Wednesday, June 22, 2011

रात और उनींदापन

रात के बारह बजे आपके रहस्यों की दुनिया धीरे धीरे सिर उठाती है, अपना काला मुँह खोलती है और गाढ़ा अँधेरा उगलने लगती है । आप इससे बचने के लिए भागते हैं और हाँफते हुए बल्ब जला लेते हैं । लेकिन फिर जब आप नींद और जागरण की संधि रेखा पर होते हैं जैसे गोधूली हो यह दुनिया फिर बोलने लगती है । लगता है मिट्टी की कोई मोटी, मजबूत दीवार जो दिन में आपकी रक्षा करती है रात में तरह तरह के जीव जंतुओं को आश्रय दे बैठी हो । झींगुर बोलने लगते हैं, मेढक टर्राने लगते हैं, कहीं जैसे चारपाई के पाए में कोई कीड़ा चल रहा हो, कहीं कोई कपड़े पर कैंची चला रहा हो, आपकी तकिया और बिछावन भी सरसराने लगते हैं और आप नींद में जाग जाते हैं ।

धीरे धीरे वह दीवार दरकने लगती है और उसमें तरह तरह की दरारें, मोखल और छेद झाँकने लगते हैं । साँपों का एक पूरा झुंड आपकी आहट लेते हुए इन छिद्रों में से अपना सर निकालते हैं और धरन, बँड़ेर, जमीन हर कहीं रेंगने लगते हैं । युगों पुरानी वेश्याएँ लुटे चेहरे पर भद्दी हँसी लेकर हाजिर होती हैं, सफेद कफ़न में लिपटी हुई वे तमाम आत्माएँ जिन्होंने जहर खा लिया या कुएँ में कूदकर जान दे दी, बेडौल बच्चे, सर कटी हुई खून में लिथड़ी बकरियाँ दुर्गंध मवाद टट्टी आप भागने की कोशिश करते हैं लेकिन आपके पाँव उठते ही नहीं ।

इस दुनिया से मेरा क्या रिश्ता है ? क्यों ये लोग मेरे पास आए हैं ? जी हाँ यह आपकी ही दुनिया है । फ़र्क इतना ही है कि आप ज्यादा चालाक, ज्यादा कलाकार हो गये हैं ।

एक सपना

करोड़ों लोगों के जुलूस के पाँव तले धरती काँप रही है । उनके एक एक कदम पड़ते हैं और दुनिया हिल हिल जाती है । यह जुलूस यहाँ से वहाँ तक पूरी पृथ्वी को चारों तरह से लपेटे हुए है । इसमें शामिल हैं स्कर्ट और शर्ट पहने अंडे और सब्जी के पैकेट उठाए लोग, लंबे स्कर्ट पहने कंप्यूटर पर थिरकती उंगलियों का संगीत रचते लोग, सुनहरे, लाल अथवा काले; घुँघराले अथवा सीधे; चोटी किए हुए अथवा खुले, लंबे अथवा छोटे बाल लहराते हुए इस जुलूस की सादगी तो देखिए । घर, सड़क, ट्रेन, पुल हर कहीं इसका एक हिस्सा बिखरा है ।

खेतों में कछनी मारकर झुके झुके दिन भर टखनों से ऊपर पानी में धान रोपते, पीठ पर अपने बच्चे बाँधे, जरा सी उत्तेजना में भभक भभक उठते चेहरे, अनंत बिवाइयों भरे या फिर मखमली जूती में पाँव, ठीक कमर पर हाथ रखकर कोई स्त्री जब आत्मविश्वास से भरा चेहरा ऊपर उठाती है तो लगता है पूरी सृष्टि से जूझ लेने की ताकत बटोर रही हो ।

