Saturday, February 21, 2026

संघर्ष और प्रेम का सहकार

 

               

                                                   

नोकिल सिंह की प्रस्तुत काव्य पुस्तिका में कवि की दो कविताओं को रखा गया है । उनके विषय क्रमश: संघर्ष और प्रेम हैं । बहुधा इन दोनों को परस्पर विरोधी भाव माना जाता है लेकिन उनकी सह उपस्थिति का इतिहास भी काफी लम्बा रहा है इसका कारण शायद यह है कि प्रेम एक ऐसा मूल्य है जो मनुष्य की निजी गरिमा को मान्यता देता है जबसे समाज में विषमता की स्थापना हुई तबसे ही प्रेम पर बंधन भी लगने लगे उन सभी बंधनों का प्रतिकार प्रेम का अभिन्न अंग हो गया कहने की जरूरत नहीं कि एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से यदि लगाव होगा तो इसका आधार समानता की भावना ही हो सकता है इतिहास में भी देखा गया कि क्रूरता और विषमता का सह अस्तित्व रहा है अतीत के साथ ही यह बात वर्तमान के लिए भी सच है । आश्चर्य नहीं कि जैसे जैसे विषमता में इजाफ़ा हो रहा है उसी मात्रा में प्रेम के स्थान पर क्रूरता और घृणा की प्रशंसा के गीत गाये जा रहे हैं ।

सभी जानते हैं कि प्रेम के दमन में स्त्रीद्वेष का गहरा असर होता है । सामाजिक रूप से ऊंच नीच की व्यवस्था में प्रेम के गीत जिन्होंने गाये उन्हें बहुतेरा ईश्वरीय प्रेम का सहारा लेना पड़ा । आज उस तरह के किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती इसलिए उसके साथ संघर्ष का अभिन्न जुड़ाव हो जाता है । इस प्रेम को जितना अधिक दबाने की कोशिश की गयी उतनी ही मजबूती से उसने समाज के साथ साहित्य में भी अपनी जगह बनायी है । हो सकता है नफ़रत के पक्ष में माहौल ऐसा बना दिया जाय कि अब साहित्य में प्रेम की केंद्रीयता का तथ्य भी दुहराना पड़े अन्यथा कौन नहीं जानता कि समूची दुनिया में खासकर कविता के क्षेत्र में प्रेम की भावना प्रधान रही है । हमारे देश के सामंती वातावरण में भी प्रेम और रति के भाव से उपजे रस को ही रसराज कहा जाता रहा है । कविता के सिलसिले में प्रेम के महत्व का कथन ही साबित करता है कि प्रेम के लिए माहौल कितना विषाक्त हो गया है । हिन्दी के सभी अध्येता प्रेम के मामले में सूरदास की गोपियों के साहस और मीराबाई के त्याग के अतिरिक्त जायसी नामक सूफी कवि के नाम से परिचित हैं । न केवल इतना बल्कि प्रेम के वर्णन में स्त्री की पराधीनता के प्रत्याख्यान की गुंजाइश पैदा हुई और उसकी झलक नोकिल की कविता में भी मिलती है ।

उत्तर प्रदेश के जायस नामक स्थान के निवासी सूफी कवि ने प्रेम को इतना ऊपर उठा दिया कि उसने प्रेम में मनुष्य को देवत्व प्रदान कर दिया । न केवल सूफी बल्कि उर्दू की समूची कविता में प्रेम की प्रतिष्ठा का जिक्र करने की जरूरत नहीं, वह प्रत्यक्ष है । इस प्रेम का संघर्ष से रिश्ता कू-ए-यार से सू-ए-दार की ओर ले जाने वाले फ़ैज़ से अधिक शायद ही कोई और स्पष्ट कर सके । इसलिए भी इन कविताओं के शिल्प पर रुबाइ का गहरा असर नजर आता है । चार पंक्तियों के इस सुपरिचित काव्य रूप के आकर्षक होने के बावजूद हिन्दी की कविता में इसका अनुकरण नहीं हुआ । इसके मुकाबले ग़ज़ल के अनुकरण में अधिक लोगों ने हाथ आजमाया । थोड़ा बहुत मधुशाला के शिल्प पर इसका प्रभाव नजर आता है । नोकिल की कविता के दोनों ही खंडों में चार पंक्तियों में बात कहने की शैली अपनायी गयी है और यह अनायास नहीं लगता । किन्हीं कारणों से उनके काव्य संस्कार में इस काव्य रूप ने बहुत ही मजबूत जगह बनायी है ।

मनुष्य का सांसारिक अस्तित्व सभी चिंतकों के लिए व्याख्या की चुनौती पेश करता रहा है । एक ओर उसे पशु भी कहा जा सकता है । संस्कृत में आहार, निद्रा, भय और मैथुन को पशुओं और मनुष्यों के बीच साझा कहा गया है । दूसरी ओर उसके किसी भी जैविकीय कर्म में केवल शारीरिक तत्व नहीं होता । मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता शरीर की सीमा के अतिक्रमण की उसकी क्षमता और प्रवृत्ति में निहित है । इसी भूमि पर उसके शुद्ध दैहिक कर्मों में भी अध्यात्म की आभा आ जाती है । इब्न रोश्द ने मनुष्य की समझ बनाते हुए उसके भीतर किसी जड़ पदार्थ, मानवेतर प्राणी और दैवी झलक के तीन स्तरों को पहचाना था । यही खूबी मनुष्य के प्रेम को निरा शारीरिक कर्म नहीं रहने देती और उसे संघर्ष की प्रेरक बना देती है । इसी अर्थ में प्रेम और संघर्ष की आस्तित्विक सहगामिता को देखा जा सकता है । संघर्ष संबंधी नोकिल की काव्य पंक्तियों में उद्बोधन की गूंज अक्सर सुनायी देती रहती है ।

संघर्ष भी प्रेम की तरह ही कविता का सर्वकालिक विषय है । इसका कारण इस संसार में मनुष्य का अस्तित्व है । सभी प्राणियों में सबसे कम सुरक्षा कवच मनुष्य के पास है । इसी वजह से उसे अपने अस्तित्व के लिए लगातार विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते रहना पड़ा । ये परिस्थितियां प्राकृतिक थीं जिनसे जूझने के क्रम में मनुष्य को आवास, वस्त्र और पके भोजन का प्रबंध करना पड़ा । एक समय के बाद ये हालात सामाजिक भी हो गये और मनुष्य को जीवित रहने के लिए अन्य मनुष्यों से ही जानलेवा संघर्ष चलाना पड़ा । इस संघर्ष की भी गूंज साहित्य में हमेशा सुनायी देती रही ।  

कविता को छंद के बंधन से आजादी दिलाने वाले जानते थे कि कविता में छंद का निर्वाह बहुत कठिन साधना है । आधुनिक मनुष्य की विवेक चेतना की सहज अभिव्यक्ति गद्य में होती है लेकिन कविता मनुष्य की आदिम अभिव्यक्ति होने के कारण सांद्र अभिव्यक्ति के माध्यम के बतौर आकर्षित करती रहती है । सभी युगों में मनुष्य की सबसे तीव्र और सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति कविता में होती रही है इसलिए उसकी ओर खिंचाव हमेशा ही बना रहता है । उसकी अभिव्यक्ति की रूपगत परिष्कृति के कारण ही काव्य हेतुओं में प्रतिभा के साथ अभ्यास को भी महत्व प्रदान किया गया है । नोकिल की कविताओं को पढ़ने से उनमें अभ्यास की कमी महसूस होती है लेकिन यह ऐसा रास्ता है जिस पर चलकर ही आसानी हासिल होती है । इसका बहुत बड़ा कारण उसका भाषा नामक माध्यम है । यह माध्यम भी मनुष्य के संघर्ष से ही उपजा है । प्राकृतिक और सामाजिक वैपरीत्य के मुकाबिल अपनी सामाजिकता की रक्षा के क्रम में मनुष्य ने भौतिक औजारों के साथ इस अत्यंत जटिल तंत्र का भी निर्माण अपने शरीर में उपलब्ध सीमित साधनों से किया । इसने मनुष्य को शेष प्राणियों के मुकाबले गुणात्मक विशेषता प्रदान कर दी । अब वह अपने आसपास के हालात का मुकाबला करने की कोशिश की सफलता या विफलता की विरासत अगली पीढ़ियों को सौंप सकता था ।      

भाषा में कविता को सम्भव करने के लिए उसे पालतू बनाना पड़ता है । उसकी ध्वनियों से लय का सृजन करते हुए भी उससे उत्पन्न अर्थ की रक्षा करनी पड़ती है । भाषा में रचना करने वाले सभी लोग कमोबेश इस प्रक्रिया की जटिलता और समस्याओं से परिचित होते हैं । साथ ही वे इससे हासिल फल से वंचित भी नहीं रहना चाहते । इससे रचनाकार को मानव समुदाय को आगे बढ़ाने वाले का जो सम्मान और सुख मिलता है वही किसी भी कवि की उपलब्धि और विशेषता का स्रोत होता है । कोई भी साहित्यकार इस खासियत से दूर नहीं होना चाहता इसलिए तमाम अपमान, उपहास और अलगाव के बावजूद वह सृजन की जिद नहीं छोड़ता ।

नोकिल की कविता में इस समय के युवा की भाषा से कविता के निर्माण का प्रयास नजर आता है । उनकी इस भाषा में अनेक अपरम्परित शब्द मिलते हैं । कविता में इन शब्दों के प्रयोग से हिंदी की दुनिया अभ्यस्त नहीं है लेकिन बोलचाल में ये शब्द इन्हीं नये अर्थों में प्रयुक्त हो रहे हैं । पढ़ते हुए ये शब्द अक्सर भोजन में कंकड़ की तरह चुभते हैं लेकिन इसी प्रक्रिया में वे हिंदी के नये पाठक तक कविता को लेकर भी जायेंगे । पाठकों से आग्रह है कि इन कविताओं को वे प्रयास की तरह ही देखें । यदि वे इन्हें आलोचनात्मक निगाह से पढ़ेंगे तो लेखक को खुशी मिलेगी । इससे भी आगे बढ़कर वे इस कोशिश को परिष्कृत और संपन्न करें तो इससे बड़ा फल किसी भी लेखक के लिए और कुछ नहीं हो सकता । सभी ईंटें कलश पर ही नहीं लगतीं । कुछ नींव में गुम भी हो जाती हैं । अगर बुनियाद में खप जाने वाले प्रयोगकर्ताओं का जत्था न हो तो किसी भी भाषा में काव्य और साहित्य रचना ठहर जायेगी । उसका विकास ही इसी तरह के कच्चे पक्के प्रयासों की मार्फत होता है । ये कविताएं मंजिल या पड़ाव नहीं उसकी ओर जारी यात्रा का छोटा सा सबूत हैं ।

