Monday, October 4, 2021

शहर और स्त्री

 

            

                             

2019 में बिट्वीन लाइन्स से लेस्ली केर्न की किताबफ़ेमिनिस्ट सिटी: फ़ील्ड गाइडका प्रकाशन हुआ लेखिका ने किताब की शुरुआत 1980-81 में लंदन के एक चौराहे की तस्वीर से की है जिसमें वे कबूतरों को दाना खिला रही हैं । उस जमाने में लंदन में ऐसा करने का रिवाज था । अब कोई ऐसा नहीं करता । वे टोरोन्टो की रहने वाली थीं । बचपन में नगर के उनके अनुभव अपने भाई से अलग थे और इसकी एकमात्र वजह उन दोनों में लैंगिक अंतर था ।

आधुनिक शाहर में स्त्री को हमेशा समस्या की तरह देखा गया है । औद्योगिक क्रांति के समय शहरों का विकास तीव्र गति से हुआ जिनमें तमाम वर्गों के लोग देहात से उखड़कर चले आये थे । उस समय की विक्टोरियाई सामाजिक मान्यता के मुताबिक ऐसे में गोरी संभ्रान्त स्त्रियों की शुद्धता की रक्षा के लिए वर्ग आधारित बंदिशों का निर्माण किया गया । इन बंदिशों पर शहरी वातावरण के चलते निरंतर टूटने का खतरा बना रहता था । इन हालात में स्त्रियों के समक्ष खुद को जनता का हिस्सा समझने का अवसर पैदा हुआ । वे यौन हिंसा और सुरक्षा संबंधी बहसों में खुलकर भाग लेने लगीं । बहरहाल संक्रमण के इस दौर में इस बात का खतरा लगातार बना रहता था कि रास्ते में किसी भी संभ्रान्त स्त्री को सामान्य स्त्री समझ लिया जाये और उसके साथ अपमानजनक बरताव हो । इसके चलते उस जमाने के बहुतेरे लोग शहरी जीवन को ही सभ्यता के लिए खतरा मानते थे । इससे हुआ यह कि जैसे जैसे स्त्रियों की आजादी का विस्तार हुआ वैसे वैसे सेक्स से लेकर साइकिल तक सब कुछ नैतिक पूर्वाग्रह का शिकार होता गया । प्रतिष्ठित लोग शहर छोड़कर देहात और उपनगरों को अपने लिए सुरक्षित समझकर वहां बसने लगे । दूसरी ओर कुछ ऐसी स्त्रियों की आमद शहरों में हुई थी जिन्हें जीवन यापन के लिए मजदूरी करनी थी । मजदूर वर्ग में उनकी शिरकत से थोड़ी आजादी तो हासिल हुई ही, घरेलू जिम्मेदारियों के लिए समय कम मिलने लगा । नतीजा कि मजदूर वर्ग के नैतिक पतन के लिए इन हालात को दोष दिया गया । यह नैतिक पतन उनके सार्वजनिक और निजी जीवन में दुर्व्यवहार के रूप में अभिव्यक्त होना शुरू हुआ । सबसे भारी समस्या तो स्वाभाविक तौर पर वेश्यावृत्ति थी । इससे परिवार की बरबादी और नतीजतन समाज की बुनियाद को खतरा पैदा हुआ । बहुतेरे लोगों ने इस समस्या का समाधान वेश्याओं को उपनिवेशों में भेजने का सुझाया । उपनिवेशों में जो अंग्रेज गये थे उन्हें स्थानीय औरतों के सम्पर्क से बचाने की चिंता इस उपाय के मूल में थी । इसलिए उपनिवेशों में शहरों से स्थानीय लोगों को उजाड़ा गया । इस तरह वहां जा बसी गोरी स्त्रियों की शुचिता को बचा लिया जाना था । देसी औरतों को शहरों में इस बदलाव के लिए खतरनाक माना गया । इसी मकसद से तमाम भौगोलिक और कानूनी कदम उठाये गये । स्थानीय स्त्रियों का कलंकीकरण नगरीकरण की परिजोजना का अंग था ।

उपनिवेशों में आज तक जिस तरह की हिंसा होती है उससे इस नीति और आचरण की निरंतरता का पता चलता है । आज भी शहरों में खास किस्म के सुधार हेतु स्त्री शरीर को नियंत्रित करने की कोशिशों का अंत नहीं हुआ है । हाल हाल तक अश्वेत या देसी स्त्रियों की जबरन नसबंदी देखी जाती है । स्त्री के शरीर को अब भी समस्या के रूप में देखा जा रहा है । शहरों में सामाजिक सरोकार के केंद्र में स्त्री शरीर बना हुआ है । यह सही बात है कि शुचिता और स्वच्छता संबंधी विक्टोरियाई भय कुछ कम हुए हैं लेकिन आज भी शहर में स्त्री को तमाम किस्म की बाधाओं का सामना करना पड़ता है । तमाम समाजार्थिक और प्रतीकात्मक किस्म की ये बाधाएं उनके दैनन्दिन जीवन को आकार देती हैं । इनमें से अधिकतर बाधाओं को पुरुष देख नहीं पाते । कारण कि इनका सामना उन्हें करना नहीं पड़ता । सभी जानते हैं कि शहरों के मामलों में फैसले लेनेवाले लोग मुख्य रूप से पुरुष हैं और शहरी अर्थनीति से लेकर गृह निर्माण तक, स्कूलों की इमारत से लेकर सार्वजनिक यातायात तक, पुलिस के इंतजाम से लेकर बर्फ हटाने तक के फैसले बिना इस जानकारी के किये जा रहे हैं कि इनसे स्त्रियों पर क्या असर पड़ता है । स्त्री के शरीर को कलंकित करने के उपाय बहुतेरे हैं । अश्वेत स्त्रियों को सरकारी इमदाद का उपभोग करने में माहिर बताया जाता है । मोटापा विरोधी अभियानों में भी माताओं को निशाना बनाया जाता है । संक्षेप में कहें तो स्त्री शरीर को अब भी शहर की समस्याओं की जड़ माना जाता है ।

नगरों के कुलीनीकरण के वकील अश्वेत माताओं और आप्रवासी स्त्रियों पर अपराधीकरण को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं । इस तरह आधुनिक शहर भी पुरुषों की पारम्परिक भूमिका के पुनरुत्पादन और पुरुषों के ही अनुभव को सामान्य बना देने के उपकरण बन गये हैं । ये शहर स्त्री के लिए तरह तरह की बाधाएं खड़ी करते हैं और उनके अनुभवों की लगातार अनदेखी की जाती है । इसे ही लेखिका ने शहर पर पुरुष प्रभुत्व का नाम दिया है । लेखिका ने उदाहरण के बतौर टोरन्टो विश्वविद्यालय के पूर्व विद्यार्थियों की शहर पर केंद्रित एक पत्रिका का जिक्र किया है । इसमें नगर की बुनियादी जरूरतों में सस्ता जीवन, सेवाओं तक पहुंच, टिकाऊपन और मनोरंजन को गिनाया गया था । इन सभी जरूरी मुद्दों पर लेख अधेड़ गोरे पुरुषों ने ही लिखे थे । लेखों में जिन विशेषज्ञों का हवाला दिया गया था वे सभी पुरुष थे । लेखन के क्षेत्र में पुरुष प्राधान्य को बरकरार रखने का यह सुपरिचित तरीका है । गोरा पुरुष अपने लेख में गोरे पुरुष का ही हवाला देगा । बहुत लम्बे समय से यह सिलसिला चलता आ रहा है और समय बीतने के साथ इसमें कोई कमी आने की जगह बढ़ोत्तरी ही नजर आ रही है । इस पहलू को उजागर करने में लेखिका ने खुद को पहला नारीवादी मानने से इनकार किया है । लम्बे समय से औरतें शहरी जीवन के बारे में लिख रही हैं, शहरी स्त्रियों की जरूरतों की वकालत कर रही हैं तथा घर, शहर और पास पड़ोस की अपनी योजना भी प्रस्तुत कर रही हैं । नारीवादी वास्तुकारों, नगर निर्माताओं और भूगोलवेत्ताओं ने स्त्री अनुभवों के बारे में श्रमसाध्य शोध करके इस मामले में गम्भीर हस्तक्षेप किया है । कार्यकर्ताओं ने नगर योजना, पुलिस व्यवस्था तथा स्त्रियों की जरूरतों के मुताबिक सेवाओं के लिए कठिन संघर्ष किये हैं फिर भी रात में कोई स्त्री सड़क पर भयभीत हो जाती है अगर कोई अपरिचित पुरुष उसके पीछे पीछे आ रहा हो । जिन भी नारीवादी चिंतकों का जिक्र लेखिका ने किया है उनके चिंतन और लेखन को इस किताब की आधारभूत सामग्री बनाया गया है ।