इस स्त्री की उंगलियों की छाप हर कहीं पड़ी हुई है । सभी चीजें उसकी मेहनत की गवाही देती हैं । अगरबत्ती से लेकर कपड़ों तक, फ़सलों से लेकर मकान तक सब कुछ बनाने के बाद जब वह सोती है तो कभी गौर से उसका चेहरा देखिए । मान्यताएँ, रूढ़ियाँ और मर्दानगी जब सब उसे परेशान करने के लिए चौबीसों घंटे तैयार रहते हैं तब भी निश्चिंतता का एक एक क्षण वह भरपूर जीती है । आपस में कभी उन्हें बात करते देखिए बच्चों सी उत्सुकता और नटखटपन; और उसी तरह दूसरे का दुख सुनने का अपार धीरज ।

वह एक भरपूर व्यक्तित्व है । उसे समझने के लिए हमारे उपादान क्या हैं ? उसकी जाँघें, स्तन, पीठ और आँखें हमें कितना सुख देते हैं । अगर निर्वस्त्र नहीं तो यह कि उसके वस्त्र, हाथ पाँव और चेहरे की चिकनाई हमारी आँखों को कितने सुंदर लगते हैं । लेकिन हम निजी जीवन में चाहे जितने घृणित हों सार्वजनिक जीवन में अत्यंत सभ्य होते हैं इसलिए हमने स्त्री मन को एक खास रहस्यमय चीज बना डाला है । इस मन के अनुसंधान के नाम पर उतरते जाइए गहराइयों में और उसे समूचे सामाजिक जीवन से अलग छोटी छोटी सामाजिक इकाइयों में दोयम दर्जे की भूमिका निभाने तक सीमित रखिए ।

सचमुच जिस दिन यह जुलूस शक्ल ले ले उस दिन सब कुछ बदल जाएगा । कोमलता और निर्माण की उस विराट सृष्टि की कल्पना भी अत्यंत दुष्कर है । सपनों के लिए भी मामूली संघर्ष नहीं करना पड़ता ।

