2023
में
पालग्रेव मैकमिलन से फ़्रंचिस्का दे हान के संपादन में
‘द पालग्रेव हैंडबुक आफ़ कम्युनिस्ट वीमेन ऐक्टिविस्ट्स
एराउंड द वर्ल्ड ’ का
प्रकाशन हुआ । संपादकीय भूमिका समेत किताब के छह हिस्सों में छब्बीस लेख संकलित हैं
। सबसे पहले वैश्विक पुरखिनों, फिर
यूरोप, एशिया,
अफ़्रीका
और मध्य पूर्व, आस्ट्रेलिया
और न्यूज़ीलैन्ड तथा अमेरिकी भाग की कार्यकर्ताओं का विवेचन किया गया है । कहानी
अर्जेन्टिना की कम्युनिस्ट पार्टी की अध्यक्ष को श्रद्धांजलि से शुरू होती है । वे
बहुत समय तक स्त्री संघ की नेता रहीं । इसी तरह चीन में भी कम्युनिस्ट पार्टी के
नेताओं में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही । इसके बावजूद कम्युनिस्ट इतिहास
में पार्टी के पुरुष ही नेताओं का जिक्र आता है । इसके विपरीत इस किताब के पचीस
अध्यायों में दुनिया भर की ऐसी तमाम नेताओं का जिक्र है जिन्होंने कम्युनिस्ट
आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । इसके लिए उन्होंने स्त्रियों को पार्टी में
भरती किया, वर्गीय की जगह स्त्री संगठनों की स्थापना की और कम्युनिस्ट पार्टी में
मौजूद पुरुषवादी रुझान से संघर्ष किया । सिद्धांत के मोर्चे पर भी उन्होंने ऐसी
समझ बनायी जिसमें वर्ग के साथ ही नस्ल और लिंग का सवाल भी शामिल रहे । इन
स्त्रियों के जीवन, योगदान और संघर्षों को वैश्विक नजर से देखा गया है । ऐसा
कम्युनिज्म के यूरोप और एशिया केंद्रित इतिहास से आगे बढ़ने के लिए किया गया है ।
इन स्त्रियों का सही मूल्यांकन न होने की बड़ी वजह यह मान्यता है कि वे भी समकालीन
कम्युनिस्टों की नारीवाद विरोधी सोच के असर में रही होंगी । उनका कहना है कि
कम्युनिस्टों द्वारा नारीवादी आंदोलन को बुर्जुआ आंदोलन मानने से यह नहीं साबित
होता कि स्त्रियों के सवालों को ही दरकिनार किया जाता रहा था । इन स्त्री नेताओं
के कामों का अवमूल्यन इस मान्यता की वजह से भी हुआ कि उन पर शीतयुद्ध की राजनीति
का दबाव था । स्त्रियों की हैसियत और अधिकार बढ़ाने हेतु नीतियों और कानूनों के
निर्माण की उनकी वास्तविक इच्छा में इसका स्रोत नहीं देखा गया ।
इस किताब
में शामिल पचीस राजनीतिक जीवनियों से जाहिर है कि ये नेता बुर्जुआ स्त्री आंदोलन
के प्रति अपनी राय के बावजूद स्त्री जीवन में सुधार की गहरी आकांक्षा से परिचालित
थीं । इसके लिए उन्होंने चतुर्दिक व्याप्त पुरुष प्रभुत्व को पहचाना और उसे चुनौती
दी । यह प्रभुत्व समूची दुनिया के साथ ही समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टियों के
भीतर भी समाया हुआ था । पितृसत्ता के प्रति इसी जागरूकता के कारण उन्होंने स्त्री
संगठनों, स्त्रियों के अखबारों, कार्यक्रमों आदि पर जोर दिया । इसके लिए भले ही
उन्हें इन ढांचों और गतिविधियों की उपेक्षा या उन्हें समाप्त करने के प्रयासों से
टकराना पड़ा । इसी वजह से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्त्री अधिकारों को
आगे ले जाने का उन्होंने काम किया । चूंकि वे स्त्री उत्पीड़न को उत्पीड़न के अन्य
रूपों के साथ जोड़कर देखती थीं इसलिए उन्होंने उदार नारीवादी अमूर्त जेंडर समता की
जगह स्त्री के राजनीतिक और समाजार्थिक अधिकारों की हिमायत की । इस क्रम में सबसे
पहले तीन वैश्विक पुरखिनों का जिक्र किया गया है । जर्मनी की क्लारा जेटकिन, रूस
की अलेक्सांद्रा कोलोन्ताइ और त्रिनिदाद की क्लाडिया जोन्स शामिल हैं । किताब के
वैश्विक आयाम का अंदाजा दूसरे हिस्से की तीन नेताओं से भी होता है जिनमें माली की
