कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह हिंदी आलोचना की उस धारा के लगभग आखिरी योद्धा थे जो उपनिवेशवाद विरोध
के गर्भ से उपजी, उसके वाम रुख को प्रकट किया तथा उसे आजादी के बाद क्रांतिकारी
तेवर देकर जिंदा रखा और प्रासंगिक बनाया । इस लम्बी रचनात्मक और वैचारिक यात्रा के
निशान उनकी आलोचना में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं । आम तौर पर कवि आलोचना
लिखने से परहेज करते हैं, अगर लिखते भी हैं तो उसमें खास तरह की औपचारिकता होती है
लेकिन इसके विपरीत कुमारेंद्र जी ने बहुत ही जिम्मेदारी के साथ आलोचना लिखी और
उसके अत्यंत परिष्कृत आलोचनात्मक औजारों का इस्तेमाल किया । उस दौर में जो वैचारिक
विभाजन था उसके कारण कथन भंगिमा से अधिक कथन की वस्तु पर ध्यान दिया जाता था लेकिन
कुमारेंद्र जी ने काव्यभाषा जैसे संवेदनशील हथियार को अपनी विवेचना का विषय बनाया
और भाषिक व्यवहार को
विषयवस्तु की अभिव्यक्ति के प्रति गम्भीरता से जोड़कर देखा । उनको लगता था कि विषय
के प्रति कवि की निष्ठा का सबूत उसके बारे में कवि द्वारा अपनायी गयी भाषा देती है
। आश्चर्यजनक ढंग से इस प्रक्रिया में उन्होंने लगभग शल्यक्रिया जैसी तटस्थता और
कुशलता का पालन किया है । उनकी आलोचना से गुजरते हुए पाठक को उस दौर की बेचैनी के
साथ रचनात्मक समृद्धि के भी दर्शन होते हैं । कुमारेंद्र जी के समकालीन कवियों के बहुत
सारे उद्धरणों के लिए भी उनकी आलोचना को देखा जा सकता है । उस समय हिंदी लेखन में जिस तरह के विद्रोह भाव का दबदबा था उसमें लेखन के प्रति मुग्ध होना बुरा समझा जाता था । लेखक को सामाजिक बदलाव में लगी ताकतों की कोशिश अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होती थी और अपने लेखन के प्रति उपेक्षा बरती जाती थी । काव्य भाषा का वामपक्ष शीर्षक उनका लेख‘आलोचना’ पत्रिका में नामवर सिंह ने छापा इसलिए वह सुरक्षित रह गया यह बात लेखक ने खुद स्वीकार की है । ऐसे में उनके आलोचनात्मक लेखन
का संग्रह कठिन था लेकिन खुशी की बात कि उसे ‘कविता का संघर्ष’
शीर्षक से संवर्धित रूप में प्रकाशित करने से यह दस्तावेजी लेखन फिर से उपलब्ध हो गया । इसके अतिरिक्त आनंद प्रकाश के संपादन में कुमारेंद्र
जी की कविताओं के प्रतिनिधि संकलन में भी उनकी कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियों को शामिल
कर लिया गया है । प्रस्तुत लेख इनके ही आधार पर तैयार किया गया है ।
कहने की जरूरत नहीं कि कुमारेंद्र जी का समय साठ दशक का विद्रोही समय है । पूरी दुनिया में उस दशक को साहसिक सपनों का समय माना जाता है । आजादी के बाद के मोहभंग को उस समय ऐसा सघन वैश्विक परिप्रेक्ष्य मिला जो उससे पहले स्वाधीनता आंदोलन के दौर की जोरदार उपनिवेशवाद विरोधी वैश्विक लहर के कारण भारत के बौद्धिक समुदाय को मिला था । इन दोनों के मिलाप ने उस दौर की न केवल साहित्य रचना बल्कि उसके मूल्यांकन को भी वाम झुकाव प्रदान किया था । हिंदी आलोचना की यही मुख्य धारा बन गयी । कुमारेंद्र जी ने इस धारा का सकारात्मक दाय एकदम साफ खुलकर स्वीकार किया है । इसी धारा की निरंतरता उन्होंने प्रगतिशील आलोचना में भी देखी है । यह रुख उन्हें अपने समकालीनों में विशेष बनाता है । इस प्रवृत्ति पर
जोर देना इसलिए भी जरूरी है कि साठ के दशक का परम्पराद्रोही पक्ष बहुत उभारा जाता
