Friday, June 26, 2026

गुलामी और पूंजीवाद

 

2025 में यूनिवर्सिटी आफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस से डेविड मैकनेली की किताब ‘स्लेवरी ऐंड कैपिटलिज्म: ए न्यू मार्क्सिस्ट हिस्ट्री’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक जो भी गुलामी के बारे में लिखता है वह आजादी के बारे में लिखता है । गुलामी के विरोध में सच्ची आजादी का हम इंतजार कर रहे हैं । इसलिए अचरज नहीं कि गुलाम लोगों ने सबसे पहले आजादी को सामाजिक मूल्य के बतौर पहचाना था । उदारवाद ने इसे स्वायत्त मनुष्य का अंतर्निहित गुण माना था । गुलामों की परिभाषा के अनुसार उत्पीड़ितों के लक्ष्य के रूप में आजादी का जन्म ऐतिहासिक प्रक्रिया में होता है । सही बात है कि दमितों की मुक्तिकारी परियोजना का अक्सर दमन ही हुआ है ।  इसके बावजूद आजादी का सपना गुप्त रूप से आशा के रूप में शक्ल बदलकर जिंदा रहता है । इस आकांक्षा के बने रहने का कारण है कि आखिरकार मनुष्य का वस्तूकरण आंशिक ही हो सकता है । इस किताब में अटलांटिक की दुनिया का अध्ययन किया गया है और वहां गुलाम मनुष्य को संपत्ति के रूप में देखा जाता था लेकिन इस मान्यता को हमेशा धक्का लगता रहता था । कानून, किताब, रस्म और व्यवहार में कोड़े, जंजीर, जेल और निगरानी के जरिए गुलामी के सिद्धांत को लागू करने की हरचंद कोशिश ही इसकी मुश्किलों का बयान करने के लिए काफी है । गुलामी संबंधी दस्तावेजों में हर कहीं उसे तोड़ने की कोशिशों के सबूत मिल जाते हैं । औजार तोड़ देना, खाना चुरा लेना, काम में सुस्ती, नाता जोड़ना, जंगल में भाग जाना, पढ़ने का प्रयास, हुक्म न मानना और ध्रुवतारे के सहारे उत्तर दिशा जाने की कोशिश आम घटना बन गये । इन सभी तरीकों से गुलामों ने सामाजिक मौत के विरुद्ध जीवन के गीत गाये । इन कोशिशों के अमिट निशान उत्पीड़ितों के अभिलेखागार में मौजूद हैं । ध्यान से सुनिए तो अब भी उनके बीच आजादी की खुसफुस सुनाई देगी ।

किताब में आजादी की इसी चाहत को सत्य का पैमाना माना गया है । वैसे भी आलोचना सिद्धांत की बुनियाद मानव मुक्ति में उसकी रुचि है । आजादी का प्रत्येक विरोध मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य के साथ धोखा है । इसका अर्थ यह है कि सत्य के साथ होना पक्षपात है । आत्मनिर्णय की सामुदायिक ताकतों द्वारा व्यवहार में सक्षम जीवन की तलाश करना उत्पीड़न और गुलामी की प्रत्येक परिस्थिति का विरोध है । मैल्कम X ने कहा था कि सत्य उत्पीड़क के विरुद्ध उत्पीड़ितों के पक्ष में खड़ा होना है । ऐसी प्रतिबद्धता की घोषणा फिलहाल चलन से बाहर कर दी गयी है । आजकल तो तमाम विद्वान यही साबित करने में लगे रहते हैं कि गुलामों में कभी आजादी की चाहत ही नहीं रही । कहा तो यह भी जा रहा है कि मुक्ति के मुकाबले गुलामों के लिए जिंदा रहना अधिक जरूरी था । इन विद्वानों का कहना है कि मुक्ति तो पश्चिम की अमूर्त धारणा है । इसके मुकाबले उनके लिए गुलामी का दैनिक यथार्थ ज्यादा बड़ी कठिनाई थी । इस तरह के सोच की परम्परा बहुत पुरानी है । बहुत पहले यूजीन जेनोवीज ने कहा था कि बंधक लोगों ने हालात को मंजूर कर लिया था । गुलामी से आजाद जीवन के मुकाबले समर्पण उन्हें अधिक लाभकर नजर आया था । उनके अनुसार गुलामी में ही किसी तरह बचे रहने का तरीका निकालना गुलामों की सबसे बड़ी चिंता थी । यह भी कहा जा रहा है कि मूल्य के स्तर पर मुक्ति के मुकाबले पारिवारिक जीवन को गुलामों ने वरीयता दी ।

इस सोच के पीछे व्यक्तिवाद की खास तरह की धारणा काम करती है । इस धारणा के मुताबिक कोई भी व्यक्ति अपनी सक्रियता के लिए तभी अबाध स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है जब वह स्वामी हो । इसके तहत संपत्ति का स्वामित्व ही अधिकार और आत्मवत्ता के स्वामित्व का स्रोत माना जाता है । यह धारणा अनुचित है और निम्न वर्गों के वर्तमान उभार के समय संदिग्ध भी है । इस समय अश्वेत, पारलिंगी, फिलिस्तीनी या मजदूर वर्ग दुनिया को बदलने की दावेदारी जता रहे हैं । निम्न वर्गों की यह सक्रियता सत्ता की संरचनाओं द्वारा की जा रही हिंसा और सामाजिक टकराव के बीच जारी है । हिंसा के इस वातावरण ने उन्हें पचाने में सफलता नहीं पायी है । नीचे से इतिहास लेखन की धारा संग्रहालयों से इसी प्रतिरोधी सक्रियता के निशान खोज लाती है । इन निशानों के सहारे निम्न वर्गों द्वारा खुद को बनाने की प्रक्रिया खुलती जाती है । यह निर्माण प्रतिरोधी व्यवहार से साकार होता है लेकिन दमन और उत्पीड़न से बचा रहता है । इस तरह दमन के भीतर से निम्न वर्गों की सक्रियता का जन्म होता है ।

जो लोग गुलामों मे समर्पण को ही एकमात्र सत्य समझते हैं उन इतिहासकारों के मुकाबले गुलामों के मालिक उनकी सक्रियता को अधिक अच्छी तरह समझते थे । गुलामी की व्यवस्था में गुलाम की अनिच्छित मेहनत तो मालिक की संपत्ति होती थी लेकिन उनकी नैतिक दुनिया पर मालिक का कोई नियंत्रण नहीं होता था । गुलामों के आवागमन पर रोक, पलायित और विद्रोही गुलामों को दंड की घटनाओं से इसी बात की पुष्टि होती है । गुलामी के बुनियादी अंतर्विरोध को व्यक्त करते हुए सिडनी मिंज़ ने कहा कि इसमें मनुष्यों के खास समूह के साथ मानवेतर प्राणियों की तरह बरताव करना पड़ता है । गुलाम लेकिन होते मनुष्य ही हैं और इस बात को गुलामों के मालिक भी जानते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि मनुष्यो में मशीनों के विपरीत स्वतंत्र इच्छा होती है । इसका अर्थ कि उनमें आजादी की चाहत मनुष्य होने के नाते होती ही है । जो उत्पीड़ित हैं उनको अपनी चाहत की पूर्ति के लिए संघर्ष करना होता है । इस समूची प्रक्रिया को हम अपने देश की जाति व्यवस्था के प्रसंग में अच्छी तरह समझ सकते हैं ।  