Monday, February 16, 2026

लेनिन का कोमिंटर्न

 

                                   

                                                       

2026 में ब्रिल से जान रिडेल की किताब लेनिनस कोमिंटर्न रीविजिटेडका प्रकाशन हुआ । इसकी प्रस्तावना में माइक ताबेर का कहना है कि कोमिंटर्न अब तक का विश्व क्रांतिकारी आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे प्रभावशाली संगठन था । 1919 में इसकी स्थापना हुई और दुनिया के लगभग प्रत्येक देश में इसके सदस्य और समर्थक थे । उनकी संख्या लाखों में थी । दुनिया के उत्पीड़ित जनगण में उसने आशा और सहानुभूति की लहर जगायी । इसी वजह से शासक वर्ग के लोग इससे डरते और नफ़रत करते थे । लेनिन द्वारा स्थापित कोमिंटर्न की विरासत ने पिछली सदी के असंख्य कार्यकर्ताओं और योद्धाओं को सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित किया ।  इसके अतिरिक्त विद्यार्थियों और शोधार्थियों में इसने अपनी गतिकी और आकर्षण को समझने की रुचि भी पैदा की ।

इसके बावजूद 1980 दशक से पहले कोमिंटर्न के बारे में अंग्रेजी में बहुत कम प्रकाशित सामग्री सुलभ थी । लोगों के मन में इसकी छवि सुनी सुनायी बातों के आधार पर बनी थी । प्रकाशित सामग्री और दस्तावेजों के अभाव में कोमिंटर्न की समूची जटिलता का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन बेहद मुश्किल काम था । 1983 में जान रिडेल के संपादन में कोमिंटर्न से जुड़े दस्तावेजों के प्रकाशन की परियोजना शुरू हुई तो स्थिति बदली । इससे कोमिंटर्न के बारे में समझ बढ़ी और गहरायी । पिछले चार दशकों में दो संग्रह कोमिंटर्न की तैयारी के छापे गये । शुरुआती चार कांग्रेसों के कार्यवृत्त से जुड़े चार संग्रह तैयार किये गये और छपे । एक संग्रह इसकी कार्यकारिणी की बैठकों के बारे में था । चार अन्य संग्रहों में कोमिंटर्न के सहायक संगठनों तथा उनके सम्मेलनों का विवरण था । प्रस्तुत किताब को इस श्रृंखला और कोमिंटर्न की परिचायिका के रूप में देखा जाना चाहिए । शुरू से प्रकाशन की इस परियोजना ने अपने लिए कुछ नियम तय किये थे ।

कोमिंटर्न की बात अधिक से अधिक सामने आ सके इसलिए संपादकों ने केवल प्रस्तावना लिखने तक खुद को सीमित रखा था । पाठक को इससे दस्तावेजों के आधार पर अपनी राय बनाने की आजादी मिली । आजकल के पाठक इन दस्तावेजों को अच्छी तरह समझ सकें इसलिए जरूरी टिप्पणियों को जगह दी गयी । इनके जरिए अपरिचित घटनाओं और व्यक्तियों को भी सुबोध बनाया गया । दस्तावेजों की मूल भाषा जर्मन या रूसी थी । अनुवाद को सावधानी के साथ ग्राह्य बनाया गया । कम्युनिस्ट आंदोलन के अध्येताओं के लिए तो यह लाभकर था ही, इसका लक्ष्य युवा विद्रोहियों, कामगारों और कार्यकर्ताओं को सामाजिक बदलाव के संघर्ष में मदद करना था । वे दुनिया बदलने की लड़ाई में कोमिंटर्न की सीख और विरासत का हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे ।

अधिकांश सामग्री कोमिंटर्न की कांग्रेसों और सम्मेलनों के कार्यवृत्त थे । इस तरह के लेखन के बारे में माना जाता है कि उसे पढ़ना रुचि नहीं जगाता । एक सुविधा थी कि लिखित व्याख्यान के मुकाबले मौखिक वक्तव्यों में स्वाभाविकता होती है । वक्ता अपनी बात सूत्रों में गढ़कर नहीं बोलते । इससे लेनिन के कोमिंटर्न को देखने की मजेदार खिड़की खुलती है । इनसे पाठक भी उन सम्मेलनों और बैठकों में बैठे हुए कल्पित कर सकते हैं और उन बहसों को जीवंत तरीके से सुन सकते हैं । वे प्रतिनिधियों के बीच उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर प्रस्तावित वैकल्पिक कार्ययोजनाओं की वैधता को परख सकते हैं । वे गलतियां होती देख सकते हैं और उनको सुधारने की कोशिश भी समझ सकते हैं । इन बैठकों के कार्यवृत्त के सहारे पाठक भी कोमिंटर्न को सौ साल पहले गुजरे जमाने की घटना समझने की जगह उसे जीवंत आंदोलन की तरह देख सकते हैं ।    

जान रिडेल ने कोमिंटर्न के बारे में यह काम किसी अकादमिक रुचि की वजह से नहीं किया । इसके पीछे उनका समाजवादी कार्यकर्ता का भाव था । 1958 में वे कनाडा में समाजवादी आंदोलन में शरीक हुए । जब क्यूबा की क्रांति को विफल करने के लिए अमेरिका ने अभियान चलाया तो उसके विरोध में कनाडा की गोलबंदी के साथ रिडेल सक्रिय रहे । 1970 दशक के पूर्वार्ध तक वे कनाडा में नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे इसलिए कनाडा की पुलिस उनके पीछे पड़ गयी । इसके बाद वे न्यू यार्क चले आये और 1983 से इस काम में लग गये । इस विराट काम को उन्होंने पूरा होने लायक संग्रहों का रूप दिया । जर्मन और फ़्रांसिसी पर उनका अधिकार था लेकिन इस काम के लिए उन्होंने रूसी भाषा पर भी अधिकार प्राप्त किया और उससे अंग्रेजी में अनुवाद करने लगे । धीरे धीरे इस काम को उन्होंने सामूहिक परियोजना में बदल दिया । दुनिया भर के सहयोगियों का समूह उन्होंने बना लिया । अनुवाद, टंकण, प्रूफ़ शोधन, संपादन और पुस्तकालयों में शोध का काम ढेर सारे महारथियों ने साथ मिलकर किया क्योंकि उन्हें रिडेल की गम्भीरता और उनके समर्पण पर विश्वास था । उन्होंने तमाम वामपंथी धारा के लोगों का सहयोग इस काम में लिया । उनका यह खुला और उदार नजरिया भी काम के साथ आगे बढ़ता गया । शुरुआती दस सालों में पांच संग्रह छपे । इसके बाद रिडेल कनाडा लौट गये । वहां वे क्यूबा और फिलिस्तीन तथा बोलीविया समेत ढेर सारे देशों के साथ एकजुटता के अभियान चलाते रहे । साथ ही अमेरिकी हमलों के प्रतिरोध में भी भाग लेते रहे । कोमिंटर्न के बारे में प्रकाशन की परियोजना को ब्रिल ने अपनाया और शेष संग्रह भी छपे । अब यह किताब उस परियोजना की भूमिका के बतौर छप रही है ।

इसके कुछ अध्याय कोमिंटर्न की शुरुआत का कालानुक्रमिक विवरण हैं । कुछ फ़ासीवाद, मजदूरों की सरकार, रणनीति और कार्यनीति, संगठन और केंद्रीयता, लोकतांत्रिक अधिकार तथा औपनिवेशिक और जातीयता जैसे खास मुद्दों से जुड़े हुए हैं । इसमें शामिल लेख उस संग्रह के बारे में अलग अलग मौकों पर लिखे गये थे इसलिए उनमें थोड़ा दुहराव भी मिलेगा । इन लेखों को संग्रह के सूचीपत्र की तरह भी देखा जा सकता है । इससे पाठकों को खास मुद्दों पर अलग अलग संग्रहों को देखने की प्रेरणा मिल सकती है । लेनिन द्वारा स्थापित कोमिंटर्न की विरासत आज की दुनिया के लिए भी ताबेर को प्रासंगिक लगती है ।

इसके बाद उन्होंने परियोजना का संक्षिप्त परिचय दिया है । इसके तहत प्रकाशित आरम्भिक संग्रह पाथफ़ाइंडर प्रेस से जान रिडेल के संपादन में छपे । प्रकाशित सामग्री का अधिकांश हिस्सा पहली बार अंग्रेजी में आया था । इसके बाद के संग्रह ब्रिल और हेमार्केट बुक्स से छपे । इसका पहला संग्रह 1907 से 1916 के बीच के वे दस्तावेज थे जिन्हें लेनिन ने कोमिंटर्न की तैयारी के बतौर दर्ज किया था । ये तैयारी के वर्षों में लेनिन के इस दिशा में किये संघर्षों के सबूत हैं । प्रथम विश्वयुद्ध की आहट मिलते ही लेनिन ने द्वितीय इंटरनेशनल के भीतर वापपक्ष गठित करने का प्रयास किया । युद्ध छिड़ने के बाद उन्होंने द्वितीय इंटरनेशनल से नाता तोड़ लिया और कोमिंटर्न के बारे में सोचने लगे थे । उसी दौर की बहसों को इसमें रखा गया है । बहस के मुद्दे साम्राज्यवाद की प्रकृति, राष्ट्रों के आत्मनिर्णय का अधिकार, युद्ध के विरुद्ध संघर्ष और मजदूर वर्ग की अंतर्राष्ट्रीय एकता थे । यह संग्रह 1984 में छपा था ।