है लेकिन उसने प्रगतिशील धारा को फिर से प्रासंगिकता प्रदान करने में जो योग दिया
उसे भुला दिया जाता है । आजादी मिलने के बाद साहित्य के भीतर प्रगतिशील धारा को
किनारे पर डालने की सचेत कोशिश की गयी थी । इस कोशिश में कुछ हद तक सफलता
भी मिली थी । साठ के दशक में नक्सलबाड़ी विद्रोह से जो चेतना पैदा हुई उसने
प्रगतिशीलों को फिर से हिंदी साहित्य के केंद्र में ला दिया और उनकी विद्रोही विरासत को आगे ले जाने का दायित्व नये विद्रोहियों ने निभाया ।
साठ के दशक की इस चेतना का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
वियतनाम और माओ से बना था । इसके लिए कुमारेंद्र जी का माओ के कवि के बारे में
लिखा देखा जाना चाहिए । माओ की कविता के बारे में लिखना आज की तरह देशद्रोह माने
जाने की कोटि में तो नहीं आता था लेकिन साहित्य के भीतर मान्यता के लिहाज से
खतरनाक जरूर था । इस लेखन से
ऐसा समझा जा सकता था कि साहित्य के भीतर वैचारिक राजनीति का बेजा लाभ लिया जा रहा
है । प्रगतिशील साहित्य को हाशिए पर डालने के लिए आलोचना का सहज बोध राजनीति से दूरी बना दिया गया था और आज
भी यही बना हुआ है कि साहित्य की बात करते हुए राजनीति से थोड़ा
परहेज करना सही और सुरक्षित होता है । ऐसे में कुमारेंद्र जी ने माओ की कविता के
बारे में लिखने का जोखिम उठाया । यह साहस उन्हें प्रेमचंद, नागार्जुन और राहुल सांकृत्यायन जैसे साहित्यकारों के कारण मिला । यह याद दिलाने की
जरूरत नहीं कि बिहार ऐसे साहित्यकारों से भरा है जो इस कृत्रिम विभाजन की खिल्ली अपने
लेखन और व्यवहार से उड़ाते हैं
। रामवृक्ष बेनीपुरी और फणीश्वर नाथ रेणु जैसे लेखक इनमें अग्रगण्य हैं । राहुल
सांकृत्यायन भी उत्तर प्रदेश से होने के बावजूद बिहार से अधिक जुड़े रहे । कुमारेंद्र
जी ने साहित्यकारों की लीक से हटकर चलने वाली इस परम्परा को अपनी आलोचना के जरिए नया
आयाम दिया है । इसी वजह से उनकी आलोचना को हिंदी आलोचना की मुख्य धारा का विकास और विस्तार समझा जाना
चाहिए । माओ के साथ ही चीनी साहित्यकार लूसुन का नाम भी उनके लेखन में बहुत
बार आया है । मुख्य रूप से कवि होने के चलते कुमारेंद्र जी ने रूसी कवि मयाकोव्सकी
और चिली के स्पेनी कवि पाब्लो नेरुदा का भी एकाधिक प्रसंगों में उल्लेख किया है । इनके अतिरिक्त भी वे यथावसर विदेशी कवियों और साहित्य चिंतकों
का निधड़क उल्लेख करते चलते हैं ।
आलोचना की जिस धारा से कुमारेंद्र जी अपने आपको
जोड़ते हैं उसमें विश्लेषण के परिष्कृत उपकरणों के पक्ष में विषयवस्तु की उपेक्षा
नहीं की जाती थी । असल में अगर ‘कथन क्या है’ को ‘कैसे कहा गया है’ से अलग कर दिया
गया तो आलोचक की नजर एकांगी हो जाती है । प्रगतिशील आलोचना पर कुत्सित समाजशास्त्र
के तमाम आरोपों के बावजूद सही यही है कि हिंदी की इस आलोचना में वैसा भोंथरापन कभी
नहीं रहा जैसा आरोप उस पर लगाया जाता रहा है ।
उसके सभी बेहतरीन आलोचकों ने दोनों को अलग समझने की जगह रचना को परखने में उनका आपसी
समन्वय किया । जिन्होंने भी समाजशास्त्रीयता के कल्पित आरोप से बचने के लिए चतुराई के साथ अतिरिक्त सावधानी बरती वे किसी न किसी
तरह के रूपवाद के शिकार हुए और रचना की गुणवत्ता की पहचान में मददगार कारगर औजार भी विकसित नहीं कर सके । आश्चर्य की तरह कुमारेंद्र जी की आलोचना इस मामले
में बहुत ही समृद्ध है ।
