Wednesday, July 20, 2022

अमेरिका में अहिंसक प्रतिरोध

 


2019 में सिटी लाइट्स बुक्स से माइकेल जी लांग के संपादन में ‘वी द रेजिस्टेन्स: डाकुमेंटिंग ए हिस्ट्री आफ़ नानवायलेन्ट प्रोटेस्ट इन द यूनाइटेड स्टेट्स’ का प्रकाशन हुआ । किताब की प्रस्तावना क्रिस हेजेस ने और पश्चलेख डोलोरेस हुएर्ता ने लिखा है । क्रिस का कहना है कि कारपोरेट शासन की नवउदारवाद, खुला बाजार और वैश्वीकरण जैसी विचारधाराओं की विश्वसनीयता खतरे में पड़ गयी है । इनकी जगह लेने वाले विचार अभी अपरिपक्व हैं । दक्षिणपंथ ने ईसाई फ़ासीवाद, परदेशी से भय, नस्लभेद, व्यक्तिवाद और हिंसा की राह पकड़ ली है । वामपंथ खुद को पुनर्गठित करने की प्रक्रिया में है । दुनिया भर में कुलीन शासकों के विरोध का माहौल बना हुआ है । ऐसे में सवाल उठता है कि जनता की भावनाओं को कौन विचार और कौन से सपने व्यक्त करेंगे । जब क्रांति होती है तो उसे व्यवस्था के पोषक अप्रत्याशित और अचानक घटित की तरह पेश करते हैं । इसका कारण है कि क्रांतिकारी चेतना के निर्माण का काम समाज की मुख्यधारा से अदृश्य रहता है । जो लोग भी बुनियादी बदलाव लाना चाहते हैं उन्हें शासकों के विचारों की विश्वसनीयता को समाप्त करना होता है और अपने विचारों को समाज में स्थापित करना होता है । इन वैकल्पिक विचारों को शासक समुदाय अक्सर ही कपोल कल्पना कहकर खारिज कर देता है । इन्हीं विचारों को जब बहुसंख्यक आबादी अपना लेती है तो पुराना शासन मृतप्राय हो जाता है । विचारों की इसी ताकत की बदौलत तमाम कुकृत्य के बावजूद सरकार और पूंजीवाद बरकरार रहते हैं । पीड़ित लोग भी इन उत्पीड़क संस्थाओं का समर्थन करते हैं और उनमें यकीन बनाये रखते हैं । इसी तरह जब तक अधिकांश नागरिक विश्व पूंजीवाद के समर्थक विचारों में यकीन करते रहेंगे तब तक उनकी सेवा करने वाली सरकारी और निजी संस्थाओं पर कोई आंच नहीं आयेगी ।

विचारों के मोर्चे पर चलने वाला संघर्ष सतह के नीचे चलता है । क्रिस के मुताबिक इसी संघर्ष में कारपोरेट राज्य की पराजय हो रही है । अधिकाधिक अमेरिकी इसे महसूस करने लगे हैं कि सर्वाधिक बुनियादी नागरिक अधिकार भी क्षीण होते जा रहे हैं । हम सभी अब तक के मानव इतिहास की सबसे अधिक हस्तक्षेपी सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी तंत्र के शिकार हैं । देश के आधे लोग अनुद्योगीकरण या स्वचालन के चलते जीने लायक वेतन नहीं पा रहे हैं और गरीबी में धकेल दिये गये हैं । किसी भी सफल क्रांति के लिए तमाम लोग इस माहौल को सर्वाधिक अनुकूल बताते हैं । लगभग सभी सामाजिक तबकों में व्याप्त विक्षोभ, आकांक्षाओं के पूरा न होने से उपजी गहरी निराशा, मुट्ठी भर शासकों के विरुद्ध एकजुटता, शासकों की कार्यवाहियों को तर्क का जामा पहनाने से बौद्धिक चिंतकों का साफ इनकार, नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में सरकार की अक्षमता, शासक समूह की इच्छाशक्ति में गिरावट और उनमें भगदड़, उनके सहयोगियों का कम होते जाना और आखिरकार आर्थिक संकट आदि को ही इसका लक्षण बताया जाता है । इन सबकी मौजूदगी के साथ ही एक अन्य तत्व भी क्रांति के लिए आवश्यक बताया जाता है । ऐसी असम्भव मागें जनता की ओर से उठने लगती हैं जिनके पूरा करने का मतलब स्थापित शक्ति संतुलन का ही खात्मा होगा ।

क्रिस हेजेस बीस सालों से विद्रोहों और क्रांतियों की पत्रकारिता करते रहे हैं । उनका मत जार्ज आर्वेल से मिलता जुलता है जिनका कहना था कि अन्यायी शासक धोखाधड़ी और बल के जरिये शासन चलाते हैं । जब धोखाधड़ी उजागर हो जाती है तो बलपूर्वक दमन ही उनका एकमात्र सहारा रह जाता है । यह युग ऐसे ही नंगे और निर्लज्ज दमन का युग है । आंतरिक सुरक्षा और निगरानी तंत्र से जुड़े लाखों नौकरशाहों को आतंकवाद रोकने से कोई मतलब नहीं, उन्हें जनता को काबू में रखने की जिम्मेदारी मिली हुई है । सभी निरंकुश शासनों का अंत भीतरघात से होता है । जब सिपाही प्रदर्शनकारियों की गिरफ़्तारी या उन्हें दंडित करने से इनकार करते हैं तो शासन में दरार पड़ जाती है । शासक वर्ग के भीतर की यह दरार बहुत धीरे धीरे चौड़ी होती है और बहुधा उसका अंदाजा नहीं लगता क्योंकि अक्सर यह काम विस्फोटक तरीके से अंजाम नहीं दिया जाता ।

क्रांतियां ऐसी घटनाओं पर फूट पड़ती हैं जिन्हें अन्यथा सरकारी अन्याय की बेहद छोटी घटना माना जाता । असल में जब विक्षोभ का प्याला भर जाता है तो कोई छोटी सी चिंगारी भी आग भड़काने के लिए काफी होती है । इसके बारे में पहले से बताना असम्भव होता है । कोई नहीं जानता कि इसका स्वरूप क्या होगा लेकिन उसकी आहट सुनायी देने लगती है । नागरिकों की न्यूनतम शिकायत जब सरकार सुनना बंद कर दे, सरकारी हिंसा को रोकने में उसकी दिलचस्पी ही न रह जाये, बेरोजगारी हद को पार कर जाये, जनता कर्ज के बोझ से कराहने लगे तथा उम्मीद की कोई भी रोशनी न नजर आये तो विक्षोभ का विस्फोट होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है ।

मैक्स वेबर का कहना था कि अगर लोग असम्भव की मांग लगातार न करें तो सम्भव भी हासिल नहीं हो सकता । स्वप्नदर्शियों के ही चलते सामाजिक बदलाव आये हैं, व्यावहारिक नेताओं के करने से कुछ भी न हुआ होता । गुलामी का खात्मा न हुआ होता अगर कुछ साहसी लोगों ने उसके खात्मे की बात न की होती । गुलामी को सार्वजनिक बहस की दुनिया से ही राजनीतिक पार्टियों, चर्चों और अन्य संस्थाओं ने खामोशी की साजिश के जरिये बाहर कर रखा था । उसके खात्मे को असम्भव माना जाता था । लिंकन व्यावहारिक नेता थे इसलिए उन्होंने गुलामी को क्रमिक रूप से खत्म करने की योजना बनायी थी जिसके तहत गुलाम मालिकों को हरजाना देना था और स्वतंत्र गुलामों को अमेरिका के बाहर बसाने के लिए उपनिवेश स्थापित करने थे । जिन लोगों ने तत्काल गुलामी के खात्मे की मांग की उन्हें अव्यावहारिक और गैर जिम्मेदार माना गया लेकिन आखिरकार उनकी ही योजना के मुताबिक बिना किसी हरजाने के गुलामी का खात्मा हुआ और अश्वेतों को अमेरिकी नागरिकता हासिल हुई ।

शासकों के आदेशों के खुले उल्लंघन से पहले ही उनके विचारों से लोगों का भरोसा उठ जाता है । हेजेस के अनुसार खुले बाजार वाले पूंजीवाद और वैश्वीकरण के साथ यही हो रहा है । इसके बाद धीमी गति से जारी बदलाव को क्रांतिकारी विस्फोट बनते ज्यादा देर नहीं लगेगी । विचारों और सपनों से रहित आंदोलन से शासकों को कभी डर नहीं लगता । दिशाविहीन सामाजिक आलोड़न जल्दी ही हिंसा और अराजकता में पतित हो जाते हैं । उनमें आत्महंता वृत्ति होती है । लेखक दीर्घकालीन रणनीति में विश्वास करते हैं । उनका मानना है कि इसी तरह बुनियादी सामाजिक और राजनीतिक बदलाव आते हैं और कायम रहते हैं ।

सामान्य तौर पर हेजेस ने कारगर लोकतांत्रिक माहौल में सुधारों का पक्ष लिया है और माना है कि सामाजिक संस्थाओं को इस बात की अनुमति देनी चाहिए कि सत्ता पर काबिज ताकतों को नागरिक खारिज कर सकें । इन संस्थाओं को कारपोरेट शाक्ति के अधीन होने की जगह आजाद होना चाहिए । ऐसी व्यवस्था के अभाव में विद्रोह ही एकमात्र रास्ता बच जाता है । जब शासक समूहों की वैधता के तर्क समाप्त हो जाते हैं तो वे बलपूर्वक दमन करने लगते हैं । सत्ता पर अपनी पकड़ बनाये रखने का यही अंतिम तरीका उन्हें आता है । जब कोई लोकप्रिय आंदोलन नौकरशाहों और पुलिस के अधिकारियों को वैचारिक रूप से निरस्त्र कर देता है तो बदलाव सम्भव हो जाता है लेकिन अगर शासक विक्षोभ का दमन करने के लिए हिंसक दमन का तरीका लम्बे समय तक अपनाते हैं तो फिर क्रांतिकारी हिंसा शुरू हो जाती है जिसे सरकारें आतंकवाद का नाम देती हैं । ऐसी क्रांतियों के नेता शासकों की तरह ही हिंसक क्रूरता का आचरण करने लगते हैं । यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होती है । कोई भी आंदोलनकारी कार्यकर्ता देश की जनता को सरकारी हिंसा के साथ विपक्षी हिंसा से भी बचाना चाहता है । कारपोरेट सरकारी समूह के पास विकराल आंतरिक सुरक्षा तंत्र और सैन्यीकृत पुलिस बल होने से इसकी गारंटी मुश्किल तो है लेकिन इसकी कोशिश जरूर करनी चाहिए । कारण कि अगर प्रतिरोधी ताकतें भी हिंसा की भाषा बोलने लगें तो सत्ता की निर्दयता का मुकाबला करना असम्भव हो जाता है । सत्ता द्वारा विपक्ष की हिंसा का इस्तेमाल उसे समाज से अलगाव में डालकर कुचल देने के लिए किया जाता है ।

वर्तमान माहौल का जिक्र करते हुए हेजेस बताते हैं कि कारपोरेट सत्ता को टिकाये रखने वाले विचार समाप्त हो चुके हैं । इससे पैदा हुए शून्य को समाजवाद के सपने से भरना होगा । साथ ही अधिकाधिक जन समुदाय को अपने पक्ष में भी खड़ा करना होगा । इस काम में विफल होने पर धार्मिक फ़ासीवाद के उभार को रोकना कठिन साबित होगा । 

Friday, July 8, 2022

‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ की लेखन प्रक्रिया

 

                 