Tuesday, June 21, 2011

नामवर सिंह के बहाने साहित्य और कला पर बातचीत

नामवर सिंह ने साक्षात्कारों के अपने संग्रह 'कहना न होगा' में एक जगह कहा है कि सभी कलाओं की तरह कविता का भी अंतिम उद्देश्य है संगीत हो जाना । कविता के साथ यह खासी झंझट है । उसका विधान इतने तत्वों से रचा हुआ है कि उसके बारे में कोई इकहरी बात कहना खतरनाक है । लेकिन एक बात तय है कि कविता भाषा में की जाती है और भाषा की सभी अर्थ संभावनायें इसमें भरी होती हैं । उसका एक छोर दर्शन को छूता है तो दूसरा संगीत को । इस द्वंद्व को सबसे पहले सुकरात ने उठाया था अपने अंतिम संवाद में, हालाँकि अर्थ की विविधताओं के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि इस अर्थ में कि काव्य दर्शन से अलग है और संगीत की ओर बढ़ने में यह अलगाव निहित है । यह द्वंद्व आज तक हल नहीं हो पाया है कि कविता में अर्थ कहाँ निहित है उसके दर्शन में या उसके संगीत में । इसी को आम तौर पर लोग अंतर्वस्तु और रूप का अंतर कहते हैं । इस द्वंद्व को हल करने के लिए कुछ कलावादियों ने कहा कि अंतर्वस्तु जिस रूप में प्रकट हुई है वही अंतर्वस्तु है । लेकिन यह द्वंद्व का समाहार नहीं है क्योंकि अन्य कलाओं में यह प्रकट है । उदाहरण के लिए ताजमहल का रूप वही है जो उसकी अंतर्वस्तु है । किसी पेंटिंग अथवा मूर्ति की अंतर्वस्तु वही है जो उसका रूप है । इसीलिए इन कलाओं का अनुवाद नहीं किया जा सकता, न उनकी अनुपस्थिति में उनका अर्थ समझाया जा सकता है । इस मामले में कविता का मुख्य उपकरण, भाषा, थोड़ा भिन्न है । रंग, स्वर, आकार, विभिन्न आकृतियाँ प्रकृति में पहले से ही मौजूद थे । यह अलग बात है कि इनका उपयोग मनुष्य उसी रूप में नहीं करता जिस तरह वे मौजूद हैं । फिर भी आधारभूत तत्वों की मौजूदगी पहले से रही है । लेकिन भाषा मनुष्य का अपना सामाजिक उत्पादन है । वह प्रकृति के अनुकरण नहीं बल्कि उसके साथ अंतःक्रिया का परिणाम है । निश्चित रूप से शब्दों के अर्थ, अर्थात वे वस्तुएँ जिन्हें शब्द द्योतित करते हैं, पहले से मौजूद हैं । यहाँ तक कि शब्दों के आकार और उनकी ध्वनियाँ कई बार वस्तुओं और क्रियाओं का अनुकरण करते हैं । पर भाषा इतने तक ही सीमित नहीं है । अमूर्तन से ही भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता का विस्तार हुआ । यहाँ सवाल आता है अर्थ का । केदार नाथ सिंह ने एक कविता में लिखा है कि 'बाल छड़ीदा' की अगम अथाह निरर्थकता के सामने नतमस्तक हूँ । अगर उनका उद्देश्य यह है कि शब्दों के अर्थ उतने ही नहीं जितने शब्दकोश में लिखे हैं तब तो ठीक है । अन्यथा अगर यह निरर्थकता का स्वस्ति गायन है तो खतरनाक है । भाषा का कोई भी शब्द अथवा शब्द समूह किसी न किसी वस्तु अथवा परिघटना की व्याख्या करता है । चूँकि यह वस्तुगत जगत जिसकी वह व्याख्या करता है, इतना उलझा हुआ है, इतना विराट है, इसमें एक साथ ही संतुलन भी है और बिखराव भी, कि भाषा का उलझ जाना स्वाभविक है । लेकिन चूँकि वह वस्तुगत जगत में गहरे धँसी हुई है इसीलिए उसे समझे जाने की योग्यता प्राप्त हो जाती है । यहीं एक गुत्थी सुलझती है । हालाँकि भिन्न भिन्न भाषाएँ एक दूसरे के बोलनेवाले की समझ में नहीं आ सकतीं फिर भी उसमें कही गई बात का दूसरी भाषा में अनुवाद संभव है । इस पर कोई कोई कहते हैं कि अनुवाद में कविता मर जाती है । इस अर्थ में कोई भी वस्तु अथवा विचार इसीलिए विशिष्ट होता है कि उसका कोई विकल्प नहीं होता । तभी सामान्यता और प्रतिनिधित्व अपना कार्य शुरू करते हैं । भाषा स्वयं एक प्रतिनिधित्व है । अन्यथा एक पत्थर, आँसू की एक बूँद, एक फूल और एक औरत को एक लाइन में खड़ा कर देने से जो अर्थ पैदा होगा उसका भी विकल्प कोई कविता नहीं हो सकती । भाषा प्रकृति और मानव समाज को मनुष्य की ओर से समझने के प्रयास का परिणाम है । अब सवाल है कि मनुष्य प्रकृति का अंग है कि नहीं । अत्यंत स्पष्ट है कि तमाम कोशिशों के बावजूद यदि उसे प्रकृति की गोद में वापस नहीं ले जाया जा सका तो अवश्य मनुष्य अपनी किसी अंतर्निहित विशिष्टता के कारण प्रकृति के अन्य तत्वों से अलग हुआ । भाषा प्रकृति से उसकी स्वाधीनता का लक्षण है । प्रकृति और मानव समाज को समझने के लिए उसने भाषा में अर्थ की अनेक ध्वनियाँ पैदा कीं । कविता के अर्थ की सभी ध्वनियों, जिसमें उसके रूप के जरिए भी पैदा होने वाली सभी संभवतम ध्वनियाँ भी शामिल हैं, के स्रोत इस व्यापक सामाजिक व्यवहार में ही खोजे जा सकते हैं । इस सामाजिक व्यवहार में भावावेग भी शामिल हैं और बुद्धिग्राह्य तर्क भी । इसीलिए कविता की छायाएँ मात्र भावावेग को छूकर उड़ती नहीं फिरतीं बल्कि वह बुद्धि द्वारा समझी भी जाती है । लेकिन यदि कविता अथवा साहित्य मात्र इतने ही होते तो लोकगीतों और लोगों की आपसी बातचीत से भी काम चल जाता । हालाँकि अर्थ के संप्रेषण के सबसे अधिक साधन इसी खजाने में से प्राप्त किए जा सकते हैं । लेकिन आधुनिक या छपा हुआ साहित्य भाषा के सामाजिक पुनरुत्पादन के सबसे जटिल और उत्तम प्रयास हैं । यथार्थ की जटिलता को समझने और उसे अभिव्यक्त करने के ये नवीनतम प्रयास हैं । उनके सृजन और ग्रहण में वही सामाजिक प्रक्रिया मूर्तिमान होती है । इसीलिए जो साहित्य यथार्थ की सबसे सही तस्वीर पेश करता है वह मात्र समाज से भाषा लेता नहीं बल्कि समाज को नई भाषा देता भी है ।


