Wednesday, November 17, 2021

आधुनिक जीवन का ज्ञानकोश

 

          

                                     

राजकमल से 2018 के बाद 2020 में छपी सोपान जोशी की किताब ‘जल थल मल’ को देखने के बाद हूक सी पैदा होती है कि काश! हिन्दी में नोबेल होता । वैसे यह किताब किसी भी पुरस्कार या सम्मान से बहुत बड़ी है । जिसे आजकल पारिस्थितिकी कहा जाता है उस जटिल वैज्ञानिक धारणा को लेखक ने कमाल की सहजता के साथ सूत्र रूप से व्यक्त कर दिया है । प्रत्येक अध्याय में घनघोर शोध से हासिल निष्कर्षों को बोधगम्य शैली में प्रस्तुत किया गया है । खास बात यह कि पर्यावरण के विचारकों पर जिस आसानी से विकास विरोधी होने की मुहर लगा दी जाती है उसका कोई मौका लेखक ने नहीं दिया है । इस मामले में सरकारी सोच की सारी कलई उतारने के बावजूद समस्या के समाधान का कोई आसान रास्ता नहीं सुझाया गया है । बेहद मौलिक इस किताब में समस्या को हल करने के सांर्वजनिक, सरकारी और निजी प्रयासों का भी लेखा जोखा रखा गया है । इससे सामुदायिक और वैज्ञानिक कोशिशों को उचित सम्मान तो मिला ही है, तमाम अन्य पहलकदमियों की प्रेरणा की सम्भावना भी पैदा हुई है । किताब इतनी जरूरी है कि प्रत्येक हिंदी भाषी को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए । किताब में छपे शब्दों के अतिरिक्त प्रत्येक पृष्ठ पर मौजूद चित्रांकन भी बेहद महत्वपूर्ण हैं । ये चित्रांकन सोमेश कुमार के उकेरे हुए हैं ।

किताब के सभी अध्याय प्रचंड शोध से हासिल जानकारी के साथ लिखे हुए हैं । लगभग सबमें ही ढेर सारी नयी बातें हैं । उन सबको किताब पढ़कर ही ठीक से जाना जा सकता है फिर भी यहां संक्षेप में उनकी विषयवस्तु को यथासम्भव सहजता के साथ पेश किया जा रहा है । इस शोध से भी अधिक महत्व उसकी प्रस्तुति का है जिसमें लेखक ने बिना बोझिल बनाये दैनन्दिन अनुभव से जोड़कर तथ्यों को ग्राह्य बना दिया है । असल में इसकी सहजता का मुकाबला भी असम्भव है । किताब का केंद्रीय तर्क है कि मल का निस्तारण थल में होना ही लाभप्रद और उपयोगी है क्योंकि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने वाले ढेर सारे तत्व मल-मूत्र में पाये जाते हैं । इसीलिए सीवर व्यवस्था के आगमन से पहले खेतों में खाद के बतौर इसका उपयोग करने के लिए किसान इसे खरीदा करते थे । मल के निस्तारण के लिए आधुनिक सीवर व्यवस्था के आगमन के साथ जल के दुरुपयोग के चलते हमारे जीवन में ढेर सारी समस्याओं का जन्म हुआ है । सीवर में मल-मूत्र की मात्रा बेहद कम होती है, पानी ही अधिक रहता है । इन सीवरों के जाल में ही सार्वजनिक सेवाओं में लगे सफाई कर्मचारियों की समस्या भी आ जाती है जिसके साथ जातिवाद का भी अटूट संबंध है । देश भर में इन सीवरों की सफाई के काम में लगे लोगों की मौतों की खबरें सुनायी देती रहती हैं । इस काम में लगे कर्मचारियों की जाति आम तौर पर अस्पृश्य होती है । इस पर विचार करते हुए लेखक ने जातिभेद की समस्या पर सोचने वालों में उन लोगों के विचारों का समर्थन किया है जो मानते हैं कि कठोर जातिभेद की मौजूदा प्रणाली का जन्म अंग्रेजी शासन के तहत जनगणना की व्यवस्था के बाद हुआ है । जाति तो मौजूद थी लेकिन उसका वर्तमान सख्त स्वरूप नहीं था । जाति के सवाल पर यह विचार सर्वमान्य होने की बजाय विवादास्पद है । बहरहाल वैकल्पिक उपायों के केंद्र में जल से सम्पर्क बचाकर उसे थल में पहुंचा देने के प्रयास वर्णित हैं ।      

सार्वजनिक क्षेत्र में मल की सफाई का सबसे संगठित तंत्र रेलवे है । मुझे भी इसका व्यक्तिगत अनुभव है । इस मामले में सचमुच बेहद दमनकारी आरक्षण व्यवस्था नजर आती है । सफाई का यह विशाल तंत्र लगभग अनिवार्य रूप से अस्पृश्य जातियों के श्रम से संचालित होता है । लेखक ने इस तंत्र की विशालता का वर्णन करने के साथ ही वास्तविक कठिनाइयों पर भी ध्यान दिया है । रेलयात्री नामक इस विशाल सचल समुदाय की मल-मूत्र व्यवस्था की देखरेख सचमुच टेढ़ी खीर है । रेल के गतिमान रहने पर ट्रैक पर उसके गिरने से लोहे में जंग तेजी से लग जाती है । नतीजतन पटरियों के कब्जे गल जाते हैं । रेल दुर्घटनाओं का इससे गहरा संबंध है । जब रेल खड़ी हो तो शौचालय के इस्तेमाल से स्टेशन का रखरखाव मुश्किल हो जाता है । रेल की गति के चलते गिरता हुआ मल-मूत्र रेल के डिब्बों से नीचे चिपक जाता है । इन सबको साफ करने में ढेर सारा पानी खर्च होता है । इस काम को हाथ से करना श्रमिक की मजबूरी हो जाती है । हाथ से मैला साफ करने पर प्रतिबंध का सबसे बड़ा उल्लंघन एक सरकारी संस्थान ही करता है । इस समस्या के समाधान पर विचार करते हुए लेखक ने सेना के अनुसंधान विभाग से विकसित एक बायोडाइजेस्टर का परिचय दिया है जिसका इस्तेमाल रेलवे में धीरे धीरे शुरू हुआ है । रेलवे के निजीकरण के मौजूदा दौर में इस पहलू पर कितना ध्यान दिया जायेगा, कहना मुश्किल है ।

रेल संबंधी अध्याय के अतिरिक्त किताब का सबसे आकर्षक अध्याय कलकत्ते से संबंधित है । उस शहर का मल-मूत्र बगल से बहने वाली हुगली में नहीं जाता बल्कि उसकी ढाल के चलते पूरब में बहने वाली छोटी सी नदी कुल्टीगंग में जाता है । नदी में जाने से पहले उसका उपचार होता है । यह उपचार तीस हजार एकड़ में फैले तालाबों और खेतों से होता है । इस पानी में मछली, सब्जी और धान उगाकर मछुआरे किसानों की अतिरिक्त कमाई भी होती है । उपचार के इस विशाल तंत्र का विस्तृत वर्णन हमारे समाज की पारम्परिक जानकारी के सचेतन प्रयोग का विलक्षण निदर्शन कराता है । समूची किताब मानव जीवन के बारे में इतने सारे वैज्ञानिक कोणों को गूंथकर तैयार की गयी है कि इससे किसी भी पाठक को इस धरती की लगभग प्रत्येक गतिविधि की मोटी जानकारी हो जायेगी । समुद्र के विशालकाय प्राणी ह्वेल से लेकर आंत के अंधेरों में आक्सीजन के बिना भी जिंदा रहनेवाले बैक्टीरिया तक जीवन के समस्त रूपों की लीला के बारे में उच्च वैज्ञानिक जानकारी को सृष्टि के खेल की तरह प्रस्तुत किया गया है । इस खेल में कुछ भी निर्जीव या व्यर्थ नहीं दिखायी देता । एक जीव के उपभोग के बाद निकला पदार्थ दूसरे का भोज्य बन जाता है । कलकत्ते के बाहर जिन खेतों में मैले जल का उपचार होता है उनमें धूप, जल, जीवाणु और मिट्टी का यही खेल अहर्निश चलता रहता है । इन भेरियों की व्यवस्था पर ढेर सारे अध्ययनों का जिक्र भी किताब को रोचक बनाता है । खास बात यह कि किताब में नगरीय मल प्रबंधन के उन आधुनिक प्रयासों का भी परिचय दिया गया है जिनसे सामाजिक शुचिता पर आधारित जीवन का निर्माण सम्भव है । सरकारी स्वच्छता के मुकाबले लेखक को शुचिता का प्रयोग सही लगता है । पर्यावरणिक रूप से उपयोगी मल प्रबंधन के ये प्रयास देश में यत्र तत्र सफलता के साथ संचालित हो रहे हैं ।                              

