Thursday, July 9, 2026

दक्षिणपंथ और फ़्रैंकफ़र्त स्कूल

 

2026 में वर्सो से ए जे ए वुड्स की किताब ‘द कल्चरल मार्क्सिज्म कनस्पिरेसी: ह्वाइ द राइट ब्लेम्स द फ़्रैंकफ़र्त स्कूल फ़ार द डिक्लाइन आफ़ द वेस्ट’ का प्रकाशन हुआ । 2021 के अंत में आक्सफ़ोर्ड शब्दकोष में सांस्कृतिक मार्क्सवाद को जोड़ा गया । इस शब्द का अतीत विवादित रहा था । 1930 दशक के हिटलरी प्रचार में इसके मूल खोजे जा सकते हैं । फ़ासीवादियों की एक अंग्रेजी पत्रिका में 1938 में इसका पहली बार इस्तेमाल हुआ था । इस बदनाम इतिहास के वावजूद इसकी लोकप्रियता बढ़ी है । परिसरों और सड़कों पर इसके दमन की अपील के पोस्टर लगाये गये । रिपब्लिकन पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं ने अमेरिका के पराभव के लिए इस विचार को जिम्मेदार ठहराते हुए किताबें लिखी हैं । इसी तरह लैटिन अमेरिका के दक्षिणपंथी शासकों ने अपनी सरकार को इस वामपंथी बीमारी से दूर रखने का इरादा जाहिर किया । ब्रिटेन में भी कनजर्वेटिव पार्टी के सांसद इस विचार पर युवकों का दिमाग खराब करने का आरोप लगाते हैं । ट्रम्प समर्थक एलन मस्क ने भी इस सिलसिले में विकिपीडिया के एक लेख में इसे झूठ मूठ का हौवा बताये जाने पर चिंता जाहिर की । धीरे धीरे यह शब्द दक्षिणपंथ की शब्दावली में जगह बनाता जा रहा है । हमारे देश से तुलना करें तो इस तरह का शब्द अर्बन नक्सल या टुकड़े टुकड़े गैंग है । इस शब्द के जरिए दक्षिणपंथ बताना चाहता है कि पश्चिमी समाजों की संस्कृति विगत साठ सालों में क्यों बदली ।

उनका कहना है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल नामक जर्मन विचारकों के एक समूह ने पश्चिमी सभ्यता के अवसान को तेज गति प्रदान करने के लिए सांस्कृतिक बहुलता, नारीवाद और पर्यावरण की विचारधाराओं का आविष्कार किया । असल में हिटलरी आतंक से भागकर अमेरिका आये अडोर्नो और मार्क्यूज जैसे चिंतकों ने वहां के साठ दशक के विद्रोही आंदोलनों में अपने विचार सफलता के साथ फैलाये । बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उनके समर्थक विभिन्न संस्थानों में दाखिल हुए और उन्होंने शिक्षा, मीडिया, सरकार और चर्च में सांस्कृतिक मार्क्सवाद को प्रोत्साहित किया । हाल में दक्षिणपंथी विचारक अश्वेत आंदोलन, समलिंगी और भिन्न यौनिकता वाले समूहों की मजबूत दावेदारी तथा जलवायु संकट पर चर्चा के पीछे इसको ही दोषी ठहराया है । अमेरिका के अतिरिक्त भी बहुत सारे देशों में इस खतरे से समाज को बचाने के लिए रूढ़िवादी ताकतें सांस्कृतिक युद्ध ठाने हुए हैं ।

इसके बाद लेखक ने इन दोनों शब्दों के अर्थ जानने का प्रयास किया है । रूढ़िवादी आलोचकों को लगता है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल ने 1930 दशक में कम्युनिस्ट विध्वंस की नयी रणनीति बनायी । मजदूरों की कोई अगुआ कम्युनिस्ट पार्टी बनाने या कारखानों पर सीधे कब्जा करने की जगह उन्होंने पश्चिमी पूंजीवाद के उन्मूलन के लिए बुर्जुआ समाज के सांस्कृतिक औजारों में घुसपैठ की योजना बनायी । इन केंद्रों पर काबिज हो जाने के बाद सांस्कृतिक मार्क्सवादियों ने विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों की मांगों को स्वर देना शुरू किया और इस तरह गोरी बहुसंख्या की सभ्यतागत विरासत को तहस नहस कर डाला । आरोप है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के इन विद्रोहियों को यकीन था कि पश्चिमी संस्कृति के विनाश से मार्क्सवादी समता का सपना साकार होगा । इस दक्षिणपंथी धारणा के मुताबिक संस्कृति तो देसी आबादी के मूल्यों को ही प्रतिबिम्बित करती है । इन्हीं मूल्यों के धागे से किसी भी देश के नागरिक तमाम शत्रुता और मतभिन्नता के बावजूद आपस में जुड़े बताये जाते हैं । संस्कृति के बारे में इस धारणा से लेकिन 1960 दशक के बाद के सामाजिक बदलावों की सटीक व्याख्या नहीं मिल पाती । कारण कि अल्पसंख्यकों की अधीनता को इसमें स्वाभाविक माना जाता है । ऐसी स्थिति में रूढ़िवादी लोग मानते हैं कि पश्चिम के विनाश के लिए किसी बाहरी शक्ति ने सांस्कृतिक उत्पादन के घटकों पर कब्जा कर लिया है । अपनी रक्षा के लिए सांस्कृतिक मार्क्सवाद के ये विरोधी सार्वजनिक जीवन से सांस्कृतिक चेतना के रेशे रेशे को समाप्त करने के लिए कानून बनवाते हैं, जीवनशैली में बदलाव की वकालत करते हैं या फिर हिंसा का सहारा लेते हैं । वे फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के समर्थकों पर ऐसी जादुई शक्ति आरोपित करते हैं जो सभी किस्म के अंतर्विरोधों और विपरीत दिशा में सक्रिय ताकतों पर काबू पा लेती है ।

इसमें तो कोई दो राय नहीं कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल का महत्व ऐतिहासिक रहा है । 1923 में इसकी स्थापना मार्क्सवादी बौद्धिकता को सांस्थानिक आधार देने के लिए हुई थी । इस संस्थान के चिंतकों ने हेगेलीय दर्शन, मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र और फ़्रायड के मनोविश्लेषण को जोड़कर सामाजिक आलोचना का रास्ता निकाला जिसे आलोचना सिद्धांत कहा गया । उनके लेखन से आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता की प्रकृति, फ़ासीवादी प्रचार की गतिकी तथा कला और संस्कृति के वस्तूकरण के बारे में अंतर्दृष्टि मिलती है ।

इस समूह के अनेक सदस्य तीस के दशक में हिटलरी शासन के चलते भागे और उन्हें अमेरिका में शरण मिली तथा शोध व अध्यापन का रोजगार भी मिला । 1960 के दशक में मार्क्यूज ने विद्यार्थी आंदोलन का उत्साह के साथ समर्थन किया और उन्हें नव वाम का गुरू भी कहा गया । फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के कुछ विद्यार्थी अध्यापन में भी बहुत सफल रहे । कुछ तो वामपंथ के महत्वपूर्ण कार्यकर्ता हुए । आज भी उनके लेखन की लोकप्रियता बरकरार है । उनकी किताबों के नये संस्करण छपते और पढ़े जाते हैं । यह किताब इस समूची प्रक्रिया के बहुत सीमित अंश का विश्लेषण करती है । इसमें केवल उनके तर्कों का ही जिक्र है जो मानते हैं कि पश्चिम के सभ्यतागत पराभव की जिम्मेदारी फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के सांस्कृतिक मार्क्सवाद पर है । इसमें कुछ सांस्कृतिक गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास है । पहली कि सांस्कृतिक पराभव को जर्मन मार्क्सवादियों के इस समूह से जोड़ने की कहानी क्यों बनायी गयी । प्रतिक्रियावादी ताकतों को आज भी इस कहानी में यकीन क्यों है । सांस्कृतिक मार्क्सवाद को षड़यंत्र की तरह देखने का चलन किस तरह आगे बढ़ा ।

अन्य विद्वानों ने भी इन सवालों का जवाब देने की कोशिश की है । उनका कहना है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद का यह हौवा पुराने यहूदी मार्क्सवाद या बोल्शेविक सांस्कृतिक हमले के हौवे का ही नया रूप है । एक जमाने में यह भी माना जाता था कि कम्युनिस्ट विचारधारा यहूदियों का षड़यंत्र है । इसके विश्वासी लोगों का कहना था कि रूस और अन्य देशों की कम्युनिस्ट क्रांतियों का असली मकसद ईसाइयत को पश्चिम से उखाड़ फेंकना है । द्वितीय विश्वयुद्ध के आसपास सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले का प्रचार हिटलर का तंत्र करता था । कहा जाता था कि यहूदी लोग पश्चिमी संस्कृति को नष्ट करने की गुपचुप कोशिश कर रहे हैं और कम्युनिस्ट आंदोलन को इसी उद्देश्य से खड़ा किया गया है । इस धारणा के स्रोत हिटलर की किताब में नस्ल और संस्कृति के बारे में व्यक्त विचार थे । एक हिटलरी सिद्धांतकार ने तो नस्ली सौंदर्यशास्त्र की धारणा भी बनायी थी । वे आधुनिकतावाद को पतनशील कला कहते थे और मानते थे कि यहूदी कम्युनिस्ट चालबाजी के तहत इसे फैलाया जा रहा है ।

यह तो सही है कि इन पुराने विचारों और सांस्कृतिक मार्क्सवाद के हल्ले के बीच बहुत सारी समानता है । 1938 में ही ब्रिटेन के फ़ासिस्टों ने सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले को सांस्कृतिक मार्क्सवाद कहा था । उनके द्वारा दिये गये इस नाम को लोग भूल गये थे । वह तो इसे फिर से 1990 दशक के पूर्वार्ध में यह नाम दिया गया । वर्तमान दक्षिणपंथी कार्यकर्ता और लेखक इस बात पर जोर देते हैं कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के अनेक सदस्य यहूदी थे । इस तरह वे कहना चाहते हैं कि सांस्कृतिक पतन की दिशा में सोचना उनके लिए आनुवंशिक तौर पर सहज था । इंटरनेट पर फ़ासीवादी कोश में भी सांस्कृतिक मार्क्सवाद और सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले को समानार्थी बताया गया है ।

इन सबके बावजूद लेखक को लगता है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद की इस नयी धारणा और पुरानी समानार्थक धारणाओं में अंतर है । इनको समान समझने के पीछे मान्यता है कि इनकी अंतर्वस्तु इनकी अभिव्यक्तियों की भिन्नता के बावजूद एक समान ही बनी हुई है । इस मान्यता में विचारों की खासियत की उपेक्षा नजर आती है और मान लिया जाता है कि समस्त दक्षिणपंथी राजनीति बुनियादी तौर पर एक समान ही होती है । लेखक मानते हैं कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद की शब्दावली और फ़्रैंकफ़र्त स्कूल को षड़यंत्र की तरह देखने का एक और भी इतिहास है । इसके बाद यह शब्दावली और धारणा हिटलरी शब्दकोष में घुसी और बोल्शेविक सांस्कृतिक हमले का समानार्थी बनी । इस जटिल कहानी पर ध्यान देने की जरूरत लेखक को महसूस होती है । इसके बिना सांस्कृतिक मार्क्सवाद को षड़यंत्र के रूप में पेश करने का इतिहास अच्छी तरह समझना मुश्किल है ।

इस इतिहास में गोता लगाने से पहले वे अपनी शब्दावली पर गौर करना जरूरी समझते हैं । इसके तहत वे षड़यंत्र सिद्धांत की धारणा की चीरफाड़ करते हैं । इसके लिए वे फ़ूको से विश्लेषण के औजार लेते हैं । उनका कहना है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद का अर्थ प्रयोग के राजनीतिक संदर्भ के अनुसार बदलता रहा है । इसलिए किसी एक सांस्कृतिक मार्क्सवाद की जगह अनेक सांस्कृतिक मार्क्सवादों की बात करनी होगी । उसके बदलते अर्थों को संदर्भ देते हुए इसका इतिहास बनाने की कोशिश इस किताब में की जाएगी । उसे षड़यंत्र सिद्धांत के बतौर प्रस्तुत करना सबसे नया मामला है । अलग अलग राजनीतिक संदर्भों में इसके अर्थ, भूमिका और उपयोग बदलते रहे हैं । इस नजरिए से यह समझने में मदद मिलेगी कि दक्षिणपंथी लेखक और कार्यकर्ता नये श्रोताओं के मुताबिक और नयी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए इसके अर्थ को अनुकूलित करते रहे हैं ।

