Saturday, June 1, 2024

भारतीय मनीषा: कुछ सवाल

 जब भी हम प्राचीन भारत की कोटि का प्रयोग करते हैं तो भारत के इतिहास में जेम्स मिल के काल विभाजन का ही अनुकरण करते हैं। इसी काल विभाजन के कारण इस्लाम के आगमन के बाद मध्य काल आ जाता है। भारत की परंपरा का जिक्र करते हुए अक्सर 1200 ईस्वी के बाद के भारत की बात नहीं होती। यह संकीर्ण नजरिया एक लम्बी अवधि की उपलब्धियों को अनदेखा कर देता है। काल संबंधी इस गड़बड़ी के अतिरिक्त भारत की मनीषा ने जो भी सृजन किया उसके एक महत्वपूर्ण हिस्से को छोड़ दिया जाता है। उदाहरण के लिए कामसूत्र को हमारी परंपरा का अंग सकारात्मक सोच के साथ नहीं माना जाता।उस ग्रंथ का प्रणयन ही हमारे देश की इहलौकिक परंपरा के कारण संभव हुआ। भारत की मनीषा ने अथर्ववेद में ही भाषाओं और मनुष्यों की विविधता को स्वीकार किया था। बाद में भी इस्लाम के साथ की वजह से सूफी दर्शन का विकास हुआ। भारतीय परंपरा की इसी समावेशी प्रकृति का ध्यान रखकर रामधारी सिंह दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय में इस्लाम के योगदान की चर्चा विस्तार से की है। उन्होंने तो वैदिक धारा को भी निवृत्ति मार्गी मानने की जगह प्रवृत्ति मार्गी माना है। राम विलास शर्मा ने भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश शीर्षक पुस्तक में आयुर्वेद के पीछे भौतिकवादी दृष्टिकोण का योगदान माना। इस्लाम के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने तानसेन, तुलसी और ताजमहल को देश की महानतम उपलब्धियों में जगह दी। वर्तमान समय के लिए यदि हम भारतीय मनीषा को प्रासंगिक बनाना चाहते हैं तो उसकी भौतिकता और समावेशिता को जागृत करना होगा। हिंदी साहित्य का प्रत्येक विद्यार्थी जानता है कि आचार्य शुक्ल ने हमारे देश को अध्यात्म प्रधान बनाने में पश्चिमी विद्वानों को जिम्मेदार माना है और विद्यापति के प्रसंग में आध्यात्मिक चश्मों के सस्ते होने का जिक्र किया है ।

Tuesday, May 28, 2024

प्रतिभा का विस्फोट

 

         

                            

अनुपम ओझा उन विरल रचनाकारों में हैं जिन्होंने एकाधिक क्षेत्रों में हाथ आजमाया और सबमें ही पारम्परिक अर्थों में सफल भी रहे । सबसे पहले स्नातकोत्तर  स्तर पर अध्ययन करते हुए उनका काव्य संग्रह छपा । फिर उनकी रुचि सिनेमा में जागी तो उससे जुड़ी किताब भी राजकमल से छपी । और अब धोती और ध्रुपदशीर्षक से यह कहानी संग्रह । इसकी अधिकतर कहानियों का बनारस से रिश्ता है बनारस से जुड़े किसी भी व्यक्ति के लेखन पर अगर वर्तमान समय की छाप नहीं है तो उसकी संवेदनशीलता पर शंका की जा सकती है । हजारों साल पुराना यह नगर फिलहाल पूंजी के आक्टोपसी चंगुल में इस कदर फंस गया है कि उसका भाग्य निर्जीव होकर किसी तरह बचे रहना ही महसूस होता है । मार्क्स ने पूंजीवाद के हाहाकारी स्वरूप का जो वर्णन किया है उसकी विध्वंसकता को बनारस जाकर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है ।

संग्रह का शीर्षक ही हमें लेखक की रचनात्मकता से परिचित करा देता है देश के सर्वशक्तिमान शासक की आलोचना करते हुए उसके कुलनाम को ले लेने से कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द हो गयी थी इस कुलनाम का भय इतना अधिक है कि बहुतेरे लोग उसकी लय का इस्तेमाल करते हुए कोई भी अन्य नाम खोज निकालते हैं गोदी मीडिया इसका सबसे उपयुक्त उदाहरण है कुछ लोग तो उसे भदोही भी बना लेते हैं फिलहाल उन्हें मोती कहा जा रहा है इसकी ध्वनियों के बारे में कुछ कहना ही उत्तम होगा अनुपम ने इसे धोती कहा है । अगर यह बात अतिपाठ लगे तो हर हर धोती, घर घर धोती का नारा पहली ही कहानी में सबूत के बतौर उपस्थित है ।   

