Saturday, June 20, 2026

पूंजीवाद से बचाव

 



2026 में सिमोन & शूस्टर से क्लारा ई मैत्तेई की किताब एस्केप फ़्राम कैपिटलिज्म: ऐन इंटरवेंशनका प्रकाशन हुआ । शुरुआत 1920 में ब्रसेल्स के प्रथम अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्मेलन में यूरोप के राजनेताओं और अर्थशास्त्रियों की जुटान से हुई है । वातावरण औपचारिक लेकिन तनावग्रस्त था । उन्हें सामाजिक अराजकता या अस्वीकार्य अव्यवस्था से दुख था जिसके कारण पूंजीवादी अर्थतंत्र रसातल के मुहाने पर आ पहुंचा था । इसके विरोध में वे एकताबद्ध होकर खड़े थे । सम्मेलन का आयोजन प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बने लीग आफ़ नेशंस ने किया था । इसका गठन विश्वयुद्ध में बरबाद अर्थतंत्र को पटरी पर लाने के लिए ही हुआ था । सारे यूरोप में मुद्रास्फीति बढ़ी हुई थी, भोजन की किल्लत थी और हड़तालों की बाढ़ आयी हुई थी । मजदूर परेशान थे और थैलीशाहों के शासन को चुनौती दे रहे थे । वे अर्थव्यवस्था में बुनियादी बदलाव चाहते थे । उद्योगों के निजी स्वामित्व को खत्म करके सरकारी या साझा मालिकाने की मांग हो रही थी । ऐसे में सम्मेलन ने कठिन फैसला किया ।

उन्होंने सामान्य नागरिकों के व्यवहार को आर्थिक नियमों के अनुरूप ढालने अथवा नियंत्रित करने की वकालत की । लोगों से कड़ी मेहनत, अल्प उपभोग और सरकार से कोई उम्मीद न करने की आशा की गयी । जरूरी था कि पूंजीवाद की उत्पादन प्रक्रिया में अवरोध पैदा करने आर्थिक अधिकारों की दावेदारी बंद हो । इसके ही अनुरूप नीति निर्माण भी हुआ । सरकारी बजट में कटौती की गयी । स्वास्थ्य बीमा और बेरोजगारी भत्ता जैसे खर्चों को रोक दिया गया । साथ ही वेतन में घटोत्तरी और बुनियादी जरूरियात के सामानों पर अधिक टैक्स जैसे उपाय अपनाये गये । फैसला करने वालों को मालूम था कि उनके इन कदमों का विरोध होगा । आर्थिक जरूरत के मुताबिक नागरिकों को नियंत्रित करने की बात आसान थी, इसे करना थोड़ा कठिन था । इसके पक्ष में जनमत को, लोगों की मानसिकता को तैयार करना था ताकि वे सरकारी कदमों का खुलकर साथ दें । उस समय इटली में वर्ग संघर्ष अपने चरम विंदु पर था । मजदूरों द्वारा कारखानों पर कब्जा किया जा रहा था । साठ शहरों में महीने भर से मजदूर खान से बंदरगाह तक, रेल से लेकर सूती मिल तक प्रत्येक किस्म के उत्पादन पर कब्जा किये हुए थे । कामगार पतियों के लिए भोजन लेकर औरतें कारखाने जातीं और उनके साथ बच्चे भी होते । मिल मालिकों या पुलिस के उच्च अधिकारियों की मौजूदगी कहीं नहीं रह गयी थी । हड़ताली मजदूरों के हाथ में सब कुछ था । देहातो में भी खेती की जमीन पर कब्जा करके वहां सहकारी खेती शुरू कर दी गयी थी ।

लोगों की मानसिकता उत्तर पूंजीवादी समाज जैसी बन गयी थी । इसमें उत्पादन के साधनों के निजी मालिकाने और मालिक तथा मजदूर के शक्ति संबंध की जगह अधिक न्यायोचित ढांचों ने लेनी शुरू कर दी थी । महायुद्ध के धक्के ने इसे आम चेतना का अंग बना दिया था कि मूल्य और संपत्ति के उत्पादन में मजदूर की भूमिका केंद्रीय होती है । ग्राम्शी तथा अन्य संगठकों और बौद्धिकों की अगुआई में कारखाना कौंसिलें उत्पादन और वितरण में लोकतांत्रिक भागीदारी की चाहत का नया औजार साबित हो रही थीं । उनकी कोशिशों से जनता आर्थिक और राजनीतिक आजादी पर अमल करना सीख रही थी । इसके आधार पर ही मुक्त और समान उत्पादकों का नया समाज बनना था ।

मुद्रास्फीति बेतहाशा तेजी से बढ़ रही थी और उसके ही कारण विक्षोभ की आग सुलग रही थी । भोजन की कीमत में तेजी आने के साथ मजदूरों ने अपनी तकलीफ से लाभ उठाने वालों का विरोध करना शुरू किया । उन्होंने चंद लोगों के हित में कार्तरत व्यवस्था के अन्याय की भी बात शुरू की । विशेषज्ञ जानते थे कि मौद्रिक अस्थिरता कोई आर्थिक गुत्थी नहीं है जिसका हल अर्थशास्त्री ही कर सकें । मूल तौर पर यह राजनीतिक समस्या थी । कीन्स ने माना कि इससे मौजूदा व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा हो गयी है । उनका मानना था कि मुद्रास्फीति और कीमतों में तेजी से न केवल विनिमय में कमी आएगी बल्कि कीमतों पर उसके असर की वजह से संविदा और सुरक्षा तथा समूची पूंजीवादी व्यवस्था के लिए ही मुश्किल पैदा हो जाएगी । कुछ विशेषज्ञ मुद्रास्फीति को अर्थतंत्र में मांग और पूर्ति के बीच का असंतुलन समझते थे और इसके लिए जनता में नैतिकता की कमी को जिम्मेदार ठहराते थे । सही है कि मजदूरों ने वेतन में बढ़ोत्तरी की लड़ाई लड़ी और उसमें जीत हासिल होने के बाद अपने को काबू नहीं कर पाये और फिजूलखर्ची शुरू कर दी । इसका सबूत शराब, मिठाई, चाकलेट और बिस्कुट के अति उपभोग की प्रवृत्ति से मिलता है । एक अर्थशास्त्री ने तो आरोप लगाया कि मजदूर घर पर सूअर की तरह रहते हैं और शराब की भट्ठी पर सब कुछ लुटा देते हैं ।

इन्हीं विशेषज्ञों ने बाद में चलकर फ़ासीवाद के जनक मुसोलिनी के शासन का समर्थन किया । इसका कारण था कि उसने वेतन में कटौती की, समाज कल्याण के सरकारी खर्चों पर रोक लगायी, सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण किया और ब्याज की दरें बढ़ायीं । दुनिया भर के उदारवादियों के साथ ही राष्ट्रवादी आर्थिक विशेषज्ञों ने उसके आर्थिक कदमों की खुलकर सराहना की थी । आज भी मजदूरों के मत्थे दोष मढ़ने की आदत अर्थशास्त्री बनाये हुए हैं । उनकी पुरानी रुझान कायम है और सौ साल पहले की तरह ही आरोप के निशाने पर मजदूर वर्ग के परिवार ही हैं ।

