Friday, September 25, 2026

जीवन चक्र में टूटन

 

2026 में मंथली रिव्यू प्रेस से इयान आंगुस की किताब ‘मेटाबोलिक रिफ़्ट्स: कैपिटलिज्म’स एसाल्ट आन द अर्थ सिस्टम’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि धरती के समूचे तंत्र का विकास लम्बे समय में हुआ है और इसमें समुद्र, मिट्टी और वातावरण की भौतिक सामग्री और ऊर्जा की गति को नियंत्रित करने वाले अनेक चक्रों ने अपनी भूमिका निभायी है । इसमें सजीव तत्वों ने प्रत्येक चरण में महत्वपूर्ण कर्तव्य का पालन किया है । जब भी इसमें व्यवधान आया तो जीवों को अनूकूलन करना पड़ा । जिनके लिए बदलाव बड़े और तेज थे वे अनुकूलन नहीं कर सके और समाप्त हो गये । उदाहरण के लिए लाखों साल पहले ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण जब हवा में कार्बन डाइ आक्साइड बेतरह बढ़ गया और तापमान भी दोगुना हो गया तो धरती का 96 फ़ीसद जीवन नष्ट हो गया था ।

लगभग बारह हजार साल पहले हुए जलवायु परिवर्तन के कारण शिकारी संग्राहकों की छोटी छोटी टोलियों में रहने वाले प्राणियों को मौका मिला और उन्होंने कुछ स्थिर मौसम वाले इलाकों में खेती की शुरुआत की । इसके बाद बड़े और स्थायी समाजों का निर्माण हुआ जिसके चलते उन्हें स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक माहौल में दबदबा कायम करने का मौका मिला । इसके बाद आंगुस सीधे पूंजीवाद पर आते हैं । इसमें भी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जीवाश्म ईंधन की ताकत से उसके विस्तार ने पर्यावरण पर मनुष्य के दबदबे को खासी तेजी दे दी । इसके कारण धरती पर जीवन के समर्थन की व्यवस्था अभूतपूर्व रूप से कमजोर पड़ने लगी । आज गरमी, आग, बाढ़ और प्रदूषण संबंधी जो भी समस्या नजर आती है वह धरती के दीर्घकालीन संकट की शुरुआत भर है । अगर बुनियादी बदलाव नहीं किये गये तो भविष्य की तबाही इससे कई गुना भयंकर होगी ।

1861 में मार्क्स ने लिखा कि डार्विन का विकास सिद्धांत मानव इतिहास के प्राकृतिक आयाम का आधार मुहैया कराता है । कुछ वर्ष बाद जब उन्होंने अर्थशास्त्र पर शोध शुरू किया तो लिखा कि मिट्टी के उपजाऊपन में गिरावट संबंधी जर्मन कृषि रसायनज्ञ का शोध सभी अर्थशास्त्रियों से अधिक महत्व का है । कहा जा सकता है कि प्रकृति से मनुष्य के अलगाव के बारे में मार्क्स के विचारों का आधार उक्त शोध था । इससे ही मार्क्सवादी पारिस्थितिकी और इकोसमाजवाद की आधारभूमि बनायी जा सकती है । इससे बीसेक साल पहले ही मार्क्स और एंगेल्स ने अपने भौतिकवादी दर्शन का खाका तैयार कर लिया था जिसके मुताबिक जीने के लिए मनुष्य को आस पास से भोजन, हवा, पानी और अन्य जरूरी चीजों को हासिल करना होता है । मार्क्स ने कहा कि प्रकृति मनुष्य का अजैविक शरीर है । वह ऐसा आवश्यक अंग है जो हमारे जैविकीय अंगों से अलग है । अगर मनुष्य को जीवित रहना है तो उसे प्रकृति के साथ निरंतर का संवाद कायम करना होगा । उस समय तक मार्क्स चयापचय से अनजान थे लेकिन भूतद्रव्य और ऊर्जा के निरंतर प्रवाह के बारे में तो गंभीरता से सोचना शुरू कर ही दिया था जिससे धरती पर जीवन सम्भव होता है । समाज और प्रकृति के आपसी रिश्तों के बारे में उनकी समझ में यही धारणा केंद्रीय भूमिका निभाती है । पूंजीवाद द्वारा इसी रिश्ते पर हमले को वे देख पा रहे थे । 

कभी कभी शरीर में ऐसी बीमारी हो जाती है जिसमें शरीर के अंग ही शरीर पर हमला कर देते हैं उसी तरह पूंजीवाद भी प्रकृति का हिस्सा होने के बावजूद उस पर हमला करता है । धरती पर जीवन की समर्थक व्यवस्था पर निर्भर होने के बावजूद वह इसे नष्ट करता है । जीवन चक्र में टूटन का यही सिद्धांत मार्क्स ने विकसित किया जिसमें मुनाफ़े और वृद्धि पर केंद्रित पूंजीवादी व्यवस्था धरती पर जीवन चलाने वाले प्राकृतिक चक्र में व्यवधान डालती है । हाल फिलहाल तक पर्यावरण के बारे में सोचने और लिखने वाले मानते थे कि मार्क्स ने प्रकृति के बारे में कुछ खास नहीं कहा है इसलिए वर्तमान पर्यावरणिक सरोकारों के लिहाज से उनका लेखन प्रासंगिक नहीं है । इस मान्यता पर 2000 में छपी जान बेलामी फ़ास्टर की किताब ने सवाल उठाया । तबसे ही पर्यावरण की समस्या पर मार्क्स की गवेषणा पर बातचीत शुरू हुई और इसी क्रम में जीवन चक्र में टूटन की धारणा सामने आयी ।

किताब के पहले अध्याय में पारिस्थितिकी के चिंतक के बतौर मार्क्स और एंगेल्स की उपयोगिता स्पष्ट की गयी है । साथ ही मार्क्सवाद को इस प्रसंग में खारिज करने वालों से बहस की गयी है । अन्य लेखकों ने भी यह काम पहले किया है । लेखक का जोर तो मार्क्सवादी इकोसमाजवाद के वैज्ञानिक आधार को जाहिर करने पर है । उन्होंने धरती पर जीवन को सम्भव बनाने वाले दो सबसे महत्व के तत्वों पर पूंजीवादी हमले पर अधिक बल दिया है । लेखक ने इसके बतौर कार्बन और नाइट्रोजन के चक्र का नाम लिया है । पहले भी उन्होंने लिखा था कि इकोसमाजवाद की सफलता के लिए उसे बेहतर दुनिया की पवित्र आकांक्षा से अधिक होना होगा । उसे सृष्टि के जन्म और विकास तथा बदलाव और मंजिल की ठोस वैज्ञानिक समझ पर आधारित होना होगा । समाजवाद के निर्माण का तरीका और उसका स्वरूप इस बात से तय होगा कि उसे किस तरह की धरती पर खड़ा किया जा रहा है । अगर हमारे कार्यक्रम और गतिविधि का वैज्ञानिक आधार नहीं होगा तो दुनिया बदलने की हमारी सारी कोशिश व्यर्थ हो जाएगी ।

किताब के चार हिस्से हैं । पहले हिस्से में जीवन चक्र में टूटन संबंधी सिद्धांत का विकास बताया गया है । इसे लेखक ने मार्क्सवादी पारिस्थितिकी भी कहा है । इसके तहत शुरू के तीन अध्यायों में मार्क्स और एंगेल्स के विचारों पर चर्चा के उपरांत ऐसे तीन अचर्चित समाजवादियों के विचारों की छानबीन की गयी है जो इस क्षेत्र में आगे का काम करते हैं । तीसरे अध्याय में बताया गया है कि दशकों तक इस पहलू की उपेक्षा के बाद हमारी वर्तमान सदी में मार्क्सवादी पारिस्थितिकी के पुनरुत्थान में इन विचारों की केंद्रीय भूमिका हो गयी है ।    

दूसरे हिस्से में धरती की चयापचयिक व्यवस्था की परीक्षा प्राकृतिक विज्ञानों के परिप्रेक्ष्य से की गयी है । इसके तहत उन क्रांतिकारी बदलावों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी का जायजा लिया गया है जिनके कारण लाखों वर्षों में जैविकीय आवरण की रचना हुई । इसके बाद धरती की प्रणाली को समझाने में जिन वैज्ञानिकों का योगदान है उनकी चर्चा की गयी है । इसके बाद उन बहुतेरे टूटनों का जिक्र किया गया है जिनके कारण धरती की समूची व्यवस्था में मनुष्य के निर्णायक हस्तक्षेप का नया युग शुरू हो चुका है । मानव निर्मित होने के कारण इस युग को वैज्ञानिकों ने एन्थ्रोपोसीन का नाम दिया है ।