मल निस्तारण की समस्या पर लिखी इस किताब में मार्क्स का जिक्र आश्चर्यजनक है लेकिन मार्क्स के नवीनतम पाठ से परिचित लोगों के लिए अनजाना नहीं है । इस सदी के तमाम मार्क्सवादी उनके लेखन में मौजूद पर्यावरण चिंता को उजागर कर रहे हैं । यहां तक कि समाजवाद को भी इस समय पुरानी धारणा से अलगाने के लिए इकोसोशलिज्म (पारिस्थिकी संवलित समाजवाद) कहा जा रहा है । लेखक के मुताबिक मार्क्स ‘लंदन के सोहो नामक इलाके में रहते थे जिसमें सन 1854 में एक पानी के पंप से हैजा फैला था ।’ मल के निस्तारण के लिए बन रहे ‘सीवर की एक बड़ी खोट उन्हें तभी दिख गयी थी’ । उनके ग्रंथ ‘पूंजी’ के तीसरे खंड से लेखक ने एक अल्पलक्षित उद्धरण देकर अपनी बात को पुष्ट किया है । मार्क्स के अनुसार ‘उपभोग से निकला मैला खेती में बहुत महत्व रखता है । पूंजीवादी अर्थव्यवस्था इसकी भव्य बरबादी करती है । मिसाल के तौर पर लंदन में 45 लाख लोगों के मल-मूत्र का कोई और इस्तेमाल नहीं है उसे टेम्स नदी में डालने के सिवा, और वह भी भारी खर्च के बाद ।’ खेती के सिलसिले में मार्क्स के गहन अध्ययन की गवाही बहुतेरे अन्य लोगों के साथ जान बेलामी फ़ास्टर ने भी दी है लेकिन उसे इस संदर्भ में लेखक ने रचनात्मक तरीके से देखा समझा है ।

किताब का सबसे उत्तेजक हिस्सा अंत के बीस पृष्ठों की संदर्भ सूची है जिसमें स्पृहणीय ईमानदारी के साथ लेखक ने एक एक तर्क और तथ्य के स्रोत का उल्लेख कर दिया है । इस विशाल सूची को देखने से हिंदी लेखन की एक खास समस्या नजर आती है । किताब में वर्णित विषयवस्तु में हमारे देश की मौजूदगी प्रमुख होने के बावजूद संदर्भ ग्रंथों में मुश्किल से कोई ग्रंथ हिंदी का लिखा दिखायी देगा । इतनी विशाल संदर्भ सूची में हिंदी की कुल चार किताबों का उल्लेख हुआ है । इससे आसपास की जानकारी के प्रति हमारी उदासीनता और गैर जिम्मेदारी का ही सबूत मिलता है ।   

 

Monday, November 1, 2021

स्वाधीनता आंदोलन का वाम तेवर

 

             

                                       

आज़ादी का अमृत महोत्सव उसके लिए लड़ने वालों को याद करने का भी मौका है । यह आज़ादी उपनिवेशवाद से लड़ाई करके हासिल की गयी थी । इस लड़ाई ने हमारे देश के भीतर स्वाधीनता की आकांक्षा को जन्म दिया था । आधुनिक भारत के रूप को बनाने में इस लड़ाई का निर्णायक योगदान है । जिसे आज देश की एकता कहा जाता है उसे न केवल भौगोलिक बल्कि भावनात्मक रूप से भी हासिल करने में आजादी की लड़ाई का योगदान है । सीधी बात यह है कि यदि अंग्रेजी राज को हम भारत की एकता का संस्थापक कहेंगे तो यह एकता महज ब्रिटिश भारत तक सीमित रहनी थी लेकिन आजादी की जंग उन इलाकों के साथ ही रजवाड़ों के भीतर भी चली थी । तेलंगाना में निज़ामशाही के विरुद्ध संघर्ष से लेकर कश्मीर में कबाइलियों के हमले को अपने दम पर नाकाम करते हुए महाराजा हरिसिंह की रियासत के भारत विलय तक देश के प्रत्येक क्षेत्र के लोगों ने उपनिवेशवाद से लड़ते हुए वर्तमान भारत की तस्वीर का निर्माण किया है । इस भौगोलिक समेकन के साथ ही आजादी के उस संघर्ष ने देश को भावनात्मक रूप से भी एकताबद्ध किया । धर्मों और संस्कृतियों से भरे इस देश में इस एकता को हासिल करने और कायम रखने के लिए जिन सिद्धांतों का सृजन किया गया उन्हें ही हम धर्मनिरपेक्षता और विविधता में एकता के नाम से जानते हैं । न केवल इतना बल्कि आज़ादी के बाद की आत्मनिर्भरता के लिए ही शुरू से स्वदेशी का भाव भी आज़ादी की लड़ाई के साथ जुड़ा रहा ।

इस आंदोलन ने हिंदी साहित्य के लेखन को गहराई से प्रभावित किया । इसमें रचनात्मक के साथ वैचारिक लेखन भी शामिल था । प्रसिद्ध आलोचक रामचंद्र शुक्ल ने उपनिवेशवाद को व्याख्यायित करते हुए इसे क्षात्र धर्म के साथ वणिक धर्म का मेल कहा । पुराने साम्राज्यों से उपनिवेशवाद का भेद करने के लिहाज से यह महत्वपूर्ण बात थी । इस सिलसिले में अन्य बातों के अतिरिक्त इसका भी उल्लेख जरूरी है कि बाल गंगाधर तिलक की शब्दावली से उनका प्रेरित होना और चंद्रशेखर आजाद से उनकी निकटता प्रामाणिक रूप से साबित हो चुकी है । इस प्रत्यक्ष संबंध को छोड़ दें तो भी उनके लेखन में स्वाधीनता आंदोलन की अनुगूंजें सुनी जा सकती हैं । अपने समय की साहित्यिक प्रवृत्ति छायावाद की पृष्ठभूमि के रूप में स्वाधीनता आंदोलन की विशेषता को उन्होंने दो मामलों में लक्ष्य किया । इस दौर में स्वाधीनता आंदोलन का प्रसार देहाती इलाकों में हुआ । याद दिलाने की बात नहीं कि इस प्रसार में गांधी के आगमन का निर्णायक योगदान है । देहाती इलाकों में आंदोलन के प्रसार के चलते साहित्यिक रचनाओं का भी व्यापक प्रचार हुआ । दूर दूर तक मैथिली शरण गुप्त की भारत भारती को लोग पढ़ते थे । इस किताब की विशेषता थी कि देश को काव्य ग्रंथ का विषय पहली बार बनाया गया था ।