इसके लेखकद्वय घोषणापत्र के लेखन से पहले ही क्रांतिकारियों के बीच चर्चित हो चुके थे । इसके कारण ही लीग ने उन्हें यह दायित्व सौंपा था । दोनों का जन्म जर्मनी के राइनलैंड में हुआ था । उस स्मय जर्मनी नाम की कोई राजनीतिक इकाई नहीं थी । 1815 की वियेना कांग्रेस से 41 हिस्सों वाले जर्मन महासंघ का गठन हुआ जिनमें राजनीति, अर्थतंत्र और संस्कृति के मामले में पर्याप्त भिन्नता थी । इनमें राइनलैंड पर चरम प्रतिक्रियावादी प्रशिया का अधिकार था । दिक्कत यह थी कि राइनलैंड पर 1813 तक फ़्रांस का कब्जा रहा था इसलिए शेष प्रशिया के मुकाबले यहां फ़्रांसिसी क्रांतिकारी विचारों के प्रभाव के कारण उदार माहौल था । मार्क्स के पिता यहूदी मूल के धनी उदार परिवार से जुड़े थे । जब राइनलैंड दुबारा प्रशिया के अधिकार में आया तो उन्होंने प्रोटेस्टैन्ट धर्म अपना लिया था । विद्यार्थी जीवन में मार्क्स क्रांतिकारी विचारों की ओर आकर्षित थे । उन्हें कविता पसंद थी जबकि पिता उन्हें कानून की शिक्षा देना चाहते थे । 1836 में मार्क्स बर्लिन आ गये और हेगेल के विचारों की जटिल दुनिया उन्हें भा गयी ।

हेगेल के चिंतन की सबसे खास बात द्वंद्ववाद थी । सरल भाषा में कहें तो यह समाज समेत सभी चीजों को गतिशील मानता है । इसके मुताबिक दुनिया स्थिर नहीं है बल्कि इसमें बुनियादी बदलाव और विकास युगों के जरिये होता है । यह बदलाव किसी भी परिघटना की आंतरिक गतिकी और तनावों के जरिये आता है । यह विकास किसी बाहरी प्रेरक का नतीजा नहीं होता है । किसी भी सामाजिक परिघटना में विकास और उसके ध्वंस के बीज उसके भीतर छिपे रहते हैं । हेगेल के अनुसार किसी भी युग की विश्व चेतना इतिहास के जरिये और अधिक स्वतंत्रता की ओर गतिमान होती है । इसका नमूना उनके लिए फ़्रांसिसी क्रांति के उपरांत नेपोलियन द्वारा प्रशिया में किये उदारवादी सुधार थे । इस पर सवाल खड़ा होता है कि जब प्रशिया ने उन सुधारों को उलट दिया तो क्या इसे इतिहास की पश्चगति कहेंगे । हेगेल का देहांत 1832 में हुआ था और अपने अंतिम वर्षों में वे प्रतिक्रिया के पक्ष में चले आये थे तथा प्रशियाई शासन को साक्षात तार्किकता कहा था । इसके कारण ही उनके चिंतन की कुल जटिलता के बावजूद देहांत के बाद उन्हें आधिकारिक प्रशियाई दार्शनिक बना दिया गया ।

ऐसे में हेगेल के समर्थकों के ही एक समूह ने परवर्ती हेगेल के मुकाबले युवा हेगेल के क्रांतिकारी विचारों को परवर्ती हेगेल के विरोध में व्याख्यायित करने लगा । इस समूह को युवा हेगेलपंथी कहा गया । उन्होंने हेगेल के संपूर्ण को मानवता के रूप में समझा और प्रशियाई शासन को इसका विरोधी साबित किया । प्रशियाई शासन के विरोधी ये हेगेलपंथी दार्शनिक रूप से भाववादी थे अर्थात उनकी नजर में दुनिया को चलाने वाली ताकत विचार हुआ करते हैं । इसलिए बदलाव भी वहीं पर होंगे । शुरू में मार्क्स का आकर्षण इन लोगों की ओर हुआ लेकिन वे प्रतिक्रियावाद पर न केवल सबसे अधिक तीखा हमला करते बल्कि तत्कालीन उदारवाद की सीमाओं से असंतुष्ट भी थे । अपनी इसी क्रांतिकारिता के चलते वे जल्दी ही इस भाववाद से मुक्त हुए और दार्शनिक रूप से भौतिकवाद के साथ खड़े हो गये । आज भी भौतिकवाद को इस तरह देखा जाता है मानो विचारों की दुनिया से उसका कोई रिश्ता ही नहीं होता हो । सवाल यह नहीं कि विचारों और संस्कृति की दुनिया अप्रासंगिक होती हो या उन्हें आर्थिक अथवा भौतिक हितों की प्रतिध्वनि मात्र माना जाता हो । मार्क्स और एंगेल्स के रुख में भौतिक और वैचारिक का जटिल अंतर्ग्रंथन मिलता है । उनके वैचारिक विकास को जर्मन विचारधारा और कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र में देखा जा सकता है । 1841 में मार्क्स को शोधोपाधि मिल गयी लेकिन उनके विचारों के कारण शिक्षण संस्थानों में उनका प्रवेश असम्भव हो गया । उन्होंने पत्रकारिता को अपनाया लेकिन जब इस क्षेत्र में भी उनके विचारों पर प्रतिबंध लगाया गया तो वे पेरिस चले आये । वहीं उनकी मुलाकात भांति भांति की वाम धाराओं के साथ लीग आफ़ जस्ट के प्रवासी जर्मन क्रांतिकारियों से हुई । उन्हें संगठित मजदूर वर्गीय आंदोलन की सुगबुगाहट भी सुनायी पड़ी ।

मार्क्स को लगा कि मानव मुक्ति का व्यावहारिक तत्व इतिहास ने समाज के इन्हीं तबकों में पिरो दिया है । ऐसे माहौल में एडम स्मिथ जैसे अर्थशास्त्री की पढ़ाई और 1844 की जर्मन बुनकरों की हड़ताल ने उन्हें पक्का वामपंथी बना दिया । जिस साल उनकी पहली पुत्री का जन्म हुआ उसी साल वे कम्युनिस्ट बने । उस जमाने में कम्युनिस्ट होने का मतलब निजी संपत्ति के विरोध में मूलगामी समता और बहुतेरे भले मनुष्यों की सामुदायिकता का पक्षधर होना था । इस दौरान मार्क्स ने अपने सिद्धांत का विकास किया । यह काम उन्होंने एकाधिक लेखों के जरिये किया । सबसे पहले उन्होंने कहा कि फ़्रांसिसी शैली की क्रांति अगर प्रशिया में हो और केवल सरकार का रूप बदल जाये तथा बुनियादी अर्थतंत्र को बरकरार रखा जाये तो इससे मानव मुक्ति नहीं होनी है । दूसरी बात कि जर्मन पूंजीवाद इतना भी नहीं कर सकता । यह काम भी मजदूरों की अगुआई में ही संपन्न होगा । तीसरी बात कि पूंजीवाद का मुख्य उत्पादक समूह होने के नाते सर्वहारा ही अपने आपको मुक्त करने के क्रम में मानवता को भी मुक्त करेगा । मजदूर वर्गीय क्रांति ही सार्वभौमिक मुक्ति की राह प्रशस्त करेगी यह धारणा इन लेखों में बीज रूप में व्यक्त हुई है । चूंकि मजदूरों के पास कोई निजी संपत्ति नहीं होती इसलिए ही निजी संपत्ति से समाज को मुक्त करने में वे सक्षम हैं ।

एंगेल्स तो समृद्ध व्यापारी के पुत्र होने के नाते मार्क्स से भी अधिक धनी परिवार से आये थे । वे भी युवा हेगेलपंथियों और उनमें भी फ़ायरबाख के लेखन की ओर खिंचे थे । मार्क्स से दो साल पहले ही वे कम्युनिस्ट हो गये थे और अपने पिता के कारखाने में काम करने मानचेस्टर आये थे । अंग्रेज मजदूरों की दुरवस्था देखकर उन्होंने इंग्लैंड के मजदूर वर्ग की दशा पर मशहूर किताब लिखी । 1842 में दोनों की पहली मुलाकात हुई थी लेकिन कुछ खास रुचि नहीं उपजी लेकिन 1844 में पेरिस में हुई मुलाकात ने ऐसी गांठ बांधी कि दोस्ती मार्क्स के देहांत तक चलती रही । पेरिस में दोनों ने संयुक्त रूप से जो शुरुआती लेखन किया उसका घोषणापत्र पर असर है । होली फ़ेमिली में उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी धारणा का विकास किया । जर्मन विचारधारा में उन्होंने अलगाव को ऐसी भौतिक, सामाजिक और मानसिक प्रक्रिया के रूप में समझा जिसमें मजदूर अपनी उत्पादक गतिविधि को बेचने के लिए मजबूर हो जाता है । उसके जरिये ऐसा काम साधा जाता है जिस पर उसका, अन्य मनुष्यों का या प्रकृति का अधिकार नहीं रह जाता । इस विचित्र स्थिति पर काबू पाने के लिए निजी संपत्ति, खासकर उत्पादन के साधनों का स्वामित्व समाप्त कर देना होगा । जर्मन विचारधारा में उन्होंने शासक वर्ग के विचारों को शासक विचार कहा । इसमें शासक वर्ग के हित साधने के लिए ऐसे विचार पेश किये जाते हैं कि ये विचार सहज बोध या शाश्वत सत्य की तरह महसूस होने लगते हैं । उनका प्रभुत्व तोड़ने के लिए उनको टक्कर देनी पड़ती है । ऐसे विचारों की ताकत की बदौलत विषमता और उत्पीड़न की व्यवस्था कायम रहती है । इस व्यवस्था के शिकार लोग भी इनके व्यामोह में रहते हैं ।

जर्मन विचारधारा में निजी संपत्ति की इस व्यवस्था में श्रमिक के अलगाव की धारणा से उन्होंने चार निष्कर्ष निकाले जो घोषणापत्र में  मौजूद हैं । पहला कि किसी भी समाज का आर्थिक विकास ऐसी जगह पहुंच जाता है कि सामाजिक संगठन में तनाव पैदा होने लगता है । तब उसकी ताकत उत्पादक की जगह विध्वंसक हो जाती है । तब मजदूर वर्ग सामने आता है जो समाज का सारा बोझ उठाता है लेकिन उसके लाभ में कोई हिस्सा नहीं बंटाता । उसमें बुनियादी क्रांति की जरूरत की चेतना पैदा होती है । इसे कम्युनिस्ट चेतना कह सकते हैं । मजदूरों की हालत पर सोचने से अन्य वर्गों में भी इस चेतना का उदय होता है । दूसरा कि इस उत्पादक वर्ग के विरुद्ध एक शासक वर्ग होता है जिसके हित उत्पादक वर्ग के विपरीत होते हैं । उसकी सामाजिक शक्ति का स्रोत उसकी संपत्ति होती है और इसकी व्यावहारिक अभिव्यक्ति राज्य के रूप में होती है । राज्य अपनी समस्त नौकरशाही और सत्ता के साथ, वर्गों के टकराव के बीच निष्पक्ष बिचौलिये की भूमिका निभाने की जगह शासक वर्ग की सत्ता को व्यक्त करता है । इसी शासक वर्ग की सत्ता के विरोध में क्रांतिकारी संघर्ष छेड़ना होता है । तीसरा कि अब तक की क्रांतिकारी हलचलों का स्वभाव राजनीतिक रहा है । वे सभी मौजूदा आर्थिक उत्पादन संबंधों को उखाड़ फेंकने की जगह उसका पुनर्गठन मात्र करते रहे हैं । कम्युनिस्ट क्रांति इनसे अलग प्रकार की होगी । उसका मकसद मौजूदा समाजार्थिक व्यवस्था को बुनियादी रूप से बदलना होगा । वह सभी वर्गों के शासन को समाप्त करने के साथ ही वर्गों का भी उन्मूलन कर देगी । व्यवस्थाजन्य विषमता की समाप्ति का संघर्ष समूचे समाज के स्तर पर चलेगा जिसमें पूंजीवाद, उसकी गतिकी और उसके ढांचों को बुनियादी रूप से बदल दिया जायेगा । समाज में विषमता के ढांचागत स्रोत के रूप में मौजूद वर्ग का अंत हो जायेगा । चौथी कि ऐसी क्रांति अनिवार्य है न केवल इसलिए कि अन्य किसी तरह शासक वर्ग को उखाड़ना सम्भव नहीं है बल्कि इसलिए भी कि इस तरह की क्रांति में ही मजदूर वर्ग युगों की दासता से अपने आपको आजाद कर सकेगा और नया समाज स्थापित करने लायक बन सकेगा । पूंजीवाद मनुष्यों के रहने लायक व्यवस्था नहीं है । उसे बदलना ही होगा । इस प्रक्रिया में ही लोग भी खुद को बदल सकेंगे और बेहतर दुनिया में जीवन बिताने लायक होंगे । सभी जानते हैं कि मार्क्स और एंगेल्स समाज को बदलना चाहते थे लेकिन उनका विश्वास था कि बड़े पैमाने पर ऐसी क्रांतिकारी गतिविधि के जरिये सामान्य लोग खुद को ही सबल बनाते हैं और पूरी तरह से भिन्न किस्म के मनुष्य में बदल जाते हैं । भविष्य के ये मुक्तिकारी अपना निर्माण भी करेंगे । वर्तमान मनुष्यता का अभिलक्षण बंधन है जबकि उसका भविष्य इन बंधनों से मुक्ति है ।