अगला हिस्सा पूंजी बनाम धरती का है जिसके तहत इनके आपसी टकरावों को देखा गया है । असल में बड़े वैश्विक संकटों के पीछे दो सबसे महत्वपूर्ण चयापचयिक चक्र हैं । पूंजीवाद की विशेषता यही है कि वह प्राकृतिक दुनिया से लगातार टकराव में रहता है । कार्बन के चक्र की परीक्षा से पता चलता है कि इसमें व्यवधान से धरती का तापमान बढ़ रहा है । इसी तरह औद्योगिक उत्पादन ने नाइट्रोजन के चक्र को बाधित किया है जिससे खेती की व्यवस्था गड़बड़ा गयी है और सारी दुनिया में मिट्टी खराब हो रही है । इन दोनों के संयुक्त प्रभाव से समुद्र में संकट पैदा हो रहा है ।

आखिरी हिस्से में धरती पर जीवन को बचाए रखने की व्यवस्था की निरंतरता की सम्भावना का विवेचन किया गया है । लगता है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोक देने के बावजूद विपत्तिकारक बदलाव रुकने वाले नहीं हैं । सबसे अंत में वैश्विक विध्वंस से बचने के लिए कारगर आंदोलन की जरूरत और सम्भावना पर जोर दिया गया है । अंत के तीन परिशिष्टों में बताया गया है कि अनुवाद की समस्या ने पारिस्थितिकी संबंधी मार्क्स के विचारों को उभरने नहीं दिया । इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक संगठन एन्थ्रोपोसीन को मान्यता देने में हिचकते रहे । कार्बन डाइ आक्साइड को कम करने की जिन तकनीकों को समाधान के बतौर प्रस्तुत किया जा रहा है उनसे इस जलवायु को बचाना सम्भव नहीं नजर आता । लेखक ने आश्वासन दिया है कि उनकी आगामी किताब में धरती की वर्तमान प्रणाली पर पूंजीवाद के वैश्विक हमले की छानबीन करके प्राणलेवा महामारी की नयी लहर लाने में उसकी भूमिका को उजागर किया जाएगा । साथ ही उसमें हम सबके लिए जीवनदायक हवा और पानी में जहर घोलने में उसकी जिम्मेदारी का भी उद्घाटन किया जाएगा ।

Friday, August 7, 2026

चेखव से अनुराग

 

          

                     

(पुस्तक वार्ता के संपादक भारत भारद्वाज ने किताब के बारे में लिखने को कहा तो जो लिखा उसे 2009 के मार्च-अप्रैल अंक में जगह मिली थी । उसका ही थोड़ा संशोधित रूप पेश है ।)

गाजीपुर जिले के सुल्तानपुर गांव की मेरी दुनिया में दो लोग रोशनी लेकर आते थे- मेरे बड़े भाई अवधेश प्रधान तब काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ रहे थे और गांव पर रखी उनकी पत्रिकाओं का ढेर मेरी पढ़ने की भूख  मिटाता था तथा दूसरे थे चचेरे भाई आनंद प्रधान जो पिता के साथ पतरातू रहते थे, हजारीबाग में पढ़ते थे और जब भी गांव आते तो अपने साथ हिंदी की ढेर सारी नयी पत्रिकाएं लेकर आते । इन्हीं लोगों के जरिए मेरे जीवन में चेखव का प्रवेश हुआ । ‘एक क्लर्क की मौत’ की आखिरी पंक्तियों की खूबसूरती और तांगेवाले का अपने घोड़े के गले लिपटकर अपना दुख बताने की मजबूरी मेरे बालमन को भिगो देती । दसवीं कक्षा उत्तीर्ण होने के बाद आगे पढ़ने बनारस आ गया ।

बीसवीं सदी का अस्सी का वह दशक हिंदी क्षेत्र के सांस्कृतिक आंदोलन में वामपंथ की गैर संसदीय जुझारू धारा के उत्थान का समय था । बिहार के किसानों की सभाओं में गोरख पांडे के साथ लाखों लोग ‘हिलेले झकझोर दुनिया’ गाते । बनारस में ‘अभियान’ नामक नुक्कड़ नाटक की टीम बनी । नाटक करना सिखाने के लिए दिल्ली से शम्सुल इस्लाम आये थे । हमारी नाटक टीम में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यापक रामनारायण शुक्ल और अनेक विद्यार्थी थे । तब की अनेक मित्रताएं अब भी बनी हुई हैं । टीम का एक पसंदीदा नाटक चेखव की कहानी ‘गिरगिट’ के आधार पर तैयार किया गया था । कमसिन होने के कारण मैं इसमें कुत्ते की भूमिका निभाता था । पुलिसिया नौकरशाही के आतंक को मारक व्यंग्य के जरिए चेखोवियन हास्य के साथ इसमें जिस तरह तहस नहस किया गया है, वह अपने आप में मिसाल है ।

कुलवक्ती क्रांतिकारी राजनीति का फैसला किया तो पूर्वाभ्यास के बतौर लम्बे अरसे के लिए गांव आया । गांव में भाकपा-माले के कार्यकर्ताओं का आना-जाना शुरू हो चुका था । पिछड़ी जातियों और ब्राह्मण परिवारों के कई नौजवान उनके साथ थे । इन्हीं नौजवानों को लेकर नाटक टीम बनायी गयी । टीम के पास क्रांतिकारी गीत थे और था ‘गिरगिट’ नाटक । गांव के पारम्परिक शक्ति केंद्रों को यह पहल नागवार गुजरी । उन्होंने हमारे दल का उपहास करते हुए इसे गिरगिट पार्टी कहना शुरू किया । वे दिन भी क्या दिन थे ! कोटवां-नरायनपुर में सामंतों और पुलिस के भय से एक भी आदमी नाटक देखने नहीं आया लेकिन नाटक खत्म हो जाने के बाद दलितों की बस्ती में शानदार दावत हुई । बरेसर में नाटक के व्यंग्य से चिढ़कर एक सिपाही ने थप्पड़ मारा । बाराचवर में अंबेडकर जयंती पर कार्यक्रम के बाद रात के अंधेरे में छिपकर दलित जाति का एक इंसपेक्टर हमसे मिलने आया । मुहम्मदाबाद में बस से उतरते हुए एक दलित नर्तक ने हाथ मिलाते हुए दो रुपए का सिक्का मुट्ठी में रहने दिया । राजनीति और सांस्कृतिक सक्रियता का मेल कराने का माध्यम चेखव बनते रहे ।

गांव में भूमिहार जाति के सामंतों का दबदबा था । उन्होंने रामलीला में अभिनय के लिए टीम के साथियों पर दबाव बनाना शुरू किया । रामलीला में जो नाटक होते उनमें निम्न कहाने वाली जातियों के लड़कों को स्त्रियों की या गौण पात्रों की भूमिका निभानी होती । इसी वजह से उनमें भाग लेने का सवाल मूल्यों की लड़ाई बन गया । बड़ी तनातनी हुई । बहरहाल वह दौर उत्तर प्रदेश में पुलिस बल को अबाध शक्ति देकर समाज को कथित तौर पर‘अपराधमुक्त’कराने की दीर्घकालीन राजनीति की शुरुआत का था । भारी पैमाने पर फ़र्ज़ी मुठभेड़ हो रही थी । लिहाजा हमारा नाटक और पुलिस की मनमानी का विरोध करने वाली नागरिक समाज की ऐसी ही कुछ गतिविधियां प्रशासन के लिए सिरदर्द बनने लगीं । तीन थानों की पुलिस ने मिलकर औपन्यासिक कल्पना का परिचय देते हुए सात लोगों के साथ ऐसी मुठभेड़ की कथा लिखी जिसमें केवल एक व्यक्ति पकड़ा गया, शेष सभी भाग गये थे । सालों की मुकदमेबाजी के बाद सभी निर्दोष साबित हुए लेकिन टीम बिखर गयी । जिंदगी की भागमभाग में चेखव का साथ लम्बे समय के लिए छूट गया । कभी कहीं कोई मौका मिला तो कुछ देख सुन लिया । इस बीच चेखव की दुनिया गायब नहीं हुई । वह दोमुंहे बौद्धिकों और बेलगाम तथा हास्यास्पद नौकरशाहों की मार्फ़त बार बार उपस्थित होती रही ।

