Tuesday, July 14, 2026

क्रांतियों की दुनिया

 


2026 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से आर्तुरो चांग की किताब ‘ए न्यू वर्ल्ड आफ़ रेवोल्यूशंस: पापुलर इमैजिनेशंस ऐंड मूवमेंट्स एक्रास द अमेरिकाज’ का प्रकाशन हुआ । लेखक बचपन में आप्रवासी के बतौर अमेरिका आये थे । शिकागो में मेक्सिको के प्रवासी के रूप में बड़े हुए । उनका कहना है कि अमेरिका में पहचान स्थिर नहीं है । इसके बनने में गति, यातायात, अनुवाद और बदलावों की भूमिका रहती है । अमेरिकी शब्द ही विवादग्रस्त है तथा उसके अर्थों के बीच साझा तत्व प्रवास, बसावट, विस्थापन, लगाव और राजनीतिक दुविधा हैं । यह विशेषता उन सभी स्थानों की होती है जहां आबादियों का मुखामुखम होता है । इस किताब में इसी नजरिए से विचार करते हुए अमेरिकी पहचानों, इतिहासों और संस्कृतियों के बारे में अलग और वैकल्पिक रुख पेश किया गया है । इसमें उन लोगों, स्थानों, आचरण, राजनीति और आकांक्षा को समझने का प्रयास है जिन्हें कभी अमेरिकी गोलार्ध की परम्परा से जुड़ा समझा जाता रहा है । संस्थागत अन्याय, दबदबा, विषमता और हाशियाकरण के अनुभव पर अमेरिकी चिंतन के विभिन्न आयामों का लेखा जोखा भी इसमें प्रस्तुत किया गया है । अमेरिकी राजनीति में जो सवाल आज भी छाये रहते हैं उनको देखने के लिए घुमंतू समुदाय और स्वप्नदर्शियों का चिंतन अब भी कारगर है । राजनीतिक जीवन के टकरावों के चलते जो बदलाव आये हैं उनका भी लेखा जोखा किताब में लिया गया है । जिन क्रांतिकारी आंदोलनों का अध्ययन इस किताब के विभिन्न अध्यायों में किया गया है उनके विचार, सपने और प्रस्ताव हम तक अनुवाद और संवाद की तरह आते हैं । उनके मूल में औपनिवेशिक शासन से उपजे नाना प्रकार के अनुभव हैं ।

लेखक ने 1770 से 1850 तक के समय को क्रांतियों का युग कहा है । लोकप्रिय विद्रोह का वह समय आज भी राजनीतिक महत्व के मामले में अतुलनीय है । लगभग अस्सी साल की अवधि में समूचे अमेरिकी महाद्वीप में तीस से अधिक प्रतिरोध आंदोलन सामने आये । कनाडा से लेकर अर्जेन्टिना तक औपनिवेशिक अधीनता और उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति की परीक्षा उन्होंने साझा अनुभवों के साथ की । हैती की क्रांति के एक नेता ने मुक्ति या मृत्यु का नारा देकर औपनिवेशिक प्रभुत्व की तकलीफ को स्वर दिया तथा उत्तर औपनिवेशिक प्रतिरोध को उसकी निरंतरता में देखा । इन्हीं अनुभवों के भीतर से वह गोलार्धीय पहचान पैदा हुई जिसे अमेरिका या अमेरिकी कहा जा सकता है । यह पहचान तमाम विजय, दखल, दोहन, गुलामी, कराधान, लैंगिक अधीनता, आर्थिक असुरक्षा और जबरिया श्रम के बावजूद इस इलाके के लोगों को आपस में जोड़ती है । क्रांति के युग की समाप्ति के समय इन तमाम आंदोलनों और उत्तर औपनिवेशिक अमेरिका के सपनों के बावजूद दर्जन भर राष्ट्र राज्य पैदा हो चुके थे । इस किताब में अमेरिकी गोलार्धीय पहचानों के उदय, प्रभाव और पराभव का विश्लेषण है । इसके साथ ही उत्तर औपनिवेशिक सपनों और आंदोलनों की भी जांच परख इसमें की गयी है । इनसे मिलकर क्रांति के युग की तस्वीर बनती है ।     

नयी दुनिया के ये लोकप्रिय उभार कोई अलग थलग घटनाक्रम नहीं थे । इनका गहरा रिश्ता साम्राज्यी सत्ता, राजनीतिक अर्थशास्त्र, सांस्कृतिक उत्पादन और प्राकृतिक विज्ञान की खोजों के सामाजिक असरात से था । साम्राज्यों, शासक वर्ग और औपनिवेशिक संस्थाओं के बीच और उनके विरोध में चल रही लड़ाई की वैश्विक परिघटना का भी अंग ये आंदोलन थे । उनमें फ़्रांसिसी क्रांति, ब्रिटेन की शाही सत्ता के विरुद्ध आयरलैंड का विद्रोह, ओटोमन साम्राज्य के विरुद्ध सर्बिया की क्रांति, स्पेन की बादशाहत का अंत, ग्रीस की आजादी का आंदोलन और 1830 दशक के दौरान बेल्जियम, पोलैंड, इटली, पुर्तगाल और स्विट्ज़रलैंड के विद्रोह तथा आखिरकार 1848 की यूरोप व्यापी क्रांतियों का नाम लेखक ने लिया है । वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो इन क्रांतियों पर औद्योगिक क्रांति, अमेरिका में गुलामी की आर्थिकी, एशिया का औपनिवेशिक दोहन तथा भारत, आस्ट्रेलिया और अफ़्रीका में औपनिवेशिक शासन के विरोध की हलचलों का भी असर था । किताब के केंद्र में अमेरिकी गोलार्ध में औपनिवेशिक सत्ता से छुटकारा पाकर बनने वाली पहचानें हैं लेकिन घटनाओं के और भी व्यापक संदर्भ में इन्हें विश्लेषित किया गया है ।

समूचे अमेरिकी गोलार्ध और व्यापक दुनिया की इन लोकप्रिय क्रांतियों की साझी पहचानों, समस्याओं और अनुभवों को इसलिए भी किनारे लगा दिया गया ताकि राष्ट्र राज्य की व्यवस्था के पक्ष में समूचे इतिहास की गति दिखायी जाए । आज की तारीख में आंदोलनों या लोगों की बातचीत के मुकाबले राष्ट्र राज्यों की बात करना अधिक सहज है । क्रांतियों के जिक्र में भी देश शामिल रहता है । हैती की क्रांति, मेक्सिको का स्वाधीनता संग्राम या संयुक्त राज्य होते हुए भी अमेरिकी क्रांति का ही जिक्र होता है । इस रुख में यह मान्यता निहित रहती है कि लोकप्रिय आंदोलनों का समाहार राष्ट्र राज्य के उदय और उसके प्रभाव की मजबूती में होता है । वे सभी समुदाय जो क्रांतिकारी आंदोलन में शरीक रहते हैं, उनके दावे और टकराव भी अगर उन्हें पूरी तरह मिटा देना सम्भव न हो तो किसी न किसी राष्ट्रीय इतिहास का अंग बना दिये जाते हैं । वैसे इसमें अचरज की कोई बात नहीं । राजनीति के सिद्धांतकार इतिहासों और वृत्तांतों को राष्ट्रीय प्राधिकार, संस्थान अथवा सत्ता को वैध ठहराने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं । किसी भी क्रांति का निर्णायक काम किसी बुनियाद की ऐतिहासिक स्मृति में सुरक्षित रख लिया जाता है । इससे राज्य की उम्र बढ़ जाती है और उसमें निहित क्रांतिकारी भावना भी दीर्घजीवी हो जाती है । क्रांतियों को बुनियाद और स्मारक में ढालने की इस प्रक्रिया में क्रांतिकारी भावना संविधान की प्रस्तावना तक सीमित रह जाती है । यह प्रस्तावना राष्ट्र राज्य की आगामी विश्व व्यवस्था और उसकी नियामक क्षमता का संकेतक हो जाती है ।

हाल के दिनों में राष्ट्र राज्य की इस बुनियादी व्यवस्था के विरोधाभासों पर बहुतेरे अध्ययन हुए हैं । लोगों का कहना है कि राष्ट्र राज्य की यह बुनियाद हमेशा अधूरी रहती है और उसके प्राधिकार की वैधता में लचीलेपन की वजह से उसको हमेशा चुनौती मिलती रहती है । उसकी बुनियाद की यह समस्या बाद में लोकप्रिय सम्प्रभुता के विरोधाभासों को जन्म देती है । इसके कारण बार बार सामूहिक सहमति की आभासी धारणा का निर्माण किया जाता है और लगातार यह क्रिया दोहरानी पड़ती है । इससे राज्य निर्माण में निहित विरोधाभासों पर सवाल उठते हैं  तथा लोकप्रिय सम्प्रभुता, प्रतिनिधित्व और सहमति की धारणाओं को प्रश्नांकित भी किया जाता है ।