भारत के स्वाधीनता आंदोलन की दूसरी जिस बड़ी विशेषता का उल्लेख आचार्य शुक्ल ने किया है वह उसकी अंतर्राष्ट्रीयता से जुड़ा हुआ है । उन्होंने कहा कि हमारे देश का स्वाधीनता आंदोलन दुनिया भर में मुक्ति के लिए चलने वाले संघर्षों के मेल में दिखायी पड़ा । उसका यह अंतर्राष्ट्रीय पहलू इस बात से भी प्रकट है कि 1857 में जब उसकी शुरुआत हुई तो लंदन में रह रहे मार्क्स का उसे समर्थन मिला । उसके तीन साल पहले ही रेल आने के अवसर पर मार्क्स ने लिखा कि इसका लाभ भारत देश को तब मिलेगा जब भारतीय लोग ब्रिटेन की सत्ता उखाड़ फेंकें या ब्रिटेन में मजदूर वर्ग पूंजीपतियों का शासन खत्म कर दे । ध्यान देने की बात है कि भारत संबंधी ये लेख मार्क्स ने अमेरिका के एक अखबार में लिखे थे । स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हुए लगभग सभी नेताओं ने विभिन्न अवसरों पर अंतर्राष्ट्रीय संदर्भों का उल्लेख किया । इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि वे अपने देश की तरह ही सभी देशों की आजादी चाहते थे । न केवल इतना बल्कि वे अंग्रेजी राज के विस्तार के लिए दुनिया भर में जारी युद्धों में भारतीयों की भागीदारी की भी मुखालफ़त करते थे ।

स्वाधीनता आंदोलन ने जिस भावना को व्यापक मान्यता प्रदान करायी वह सभी मनुष्यों को मुक्ति की प्रेरणा प्रदान करती थी । स्वतंत्रता के बारे में इसी सोच ने जयशंकर ‘प्रसाद’ की कविता में हिमाद्रि तुंग श्रृंग पर ‘स्वयंप्रभा, समुज्ज्वला स्वतंत्रता’ को प्रतिष्ठित कराया जिसको ही हासिल करने के लिए अमर्त्य वीर पुत्रों को बढ़े चलना था । यहां तक कि ‘निराला’ ने सरस्वती से जो वर मांगा वह भारत में प्रिय स्वतंत्र रव भरने का था जो अमृत मंत्र नव भी था । स्वतंत्रता का यह स्वर ही नया मंत्र था जिसे भारत में गुंजा देने की प्रार्थना निराला ने सरस्वती से की । समसामयिक साहित्य को प्रभावित करने की स्वाधीनता आंदोलन की क्षमता का कारण विशाल जनसमुदाय को आंदोलन में बड़े पैमाने पर शामिल कर लेना था । इसके कारण ही उस दौर के साहित्यिक लेखन को व्यापक लोकप्रियता हासिल हुई । सबको शिक्षा नहीं सुलभ थी इसलिए सार्वजनिक पुस्तकालयों की लड़ी के सहारे लोगों ने किताबें पायीं और पढ़ीं । आंबेडकर ने शिक्षित होने की बात सबसे पहले अनायास नहीं की थी ।

अंग्रेजी राज ने अपने स्थायित्व के लिए लोगों को विभाजित करने की नीति अपनायी थी इसलिए भी स्वाधीनता आंदोलन को जनता की एकता स्थापित करने की योजना बनानी पड़ी । धार्मिक एकता की बात हमने पहले ही की है । लगभग प्रत्येक कदम पर हमें इसके सबूत मिलते हैं । कारण यह भी था कि अंग्रेजों से पहले के शासन में धार्मिक आधार पर भेदभाव का न के बराबर उदाहरण दिखाई देते हैं । इसी विरासत को 1857 की क्रांति ने अपनाया था । इसमें बेगम हज़रत महल से लेकर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तक और मौलवी अहमदुल्ला शाह से लेकर नाना फड़नवीस तक शामिल रहे । इसके बाद भी कांग्रेस के अध्यक्षों में दादा भाई नौरोजी, बदरुद्दीन तैयबजी से लेकर गोपालकृष्ण गोखले तक थे । गांधी के आने के बाद तो यह एकता स्वाधीनता की लड़ाई का आधार ही बन गयी । कांग्रेस की धारा से अलग क्रांतिकारियों की धारा में अशफ़ाकुल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह की दोस्ती को कौन भुला सकता है! जिस जलियांवाला बाग को पर्यटन के अनुकूल बनाने के लिए लहू के निशान तो मिटाये ही गये, उस पर बनी फ़िल्म ‘सरदार उधम’ को घृणा का प्रचार कहकर आस्कर में भेजने से रोक दिया गया उस सभा को संबोधित करने वालों में सैफ़ुद्दीन किचलू भी थे । बहुत बाद में नौसेना विद्रोह के जिन नेताओं का मुकदमा लड़ने के लिए नेहरू ने काफी अरसे बाद वकीलों का कोट पहना उनमें कैप्टन सहगल के साथ कैप्टन शाहनवाज़ भी थे ।

धार्मिक एकता के ही दायरे में बौद्ध धर्म भी आता है । स्वाधीनता के बाद आंबेडकर ने धर्म बदलकर बौद्ध धर्म ग्रहण किया लेकिन उस आंदोलन के दौरान भी बहुतेरे लोग बौद्ध धर्म से जुड़े रहे । इनमें से राहुल सांकृत्यायन का नाम तो सभी जानते हैं जिनका नाम ही बुद्ध के पुत्र के नाम पर रखा गया । उनके अतिरिक्त हिंदी के प्रसिद्ध कवि नागार्जुन का नाम भी मशहूर बौद्ध दार्शनिक के नाम पर रखा है । लेखन के स्तर पर भी आचार्य नरेंद्र देव ने बौद्ध दर्शन के बारे में पुस्तक लिखी । मैथिलीशरण गुप्त की रचना ‘यशोधरा’ महात्मा बुद्ध की पत्नी के नाम पर लिखी गयी । रामवृक्ष बेनीपुरी से लेकर आचार्य परशुराम चतुर्वेदी तक बहुत सारे विद्वानों ने बुद्ध के जीवन को रचना का विषय बनाया । रामचंद्र शुक्ल ने तो ‘लाइट आफ़ एशिया’ का हिंदी काव्यानुवाद ‘बुद्धचरित’ के नाम से किया । कहने की जरूरत नहीं कि इसके पीछे केवल धार्मिक एकता की ही बात नहीं थी । उस समय के नेतागण जानते थे कि वे एशियाई जागरण के अंग हैं और हमारे अधिकांश पड़ोसी देशों से हमारी दोस्ती बुद्ध के बहाने हो सकती है । उस समय के बौद्धिक भारत को आजादी के बाद पड़ोसी देशों का मित्र ही बनाना चाहते थे ।            

स्वाधीनता आंदोलन के इस पहलू के साथ ही लोकतंत्र की धारणा भी जुड़ी हुई है । लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन ही नहीं है । बहुमत के साथ ही अल्पमत को भी अभिव्यक्ति और अन्य तमाम किस्म की आजादियों के बिना लोकतंत्र को बहुत आसानी के साथ बहुमत की तानाशाही में बदला जा सकता है । इस खतरे को पहचानने के कारण ही आजादी के संघर्ष के दौरान ही सामाजिक एकता का भी ताना बाना बुना गया । समाज सुधार की तत्कालीन कोशिशों को भी उसी संघर्ष का अंग मानना होगा क्योंकि सभी नेता जानते थे कि पुराने भारत में लौटना सम्भव नहीं । नये भारत की उस समय जो भी तस्वीर बनायी गयी उसमें जातिवाद जनित भेदभाव के विरोध के साथ ही स्त्री की सहभागिता का तत्व भी जुड़ा रहता था । राजनीति के स्तर पर भले ही समाज सुधार और राजनीतिक अधिकार की धाराओं में भिन्नता रही हो लेकिन साहित्य के लिए उनकी एकता और मेल के कारण ही प्रेमचंद के साहित्य का उदय हुआ जिसमें अंग्रेजीराज के विरोध के साथ ही जातिभेद का विरोध तथा जमींदारों के शोषण का विरोध था ।

