Wednesday, June 17, 2026

नया मजदूर वर्ग

 

             

                         

बहुत पहले कार्ल मार्क्स ने पूंजीवाद के बारे में लिखा कि लगातार क्रांतिकारी बदलाव किये बिना उसका जिंदा रहना असम्भव है । इस बदलाव की जरूरत उसे बाजार में अन्य पूंजीपतियों के साथ की गलाकाटू होड़ के कारण पड़ती है । इसके अतिरिक्त मुनाफ़े में कमी की भरपाई के लिए भी उसे मजबूरन लगातार बदलाव लाना पड़ता है । हम सबके सामने पूंजीवाद में सबसे बड़ा बदलाव नवउदारवाद के नाम से आया । पश्चिमी देशों में इसका आगाज़ 1970 दशक से हो चुका था । हमारे खित्ते में इसकी धमक सोवियत संघ के बिखराव के साथ नब्बे के दशक में सुनायी पड़ी । यह बदलाव पूंजीवाद के मूल स्वभाव में नहीं आया था । नाम से यह भी भ्रम नहीं होना चाहिए कि पूंजीवाद अधिक उदार हो गया । उसका मूल स्वभाव श्रमिक के श्रम का शोषण करना और उससे मुनाफ़ा कमाना है । इस बुनियादी मकसद को हासिल करने के तरीके उसने हमेशा बदले हैं । इस भ्रम की गुंजाइश इसलिए भी बनी कि नये समय में इसे मानवीय चेहरे वाला पूंजीवाद कहा गया । इस दौर में आये बदलाव के अनेक आयाम हैं । उस समय के वातावरण को याद करें तो बाजार को सभी समस्याओं के एकमात्र समाधान के रूप में पेश किया जा रहा था । सरकार की ओर से सभी संसाधनों के निजीकरण को गुणवत्ता हेतु आवश्यक प्रतियोगिता की कुंजी बताया जा रहा था । अगर याद करें तो शिक्षा मंत्रलाय को नया नाम देकर उसे मानव संसाधन मंत्रालय कर दिया गया था । नाम की वापसी तो हो गयी लेकिन मकसद वही बना हुआ है । तभी आर्थिक नीतियों को राजनीति से परे बताने की वकालत की गयी । अब इस बीमारी का प्रसार इस कदर हुआ है कि राजनीति ही राजनीति से परे होकर बाजार के सामने एकदम नतमस्तक हो गयी है । इन पहलुओं में से हम इस लेख में केवल श्रमिक समुदाय की संरचना में आये बदलावों पर ध्यान केंद्रित करेंगे ।

सोवियत संघ की मौजूदगी ने पूंजीवाद पर श्रमिक समुदाय का पक्षधर रुख अपनाये रखने का दबाव बनाया था । उसके बिखराव के साथ यह दबाव समाप्त हो गया । पूंजीवाद की बुनियादी विशेषता श्रमिक का अबाध शोषण है । इस शोषण में मजदूरी का स्तर नीचे बनाये रखना आवश्यक होता है । इसमें बेरोजगारों की फौज से मदद मिलती है । कामगारों के बीच होड़ से पूंजीपति को पगार कम रखने का तर्क मिलता है । पूंजी के मुनाफ़े के लिए आबादी के एक हिस्से की बेरोजगारी जरूरी होती है । इससे रोजगारशुदा मजदूरों को डराकर उनकी पगार काबू में रखने में मदद मिलती है । सबको रोजगार की गारंटी होने से मजदूरों को पगार बढ़ाने की सौदेबाजी करने में सुविधा होती है । शीतयुद्ध के दौर में मजदूरों को एक हद तक यह सुविधा हासिल थी । सोवियत संघ की समाप्ति के साथ पूंजीवाद ने रोजगार के क्षेत्र में अस्थायित्व को अपने लिए भारी सुविधा बना लिया है । सरकारी उद्यमों के सहायक क्षेत्रों से शुरू होकर यह अस्थायित्व अब सेना तक में चार साल के लिए नियुक्त अग्निवीर के रूप में पहुंच गया है । हालिया युद्धों के सिलसिले में जो खबरें आयीं उनसे अनुमान होता है कि सेना के मामले में भारत की तरह रूस और अमेरिका में भी ठेकेदारी प्रथा चल रही है । ऐसा करने से अपने देश के नागरिकों की मृत्यु से उपजे विक्षोभ से शासक बच जाते हैं और स्थायी सैनिकों जैसी देनदारी भी नहीं निभानी होती ।