इसके बाद लेखिका सीधे 2022 के ऐसे ही एक सम्मेलन का जिक्र करती हैं । मुद्रास्फीति की एक और लहर ने विश्व अर्थतंत्र में उथल पुथल पैदा की हुई थी । अमेरिकी रिजर्व बैंक के विशेषज्ञ ब्याज की दर बढ़ाने के लिए बैठक कर रहे थे । लगातार दो साल दरें तेजी से बढ़ायी गयीं । असर सारी दुनिया के बैंकों पर पड़ा । विशेषज्ञों की भाषा अब परिष्कृत हो गयी है लेकिन मजदूर वर्ग के प्रति शत्रुता का भाव पुराना ही है । गवर्नर कहते हैं कि कीमतों में स्थिरता बहाल करने के लिए आर्थिक विशेषज्ञों को मजबूत उपाय करने होंगे जिससे तय है कि दर्द होगा । दर्द उनको होगा जो मुद्रास्फीति के गुनाहगार हैं । ये वही हैं जो काम से उनके मुताबिक जी चुराते हैं लेकिन उपभोग कुछ अधिक ही करते हैं । गवर्नर का मानना है कि श्रम बाजार में गड़बड़ी है क्योंकि काम अधिक हैं और उन्हें करने लायक लोग कम हैं । इसके कारण मजदूरी बढ़ाने का दबाव बनता है । ऐसे में बेरोजगारी बेहतर तरीका है जिससे इसकी दर को स्थिर रखा जा सकता है । बेरोजगारी का भय मजदूर को निरीक्षकों के बिना भी अनुशासन में रखता है और वे मेहनत से जी नहीं चुराते । कुछ लोग इन बातों को धक्कामार तरीके से भी व्यक्त करते हैं । आस्ट्रेलिया के एक अरबपति ने आधी आबादी को रोजगार से बाहर रखने की हिमायत की । इससे कामगारों को याद दिलाने में आसानी होगी कि वे नियोक्ता हेतु काम कर रहे हैं । उनका कहना था कि दुनिया भर की सरकारों को बेकारी बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि अर्थतंत्र को अपनी पटरी पर वापस लाया जा सके । इससे श्रम बाजार में मजदूरों की ढिठाई पर अंकुश लगाने में मदद मिलने की उम्मीद थी ।       

लेखिका का कहना है कि जब कभी ब्याज दर बढ़ाने की बात की जाती है तो हम इसे दूरस्थ या तकनीकी फैसला मानते हैं । लगता है कि उससे हमारा कोई हालिया सरोकार नहीं है या उसके बारे में कुछ करना हमारे वश में नहीं है । इस तरह अर्थशास्त्र को राजनीति से बाहर कर दिया जाता है और उसके बारे में फैसला लेने की प्रक्रिया में हमारी भागीदारी नहीं होती । व्यवस्था की सफलता ही यह है कि हमारे हाथ बांध दिये जाते हैं और जुबान पर ताला डाल दिया जाता है । अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं उससे लगता है कि हमारी जिंदगी को प्रभावित करने वाले आर्थिक फैसलों के बारे में बात करने लायक ज्ञान हमारे पास नहीं है । यदि इन विशेषज्ञों की करतूत पर ध्यान दें तो पाएंगे कि उनके फैसले बहुत ही गहरी राजनीतिक परियोजना से उपजे हैं । वे सभी वर्तमान अर्थव्यवस्था को कायम रखना चाहते हैं क्योंकि वे इसे ही एकमात्र सम्भव व्यवस्था समझते हैं । सौ साल पहले के अर्थशास्त्रियों की ही तरह आज के अर्थशास्त्री भी ऐसी व्यवस्था को बचाना चाहते हैं जो न तो हमेशा से है और न ही प्राकृतिक है लेकिन उनकी भाषा उनकी इस चिंता को छिपाती है । अगर आप मान लेंगे कि आपका जीवन पूंजीवाद पर निर्भर है तो पूंजीवादी अर्थतंत्र को चुनौती देने वाला कोई भी आंदोलन आपको भावुक प्रतिक्रिया के लिए मजबूर कर देगा ।

हमारे समाज में अधिकांश सामाजिक संबंधों में मुद्रा मध्यस्थ का काम करती है । मुद्रास्फीति से डर लगता है क्योंकि इससे मुद्रा स्थिर नहीं रह जाती । हमारा समूचा बाजार अर्थतंत्र मुद्रा की स्थिरता पर ही टिका हुआ है । कीन्स ने तो कहा था कि मुद्रास्फीति से व्यवस्था को हासिल सहमति भी डगमग हो जाती है । हमें गुस्सा आता है कि खाने पीने की चीजों की कीमत दोगुना हो गयी अथवा बिजली या गैस के खर्च की बढ़ोत्तरी से बचत में कमी आएगी । मुद्रास्फीति से सामाजिक विक्षोभ तो पैदा होता ही है उससे यह अनुभूति भी पैदा हो सकती है कि हमारी यह अर्थव्यवस्था सर्वोत्तम सम्भव व्यवस्था नहीं है । इस अहसास से वैकल्पिक व्यवस्था की खोज पैदा होती है ।

1919 की मुद्रास्फीति ने यूरोप में भंडार लूटने, हड़ताल और उत्पादन पर कब्जा करने के लिए संगठन की प्रेरणा दी थी । कोरोना के बाद अमेरिका में जो मुद्रास्फीति आयी उसने यूनियनों के गठन की नयी लहर को जन्म दिया और यूनियनें वेतन बढ़ाने की मांग करने लगीं । इसने मजदूरों के दिमाग में मालिकों की मंशा के प्रति संदेह को जन्म दिया जिससे काम छोड़ने की प्रवृत्ति पैदा हुई । 2022 में ही अमेरिका के एक तिहाई मजदूरों ने रोजगार से पीछा छुड़ा लिया । ऐसे में सौ साल पहले के अपने पुरखों के समान वर्तमान विशेषज्ञ भी व्यवस्था में बदलाव की सम्भावना से परेशान हैं । उनकी उंगली जिस दुश्मन की ओर उठ रही है वे मजदूर हैं । ऐसे में लेखिका की अपील है कि हमें व्यर्थ के आरोपों के समक्ष शक्तिहीन नहीं होना होगा । आखिर ऐसी अर्थव्यवस्था को क्यों मंजूर किया जाए जो चंद धन्नासेठों को और अमीर बनाती है जबकि आम लोग मुसीबत में पड़े रहते हैं ।