आगामी भारत की आत्मनिर्भरता के लिहाज से आजादी मिलने से पहले ही तमाम आर्थिक उपाय सोचे गये थे जिनमें सबसे महत्वपूर्ण उपाय योजना आयोग का गठन था । इसी तरह स्वावलम्बन के लिए ही आंबेडकर ने ‘राजकीय समाजवाद’ का प्रस्ताव किया था । भूलना नहीं चाहिए कि आंबेडकर मूल रूप से अर्थशास्त्र के विद्यार्थी रहे थे । उनके अमेरिकी प्रवास के अनुभव ने ही उन्हें रिजर्व बैंक का सपना दिया जो आर्थिक उथल पुथल के समय निजी पूंजी की स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाने का काम करने वाली संस्था होनी थी । कहना न होगा कि आजादी के आंदोलन के इस स्वरूप को गढ़ने में रूस की समाजवादी क्रांति का गहरा दबाव था । इसी वाम दबाव ने हमारे संविधान में देश की प्रभुसत्ता का मालिक ‘हम भारत के लोग’ को बनाया । इनमें मजदूर और किसान बहुमत में थे जिनको ट्रेड यूनियनों तथा किसान सभाओं के झंडे तले संगठित करने में वामपंथियों ने निर्णायक भूमिका निभायी । शायद इसीलिए लेखकों को भी प्रगतिशील लेखक संघ में एकत्र करने में उनकी भूमिका बेहद प्रभावी रही थी । साथ ही स्वस्थ राजनीतिक नेताओं की नयी पौध का निर्माण करने के लिए विद्यार्थियों को एकजुट करने में भी वामपंथियों ने गहरी रुचि ली ।                                     

Tuesday, October 26, 2021

फ़्लायड की हत्या के बाद

 

            

2021 में द यूनिवर्सिटी आफ़ नार्थ कैरोलाइना प्रेस से ज़ाक सेल की किताबट्रबल आफ़ द वर्ल्ड: स्लेवरी ऐंड एम्पायर इन द एज आफ़ कैपिटलका प्रकाशन हुआ । लेखक ने पूंजीवादी संकट के एक विस्फोटक दौर को इस किताब में विश्लेषित किया है ताकि पूंजीवाद के तहत गुलामी और साम्राज्य के रिश्तों को समझा जा सके । विश्व पूंजी के इस दौर में गुलामी का स्तर बेहद उच्च था क्योंकि इस व्यवस्था में उत्पादित माल की खपत ब्रिटेन, यूरोप और समूची दुनिया में होती थी । इससे ब्रिटेन को उपनिवेशों के साथ व्यापार संतुलन कायम रखने में आसानी होती थी । दूसरी ओर गुलामी से पैदा होनेवाली वस्तुओं की अमेरिका से बाहर की बिक्री से अर्जित मुनाफ़े के सहारे दास मालिक इस व्यवस्था को विस्तारित करते थे । गुलामी में काम करनेवालों की मेहनत से पैदा कच्चे माल से ब्रिटेन के उद्योगीकरण को गति मिली और दुनिया भर में अपने उपनिवेश कायम करने का सपना देखने का हौसला मिला । 1833 में संसद में कानून बनाकर गुलामी का उन्मूलन किया गया । बस भारत, श्रीलंका और सेंट हेलेना को इस कानून से मुक्त रखा गया । दास मालिकों को भारी हर्जाना दिया गया । गुलामों के विद्रोह होने लगे और अमेरिका में भी दास प्रथा समाप्त हुई । मुक्ति की इस लहर की प्रतिक्रिया हुई और गोरे मुल्कों में नस्ली श्रेष्ठता का विचार मजबूत हुआ । साफ नजर आता है कि अमेरिका में गुलामी के साथ ही ब्रिटेन का साम्राज्यवादी विस्तार भी हो रहा था ।

2021 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से डोरोथी स्यू काबल की किताब ‘फ़ार द मेनी: अमेरिकन फ़ेमिनिस्ट्स ऐंड द ग्लोबल फ़ाइट फ़ार डेमोक्रेटिक इक्वलिटी’ का प्रकाशन हुआ । पूर्वपीठिका के बतौर लेखिका ने दर्ज किया है कि ये आंदोलनकारी पुरुष और स्त्री के बीच समानता से आगे बढ़कर वे ऐसी दुनिया चाहती थीं जहां सभी स्त्री पुरुष फल फूल सकें । उन्हें लेखिका ने सम्पूर्ण अधिकारवादी या सामाजिक जनवादी नारीवादी कहा है । उनका मानना था कि नागरिक और राजनीतिक अधिकार समाजार्थिक अधिकारों से जुड़े हुए हैं । वे यह भी सोचती थीं, असली समानता  सार्वभौमिक और बहुआयामी ही हो सकती है । प्रगति को भी वे सामाजिक अर्थों में समझती थीं । बीसवीं सदी में उनको विभिन्न नामों से जाना गया । शुरुआती दशकों में उन्हें समाजवादी और प्रगतिशील कहा जाता था । बीच के दशकों में न्यू डील उदारवादी या सामाजिक जनवादी कहा जाने लगा । साठ के दशक के दौरान वामपंथी उदारवादी या लोकतांत्रिक समाजवादी भी उन्हें कहा जाने लगा था । इस तरह के नामों में अर्थ परिवर्तन तो होता ही रहता है । इन नामों से ऐसे व्यक्तियों या उनकी विचारधारा की जटिलता, अंतर्विरोध और गतिकी का कोई पता नहीं चलता । उनके नाम जो भी रहे हों इस किताब में वर्णित सभी व्यक्तियों में समतामूलक और लोकतांत्रिक दुनिया बनाने की चाहत साझा थी और उन्हें पूरा करने के लिए उन्होंने अमेरिका तथा विदेश में माकूल संस्थाओं, कानूनों और सामाजिक नीतियों का निर्माण किया ।      

2021 में पी एम प्रेस से पीटर कोल की किताब बेन फ़्लेचर: द लाइफ़ ऐंड टाइम्स आफ़ ए ब्लैक वोबलीके दूसरे संस्करण का प्रकाशन हुआ । इस संस्करण की प्रस्तावना रोबिन डी जी केल्ली ने लिखी है ।

2021 में प्लूटो प्रेस से गार्गी भट्टाचार्य, एडम इलियट-कूपर, सीता बलानी, करीम निशानकियोग्लू, कोजो कोरम, डालिया ग्रेब्रिएल, नादीन एल-एनानी और ल्यूक द नोरोन्हा की किताब ‘एम्पायर’स एन्डगेम: रेसिज्म ऐंड द ब्रिटिश स्टेट’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों का कहना है कि नस्लभेद की हिंसक शक्ति से निर्मित समाज में रहते हुए हमें नस्ल विरोधी होना ही पड़ेगा । बहरहाल इसके प्रभावी विरोध के लिए इसके बदलते रूपों के मुताबिक इसे पहचाना होगा । इसका निर्माण और पुनर्निर्माण हुआ है ।

2021 में वन वर्ल्ड से इब्राम एक्स केन्डी और कीशा एन ब्लेन के संपादन मेंफ़ोर हंड्रेड सोल्स: ए कम्युनिटी हिस्ट्री आफ़ अफ़्रीकन अमेरिका, 1619-2019’ का प्रकाशन हुआ । किताब की शुरुआत उस दिन से होती है जब 1619 में बीस अफ़्रीकी नीग्रो पानी की जहाज से उतरे तो उन्हें पता नहीं था कि अब वे अपने समुदाय के लोगों को कभी नहीं देख सकेंगे । उन लोगों को अंगोला से लाया गया था । 20 अगस्त को उन्हें अमेरिकी महाद्वीप पर उतारा गया था और उसी दिन से अमेरिका के अफ़्रीकी समुदाय का आरम्भ हुआ । 