उस जमाने में समाजवाद को मध्य वर्ग का आंदोलन माना जाता था जबकि कम्युनिज्म को मजदूर वर्ग का आंदोलन माना जाता था । समाजवाद को सम्मानित निगाह से देखा जाता था जबकि कम्युनिज्म अपने समर्थकों की तरह ही प्रतिबंधित था । समाजवादी लोग पूंजीवादी व्यवस्था की समस्याओं में सुधार चाहते थे जबकि कम्युनिस्ट संपूर्ण सामाजिक बदलाव के हामी हुआ करते थे । कम्युनिज्म की भावना के मूल सोलहवीं सदी के उन धार्मिक संप्रदायों में थे जो स्थापित चर्चों की ताकत और संपत्ति के विरोध में साझा संपत्ति के पक्षधर थे । इन विचारों का आधुनिकीकरण अठारहवीं सदी में हुआ जब विद्रोही विचारकों ने निजी संपत्ति के उन्मूलन की वकालत की । उसी समय बाबुएफ़ जैसे अति वामपंथी फ़्रांसिसी क्रांतिकारियों की ओर से कम्युनिस्ट शब्द सुनायी देने लगा था । 1830 में फिर से फ़्रांस में इस शब्द का इस्तेमाल हुआ क्योंकि उस समय के क्रांतिकारी निजी संपत्ति को सामाजिक शक्ति और विषमता का स्रोत मानते थे तथा इसके विरोध में संपत्ति की साझेदारी चाहते थे । यह प्रवृत्ति समूची दुनिया में अलग अलग रूपों में फैली और सर्वत्र शासक वर्ग के लिए भय का कारण साबित हुई । इस इतिहास से परिचित होने के बावजूद मार्क्स-एंगेल्स की निगाह में कम्युनिज्म का उभार तो पूंजीपति और सर्वहारा के बीच संघर्ष के दौरान हुआ । उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में पूंजीवाद के विरोध में तमाम तरह के समाजवादी, कम्युनिस्ट और अराजक व्यक्ति तथा समूह कार्यरत थे । कुछ धार्मिक किस्म की समता के पुराने विचारों से प्रभावित थे तो कुछ ऐसे भी थे जो काल्पनिक समाजवाद के मुताबिक सपनों के समाज की स्थापना के लिए कार्यरत थे । कुछ आदर्शवादी थे जो शांतिपूर्ण बदलाव के पक्षधर थे तो कुछ लोग सरकारों को मुट्ठी भर बुद्धिमान क्रांतिकारियों की हिंसक कार्यवाही से उलट देने का षड़यंत्र करते रहते थे । 1846 में मार्क्स और एंगेल्स ने ऐसे क्रांतिकारियों के बीच संपर्क संवाद बनाने के लिए कम्युनिस्ट करेस्पांडेन्स कमेटी बनायी । इसमें लीग आफ़ जस्ट के सदस्यों के साथ ही चार्टिस्ट आंदोलन के वामपंथी भी शामिल थे ।

1847 तक इस आंदोलन का केंद्र मार्क्स और एंगेल्स हो चुके थे । एंगेल्स इसकी कांग्रेस में भाग लेने लंदन आये जहां इसका नाम कम्युनिस्ट लीग हो गया और इसकी गतिविधियों में षड़यंत्र के मुकाबले खुली लोकतांत्रिक कार्यवाही का तत्व बढ़ने लगा । इसके सुर में भी बदलाव आया । इसके नारों में पहले आदर्शवादी नैतिक रंग अधिक हुआ करता था तथा प्रेम और समानता की अमूर्त भावनाओं पर जोर दिया जाता था । अब उसका नारा हुआसभी देशों के मजदूर एक हो!’ । यह मार्क्स और एंगेल्स के विचारों और रुख के असर का सीधा सबूत था । इनके लिए एंगेल्स ने प्रश्नोत्तरी की शैली में एक दस्तावेज तैयार किया । इसमें कुल बाइस सवालों के जवाब थे । इसी को विस्तारित करके उन्होंने कम्युनिज्म के सिद्धांत नामक दस्तावेज तैयार किया । बहरहाल इस शैली की समस्या और सीमा को भी एंगेल्स ने देख लिया इसलिए मार्क्स को इसकी जगह घोषणापत्र लिखने की सलाह दी । राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए उन्हें यही रूप उपयुक्त लगा । लीग की दूसरी कांग्रेस दस दिनों तक लंदन में चली । इसमें एंगेल्स के साथ मार्क्स भी शरीक हुए । उनके कम्युनिज्म के भौतिकवादी और वर्ग संघर्ष आधारित स्वरूप और पुराने आदर्शवादी भाइचारे पर आधारित कम्युनिज्म के बीच गरमागरम बहस भी चली । मार्क्स के भाषण के बाद कांग्रेस के प्रतिनिधियों ने वाइटलिंग की सोच और इस नयी समझदारी के अंतर को अच्छी तरह पकड़ लिया । यह विकास मजदूर आंदोलन की वैचारिक परिपक्वता का पुष्ट प्रमाण था । कांग्रेस ने मार्क्स को प्रस्तावित कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखने का जिम्मा दिया ।

कांग्रेस से लौटकर मार्क्स इस काम में जुट गये । उन्होंने एंगेल्स की प्रश्नोत्तरी से काफी मदद ली । लीग के साथी इंतजार कर रहे थे लेकिन मार्क्स के लिए काम पूरा करना मुश्किल हो रहा था । वे उसकी नोंक पलक दुरुस्त करते रहे । बाद में यह उनकी आदत में ही शुमार हो गया । यूरोप में उथल पुथल बढ़ती जा रही थी । घोषणापत्र को इस पर असर डालने वाला होना था । 1847 का साल ही भुखमरी के साल जैसा था । आयरलैंड में आलू की फसल बर्बाद हो गयी थी और जबर्दस्त आर्थिक संकट पैदा हुआ । प्रतिक्रियावादी सामंती शासन और आर्थिक तौर पर शक्तिशाली मध्य वर्ग के बीच सत्ता पर कब्जे की लड़ाई राजनीतिक रंग लेती जा रही थी जबकि मताधिकार से वंचित कामगारों की हालत खस्ता थी । क्रांति की भविष्यवाणी वामपंथियों के साथ दक्षिणपंथी भी कर रहे थे । 1847 के अंत में स्विट्ज़रलैंड में कैथोलिक और प्रोटेस्टैंट इलाकों में टकराव हुआ । इसे धार्मिक टकराव की जगह कट्टर पोंगापंथी ताकतों और उदार लोकतांत्रिक बुर्जुआ ताकतों के बीच राजनीतिक टकराव के रूप में देखा गया । पूरे यूरोप में पोंगापंथी बादशाहत की प्रतिक्रिया में जबर्दस्त जन विक्षोभ फूट पड़ा । आखिरकार 12 जनवरी 1848 को इस क्रांतिकारी वर्ष का बाकायदे आगाज हुआ जब सिसिली में विद्रोह शुरू हुआ और पूरे इटली में आग की तरह फैल गया । मार्क्स का लेखन जारी रहा । क्रांति फूट पड़ी थी और कम्युनिस्टों के पास घोषणापत्र नहीं था! आखिरकार लीग ने मार्क्स को एक हफ़्ते के भीतर काम खत्म करके भेजने की चेतावनी जारी की । मार्क्स ने काम समेटा और फ़रवरी मध्य में घोषणापत्र छप गया ।

ध्यान देने की बात है कि यह घोषणापत्र कम्युनिस्ट लीग का नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी का था । लेखकों का मकसद लीग के बाहर भी अपने विचारों को ले जाने का था । आधुनिक पार्टी व्यवस्था के आगमन से पहले इसका अर्थ कोई संगठित समूह होने के बदले प्रवृत्ति या अभिमत हुआ करता था । इस तरह  इस शीर्षक का अर्थ कम्युनिस्ट दृष्टिकोण हुआ । यूरोप की उथल पुथल भरी दुनिया में यह विद्रोही घोषणापत्र जारी हुआ था । विद्रोह की सम्भावना के चलते एंगेल्स को जनवरी अंत में फ़्रांस से सरकारी आदेश निकालकर बहिष्कृत कर दिया गया । घोषणापत्र के प्रकाशित होते ही पेरिस में विद्रोह शुरू हो गया । सरकार ने राजनीतिक सहभोज पर प्रतिबंध लगा दिया क्योंकि सत्ता विरोधियों के मिलन का यह सबसे पसंदीदा रूप था । मजबूरन पेरिस के कामगारों और उदारपंथी मध्य वर्ग को बैरीकेड खड़े करने पड़े । मार्क्स ने इसे क्रांति की खूबसूरती कहा । शासक को जान बचाकर भागना पड़ा और बादशाहत अंतिम रूप से ढह गयी । क्रांति फैलती गयी और सच्चे अर्थों में यूरोपव्यापी हो गयी । मार्च में मार्क्स को बेल्जियम से देशनिकाला मिला । एंगेल्स और वे क्रांति में भाग लेने जर्मनी पहुंचे । वहां भी बर्लिन और वियेना में हलचल शुरू हुई । क्रांति की लहर यूरोप से बाहर निकलकर श्री लंका, कैरीबियन और आस्ट्रेलिया तक जा पहुंची । नागरिक अधिकारों की मांग होने लगी, साम्राज्यवादी ताकतों के कब्जे से यूरोपीय राष्ट्र-राज्य की मुक्ति की बात शुरू हुई और चर्टिस्टों ने विशाल प्रदर्शन आयोजित किये । मार्क्स और एंगेल्स को उम्मीद थी कि जर्मनी का मध्यवर्ग इस बार अपने ऐतिहासिक दायित्व को पूरा करते हुए सामंती कचरे को झाड़ बुहारकर साफ कर देगा । इससे उदारपंथी आधुनिकता का प्रवेश होगा, मजदूरों और पूंजीपतियों की राजनीतिक स्थिति में बेहतरी आयेगी । अनुकूल माहौल मिलने से पूंजीवादी विकास होगा और राजनीतिक सत्ता पर मजदूरों का कब्जा हो जायेगा । घोषणापत्र में लिखा कि पूंजीवादी जर्मनी परवर्ती सर्वहारा क्रांति की पूर्वपीठिका साबित होगा ।

तत्कालीन परिस्थिति में मजदूर वर्ग का कर्तव्य बताते हुए घोषणापत्र कहता है कि पूंजीपति वर्ग के साथ स्पष्ट शत्रुता को मानते हुए भी उसे फिलहाल पूंजीपति वर्ग का साथ देना चाहिए जहां कहीं भी वह सामंती तत्वों के विरोध में क्रांतिकारी तरीके से काम करे । मजदूर वर्ग इस लोकतांत्रिक क्रांति की चरम वाम शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है । उसके लक्ष्य के प्रति निष्ठावान रहते हुए भी उन्होंने पुराने शासकों के विरोध में पूंजीपति वर्ग के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की सलाह उसे दी । कार्यनीति यह थी कि वामपंथ का स्वतंत्र आधार बनाकर पूंजीपति वर्ग के साथ मिलकर पुराने शासकों पर हमला बोला जाये तथा सर्वहारा, निम्न पूंजीपति और किसानों के इस खेमे को तत्काल अगुआ की भूमिका में उतारा जाये अगर पूंजीपति वर्ग इस लड़ाई से अपने कदम वापस खींचने की कोशिश करे तो । उन्होंने तत्कालीन माहौल में मजदूर वर्ग की राजनीति और उसके साथ ही समर्थक पूंजीपति वर्ग को वामपंथ की ओर से आगे बढ़ने के लिए धक्का देना चाहा । इसके लिए उन्होंने न्यू राइनिशे जाइटुंग नामक अखबार का संपादन संभाला । स्थानीय पूंजीपतियों के धन से जर्मन प्रतिक्रियावाद के विरोध में यह राजनीतिक अखबार निकलता था । इसके लक्ष्य पाठक मजदूर, किसान और छोटे व्यापारी थे ।