उनके आलोचनात्मक लेखन का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष स्त्री के प्रति अपने समय के कवियों के रुख की तीखी मीमांसा है । उनकी आलोचना के इस पहलू पर जोर देने की जरूरत है । असल में हिंदी कविता में स्त्री शरीर के अंगों का उल्लेख पाठक के आस्वाद को धक्का देने की विद्रोही क्रिया मानी जाती रही है । इस दृष्टिकोण की लम्बी उपस्थिति साठ के दशक के कवियों को विरासत में मिली थी । कुमारेंद्र जी की आलोचना स्पष्ट करती है कि यह रुख विद्रोह की जगह उसकी बनावटी मुद्रा मात्र है । इस सवाल पर उनकी आलोचना के मूल किसी नैतिक आग्रह में नहीं हैं । वे इसे संवेदना की सच्चाई के तराजू पर तौलते हैं और पाते हैं कि यह रुख लेखक की संवेदना में तीव्रता की कमी का द्योतक है जिसकी भरपाई लेखक विद्रोह की भंगिमा से करना चाहता है । इस मामले में उनकी आलोचना से आज भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है । कुमारेंद्र जी के इस रुख से उन पर सामंती नैतिकता के असर का आरोप लगने की गुंजाइश थी फिर भी उन्होंने स्त्री शरीर के प्रति इस भोगवादी रुख का प्रतिकार करना बहुत ही जरूरी समझा । उनके इस साहस और समझ की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है ।
विद्रोह
की शाब्दिक भंगिमा के प्रति उनकी चिढ़ अपने प्रिय कवियों के भी आडम्बर को
व्यक्त करने में प्रकट हुई है । उनकी आलोचना में शाश्वत की जगह तत्काल और जरूरी को
निभाने पर अतिरिक्त जोर है । तत्काल और जरूरी पर उनका यह अतिरिक्त बल एकाधिक प्रसंगों में कवि कर्म की सीमा लांघने की अनुशंसा तक चला जाता
है । असल में साहित्यकारों की दुनिया में अपने आपको तात्कालिक से अलग शाश्वत की खोल में सुरक्षित रखने का चलन रहा है । इसी प्रवृत्ति के विरोध में उस समय समाज से प्रतिबद्धता की जरूरत पर बल दिया गया था । इसके लिए कुमारेंद्र जी ने एकदम ही मौलिक शब्द ‘हमबद्ध’
का प्रयोग किया है । इसमें व्यक्तिनिष्ठता के प्रतिकार की ध्वनि तो है ही,
प्रतिबद्ध के उस अर्थ को भी उलटने की कोशिश है जिसमें खूंटे से बंधे होने की अनुगूंज
है । इन तमाम शब्दों की तरह कुमारेंद्र जी की आलोचना का एक और रोचक बीजशब्द बदल भी है । कभी कभी वे इसके समानार्थी परिवर्तन का भी इस्तेमाल करते हैं लेकिन अधिकतर बदल ही उन्हें प्रिय है । इसके साथ वे किसी विशेषण का भी उपयोग नहीं करते जिससे बदलाव के किसी खास पहलू का पता चले । इसका अर्थ बहुत हद तक परिवर्तन के एकमात्र सत्य होने की दार्शनिक धारणा तक चला जाता है । समग्र बदलाव की इस व्यापक प्रक्रिया से मनुष्य होने के नाते साहित्यकार भी निरपेक्ष नहीं रह सकता । मनुष्य के रूप में कवि/साहित्यकार का अस्तित्व सामाजिक होता है । इस उच्चतर भूमि से कुमारेंद्र जी ने उसकी वृहत्तर सामाजिक जिम्मेदारी का सवाल उठाया है । इस जिम्मेदारी के ही
संदर्भ में उन्होंने एक अन्य मौलिक शब्द रक्ताल का भी उपयोग किया है । इस शब्द का
सबसे नरम अर्थ लाल है तो यह कभी खून से लथपथ तक जाता है । कवि के इस सामाजिक कर्तव्य को उसकी कविता से बहुत अलग नहीं किया जा सकता । यहां आकर कुमारेंद्र जी हिंदी आलोचना की जिस मुख्य धारा के साथ खड़े होते हैं उसके शीर्ष पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल रहे हैं । कविता में अभिधा को प्रमुख तौर पर प्रयोग करने की उनकी धारणा कभी विचार करने लायक भी नहीं मानी गयी । शुक्ल जी की इस मामले
में हिंदी