गिरिधर कविराय की कुंडलिया

सोना लादन पिउ गए सूना करि गये देस

सोना मिला न पिउ मिले रूपा ह्वै गे केस

रूपा ह्वै गे केस रोय रंग रूप गँवावा

सेजन को बिसराम पिया बिन कबहुँ न पावा

कह गिरिधर कविराय लोन बिन सबै अलोना

बहुरि पिया घर आउ कहा करिहौं कै सोना

Monday, June 20, 2011

कविताओं के अभ्यास


उसका नाम

अफ़जल भी हो सकता है

और हो सकता है

मुश्ताक भी

दुनिया की हर खुशी

उसके जीवन में

महज एक पल के लिए

आती है ।

वह मिल सकता है रिक्शे पर

पैदल बस में या ट्रेन में

हर कहीं उसकी पहचान

की जा सकती है

उसके डर से ।

वह छुट्टी पर घर

जा रहा होता है

या नौकरी पर शहर

वह नौजवान हो सकता है

या हो सकता है बूढ़ा

वह खामोश हो सकता है

या हो सकता है बातूनी

किसी भी स्थिति में

वह दिन डूबने से डरता है

उसने पूछा था

दिन में चलने वाली

गाड़ियों के बारे में

छोटे बच्चों के लिए मिठाइयाँ

खरीद ली थीं उसने

रिश्तेदारियों के लिए

दिया जाने वाला समय भी

तय कर लिया था

सब कुछ के बारे में

हँसकर बताने के बाद

सहमते हुए आखिरी सवाल

उसने पूछा था

मुझे लगा कि जब उसने

पहले कपड़े पहने थे

तभी उन पर लिख दिया गया था

उसका धर्म

और इस अपराध में

उसकी कमीज कभी भी

गाढ़े, गर्म इंसानी लहू में

नहा सकती है

लेकिन कोई भी चीज उसे

रोक नहीं सकती

भय और अनिश्चय के बीच

उसे अपना रास्ता बनाना ही है

लोगो

सावधान होओ कि

तुम्हारी नींद से होता हुआ

एक खतरनाक तूफ़ान

चला आ रहा है

कि सबसे कोरे कागजों पर

सबसे खतरनाक इबारतें

लिखी जा रही हैं

याद रखो कि

पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ गुजर सकती हैं

खामोश

लेकिन सवाल नहीं मरते

क्योंकि आदमी कभी नहीं मरता

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जिंदगी की सरहदों से घिर गया हूँ इस तरह