आओआ केइता, क्यूबा की विल्मा एस्पिन और वियतनाम की गुयेन थी बिन्ह शामिल हैं ।
तीसरे हिस्से में इतिहास का संक्षिप्त लेखा जोखा है । चौथे हिस्से में इन
स्त्रियों की प्रेरणा, योगदान और उपलब्धियों की चर्चा है । आखिरी पांचवें हिस्से
में किताब की योजना और उसके लक्ष्य का विवरण है ।
जिन तीन
पुरखिनों का जिक्र हुआ उन सबने समाजवाद और कम्युनिज्म के हित में विशेष योगदान
किया । क्लारा जेटकिन के राजनीतिक जीवन की शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी स्त्री
आंदोलन के निर्विवाद नेता के रूप में हुई जब उन्होंने 1889 में दूसरे इंटरनेशनल के
पेरिस में आयोजित स्थापना सम्मेलन में स्त्रियों के काम और मजदूर आंदोलन में उनकी
भूमिका पर व्याख्यान दिया । उनकी बातें अगस्त बेबेल की स्त्री और समाजवाद शीर्षक
1879 की किताब से प्रभावित थीं । उन्होंने इसे किताब से अधिक घटना का दर्जा दिया
था । प्रतिबद्ध मार्क्सवादी होने के नाते उनका मानना था कि स्त्री उत्पीड़न का मूल
वर्ग आधारित आर्थिक शोषण है । इसे यूं भी कहा जा सकता है कि लैंगिक विषमता की जड़
आर्थिक ढांचे में है । बेबेल से उनकी सहमति यह थी कि स्त्री को सबसे पहले पुरुष से
आर्थिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए । इसकी कुंजी काम में उनकी भागीदारी है । आर्थिक
स्वतंत्रता से सामाजिक आत्म निर्भरता की राह खुलेगी । वे यह भी मानती थीं कि
स्त्री की यह सामाजिक आत्मनिर्भरता और तज्जनित बराबरी समग्र मानव मुक्ति के लिए
आवश्यक है । उनकी विशेषता यह भी थी कि वे स्त्रियों के अलग संगठन के पक्ष में थीं
। जर्मनी के मजदूर आंदोलन में अपनी लम्बी सहभागिता के अनुभव से वे इस नतीजे पर
पहुंची थीं । इससे पार्टी को स्त्रियों को संगठित करने में भारी सफलता मिली थी ।
इसके साथ 8 मार्च का अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी उनका प्रस्ताव था । इसकी शुरुआत
स्त्री मताधिकार की मांग पर जोर देने के लिए हुई थी । कोमिंटर्न के स्त्री पहल के केंद्र
में भी क्लारा रहीं । इस दौरान सोवियत संघ में उनकी मुलाकातें लेनिन से अक्सर होती
रहीं । उनके साथ स्त्री प्रश्न पर लम्बे वार्तालाप मशहूर हैं । इनका प्रकाशन लेनिन
के निधन के साल भर बाद हुआ था । मजदूर आंदोलन में मौजूद पितृसत्ता की सोच से लड़ने
में उन्होंने बहुत समय दिया । 1930 दशक में वे अमेरिका की नस्लवाद विरोधी
अंतर्राष्ट्रीय गोलबंदी में भी सक्रिय रहीं । एंजेला डेविस ने उनकी इस भूमिका को
रेखांकित किया है । स्त्री अधिकार, शांति, फ़ासीवाद विरोध और अंतर्राष्ट्रीय
एकजुटता के क्षेत्र में उनकी सक्रियता की विरासत 1933 में उनके निधन के बाद भी
कायम रही । कोलोन्ताइ ने आत्मकथा में सोवियत संघ में सर्वहारा स्त्रियों के जमीनी
संगठन बनाने में उनकी प्रेरणा को याद किया है । उनका जर्मन अनुभव अंतर्राष्ट्रीय
समाजवादी स्त्री आंदोलन के लिए पूंजी साबित हुआ । मेक्सिको की एक स्त्री
कार्यकर्ता रीलू के सम्मेलन में भाग लेने जब सोवियत संघ गयीं तो उनकी मुलाकात
क्लारा से हुई थी । उन्होंने अपने संस्मरणों में उनके व्याख्यान को याद किया ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भी उनकी विरासत जिंदा रही । यूरोप और एशिया के स्त्री
संगठनों और उनके नेताओं ने उनकी याद को जिंदा रखा । उनका सबसे जीवंत स्मारक तो 8
मार्च का अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है जिसे सामूहिक स्मृति में कायम रखने में वाम