2021 में सिमोन & शूस्टर से ब्रूस लेवाइन की किताब ‘थेडियस स्टीवेन्स: सिविल राइट रेवोल्यूशनरी, फ़ाइटर फ़ार रेशियल जस्टिस’ का प्रकाशन हुआ । किताब स्टीवेन्स की जीवनी है । स्टीवेन्स ने संसद के भीतर इस बात की गारंटी की कि अमेरिकी संघ को बचाने के लिए दक्षिणी राज्यों से लड़ने वाली सेना को अनुदान की किल्लत न आये । उन्होंने गुलामी और नस्लभेद के विरोध में मजबूत नीतियों को प्रस्तावित किया जिन पर अन्य रिपब्लिकन सांसद बाद में सहमत हुए । उनके साथी उन्हें हमेशा जनमत से एक कदम आगे देखते थे । अक्सर वे इसके विरोध में भी रहते थे जबकि नेतागण आम तौर पर जो चलन में होता है उसका ही साथ देते हैं । वे जनमत का निर्माण करने और जन भावना को आकार देने में सक्षम थे । सही है कि कभी कभी जनता के विरोध के चलते वे हिचक जाया करते थे लेकिन विरोध को धता बताते हुए गुलामी के विनाश और नस्लभेद के प्रतिरोध का समर्थन करते थे । इस ऐतिहासिक काम के नेता के रूप में लिंकन को मान्यता मिली लेकिन थेडियस स्टीवेन्स उनसे एक कदम आगे रहकर इस काम में लिंकन का साथ दिया । लिंकन से एक साल पहले ही गुलामी को अमेरिका में कानूनी अपराध घोषित करने का प्रस्ताव लेकर वे आये थे । दक्षिणी राज्यों की पराजय और लिंकन की हत्या के बाद वे चुप नहीं बैठे । युद्ध के बाद पुनर्निर्माण के समय उन्होंने अश्वेत अमेरिकी जनता के लिए समान नागरिक अधिकारों की मांग की । मतदान और पदाधिकारी बनने के अधिकार पर वे पहले से ही गोलबंदी जारी रखे हुए थे ।       

2021 में मेट्रोपोलिटन प्रेस से थामस हीली की किताबसोल सिटी: रेस, इक्वलिटी, ऐंड द लास्ट ड्रीम आफ़ ऐन अमेरिकन यूटोपियाका प्रकाशन हुआ । किताब की शुरुआत 1972 में एक पुराने प्लांटेशन की हालत के बयान से होती है जिसमें सैकड़ों गुलाम तम्बाकू की खेती किया करते थे । तम्बाकू की कीमत घट जाने से सारा ढांचा ढह गया है । इसके बावजूद पुरानी बुलंदी के निशान मौजूद हैं । विशाल मकान को दिखाते हुए पुराने समय के एक गुलाम ने सोचा कि ऊपर बरामदे में बैठे मालिक पंखा झलते हुए क्या करते । लेखक का अनुमान है कि चतुर्दिक बदलाव से वे भौंचक्का जरूर हो गये होते । जो गुलाम नर नारी बंधन में निराश भाव से खटते थे वे इस समय अश्वेतों की मुक्ति का नया नगर खड़ा करने की महत्वाकांक्षी परियोजना में व्यस्त थे । उस नगर में सत्ता, पूंजी और अवसर में अश्वेतों का हिस्सा बड़ा होना था । सोल सिटी नामक उस नगर को उद्योगीकरण और नगरीकरण की ताकतों से उपेक्षित इलाके में बसाया जाना था और उसे अश्वेत आर्थिक शक्ति का आदर्श होना था । परियोजना के समर्थकों को उम्मीद थी कि इससे दक्षिणी प्रांतों से अश्वेतों का पलायन रुक जायेगा और नतीजतन उत्तरी प्रांतों की झोपड़पट्टियों में भीड़ कम होगी । तीन साल पहले देखा गया यह सपना उन तमाम सपनों में से एक था जो अश्वेतों के बीच लोकप्रिय हो जाया करते थे । इस सपने को देखने वाले सज्जन एक वकील थे और कांग्रेस आफ़ रेशियल इक्वलिटी नामक एक संगठन के मुखिया थे ।           

2021 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से टाइलर स्टोवाल की किताबह्वाइट फ़्रीडम: द रेशियल हिस्ट्री आफ़ ऐन आइडियाका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि आधुनिक इतिहास के सभी इतिहासकारों के जीवन में ऐसा मौका जरूर आता है जब उनका शोध विषय और उनके जीवन के अनुभव एकमेक होने लगते हैं । लेखक का जन्म नागरिक अधिकार आंदोलन की शुरुआत के साथ हुआ था । बचपन और जवानी उस आंदोलन में भागीदारी करते बीती । इस तरह लेखक का समूचा जीवन आजादी और नस्ल के आपसी रिश्तों में आनेवाले बदलावों के इर्द गिर्द बीता । इससे इस किताब के लिखने का मकसद साफ हो जाता है । लेखक के लिए यह किताब निजी, राष्ट्रीय और वैश्विक धरातल पर अतीत और वर्तमान का बयान है ।    

2021 में नार्थ अटलांटिक बुक्स से ब्रीशिया वाडे की किताबग्रीविंग ह्वाइल ब्लैक: द एन्टीरेसिस्ट टेक आन आप्रेशन ऐंड सारोका प्रकाशन हुआ । लेखिका ने स्नातक के दौरान सांस्कृतिक मानवशास्त्र का अध्ययन किया । इसमें संस्कृति, समुदाय और मानव स्वभाव को समझने का मौका मिला । दिक्कत थी कि मानव स्वभाव को सही सही दर्ज करना असम्भव था । नतीजा कि खुद के अनुभवों को विश्लेषित करना शुरू किया ताकि दूसरों को समझ सकें । वे अश्वेत स्त्री होने के नाते इस विषय से खुद को अलगा नहीं सकती थीं । उन्हें अपनी स्थिति के चलते ढेर सारी अकथनीय तकलीफों का गवाह बनना पड़ा । इन तकलीफों को अपने शरीर पर लेकर पीढ़ियों तक लोग खामोश रहे । इन यादों के भूत लेखिका के अचेतन पर निरंतर दस्तक देते रहते थे ।

2021 में बोल्ड टाइप बुक्स से केंहिंद एंड्र्यूज की किताबद न्यू एज आफ़ एम्पायर: हाउ रेसिज्म ऐंड कोलिनियलिज्म स्टिल रूल द वर्ल्डका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि जार्ज फ़्लायड की हत्या के चलते लोगों के मन में भरा गुस्सा फूट पड़ा । साठ के दशक की तरह अमेरिका की सड़कें विरोध प्रदर्शनों से भर गयीं । दुनिया भर के लाखों लोग इन प्रदर्शनों में शरीक हुए । आशा पैदा हुई कि समाज नस्लभेद की सच्चाई का सामना करने को तैयार है ।

2021 में हेमार्केट से तमारा के नापर के संपादन में नाओमी मुराकावा की प्रस्तावना के साथ मरियामे काबा की किताब ‘वी डू दिस ‘टिल वी फ़्री यू एस: एबोलीशनिस्ट आर्गेनाइजिंग ऐंड ट्रान्सफ़ार्मिंग जस्टिस’ का प्रकाशन हुआ । मुराकावा कैपिटोल पर ट्रम्प समर्थकों के धावे से किताब की शुरुआत करते हैं । एक पुलिसवाला दंगाइयों के साथ फोटो ले रहा था तो एक और पुलिसकर्मी दंगाइयों के साथ था । लोग अचरज से पूछ रहे थे कि जो देश अपनी सुरक्षा पर इतना खर्च करता है उसकी सुरक्षा व्यवस्था को लकवा कैसे मार गया । मुराकावा का कहना है कि गोरी श्रेष्ठता को खाद पानी इसी सुरक्षा व्यवस्था से मिलता है । पुलिसकर्मियों में काले लोगों के प्रति नफ़रत का आलम कोई छिपी बात नहीं । उनकी दंड प्रणाली से प्राण देनेवाले अश्वेतों की संख्या साल दर साल बढ़ती रही है । आबादी में उनका हिस्सा महज तेरह प्रतिशत होने के बावजूद गिरफ़्तारियों में तीस प्रतिशत, जेल जानेवालों में 35 प्रतिशत, प्राणदंड पानेवालों में 42 प्रतिशत और आजीवन कारावासियों में 56 प्रतिशत उनका हिस्सा है । किसी भी अन्य देश से अधिक जेलोंवाले उस देश में कोरोना से मरनेवालों का अनुपात जेल में सामान्य नागरिकों का पांच गुना है । पूरी दुनिया में लगभग आठ सौ सैनिक अड्डे कायम करनेवाले इस देश का जन्म ही मूलवासियों के संपत्ति हरण और गुलामी के सहारे हुआ था । ट्रम्प के समर्थकों को राज करने का मंत्र मालूम है । जबर्दस्ती छीन लो और नस्ली शत्रु का आविष्कार करो । जेलों और फौज की यह पूरी व्यवस्था हत्या को उद्योग में बदल देती है ।       