उनकी उम्मीद के विपरीत यूरोप के पूंजीपति सामंती शासन के मुकाबले आसन्न वामपंथी क्रांति से अधिक भयभीत निकले । जनता के दबाव के चलते कुछ उपलब्धियां तो हासिल हुईं लेकिन छह महीने बीतते न बीतते साफ हो गया कि समूचे यूरोप में प्रतिक्रिया की एक लहर व्याप रही है । जून में फ़्रांस की नयी सरकार ने पेरिस में मजदूरों का दमन करने के लिए तीन हजार से अधिक लोगों को क्रूरता से मार डाला । सितम्बर में फ़्रैंकफ़र्त में एक जन विद्रोह का दमन करने के लिए अधिकारियों ने सेना बुलायी । नवम्बर में बर्लिन में मार्शल ला लगा दिया गया । पूंजीपति वर्ग ने सामंती शासन का खात्मा करने की जगह कुछ वैधानिक टुकड़ों के लिए उसकी सत्ता से समझौता कर लिया । आखिरकार यूरोपीय क्रांति पराजित हो गयी । मार्क्स ने इस पूरे दौर से मूल्यवान सीख हासिल की । पूंजीपति वर्ग के बारे में उन्हें नयी समझ मिली जिसका उपयोग घोषणापत्र में हुआ । यूरोपव्यापी प्रतिक्रांतिकारी माहौल के चलते मार्क्स और एंगेल्स ने अब इंग्लैंड को नया बसेरा बनाया ।                                                                                                                                                                       

 

Monday, July 4, 2022

कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र की कहानी

 

             

2022 में हेड आफ़ जीयस से चाइना मेविल की किताब ‘ए स्पेक्टर, हांटिंग: चाइना मेविल आन द कम्युनिस्ट मेनिफ़ेस्टो’ का प्रकाशन हुआ । उन्नीसवीं सदी के मध्य में जुझारू वामपंथियों के एक छोटे से समूह ने घोषित किया कि उनके शत्रु यानी यूरोप की बड़ी ताकतें कम्युनिज्म के भूत से डरी हुई हैं । घोषणापत्र की शुरुआत इसी तरह होती है । यह आकार में तो पर्याप्त छोटी है लेकिन इसका असर युगांतरकारी रहा । इसके प्रशंसकों को इस तथ्य पर गर्व होता है लेकिन आलोचक इसको खारिज करते हैं । पाठक के दिमाग पर इसके प्रभाव तथा इसकी ऐतिहासिक शक्ति को दोनों ही स्वीकार करते हैं । भूत फिर से जाग गया है । फिर से इस समय जितने बड़े पैमाने पर कम्युनिस्टों का विरोध हो रहा है उसका कोई कारण नजर नहीं आता । समूचे समाजवादी खेमे के पतन को तीस साल बीत चुके हैं और दुनिया की राजनीति में कोई वाम चुनौती भी नहीं है । फिर भी प्रतिक्रियावादियों को कम्युनिस्ट खतरे का भ्रम होता रहता है ।

घोषणापत्र को प्रत्येक राजनीतिक पीढ़ी ने अपने समय के सवालों से जूझते हुए पढ़ा है । अनुपनिवेशीकरण और नवउपनिवेशीकरण के वर्तमान संदर्भ में भी इसकी रोचकता वैसी ही है जैसे कल्याणकारी राज्य के उदय और सोवियत खेमे के पतन के दौरान थी । ये शब्द जिस समय लिखे जा रहे हैं उस समय दुनिया के मुट्ठी भर खरबपतियों के पास दुनिया के साठ फ़ीसद गरीब लोगों से अधिक की संपत्ति है । इसके बावजूद संपदा कर इतना कम पहले कभी नहीं था । दुनिया भर के बीस फ़ीसद बच्चे स्कूल नहीं जा पाते । गरीबी के चलते रोज बीस हजार लोग मरते हैं । इन हालात के अतिरिक्त कम्युनिज्म के वर्तमान आकर्षण की वजह हालिया आर्थिक संकट, जलवायु विध्वंस, सामाजिक दुश्चिंता, जहरीली राजनीति और पर उत्पीड़न सुख है । इसी दौर में नवउदारवादी पूंजीवाद के लिए वाम चुनौती पैदा हुई और तेजी से उसका अंत भी हो गया । कल्याणकारी मदों में कटौती को अनिवार्य बताया गया । इंग्लैंड में कोरबीन के नेतृत्व में लेबर पार्टी और सांडर्स के नेतृत्व में डेमोक्रेटिक पार्टी उठी और बैठ गयी । इसी समय ट्रम्प और जानसन की चरम दक्षिणपंथी सत्ता भी सामने आयी । दुनिया में भीषण महामारी फैली जिसकी चपेट में सबसे अधिक गरीब और अल्पसंख्यक आये । लाकडाउन लगे जिसके चलते अर्थव्यवस्था की तबाही हुई और पूंजीवाद को अपने जीवन की सबसे भीषण मंदी से गुजरना पड़ रहा है । यही ऐसा भी समय है जब अमेरिका में पचास साल के बाद सबसे जबर्दस्त सामाजिक उथल पुथल हो रही है । फ़्लायड की पुलिसिया हत्या के बाद फूटे जन विक्षोभ को सशस्त्र पुलिस की सर्वाधिक क्रूर कार्यवाही झेलनी पड़ी । सारी दुनिया में भारी एकजुटता पैदा हुई और राजनीतिक बहस के केंद्र में सत्ता से टक्कर की बात सुनायी पड़ी । अराजकता और अस्थिरता के वर्तमान माहौल में दमन का प्रतिरोध भी जारी रहा ।

बोलीविया में 1919 में थोड़े दिनों के लिए दक्षिणपंथी सरकार सत्ता में काबिज हुई लेकिन एक ही साल बाद उसे पलट दिया गया । वामपंथ को ऐसी चुनावी जीत मिली कि विरोधी भी धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा सके । हांग कांग में चीन के हस्तक्षेप के विरोध में विद्रोह फूट पड़ा । फिलिस्तीन में भी यरूसलम से फिलिस्तीनियों को हटाये जाने के विरोध में जबर्दस्त गुस्सा फूटा जिसको काबू करने के लिए इजरायल को गाज़ा पट्टी की बमबारी समेत हिंसा का सहारा लेना पड़ा । इस सूची में राजकीय हिंसा और जन प्रतिरोध की ढेरों मिसालों का उल्लेख किया जा सकता है । लेखक का सवाल है कि ऐसे माहौल में कम्युनिस्ट घोषणापत्र का क्या हो । लेखक ने घोषणापत्र का अंतिम मूल्यांकन पेश करने का दावा नहीं किया है । इसमें केवल उसका परिचय कराने का प्रयास किया गया है । बस पाठक से दिमाग खुला रखने की अपील लेखक ने की है । इसके लिए पहले से किसी जानकारी की अपेक्षा भी नहीं है ।

लेखक ने मूल पाठ से ढेर सारे उद्धरण दिये हैं ताकि अगर पहले घोषणापत्र न भी पढ़े हों तो दिक्कत न हो । पहले के जिन लोगों ने भी घोषणापत्र पर विचार किया है उनके लेखन से मदद लेने की कोशिश की गयी है । किताब के अंत में उन सभी बहसों के संदर्भ विस्तार से बताये गये हैं जिनका किताब के भीतर संक्षिप्त उल्लेख है । सही बात तो यही है कि घोषणापत्र के बारे में कोई भी लेखन मूल पाठ की जगह नहीं ले सकता । कुल बारह हजार शब्दों के मूल पाठ को परिशिष्ट के बतौर शामिल किया गया है । 1848 में इस पुस्तिका को कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स ने जर्मन भाषा में लिखा था हालांकि एंगेल्स ने मार्क्स को ही इसका लेखक बताया है । तब से असंख्य भाषाओं में इसके अनगिनत अनुवाद छप चुके हैं । 1888 में सैमुएल मूर ने एंगेल्स के साथ इसका अंग्रेजी अनुवाद किया था । उसी को परिशिष्ट में शामिल किया गया है ।

इस किताब में सबसे पहले घोषणापत्र के रूप के बारे में एक छोटी कविता है । दूसरे अध्याय में इसके ऐतिहासिक संदर्भ का विवेचन करते हुए मार्क्स-एंगेल्स के समूचे चिंतन में इसे अवस्थित किया गया है । इसके बाद इसके विभिन्न पश्चलेखों का जिक्र है । फिर इसे इतिहास, राजनीति, अर्थ और नीतिशास्त्र के अनुशासनों की नजर से विश्लेषित किया गया है । इसके बाद इसकी कुछ महत्वपूर्ण आलोचनाओं को विविध परिप्रेक्ष्य में देखा गया है । सबसे अंत में वर्तमान हालात में इसकी प्रासंगिकता की जांच परख की गयी है । उनकी छानबीन में शुद्ध बौद्धिकता नहीं है । घोषणापत्र की तर्ज पर ही उनका मानना है कि दुनिया की व्यापक परेशानी, वंचना और कष्ट का रिश्ता हमारी वर्तमान अर्थव्यवस्था से है । गरीबों की गरीबी का संबंध अमीरों की अमीरी से है और शक्तिहीन की बेबसी का गहरा संबंध सत्ता पर काबिज लोगों की ताकत से है । विषमता का इसी दुनिया में उत्पादन होता है । इस पर कुछ लोगों को गुस्सा आता है तो कुछ लोगों को उनके गुस्से पर अचरज होता है । लेखक का मानना है कि इस समय के दुखद यथार्थ की व्याख्या मानव स्वभाव के तथ्य से नहीं होती और यह यथार्थ बदला भी जा सकता है हालांकि यह बदलाव बहुत आसान नहीं होगा । सवाल तो इस कोशिश के सार्थक होने का है । जो अनगिनत लोग बहिष्कृत और शक्तिहीन बना दिये गये हैं उनके लिए और उनके साथ लड़ना लेखक को पर्याप्त जायज लगता है । घोषणापत्र के बारे में लिखते हुए लेखक ने व्यर्थ की तटस्थता का दिखावा नहीं किया है । उन्होंने माना है कि घोषणापत्र कोई ऐतिहासिक महत्व का दस्तावेज भर नहीं है वरन बेचैन कर देने की ताकत उसमें अब भी है । बहरहाल यह बेचैनी प्रदत्त नहीं, इसे हमें खुद अर्जित करना होगा ।