हेगेल की सोच में बाकी जो भी समस्या हो लेकिन उन्होंने जब मालिक और गुलाम के बीच द्वंद्वात्मक रिश्ते की बात की थी तो उसके पीछे उनकी यही मान्यता थी । गुलाम की स्वतंत्र सक्रियता उसका निहित गुण नहीं होती । इसे इतिहास के क्रम में दूसरों के साथ व्यवहारिक संघर्ष  से अर्जित करना होता है । अपनी दावेदारी के अवसर पर गुलाम व्यक्ति मालिक के भय पर काबू पा लेता है । हेगेल लिखते हैं कि स्थापित व्यवस्था के नकार में खड़ा होकर वह अपने आपको पा लेता है । हेगेल द्वारा प्रतिपादित निम्न वर्गों की इस स्वतंत्र सक्रियता को दूषित करने वाले तत्वों के बारे में मार्क्स को जरूर पता रहा होगा । इसलिए टकराव के इस ढांचे को उन्होंने व्यक्तियों के सामाजिक संबंधों में देखा । उन्होंने निम्न वर्गों की इस सक्रियता को उनके सामाजिक गुण के रूप में कल्पित किया जिसे सत्ता और संपत्ति के दायरे में सामूहिक कार्यवाही से अर्जित किया जाता है । इसे वे वर्ग संघर्ष कहते हैं । संघर्ष की यह प्रक्रिया संघर्ष करने वाले को भी बदलती है । इसी कारण सामूहिक गोलबंदी को आत्म निर्माण की सामूहिक क्रिया के बतौर समझा गया । इस तरह निम्न वर्गों की सक्रियता सामूहिक कार्यवाही के परिणाम के बतौर सामने आती है । इसी गतिविधि में मनुष्य अभिकर्ता के रूप में विकसित होता है । अपने आपको बदलने की सामाजिक प्रक्रिया की इस धारणा में ही अपनी मुक्ति की नैतिकता भी शामिल रहती है ।                                 

इस तरह मुक्ति की उदार व्यक्तिवादी सोच के विपरीत उसकी सामाजिक धारणा का जन्म होता है । असल में गुलामों के लिए गुलामी सामाजिक मृत्यु की तरह थी क्योंकि वे नातेदारी के रिश्तों से अलगाव में ही होते थे । इसलिए मुक्ति का मतलब उनके लिए सामाजिक संबंध और एकजुटता, परिवार, नातेदारी, समुदाय और वर्ग की पहचान की पुन:प्राप्ति भी था । इसी तरह आजादी उनके लिए ऐसा सामाजिक संकेतक था जो प्रतिरोध और मुक्ति के अभिकर्ता के रूप में उनकी पहचान को इसी प्रक्रिया में मजबूती के साथ स्थापित भी करता था । इसी वजह से आजादी उनके लिए किसी संप्रभु व्यक्ति का कोई पूर्वनिर्धारित गुण नहीं था बल्कि अस्तित्व की ऐसी प्रक्रिया थी जिसके साथ टकराव अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था । आजादी ऐसी चीज थी जिसको अभी हासिल किया जाना था । वह चतुर्दिक व्याप्त गुलामी के भीतर से निकाली जानी थी । साथ ही यह कभी पूरी तरह समाप्त कोई अंतिम परिणाम नहीं होती थी । इसे लगातार विकसित होते रहना था । यह हमेशा ही अपूर्ण रहने वाली सामूहिक सामाजिक परियोजना थी । मनुष्यता के प्राक इतिहास से मानव इतिहास में प्रवेश करने का यही मतलब है । इन बातों को उदार व्यक्तिवादी निगाह से देखना सम्भव नहीं है । गुलामी के अधिकांश इतिहास इसी उदार व्यक्तिवादी नजरिए के शिकार रहे हैं । इसलिए उनमें निम्न वर्गों द्वारा मुक्ति की सामूहिक कोशिश का निशान नहीं मिलता ।     

इस बाध्यकारी सीमा से मुक्ति के लिए इस किताब में डब्ल्यू ई बी ड्यु बोइस, सी एल आर जेम्स और सिल्विया विंटर की क्रांतिकारी अश्वेत परम्परा के तीन प्रतिनिधि पाठों से प्रेरणा ली गयी है । इन तीनों पाठों में गुलाम कामगारों के सामूहिक संघर्षों को आधुनिक वर्ग संघर्ष के ही विभिन्न रूप माना गया है । इस तरह लेखक का मानना है कि नयी दुनिया के प्लांटेशनों पर काम करने वाले ये सभी गुलाम कामगार आधुनिक मजदूर वर्ग का हिस्सा थे । ड्यु बोइस का कहना है कि दक्षिणी अमेरिका के जो भी प्रांत गृहयुद्ध में गुलामी के समर्थन में लड़ रहे थे उनकी आर्थिक ताकत को कम करने में गुलाम मजदूरों द्वारा प्लांटेशन का काम छोड़कर बड़े पैमाने पर पलायन की निर्णायक भूमिका थी । गुलामों द्वारा इस तरह इकट्ठा काम छोड़ना काम के हालात के विरोध में आम हड़ताल ही थी । इसमें लगभग पांच लाख गुलाम शामिल थे । वे प्लांटेशन पर आधारित अर्थव्यवस्था को जाम करना चाहते थे और इसका उपाय उन्हें काम छोड़ना लगा । इसी तरह सी एल आर जेम्स ने हैती की 1791 की क्रांति का विश्लेषण करते हुए कहा कि उत्तर के मैदानों के विशाल चीनी मिलों में सैकड़ों की संख्या में साथ रहने और काम करने वाले लोग आधुनिक सर्वहारा के सबसे नजदीकी समूह थे इसलिए ही उनका विद्रोह इतना संगठित था । गुलामी और पूंजीवाद संबंधी बहस में इन दोनों का योगदान नीचे से उठने वाले वर्ग संघर्ष के रूपों पर ध्यान देना है । इसके अलावा उन्होंने गुलामी के सामाजिक टकरावों के पूंजीवादी चरित्र पर भी बल दिया । सिल्विया विंटर ने भी यही राह अपनायी । साथ ही उन्होंने गुलाम सर्वहारा के निर्माण में नस्ल और वर्ग की द्वंद्वात्मकता पर भी ध्यान दिया । उनका कहना था कि नयी दुनिया में अश्वेत वह पहला समुदाय है जिसका निर्माण वैश्विक उत्पादन संबंधों ने किया है । वे वर्ग और नस्ल के निर्माण को एक ही वैश्विक प्रक्रिया का नतीजा मानती हैं । उनके मुताबिक अश्वेत मनुष्य के व्यवस्थित अवमूल्यन के साथ ही श्रमशक्ति के व्यवस्थित शोषण की प्रक्रिया भी चली । दलित समुदाय के साथ सामाजिक व्यवहार में इस प्रक्रिया की झलक देखी जा सकती है । विंटर ने प्लांटेशन को उस वैश्विक प्रक्रिया का अंग कहा है जिसमें श्रमशक्ति का नस्लीकरण हुआ । इसी उदीयमान नस्ली पूंजीवाद को वे श्रमशक्ति के वस्तूकरण के जरिए समझती हैं ।