सही संदर्भ प्रदान करने की इस पद्धति में लेखक ने समय का विशेष ध्यान रखा है । विश्लेषण की इस पद्धति की प्रेरणा उन्हें ग्राम्शी से मिली है । ग्राम्शी ने किसी खास ऐतिहासिक दौर में राजनीति, संस्कृति और अर्थतंत्र के जटिल रिश्तों को पहचानने लायक मार्क्सवादी विश्लेषण का तरीका विकसित किया । पूंजीवादी उत्पादन पद्धति जैसी मार्क्स की अनेक धारणाओं को भी इसी तरह का अमूर्तन समझा जा सकता है जो पूंजीवादी समाज के बुनियादी लक्षणों को उजागर करते हैं । इस विश्लेषण के तहत पूंजीवादी विकास के खास दौर में किसी भी समाज के हालात की परीक्षा की जाती है । यह ऐसा क्षण होता है जब विभिन्न तरह की ताकतें या घटक आपस में मिलकर उस भूमि का निर्माण करते हैं जिस पर वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष संचालित किया जाता है । इस विश्लेषण में ग्राम्शी आंगिक और सामयिक के बीच भेद करते हैं ।

आंगिक किसी भी सामाजिक गठन के अपेक्षाकृत स्थायी लक्षण होते हैं । आंगिक तथ्य वे संबंध होते हैं जो किसी भी समाज के दैनन्दिन जीवन में समा गये होते हैं । इसके उदाहरण श्रम संबंध, आर्थिक ढांचा, सरकारी संस्थान, सांस्कृतिक व्यवहार और कानूनी प्रक्रिया हैं । राजनीतिक उथल पुथल या बाजार के उतार चढ़ाव से इन तत्वों पर बहुत असर नहीं पड़ता । सामान्य तरीके से कहें तो आंगिक का अर्थ यथास्थिति भी निकलता है । जब इस यथास्थिति को संकट का सामना करना पड़ता है तो संघर्ष का सामयिक इलाका खुल जाता है । आंगिक संकट पूंजीवादी विकास के अंतर्निहित शत्रुतापूर्ण संबंधों की उग्रतर अभिव्यक्ति होते हैं । इसमें सामान्यता बाधित हो जाती है, पहले से चले आ रहे तौर तरीकों को चुनौती का सामना करना पड़ता है और पारम्परिक सहजबोध गड़बड़ा जाता है । इस आंगिक संकट से निपटने और यथास्थिति के संरक्षण के लिए प्रभुत्वशील ताकतें संघर्ष के सामयिक क्षेत्र में उतरती हैं । सामाजिक समस्याओं को काबू करने के लिए वे नयी नीतियों का प्रस्ताव कर सकते हैं, विक्षोभ से निपटने के लिए पुलिस की शक्तियों को बढ़ा सकते हैं या बजट के घाटे को कम करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में कटौती की घोषणा कर सकते हैं । संतुलन हासिल करने के लिए वे अन्य समूहों से समझौता कर सकते या मोर्चा बना सकते हैं । ऐसी स्थिति में वैकल्पिक या विपक्षी राजनीति करने वालों को जनता के सामने संकट का अपना समाधान प्रस्तुत करना चाहिए । इन प्रयासों की सफलता का मूल्यांकन सबको कायल करने की और सामाजिक शक्तियों के मौजूदा संतुलन को बदलने की उनकी क्षमता के आधार पर किया जा सकता है । नया शक्ति संतुलन स्थापित करने या वर्चस्व की नयी व्यवस्था कायम करने के ये सामयिक प्रयास उथल पुथल की जगह सामाजिक स्थिरता कायम करने की ओर लक्षित होते हैं ।

लेखक का सवाल है कि सांस्कृतिक मार्क्सवादों के अध्ययन में विश्लेषण की इस पद्धति का इस्तेमाल किस तरह किया जाए । वे सबसे पहले याद दिलाते हैं कि यह धारणा किसी के दिमाग में यूं ही नहीं पैदा हो जाती । इसका जन्म सामयिक संघर्ष की गरमी में होता है । खास राजनीतिक ताकतों के वैचारिक मकसद को पूरा करने के लिए इनका निर्माण किया जाता है । आम लोगों को संकट के कारण से अवगत कराना होता है और बेहतर समाज के किसी खास नमूने के पक्ष में उनका समर्थन हासिल करना होता है । सामयिक विश्लेषण से वह भूमि स्पष्ट होती है जहां ये ताकतें पैदा और गोलबंद होती हैं । इस विश्लेषण से नजर आ सकता है कि कोई खास ताकत क्यों अलग किस्म की राजनीति करती है और क्यों कुछ ही समस्याओं को उठाने का फैसला करती है । किताब में ऐसा कोई अंतिम विश्लेषण मुहैया कराने का दावा लेखक ने नहीं किया है । इस दिशा में सोचने और लिखने के लिए तो एकाधिक लोगों के सामूहिक प्रयास की जरूरत होगी । कोई भी एक लेखक उन तमाम ताकतों, दबावों, प्रवृत्तियों, तनावों, शत्रुताओं और अंतर्विरोधों को पकड़ नहीं सकता जिनसे मिलकर कोई भी खास समय बनता है । सामयिक विश्लेषण की दीर्घकालीन परम्परा पर आश्रित रहने के बावजूद लेखक को अपना विश्लेषण आंशिक और तदर्थ ही लगता है । इसके जरिए उन्होंने देखा है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद के विचारों का उत्पादन और प्रसार कैसे सम्भव हुआ । इसके लिए उन्होंने काल और भूगोल की सीमा पहले ही तय कर ली है । उन्हें उम्मीद है कि अन्य लोग इसे विस्तार और गहराई प्रदान करेंगे । इसी क्रम में लेखक द्वारा प्रस्तुत तर्कों और व्याख्याओं को भी आगे ले जाया जाएगा । वैसे भी इस सांस्कृतिक मार्क्सवाद की कहानी का अभी अंत नहीं हुआ है ।

उन्होंने पहले ही कहा कि बोल्शेविक सांस्कृतिक हमले और सांस्कृतिक मार्क्सवाद में समानता तो है लेकिन कहानी की शुरुआत 1920 या 1930 दशक से नहीं होती । विश्लेषण हेतु वे 1960 दशक से इसकी शुरुआत मानते हैं । इसकी समझ के लिए साठ के दशक के तमाम तरह के बदलावों और संयोजनों को देखना वे जरूरी समझते हैं । उस दशक को वे मई 1968 तक ही सीमित नहीं मानते । वे मानते हैं कि यह दशक 1955 से 1974 तक फैला हुआ है और इसका विस्तार वैश्विक था । इस लम्बे दशक ने क्रांति, विक्षोभ और प्रतिसंस्कृति की सम्भावना को जन्म दिया । इसी दशक में सामाजिक और नस्ली ऊंचनीच की व्यवस्था की रक्षा, विध्वंसक ऊर्जा को नियंत्रित करने तथा दमन और शोषण की पद्धतियों को बरकरार रखने के लिए राजनीतिक ताकत का भी बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ । साठ का दशक ऐसा वैश्विक खरल था जिसमें नस्ल, लिंग, वर्ग, यौनिकता और पीढ़ी के मसले पर राजनीतिक और सामाजिक विरोध के साथ ही तकनीक के नये रूप, सूचना और संचार क्रांति तथा व्यावसायिक बाजार का फैलाव भी मिल गया था । जेमेसन तो साठ के दशक का मूल उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों तक ले जाते हैं । दक्षिणी गोलार्ध की इन घटनाओं ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था में उलट फेर को जन्म दिया । अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के क्रांतिकारी दुनिया भर के साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी आंदोलनों की सफलता से प्रेरणा ले रहे थे । फ़ैनन, माओ और चे की किताबें उनको दिशा दिखा रही थीं । अमेरिका के नव वामपंथी युवक वियतनाम, कम्बोडिया और लाओस में अपनी ही सरकार के सैन्य हस्तक्षेप का विरोध कर रहे थे । साठ दशक के विद्रोह की इसी वैश्विकता ने हाशिए पर डाल दिये गये और अल्पसंख्यक बना दिये गये समूहों में इस उम्मीद को जन्म दिया कि वे इस विश्वव्यापी क्रांति की अबाध प्रगति के अग्रिम मोर्चे पर खड़े हो सकते हैं । पश्चिमी सभ्यता की अजेय श्रेष्ठता का पराभव सन्निकट लगने लगा था ।

इसी साठ के दशक में नस्ल, लिंग और यौनिकता की नयी सामाजिक और राजनीतिक कोटियों को भी लोकप्रियता मिली । वर्ग संघर्ष आधारित पुराने रूपों का जुझारूपन मंद पड़ने लगा था । अमेरिका में शीतयुद्ध के समय बनी कम्युनिस्ट विरोधी सर्वसम्मति ने ट्रेड यूनियन आंदोलन की वैधता को चुनौती दी । सोवियत खेमे के कुछेक देशों में रूसी दबदबे का विरोध प्रकट हुआ । राजनीति के नये तरीके सामने आये । नारीवाद की दूसरी लहर ने निजी के राजनीतिक होने का नारा दिया । उसने निजी अनुभवों तथा दमन के व्यापक ढांचों में सम्पर्क देखने पर जोर दिया । अश्वेत सत्ता और स्त्री तथा समलैंगिक मुक्ति के आंदोलनों ने पहचान की राजनीति की शुरुआत की । इस राजनीति ने मौजूदा व्यवस्था की आलोचना के साथ आगामी मुक्ति के सपने को जोड़ा । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवादी समाजों में व्याप्त सामाजिक बहिष्करण, अधीनता और अवरोधों से निर्मित यथास्थिति को इन्होंने उजागर कर दिया । अमेरिकी शिक्षा में स्त्री अध्ययन, अश्वेत अध्ययन और मूलवासी अध्ययन हेतु इन आंदोलनों ने लड़ाई लड़ी । ज्ञान के नये रूपों के विकास हेतु नस्ली, यौनिक और लैंगिक पहचानों को आधार बनाया जाने लगा । माना गया कि इससे सत्ता और दमन के विविध आयामों को देखने में भी मदद मिलेगी । साठ के दशक के बाद से अनेक देशों में स्त्रियों, नस्ली अल्पसंख्यकों और विभिन्न यौनिक समूहों ने बहुत सारे नागरिक अधिकार अर्जित किये और सामाजिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभायी । समता और समावेशन के ये रूप आंशिक और अंतर्विरोधी थे फिर भी इनसे सामाजिक जीवन में उदारता आयी और ऊंचनीच की पुरानी व्यवस्था में थोड़ी ढिलाई आयी ।

उस समय संस्कृति की धारणा भी बदली । बीसवीं सदी के मध्य में बहुत सारे विकसित देश औद्योगिक उत्पादन की जगह सेवा और सूचना आधारित समाजों में बदले । इसे उत्तर औद्योगिक अर्थतंत्र कहा गया और इसमें संस्कृति की पहुंच दैनन्दिन तक प्रसारित हो गयी । फ़िल्म, टेलीविजन, संगीत, फ़ैशन, विज्ञापन, अखबार और पत्रिका ने सबके अस्तित्व को प्रभावित करना शुरू किया और उनकी ताकत में बेतरह इजाफ़ा हुआ । किशोर और युवक इस नयी और उत्तेजक युवा संस्कृति के उपभोक्ता बने । इस नयी संस्कृति ने बोलने, पहनने और व्यवहार की पारम्परिक आदतों को भी बदल दिया । मानविकी और समाज विज्ञान के विद्वान भी इस सांस्कृतिक मोड़ पर विचार करने लगे । पूंजीवादी समाजों में सांस्कृतिक उत्पादन और उपभोग पर केंद्रित संस्कृति अध्ययन में ग्राम्शी के सिद्धांतों का उपयोग शुरू हुआ । पहले जहां समझा जाता था कि मास संस्कृति लोगों को निष्क्रिय उपभोक्ताओं में बदल रही है उसकी जगह नये सिद्धांतकारों ने लोकप्रिय संस्कृति को राजनीतिक संघर्ष के औजार के रूप में देखना शुरू किया । इन बौद्धिकों ने मास्को से नजदीकी समाप्त करके सांस्कृतिक राजनीति का व्यापक और लोकप्रिय रूप विकसित करने के लिए अन्य आंदोलनों के साथ संवाद शुरू किया । साठ दशक के बाद से सांस्कृतिक सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में अधिकाधिक आते गये ।