बड़े संगठित उद्योग की जगह ढेर सारी छोटी छोटी सहायक इकाइयों ने लेनी शुरू कर दी । इन इकाइयों में काम करने वाले श्रमिकों के रोजगार की कोई गारंटी नहीं होती थी । वेतन भी वे मनमाना देती थीं । हमारी आंख के सामने उद्यमों की संपत्ति की सुरक्षा के काम का निजीकरण शुरू हुआ और इस क्षेत्र में ठेके पर चौकीदार रखे जाने शुरू हुए । पहले जहां इस काम के लिए उद्यम को जवाबदेह कर्मचारी होते थे उनकी जगह नियुक्त इन नये किस्म के चौकीदारों के काम के घंटे बारह होने लगे । तमाम उद्यमों में इस तरह के ढेर सारे नियमित कामों को टुकड़े टुकड़े ठेके पर बाहर से कराये जाने की प्रथा चल पड़ी । धीरे धीरे यह काम अध्यापन में भी शुरू हुआ और नियमित नियुक्ति की जगह ठेके पर पाठ्यक्रम का अध्यापन सामान्य हो चला । इस तरह काम के आठ घंटों के लड़कर हासिल अधिकार के सरेआम उल्लंघन को सामान्य चीज बनाया गया । हाल में लाये गये श्रम कोड को पहले से ही व्यवहार में लागू किया जाना इस तरह शुरू हो चुका था । अब उसको औपचारिक स्वरूप दिया जा रहा है । उस समय आर्थिक विकास के लिए बाजार को एकमात्र नियामक मानने की वकालत की जा रही थी और वेतन आदि के कानूनों को इसमें बेवजह का दखल कहा जाने लगा था । नये श्रमिक को इसी नये असुरक्षित माहौल में नौकरी करनी पड़ रही है । अब तो श्रम निरीक्षकों को भी गैर जरूरी बताया जा रहा है । जिन उद्यमों की जांच वे कर सकते हैं उनके श्रमिकों की संख्या लगातार बढ़ायी जाती है ताकि ढेर सारे उद्यमों को उससे बाहर रखा जा सके । सरकार का काम पूंजी निवेश हेतु सहूलियत पैदा करना रह गया है । कार्यस्थल तो छोड़िए बाहर भी चिकित्सा और शिक्षा जैसी सुविधा से सरकार अपने हाथ खींच रही है । पहली बार बेशर्मी के साथ सरकार के मुखिया भी धनकुबेरों के चाकर नजर आ रहे हैं । यह समय हमारे देश में कामगार के लिए सबसे कठिन है ।  

पूंजी और उसके उत्पादकों के भीतर के इस बदलाव पर रूसी विद्वान बोरिस कागरलित्सकी ने सदी के मोड़ पर ही लिखा । उनका कहना था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्थापित वैश्विक संस्थाओं की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय बाजार को नियंत्रित करने की थी लेकिन नवउदारवाद ने इन्हें विनियमितीकरण के हथियार में बदल दिया है अब तो ये संस्थाएं अपना एजेन्डा खुद तय करती हैं तथा उसे जनता और सरकारों पर थोप देती हैं सार्वजनिक योजना निर्माण के काम का निजीकरण हो गया है ये संस्थान इस तरह काम करते हैं जैसे समूची दुनिया पर इनका कब्जा हो इनके विशेषज्ञ तय करते हैं कि रूस के कोयला उद्योग का क्या किया जाए, कोरिया में कंपनियों को कैसे संगठित करें या मेक्सिको की वित्तव्यवस्था कैसे दुरुस्त होगी समस्या जितनी विकट होगी उतना ही आसान और आदिम उसका समाधान प्रस्तुत किया जाएगा ये संस्थाएं अफ़्रीका से लेकर रूस तक प्रत्येक समस्या के हल का एक ही नुस्खा सुझाती हैं अपनी ही विचारधारा का शिकार ये संथाएं अपनी विराट नौकरशाहाना मशीन से संचालित होती हैं मुक्त बाजार के नाम पर समूची दुनिया में अभूतपूर्व केंद्रीकरण थोप दिया गया है पश्चिमी देशों की सरकारें भी इस समानांतर प्राधिकार से परेशान हैं। यह पूरा ढांचा मूल रूप से अलोकतांत्रिक है पुराने जमाने की निरंकुश बादशाहतों की तरह वैश्विक प्रशासन का यह नया निजाम भी शासितों की सहमति पर आधारित नहीं है इसीलिए साधारण जनता को लाभ पहुंचाने का आधुनिक सरकारों का काम करना इनके स्वभाव में नहीं है