दूसरा संग्रह 1918 से 1919 के दस्तावेजों का है । यह समय जर्मन क्रांति और सोवियत सत्ता की स्थापना का था । इनमें स्थापना कांग्रेस की तैयारी की झलक मिलती है । नवम्बर 1918 में जर्मनी में क्रांति हुई जिसके कारण प्रथम विश्वयुद्ध सहसा रुक गया और विश्व क्रांति का नया रास्ता खुल गया ।  जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर की बहसों का पता इस दौर के दस्तावेजों से चलता है । इन घटनाओं के बारे में रूसी बोल्शेविक नेताओं की राय भी देखने को मिलती है । सोवियत सत्ता के बारे में लेनिन और काउत्सकी की बहस भी पाठकों को नजर आती है । कोमिंटर्न की स्थापना कांग्रेस की तैयारी के प्रमाण भी इस समय के दस्तावेजों में सुरक्षित हैं । इसे 1986 में छापा गया था ।

तीसरा संग्रह स्वाभाविक रूप से 1919 की स्थापना कांग्रेस के कार्यवृत्त का है । मार्च में 20 देशों के प्रतिनिधियों ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मध्य यूरोप और एशिया के क्रांतिकारी उभार की चर्चा की और कोमिंटर्न के गठन का फैसला किया । कांग्रेस की बहसों, रपटों और पारित प्रस्तावों का संग्रह इसमें किया गया । विश्व क्रांतिकारी प्रगति के माहौल में इस आंदोलन की नयी उठान का पता इससे चलता है । 1987 में इसे छापा गया ।

अगले साल 1920 में दूसरी कांग्रेस हुई । इसमें मजदूर वर्ग की रणनीति और कार्यक्रम, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष, ट्रेड यूनियनों के क्रांतिकारी बदलाव, मजदूर-किसान एकता, बुर्जुआ संसदों और चुनावों में भागीदारी तथा कम्युनिस्ट पार्टियों की संरचना और उनकी जिम्मेदारी के सवाल पर उग्र वाम तथा दक्षिणपंथी नजरिए से ढेर सारी तीखी बहसें हुईं । उस समय आंदोलन के लिए ये सवाल बेहद अहम थे । इसलिए इन तमाम ज्वलंत सवालों पर इस कांग्रेस के फैसले शुरुआती कोमिंटर्न के लिए भारी महत्व के रहे । 1991 में इसे दो खंडों में छापा गया था ।

1920 में ही बाकू कांग्रेस का आयोजन कोमिंटर्न ने किया । उस समय मध्य एशिया और यूरोप के क्रांतिकारी संघर्षों के कारण नयी सुबह की उम्मीद मेहनतकशों में उपजी थी । मुख्य रूप से मध्य एशिया के 2000 प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए थे । बहस इस सवाल पर हुई कि औपनिवेशिक दुनिया के किसान और मजदूर साम्राज्यवादी शोषण से कैसे आजाद होंगे । वहां के शासक वर्ग ने जो जातीय और धार्मिक विभाजन पैदा किया है उस पर विजय प्राप्त करते हुए साझा वर्ग हितों के लिए कैसे लड़ेंगे । इसे 1993 में छापा गया ।

1922 की कांग्रेस आखिरी कांग्रेस थी जिसमें लेनिन ने भाग लिया । उसमें जिन बहुतेरे सवालों पर बात हुई वे अब भी हमारी रुचि के विषय बने हुए हैं । संयुक्त मोर्चे का निर्माण, किसानों और मजदूरों की सरकार, साम्राज्यवाद विरोधी एकजुटता, अंतर्राष्ट्रीय मांगें और अंतर्राष्ट्रीय संगठन आदि मसले उनमें शामिल थे । प्रतिनिधियों के मत तरह तरह के थे । फ़ासीवाद के उदय, वर्साई संधि की व्यवस्था के अंत, औपनिवेशिक देशों में क्रांति तथा स्त्री मुक्ति जैसे सवालों पर मजेदार बहसें हुईं । इसके दस्तावेजों का संग्रह 2012 में ब्रिल से छपा ।  

इससे साल भर पहले 1921 में कोमिंटर्न की तीसरी कांग्रेस हुई । इसमें तीखा राजनीतिक संघर्ष हुआ । त्रात्सकी और लेनिन शुरू में अल्पमत में थे लेकिन फिर प्रतिनिधियों का बहुमत उनके पक्ष में आ गया । बहस का मुद्दा यह था कि सत्ता पर क्रांतिकारी कब्जे की प्रक्रिया में मजदूर वर्ग की बहुसंख्या का समर्थन नेताओं का छोटा सा समूह किस तरह हासिल करे । इसके लिए उसे किस तरह की आक्रामक पहल लेनी होगी । बहस का समापन कम्युनिस्ट रणनीति और कार्यनीति के सूत्रीकरण में हुआ । सोवियत संघ और उसके द्वारा हाल ही में अपनायी गयी नयी आर्थिक नीति के बारे में भी बहस हुई । इस संग्रह में कार्यवृत्त के साथ 32 परिशिष्ट शामिल किये गये । इन्हें पहले कभी छापा नहीं गया था । इनसे परदे के पीछे की बातचीत का अंदाजा लगता है । ब्रिल से इसे 2015 में छापा गया । 

1922 से 1923 के बीच कोमिंटर्न की कार्यकारिणी की तीन विस्तारित बैठकें हुईं । इनके कार्यवृत्त और प्रस्तावों का संग्रह माइक ताबेर के संपादन में छपा । इन्हें लघु कांग्रेस भी कहा जा सकता है जिनमें दुनिया भर के कम्युनिस्ट नेताओं ने संयुक्त मोर्चे से लेकर फ़ासीवाद से लड़ाई तक विभिन्न रणनीतिक सवालों से लेकर पहलों तक पर बातचीत की । इस प्रचुर सामग्री से लेनिन के समय विश्व क्रांतिकारी आंदोलन तथा कोमिंटर्न के परवर्ती विकास को समझने में मदद मिलती है । इसका प्रकाशन ब्रिल से 2018 में हुआ ।

इसके बाद के संग्रह सहायक संगठनों पर केंद्रित हैं । पहला संग्रह माइक ताबेर और मारिया द्याकोनोवा के संपादन में कम्युनिस्ट स्त्री आंदोलन का है । 1920 में इसकी शुरुआत हुई और यह दुनिया का पहला वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी स्त्री संगठन था । इसने स्त्री मुक्ति का कार्यक्रम बनाया, स्त्री अधिकारों के संघर्ष में भाग लिया और कम्युनिस्ट आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए काम किया । इस संग्रह में संगठन के सम्मेलनों के कार्यवृत्त और प्रस्ताव तथा दुनिया भर में हो रहे काम की रपटें शामिल की गयी हैं । इसकी अधिकांश सामग्री पहली बार अंग्रेजी में सुलभ हुई है । आधी सामग्री तो पहली बार छपी है । 2022 में ब्रिल ने इसे छापा ।

1921 में स्थापित रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की पहली कांग्रेस की कार्यवाही और प्रस्तावों का संग्रह माइक ताबेर के संपादन में छपा । इसे संक्षेप में प्रोफ़िंटर्न कहा जाता है । क्रांतिकारी संघर्ष में दुनिया के लाखों कामगारों को खींच लाने के लिए ट्रेड यूनियनों का वैश्विक आंदोलन खड़ा करने के मकसद से इसे गठित किया गया था । इस कांग्रेस में मजदूर आंदोलन की विविध धाराओं का प्रतिनिधित्व हुआ जिनमें  बिग हिल हेवुड और टाम मान जैसी मशहूर हस्तियां भी शामिल थीं । ट्रेड यूनियनों के लक्ष्य और कार्यभार, यूनियनवादी वर्ग संघर्ष की प्रकृति और यूनियन की रणनीति और कार्यनीति के सवाल पर विभिन्न धाराओं के बीच जीवंत और यदा कदा तीखी बहसें भी हुईं । 2024 में इसे ब्रिल ने छापा ।

कम्युनिस्ट यूथ इंटरनेशनल भी कोमिंटर्न का महत्वपूर्ण सहायक संगठन था । बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में द्वितीय इंटरनेशनल से जुड़े समाजवादी युवा आंदोलन से इसका विकास हुआ और इसने कोमिंटर्न की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । 1919 और 1921 में इसकी दो कांग्रेस हुईं जिनकी कार्यवाही और प्रस्ताव माइक ताबेर और बाब श्वार्ज़ के संपादन में संग्रहित किये गये हैं । यह सामग्री पहली बार अंग्रेजी में आयी है । इसमें सम्मेलनों के दस्तावेजों के अतिरिक्त नेताओं की बैठकों की कार्यवाही भी शामिल है । इन बैठकों में लड़ाकूपन, युवकों की अग्रदूत की भूमिका, कोमिंटर्न के साथ संबंध के अतिरिक्त क्रांतिकारी युवा संगठन की प्रकृति और उसके कार्यभार के बारे में लगातार बहसें होती रही थीं । इसे भी ब्रिल से छापा गया है ।

इन संग्रहों के अतिरिक्त जान रिडेल, विजय प्रसाद और नसीफ़ मुल्ला के संपादन में लिबरेट द कालोनीज! कम्युनिज्म ऐंड कोलोनियल फ़्रीडम 1917-1924’ का प्रकाशन 2019 में लेफ़्टवर्ड से, जान रिडेल और माइक ताबेर के संपादन में क्लारा जेटकिन की फ़ाइटिंग फ़ासिज्मका प्रकाशन 2017 में हेमार्केट बुक्स से तथा माइक ताबेर के संपादन में इसी तरह हेमार्केट बुक्स से 2021 और 2023 में द्वितीय इंटरनेशनल की बहसों के दस्तावेजों के दो संग्रह छापे गये हैं । कुछेक किताबों और संग्रहों के छपने से अधिक यह कहानी एक व्यक्ति के चालीस साला एकनिष्ठ समर्पण की लोमहर्षक दास्तान है ।