अध्यापकीय जीवन की शुरुआत काफ़्काई तरीके से हुई । जिस कालेज में नियुक्ति का आदेश उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग ने थमाया वहां पहुंचने के लिए कस्बे में उतरा तो किसी को पता नहीं था कि वह है कहां । किसी एक व्यक्ति ने बताया कि मंडी समिति जाइए । वहां पता लगा कि कल ही वह इंटर कालेज के बगल में चला गया है । वहां गये तो एक इमारत में ताला लगा था । प्रिंसिपल और क्लर्क का इंतजार सामने की चाय दुकान में बैठकर किया । प्रिंसिपल किसी अन्य कालेज से सेवानिवृत्त होकर जनसेवा करने आये थे । क्लर्क स्थानीय चीनी मिल में कर्मचारी थे । नियुक्ति जिलाधिकारी के कार्यालय में होनी थी । कालेज को सरकारी अनुदान नहीं मिला था इसलिए वेतन का भुगतान चीनी मिल से होना था । इस तरह वह कालेज था और नहीं भी था । हम अध्यापक थे और नहीं भी थे । हमें वेतन मिलता था और नहीं भी मिलता था । ऐसी अजीब दुनिया में पुराने मित्र आलोक श्रीवास्तव आये और वर्जीनिया वुल्फ़ की किताब ‘ए रूम आफ़ वन’स ओन’अनुवाद हेतु दे गये । उसके प्रकाशन के बाद चेखव की जीवनी लिखने का प्रस्ताव किया तो पुरानी मुहब्बत याद आ गयी और उत्साहपूर्वक झट से राजी हो गया । उनमें व्यावसायिक धूर्तता कम महसूस हुई ।

इस बात का जिक्र जानबूझकर कर रहा हूं । रामविलास शर्मा ने निराला के प्रकाशकों पर व्यंग्य करते हुए लिखा कि निराला की किताबें बिकती नहीं थीं लेकिन उनके प्रकाशकों की कोठियां खड़ी हो जाती थीं । हिंदी के अधिकांश प्रकाशक कोशिश करते हैं कि किताबों के सर्वाधिकार उनके पास सुरक्षित रहें ताकि लेखक कहीं और से दुबारा छपा न सके । इसके सहारे वे पाठकों से मूल्य तो अधिक वसूलते हैं लेकिन अपने मुनाफ़े से लेखक अथवा अनुवादक को बढ़ा हुआ मेहनताना नहीं देते । इसके विपरीत आलोक ने बिस्सोवा शिम्बोर्स्का की कविताओं के अनुवाद का सर्वाधिकार अनुवादक को दिया था । तकरीबन अंग्रेजी स्रोतों का सहारा लेकर लिखी जीवनियों का भी सर्वाधिकार उन्होंने लेखकों को दिया था । इन्हीं कारणों से राजी हुआ तो उन्होंने आठ सौ पृष्ठों की अंग्रेजी में लिखी चेखव की एक जीवनी की फोटोप्रति सौंपी । हंस में लीदिया एविलोवा के संस्मरणों का हिंदी अनुवाद पढ़ चुका था । आलोक की दी हुई जीवनी पढ़कर चेखव की दूसरी छवि मन में बनी । शंका समाधान के लिए कुछ और सामग्री खोजी । संयोग से कृष्णमोहन सिंह के पास प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मास्को से छपी‘अंतोन चेखव ऐंड हिज टाइम्स’अंग्रेजी में मिल गयी । उदारता के साथ उन्होंने दे दी । अब भी वह पास रखी है । पुरानी दोस्त शुभ्रा नगालिया रूसी भाषा की जानकार हैं इसलिए उनसे भी बहुत सारे मुद्दों पर सलाह मशविरा किया । नाटककार राजेश कुमार तब शाहजहांपुर में थे । उनसे चेखव के नाटकों का संग्रह मिला जिसकी भूमिका राजेंद्र यादव ने लिखी थी । उनकी किताब‘एक काल्पनिक इंटरव्यू’की सूचना अवधेश प्रधान ने दी । राजेंद्र यादव को पत्र लिखा तो तत्काल जवाब देकर उन्होंने अपनी उन किताबों के नाम बताये जिनमें चेखव पर उनका लिखा संग्रहित था । पुस्तक मेले से ये किताबें लीं । कथाकार हृदयेश ने कहानियों का संग्रह उपलब्ध कराया । आलोक ने पुष्पा भारती की पुस्तक‘शुभागता’में से चेखव वाला अंश भेजा । इतनी तैयारी के बाद लिखना शुरू किया तो पारिवारिक समस्याओं ने आ घेरा ।

ये नितांत व्यक्तिगत थीं लेकिन इनके कारण दो बार लिखना स्थगित करना पड़ा । कालेज से मुक्ति मिली तो दूसरी झंझट में जा पड़ा । महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने कालेज से आजाद तो किया लेकिन कोई राहत नहीं मिली । लाभ यह रहा कि मुम्बई आकर आलोक से मिला और पहला मसौदा दिखाया । दोनों को यह संतोषजनक नहीं लगा । गोर्की और ओल्गा के संस्मरणों का अनुवाद किया । इनसे चेखव के जीवन के बारे में मेरी धारणा पुष्ट हुई । चेखव की चिट्ठियों के बारे में निर्मल वर्मा का लेख देखा । मसौदे में थोड़ा संशोधन किया लेकिन तब तक वर्धा से विदाई की नौबत आ गयी ।

लौटकर दिल्ली आया तो शुरू में व्यस्तता रही । बाद में इग्नू में सलाहकार का रोजगार मिला तो कुछ राहत मिली । फिर एकाध अध्याय लिखे तब तक सिलचर जाने का बानक बन गया । स्थिर होकर पूरी पांडुलिपि देख गया । लिखना पूरा किया । आलोक ने टंकित प्रति भेजी । उसे अवधेश प्रधान को दिखाया । पढ़कर अनेक संशोधन उन्होंने खुद किये और सुधार के अनेक सुझाव दिये । साथ ही तोलस्तोय की जीवनी लिखने का भी परामर्श दिया जो दिमाग में अटका हुआ है ।

चेखव पर हिंदी में जो भी सामग्री मिली उसमें उनके जीवन को अत्यंत रंगीन बनाकर पेश किया गया था । मेरी धारणा अलग किस्म की थी । समयांतर में लीदिया एविलोवा के संस्मरण की एक समीक्षा शायद मस्तराम कपूर ने लिखी थी । उससे बहुत बल मिला । राजेंद्र यादव और पुष्पा भारती ने चेखव की जो चटपटी तस्वीर बनायी है उसका आधार लीदिया के ये संस्मरण ही हैं । इनसे समाज की चीरफाड़ करने वाली  चेखव की पारगामी नजर पाठक के सामने से ओझल हो जाती है । चेखव की सामाजिक आलोचना को अनदेखा करने की यह कोशिश नयी कहानी के दृष्टिकोण के मेल में थी । नयी कहानी ने समस्याओं को यौन कुंठा के इर्द गिर्द सीमित किया था । इसी किस्म का नजरिया चेखव के सिलसिले में भी अपनाया गया । इसके विपरीत चेखव के रूसी जीवनी लेखक लीदिया के संस्मरणों पर बहुत भरोसा नहीं करते । उनके सामने तोलस्तोय और गोर्की की ऊंचाई के कथाकार को समझने की चुनौती होती है । चेखव के समय के रूस मे नौकरशाही का उदय हो रहा था और उसमें अभिव्यक्त बुर्जुआ संस्कृति का पतन सबको प्रत्यक्ष था ।  चेखव के मारक व्यंग्य ने इसके भारी भरकम आवरण को चीरकर उसके छद्म को उजागर कर दिया था । इसीलिए महज कहानियां लिखकर भी उन्होंने महान उपन्यासकारों जैसा सम्मान और यश अर्जित किया था । उनकी जीवनी लिखने के लिए सबसे पहले उनकी इस छैला छवि से मुक्त होना जरूरी था ।

माशा और ओल्गा संबंधी उलझनों को समझने के लिए स्त्रियों की सहजबुद्धि पर भरोसा किया । इसमें सबसे अधिक सहायता पत्नी से मिली । हिंदी के अकादमिक जगत में संदर्भ सूची को बहुत ही पवित्र नजर से देखा जाता है । निकृष्ट लेखन को भी उससे गरिमा प्राप्त हो जाती है । इसके कारण शोध और सृजन एक दूसरे से अलग ही नहीं विरोधी भी बना दिये जाते हैं । इससे हिंदी का ऐसा भारी नुकसान हुआ है कि‘महाकवि सरल: व्यक्तित्व और कृतित्व’जैसी पुस्तकें महत्व की होती जा रही हैं और उनके लेखक सम्मानित और पुरस्कृत होकर आदर्श बने घूम रहे हैं । शिक्षा और संस्कृति के विनाश में सत्ता की रुचि को इनसे खाद पानी मिल रहा है । ‘निराला की साहित्य साधना’में कोई संदर्भसूची नहीं होने से उसे महत्वहीन समझने वाले विवेक को क्या ही कहा जा सकता है । संदर्भ सूची न होने के कारण ही त्रिपुरा के कुलपति ने इसे मामूली कहने की योग्यता भी दिखायी थी ।   