साठ के दशक को उदार सहमति और युवा विद्रोह तक सीमित करना सही नहीं होगा । दक्षिणपंथी तख्तापलट और नव औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों से लेकर पुलिस दमन और राजकीय निगरानी तक साठ का दशक सत्ता और विशेषाधिकार के संरक्षण हेतु असाधारण ताकत के इस्तेमाल का भी दशक था । उसी समय तमाम दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक आंदोलन उभरे जिनका मकसद पश्चिमी सभ्यता की मौजूदा ऊंचनीच की रक्षा करना था । इन ताकतों को ऐसे बौद्धिकों की जरूरत थी जो तथाकथित सांस्कृतिक पतन के कारण बता सकें, समर्थकों को सुसंगत राजनीतिक पहचान हेतु गोलबंद कर सकें और रूढ़िवादी पुनरुत्थान के सपने परोस सकें । साठ के दशक में जो भी सामाजिक बदलाव शुरू हुए उनका प्रतिरोध करने और उन्हें पलट देने की कोशिश से सांस्कृतिक मार्क्सवाद के हौवे का गहरा नाता है । लेखक समझना चाहते हैं कि ये बौद्धिक राजनीतिक आंदोलनों के साथ किस तरह का रिश्ता रखते हैं । उनकी भूमिका की छानबीन के सिलसिले में लेखक को बुद्धिजीवियों के बारे में ग्राम्शी की धारणा उपयोगी प्रतीत होती है ।

ग्राम्शी के लेखन में बुद्धिजीवियों की धारणा का खास महत्व है । वे इस धारणा को विख्यात बुद्धिजीवियों के परे ले जाना चाहते थे । वे इसकी अमूर्त धारणा की जगह देखना चाहते थे कि खास किस्म के बौद्धिकों का निर्माण ऐतिहासिक तौर से कैसे हुआ है और उनकी राजनीतिक भूमिका क्या होती है । ग्राम्शी का यह रुख विश्लेषणात्मक है जो समझता है कि बुद्धिजीवियों के विभिन्न समूहों की वास्तविक राजनीतिक चेतना और गतिविधियों को आकार देने वाले हालात और प्रक्रियाएं कौन सी हैं । उन्होंने शुरू करने के लिए तात्कालिक, प्रत्यक्ष और जीवंत को चुना, व्यापक ऐतिहासिक परिघटना को समझने के लिए सामाजिक आचरण और भौतिक परिस्थिति की छानबीन की । बुद्धिजीवियों की बात करते हुए बहुधा उन्होंने ठोस भौतिक यथार्थ के महत्व पर जोर दिया । उनका कहना था कि बौद्धिक समूह का निर्माण अमूर्त लोकतंत्र की भूमि पर नहीं होता बल्कि एकदम ठोस पारम्परिक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के अनुसार इसका निर्माण होता है । ग्राम्शी की इसी समझ के अनुरूप लेखक ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद का हौवा खड़ा करने वालों की शिनाख्त की है । ये सभी लोग उस वैचारिक संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल हैं जो सामाजिक वर्गों, राजनीतिक ताकतों और अधिरचना के संस्थानों के खास किस्म के संबंध से पैदा होता है । सांस्कृतिक मार्क्सवाद के बारे में प्रत्येक कथन को इसी संदर्भ में देखना होगा ।     

इस किताब में लेखक ने किसी धारणा की उत्पत्ति से लेकर उसमें आये बदलावों का एकरेखीय इतिहास उकेरने की जगह पर सांस्कृतिक मार्क्सवाद की बहुलता को देखने का प्रयास किया है । इस यात्रा में उन्होंने इधर उधर का भी रास्ता लिया है और निरंतरता को भंग भी किया है । इसमें उस इतिहास को सुलझाया गया है जिसका एक सिरा महत्वोन्मादी नेता से उलझा है तो दूसरे सिरे पर रूढ़िवादी चिंतको का कोई समूह है । कभी इसके निशान किसी ईसाई दक्षिणपंथी दस्तावेजी फ़िल्म में मिल गये । सांस्कृतिक मार्क्सवाद की यह कहानी दुनिया भर की प्रतिक्रियावादी राजनीतिक शक्तियों द्वारा बार बार सुनायी गयी ताकि समता, लोकतंत्र और न्याय के विरोध को सही ठहराने के नये नये तरीके तलाशे जा सकें । अगर व्यक्तियों की बीमार मानसिकता में ही इसके स्रोत देखेंगे तो कभी हम इसे समझ नहीं सकते । इसे समझने के लिए हमें संस्थानों को देखना होगा । इसके विश्लेषण हेतु सामयिकता का रुख अपनाना होगा और इसे ढांचागत तर्क समझने होंगे । ग्राम्शी ने कहा था कि किसी व्यक्ति के दिमाग में विचार और मत अपने आप नहीं पैदा होते । उसे मौजूदा यथार्थ का राजनीतिक स्वरूप देने वाले कुछ केंद्र होते हैं । इस किताब में भी व्यक्तियों के दिमाग की जगह इन्हीं केंद्रों की छानबीन की गयी है ।

किताब में सांस्कृतिक मार्क्सवाद के दावे से इनकार नहीं किया गया है । कुछ बातें तो सही हैं भी । मार्क्यूज ने कहा था ही कि साठ के दशक के बाद नव वाम की रणनीति संस्थाओं के जरिए दीर्घकाल तक बने रहने की होनी चाहिए । दिक्कत यह है कि इन तथ्यों का उपयोग फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के प्रभाव को बताने या मौजूदा सामाजिक यथार्थ को स्पष्ट करने के लिए नहीं किया गया है । इनका तो उपयोग राजनीतिक गोलबंदी के लिए किया जा रहा है जिसका मकसद कुछेक वंचित समूहों की बेदखली है । लड़ाई फ़्रैंकफ़र्त स्कूल की विरासत को लेकर है ही नहीं । संघर्ष तो रहने लायक दुनिया के स्वरूप के निर्धारण को लेकर हो रहा है । इधर दक्षिणपंथ ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद पर हल्ला बोल दिया है । इस युद्ध में शामिल प्रतिक्रियावादियों की ताकत और कमजोरी की हमारी समझ पर ही इस हमले के प्रतिरोध और बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष की उम्मीद टिकी हुई है ।       


Wednesday, July 1, 2026

आवारा पशु, किसान और सरकार

 

                 

                                             

हमारे देश में खेती के साथ जानवरों का बहुत गहरा रिश्ता है । खेती का काम करने के दौरान किसान के सादा और मेहनत से भरे जीवन में ये जानवर हमेशा मौजूद रहते हैं । खेत से अन्न उपजाने के लिए उसको बीज बोने लायक बनाने के लिए हल खींचने से लेकर फसल के लिए जैविक खाद मुहैया कराने तक इन जानवरों की उपयोगिता भी अनेक किस्म की होती है । इसलिए किसान का इन जानवरों के साथ घरेलू रिश्ता भी बन जाता है । भारतीय साहित्य का बड़ा हिस्सा उनकी इस आपसदारी की गवाही देता है ।

इसमें बुनियादी व्यवधान अंग्रेजी राज के दौरान आया गोरे सैनिकों के लिए फौजी छावनियों में बूचड़खाने खोले गये । कहने की जरूरत नहीं कि बूचड़ अंग्रेजी के बुचर से आया है । गोरे सैनिकों को ठंडे वातावरण में मांस की जरूरत पड़ती रही थी । भारत में भी आहार की उनकी यह आदत बनी रही इसलिए खेती के लिए जरूरी पशुओं का मांस उन्हें दिया जाने लगा । इसका नतीजा यह हुआ कि किसानों को खेती हेतु पशुओं और उनके दूध से मिलने वाले पोषण की कमी महसूस होने लगी । इसी पृष्ठभूमि में हम उस समय आजादी के आंदोलन में गोहत्या के सवाल को महत्वपूर्ण सवाल के बतौर उठता देखते हैं । अंग्रेजी राज भी इसके प्रति संवेदनशील था । उनके लिए इसका एक पहलू सकारात्मक था क्योंकि इस सवाल पर धार्मिक विभाजन तो पैदा किया ही जा सकता था इसलिए उन्होंने इस सवाल को जिंदा रखा । इसके कारण इस मुद्दे में उपनिवेश विरोध का तत्व भी आ जाता है । लेकिन हमारे देश में दुधारू पशुओं का मांस खाने की परम्परा केवल इस्लाम में कुर्बानी के साथ नहीं जुड़ी है । बहुत बड़े क्षेत्र में यह पोषण के लिए आवश्यक प्रोटीन का सस्ता और सुलभ स्रोत भी है । देश की हिंदू आबादी के भी साधनहीन हिस्से में इसके आहार की परम्परा रही है । इसके अतिरिक्त चमड़े का समूचा व्यवसाय पशुओं की खाल पर टिका हुआ है । चमड़े का उपयोग जूता, बेल्ट, पर्स, तमाम अन्य वस्तुओं और संगीत के ढेर सारे वाद्ययंत्रों के बनाने में होता है । इसके अतिरिक्त उनके रक्त का इस्तेमाल विटामिन की गोलियों के निर्माण में भी होता है और पशु चिकित्सक होने के नाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं । 

पशुओं के इस दोहरे किस्म के उपयोग के कारण सरकार की ओर से हमेशा ऐसी नीति की जरूरत रही जिसमें उसके यथोचित संरक्षण के साथ ही उसके औद्योगिक उपयोग की भी सम्भावना बनी रहे । आजादी के बाद के विषाक्त सांप्रदायिक वातावरण में जिन ताकतों ने गांधी की हत्या की उन्होंने ही गोरक्षा के सवाल को राजनीतिक गोलबंदी का साधन बनाया और इसके लिए संसद के सामने हिंसक प्रदर्शन भी किया गया । बहरहाल इस सिलसिले में गांधी का नाम हमने अनावश्यक नहीं लिया । उन्होंने 1910 में ही इसके सांप्रदायिक तत्व को समझ लिया था और सीधे कहा कि आदमी के जान की कीमत उनके लिए गाय से अधिक है ।

उनकी हत्या के बाद न केवल इस मसले पर सांप्रदायिक अभियान को धक्का लगा बल्कि गाय के सवाल पर उनकी राय ही सर्वसम्मति की तरह बनी रही । खेती और चमड़े के व्यावसायिक कारोबार के बीच संतुलन वाली नीति अपनाने के कारण किसान पर बीमार पशु को पालने का बोझ भी नहीं रहता था । इस शांतिपूर्ण माहौल में व्यवधान तब आया जब गांधी के हत्यारों को सरकार पर काबिज होने का मौका मिला । उसके बाद से इस मामले को हिंसक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का अस्त्र बना लिया गया । लेकिन इसमें भी पाखंड और झूठ पर्याप्त फैलाया जा रहा है । एक ओर गाय बचाने का उन्मादी शोर मचाना है तो दूसरी ओर उसके निर्यात का लाभ भी उठाना है । एक से ध्रुवीकरण का राजनीतिक लाभ मिलता है तो दूसरे से देशी और विदेशी कारपोरेट जगत के साथ रिश्ते मजबूत होते हैं ।