कोइ रस्ता खुल नहीं सकता यहाँ से या खुदा

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जुबान की हल्की जुम्बिश से

हाँ या ना के बीच

निकला हुआ

कोई गोलमोल जवाब

अँधेरी सुरंगों में

आपके जाने का रास्ता

धीरे धीरे तैयार करता है

जिंदगी के तमाम सरोकारों से

नाता टूट जाने के बाद

आप इस पर कदम बढ़ा सकते हैं

तबाहकुन फ़ैसले लिए नहीं जाते

हो जाते हैं

फिर मिलती है मुसाफ़िरों की

एक लंबी कतार

चेहरे पर परिचय की मुस्कान

और कहीं जाने की हड़बड़ी

साथ साथ लपेटे

आप इस जुलूस में

शामिल हो भी सकते हैं

और नहीं भी

दोनों ही स्थितियों में आपका स्वागत है

किताबों के पुराने पन्ने पलटते हुए

अतीत की परछाइयाँ

हल्के हल्के

आपके दिम्मग से गुजरती रहती हैं और

आप बेवजह उदास हो जाते हैं

छोड़िए

आप कितने भाई हैं

आपकी बहन कहाँ ब्याही है

आपके पिताजी हैं या नहीं

इससे किसी को क्या फ़र्क पड़ता है

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किसी पेड़ की एक पत्ती

नहीं हिल रही

बल्ब स्थिर हैं

कुतुबमीनार खड़ी है

दूर कहीं तेज हवा का शोर

सुनाई दे रहा है

और मैं इंतजार करता रहा

बल्ब नाचें

पेड़ झूमें

कुतुबमीनार काँपे

पहले एक चिड़िया बोली

फिर दूसरी

फिर हल्की हवा का एक झोंका आया

कुछ बूँदें टपकीं

बिजलियाँ चमकीं

लेकिन तूफ़ान नहीं आया

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वर्तमान (साहित्य) कविता (विशेषांक)

आग एक शब्द है

और शब्द एक आग

घोड़ा घास है लगाम है और

है उद्दाम वासना

कविता प्यार है

प्यार एक खेल

खेल स्वतंत्रता है

और स्वतंत्रता ?

दया औरत है

औरत पृथ्वी

कवि एक चिंगारी है

और है फूल

क्योंकि चिंगारी और फूल में

कोई खास फ़र्क नहीं है

संक्षेप में

मैं जो कुछ भी कह सकूँ

और आप समझें नहीं

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लहराती फ़सलों के समुद्र में

मैं अकेला खड़ा हूँ

कोई और आदमी नहीं

कोई घर भी नहीं दिखाई देता

फिर भी दुनिया से

चिल्ला चिल्ला कर बताना चाहता हूँ

देखो मैं यहाँ अकेला नहीं हूँ

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रात बारिश हुई और मैं सोया रहा

जैसे मुझे कोई प्रेम करता रहा हो

और मैं चूक गया होऊँ

इस बारिश में आप मुझे

नंगे नहाने की इजाजत दें

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मन की बंसी पर उंगली यह तेरी यूँ ही फिरा करेगी

सुख की नींद सुला दो प्यारी रात समूची जगा करेगी

आँखें तेरी कोंपल जैसी देखे से जो होश उड़ा दें

बेहोशी में आशा जैसे किस्मत मेरी खुला करेगी

ताप पसीना चिंता दुख औ खतो किताबत घर के राज़

गोपनीय विषयों पर तेरे बात हमेशा चला करेगी

नया काम करना खतरा है मगर डगर यह बनी पुरानी

जब भी चलेगी इसकी चर्चा सीधे दिल में लगा करेगी

दर्द बहुत है मेरे दिल में एक बार गर झाँको तुम

दर्दे ज़माना दर्दे मुहब्बत दर्दे जिंदगी दिखा करेगी

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कविता मेरी जाग उठी है लेकर के अँगड़ाई आज

अंतर्मुखी चेतना जैसे उपजे परिवर्तन विश्वास

लड़ता जीवन हारा सँभला गिरा उठा औ खड़ा हुआ

रुत की रंगत ही ऐसी है आज जगाए मन में आस

कहने को तो बहुत बड़ी है भूख पेट की तन की आग

मगर मुझे ऐसा लगता है सबसे बड़ी हृदय की प्यास

खोज जगत में उस डोरे को जिसमें हैं सब बँधे हुए

तभी मिलेगी शांति कल्पने चैन छीनता यह अहसास

मेरे जैसे और बहुत हैं लट के धोखे खाए लोग

और बहुत हैं गम के मारे खोजो आँख लगाकर पास

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सधे सधे कदमों से आती जनता मेरे मनोजगत में