प्रकाशकों में व्यावसायिक धूर्तता का अभाव दुर्लभ होता जा रहा है । सर्वाधिकार की व्यवस्था ने लेखकों को बहुत लाभ नहीं पहुंचाया, प्रकाशक अलबत्ता धन्नासेठ बन बैठे । वे प्रकाशित और बिकी प्रतियों की मनमानी संख्या बताकर लेखक को नाममात्र की रायल्टी देते हैं । कई तो सर्वाधिकार भी लेखक को नहीं देते । भय होता होगा कि सनक में आकर लेखक किताबों को कापीराइट से मुक्त न कर दे । होना तो यह चाहिए कि अनुवाद पर भी अनुवादक का अधिकार हो क्योंकि उस विशेष रूप में वह अनुवादक की रचना है । शमशेर जी को जिन चीजों का अभाव खला था वे इतनी आसानी से सुलभ नहीं होनी ।                           

                                

Tuesday, July 14, 2026

क्रांतियों की दुनिया

 


2026 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से आर्तुरो चांग की किताब ‘ए न्यू वर्ल्ड आफ़ रेवोल्यूशंस: पापुलर इमैजिनेशंस ऐंड मूवमेंट्स एक्रास द अमेरिकाज’ का प्रकाशन हुआ । लेखक बचपन में आप्रवासी के बतौर अमेरिका आये थे । शिकागो में मेक्सिको के प्रवासी के रूप में बड़े हुए । उनका कहना है कि अमेरिका में पहचान स्थिर नहीं है । इसके बनने में गति, यातायात, अनुवाद और बदलावों की भूमिका रहती है । अमेरिकी शब्द ही विवादग्रस्त है तथा उसके अर्थों के बीच साझा तत्व प्रवास, बसावट, विस्थापन, लगाव और राजनीतिक दुविधा हैं । यह विशेषता उन सभी स्थानों की होती है जहां आबादियों का मुखामुखम होता है । इस किताब में इसी नजरिए से विचार करते हुए अमेरिकी पहचानों, इतिहासों और संस्कृतियों के बारे में अलग और वैकल्पिक रुख पेश किया गया है । इसमें उन लोगों, स्थानों, आचरण, राजनीति और आकांक्षा को समझने का प्रयास है जिन्हें कभी अमेरिकी गोलार्ध की परम्परा से जुड़ा समझा जाता रहा है । संस्थागत अन्याय, दबदबा, विषमता और हाशियाकरण के अनुभव पर अमेरिकी चिंतन के विभिन्न आयामों का लेखा जोखा भी इसमें प्रस्तुत किया गया है । अमेरिकी राजनीति में जो सवाल आज भी छाये रहते हैं उनको देखने के लिए घुमंतू समुदाय और स्वप्नदर्शियों का चिंतन अब भी कारगर है । राजनीतिक जीवन के टकरावों के चलते जो बदलाव आये हैं उनका भी लेखा जोखा किताब में लिया गया है । जिन क्रांतिकारी आंदोलनों का अध्ययन इस किताब के विभिन्न अध्यायों में किया गया है उनके विचार, सपने और प्रस्ताव हम तक अनुवाद और संवाद की तरह आते हैं । उनके मूल में औपनिवेशिक शासन से उपजे नाना प्रकार के अनुभव हैं ।

लेखक ने 1770 से 1850 तक के समय को क्रांतियों का युग कहा है । लोकप्रिय विद्रोह का वह समय आज भी राजनीतिक महत्व के मामले में अतुलनीय है । लगभग अस्सी साल की अवधि में समूचे अमेरिकी महाद्वीप में तीस से अधिक प्रतिरोध आंदोलन सामने आये । कनाडा से लेकर अर्जेन्टिना तक औपनिवेशिक अधीनता और उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति की परीक्षा उन्होंने साझा अनुभवों के साथ की । हैती की क्रांति के एक नेता ने मुक्ति या मृत्यु का नारा देकर औपनिवेशिक प्रभुत्व की तकलीफ को स्वर दिया तथा उत्तर औपनिवेशिक प्रतिरोध को उसकी निरंतरता में देखा । इन्हीं अनुभवों के भीतर से वह गोलार्धीय पहचान पैदा हुई जिसे अमेरिका या अमेरिकी कहा जा सकता है । यह पहचान तमाम विजय, दखल, दोहन, गुलामी, कराधान, लैंगिक अधीनता, आर्थिक असुरक्षा और जबरिया श्रम के बावजूद इस इलाके के लोगों को आपस में जोड़ती है । क्रांति के युग की समाप्ति के समय इन तमाम आंदोलनों और उत्तर औपनिवेशिक अमेरिका के सपनों के बावजूद दर्जन भर राष्ट्र राज्य पैदा हो चुके थे । इस किताब में अमेरिकी गोलार्धीय पहचानों के उदय, प्रभाव और पराभव का विश्लेषण है । इसके साथ ही उत्तर औपनिवेशिक सपनों और आंदोलनों की भी जांच परख इसमें की गयी है । इनसे मिलकर क्रांति के युग की तस्वीर बनती है ।     

नयी दुनिया के ये लोकप्रिय उभार कोई अलग थलग घटनाक्रम नहीं थे । इनका गहरा रिश्ता साम्राज्यी सत्ता, राजनीतिक अर्थशास्त्र, सांस्कृतिक उत्पादन और प्राकृतिक विज्ञान की खोजों के सामाजिक असरात से था । साम्राज्यों, शासक वर्ग और औपनिवेशिक संस्थाओं के बीच और उनके विरोध में चल रही लड़ाई की वैश्विक परिघटना का भी अंग ये आंदोलन थे । उनमें फ़्रांसिसी क्रांति, ब्रिटेन की शाही सत्ता के विरुद्ध आयरलैंड का विद्रोह, ओटोमन साम्राज्य के विरुद्ध सर्बिया की क्रांति, स्पेन की बादशाहत का अंत, ग्रीस की आजादी का आंदोलन और 1830 दशक के दौरान बेल्जियम, पोलैंड, इटली, पुर्तगाल और स्विट्ज़रलैंड के विद्रोह तथा आखिरकार 1848 की यूरोप व्यापी क्रांतियों का नाम लेखक ने लिया है । वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो इन क्रांतियों पर औद्योगिक क्रांति, अमेरिका में गुलामी की आर्थिकी, एशिया का औपनिवेशिक दोहन तथा भारत, आस्ट्रेलिया और अफ़्रीका में औपनिवेशिक शासन के विरोध की हलचलों का भी असर था । किताब के केंद्र में अमेरिकी गोलार्ध में औपनिवेशिक सत्ता से छुटकारा पाकर बनने वाली पहचानें हैं लेकिन घटनाओं के और भी व्यापक संदर्भ में इन्हें विश्लेषित किया गया है ।

समूचे अमेरिकी गोलार्ध और व्यापक दुनिया की इन लोकप्रिय क्रांतियों की साझी पहचानों, समस्याओं और अनुभवों को इसलिए भी किनारे लगा दिया गया ताकि राष्ट्र राज्य की व्यवस्था के पक्ष में समूचे इतिहास की गति दिखायी जाए । आज की तारीख में आंदोलनों या लोगों की बातचीत के मुकाबले राष्ट्र राज्यों की बात करना अधिक सहज है । क्रांतियों के जिक्र में भी देश शामिल रहता है । हैती की क्रांति, मेक्सिको का स्वाधीनता संग्राम या संयुक्त राज्य होते हुए भी अमेरिकी क्रांति का ही जिक्र होता है । इस रुख में यह मान्यता निहित रहती है कि लोकप्रिय आंदोलनों का समाहार राष्ट्र राज्य के उदय और उसके प्रभाव की मजबूती में होता है । वे सभी समुदाय जो क्रांतिकारी आंदोलन में शरीक रहते हैं, उनके दावे और टकराव भी अगर उन्हें पूरी तरह मिटा देना सम्भव न हो तो किसी न किसी राष्ट्रीय इतिहास का अंग बना दिये जाते हैं । वैसे इसमें अचरज की कोई बात नहीं । राजनीति के सिद्धांतकार इतिहासों और वृत्तांतों को राष्ट्रीय प्राधिकार, संस्थान अथवा सत्ता को वैध ठहराने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं । किसी भी क्रांति का निर्णायक काम किसी बुनियाद की ऐतिहासिक स्मृति में सुरक्षित रख लिया जाता है । इससे राज्य की उम्र बढ़ जाती है और उसमें निहित क्रांतिकारी भावना भी दीर्घजीवी हो जाती है । क्रांतियों को बुनियाद और स्मारक में ढालने की इस प्रक्रिया में क्रांतिकारी भावना संविधान की प्रस्तावना तक सीमित रह जाती है । यह प्रस्तावना राष्ट्र राज्य की आगामी विश्व व्यवस्था और उसकी नियामक क्षमता का संकेतक हो जाती है ।