लेखिका ने जब पहली बार नारीवादी भूगोल की बाबत सुना तो नारीवादी सिद्धांतों का नया आयाम उनके सामने खुल गया । सत्तातंत्र की कार्यपद्धति को उन्होंने नयी निगाह से देखना शुरू किया और शहरी जीवन के अपने अनुभवों को स्त्री की समझ से विश्लेषित करना शुरू किया । उसके बाद शहर उनके लिए नया हो गया । बाद में उन्होंने खुद को नारीवादी भूगोलवेत्ता के बतौर समझा । किताब में सिद्धांत की जगह उन्होंने सबसे करीबी चीज के विश्लेषण से शुरुआत की है । स्त्री के लिए सबसे करीबी चीज उसका शरीर होता है । स्त्री शरीर को केंद्र में रखकर उन्होंने औरतों के सवाल ही पूछे हैं । उनके ये सारे सवाल कोई अमूर्त नहीं, बल्कि ठोस व्यावहारिक दैनन्दिन के अनुभव से उपजे हैं । शहरी जीवन ने स्त्री के सामने बहुतेरे सवाल उठाये जिनका उत्तर अभी नहीं मिला है । स्त्री के शहरी अनुभव बहुत गहरे में लैंगिक आयाम लिये हुए होते हैं । उसकी लैंगिक पहचान से ही तय होता है कि वह शहर में कैसे चलेगी- फिरेगी तथा कौन सी चीजें उसे सुलभ होंगी । यह लैंगिकता उसके शरीर तक ही महदूद नहीं होती लेकिन उसके रोज ब रोज के अनुभव इस शरीर पर आधारित होते हैं । इससे उसकी पहचान बनती है । इसके कारण ही उसे दूरी अधिक होने के बावजूद बहुधा सुरक्षित राह अपनानी पड़ती है । विरोध प्रदर्शनों में भागीदारी की इच्छा के बावजूद उसे गिरफ़्तार होने पर संतान की देखरेख की फ़िक्र शामिल होने से रोक देती है । ये सवाल लेखिका को निजी नहीं लगते । इन्हीं छोटे महसूस होनेवाले उपायों से शहर स्त्री को उसकी जगह बताता है ।

संयोग कि किताब को लिखते समय ही मीटू आंदोलन फूट पड़ा । तमाम स्त्री और पुरुष अपने साथ हुई यौन हिंसा को बताने के लिए सामने आये । यह यौन उत्पीड़न और हिंसा कार्यस्थल, खेल, राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में हुई थी । इस विस्फोट के पहले मीडिया, संस्थान और नीति निर्माण के हलकों में इस उत्पीड़न की बात भी नहीं होती थी । हालांकि इस हिंसा के शिकारों और भेद खोलने वालों को बदनाम करने के मामले में कोई खास सुधार तो नहीं हुआ है लेकिन सबूतों के भारी पहाड़ ने नारीद्वेषी सांस्थानिक रुख में बदलाव की जरूरत पैदा कर दी है । यौन हिंसा के सभी शिकारों ने बताया कि उनके साथ घटित शारीरिक और मानसिक हिंसा ने उनके जीवन को बदल डाला और इसके तकलीफदेह असरात वे अब भी झेलती हैं । उनकी कहानियों से शहर में स्त्री को होनेवाले भय की समता महसूस होती है । हिंसा का निरंतर खतरा तथा रोज रोज का उत्पीड़न शहरों में रहनेवाली स्त्री की चाल और चेतना को रूपायित करता है । कार्यस्थल पर होनेवाला उत्पीड़न स्त्रियों को ऊंचे पदों पर पहुंचने से रोकता है और विज्ञान, राजनीति, कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान को ओझल कर देता है । इसी तरह शहरी हिंसा का खौफ़ भी उनकी पसंद, पहुंच, ताकत और आर्थिक सम्भावनाओं को सीमित कर देता है । जिस तरह कानून उत्पीड़क को बचाता है और उत्पीड़ित को परेशान करता है उसी तरह शहर का माहौल पितृसत्ताक परिवार को, श्रम बाजार के लैंगिक भेदभाव को और स्त्री पुरुष के पारम्परिक कार्य विभाजन को मजबूत बनाता है । पुराने बंधनों के कुछ ढीला होने के बावजूद शहरों में निर्मित सामाजिक कायदों ने स्त्रियों और हाशियों के अन्य समूहों के जीवन को प्रभावित किया है ।

मीटू के दौरान सामने आयी कहानियों ने बलात्कार के झूठे तर्कों की असलियत जाहिर कर दी । समाज में ऐसे झूठे विचार और गलत धारणाओं की व्याप्ति अब भी है जो यौन उत्पीड़न और हिंसा की जिम्मेदारी उसके शिकारों के सिर पर मढ़ देते हैं । इनसे ही बलात्कार की संस्कृति का जन्म होता है । इस हिंसा के शिकारों को दो सवालों का जवाब अक्सर देना पड़ता है । एक कि उसने क्या पहना था और दूसरे कि उसने शिकायत क्यों नहीं दर्ज करायी । इनके इर्द गिर्द सुरक्षा और खतरे का एक मानसिक भूगोल भी निर्मित होता है जो प्रत्येक स्त्री के दिमाग में हमेशा मौजूद रहता है । जगह और समय तथा रास्ते के बारे में सही और गलत की व्यवस्था स्त्री के लिए जानना बेहद जरूरी होता है । इन सब संकेतों के जरिए स्त्री को बता दिया जाता है कि शहर उसके लिए नहीं है ।

लेखिका ने किसी भी स्त्री की तरह सीख लिया कि शहर का खतरा, रोमांच, संस्कृति और आकर्षण जितना कल्पना में होता है उतना ही ठोस होता है । कल्पना का शहर अनुभव, मीडिया, कला, अफवाह, भय और आकांक्षा से निर्मित होता है । शहर का आकर्षण कुछ भी घटित होने की सम्भावना से पैदा होता है और यही उसकी ऊर्जा का भी स्रोत होता है । आजादी और भय, उत्तेजना और खतरा, अवसर और सावधानी के इसी मिश्रण के चलते शहरों के बारे में नारीवादियों ने इतना सोचा और लिखा है । नारीवादी कार्यकर्ताओं ने शहरी जीवन पर अक्सर दावा ठोंका है । स्त्री के विरुद्ध लक्षित सार्वजनिक हिंसा के विरोध में स्त्रियों ने यूरोप और अमेरिका के शहरों में रात्रिकालीन जीवन पर अपना हक जताया है । शहरी जीवन में समायी हिंसा के बावजूद स्त्रियों ने शहरी जीवन का मजा लिया है । शहर उनके लायक नहीं होते फिर भी शहरों में उन्होंने अपने लिए जगह बनायी है ।