2021 में वनवर्ल्ड से हीथर मैकगी की किताब ‘द सम आफ़ अस: ह्वाट रेसिज्म कास्ट्स एवरीवन ऐंड हाउ वी कैन प्रास्पर टुगेदर’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक समाज के लगभग सभी लोग कुछ बुनियादी सुविधाओं की चाह रखते हैं मसलन पर्याप्त स्कूली अनुदान, भरोसेमंद अधिरचना, सुखद वेतन और बीमारियों से निपटने लायक सरकारी स्वास्थ्य सेवा । फिर भी सभी अमेरिकी लोगों को ये सुलभ नहीं होतीं ।   

2021 में बीकन प्रेस से अलेक्स ज़मालिन की किताब ‘अगेंस्ट सिविलिटी: द हिडेन रेसिज्म इन आवर आब्सेशन विथ सिविलिटी’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने शुरू ही इस बात से किया है कि ट्रम्प ने चुनाव अभियान के पहले दिन से ही राजनेताओं के सार्वजनिक आचरण के कायदों की धज्जी उधेड़ना आरम्भ कर दिया । मेक्सिकोवासियों को खुलेआम बलात्कारी कहा और अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश पर पाबंदी की बात की । गोरों की श्रेष्ठता की वकालत करने वालों की निंदा नहीं की । अश्वेत राष्ट्रपति के आठ साल के शासन में जो नस्ली खुलकर बोल नहीं पाते थे उनके जहरीले विचारों को अमेरिकी समाज की मुख्य धारा में ला दिया । ट्वीट करके विरोधियों का निजी अपमान किया । औरतों पर उनके शरीर को लेकर टिप्पणी की, विकलांगों का मजाक उड़ाया और शरणार्थियों को हत्यारा कहा । हालांकि उनके आरोप झूठे थे लेकिन उनके समर्थक इस झूठ को ही सत्य मानते थे । उनके विरोधी यकीन ही नहीं कर सके थे कि वे चुनाव जीत भी सकते हैं । जनता ने खौफ़ पर काबू पाया और हिम्मत के साथ विरोध का झंडा उठा लिया । शपथ ग्रहण के दूसरे ही दिन स्त्रियों का विराट विरोध प्रदर्शन हुआ । इसका आवाहन स्त्रियों ने किया था लेकिन लैंगिक और नस्ली विषमता, पर्यावरण के विनाश और आर्थिक निजीकरण की चरम दक्षिणपंथी नीतियों के सभी विरोधी उनके साथ आ मिले । भागीदारों ने इसे ट्रम्प शासन का प्रतिरोध कहा । इनमें आपस में मतभिन्नता थी । कुछ लोग मतों के मुकाबले निर्वाचक मंडल की जीत को अलोकतांत्रिक मानते थे, कुछ रूस की दखलंदाजी से खफ़ा थे, कुछ लोग उनकी तानाशाही से आशंकित थे तो अन्य इसे निक्सन, रीगन और बुश शासन की निरंतरता समझते थे । इसके बावजूद ये सभी ट्रम्प की नीतियों के विरोध पर एकमत थे ।

दिन, महीने और साल गुजरने के साथ सहमति बनती गयी कि ट्रम्प की विभाजनकारी नीतियों का मुकाबला करते हुए सबको सभ्यता की सीमा को पार नहीं करना है । अखबार, रेडियो और टेलीविजन पर तमाम लेखक-वार्ताकार इस नुस्खे की वकालत करते नजर आये । सबको राजनीतिज्ञों में स्तर की गिरावट परेशान करने लगी । नियम कानून के पालन को ट्रम्प की गुंडागर्दी की काट घोषित किया जाने लगा । सभ्य बने रहने की सलाह दोनों पक्षों को दी जाने लगी । गोरी श्रेष्ठता के अलम्बरदारों के साथ फ़ासीवाद विरोधियों को भी संयम बरतने को कहा जाने लगा । अभिव्यक्ति की आजादी के लिए बोलने वालों से संभलकर बोलने की अपेक्षा की जाने लगी । बातचीत में दूसरे का पक्ष समझने की चेष्टा को बहुसांस्कृतिक समाज में समायोजन हेतु आवश्यक बताया गया । कहा गया कि जिन लोगों ने मूर्तिभंजन किया अथवा विश्वविद्यालयों पर कब्जा कर लिया उनमें इस गुण का अभाव था ।

जिस समाज में चरमपंथ का बोलबाला होता है वहां सभ्यता फायदेमंद चीज होती है । ऐसे में मध्यमार्ग की ओर समाज लौट आता है तथा ध्रुवांत का प्रबल विरोध उभरता है । जब दुनिया भर में उदार लोकतांत्रिक मूल्यों में गिरावट हो रही है तो मुख्यधारा को सभ्यता आकर्षित करती है क्योंकि इससे ऐसी साझा जमीन पैदा होती है जहां से सहमति बहुत दूर नहीं रह जाती । आक्रामकता का मुकाबला लचीलापन करता है और अतार्किकता को विवेक काबू में रखता है । इसकी उपयोगिता नस्ल से अधिक किसी अन्य प्रकरण में नहीं दिखायी देती ।            

2021 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस से डेस्टिन जेनकिन्स और जस्टिन लेराय के संपादन में ‘हिस्ट्रीज आफ़ रेशियल कैपिटलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । एंजेला पी हैरिस की भूमिका और संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब में नौ लेख संकलित हैं । एंजेला कानून की अध्येता हैं और कहती हैं कि नस्ली पूंजीवाद संबंधी साहित्य में विस्थापन, छीनाझपटी, संचय और शोषण के मामलों में गोरों की श्रेष्ठता की ऐतिहासिक भूमिका रही है । संपादक मानते हैं कि पूंजीवाद के संचालन में नस्ली अधीनता निर्णायक रही है । अटलांटिक महासागर से होनेवाले गुलाम व्यापार और अमेरिकी महाद्वीप के उपनिवेशीकरण के बाद से समस्त पूंजीवाद नस्ली पूंजीवाद रहा है । 

2021 में फ़्लैटिरान बुक्स से अन्ना मलइका टब्स की किताबद थ्री मदर्स: हाउ द मदर्स आफ़ मार्टिन लूथर किंग, जूनियर, मैल्कम एक्स, ऐंड जेम्स बाल्डविन शेप्ड ए नेशनका प्रकाशन हुआ । लेखिका ने किताब के लिखने की कहानी निजी ढंग से बतायी है । वाशिंगटन में आयोजित डगलस पुरस्कार समारोह में भाग लेने वे पति के साथ गयी थीं । उन्हें माहवारी आनेवाली थी इसलिए चिंतित थीं । नहीं आयी तो गर्भवती निकलीं । माता होने के गौरवबोध के साथ गर्भस्थ शिशु के प्रति जिम्मेदारी का अनुभव हुआ । शायद मातृत्व ऐसा ही होता है । उसमें अत्यधिक खुशी के साथ ही दुश्चिंता शामिल रहती है । शोध के दौरान उनकी छुट्टी का साल था इसलिए विशेष परेशानी नहीं महसूस हुई । शोध भी अश्वेत माताओं के बारे में था । इस शोध के क्रम में ही उन्हें इन तीनों माताओं का पता चला जिनसे पर्याप्त प्रेरणा मिलने की आशा थी । इन माताओं के जीवन की खोज से मातृत्व से जुड़ी दुश्चिंताओं के साथ ही साहस का भी अंदाजा मिला । उनका नाम अल्बर्टा किंग, बेर्डिस बाल्डविन और लुइस लिटिल था । समूचे इतिहास में इनकी उपेक्षा हुई । वैसे तो अश्वेत माताओं की गुमनामी कोई अद्भुत बात नहीं लेकिन पुत्रों की मकबूलियत को देखते हुए इन माताओं की उपेक्षा थोड़ी आश्चर्यजनक है । इनके पुत्रों को अश्वेत प्रतिरोध की सफलता, अश्वेत चेतना के विकास और अश्वेत समुदाय की दीर्घजीविता का श्रेय दिया जाता है लेकिन उनकी माताओं का नाम भी मिटा दिया गया । इन माताओं की कहानी लिखने के जरिये लेखिका ने अश्वेत मातृत्व की विशेषता को उजागर किया है जिसमें वे पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान और सूझबूझ का हस्तांतरण करती रहीं ।         