लेखिका का कहना है कि तमाम आर्थिक संस्थाओं के फैसले न तो निष्पक्ष हैं, न वैज्ञानिक या नैतिक ही हैं । सबका कल्याण करने में वे बहुत पहले विफल हो चुके हैं । हमारे समाज की मौजूदा अर्थव्यवस्था, जिसे पूंजीवाद कहा जाता है, उसे स्वाभाविक, अपरिहार्य और शाश्वत कहना धोखाधड़ी है । पूंजीवाद को स्वाभाविक समझने और अनेक बुनियादी फैसलों को विशेषज्ञों पर ही छोड़ देने की हमारी आदत ने हमें शक्तिहीन बना दिया है और ऐसे समाज के लिए हमारी सहमति हासिल कर ली है जो बहुसंख्या का उत्पीड़न करता है । लगभग सभी अर्थशास्त्री, टेलीविजन, सोशल मीडिया और अखबार वही कहानी सुनाते हैं जो हमारी अर्थव्यवस्था की कार्यपद्धति की व्याख्या करने की जगह उस पर परदा डालती है । तथ्य यह है कि व्यवस्था की विषमता विस्फोटक हो गयी है । अमेरिका में मध्य वर्ग की आबादी कम हो रही है जबकि संपत्ति में असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है । सबसे ऊपर के 0.1 फ़ीसद लोगों की संपत्ति नीचे की आधी आबादी के पांच गुना से अधिक हो गयी है । सबसे अमीर तीन लोगों की संपत्ति डेढ़ करोड़ अमेरिकी लोगों से अधिक हो गयी है । यह समस्या अमेरिका तक ही सीमित नहीं है । ब्रिटेन में सबसे अमीर एक फ़ीसद लोगों के पास सत्तर फ़ीसद लोगों से अधिक संपत्ति हो गयी है । 2014 से ही ब्रिटेन में प्रत्येक तीसरा बच्चा गरीबी में रह रहा है जबकि इसी दौरान खरबपतियों की संख्या छह गुना बढ़ गयी । 

रोजगार सृजन के तमाम दावों और व्यवसाय की सफलता से सबकी मदद की कहानी के बावजूद सच यही है कि लाभ तो बाजार को ही मिल रहा है । मुनाफ़े और नागरिकों की खुशहाली में छत्तीस का आंकड़ा होता है । एक की बढ़ती दूसरे की घटत पर निर्भर होती है । वर्तमान अर्थव्यवस्था दमनकारी है और इस क्रूर राजनीतिक सच पर परदा डालना अर्थशास्त्र का प्रमुख काम है । गड़बड़ी की आशंका के बावजूद हम सुबह काम पर निकल जाते हैं और आराम का जरा भी समय न मिलने के बावजूद समाज हालात के सामान्य होने का संदेश देता है । आर्थिक जीवन के बारे में हमारा ठोस अनुभव अलगाव और संघर्ष का होता है इसके बावजूद हम इसे मंजूर कर लेते हैं । यह मान लेते हैं कि इस व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है । लेखिका के अनुसार हमारी इस मान्यता का निर्माण अर्थशास्त्र द्वारा किया गया है । वह हमें पूंजी की व्यवस्था के सामने समर्पण सिखाता है । इस व्यवस्था में फैसला लेने की ताकत निजी निवेशकों के हाथों में केंद्रित हो गयी है और बहुसंख्यक लोग किसी और के मुनाफ़े के लिए काम करने को मजबूर हो गये हैं । दुखद है कि उनको अपनी यह मजबूरी नजर भी नहीं आती ।

इसी कारण हम वैकल्पिक अर्थतंत्र देख नहीं पाते । दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ दशकों से हमें विकल्पहीनता की यह कहानी सुनाते आ रहे हैं । मौजूदा अर्थव्यवस्था की असली प्रकृति पर परदा डालकर वे हमारा दिमाग सुन्न कर देते हैं । इससे बदलाव की किसी व्यावहारिक कार्यवाही की सम्भावना अवरुद्ध हो जाती है । लेकिन लेखिका को पूंजीवाद का विकल्प सम्भव प्रतीत होता है । अर्थशास्त्र के संस्थापकों ने पूंजीवाद को वर्ग और वर्ग संघर्ष की निगाह से देखा था । उनके इस नजरिए पर सौ साल से बौद्धिक और राजनीतिक टकराव जारी है । इसके तहत वर्ग की जगह व्यक्ति की और संघर्ष की जगह समरसता की स्थापना का प्रयास किया गया । आर्थिक वृद्धि का चालक मजदूर की जगह उद्यमी हो गया जो बचत और निवेश करता है । अर्थशास्त्र के पुरखों ने मजदूर को प्रमुख उत्पादक वर्ग माना और उसे जमींदारों और पूंजीपतियों के विरोध में चित्रित किया । मार्क्स ने तो मजदूर के शोषण को पूंजीवाद की संरचना में निहित करार दिया । इसके बदले नवशास्त्रीय अर्थशास्त्री अपने विश्लेषण से वर्ग संघर्ष को बाहर कर देते हैं और श्रम संबंधों को व्यक्तियों के बीच समान विनिमय की तरह प्रस्तुत करते हैं । वे यह भी कल्पना करते और परोसते हैं कि आज मुक्त बाजार की होड़ में जो कोई अपने पत्ते सही तरीके से चलेगा उसके लिए समृद्धि का दरवाजा खुल जाएगा । 

इन विद्वानों ने अपने सिद्धांतों को वस्तुनिष्ठ कहा । राजनीतिक अर्थशास्त्र की जगह शुद्ध अर्थशास्त्र की संज्ञा का प्रचलन हुआ । इसमें अर्थतंत्र को शक्ति संबंधों से परे साबित करने की जीतोड़ कोशिश की गयी । न्यूटन के भौतिक विज्ञान के नियमों की तरह अर्थशास्त्र के नियम बनाये गये । इन नियमों की रक्षा की जिम्मेदारी अर्थशास्त्रियों ने ओढ़ ली क्योंकि ये नियम सबकी समझ में नहीं आ सकते थे । उसी समय स्वतंत्र आर्थिक संस्थान बने जो नीति संबंधी फैसलों को लोकतंत्र की राजनीतिक दखल से दूर रखने की वकालत करते थे ।

समस्त अर्थशास्त्रीय विमर्श से किसी भी मानवीय सहजबोध को दूर रखा गया । प्रगतिशील आलोचक भी अत्यधिक कारपोरेट लोभ या वित्तीय क्षेत्र के अनियंत्रित उभार पर ही उंगली उठाने तक खुद को सीमित रखते थे । लक्षण की इस तरह की आलोचना बुनियादी ढांचे की समस्याओं को सामने नहीं लाती थी । इन नवशास्त्रीय अर्थशास्त्रियों ने बाजार आधारित समाज को सबकी उन्नति में सक्षम बताया । सामाजिक ऊंच नीच को उन्होंने व्यक्ति के गुणों का नतीजा कहा जिसका मतलब था कि जिसकी जैसी योग्यता है वह वैसी जगह पर है । कहने की जरूरत नहीं कि सत्ता में बैठे लोगों को ये तर्क सुहाने लगते हैं । इससे ही यह आम समझ बनी कि कठिन परिश्रम से कोई भी अमीर बन सकता है । नतीजा यह निकला कि गरीब लोग अपनी स्थिति के लिए खुद को ही दोषी मानने लगे ।