घोषणापत्र के रूप के बारे में उनका कहना है कि उनमें परस्पर विरोधी बातें होती हैं । यह न तो सिद्धांत होता है, न ही कविता । उनमें भरपूर नाटकीयता होती है । कला की दुनिया में तो आधुनिकतावाद के बाद से घोषणापत्रों की बाढ़ ही आ गयी थी । उनमें बीसवीं सदी की शुरुआत की इस या उस परिघटना के बारे में इस या उस तरह का रुख अपनाने की मांग की गयी थी । कला की दुनिया से बाहर राजनीतिक रूप से क्रांतिकारी घोषणापत्रों की परम्परा इससे पुरानी रही है । इन पुराने घोषणापत्रों की परम्परा को कला की दुनिया के घोषणापत्रों में भी निभाया गया । कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र से ठीक पहले राबर्ट ओवेन का समाजवादी घोषणापत्र आया था लेकिन मार्क्स लिखित इस घोषणापत्र ने इस परम्परा में कलात्मकता पैदा की । उसके बाद आये किसी भी घोषणापत्र पर उसकी छाया रही है । इसकी उद्बोधनपरक शैली किसी भी पाठक को तत्काल स्पष्ट हो जाती है । इसकी शैली से भी इसके राजनीतिक उद्देश्य में मदद मिली । विद्वत्तापूर्ण मान्यताओं को भविष्यवाणी की तरह इसमें प्रस्तुत किया गया था । घोषणापत्र इन पर अमल की मांग करता था । यह ऐसे ही था जैसे कोई सेनापति अपनी सेना से युद्ध की तैयारी का आवाहन करता है । इसके लिए वह एक नक्शा बनाता है जिस पर विपक्षी सेना की स्थिति दिखायी जाती है और युद्धभूमि का आकलन करते हुए हमले की योजना पेश की जाती है । सिपाहियों में जोश भरने के लिए जीत की घोषणा भी की जाती है । मार्क्स ने युद्धभूमि का आकलन सही सही किया था लेकिन विपक्षी सेना के बारे में सम्भव है उनको सटीक जानकारी न मिली हो । शक्ति संतुलन के अनुकूल न होने का भी उनको अंदाजा है । कहने का मतलब कि मार्क्स लिखित यह घोषणापत्र आलोचना से परे नहीं है । इसके लिए सहानुभूति के साथ ही संदेह को भी बनाये रखना होगा । उदारता के साथ इसे देखते हुए भी कठोर परीक्षण से जी नहीं चुराना होगा । किसी भी अच्छे सेनापति की तरह युद्ध में जीत की घोषणा का मकसद पुरानी दुनिया के भीतर नयी सचाई को साकार करना है । क्रांति की सेवा में हथियार उठाने का आवाहन ही इसकी खासियत है । जोर इस बात पर है कि अब पूंजीवादी व्यवस्था हमारे समाज के लिए कारगर नहीं रह गयी है । इस व्यवस्था को हटाने के लिए संचालित अभियान में पाठक को सहभागी बनाना इसका लक्ष्य है ।

1848 की फ़रवरी में इसका प्रकाशन हुआ और उसके तत्काल बाद यूरोपव्यापी क्रांतिकारी उथल पुथल शुरू हो गयी । उसके बाद के साठ साल यूरोप और अमेरिका के लिए दुहरी क्रांति के साल रहे । फ़्रांस की राजनीतिक क्रांतियों और ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति ने पश्चिमी दुनिया का चेहरा मोहरा बनाया । ये दोनों ही कुछ हद तक सत्रहवीं सदी के प्रबोधन से उत्पन्न राजनीतिक और वैज्ञानिक विचारों का प्रतिफलन थे । ब्रिटेन से बाहर फैलकर औद्योगिक क्रांति ने एक ओर नयी तकनीक और शक्ति के नये स्रोतों तथा उत्पादन और यातायात की नयी प्रौद्योगिकी से आर्थिक माहौल को बदल दिया तो दूसरी ओर मानव श्रम और मशीन को एक साथ कारखाने में एकत्र कर दिया । हालांकि अधिकतर लोग यूरोप में अब भी थोड़ा बदले हुए हालात में खेत में ही काम करते थे लेकिन औद्योगिक मजदूर वर्ग तेजी से अर्थतंत्र में मुख्य भूमिका में उभरना शुरू कर चुका था । उनके जीने और काम के हालात बेहद खराब थे जिनके कारण मुनाफ़ाखोर मालिकों के साथ टकराव लाजिम थे । इससे उनके राजनीतिक जुझारूपन में बहुत वृद्धि हुई ।

1789 की महान फ़्रांसिसी क्रांति की याद धूमिल नहीं हुई थी । इसने बादशाही सत्ता और भूदासता का तख्ता पलट दिया तथा ऊंच नीच, स्थायित्व और आज्ञाकारिता जैसे पुराने सामंती मूल्यों की जगह समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित नये गणतंत्र की नींव रखी । यूरोप के तमाम बादशाह क्रांति को मसल देने के लिए तो लामबंद हुए ही, अंदर भी राजनीतिक उठापटक और दबाव की होड़ का माहौल बना हुआ था । ऐसे में नये शासन ने विचित्र राह पकड़ी । जल्दी ही नेपोलियन की सत्ता स्थापित हुई जिसने क्रांति के कुछ कानूनी और आर्थिक कदमों को बरकरार रखा लेकिन राजनीतिक अधिकारों की हद बांध दी और नये फ़्रांस के लाभार्थ दुनिया भर में साम्राज्य स्थापित करने के लिए सेना भेजी । यूरोप के प्रतिक्रांतिकारियों के गंठजोड़ के सामने 1815 में आखिर उसकी पराजय हो गयी । उसके बाद पूंजीपति वर्ग की या उनके समर्थन से सत्ता चलती रही । जल्दी ही फ़्रांसिसी क्रांति के मूल्य इस समाज के मूल्यों से टकराने लगे । यह समाज अधिकतम मुनाफ़े की आकांक्षा के इर्द गिर्द गठित था । यह समाज ऐसे बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर सकता था जो  मुनाफ़ा हासिल करने में बाधा डाले या उस संतुलन को भंग कर दे जिस पर यह मुनाफ़ा और शासन निर्भर थे । इस संतुलन में दमन और उत्पीड़न को समाहित तो किया ही गया था, स्वतंत्रता और समानता की घोषणा के बावजूद यह संतुलन उस दमन उत्पीड़न पर आधारित भी था । मसलन स्त्रियों को मताधिकार नहीं दिया गया था । नेपोलियन ने फ़्रांसिसी उपनिवेशों में गुलामी समाप्त करने वाले कानून को खत्म कर दिया था । इनसे गणतंत्र और उदारवाद की असली प्राथमिकता उजागर हुई ।

इसके बावजूद कहा जा सकता है कि उदारवादी आदर्श झूठ पर आधारित नहीं थे । उनके अर्थ को लेकर हमेशा खींचतान होती रही है । एक ओर तो महान क्रांतिकारियों ने उन्हें दमन के विरुद्ध ठोस भौतिक शाक्ति में बदल डाला । मसलन हैती के क्रांतिकारी ने इनके नाम पर गुलामी के खात्मे की अपील की तो दूसरी ओर सत्ता और संपत्ति के लिए विद्रोही गुलामों को धोखा देने वालों ने भी इनका निर्लज्ज इस्तेमाल किया । उन्होंने स्वतंत्रता के मंदिर में देवी के समक्ष समर्पण की अपील नयी पीढ़ी से की । ये आदर्श अंतर्विरोधी और जटिल होने के बावजूद विजयी फ़्रांसिसी सेना के साथ दुनिया भर में पहुंचे और क्रांति विरोधी गठबंधन ने इनकी मुखालफ़त भी की । अर्थ की अस्पष्टता के बावजूद इनके चलते अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी, उपनिवेशों की मुक्ति, उत्तर सामंती राजनीति की मजबूती, मजदूरों के हालात और उनके अधिकार तथा लोकतंत्र से जुड़े सवाल उठ खड़े हुए । ये सभी अत्यंत विवादास्पद और महत्वपूर्ण मुद्दे थे । इनके लिए ही जनता के संघर्ष भी होने लगे ।

यूरोप में 1840 के दशक में राजनीतिक और आर्थिक संकट पैदा हुआ । फसलें नष्ट हुईं और अकाल के कारण भारी दरिद्रता फैल गयी । सरकारों ने भुखमरी की समस्या का समाधान करने से क्रूरता से इनकार कर दिया जिसके कारण अकेले आयरलैंड में लाखों लोग मौत के मुंह में समा गये जो ब्रिटेन का उपनिवेश था । नतिजतन इंग्लैंड में ही चार्टिस्ट आंदोलन के रूप में मजदूरों के विक्षोभ की सर्वाधिक संगठित अभिव्यक्ति हुई । इसने अन्य चीजों के साथ सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार की मांग की । इंग्लैंड के बाहर भी मजदूरों की इस नयी राजनीतिक चेतना की अभिव्यक्ति हुई । यूरोप के तमाम शहरों में वहां के उदार माहौल का लाभ उठाकर मुख्य रूप से जर्मन मजदूरों की अवैध समितियां उग आयीं । इनके नाम विचित्र हुआ करते थे । उनमें से ही एक समिति पेरिस में विल्हेल्म वाइटलिंग की सदारत में बनी जिसका नाम लीग आफ़ द जस्ट था । इसके लिए ही कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र लिखा गया था ।                                                                           

 

Saturday, July 2, 2022

अंबेडकर का वैचारिक निर्माण

 

              

                                                      

अंबेडकर की जीवनी लिखने की उलझन का जिक्र करते हुए वी गीता 2021 में पालग्रेव मैकमिलन से प्रकाशित अपनी किताब ‘भीमराव रामजी अंबेडकर ऐंड द क्वेश्चन आफ़ सोशलिज्म इन इंडिया’ में कहती हैं कि जीवन भर अंबेडकर बोलते और लिखते रहे लेकिन अपने बारे में लगभग कुछ भी नहीं जिक्र किया । आत्मकथात्मक थोड़े बहुत जो टुकड़े मिलते हैं उनसे औपनिवेशिक भारत में किसी अछूत बालक की हालत का पता चलता है । भारतीय समाज में उसे हरेक जगह ऐसी समाजार्थिक विभाजक रेखा का सामना करना पड़ता है जो उसे यानी तथाकथित अछूतों को शेष लोगों से अलगाती है । अपने समय को उन्होंने अनेक लेखों में दर्ज किया है जब उन्हें औपनिवेशिक शासन का वर्णन करना होता या उससे पहले के हालात का मूल्यांकन करना होता ।

वे मानते थे कि अंग्रेज भारत पर अपने स्वार्थ में ही शासन कर रहे हैं लेकिन उनके शासन के चलते ढेर सारे ऐसे बदलाव आये हैं जिनका महत्व देश की गरीब और हाशिये की आबादी के लिए बहुत अधिक है । ये बुनियादी बदलाव इस उपमहाद्वीप में अंग्रेजों के राजनीतिक प्राधिकार को सुरक्षित रखने के लिए तो नहीं लाये तो जा रहे हैं  लेकिन उनके असरात दूरगामी साबित होंगे । सार्वजनिक शिक्षा, बेहतर संचार व्यवस्था और आधुनिक कानूनी प्रणाली ने भारत को आधुनिक जगत में ला खड़ा किया हालांकि भारत के शासक आधुनिकता को साकार करने के लिए बहुत प्रतिबद्ध नजर नहीं आते । अनगिनत अन्य लोग भी इस विचित्र आधुनिक समय को महसूस कर रहे थे । भू-राजस्व में नीतिगत बदलाव, कारखानों के आगमन और संचार के विस्तार ने औपनिवेशिक समय में हजारों स्त्री-पुरुषों का जीवन बदल दिया । उन्हें तकलीफदेह और कठिन परिस्थिति में डाल दिया गया था लेकिन इसमें नवीनता और अप्रत्याशित का मजा था । औपनिवेशिक शहर में तो खासकर ऐसा ही था । अंबेडकर ऐसे ही शहर बाम्बे में बड़े हुए और मजदूरों की बस्तियों में उनका वयस्क जीवन गुजरा । बाम्बे के मजदूर अधिकतर देहात से आये हुए थे । उनमें जो सवर्ण थे उनकी सामाजिकता उनकी जाति के इर्द गिर्द घूमती थी । उन्हें अपने ही समुदाय के ठेकेदारों ने सूती मिलों में या दीगर जगहों पर काम दिलाया था । अछूत कामगार भी इसी तरह शहर आये थे । ज्यादातर खास खास जातियों या समुदायों ने शहर में भी अपने पेशों के मुताबिक ही काम चुना । इस मामले में शहरी सर्वहारा पुरानी देहाती सामाजिक दुनिया से जुड़े रहे ।     