कहने की जरूरत नहीं कि इससे हमारे देश के उत्पादक किसान समुदाय का नुकसान होता है । उसे खड़ी फसल वाले खेत की रक्षा के लिए आवारा घूमते पशुओं की समस्या का सामना करना पड़ता है तो दूसरी ओर बीमार पड़े पशुओं का बोझ भी बेवजह उठाना पड़ता है । आवारा घूमती नीलगायों की समस्या का पहले से सामना कर रहे किसान समुदाय पर यह अतिरिक्त बोझ सरकार ने डाल दिया है, उसका संप्रदायीकरण कर रही है और उन पशुओं के निर्यात का लाभ भी उठा रही है ।                                  

Friday, June 26, 2026

गुलामी और पूंजीवाद

 

2025 में यूनिवर्सिटी आफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस से डेविड मैकनेली की किताब ‘स्लेवरी ऐंड कैपिटलिज्म: ए न्यू मार्क्सिस्ट हिस्ट्री’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक जो भी गुलामी के बारे में लिखता है वह आजादी के बारे में लिखता है । गुलामी के विरोध में सच्ची आजादी का हम इंतजार कर रहे हैं । इसलिए अचरज नहीं कि गुलाम लोगों ने सबसे पहले आजादी को सामाजिक मूल्य के बतौर पहचाना था । उदारवाद ने इसे स्वायत्त मनुष्य का अंतर्निहित गुण माना था । गुलामों की परिभाषा के अनुसार उत्पीड़ितों के लक्ष्य के रूप में आजादी का जन्म ऐतिहासिक प्रक्रिया में होता है । सही बात है कि दमितों की मुक्तिकारी परियोजना का अक्सर दमन ही हुआ है ।  इसके बावजूद आजादी का सपना गुप्त रूप से आशा के रूप में शक्ल बदलकर जिंदा रहता है । इस आकांक्षा के बने रहने का कारण है कि आखिरकार मनुष्य का वस्तूकरण आंशिक ही हो सकता है । इस किताब में अटलांटिक की दुनिया का अध्ययन किया गया है और वहां गुलाम मनुष्य को संपत्ति के रूप में देखा जाता था लेकिन इस मान्यता को हमेशा धक्का लगता रहता था । कानून, किताब, रस्म और व्यवहार में कोड़े, जंजीर, जेल और निगरानी के जरिए गुलामी के सिद्धांत को लागू करने की हरचंद कोशिश ही इसकी मुश्किलों का बयान करने के लिए काफी है । गुलामी संबंधी दस्तावेजों में हर कहीं उसे तोड़ने की कोशिशों के सबूत मिल जाते हैं । औजार तोड़ देना, खाना चुरा लेना, काम में सुस्ती, नाता जोड़ना, जंगल में भाग जाना, पढ़ने का प्रयास, हुक्म न मानना और ध्रुवतारे के सहारे उत्तर दिशा जाने की कोशिश आम घटना बन गये । इन सभी तरीकों से गुलामों ने सामाजिक मौत के विरुद्ध जीवन के गीत गाये । इन कोशिशों के अमिट निशान उत्पीड़ितों के अभिलेखागार में मौजूद हैं । ध्यान से सुनिए तो अब भी उनके बीच आजादी की खुसफुस सुनाई देगी ।

किताब में आजादी की इसी चाहत को सत्य का पैमाना माना गया है । वैसे भी आलोचना सिद्धांत की बुनियाद मानव मुक्ति में उसकी रुचि है । आजादी का प्रत्येक विरोध मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य के साथ धोखा है । इसका अर्थ यह है कि सत्य के साथ होना पक्षपात है । आत्मनिर्णय की सामुदायिक ताकतों द्वारा व्यवहार में सक्षम जीवन की तलाश करना उत्पीड़न और गुलामी की प्रत्येक परिस्थिति का विरोध है । मैल्कम X ने कहा था कि सत्य उत्पीड़क के विरुद्ध उत्पीड़ितों के पक्ष में खड़ा होना है । ऐसी प्रतिबद्धता की घोषणा फिलहाल चलन से बाहर कर दी गयी है । आजकल तो तमाम विद्वान यही साबित करने में लगे रहते हैं कि गुलामों में कभी आजादी की चाहत ही नहीं रही । कहा तो यह भी जा रहा है कि मुक्ति के मुकाबले गुलामों के लिए जिंदा रहना अधिक जरूरी था । इन विद्वानों का कहना है कि मुक्ति तो पश्चिम की अमूर्त धारणा है । इसके मुकाबले उनके लिए गुलामी का दैनिक यथार्थ ज्यादा बड़ी कठिनाई थी । इस तरह के सोच की परम्परा बहुत पुरानी है । बहुत पहले यूजीन जेनोवीज ने कहा था कि बंधक लोगों ने हालात को मंजूर कर लिया था । गुलामी से आजाद जीवन के मुकाबले समर्पण उन्हें अधिक लाभकर नजर आया था । उनके अनुसार गुलामी में ही किसी तरह बचे रहने का तरीका निकालना गुलामों की सबसे बड़ी चिंता थी । यह भी कहा जा रहा है कि मूल्य के स्तर पर मुक्ति के मुकाबले पारिवारिक जीवन को गुलामों ने वरीयता दी ।

इस सोच के पीछे व्यक्तिवाद की खास तरह की धारणा काम करती है । इस धारणा के मुताबिक कोई भी व्यक्ति अपनी सक्रियता के लिए तभी अबाध स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है जब वह स्वामी हो । इसके तहत संपत्ति का स्वामित्व ही अधिकार और आत्मवत्ता के स्वामित्व का स्रोत माना जाता है । यह धारणा अनुचित है और निम्न वर्गों के वर्तमान उभार के समय संदिग्ध भी है । इस समय अश्वेत, पारलिंगी, फिलिस्तीनी या मजदूर वर्ग दुनिया को बदलने की दावेदारी जता रहे हैं । निम्न वर्गों की यह सक्रियता सत्ता की संरचनाओं द्वारा की जा रही हिंसा और सामाजिक टकराव के बीच जारी है । हिंसा के इस वातावरण ने उन्हें पचाने में सफलता नहीं पायी है । नीचे से इतिहास लेखन की धारा संग्रहालयों से इसी प्रतिरोधी सक्रियता के निशान खोज लाती है । इन निशानों के सहारे निम्न वर्गों द्वारा खुद को बनाने की प्रक्रिया खुलती जाती है । यह निर्माण प्रतिरोधी व्यवहार से साकार होता है लेकिन दमन और उत्पीड़न से बचा रहता है । इस तरह दमन के भीतर से निम्न वर्गों की सक्रियता का जन्म होता है ।

जो लोग गुलामों मे समर्पण को ही एकमात्र सत्य समझते हैं उन इतिहासकारों के मुकाबले गुलामों के मालिक उनकी सक्रियता को अधिक अच्छी तरह समझते थे । गुलामी की व्यवस्था में गुलाम की अनिच्छित मेहनत तो मालिक की संपत्ति होती थी लेकिन उनकी नैतिक दुनिया पर मालिक का कोई नियंत्रण नहीं होता था । गुलामों के आवागमन पर रोक, पलायित और विद्रोही गुलामों को दंड की घटनाओं से इसी बात की पुष्टि होती है । गुलामी के बुनियादी अंतर्विरोध को व्यक्त करते हुए सिडनी मिंज़ ने कहा कि इसमें मनुष्यों के खास समूह के साथ मानवेतर प्राणियों की तरह बरताव करना पड़ता है । गुलाम लेकिन होते मनुष्य ही हैं और इस बात को गुलामों के मालिक भी जानते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि मनुष्यो में मशीनों के विपरीत स्वतंत्र इच्छा होती है । इसका अर्थ कि उनमें आजादी की चाहत मनुष्य होने के नाते होती ही है । जो उत्पीड़ित हैं उनको अपनी चाहत की पूर्ति के लिए संघर्ष करना होता है । इस समूची प्रक्रिया को हम अपने देश की जाति व्यवस्था के प्रसंग में अच्छी तरह समझ सकते हैं ।  

हेगेल की सोच में बाकी जो भी समस्या हो लेकिन उन्होंने जब मालिक और गुलाम के बीच द्वंद्वात्मक रिश्ते की बात की थी तो उसके पीछे उनकी यही मान्यता थी । गुलाम की स्वतंत्र सक्रियता उसका निहित गुण नहीं होती । इसे इतिहास के क्रम में दूसरों के साथ व्यवहारिक संघर्ष  से अर्जित करना होता है । अपनी दावेदारी के अवसर पर गुलाम व्यक्ति मालिक के भय पर काबू पा लेता है । हेगेल लिखते हैं कि स्थापित व्यवस्था के नकार में खड़ा होकर वह अपने आपको पा लेता है । हेगेल द्वारा प्रतिपादित निम्न वर्गों की इस स्वतंत्र सक्रियता को दूषित करने वाले तत्वों के बारे में मार्क्स को जरूर पता रहा होगा । इसलिए टकराव के इस ढांचे को उन्होंने व्यक्तियों के सामाजिक संबंधों में देखा । उन्होंने निम्न वर्गों की इस सक्रियता को उनके सामाजिक गुण के रूप में कल्पित किया जिसे सत्ता और संपत्ति के दायरे में सामूहिक कार्यवाही से अर्जित किया जाता है । इसे वे वर्ग संघर्ष कहते हैं । संघर्ष की यह प्रक्रिया संघर्ष करने वाले को भी बदलती है । इसी कारण सामूहिक गोलबंदी को आत्म निर्माण की सामूहिक क्रिया के बतौर समझा गया । इस तरह निम्न वर्गों की सक्रियता सामूहिक कार्यवाही के परिणाम के बतौर सामने आती है । इसी गतिविधि में मनुष्य अभिकर्ता के रूप में विकसित होता है । अपने आपको बदलने की सामाजिक प्रक्रिया की इस धारणा में ही अपनी मुक्ति की नैतिकता भी शामिल रहती है ।                                 

इस तरह मुक्ति की उदार व्यक्तिवादी सोच के विपरीत उसकी सामाजिक धारणा का जन्म होता है । असल में गुलामों के लिए गुलामी सामाजिक मृत्यु की तरह थी क्योंकि वे नातेदारी के रिश्तों से अलगाव में ही होते थे । इसलिए मुक्ति का मतलब उनके लिए सामाजिक संबंध और एकजुटता, परिवार, नातेदारी, समुदाय और वर्ग की पहचान की पुन:प्राप्ति भी था । इसी तरह आजादी उनके लिए ऐसा सामाजिक संकेतक था जो प्रतिरोध और मुक्ति के अभिकर्ता के रूप में उनकी पहचान को इसी प्रक्रिया में मजबूती के साथ स्थापित भी करता था । इसी वजह से आजादी उनके लिए किसी संप्रभु व्यक्ति का कोई पूर्वनिर्धारित गुण नहीं था बल्कि अस्तित्व की ऐसी प्रक्रिया थी जिसके साथ टकराव अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था । आजादी ऐसी चीज थी जिसको अभी हासिल किया जाना था । वह चतुर्दिक व्याप्त गुलामी के भीतर से निकाली जानी थी । साथ ही यह कभी पूरी तरह समाप्त कोई अंतिम परिणाम नहीं होती थी । इसे लगातार विकसित होते रहना था । यह हमेशा ही अपूर्ण रहने वाली सामूहिक सामाजिक परियोजना थी । मनुष्यता के प्राक इतिहास से मानव इतिहास में प्रवेश करने का यही मतलब है । इन बातों को उदार व्यक्तिवादी निगाह से देखना सम्भव नहीं है । गुलामी के अधिकांश इतिहास इसी उदार व्यक्तिवादी नजरिए के शिकार रहे हैं । इसलिए उनमें निम्न वर्गों द्वारा मुक्ति की सामूहिक कोशिश का निशान नहीं मिलता ।     