वस्त्र के इस विशेष रूप से एकाधिक छवियां पैदा होती हैं स्त्री के प्रकरण में इससे कुलीनता नहीं पैदा होती लेकिन पुरुष के लिए यह वस्त्र केवल कुलीनता बल्कि बहुधा महत्वपूर्ण उत्सवों आदि से जुड़ जाता है विवाह और पूजा के समय धोती स्वतंत्र आभा ग्रहण कर लेती है उसके साथ मुहावरे भी जुड़े हैं जिसमें धोती खोल देना बहुत लोकप्रिय है स्वयं उस शासक ने अपने गृहप्रांत में किसी बुजुर्ग नेता के साथ इस तरह के आचरण की व्याप्ति की कथा सुनायी थी लेखकों द्वारा इस किस्म के उपाय अपनाना बहुत पुरानी परम्परा है सभी कथा लेखक जानते हैं कि असली नाम लेने के खतरे से बचने के लिए उन्हें तमाम पात्र अलग नामों से गढ़ने पड़ते हैं जबसे कहानी है तबसे ही शक्तिशाली की खिल्ली उड़ाने की प्रथा भी है और इसका सफल तथा सुरक्षित निर्वाह करने के लिए यह युक्ति भी सभी लेखक अपनाते रहे हैं

बनारस में होने वाले बदलावों को काशीनाथ सिंह ने भी अपनी कहानियों में बेहद संवेदनशीलता के साथ दर्ज किया था अनुपम की कहानियों का संसार उनके बाद का है इनमें नगर की आत्मा ही मर गयी है इस विध्वंस के निशान बनारस तक ही महदूद नहीं बल्कि राष्ट्रव्यापी हो गये हैं इनके भौगोलिक प्रसार के साथ ही मानसिक विस्तार को भी इन कहानियों में दर्ज किया गया है इन कहानियों में युवा प्रेम भी उसी विध्वंस का शिकार हुआ है इसलिए कहानियों में प्रेम करती लड़कियों की मौजूदगी भी पर्याप्त है प्रेम सबसे कोमल क्षेत्र है जिसे इस बदलाव वा विध्वंस ने अपना शिकार बनाया है प्रेम की रोमांटिकता को ध्वस्त करता हुआ देह व्यापार का बहुत पुराना व्यवसाय है जिसने स्त्री के शरीर का इस कदर वस्तूकरण किया है कि उसकी मनुष्यता का अंदाजा ही बहुधा नहीं होता । इन कहानियों में स्त्री की ढेर सारी छवियों के दर्शन होते हैं । सबसे अधिक करुणा उपजाने वाली हालत यह है कि पुत्र प्राप्ति की आशा में लड़कियों का जन्म होता जाता है और वे अनचाहे अस्तित्व की तरह पारिवारिक दायित्व निभाये जाती हैं । रोज के इस अनचाहे बोझ की बहुरंगी छवि भी इस संग्रह की बड़ी विशेषता है । बहुतेरी दीगर चीजें भी अमानुषीकरण की इस प्रक्रिया का शिकार हुई हैं बदलाव की प्रेरणा बनकर हमारे देश में टेलीविजन आया था जिसने प्रत्येक घर में बाजार का प्रवेश कराया और सामर्थ्य से अधिक की आकांक्षा पैदा कर दी इसने जीवन गुजारने के पारम्परिक रवैये को पिछड़ापन साबित किया और अनाप शनाप खर्च को ही आधुनिक होने की कसौटी बना दिया नष्ट होती इस समृद्ध सभ्यता में सबसे हृदयविदारक प्रसंग पर्यावरण का मनुष्य द्वारा आत्मघाती नाश है