इन्हीं पारम्परिक सम्पर्कों के हिसाब से उस समय शहर की भी राजनीति चलती थी । मजदूरों के संगठन भी इस समस्या का शिकार थे । एक शुरुआती श्रमिक प्रवक्ता नारायण लोखंडे के जीवन से यह तथ्य स्पष्ट है । वे देहात से आये, एक सूती मिल में स्टोर सुपरवाइजर और फिर मैनेजर के सहायक बने । वे ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज से भी जुड़े थे । यह संगठन बाम्बे में बहुत सक्रिय नहीं था लेकिन उसका मुखपत्र ‘दीनबंधु’ यहीं से छपता था । लोखंडे 1880 में उसके संपादक हुए और सत्रह साल तक इस पद पर बने रहे । धीरे धीरे उनका मकसद ही सामाजिक रूप से दमित समुदाय की बेहतरी हो गया और इसी क्रम में कारखाने के हालात की उनकी जानकारी के चलते दीनबंधु भी मजदूर वर्ग के हितों से प्रतिबद्ध अखबार बनता गया । काम के बेहतर हालात और वेतन में बढ़ोत्तरी की मुखर आवाज बनकर लोखंडे उभरे । 1884 में उन्होंने संगठन बनाकर मजदूरों के काम और आराम के घंटों का नियम बनाने की मांग की । शहर का यह पहला मजदूर संगठन था और इसके प्रवक्ता के रूप में लोखंडे ने उन्नीसवीं सदी के अंत में स्थापित फ़ैक्ट्री आयोग के सामने अपना बयान दिया । इसके बाद जल्दी ही निम्न जातियों के राजनीतिक उत्थान की अभिव्यक्ति के बतौर अन्य संगठन भी सामने आये । 1909 में एस के बोले ने कामगार हितवर्धक सभा की स्थापना की । सभा की ओर से खेलकूद, कुश्ती, सामयिक विषयों पर व्याख्यान आदि आयोजित किये जाते थे । इसने मजदूरों के बच्चों की पढ़ाई के लिए रात्रिकालीन स्कूल खोले और कभी कभार मालिकों और मजदूरों के बीच संघर्ष के दौरान मध्यस्थता भी की ।

इसकी जानकारी नहीं मिलती कि इन गतिविधियों के दायरे में बाम्बे के अछूत कामगार भी आते थे या नहीं लेकिन शहरी जीवन में देहाती जीवन का भौतिक और सामाजिक पार्थक्य कम हो गया । इसके बावजूद अछूतों के साथ जुड़ा कलंक समाप्त नहीं हुआ, उनके साथ काम करनेवाले भी उन्हें नीची निगाह से ही देखते थे । दूसरी ओर अंबेडकर के सबसे कनिष्ठ सहयोगी आर बी मोरे ने लिखा है कि शहरी जीवन ने अछूतों को क्रांतिकारी बनाया । काम के खतरनाक हालात के बावजूद काम के बाद आराम और सामाजिक आजादी की अनंत सम्भावना खुली थी, जातिगत भेदभाव की मौजूदगी के बावजूद ट्रेड यूनियनों और क्रांतिकारी सांस्कृतिक संगठनों के रूप में नये सामाजिक जुड़ाव भी नजर आये । इस दुनिया की सीमाओं और सम्भावनाओं के जानकार अंबेडकर ने इसका प्रचुर लाभ उठाया ।

अछूत जातियों में से उच्च शिक्षा हासिल करने वाले बहुत कम लोगों में अंबेडकर शामिल थे । उनके समुदाय के लोग अगर विदेश जाते भी तो आजीविका के लिए जाते थे, शिक्षा प्राप्त करने के लिए नहीं । कोलम्बिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल आफ़ इकोनामिक्स की शिक्षा के साथ ही उनकी विश्वदृष्टि और कल्पना पर बहुत गहरा प्रभाव बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के युगांतकारी घटनाक्रम का भी पड़ा । प्रथम विश्वयुद्ध, राष्ट्रवाद का उभार, बोल्शेविक क्रांति, यूरोप में पूंजीवाद का व्यापक विरोध और विश्व शक्ति के रूप में अमेरिका का उभार आदि ऐसी ही घटनाएं थीं । दूसरी ओर उन पर औपनिवेशिक भारत में जाति प्रथा और छुआछूत के विरोध में लागातार जारी विद्रोह और विक्षोभ की परम्परा ने भी उनकी चेतना को आकार दिया था ।

अंबेडकर का जन्म और पालन पोषण पश्चिमी भारत के महाराष्ट्र में हुआ था । 1818 में इस इलाके पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हुआ था । भोंसले ने मुगल शासकों को इलाके की सीमा के बाहर रोके रखने में कामयाबी पायी थी । इसके चलते अठारहवीं सदी के दूसरे दशक से ही इस इलाके में ब्राह्मणों का शासन बरकरार रहा था । उन्होंने ऐसा सैन्य-नौकरशाहाना शासन विकसित किया जिसमें ब्राह्मण जातियों की सत्ता और उनका विशेषाधिकार भूमि और मुद्रा दान के सहारे कानूनन मजबूत बने । अब्राह्मण सैन्य समूहों को एक ऐसी व्यवस्था को मानना पड़ता था जिसमें उनकी हैसियत दोयम दर्जे की थी । इससे पहले मराठा गौरव से प्रेरित छोटे छोटे दबंगों के इस समूह ने ब्राह्मण सत्ता के साथ सहयोग करते हुए भी उसे काबू में रखा था लेकिन अब उन्हें सामाजिक रूप से एक पायदान नीचे होने का कड़वा घूंट पीना पड़ रहा था । पेशवा राज ने कानून बनाकर किसानों, कारीगरों और स्थानीय व्यापारियों की अन्य जातियों को भी निचली श्रेणी में डाल दिया । अछूत जातियों को तो बहिष्करण और अपमान की भयावह स्थितियों का सामना करना होता ।

1818 में पेशवाओं पर अंग्रेजों की जीत से इस व्यवस्था का अंत हुआ । धीरे धीरे अंग्रेजों ने शोषक राजस्व और प्रशासन की नयी व्यवस्था लागू की जिससे आर्थिक और नागरिक जीवन में बदलाव आया । बहरहाल 1858 में इस इलाके में शेष भारत की तरह ही विक्टोरिया का प्रत्यक्ष शासन कायम हो गया । इसने पुरानी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया । राजस्व वसूली की दर ऊंची बनी रही, किसान कर्ज में डूबे रहे, दस्तकारी का उत्पादन घटा और कारीगर लोग पहले से ही बदहाल कृषि अर्थतंत्र में मजदूर की तरह शामिल हुए । देहाती इलाकों में भूख और अकाल के प्रसार के बावजूद नयी व्यवस्था में जमींदारों और वसूली करने वालों की चांदी रही । आधे मन से कुछ सुधार किये गये लेकिन राजस्व की वसूली पूर्ववत रही और कर्ज की समस्या में भी कमी नहीं आयी । दूसरी ओर कुछ इलाकों में कपास की वाणिज्यिक खेती शुरू हुई जिससे छोटे किसानों और अछूत खेत मजदूरों की हालत में थोड़ा सुधार भी आया । इसके साथ जब शिक्षा भी मिली तो निम्न और अछूत जातियों में शिक्षितों की आधुनिक पीढ़ी का जन्म हुआ ।

अंग्रेजों के व्यापारिक और औद्योगिक हित पूरी तरह सुरक्षित थे । बाम्बे में आधुनिक कताई मिलों की स्थापना हुई जो निर्यात हेतु कपड़े का उत्पादन करती थीं । बाद में वही तैयार माल के रूप में अंग्रेज व्यापारी बेचते थे । उन्नीसवीं सदी की आखिरी चौथाई में पूंजीवादी उत्पादन से जुड़ी हरेक बुराई (काम के लम्बे घंटे, औरतों और बच्चों को काम पर रखना, खराब सेहत और झोपड़पट्टी) बाम्बे में मौजूद थी । इन हालात के बारे में एकाधिक प्रतिक्रिया देखने को मिलती है । जो कुलीन ब्राह्मण थे वे अपनी राजनीतिक हैसियत में कमी से क्षुब्ध थे । इसके कारण अंग्रेजी शासन के विरोध में शुरुआती आतंकी घटनाएं घटीं । बाद में इसकी जगह नवोदित राष्ट्रवाद ने ले ली । दूसरी ओर अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त ब्राह्मणों का ऐसा समूह भी था जो अंग्रेजी शासन में सम्भावना तलाश रहा था लेकिन उसे ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा अपने समाज और धर्म की खिल्ली उड़ाना पसंद नहीं था हालांकि वे इस आलोचना को गलत भी नहीं मान पाते थे । इस वजह से उन्होंने अंग्रेजी शासन को उपकारी और खुद को ऐसा आधुनिक राजनेता माना जिन्हें समाज व्यवस्था की आलोचना, संग्रह-त्याग और सुधार लायक ज्ञान था तो दूसरी ओर सरकार को अर्थतंत्र, शिक्षा और कानून में सुधार सुझाने की जिम्मेदारी थी ताकि लोगों की शिकायतें दूर हो सकें । किसान और दस्तकार जातियों के लोग भी अंग्रेजी शासन को उपकारी मानते लेकिन उनके तईं इसकी वजहें भिन्न थीं । उन्हें लगता था कि अंग्रेजी शासन की वजह से विचार और आचार की ऐसी नयी दुनिया खुल गयी है जिसे जाति व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने वाले विश्वासों और मूल्यों के बरक्स पेश किया जा सकता है । यह नयापन आधुनिक स्कूलों और सार्वजनिक बहसों में प्रकट होता था । कम से कम धारणा के स्तर पर अंग्रेजों ने सबके लिए शिक्षा को सुलभ कराया । इससे न केवल निम्न जातियों को भौतिक उन्नति का अवसर मिला बल्कि उनके समुदाय के युवकों के सामने आलोचनात्मक ज्ञान की दुनिया खुल गयी । इसके कारण उनमें क्रांतिकारी तरीके से लोकतांत्रिक विचारों का प्रसार हुआ और पुरोहितवाद से उनका विरोध बढ़ा ।

अतीत काल में ब्राह्मण सत्ता को काबू में रखने के क्रम में स्थानीय स्तर पर लोक आध्यात्मिकता से लेकर विद्रोही धार्मिक संस्थाओं तथा संप्रदायों का उदय हुआ था । विक्षोभ की इस परम्परा से ये युवक सुपरिचित थे शायद इसीलिए वे आधुनिक तार्किकता पर आधारित धर्मद्रोह की ओर तेजी से आकर्षित हुए । स्वतंत्रता और समानता के नवोदित विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने न केवल सामाजिक प्रचलन और विश्वासों को चुनौती दी बल्कि एक हद तक पुराने सामाजिक संबंधों तक को मानने से इनकार किया । इस संदर्भ में ज्योतिराव फुले की कहानी बेहद महत्व की है । उन्होंने किसी भी अन्य व्यक्ति से आगे बढ़कर इस आधुनिक समय को पहचाना और स्वतंत्रता तथा समानता की सम्भावना को साकार करना चाहा ताकि सामाजिक दुखों का खात्मा हो सके । नयी पीढ़ी के भारतीयों में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने छुआछूत के सवाल को मानवाधिकार के नजरिये से देखा ।

फुले खेतिहर जाति से जुड़े हुए थे । उनके पिता पेशवाओं के दरबार में फूल पहुंचाने का काम करते थे । इसके साथ ही पुणे में छोटा मोटा व्यवसाय भी चलाते थे । ईसाई स्कूल में उनकी शिक्षा दीक्षा हुई थी और उस जमाने में बढ़ रही छापे की संस्कृति के चलते अपने समय के अन्य लोगों की तरह उन्हें भी थामस पेन जैसे क्रांतिकारियों का लेखन सुलभ हुआ । इसके साथ ही दुनिया भर में घट रही ऐतिहासिक घटनाओं में निहित शिक्षा को भी उन्होंने अच्छी तरह आत्मसात किया था । फुले अमेरिकी क्रांति और उससे उपजे गणराज्य से खासे प्रभावित थे । अमेरिकी दासता से नफरत के कारण वे उसे समाप्त करने वाले गृहयुद्ध के भी पक्ष में थे । अमेरिका और आस्ट्रेलिया में ब्रिटिश और यूरोपीय लोगों की मौजूदगी के विध्वंसक प्रभावों की भी उन्हें जानकारी थी और वे मूलवासियों के अधिकारों के पक्षधर थे । दूसरी ओर भारत के मामले में वे अंग्रेजी शासन के पक्ष में थे क्योंकि इसने पेशवाशाही को खत्म किया और सबके लिए समान कानूनी और शिक्षा की व्यवस्था को कायम किया । इसके बावजूद वे उनकी कृषि नीति का विरोध करते थे । उनका निर्मम राजस्व प्रबंधन तथा ग्रामीण अर्थतंत्र के विकास के प्रति उनकी उदासीनता समझ में न आने वाली बातें थीं । किसानों की दीनदशा देखकर फुले ने इसकी जिम्मेदारी शासकीय ढांचे पर डालने का प्रयास किया । अंग्रेज अफ़सरों के बारे में उनके मन में प्रशंसा का भाव था इसलिए उनका गुस्सा भारतीय राज कर्मचारियों पर जाहिर हुआ । ये राजकर्मी ब्राह्मण जाति के थे । जमीनी स्तर पर औपनिवेशिक नीतियों को इनके जरिये लागू किया जाता था । अपनी उच्च स्थिति के चलते ये सभी राजकर्मी किसानों और दस्तकारों को नीचा समझते थे और उनसे चिढ़ते थे । फुले की निगाह में ये अफ़सर भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए थे । इस तंत्र को बनाये रखने में एक ओर ब्राह्मणी व्यावसायिक और जमींदारी हितों तथा दूसरी ओर न्यायिक सेवा के उनके भाई बंधुओं का योगदान था ।