उन्होंने यह भी देखा कि संपदा और संसाधनों का अभूतपूर्व संकेंद्रण हो गया है अतीत के किसी भी तानाशाह के हाथों में उतनी नहीं रही होगी जितनी ताकत इस समय अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निदेशक या माइक्रोसाफ़्ट जैसी किसी बड़ी कंपनी के मालिक के हाथ में आ गयी है इस अति-केंद्रित व्यवस्था के कारण ढेर सारी समस्याएं भी पैदा हो रही हैं यह नहीं कि नवउदारवादी पूंजीवाद अधिकांश मानवता को दरिद्रता में धकेले हुए है या परिधि पर स्थित देशों में बर्बरता का बोलबाला है ऐसे नैतिक सवालों से गंभीर लोग परेशान नहीं होते संकट यह है कि इस व्यवस्था में गलतियों के नुकसान बहुत अधिक हैं असल में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास इतने ज्यादा संसाधन हैं कि अपने गलत साबित हो चुके फैसलों के नतीजों के नुकसानदेह अंजाम देखते हुए भी उसके नियंता उन्हीं गलत नीतियों को लम्बे समय तक जारी रख सकते हैं

इसके साथ ही तकनीक संबंधी नयेपन के असरात का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि वैश्वीकरण के साथ ही सूचना युग का भी प्रसार हुआ था सभी बीमारियों के लिए अचूक नुस्खे के रूप में तकनीकी बदलाव पर जोर दिया गया इस बदलाव ने व्यवस्था के अंतर्विरोधों को और मजबूत बना दिया बहुत सारे विद्वान इस नयी स्थिति को विकेंद्रित उत्पादन के साथ नियंत्रण का केंद्रीकरण कह रहे हैं तकनीक आधारित संजाल बन तो रहे हैं लेकिन प्रभुतासंपन्न संरचनाएं और स्वार्थ इनका इस्तेमाल अपने मकसद के लिए करना चाहते हैं इससे नये तरह के अंतर्विरोध पैदा हो रहे हैं संजाल के लिए ऊंच-नीच की व्यवस्था का समाप्त होना जरूरी नहीं होता, उसके लिए दूसरे तरह के पदानुक्रम की जरूरत होती है और इससे नये स्वार्थों का जन्म होता है संजाल की मौजूदगी पर बहुत अधिक जोर देनेवाले लोगों का कहना है कि इस समय पूंजीपति मानव रूप में तो नजर आते  हैं लेकिन समकालीन पूंजीवाद का कोई ठोस चेहरा नहीं है । वित्त प्रवाह इलेक्ट्रानिक संजालों के जरिए हो रहा है । लेखक को चेहराविहीन इस पूंजीवादी संजाल का वर्णन बहुत कुछ नौकरशाही के वर्णन जैसा महसूस हो रहा है । उनका कहना है कि आज की दुनिया में कोई लोग तो हैं जो फैसले करते हैं और ये फैसले खास हितों तथा विचारों से साफ साफ प्रभावित दिखायी पड़ते हैं । कुछ ऐसी वास्तविक संस्थाएं और संरचनाएं तो हैं ही जहां ये हित सुदृढ़ होते हैं और तब फैसले लिये जाते हैं ।