विक्टोरियाई जमाने में भी कुछ स्त्रियों ने सार्वजनिक व्यक्तित्व के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करायी । खतरों को दरकिनार किया जा सकता है । शहरों ने स्त्रियों के समक्ष जो अवसर पैदा किये वे कस्बे या देहात में अनसुने थे । काम करने का मौका हो या संकीर्ण पारम्परिक भूमिका को तोड़ देने की आजादी हो या फिर वैवाहिक और पारिवारिक जीवन से परहेज करने का अवसर हो, सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने की सम्भावना हो या सामाजिक और राजनीतिक आदर्श को निजी जीवन में साकार करने की ताकत हो या फिर दोस्ती विकसित करने का सपना हो- शहरों की स्त्रियों के लिए ये सभी विकल्प किसी छोटी जगह के मुकाबले बहुत आसानी से खुल जाते हैं । शहर की मनोवैज्ञानिक खूबियां भी कुछ कम महत्व की नहीं होतीं । गुमनामी, ऊर्जा, स्वत:स्फूर्तता, अप्रत्याशित की सम्भावना और खतरा भी मजेदार अनुभव का स्रोत बन जाता है । लेखिका यह तो नहीं कहतीं कि स्त्रियों को भयभीत रहना पसंद है लेकिन शहरी जीवन का आनंद उसमें निहित अज्ञात को जान लेने के साहस में मौजूद होता है । असल में शहरी जीवन की अव्यवस्थाजन्य उत्तेजना आसान हो जाती है जब हमारे पास वापस लौट आने की जगह हो । वैसे भी अपराध का भय औरतों को घर के भीतर कैद रखने में सक्षम नहीं साबित हुआ है । किताब में शहर के बुरे और अच्छे दोनों ही पहलुओं पर विचार किया गया है । इसके जरिए शहरों के बारे में हमारी उपलब्ध जानकारी को हिलाया डुलाया गया है ताकि हम शहर के सामाजिक संबंधों को नयी नजर से देख सकें ।  लेखिका को उम्मीद है कि इससे नारीवादी शहर बनाने की रचनात्मक सोच की जगह बनेगी । नारीवादी भूगोल का संवाद शहर में जारी जीवन यापन के वास्तविक संघर्ष से होगा ।

नारीवादी भूगोल सुनने में विचित्र लगता है अगर हम भूगोल को केवल स्कूली दिनों में नक्शे बनाने तक सीमित समझते हैं । लेखिका को लगता है कि नारीवादी विश्लेषण में भूगोल की आमद से उसके कई नये आयाम खुलेंगे । भूगोल का अर्थ हमारे मानव निर्मित और प्राकृतिक परिवेश के साथ मनुष्य का रिश्ता है । इस नजरिये से देखने पर समझ आयेगा कि स्त्री पुरुष के बीच भेद जमीनी स्तर पर कैसे लागू होता है । स्त्री की दोयम दर्जे की हैसियत केवल धारणाओं के सहारे नहीं बनायी जाती । उसके लिए बहिष्करण का ठोस और वास्तविक भूगोल निर्मित किया जाता है । पुरुष की सत्ता और विशेषाधिकार को बरकरार रखने के लिए स्त्रियों की हदबंदी जरूरी होती है । सही बात यह है कि शहरों में पितृसत्ता पत्थर की लकीर हो जाती है । ईंट पत्थर से बनी इमारतें उन्हें बनाने वाले समाज को प्रतिबिम्बित करती हैं । टोरन्टो में हवा के असरात के बारे में जो निर्देश जारी किये गये उसमें सामान्य मनुष्य की परिभाषा बालिग पुरुष की मानी गयी । लिंग संबंधी पूर्वाग्रह इमारतों की ऊंचाई और स्थिति तथा हवा के निकास की टनेल को भी निर्धारित करती है ।

एक बार बन जाने के बाद यही शहर सामाजिक शक्ति संबंधों और विषमता का पुनरुत्पादन करने लगते हैं । उसकी इमारतों का रूपाकार व्यक्तियों और समूहों को उपलब्ध सम्भावनाओं को तय करना शुरू कर देता है । उनसे सामान्य और सही तथा बेढंगा और व्यर्थ का निर्धारण होने लगता है । इसलिए ही सामाजिक बदलाव के बारे में सोचते हुए शहर जैसी भौतिक जगहों का भी ध्यान रखना चाहिए ।                                                                                           

 

Saturday, October 2, 2021

प्रेमचंद का स्त्री चित्रण

 


                                 

 

विवादों के कारण ही सही प्रेमचंद का साहित्य हमेशा चर्चा में बना रहता है । विवाद के जरिये प्रासंगिकता की यह व्यथा कार्ल मार्क्स के साथ भी रही है । विवादों से उनका पीछा उनके जन्म के दो सौ साल बाद भी नहीं छूटा । हाल में लंदन स्थित उनकी कब्र पर तोड़फोड़ की गयी । तोड़फोड़ करने वाले उग्र राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी समूह के लोग थे । उनके मुताबिक जो व्यक्ति ब्रिटेन का नागरिक नहीं था उसकी कब्र इस देश की राजधानी में होना अनुचित है । प्रेमचंद जीवित रहते तो विवादों में रहे ही देहांत के बाद भी उनको ध्वस्त करना बारम्बार जरूरी लगता है । कार्ल मार्क्स को पूंजीवाद के विरोध में मजदूरों के प्रति निष्ठा की कीमत अब तक चुकानी पड़ रही है । प्रेमचंद को भी अपनी प्रतिबद्धता घोषित करने की कीमत चुकानी होगी । प्रतिबद्धता को साहित्य के लिए नुकसानदेह समझने वाले लोग प्रगतिशील लेखक संघ की अध्यक्षता के लिए उन्हें कैसे माफ़ कर सकते हैं ।  

कभी दलित साहित्य के लेखकों ने उनके साहित्य को दलित साहित्य का अंग मानने से इनकार करते हुए उसे सहानुभूति का साहित्य कहा था । स्त्री लेखन की ओर से अभी तक संयोग से कोई गंभीर सवाल नहीं उठाया गया । बहुत पहले एक आरोप जरूर प्रेमचंद के स्त्री चित्रण लगाया गया था कि इसमें मनोवैज्ञानिक गहराई नहीं नजर आती । हाल में एकाध ऐसे लेख देखने में आये जिनमें कहा गया था कि यथार्थ के कुल चित्रण के बावजूद प्रेमचंद अपने स्त्री चित्रण में सामंती नैतिकता के घेरे को तोड़ नहीं पाते हैं । उचित होगा कि हम प्रेमचंद के स्त्री चित्रण के सही परिप्रेक्ष्य और उद्देश्य को समझें ।