जान रिडेल का कहना है कि मार्क्स और एंगेल्स ने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मजदूरों के अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी संघर्ष का जो आवाहन किया था उससे दो सौ साल तक मजदूर आंदोलन अनुप्राणित रहा । सामाजिक मुक्ति के इस आंदोलन को ही आगे ले जाने की कोशिश कोमिंटर्न ने की । उसके इन्हीं प्रयासों को उजागर करने के मकसद से प्रकाशन की यह योजना चली । इसमें 1919 से 1923 के दौरान की उसकी गतिविधियों को सामने लाया गया जिस समय लेनिन या उनके साथियों ने इसका नेतृत्व किया । रूसी किसानों और मजदूरों की क्रांति के वैश्विक प्रसार की आकांक्षा से इसकी स्थापना हुई थी । दस साल के भीतर ही इस पर स्तालिन का असर दिखायी देने लगा और 1943 में इसे समाप्त कर दिया गया । फिर भी शुरुआती दिनों में इसने यूरेशिया, अफ़्रीका और अमेरिकी महाद्वीप के अनेक देशों में पूंजीवाद विरोधी उभार की प्रेरणा दी । खासकर चीन, वियतनाम और क्यूबा की क्रांतियों का उससे गहरा रिश्ता रहा ।

कोमिंटर्न की सबसे स्थायी उपलब्धि रणनीति और कार्यनीति के स्तर पर ऐसी धारणाओं को प्रस्तुत करने में है जिनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है । प्रस्तावों के अतिरिक्त इन धारणाओं का विकास मौखिक बहसों में भी हुआ । इन बहसों के बारे में विस्तृत लिखित साक्ष्य मौजूद हैं । कोमिंटर्न की विश्व कांग्रेसों में ये बहसें होती थीं और इन कांग्रेसों की अवधि अक्सर एकाधिक हफ़्तों तक भी होती थी । इन धारणाओं को इस समय के कार्यकर्ताओं और विद्वानों को सर्व सुलभ कराने के लिए यह परियोजना शुरू हुई थी । लेनिन के समय के विश्व क्रांतिकारी आंदोलन के दस्तावेजों को अनूदित, संपादित और प्रकाशित करने की योजना के तहत यह काम हुआ । अनुमान था कि दसेक साल में दर्जन भर मोटी किताबों के प्रकाशन के साथ काम पूरा हो जाएगा । भरोसा था कि कोमिंटर्न के समय का सामाजिक और राजनीतिक माहौल दुनिया भर में बदल चुका है फिर भी कोमिंटर्न के विचार प्रासंगिक हैं । 

कोमिंटर्न की सक्रियता ने क्रांतिकारी मार्क्सवाद को वैश्विक शक्ति में बदल दिया था । दर्जनों राजनीतिक पार्टियों और अनेक सहकारी संगठनों में करोड़ो सदस्य संगठित थे । सोवियत संघ की राजधानी मास्को से इनको भौतिक और बौद्धिक नेतृत्व मिलता था । इसके लिए नेताओं और प्रकाशनों का व्यवस्थित तंत्र काम करता था । कोमिंटर्न का असर उसके सहकारी संगठनों के जरिए संसार भर में फैलता था । इनका आपसी समन्वय साम्राज्यवाद विरोधी एकजुटता, राष्ट्रीय और नस्ली उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष तथा युवकों, स्त्रियों और ट्रेड यूनियनों की पहल के जरिए होता था ।

आज भी सामाजिक विकल्प की कल्पना में कोमिंटर्न की भाषा और धारणाओं का उपयोग थाती की तरह किया जा सकता है । समाज की कल्पना के अतिरिक्त इसकी याद से नीतियों के मूल्यांकन और परीक्षण का भी वस्तुगत आधार पैदा होता है । रिडेल ने उसी याद को खोजने, सहेजने और आगामी पीढ़ियों तक ले जाने की कोशिश इन संग्रहों के माध्यम से की है । समाजवादी धरोहर का उत्खनन इन प्रकाशनों से हुआ है ।     

इन दस्तावेजों की प्राप्ति का कारण है कि कोमिंटर्न ऐसे दौर में पैदा हुआ जब इलेक्ट्रानिक और फ़िल्म जैसे माध्यम शैशवावस्था में थे और उसने अपने दस्तावेजों को दर्ज करने पर ध्यान दिया था । लगभग 7000 पृष्ठों में इन दस्तावेजों के ग्यारह संग्रह छप चुके हैं और बारहवां भी छपने वाला है ।                                              

Thursday, February 12, 2026

पूंजीवाद और उसके आलोचक

 

2025 में फ़रार, स्त्रास ऐंड गीरू से जान कसीदी की किताब ‘कैपिटलिज्म ऐंड इट्स क्रिटीक्स: ए हिस्ट्री फ़्राम द इनडस्ट्रियल रेवोल्यूशन टु एआइ’ का प्रकाशन हुआ । लेखक मानते हैं कि इतिहास की सभी किताबों की तरह उनकी किताब भी अपने समय का उत्पाद है । इसका खयाल बर्नी सांडर्स के चुनाव अभियान के समय आया था और आखिरी संपादन ट्रम्प की दूसरी जीत के बाद हुआ । सांडर्स ने अमेरिकी अर्थतंत्र पर मुट्ठी भर खरबपतियों के कब्जे के विरुद्ध सामान्य कामगारों के हित में उसके संचालन का वादा किया था । ट्रम्प तो खुद ही खरबपति है इसके बावजूद उसने कामगारों की बात की और एक बार नहीं दो बार उसने ऐसा किया । अमेरिकी पूंजीवाद से यह मोहभंग दीर्घकालीन परिघटना रही है । 2018 में देखा गया कि अठारह से उनतीस साल के बीच की आबादी में पूंजीवाद के मुकाबले समाजवाद अधिक आकर्षण पैदा कर रहा था । ऐसा केवल अमेरिका तक सीमित नहीं था । 2017 में ब्रिटेन में भी एक सर्वेक्षण में पूंजीवाद से अधिक सद्गुण समाजवाद में लक्षित किये जा रहे थे । लेखक ने समकालीन पूंजीवाद के संक्षिप्त इतिहास के रूप में अपनी किताब की कल्पना की थी । साथ ही उससे जुड़ी बहसों को भी इसमें जगह मिलनी थी । समय सोवियत संघ के पतन से अब तक का होना था ।

जल्दी ही उन्हें अंदाजा हुआ कि आधुनिक पूंजीवाद की जो भी आलोचना है उसकी जड़ ब्रिटेन में औद्योगिक पूंजीवाद के उदय में है । चाहे सवाल इजारेदारी का हो या तकनीक के असर अथवा विषमता का हो बहसें उसी समय शुरू हुई थीं । एडम स्मिथ मुनाफ़े की होड़ के विरोधी नहीं थे लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी की औपनिवेशिक इजारेदारी के विरोध में थे । उन्हें लगा कि ये तो पुराने धन्नासेठों की तरह काम कर रही है । इसी तरह जब कारखानों के औद्योगिक स्वरूप का उत्तरी इंग्लैंड में विस्तार हुआ तो बहुतेरे दस्तकारों ने सूती मिलों और उनकी मशीनों को तोड़ा क्योंकि वे उनकी आजीविका पर हमला कर रही थीं । तब उन्हें आधुनिकता का शत्रु कहकर खारिज किया जाता था । अब कृत्रिम बुद्धि से अनगिनत रोजगार खत्म होने जा रहे हैं तो उन मशीन तोड़कों की चिंता को समझा जा सकता है । उसी समय पूंजीवाद की एक और विशेषता सामने आयी थी कि अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बढ़ती जा रही थी । उसी समय बड़ी मछली द्वारा छोटी मछलियों को खाने का रूपक पूंजीवाद को समझाने के लिए गढ़ा गया और गरीबी बढ़ने के साथ अमीरी बढ़ने के रिश्ते को भी पहचाना गया था ।

इसी वजह से लेखक ने परियोजना और विस्तारित किया । सब कुछ को समेटने की उम्मीद उन्हें एकदम नहीं है । 1950 दशक में समाजवादी चिंतन का इतिहास जी डी एच कोल ने सात खंडों में लिखा था । पूर्वजों वाले पहले खंड में ही पचास प्रमुख लोगों के बारे में लिखना पड़ा था । लेखक को कम जगह में अपनी बात समेट लेने में इस तथ्य से मदद मिली कि सदियों के दौरान पूंजीवाद पर लगे आरोपों में सुसंगति रही है । अक्सर इसे निर्मम, शोषक, विषमताकारी, अस्थिर और विध्वंसक कहते हुए भी इसकी व्याप्ति और जीत की क्षमता को मान लिया गया है । इसे अर्थतंत्र के साथ ही ऐसी विचारधारा भी स्वीकार किया गया जो जीवन के साथ दिमाग पर भी कब्जा कर लेती है ।

पूंजीवाद की आलोचना और प्रतिरोध का जायजा लेते हुए लेखक ने इस व्यवस्था की विविधता को भी उजागर किया है । पूंजीवाद के स्वरूप में होने वाले बदलावों को दर्ज करने के बावजूद लेखक ने इसे पूंजीवाद का इतिहास मानने से परहेज किया है । इसमें उत्पादन के आंकड़ों, मजदूरी की दर और तकनीकी बदलावों पर भी बात की गयी है और इनके साथ राजनीतिक इतिहास का भी जिक्र है इसके बावजूद केंद्र में लेखकों और आलोचकों का जीवन और लेखन है । सिद्धांतों और विवेचनाओं पर बात करते हुए लेखक ने इस बात पर ध्यान दिया है कि उन लेखकों के समय और माहौल में आसपास की दुनिया उनको कैसी महसूस होती थी । इस तरह इस किताब में आलोचकों की निगाह से पूंजीवाद का इतिहास बताने की कोशिश है । जिन आलोचकों की बात की गयी है उनमें अधिकतर अर्थशास्त्री रहे हैं लेकिन सभी नहीं । दो तो समूह हैं- मशीन तोड़क और निर्भरता के सिद्धांतकार । निर्भरता के सिद्धांतकारों ने 1950 और 1960 के दशक में उत्तर औपनिवेशिक देशों के विकास में अवरोधों पर जोर दिया था । जिन व्यक्तियों का उल्लेख है उनमें से कुछ ने सामान्य शिक्षकों का जीवन बिताया हालांकि उनके विचार सामान्य नहीं थे । अन्य लोग भद्र विद्वान, पत्रकार लेखक, समाजवादी क्रांतिकारी और ऐसे अर्थशास्त्री थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के लिए काम किया । उनमें से एक एंगेल्स ऐसे थे जो क्रांतिकारी होने के साथ सूती मिल के पूंजीवादी मालिक भी थे । एक और एरिक विलियम्स थे जिनका जीवन इतिहासकार के बतौर शुरू हुआ लेकिन बाद में अपने देश ट्रिनिदाद टोबैगो के प्रधानमंत्री बने । रोजा और रोबिन्सन के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों का भी जिक्र इस किताब में हुआ है । आयरलैंड की नारीवादी अन्ना ह्वीलर और फ़्रांसिसी लेखक फ़्लोरा त्रिस्तन ने पुरुष और स्त्री के संयुक्त जनरल यूनियन के गठन का प्रस्ताव किया और कारखानों के स्त्री कामगारों के उभार की बात की । एक अन्य स्त्री इतालवी लड़ाकू सिल्विया फ़ेदरीची थीं जिन्होंने न्यू यार्क में घरेलू काम के पगार का सवाल उठाया । उन्होंने घरेलू काम की बात की जिसके लिए तब तक कोई पगार नहीं मिलती थी और इसे स्त्रियों की जिम्मेदारी समझा जाता था । उन्होंने बताया कि यह पगारविहीन श्रम पूंजीवादी कामगार के बने रहने और पुनरुत्पादन के लिए जरूरी था । इसके बिना यह व्यवस्था चल ही नहीं सकती ।