उनका यह भी मानना है कि तकनीकी क्रांति ने पुरानी समाजार्थिक व्यवस्था को नष्ट नहीं किया है । पुरानी समाजार्थिक व्यवस्था के ऊपर से नए समाजार्थिक ढांचों को थोप दिया गया है । किसानों के लोप की तमाम अटकलों के बावजूद किसान मौजूद हैं । जनसंख्या विस्फोट के साथ उनकी तादाद भी बढ़ रही है । वर्ग के बतौर औद्योगिक मजदूरों के भी लुप्त होने की बात थी लेकिन वैश्विक स्तर पर कुल मिलाकर उनकी संख्या में इजाफा हो रहा है । गैरजरूरी लोग हाशियों पर तमाम आदिम और अकुशल कामों के सहारे जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे हैं । करोड़ो की संख्या में ये लोग कंप्यूटर और कारखानों की दुनिया से पूरी तरह असंबद्ध माहौल में रह रहे हैं और अब अपनी पुरानी दुनिया में लौटने के काबिल नहीं रह गए हैं । ये अनौपचारिक कामगारों की फौज के सदस्य हैं और इनका श्रम लगभग मुफ़्त है । तमाम मोटर चालित वाहन सड़क पर से रिक्शे को बेदखल नहीं कर सके हैं । कंप्यूटर की दुनियावाले लोगों को लगता है कि थोड़े ही समय में तकनीक सभी सामाजिक समस्याओं को समाप्त कर देगी । संसदों में बैठे हुए और सभाओं में भाषण देनेवाले वामपंथी नेतागण इन दोनों किस्म के लोगों से दूर हो गए हैं । आम नेतागण इस दुनिया को उसी तरह देख और समझ नहीं पाते जिस तरह पहले शहरी लोग बर्बर आबादी को देख समझ नहीं पाते थे ।

नये हालात से सावधान करते हुए वे कहते हैं कि तकनीकी क्रांति के वर्तमान दौर की खूबी यह है कि विकास की गति में त्वरण आ गया है । मनुष्यों को कंप्यूटरों की तरह लगातार नवीकृत होना पड़ रहा है । लेकिन इसका प्रभाव बहुत कम लोगों तक सीमित है । इसमें प्रसार के मुकाबले उठान अधिक है । तकनीक के विकास की रफ़्तार से प्रभावित होकर दावा किया जा रहा है कि थोड़े ही दिनों बाद जन्नत जैसी जिंदगी सबको मिल जाएगी । असल में किसी भी नई तकनीक के आरम्भिक दिनों में उसके विकास की रफ़्तार तेज होती है । बाद में उस रफ़्तार को बरकरार रखने में मुश्किल पेश आती है । समाज पर थोपी गई बदलाव की रफ़्तार से उसे थकान होने लगती है । विकास सहायता नहीं प्रतीत होता बल्कि आक्रामक दबाव महसूस होने लगता है । लगातार कुछ तोड़फोड़ चलते रहने का नयापन सुखद ही नहीं होता । इतनी तेज रफ़्तार के कारण भारी बेरोजगारी फैल रही है । सफलता, गतिशीलता और क्षमता केवल ऊंचे तबके के लोगों को सुलभ रह गए हैं । ये तबके निचले तबकों के बारे में आपराधिक रूप से उदासीन हैं लेकिन यह रुख आत्मघाती है क्योंकि आधार की चौड़ाई के बिना ऊंचाई को बनाए रखना असम्भव है । राजनीतिक क्रांति की तरह ही तकनीकी क्रांति को भी सांस लेने के लिए रुकना पड़ता है । सरपट दौड़ते हुए आसमान की ओर निगाह लगाए रखने में खतरा है ।    