2021 में बीकन प्रेस से लौरा एल लोवेट की किताबविथ हर फ़िस्ट रेज्ड: डोरोथी पिटमैन ह्यूज ऐंड द ट्रान्सफ़ार्मेटिव पावर आफ़ ब्लैक कम्युनिटी ऐक्टिविज्मका प्रकाशन हुआ । जिनकी जीवनी है उनसे लेखिका की मुलाकात 2010 में हुई थी । उस समय वे बच्चों के खेल, किताबों और गीतों में लिंग और नस्ल के मामले पर मौजूद पूर्वाग्रहों पर शोध कर रही थीं ।  

2021 में बीकन प्रेस से ब्री पिकओवर की किताबरीडिंग, राइटिंग, ऐंड रेसिज्म: डिसरप्टिंग ह्वाइटनेस इन टीचर एजुकेशन ऐंड द क्लासरूमका प्रकाशन हुआ । किताब की शुरुआत इस मजबूत दावे के साथ होती है कि अमेरिका न केवल नस्लवादी है बल्कि अश्वेत विरोधी है । नस्लवाद कहने से उन तमाम तरीकों का पता नहीं लगता जिनके जरिए अश्वेत लोगों की हत्या की जाती है और उन्हें बरबाद किया जाता है । इससे पता चलता है कि व्यवस्थित रूप से उन्हें अधिकारों, रोजगार, मकान, शिक्षा और सेहत की सुविधाओं से दूर किया जाता है । फिर भी अश्वेत जीवन, अश्वेत प्रेम, अश्वेत सबलीकरण, अश्वेत प्रतिरोध, अश्वेत खुशी और अश्वेत शिक्षा के प्रति अमेरिका में व्याप्त नफ़रत का सही सही पता नहीं चलता । 2020 को अश्वेत जीवन के प्रति हिकारत के साल के तौर पर याद रखा जायेगा ।     

2021 में क्राउन से डोरोथी ए ब्राउन की किताब ‘द ह्वाइटनेस आफ़ वेल्थ: हाउ द टैक्स सिस्टम इम्पावरिशेज ब्लैक अमेरिकंस- ऐंड हाउ वी कैन फ़िक्स इट’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका ने टैक्स के मामलों की वकालत चुनी ताकि वे नस्लभेद से आजाद हो सकें । माता पिता के पास घर था, भोजन मिल जाता था, पहनने के लिए माता के हाथ के सिले कपड़े और खर्चने के लिए कुछ धन भी होता था । माता पिता नस्लभेद के शिकार रहे थे जब उनकी कमाई से लेकर आवास तक की हदबंदी थी लेकिन उन्होंने तय किया था कि बच्चों को शिक्षा के सहारे अपने पैरों पर खड़ा करेंगे । लेखिका को भी इस सम्भावना में यकीन था । फिर नौ या दस साल की उम्र में सड़क पार करते समय पुलिस की गाड़ी में हथकड़ी में जकड़े एक अश्वेत को पीटता हुआ गोरा पुलिस का आदमी नजर आया । गाड़ी में पिटते व्यक्ति से नजर मिली तो टकटकी लग गयी । माता आम तौर पर नस्लभेद के विरोध में मुखर रहती थीं लेकिन इस घटना पर उनकी खामोशी से बेचारगी का पता चला । इसी वजह से लेखिका ने यह पेशा चुना ।

2021 में स्टेट यूनिवर्सिटी आफ़ न्यू यार्क प्रेस से लोरी लेट्रिस मार्टिन की किताब अमेरिका इन डिनायल: हाउ रेस-फ़ेयर पालिसीज रीएनफ़ोर्स रेशियल इनइक्वलिटी इन अमेरिकाका प्रकाशन हुआ ।

2021 में एच क्यू से सोफी विलियम्स की किताब मिलेनियल ब्लैक: द अल्टीमेट गाइड फ़ार ब्लैक वीमेन ऐट वर्कका प्रकाशन हुआ ।

2021 में स्क्रिबनेर से डोरोथी विकेनडेन की किताब द एजिटेटर्स: थ्री फ़्रेंड्स हू फ़ाट फ़ार एबोलीशन ऐंड वीमेनस राइट्सका प्रकाशन हुआ ।

2021 में रटलेज से हेलेन मोर्गन की किताब द वर्क आफ़ ह्वाइटनेस: ए साइकोएनालीटिक पर्सपेक्टिवका प्रकाशन हुआ ।

2021 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से टेउन ए वान दिज्क की किताबएन्टीरेसिस्ट डिसकोर्स: थियरी ऐंड हिस्ट्री आफ़ ए मैक्रोमूवमेन्टका प्रकाशन हुआ ।

2021 में डब्ल्यू डब्ल्यू नार्टन & कंपनी से केट मासुर की किताब ‘अनटिल जस्टिस बी डन: अमेरिका’ज फ़र्स्ट सिविल राइट्स मूवमेन्ट, फ़्राम द रेवोल्यूशन टु रीकनस्ट्रक्शन’ का प्रकाशन हुआ ।

2021 में बेसिक बुक्स से जोशुआ डी रोथमैन की किताबद लेजर ऐंड द चेन: हाउ डोमेस्टिक स्लेव ट्रेडर्स शेप्ड अमेरिकाका प्रकाशन हुआ ।

2021 में न्यू यार्क यूनिवर्सिटी प्रेस से अलेक्जेंडर लबान हिंटन की किताबइट कैन हैपेन हेयर: ह्वाइट पावर ऐंड द राइजिंग थ्रेट आफ़ जेनोसाइड इन द यू एसका प्रकाशन हुआ ।

2021 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से रिनाल्डो वालकाट की किताबद लांग इमैन्सिपेशन: मूविंग टुवर्ड ब्लैक फ़्रीडमका प्रकाशन हुआ ।

2021 में स्टेट यूनिवर्सिटी आफ़ न्यू यार्क प्रेस से जेसन ई कोहेन, शेरों डी रेनोर और द्वाइने ए मैक के संपादन में ‘टीचिंग रेस इन पेरिलस टाइम्स’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की भूमिका और चायना क्राफ़ोर्ड के पश्चलेख के अतिरिक्त किताब के चार भागों में पंद्रह अध्याय हैं ।

2020 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से एनेट गोर्डन-रीड की प्रस्तावना के साथरेसिज्म इन अमेरिका: ए रीडरका प्रकाशन हुआ । उनका कहना है कि अमेरिका इस समय सामाजिक बदलाव से गुजर रहा है । सालों से इस बात की शिकायत की जा रही थी कि अश्वेत समुदाय को पुलिस की निगरानी कुछ अधिक ही झेलनी पड़ती है और निहत्थे पुरुष, स्त्री और बच्चों की हत्या समेत उनके साथ बर्बर हिंसा होती है । इसके बावजूद मई 2020 में जार्ज फ़्लायड की हत्या के बाद देश उबल पड़ा । लगा जैसे कोई बांध टूट पड़ा हो और सभी पचास राज्यों में विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया और इस आंदोलन के साथ अपनी एकजुटता जाहिर की । दुनिया भर में लोगों ने अपने देश के भेदभाव के साथ इस घटना को जोड़कर गुस्सा जाहिर किया । फ़्लायड की हत्या ने बस चिंगारी का काम किया तथा इसमें निहित सोच और आचरण की समूची व्यवस्था को उजागर कर दिया । इसने नस्ली भेदभाव और गोरी श्रेष्ठता के सदियों पुराने इतिहास को भी नंगा कर दिया । इस इतिहास की छाया वर्तमान नीतियों पर भी पड़ रही है ।     