इस बाध्यकारी सीमा से मुक्ति के लिए इस किताब में डब्ल्यू ई बी ड्यु बोइस, सी एल आर जेम्स और सिल्विया विंटर की क्रांतिकारी अश्वेत परम्परा के तीन प्रतिनिधि पाठों से प्रेरणा ली गयी है । इन तीनों पाठों में गुलाम कामगारों के सामूहिक संघर्षों को आधुनिक वर्ग संघर्ष के ही विभिन्न रूप माना गया है । इस तरह लेखक का मानना है कि नयी दुनिया के प्लांटेशनों पर काम करने वाले ये सभी गुलाम कामगार आधुनिक मजदूर वर्ग का हिस्सा थे । ड्यु बोइस का कहना है कि दक्षिणी अमेरिका के जो भी प्रांत गृहयुद्ध में गुलामी के समर्थन में लड़ रहे थे उनकी आर्थिक ताकत को कम करने में गुलाम मजदूरों द्वारा प्लांटेशन का काम छोड़कर बड़े पैमाने पर पलायन की निर्णायक भूमिका थी । गुलामों द्वारा इस तरह इकट्ठा काम छोड़ना काम के हालात के विरोध में आम हड़ताल ही थी । इसमें लगभग पांच लाख गुलाम शामिल थे । वे प्लांटेशन पर आधारित अर्थव्यवस्था को जाम करना चाहते थे और इसका उपाय उन्हें काम छोड़ना लगा । इसी तरह सी एल आर जेम्स ने हैती की 1791 की क्रांति का विश्लेषण करते हुए कहा कि उत्तर के मैदानों के विशाल चीनी मिलों में सैकड़ों की संख्या में साथ रहने और काम करने वाले लोग आधुनिक सर्वहारा के सबसे नजदीकी समूह थे इसलिए ही उनका विद्रोह इतना संगठित था । गुलामी और पूंजीवाद संबंधी बहस में इन दोनों का योगदान नीचे से उठने वाले वर्ग संघर्ष के रूपों पर ध्यान देना है । इसके अलावा उन्होंने गुलामी के सामाजिक टकरावों के पूंजीवादी चरित्र पर भी बल दिया । सिल्विया विंटर ने भी यही राह अपनायी । साथ ही उन्होंने गुलाम सर्वहारा के निर्माण में नस्ल और वर्ग की द्वंद्वात्मकता पर भी ध्यान दिया । उनका कहना था कि नयी दुनिया में अश्वेत वह पहला समुदाय है जिसका निर्माण वैश्विक उत्पादन संबंधों ने किया है । वे वर्ग और नस्ल के निर्माण को एक ही वैश्विक प्रक्रिया का नतीजा मानती हैं । उनके मुताबिक अश्वेत मनुष्य के व्यवस्थित अवमूल्यन के साथ ही श्रमशक्ति के व्यवस्थित शोषण की प्रक्रिया भी चली । दलित समुदाय के साथ सामाजिक व्यवहार में इस प्रक्रिया की झलक देखी जा सकती है । विंटर ने प्लांटेशन को उस वैश्विक प्रक्रिया का अंग कहा है जिसमें श्रमशक्ति का नस्लीकरण हुआ । इसी उदीयमान नस्ली पूंजीवाद को वे श्रमशक्ति के वस्तूकरण के जरिए समझती हैं ।

हाल के दशकों में इतिहासकारों ने इन चिंतकों के लेखन का जिक्र तो किया लेकिन उनकी दावेदारी से परहेज किया । खासकर प्लांटेशन के गुलाम कामगारों को आधुनिक मजदूर वर्ग का कहने को असावधानी के साथ बढ़ा चढ़ाकर कही बात समझा गया । इस इनकार से आलोचना सिद्धांत कमजोर हुआ और द्वंद्वात्मक आलोचना का स्वर मंद पड़ा । असल में उत्पीड़ितों की दुनिया में धक्का देने वाला सच बोला जाना चाहिए । जानकारी को दबाने वाले इनकार के तंत्र को तोड़ा ही जाना चाहिए । जिस समाज में नस्ली पूंजीवाद की क्रूर सच्चाई से इनकार करने की बीमारी हो वहां धक्का लगने वाला सच बोलना होगा । उन अर्थों को सामने लाना होगा जिनसे जी चुराया जाता है । इसी भावना के साथ इस किताब में इन चिंतकों के लेखन से प्रेरणा ली गयी है । अब तो बहुतेरे लोग मानने लगे हैं कि नयी दुनिया की गुलामी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति का अंग थी । इसके बावजूद उदार चिंतन के प्रभाव के कारण इसको सैद्धांतिक मजबूती नहीं मिल पाती । इसका कारण यह है कि पूंजीवाद को बाजार के साथ ही जोड़कर देखा जाता है । उत्पादन संबंध, शोषण और वर्ग संघर्ष जैसे तत्वों पर कम ध्यान दिया जाता है । इस किताब में ऐतिहासिक भौतिकवाद की जिस आलोचनात्मक धारा का अनुगमन किया गया है उसमें समाज का स्वरूप उसे आकार देने वाले बुनियादी उत्पादक और पुनरुत्पादक टकरावों से अलग नहीं होता । इसी कारण नयी दुनिया की गुलामी की पूंजीवादी प्रकृति पर किताब का जोर प्लांटेशन सर्वहारा की धारणा को भी मान्यता देता है ।

लेखक बताते हैं कि किताब के अलग अलग अध्यायों में इस मान्यता का विस्तार है लेकिन इन लेखकों की बातों को ही दुहराया नहीं गया है । किताब उनके पाठ के घेरे से बाहर निकलती है और यात्रा साहित्य, प्लांटेशन मालिकों के दस्तावेज तथा डायरी, गुलामों की कहानी के साथ राजनीतिक अर्थशास्त्र और हालिया ऐतिहासिक विद्वत्ता का भी उपयोग करती है । इतिहास और सिद्धांत निर्माण के लिए ऐसा करना उन्हें जरूरी लगा । पूंजीवाद और गुलामी की सैद्धांतिक समझ के लिए लेखक ने राजनीतिक अर्थशास्त्र की मार्क्सवादी आलोचना से जरूरी धारणाओं को ग्रहण किया है । असल में इतिहास में उदारवाद की प्रभुता की एक पहचान सिद्धांत की उपेक्षा भी है । इसके तहत समाज का जो सहजबोध बनता है उसमें आलोचनात्मक चिंतन से परहेज किया जाता है । सिद्धांत की उपेक्षा से तथ्यों को ही निरपेक्ष सत्य मानने की भूल पैदा होती है । सिद्धांत की अवहेलना करके तथ्य पर यह अतिरिक्त जोर बौद्धिक जड़ता की ओर ले जाता है जिससे यथास्थिति के प्रति सहनीय रुख का जन्म होता है । गुलामी और पूंजीवाद संबंधी अधिकांश इतिहास लेखन तमाम मूल्यवान शोध के बावजूद इसी विंदु पर फंसा हुआ है । इस जड़ता को तोड़ने के लिए इस किताब में ऐतिहासिक गवेषणा के साथ आलोचना सिद्धांत का भी मेल किया गया है । आम तौर पर यह रुख चलन के बाहर है । पूंजीवाद के नये इतिहास लेखन की धारा सदी के आरम्भ में लोकप्रिय हुई थी लेकिन उसमें भी पूंजीवाद और उसके राजनीतिक अर्थशास्त्र की ओर वापसी की स्पष्ट इच्छा के बावजूद सिद्धांत से यह दुराव अच्छा माना जाता है ।                           

इसके उदाहरण के बतौर लेखक ने हाल में छपी एक किताब का जिक्र किया है जिसका शीर्षक ‘स्लेवरी’ज  कैपिटलिज्म’ है । इस शीर्षक के बावजूद संपादकों ने इस सवाल में अरुचि जाहिर की है कि गुलामी को पूंजीवाद माना जाए या नहीं । तमाम तरह की गवेषणा के बावजूद एक समीक्षक का कहना है कि पूंजीवाद और गुलामी के प्रसंग में आर्थिक सिद्धांतों को ले आने से विषय के प्रति पूरा न्याय नहीं हो सकता । नतीजे के तौर पर उल्लिखित किताब में तथ्यों के प्रति उन्नीसवीं सदी जैसा पूजाभाव नजर आता है । इसके चलते विश्लेषण के नाम पर वर्णन मात्र परोसा जाता है । पूंजीवाद के ऐसे नये इतिहासकार पूंजीवाद को परिभाषित करने की झंझट से मुक्त होकर व्यवस्था के जमीनी साक्ष्य खोजते रहते हैं । लेखक का कहना है कि जमीनी साक्ष्य जरूरी हैं और इस मोर्चे पर भी उनकी किताब में कोताही नहीं बरती गयी है । इसके बावजूद अनुभवजन्य सबूत की बहुतायत सिद्धांत निर्माण की जगह नहीं ले सकती । सिद्धांत के अभाव में व्यवस्था का कोई ऐतिहासिक अर्थ ही नहीं निकलेगा । किसी भी ऐतिहासिक परिघटना का अर्थ संपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया में निहित सामान्य दिशा, गतिपथ, टकराव और अंतर्विरोध के जरिए ही निकलता है । प्लांटेशन पूंजीवाद की व्यवस्थित कार्यपद्धति को रूई की गांठ के ही विश्लेषण से नहीं समझा जा सकता ।

मार्क्स ने अपने ग्रंथ पूंजी में यही तो कहा कि पूंजीवाद का विश्लेषण किसी एक माल से शुरू कर सकते हैं लेकिन फिर अन्य मालों के साथ उसके रिश्ते को देखते हुए आगे बढ़ना होता है । यहां से उस श्रम की ओर जाना होता है जिससे इन सभी मालों का जन्म होता है । मतलब कि माल का सामाजिक अर्थ समझने के लिए उसे समूची सामाजिक प्रक्रिया के रिश्ते में रखकर देखना होता है । मार्क्स ने जब विभिन्न मालों का मशहूर समीकरण बनाया तब वे माल को ऐतिहासिक सामाजिक संबंध के रूप में विश्लेषित कर रहे थे । ऐसा कोई भी विश्लेषण सिद्धांत के बिना सम्भव नहीं । लेखक ने एक और इतिहासकार का जिक्र करते हुए बताया कि वे रूई के कारोबार में बाजार या पूंजीवाद के प्रवेश को नापने की जगह पर इस बाजार की ठोस कार्यपद्धति को समझना अधिक उपयोगी कहते हैं । इस रुख के बारे में लेखक का कहना है कि माल और पूंजी के प्रवाह, कीमत का निर्माण, मुनाफ़े की दर, मौद्रिक और वित्तीय औजार, पूंजी निवेश के रूप और श्रम प्रिक्रिया के वैश्विक संजाल के व्यवस्थित अंतर्संबंधों की समझ के बिना बाजार की कार्यपद्धति को किस तरीके से समझा जा सकता है । अगर नयी दुनिया की गुलामी का अध्ययन विश्व पूंजीवाद के एक पहलू के बतौर करना है तो रूई की किसी गांठ को सामाजिक ऐतिहासिक रिश्तों की गतिमान व्यवस्था के भीतर रखकर देखना होगा ।

लेखक के अनुसार उनकी किताब नयी दुनिया की गुलामी की पूंजीवादी प्रकृति को समग्रता में देखने की वकालत करती है । उनका यह भी कहना है कि पूंजीवाद की समाजार्थिक गतिकी ही अंतर्विरोधी होती है । इसी गतिकी और वर्ग संघर्ष के जरिए यह समूची व्यवस्था उत्पादित और पुनरुत्पादित होती रहती है । पूंजीवाद के पुनरुत्पादन का बुनियादी नियम है माल उत्पादक इकाइयों द्वारा अधिशेष का उत्पादन और अधिग्रहण । विक्रेय माल के उत्पादन में लगे कारखाने मजदूर के श्रम से अतिरिक्त मूल्य पैदा करते हैं और उसको निजी संपदा की तरह हथिया लेते हैं । उनके इस काम के साथ बाजार की होड़ भी नत्थी रहती है । शोषण के इस कारोबार को अधिकाधिक मुनाफ़ा पैदा करने के मकसद से अलग अलग पूंजीपति आपस में होड़ के साथ चलाते हैं । इस तरह यह समूची व्यवस्था आंगिक समग्रता के साथ चलती रहती है । इसके भीतर बदलाव इसकी अंतर्विरोधी गतिकी के कारण ही आते हैं ।  