उनके सामाजिक अस्तित्व और उनके रुख की छानबीन के लिए फुले ने नस्लभेद के सिद्धांतों का सहारा लिया और कहा कि वे बाहर से आये इरानी आर्य नस्ल के हमलावर लोग हैं जो स्थानीय मूलवासियों पर अपनी राजनीतिक इच्छा और सांस्कृतिक प्राधिकार थोपने के लिए आमादा थे । समय बीतने के साथ ये मजबूत बौद्धिक वर्ग में बदल गये तथा विचारों और विश्वासों के क्षेत्र में अपना दबदबा कायम किया । उनका प्रभुत्व कभी पूरी तरह स्थापित न हो सका और लगातार उन्हें चुनौती मिलती रही है । अतीत में बौद्ध, मध्यकाल में इस्लाम और वर्तमान में अंग्रेजी शासन इसी तरह की चुनौतियां हैं । ब्राह्मण प्रभुत्व के प्रतिरोध के इन मौकों पर निम्न जातियों और अछूतों को कुछ आजादी मिली लेकिन जब इसके विरोध में प्रतिक्रिया का उभार हुआ तो यह सीमित आजादी भी कुचल दी गयी । फुले ने ब्राह्मण मालिकों को गुलामों के मालिकान जैसा बताया और उनके सताये लोगों को अमेरिकी मूलवासियों की तरह पेश किया ।

सभी अंग्रेजों को एक समान मानने से फुले ने इनकार किया । उनको उन्होंने तीन प्रकार का चिन्हित किया । इनमें सबसे पहले ईसा मसीह से प्रेरित धर्मोपदेशक थे जो शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय थे । उन्होंने ऐसे भारतीयों को आधुनिक शिक्षा दी जिन्हें शिक्षा नहीं दी जाती थी । फुले की निगाह में ये लोग प्रेम तथा स्वतंत्रता और समानता का संदेश भारतीय संदर्भ में फैला रहे थे जहां जन्म आधारित विषमता और तज्जनित तकलीफें संरचना में समायी हुई थीं  । दूसरी तरह के अंग्रेज वे थे जिनकी हरकतें किसानों और दस्तकारों के लिए नुकसानदेह थीं । स्थानीय राजकर्मियों के साथ मिलकर इन लोगों ने धरती को चूस लिया था । उनका सबसे बड़ा अपराध था कि उन्होंने भारत को खाद्यान्न का निर्यातक बना दिया था जिसकी वजह से किसान कष्ट में कराह रहे थे । जंगलात विभाग की स्थापना के जरिये साझा जमीन पर खेतिहरों के अधिकार हड़प लिये गये थे और सस्ते आयात के हथियार से दस्तकारी को तबाह कर दिया गया था । तीसरे समूह को व्यक्तियों का मानने की जगह उन्होंने राज्य कहा । इसे आदर्श रूप में कार्यरत होना चाहिए लेकिन फुले मानते हैं कि इसका आचरण वांछित स्वरूप का नहीं है ।

अंग्रेजी शासन का दावा तो यह था कि वह उपकारी शासन है लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ नजर नहीं आता था । भू राजस्व की वसूली के चलते ग्रामीण लोग घर और खेत छोड़ रहे थे क्योंकि वे न तो सरकारी राजस्व चुका पा रहे थे न ही सूदखोरों का कर्ज ही खत्म हो रहा था । उनके भीतर असंतोष और विद्रोह का भाव व्याप्त था । अपनी गलती छिपाने के लिए अंग्रेज अतीत के शासन के मुकाबले अपने शासन की बेहतरी का दावा करते थे । ऐसे में फुले का आदर्श राज्य अंग्रेजी शासन नहीं हो सकता था । रास्ता बचा कि समाज का पुनर्निर्माण करना होगा । इसके लिए तीन मोर्चों पर बदलाव लाना था । पहला कि शूद्रों को आत्मोत्थान करना होगा । घरेलू और पारिवारिक रिश्तों को बदलना होगा । स्त्रियों को बराबर का मनुष्य मानना होगा, उनके श्रम का मूल्य और शिक्षा का अधिकार उनको देना होगा । दूसरा कि सामाजिक संबंधों को अछूतों या अतिशूद्रों को समानता और स्वतंत्रता के आधार पर बदलना होगा । देहाती और शहरी समाजार्थिक व्यवस्था में उनका मूल्य समझना होगा । तीसरा बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में होगा । किसानी और दस्तकारी के कौशल को मजबूत करने तथा सत्य की खोज करने लायक आधुनिक शिक्षा देनी होगी । इसके लिए धार्मिक आचार व्यवहार त्याग करके तार्किक चिंतन और समता, स्वाभिमान और सामूहिक जिम्मेदारी पैदा करने वाली नैतिकता को अपनाना होगा । इस स्वप्न को पूरा करने के लिए फुले ने दो काम किये । एक तो उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की जिसे लड़कियों और अछूतों समेत निम्न जाति के लड़कों के लिए स्कूल चलाने थे तथा ब्राह्मणों के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व के विरोध में प्रचार करना था । इस समाज को फुले की एक और बात को प्रचारित करना था । फुले का मानना था कि अतीत में राजा बालि के शासन में किसानों और उत्पादक कामगारों का सम्मान था । आर्य आक्रांताओं ने उनके शासन को उखाड़ फेंका लेकिन उनके समान शासन का सपना जिंदा रहा । सत्यशोधक समाज को राजा बालि के शासन की स्थापना की राह हमवार करनी होगी ।

फुले और उनके समर्थकों के लिए सामाजिक विषमता और तज्जनित आर्थिक कष्ट की व्याख्या औपनिवेशिक राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था के जरिये ही नहीं हो सकती थी । औपनिवेशिक शासन  के साथ अन्याय की दीर्घकालीन व्यवस्था ने इसे आकार दिया । अगर इसका विकल्प खोजना है तो कोई कल्पित इतिहास ही इसमें मदद कर सकता है जिसके सहारे किसान और कामगार की दुनिया बनायी जा सके । यह भी एक कारण था कि फुले ने शुरुआती राष्ट्रवाद की उपेक्षा की क्योंकि यह राष्ट्रीय एकता का राग अलापने और औपनिवेशिक सरकार में बढ़ी हुई भागीदारी से आगे की बात ही नहीं करता था । इन दोनों ही मामलों में फुले को समस्या नजर आयी । निम्न जातियों को ओछी निगाह से देखनेवाले ब्राह्मणों के आवाहन पर राष्ट्रीय एकता कैसे हो सकती थी ! सरकार में भागीदारी भी अपने सभी देशवासियों के हितों की सेवा न करने की स्थिति में महत्वहीन बात थी ।

सत्यशोधक समाज के कामों से महाराष्ट्र के उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध  के ढेर सारे अछूत चिंतक गहरे प्रभावित हुए । इनमें से गोपालबाबा वालंगकर ने शास्त्रों की कटु आलोचना के मुकाबले उनके पाठ पर जोर दिया और पाया कि ॠग्वेद  और गीता जैसे ग्रंथों में जन्म आधारित भेदभाव का समर्थन नहीं किया गया है । उनका मानना था कि अछूतों की वर्तमान अवस्था ऐसी ऐतिहासिक घटना है जिसका सुधार अभी नहीं हो सका है । वालंगकर ने सत्यशोधक समाज के साथ मिलकर काम किया लेकिन फुले के देहांत के बाद कुछ महत्वाकांक्षी पिछड़े नेताओं ने उनके जैसे अछूतों को उससे बाहर कर दिया । इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र संगठन बनाया तथा प्रचार कार्य के साथ ही सरकार को अछूतों की शिकायतों से अवगत भी कराते रहे । उन्होंने अछूतों का कलंकीकरण समाप्त करने के लिए एक ओर उसके समर्थकों की सीमाओं और कमियों का जिक्र करते और दूसरी ओर अछूतों के आत्मोत्थान की बात भी की ।

महाराष्ट्र के मराठा शासकों में कोल्हापुर के साहू जी महाराज और बड़ौदा के सयाजीराव गायकवाड़ ने भी अछूतों की शिक्षा के मामले में बहुत प्रयास किये । साहू जी महाराज ब्राह्मण विशेषाधिकार और जातिगत ऊंच नीच के वैचारिक विरोधी थे । अपने प्रशासन में उन्होंने निम्न जातियों को नियुक्त किया । उन्होंने जाति और ब्राह्मण श्रेष्ठता से जुड़ी बहसों में सक्रिय हस्तक्षेप किया और ऐसे मंचों का गठन किया जहां अछूत नेता मिल सकें और अपने सरोकारों को स्वर दे सकें । उन्होंने ढेर सारे ऐसे कानूनी और सामाजिक कदम उठाये जिनसे अछूतों की आर्थिक दुर्दशा का अंत हो और वे आधुनिक शिक्षा हासिल करने में समर्थ हों । ऐसे भी सवर्ण सुधारक सामने आये जो अछूतों की हालत में सुधार चाहते थे । इस प्रसंग में वी आर शिंदे के प्रयास अधिक टिकाऊ साबित हुए । उन्होंने हिंदू सुधार पर जोर दिया और जाति तथा छुआछूत का विरोध किया । अछूतों के धर्मांतरण को देखते हुए कुछ कट्टर हिंदू लोगों ने भी छुआछूत पर चिंता जाहिर की और अछूतों को जाति व्यवस्था के भीतर समाहित करना चाहा ।

जिस तरह पश्चिमी भारत में फुले और उनके साथियों ने किया उसी तरह समूचे भारत के अछूत और निम्न जाति के चिंतकों ने अपने समय को समझने का प्रयास किया । ये लोग अंग्रेजी शिक्षा तो हासिल कर ही चुके थे, दुनिया भर के बदलावों से भी वाकिफ़ थे जिसमें समता का मूल्य प्रधान था इसलिए जाति व्यवस्था में अपनी स्थिति का उन्होंने विरोध किया और अन्यायपूर्ण तथा ऊंच नीच आधारित समाज को बनाये रखने में हिंदू धर्म और ब्राह्मण प्राधिकार की आलोचना की । सबने ही औपनिवेशिक शासन को अवसर की तरह देखा और राष्ट्रवादी आंदोलन से दूरी कायम की । कुछ जगहों पर अछूतों और निम्न जातियों ने एकता बनायी ताकि अपने साथ दुर्व्यवहार पर अंग्रेजी शासन का ध्यान आकर्षित कर सकें । यह एकता हमेशा नहीं बनी क्योंकि अछूतों की समस्या विशेष थी इसलिए उसके बारे में वे ही बोलते थे । अछूतों के संगठनों ने औपनिवेशिक सरकार से शिक्षा और रोजगार के अपने अधिकार की मांग की और इसके लिए कानून या अध्यादेश पर जोर दिया । भौतिक दुरवस्था के कारण अलग अलग इलाकों के लोगों ने अपने क्षेत्र की आर्थिक स्थिति के अनुरूप मांगे प्रस्तुत कीं । कुछ जगहों पर ट्रेड यूनियन बने, कुछ जगहों पर जमीन की मांग हुई और कुछ जगहों पर ये समुदाय किसान आंदोलनों में शामिल हुए । इन सबने पहचान और इतिहास के सवाल उठाये । अतीत में शासक होने, फिर आर्यों के आगमन से पराजित होने और फिर जाति व्यवस्था का निर्माण सुपरिचित कहानी होती थी । अन्य कुछ लोग स्थानीय समाज के सबसे आदिम सदस्य होने का दावा करते थे तथा कुछ ऐसे भी थे जो आस्तिकता की दुनिया में अपनी जगह का दावा करते थे । ऐसे ही माहौल में अंबेडकर का आगमन हुआ ।