प्रेमचंद को किसानों का चितेरा बहुतेरा कहा गया है लेकिन उनके उपन्यासों के स्त्री पात्र भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं । उनके ये सभी पात्र बेहद जीवंत, भास्वर और सकर्मक हैं । इन पात्रों के जरिए प्रेमचंद स्त्री की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करते हैं । उनके स्त्री पात्रों की मुखरता और निर्णय लेने की क्षमता प्रत्यक्ष है । रामविलास जी ने भी कहा था कि धनिया की सरस्वती कु अधिक ही उदग्र है । आखिर प्रेमचंद को ऐसी स्त्रियों के सृजन की प्रेरणा कहाँ से मिल रही थी ? जब प्रेमचंद अपने उपन्यास लिख रहे थे तो 1857 को महज साठ सत्तर बरस ही बीते थे । समय के इतने कम अंतराल के असर को समझना हो तो आजादी के आंदोलन के वर्तमान असर को हम देख सकते हैं । समय की इतनी कम दूरी पर घटित उस घटना के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता । आजादी के आंदोलन से बेहद गहरा लगाव महसूस करने वाले प्रेमचंद पर आजादी की उस लड़ाई का मानसिक प्रभाव अवश्य रहा होगा । प्रेमचंद के लेखन में स्वाधीनता के इतने गहरे रंग हैं कि चकित हो जाना पड़ता है । दुनिया का सबसे अनमोल रतन से लेकर कफन तक इस भावना का विस्तार बहुविध है ।    

1857 की जंग के बारे में चाहे इतिहास के दस्तावेजों के जरिए देखें या जनश्रुतियों के आधार पर बात करेंस्त्रियों की समाजी भूमिका बहुत ही निर्णायक और नेतृत्वकारी दिखाई पड़ती है । झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हों अथवा लखनऊ की बेगम हजरत महल, ये सब महज प्रतीक हैं उन हजारों बहादुर स्त्रियों की जिनकी जिंदगी घर की चारदीवारी के भीतर ही कैद नहीं थी । कुछ भरोसेमंद गवाहियों पर यकीन करें तो वेश्याओं तक की भागीदारी आजादी के आंदोलन में थी । यह देशव्यापी परिघटना हमें इस आम विश्वास पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करती है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत में स्त्रियाँ सामाजिक जीवन में मौजूद ही नहीं थीं । असल में 1857 की पराजय के बाद जब अंग्रेजों का शासन अच्छी तरह स्थापित हो गया तभी विक्टोरियाई नैतिकता के दबाव में स्त्री की घरेलू छवि को सजाया सँवारा गया । लेकिन घरों में कैद होने के बावजूद हिंदी क्षेत्र की स्त्रियों के दिमाग से अपने इन लड़ाकू पूर्वजों की याद गायब नहीं हुई थी । याद की कौन कहे, प्रत्यक्ष जीवन में भी उनके गहरे सामाजिक हस्तक्षेप के भरपूर सबूत मौजूद हैं । याद दिलाने की जरूरत न होगी कि बिहार प्रांत के विनाशकारी भूकम्प के बाद मदद के चंदे के लिए ही बेगम अख्तर पहली बार मंच पर आयी थीं । यह भी ध्यान रखना होगा कि स्त्रियों की पहली पीढ़ी उस समय औपचारिक शिक्षा पा रही थी । यह शिक्षा उन्हें घर के बाहर लेकर आयी थी । घर के भीतर की कैद और बाहरी दुनिया में अपनी भूमिका निभाने की चाहत के बीच द्विखंडित ये पढ़ाकू स्त्रियाँ ही प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों की पाठक थीं ।

आयन वाट ने उपन्यास के बारे में कहा है कि इस विधा को उसके पाठकों की रुचि और चाहत ने बेहद प्रभावित किया । प्रेमचंद के इन पाठकों ने उनसे ऐसे स्त्री पात्रों का सृजन कराया जो महानायक तो नहीं प्रतीत होती थीं लेकिन सामान्य सामाजिक जीवन में भी पर्याप्त स्वतंत्र भूमिका निभाती दिखाई पड़ती हैं । अंग्रेजों पर चाकू चलाने वाली कर्मभूमि की बलात्कार पीड़िता से लेकर मालती जैसी स्वतंत्रचेता स्त्री तक प्रेमचंद के स्त्री पात्रों की विद्रोही चेतना का जीवंत चित्रण किसी भी लेखक के लिए ईर्ष्याजनक है । सही बात है कि प्रेमचंद पर भी विक्टोरियाई नैतिकता का असर दिखाई पड़ता है और यह उनके युग का अंतर्विरोध है । फिर भी वे अपने समय के लिहाज से काफी आगे बढ़े हुए हैं । इस मामले में कुछ आधुनिक नारीवादी धारणाओं की चर्चा करना उचित होगा ।

नारीवादी चिंतक जर्मेन ग्रीयर ने पुरुष और स्त्री देह की तुलना करते हुए साबित किया है कि दोनों के शरीर में बहुत अंतर नहीं है । स्त्री के स्तन उभरे होने और पुरुष के दबे होने के बावजूद दोनों में उत्तेजना और संवेदनशीलता समान ही होती है । यही बात लिंग के बारे में भी सही है । स्त्री का जननांग भीतर की ओर तथा पुरुष का बाहर की ओर होता है । इन्हें छोड़कर पुरुष और स्त्री में कोई बुनियादी भेद नहीं है । ग्रियर का जोर स्त्री की मनुष्यता को उभारने पर था । इसके लिए उन्होंने अपने शरीर के प्रति स्त्री की असहजता को प्रश्नांकित किया है । वे बताती हैं कि इस नजरिये के चलते स्त्री अपने शरीर से हासिल होने वाला यौन सुख भी नहीं उठा पाती । इसको ही वे ‘बधिया स्त्री’ कहती हैं । ग्रियर की इस धारणा का उपयोग हमने ‘गबन’ की जालपा की अंतर्बाधा को समझने के लिए किया है । इस प्रसंग में ध्यान रखना होगा कि प्रेमचंद के जमाने में पश्चिम में भी नारी चिंतन अभी बहुत उन्नत अवस्था में नहीं था । हिंदी में उस समय के साहित्यकारों ने स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा से प्रगतिशील नारी विवेक अर्जित किया था । महादेवी की किताब, निराला के नजरिये और प्रसाद के चित्रण के साथ रखकर देखने से भी उस समय अर्जित इस विवेक की समता प्रेमचंद की नारीदृष्टि से दिखायी देगी ।    

प्रेमचंद ने नारीवादी साहित्य पढ़ा हो या नहीं अपने सहज बोध और स्वतंत्रता संग्राम में स्त्रियों की भागीदारी के आधार पर कम से कम अपने उपन्यासों में उन्होंने ऐसी स्त्रियों का सृजन किया जो निर्णायक भूमिका में खड़ी हैं । रचनाकार अक्सर अपनी रचना में अपनी मान्यताओं की सीमा का उल्लंघन कर जाते हैं । साहित्य की इस विशेषता को मार्क्स और एंगेल्स ने भी फ़्रांसिसी उपन्यासकार बाल्ज़ाक के प्रसंग में उठाया था । वैसे मान्यता के स्तर पर भी कम से कम एक प्रसंग तो ऐसा है ही जिसमें प्रेमचंद निर्भय होकर स्त्री जाति के पक्ष में खड़े हुए थे । उस जमाने में निकलने वाली पत्रिका मतवाला खुद को पुरुष और माधुरी को स्त्री मानकर छींटाकशी किया करता था । हिंदी समाज की सहज मनोदशा के अनुसार यह प्रसंग कभी कभी हास्य की सीमा को लांघ जाया करता था । तब प्रेमचंद ने कड़ा एतराज जताते हुए लिखा कि एक फ़ेयर सेक्स पर खुलेआम हमला हो रहा है और इसे हिंदी समाज चुप देख रहा है । उन्हें यह प्रसंग लज्जाजनक महसूस हुआ । इसी सिलसिले में गालियों के बारे में प्रेमचंद के लिखे निबंध को भी देख लेना उचित होगा । कहने की जरूरत नहीं कि गालियों का समाजशास्त्र स्त्री और दलित विरोध की मौजूदगी की तस्दीक करता है । यदि कोई व्यक्ति गालियों की आलोचना करता है तो वह इन दोनों के साथ ऐसे हिंसक भाषिक आचरण का विरोध भी करता है । जाति और जेंडर संबंधी भेदभाव को अकारण एक साथ रखकर नहीं देखा जाता ।      