असल में लोकप्रिय राजनीति और संस्थाओं को राज्य के उदय के साथ जोड़ दिया जाता रहा है । लेखक का सवाल है कि अगर हम संकट के समय किये जाने वाले अनेक प्रस्तावों में राज्य को भी तात्कालिक समाधान का एक रूप मानें तो ऊपर बतायी गयी धारणाओं और निष्कर्षों में क्या बदलाव आएगा । अगर संगठन की जमीन राष्ट्र की जगह गोलार्ध हो गयी तो लोकप्रिय सम्प्रभुता, प्रतिनिधित्व और सहमति के विरोधाभास किस तरह के नजर आएंगे । प्राधिकार और संप्रभुता रहेंगे लेकिन सम्भव है औपनिवेशिक अधीनता और उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति की दिशा में अपूर्ण और अस्थायी समाधान की तरह दिखायी देंगे । लेखक का दावा है कि अगर हमें राष्ट्रों के बनने के बहुत पहले लोगों, उनके आचरण, संस्कृति और राजनीतिक टकरावों को गोलार्धीय स्तर पर देखना है तो क्रांतियों के युग के प्राथमिक परिणाम के बतौर राष्ट्र राज्य के उदय की मान्यता से मुक्त होना होगा । इसके लिए लेखक ने अलग अलग इलाकों के विभिन्न आंदोलनों के बीच संपर्क का उद्घाटन किया है । उनका कहना है कि क्रांतियों के इस युग में गोलार्धीय राजनीति का उदय हुआ था । यह बात विरोध के सांस्कृतिक रूपों से साबित होती है जिन्होंने बाद में औपचारिक प्रस्तावों पर भी असर डाला । इसका केंद्र औपनिवेशिक अधीनता के विरुद्ध अमेरिकी मोर्चा बना । कविता, नाटक, प्रयाण गीत, पत्र व्यवहार, अखबार और दृश्य कलारूपों में इनको व्यक्त किया गया । उसके बाद संविधान, घोषणा, आदेश और परिपत्र जैसे राष्ट्र निर्माण के दस्तावेजों में इनका असर दिखा । इस परिघटना के ही कारण लेखक ने जब भी अमेरिकी चिंतन, राजनीति और इतिहास का जिक्र किया है तो उसका अर्थ अमेरिका में जन्म लेने वाले या अमेरिका की मुक्ति के साथ जुड़े प्रत्येक व्यक्ति से लिया गया है ।

लेखक का कहना है कि अमेरिकी की उत्तर औपनिवेशिक लोकप्रिय राजनीति के विकास में गोलार्धीय विमर्श और सांस्कृतिक उत्पादन का भारी योगदान रहा है । जब क्रांतिकारी आंदोलन खड़े हुए और उन्होंने औपनिवेशिक प्राधिकार को चुनौती देते हुए मांगे कीं तो अमेरिकी हालात, पहचान, इतिहास और राजनीति की विशेषता का उल्लेख करने में गोलार्धीय वृत्तांत का हवाला दिया और बाद की मुक्ति का विमर्श खड़ा करने में इससे मदद मिली । उन्होंने अपना राजनीतिक सपना भी स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिहाज से बुना । इस सिलसिले में लेखक के विश्लेषण से पता चलता है कि समूचे अमेरिका में गोलार्धीय विमर्श से उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति का अर्थ समझने और समूचे इलाके के विभिन्न समूहों को संगठित करने में मदद की । इन परियोजनाओं से उभरने वाले राजनीतिक प्रस्ताव राष्ट्र राज्य के पारम्परिक मानदंड पर नहीं समझे जा सकते ।

उनका यह भी कहना है कि अमेरिका के हाशिये के समुदायों के लिए गोलार्धीय राजनीति खासकर महत्व की रही है । कारण कि वे अन्य किसी तरह के आनुवंशिक या राजनीतिक प्राधिकार से परिचित नहीं रहे । मूलवासी, मिश्रित और अश्वेत समुदाय के लोगों ने अमेरिकी मुक्ति, एकता और प्रतिरोध की वह भाषा निर्मित की जो उपनिवेशित समाजों में साझा मोर्चा बनाने की राह हमवार करे । इसी क्रम में इन समूहों ने गोलार्धीय पहचान और सामुदायिकता की धारणा तैयार की जो उनके मुताबिक नयी दुनिया की आगामी राजनीति को आकार देगी । इन विमर्शों ने क्रांतिकारी सुधारों का रास्ता खोला । जाति के आधार पर कराधान की व्यवस्था खारिज की गयी, दासप्रथा का उन्मूलन हुआ, जमीन पर मूलवासियों के अधिकार को मान्यता मिली, चढ़ावा प्रथा का खात्मा हुआ, संपत्ति का पुनर्वितरण हुआ और जनता की संप्रभुता का विस्तार हुआ । इस गोलार्धीय राजनीति ने ऐसे समन्वय की गुंजाइश भी पैदा की जिसमें गोलबंदी, प्रतिरोध और दावेदारी के संयुक्त अभियान चलाये जा सके । राजनीतिक कल्पना के धरातल पर सामासिक गोलार्धीय सपने का जन्म हुआ जिसके साथ मूलवासी इतिहास, दासता का ज्ञानकांड, पर्यावरणिक दोहन की आलोचना और गणतांत्रिक राजनीति की परम्परा फलते फूलते रहे ।

अमेरिका में गोलार्धीय चिंतन का लोकप्रिय आयाम समारोही या प्रतीकात्मक ही नहीं है । गणतांत्रिक राजनीति को अपनाने और अपने मुताबिक ढालने में गोलार्धीय विमर्श की बुनियादी भूमिका रही है । इस इलाके की राजनीति में लोकप्रियता के तत्व ने गणतांत्रिकता की कुलीन और यूरोपीय परम्परा को खारिज करते हुए उसका लोकप्रिय अमेरिकी संस्करण तैयार किया । क्रांतिकारी आंदोलनों ने एक दूसरे से अपनी कोशिशों हेतु जिस तरह वैधता पानी चाही उसी तरह उन्होंने गणतांत्रिक शासन के अनुभव भी आपस में बांटे । इसके तहत नागरिक समानता, जनता की संप्रभुता, नागरिकता और भौतिक विषमता के क्षेत्र में नये प्रयोग किये गये । इन सभी मामलों में औपनिवेशिक अधीनता की सीमाओं को पार किया गया । लेखक का कहना है कि क्रांतियों के युग में हाशिए के समुदायों ने गणतांत्रिक राजनीतिक चिंतन को आकार देने और उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । उनके इस योगदान की अक्सर उपेक्षा की जाती रही है । इस सिलसिले में लेखक ने सिमोन बोलिवार, खोसे मार्ती और ड्यु बोइस जैसे लोगों का नाम लिया है जिन्होंने साम्राज्य, नस्ल , नागरिकता और अंतर्राष्ट्रीय विकास के सवाल पर मौलिक योगदान किया । इन नामों को पढ़ते हुए हमें राहुल सांकृत्यायन, धर्मानंद कोसाम्बी और आम्बेडकर की याद आती रही जिनके अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मौलिक योगदान को रेखांकित करना बचा है । लेखक ने गोलार्धीय अमेरिकी चिंतन के लोकप्रिय और देसी आयामों को अपने विश्लेषण के केंद्र में रखा है । जिन चिंतकों का नाम उन्होंने लिया वे गणतांत्रिकता और उत्तर औपनिवेशिक राजनीति को नये तरह के राजनीतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, कलात्मक और साहित्यिक रचनात्मकता के साथ आपस में जोड़ते हैं । इन सबने गणतांत्रिक राजनीतिक चिंतन को देसी राजनीति, कैथोलिक पहचान और नस्लभेद के उन्मूलन की परम्पराओं के साथ जोड़ा । उन्होंने यूरोपीय चिंतकों, परम्पराओं और आधुनिकता के साथ संवाद बनाते हुए भी यूरोपीय वर्चस्व को सिरे से खारिज किया । शेष औपनिवेशिक दुनिया की तरह ही गोलार्धीय अमेरिकी राजनीतिक चिंतन तमाम तरह के विरोधाभासी लेनदेन से भरा हुआ है । इसके ही कारण मुक्ति के उसके प्रस्ताव बेहद आकर्षक प्रतीत होते हैं ।

लेखक के मन में सवाल है कि अमेरिकी गोलार्ध में तमाम तरह के समूहों, व्यवहारों, संस्थानों और संस्कृतियों के होते हुए गोलार्धीय विश्लेषण कैसे सम्भव है । असल में क्रांतिकारी दौर में रहने वाले लोग भारी समाजार्थिक और राजनीतिक बदलावों का अनुभव करते हैं । इनके कारण साझा अमेरिकी अनुभव और देश से लगाव का विकास हुआ । आपस में घुले मिले इन कारकों ने अमेरिका के आर्थिक और राजनीतिक आजादी की चाहत का अवसर प्रदान किया । इससे ही अमेरिकावासियों के लोकप्रिय शासन की वैधता पैदा हुई । लगे लिपटे यूरोपीय देशों के अर्थतंत्र को कायम रखने के लिए अमेरिकी उत्पादों पर निर्भरता की आलोचना का भी जन्म हुआ । अमेरिकी गोलार्ध पर यूरोप की पकड़ को किसी एक घटना से समाप्त मानने की जगह लेखक ने इसे इन सभी कारकों का संचयी प्रभाव माना है ।