आंदोलन का भारी योगदान रहा है ।
इसी तरह की
दूसरी नेता अलेक्सांद्रा कोलोन्ताइ थीं जिन्हें उनके जीवन में तो विश्वव्यापी ख्याति
मिली ही, आज
भी उन्हें सर्वकालिक कम्युनिस्ट नेता के बतौर याद किया जाता है । हाल के दिनों में
क्लारा जेटकिन की तरह उनके जीवन के बारे में फिर से रुचि पैदा हुई है । वे दुनिया की
पहली स्त्री थीं जो किसी सरकार में मंत्री बनीं । अक्टूबर क्रांति के बाद की बोल्शेविक
सरकार में समाज कल्याण मंत्री रहते हुए उन्होंने तलाक,
पंजीकृत
विवाह, अवैध
बच्चों के अधिकार की समानता तथा मातृत्व और बचपन की सुरक्षा के अनेक कानूनी प्रावधान
तैयार करने के काम में भाग लिया । पार्टी की केंद्रीय समिति में स्त्री विभाग की स्थापना
में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा । ट्रेड यूनियनों को अधिक अधिकार देने की वकालत भी
उन्होंने की । नार्वे में जब उन्हें राजदूत बनाया गया तो वे दुनिया की पहली राजदूत
स्त्री थीं । यौनिक मुक्ति के लिए उन्होंने नयी नैतिकता की वकालत की और इसे व्यक्त
करने वाले उपन्यास भी लिखे । आधुनिक स्त्री की नयी पहचान और यौनिकता के बारे में लेखन
के कारण भी वे मशहूर रहीं । दूसरी नारीवादी लहर में उनका इस तरह का लेखन फिर से छपा
और चर्चित हुआ ।
संपादक
उनके प्रभाव को इसी पहलू तक सीमित रखने का विरोध करती हैं । वे यह भी नहीं मानतीं
कि राजदूत के बतौर सोवियत संघ से बाहर रहने के कारण वे गायब हो गयीं । उपन्यासों
के लेखन से पहले भी उन्होंने स्त्रियों के बारे में वैज्ञानिक छानबीन के आधार पर
बहुत कुछ लिखा । इसमें समाज और मातृत्व के बारे में 1916 में लिखी 600 पृष्ठों की
किताब भी शामिल है जिसमें उन्होंने मातृत्व को ऐसी सामाजिक जिम्मेदारी माना जिसमें
स्त्री और समाज सहभागी होते हैं । उनका यह सिद्धांत बोल्शेविक नारीवाद की
मूलभित्ति बना । आज भी समाजवादी शासन और वाम स्त्री संगठनों के काम में इस धारणा
की मौजूदगी देखी जा सकती है । स्वीडेन में पंद्रह साल तक राजदूत रहने की वजह से
वहां के स्त्री आंदोलन के साथ भी उनका सम्पर्क बना । उस देश के प्रगतिशील स्त्री
समूह कोलोन्ताइ को अपनी प्रेरणा स्वीकार करती हैं । लीग आफ़ नेशंस में भी सोवियत
संघ का प्रतिनिधित्व तीन साल तक कोलोन्ताइ ने किया और अपने कार्यकाल में स्त्रियों
की कानूनी स्थिति की जांच पड़ताल करायी । वे सभी सदस्य देशों में स्त्री की कानूनी
समता के लिए संधि की पैरोकार भी थीं । फ़ासीवाद विरोधी स्त्री अभियान में भी उनकी
सक्रिय भागीदारी रही । घरेलू काम के असमान वितरण के सवाल पर वैचारिक जागृति की
उन्होंने जरूरत महसूस की ।
क्लारा
जेटकिन और कोलोन्ताइ की कहानियां उतनी ही नहीं हैं जितनी इस किताब में बतायी गयी
हैं फिर भी सबने उनको अग्रणी समाजवादी और कम्युनिस्ट स्त्री नेता माना है । इनके
साथ संपादक ने क्लाडिया जोन्स को भी शामिल किया है । इसकी मुख्य वजह मार्क्सवादी
सिद्धांत के क्षेत्र में उनका योगदान है । वे बचपन में ही परिवार के अन्य सदस्यों
के साथ त्रिनिदाद से अमेरिका आ गयी थीं और कम्युनिस्ट पार्टी की युवा शाखा में
शरीक हुईं । उन्होंने बहुतेरे सैद्धांतिक हस्तक्षेप किये । वे पार्टी की स्त्री
आयोग की सचिव रहीं । आयोग ने स्त्री के बारे में जो समझ बनायी उसकी वजह से पार्टी
को बहुत सारे बदलाव करने पड़े । उन्होंने माना कि पुरुष प्रभुता सभी मामलों में
कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रगति में बाधा है इसलिए इसका विरोध होना चाहिए । पार्टी की