वैसे तो उनके सभी उपन्यासों में स्त्रियों के चित्र बहुत भास्वर हैं लेकिन तीन उपन्यास 'सेवासदन' , 'निर्मलाऔर 'गबनतो पूरी तरह स्त्री समस्या पर ही केंद्रित हैं । सेवासदन उपन्यास को अगर ध्यान से पढ़ें तो शुरुआती सौ डेढ़ सौ पृष्ठ पूरी तरह से परिवार की धारणा पर एक तरह का कथात्मक विमर्श हैं । सुमन एक घरेलू स्त्री और उसके सामने रहनेवाली वेश्या भोली । परिवार में सुमन को निरंतर घुटन का अहसास होता रहता है और इस संस्था की सीमाएँ उसके सामने भोली की स्वच्छंदता के साथ जिरह के जरिए खुलती जाती हैं । तालस्ताय की तरह ही परिवार प्रेमचंद के चिंतन का बड़ा हिस्सा घेरता है । निर्मला में भी यह संकट ही उपन्यास के तीव्र घटनाक्रम को बाँधे रखता है । अंतत गोदान में आकर वे इसका एक विश्वसनीय उत्तर सहजीवन की धारणा में खोज पाते हैं । उल्लेखनीय है कि परिवार की ओर से दी गयी सुरक्षा भी स्त्री मुक्ति की राह में एक बड़ी बाधा बन जाती है ।

प्रेमचंद के लिए वेश्यावृत्ति स्त्री का नैतिक पतन नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्था है । वेश्यावृत्ति के बारे में उनका यह नजरिया उनके ही समय से नहीं आज के भी लिहाज से बहुत आगे बढ़ा हुआ है । इसे गबन की पात्र जोहरा के प्रसंग से भी समझा जा सकता है । यह बात ही बताती है कि प्रेमचंद सामंती नैतिकता की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकते थे । भोली की तरह की सहज पात्र हिंदी कथा साहित्य में दुर्लभ है । कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह की पात्र के जरिये उस स्त्री के बारे में कम उसके यहां आनेवालों के बारे में प्रेमचंद अधिक बताते हैं । उनकी एक अलक्षित कहानी ‘मनोवृत्ति’ में तो उनकी यह कला चरम पर है । पार्क में अकेले लेटी स्त्री को देखकर सुबह टहलने वाले जो कुछ बोलते हैं उसके सहारे प्रेमचंद इन पात्रों की मानसिकता को उजागर करते हैं । यह बड़ा सवाल घलुए में कि पार्क जैसी सार्वजनिक जगह पर अकेली स्त्री की उपस्थिति आखिरकार इतनी विचित्र क्यों है ।   

गबन में उनकी मुख्य चिंता जालपा को उस अंतर्बाधा से मुक्त करने की है जो उसे 'बधिया स्त्रीबनाये रखती है । पति के पलायन के साथ उसे इसकी व्यर्थता का अहसास होता है और एक झटके में वह इस अंतर्बाधा से आजाद हो जाती है । यह आजादी उसे उसकी सामाजिक सार्थकता की ओर ले जाती है । यहीं प्रेमचंद अपने समय की सीमाओं को भी तोड़ देते हैं । अकारण नहीं कि सुमन और जालपा जैसी तर्कप्रवण स्त्रियों के तीखे सवालों के सामने तत्कालीन सामाजिक सुधार आंदोलन के नेता वकील साहबान निरुत्तर हो जाते हैं । उनके ये सभी साहसी पात्र अपने पाठकों के मन में दबी आकांक्षाओं को जैसे मूर्तिमान कर देते हैं । वे क्या किसी को अपने साहित्य के जरिए सामाजिक भूमिका में उतार सके ? यह प्रश्न साहित्य से थोड़ा अधिक की माँग है । साहित्य का कर्तव्य अपने समय के अंतर्विरोधों को वाणी देना है । उनका समाधान साहित्येतर प्रक्रम है ।

गौरतलब है कि अगर प्रेमचंद स्त्री मनोविज्ञान की गहराई में उतरते या उसकी देह तक ही महदूद रहते तो शायद वह भी नहीं कर पाते जो उन्होंने किया । सही है कि आज के स्त्री लेखन ने साहस के साथ नये समय की स्त्री की आकांक्षा को वाणी दी है । उसके इस लक्ष्य से प्रेमचंद मतभेद नहीं रखते । यह लेखन इस पुरखे से बहुत कु सीख सकता है । सबसे बड़ी बात कि प्रेमचंद की स्त्री को स्वतंत्रचेता होने के लिए मध्यवर्गीय नहीं होना पड़ता । खेतिहर स्त्री तो हिंदी कथा साहित्य में प्रेमचंद के अतिरिक्त मुश्किल से ही मिलेगी । कामगार स्त्री को खेत में की गयी मेहनत की बदौलत ही खास किस्म की आजादी हासिल होती है । फिर से गोदान की आदिवासी स्त्री को याद कर लेना काफी होगा । पंच परमेश्वर को पढ़ते हुए उसके इस पहलू को अक्सर हम निगाह से ओझल कर देते हैं कि उसमें मूल समस्या संपत्ति पर स्त्री के अधिकार को लेकर विवाद है । इसी तरह अलग्योझा में भी संपत्ति का विवाद ही मूल में है । अनेकानेक कहानियों में आपको सामंती समाज में गोपनीय रूप से संचालित कुछ हद तक स्वतंत्र स्त्री अर्थतंत्र की झलक भी मिल सकती है । उस समाज में जब संपत्ति पर स्त्री का कोई अधिकार नहीं समझा जाता था तब भी प्रेमचंद के स्त्री पात्र एक समानांतर किस्म का अर्थतंत्र चलाते हुए नजर आते हैं जो बहुधा पुरुष की नजर से गुप्त ही रहता है । स्त्री लेखकों की नयी पौध को इस पुरोधा की रचनात्मक क्षमता से टकराते हुए प्रेरणा लेनी चाहिए ।

हिंदी में दलित साहित्य और स्त्री लेखन ने प्रगतिशील आंदोलन (जिसके नेता प्रेमचंद थे) के बाद साहित्य को देखने का वह नजरिया विकसित किया है जिसके हामी प्रेमचद थे । कहने की जरूरत नहीं कि लम्बे अरसे तक साहित्य को समाज के संदर्भ में देखने का विरोध हिंदी में व्यवस्थित रूप से किया गया । उस दौरान लेखक की प्रतिभा को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से अलग करके देखा जाने लगा था । पाठक की सामाजिकता पर भी कोई विचार नहीं किया जाता था । रचना के विश्लेषण में कथ्य के मुकाबले कहने के तरीके पर जोर ने ले ली थी । इस नजरिये को प्रगतिशील आलोचना के लिए पूरी तरह मारक समझकर प्रतिष्ठान की ओर से भरपूर प्रोत्साहन दिया गया । अस्मिताओं के लेखन ने बहुत समय बाद साहित्य के संदर्भ में समाज का सवाल खड़ा कर दिया है । प्रेमचंद के साहित्य चिंतन में इसके स्रोत आसानी से देखे जा सकते हैं । साहित्य की सर्वोत्तम परिभाषा उन्होंने ‘जीवन की आलोचना’ बताया था । इसका सीधा मतलब दमघोंटू समाजी हालात की आलोचना था । नग्न यथार्थवाद की जगह ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ की माँग भी वांछित समाज की प्रेरणा देने वाले परिवर्तनकामी यथार्थ चित्रण की तरफ़दारी करती है । साहित्य के बारे में इस तरह की धारणा ने विमर्शों के साहित्य लेखन के लिए विरासत का काम किया । शुरुआती टकराव की मुद्रा के बाद इस तरह से सोचना ही फिलहाल उचित होगा ।