सबसे पहले उन्होंने स्पेन द्वारा अपने उपनिवेशों में उत्पादन को नियमित करने की मंशा से किये आर्थिक सुधारों का जिक्र किया है जिसने स्पेनी साम्राज्य को एक ही प्रशासनिक व्यवस्था के तहत ला दिया । इसने वाणिज्य, नस्ल, धर्म, जमीन और बौद्धिक उत्पादन को नियमित करना शुरू किया । इससे स्पेन को मजबूती के साथ कमजोरी भी मिली । स्पेन दूर था और उपनिवेशों का प्रशासन एक हद तक स्वायत्त तरीके से काम करता था इसलिए इन सुधारों ने गोलार्धीय एकता को जन्म दिया । अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज भरे पड़े हैं जिनमें केंद्र तथा उपनिवेश के बीच रिश्तों का बदलाव देखा जा सकता है । इनमें जनता के संगठित होने की गोलार्धीय प्रक्रिया के भी सबूत बिखरे पड़े हैं । इन सुधारों ने जनता पर भी असर डाला था क्योंकि केंद्र और उपनिवेश के बीच दोहन का नया रिश्ता बना था । इन सुधारों ने स्थानीय कुलीनों की ताकत कम कर दी क्योंकि केंद्र ने उपनिवेशों के शासन में सीधे दखल देना शुरू किया । पहले स्थानीय कुलीनों के पास राजनीतिक नियुक्ति, जमीन की खरीद बिक्री और कानूनों की व्याख्या के मामले में बहुत ताकत थी । सुधारों ने यह ताकत बादशाह के प्रतिनिधि को दे दी । दूसरी ओर इससे चर्च, मूलवासी मुखिया और आर्थिक संघों की भी ताकत घटी । ऐसी हालत में इन स्थानीय कुलीनों ने अपने हितों की रक्षा और औपनिवेशिक शासकों के अधिकारों पर बंदिश के लिए आम लोगों के साथ संवाद शुरू किया । इन सुधारों ने राजकीय निगरानी में भी इजाफ़ा किया और उसके जरिए अमेरिकी उत्पादन का नियमन और उसका केंद्रीय स्तर पर औपनिवेशिक दोहन आरम्भ हुआ । इससे पहले स्थानीय कुलीनों के पास उपनिवेशों में श्रमिकों के वितरण का अधिकार हुआ करता था । अब यह काम बादशाह के प्रतिनिधियों के हाथ आ गया । इससे उपनिवेशों के शहरी केंद्रों की आर्थिक ताकत कम हुई । दूसरी ओर कर संग्रह की प्रक्रिया संगठित हुई और कर देने वालों की संख्या तेजी से बढ़ायी गयी । इन सुधारों का क्षेत्र मुख्य रूप से आर्थिक था लेकिन कुछ सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव भी किये गये ताकि आबादी में बादशाह के प्रति श्रद्धा बढ़े । इसके लिए शिक्षा की व्यवस्था को बादशाह के प्रति निष्ठा का माध्यम बनाया गया । स्कूल की नयी व्यवस्था में मूलवासी समुदायों को प्रजा के बतौर फिर से ढाला गया और उनमे राजभक्ति को मजबूत किया गया । धार्मिक भावना को बादशाह के प्राधिकार का समर्थक बनाया गया । शिक्षा संबंधी ये नीतियां बहुत सफल तो नहीं हुईं लेकिन औपनिवेशिक शासन की वैधता के लिए पुनर्जागरण की भाषा का उपयोग विद्वानों द्वारा चिन्हित किया गया है । शासन ने जनता के निजी जीवन में दखल देना शुरू किया और उसके लिए लोक कल्याण की शब्दावली का प्रयोग किया गया । उपनिवेशों की प्रजा के लिए पहले इस तरह की धारणा नहीं इस्तेमाल की गयी थी । तब तो बादशाह का दैवी प्राधिकार ही स्पेनी शासन का औचित्य साबित करने के लिए काफी था । जनता संबंधी सोच और उसके कल्याण की बात धारणा के स्तर पर बदलाव का संकेतक है । केंद्र और उपनिवेश के बीच दोहन और ऊंचनीच के रिश्ते में बदलाव का तो कोई सवाल ही नहीं था लेकिन जनता के कल्याण की धारणा औपनिवेशिक शासन के कई कदमों के लिए बाधक बनने लगी । स्पेनी उपनिवेशों के ये बदलाव ब्रिटिश और फ़्रांसिसी उपनिवेशों के मेल में थे ।

इन सांस्थानिक सुधारों के जरिए औपनिवेशिक सत्ता का केंद्रीकरण हुआ जिसने अमेरिका के विकास को एकीकृत किया । इसी प्रक्रिया में लेखक ने अमेरिकी पहचानों के समूहीकरण का उदय भी देखा है । गोलार्धीय विमर्श को समझने में अगर इस औपनिवेशिक अतीत को गायब कर दिया जाए तो इस विमर्श का उदय पूरी तरह संयोग के अधीन नजर आने लगेगा । गोलार्धीय चिंतन का उदय उस समय हुआ जब औपनिवेशिक नियमन के सहारे यूरोपीय ताकतें अमेरिका को फिर से जीतना चाहती थीं और अमेरिकावासी इस प्रयास की प्रतिक्रिया में सामूहिक वृत्तांत की ताकत को खड़ा कर रहे थे । इसी दौरान इन औपनिवेशिक ताकतों में युद्ध के कारण फूट पड़ी । जल्दी ही निष्ठा बादशाह की जगह जनता के प्रति पैदा होने लगी । अमेरिका में नयी दुनिया के स्वायत्त अर्थतंत्र के लाभकर होने का तर्क जोर पकड़ने लगा । औपनिवेशिक सत्ता की वैधता में कमी, अमेरिकी शहरों के उदीयमान अर्थतंत्र के महत्व और युद्ध के कारण लोगों की निष्ठा को काबू में रखने में केंद्रीय शासन की अक्षमता ने औपनिवेशिक विमर्श को जमीन दी ।     

यूरोपीय उपनिवेशक देशों की अमेरिका पर जकड़बंदी में जो ढील आयी उसे संयुक्त राज्य और हैती की क्रांतियों ने काफी तेज कर दिया था । संयुक्त राज्य के नागरिकों ने अपनी क्रांतिकारी विरासत को गणतांत्रिक अमेरिका के रूप में देखा और इसलिए लैटिन अमेरिका की आजादी के उत्साही समर्थक हो गये । यह गोलार्धीय प्रतिबद्धता अनेक स्थानों और मौकों पर जाहिर हुई । इस चेतना की मुखर अभिव्यक्ति परिपत्रों, अखबारों और नाटकों में तो हुई ही मेक्सिको की आजादी की वजह से ढेर सारी गुप्त संस्थाओं का भी निर्माण हुआ । उनकी गणतांत्रिक भाषा को लेखक ने लोकप्रिय स्तर पर विकासमान परिघटना माना है । इसकी ताकत स्पेनी भाषी अमेरिका में प्रेस की आजादी के साथ बढ़ती चली गयी ।

लेखक का यह भी कहना है कि संयुक्त राज्य में ये गोलार्धीय विमर्श भावुक देशभक्ति और राष्ट्रवाद तक ही सीमित नहीं रहे । समूचे अमेरिका में इन्होंने मेलजोल और राजनीतिक संभावना का दरवाजा खोला । उदाहरण के लिए हैती की क्रांति ने गणतांत्रिकता के साथ नस्ली मुक्ति की राजनीति को मिला दिया । लगा कि अगर अश्वेत दास समुदाय फ़्रांसिसी औपनिवेशिक शासन को मिटा सकता है तो समूचे अमेरिका में दासता को समाप्त किया जा सकता है । इसी तरह संयुक्त राज्य और मेक्सिको की सीमा पर मूलवासी पहचानों की दावेदारी के कारण मूलवासियों के इलाकों पर औपनिवेशिक कब्जे के विरोध की आवाजें भी सुनायी देने लगीं । इंका संप्रभुता की नयी धारणा को भी गोलार्धीय विमर्श में लैटिन अमेरिका के विशेष योगदान की तरह लेखक ने पेश किया है । समूचे अमेरिका में उत्तर औपनिवेशिक गणतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के साथ गोलार्धीय विमर्श ने नयी राजनीतिक कल्पना और संभावना का भी दरवाजा खोला है ।       

उन्होंने क्रांतिकारी समय की गोलार्धीय पहचान, वृत्तांत और वक्तृता के सहारे अमेरिकी राजनीतिक चिंतन की परम्परा के घटक लोगों, संदर्भों, अभिलेखों और राजनीति को सवालों के घेरे में लिया है । इसमें अमेरिकी होने की पहचान का मुद्दा भी शामिल है । सबसे पहले तो अमेरिका एक भूगोल है जिसमें यूरोपीय शासन, ज्ञान के उत्पादन और आधुनिकता वाली प्रगति की धारणा का वर्चस्व है । इन सबका मतलब है कि नयी दुनिया गणतांत्रिक संस्थाओं के लिए उपयुक्त नहीं है । इसमें यह भी निहित है कि इस इलाके के लोग अपने आप पर शासन करने लायक नहीं हैं । अमेरिका और इसकी जनता की नवीनता पर अधिक जोर इन्हीं बातों को पुष्ट करता था । इसके बाद समूचे गोलार्ध के लोगों ने कहना शुरू किया कि नयी दुनिया की गैर पारम्परिक स्थितियां उसकी ताकत हैं । इस इलाके के लोग भविष्य की संस्थाओं, राजनीति और सिद्धांतों को जन्म देंगे जो आगामी युग की विश्व राजनीति को संगठित करेंगे । इसी अर्थ में लेखक उस समय के अमेरिकी राजनीतिक चिंतन को अमेरिकी राष्ट्र राज्य की पहचानों के ठोस होने से पहले की परम्परा से जोड़ते हैं । इस चिंतन को राष्ट्र राज्य के चश्मे से देखने की जगह आलोचनात्मक निगाह से देखना सही समझ आता है । इस चिंतन को गोलार्धीय स्तर पर जोड़ने वाली चीज उत्तर औपनिवेशिक कल्पना और सपने थे । उनके ये सारे सपने तो यूरोपीय वर्चस्व की राजनीतिक, ज्ञानात्मक, आनुवंशिक और भौतिक अधीनता से परे मौजूद सुखद भविष्य की ओर ले जाने वाली परियोजना का अंग थे । खास बात कि उनकी यह आकांक्षा उन्हें अटलांटिक सागर के आरपार संवाद और विनिमय से नहीं रोकती थी । वे वैश्विक आधुनिकता में अमेरिकी योगदान को महत्वपूर्ण समझते थे । उनके इस चिंतन के उत्तर औपनिवेशिक आयाम में औपनिवेशिक सत्ता, आधुनिकता और वैश्विक ऊंचनीच की समस्या शामिल थी । प्रस्तुत किताब में यही बताया गया है कि उत्तर औपनिवेशिक आंदोलनों में यूरोप से पूरी तरह अलग होने की चाहत नहीं थी । इसकी जगह उन्होंने उत्तर औपनिवेशिक चिंतन की सामासिक प्रकृति को सही माना ।