पूंजीवाद का इतिहास बताते समय होड़, तकनीक, उपनिवेशवाद या मुनाफ़ा आदि जैसी निर्वैयक्तिक ताकतों का ही जिक्र होता है । इस  पद्धति के फायदे हैं, इससे उन व्यापक प्रवृत्तियों का पता चलता है जिन्होंने आधुनिक जीवन को शक्ल दी है लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं । इससे फ़ासीवाद का उदय या समाजवाद का पतन जैसी कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का होना आम तौर पर अपरिहार्य प्रतीत होगा । अलग अलग समयों पर विभिन्न व्यक्तियों की आलोचना पर ध्यान देने से संयोग का भी अंदाजा लगेगा । यह भी इतिहास का ही अंग होता है । इससे हम उन अवसरों और विचारों की झलक भी पाते हैं जिनका अनुगमन नहीं हुआ या वैकल्पिक अर्थव्यवस्थाओं की कल्पना की सम्भावना भी इनसे खुलेगी ।

उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में पूंजीवाद के वामपंथी और दक्षिणपंथी आलोचक नैतिक तर्क देते थे कि कारखाने ने मजदूरों को अमानवीय बना दिया है और लम्बे समय से स्थापित सामाजिक ढर्रे को तोड़ दिया है । ब्रिटेन और फ़्रांस में समाजवाद सुनायी देता था लेकिन उस समय इसका मतलब बहुत अलग हुआ करता था । आज उसे आम तौर पर पुनर्वितरण और सरकारी दखल से जोड़कर देखा जाता है । शुरुआती समाजवादियों को सरकार में कोई यकीन नहीं था । वे उसे ऊपरी लोगों की भ्रष्ट संस्था मानते थे । वे तो स्वशासी सहकारी समुदायों की स्थापना करना जरूरी समझते थे जिनमें काम और उसकी पगार बराबरी के साथ तय होनी थी । शुरू में ऐसे समुदायों की स्थापना की कोशिशें नाकामयाब रहीं तो मार्क्स ने इन्हें काल्पनिक समाजवादी कहा । मार्क्स ने अपने शुरू के लेखन में माना कि औद्योगिक पूंजीवाद ने मजदूरों को उनके स्व से अलगा दिया है लेकिन उनका मुख्य जोर इस व्यवस्था की गति के नियमों की खोज और विश्लेषण पर रहा । उन्होंने इस व्यवस्था के अंदरूनी अंतर्विरोधों पर ध्यान दिया और क्रांतिकारी ताकत के बतौर मजदूर वर्ग के उभार को रेखांकित किया ।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में अमेरिका में विकराल औद्योगिक साम्राज्य और उसके अनुरूप राजनीति को वेब्लेन ने निर्ममता के साथ विश्लेषित किया । उसी समय साम्राज्यवाद का उदय हुआ जिसे लेनिन ने पूंजीवाद की चरम अवस्था कहा । रोजा ने कहा कि पूंजीवादी व्यवस्था अपने जीवन के लिए प्राक पूंजीवादी समाजों को अपने भीतर समाहित करता है और उन्हें बरबाद करता है । प्रथम विश्वयुद्ध को लेनिन और रोजा ने अपने सिद्धांतों के सबूत के बतौर देखा । उन्हें उम्मीद थी कि इससे साम्राज्यवादी देशों में क्रांति की लहर उठेगी लेकिन उनकी आशा पूरी नहीं हुई । केवल रूस में बोल्शेविकों ने सत्ता पर कब्जा किया और समाजवाद के निर्माण के कठिन काम में लग गये ।

विश्वयुद्ध का झटका तो पूंजीवाद ने बरदाश्त कर लिया लेकिन उसकी सबसे कड़ी परीक्षा होनी थी । महामंदी के दौरान उत्पादन में घटोत्तरी आयी, बेरोजगारी आसमान छूने लगी और राजनीति में चरमपंथ का बोलबाला हुआ । कार्ल पोलान्यी ने कहा कि अबाध पूंजीवाद से समाजवाद और फ़ासीवाद ही पैदा हो सकते हैं । ऐसे सुधारक भी थे जिन्होंने कम क्रांतिकारी विकल्पों का पक्ष लिया । कीन्स ऐसे ही एक सुधारक थे । वे मुक्त बाजार के समर्थक तो थे लेकिन उसकी आलोचना भी करते थे । उन्होंने अर्थतंत्र को मंदी से बाहर निकालने के लिए टैक्स के इस्तेमाल और सरकारी व्यय की नीति की वकालत की । इसने सामाजिक बीमा के विस्तार और ब्रेटन वुड्स में प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सुधारों के साथ मिलकर पूंजीवाद की कुछ समस्याओं का तात्कालिक समाधान किया । सोवियत संघ के पतन तथा नवउदारवाद के आगमन के साथ वे समस्याएं अब फिर लौट आयी हैं । इतिहास का अंत तो दो दशक ही चल सका । उसके बाद भयानक पापुलिज्म ने उलटकर वार किया है ।

लेखक ने पूंजीवाद के वैश्विक स्वरूप पर सर्वत्र बल दिया है । औद्योगिक पूंजीवाद में बदलने से पहले से ही उसका यह स्वरूप स्पष्ट था । अमेरिका में ईस्ट इंडिया कंपनी के जलपोतों ने बोस्टन टी पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । अमेरिकी उपनिवेशों चाय आयात पर कंपनी के एकाधिकार ने अमेरिकी देशभक्तों को क्रोध दिलाया था लेकिन वह तो उसके व्यापार का बहुत छोटा हिस्सा था । उसका व्यापार चार महाद्वीपों में फैला था । औपनिवेशिक पूंजीवाद के दौर में समुद्रों के आरपार सबसे लाभदायक व्यापार तिहरा लेनदेन का था । इसमें अफ़्रीका से लाखों लोगों को गुलाम बनाकर अमेरिका में काम करने के लिए लाया जाता था । वे चीनी, कपास और तम्बाकू के बागानों में काम करते थे । यह बात 1942 में एरिक विलियम्स ने अपनी किताब कैपिटलिज्म ऐंड स्लेवरी में कही कि उपनिवेशवाद और गुलामों के व्यापार ने औद्योगिक पूंजीवाद के उदय का आधार तैयार किया । इस बात पर उस समय बहुत गरमागरम बहसें हुई थीं । इसी तरह उपनिवेशवाद के आलोचक भारतीय अर्थशास्त्री जे सी कुमारप्पा थे जिन्हें पारिस्थितिकीय अर्थशास्त्र का अग्रदूत माना जा रहा है । इन दोनों ने विश्व पूंजीवादी व्यवस्था के केंद्र और परिधि के आपसी रिश्ते में काफी रुचि ली थी । यही पहलू बाद में लैटिन अमेरिका के निर्भरता के सिद्धांतकारों की रुचि का भी विषय बना । पूंजीवाद के वैश्विक स्वरूप पर लगातार समीर अमीन ने भी लिखा और वैश्वीकरण की तीखी आलोचना की ।                

वैश्विक परिप्रेक्ष्य होने के बावजूद लेखक ने किताब की यूरोकेंद्रीयता को स्वीकार किया है । इसे उन्होंने विश्व पूंजीवादी व्यवस्था का केंद्र कहा है । इसका कारण यह है कि ब्रिटेन, जर्मनी और अमेरिका सबसे पहले औद्योगिक पूंजीवाद की ओर चले थे । इनके साथ फ़्रांस भी शामिल हुआ और उनकी इस नयी व्यवस्था की व्यवस्थित विश्लेषणात्मक आलोचना शुरू हुई । लेखक ने यह माना है कि बहुत सारे अन्य आलोचकों की बातों को वे जगह की कमी के कारण शामिल नहीं कर सके हैं । एक तो वे समूचे युग को समेटने वाले लोगों का जिक्र करना चाहते थे और दूसरे उनकी इच्छा कुछ कम प्रसिद्ध आलोचकों को जगह देने की थी जिनकी आलोचना में कुछ खास नुक्ता मौजूद था ।

उनका कहना है कि पूंजीवाद और उसके आलोचकों का यह एक इतिहास है एकमात्र इतिहास नहीं है । सभी जानते हैं कि पूंजीवाद की प्रकृति ही लगातार बदलने वाली है । उसके बदलाव के साथ ही उसके आलोचक भी अपने को नया बनाते रहते हैं । इसके बावजूद उसके संकट की बात सभी लोग उसकी शुरुआत से उठाते रहे हैं । औद्योगिक पूंजीवाद में उसके समृद्धि के दौर भी आये हैं जब वह पूरी तरह विश्वविजयी लगता रहा और ऐसे दौर भी आये जब घबराहट और मंदी देखी गयी । यह कोई अतिकथन नहीं होगा कि पूंजीवाद हमेशा संकटग्रस्त रहा है । एक संकट से निकलता है तो दूसरे संकट में प्रवेश करने जा रहा होता है ।