असल में प्रेमचंद पर स्त्री मनोविज्ञान की उपेक्षा का यह आरोप लगाने वालों की मंशा प्रेमचंद से चटक यौन चित्रण की होती है लेकिन आरोप लगाने वाले लोग ध्यान भी नहीं देते कि ऐसा करके वे भी स्त्री को योनि तक ही सीमित कर देते हैं । जिस तरह की मानसिक आजादी और खुलापन आज हमने अर्जित किया है उसकी चाहत प्रेमचंद से करना पूरी तरह अनैतिहासिक है । यदि कोई कहे कि उनकी अपेक्षा यौन चित्रण की नहीं, प्रेम चित्रण की है तो निवेदन है कि प्रेमचंद के उपन्यासों में प्रेम का भरपूर चित्रण है । न केवल इतना बल्कि उसके तिरस्कार पर भयंकर प्रतिहिंसा भी वर्णित है । इसके नमूने के बतौर गोदान से केवल दो प्रसंगों की याद कर ले सकते हैं । पहला प्रसंग तब का है जब झुनिया को लेकर गोबर घर आया है और धनिया के बुलाने पर होरी आया है । घर की ओर आते हुए रास्ते में वह खूब गुस्सा दिखाता है । घर में प्रवेश से पहले धनिया होरी के गले में बांह डालकर मनुहार करती है । होरी को लगा कि देवी प्रसन्न होकर वरदान दे रही है । इसकी सांकेतिकता को लोक में पगा वही व्यक्ति समझ सकता है जिसे पता हो कि धरती पर बादलों के झुकने से नागमती को आखिर क्यों रतनसेन की याद आती है । दूसरा प्रसंग तो बिना किसी विशेष प्रयत्न के भी याद आना चाहिए । सोना से मिलने विवाह के बाद उसकी सखी नदी पारकर गयी है । सोना का पति घर का दरवाजा खोलता है और सोना के पास पहुंचने से पहले उसकी सखी के प्रति आकर्षण का अनुभव करता है । सोना इतनी दूर से आयी सखी को उलटे पांव लौटा देती है । थोड़ी ही देर का यह प्रसंग तीक्ष्ण मानसिक घात प्रतिघात का बेहद जीवंत चित्रण है । यदि आपको लगता हो कि प्रेमचंद की स्त्री प्रेम की अपनी इच्छा को व्यक्त नहीं करती तो केवल याद कर लीजिये कि झुनिया ने गोबर को पसंद किया था । न केवल इस मामले में बल्कि अन्य मामलों में भी झुनिया का व्यक्तित्व स्वतंत्रचेता है । यह तो याद दिलाना न होगा कि दूध पहुंचाने के क्रम में उसे कैसे कैसे लोगों की निगाहों और लोभी आचरण का सामना करना पड़ता है और इनसे वह कैसे निपटती है । मातादीन के प्रसंग में यह भी देखा जा सकता है कि प्रेम कोई नितांत व्यक्तिगत चीज नहीं होता, उसके सामाजिक पहलू हमेशा होते हैं । अलग बात है कि उसकी अभिव्यक्ति में रचनाकार सक्षम है या नहीं ।    

प्रेमचंद के औपन्यासिक लेखन में किसान समस्या के साथ ही स्त्री समस्या शुरू से रही है । गोदान में आकर इन दोनों धाराओं का मेल हो जाता है । इसीलिए गोदान में बहुस्वरीयता भरपूर है । गोदान की यह बहुस्वरीयता हम कई बार सुनना ही नहीं चाहते । मालती की छोटी बहन सरोज का जिक्र करने से पूर्व धारणा बन सकती है कि उसकी बड़ी बहन तो आधुनिका है ही । राय साहब की पुत्री मीनाक्षी तो जरूर याद होगी । उसकी शादी जिस अय्याश ठाकुर साहब से हुई है वे महफ़िलों के शौकीन हैं । ऐसी ही किसी रंगीन महफ़िल में मीनाक्षी कोड़ा लेकर पहुंच जाती है । उनके समय में ऐसी साहसी स्त्री रही हो या नहीं, प्रेमचंद स्त्री की इस मुखर सक्रिय हस्तक्षेप की आकांक्षा को स्वर तो दे ही रहे हैं । उस समय के समाज में सामाजिक उपस्थिति की स्त्री आकांक्षा को देखना हो तो इसके लिए ‘पिसनहारी का कुँआ’ कहानी को देखना पर्याप्त होगा । इसे केवल किसी अतिशय वंचित स्त्री द्वारा सार्वजनिक कल्याण के काम में अपनी उपस्थिति को दर्ज कराने की प्रेमचंद की क्षमता के बतौर न देखा जाये बल्कि प्रेमचंद के पात्र के सहारे अभिव्यक्त उनके स्त्री पाठकों की चाहत या प्रेमचंद की ओर से इसकी प्रेरणा के रूप में भी पढ़ा जाना चाहिए ।

साहित्य को पढ़ने की संवेदनशील दृष्टि का ह्रास सबके अनुभव का अंग है । रामचंद्र शुक्ल ने अभिधा को जब उत्तम काव्य कहा था तो उनका तात्पर्य यह नहीं था कि लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ पर ध्यान ही न दिया जाये । दो बैलों की कथा में जब हीरा और मोती कहते हैं कि औरत जात पर सींग चलाना मना है तो इसे केवल पारम्परिक सोच का अनुगमन समझना थोड़ा सरल भाष्य कहा जायेगा । यह उस समाज के बारे में अपना मतविरोध दर्ज कराना है जिसमें परिवार के भीतर स्त्री के साथ मारपीट आपत्तिजनक बात न समझी जाती थी । निवेदन यह है कि प्रेमचंद को पढ़ने के लिए उनके लेखन में व्यक्त भावों और आकांक्षाओं को केवल उपनिवेशवाद का विरोधी नहीं, सामाजिक भेदभाव का विरोधी भी समझा जाना चाहिए । इस लिहाज से जातिप्रथा के उनके विरोध को बहुधा रेखांकित किया गया है लेकिन समय आ गया है कि सामाजिक बदलाव के स्त्री मुक्ति वाले पहलू से भी उनके लेखन की कड़ी परीक्षा हो ताकि पितृसत्ता की वर्तमान उठान के समय इस पुरखे की थाती को सहेजा जा सके ।              

राजनीतिक प्रतिरोध में अहिंसा की भूमिका

 