हाल के दशकों में इतिहासकारों ने इन चिंतकों के लेखन का जिक्र तो किया लेकिन उनकी दावेदारी से परहेज किया । खासकर प्लांटेशन के गुलाम कामगारों को आधुनिक मजदूर वर्ग का कहने को असावधानी के साथ बढ़ा चढ़ाकर कही बात समझा गया । इस इनकार से आलोचना सिद्धांत कमजोर हुआ और द्वंद्वात्मक आलोचना का स्वर मंद पड़ा । असल में उत्पीड़ितों की दुनिया में धक्का देने वाला सच बोला जाना चाहिए । जानकारी को दबाने वाले इनकार के तंत्र को तोड़ा ही जाना चाहिए । जिस समाज में नस्ली पूंजीवाद की क्रूर सच्चाई से इनकार करने की बीमारी हो वहां धक्का लगने वाला सच बोलना होगा । उन अर्थों को सामने लाना होगा जिनसे जी चुराया जाता है । इसी भावना के साथ इस किताब में इन चिंतकों के लेखन से प्रेरणा ली गयी है । अब तो बहुतेरे लोग मानने लगे हैं कि नयी दुनिया की गुलामी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति का अंग थी । इसके बावजूद उदार चिंतन के प्रभाव के कारण इसको सैद्धांतिक मजबूती नहीं मिल पाती । इसका कारण यह है कि पूंजीवाद को बाजार के साथ ही जोड़कर देखा जाता है । उत्पादन संबंध, शोषण और वर्ग संघर्ष जैसे तत्वों पर कम ध्यान दिया जाता है । इस किताब में ऐतिहासिक भौतिकवाद की जिस आलोचनात्मक धारा का अनुगमन किया गया है उसमें समाज का स्वरूप उसे आकार देने वाले बुनियादी उत्पादक और पुनरुत्पादक टकरावों से अलग नहीं होता । इसी कारण नयी दुनिया की गुलामी की पूंजीवादी प्रकृति पर किताब का जोर प्लांटेशन सर्वहारा की धारणा को भी मान्यता देता है ।

लेखक बताते हैं कि किताब के अलग अलग अध्यायों में इस मान्यता का विस्तार है लेकिन इन लेखकों की बातों को ही दुहराया नहीं गया है । किताब उनके पाठ के घेरे से बाहर निकलती है और यात्रा साहित्य, प्लांटेशन मालिकों के दस्तावेज तथा डायरी, गुलामों की कहानी के साथ राजनीतिक अर्थशास्त्र और हालिया ऐतिहासिक विद्वत्ता का भी उपयोग करती है । इतिहास और सिद्धांत निर्माण के लिए ऐसा करना उन्हें जरूरी लगा । पूंजीवाद और गुलामी की सैद्धांतिक समझ के लिए लेखक ने राजनीतिक अर्थशास्त्र की मार्क्सवादी आलोचना से जरूरी धारणाओं को ग्रहण किया है । असल में इतिहास में उदारवाद की प्रभुता की एक पहचान सिद्धांत की उपेक्षा भी है । इसके तहत समाज का जो सहजबोध बनता है उसमें आलोचनात्मक चिंतन से परहेज किया जाता है । सिद्धांत की उपेक्षा से तथ्यों को ही निरपेक्ष सत्य मानने की भूल पैदा होती है । सिद्धांत की अवहेलना करके तथ्य पर यह अतिरिक्त जोर बौद्धिक जड़ता की ओर ले जाता है जिससे यथास्थिति के प्रति सहनीय रुख का जन्म होता है । गुलामी और पूंजीवाद संबंधी अधिकांश इतिहास लेखन तमाम मूल्यवान शोध के बावजूद इसी विंदु पर फंसा हुआ है । इस जड़ता को तोड़ने के लिए इस किताब में ऐतिहासिक गवेषणा के साथ आलोचना सिद्धांत का भी मेल किया गया है । आम तौर पर यह रुख चलन के बाहर है । पूंजीवाद के नये इतिहास लेखन की धारा सदी के आरम्भ में लोकप्रिय हुई थी लेकिन उसमें भी पूंजीवाद और उसके राजनीतिक अर्थशास्त्र की ओर वापसी की स्पष्ट इच्छा के बावजूद सिद्धांत से यह दुराव अच्छा माना जाता है ।                           

इसके उदाहरण के बतौर लेखक ने हाल में छपी एक किताब का जिक्र किया है जिसका शीर्षक ‘स्लेवरी’ज  कैपिटलिज्म’ है । इस शीर्षक के बावजूद संपादकों ने इस सवाल में अरुचि जाहिर की है कि गुलामी को पूंजीवाद माना जाए या नहीं । तमाम तरह की गवेषणा के बावजूद एक समीक्षक का कहना है कि पूंजीवाद और गुलामी के प्रसंग में आर्थिक सिद्धांतों को ले आने से विषय के प्रति पूरा न्याय नहीं हो सकता । नतीजे के तौर पर उल्लिखित किताब में तथ्यों के प्रति उन्नीसवीं सदी जैसा पूजाभाव नजर आता है । इसके चलते विश्लेषण के नाम पर वर्णन मात्र परोसा जाता है । पूंजीवाद के ऐसे नये इतिहासकार पूंजीवाद को परिभाषित करने की झंझट से मुक्त होकर व्यवस्था के जमीनी साक्ष्य खोजते रहते हैं । लेखक का कहना है कि जमीनी साक्ष्य जरूरी हैं और इस मोर्चे पर भी उनकी किताब में कोताही नहीं बरती गयी है । इसके बावजूद अनुभवजन्य सबूत की बहुतायत सिद्धांत निर्माण की जगह नहीं ले सकती । सिद्धांत के अभाव में व्यवस्था का कोई ऐतिहासिक अर्थ ही नहीं निकलेगा । किसी भी ऐतिहासिक परिघटना का अर्थ संपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया में निहित सामान्य दिशा, गतिपथ, टकराव और अंतर्विरोध के जरिए ही निकलता है । प्लांटेशन पूंजीवाद की व्यवस्थित कार्यपद्धति को रूई की गांठ के ही विश्लेषण से नहीं समझा जा सकता ।

मार्क्स ने अपने ग्रंथ पूंजी में यही तो कहा कि पूंजीवाद का विश्लेषण किसी एक माल से शुरू कर सकते हैं लेकिन फिर अन्य मालों के साथ उसके रिश्ते को देखते हुए आगे बढ़ना होता है । यहां से उस श्रम की ओर जाना होता है जिससे इन सभी मालों का जन्म होता है । मतलब कि माल का सामाजिक अर्थ समझने के लिए उसे समूची सामाजिक प्रक्रिया के रिश्ते में रखकर देखना होता है । मार्क्स ने जब विभिन्न मालों का मशहूर समीकरण बनाया तब वे माल को ऐतिहासिक सामाजिक संबंध के रूप में विश्लेषित कर रहे थे । ऐसा कोई भी विश्लेषण सिद्धांत के बिना सम्भव नहीं । लेखक ने एक और इतिहासकार का जिक्र करते हुए बताया कि वे रूई के कारोबार में बाजार या पूंजीवाद के प्रवेश को नापने की जगह पर इस बाजार की ठोस कार्यपद्धति को समझना अधिक उपयोगी कहते हैं । इस रुख के बारे में लेखक का कहना है कि माल और पूंजी के प्रवाह, कीमत का निर्माण, मुनाफ़े की दर, मौद्रिक और वित्तीय औजार, पूंजी निवेश के रूप और श्रम प्रिक्रिया के वैश्विक संजाल के व्यवस्थित अंतर्संबंधों की समझ के बिना बाजार की कार्यपद्धति को किस तरीके से समझा जा सकता है । अगर नयी दुनिया की गुलामी का अध्ययन विश्व पूंजीवाद के एक पहलू के बतौर करना है तो रूई की किसी गांठ को सामाजिक ऐतिहासिक रिश्तों की गतिमान व्यवस्था के भीतर रखकर देखना होगा ।