लेखिका सवाल करती हैं कि क्या हम सचमुच एकमात्र सम्भव आर्थिक स्थिति में हैं । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के पूंजीवाद के सुनहरे दिनों में तो ऐसा कहा जा सकता था । कम से कम अमेरिका और यूरोप में रहनेवाले गोरे मर्द के लिए यह विश्वसनीय बात होती लेकिन आज तो धरती की अधिकांश आबादी समाजार्थिक अन्याय से जूझ रही है और समूची धरती पारिस्थितिकी के विनाश की कगार पर है । ऐसे में एकमात्र सम्भव दुनिया का छद्मवैज्ञानिक तर्क किसी काम का नहीं रह गया है । समाज को समझने का थोड़ा मानवीय नजरिया खोजना होगा । इसके तहत अर्थतंत्र को लोकतांत्रिक बनाना होगा जिससे नागरिक अपनी जिंदगी को नियमित करने वाली नीतियों के सिलसिले में अपनी पसंद जाहिर कर सकें । आगे बढ़ने का यह सबसे पहला कदम होगा । इसके लिए परिप्रेक्ष्य में क्रांतिकारी बदलाव आवश्यक है । दुनिया को देखने का हमारा नजरिया राजनीतिक होता है । दुनिया को भिन्न नजर से देखने से ही हम अलग किस्म की कार्यवाही में शरीक हो सकते हैं ।

किताब का उद्देश्य नया मुक्तिकारी परिप्रेक्ष्य प्रदान करना है । समय आ गया है कि अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीतिक अर्थशास्त्र के लेखन पर आधारित होकर किया जाए । नागरिक आलोचनात्मक आर्थिक विश्लेषण के बल पर नीतियों में जरूरी बदलाव कर सकेंगे और इसमें तकनीकी विशेषज्ञों के एकाधिकार की जगह लोकतांत्रिक भागीदारी को प्रमुखता स्थापित कर सकेंगे । लेखिका को लगता है कि सारी आर्थिक समस्याओं की जड़ में राजनीतिक समस्याएं होती हैं । अर्थतंत्र आखिरकार हम सबकी गतिविधि है इसलिए उसमें हमारी दखल जरूरी है ।

Wednesday, June 17, 2026

नया मजदूर वर्ग

 

             

                         

बहुत पहले कार्ल मार्क्स ने पूंजीवाद के बारे में लिखा कि लगातार क्रांतिकारी बदलाव किये बिना उसका जिंदा रहना असम्भव है । इस बदलाव की जरूरत उसे बाजार में अन्य पूंजीपतियों के साथ की गलाकाटू होड़ के कारण पड़ती है । इसके अतिरिक्त मुनाफ़े में कमी की भरपाई के लिए भी उसे मजबूरन लगातार बदलाव लाना पड़ता है । हम सबके सामने पूंजीवाद में सबसे बड़ा बदलाव नवउदारवाद के नाम से आया । पश्चिमी देशों में इसका आगाज़ 1970 दशक से हो चुका था । हमारे खित्ते में इसकी धमक सोवियत संघ के बिखराव के साथ नब्बे के दशक में सुनायी पड़ी । यह बदलाव पूंजीवाद के मूल स्वभाव में नहीं आया था । नाम से यह भी भ्रम नहीं होना चाहिए कि पूंजीवाद अधिक उदार हो गया । उसका मूल स्वभाव श्रमिक के श्रम का शोषण करना और उससे मुनाफ़ा कमाना है । इस बुनियादी मकसद को हासिल करने के तरीके उसने हमेशा बदले हैं । इस भ्रम की गुंजाइश इसलिए भी बनी कि नये समय में इसे मानवीय चेहरे वाला पूंजीवाद कहा गया । इस दौर में आये बदलाव के अनेक आयाम हैं । उस समय के वातावरण को याद करें तो बाजार को सभी समस्याओं के एकमात्र समाधान के रूप में पेश किया जा रहा था । सरकार की ओर से सभी संसाधनों के निजीकरण को गुणवत्ता हेतु आवश्यक प्रतियोगिता की कुंजी बताया जा रहा था । अगर याद करें तो शिक्षा मंत्रलाय को नया नाम देकर उसे मानव संसाधन मंत्रालय कर दिया गया था । नाम की वापसी तो हो गयी लेकिन मकसद वही बना हुआ है । तभी आर्थिक नीतियों को राजनीति से परे बताने की वकालत की गयी । अब इस बीमारी का प्रसार इस कदर हुआ है कि राजनीति ही राजनीति से परे होकर बाजार के सामने एकदम नतमस्तक हो गयी है । इन पहलुओं में से हम इस लेख में केवल श्रमिक समुदाय की संरचना में आये बदलावों पर ध्यान केंद्रित करेंगे ।

सोवियत संघ की मौजूदगी ने पूंजीवाद पर श्रमिक समुदाय का पक्षधर रुख अपनाये रखने का दबाव बनाया था । उसके बिखराव के साथ यह दबाव समाप्त हो गया । पूंजीवाद की बुनियादी विशेषता श्रमिक का अबाध शोषण है । इस शोषण में मजदूरी का स्तर नीचे बनाये रखना आवश्यक होता है । इसमें बेरोजगारों की फौज से मदद मिलती है । कामगारों के बीच होड़ से पूंजीपति को पगार कम रखने का तर्क मिलता है । पूंजी के मुनाफ़े के लिए आबादी के एक हिस्से की बेरोजगारी जरूरी होती है । इससे रोजगारशुदा मजदूरों को डराकर उनकी पगार काबू में रखने में मदद मिलती है । सबको रोजगार की गारंटी होने से मजदूरों को पगार बढ़ाने की सौदेबाजी करने में सुविधा होती है । शीतयुद्ध के दौर में मजदूरों को एक हद तक यह सुविधा हासिल थी । सोवियत संघ की समाप्ति के साथ पूंजीवाद ने रोजगार के क्षेत्र में अस्थायित्व को अपने लिए भारी सुविधा बना लिया है । सरकारी उद्यमों के सहायक क्षेत्रों से शुरू होकर यह अस्थायित्व अब सेना तक में चार साल के लिए नियुक्त अग्निवीर के रूप में पहुंच गया है । हालिया युद्धों के सिलसिले में जो खबरें आयीं उनसे अनुमान होता है कि सेना के मामले में भारत की तरह रूस और अमेरिका में भी ठेकेदारी प्रथा चल रही है । ऐसा करने से अपने देश के नागरिकों की मृत्यु से उपजे विक्षोभ से शासक बच जाते हैं और स्थायी सैनिकों जैसी देनदारी भी नहीं निभानी होती ।