राजनीतिक प्रतिरोध के प्रसंग में अहिंसा की भूमिका को उजागर करने की दृष्टि से 2000 में पालग्रेव से पीटर एकरमान और जैक दुवाल की किताब ‘ए फ़ोर्स मोर पावरफ़ुल: ए सेन्चुरी आफ़ नानवायलेन्ट कनफ़्लिक्ट’ का प्रकाशन हुआ । यह किताब टेलीविजन के लिए डाकुमेंटरी बनाने के क्रम में तैयार हुई है । शुरुआत पोलैंड में लेक वालेसा की गिरफ़्तारी से हुई है । सोलह महीनों तक उनके ट्रेड यूनियन आंदोलन ने कम्युनिस्ट शासन को सांसत में डाला हुआ था । सोलिडेरिटी नामक उनका संगठन बेहद लोकप्रिय हो गया था । गिरफ़्तारी के समय वालेसा ने सत्ता के पराजय की भविष्यवाणी की । इसके आधार पर लेखक का कहना है कि अगर हिंसा में ही ताकत होती और दमन का कोई जवाब न होता तो वालेसा की बात बेवकूफाना होती । लेकिन उन्हें पता था कि इस आंदोलन के चलते सत्ता को जनता का समर्थन समाप्त हो गया है । जब सत्ता के पास अपनी बात मनवाने की ताकत नहीं रह जाती तो उसे घुटने टेकने पड़ते हैं । 1990 में वालेसा पोलैंड के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए जो महज दस साल पहले गोदी में बिजतीकर्मी थे । उनके संगठन ने बिना किसी हिंसा के सत्ता को हिला डाला था । जब वे संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा में गये तो वहां मौजूद अधिकांश राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित नेता थे । लेखक का कहना है कि सौ साल पहले अगर ऐसी कोई सभा होती तो उसमें मौजूद बहुत कम ही राष्ट्र प्रमुख निर्वाचित नेता होते । बीसवीं सदी का यह सबसे बड़ा राजनीतिक बदलाव दमनकारी शासकों का अहिंसक तरीके से मुकाबला करने वाले सामान्य जन की हिम्मत से आया था । इन सौ सालों में सत्ता पर काबिज शासकों और सेना के विरुद्ध जनता के बीच लोकप्रिय आंदोलनों ने गोली बारूद से पूरी तरह भिन्न हथियारों के सहारे लड़ाई लड़ी । इसमें मांगपत्र, जुलूस, बहिष्कार और विरोध प्रदर्शन के आधार पर आंदोलनों के लिए जनता का समर्थन जुटाया गया । हड़ताल, बहिष्कार, त्यागपत्र और अवज्ञा के जरिये सरकारी कार्यवाही का मुकाबला किया गया । इनसे तानाशाहों को उखाड़ फेंका गया, सरकारों को पलट दिया गया, कब्जा करने वाली फौज को रोक दिया गया और मानवाधिकार को न मानने वाली ताकतें बिखर गयीं । ढेर सारे समाजों का कायांतरण इनके चलते हुआ । इस किस्म के बदलाव और इनके प्रेरक अहिंसक विचारों का विवेचन इस किताब में हुआ है ।

लेखकों ने इसकी शुरुआत रूस से मानी है जब 1905 में एक पादरी के नेतृत्व में डेढ़ लाख मजदूर रूस की बर्फीली सड़क पर उतरकर जार की अनुकम्पा प्राप्त करने की उम्मीद से राजमहल गये थे । उसके चलते ही रूस में संसद के लिए निर्वाचन हुआ था । इस किस्म के प्रतिरोध का दूसरा उदाहरण लेखकों ने 1923 की एक घटना के रूप में दर्ज किया है जब प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी से हर्जाने की वसूली के लिए जा रहे फ़्रांस और बेल्जियम के सिपाहियों का रास्ता जर्मनी के रेल मजदूरों और खनिकों ने सफल असहयोग के जरिये रोक दिया था । आखिरकार सिपाहियों को वापस होना पड़ा था । प्रतिरोध का ऐसा तीसरा उदाहरण लेखकों ने गांधी के नेतृत्व में 1930-31 के सविनय अवज्ञा को माना है जिसके तहत नमक टैक्स देना बंद कर दिया गया और अंग्रेजों के एकाधिकार वाले वस्त्र और शराब का बहिष्कार हुआ था । इसी तरह 1944 में डेनमार्क के नागरिकों ने दूसरे विश्वयुद्ध में देश पर हिटलर के कब्जे का प्रतिरोध करते हुए असहयोग का रास्ता अपनाया । बहुतेरे अन्य यूरोपीय देशों में भी सामान्य नागरिकों ने हिटलरी शासन का ऐसा ही अहिंसक विरोध किया था । लगभग इसी कालखंड में सल्वाडोर में दीर्घकालीन सैनिक शासन से ऊबकर नागरिक हड़ताल हुई । बिना कोई बंदूक उठाये उन्होंने सेनापति को पैदल कर दिया और उसे देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा । भारत की आजादी को दस साल भी नहीं हुए थे कि अमेरिका के जार्जिया के धर्मोपदेशक मार्टिन लूथर किंग, जूनियर ने गांधी की सीख का अनुसरण करते हुए अमेरिका के अश्वेत अफ़्रीकियों का अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों में जारी नस्लभेद को उखाड़ फेंकने के मकसद से जुलूस और बहिष्कार की पंद्रह साला लम्बी मुहिम का नेतृत्व किया । उनकी हत्या के कुछ ही साल बाद पोलैन्ड के मजदूरों ने सामाजिक गोलबंदी की ऐसी पहल की जैसा सोवियत खेमे में कभी न की गयी थी । हड़ताल से उन्हें संगठित होने का अधिकार मिला, उनका संगठन कायम हुआ और उसके बाद की कहानी सबको मालूम है । उसी दौरान अर्जेन्टिना की माताओं ने अपनी गायब संतानों के प्रति सरकारी रवैये से क्षुब्ध होकर जुलूस निकाला । इसके चलते वहां के सैन्य शासन की पूरी वैधता समाप्त हो गयी और फ़ाकलैन्ड युद्ध के बाद वह समाप्त ही हो गया । इसके साथ ही चिली में पिनोशे की तानाशाही के विरुद्ध लोकप्रिय आंदोलन उठ खड़ा हुआ और अजेय प्रतीत होने वाला वह शासक जनमत संग्रह में सत्ता गंवा बैठा । दुनिया के दूसरे कोने पर 1986 में फिलीपीन्स में मार्कोस नामक शासक के विरोध में विपक्षी नेता की एक विधवा सड़क पर उतर आयी । विद्रोह ने सेना को भी अपने साथ आने को मजबूर कर दिया और आखिरकार मार्कोस को शासन और देश छोड़कर भागना पड़ा । फिलीपीनियों की इस जीत के कुछ ही समय बाद फिलिस्तीनी लोगों ने गाज़ा पट्टी और पश्चिमी तट पर इजारयली सेना के कब्जे के विरुद्ध प्रदर्शन और बहिष्कार के क्रम में स्वयं की सामाजिक सेवाओं की शुरुआत की । उनके इंतिफ़ादा का यह सबसे बड़ा अहिंसक प्रतिरोध साबित हुआ । उसी समय दक्षिण अफ़्रीका में धार्मिक नेताओं ने रंगभेद के विरोध में अहिंसक मुहिम छेड़ दी । मुहिम को अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिला और अंतत: नेल्सन मेंडेला की रिहाई के साथ दक्षिण अफ़्रीका में लोकतांत्रिक शासन की राह हमवार हुई । नब्बे के दशक में बर्मा में आंग सान सू की ने लोकतंत्र के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया और लम्बी नजरबंदी के बावजूद कार्यकर्ताओं के लिए दुनिया भर में प्रेरणा का स्रोत साबित हुईं ।                           