लेखक के अनुसार उनकी किताब नयी दुनिया की गुलामी की पूंजीवादी प्रकृति को समग्रता में देखने की वकालत करती है । उनका यह भी कहना है कि पूंजीवाद की समाजार्थिक गतिकी ही अंतर्विरोधी होती है । इसी गतिकी और वर्ग संघर्ष के जरिए यह समूची व्यवस्था उत्पादित और पुनरुत्पादित होती रहती है । पूंजीवाद के पुनरुत्पादन का बुनियादी नियम है माल उत्पादक इकाइयों द्वारा अधिशेष का उत्पादन और अधिग्रहण । विक्रेय माल के उत्पादन में लगे कारखाने मजदूर के श्रम से अतिरिक्त मूल्य पैदा करते हैं और उसको निजी संपदा की तरह हथिया लेते हैं । उनके इस काम के साथ बाजार की होड़ भी नत्थी रहती है । शोषण के इस कारोबार को अधिकाधिक मुनाफ़ा पैदा करने के मकसद से अलग अलग पूंजीपति आपस में होड़ के साथ चलाते हैं । इस तरह यह समूची व्यवस्था आंगिक समग्रता के साथ चलती रहती है । इसके भीतर बदलाव इसकी अंतर्विरोधी गतिकी के कारण ही आते हैं ।                    


Thursday, June 25, 2026

कम्युनिस्ट स्त्री कार्यकर्ता

 

                                   

                                                      

2023 में पालग्रेव मैकमिलन से फ़्रंचिस्का दे हान के संपादन मेंद पालग्रेव हैंडबुक आफ़ कम्युनिस्ट वीमेन ऐक्टिविस्ट्स एराउंड द वर्ल्डका प्रकाशन हुआ । संपादकीय भूमिका समेत किताब के छह हिस्सों में छब्बीस लेख संकलित हैं । सबसे पहले वैश्विक पुरखिनों, फिर यूरोप, एशिया, अफ़्रीका और मध्य पूर्व, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैन्ड तथा अमेरिकी भाग की कार्यकर्ताओं का विवेचन किया गया है । कहानी अर्जेन्टिना की कम्युनिस्ट पार्टी की अध्यक्ष को श्रद्धांजलि से शुरू होती है । वे बहुत समय तक स्त्री संघ की नेता रहीं । इसी तरह चीन में भी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही । इसके बावजूद कम्युनिस्ट इतिहास में पार्टी के पुरुष ही नेताओं का जिक्र आता है । इसके विपरीत इस किताब के पचीस अध्यायों में दुनिया भर की ऐसी तमाम नेताओं का जिक्र है जिन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । इसके लिए उन्होंने स्त्रियों को पार्टी में भरती किया, वर्गीय की जगह स्त्री संगठनों की स्थापना की और कम्युनिस्ट पार्टी में मौजूद पुरुषवादी रुझान से संघर्ष किया । सिद्धांत के मोर्चे पर भी उन्होंने ऐसी समझ बनायी जिसमें वर्ग के साथ ही नस्ल और लिंग का सवाल भी शामिल रहे । इन स्त्रियों के जीवन, योगदान और संघर्षों को वैश्विक नजर से देखा गया है । ऐसा कम्युनिज्म के यूरोप और एशिया केंद्रित इतिहास से आगे बढ़ने के लिए किया गया है । इन स्त्रियों का सही मूल्यांकन न होने की बड़ी वजह यह मान्यता है कि वे भी समकालीन कम्युनिस्टों की नारीवाद विरोधी सोच के असर में रही होंगी । उनका कहना है कि कम्युनिस्टों द्वारा नारीवादी आंदोलन को बुर्जुआ आंदोलन मानने से यह नहीं साबित होता कि स्त्रियों के सवालों को ही दरकिनार किया जाता रहा था । इन स्त्री नेताओं के कामों का अवमूल्यन इस मान्यता की वजह से भी हुआ कि उन पर शीतयुद्ध की राजनीति का दबाव था । स्त्रियों की हैसियत और अधिकार बढ़ाने हेतु नीतियों और कानूनों के निर्माण की उनकी वास्तविक इच्छा में इसका स्रोत नहीं देखा गया ।

इस किताब में शामिल पचीस राजनीतिक जीवनियों से जाहिर है कि ये नेता बुर्जुआ स्त्री आंदोलन के प्रति अपनी राय के बावजूद स्त्री जीवन में सुधार की गहरी आकांक्षा से परिचालित थीं । इसके लिए उन्होंने चतुर्दिक व्याप्त पुरुष प्रभुत्व को पहचाना और उसे चुनौती दी । यह प्रभुत्व समूची दुनिया के साथ ही समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टियों के भीतर भी समाया हुआ था । पितृसत्ता के प्रति इसी जागरूकता के कारण उन्होंने स्त्री संगठनों, स्त्रियों के अखबारों, कार्यक्रमों आदि पर जोर दिया । इसके लिए भले ही उन्हें इन ढांचों और गतिविधियों की उपेक्षा या उन्हें समाप्त करने के प्रयासों से टकराना पड़ा । इसी वजह से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्त्री अधिकारों को आगे ले जाने का उन्होंने काम किया । चूंकि वे स्त्री उत्पीड़न को उत्पीड़न के अन्य रूपों के साथ जोड़कर देखती थीं इसलिए उन्होंने उदार नारीवादी अमूर्त जेंडर समता की जगह स्त्री के राजनीतिक और समाजार्थिक अधिकारों की हिमायत की । इस क्रम में सबसे पहले तीन वैश्विक पुरखिनों का जिक्र किया गया है । जर्मनी की क्लारा जेटकिन, रूस की अलेक्सांद्रा कोलोन्ताइ और त्रिनिदाद की क्लाडिया जोन्स शामिल हैं । किताब के वैश्विक आयाम का अंदाजा दूसरे हिस्से की तीन नेताओं से भी होता है जिनमें माली की आओआ केइता, क्यूबा की विल्मा एस्पिन और वियतनाम की गुयेन थी बिन्ह शामिल हैं । तीसरे हिस्से में इतिहास का संक्षिप्त लेखा जोखा है । चौथे हिस्से में इन स्त्रियों की प्रेरणा, योगदान और उपलब्धियों की चर्चा है । आखिरी पांचवें हिस्से में किताब की योजना और उसके लक्ष्य का विवरण है ।