यह सामासिक संपर्क और अमेरिका की नवीनता संबंधी संभावना गोलार्धीय विमर्श और नवीनता के आकर्षण में प्रत्यक्ष है । लैटिन अमेरिका के तमाम समुदायों ने पुनर्जागरण की भाषा से जूझते हुए उसका अपनी जरूरत के मुताबिक नया रूप बनाया और नयी दुनिया में सम्भव राजनीतिक नयेपन को वैधता देने के लिए उसका इस्तेमाल किया । यह अमेरिकी नयापन कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं था बल्कि उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति आम जनता की रुचि का विषय थी । उस समय के ये प्रयास वर्ग, नस्ल, लिंग और विधा की सीमाओं को पार कर जाते थे । आंग्लभाषी दुनिया में अमेरिकी राजनीतिक चिंतन में संयुक्त राज्य को केंद्र में रखा जाता है । इसमें मुख्य तौर पर लोकतंत्र, राष्ट्रीय विशेषता, परिणामवाद, साम्राज्यी विदेश नीति और उदारवाद पर ही बात की जाती है । इन विचारों के प्रसंग में संयुक्त राज्य के चिंतकों का ही संदर्भ दिया जाता है । इस चिंतन में राष्ट्रीय विशेषता होने के बावजूद उसे यूरोपीय आधुनिकता के विकासपरक और प्रगतिशील सपने से जोड़ दिया जाता है । संयुक्त राज्य और उसके बौद्धिक योगदान को ही आधुनिकता का स्रोत घोषित किया जाता है । कहने को तो इस चिंतन की बहुलता को स्वीकार किया जाता है लेकिन ये कथन बहुधा अस्पष्ट ही रहते हैं ।लेखक को इस चिंतन से जुड़ी बहसें इस समय खासकर प्रासंगिक लगती हैं क्योंकि समकालीन राजनीति में अमेरिकी महानता की वापसी का ढोल पीटा जा रहा है । हो सकता है अमेरिकी चिंतन की कुछ खास राजनीतिक विशेषता हो लेकिन उन्हें उजागर करने के लिए सबसे अलगाने पर इसमें एकरसता का आना तय है । इससे बचने के लिए लेखक कहते हैं कि अमेरिकी चिंतन की अपनी विशेषता को आधुनिक इतिहास के वैश्विक संदर्भ से अलगाया नहीं जा सकता लेकिन इसे संयुक्त राज्य और यूरोप के बीच लेनदेन तक सीमित कर देना भी सही नहीं होगा । अमेरिकी चिंतन की बहुलता की प्रतिष्ठा के लिए उसे राष्ट्रीय पहचानों, संस्थाओं, सीमा रेखाओं और हमेशा अस्पष्ट रह जाने वाली पश्चिम की घेरेबंदी से आजाद करना होगा ।                          

                    

                                                 

Monday, July 13, 2026

हक़ की लड़ाई का कथाकार

 

          

                             

विजेन्द्र अनिल के मरणोपरांत प्रकाशित कहानी संग्रहफर्ज़पर एकाधिक कारणों से ध्यान देना होगा । इसे उनके पुत्र सुनील श्रीवास्तव ने संपादित किया है और प्रकाशन 2026 में अभिधा प्रकाशन से हुआ है । इस कहानी संग्रह से न केवल विजेन्द्र अनिल बल्कि उस समय भोजपुर और बिहार में फूटी विद्रोही रचनात्मकता की साफ झलक मिलती है । वह समय न केवल किसान आंदोलन और संघर्ष के नये अध्याय के लिए मशहूर हुआ बल्कि उसकी ऊर्जा ने युवा साहित्यकारों की नयी जमात को जन्म दिया । इनमें विजेन्द्र अनिल भी शामिल थे । इन साहित्यकारों ने संघर्ष के चित्रण की जो नूतन प्रविधि विकसित की उसमें भाषा के नवाचार का विशेष महत्व था ।  भोजपुरी में क्रांतिकारी गीत लेखन ने उसे नयी पहचान दी थी । भोजपुरी में इस नये तरह के लेखन से अलग हिंदी लेखन को भी इस भाषिक नवीनता ने जमीनी आधार दिया और कहानियों के पात्र इस भाषा में पूरी तरह जीवंत हो उठे । जो भोजपुरी बोलने वालों के दुख और दर्द की अभिव्यक्ति का माध्यम थी वह सहसा हक और दावेदारी की लड़ाई के वर्णन का माध्यम बन गयी । ये अधिकार संविधान प्रदत्त मूल अधिकार होने के साथ मानवाधिकार भी होते थे । कहानियों की जान इन अधिकारों को हासिल करने के लिए होने वाली जुझारू लड़ाई है । यह लड़ाई ही कहानियों के पात्रों को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है । कहानियों में बी बीच में भोजपुरी के ये गीत भी आते रहते हैं । जिन गीतों की उपस्थिति है वे लोकगीत की तरह के ही संघर्ष गीत हैं । इनसे इस संघर्ष का सांस्कृतिक और रचनात्मक आयाम बनता है ।        

इस संग्रह में कुल दस कहानियां रखी गयी हैं जिनमें संग्रह की शीर्षक कहानी अंतिम है । इस कहानी में आत्मकथात्मकता की हल्की गंध है । ये सभी किसी न किसी पत्रिका में प्रकाशित हैं । कहानियों के साथ उन पत्रिकाओं का नाम और प्रकाशन का वर्ष महीना भी दे दिया गया है । इससे उस समय की महत्वपूर्ण लघु पत्रिकाओं की सूचना मिल जाती है । बिहार, उत्तर प्रदेश तथा हिंदी भाषी क्षेत्र से छपने वाली इन पत्रिकाओं का महत्व उन स्वरों को सामने लाने में निहित है जिन्हें पुरस्कार और प्रसिद्धि के बाहर और उनका प्रतिरोधी माना जाता था । इस समय के पुरस्कार बहुल वातावरण के लिए, जब प्रतिरोधी पहल का भी एक हिस्सा बिना किसी संकोच या दुविधा के वित्त पोषित नजर आता है, उस समय की कल्पना भी मुश्किल है जब समझदार पाठक मिलना ही सबसे बड़ा पुरस्कार हुआ करता था और सभाओं की जगह छोटे छोटे समूहों में रचनापाठ और उस पर खुली बातचीत ही आलोचना का सबसे प्रामाणिक रूप माना जाता था । इस लेखन और उस पर बातचीत में वैचारिक सघनता हुआ करती थी और तीखी बहसों के बावजूद कटुता नहीं पैदा होती थी । ये कहानियां उसी समय की उपज हैं जब छपने से पहले किसी भी रचना को इस कठिन अग्निपरीक्षा से गुजरना होता था ।                  

कहानियों के पात्र जिस वातावरण में अवस्थित हैं वहां उनकी सामाजिक हैसियत और आर्थिक स्थिति आपस में मिल जाते हैं । ग्रामीण इलाके के सामाजिक ढांचे में जमीन का सवाल सबसे प्रमुख है । जमीन की जरूरत खेती के लिए तो है ही, रहने के लिए भी जमीन चाहिए होती है और जब रहेंगे तो खाने के लिए अन्न उगाने हेतु जमीन ही सुलभ संसाधन होती है । जमीन के संसाधन होने से उसके साथ कामगार और मालिकाना जुड़ा होता है । अपवाद के बतौर ही कुछेक पात्र जमीन के मालिक हैं, अधिकतर उस पर काम करने वाले कामगार तबके से संबद्ध हैं । हमारे सामाजिक ढांचे से जिसका परिचय हो वह जानता है कि इसी मालिकाने के हिसाब से सामाजिक व्यवस्था भी निर्मित है । कामगार पात्रों के सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी खूबी स्त्रियों की बराबरी है । असल में मालिकों के मुकाबले कामगार तबके की स्त्रियों के लिए जीने का मतलब खेत में काम करना है । वे आर्थिक रूप से पुरुष पर निर्भर नहीं होतीं इसलिए उनमें बराबरी की मानसिकता होती है । 

स्त्रियों की तरह ही खेतिहर जीवन के साथ इन कहानियो में मुस्लिम पात्रों की बहुतायत अचरज में डालने वाली है । इन सबका जीवन खेती और जमीन के साथ जुड़े संघर्ष से बना है । जमीन का मालिकाना हमारे देश का महत्वपूर्ण तत्व है । सभी जानते हैं कि आजादी के आंदोलन में जब किसान आये तो उनके साथ ही जमींदारी का सवाल भी आया । रामविलास शर्मा का मानना है कि सबसे बड़ा जमींदार अंग्रेज था । इसका सबूत नील और अफीम जैसी नकदी फसलों की खेती के लिए अपनायी गयी व्यवस्था थी । इसके अतिरिक्त अपने शासन और शोषण की व्यवस्था को चलाते रहने के लिए अंग्रेजी राज ने देशी जमींदारों को विकसित किया और उन्हें संरक्षण भी दिया । यही कारण है कि आजादी के आंदोलन के साथ जमींदारी उन्मूलन का सवाल भी जुड़ गया था । कागज में आजादी के बाद जमींदारी खत्म भी हुई लेकिन जमीन पर मालिकाना कायम रहा । खेती के लिए जमीन के मालिक के साथ कामगार की भी जरूरत होती है । इस कामगार समुदाय की आकांक्षा के साथ संसाधनों के बंटवारे की व्यवस्था का टकराव होने से भूमि संघर्ष का जन्म होता है । यही संघर्ष सारी कहानियों का मर्म है । यह संघर्ष कामगारों को स्वतंत्र व्यक्तित्व प्रदान करता है ।

उनका यह व्यक्तित्व दबकर सहने की जगह अपने हक के लिए बोलने में व्यक्त होता है । जब भी अभिव्यक्ति की आजादी की बात होती है तो उसका अर्थ अखबार की स्वतंत्रता तक सीमित समझा जाता है । हम सभी जानते हैं कि सामाजिक ढांचे में बोलने का अधिकार भी व्यक्ति की हैसियत से तय होता है । यह अधिकार कामगारों को सबसे कम मिलता है । लेखक ने संविधान प्रदत्त इस मूल अधिकार को जमीन पर उतारने का साहस करने वालों की कथा कही है । यह भी याद रखना होगा कि हमारी वर्तमान सरकार अधिकार के मुकाबले कर्तव्य की बात पर अनायास जोर नहीं देती । यह कर्तव्य भी उसके लिए संस्थान द्वारा निभाया जाने वाला नहीं होता, बल्कि जिम्मेदारी नागरिक को दे दी जाती है कि वह कर्तव्य पालन करे । इसीलिए प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े कर्तव्य पथ की जगह सेवा तीर्थ बना दिया गया है । नागरिकों का कर्तव्य है कि वे सरकार की सेवा करें ।