यह विनाश शहरों से फैलता हुआ देहात तक भी जाता है । भारत के देहात का विनाश समूचे संसार की सबसे बड़ी दुर्घटना है । अंग्रेजी शासन प्रणाली ने शपथ का व्यवसायीकरण किया तो झूठ बोलने की शर्म समाप्त हो गयी थी । अबकी बार जो हो रहा है उसने भ्रष्टाचार को सहज जीवन पद्धति में बदल दिया है । देश की लगभग प्रत्येक संस्था इसके लपेटे में आ चुकी है । अबाध भोग की आकांक्षा ने युवकों को देहात से उखाड़ दिया है और उन्हें मोल तोल की क्रूर दुनिया में किसी तरह जीने लायक सुविधा जुटाने की गलाकाट होड़ में उतार दिया है ।  माहौल की मारकता को जीवंत करने के लिए अनुपम ने व्यंग्य का बहुत बेहतरीन इस्तेमाल किया है । व्यंग्य के अलावे भी इन कहानियों की भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ ही शुद्ध भोजपुरी और अंग्रेजी शब्द भी धड़ल्ले से आते रहते हैं । 

कहानीकार ने लोभ लाभ के इस सर्वग्रासी बाजारी उपभोक्ता वातावरण का प्रतिलोम भी तैयार करने का प्रयास किया है और पाठकों को कला की साधना की ऐसी दुनिया की भी सैर करायी है जिसमें सीखने और सिखाने वाले का अंतर समाप्त हो जाता है और इस भौतिक शरीर के भीतर से ही इसकी सीमा का अतिक्रमण करती हुई सुर और लय की वैकल्पिक दुनिया खुल जाती है । उसका सपना इतना कोमल और भंगुर होता है कि पढ़ते हुए उसमें कहानीकार के यकीन से भय होता है ।      

अनुपम ने एक गांव के जीवन के सजीव वर्णन से देश के माहौल में आयी गिरावट को साकार कर दिया है । इस गिरावट में व्यापारीकरण के साथ ही धार्मिकता का नशा भी शामिल हो गया है । इन दोनों की नशीली मिलावट ने देश की बुनियाद को जिस तरह भीतर से खोखला करना शुरू किया है उसका जोरदार प्रतिकार इस औपन्यासिक वितान की कहानी में दर्ज हुआ है । दुखद रूप से यह धार्मिकता भी नहीं है, इसमें भ्रष्ट सांप्रदायिक राजनीति का जहर भी घुला हुआ है । ध्यान देने की बात है कि इस राजनीति ने अनैतिकता को बहुत बड़ा दर्जा दिया है । दूसरे धर्म के विरोध में अभियान शुरू करने वाले उसे हिंदू धर्म की निचली जातियों के विरोध में मोड़ देते हैं । इन निम्न जातियों को हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था खास किस्म के ही काम करने लायक मानती है इस प्रसंग में मानसिक श्रम की श्रेष्ठता के कारण इस क्षेत्र में उनका आगमन निषिद्ध जैसा ही रहता है संयोग से यदि प्रवेश हो गया तो भी जीवन भर विषैली टिप्पणियों को झेलना पड़ता है कहानी ने यह भी दर्ज किया है कि इस भेदभाव की सफलता के लिए शिक्षा और विवेक का नाश जरूरी है । शिक्षा के विनाश की वर्तमान परियोजना हमारे देश का स्थायी नुकसान करने जा रही है । विवेकहीनता का जब डंका बजे तो समझना होगा कि अब तक के हासिल की भारी क्षति होने जा रही है और उसकी पूर्ति के साधन भी हमेशा के लिए नष्ट किये जा रहे हैं ।        

खटकने वाली एक बात है कि लगभग प्रत्येक कहानी में वाचक पूरी तरह से संदेह से परे है और सबके बारे में फैसला सुनाता रहता है । बेहतर होता कि वह भी सहज मानवीय दुर्बलताओं से संशयग्रस्त नजर आता । इससे पाठक की उसके साथ होने की गुंजाइश बढ़ जाती है । वाचक को अगर पाठक महामानव समझेगा तो उसके साथ खड़ा होने में उसे व्यर्थता का अनुभव होगा । लेखक को सिनेमा का गहरा ज्ञान है इसलिए उसकी छाप भी समय समय पर उभरती रहती है ।                        

Saturday, May 25, 2024

प्रेम का प्राणलेवा आकर्षण

 

         

                                    