जिन तीन पुरखिनों का जिक्र हुआ उन सबने समाजवाद और कम्युनिज्म के हित में विशेष योगदान किया । क्लारा जेटकिन के राजनीतिक जीवन की शुरुआत अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी स्त्री आंदोलन के निर्विवाद नेता के रूप में हुई जब उन्होंने 1889 में दूसरे इंटरनेशनल के पेरिस में आयोजित स्थापना सम्मेलन में स्त्रियों के काम और मजदूर आंदोलन में उनकी भूमिका पर व्याख्यान दिया । उनकी बातें अगस्त बेबेल की स्त्री और समाजवाद शीर्षक 1879 की किताब से प्रभावित थीं । उन्होंने इसे किताब से अधिक घटना का दर्जा दिया था । प्रतिबद्ध मार्क्सवादी होने के नाते उनका मानना था कि स्त्री उत्पीड़न का मूल वर्ग आधारित आर्थिक शोषण है । इसे यूं भी कहा जा सकता है कि लैंगिक विषमता की जड़ आर्थिक ढांचे में है । बेबेल से उनकी सहमति यह थी कि स्त्री को सबसे पहले पुरुष से आर्थिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए । इसकी कुंजी काम में उनकी भागीदारी है । आर्थिक स्वतंत्रता से सामाजिक आत्म निर्भरता की राह खुलेगी । वे यह भी मानती थीं कि स्त्री की यह सामाजिक आत्मनिर्भरता और तज्जनित बराबरी समग्र मानव मुक्ति के लिए आवश्यक है । उनकी विशेषता यह भी थी कि वे स्त्रियों के अलग संगठन के पक्ष में थीं । जर्मनी के मजदूर आंदोलन में अपनी लम्बी सहभागिता के अनुभव से वे इस नतीजे पर पहुंची थीं । इससे पार्टी को स्त्रियों को संगठित करने में भारी सफलता मिली थी । इसके साथ 8 मार्च का अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी उनका प्रस्ताव था । इसकी शुरुआत स्त्री मताधिकार की मांग पर जोर देने के लिए हुई थी । कोमिंटर्न के स्त्री पहल के केंद्र में भी क्लारा रहीं । इस दौरान सोवियत संघ में उनकी मुलाकातें लेनिन से अक्सर होती रहीं । उनके साथ स्त्री प्रश्न पर लम्बे वार्तालाप मशहूर हैं । इनका प्रकाशन लेनिन के निधन के साल भर बाद हुआ था । मजदूर आंदोलन में मौजूद पितृसत्ता की सोच से लड़ने में उन्होंने बहुत समय दिया । 1930 दशक में वे अमेरिका की नस्लवाद विरोधी अंतर्राष्ट्रीय गोलबंदी में भी सक्रिय रहीं । एंजेला डेविस ने उनकी इस भूमिका को रेखांकित किया है । स्त्री अधिकार, शांति, फ़ासीवाद विरोध और अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के क्षेत्र में उनकी सक्रियता की विरासत 1933 में उनके निधन के बाद भी कायम रही । कोलोन्ताइ ने आत्मकथा में सोवियत संघ में सर्वहारा स्त्रियों के जमीनी संगठन बनाने में उनकी प्रेरणा को याद किया है । उनका जर्मन अनुभव अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी स्त्री आंदोलन के लिए पूंजी साबित हुआ । मेक्सिको की एक स्त्री कार्यकर्ता रीलू के सम्मेलन में भाग लेने जब सोवियत संघ गयीं तो उनकी मुलाकात क्लारा से हुई थी । उन्होंने अपने संस्मरणों में उनके व्याख्यान को याद किया । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भी उनकी विरासत जिंदा रही । यूरोप और एशिया के स्त्री संगठनों और उनके नेताओं ने उनकी याद को जिंदा रखा । उनका सबसे जीवंत स्मारक तो 8 मार्च का अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है जिसे सामूहिक स्मृति में कायम रखने में वाम आंदोलन का भारी योगदान रहा है ।

इसी तरह की दूसरी नेता अलेक्सांद्रा कोलोन्ताइ थीं जिन्हें उनके जीवन में तो विश्वव्यापी ख्याति मिली ही, आज भी उन्हें सर्वकालिक कम्युनिस्ट नेता के बतौर याद किया जाता है । हाल के दिनों में क्लारा जेटकिन की तरह उनके जीवन के बारे में फिर से रुचि पैदा हुई है । वे दुनिया की पहली स्त्री थीं जो किसी सरकार में मंत्री बनीं । अक्टूबर क्रांति के बाद की बोल्शेविक सरकार में समाज कल्याण मंत्री रहते हुए उन्होंने तलाक, पंजीकृत विवाह, अवैध बच्चों के अधिकार की समानता तथा मातृत्व और बचपन की सुरक्षा के अनेक कानूनी प्रावधान तैयार करने के काम में भाग लिया । पार्टी की केंद्रीय समिति में स्त्री विभाग की स्थापना में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा । ट्रेड यूनियनों को अधिक अधिकार देने की वकालत भी उन्होंने की । नार्वे में जब उन्हें राजदूत बनाया गया तो वे दुनिया की पहली राजदूत स्त्री थीं । यौनिक मुक्ति के लिए उन्होंने नयी नैतिकता की वकालत की और इसे व्यक्त करने वाले उपन्यास भी लिखे । आधुनिक स्त्री की नयी पहचान और यौनिकता के बारे में लेखन के कारण भी वे मशहूर रहीं । दूसरी नारीवादी लहर में उनका इस तरह का लेखन फिर से छपा और चर्चित हुआ ।

संपादक उनके प्रभाव को इसी पहलू तक सीमित रखने का विरोध करती हैं । वे यह भी नहीं मानतीं कि राजदूत के बतौर सोवियत संघ से बाहर रहने के कारण वे गायब हो गयीं । उपन्यासों के लेखन से पहले भी उन्होंने स्त्रियों के बारे में वैज्ञानिक छानबीन के आधार पर बहुत कुछ लिखा । इसमें समाज और मातृत्व के बारे में 1916 में लिखी 600 पृष्ठों की किताब भी शामिल है जिसमें उन्होंने मातृत्व को ऐसी सामाजिक जिम्मेदारी माना जिसमें स्त्री और समाज सहभागी होते हैं । उनका यह सिद्धांत बोल्शेविक नारीवाद की मूलभित्ति बना । आज भी समाजवादी शासन और वाम स्त्री संगठनों के काम में इस धारणा की मौजूदगी देखी जा सकती है । स्वीडेन में पंद्रह साल तक राजदूत रहने की वजह से वहां के स्त्री आंदोलन के साथ भी उनका सम्पर्क बना । उस देश के प्रगतिशील स्त्री समूह कोलोन्ताइ को अपनी प्रेरणा स्वीकार करती हैं । लीग आफ़ नेशंस में भी सोवियत संघ का प्रतिनिधित्व तीन साल तक कोलोन्ताइ ने किया और अपने कार्यकाल में स्त्रियों की कानूनी स्थिति की जांच पड़ताल करायी । वे सभी सदस्य देशों में स्त्री की कानूनी समता के लिए संधि की पैरोकार भी थीं । फ़ासीवाद विरोधी स्त्री अभियान में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही । घरेलू काम के असमान वितरण के सवाल पर वैचारिक जागृति की उन्होंने जरूरत महसूस की ।

क्लारा जेटकिन और कोलोन्ताइ की कहानियां उतनी ही नहीं हैं जितनी इस किताब में बतायी गयी हैं फिर भी सबने उनको अग्रणी समाजवादी और कम्युनिस्ट स्त्री नेता माना है । इनके साथ संपादक ने क्लाडिया जोन्स को भी शामिल किया है । इसकी मुख्य वजह मार्क्सवादी सिद्धांत के क्षेत्र में उनका योगदान है । वे बचपन में ही परिवार के अन्य सदस्यों के साथ त्रिनिदाद से अमेरिका आ गयी थीं और कम्युनिस्ट पार्टी की युवा शाखा में शरीक हुईं । उन्होंने बहुतेरे सैद्धांतिक हस्तक्षेप किये । वे पार्टी की स्त्री आयोग की सचिव रहीं । आयोग ने स्त्री के बारे में जो समझ बनायी उसकी वजह से पार्टी को बहुत सारे बदलाव करने पड़े । उन्होंने माना कि पुरुष प्रभुता सभी मामलों में कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रगति में बाधा है इसलिए इसका विरोध होना चाहिए । पार्टी की इस समझ के बावजूद अश्वेत स्त्री की उपेक्षा जारी रही जिसके विरोध में क्लाडिया जोन्स ने अभियान चलाया । इस तरह उन्होंने उस सवाल पर विचार किया जिसे मार्क्स और लेनिन ने भी चर्चा से बाहर रखा था । क्लारा द्वारा स्त्री प्रश्न पर लेनिन की राय वाली पुस्तिका के अमेरिकी संस्करण की भूमिका में क्लाडिया जोन्स ने अश्वेत कामगार स्त्री को इस संघर्ष का नेता बनाने का सुझाव दिया और इस तरह लिंग, नस्ल और वर्ग की आपसदारी को रेखांकित किया । इस तरह के रिश्ते के लिए फिलहाल जिस इंटरसेक्शनल शब्द का प्रयोग किया जाता है उसकी पहली स्पष्ट झलक क्लाडिया जोन्स के लेखन में मिलती है । उनके ये विचार अमेरिका के बाहर भी फैले । उनके प्रभाव में ही हंगरी में आयोजित 1948 के एक सम्मेलन की अमेरिकी प्रतिनिधि ने अश्वेत स्त्री को नस्ली और लैंगिक भेदभाव के साथ सबसे कम पगार पाने वाली मजदूर के बतौर तिहरे शोषण का शिकार बताया था ।