गुलामी की तरह पूंजीवाद भी वैश्विक प्रक्रिया है । इन दोनों के विकास को समझने के लिए इनकी अंत:क्रिया पर निगाह रखनी होगी । पूंजीवाद के नये इतिहास उसकी द्वंद्वात्मक गतिशीलता को अच्छी तरह ग्रहण नहीं कर पाते इसलिए उनमें फंसाव नजर आता है । उनका यह रुख अबोध नहीं है । तमाम अकादमिक शोध शासक सामाजिक शक्तियों और चिंतन के रूपों के दायरे में ही चलते हैं । आलोचना सिद्धांत से परहेज जाने अनजाने मौजूदा उदार पूंजीवादी आम समझ की ओर ले जाता है । मसलन बहुत सारे अध्ययन एडम स्मिथ की भोंड़ी नकल करते हुए पूंजीवाद की पहचान को व्यापार और वित्त तक सीमित कर देते हैं । यह उदार परिप्रेक्ष्य इतिहासकारों और समाज विज्ञानियों के मानसिक क्षितिज को खासकर अमेरिका में काफी सीमित कर देता है । अमेरिका में पूंजीवाद के उदय से संबंधित एक किताब के संपादक कहते हैं कि उनके लेखकों को अमेरिका को बनाने वालों के मुकाबले उसे बेचने वालों और इस बिक्री के लिए वित्त का प्रबंध करने वालों में अधिक रुचि है । इसी तरह पूंजीवाद का नया इतिहास लिखने वाले विद्वान गुलामों की खरीद बिक्री से जुड़े वित्तीय औजारों में अधिक रुचि लेते हैं । गुलामी और वित्त के आपसी रिश्ते से जितना भी अधिक जानकारी मिले, इस पर अधिक ध्यान देने से उत्पादन में गुलाम कामगार की भूमिका ओझल होती है । इसी तरह व्यापार और वित्त पर अधिक जोर देने से लगता है कि आधुनिक समाज की सारी समस्याओं की जड़ वही है । इससे पूंजीवाद की बीमारियां धोखाधड़ी और बैंकों से कर्ज की लूट मात्र नजर आती हैं । इस नजरिए से अध्ययन करने वाले एक इतिहासकार का दावा है कि पूंजीवाद कुल मिलाकर भरोसे का खेल है । इससे तो पूंजीवाद का इतिहास या राजनीतिक अर्थशास्त्र समझना मुश्किल होगा ।

इसी वजह से वस्तुओं की जड़पूजा संबंधी मार्क्स का विवरण पूंजीवाद के आलोचना सिद्धांत के लिए अपरिहार्य है । पूंजीवाद को अगर सतही तौर पर वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार तथा मुद्रा के प्रवाह मात्र के रूप में देखा जाएगा तो यह कानूनी तौर पर पूरी तरह आजाद और समान व्यक्तियों के बीच स्वैच्छिक बाजार संबंध की तरह नजर आएगा । मार्क्स ने कहा ही था कि ऊपर से यह आजादी, समता, संपत्ति और बेंथम का स्वर्ग नजर आता है । झटका तो तब लगता है जब हम उत्पादन के प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करते हैं । उदार अर्थशास्त्री ऐसा करने से परहेज करते हैं । इसी प्रतिबंधित क्षेत्र में पूंजी की प्रत्यक्ष तानाशाही दिखायी देती है । पूंजी यहीं मजदूर के शरीर को नियंत्रित करती है और उसे उत्पादन के दबावों और खतरों के सामने खुला छोड़ देती है । उत्पादन ही पूंजी का परम लक्ष्य है । इसके बाद ही बाजार विनिमय पर आधारित समाज जबरिया श्रम की व्यवस्था नजर आता है । उदार अर्थशास्त्र जान बूझकर उत्पादन की छानबीन नहीं करता जिससे मनुष्य की उत्पादक गतिविधि प्रकृति के साथ उसकी तकनीकी अंत:क्रिया प्रकट होती है न कि ऐतिहासिक रूप से बनी अलगावकारी और शोषक व्यवस्था नजर आती है । इस व्यवस्था के मूल में ऐसे सामाजिक संबंध होते हैं जो प्रकृति के साथ मनुष्य के चयापचय को भी नियमित करते हैं । इस तरह उत्पादन को उसके साथ जुड़े दमन और शोषण समेत स्वाभाविक बना दिया जाता है ।

मार्क्स की आलोचना इसी जड़पूजा का रहस्यभेदन करती है । उदार राजनीतिक अर्थशास्त्र जिस मामले में इतिहास को आने से रोक देता है उसी मामले में मार्क्स उसका प्रवेश कराते हैं । पूंजी की ऐतिहासिकता पर बल देकर वे उसे स्वाभाविक नहीं रहने देते । इसी वजह से उनके ग्रंथ का पहला खंड पूंजी संचय की प्रक्रिया के मौलिक उद्घाटन के साथ बंद होता है । उनकी यह द्वंद्वात्मक आलोचना पूंजी के सतही आभास को खोल देती है और उसमें इतिहास का प्रवेश कराती है । यह इतिहास बहुत सुखकर नहीं है । वस्तुओं और मुद्रा की गतिविधियों की सतह के नीचे खून और आग से लिखा हिंसक इतिहास नजर आने लगता है । पूंजीवाद के नये इतिहासों में पूंजी की यही कहानी छिपायी जाती है । बैंक, व्यापार और कर्ज के बाजार पर केंद्रित करके पूंजीवाद पर से खून के दाग धोये जाते हैं । इसके बाद बाजार की धोखाधड़ी को सबसे बड़ी आधुनिक बीमारी के रूप में पेश किया जाता है । सही बात है कि एकाधिकारी सत्ता के कारण धोखाधड़ी होती है लेकिन इसी पहलू पर अतिरिक्त जोर देने से पूंजीवाद के बारे में प्रचलित समझ मजबूत होती है ।

उदारवाद तो बाजार को ही बुनियाद मानता है । आधुनिक समाज की उसकी परिभाषा संप्रभु व्यक्तियों के बीच मुक्त लेनदेन पर टिकी हुई है । इसमें धोखाधड़ी का खेल अपवाद नजर आता है जिसे समुचित विनिमय संबंधों के उल्लंघन की तरह ही पेश किया जाता है । यह कहना साहसिक प्रतीत होने लगता है कि पूंजीवाद ही धोखाधड़ी है लेकिन आलोचना सिद्धांत की यही मान्यता है । उदार राजनीतिक अर्थशास्त्र इसके उलट बाजार आधारित विनिमय को व्यवस्था की जान बताता है और श्रमिक के शरीर को ही उत्पादन का स्रोत बताने से जी चुराता है । इसके बाद तमाम विश्लेषणकर्ता गुलाम व्यापार से जुड़ी जटिल वित्तीय व्यवस्था का तो विश्लेषण करते हैं लेकिन अपने स्वामी के लिए वस्तुओं और अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन करने वाले कामगार के शोषक संबंध पर उस तरह ध्यान नहीं देते । लेखक का यह भी मानना है कि पूंजीवादी संपदा का स्रोत वित्तीय खेल में खोजकर ये विद्वान लोग न केवल उत्पादन के असली स्रोत पर परदा डालते हैं बल्कि इसके जरिए वे सामाजिक इतिहास के असली नायकों अर्थात उत्पादकों को अदृश्य कर देते हैं और उनकी जगह खरीद बिक्री करने वाले निवेशकों को ला बिठाते हैं । इस तरह वे उत्पादकों द्वारा पूंजी के प्रभुत्व के प्रतिरोध की कहानी को गायब कर देते हैं । उत्पीड़ितों की सामूहिक सक्रियता और शोषितों द्वारा नयी दुनिया बनाने की सम्भावना पढ़ने वाले की नजर से ओझल हो जाती है । इसके बाद इतिहास वर्ग संघर्ष से रहित हो जाता है । सामाजिक न्याय के लिए एकाधिकार पर प्रतिबंध जैसे बाजारी सुधारों की राजनीति ही बची रह जाती है । इसके लिए उत्पादन संबंधों में बुनियादी बदलाव की जरूरत नहीं महसूस होती । सामाजिक और बौद्धिक आलोचना की प्रेरणा पूंजीवाद विरोध नहीं उदारवाद बन जाता है ।

उदारवाद का गुलामी से बहुत नजदीकी रिश्ता रहा है । ब्रिटेन पहला पूंजीवादी राष्ट्र राज्य था और उसने गुलामी के सिद्धांत को स्वीकार किया था । वहां दास को संपत्ति ही माना जाता था । यह कोई अचरज की बात नहीं कि पूंजीवादी संपत्ति के नाम पर गरीब का हिंसक दमन करने वाला शासक वर्ग ही प्लांटेशन गुलामी के सबसे विकसित रूपों का जनक हुआ । इसलिए भी इस किताब में वेस्ट इंडीज और अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों पर अधिक ध्यान दिया गया है जो दासप्रथा के सबसे बड़े और गतिशील केंद्र बने । ब्रिटेन के उपनिवेश बारबाडोस ने गुलामी पर आधारित चीनी उद्योग वाले पूंजीवाद की शुरुआत की । नयी दुनिया के दो तिहाई गुलाम ब्रिटेन के ही उपनिवेशों में काम करते थे । उन्नीसवीं सदी के मध्य में अमेरिका के दक्षिणी प्रांत सबसे बड़े गुलाम समाज थे । ब्रिटेन के इसी नमूने को अन्य साम्राज्यवादी अनुसरणकर्ता देशों ने भी अपनाया । स्पेन, हालैंड और फ़्रान्स ने ब्रिटेन से युद्ध हारने के बाद नयी दुनिया के अपने उपनिवेशों में औद्योगिक पैमाने की इसी गुलामी की तकनीक और सामाजिक संबंधों को अपनाया ।

पूंजीवाद के नये इतिहास के बहुत सारे लेखक ऐसे भी रहे जिन्होंने उदारवाद की इस धारा का विरोध करते हुए गुलामी और पूंजीवाद के बीच रिश्ते पर जोर दिया । इसके बावजूद उनके विश्लेषण में मार्क्सवाद की समझ चलताऊ है । अमेरिका में मजदूर वर्ग के समाजवादी आंदोलन ऐतिहासिक तौर पर कमजोर रहे हैं इसलिए मार्क्सवाद की यहां की बौद्धिकता में गहराई कम रही है । ऊपर जिन यूजीन जेनोवीज का नाम आया है उनके समाजशास्त्र में पूंजीवाद का मतलब मुक्त मजदूर और दासप्रथा में मुक्त मजदूर नहीं था इसलिए दासता और पूंजीवाद भिन्न हैं । इस तरह की समझ से दरिद्र सिद्धांत और गलत इतिहास का जन्म होता है । वे दक्षिणी प्रांतों के गुलाम मालिकों को प्राक पूंजीवादी शासक वर्ग कहते हैं । उनका यह भी कहना है कि गुलाम कामगार स्थिर पूंजी थे इसलिए परिभाषा के अनुसार अतिरिक्त मूल्य नहीं पैदा कर सकते । यह भोंड़ा द्वंद्ववाद है जो विश्लेषण की सामग्री पर बाहरी नियम लाकर थोप देता है । औपचारिक समाधान के पक्षधरों को इससे जो भी आकर्षण और मदद मिले ऐसे सिद्धांत से जीवंत इतिहास नहीं बना करता । इसी तरह वाल्टर जान्सन का दावा है कि मार्क्स के नाम से जुड़ी बौद्धिक परम्परा में गुलामी और पूंजीवाद को अलग समझा जाता है । उनका यह दावा मार्क्स, रोजा और लेनिन के लेखन से मेल नहीं खाता । न केवल इतना बल्कि इससे कैरीबियाई मार्क्सवाद की परम्परा की अवमानना भी होती है । सी एल आर जेम्स, सिल्विया विंटर और एमी सेजारे जैसे इन सिद्धांतकारों ने न केवल नयी दुनिया कीगुलामी को पूंजीवादी कार्यपद्धति का अंग माना बल्कि उन्होंने उपनिवेशवाद और नस्लवाद को विश्व पूंजीवाद का घटक माना । अगर इस परम्परा को नजरअंदाज किया गया तो यह कहने वाले मिलते रहेंगे कि मार्क्सवादी इतिहासकार गुलामी को पूंजीवाद मानने से इनकार करते हैं तथा मार्क्सवाद गुलामी और पूंजीवाद को परस्पर विरोधी उत्पादन पद्धति मानता है । सबूत इस तरह के दावों का खंडन करते हैं । इनसे अमेरिकी बौद्धिकता की उस धारा का अज्ञान जाहिर होता है जिसमें मार्क्सवादी आलोचना सिद्धांत और वैश्विक अश्वेत क्रांतिकारी परम्परा आते हैं । इसका ही समाहार काले और लाल के मिलन में हुआ है । किताब में इन बहिष्कृत परम्पराओं से प्रेरणा ली गयी है ।