उनके जीवन के शुरुआती दिनों में बाम्बे में तमाम अछूत नेता सक्रिय थे । वे अखबार निकालते, सामुदायिक कामों में भाग लेते और सेना में अछूतों की भरती खोलने के लिए अंग्रेज सरकार को आवेदन देते थे । सेना में उनकी भरती अंबेडकर के जन्म के साल ही बंद हो गयी थी । सेना के उनकी भरती से सामाजिक उत्पीड़न से कुछ हद तक आजादी तो मिलती ही थी, आधुनिक शिक्षा भी हासिल करने में आसानी होती । वजह कि सैनिकों के बच्चों के लिए स्कूल जाना अनिवार्य था । अंबेडकर के पिता भी अछूतों की इस मांग के समर्थक थे । उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजा हालांकि खुद आजीविका के चक्कर में भटकते रहे । अंबडकर स्कूल गये और वहां जारी भेदभाव को प्रत्यक्ष देखा । स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद वे एलफिंस्टन कालेज गये । कालेज में शिक्षा का उदार माहौल था और तमाम किस्म की समाज सुधार सभाओं की सक्रियता थी । यहां अंबेडकर को समसामयिक राजनीतिक और सामाजिक सवालों की जानकारी मिली । सयाजीराव गायकवाड़ की वृत्ति के चलते उन्हें कालेज में कोई असुविधा नहीं हुई । 1912 में राजनीति और अर्थशास्त्र में उपाधि हासिल करके उन्हें बड़ौदा राज की सेवा में आना पड़ा । पढ़ाई में आर्थिक मदद के बदले में ऐसा करना जरूरी था । इस सेवा में बहुत समय तक रहना उनके लिए मुश्किल हो गया । अछूत होने के नाते आवास और भोजन का प्रबंध करना उनके लिए कठिन साबित हुआ । बहरहाल पिता के निधन के बाद घरेलू जिम्मेदारियां उठानी पड़ीं । इसी बीच गायकवाड़ ने तीन साल के लिए कोलम्बिया विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा हेतु वृत्ति प्रदान की और 1913 में पढ़ाई के लिए अंबेडकर अमेरिका चले गये ।

घर में आधुनिक माहौल होने के बावजूद अंबेडकर का परिचय भक्ति साहित्य खासकर कबीर से था । अछूतों के घरों में कबीर का बहुत सम्मान था क्योंकि उन्होंने जन्म आधारित भेदभाव का विरोध किया था । बुद्ध की भी पढ़ाई उन्होंने की थी । उन्नीसवीं सदी में यूरोपीय और भारतीय विद्वानों ने बुद्ध को बहुत कुछ विद्रोही प्रोटेस्टैन्ट धर्म की तरह पेश किया था । इसके चलते उनकी ओर समाज सुधारक और क्रांतिकारी आकर्षित होते थे खासकर अछूत और निम्न जातियों के चिंतक । बचपन के प्रभावों को याद करते हुए बाद में अंबेडकर ने सबको समान महत्व नहीं दिया । भक्तिकालीन परम्परा से आत्मिक बल तो मिलता था लेकिन मौजूदा सामाजिक संबंधों को चुनौती नहीं मिलती थी । इससे थोड़ी देर के लिए सामाजिक भेदभाव को अतिक्रांत करने की अनुभूति होती थी लेकिन सोच विचार के तरीकों में बदलाव नहीं आता था । इसके बावजूद इस परम्परा की उन्होंने उपेक्षा नहीं की । अपनी एक किताब उन्होंने चोखामेला को समर्पित की है । बौद्ध धर्म और दर्शन में तो उनकी रुचि जीवन भर बनी रही । 

जब अंबेडकर अमेरिका पहुंचे तो अपने साथ ही दुनिया के बारे में भी पर्याप्त उत्सुकता उनके भीतर थी । यहां उन्हें कोई अछूत नहीं मानता था इसलिए इस समय का सर्वोत्तम उपयोग उन्हें करना था । कोलम्बिया में उन्हें ऐसे अध्यापक मिले जिनकी सोच को आकार प्रगतिशीलता ने दिया था । मानवशास्त्र और समाजशास्त्र की पढ़ाई के आधार पर उन्होंने सामाजिक ऊंच नीच और नियंत्रण, सहकारी जीवन और सामाजिक नातेदारी के महत्व को समझा और इसी तरह अर्थशास्त्र और इतिहास के आधार पर समानता, न्याय और बंधुत्व की अपनी धारणा को पुष्ट किया । तीन साल में उन्होंने जो शोध किया उसका प्रकाशन 1925 में हुआ और 1927 में उन्हें डाक्टरेट की उपाधि प्रदान की गयी । जाति व्यवस्था के बारे में अपना प्रपत्र भी उन्होंने प्रस्तुत किया । वहां से लंदन आये । वहां कानून और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की । शोध कार्य करना चाहते थे लेकिन संसाधनों की कमी के कारण 1917 में भारत लौट आना पड़ा । बाद में छूटी पढ़ाई को पूरा करने 1920 में फिर आये । उस दौरान इंग्लैंड प्रथम विश्वयुद्ध में मुब्तिला था, बोल्शेविक क्रांति मुहाने पर थी और एशिया तथा यूरोप के साम्राज्य ढहने की कगार पर थे । लंदन में मजदूरों की सभाओं में वाम नेताओं के जोशीले व्याख्यान हुआ करते थे । मजदूर प्रश्न पर अंबेडकर की रुचि इसके बाद आजीवन बनी रही । विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रवाद का जो उभार हुआ उसके प्रभाव में अंबेडकर ने आत्मनिर्णय और सम्प्रभुता के सवालों पर गहन विचार किया । सम्प्रभुता को उन्होंने राष्ट्र-राज्य के साथ व्यक्तियों में भी निहित माना और आत्मनिर्णय को राष्ट्र के साथ ही सामाजिक तौर पर उत्पीड़ितों का भी अधिकार माना । इन्हें अंबेडकर ने लोकतंत्र के जरूरी घटक माना । लोकतंत्र को भी कानूनी औपचारिकता की जगह अंबेडकर ने सामाजिक रिश्तों में उतारने का सुझाव दिया ।

अंबेडकर के भारत आगमन के साथ ही राष्ट्रीय आंदोलन के जुझारू दौर की शुरुआत होती है । इससे पहले आवेदन का एक दौर रहा था जिसमें हद से हद अंग्रेजी राज की उदार आलोचना की जाती थी । नेता लोग आवेदन के जरिये सरकार का ध्यान अर्थतंत्र या प्रशासन की आम समस्याओं की ओर आकर्षित करते थे । कभी देसी शिक्षा, उद्योग आदि की स्थापना का अभियान भी चलाया जाता था । इस दौर का समूचा राष्ट्रीय आलोड़न बहुत कुछ हिंदू चरित्र का रहा इसलिए उसमें मुस्लिम समुदाय की भागीदारी कम ही रहती थी । बहुत हद तक इसकी वजह से 1909 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई । इसी समय अंग्रेज सरकार ने पहली बार राजनीतिक सुधार आरम्भ किये । इसका मकसद अधिकाधिक भारतीयों का विधायी या शासकीय सहयोग हासिल करना था । उग्र राष्ट्रीय भावना के उभार के कारण ऐसा करना जरूरी समझा गया । मुस्लिम लीग ने कहा कि इसमें मुसलमानों के हितों की नुमाइंदगी के लिए उनका अलग निर्वाचक मंडल बनाया जाये । कांग्रेस और लीग ने बहुसंख्या और अल्पसंख्या के नाम पर सीटों की संख्या की मांग की इसलिए संख्या का सवाल उस समय बहुत संवेदनशील सवाल हो गया । आबादी के लिहाज से सीटों का प्रतिशत तय होना था । इस मामले में अछूतों का टेढ़ा मामला फंस गया । मुस्लिम लोग अछूतों को हिंदुओं से अलग गिनने की मांग करने लगे और हिंदू लोग अछूतों को हिंदू समुदाय के भीतर गिनने की वकालत करने लगे । उनका कहना था कि मुस्लिम और ईसाई लोगों ने अछूतों का धर्मांतरण कराया है ताकि हिंदुओं की तादाद कम की जा सके । कांग्रेस ने लगातार यह भी प्रयास किया कि मुस्लिम नेताओं को प्रमुखता दे और मुसलमानों के हितों का ध्यान रखने का आश्वासन दिया ।

इस विवाद के दौरान ही राष्ट्रीय आंदोलन में कुछेक कारणों से जान आयी । आयरलैंड के होम रूल आंदोलन के प्रभाव में 1916 में स्वराज की मांग पेश की गयी थी । इसी समय मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच समझौता हुआ जिसके चलते कांग्रेस ने कुछ प्रांतों में जायज मुस्लिम प्रतिनिधित्व का दावा माना और मुस्लिम लीग ने स्वराज की मांग का समर्थन किया । गांधी 1915 में दक्षिण अफ़्रीका से भारत आ गये थे । सबसे पहले देश भर घूमकर उन्होंने युद्ध प्रयासों में साथ देने की अपील भारतीयों से की । बाद में उन्होंने भी आर्थिक सवालों पर कुछ अभियान चलाये जिन्हें उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया । युद्ध के दौरान और बाद में गांधी तमाम किस्म के असंतोष के विरोध में होने वाले आंदोलनों का केंद्र बनते गये । युद्ध के समाप्त होते ही भारत भर में आंदोलनों की बाढ़ आ गयी और जुझारू चेतना का उभार हुआ । अंग्रेजी शासकों को लग गया कि पुराने तरीकों से ही शासन सम्भव नहीं है । भारतीयों की भागीदारी में बढ़ोत्तरी जरूरी हो गयी । मताधिकार तो सीमित ही रहा लेकिन भारतीयों के प्रतिनिधित्व में इजाफ़ा हुआ । उनकी शक्ति और जिम्मेदारी को प्रभावी बनाने के लिए संवैधानिक बदलाव भी किये गये । प्रस्तावित सुधारों के मुताबिक प्रतिनिधियों में अछूतों को भी होना था ।

अंबेडकर को कोलम्बिया शिक्षा के लिए मिली वृत्ति के एवज में बड़ौदा में सेवा देनी थी । उन्होंने प्रशासन में पद तो ग्रहण किया लेकिन नगर में रहना मुश्किल था । कार्यस्थल पर भी सहकर्मी उनके साथ भेदभाव करते । लौटकर बाम्बे आये लेकिन उनकी उच्च शिक्षा के बावजूद कोई सलीके का काम न मिल सका । इसी शिक्षा की बदौलत उन्हें अछूतों और निम्न जातियों में अपार सम्मान मिला । शाहू जी महाराज ने उनमें नेता बनने की सम्भावना देखी । अंबेडकर ने मूकनायक का संपादन शुरू किया ताकि विषमता और अन्याय के बारे में अपनी समझ का प्रचार कर सकें । उन्होंने साउथबरो आयोग के समक्ष अपना बयान दर्ज कराया और देश में मताधिकार के विस्तार का पक्ष लिया । उन्हें बुलाया नहीं गया था लेकिन सवर्णों द्वारा अछूतों के प्रतिनिधित्व के प्रस्ताव के विरोध में उन्होंने लिखित उत्तर दिया । इसे उनका पहला विद्रोह कहा जा सकता है । भारत के असमान समाज में लोकतंत्र को साकार करने की दिशा में लक्षित उनके हस्तक्षेपों की बस शुरुआत ही इससे हुई थी ।