संपादक का कहना है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के इस क्रांतिकारी चिंतन को चर्चा से बाहर रखने में शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका के कम्युनिस्ट विरोधी दमन का हाथ है । इस दमन ने इतिहास लेखन के लिए आवश्यक स्रोत भी नष्ट कर दिये । इसी दमन अभियान के तहत क्लाडिया जोन्स को 1954 में कारावास और 1955 में देशनिकाला मिला । लंदन में रहकर उन्होंने पहला अश्वेत अखबार शुरू किया, कैरीबियाई समुदाय को संगठित करने में मदद की और वामपंथी उपनिवेशवाद विरोधी वैश्विक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की । पिछले दस पंद्रह सालों में अश्वेत क्रांतिकारी स्त्रियों के इस इतिहास का उत्खनन शुरू हुआ है ।

संपादक के अनुसार किताब में जिन पचीस नेताओं की जीवनी है उन सबका संक्षेप में परिचय मुश्किल है फिर भी माली, क्यूबा और वियतनाम की तीन कार्यकर्ताओं का जिक्र उन्हें जरुरी लगता है । आओआ कीता नामक नेता माली को 1960 में हासिल हुई आजादी के आंदोलन की सबसे प्रभावशाली नेता मानी जाती हैं । उनका जीवन उपनिवेशवाद विरोध, राष्ट्रवाद, नारीवाद और अफ़्रीकावाद से जुड़ा था । वे देश और दुनिया में स्त्रियों के राजनीतिक संगठन के काम में लगी रहीं । कम्युनिस्ट दुनिया के साथ उनके रिश्तों का मकसद आत्म निर्णय और स्त्री मुक्ति के अधिकार की रक्षा हेतु समर्थन जुटाना था । क्यूबा की नेता विल्मा एस्पिन को फ़िदेल के विचारों की व्याख्याता का दर्जा हासिल है । वे ऐसा मानती हुई प्रतीत होती हैं कि फ़िदेल कास्त्रो उनके बौद्धिक नेता हैं लेकिन यह छवि उनकी स्वतंत्र सत्ता के साथ न्याय नहीं कर पाती । क्यूबा की क्रांति में उनकी राजनीतिक भूमिका केंद्रीय थी । अनेक सुधारों के पीछे उनकी प्रेरणा रही है । उन्होंने क्यूबा की क्रांतिकारी प्रक्रिया को वैश्विक पूंजीवाद और साम्राज्यवाद विरोध के साथ जोड़ा । वियतनाम की गुएन थी बिन्ह वियतनाम की अस्थायी क्रांतिकारी सरकार में 1969 से 1975 तक विदेश मंत्री रहीं । वे वियतनाम के स्त्री संघ की उपाध्यक्ष रहीं और युद्ध के उपरांत देश की शिक्षा मंत्री तथा उप राष्ट्रपति रहीं । वे क्रांति के लिए आग के साथ फूल का भी काम करती रहीं । वे तीसरी दुनिया के नारीवाद का साकार रूप थीं । उनके व्यक्तिव में नारीवाद और क्रांति, आधुनिकता और परम्परा तथा विनम्रता और दृढ़ता का संयोग था । इसी किस्म के नारीवाद ने बीसवीं सदी में दक्षिणी गोलार्ध के अनुपनिवेशीकरण के संघर्षों को सफलता की मंजिल तक पहुंचाया ।        

Tuesday, June 23, 2026

हिंदी आलोचना का अग्निधर्मी पक्ष

 

          

                               

कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह हिंदी आलोचना की उस धारा के लगभग आखिरी योद्धा थे जो उपनिवेशवाद विरोध के गर्भ से उपजी, उसके वाम रुख को प्रकट किया तथा उसे आजादी के बाद क्रांतिकारी तेवर देकर जिंदा रखा और प्रासंगिक बनाया । इस लम्बी रचनात्मक और वैचारिक यात्रा के निशान उनकी आलोचना में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं । आम तौर पर कवि आलोचना लिखने से परहेज करते हैं, अगर लिखते भी हैं तो उसमें खास तरह की औपचारिकता होती है लेकिन इसके विपरीत कुमारेंद्र जी ने बहुत ही जिम्मेदारी के साथ आलोचना लिखी और उसके अत्यंत परिष्कृत आलोचनात्मक औजारों का इस्तेमाल किया । उस दौर में जो वैचारिक विभाजन था उसके कारण कथन भंगिमा से अधिक कथन की वस्तु पर ध्यान दिया जाता था लेकिन कुमारेंद्र जी ने काव्यभाषा जैसे संवेदनशील हथियार को अपनी विवेचना का विषय बनाया और भाषिक व्यवहार को विषयवस्तु की अभिव्यक्ति के प्रति गम्भीरता से जोड़कर देखा । उनको लगता था कि विषय के प्रति कवि की निष्ठा का सबूत उसके बारे में कवि द्वारा अपनायी गयी भाषा देती है । आश्चर्यजनक ढंग से इस प्रक्रिया में उन्होंने लगभग शल्यक्रिया जैसी तटस्थता और कुशलता का पालन किया है । उनकी आलोचना से गुजरते हुए पाठक को उस दौर की बेचैनी के साथ रचनात्मक समृद्धि के भी दर्शन होते हैं । कुमारेंद्र जी के समकालीन कवियों के बहुत सारे उद्धरणों के लिए भी उनकी आलोचना को देखा जा सकता है । उस समय हिंदी लेखन में जिस तरह के विद्रोह भाव का दबदबा था उसमें लेखन के प्रति मुग्ध होना बुरा समझा जाता था लेखक को सामाजिक बदलाव में लगी ताकतों की कोशिश अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होती थी और अपने लेखन के प्रति उपेक्षा बरती जाती थी काव्य भाषा का वामपक्ष शीर्षक उनका लेखआलोचना पत्रिका में नामवर सिंह ने छापा इसलिए वह सुरक्षित रह गया यह बात लेखक ने खुद स्वीकार की है ऐसे में उनके आलोचनात्मक लेखन का संग्रह कठिन था लेकिन खुशी की बात कि उसे ‘कविता का संघर्ष’ शीर्षक से संवर्धित रूप में प्रकाशित करने से यह दस्तावेजी लेखन फिर से उपलब्ध हो गया । इसके अतिरिक्त आनंद प्रकाश के संपादन में कुमारेंद्र जी की कविताओं के प्रतिनिधि संकलन में भी उनकी कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियों को शामिल कर लिया गया है । प्रस्तुत लेख इनके ही आधार पर तैयार किया गया है ।          