बड़े संगठित उद्योग की जगह ढेर सारी छोटी छोटी सहायक इकाइयों ने लेनी शुरू कर दी । इन इकाइयों में काम करने वाले श्रमिकों के रोजगार की कोई गारंटी नहीं होती थी । वेतन भी वे मनमाना देती थीं । हमारी आंख के सामने उद्यमों की संपत्ति की सुरक्षा के काम का निजीकरण शुरू हुआ और इस क्षेत्र में ठेके पर चौकीदार रखे जाने शुरू हुए । पहले जहां इस काम के लिए उद्यम को जवाबदेह कर्मचारी होते थे उनकी जगह नियुक्त इन नये किस्म के चौकीदारों के काम के घंटे बारह होने लगे । तमाम उद्यमों में इस तरह के ढेर सारे नियमित कामों को टुकड़े टुकड़े ठेके पर बाहर से कराये जाने की प्रथा चल पड़ी । धीरे धीरे यह काम अध्यापन में भी शुरू हुआ और नियमित नियुक्ति की जगह ठेके पर पाठ्यक्रम का अध्यापन सामान्य हो चला । इस तरह काम के आठ घंटों के लड़कर हासिल अधिकार के सरेआम उल्लंघन को सामान्य चीज बनाया गया । हाल में लाये गये श्रम कोड को पहले से ही व्यवहार में लागू किया जाना इस तरह शुरू हो चुका था । अब उसको औपचारिक स्वरूप दिया जा रहा है । उस समय आर्थिक विकास के लिए बाजार को एकमात्र नियामक मानने की वकालत की जा रही थी और वेतन आदि के कानूनों को इसमें बेवजह का दखल कहा जाने लगा था । नये श्रमिक को इसी नये असुरक्षित माहौल में नौकरी करनी पड़ रही है । अब तो श्रम निरीक्षकों को भी गैर जरूरी बताया जा रहा है । जिन उद्यमों की जांच वे कर सकते हैं उनके श्रमिकों की संख्या लगातार बढ़ायी जाती है ताकि ढेर सारे उद्यमों को उससे बाहर रखा जा सके । सरकार का काम पूंजी निवेश हेतु सहूलियत पैदा करना रह गया है । कार्यस्थल तो छोड़िए बाहर भी चिकित्सा और शिक्षा जैसी सुविधा से सरकार अपने हाथ खींच रही है । पहली बार बेशर्मी के साथ सरकार के मुखिया भी धनकुबेरों के चाकर नजर आ रहे हैं । यह समय हमारे देश में कामगार के लिए सबसे कठिन है ।  

पूंजी और उसके उत्पादकों के भीतर के इस बदलाव पर रूसी विद्वान बोरिस कागरलित्सकी ने सदी के मोड़ पर ही लिखा । उनका कहना था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्थापित वैश्विक संस्थाओं की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय बाजार को नियंत्रित करने की थी लेकिन नवउदारवाद ने इन्हें विनियमितीकरण के हथियार में बदल दिया है अब तो ये संस्थाएं अपना एजेन्डा खुद तय करती हैं तथा उसे जनता और सरकारों पर थोप देती हैं सार्वजनिक योजना निर्माण के काम का निजीकरण हो गया है ये संस्थान इस तरह काम करते हैं जैसे समूची दुनिया पर इनका कब्जा हो इनके विशेषज्ञ तय करते हैं कि रूस के कोयला उद्योग का क्या किया जाए, कोरिया में कंपनियों को कैसे संगठित करें या मेक्सिको की वित्तव्यवस्था कैसे दुरुस्त होगी समस्या जितनी विकट होगी उतना ही आसान और आदिम उसका समाधान प्रस्तुत किया जाएगा ये संस्थाएं अफ़्रीका से लेकर रूस तक प्रत्येक समस्या के हल का एक ही नुस्खा सुझाती हैं अपनी ही विचारधारा का शिकार ये संथाएं अपनी विराट नौकरशाहाना मशीन से संचालित होती हैं मुक्त बाजार के नाम पर समूची दुनिया में अभूतपूर्व केंद्रीकरण थोप दिया गया है पश्चिमी देशों की सरकारें भी इस समानांतर प्राधिकार से परेशान हैं। यह पूरा ढांचा मूल रूप से अलोकतांत्रिक है पुराने जमाने की निरंकुश बादशाहतों की तरह वैश्विक प्रशासन का यह नया निजाम भी शासितों की सहमति पर आधारित नहीं है इसीलिए साधारण जनता को लाभ पहुंचाने का आधुनिक सरकारों का काम करना इनके स्वभाव में नहीं है

उन्होंने यह भी देखा कि संपदा और संसाधनों का अभूतपूर्व संकेंद्रण हो गया है अतीत के किसी भी तानाशाह के हाथों में उतनी नहीं रही होगी जितनी ताकत इस समय अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निदेशक या माइक्रोसाफ़्ट जैसी किसी बड़ी कंपनी के मालिक के हाथ में आ गयी है इस अति-केंद्रित व्यवस्था के कारण ढेर सारी समस्याएं भी पैदा हो रही हैं यह नहीं कि नवउदारवादी पूंजीवाद अधिकांश मानवता को दरिद्रता में धकेले हुए है या परिधि पर स्थित देशों में बर्बरता का बोलबाला है ऐसे नैतिक सवालों से गंभीर लोग परेशान नहीं होते संकट यह है कि इस व्यवस्था में गलतियों के नुकसान बहुत अधिक हैं असल में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास इतने ज्यादा संसाधन हैं कि अपने गलत साबित हो चुके फैसलों के नतीजों के नुकसानदेह अंजाम देखते हुए भी उसके नियंता उन्हीं गलत नीतियों को लम्बे समय तक जारी रख सकते हैं

इसके साथ ही तकनीक संबंधी नयेपन के असरात का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि वैश्वीकरण के साथ ही सूचना युग का भी प्रसार हुआ था सभी बीमारियों के लिए अचूक नुस्खे के रूप में तकनीकी बदलाव पर जोर दिया गया इस बदलाव ने व्यवस्था के अंतर्विरोधों को और मजबूत बना दिया बहुत सारे विद्वान इस नयी स्थिति को विकेंद्रित उत्पादन के साथ नियंत्रण का केंद्रीकरण कह रहे हैं तकनीक आधारित संजाल बन तो रहे हैं लेकिन प्रभुतासंपन्न संरचनाएं और स्वार्थ इनका इस्तेमाल अपने मकसद के लिए करना चाहते हैं इससे नये तरह के अंतर्विरोध पैदा हो रहे हैं संजाल के लिए ऊंच-नीच की व्यवस्था का समाप्त होना जरूरी नहीं होता, उसके लिए दूसरे तरह के पदानुक्रम की जरूरत होती है और इससे नये स्वार्थों का जन्म होता है संजाल की मौजूदगी पर बहुत अधिक जोर देनेवाले लोगों का कहना है कि इस समय पूंजीपति मानव रूप में तो नजर आते  हैं लेकिन समकालीन पूंजीवाद का कोई ठोस चेहरा नहीं है । वित्त प्रवाह इलेक्ट्रानिक संजालों के जरिए हो रहा है । लेखक को चेहराविहीन इस पूंजीवादी संजाल का वर्णन बहुत कुछ नौकरशाही के वर्णन जैसा महसूस हो रहा है । उनका कहना है कि आज की दुनिया में कोई लोग तो हैं जो फैसले करते हैं और ये फैसले खास हितों तथा विचारों से साफ साफ प्रभावित दिखायी पड़ते हैं । कुछ ऐसी वास्तविक संस्थाएं और संरचनाएं तो हैं ही जहां ये हित सुदृढ़ होते हैं और तब फैसले लिये जाते हैं ।