हाल के दिनों में राष्ट्र राज्य की इस बुनियादी व्यवस्था के विरोधाभासों पर बहुतेरे अध्ययन हुए हैं । लोगों का कहना है कि राष्ट्र राज्य की यह बुनियाद हमेशा अधूरी रहती है और उसके प्राधिकार की वैधता में लचीलेपन की वजह से उसको हमेशा चुनौती मिलती रहती है । उसकी बुनियाद की यह समस्या बाद में लोकप्रिय सम्प्रभुता के विरोधाभासों को जन्म देती है । इसके कारण बार बार सामूहिक सहमति की आभासी धारणा का निर्माण किया जाता है और लगातार यह क्रिया दोहरानी पड़ती है । इससे राज्य निर्माण में निहित विरोधाभासों पर सवाल उठते हैं  तथा लोकप्रिय सम्प्रभुता, प्रतिनिधित्व और सहमति की धारणाओं को प्रश्नांकित भी किया जाता है ।

असल में लोकप्रिय राजनीति और संस्थाओं को राज्य के उदय के साथ जोड़ दिया जाता रहा है । लेखक का सवाल है कि अगर हम संकट के समय किये जाने वाले अनेक प्रस्तावों में राज्य को भी तात्कालिक समाधान का एक रूप मानें तो ऊपर बतायी गयी धारणाओं और निष्कर्षों में क्या बदलाव आएगा । अगर संगठन की जमीन राष्ट्र की जगह गोलार्ध हो गयी तो लोकप्रिय सम्प्रभुता, प्रतिनिधित्व और सहमति के विरोधाभास किस तरह के नजर आएंगे । प्राधिकार और संप्रभुता रहेंगे लेकिन सम्भव है औपनिवेशिक अधीनता और उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति की दिशा में अपूर्ण और अस्थायी समाधान की तरह दिखायी देंगे । लेखक का दावा है कि अगर हमें राष्ट्रों के बनने के बहुत पहले लोगों, उनके आचरण, संस्कृति और राजनीतिक टकरावों को गोलार्धीय स्तर पर देखना है तो क्रांतियों के युग के प्राथमिक परिणाम के बतौर राष्ट्र राज्य के उदय की मान्यता से मुक्त होना होगा । इसके लिए लेखक ने अलग अलग इलाकों के विभिन्न आंदोलनों के बीच संपर्क का उद्घाटन किया है । उनका कहना है कि क्रांतियों के इस युग में गोलार्धीय राजनीति का उदय हुआ था । यह बात विरोध के सांस्कृतिक रूपों से साबित होती है जिन्होंने बाद में औपचारिक प्रस्तावों पर भी असर डाला । इसका केंद्र औपनिवेशिक अधीनता के विरुद्ध अमेरिकी मोर्चा बना । कविता, नाटक, प्रयाण गीत, पत्र व्यवहार, अखबार और दृश्य कलारूपों में इनको व्यक्त किया गया । उसके बाद संविधान, घोषणा, आदेश और परिपत्र जैसे राष्ट्र निर्माण के दस्तावेजों में इनका असर दिखा । इस परिघटना के ही कारण लेखक ने जब भी अमेरिकी चिंतन, राजनीति और इतिहास का जिक्र किया है तो उसका अर्थ अमेरिका में जन्म लेने वाले या अमेरिका की मुक्ति के साथ जुड़े प्रत्येक व्यक्ति से लिया गया है ।

लेखक का कहना है कि अमेरिकी की उत्तर औपनिवेशिक लोकप्रिय राजनीति के विकास में गोलार्धीय विमर्श और सांस्कृतिक उत्पादन का भारी योगदान रहा है । जब क्रांतिकारी आंदोलन खड़े हुए और उन्होंने औपनिवेशिक प्राधिकार को चुनौती देते हुए मांगे कीं तो अमेरिकी हालात, पहचान, इतिहास और राजनीति की विशेषता का उल्लेख करने में गोलार्धीय वृत्तांत का हवाला दिया और बाद की मुक्ति का विमर्श खड़ा करने में इससे मदद मिली । उन्होंने अपना राजनीतिक सपना भी स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिहाज से बुना । इस सिलसिले में लेखक के विश्लेषण से पता चलता है कि समूचे अमेरिका में गोलार्धीय विमर्श से उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति का अर्थ समझने और समूचे इलाके के विभिन्न समूहों को संगठित करने में मदद की । इन परियोजनाओं से उभरने वाले राजनीतिक प्रस्ताव राष्ट्र राज्य के पारम्परिक मानदंड पर नहीं समझे जा सकते ।

उनका यह भी कहना है कि अमेरिका के हाशिये के समुदायों के लिए गोलार्धीय राजनीति खासकर महत्व की रही है । कारण कि वे अन्य किसी तरह के आनुवंशिक या राजनीतिक प्राधिकार से परिचित नहीं रहे । मूलवासी, मिश्रित और अश्वेत समुदाय के लोगों ने अमेरिकी मुक्ति, एकता और प्रतिरोध की वह भाषा निर्मित की जो उपनिवेशित समाजों में साझा मोर्चा बनाने की राह हमवार करे । इसी क्रम में इन समूहों ने गोलार्धीय पहचान और सामुदायिकता की धारणा तैयार की जो उनके मुताबिक नयी दुनिया की आगामी राजनीति को आकार देगी । इन विमर्शों ने क्रांतिकारी सुधारों का रास्ता खोला । जाति के आधार पर कराधान की व्यवस्था खारिज की गयी, दासप्रथा का उन्मूलन हुआ, जमीन पर मूलवासियों के अधिकार को मान्यता मिली, चढ़ावा प्रथा का खात्मा हुआ, संपत्ति का पुनर्वितरण हुआ और जनता की संप्रभुता का विस्तार हुआ । इस गोलार्धीय राजनीति ने ऐसे समन्वय की गुंजाइश भी पैदा की जिसमें गोलबंदी, प्रतिरोध और दावेदारी के संयुक्त अभियान चलाये जा सके । राजनीतिक कल्पना के धरातल पर सामासिक गोलार्धीय सपने का जन्म हुआ जिसके साथ मूलवासी इतिहास, दासता का ज्ञानकांड, पर्यावरणिक दोहन की आलोचना और गणतांत्रिक राजनीति की परम्परा फलते फूलते रहे ।

अमेरिका में गोलार्धीय चिंतन का लोकप्रिय आयाम समारोही या प्रतीकात्मक ही नहीं है । गणतांत्रिक राजनीति को अपनाने और अपने मुताबिक ढालने में गोलार्धीय विमर्श की बुनियादी भूमिका रही है । इस इलाके की राजनीति में लोकप्रियता के तत्व ने गणतांत्रिकता की कुलीन और यूरोपीय परम्परा को खारिज करते हुए उसका लोकप्रिय अमेरिकी संस्करण तैयार किया । क्रांतिकारी आंदोलनों ने एक दूसरे से अपनी कोशिशों हेतु जिस तरह वैधता पानी चाही उसी तरह उन्होंने गणतांत्रिक शासन के अनुभव भी आपस में बांटे । इसके तहत नागरिक समानता, जनता की संप्रभुता, नागरिकता और भौतिक विषमता के क्षेत्र में नये प्रयोग किये गये । इन सभी मामलों में औपनिवेशिक अधीनता की सीमाओं को पार किया गया । लेखक का कहना है कि क्रांतियों के युग में हाशिए के समुदायों ने गणतांत्रिक राजनीतिक चिंतन को आकार देने और उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । उनके इस योगदान की अक्सर उपेक्षा की जाती रही है । इस सिलसिले में लेखक ने सिमोन बोलिवार, खोसे मार्ती और ड्यु बोइस जैसे लोगों का नाम लिया है जिन्होंने साम्राज्य, नस्ल , नागरिकता और अंतर्राष्ट्रीय विकास के सवाल पर मौलिक योगदान किया । इन नामों को पढ़ते हुए हमें राहुल सांकृत्यायन, धर्मानंद कोसाम्बी और आम्बेडकर की याद आती रही जिनके अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मौलिक योगदान को रेखांकित करना बचा है । लेखक ने गोलार्धीय अमेरिकी चिंतन के लोकप्रिय और देसी आयामों को अपने विश्लेषण के केंद्र में रखा है । जिन चिंतकों का नाम उन्होंने लिया वे गणतांत्रिकता और उत्तर औपनिवेशिक राजनीति को नये तरह के राजनीतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, कलात्मक और साहित्यिक रचनात्मकता के साथ आपस में जोड़ते हैं । इन सबने गणतांत्रिक राजनीतिक चिंतन को देसी राजनीति, कैथोलिक पहचान और नस्लभेद के उन्मूलन की परम्पराओं के साथ जोड़ा । उन्होंने यूरोपीय चिंतकों, परम्पराओं और आधुनिकता के साथ संवाद बनाते हुए भी यूरोपीय वर्चस्व को सिरे से खारिज किया । शेष औपनिवेशिक दुनिया की तरह ही गोलार्धीय अमेरिकी राजनीतिक चिंतन तमाम तरह के विरोधाभासी लेनदेन से भरा हुआ है । इसके ही कारण मुक्ति के उसके प्रस्ताव बेहद आकर्षक प्रतीत होते हैं ।