उनसे अंतर्दृष्टि लेकर नयी दुनिया की गुलामी और विश्व पूंजीवाद के गहन अंतर्संबंधों की छानबीन इसमें की गयी है । ऐतिहासिक भौतिकवाद की भी उस धारा से इसमें मदद ली गयी है जो ऐतिहासिक समय को एकरेखीय नहीं मानता और उसकी जटिल गति को मान्यता देता है । सौ साल हो गये जब असमान और संबद्ध विकास की प्रक्रिया का मार्क्सवादी विवेचन हुआ था । इस सोच के अनुसार अलग अलग ऐतिहासिक कालखंड से जुड़े सामाजिक रूप एक साथ मिलकर जटिल लेकिन एकीकृत इतिहास का निर्माण करते हैं । इसके बावजूद नासमझ विद्वान ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम पर एक के बाद एक के क्रम में भिन्न भिन्न समाजों की एकरेखीय गति को ही दुहराते रहते हैं । इसी तरह की समझ से कुछ अमेरिकी इतिहासकारों का कहना है कि मार्क्स के मुताबिक दासप्रथा आदिम पूंजी संचय के प्रचीन युग से संबद्ध है । ऐसा कहकर वे मार्क्सवाद की भ्रामक छवि का पुनरुत्पादन करते हैं ।

सिद्ध है कि पूंजीवाद के राजनीतिक अर्थशास्त्र की मार्क्सी आलोचना में एकाधिक समयों की अंतर्विरोधी एकता है । इसमें एक ओर तात्कालिक उत्पादन का एकरेखीय समय है तो उसके साथ ही परिचलन का चक्रीय समय भी मौजूद है । इनके साथ ही व्यवस्था के पुनरुत्पादन के दौरान आपस में टकराते समयों की संकटग्रस्त विस्फोटक एकता भी बनी रहती है । इसी को असमान और संबद्ध विकास कहा जाता है । पूंजी की यही जटिलता होती है जिसमें पुराने के साथ नया और प्राक आधुनिक के साथ आधुनिक भी जुड़ा रहता है । इसी जटिलता की वजह से विकास में एकरेखीयता नहीं होती और आधुनिक के साथ मध्ययुगीन भी मौजूद रहता है । इसी समझ के साथ सी एल आर जेम्स ने कैरीबियाई प्लांटेशन को आधुनिक पूंजीवाद की अग्रिम चौकी कहा था । उनकी नजर में गुलामी कोई प्राचीन अवशेष नहीं थी बल्कि आधुनिक व्यवस्था अपने लाभ हेतु इस अति प्राचीन सामाजिक संबंध को संरक्षण दे रही थी । यहां आकर सिद्धांत और पद्धति के सिलसिले में लेखक ने कुछ नये  सूत्र दिये हैं । 

उनकी यह किताब ऐतिहासिक भौतिकवाद को ऐसा शोध कार्यक्रम मानती है जिसका मकसद नया ज्ञान पैदा करना है । इसके लिए विषयानुकूल नयी धारणा बनानी होगी। पहले से स्थापित मान्यताओं को दुहराने से काम नहीं चलेगा । इसके तहत गवेषणा के लिए जिस विषय को चुना गया है हेगेल के मुताबिक उसके स्वतंत्र जीवन के सामने समर्पण करना होता है । शोधकर्ता शोध की सामग्री में अपने आपको डुबा देता है । इससे अलग किसी अन्य पद्धति को अपनाने का मतलब है मानव अनुभव के आगार के प्रति जिम्मेदारी न होना । इसीलिए किताब के आरम्भिक अध्यायों में ब्रिटेन के कैरीबियाई उपनिवेशों और अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों में समेकित गुलाम प्लांटेशन के महत्वपूर्ण मौकों की पड़ताल की गयी है । बाद के अध्यायों में उन धारणाओं को प्रस्तुत किया गया है जो इतिहास के सामाजिक तर्क पर रोशनी डालती हैं । ई पी थाम्पसन की तरह लेखक ने भी धारणा और साक्ष्य के बीच संवाद के जरिए सामाजिक प्रक्रिया के ऐतिहासिक तर्क का विवेचन किया है । उनका यह संवाद सचमुच दोतरफा है । साक्ष्य के संदर्भ में धारणाओं को गहराई और नयी शक्ल मिलती रही है । इसी तरह तथ्यों के ऐतिहासिक अर्थ समूची इतिहास प्रक्रिया लायक नयी धारणाओं के सहारे ही प्रकट होते हैं । सिद्धांत और इतिहास के बीच यह दोतरफा संवाद आवश्यक होता है ताकि सिद्धांत से जी चुराने वाले आनुभविक इतिहास और जीवन रहित अमूर्तन पर आधारित सैद्धांतिक रूपवाद से बचा जा सके ।

इसके लिए जरूरी होता है कि नयी धारणा ऐतिहासिक साक्ष्य के लिए मुफ़ीद तो हो ही, सैद्धांतिक रूप से सटीक भी हो । प्रूदों के बारे में मार्क्स ने कहा कि द्वंद्ववाद जब नयी कोटियों के जन्म और विकास की मांग करता है तो वे इसमें अक्षम हो जाते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि सामाजिक जीवन की जटिल गति लायक नयी कोटियों का निर्माण समस्त आलोचनात्मक ऐतिहासिक शोध हेतु आवश्यक है । इस मामले में लेखक ने अमेरिका में नस्ल और रंगभेद के विनाश संबंधी मार्क्स के अपेक्षाकृत उपेक्षित  लेखन को सिद्धांत और राजनीति में ऊंचाई देने की जरूरत महसूस की है । उनका दावा यह नहीं है कि मार्क्स द्वारा कही गयी बातों को ही वे प्रस्तुत कर रहे हैं । उनका बस यही कहना है कि इस विषय के विश्लेषण के लिए उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद की ही कुछ धारणाओं को विकसित किया है । इन्हें धारणा और साक्ष्य के बीच संवाद के ईमानदार प्रयास की तरह देखा जाए ।                                                                                                                     

                


Thursday, June 25, 2026

कम्युनिस्ट स्त्री कार्यकर्ता

 

                                   

                                                      

2023 में पालग्रेव मैकमिलन से फ़्रंचिस्का दे हान के संपादन मेंद पालग्रेव हैंडबुक आफ़ कम्युनिस्ट वीमेन ऐक्टिविस्ट्स एराउंड द वर्ल्डका प्रकाशन हुआ । संपादकीय भूमिका समेत किताब के छह हिस्सों में छब्बीस लेख संकलित हैं । सबसे पहले वैश्विक पुरखिनों, फिर यूरोप, एशिया, अफ़्रीका और मध्य पूर्व, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैन्ड तथा अमेरिकी भाग की कार्यकर्ताओं का विवेचन किया गया है । कहानी अर्जेन्टिना की कम्युनिस्ट पार्टी की अध्यक्ष को श्रद्धांजलि से शुरू होती है । वे बहुत समय तक स्त्री संघ की नेता रहीं । इसी तरह चीन में भी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही । इसके बावजूद कम्युनिस्ट इतिहास में पार्टी के पुरुष ही नेताओं का जिक्र आता है । इसके विपरीत इस किताब के पचीस अध्यायों में दुनिया भर की ऐसी तमाम नेताओं का जिक्र है जिन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । इसके लिए उन्होंने स्त्रियों को पार्टी में भरती किया, वर्गीय की जगह स्त्री संगठनों की स्थापना की और कम्युनिस्ट पार्टी में मौजूद पुरुषवादी रुझान से संघर्ष किया । सिद्धांत के मोर्चे पर भी उन्होंने ऐसी समझ बनायी जिसमें वर्ग के साथ ही नस्ल और लिंग का सवाल भी शामिल रहे । इन स्त्रियों के जीवन, योगदान और संघर्षों को वैश्विक नजर से देखा गया है । ऐसा कम्युनिज्म के यूरोप और एशिया केंद्रित इतिहास से आगे बढ़ने के लिए किया गया है । इन स्त्रियों का सही मूल्यांकन न होने की बड़ी वजह यह मान्यता है कि वे भी समकालीन कम्युनिस्टों की नारीवाद विरोधी सोच के असर में रही होंगी । उनका कहना है कि कम्युनिस्टों द्वारा नारीवादी आंदोलन को बुर्जुआ आंदोलन मानने से यह नहीं साबित होता कि स्त्रियों के सवालों को ही दरकिनार किया जाता रहा था । इन स्त्री नेताओं के कामों का अवमूल्यन इस मान्यता की वजह से भी हुआ कि उन पर शीतयुद्ध की राजनीति का दबाव था । स्त्रियों की हैसियत और अधिकार बढ़ाने हेतु नीतियों और कानूनों के निर्माण की उनकी वास्तविक इच्छा में इसका स्रोत नहीं देखा गया ।

इस किताब में शामिल पचीस राजनीतिक जीवनियों से जाहिर है कि ये नेता बुर्जुआ स्त्री आंदोलन के प्रति अपनी राय के बावजूद स्त्री जीवन में सुधार की गहरी आकांक्षा से परिचालित थीं । इसके लिए उन्होंने चतुर्दिक व्याप्त पुरुष प्रभुत्व को पहचाना और उसे चुनौती दी । यह प्रभुत्व समूची दुनिया के साथ ही समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टियों के भीतर भी समाया हुआ था । पितृसत्ता के प्रति इसी जागरूकता के कारण उन्होंने स्त्री संगठनों, स्त्रियों के अखबारों, कार्यक्रमों आदि पर जोर दिया । इसके लिए भले ही उन्हें इन ढांचों और गतिविधियों की उपेक्षा या उन्हें समाप्त करने के प्रयासों से टकराना पड़ा । इसी वजह से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्त्री अधिकारों को आगे ले जाने का उन्होंने काम किया । चूंकि वे स्त्री उत्पीड़न को उत्पीड़न के अन्य रूपों के साथ जोड़कर देखती थीं इसलिए उन्होंने उदार नारीवादी अमूर्त जेंडर समता की जगह स्त्री के राजनीतिक और समाजार्थिक अधिकारों की हिमायत की । इस क्रम में सबसे पहले तीन वैश्विक पुरखिनों का जिक्र किया गया है । जर्मनी की क्लारा जेटकिन, रूस की अलेक्सांद्रा कोलोन्ताइ और त्रिनिदाद की क्लाडिया जोन्स शामिल हैं । किताब के वैश्विक आयाम का अंदाजा दूसरे हिस्से की तीन नेताओं से भी होता है जिनमें माली की आओआ केइता, क्यूबा की विल्मा एस्पिन और वियतनाम की गुयेन थी बिन्ह शामिल हैं । तीसरे हिस्से में इतिहास का संक्षिप्त लेखा जोखा है । चौथे हिस्से में इन स्त्रियों की प्रेरणा, योगदान और उपलब्धियों की चर्चा है । आखिरी पांचवें हिस्से में किताब की योजना और उसके लक्ष्य का विवरण है ।