अहिंसक गोलबंदी के जरिए बदलाव की इस लम्बी सूची के बाद लेखकों का कहना है कि हिंसा का सहारा लिये बिना विजय की आशा सभी टकरावों में रहती है । इस आशा को साकार करने में बहुतेरे कारकों का योग होता है । अत्यंत सामान्य लोग तानाशाहों के घमंड को झुका देने में कामयाब हो जाते हैं और भांति भांति के जनसत्ता के रूपों को जन्म देते हैं । गांधी से कभी एक अश्वेत अमेरिकी ने पूछा कि अहिंसक प्रतिरोध क्या सीधी कार्यवाही का एक रूप है । गांधी ने कहा कि यह एक नहीं, एकमात्र रूप है । अक्सर माना जाता है कि अहिंसा का चुनाव नैतिक कारणों से किया जाता है लेकिन, लेखकों के मुताबिक, इसके इतिहास से ऐसा साबित नहीं होता । बीसवीं सदी में जिन्होंने भी यह राह अपनायी वे भली तरह जानते थे कि सैनिक या भौतिक बल कारगर नहीं होगा । कुछ लोगों के पास पर्याप्त हथियार नहीं थे तो कुछ लोगों ने हिंसक प्रयास की विफलता देखी थी जिससे जानमाल की भारी क्षति हुई थी लेकिन चूंकि जनता का हित दांव पर लगा था और लोग शासकों को उखाड़ फेंकने पर आमादा थे इसलिए अहिंसक लड़ाई का रास्ता अपनाना पड़ा । उन्हें शांति नहीं स्थापित करनी थी, उन्हें लड़ाई लड़नी थी ।

लेखकों का कहना है कि जिन लड़ाइयों के बारे में मीडिया में बमबारी और हिंसा की कार्यवाहियों पर बल दिया जाता है उनमें भी अहिंसक तरीकों की भारी भूमिका रही है । विभिन्न देशों की अन्यायी सत्ता को पराजित करने में स्थानीय लड़ाकुओं से कम महत्वपूर्ण भूमिका अंतर्राष्ट्रीय वैचारिक अभियानों की नहीं रही है । अहिंसक तरीकों से हासिल जीत का पूरा विवरण सम्भव नहीं इसलिए लेखक अपनी किताब को इस किस्म का इतिहास नहीं मानते । कुछेक मामलों के अध्ययन के सहारे लेखकों ने बताने की कोशिश की है कि अपराजेय प्रतीत होनेवाले विरोधी को पराजित करने में रणनीति के स्तर पर बहिष्कार या अहिंसक तरीकों ने कई बार निर्णायक भूमिका निभायी है । इस तरह किताब समूची सदी में अहिंसा की बढ़ती ताकत का बयान बन गयी है । इन कार्यवाहियों की निरंतरता सदी के अंत में ही प्रकट नहीं हुई है । इन अभियानों के नेताओं ने पूर्ववर्तियों के अनुभवों से सीखा है । गांधी को रूस की घटनाओं से प्रेरणा मिली थी । अमेरिकी अश्वेत नेताओं ने गांधी की रणनीति से सीखा । इसी तरह पिनोशे या मार्कोस के विरोध में लड़नेवालों को रिचर्ड एटनबरो की गांधी फ़िल्म से प्रेरणा मिली थी । इन सब लोगों को जिन शासकों से लड़ना पड़ा वे बहुत अलग अलग थे लेकिन सभी जगहों पर लड़ने के तरीकों में बहुत हद तक समानता रही । सिद्ध है कि लड़ाई के अहिंसक तरीके जितना माना जाता है उससे अधिक व्यापक और प्रभावी थे । दुनिया के लगभग प्रत्येक हिस्से में और सदी के प्रत्येक दशक में इतिहास बनानेवाले संघर्षों में इनकी भूमिका निर्णायक रही । अहिंसक तरीके अलग अलग हालात में भी कामयाब रहे हैं । लोकप्रिय आंदोलन के लिए अहिंसक तरीकों से गोलबंदी के कारण नागरिक समाज मजबूत होता जाता है इसलिए लोकतंत्र की मजबूती की सम्भावना अधिक रहती है ।

इन सब सचाइयों के बावजूद लोगों के दिमाग में अहिंसक संघर्ष के बारे में कुछ गलत धारणाएं मौजूद हैं । चूंकि अहिंसक संघर्ष के दो बड़े योद्धाओं (गांधी और मार्टिन लूथर किंग, जूनियर) के साथ कुछ हद तक धर्म का तत्व जुड़ा रहा है इसलिए अहिंसा को थोड़ा नैतिक मामला समझा जाता है और इस तरह उसका रणनीतिक महत्व कम हो जाता है । दूसरे कि मार्कोस के पतन के बाद से धारणा बन गयी कि आंदोलन की ताकत का पैमाना सड़क पर मौजूद लोगों की भीड़ से तय होगा । सही बात है कि विरोधी से भौतिक मुकाबला जरूरी होता है लेकिन अहिंसक कार्यवाही तब अधिक प्रभावी होती है जब वह स्वत:स्फूर्त होने की जगह सुनियोजित हो । नारे लगाने के मुकाबले इसका मकसद सरकारों को नियंत्रण के उनके साधनों से वंचित कर देना है । यदि अहिंसक तरीकों के प्रभाव को लोग जानें तो किसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिंसा व्यर्थ का तरीका लगने लगेगा ।

किताब में यही बताया गया है कि बीसवीं सदी में जनता ने हिंसा के बगैर सत्ता पर कब्जा करने की क्षमता अर्जित की । लेखकों ने अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा है कि अहिंसक तरीकों का प्रभावी इस्तेमाल करने पर उत्पीड़न को खत्म कर देश और जनता को आजाद किया जा सकता है और ऐसा करने में हिंसक तरीकों के मुकाबले कम खतरा होगा । कभी कभी ये प्रयास विफल भी हुए हैं लेकिन उनकी सफलता की मात्रा विफलता से अधिक रही है । अहिंसक प्रतिरोध पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए उसके मुकाबले कम ध्यान दिया गया है । सही है कि हिंसा में नाटकीयता अधिक होने से खबरों में उसकी मौजूदगी अधिक रहती है लेकिन अहिंसक प्रतिरोध को यदि प्रक्रिया के रूप में देखा जायेगा तो उसका असर समझने में आसानी होगी । अहिंसक कार्यवाही सामान्य जीवन के धरातल पर होती है । यह निराश आदर्शवादियों या कुछेक शहीदों या आजादी देनेवाले मसीहाओं का कारनामा नहीं होती । महान लक्ष्य के आकर्षण में आनेवाले सामान्य नागरिक इसके नायक होते हैं । इसका संबंध अवज्ञा से होता है । इन कार्यवाहियों से सामान्य जनता को लगता है कि शक्ति का स्रोत महल में या सिंहासन पर बैठे महान लोगों के काम ही नहीं होते, जनता भी कुछ कर सकती है । सभी शासक अपनी सत्ता के लिए शासितों पर निर्भर होते हैं । उनकी इसी कमजोरी पर अहिंसक प्रतिरोध प्रहार करता है । बीसवीं सदी के अंत में विगत सौ सालों के बारे में जो कुछ बताया गया उससे यह सदी हिंसा की सफलता की कहानी प्रतीत हुई लेकिन तब ऐसा कैसे हुआ कि जिनके कब्जे में हथियारों का जखीरा था उन्हें जनता ने बिना खून खराबे के सत्ता से बेदखल करने में कामयाबी हासिल की । लेखकों का मानना है कि पिछली सदी में अहिंसक कदम अधिक प्रभावी साबित हुए हैं ।