लेखक के मन में सवाल है कि अमेरिकी गोलार्ध में तमाम तरह के समूहों, व्यवहारों, संस्थानों और संस्कृतियों के होते हुए गोलार्धीय विश्लेषण कैसे सम्भव है । असल में क्रांतिकारी दौर में रहने वाले लोग भारी समाजार्थिक और राजनीतिक बदलावों का अनुभव करते हैं । इनके कारण साझा अमेरिकी अनुभव और देश से लगाव का विकास हुआ । आपस में घुले मिले इन कारकों ने अमेरिका के आर्थिक और राजनीतिक आजादी की चाहत का अवसर प्रदान किया । इससे ही अमेरिकावासियों के लोकप्रिय शासन की वैधता पैदा हुई । लगे लिपटे यूरोपीय देशों के अर्थतंत्र को कायम रखने के लिए अमेरिकी उत्पादों पर निर्भरता की आलोचना का भी जन्म हुआ । अमेरिकी गोलार्ध पर यूरोप की पकड़ को किसी एक घटना से समाप्त मानने की जगह लेखक ने इसे इन सभी कारकों का संचयी प्रभाव माना है ।

सबसे पहले उन्होंने स्पेन द्वारा अपने उपनिवेशों में उत्पादन को नियमित करने की मंशा से किये आर्थिक सुधारों का जिक्र किया है जिसने स्पेनी साम्राज्य को एक ही प्रशासनिक व्यवस्था के तहत ला दिया । इसने वाणिज्य, नस्ल, धर्म, जमीन और बौद्धिक उत्पादन को नियमित करना शुरू किया । इससे स्पेन को मजबूती के साथ कमजोरी भी मिली । स्पेन दूर था और उपनिवेशों का प्रशासन एक हद तक स्वायत्त तरीके से काम करता था इसलिए इन सुधारों ने गोलार्धीय एकता को जन्म दिया । अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज भरे पड़े हैं जिनमें केंद्र तथा उपनिवेश के बीच रिश्तों का बदलाव देखा जा सकता है । इनमें जनता के संगठित होने की गोलार्धीय प्रक्रिया के भी सबूत बिखरे पड़े हैं । इन सुधारों ने जनता पर भी असर डाला था क्योंकि केंद्र और उपनिवेश के बीच दोहन का नया रिश्ता बना था । इन सुधारों ने स्थानीय कुलीनों की ताकत कम कर दी क्योंकि केंद्र ने उपनिवेशों के शासन में सीधे दखल देना शुरू किया । पहले स्थानीय कुलीनों के पास राजनीतिक नियुक्ति, जमीन की खरीद बिक्री और कानूनों की व्याख्या के मामले में बहुत ताकत थी । सुधारों ने यह ताकत बादशाह के प्रतिनिधि को दे दी । दूसरी ओर इससे चर्च, मूलवासी मुखिया और आर्थिक संघों की भी ताकत घटी । ऐसी हालत में इन स्थानीय कुलीनों ने अपने हितों की रक्षा और औपनिवेशिक शासकों के अधिकारों पर बंदिश के लिए आम लोगों के साथ संवाद शुरू किया । इन सुधारों ने राजकीय निगरानी में भी इजाफ़ा किया और उसके जरिए अमेरिकी उत्पादन का नियमन और उसका केंद्रीय स्तर पर औपनिवेशिक दोहन आरम्भ हुआ । इससे पहले स्थानीय कुलीनों के पास उपनिवेशों में श्रमिकों के वितरण का अधिकार हुआ करता था । अब यह काम बादशाह के प्रतिनिधियों के हाथ आ गया । इससे उपनिवेशों के शहरी केंद्रों की आर्थिक ताकत कम हुई । दूसरी ओर कर संग्रह की प्रक्रिया संगठित हुई और कर देने वालों की संख्या तेजी से बढ़ायी गयी । इन सुधारों का क्षेत्र मुख्य रूप से आर्थिक था लेकिन कुछ सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव भी किये गये ताकि आबादी में बादशाह के प्रति श्रद्धा बढ़े । इसके लिए शिक्षा की व्यवस्था को बादशाह के प्रति निष्ठा का माध्यम बनाया गया । स्कूल की नयी व्यवस्था में मूलवासी समुदायों को प्रजा के बतौर फिर से ढाला गया और उनमे राजभक्ति को मजबूत किया गया । धार्मिक भावना को बादशाह के प्राधिकार का समर्थक बनाया गया । शिक्षा संबंधी ये नीतियां बहुत सफल तो नहीं हुईं लेकिन औपनिवेशिक शासन की वैधता के लिए पुनर्जागरण की भाषा का उपयोग विद्वानों द्वारा चिन्हित किया गया है । शासन ने जनता के निजी जीवन में दखल देना शुरू किया और उसके लिए लोक कल्याण की शब्दावली का प्रयोग किया गया । उपनिवेशों की प्रजा के लिए पहले इस तरह की धारणा नहीं इस्तेमाल की गयी थी । तब तो बादशाह का दैवी प्राधिकार ही स्पेनी शासन का औचित्य साबित करने के लिए काफी था । जनता संबंधी सोच और उसके कल्याण की बात धारणा के स्तर पर बदलाव का संकेतक है । केंद्र और उपनिवेश के बीच दोहन और ऊंचनीच के रिश्ते में बदलाव का तो कोई सवाल ही नहीं था लेकिन जनता के कल्याण की धारणा औपनिवेशिक शासन के कई कदमों के लिए बाधक बनने लगी । स्पेनी उपनिवेशों के ये बदलाव ब्रिटिश और फ़्रांसिसी उपनिवेशों के मेल में थे ।

इन सांस्थानिक सुधारों के जरिए औपनिवेशिक सत्ता का केंद्रीकरण हुआ जिसने अमेरिका के विकास को एकीकृत किया । इसी प्रक्रिया में लेखक ने अमेरिकी पहचानों के समूहीकरण का उदय भी देखा है । गोलार्धीय विमर्श को समझने में अगर इस औपनिवेशिक अतीत को गायब कर दिया जाए तो इस विमर्श का उदय पूरी तरह संयोग के अधीन नजर आने लगेगा । गोलार्धीय चिंतन का उदय उस समय हुआ जब औपनिवेशिक नियमन के सहारे यूरोपीय ताकतें अमेरिका को फिर से जीतना चाहती थीं और अमेरिकावासी इस प्रयास की प्रतिक्रिया में सामूहिक वृत्तांत की ताकत को खड़ा कर रहे थे । इसी दौरान इन औपनिवेशिक ताकतों में युद्ध के कारण फूट पड़ी । जल्दी ही निष्ठा बादशाह की जगह जनता के प्रति पैदा होने लगी । अमेरिका में नयी दुनिया के स्वायत्त अर्थतंत्र के लाभकर होने का तर्क जोर पकड़ने लगा । औपनिवेशिक सत्ता की वैधता में कमी, अमेरिकी शहरों के उदीयमान अर्थतंत्र के महत्व और युद्ध के कारण लोगों की निष्ठा को काबू में रखने में केंद्रीय शासन की अक्षमता ने औपनिवेशिक विमर्श को जमीन दी ।     

यूरोपीय उपनिवेशक देशों की अमेरिका पर जकड़बंदी में जो ढील आयी उसे संयुक्त राज्य और हैती की क्रांतियों ने काफी तेज कर दिया था । संयुक्त राज्य के नागरिकों ने अपनी क्रांतिकारी विरासत को गणतांत्रिक अमेरिका के रूप में देखा और इसलिए लैटिन अमेरिका की आजादी के उत्साही समर्थक हो गये । यह गोलार्धीय प्रतिबद्धता अनेक स्थानों और मौकों पर जाहिर हुई । इस चेतना की मुखर अभिव्यक्ति परिपत्रों, अखबारों और नाटकों में तो हुई ही मेक्सिको की आजादी की वजह से ढेर सारी गुप्त संस्थाओं का भी निर्माण हुआ । उनकी गणतांत्रिक भाषा को लेखक ने लोकप्रिय स्तर पर विकासमान परिघटना माना है । इसकी ताकत स्पेनी भाषी अमेरिका में प्रेस की आजादी के साथ बढ़ती चली गयी ।