जिन तीन पुरखिनों का जिक्र हुआ उन सबने समाजवाद और कम्युनिज्म के हित में विशेष योगदान किया । क्लारा जेटकिन के राजनीतिक जीवन की शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी स्त्री आंदोलन के निर्विवाद नेता के रूप में हुई जब उन्होंने 1889 में दूसरे इंटरनेशनल के पेरिस में आयोजित स्थापना सम्मेलन में स्त्रियों के काम और मजदूर आंदोलन में उनकी भूमिका पर व्याख्यान दिया । उनकी बातें अगस्त बेबेल की स्त्री और समाजवाद शीर्षक 1879 की किताब से प्रभावित थीं । उन्होंने इसे किताब से अधिक घटना का दर्जा दिया था । प्रतिबद्ध मार्क्सवादी होने के नाते उनका मानना था कि स्त्री उत्पीड़न का मूल वर्ग आधारित आर्थिक शोषण है । इसे यूं भी कहा जा सकता है कि लैंगिक विषमता की जड़ आर्थिक ढांचे में है । बेबेल से उनकी सहमति यह थी कि स्त्री को सबसे पहले पुरुष से आर्थिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए । इसकी कुंजी काम में उनकी भागीदारी है । आर्थिक स्वतंत्रता से सामाजिक आत्म निर्भरता की राह खुलेगी । वे यह भी मानती थीं कि स्त्री की यह सामाजिक आत्मनिर्भरता और तज्जनित बराबरी समग्र मानव मुक्ति के लिए आवश्यक है । उनकी विशेषता यह भी थी कि वे स्त्रियों के अलग संगठन के पक्ष में थीं । जर्मनी के मजदूर आंदोलन में अपनी लम्बी सहभागिता के अनुभव से वे इस नतीजे पर पहुंची थीं । इससे पार्टी को स्त्रियों को संगठित करने में भारी सफलता मिली थी । इसके साथ 8 मार्च का अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी उनका प्रस्ताव था । इसकी शुरुआत स्त्री मताधिकार की मांग पर जोर देने के लिए हुई थी । कोमिंटर्न के स्त्री पहल के केंद्र में भी क्लारा रहीं । इस दौरान सोवियत संघ में उनकी मुलाकातें लेनिन से अक्सर होती रहीं । उनके साथ स्त्री प्रश्न पर लम्बे वार्तालाप मशहूर हैं । इनका प्रकाशन लेनिन के निधन के साल भर बाद हुआ था । मजदूर आंदोलन में मौजूद पितृसत्ता की सोच से लड़ने में उन्होंने बहुत समय दिया । 1930 दशक में वे अमेरिका की नस्लवाद विरोधी अंतर्राष्ट्रीय गोलबंदी में भी सक्रिय रहीं । एंजेला डेविस ने उनकी इस भूमिका को रेखांकित किया है । स्त्री अधिकार, शांति, फ़ासीवाद विरोध और अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के क्षेत्र में उनकी सक्रियता की विरासत 1933 में उनके निधन के बाद भी कायम रही । कोलोन्ताइ ने आत्मकथा में सोवियत संघ में सर्वहारा स्त्रियों के जमीनी संगठन बनाने में उनकी प्रेरणा को याद किया है । उनका जर्मन अनुभव अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी स्त्री आंदोलन के लिए पूंजी साबित हुआ । मेक्सिको की एक स्त्री कार्यकर्ता रीलू के सम्मेलन में भाग लेने जब सोवियत संघ गयीं तो उनकी मुलाकात क्लारा से हुई थी । उन्होंने अपने संस्मरणों में उनके व्याख्यान को याद किया । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भी उनकी विरासत जिंदा रही । यूरोप और एशिया के स्त्री संगठनों और उनके नेताओं ने उनकी याद को जिंदा रखा । उनका सबसे जीवंत स्मारक तो 8 मार्च का अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है जिसे सामूहिक स्मृति में कायम रखने में वाम आंदोलन का भारी योगदान रहा है ।

इसी तरह की दूसरी नेता अलेक्सांद्रा कोलोन्ताइ थीं जिन्हें उनके जीवन में तो विश्वव्यापी ख्याति मिली ही, आज भी उन्हें सर्वकालिक कम्युनिस्ट नेता के बतौर याद किया जाता है । हाल के दिनों में क्लारा जेटकिन की तरह उनके जीवन के बारे में फिर से रुचि पैदा हुई है । वे दुनिया की पहली स्त्री थीं जो किसी सरकार में मंत्री बनीं । अक्टूबर क्रांति के बाद की बोल्शेविक सरकार में समाज कल्याण मंत्री रहते हुए उन्होंने तलाक, पंजीकृत विवाह, अवैध बच्चों के अधिकार की समानता तथा मातृत्व और बचपन की सुरक्षा के अनेक कानूनी प्रावधान तैयार करने के काम में भाग लिया । पार्टी की केंद्रीय समिति में स्त्री विभाग की स्थापना में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा । ट्रेड यूनियनों को अधिक अधिकार देने की वकालत भी उन्होंने की । नार्वे में जब उन्हें राजदूत बनाया गया तो वे दुनिया की पहली राजदूत स्त्री थीं । यौनिक मुक्ति के लिए उन्होंने नयी नैतिकता की वकालत की और इसे व्यक्त करने वाले उपन्यास भी लिखे । आधुनिक स्त्री की नयी पहचान और यौनिकता के बारे में लेखन के कारण भी वे मशहूर रहीं । दूसरी नारीवादी लहर में उनका इस तरह का लेखन फिर से छपा और चर्चित हुआ ।

संपादक उनके प्रभाव को इसी पहलू तक सीमित रखने का विरोध करती हैं । वे यह भी नहीं मानतीं कि राजदूत के बतौर सोवियत संघ से बाहर रहने के कारण वे गायब हो गयीं । उपन्यासों के लेखन से पहले भी उन्होंने स्त्रियों के बारे में वैज्ञानिक छानबीन के आधार पर बहुत कुछ लिखा । इसमें समाज और मातृत्व के बारे में 1916 में लिखी 600 पृष्ठों की किताब भी शामिल है जिसमें उन्होंने मातृत्व को ऐसी सामाजिक जिम्मेदारी माना जिसमें स्त्री और समाज सहभागी होते हैं । उनका यह सिद्धांत बोल्शेविक नारीवाद की मूलभित्ति बना । आज भी समाजवादी शासन और वाम स्त्री संगठनों के काम में इस धारणा की मौजूदगी देखी जा सकती है । स्वीडेन में पंद्रह साल तक राजदूत रहने की वजह से वहां के स्त्री आंदोलन के साथ भी उनका सम्पर्क बना । उस देश के प्रगतिशील स्त्री समूह कोलोन्ताइ को अपनी प्रेरणा स्वीकार करती हैं । लीग आफ़ नेशंस में भी सोवियत संघ का प्रतिनिधित्व तीन साल तक कोलोन्ताइ ने किया और अपने कार्यकाल में स्त्रियों की कानूनी स्थिति की जांच पड़ताल करायी । वे सभी सदस्य देशों में स्त्री की कानूनी समता के लिए संधि की पैरोकार भी थीं । फ़ासीवाद विरोधी स्त्री अभियान में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही । घरेलू काम के असमान वितरण के सवाल पर वैचारिक जागृति की उन्होंने जरूरत महसूस की ।

क्लारा जेटकिन और कोलोन्ताइ की कहानियां उतनी ही नहीं हैं जितनी इस किताब में बतायी गयी हैं फिर भी सबने उनको अग्रणी समाजवादी और कम्युनिस्ट स्त्री नेता माना है । इनके साथ संपादक ने क्लाडिया जोन्स को भी शामिल किया है । इसकी मुख्य वजह मार्क्सवादी सिद्धांत के क्षेत्र में उनका योगदान है । वे बचपन में ही परिवार के अन्य सदस्यों के साथ त्रिनिदाद से अमेरिका आ गयी थीं और कम्युनिस्ट पार्टी की युवा शाखा में शरीक हुईं । उन्होंने बहुतेरे सैद्धांतिक हस्तक्षेप किये । वे पार्टी की स्त्री आयोग की सचिव रहीं । आयोग ने स्त्री के बारे में जो समझ बनायी उसकी वजह से पार्टी को बहुत सारे बदलाव करने पड़े । उन्होंने माना कि पुरुष प्रभुता सभी मामलों में कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रगति में बाधा है इसलिए इसका विरोध होना चाहिए । पार्टी की इस समझ के बावजूद अश्वेत स्त्री की उपेक्षा जारी रही जिसके विरोध में क्लाडिया जोन्स ने अभियान चलाया । इस तरह उन्होंने उस सवाल पर विचार किया जिसे मार्क्स और लेनिन ने भी चर्चा से बाहर रखा था । क्लारा द्वारा स्त्री प्रश्न पर लेनिन की राय वाली पुस्तिका के अमेरिकी संस्करण की भूमिका में क्लाडिया जोन्स ने अश्वेत कामगार स्त्री को इस संघर्ष का नेता बनाने का सुझाव दिया और इस तरह लिंग, नस्ल और वर्ग की आपसदारी को रेखांकित किया । इस तरह के रिश्ते के लिए फिलहाल जिस इंटरसेक्शनल शब्द का प्रयोग किया जाता है उसकी पहली स्पष्ट झलक क्लाडिया जोन्स के लेखन में मिलती है । उनके ये विचार अमेरिका के बाहर भी फैले । उनके प्रभाव में ही हंगरी में आयोजित 1948 के एक सम्मेलन की अमेरिकी प्रतिनिधि ने अश्वेत स्त्री को नस्ली और लैंगिक भेदभाव के साथ सबसे कम पगार पाने वाली मजदूर के बतौर तिहरे शोषण का शिकार बताया था ।

संपादक का कहना है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के इस क्रांतिकारी चिंतन को चर्चा से बाहर रखने में शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका के कम्युनिस्ट विरोधी दमन का हाथ है । इस दमन ने इतिहास लेखन के लिए आवश्यक स्रोत भी नष्ट कर दिये । इसी दमन अभियान के तहत क्लाडिया जोन्स को 1954 में कारावास और 1955 में देशनिकाला मिला । लंदन में रहकर उन्होंने पहला अश्वेत अखबार शुरू किया, कैरीबियाई समुदाय को संगठित करने में मदद की और वामपंथी उपनिवेशवाद विरोधी वैश्विक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की । पिछले दस पंद्रह सालों में अश्वेत क्रांतिकारी स्त्रियों के इस इतिहास का उत्खनन शुरू हुआ है ।

संपादक के अनुसार किताब में जिन पचीस नेताओं की जीवनी है उन सबका संक्षेप में परिचय मुश्किल है फिर भी माली, क्यूबा और वियतनाम की तीन कार्यकर्ताओं का जिक्र उन्हें जरुरी लगता है । आओआ कीता नामक नेता माली को 1960 में हासिल हुई आजादी के आंदोलन की सबसे प्रभावशाली नेता मानी जाती हैं । उनका जीवन उपनिवेशवाद विरोध, राष्ट्रवाद, नारीवाद और अफ़्रीकावाद से जुड़ा था । वे देश और दुनिया में स्त्रियों के राजनीतिक संगठन के काम में लगी रहीं । कम्युनिस्ट दुनिया के साथ उनके रिश्तों का मकसद आत्म निर्णय और स्त्री मुक्ति के अधिकार की रक्षा हेतु समर्थन जुटाना था । क्यूबा की नेता विल्मा एस्पिन को फ़िदेल के विचारों की व्याख्याता का दर्जा हासिल है । वे ऐसा मानती हुई प्रतीत होती हैं कि फ़िदेल कास्त्रो उनके बौद्धिक नेता हैं लेकिन यह छवि उनकी स्वतंत्र सत्ता के साथ न्याय नहीं कर पाती । क्यूबा की क्रांति में उनकी राजनीतिक भूमिका केंद्रीय थी । अनेक सुधारों के पीछे उनकी प्रेरणा रही है । उन्होंने क्यूबा की क्रांतिकारी प्रक्रिया को वैश्विक पूंजीवाद और साम्राज्यवाद विरोध के साथ जोड़ा । वियतनाम की गुएन थी बिन्ह वियतनाम की अस्थायी क्रांतिकारी सरकार में 1969 से 1975 तक विदेश मंत्री रहीं । वे वियतनाम के स्त्री संघ की उपाध्यक्ष रहीं और युद्ध के उपरांत देश की शिक्षा मंत्री तथा उप राष्ट्रपति रहीं । वे क्रांति के लिए आग के साथ फूल का भी काम करती रहीं । वे तीसरी दुनिया के नारीवाद का साकार रूप थीं । उनके व्यक्तिव में नारीवाद और क्रांति, आधुनिकता और परम्परा तथा विनम्रता और दृढ़ता का संयोग था । इसी किस्म के नारीवाद ने बीसवीं सदी में दक्षिणी गोलार्ध के अनुपनिवेशीकरण के संघर्षों को सफलता की मंजिल तक पहुंचाया ।