इस नये समय की जरूरत को सूत्रबद्ध करते हुए उनका मत है कि तकनीक, संसाधन, संपत्ति और ज्ञान- सब कुछ का पुनर्वितरण आवश्यक है । विकास में प्रसार और व्याप्ति लानी होगी । कुशल कामगारों की फौज तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर शिक्षकों की जरूरत है । साठ के दशक मे शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का सबसे बेहतर साधन था । राजनीति की वरीयता सूची में अर्थतंत्र के ऊपर शिक्षा को होना चाहिए । शिक्षा में निवेश के लिए संपदा के भारी पुनर्वितरण की जरूरत पड़ेगी ।

मजदूर वर्ग के मामले में सबसे बड़ा बदलाव उत्पादक उद्यमों को दक्षिणी गोलार्ध के देशों में भेजना था । इसने पश्चिमी देशों में मजदूरों की तादाद कम कर दी । संख्या में कमी का असर उनकी ताकत में प्रतिबिम्बित हुआ । उस समय मजदूर आंदोलनों को कुचलने के कारण इंग्लैंड में मार्गरेट थैचर और अमेरिका में रोनाल्ड रीगन को पूंजीवाद की नयी आक्रामकता का प्रतिनिधि माना जाने लगा । इन दोनों को नवउदारवाद की सैद्धांतिकी का प्रणेता यूं ही नहीं माना जाता । यही समय था जब मजदूर आंदोलनों को बदनाम करने का भी अभियान शुरू हुआ । हमारे देश में अदालतों ने आम हड़तालों को आर्थिक प्रगति में बाधा की तरह पेश करना शुरू किया । एकाध मामलों में तो तोड़फोड़ में सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए हड़ताल के आयोजकों पर जुर्माना भी लगाया गया । सूचना और संचार क्रांति ने भी अर्थतंत्र को प्रभावित किया और उसमें सेवा क्षेत्र का योगदान बढ़ने की खबरें गम्भीर विश्लेषण में जगह पाने लगीं ।

श्रम में निचले स्तर के कम मजदूरी वाले क्षेत्रों में आये बदलाव की चर्चा हम बाद में करेंगे लेकिन यह छूत उन नौकरियों को भी लगी जिनमें उच्च स्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है । संचार क्रांति के साथ वैश्वीकरण ने उपभोक्ताओं की शिकायत सुनना किसी अन्य देश में भी सम्भव बना दिया । इसके लिए शुद्ध अमेरिकी उच्चारण वाली अंग्रेजी की नकल के अतिरिक्त अन्य यूरोपीय भाषाओं की कामचलाऊ जानकारी वाले युवा रातों को जागकर गोरों की गाली सुना करते थे । न केवल इतना बल्कि फोन पर वे अपना असली नाम तक बदल लेते थे ताकि उपभोक्ता उन्हें अमेरिकी ही समझें । कंप्यूटर की सुविधा से संपन्न चमकीले आधुनिक कार्यालयों में काम करने वाले युवकों के लिए काम के घंटों का कोई मतलब नहीं रह गया था ।