इसके बाद लेखक ने 1857 के वित्तीय संकट का जिक्र किया है ओहायो लाइफ़ इनश्योरेन्स ऐंड ट्रस्ट कंपनी डूब गयी थी और इससे सट्टा बाजार में घबराहट फैल गयी थी । कंपनी में जिनका पैसा जमा था वे अपना पैसा निकालने की जल्दी में थे तो दूसरे शहरों में भी बैंक डूबने लगे । वित्तीय संस्थाओं में भगदड़ मच गयी और उनका भाव गिरकर जमीन पर आ गया । समुद्र पारकर घबराहट पेरिस और लंदन जा पहुंची और वहां ब्याज की दर ऊपर भागने लगी क्योंकि कर्ज की किल्लत पड़ गयी । लंदन में बैठे मार्क्स ने इस परिघटना को उत्तेजक उत्सुकता के साथ देखा । उन्होंने एंगेल्स को लिखा कि इस अमेरिकी संकट की घोषणा उन्होंने 1850 में ही कर दी थी । उनको उम्मीद थी कि फ़्रांसिसी उद्योग पर इसका तत्काल असर पड़ेगा । वजह कि फ़्रांस में सिल्क के निर्माण में जितनी लागत आती है उससे सस्ता सिल्क न्यू यार्क में बिक रहा है । लिवरपूल और ग्लासगो में एकाधिक बैंक डूबे । एंगेल्स ने जवाब लिखा कि अमेरिकी मंदी जल्दी जाने वाली नहीं है । उन्होंने देखा कि कर्ज की किल्लत समूचे यूरोप में पैदा हो गयी है इसलिए वाणिज्य का हाल आगामी तीन से चार साल तक सुधरने नहीं जा रहा है । मार्क्स और एंगेल्स ने अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद के खात्मे की जो आशा पाली वह फलीभूत न हो सकी । सरकारों ने हस्तक्षेप करके बैंकों को बचा लिया । अमेरिका में सोने के भंडार के सहारे बैंकों में फिर से पूंजी डाली गयी ताकि मुद्रा और कर्ज की साख बनी रहे । ब्रिटेन में बैंक आफ़ इंग्लैंड को मुद्रा छापने की इजाजत दी गयी । इससे मंदी तो दूर नहीं हुई लेकिन वित्तीय बिखराव रुक गया । धीरे धीरे बैंक संभले, विश्वास लौटा और अर्थतंत्र में फिर से जीवन पड़ा ।

लेखक के मुताबिक विगत दो सौ सालों से यही कहानी नये नये रूपों में प्रकट होती रही है । इससे पूंजीवाद की अपने आपको दुरुस्त करने की ताकत का पता चलता है और उसके संकट मोचक के बतौर सरकारों की क्षमता भी उजागर होती है । कुछ अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है कि बारम्बार आने वाले इन संकटों के जरिए पूंजीवाद अपने आंतरिक अंतर्विरोधों को हल करता है । इस तरह के लोगों में रूसी अर्थशास्त्री निकोलाइ कोंद्रातिएव हैं जिनका मानना है कि पूंजीवाद का विकास पचास सालों की लम्बी अवधि वाले ऐसे चक्रों से हुई है । इसी तरह के एक और आस्ट्रियाई सिद्धांतकार जोसेफ शूमपीटर हैं जिनका रचनात्मक विध्वंस का सिद्धांत सिलिकान घाटी के कंप्यूटर उद्योग का बहुत दुलारा सिद्धांत है ।

लेकिन किताब में शामिल बहुतेरे आलोचक मानते हैं कि पूंजीवाद अपनी कुछ शाश्वत समस्याओं को हल करने में अक्षम है । वह खुद द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की खपत के लिए आवश्यक मांग पैदा नहीं कर पाता । यहां तक कि जितना मुनाफ़ा और बचत होती है उसके लिए भी निवेश के अवसर पैदा करने में वह सफल नहीं होता । मार्क्स, हाबसन, रोजा, कीन्स और रोबिन्सन ने यही बात कही । कीन्स को छोड़कर शेष सभी लोगों ने पूंजीपति और मजदूर में अर्थतंत्र के विभाजन को बुनियादी समस्या बताया । इससे एक वर्ग ऐसा हो जाता है जिसे सामान्य जीवन चलाने लायक धन जुटाने में लगातार लगे रहना पड़ता है जबकि दूसरा वर्ग इतना धन एकत्र कर लेता है कि उसको खर्च करने की चिंता में दुबला होता रहता है । मार्क्स और उनके समर्थकों को आशा थी कि इस विभाजन से इतनी विषमता पैदा होगी, सामाजिक खाई इतनी चौड़ी हो जाएगी कि मजदूर इस व्यवस्था को उखाड़ फेंकेंगे ।

इतिहास ने इस उम्मीद का साथ नहीं दिया । इसका एक कारण सरकार की ताकत में बढ़ोत्तरी भी है । आधुनिक राज्य ने औद्योगिक पूंजीवाद को सहारा देने की भूमिका अपना ली है । लेखक ने कीन्स के सामाजिक जनवाद को इससे जोड़कर देखा है । इसे वे प्रबंधित पूंजीवाद भी कहते हैं । दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इस तरह के पूंजीवाद का उभार देखा गया और उस समय पूंजीवाद की आलोचना में दक्षिणपंथी सुर तेज रहा । इनमें हायेक और फ़्रीडमैन का नाम सबसे अधिक हुआ । इनको नवउदारवाद का अगुआ सिद्धांतकार माना जाता है । इसे लेखक ने प्रतिक्रांति का नाम दिया है और कीन्सवाद के संकट में इसके स्रोत देखे हैं । इस संकट को 1940 दशक में ही कालेकी और पाल स्वीज़ी ने समझ लिया था । वर्तमान सदी के पहले दशक में ही विश्व पूंजीवाद की चुनौतियों ने अपना रूप दिखाना शुरू कर दिया और इस व्यवस्था की वैधता पर ही सवाल उठने लगे हैं । जलवायु परिवर्तन ने क्रांतिकारी पर्यावरण आंदोलन को जन्म दिया है । लेखक ने इसके स्रोत रोमानियाई अमेरिकी अर्थशास्त्री निकोलस जार्जेस्क्यू-रोएगन के चिंतन में देखे हैं जिन्होंने 1970 दशक में ही कहा कि धरती अब इससे अधिक आर्थिक गतिविधियों का बोझ उठाने में सक्षम नहीं रह गयी है । इसके साथ ही कुछ अन्य खतरे भी हैं । उनमें लेखक ने बढ़ती विषमता, वित्तीय अस्थिरता और तकनीकी के दैत्याकार इजारेदार घरानों का जिक्र किया है । ये घराने अपने ही कायदे कानून से चलते हैं । साथ ही कृत्रिम बुद्धि के आगमन से रोजगार के अवसरों पर भारी संकट के बादल छाये हैं । कुछ लोग इन चुनौतियों को समय के साथ बीत जाने वाली परिघटना मानते हैं जबकि कुछ अन्य लोग इसे नया आर्थिक प्रतिमान रचने का सुनहरा मौका मानते हैं । यह नया प्रतिमान अधिक टिकाऊ, समतामूलक और समावेशी होना होगा ।  

उनका कहना है कि पूंजी का प्रयोग तो बहुत पहले से धन संपदा के विभिन्न रूपों के लिए होता रहा था लेकिन पूंजीवाद का इस्तेमाल उन्नीसवीं सदी के मध्य से निंदात्मक तौर पर शुरू हुआ । 1850 में लुई ब्लांक ने पूंजीवाद के बारे में कहा कि बहुतों को पूंजी से बेदखल करके कुछ लोगों द्वारा उसका अधिग्रहण ही यह व्यवस्था है । पूंजीवादी उत्पादन पद्धति की बात करते हुए मार्क्स ने मजदूरों द्वारा पैदा किये हुए अतिरिक्त मूल्य पर जोर दिया लेकिन उनकी मान्यता भी लुई ब्लांक से मिलती जुलती ही थी । इसके बाद इसका प्रयोग ऐसी बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के लिए होने लगा जिसमें उत्पादन के साधन निजी पूंजीपतियों के पास होते हैं और वे प्रबंधकों तथा मजदूरों को नियुक्त करते हैं । इसके बारे में विवाद है कि पूंजीवाद का जन्म कब हुआ । लेखक ने इस मामले में जर्मन इतिहासकार जुर्गेन कोका की राय सही मानी है कि व्यापारिक पूंजीवाद, प्लांटेशन अर्थतंत्र और औद्योगिक पूंजीवाद एक ही व्यवस्था के विविध रूप हैं । इसका जन्म पूंजी की व्यापक गोलबंदी और मुनाफ़े के लिए उत्पादन के दौर में हुआ । इसके लिए सुरक्षित संपत्ति का अधिकार भी जरूरी था । इंग्लैंड में 1770 दशक में इसका जन्म उन्होंने माना है ।

किताब में पूंजीवाद के जिन आलोचकों का जिक्र है उनके लेखन से लेखक ने भरपूर मदद ली है । उनके जीवन के सिलसिले में अन्य स्रोतों से सहायता ली है ताकि उनके विचारों के ऐतिहासिक संदर्भ साफ हों । यथास्थान उनका जिक्र कर दिया गया है । लेखक को मार्क्स की यह बात हमेशा याद रही कि दुनिया की व्याख्या करने से अधिक जरूरी उसे बदलना है । इसलिए वे पाठकों से आशा करते हैं कि आगामी पीढ़ियों समेत सबके लिए बेहतर भविष्य हेतु अर्थतंत्र को दुरुस्त करने की दिशा में वे सक्रिय हों तो लेखक का श्रम सार्थक होगा ।

Sunday, January 25, 2026

सत्ता में समाजवाद

 

                                   

                                                              