कहने की जरूरत नहीं कि कुमारेंद्र जी का समय साठ दशक का विद्रोही समय है पूरी दुनिया में उस दशक को साहसिक सपनों का समय माना जाता है आजादी के बाद के मोहभंग को उस समय ऐसा सघन वैश्विक परिप्रेक्ष्य मिला जो उससे पहले स्वाधीनता आंदोलन के दौर की जोरदार उपनिवेशवाद विरोधी वैश्विक लहर के कारण भारत के बौद्धिक समुदाय को मिला था इन दोनों के मिलाप ने उस दौर की केवल साहित्य रचना बल्कि उसके मूल्यांकन को भी वाम झुकाव प्रदान किया था हिंदी आलोचना की यही मुख्य धारा बन गयी कुमारेंद्र जी ने इस धारा का सकारात्मक दाय एकदम साफ खुलकर स्वीकार किया है इसी धारा की निरंतरता उन्होंने प्रगतिशील आलोचना में भी देखी है यह रुख उन्हें अपने समकालीनों में विशेष बनाता है । इस प्रवृत्ति पर जोर देना इसलिए भी जरूरी है कि साठ के दशक का परम्पराद्रोही पक्ष बहुत उभारा जाता है लेकिन उसने प्रगतिशील धारा को फिर से प्रासंगिकता प्रदान करने में जो योग दिया उसे भुला दिया जाता है । आजादी मिलने के बाद साहित्य के भीतर प्रगतिशील धारा को किनारे पर डालने की सचेत कोशिश की गयी थी । इस कोशिश में कुछ हद तक सफलता भी मिली थी । साठ के दशक में नक्सलबाड़ी विद्रोह से जो चेतना पैदा हुई उसने प्रगतिशीलों को फिर से हिंदी साहित्य के केंद्र में ला दिया और उनकी विद्रोही विरासत को आगे ले जाने का दायित्व नये विद्रोहियों ने निभाया     

साठ के दशक की इस चेतना का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य वियतनाम और माओ से बना था । इसके लिए कुमारेंद्र जी का माओ के कवि के बारे में लिखा देखा जाना चाहिए । माओ की कविता के बारे में लिखना आज की तरह देशद्रोह माने जाने की कोटि में तो नहीं आता था लेकिन साहित्य के भीतर मान्यता के लिहाज से खतरनाक जरूर था । इस लेखन से ऐसा समझा जा सकता था कि साहित्य के भीतर वैचारिक राजनीति का बेजा लाभ लिया जा रहा है । प्रगतिशील साहित्य को हाशिए पर डालने के लिए आलोचना का सहज बोध राजनीति से दूरी बना दिया गया था और आज भी यही बना हुआ है कि साहित्य की बात करते हुए राजनीति से थोड़ा परहेज करना सही और सुरक्षित होता है । ऐसे में कुमारेंद्र जी ने माओ की कविता के बारे में लिखने का जोखिम उठाया । यह साहस उन्हें प्रेमचंद, नागार्जुन और राहुल सांकृत्यायन जैसे साहित्यकारों के कारण मिला । यह याद दिलाने की जरूरत नहीं कि बिहार ऐसे साहित्यकारों से भरा है जो इस कृत्रिम विभाजन की खिल्ली अपने लेखन और व्यवहार से उड़ाते हैं । रामवृक्ष बेनीपुरी और फणीश्वर नाथ रेणु जैसे लेखक इनमें अग्रगण्य हैं । राहुल सांकृत्यायन भी उत्तर प्रदेश से होने के बावजूद बिहार से अधिक जुड़े रहे । कुमारेंद्र जी ने साहित्यकारों की लीक से हटकर चलने वाली इस परम्परा को अपनी आलोचना के जरिए नया आयाम दिया है । इसी वजह से उनकी आलोचना को हिंदी आलोचना की मुख्य धारा का विकास और विस्तार समझा जाना चाहिए । माओ के साथ ही चीनी साहित्यकार लूसुन का नाम भी उनके लेखन में बहुत बार आया है । मुख्य रूप से कवि होने के चलते कुमारेंद्र जी ने रूसी कवि मयाकोव्सकी और चिली के स्पेनी कवि पाब्लो नेरुदा का भी एकाधिक प्रसंगों में उल्लेख किया है । इनके अतिरिक्त भी वे यथावसर विदेशी कवियों और साहित्य चिंतकों का निधड़क उल्लेख करते चलते हैं   

आलोचना की जिस धारा से कुमारेंद्र जी अपने आपको जोड़ते हैं उसमें विश्लेषण के परिष्कृत उपकरणों के पक्ष में विषयवस्तु की उपेक्षा नहीं की जाती थी । असल में अगर ‘कथन क्या है’ को ‘कैसे कहा गया है’ से अलग कर दिया गया तो आलोचक की नजर एकांगी हो जाती है । प्रगतिशील आलोचना पर कुत्सित समाजशास्त्र के तमाम आरोपों के बावजूद सही यही है कि हिंदी की इस आलोचना में वैसा भोंथरापन कभी नहीं रहा जैसा आरोप उस पर लगाया जाता रहा है । उसके सभी बेहतरीन आलोचकों ने दोनों को अलग समझने की जगह रचना को परखने में उनका आपसी समन्वय किया । जिन्होंने भी समाजशास्त्रीयता के कल्पित आरोप से बचने के लिए चतुराई के साथ अतिरिक्त सावधानी बरती वे किसी न किसी तरह के रूपवाद के शिकार हुए और रचना की गुणवत्ता की पहचान में मददगार कारगर औजार भी विकसित नहीं कर सके । आश्चर्य की तरह कुमारेंद्र जी की आलोचना इस मामले में बहुत ही समृद्ध है ।

उनके आलोचनात्मक लेखन का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष स्त्री के प्रति अपने समय के कवियों के रुख की तीखी मीमांसा है उनकी आलोचना के इस पहलू पर जोर देने की जरूरत है असल में हिंदी कविता में स्त्री शरीर के अंगों का उल्लेख पाठक के आस्वाद को धक्का देने की विद्रोही क्रिया मानी जाती रही है इस दृष्टिकोण की लम्बी उपस्थिति साठ के दशक के कवियों को विरासत में मिली थी कुमारेंद्र जी की आलोचना स्पष्ट करती है कि यह रुख विद्रोह की जगह उसकी बनावटी मुद्रा मात्र है इस सवाल पर उनकी आलोचना के मूल किसी नैतिक आग्रह में नहीं हैं वे इसे संवेदना की सच्चाई के तराजू पर तौलते हैं और पाते हैं कि यह रुख लेखक की संवेदना में तीव्रता की कमी का द्योतक है जिसकी भरपाई लेखक विद्रोह की भंगिमा से करना चाहता है इस मामले में उनकी आलोचना से आज भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है कुमारेंद्र जी के इस रुख से उन पर सामंती नैतिकता के असर का आरोप लगने की गुंजाइश थी फिर भी उन्होंने स्त्री शरीर के प्रति इस भोगवादी रुख का प्रतिकार करना बहुत ही जरूरी समझा उनके इस साहस और समझ की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है