उनका यह भी मानना है कि तकनीकी क्रांति ने पुरानी समाजार्थिक व्यवस्था को नष्ट नहीं किया है । पुरानी समाजार्थिक व्यवस्था के ऊपर से नए समाजार्थिक ढांचों को थोप दिया गया है । किसानों के लोप की तमाम अटकलों के बावजूद किसान मौजूद हैं । जनसंख्या विस्फोट के साथ उनकी तादाद भी बढ़ रही है । वर्ग के बतौर औद्योगिक मजदूरों के भी लुप्त होने की बात थी लेकिन वैश्विक स्तर पर कुल मिलाकर उनकी संख्या में इजाफा हो रहा है । गैरजरूरी लोग हाशियों पर तमाम आदिम और अकुशल कामों के सहारे जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे हैं । करोड़ो की संख्या में ये लोग कंप्यूटर और कारखानों की दुनिया से पूरी तरह असंबद्ध माहौल में रह रहे हैं और अब अपनी पुरानी दुनिया में लौटने के काबिल नहीं रह गए हैं । ये अनौपचारिक कामगारों की फौज के सदस्य हैं और इनका श्रम लगभग मुफ़्त है । तमाम मोटर चालित वाहन सड़क पर से रिक्शे को बेदखल नहीं कर सके हैं । कंप्यूटर की दुनियावाले लोगों को लगता है कि थोड़े ही समय में तकनीक सभी सामाजिक समस्याओं को समाप्त कर देगी । संसदों में बैठे हुए और सभाओं में भाषण देनेवाले वामपंथी नेतागण इन दोनों किस्म के लोगों से दूर हो गए हैं । आम नेतागण इस दुनिया को उसी तरह देख और समझ नहीं पाते जिस तरह पहले शहरी लोग बर्बर आबादी को देख समझ नहीं पाते थे ।

नये हालात से सावधान करते हुए वे कहते हैं कि तकनीकी क्रांति के वर्तमान दौर की खूबी यह है कि विकास की गति में त्वरण आ गया है । मनुष्यों को कंप्यूटरों की तरह लगातार नवीकृत होना पड़ रहा है । लेकिन इसका प्रभाव बहुत कम लोगों तक सीमित है । इसमें प्रसार के मुकाबले उठान अधिक है । तकनीक के विकास की रफ़्तार से प्रभावित होकर दावा किया जा रहा है कि थोड़े ही दिनों बाद जन्नत जैसी जिंदगी सबको मिल जाएगी । असल में किसी भी नई तकनीक के आरम्भिक दिनों में उसके विकास की रफ़्तार तेज होती है । बाद में उस रफ़्तार को बरकरार रखने में मुश्किल पेश आती है । समाज पर थोपी गई बदलाव की रफ़्तार से उसे थकान होने लगती है । विकास सहायता नहीं प्रतीत होता बल्कि आक्रामक दबाव महसूस होने लगता है । लगातार कुछ तोड़फोड़ चलते रहने का नयापन सुखद ही नहीं होता । इतनी तेज रफ़्तार के कारण भारी बेरोजगारी फैल रही है । सफलता, गतिशीलता और क्षमता केवल ऊंचे तबके के लोगों को सुलभ रह गए हैं । ये तबके निचले तबकों के बारे में आपराधिक रूप से उदासीन हैं लेकिन यह रुख आत्मघाती है क्योंकि आधार की चौड़ाई के बिना ऊंचाई को बनाए रखना असम्भव है । राजनीतिक क्रांति की तरह ही तकनीकी क्रांति को भी सांस लेने के लिए रुकना पड़ता है । सरपट दौड़ते हुए आसमान की ओर निगाह लगाए रखने में खतरा है ।    

इस नये समय की जरूरत को सूत्रबद्ध करते हुए उनका मत है कि तकनीक, संसाधन, संपत्ति और ज्ञान- सब कुछ का पुनर्वितरण आवश्यक है । विकास में प्रसार और व्याप्ति लानी होगी । कुशल कामगारों की फौज तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर शिक्षकों की जरूरत है । साठ के दशक मे शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का सबसे बेहतर साधन था । राजनीति की वरीयता सूची में अर्थतंत्र के ऊपर शिक्षा को होना चाहिए । शिक्षा में निवेश के लिए संपदा के भारी पुनर्वितरण की जरूरत पड़ेगी ।

मजदूर वर्ग के मामले में सबसे बड़ा बदलाव उत्पादक उद्यमों को दक्षिणी गोलार्ध के देशों में भेजना था । इसने पश्चिमी देशों में मजदूरों की तादाद कम कर दी । संख्या में कमी का असर उनकी ताकत में प्रतिबिम्बित हुआ । उस समय मजदूर आंदोलनों को कुचलने के कारण इंग्लैंड में मार्गरेट थैचर और अमेरिका में रोनाल्ड रीगन को पूंजीवाद की नयी आक्रामकता का प्रतिनिधि माना जाने लगा । इन दोनों को नवउदारवाद की सैद्धांतिकी का प्रणेता यूं ही नहीं माना जाता । यही समय था जब मजदूर आंदोलनों को बदनाम करने का भी अभियान शुरू हुआ । हमारे देश में अदालतों ने आम हड़तालों को आर्थिक प्रगति में बाधा की तरह पेश करना शुरू किया । एकाध मामलों में तो तोड़फोड़ में सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए हड़ताल के आयोजकों पर जुर्माना भी लगाया गया । सूचना और संचार क्रांति ने भी अर्थतंत्र को प्रभावित किया और उसमें सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ने की खबरें गम्भीर विश्लेषण में जगह पाने लगीं ।

श्रम में निचले स्तर के कम मजदूरी वाले क्षेत्रों में आये बदलाव की चर्चा हम बाद में करेंगे लेकिन यह छूत उन नौकरियों को भी लगी जिनमें उच्च स्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है । संचार क्रांति के साथ वैश्वीकरण ने उपभोक्ताओं की शिकायत सुनना किसी अन्य देश में भी सम्भव बना दिया । इसके लिए शुद्ध अमेरिकी उच्चारण वाली अंग्रेजी की नकल के अतिरिक्त अन्य यूरोपीय भाषाओं की कामचलाऊ जानकारी वाले युवा रातों को जागकर गोरों की गाली सुना करते थे । न केवल इतना बल्कि फोन पर वे अपना असली नाम तक बदल लेते थे ताकि उपभोक्ता उन्हें अमेरिकी ही समझें । कंप्यूटर की सुविधा से संपन्न चमकीले आधुनिक कार्यालयों में काम करने वाले युवकों के लिए काम के घंटों का कोई मतलब नहीं रह गया था ।