लेखक का यह भी कहना है कि संयुक्त राज्य में ये गोलार्धीय विमर्श भावुक देशभक्ति और राष्ट्रवाद तक ही सीमित नहीं रहे । समूचे अमेरिका में इन्होंने मेलजोल और राजनीतिक संभावना का दरवाजा खोला । उदाहरण के लिए हैती की क्रांति ने गणतांत्रिकता के साथ नस्ली मुक्ति की राजनीति को मिला दिया । लगा कि अगर अश्वेत दास समुदाय फ़्रांसिसी औपनिवेशिक शासन को मिटा सकता है तो समूचे अमेरिका में दासता को समाप्त किया जा सकता है । इसी तरह संयुक्त राज्य और मेक्सिको की सीमा पर मूलवासी पहचानों की दावेदारी के कारण मूलवासियों के इलाकों पर औपनिवेशिक कब्जे के विरोध की आवाजें भी सुनायी देने लगीं । इंका संप्रभुता की नयी धारणा को भी गोलार्धीय विमर्श में लैटिन अमेरिका के विशेष योगदान की तरह लेखक ने पेश किया है । समूचे अमेरिका में उत्तर औपनिवेशिक गणतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के साथ गोलार्धीय विमर्श ने नयी राजनीतिक कल्पना और संभावना का भी दरवाजा खोला है ।       

उन्होंने क्रांतिकारी समय की गोलार्धीय पहचान, वृत्तांत और वक्तृता के सहारे अमेरिकी राजनीतिक चिंतन की परम्परा के घटक लोगों, संदर्भों, अभिलेखों और राजनीति को सवालों के घेरे में लिया है । इसमें अमेरिकी होने की पहचान का मुद्दा भी शामिल है । सबसे पहले तो अमेरिका एक भूगोल है जिसमें यूरोपीय शासन, ज्ञान के उत्पादन और आधुनिकता वाली प्रगति की धारणा का वर्चस्व है । इन सबका मतलब है कि नयी दुनिया गणतांत्रिक संस्थाओं के लिए उपयुक्त नहीं है । इसमें यह भी निहित है कि इस इलाके के लोग अपने आप पर शासन करने लायक नहीं हैं । अमेरिका और इसकी जनता की नवीनता पर अधिक जोर इन्हीं बातों को पुष्ट करता था । इसके बाद समूचे गोलार्ध के लोगों ने कहना शुरू किया कि नयी दुनिया की गैर पारम्परिक स्थितियां उसकी ताकत हैं । इस इलाके के लोग भविष्य की संस्थाओं, राजनीति और सिद्धांतों को जन्म देंगे जो आगामी युग की विश्व राजनीति को संगठित करेंगे । इसी अर्थ में लेखक उस समय के अमेरिकी राजनीतिक चिंतन को अमेरिकी राष्ट्र राज्य की पहचानों के ठोस होने से पहले की परम्परा से जोड़ते हैं । इस चिंतन को राष्ट्र राज्य के चश्मे से देखने की जगह आलोचनात्मक निगाह से देखना सही समझ आता है । इस चिंतन को गोलार्धीय स्तर पर जोड़ने वाली चीज उत्तर औपनिवेशिक कल्पना और सपने थे । उनके ये सारे सपने तो यूरोपीय वर्चस्व की राजनीतिक, ज्ञानात्मक, आनुवंशिक और भौतिक अधीनता से परे मौजूद सुखद भविष्य की ओर ले जाने वाली परियोजना का अंग थे । खास बात कि उनकी यह आकांक्षा उन्हें अटलांटिक सागर के आरपार संवाद और विनिमय से नहीं रोकती थी । वे वैश्विक आधुनिकता में अमेरिकी योगदान को महत्वपूर्ण समझते थे । उनके इस चिंतन के उत्तर औपनिवेशिक आयाम में औपनिवेशिक सत्ता, आधुनिकता और वैश्विक ऊंचनीच की समस्या शामिल थी । प्रस्तुत किताब में यही बताया गया है कि उत्तर औपनिवेशिक आंदोलनों में यूरोप से पूरी तरह अलग होने की चाहत नहीं थी । इसकी जगह उन्होंने उत्तर औपनिवेशिक चिंतन की सामासिक प्रकृति को सही माना ।

यह सामासिक संपर्क और अमेरिका की नवीनता संबंधी संभावना गोलार्धीय विमर्श और नवीनता के आकर्षण में प्रत्यक्ष है । लैटिन अमेरिका के तमाम समुदायों ने पुनर्जागरण की भाषा से जूझते हुए उसका अपनी जरूरत के मुताबिक नया रूप बनाया और नयी दुनिया में सम्भव राजनीतिक नयेपन को वैधता देने के लिए उसका इस्तेमाल किया । यह अमेरिकी नयापन कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं था बल्कि उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति आम जनता की रुचि का विषय थी । उस समय के ये प्रयास वर्ग, नस्ल, लिंग और विधा की सीमाओं को पार कर जाते थे । आंग्लभाषी दुनिया में अमेरिकी राजनीतिक चिंतन में संयुक्त राज्य को केंद्र में रखा जाता है । इसमें मुख्य तौर पर लोकतंत्र, राष्ट्रीय विशेषता, परिणामवाद, साम्राज्यी विदेश नीति और उदारवाद पर ही बात की जाती है । इन विचारों के प्रसंग में संयुक्त राज्य के चिंतकों का ही संदर्भ दिया जाता है । इस चिंतन में राष्ट्रीय विशेषता होने के बावजूद उसे यूरोपीय आधुनिकता के विकासपरक और प्रगतिशील सपने से जोड़ दिया जाता है । संयुक्त राज्य और उसके बौद्धिक योगदान को ही आधुनिकता का स्रोत घोषित किया जाता है । कहने को तो इस चिंतन की बहुलता को स्वीकार किया जाता है लेकिन ये कथन बहुधा अस्पष्ट ही रहते हैं ।लेखक को इस चिंतन से जुड़ी बहसें इस समय खासकर प्रासंगिक लगती हैं क्योंकि समकालीन राजनीति में अमेरिकी महानता की वापसी का ढोल पीटा जा रहा है । हो सकता है अमेरिकी चिंतन की कुछ खास राजनीतिक विशेषता हो लेकिन उन्हें उजागर करने के लिए सबसे अलगाने पर इसमें एकरसता का आना तय है । इससे बचने के लिए लेखक कहते हैं कि अमेरिकी चिंतन की अपनी विशेषता को आधुनिक इतिहास के वैश्विक संदर्भ से अलगाया नहीं जा सकता लेकिन इसे संयुक्त राज्य और यूरोप के बीच लेनदेन तक सीमित कर देना भी सही नहीं होगा । अमेरिकी चिंतन की बहुलता की प्रतिष्ठा के लिए उसे राष्ट्रीय पहचानों, संस्थाओं, सीमा रेखाओं और हमेशा अस्पष्ट रह जाने वाली पश्चिम की घेरेबंदी से आजाद करना होगा ।                          

                    

                                                 

Monday, July 13, 2026

हक़ की लड़ाई का कथाकार

 

          

                             

विजेन्द्र अनिल के मरणोपरांत प्रकाशित कहानी संग्रह‘फर्ज़’पर एकाधिक कारणों से ध्यान देना होगा । इसे उनके पुत्र सुनील श्रीवास्तव ने संपादित किया है और प्रकाशन 2026 में अभिधा प्रकाशन से हुआ है । इस कहानी संग्रह से न केवल विजेन्द्र अनिल बल्कि उस समय भोजपुर और बिहार में फूटी विद्रोही रचनात्मकता की साफ झलक मिलती है । वह समय न केवल किसान आंदोलन और संघर्ष के नये अध्याय के लिए मशहूर हुआ बल्कि उसकी ऊर्जा ने युवा साहित्यकारों की नयी जमात को जन्म दिया । इनमें विजेन्द्र अनिल भी शामिल थे । इन साहित्यकारों ने संघर्ष के चित्रण की जो नूतन प्रविधि विकसित की उसमें भाषा के नवाचार का विशेष महत्व था ।  भोजपुरी में क्रांतिकारी गीत लेखन ने उसे नयी पहचान दी थी । भोजपुरी में इस नये तरह के लेखन से अलग हिंदी लेखन को भी इस भाषिक नवीनता ने जमीनी आधार दिया और कहानियों के पात्र इस भाषा में पूरी तरह जीवंत हो उठे । जो भोजपुरी बोलने वालों के दुख और दर्द की अभिव्यक्ति का माध्यम थी वह सहसा हक और दावेदारी की लड़ाई के वर्णन का माध्यम बन गयी । ये अधिकार संविधान प्रदत्त मूल अधिकार होने के साथ मानवाधिकार भी होते थे । कहानियों की जान इन अधिकारों को हासिल करने के लिए होने वाली जुझारू लड़ाई है । यह लड़ाई ही कहानियों के पात्रों को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है । कहानियों में बीच बीच में भोजपुरी के ये गीत भी आते रहते हैं । जिन गीतों की उपस्थिति है वे लोकगीत की तरह के ही संघर्ष गीत हैं । इनसे इस संघर्ष का सांस्कृतिक और रचनात्मक आयाम बनता है ।        