इस क्षेत्र के कामगारों के बारे में 2014 में मंथली रिव्यू प्रेस से उर्सुला हुव्स की किताबलेबर इन द ग्लोबल डिजिटल इकोनामी: द साइबेरिएट कम्स आफ़ एजका प्रकाशन हुआ । किताब विश्व अर्थतंत्र के सबसे हालिया रूप का विश्लेषण करती है और उसे भी पूंजीवाद का ही एक नया रूप मानकर उसके उत्पादकों को सर्वहारा मानते हुए उनके शोषण को उजागर करती है । किताब में ज्ञान आधारित अर्थतंत्र के कामगारों के बारे में 2006 से 2013 के बीच लिखे लेख संकलित हैं । यह समय पूंजीवाद के इतिहास और श्रम संगठन के लिहाज से उथल पुथल भरा समय था । इससे पहले भी एक किताब उन्होंने लिखी थी जिसमें उनकी मान्यता थी कि पूंजीवाद नए माल पैदा करके संकटों से पार पा जाता रहा है । जैसे ही इसका विस्तार ऐसे विंदु पर पहुंचता है जहां लगता है कि इसके लिए बाजार और मुनाफ़े की संभावना समाप्त होती महसूस होती है वहीं वह जीवन के नए क्षेत्रों को अपनी जद में ले आता है, नई वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के नए रूपों को जन्म देता है और फिर उनके लिए बाजार का सृजन करता है । इस तरह के किसी भी दौर में नई तकनीक का व्यापक प्रसार होता है । उदाहरण के लिए बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में बिजली के प्रसार के साथ घरेलू श्रम (वैक्यूम क्लीनर, वाशिंग मशीन या फ़्रिज) या लोकप्रिय मनोरंजन (रेडियो, सिनेमा या ग्रामोफोन) पर आधारित नई वस्तुओं की बाढ़ आयी थी । इस प्रक्रिया में उत्पादन और उपभोग के नये रूपों का भी जन्म हुआ था । अधिकाधिक मजदूर अपने रोजमर्रा के जीवन में इन वस्तुओं पर निर्भर होते गये थे । उन्हें इतनी आमदनी की जरूरत पड़ी जिससे इन वस्तुओं को खरीदा जा सके और उनके जीवन पर पूंजीवाद की पकड़ भी इसी के मुताबिक बढ़ी । सबको अपने जीवन में इन्हें अपनाना ही पड़ा । इनके नयेपन में इनका आकर्षण था । बिक्री में इजाफ़े के साथ इनकी कीमत कम होती गयी । समय और श्रम की बचत तथा सुविधा का तत्व भी जुड़ गया । इसके अतिरिक्त इनकी मौजूदगी से व्यक्ति की हैसियत में भी बढ़ोत्तरी होती थी ।

इंटरनेट आधारित तकनीक के आगमन और प्रसार के साथ श्रम के नये रूप और क्षेत्र पैदा हो रहे हैं । जो क्षेत्र पारम्परिक तौर पर औपचारिक श्रम की दुनिया से बाहर माने जाते थे उनको भी बाजार के भीतर खींच लाया गया है । 2020 में पालग्रेव मैकमिलन से सिडोनी नाउलिन और एनी जौर्डेन के संपादन में ‘द सोशल मीनिंग आफ़ एक्स्ट्रा मनी: कैपिटलिज्म ऐंड द कमोडिफ़िकेशन आफ़ डोमेस्टिक ऐंड लेबर ऐक्टिविटीज’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों ने कुछेक ऐसी कहानियों से किताब की शुरुआत की है जिनमें इंटरनेट के सहारे तरह तरह के नये नये रोजगार करने वालों का विवरण है । इन कहानियों में संगीत, सिले कपड़े, भोजन, घरेलू उपज से लेकर अश्लील सामग्री तक का निर्माण और बिक्री का रोजगार घर से ही किया जाता है । कह सकते हैं कि जिन गतिविधियों को पहले मनोरंजनपरक माना जाता था उनसे उत्पादित वस्तुओं का व्यापार नयी परिघटना है । इसका मतलब कि जिसे खाली समय कहा जाता था उसका भी आर्थिक इस्तेमाल होने लगा है ।               