उनके व्यक्तित्व का यह बदलाव बोलने की हिम्मत नक ही सीमित नहीं रहता, संगठन बनाने तक पहुंचता है । हम सभी जानते हैं कि शासक समूह अपने अधीनस्थ को काबू में रखने के लिए उनके बीच विभाजन को जन्म देता है । इसलिए हक के लिए लड़ने वाले संगठन पर जोर देते हैं ताकि उत्पीड़ितों के बीच समझ पर आधारित एकता बन सके । यह एकता अपने आपको संगठन में व्यक्त करती है । जमीन के मालिक भी अपनी प्रभुता की रक्षा के लिए संगठन का निर्माण करते हैं । वास्तव में बनी ‘भूमि सेना’ का फर्ज़ कहानी में कथात्मक प्रतिरूप ‘किसान रक्षा वाहिनी’ है । इस नाम में ही विडम्बना है क्योंकि इसमें किसान की जगह खेतों के मालिकान हैं । इसके विरोध में किसान सभा है जो गंगा के पेट से निकली जमीन पर बसने के हक के लिए संगठित हो रहे हैं । बसने का उनका यह अधिकार मानवाधिकार की श्रेणी में आता है । यह मूलभूत अधिकार भी हासिल करने के लिए उन्हें लड़ाई करनी पड़ती है ।

व्यक्तित्व का यही बदलाव रात बिरात कहानी में मुस्लिम दुकानदार के मन में दूसरे धर्म के एक यात्री के प्रति भी करुणा को जन्म देता है मनुष्य एकता का यह भावात्मक विस्तार अद्भुत है और इसका कथात्मक प्रतिनिधित्व भी ध्यातव्य है जाने पहचाने के प्रति सहानुभूति सहज मानवीय गुण है लेकिन अनजान मुसाफिर को पत्नी के साथ रात हो जाने पर घर में शरण देना अन्याय के विरुद्ध संघर्ष से उपजी चेतना का बहुत पक्का सबूत है

इस कहानी संग्रह की एक और विशेषता खेती के साथ जुड़े शब्दों का बेधड़क इस्तेमाल है इसके आधार पर ऐसे शब्दों का पूरा कोश तैयार किया जा सकता है जिनका प्रयोग आज भी गांव देहात में होता है इन शब्दों के मूल मुगल शासन द्वारा तैयार प्रशासनिक व्यवस्था का पता देते हैं जिसने हमारे देश को दुनिया के पैमाने पर सबसे अमीर देशों में एक बनाने में मदद की थी उसकी औपनिवेशिक लूट की व्यवस्था ने व्यापक किसान विक्षोभ को जन्म दिया था इसी विक्षोभ की निरंतरता इन कहानियों में भी दर्ज हुई है                      

Thursday, July 9, 2026

दक्षिणपंथ और फ़्रैंकफ़र्त स्कूल

 

2026 में वर्सो से ए जे ए वुड्स की किताब ‘द कल्चरल मार्क्सिज्म कनस्पिरेसी: ह्वाइ द राइट ब्लेम्स द फ़्रैंकफ़र्त स्कूल फ़ार द डिक्लाइन आफ़ द वेस्ट’ का प्रकाशन हुआ । 2021 के अंत में आक्सफ़ोर्ड शब्दकोष में सांस्कृतिक मार्क्सवाद को जोड़ा गया । इस शब्द का अतीत विवादित रहा था । 1930 दशक के हिटलरी प्रचार में इसके मूल खोजे जा सकते हैं । फ़ासीवादियों की एक अंग्रेजी पत्रिका में 1938 में इसका पहली बार इस्तेमाल हुआ था । इस बदनाम इतिहास के वावजूद इसकी लोकप्रियता बढ़ी है । परिसरों और सड़कों पर इसके दमन की अपील के पोस्टर लगाये गये । रिपब्लिकन पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं ने अमेरिका के पराभव के लिए इस विचार को जिम्मेदार ठहराते हुए किताबें लिखी हैं । इसी तरह लैटिन अमेरिका के दक्षिणपंथी शासकों ने अपनी सरकार को इस वामपंथी बीमारी से दूर रखने का इरादा जाहिर किया । ब्रिटेन में भी कनजर्वेटिव पार्टी के सांसद इस विचार पर युवकों का दिमाग खराब करने का आरोप लगाते हैं । ट्रम्प समर्थक एलन मस्क ने भी इस सिलसिले में विकिपीडिया के एक लेख में इसे झूठ मूठ का हौवा बताये जाने पर चिंता जाहिर की । धीरे धीरे यह शब्द दक्षिणपंथ की शब्दावली में जगह बनाता जा रहा है । हमारे देश से तुलना करें तो इस तरह का शब्द अर्बन नक्सल या टुकड़े टुकड़े गैंग है । इस शब्द के जरिए दक्षिणपंथ बताना चाहता है कि पश्चिमी समाजों की संस्कृति विगत साठ सालों में क्यों बदली ।

उनका कहना है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल नामक जर्मन विचारकों के एक समूह ने पश्चिमी सभ्यता के अवसान को तेज गति प्रदान करने के लिए सांस्कृतिक बहुलता, नारीवाद और पर्यावरण की विचारधाराओं का आविष्कार किया । असल में हिटलरी आतंक से भागकर अमेरिका आये अडोर्नो और मार्क्यूज जैसे चिंतकों ने वहां के साठ दशक के विद्रोही आंदोलनों में अपने विचार सफलता के साथ फैलाये । बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उनके समर्थक विभिन्न संस्थानों में दाखिल हुए और उन्होंने शिक्षा, मीडिया, सरकार और चर्च में सांस्कृतिक मार्क्सवाद को प्रोत्साहित किया । हाल में दक्षिणपंथी विचारक अश्वेत आंदोलन, समलिंगी और भिन्न यौनिकता वाले समूहों की मजबूत दावेदारी तथा जलवायु संकट पर चर्चा के पीछे इसको ही दोषी ठहराया है । अमेरिका के अतिरिक्त भी बहुत सारे देशों में इस खतरे से समाज को बचाने के लिए रूढ़िवादी ताकतें सांस्कृतिक युद्ध ठाने हुए हैं ।

इसके बाद लेखक ने इन दोनों शब्दों के अर्थ जानने का प्रयास किया है । रूढ़िवादी आलोचकों को लगता है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल ने 1930 दशक में कम्युनिस्ट विध्वंस की नयी रणनीति बनायी । मजदूरों की कोई अगुआ कम्युनिस्ट पार्टी बनाने या कारखानों पर सीधे कब्जा करने की जगह उन्होंने पश्चिमी पूंजीवाद के उन्मूलन के लिए बुर्जुआ समाज के सांस्कृतिक औजारों में घुसपैठ की योजना बनायी । इन केंद्रों पर काबिज हो जाने के बाद सांस्कृतिक मार्क्सवादियों ने विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों की मांगों को स्वर देना शुरू किया और इस तरह गोरी बहुसंख्या की सभ्यतागत विरासत को तहस नहस कर डाला । आरोप है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के इन विद्रोहियों को यकीन था कि पश्चिमी संस्कृति के विनाश से मार्क्सवादी समता का सपना साकार होगा । इस दक्षिणपंथी धारणा के मुताबिक संस्कृति तो देसी आबादी के मूल्यों को ही प्रतिबिम्बित करती है । इन्हीं मूल्यों के धागे से किसी भी देश के नागरिक तमाम शत्रुता और मतभिन्नता के बावजूद आपस में जुड़े बताये जाते हैं । संस्कृति के बारे में इस धारणा से लेकिन 1960 दशक के बाद के सामाजिक बदलावों की सटीक व्याख्या नहीं मिल पाती । कारण कि अल्पसंख्यकों की अधीनता को इसमें स्वाभाविक माना जाता है । ऐसी स्थिति में रूढ़िवादी लोग मानते हैं कि पश्चिम के विनाश के लिए किसी बाहरी शक्ति ने सांस्कृतिक उत्पादन के घटकों पर कब्जा कर लिया है । अपनी रक्षा के लिए सांस्कृतिक मार्क्सवाद के ये विरोधी सार्वजनिक जीवन से सांस्कृतिक चेतना के रेशे रेशे को समाप्त करने के लिए कानून बनवाते हैं, जीवनशैली में बदलाव की वकालत करते हैं या फिर हिंसा का सहारा लेते हैं । वे फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के समर्थकों पर ऐसी जादुई शक्ति आरोपित करते हैं जो सभी किस्म के अंतर्विरोधों और विपरीत दिशा में सक्रिय ताकतों पर काबू पा लेती है ।

इसमें तो कोई दो राय नहीं कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल का महत्व ऐतिहासिक रहा है । 1923 में इसकी स्थापना मार्क्सवादी बौद्धिकता को सांस्थानिक आधार देने के लिए हुई थी । इस संस्थान के चिंतकों ने हेगेलीय दर्शन, मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र और फ़्रायड के मनोविश्लेषण को जोड़कर सामाजिक आलोचना का रास्ता निकाला जिसे आलोचना सिद्धांत कहा गया । उनके लेखन से आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता की प्रकृति, फ़ासीवादी प्रचार की गतिकी तथा कला और संस्कृति के वस्तूकरण के बारे में अंतर्दृष्टि मिलती है ।