इस समझ के बावजूद अश्वेत स्त्री की उपेक्षा जारी रही जिसके विरोध में क्लाडिया
जोन्स ने अभियान चलाया । इस तरह उन्होंने उस सवाल पर विचार किया जिसे मार्क्स और
लेनिन ने भी चर्चा से बाहर रखा था । क्लारा द्वारा स्त्री प्रश्न पर लेनिन की राय
वाली पुस्तिका के अमेरिकी संस्करण की भूमिका में क्लाडिया जोन्स ने अश्वेत कामगार
स्त्री को इस संघर्ष का नेता बनाने का सुझाव दिया और इस तरह लिंग, नस्ल और वर्ग की
आपसदारी को रेखांकित किया । इस तरह के रिश्ते के लिए फिलहाल जिस इंटरसेक्शनल शब्द का
प्रयोग किया जाता है उसकी पहली स्पष्ट झलक क्लाडिया जोन्स के लेखन में मिलती है । उनके
ये विचार अमेरिका के बाहर भी फैले । उनके प्रभाव में ही हंगरी में आयोजित
1948 के एक सम्मेलन की अमेरिकी प्रतिनिधि ने अश्वेत स्त्री
को नस्ली और लैंगिक भेदभाव के साथ सबसे कम पगार पाने वाली मजदूर के बतौर तिहरे शोषण
का शिकार बताया था ।
संपादक का कहना
है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के इस क्रांतिकारी चिंतन को चर्चा से बाहर रखने में
शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका के कम्युनिस्ट विरोधी दमन का हाथ है । इस दमन ने इतिहास
लेखन के लिए आवश्यक स्रोत भी नष्ट कर दिये । इसी दमन अभियान के तहत क्लाडिया जोन्स
को 1954 में कारावास
और 1955 में देशनिकाला
मिला । लंदन में रहकर उन्होंने पहला अश्वेत अखबार शुरू किया,
कैरीबियाई
समुदाय को संगठित करने में मदद की और वामपंथी उपनिवेशवाद विरोधी वैश्विक आंदोलन में
सक्रिय भागीदारी की । पिछले दस पंद्रह सालों में अश्वेत क्रांतिकारी स्त्रियों के इस
इतिहास का उत्खनन शुरू हुआ है ।
संपादक के
अनुसार किताब में जिन पचीस नेताओं की जीवनी है उन सबका संक्षेप में परिचय मुश्किल
है फिर भी माली, क्यूबा और वियतनाम की तीन कार्यकर्ताओं का जिक्र उन्हें जरुरी
लगता है । आओआ कीता नामक नेता माली को 1960 में हासिल हुई आजादी के आंदोलन की सबसे
प्रभावशाली नेता मानी जाती हैं । उनका जीवन उपनिवेशवाद विरोध, राष्ट्रवाद, नारीवाद
और अफ़्रीकावाद से जुड़ा था । वे देश और दुनिया में स्त्रियों के राजनीतिक संगठन के
काम में लगी रहीं । कम्युनिस्ट दुनिया के साथ उनके रिश्तों का मकसद आत्म निर्णय और
स्त्री मुक्ति के अधिकार की रक्षा हेतु समर्थन जुटाना था । क्यूबा की नेता विल्मा
एस्पिन को फ़िदेल के विचारों की व्याख्याता का दर्जा हासिल है । वे ऐसा मानती हुई
प्रतीत होती हैं कि फ़िदेल कास्त्रो उनके बौद्धिक नेता हैं लेकिन यह छवि उनकी
स्वतंत्र सत्ता के साथ न्याय नहीं कर पाती । क्यूबा की क्रांति में उनकी राजनीतिक
भूमिका केंद्रीय थी । अनेक सुधारों के पीछे उनकी प्रेरणा रही है । उन्होंने क्यूबा
की क्रांतिकारी प्रक्रिया को वैश्विक पूंजीवाद और साम्राज्यवाद विरोध के साथ जोड़ा
। वियतनाम की गुएन थी बिन्ह वियतनाम की अस्थायी क्रांतिकारी सरकार में
1969 से 1975 तक
विदेश मंत्री रहीं । वे वियतनाम के स्त्री संघ की उपाध्यक्ष रहीं और युद्ध के उपरांत
देश की शिक्षा मंत्री तथा उप राष्ट्रपति रहीं । वे क्रांति के लिए आग के साथ फूल का
भी काम करती रहीं । वे तीसरी दुनिया के नारीवाद का साकार रूप थीं । उनके व्यक्तिव में
नारीवाद और क्रांति, आधुनिकता
और परम्परा तथा विनम्रता और दृढ़ता का संयोग था । इसी किस्म के नारीवाद ने बीसवीं सदी
में दक्षिणी गोलार्ध के अनुपनिवेशीकरण के संघर्षों को सफलता की मंजिल तक पहुंचाया ।