की दुनिया द्वारा उपेक्षा के बावजूद काव्य भाषा के सवाल पर कुमारेंद्र जी ने बहुधा वायवीय होने के खतरे से बचने के लिए चीजों को उनके सही नाम से पुकारने की वकालत की है और इस रुख में अभिव्यक्ति की ईमानदारी मानी है । इसे उन्होंने जन साधारण की वाक संस्कृति के साथ काव्य
भाषा को सम्पर्कित करने की तरह देखा है ।
सभी आलोचकों की तरह कुमारेंद्र जी को अपने समय से
अनुराग तो है लेकिन उसके
बावजूद अधिक की आशा भी है । उनकी इस आशा का ही फल नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और
मुक्तिबोध जैसे अपने पुरखों की कविता का प्रेरणा प्रदान करने वाला मूल्यांकन है ।
विस्तार से उन्होंने इन सभी कवियों की समानता और भिन्नता को पहचाना और दर्ज किया
है । इसी संदर्भ में उन्होंने अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ और मुक्तिबोध की ‘अंधेरे
में’ को इन दोनों की परस्पर भावभूमियों की प्रतिनिधि कविताओं के रूप में चर्चा की
है । पहली कविता में उन्हें अगर व्यक्तिवाद की गहरी गूंज सुनायी देती है तो दूसरी
कविता में समूह में व्यक्ति का निरसन होता नजर आता है । मुक्तिबोध की कविता में इस प्रयास को कुमारेंद्र जी ने पाताल-तोड़ कोशिश जैसे रचनात्मक शब्द-युग्म से अभिहित किया है । इसी जगह अभिव्यक्ति की क्षमता के संदर्भ में उन्होंने नागार्जुन की सफलता का भी रहस्य खोला है ।
वह समय हिंदी में नवगीत के लिए भी मशहूर रहा है । किताब में आखिरी लेख गीत
रचना पर केंद्रित है । लेखक ने विस्तार से इसमें कविता और गीत का अंतर
स्पष्ट करते हुए गीत लेखन की विशेषता और इसके स्वतंत्र महत्व पर प्रकाश डाला है । निराला
और नचिकेता के एक एक गीत के सौंदर्य के विश्लेषण से उन्होंने नये रचनाकार की
क्षमता को उजागर किया है । इसके अतिरिक्त किताब में पांच परिशिष्ट भी हैं जिनमें
किताब के ऊपर लिखे विभिन्न सूत्रों को अनेकानेक अन्य प्रसंगों से पुष्ट किया गया
है । इनमें मुक्तिबोध की अंधेरे में पर एक स्वतंत्र टिप्पणी के साथ नेरुदा के
कविता संबंधी विचार भी स्पष्ट किये गये हैं ।
कुमारेंद्र जी नक्सल धारा के प्रतिबद्ध साहित्यकार
थे । इस धारा के बारे में सामान्य धारणा परम्पराद्रोह की है । साहित्य की अभिजन
समझ से विद्रोही लेखन को बाहर रखने की मंशा से ऐसा किया गया । हिंदी में इस समझ के
बनाने में पारम्परिक वाम का भी सहयोग रहा था । इसके संस्थान केंद्रित रूप से अलग
ऐसे रचनाकार भी थे जो संस्थान के भीतर समाने लायक नहीं समझे गये थे । नक्सल धारा
ने प्रगतिशीलों के इस संस्थानबाह्य खेमे के साथ रचनात्मक संवाद बनाया । नक्सल धारा से जुड़े आलोचकों के इस पहलू पर कम ध्यान दिया गया है लेकिन इसी पहलू ने इस धारा को हिंदी साहित्य की विद्रोही परम्परा के साथ इसे जोड़ा । इस सम्मिलन का दबाव इतना गहरा था कि संस्थानबद्ध खेमे के भीतर भी यदा कदा इसकी मान्यताओं की झलक मिल जाया करती है । बहुत लम्बे अरसे तक इसने हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता
को मुख्य स्वर बनाए रखा । आज भी इसने हिंदी साहित्य की मुख्य धारा की धारणा को वाममुखी
रखा है । बहुत हद तक इसी वजह से हिंदी साहित्य और साहित्यकार का सहजबोध आज भी सत्ता
के प्रतिपक्ष से परिभाषित होता है । यही कारण है कि सत्ता द्वारा तमाम कोशिशों के बावजूद
कुछ पदलोभी चाटुकारों को छोड़कर हिंदी के किसी महत्वपूर्ण साहित्यकार ने दलबदल के इस
मौसम में भी इसकी जरूरत नहीं समझी ।