इस समूह के अनेक सदस्य तीस के दशक में हिटलरी शासन के चलते भागे और उन्हें अमेरिका में शरण मिली तथा शोध व अध्यापन का रोजगार भी मिला । 1960 के दशक में मार्क्यूज ने विद्यार्थी आंदोलन का उत्साह के साथ समर्थन किया और उन्हें नव वाम का गुरू भी कहा गया । फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के कुछ विद्यार्थी अध्यापन में भी बहुत सफल रहे । कुछ तो वामपंथ के महत्वपूर्ण कार्यकर्ता हुए । आज भी उनके लेखन की लोकप्रियता बरकरार है । उनकी किताबों के नये संस्करण छपते और पढ़े जाते हैं । यह किताब इस समूची प्रक्रिया के बहुत सीमित अंश का विश्लेषण करती है । इसमें केवल उनके तर्कों का ही जिक्र है जो मानते हैं कि पश्चिम के सभ्यतागत पराभव की जिम्मेदारी फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के सांस्कृतिक मार्क्सवाद पर है । इसमें कुछ सांस्कृतिक गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास है । पहली कि सांस्कृतिक पराभव को जर्मन मार्क्सवादियों के इस समूह से जोड़ने की कहानी क्यों बनायी गयी । प्रतिक्रियावादी ताकतों को आज भी इस कहानी में यकीन क्यों है । सांस्कृतिक मार्क्सवाद को षड़यंत्र की तरह देखने का चलन किस तरह आगे बढ़ा ।

अन्य विद्वानों ने भी इन सवालों का जवाब देने की कोशिश की है । उनका कहना है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद का यह हौवा पुराने यहूदी मार्क्सवाद या बोल्शेविक सांस्कृतिक हमले के हौवे का ही नया रूप है । एक जमाने में यह भी माना जाता था कि कम्युनिस्ट विचारधारा यहूदियों का षड़यंत्र है । इसके विश्वासी लोगों का कहना था कि रूस और अन्य देशों की कम्युनिस्ट क्रांतियों का असली मकसद ईसाइयत को पश्चिम से उखाड़ फेंकना है । द्वितीय विश्वयुद्ध के आसपास सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले का प्रचार हिटलर का तंत्र करता था । कहा जाता था कि यहूदी लोग पश्चिमी संस्कृति को नष्ट करने की गुपचुप कोशिश कर रहे हैं और कम्युनिस्ट आंदोलन को इसी उद्देश्य से खड़ा किया गया है । इस धारणा के स्रोत हिटलर की किताब में नस्ल और संस्कृति के बारे में व्यक्त विचार थे । एक हिटलरी सिद्धांतकार ने तो नस्ली सौंदर्यशास्त्र की धारणा भी बनायी थी । वे आधुनिकतावाद को पतनशील कला कहते थे और मानते थे कि यहूदी कम्युनिस्ट चालबाजी के तहत इसे फैलाया जा रहा है ।

यह तो सही है कि इन पुराने विचारों और सांस्कृतिक मार्क्सवाद के हल्ले के बीच बहुत सारी समानता है । 1938 में ही ब्रिटेन के फ़ासिस्टों ने सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले को सांस्कृतिक मार्क्सवाद कहा था । उनके द्वारा दिये गये इस नाम को लोग भूल गये थे । वह तो इसे फिर से 1990 दशक के पूर्वार्ध में यह नाम दिया गया । वर्तमान दक्षिणपंथी कार्यकर्ता और लेखक इस बात पर जोर देते हैं कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के अनेक सदस्य यहूदी थे । इस तरह वे कहना चाहते हैं कि सांस्कृतिक पतन की दिशा में सोचना उनके लिए आनुवंशिक तौर पर सहज था । इंटरनेट पर फ़ासीवादी कोश में भी सांस्कृतिक मार्क्सवाद और सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले को समानार्थी बताया गया है ।

इन सबके बावजूद लेखक को लगता है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद की इस नयी धारणा और पुरानी समानार्थक धारणाओं में अंतर है । इनको समान समझने के पीछे मान्यता है कि इनकी अंतर्वस्तु इनकी अभिव्यक्तियों की भिन्नता के बावजूद एक समान ही बनी हुई है । इस मान्यता में विचारों की खासियत की उपेक्षा नजर आती है और मान लिया जाता है कि समस्त दक्षिणपंथी राजनीति बुनियादी तौर पर एक समान ही होती है । लेखक मानते हैं कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद की शब्दावली और फ़्रैंकफ़र्त स्कूल को षड़यंत्र की तरह देखने का एक और भी इतिहास है । इसके बाद यह शब्दावली और धारणा हिटलरी शब्दकोष में घुसी और बोल्शेविक सांस्कृतिक हमले का समानार्थी बनी । इस जटिल कहानी पर ध्यान देने की जरूरत लेखक को महसूस होती है । इसके बिना सांस्कृतिक मार्क्सवाद को षड़यंत्र के रूप में पेश करने का इतिहास अच्छी तरह समझना मुश्किल है ।

इस इतिहास में गोता लगाने से पहले वे अपनी शब्दावली पर गौर करना जरूरी समझते हैं । इसके तहत वे षड़यंत्र सिद्धांत की धारणा की चीरफाड़ करते हैं । इसके लिए वे फ़ूको से विश्लेषण के औजार लेते हैं । उनका कहना है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद का अर्थ प्रयोग के राजनीतिक संदर्भ के अनुसार बदलता रहा है । इसलिए किसी एक सांस्कृतिक मार्क्सवाद की जगह अनेक सांस्कृतिक मार्क्सवादों की बात करनी होगी । उसके बदलते अर्थों को संदर्भ देते हुए इसका इतिहास बनाने की कोशिश इस किताब में की जाएगी । उसे षड़यंत्र सिद्धांत के बतौर प्रस्तुत करना सबसे नया मामला है । अलग अलग राजनीतिक संदर्भों में इसके अर्थ, भूमिका और उपयोग बदलते रहे हैं । इस नजरिए से यह समझने में मदद मिलेगी कि दक्षिणपंथी लेखक और कार्यकर्ता नये श्रोताओं के मुताबिक और नयी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए इसके अर्थ को अनुकूलित करते रहे हैं ।

सही संदर्भ प्रदान करने की इस पद्धति में लेखक ने समय का विशेष ध्यान रखा है । विश्लेषण की इस पद्धति की प्रेरणा उन्हें ग्राम्शी से मिली है । ग्राम्शी ने किसी खास ऐतिहासिक दौर में राजनीति, संस्कृति और अर्थतंत्र के जटिल रिश्तों को पहचानने लायक मार्क्सवादी विश्लेषण का तरीका विकसित किया । पूंजीवादी उत्पादन पद्धति जैसी मार्क्स की अनेक धारणाओं को भी इसी तरह का अमूर्तन समझा जा सकता है जो पूंजीवादी समाज के बुनियादी लक्षणों को उजागर करते हैं । इस विश्लेषण के तहत पूंजीवादी विकास के खास दौर में किसी भी समाज के हालात की परीक्षा की जाती है । यह ऐसा क्षण होता है जब विभिन्न तरह की ताकतें या घटक आपस में मिलकर उस भूमि का निर्माण करते हैं जिस पर वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष संचालित किया जाता है । इस विश्लेषण में ग्राम्शी आंगिक और सामयिक के बीच भेद करते हैं ।

आंगिक किसी भी सामाजिक गठन के अपेक्षाकृत स्थायी लक्षण होते हैं । आंगिक तथ्य वे संबंध होते हैं जो किसी भी समाज के दैनन्दिन जीवन में समा गये होते हैं । इसके उदाहरण श्रम संबंध, आर्थिक ढांचा, सरकारी संस्थान, सांस्कृतिक व्यवहार और कानूनी प्रक्रिया हैं । राजनीतिक उथल पुथल या बाजार के उतार चढ़ाव से इन तत्वों पर बहुत असर नहीं पड़ता । सामान्य तरीके से कहें तो आंगिक का अर्थ यथास्थिति भी निकलता है । जब इस यथास्थिति को संकट का सामना करना पड़ता है तो संघर्ष का सामयिक इलाका खुल जाता है । आंगिक संकट पूंजीवादी विकास के अंतर्निहित शत्रुतापूर्ण संबंधों की उग्रतर अभिव्यक्ति होते हैं । इसमें सामान्यता बाधित हो जाती है, पहले से चले आ रहे तौर तरीकों को चुनौती का सामना करना पड़ता है और पारम्परिक सहजबोध गड़बड़ा जाता है । इस आंगिक संकट से निपटने और यथास्थिति के संरक्षण के लिए प्रभुत्वशील ताकतें संघर्ष के सामयिक क्षेत्र में उतरती हैं । सामाजिक समस्याओं को काबू करने के लिए वे नयी नीतियों का प्रस्ताव कर सकते हैं, विक्षोभ से निपटने के लिए पुलिस की शक्तियों को बढ़ा सकते हैं या बजट के घाटे को कम करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में कटौती की घोषणा कर सकते हैं । संतुलन हासिल करने के लिए वे अन्य समूहों से समझौता कर सकते या मोर्चा बना सकते हैं । ऐसी स्थिति में वैकल्पिक या विपक्षी राजनीति करने वालों को जनता के सामने संकट का अपना समाधान प्रस्तुत करना चाहिए । इन प्रयासों की सफलता का मूल्यांकन सबको कायल करने की और सामाजिक शक्तियों के मौजूदा संतुलन को बदलने की उनकी क्षमता के आधार पर किया जा सकता है । नया शक्ति संतुलन स्थापित करने या वर्चस्व की नयी व्यवस्था कायम करने के ये सामयिक प्रयास उथल पुथल की जगह सामाजिक स्थिरता कायम करने की ओर लक्षित होते हैं ।