2023 में स्प्रिंगेर से रोलैंड बोअर की किताब सोशलिज्म इन पावर: आन द हिस्ट्री ऐंड थियरी आफ़ सोशलिस्ट गवर्नेन्सका प्रकाशन हुआ । सत्ता में समाजवादी पार्टियों को सौ साल से अधिक का सैद्धांतिक और व्यावहारिक अनुभव हो चुका है इसलिए उसके विश्लेषण की जरूरत आ गयी है । इसी मकसद से लेखक ने यह किताब लिखी है । इसको लिखने के क्रम में एंगेल्स द्वारा समाजवादी शासन के बारे में लिखे का विश्लेषण जरूरी लगा तो वह स्वतंत्र किताब हो गयी । फिर चीन के बारे में अलग से किताब लिखी गयी । इन दोनों के बाद ही इस किताब को पूरा किया । सैद्धांतिक दृष्टि के लिए लेखक ने मार्क्स और एंगेल्स के लेखन को आधार बनाया है और शुरू के दो अध्याय उनको समर्पित हैं । इसके बाद सोवियत संघ के अनुभव पर आगे के तीन अध्याय लिखे गये हैं । इसके बाद ही पूर्वी एशिया पर निगाह डाली गयी है । इसके तहत एक अध्याय उत्तरी कोरिया पर लिखा गया है । इसके बाद चीन के बारे में शेष अध्याय लिखे गये क्योंकि लेखक ने उसे इस मामले में सबसे आगे बढ़ा हुआ प्रयोग माना है । सर्वहारा क्रांतियों के उपरांत पैदा समाजवादी शासन जैसे शासन के रूप अब तक आजमाए नहीं गये हैं । यह रूप पश्चिम यूरोप के राष्ट्र राज्य से अलग किस्म का है । उपनिवेशों की स्थापना करने वाले साम्राज्यों से भी यह अलग है और इसका स्वरूप संघीय भी नहीं है । ऐसी स्थिति में शासन के इस विशेष स्वरूप की ही गवेषणा करने के उद्देश्य से यह किताब तैयार की गयी है । इस विषय पर अंग्रेजी में बहुत कम किताबों से मदद मिलने की आशा है ।

किताबों की इस कमी का कारण पश्चिमी उदारवादी नजरिये से समाजवादी विकास को देखने का पूर्वाग्रह है । इसके तहत पूंजीवादी राष्ट्र राज्य का पश्चिमी ढांचा ही मानक के बतौर थोप दिया जाता है । यह मानक उन देशों के साथ कोई न्याय नहीं कर पाता जिनका इतिहास, संस्कृति और प्रशासन की परम्परा अलग हो । इस उदारवादी पश्चिमी मानक का असर बहुतेरे पश्चिमी मार्क्सवादियों पर भी बहुत गहरा रहा है जिसके कारण वे समाजवादी शासन के वास्तविक अनुभवों को खारिज कर देते हैं । सत्ता में समाजवाद को उसकी ही शर्तों पर समझने के मामले में किताबों की भारी कमी है । जो भी थोड़ी किताबें उपलब्ध हैं उनका उपयोग करने के अतिरिक्त लेखक ने मुख्य रूप से संबंधित देशों की सामग्री पर भरोसा किया है । इन देशों में रहने वाले लेखक के मित्रों ने बहसों और बातचीत के जरिए लेखक को बहुतेरी उलझनों को सुलझाने में मदद भी की है । इनमें कुछ लोग विश्वविद्यालयों के विख्यात अध्यापक और विद्वान भी हैं ।

लेखक का कहना है कि क्रांतिकारी प्रक्रिया के जरिए सत्ता पर कब्जा करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी और शासन के वास्तविक संचालन में बुनियादी अंतर होता है । लेनिन ने कहा ही था कि सत्ता पर कब्जा करना अपेक्षाकृत आसान होता है । इस कब्जे के बाद समाजवाद का निर्माण उसके मुकाबले अधिक कठिन काम होता है । समाजवादी प्रशासन स्थिर होने की जगह विकासमान प्रक्रिया होता है । यह पूर्वप्रदत्त नहीं होता और इसीलिए बदलाव की गुंजाइश इसमें बनी रहती है । यह काम मार्क्सवादी पद्धति से संपन्न होता है । पश्चिमी उदारवादी आलोचना के प्रभाव में होने की जगह ये बदलाव संबंधित समाजों की समस्याओं और मार्क्सवाद से प्रभावित होते हैं । ये देश समाजवादी निर्माण के सिलसिले में मार्क्सवाद लेनिनवाद को अपनाने का प्रयास करते हैं । इस मामले में बुनियादी सिद्धांतों और विशेष परिस्थितियों के बीच सामंजस्य बनाने की कोशिश की जाती है । ये परिस्थितियां स्थायी नहीं होतीं और सांस्कृतिक परम्पराओं और इतिहासों की खासियत से पैदा होती हैं । इसके साथ ही जिन समस्याओं का समाधान करना होता है उनका भी प्रभाव शासन की नीतियों पर पड़ता है । बुनियादी सिद्धांत भी लागू करने के देशकाल के अनुरूप ढाले जाते हैं । उनमें बदलाव और नयापन भी आता है । इस प्रक्रिया में सिद्धांत समृद्ध भी होते हैं ।

इसके बाद वे समाजवादी राजनीति या समाजवादी राज्य की जगह पर समाजवादी शासन शब्द के इस्तेमाल का कारण बताते हैं । कारण कि एंगेल्स ने राज्य के सभी रूपों को जनता की सत्ता से अलगाया हुआ मानते हैं । इसी वजह से राज्य हमेशा समाज के साथ अलगाव और तनाव की स्थिति में होता है । समाजवादी व्यवस्था में इसके विपरीत सार्वजनिक सत्ता समाज में निहित होती है और इसलिए उसे पारम्परिक अर्थों में राज्य नहीं कहा जा सकता । इस कारण से लेनिन के बाद से ही इसे सर्वहारा राज्य या समाजवादी राज्य कहा जाता रहा जो नया है और इतिहास में इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती । इसे वे गुणात्मक रूप से भिन्न किस्म का राज्य मानते हैं जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के माध्यम से ग्रामीण और शहरी कामगार ही स्वामी होते हैं और राज्य समाज में निहित होता है । लेखक ने भी एंगेल्स के अनुकरण में इसे समाजवादी शासन कहा है । उनका कहना है कि चीन में आधिकारिक दस्तावेजों में इसी तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जाता है ।

लेखक को किताब की सीमाओं का अनुमान है । मार्क्स-एंगेल्स, सोवियत संघ, उत्तरी कोरिया और चीन के अलावे भी पूर्वी यूरोप के देश, पूर्वी एशिया के अन्य देश, लैटिन अमेरिका और अफ़्रीका के भी बहुतेरे देशों को समाजवादी शासन के अध्ययन में शामिल किया जाना चाहिए लेकिन उसके लिए अपेक्षित योग्यता का अभाव लेखक को महसूस होता है । अपनी सीमा के भीतर ही किये गये इस अध्ययन में लेखक ने मार्क्स द्वारा राज्य के मौजूदा रूपों की समीक्षा की रूपरेखा प्रस्तुत करने के बाद यह भी समझने की कोशिश की कि उनके मुताबिक क्रांति के बाद समाजवादी शासन में राज्य का क्या होगा । इसके तहत सर्वहारा की तानाशाही की धारणा को भी समझा गया है । पेरिस कम्यून के अनुभव का भी जिक्र इस संदर्भ में हुआ है । मजदूरों के शासन के इस प्रथम प्रयोग का संपूर्ण विश्लेषण मार्क्स नहीं कर सके थे । एंगेल्स ने इसे आगे बढ़ाया । क्रांति के बाद के शासन संबंधी मार्क्स के अनुमान को भी प्रस्तुत करने की कोशिश लेखक ने की है । मार्क्स ने इस दिशा में अधिक प्रयास नहीं किया क्योंकि इस मामले में कोई ठोस अनुभव नहीं था । एंगेल्स ने मार्क्स के अधूरे काम की दिशा में आगे बढ़ते हुए समाजवादी शासन के कुछ बुनियादी सिद्धांत और सूत्र दिये । सबसे पहले तो उन्होंने अब तक के राज्य के रूपों को अलगाया हुआ सार्वजनिक सत्ता माना । समाजवादी निर्माण के लिहाज से भी उन्होंने कुछ जरूरी बातें कहीं । पेरिस कम्यून को उन्होंने सर्वहारा की तानाशाही से जोड़ा । इसके अतिरिक्त सर्वहारा सत्ता के आरम्भिक दौर में बल प्रयोग की भूमिका पर भी उन्होंने जोर दिया । उन्होंने ही राज्य के लोप का भी महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत किया । अराजकतावादी कहते थे कि समाजवादी सत्ता का पहला काम राज्य का उन्मूलन होगा । इसके उत्तर में एंगेल्स ने जोर दिया कि समाजवादी सत्ता के अंतिम काम के बतौर राज्य अपने आप समाप्त हो जाएगा । यह काम तत्काल नहीं होगा बल्कि इसमें लम्बा समय लगेगा । उन्होंने समाजवादी शासन के जो सूत्र दिये वे थे कि सार्वजनिक सत्ता बनी रहेगी लेकिन वह समाज से अलग होने की जगह उसमें धंसी होगी । इसका आधार वर्ग संघर्ष नहीं होगा इसलिए इसका चरित्र राजनीतिक नहीं होगा । शासन का मतलब समाज के वास्तविक हितों के लिए वस्तुओं का प्रशासन और उत्पादन की प्रक्रियाओं का प्रबंधन होगा । इससे आरम्भिक साम्यवाद में रूपांतरण की जमीन तैयार होगी ।

लेनिन की स्थिति विशेष रही क्योंकि उन्हें सत्ता पर कब्जा करने की क्रांतिकारी प्रक्रिया का अनुभव तो था ही, क्रांति के बाद सत्ता में रहते हुए समाजवादी निर्माण की जटिलता का भी कुछ समय तक अनुभव रहा । क्रांति से पहले ही उन्होंने क्रांति के बाद के राज्य, लोकतंत्र और प्रशासन के रूप के बारे में विचार किया था । इसमें उन्होंने मुख्य तौर पर एंगेल्स के लेखन का सहारा लिया, कभी कभी मार्क्स को भी उद्धृत किया और इनके लेखन को क्रांतिकारी संघर्ष के अनुभव की रोशनी में व्याख्यायित किया । सोवियत सत्ता के शुरुआती व्यावहारिक अनुभव ने भी लेनिन को सिखाया, उन्होंने संस्थानीकरण की ओर सत्ता के संक्रमण को चिन्हित किया तथा इसमें कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के सवाल के साथ ही समाजवादी लोकतंत्र पर भी अपनी बातें कहीं । घटनाक्रम की तेजी के साथ उन्होंने सिद्धांत के मोर्चे पर भी नयी जमीन तोड़ी और बदलती हुई परिस्थिति के साथ समाजवादी प्रशासन के स्वरूप में विकास पर भी बल दिया । समाजवादी सत्ता के तात्कालिक कार्यभार के बतौर उन्होंने किसान और मजदूर जनसमुदाय पर आम नेतृत्व के साथ शासन में कम्युनिस्ट नेतृत्व के सवाल पर विचार करते हुए लौह अनुशासन के साथ मजदूरों के लोकतंत्र को विकसित करने की जरूरत बतायी । सिद्धांत के क्षेत्र में समाजवादी लोकतंत्र को लोकतंत्र का उच्चतम रूप बनाने पर उन्होंने बल दिया और इसे लोकतांत्रिक केंद्रीयता की धारणा के साथ जोड़ा । इस सिलसिले में लेखक ने एंगेल्स द्वारा क्रांति के बाद राज्य के दीर्घकालीन लोप की धारणा की भी परीक्षा की है । 