रोजगार के अस्थायीकरण की इस मुहिम का सबसे बड़ा नमूना सेवा क्षेत्र के नये तरह के रोजगार हैं । इनकी शुरुआत यातायात की सुविधा में हुई जब यात्री और चालक को आपस में जोड़ने वाली सेवाओं का आगमन हुआ । अब चार पहिया वाहनों से आगे बढ़कर दो पहिया वाहनों के मामले में भी अब ऐसा हो रहा है । इस काम में तमाम युवा शामिल हो रहे हैं । शिक्षा की चाहत बढ़ने के साथ ही उसकी कीमत भी बढ़ गयी । जीवन निर्वाह के खर्च में बढ़ोत्तरी और बेरोजगारी ने मिलकर ऐसे विद्यार्थियों की फौज को जन्म दिया है जो ग्राहकों तक उनकी जरूरत के सामान पहुंचाकर कुछ धन कमा रहे हैं । इस क्षेत्र में आरम्भिक हिचक के बाद युवतियों का भी तेजी से आगमन हुआ है । इनके साथ असुविधा और भेदभाव अकल्पनीय हैं । अर्थतंत्र का यह समूचा क्षेत्र पूरी तरह अनौपचारिक है और कोई नियम कानून इनकी परवाह नहीं करता । तैयार भोजन को उपभोक्ता के पास गरम ले जाने की होड़ में ये मजदूर अक्सर दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं । सामान पहुंचाने की जल्दी ने इनके समूचे पेशे को खतरनाक बना दिया है । बहुमंजिला ऊंची इमारतों में इन्हें लिफ़्ट के इस्तेमाल से रोका जाता है । इस प्रतिबंध के नतीजे में इन्हें पीठ पर भारी बस्ता लेकर पैदल सीढ़ी चढ़कर आना जाना होता है । इसके अतिरिक्त उपभोक्ता के सशक्तीकरण के नाम पर उसकी संतुष्टि पर इनकी पगार निर्भर होती है । अब यह संस्कृति बैंक जैसे संगठित सेवा क्षेत्र में भी प्रवेश कर चुकी है । शिक्षा के मामले में भी विद्यार्थियों से उनकी संतुष्टि की रिपोर्ट लेने का चलन पैदा हुआ है । घरेलू सहायकों की दुनिया में भी इस प्रवृत्ति का आगमन हुआ है । पहले भी इन क्षेत्रों के श्रमिकों की कोई सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था नहीं थी । अब तो उनकी उम्र हो जाने के बाद उनकी फ़िक्र करने वाला कोई नहीं रह गया है । एक जमाने में जो कुछ भारतीय लोगों के साथ अमेरिकी उपभोक्ता करते थे वही व्यवहार इस समय शहरी मध्य वर्ग इन श्रमिकों के साथ करता है । श्रम के इस नये बाजार के समाजशास्त्र का अध्ययन अभी ठीक से नहीं हुआ है अन्यथा इसके भीतर से पैदा और मजबूत हो रही जातिगत भेदभाव की नयी व्यवस्था का पता लगता । जिस तरह नगर पालिकाओं और रेलवे ने सफाई कर्मचारियों के मामले में देश की जाति व्यवस्था का अनुपालन किया उसी तरह इन पेशों में शामिल लोगों की जाति संरचना का अध्ययन होने से अस्थायीकरण के समाजशास्त्र का उद्घाटन होता और कुछ मजेदार निष्कर्ष सामने आते ।             

इन बदलावों के साथ ही देशों के आंतरिक और बाहर प्रवास की नयी गतिकी का जन्म हुआ है । देश के भीतर क्षेत्रीय विषमता का नया भूगोल पैदा हुआ है तो अंतर्राष्ट्रीय प्रवास की प्रवृत्ति में साम्राज्यवाद का पुनरुत्थान देखा जा सकता है । इन दोनों ही क्षेत्रों में प्रवास के लैंगिक पहलू की गहन छानबीन की जानी चाहिए । हरियाणा के मामले में असंतुलित लिंगानुपात की वजह से विवाह हेतु आदिवासी क्षेत्रों से स्त्रियों की आमद के सुव्यवस्थित तंत्र का खुलासा हुआ था । हिंदी कथाकार अल्पना मिश्र ने इस परिघटना पर केंद्रित ‘अस्थि फूल’ उपन्यास भी लिखा था । प्रवास की इस नयी लहर ने विभिन्न क्षेत्रों के बीच नये तनावों को जन्म दिया है । इस तनाव ने राजनीति को भी नया रूप प्रदान करना शुरू किया है । इससे दक्षिण और उत्तर तथा विभिन्न प्रांतों के बीच नये टकराव पैदा हो रहे हैं । इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय प्रवास ने लैंगिक के साथ ही नस्ली पहलू को उजागर किया है । पश्चिमी देशों में जीवन चलाने के लिए अधिक आय के कारण पति के साथ ही पत्नी को भी नौकरी पर मजबूरन जाना पड़ता है । ऐसे में बुजुर्गों और बच्चों की देखरेख काफी गम्भीर समस्या के रूप में सामने आयी है । इस काम के लिए दक्षिण और पूर्वी एशिया के देशों से स्त्रियों की आपूर्ति बड़े पैमाने पर की जाती है ।