प्यारे प्यारे भाव जगाती जनता मेरे मनोजगत में

राह बड़ी फिसलन वाली है जीवन की औ कविता की

रस्ते सारे ठोस बनाती जनता मेरे मनोजगत में

उलझ उलझ जाती है डोरी चिंतन की जब कई तरह से

पड़ी सभी गाँठें सुलझाती जनता मेरे मनोजगत में

तार तार हो बिखरे मन और टूट टूट कर इच्छा शक्ति

सूत जोड़कर डोर बनाती जनता मेरे मनोजगत में

वन में फूल धान खेत में बादल में ज्यों बिजली हो

गंध फूल में वैसे आती जनता मेरे मनोजगत में

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कभी कभी मन खो जाता है

तेरे जैसा हो जाता है

तू हँसती है बचपन जैसी

दुःख दूर हो सो जाता है

हृदय तुम्हारा पानी जैसा

कपट कलुष सब धो जाता है

चलने से घुँघरू बजते हैं

और और मन हो जाता है

तुम आओगी इसी सहारे

चिंता जीवन ढो जाता है

ध्यान तुम्हारा कविता बरसे

चमत्कार यह हो जाता है

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कविता बहुत सरल होती है दुख की राह गुजरने से

सुख आते हैं इस जीवन के दुख सागर में सपने से

माता की छाती छूटी और छाँह पिता की छूट गई

भाई का साया छूटा है सत्य सत्य कुछ कहने से

पाया तुम्हे बहुत नामों में मगर रूप सब जगह समान

तुम तो सबको मिल जाते हो जग जीवन में बसने से

नया क्षेत्र है जीवन रण का मेरे सम्मुख खुला हुआ

दिल दूना छाती गज भर की होती तेरे होने से

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Tuesday, June 14, 2011

दलित नेता के लिए


एक आदमी अछूत पैदा हुआ । गाँव के एक तरफ़ की बस्ती के एक घर में उसकी आँखें खुलीं । उसे बताया गया कि इस बस्ती के तो सारे लोगों के साथ उसका अपनापा है । दरअसल बताया भी नहीं गया उसने सहज बोध से जान लिया । और उसी गाँव की बाकी बस्तियों के लिए वह अछूत है । हालाँकि उस बस्ती में कोई दुकान नहीं थी और न ही खाने कमाने का कोई जरिया वहाँ से खुलता था । इसलिए दूसरी बस्तियों के साथ संबंध तो उसका रहेगा रोज रोज का लेकिन एक अजीब किस्म का । जाकर काम करने का, बेगार खटने का, हाथ पर ऊपर से टपका दी गई रोटी और नमक को कुत्ते की तरह खाने का, शाम को कुछ अनाज देकर एक शीशी तेल पुड़िया भर मसाला और नमक खरीदने का, पर वहाँ रोज रोज जाने के बावजूद वह बाहरी ही रहेगा । इस संबंध को समाजशास्त्रियों ने अनेक तुलनाओं के जरिए समझने की कोशिश की लेकिन इससे इसकी जटिलता और विचित्रता कम नहीं हुई ।

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सदियों से एक ही कहानी चलती आ रही है । शायद बहुत दिनों तक वह और भी दोहराई जायेगी । कुछ ने इसे सिर झुकाकर मान लिया कुछ ने कहा नहीं । कभी यह आवाज जिबह किए जाते हुए बकरे की तरह फूटी कभी चीख की तरह कभी एक खामोश ऐंठन सीने और पेट को जलाती रही कभी सारी बस्ती में एक चूल्हा नहीं जला कभी चोरी कभी डाका कभी षड़यंत्र कभी खून कभी हत्या- सबमें वही एक नहीं गूँजता रहा । नौजवानों के बदन बार बार धान की बालियों की तरह फूट फूट बाहर आते रहे । तेल चुपड़े हुए लंबे बाल, छींटदार लुंगी, हाथ में रेडियो पकड़कर एक क्षण को उन्हें लगता बाकी सारे नौजवानों की तरह उन पर भी जवानी आई है । लेकिन यह अहसास तभी तक रह सकता था जब तक कोई बाबू किनारीदार धोती पहने, जनेऊ डाले दिखे नहीं । उनके दर्शन हुए नहीं कि आत्मा तक सकुच जाती । क्या क्या नहीं किया उन्होंने इस संकोच से जी छुड़ाने के लिए ।