इस संग्रह में कुल दस कहानियां रखी गयी हैं जिनमें संग्रह की शीर्षक कहानी अंतिम है । इस कहानी में आत्मकथात्मकता की हल्की गंध है । ये सभी किसी न किसी पत्रिका में प्रकाशित हैं । कहानियों के साथ उन पत्रिकाओं का नाम और प्रकाशन का वर्ष महीना भी दे दिया गया है । इससे उस समय की महत्वपूर्ण लघु पत्रिकाओं की सूचना मिल जाती है । बिहार, उत्तर प्रदेश तथा हिंदी भाषी क्षेत्र से छपने वाली इन पत्रिकाओं का महत्व उन स्वरों को सामने लाने में निहित है जिन्हें पुरस्कार और प्रसिद्धि के बाहर और उनका प्रतिरोधी माना जाता था । इस समय के पुरस्कार बहुल वातावरण के लिए, जब प्रतिरोधी पहल का भी एक हिस्सा बिना किसी संकोच या दुविधा के वित्त पोषित नजर आता है, उस समय की कल्पना भी मुश्किल है जब समझदार पाठक मिलना ही सबसे बड़ा पुरस्कार हुआ करता था और सभाओं की जगह छोटे छोटे समूहों में रचनापाठ और उस पर खुली बातचीत ही आलोचना का सबसे प्रामाणिक रूप माना जाता था । इस लेखन और उस पर बातचीत में वैचारिक सघनता हुआ करती थी और तीखी बहसों के बावजूद कटुता नहीं पैदा होती थी । ये कहानियां उसी समय की उपज हैं जब छपने से पहले किसी भी रचना को इस कठिन अग्निपरीक्षा से गुजरना होता था ।                  

कहानियों के पात्र जिस वातावरण में अवस्थित हैं वहां उनकी सामाजिक हैसियत और आर्थिक स्थिति आपस में मिल जाते हैं । ग्रामीण इलाके के सामाजिक ढांचे में जमीन का सवाल सबसे प्रमुख है । जमीन की जरूरत खेती के लिए तो है ही, रहने के लिए भी जमीन चाहिए होती है और जब रहेंगे तो खाने के लिए अन्न उगाने हेतु जमीन ही सुलभ संसाधन होती है । जमीन के संसाधन होने से उसके साथ कामगार और मालिकाना जुड़ा होता है । अपवाद के बतौर ही कुछेक पात्र जमीन के मालिक हैं, अधिकतर उस पर काम करने वाले कामगार तबके से संबद्ध हैं । हमारे सामाजिक ढांचे से जिसका परिचय हो वह जानता है कि इसी मालिकाने के हिसाब से सामाजिक व्यवस्था भी निर्मित है । कामगार पात्रों के सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी खूबी स्त्रियों की बराबरी है । असल में मालिकों के मुकाबले कामगार तबके की स्त्रियों के लिए जीने का मतलब खेत में काम करना है । वे आर्थिक रूप से पुरुष पर निर्भर नहीं होतीं इसलिए उनमें बराबरी की मानसिकता होती है । 

स्त्रियों की तरह ही खेतिहर जीवन के साथ इन कहानियो में मुस्लिम पात्रों की बहुतायत अचरज में डालने वाली है । इन सबका जीवन खेती और जमीन के साथ जुड़े संघर्ष से बना है । जमीन का मालिकाना हमारे देश का महत्वपूर्ण तत्व है । सभी जानते हैं कि आजादी के आंदोलन में जब किसान आये तो उनके साथ ही जमींदारी का सवाल भी आया । रामविलास शर्मा का मानना है कि सबसे बड़ा जमींदार अंग्रेज था । इसका सबूत नील और अफीम जैसी नकदी फसलों की खेती के लिए अपनायी गयी व्यवस्था थी । इसके अतिरिक्त अपने शासन और शोषण की व्यवस्था को चलाते रहने के लिए अंग्रेजी राज ने देशी जमींदारों को विकसित किया और उन्हें संरक्षण भी दिया । यही कारण है कि आजादी के आंदोलन के साथ जमींदारी उन्मूलन का सवाल भी जुड़ गया था । कागज में आजादी के बाद जमींदारी खत्म भी हुई लेकिन जमीन पर मालिकाना कायम रहा । खेती के लिए जमीन के मालिक के साथ कामगार की भी जरूरत होती है । इस कामगार समुदाय की आकांक्षा के साथ संसाधनों के बंटवारे की व्यवस्था का टकराव होने से भूमि संघर्ष का जन्म होता है । यही संघर्ष सारी कहानियों का मर्म है । यह संघर्ष कामगारों को स्वतंत्र व्यक्तित्व प्रदान करता है ।

उनका यह व्यक्तित्व दबकर सहने की जगह अपने हक के लिए बोलने में व्यक्त होता है । जब भी अभिव्यक्ति की आजादी की बात होती है तो उसका अर्थ अखबार की स्वतंत्रता तक सीमित समझा जाता है । हम सभी जानते हैं कि सामाजिक ढांचे में बोलने का अधिकार भी व्यक्ति की हैसियत से तय होता है । यह अधिकार कामगारों को सबसे कम मिलता है । लेखक ने संविधान प्रदत्त इस मूल अधिकार को जमीन पर उतारने का साहस करने वालों की कथा कही है । यह भी याद रखना होगा कि हमारी वर्तमान सरकार अधिकार के मुकाबले कर्तव्य की बात पर अनायास जोर नहीं देती । यह कर्तव्य भी उसके लिए संस्थान द्वारा निभाया जाने वाला नहीं होता, बल्कि जिम्मेदारी नागरिक को दे दी जाती है कि वह कर्तव्य पालन करे । इसीलिए प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े कर्तव्य पथ की जगह सेवा तीर्थ बना दिया गया है । नागरिकों का कर्तव्य है कि वे सरकार की सेवा करें ।

उनके व्यक्तित्व का यह बदलाव बोलने की हिम्मत नक ही सीमित नहीं रहता, संगठन बनाने तक पहुंचता है । हम सभी जानते हैं कि शासक समूह अपने अधीनस्थ को काबू में रखने के लिए उनके बीच विभाजन को जन्म देता है । इसलिए हक के लिए लड़ने वाले संगठन पर जोर देते हैं ताकि उत्पीड़ितों के बीच समझ पर आधारित एकता बन सके । यह एकता अपने आपको संगठन में व्यक्त करती है । जमीन के मालिक भी अपनी प्रभुता की रक्षा के लिए संगठन का निर्माण करते हैं । वास्तव में बनी ‘भूमि सेना’ का फर्ज़ कहानी में कथात्मक प्रतिरूप ‘किसान रक्षा वाहिनी’ है । इस नाम में ही विडम्बना है क्योंकि इसमें किसान की जगह खेतों के मालिकान हैं । इसके विरोध में किसान सभा है जो गंगा के पेट से निकली जमीन पर बसने के हक के लिए संगठित हो रहे हैं । बसने का उनका यह अधिकार मानवाधिकार की श्रेणी में आता है । यह मूलभूत अधिकार भी हासिल करने के लिए उन्हें लड़ाई करनी पड़ती है ।

व्यक्तित्व का यही बदलाव ‘रात बिरात’ कहानी में मुस्लिम दुकानदार के मन में दूसरे धर्म के एक यात्री के प्रति भी करुणा को जन्म देता है । मनुष्य एकता का यह भावात्मक विस्तार अद्भुत है और इसका कथात्मक प्रतिनिधित्व भी ध्यातव्य है । जाने पहचाने के प्रति सहानुभूति सहज मानवीय गुण है लेकिन अनजान मुसाफिर को पत्नी के साथ रात हो जाने पर घर में शरण देना अन्याय के विरुद्ध संघर्ष से उपजी चेतना का बहुत पक्का सबूत है ।

इस कहानी संग्रह की एक और विशेषता खेती के साथ जुड़े शब्दों का बेधड़क इस्तेमाल है । इसके आधार पर ऐसे शब्दों का पूरा कोश तैयार किया जा सकता है जिनका प्रयोग आज भी गांव देहात में होता है । इन शब्दों के मूल मुगल शासन द्वारा तैयार प्रशासनिक व्यवस्था का पता देते हैं जिसने हमारे देश को दुनिया के पैमाने पर सबसे अमीर देशों में एक बनाने में मदद की थी । उसकी औपनिवेशिक लूट की व्यवस्था ने व्यापक किसान विक्षोभ को जन्म दिया था । इसी विक्षोभ की निरंतरता इन कहानियों में भी दर्ज हुई है ।