लेखक का सवाल है कि सांस्कृतिक मार्क्सवादों के अध्ययन में विश्लेषण की इस पद्धति का इस्तेमाल किस तरह किया जाए । वे सबसे पहले याद दिलाते हैं कि यह धारणा किसी के दिमाग में यूं ही नहीं पैदा हो जाती । इसका जन्म सामयिक संघर्ष की गरमी में होता है । खास राजनीतिक ताकतों के वैचारिक मकसद को पूरा करने के लिए इनका निर्माण किया जाता है । आम लोगों को संकट के कारण से अवगत कराना होता है और बेहतर समाज के किसी खास नमूने के पक्ष में उनका समर्थन हासिल करना होता है । सामयिक विश्लेषण से वह भूमि स्पष्ट होती है जहां ये ताकतें पैदा और गोलबंद होती हैं । इस विश्लेषण से नजर आ सकता है कि कोई खास ताकत क्यों अलग किस्म की राजनीति करती है और क्यों कुछ ही समस्याओं को उठाने का फैसला करती है । किताब में ऐसा कोई अंतिम विश्लेषण मुहैया कराने का दावा लेखक ने नहीं किया है । इस दिशा में सोचने और लिखने के लिए तो एकाधिक लोगों के सामूहिक प्रयास की जरूरत होगी । कोई भी एक लेखक उन तमाम ताकतों, दबावों, प्रवृत्तियों, तनावों, शत्रुताओं और अंतर्विरोधों को पकड़ नहीं सकता जिनसे मिलकर कोई भी खास समय बनता है । सामयिक विश्लेषण की दीर्घकालीन परम्परा पर आश्रित रहने के बावजूद लेखक को अपना विश्लेषण आंशिक और तदर्थ ही लगता है । इसके जरिए उन्होंने देखा है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद के विचारों का उत्पादन और प्रसार कैसे सम्भव हुआ । इसके लिए उन्होंने काल और भूगोल की सीमा पहले ही तय कर ली है । उन्हें उम्मीद है कि अन्य लोग इसे विस्तार और गहराई प्रदान करेंगे । इसी क्रम में लेखक द्वारा प्रस्तुत तर्कों और व्याख्याओं को भी आगे ले जाया जाएगा । वैसे भी इस सांस्कृतिक मार्क्सवाद की कहानी का अभी अंत नहीं हुआ है ।

उन्होंने पहले ही कहा कि बोल्शेविक सांस्कृतिक हमले और सांस्कृतिक मार्क्सवाद में समानता तो है लेकिन कहानी की शुरुआत 1920 या 1930 दशक से नहीं होती । विश्लेषण हेतु वे 1960 दशक से इसकी शुरुआत मानते हैं । इसकी समझ के लिए साठ के दशक के तमाम तरह के बदलावों और संयोजनों को देखना वे जरूरी समझते हैं । उस दशक को वे मई 1968 तक ही सीमित नहीं मानते । वे मानते हैं कि यह दशक 1955 से 1974 तक फैला हुआ है और इसका विस्तार वैश्विक था । इस लम्बे दशक ने क्रांति, विक्षोभ और प्रतिसंस्कृति की सम्भावना को जन्म दिया । इसी दशक में सामाजिक और नस्ली ऊंचनीच की व्यवस्था की रक्षा, विध्वंसक ऊर्जा को नियंत्रित करने तथा दमन और शोषण की पद्धतियों को बरकरार रखने के लिए राजनीतिक ताकत का भी बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ । साठ का दशक ऐसा वैश्विक खरल था जिसमें नस्ल, लिंग, वर्ग, यौनिकता और पीढ़ी के मसले पर राजनीतिक और सामाजिक विरोध के साथ ही तकनीक के नये रूप, सूचना और संचार क्रांति तथा व्यावसायिक बाजार का फैलाव भी मिल गया था । जेमेसन तो साठ के दशक का मूल उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों तक ले जाते हैं । दक्षिणी गोलार्ध की इन घटनाओं ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था में उलट फेर को जन्म दिया । अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के क्रांतिकारी दुनिया भर के साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी आंदोलनों की सफलता से प्रेरणा ले रहे थे । फ़ैनन, माओ और चे की किताबें उनको दिशा दिखा रही थीं । अमेरिका के नव वामपंथी युवक वियतनाम, कम्बोडिया और लाओस में अपनी ही सरकार के सैन्य हस्तक्षेप का विरोध कर रहे थे । साठ दशक के विद्रोह की इसी वैश्विकता ने हाशिए पर डाल दिये गये और अल्पसंख्यक बना दिये गये समूहों में इस उम्मीद को जन्म दिया कि वे इस विश्वव्यापी क्रांति की अबाध प्रगति के अग्रिम मोर्चे पर खड़े हो सकते हैं । पश्चिमी सभ्यता की अजेय श्रेष्ठता का पराभव सन्निकट लगने लगा था ।

इसी साठ के दशक में नस्ल, लिंग और यौनिकता की नयी सामाजिक और राजनीतिक कोटियों को भी लोकप्रियता मिली । वर्ग संघर्ष आधारित पुराने रूपों का जुझारूपन मंद पड़ने लगा था । अमेरिका में शीतयुद्ध के समय बनी कम्युनिस्ट विरोधी सर्वसम्मति ने ट्रेड यूनियन आंदोलन की वैधता को चुनौती दी । सोवियत खेमे के कुछेक देशों में रूसी दबदबे का विरोध प्रकट हुआ । राजनीति के नये तरीके सामने आये । नारीवाद की दूसरी लहर ने निजी के राजनीतिक होने का नारा दिया । उसने निजी अनुभवों तथा दमन के व्यापक ढांचों में सम्पर्क देखने पर जोर दिया । अश्वेत सत्ता और स्त्री तथा समलैंगिक मुक्ति के आंदोलनों ने पहचान की राजनीति की शुरुआत की । इस राजनीति ने मौजूदा व्यवस्था की आलोचना के साथ आगामी मुक्ति के सपने को जोड़ा । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवादी समाजों में व्याप्त सामाजिक बहिष्करण, अधीनता और अवरोधों से निर्मित यथास्थिति को इन्होंने उजागर कर दिया । अमेरिकी शिक्षा में स्त्री अध्ययन, अश्वेत अध्ययन और मूलवासी अध्ययन हेतु इन आंदोलनों ने लड़ाई लड़ी । ज्ञान के नये रूपों के विकास हेतु नस्ली, यौनिक और लैंगिक पहचानों को आधार बनाया जाने लगा । माना गया कि इससे सत्ता और दमन के विविध आयामों को देखने में भी मदद मिलेगी । साठ के दशक के बाद से अनेक देशों में स्त्रियों, नस्ली अल्पसंख्यकों और विभिन्न यौनिक समूहों ने बहुत सारे नागरिक अधिकार अर्जित किये और सामाजिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभायी । समता और समावेशन के ये रूप आंशिक और अंतर्विरोधी थे फिर भी इनसे सामाजिक जीवन में उदारता आयी और ऊंचनीच की पुरानी व्यवस्था में थोड़ी ढिलाई आयी ।

उस समय संस्कृति की धारणा भी बदली । बीसवीं सदी के मध्य में बहुत सारे विकसित देश औद्योगिक उत्पादन की जगह सेवा और सूचना आधारित समाजों में बदले । इसे उत्तर औद्योगिक अर्थतंत्र कहा गया और इसमें संस्कृति की पहुंच दैनन्दिन तक प्रसारित हो गयी । फ़िल्म, टेलीविजन, संगीत, फ़ैशन, विज्ञापन, अखबार और पत्रिका ने सबके अस्तित्व को प्रभावित करना शुरू किया और उनकी ताकत में बेतरह इजाफ़ा हुआ । किशोर और युवक इस नयी और उत्तेजक युवा संस्कृति के उपभोक्ता बने । इस नयी संस्कृति ने बोलने, पहनने और व्यवहार की पारम्परिक आदतों को भी बदल दिया । मानविकी और समाज विज्ञान के विद्वान भी इस सांस्कृतिक मोड़ पर विचार करने लगे । पूंजीवादी समाजों में सांस्कृतिक उत्पादन और उपभोग पर केंद्रित संस्कृति अध्ययन में ग्राम्शी के सिद्धांतों का उपयोग शुरू हुआ । पहले जहां समझा जाता था कि मास संस्कृति लोगों को निष्क्रिय उपभोक्ताओं में बदल रही है उसकी जगह नये सिद्धांतकारों ने लोकप्रिय संस्कृति को राजनीतिक संघर्ष के औजार के रूप में देखना शुरू किया । इन बौद्धिकों ने मास्को से नजदीकी समाप्त करके सांस्कृतिक राजनीति का व्यापक और लोकप्रिय रूप विकसित करने के लिए अन्य आंदोलनों के साथ संवाद शुरू किया । साठ दशक के बाद से सांस्कृतिक सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में अधिकाधिक आते गये ।

साठ के दशक को उदार सहमति और युवा विद्रोह तक सीमित करना सही नहीं होगा । दक्षिणपंथी तख्तापलट और नव औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों से लेकर पुलिस दमन और राजकीय निगरानी तक साठ का दशक सत्ता और विशेषाधिकार के संरक्षण हेतु असाधारण ताकत के इस्तेमाल का भी दशक था । उसी समय तमाम दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक आंदोलन उभरे जिनका मकसद पश्चिमी सभ्यता की मौजूदा ऊंचनीच की रक्षा करना था । इन ताकतों को ऐसे बौद्धिकों की जरूरत थी जो तथाकथित सांस्कृतिक पतन के कारण बता सकें, समर्थकों को सुसंगत राजनीतिक पहचान हेतु गोलबंद कर सकें और रूढ़िवादी पुनरुत्थान के सपने परोस सकें । साठ के दशक में जो भी सामाजिक बदलाव शुरू हुए उनका प्रतिरोध करने और उन्हें पलट देने की कोशिश से सांस्कृतिक मार्क्सवाद के हौवे का गहरा नाता है । लेखक समझना चाहते हैं कि ये बौद्धिक राजनीतिक आंदोलनों के साथ किस तरह का रिश्ता रखते हैं । उनकी भूमिका की छानबीन के सिलसिले में लेखक को बुद्धिजीवियों के बारे में ग्राम्शी की धारणा उपयोगी प्रतीत होती है ।