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उनके सभी नेता अछूत मरे । हाथ में देश का संविधान रहे या राइफ़ल की अकड़, दर्शन की ऊँचाइयाँ हों या लाखों लोगों का साथ- जीवन भर वे अछूत रहे और जब मरे तो भी अछूत । शायद वे ऐसी जलती हुई आग हैं जिनमें कोई मिलावट संभव नहीं । शायद यही उनकी सच्चाई का सबूत है । वे स्वीकार किए जाने की माँग नहीं करेंगे क्योंकि इसकी आशा ही व्यर्थ है । वे तो सब कुछ भस्म कर देंगे । एक के मरने से निश्चिंत होने की कोई जरूरत नहीं । उन्हें तो यह धरती ही पैदा करती है । वे रक्तबीज हैं ।

Monday, June 13, 2011

किसलय के लिए


इस पृथ्वी पर घटनेवाली सबसे हैरतअंगेज घटना घट चुकी थी । सभी पिरामिडों, भवनों, सभी मूर्तियों, सभी चित्रों, सभी रचनाओं से अधिक महान और आश्चर्यजनक घटना कि एक जीवित मनुष्य इस दुनिया में पधार चुका था ।

उसका लड़की होना मुझे ज्यादा स्वाभाविक लगा था क्योंकि उसकी माता स्त्री थी । मैंने सोचा माता के भीतर वह धीरे धीरे आकार ले रही होगी । हाथों के भीतर हाथ, पाँवों के भीतर पाँव और इस तरह पचीस वर्ष बाद मेरी पत्नी पुनः पचीस वर्ष पीछे आ जाएगी । लेकिन ऐसा नहीं हुआ और एक स्त्री ने एक पुरुष को जन्म दिया । अनेक लोग कहते हैं कि पुरुष और स्त्री की दुनियाएँ बुनियादी रूप से भिन्न हैं । इस घटना के मद्देनजर इस पर यकीन करना मुश्किल है ।

उसका जन्म ऐसे समय हुआ जब झूठ, फ़रेब, मक्कारी और क्रूरता को मरकजी रुतबा हासिल था । शायद वह लड़की होता तो मैं सोचता कि बाहर की दुनिया से उसे बचा ले जाऊँगा लेकिन लड़का तो जूझेगा, लड़ेगा, मरेगा । इतनी चिंता को वह अनजाने चुरा लेता है । आप देखते हैं कि उसकी साँस तेज तेज चल रही है और सारा ध्यान फिर उसकी साँस पर । दस सेकंड के अंदर वह सोए में मुस्करा देता है और आप खुश ।

उसने तो होश भी नहीं सँभाला और अभी से राहत की वजह बन गया । इसे व्यक्तिगत संपत्ति के प्रति मेरी पक्षधरता न माना जाय तो कहूँगा कि अबसे पहले किसलय अर्चना के भीतर धड़क रहा था अब मेरे भीतर धड़कता है । उसके बंद हाथों में जीवन की बागडोर है तो खुले हाथों में जमाने भर का इंद्रजाल । त्वचा की एक एक पोर से वह है और बस ।

स्वप्न और जागरण, नींद और होश, सोचना और बोलना- ये अलग अलग विभाग हैं । इनमें कोई भी घालमेल खतरनाक है । ये सब अपनी जगह पर सही तरीके से काम करते रहें इसकी तो वह गारंटी लेकर पैदा हुआ है । आसमान को वह दोनों हाथों से थामे हुए है और दोनों पाँवों से धरती को ठेल रहा है । है कोई इसके मुकाबले ?