उनको समाजवादी शासन को देखने का समय बहुत कम मिला इसलिए वे महज कुछ उदीयमान रूपों को ही देख सके थे । असल में तो स्तालिन के समय ही जमीनी हकीकत उभरी । इन तीन दशकों में समाजवादी शासन का रूपरंग प्रकट हुआ । इसका एक प्रमुख पहलू समाजवादी शासन के ढांचे में अनेक अल्पसंख्यक जातियों की स्थिति से जुड़ा हुआ है । जातियों का सवाल बीसवीं सदी में मार्क्सवादी पार्टियों में बहस के केंद्र में था । स्तालिन ने इन बहसों में सिद्धांत के स्तर पर अत्यंत मौलिक योगदान किया । उन्होंने कहा कि संघीय समाजवादी देश की विशेषता के बतौर सांस्कृतिक जातीय स्वायत्तता का प्रस्ताव उचित नहीं है । इसकी जगह उन्होंने वर्ग की एकता पर बल दिया । वर्ग की इस एकता के आधार पर अधिकतम और अभूतपूर्व विविधता की सच्ची और समग्र बुनियाद रखी जा सकती है । ठीक इसी सिद्धांत के आधार पर 1917 के बाद सोवियत संघ में अल्पसंख्यक जातियों के लिए पहली बार सांगोपांग नीति का निर्माण हुआ । इसी नीति ने उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के साथ एकता बनाने का भी आधार उपलब्ध कराया । इसने दुनिया भर के मुक्ति संघर्षों को गति प्रदान की ।

इसका एक और पहलू सोवियत संघ के भीतर समाजवादी लोकतंत्र का निर्माण था । इसके तहत चार कदमों का उल्लेख किया गया है । चुनावी लोकतंत्र की दिशा में 1930 दशक के उत्तरार्ध में सार्वभौमिक मताधिकार पर आधारित अनेक प्रत्याशियों के बीच लड़े जाने वाले चुनाव हुए । कार्यस्थल, सामूहिक खेती और रिहाइश की जगहों पर प्राथमिक पार्टी संगठनों के साथ सलाह मशविरे के जरिए सार्थक लोकतंत्र स्थापित करने की कोशिश की गयी । 1936 के संविधान में शोषण से मुक्ति को बुनियादी मानवाधिकार माना गया । इसके साथ तमाम बहुतेरे अन्य अधिकार दिये गये । समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना में कम्युनिस्ट पार्टी की अनिवार्य और द्वंद्वात्मक भूमिका स्वीकार की गयी । अन्य समाजवादी देशों ने भी इन पहलुओं को और आगे बढ़ाया । लेखक का कहना है कि राज्य के सामान्य अर्थ से हटकर समाजवादी राज्य की धारणा थी । राज्य के लोप से संबंधित जो बहसें चल रही थीं उनके संदर्भ में स्तालिन की नीतियों को देखने का अनुरोध लेखक ने किया है । इसी सिलसिले में उन्होंने 1939 की अठारहवीं कांग्रेस के उनके भाषण का जिक्र हुआ है जिसमें उन्होंने समाजवाद के दूसरे चरण की धारणा प्रस्तुत की और समाजवादी राज्य के ढांचों की सापेक्षिक परिपक्वता और स्थिरता का उल्लेख किया । उस समय प्रशासन के विभिन्न अंग समाज के भीतर अधिकाधिक अवस्थित थे ।

इसके बाद उत्तरी कोरिया को देखने की वजह बताते हुए लेखक ने उसकी सबसे अधिक स्थिरता का जिक्र किया है । साथ ही पश्चिमी देशों में उसका सबसे अधिक मजाक उड़ाने और गलतबयानी का भी लेखक ने उल्लेख किया है । इसलिए उनका कहना है कि बाहरी आलोचकों के मुकाबले उस देश को जानने वालों पर भरोसा करना चाहिए । कोरियाई स्रोतों के अतिरिक्त लेखक ने खुद भी उस देश का गहराई से अध्ययन किया है । इनके आधार पर उनका कहना है कि प्रशासन और सिद्धांत के मामले में उत्तरी कोरिया अन्य सभी समाजवादी देशों के समान होते हुए भी कोरियाई शैली की निरंतरता पर विशेष बल देता है । उसके शासन के ढांचों की उत्पत्ति के इतिहास की जानकारी देने के साथ उनके व्यावहारिक संचालन का विस्तार से जिक्र किया गया है । इसका महत्वपूर्ण अंग चुनावी लोकतंत्र है । इन चुनावों का रिश्ता दो संस्थाओं से है । पीपुल्स असेम्बली और पितृभूमि के पुन:एकीककरण हेतु लोकतांत्रिक मोर्चा । इस मोर्चे में सभी राजनीतिक पार्टियों, जन संगठनों और धार्मिक समूहों के लोग शामिल हैं और इसमें चुनाव के लिए विविध प्रत्याशी खड़े होते हैं, उनके बारे में चर्चा होती है और उनका निर्वाचन होता है । इसके बाद पीपुल्स असेम्बली के लिए प्रस्तावित प्रत्याशियों का चुनाव होता है जिसमें सर्वोच्च असेम्बली का चुनाव भी शामिल है । यही असेम्बली देश की सबसे ऊपरी विधायिका है । इसके अलावे सलाह मशविरे वाला लोकतंत्र है जिसमें जनता के साथ शासन का आंगिक जुड़ाव होता है । खेती और उद्योग में भी इस तरह की ही पद्धति अपनायी जाती है । सामूहिक खेती और औद्योगिक कार्यस्थल पर समस्याओं को हल करने और व्यावहारिक योजना बनाने के बारे में विचार विमर्श होता है । इनके जरिए ही पार्टी कमेटियों और योजना आयोगों के फैसलों को लागू किया जाता है । इस प्रक्रिया में ये फैसले जनता के अपने फैसले हो जाते हैं । वैचारिक नेतृत्व वर्कर्स पार्टी आफ़ कोरिया का होता है । देश का मुखिया स्टेट अफ़ेयर्स कमीशन का अध्यक्ष होता है लेकिन सर्वोच्च असेम्बली का नहीं । यह कमीशन कोरिया के समाजवादी लोकतंत्र की समूची व्यवस्था का अंग होता है । यह कमीशन सर्वोच्च असेम्बली के प्रति जवाबदेह होता है । इस तरह यह कमीशन न केवल जवाबदेह बनाया जाता है बल्कि वर्कर्स पार्टी का नेतृत्व मजबूत कानूनी प्रक्रिया के जरिए स्थापित होता है । इसके पीछे के सिद्धांत में जूझे की धारणा का भारी महत्व है । इसका अर्थ जनता की प्राथमिकता है । क्रांतिकारी निर्माण, स्वतंत्रता और आत्म निर्भरता के संघर्ष के जरिए जनता अपनी नियति की मालिक बनती है । इसके साथ ही 1990 दशक की चुनौती के समक्ष सेना को प्रधान क्रांतिकारी शक्ति की मान्यता पैदा हुई जो आर्थिक उन्नति और संप्रभुता की रक्षा के लिए जिम्मेदार है । तीसरा महत्वपूर्ण तत्व जनता की सृजनात्मकता को मुक्त करने से जुड़ा है । इसका मकसद उनकी दैनिक जिंदगी में सुधार लाना भी है । कोशिश समाज और शासन के सभी स्तरों पर विचार और व्यवहार के बीच सामंजस्य ले आना है ।

इसके बाद लेखक ने चीन की समाजवादी व्यवस्था का जायजा लिया है । उन्नीसवीं सदी के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के साथ चीन में समाजवादी लोकतंत्र की धारणा शुरू होती है, माओ की नव जनवाद की धारणा से उसे परिपक्वता मिलती है । फिर लोकतांत्रिक तानाशाही और लोकतांत्रिक केंद्रीयता में उसके घटक तैयार होते हैं । लेखक ने 2012 की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की अठारहवीं कांग्रेस में समाजवादी लोकतंत्र को विकसित करने के संकल्प पर जोर दिया है और वर्तमान कार्यभार को समझने की कोशिश की है । इसमें जनता की इच्छा, कानून का शासन और कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व आपस में अविभाज्य घटक की तरह काम करते नजर आते हैं । इन तीनों में जनता की इच्छा को समाजवादी संदर्भ में लोकतांत्रिक निरीक्षण की व्यवस्था की तरह समझा गया है । इसके तहत ही जनता को देश का मालिक घोषित किया गया है । कानून के शासन की समाजवादी पृष्ठभूमि को लेखक ने स्पष्ट किया है और इसे संविधान की मजबूती तथा लगातार बदलती व्यवस्थित कानूनी ढांचे से जोड़ा है । समाजवादी कानून व्यवस्था के लिए अच्छे कानून जरूरी समझे जाते हैं । तीसरे तत्व कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के बिना समाजवादी लोकतंत्र सम्भव नहीं माना जाता । कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए कानून का शासन स्थापित होता है और इसके जरिए ही पार्टी के प्रस्ताव जनता की इच्छा में ढल जाते हैं । लोकतांत्रिक केंद्रीयता को समूचे देश के शासन की धारणा के बतौर विकसित किया गया है । इस तरह कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व और जनता की इच्छा के बीच कानूनी प्रक्रियाओं की मध्यस्थता शासन को समाज से जोड़ती है ।