कहानीकार नर्मदेश्वर की कहानी ‘कंघी’ को उसके पुरानेपन के लिए भी देखा जाना चाहिए । न केवल इसकी कथावस्तु मनुष्य और चराचर जगत की पारस्परिकता की अनुगूंज लिये हुए है बल्कि कहानी का रचाव भी बहुत ही सादा और परम्पराबद्ध है । उसकी ये विशेषताएं कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत हैं । असल में बहुधा हम भूल जाते हैं कि कहानी का मूल कहना है, लिखना नहीं । कहानी एक लड़की और मछली के बारे में है । मछली के जिक्र से हमारे उपभोक्ता समय को चटपटी भोज्य सामग्री की याद आयेगी लेकिन कहानी उस समय में पाठक को अनायास ले जाती है जब इनके बीच दोस्ती का रिश्ता सम्भव था । लड़की के साथ मछली को एक और भी बोध से जोड़कर देखा जाता है । कहने की जरूरत नहीं कि स्त्री शरीर का जब उपभोक्ताकरण होता है तो उसे भी मछली की संज्ञा दी जाती है । उनके इस तरह के रिश्तों का प्रतिवाद ही इस कहानी की बुनियाद है ।

कहानी की शुरुआत मछली से होती है और उस मानवेतर प्राणी का कहानीकार ने मानवीकरण किया है । तत्काल आचार्य शुक्ल की कविता संबंधी मान्यता का ध्यान आता है जिसमें वे साहित्य का धर्म मनुष्य की संवेदना का विस्तार मानवेतर प्राणी जगत और प्रकृति तक करना बतलाते हैं । मानवेतर का मानवीकरण संवेदना के इस विस्तार के लिए आवश्यक होता है । कहानीकार नर्मदेश्वर के हाथ से मछली सहसा एक अल्हड़ किशोरी में बदल जाती है जो बुजुर्गों की सरपरस्ती में रहते हुए भी कुलूहल की अपनी दुनिया बसा लेती है । मां मछली की मौजूदगी में थोड़ी आजादी लेकर उसने कुछ मनाहियों की सीमा भी पार की । मनाहियों के प्रतिबंध तोड़ने का उत्तेजक आनंद उसके साहस का कुल हासिल था जिसकी वजह से उसे लगातार सीमाओं के उल्लंघन का मजा आने लगा । एक बार जब उसने  पानी के बाहर न जाने की ऐसी ही मनाही का उल्लंघन किया तो पहली बार खतरे की अनुभूति हुई । जब बुलबुले का पीछा करने के बहाने वह ऊपर उठ आयी तो रोशनी से उसकी आंखें चौंधिया गयीं । अनजान को जानने की जिज्ञासा किसी को भी ऐसे खतरनाक अनुभवों की ओर ले जाती ही है लेकिन ज्ञान की राह भी तो यही है । इस खतरे के जिक्र से लेखक ने मछली के साथ होने वाली उस दुर्घटना का आभास दे दिया है जिसने आखिरकार उसकी जान ले ली । यह मछली पूर्वनिर्धारित रास्तों से कुछ अलग हटकर चलती है इसका संकेत देते हुए लेखक ने लिखा कि ‘जिस काम को मना किया जाता, छोटी मछली उसे जरूर आजमाती’ । कहानी में पानी की दुनिया किसी भी लड़की के लिए बंद घरेलू दुनिया का रूपक बनकर आयी है । इससे बाहर की दुनिया का आकर्षण उसे लुभाने लगा और अक्सर इस दुनिया की सैर करने लगी । इसी क्रम में उसकी मुलाकात उस लड़की से हुई जिसके प्रेम में वह पड़ी । कारण कि लड़की भी इस मछली के ही स्वभाव की निकली

लड़की गड़ही में कमलिनी के उजले खिले फूल देखकर उन पर मुग्ध हो गयी उन्हें पाने के लिए पानी में उतरी तो फूल हाथ की पकड़ से दूर थे बालों से कंघी निकालकर उसने फूल को करीब खींचा और तोड़ लिया कंघी तो पानी में गयी लेकिन फूल में वह मगन हो गयी लड़की की तरह ही मछली भीडीठहो गयी थी इसी दुस्साहस ने उसे एक बार फिर से दुर्घटना का शिकार बनाया पानी में पड़ती चील की छाया देखने में मगन थी कि बगुले की चोंच में जाना पड़ा कंघी इस बगुले के भी प्रसंग में है लेकिन महज क्रिया के बतौर । लड़की ने उसे बगुले से बचाया और वापस पानी में डाल दिया । मछली को लड़की का भोला चेहरा और उसके कोमल हाथों का स्पर्श याद आता रहा लेकिन भयवश बाहर नहीं आयी । उसने घर पर इस दुर्घटना की खबर भी नहीं दी । यहां आकर हम मछली के भीतर की साहसी लड़की को तो ठीक ढंग से देख समझ लेते हैं लेकिन कहानीकार लड़की की ओर का हाल नहीं बताता । शायद कहानी की आखिरी परिणति तक के लिए लेखक ने उसका प्रवेश मछली के भीतर करा दिया है । 