इस क्षेत्र के कामगारों के बारे में 2014 में मंथली रिव्यू प्रेस से उर्सुला हुव्स की किताबलेबर इन द ग्लोबल डिजिटल इकोनामी: द साइबेरिएट कम्स आफ़ एजका प्रकाशन हुआ । किताब विश्व अर्थतंत्र के सबसे हालिया रूप का विश्लेषण करती है और उसे भी पूंजीवाद का ही एक नया रूप मानकर उसके उत्पादकों को सर्वहारा मानते हुए उनके शोषण को उजागर करती है । किताब में ज्ञान आधारित अर्थतंत्र के कामगारों के बारे में 2006 से 2013 के बीच लिखे लेख संकलित हैं । यह समय पूंजीवाद के इतिहास और श्रम संगठन के लिहाज से उथल पुथल भरा समय था । इससे पहले भी एक किताब उन्होंने लिखी थी जिसमें उनकी मान्यता थी कि पूंजीवाद नए माल पैदा करके संकटों से पार पा जाता रहा है । जैसे ही इसका विस्तार ऐसे विंदु पर पहुंचता है जहां लगता है कि इसके लिए बाजार और मुनाफ़े की संभावना समाप्त होती महसूस होती है वहीं वह जीवन के नए क्षेत्रों को अपनी जद में ले आता है, नई वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के नए रूपों को जन्म देता है और फिर उनके लिए बाजार का सृजन करता है । इस तरह के किसी भी दौर में नई तकनीक का व्यापक प्रसार होता है । उदाहरण के लिए बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में बिजली के प्रसार के साथ घरेलू श्रम (वैक्यूम क्लीनर, वाशिंग मशीन या फ़्रिज) या लोकप्रिय मनोरंजन (रेडियो, सिनेमा या ग्रामोफोन) पर आधारित नई वस्तुओं की बाढ़ आयी थी । इस प्रक्रिया में उत्पादन और उपभोग के नये रूपों का भी जन्म हुआ था । अधिकाधिक मजदूर अपने रोजमर्रा के जीवन में इन वस्तुओं पर निर्भर होते गये थे । उन्हें इतनी आमदनी की जरूरत पड़ी जिससे इन वस्तुओं को खरीदा जा सके और उनके जीवन पर पूंजीवाद की पकड़ भी इसी के मुताबिक बढ़ी । सबको अपने जीवन में इन्हें अपनाना ही पड़ा । इनके नयेपन में इनका आकर्षण था । बिक्री में इजाफ़े के साथ इनकी कीमत कम होती गयी । समय और श्रम की बचत तथा सुविधा का तत्व भी जुड़ गया । इसके अतिरिक्त इनकी मौजूदगी से व्यक्ति की हैसियत में भी बढ़ोत्तरी होती थी ।

इंटरनेट आधारित तकनीक के आगमन और प्रसार के साथ श्रम के नये रूप और क्षेत्र पैदा हो रहे हैं । जो क्षेत्र पारम्परिक तौर पर औपचारिक श्रम की दुनिया से बाहर माने जाते थे उनको भी बाजार के भीतर खींच लाया गया है । 2020 में पालग्रेव मैकमिलन से सिडोनी नाउलिन और एनी जौर्डेन के संपादन में ‘द सोशल मीनिंग आफ़ एक्स्ट्रा मनी: कैपिटलिज्म ऐंड द कमोडिफ़िकेशन आफ़ डोमेस्टिक ऐंड लेबर ऐक्टिविटीज’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों ने कुछेक ऐसी कहानियों से किताब की शुरुआत की है जिनमें इंटरनेट के सहारे तरह तरह के नये नये रोजगार करने वालों का विवरण है । इन कहानियों में संगीत, सिले कपड़े, भोजन, घरेलू उपज से लेकर अश्लील सामग्री तक का निर्माण और बिक्री का रोजगार घर से ही किया जाता है । कह सकते हैं कि जिन गतिविधियों को पहले मनोरंजनपरक माना जाता था उनसे उत्पादित वस्तुओं का व्यापार नयी परिघटना है । इसका मतलब कि जिसे खाली समय कहा जाता था उसका भी आर्थिक इस्तेमाल होने लगा है ।               

रोजगार के अस्थायीकरण की इस मुहिम का सबसे बड़ा नमूना सेवा क्षेत्र के नये तरह के रोजगार हैं । इनकी शुरुआत यातायात की सुविधा में हुई जब यात्री और चालक को आपस में जोड़ने वाली सेवाओं का आगमन हुआ । अब चार पहिया वाहनों से आगे बढ़कर दो पहिया वाहनों के मामले में भी अब ऐसा हो रहा है । इस काम में तमाम युवा शामिल हो रहे हैं । शिक्षा की चाहत बढ़ने के साथ ही उसकी कीमत भी बढ़ गयी । जीवन निर्वाह के खर्च में बढ़ोत्तरी और बेरोजगारी ने मिलकर ऐसे विद्यार्थियों की फौज को जन्म दिया है जो ग्राहकों तक उनकी जरूरत के सामान पहुंचाकर कुछ धन कमा रहे हैं । इस क्षेत्र में आरम्भिक हिचक के बाद युवतियों का भी तेजी से आगमन हुआ है । इनके साथ असुविधा और भेदभाव अकल्पनीय हैं । अर्थतंत्र का यह समूचा क्षेत्र पूरी तरह अनौपचारिक है और कोई नियम कानून इनकी परवाह नहीं करता । तैयार भोजन को उपभोक्ता के पास गरम ले जाने की होड़ में ये मजदूर अक्सर दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं । सामान पहुंचाने की जल्दी ने इनके समूचे पेशे को खतरनाक बना दिया है । बहुमंजिला ऊंची इमारतों में इन्हें लिफ़्ट के इस्तेमाल से रोका जाता है । इस प्रतिबंध के नतीजे में इन्हें पीठ पर भारी बस्ता लेकर पैदल सीढ़ी चढ़कर आना जाना होता है । इसके अतिरिक्त उपभोक्ता के सशक्तीकरण के नाम पर उसकी संतुष्टि पर इनकी पगार निर्भर होती है । अब यह संस्कृति बैंक जैसे संगठित सेवा क्षेत्र में भी प्रवेश कर चुकी है । शिक्षा के मामले में भी विद्यार्थियों से उनकी संतुष्टि की रिपोर्ट लेने का चलन पैदा हुआ है । घरेलू सहायकों की दुनिया में भी इस प्रवृत्ति का आगमन हुआ है । पहले भी इन क्षेत्रों के श्रमिकों की कोई सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था नहीं थी । अब तो उनकी उम्र हो जाने के बाद उनकी फ़िक्र करने वाला कोई नहीं रह गया है । एक जमाने में जो कुछ भारतीय लोगों के साथ अमेरिकी उपभोक्ता करते थे वही व्यवहार इस समय शहरी मध्य वर्ग इन श्रमिकों के साथ करता है । श्रम के इस नये बाजार के समाजशास्त्र का अध्ययन अभी ठीक से नहीं हुआ है अन्यथा इसके भीतर से पैदा और मजबूत हो रही जातिगत भेदभाव की नयी व्यवस्था का पता लगता । जिस तरह नगर पालिकाओं और रेलवे ने सफाई कर्मचारियों के मामले में देश की जाति व्यवस्था का अनुपालन किया उसी तरह इन पेशों में शामिल लोगों की जाति संरचना का अध्ययन होने से अस्थायीकरण के समाजशास्त्र का उद्घाटन होता और कुछ मजेदार निष्कर्ष सामने आते ।             