विद्रोह की शाब्दिक भंगिमा के प्रति उनकी चिढ़ अपने प्रिय कवियों के भी आडम्बर को व्यक्त करने में प्रकट हुई है । उनकी आलोचना में शाश्वत की जगह तत्काल और जरूरी को निभाने पर अतिरिक्त जोर है । तत्काल और जरूरी पर उनका यह अतिरिक्त बल एकाधिक प्रसंगों में कवि कर्म की सीमा लांघने की अनुशंसा तक चला जाता है । असल में साहित्यकारों की दुनिया में अपने आपको तात्कालिक से अलग शाश्वत की खोल में सुरक्षित रखने का चलन रहा है इसी प्रवृत्ति के विरोध में उस समय समाज से प्रतिबद्धता की जरूरत पर बल दिया गया था । इसके लिए कुमारेंद्र जी ने एकदम ही मौलिक शब्द ‘हमबद्ध’ का प्रयोग किया है । इसमें व्यक्तिनिष्ठता के प्रतिकार की ध्वनि तो है ही, प्रतिबद्ध के उस अर्थ को भी उलटने की कोशिश है जिसमें खूंटे से बंधे होने की अनुगूंज है । इन तमाम शब्दों की तरह कुमारेंद्र जी की आलोचना का एक और रोचक बीजशब्द बदल भी है कभी कभी वे इसके समानार्थी परिवर्तन का भी इस्तेमाल करते हैं लेकिन अधिकतर बदल ही उन्हें प्रिय है इसके साथ वे किसी विशेषण का भी उपयोग नहीं करते जिससे बदलाव के किसी खास पहलू का पता चले इसका अर्थ बहुत हद तक परिवर्तन के एकमात्र सत्य होने की दार्शनिक धारणा तक चला जाता है समग्र बदलाव की इस व्यापक प्रक्रिया से मनुष्य होने के नाते साहित्यकार भी निरपेक्ष नहीं रह सकता मनुष्य के रूप में कवि/साहित्यकार का अस्तित्व सामाजिक होता है इस उच्चतर भूमि से कुमारेंद्र जी ने उसकी वृहत्तर सामाजिक जिम्मेदारी का सवाल उठाया है इस जिम्मेदारी के ही संदर्भ में उन्होंने एक अन्य मौलिक शब्द रक्ताल का भी उपयोग किया है । इस शब्द का सबसे नरम अर्थ लाल है तो यह कभी खून से लथपथ तक जाता है । कवि के इस सामाजिक कर्तव्य को उसकी कविता से बहुत अलग नहीं किया जा सकता यहां आकर कुमारेंद्र जी हिंदी आलोचना की जिस मुख्य धारा के साथ खड़े होते हैं उसके शीर्ष पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल रहे हैं कविता में अभिधा को प्रमुख तौर पर प्रयोग करने की उनकी धारणा कभी विचार करने लायक भी नहीं मानी गयी शुक्ल जी की इस मामले में हिंदी की दुनिया द्वारा उपेक्षा के बावजूद काव्य भाषा के सवाल पर कुमारेंद्र जी ने बहुधा वायवीय होने के खतरे से बचने के लिए चीजों को उनके सही नाम से पुकारने की वकालत की है और इस रुख में अभिव्यक्ति की ईमानदारी मानी है । इसे उन्होंने जन साधारण की वाक संस्कृति के साथ काव्य भाषा को सम्पर्कित करने की तरह देखा है ।               

सभी आलोचकों की तरह कुमारेंद्र जी को अपने समय से अनुराग तो है लेकिन उसके बावजूद अधिक की आशा भी है । उनकी इस आशा का ही फल नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और मुक्तिबोध जैसे अपने पुरखों की कविता का प्रेरणा प्रदान करने वाला मूल्यांकन है । विस्तार से उन्होंने इन सभी कवियों की समानता और भिन्नता को पहचाना और दर्ज किया है । इसी संदर्भ में उन्होंने अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ और मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ को इन दोनों की परस्पर भावभूमियों की प्रतिनिधि कविताओं के रूप में चर्चा की है । पहली कविता में उन्हें अगर व्यक्तिवाद की गहरी गूंज सुनायी देती है तो दूसरी कविता में समूह में व्यक्ति का निरसन होता नजर आता है । मुक्तिबोध की कविता में इस प्रयास को कुमारेंद्र जी ने पाताल-तोड़ कोशिश जैसे रचनात्मक शब्द-युग्म से अभिहित किया है इसी जगह अभिव्यक्ति की क्षमता के संदर्भ में उन्होंने नागार्जुन की सफलता का भी रहस्य खोला है

वह समय हिंदी में नवगीत के लिए भी मशहूर रहा है । किताब में आखिरी लेख गीत रचना पर केंद्रित है । लेखक ने विस्तार से इसमें कविता और गीत का अंतर स्पष्ट करते हुए गीत लेखन की विशेषता और इसके स्वतंत्र महत्व पर प्रकाश डाला है । निराला और नचिकेता के एक एक गीत के सौंदर्य के विश्लेषण से उन्होंने नये रचनाकार की क्षमता को उजागर किया है । गीतों के प्रसंग में जनभाषा के प्रयोग की उनकी पक्षधरता उन्हें बोलियों की सृजनात्मक क्षमता को उजागर करने तक ले गयी है । बोलियों को वे केवल साहित्य की भाषा के रूप में नहीं देखते बल्कि उनको अलग तरह की संवेदना का उत्स भी मानते हैं । इसके अतिरिक्त किताब में पांच परिशिष्ट भी हैं जिनमें किताब के ऊपर लिखे विभिन्न सूत्रों को अनेकानेक अन्य प्रसंगों से पुष्ट किया गया है । इनमें मुक्तिबोध की अंधेरे में पर एक स्वतंत्र टिप्पणी के साथ नेरुदा के कविता संबंधी विचार भी स्पष्ट किये गये हैं । काव्य भाषा के प्रसंग में पहले ही परिशिष्ट में रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा के विचारों को विदेशी विचारकों के साथ उद्धृत किया गया है ।        

कुमारेंद्र जी नक्सल धारा के प्रतिबद्ध साहित्यकार थे । इस धारा के बारे में सामान्य धारणा परम्पराद्रोह की है । साहित्य की अभिजन समझ से विद्रोही लेखन को बाहर रखने की मंशा से ऐसा किया गया । हिंदी में इस समझ के बनाने में पारम्परिक वाम का भी सहयोग रहा था । इसके संस्थान केंद्रित रूप से अलग ऐसे रचनाकार भी थे जो संस्थान के भीतर समाने लायक नहीं समझे गये थे । नक्सल धारा ने प्रगतिशीलों के इस संस्थानबाह्य खेमे के साथ रचनात्मक संवाद बनाया । नक्सल धारा से जुड़े आलोचकों के इस पहलू पर कम ध्यान दिया गया है लेकिन इसी पहलू ने इस धारा को हिंदी साहित्य की विद्रोही परम्परा के साथ इसे जोड़ा इस सम्मिलन का दबाव इतना गहरा था कि संस्थानबद्ध खेमे के भीतर भी यदा कदा इसकी मान्यताओं की झलक मिल जाया करती है । बहुत लम्बे अरसे तक इसने हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता को मुख्य स्वर बनाए रखा । आज भी इसने हिंदी साहित्य की मुख्य धारा की धारणा को वाममुखी रखा है । बहुत हद तक इसी वजह से हिंदी साहित्य और साहित्यकार का सहजबोध आज भी सत्ता के प्रतिपक्ष से परिभाषित होता है । यही कारण है कि सत्ता द्वारा तमाम कोशिशों के बावजूद कुछ पदलोभी चाटुकारों को छोड़कर हिंदी के किसी महत्वपूर्ण साहित्यकार ने दलबदल के इस मौसम में भी इसकी जरूरत नहीं समझी ।