नगरीकरण आज की दुनिया की हकीकत है । उद्योगीकरण के साथ विशाल नगरों का जन्म हुआ था । दुनिया का कोई भी शहर बड़े पैमाने पर अदृश्य शारीरिक श्रम करने वालों के बिना नहीं चल सकता । इनके लिए वर्क फ़्राम होम की सुविधा हो ही नहीं सकती । इसी कारण हालिया कोरोना महामारी के दौरान मरने वालों में सबसे बड़ी संख्या इन्हीं श्रमिकों की थी । दक्षिणी गोलार्ध के देशों की बहुतेरी समस्याओं के चलते ये श्रमिक पश्चिमी देशों में जाते हैं । उनके साथ इन देशों में नस्लभेदी व्यवहार होता है । आबादी के इस विस्थापन ने पश्चिमी देशों में विदेशियों के प्रति नफ़रत की लहर पैदा की है । उन देशों में फ़ासीवादी राजनीति के उभार के पीछे इस नफ़रती माहौल का भी योगदान रहता है ।           

बदले समय के मजदूर आंदोलन का जिक्र करते हुए 2021 में प्लूटो प्रेस से ट्रेवर न्वाने की किताब ‘अमाकोमिटी: ग्रासरूट्स डेमोक्रेसी इन साउथ अफ़्रीकन शैक सेटलमेंट्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि वर्तमान पूंजीवाद में भी मजदूरों के आंदोलन कायम हैं । बीसवीं सदी की उनकी जुझारू प्रेरणा आज भी विश्वव्यापी मजदूर संघर्षों को परिभाषित करते हैं । पूंजीवाद के दुराचरण को उजागर करने, वेतन के मानक स्थापित करने, काम के हालात में सुधार तथा मालिकों और सरकार के साथ मोलतोल में मजदूरों के राजनीतिक और आर्थिक हितों का प्रतिनिधित्व सौ साल से मजदूर यूनियनें कर रही हैं । 1970 दशक के बाद से संगठित मजदूर वर्ग का आकार और वैश्विक ताकत घटी है तथा पूंजी का प्रभाव नाटकीय रूप से बढ़ा है । नवउदारवाद, वित्तीकरण और लोभी साम्राज्यवाद की वापसी के समक्ष मौजूदा यूनियनें टूट फूट और उथल पुथल का शिकार हैं । नयी और आधुनिक यूनियनें खुद को हालात के मुताबिक ढाल रही हैं और वर्ग सचेत मजदूरों के जुझारू आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं । वे उनके लिए एकजुटता बढ़ाने की भी कोशिश में लगी हैं । एक ओर संगठित मजदूर की ताकत तो कम हो रही है लेकिन उसके साथ ही दक्षिणी गोलार्ध में मजदूर वर्ग का जुझारूपन और प्रतिरोध बढ़ रहा है ।  

हाल के दिनों में ये आंदोलन पारम्परिक ट्रेड यूनियनों की सीमा के बाहर से पैदा हुए । असल में समूची दुनिया की तरह हमारे देश में भी ट्रेड यूनियन आंदोलन संगठित उद्योग जगत के श्रमिकों के साथ जुड़ा रहा है । बहुत कुछ इसी वजह से यह नया श्रमिक समूह उसकी नजर से बाहर रहता है । ऐसे में उसकी समस्याओं के हल का कोई औपचारिक रास्ता नहीं बनता । ऐसे में ये आंदोलन आकस्मिक विस्फोट की तरह उभर आते हैं । दुर्भाग्य से बौद्धिक समूह के मध्यवर्गीय आग्रहों के चलते ये श्रमिक सार्वजनिक विमर्श से बाहर रहते हैं । इसलिए इनको बदनाम और दंडित करना सरकार और प्रशासन के लिए आसान हो जाता है । इसके बावजूद इनके भीतर खुद ही संगठित होने की शुरुआत हुई है । उनके सामने अतीत का कोई उदाहरण नहीं है इसलिए उन्हें अपनी रक्षा और अधिकार की लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है । इनकी अरक्षित जीवन स्थिति ने इन्हें बेहद जुझारू बना दिया है ।