इन बदलावों के साथ ही देशों के आंतरिक और बाहर प्रवास की नयी गतिकी का जन्म हुआ है । देश के भीतर क्षेत्रीय विषमता का नया भूगोल पैदा हुआ है तो अंतर्राष्ट्रीय प्रवास की प्रवृत्ति में साम्राज्यवाद का पुनरुत्थान देखा जा सकता है । इन दोनों ही क्षेत्रों में प्रवास के लैंगिक पहलू की गहन छानबीन की जानी चाहिए । हरियाणा के मामले में असंतुलित लिंगानुपात की वजह से विवाह हेतु आदिवासी क्षेत्रों से स्त्रियों की आमद के सुव्यवस्थित तंत्र का खुलासा हुआ था । हिंदी कथाकार अल्पना मिश्र ने इस परिघटना पर केंद्रित ‘अस्थि फूल’ उपन्यास भी लिखा था । प्रवास की इस नयी लहर ने विभिन्न क्षेत्रों के बीच नये तनावों को जन्म दिया है । इस तनाव ने राजनीति को भी नया रूप प्रदान करना शुरू किया है । इससे दक्षिण और उत्तर तथा विभिन्न प्रांतों के बीच नये टकराव पैदा हो रहे हैं । इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय प्रवास ने लैंगिक के साथ ही नस्ली पहलू को उजागर किया है । पश्चिमी देशों में जीवन चलाने के लिए अधिक आय के कारण पति के साथ ही पत्नी को भी नौकरी पर मजबूरन जाना पड़ता है । ऐसे में बुजुर्गों और बच्चों की देखरेख काफी गम्भीर समस्या के रूप में सामने आयी है । इस काम के लिए दक्षिण और पूर्वी एशिया के देशों से स्त्रियों की आपूर्ति बड़े पैमाने पर की जाती है ।

नगरीकरण आज की दुनिया की हकीकत है । उद्योगीकरण के साथ विशाल नगरों का जन्म हुआ था । दुनिया का कोई भी शहर बड़े पैमाने पर अदृश्य शारीरिक श्रम करने वालों के बिना नहीं चल सकता । इनके लिए वर्क फ़्राम होम की सुविधा हो ही नहीं सकती । इसी कारण हालिया कोरोना महामारी के दौरान मरने वालों में सबसे बड़ी संख्या इन्हीं श्रमिकों की थी । दक्षिणी गोलार्ध के देशों की बहुतेरी समस्याओं के चलते ये श्रमिक पश्चिमी देशों में जाते हैं । उनके साथ इन देशों में नस्लभेदी व्यवहार होता है । आबादी के इस विस्थापन ने पश्चिमी देशों में विदेशियों के प्रति नफ़रत की लहर पैदा की है । उन देशों में फ़ासीवादी राजनीति के उभार के पीछे इस नफ़रती माहौल का भी योगदान रहता है ।           

बदले समय के मजदूर आंदोलन का जिक्र करते हुए 2021 में प्लूटो प्रेस से ट्रेवर न्वाने की किताब ‘अमाकोमिटी: ग्रासरूट्स डेमोक्रेसी इन साउथ अफ़्रीकन शैक सेटलमेंट्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि वर्तमान पूंजीवाद में भी मजदूरों के आंदोलन कायम हैं । बीसवीं सदी की उनकी जुझारू प्रेरणा आज भी विश्वव्यापी मजदूर संघर्षों को परिभाषित करते हैं । पूंजीवाद के दुराचरण को उजागर करने, वेतन के मानक स्थापित करने, काम के हालात में सुधार तथा मालिकों और सरकार के साथ मोलतोल में मजदूरों के राजनीतिक और आर्थिक हितों का प्रतिनिधित्व सौ साल से मजदूर यूनियनें कर रही हैं । 1970 दशक के बाद से संगठित मजदूर वर्ग का आकार और वैश्विक ताकत घटी है तथा पूंजी का प्रभाव नाटकीय रूप से बढ़ा है । नवउदारवाद, वित्तीकरण और लोभी साम्राज्यवाद की वापसी के समक्ष मौजूदा यूनियनें टूट फूट और उथल पुथल का शिकार हैं । नयी और आधुनिक यूनियनें खुद को हालात के मुताबिक ढाल रही हैं और वर्ग सचेत मजदूरों के जुझारू आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं । वे उनके लिए एकजुटता बढ़ाने की भी कोशिश में लगी हैं । एक ओर संगठित मजदूर की ताकत तो कम हो रही है लेकिन उसके साथ ही दक्षिणी गोलार्ध में मजदूर वर्ग का जुझारूपन और प्रतिरोध बढ़ रहा है ।  

हाल के दिनों में ये आंदोलन पारम्परिक ट्रेड यूनियनों की सीमा के बाहर से पैदा हुए । असल में समूची दुनिया की तरह हमारे देश में भी ट्रेड यूनियन आंदोलन संगठित उद्योग जगत के श्रमिकों के साथ जुड़ा रहा है । बहुत कुछ इसी वजह से यह नया श्रमिक समूह उसकी नजर से बाहर रहता है । ऐसे में उसकी समस्याओं के हल का कोई औपचारिक रास्ता नहीं बनता । ऐसे में ये आंदोलन आकस्मिक विस्फोट की तरह उभर आते हैं । दुर्भाग्य से बौद्धिक समूह के मध्यवर्गीय आग्रहों के चलते ये श्रमिक सार्वजनिक विमर्श से बाहर रहते हैं । इसलिए इनको बदनाम और दंडित करना सरकार और प्रशासन के लिए आसान हो जाता है । इसके बावजूद इनके भीतर खुद ही संगठित होने की शुरुआत हुई है । उनके सामने अतीत का कोई उदाहरण नहीं है इसलिए उन्हें अपनी रक्षा और अधिकार की लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है । इनकी अरक्षित जीवन स्थिति ने इन्हें बेहद जुझारू बना दिया है ।