ग्राम्शी के लेखन में बुद्धिजीवियों की धारणा का खास महत्व है । वे इस धारणा को विख्यात बुद्धिजीवियों के परे ले जाना चाहते थे । वे इसकी अमूर्त धारणा की जगह देखना चाहते थे कि खास किस्म के बौद्धिकों का निर्माण ऐतिहासिक तौर से कैसे हुआ है और उनकी राजनीतिक भूमिका क्या होती है । ग्राम्शी का यह रुख विश्लेषणात्मक है जो समझता है कि बुद्धिजीवियों के विभिन्न समूहों की वास्तविक राजनीतिक चेतना और गतिविधियों को आकार देने वाले हालात और प्रक्रियाएं कौन सी हैं । उन्होंने शुरू करने के लिए तात्कालिक, प्रत्यक्ष और जीवंत को चुना, व्यापक ऐतिहासिक परिघटना को समझने के लिए सामाजिक आचरण और भौतिक परिस्थिति की छानबीन की । बुद्धिजीवियों की बात करते हुए बहुधा उन्होंने ठोस भौतिक यथार्थ के महत्व पर जोर दिया । उनका कहना था कि बौद्धिक समूह का निर्माण अमूर्त लोकतंत्र की भूमि पर नहीं होता बल्कि एकदम ठोस पारम्परिक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के अनुसार इसका निर्माण होता है । ग्राम्शी की इसी समझ के अनुरूप लेखक ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद का हौवा खड़ा करने वालों की शिनाख्त की है । ये सभी लोग उस वैचारिक संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल हैं जो सामाजिक वर्गों, राजनीतिक ताकतों और अधिरचना के संस्थानों के खास किस्म के संबंध से पैदा होता है । सांस्कृतिक मार्क्सवाद के बारे में प्रत्येक कथन को इसी संदर्भ में देखना होगा ।     

इस किताब में लेखक ने किसी धारणा की उत्पत्ति से लेकर उसमें आये बदलावों का एकरेखीय इतिहास उकेरने की जगह पर सांस्कृतिक मार्क्सवाद की बहुलता को देखने का प्रयास किया है । इस यात्रा में उन्होंने इधर उधर का भी रास्ता लिया है और निरंतरता को भंग भी किया है । इसमें उस इतिहास को सुलझाया गया है जिसका एक सिरा महत्वोन्मादी नेता से उलझा है तो दूसरे सिरे पर रूढ़िवादी चिंतको का कोई समूह है । कभी इसके निशान किसी ईसाई दक्षिणपंथी दस्तावेजी फ़िल्म में मिल गये । सांस्कृतिक मार्क्सवाद की यह कहानी दुनिया भर की प्रतिक्रियावादी राजनीतिक शक्तियों द्वारा बार बार सुनायी गयी ताकि समता, लोकतंत्र और न्याय के विरोध को सही ठहराने के नये नये तरीके तलाशे जा सकें । अगर व्यक्तियों की बीमार मानसिकता में ही इसके स्रोत देखेंगे तो कभी हम इसे समझ नहीं सकते । इसे समझने के लिए हमें संस्थानों को देखना होगा । इसके विश्लेषण हेतु सामयिकता का रुख अपनाना होगा और इसे ढांचागत तर्क समझने होंगे । ग्राम्शी ने कहा था कि किसी व्यक्ति के दिमाग में विचार और मत अपने आप नहीं पैदा होते । उसे मौजूदा यथार्थ का राजनीतिक स्वरूप देने वाले कुछ केंद्र होते हैं । इस किताब में भी व्यक्तियों के दिमाग की जगह इन्हीं केंद्रों की छानबीन की गयी है ।

किताब में सांस्कृतिक मार्क्सवाद के दावे से इनकार नहीं किया गया है । कुछ बातें तो सही हैं भी । मार्क्यूज ने कहा था ही कि साठ के दशक के बाद नव वाम की रणनीति संस्थाओं के जरिए दीर्घकाल तक बने रहने की होनी चाहिए । दिक्कत यह है कि इन तथ्यों का उपयोग फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के प्रभाव को बताने या मौजूदा सामाजिक यथार्थ को स्पष्ट करने के लिए नहीं किया गया है । इनका तो उपयोग राजनीतिक गोलबंदी के लिए किया जा रहा है जिसका मकसद कुछेक वंचित समूहों की बेदखली है । लड़ाई फ़्रैंकफ़र्त स्कूल की विरासत को लेकर है ही नहीं । संघर्ष तो रहने लायक दुनिया के स्वरूप के निर्धारण को लेकर हो रहा है । इधर दक्षिणपंथ ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद पर हल्ला बोल दिया है । इस युद्ध में शामिल प्रतिक्रियावादियों की ताकत और कमजोरी की हमारी समझ पर ही इस हमले के प्रतिरोध और बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष की उम्मीद टिकी हुई है ।       


Wednesday, July 1, 2026

आवारा पशु, किसान और सरकार

 

                 

                                             

हमारे देश में खेती के साथ जानवरों का बहुत गहरा रिश्ता है । खेती का काम करने के दौरान किसान के सादा और मेहनत से भरे जीवन में ये जानवर हमेशा मौजूद रहते हैं । खेत से अन्न उपजाने के लिए उसको बीज बोने लायक बनाने के लिए हल खींचने से लेकर फसल के लिए जैविक खाद मुहैया कराने तक इन जानवरों की उपयोगिता भी अनेक किस्म की होती है । इसलिए किसान का इन जानवरों के साथ घरेलू रिश्ता भी बन जाता है । भारतीय साहित्य का बड़ा हिस्सा उनकी इस आपसदारी की गवाही देता है ।

इसमें बुनियादी व्यवधान अंग्रेजी राज के दौरान आया गोरे सैनिकों के लिए फौजी छावनियों में बूचड़खाने खोले गये । कहने की जरूरत नहीं कि बूचड़ अंग्रेजी के बुचर से आया है । गोरे सैनिकों को ठंडे वातावरण में मांस की जरूरत पड़ती रही थी । भारत में भी आहार की उनकी यह आदत बनी रही इसलिए खेती के लिए जरूरी पशुओं का मांस उन्हें दिया जाने लगा । इसका नतीजा यह हुआ कि किसानों को खेती हेतु पशुओं और उनके दूध से मिलने वाले पोषण की कमी महसूस होने लगी । इसी पृष्ठभूमि में हम उस समय आजादी के आंदोलन में गोहत्या के सवाल को महत्वपूर्ण सवाल के बतौर उठता देखते हैं । अंग्रेजी राज भी इसके प्रति संवेदनशील था । उनके लिए इसका एक पहलू सकारात्मक था क्योंकि इस सवाल पर धार्मिक विभाजन तो पैदा किया ही जा सकता था इसलिए उन्होंने इस सवाल को जिंदा रखा । इसके कारण इस मुद्दे में उपनिवेश विरोध का तत्व भी आ जाता है । लेकिन हमारे देश में दुधारू पशुओं का मांस खाने की परम्परा केवल इस्लाम में कुर्बानी के साथ नहीं जुड़ी है । बहुत बड़े क्षेत्र में यह पोषण के लिए आवश्यक प्रोटीन का सस्ता और सुलभ स्रोत भी है । देश की हिंदू आबादी के भी साधनहीन हिस्से में इसके आहार की परम्परा रही है । इसके अतिरिक्त चमड़े का समूचा व्यवसाय पशुओं की खाल पर टिका हुआ है । चमड़े का उपयोग जूता, बेल्ट, पर्स, तमाम अन्य वस्तुओं और संगीत के ढेर सारे वाद्ययंत्रों के बनाने में होता है । इसके अतिरिक्त उनके रक्त का इस्तेमाल विटामिन की गोलियों के निर्माण में भी होता है और पशु चिकित्सक होने के नाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं । 

पशुओं के इस दोहरे किस्म के उपयोग के कारण सरकार की ओर से हमेशा ऐसी नीति की जरूरत रही जिसमें उसके यथोचित संरक्षण के साथ ही उसके औद्योगिक उपयोग की भी सम्भावना बनी रहे । आजादी के बाद के विषाक्त सांप्रदायिक वातावरण में जिन ताकतों ने गांधी की हत्या की उन्होंने ही गोरक्षा के सवाल को राजनीतिक गोलबंदी का साधन बनाया और इसके लिए संसद के सामने हिंसक प्रदर्शन भी किया गया । बहरहाल इस सिलसिले में गांधी का नाम हमने अनावश्यक नहीं लिया । उन्होंने 1910 में ही इसके सांप्रदायिक तत्व को समझ लिया था और सीधे कहा कि आदमी के जान की कीमत उनके लिए गाय से अधिक है ।

उनकी हत्या के बाद न केवल इस मसले पर सांप्रदायिक अभियान को धक्का लगा बल्कि गाय के सवाल पर उनकी राय ही सर्वसम्मति की तरह बनी रही । खेती और चमड़े के व्यावसायिक कारोबार के बीच संतुलन वाली नीति अपनाने के कारण किसान पर बीमार पशु को पालने का बोझ भी नहीं रहता था । इस शांतिपूर्ण माहौल में व्यवधान तब आया जब गांधी के हत्यारों को सरकार पर काबिज होने का मौका मिला । उसके बाद से इस मामले को हिंसक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का अस्त्र बना लिया गया । लेकिन इसमें भी पाखंड और झूठ पर्याप्त फैलाया जा रहा है । एक ओर गाय बचाने का उन्मादी शोर मचाना है तो दूसरी ओर उसके निर्यात का लाभ भी उठाना है । एक से ध्रुवीकरण का राजनीतिक लाभ मिलता है तो दूसरे से देशी और विदेशी कारपोरेट जगत के साथ रिश्ते मजबूत होते हैं ।

कहने की जरूरत नहीं कि इससे हमारे देश के उत्पादक किसान समुदाय का नुकसान होता है । उसे खड़ी फसल वाले खेत की रक्षा के लिए आवारा घूमते पशुओं की समस्या का सामना करना पड़ता है तो दूसरी ओर बीमार पड़े पशुओं का बोझ भी बेवजह उठाना पड़ता है । आवारा घूमती नीलगायों की समस्या का पहले से सामना कर रहे किसान समुदाय पर यह अतिरिक्त बोझ सरकार ने डाल दिया है, उसका संप्रदायीकरण कर रही है और उन पशुओं के निर्यात का लाभ भी उठा रही है ।