आखिरकार मछली के भय का परिहार हुआ और वह फिर से बलखाने लगी । उसका मन बाहर आने को मचलने लगा । इस शब्दावली पर थोड़ा भी ध्यान देने से समझा जा सकता है कि उसके भीतर लड़की का प्रवेश हो चुका है । उसके भीतर साहस के फिर से संचार होने से आगामी दुर्घटना का माहौल बनने लगता है । इस दुर्घटना का माहौल फिर से लेखक ने बहुत विस्तार से बनाया है । बहुत समय के बाद जब मछली फिर से ऊपर आती है तो गरमी का मौसम है । गड़ही में पानी कम रह गया है । फूल भी सूख चुके हैं । तभी बारिश शुरू हुई और फिर क्या बारिश! पूरी तरह लोकगीतों की तरह अनवरत आसमान बरसता रहता । गड़ही का विस्तार हुआ जो उसके अनुभव संसार के विस्तार की तरह था । मछली को उसी गड़ही के रास्ते ताल में निकल जाने पर एक और विचित्र संसार नजर आने लगा । लेखक ने गड़ही से लगे ताल के उस संसार को हमारे जाने बूझे समाज की तर्ज पर रचा है ।

इसमें मछली को उल्लू के डर से छिपकर रहने वाले केंकड़े के परिवार के दर्शन होते हैं । विद्रोही मछली को डरकर छिपने का कारण नहीं समझ आता तो केंकड़े को उसके मजबूत हाथों की याद दिलाती है और भय पर जीत हासिल करने की प्रेरणा देती है । बिहार के सामंती सामाजिक संबंधों में अन्याय और भय के प्रतिरोध का इतना कोमल बिम्ब बहुत कम दिखायी देता है । केंकड़े के हाथों को वह फौलादी पंजे कहती है और उनसे उल्लू की गर्दन दबा देने की युक्ति सुझाती है । केंकड़े ने इसी युक्ति का सहारा लिया और उल्लू के भय से हमेशा के लिए छुटकारा पा लिया । इस छोटे से प्रकरण के बाद मछली की स्वतंत्र यात्रा फिर से शुरू हो गयी । कहने की जरूरत नहीं कि अब तक वह अपना सुरक्षित संसार छोड़कर अकेले ही संसार से जूझने और देखने निकल पड़ी थी । किसी को भी एकबारगी आलोक धन्वा की ‘भागी हुई लड़कियां’ याद आ सकती है । उसने अपनी इस बेखौफ़ आजादी की कीमत भी चुकाई ।

खेतों में काम करते हुए गाती स्त्रियों के दल में उसकी प्यारी दोस्त लड़की भी नजर आयी । प्रेम दोनों ओर से था इसका सबूत यह था कि लड़की धान और मछली के लिए पानी की जरूरत का ध्यान रखती । लड़की के प्रेम में पड़ी मछली उसके पास आने की कोशिश करती रहती । उनके आपसी प्रेम के वर्णन में समलिंगी आकर्षण की भी छाया देखी जा सकती है । समलिंगी आकर्षण की भाषा साधना अब भी बहुत कठिन है । लेखक ने स्त्री भाषा के सुलभ संकेतों का सहारा लेकर इसे स्पष्ट किया है । कहानी के एकदम अंत में कहानीकार ने ठहरकर बताने की जगह गतिमान दृश्यों का तांता सा लगा दिया है जो मछली की जानलेवा फंसान और बेचैनी को जाहिर करते हैं ।                         

कहानी के अंत में मछली का कांटा कंघी बनकर लड़की के उसी जूड़े में समा जाता है जहां से निकालकर कभी लड़की ने पसंदीदा कमलिनी का फूल तोड़ा था और जिसके पानी में गिर जाने पर मछली निकालकर वापस देने की हसरत मन में ही रखे रह गयी थी । इस तरह जिस लड़की को लेखक ने बहुत देर तक कहानी में अनुपस्थित रखा था वही आगे मछली के साहस और मौत की आशंका के बावजूद खतरे उठाने की आदत का जीवन जियेगी ।