2020 में रोबिंसन से पेड्राइक एक्स स्कैनलान की किताब ‘स्लेव एम्पायर: हाउ स्लेवरी बिल्ट माडर्न ब्रिटेन’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने बात 1845 की से शुरू की है जब ब्रिटिश साम्राज्य में दासता के उन्मूलन की ग्यारहवीं सालगिरह मनायी जा रही थी । उस समय एक व्याख्यान आयोजित हुआ जिसमें कहा गया कि गुलामी पुराने समय से बहुतेरे मानव समाजों में उत्पीड़न का एक रूप बनी रही है । लेकिन पंद्रहवीं सदी से गुलामों की खरीद बिक्री ने दुनिया को बदल डाला ।   

2020 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से एडी आर कोल की किताब ‘द कैम्पस कलर लाइन: कालेज प्रेसिडेंट्स ऐंड द स्ट्रगल फ़ार ब्लैक फ़्रीडम’ का प्रकाशन हुआ । साठ के दशक में विभिन्न शैक्षिक परिसरों में होने वाले बदलावों को इसमें दर्ज किया गया है । लेखक खुद भी अश्वेत शिक्षा से जुड़े रहे हैं इसलिए यह किताब उनकी रुचि का विस्तार मात्र है । माता पिता स्कूली शिक्षक थे । तीस साल तक उन्होंने स्कूल व्यवस्था में काम किया था । पिता के माता पिता भी स्कूली शिक्षा से जुड़े रहे थे और अश्वेत शिक्षक संघ के सदस्य थे । इस तरह अश्वेत मुक्ति संघर्ष में भी शिक्षा का महत्व लेखक को स्पष्ट था । लेखक की शिक्षा आरम्भ होते समय तक स्कूलों में कानूनी तौर पर रंगभेद समाप्त हो चुका था लेकिन उसकी जगह व्यावहारिक रंगभेद कायम था । अश्वेत बच्चों का सरकारी स्कूल गोरों के निजी शिक्षा संस्थान से दूर कोने में अवस्थित था । दोनों के बीच की विभाजक रेखा का सख्ती से पालन भी किया जाता था । तब भी लेखक को इस विभाजन की सहजता के बारे में सवाल सताया करते थे । उन्हीं सवालों को इस किताब में उच्च शिक्षा के संदर्भ में उठाया गया है । आज भी इस पर बहस होती है कि कुछ खास कालेजों और विश्वविद्यालयों में किसे दाखिला मिलना चाहिए । शहरी शिक्षा परिसरों और सीमाई स्कूलों के रिश्तों पर विवाद होता रहता है ।        

2020 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस से पेज ग्लाट्ज़ेर की किताबहाउ द सबअर्ब्स वेयर सेग्रेगेटेड: डेवलपर्स ऐंड द बिजनेस आफ़ एक्सक्लूशनरी हाउसिंग, 1890-1960’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक बहुतेरे लोग इस बात को जानते हैं कि अमेरिकी नगर नस्ली आधार पर विभाजित और असमानता से भरे हुए हैं । बीसवीं सदी में गोरों के इलाकों में अश्वेत इलाकों के मुकाबले शहरी सुविधाओं की उपलब्धता अधिक रही । इसी दौरान उपनगरों में गोरी आबादी और धन का संकेंद्रण भी बढ़ता रहा । 

2020 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से ब्रांडी क्ले ब्रिमर की किताब ‘क्लेमिंग यूनियन विडोहुड: रेस, रिस्पेक्टेबिलिटी, ऐंड पावर्टी इन द पोस्ट-इमैन्सिपेशन साउथ’ का प्रकाशन हुआ । किताब में उन अश्वेत स्त्रियों के संघर्ष की कहानी सुनायी गयी है जिन्होंने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में नागरिकता, अधिकार और विधवा पेंशन के सवाल उठाये । अमेरिका की एकता को कायम रखने की लड़ाई में इनके पति शहीद हुए थे । इन स्त्रियों के संघर्ष में नस्ल, लिंग और वर्ग की कोटियों का घुलाव मिलाव नजर आता है ।

 

Friday, October 22, 2021

पूंजीवाद और बर्बरता

 


आम तौर पर बर्बरता को असभ्यता या पुराने समय से जोड़कर देखा जाता है । हमारी कल्पना में भी यह बात नहीं आती कि बर्बरता की पूरी धारणा को मनुष्यों के ऐसे सभी समूहों पर थोपा गया है जो किसी भी तरह से भिन्न होते हैं । जहां तक पुराने समय के साथ इसे जोड़ने का संबंध है तो यह जानना उचित होगा कि बहुत सारे अपराध आधुनिक समय में जितने बड़े पैमाने पर किये जा रहे हैं, पुराने समय में उनकी न तो जरूरत थी और न ही उसके लिए आवश्यक साधन उपलब्ध थे । राज्य नामक संस्था के आगमन के साथ पाप से अलग अपराध नामक धारणा की जरूरत सामाजिक नियंत्रण के लिए पड़ी और इस संस्था का लोगों की जिंदगी में इतना दखल पहले कभी नहीं रहा था । समाज से पैदा होने वाली इस संस्था ने धीरे धीरे सामाजिक जीवन को अपने हितों के अनुरूप ढालना शुरू किया तो व्यक्तियों के भिन्न आचरण को काबू करना उसे जरूरी लगने लगा । एक और बात कि कुछ अपराधों को हम पाशविक कहते हैं जिनका पशु जगत में अस्तित्व ही नहीं होता । बर्बरता भी ऐसी ही परिघटना है जिसका इस्तेमाल तो प्रचीन काल के लिए किया जाता है लेकिन इस किस्म के आचरण को आधुनिक समय में आकर विस्तार मिला है । आधुनिक समय की इस बर्बरता के विभिन्न पहलुओं को पहचानने की जो भी कोशिश हुई है उसे देखने से लगता है कि राज्य और तकनीक से इनका गहरा रिश्ता है । आधुनिक काल में हिंसा और बर्बरता के सबसे व्यवस्थित रूप के बतौर युद्ध को समझा जा सकता है जिसके साथ राज्य और तकनीक का गहरा नाता है । युद्ध का कुल मकसद राज्य की सीमाओं का या प्रभाव क्षेत्र का विस्तार रहा है तथा अधिकांश तकनीक संबंधी नवीनता का निवेश भी इस काम में किया जाता रहा है ।  

इस मामले में सबसे हाल का उदाहरण अफ़गानिस्तान में अमेरिका की पिछले बीस साल की मौजूदगी है जिसके इर्द गिर्द अमेरिका के युद्धक इतिहास की छानबीन हो रही है । इस सिलसिले में 2021 में फ़रार, स्त्रास ऐंड गीरू से सैमुएल मोइन की किताब ‘ह्यूमेन: हाउ द यूनाइटेड स्टेट्स एबैन्डंड पीस ऐंड रीइनवेन्टेड वार’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने आमुख में दो वैवाहिक समारोहों का जिक्र किया है जो एक ही दिन दो मुल्कों में आयोजित हुए हैं । इनमें से एक अमेरिका के कनेक्टिकट में आयोजित हुआ है तो दूसरा अफ़गानिस्तान के कंदहार में । मौसम दोनों ही जगह सुहाना है । अमेरिका वाली शादी में वेटर सर्वोत्तम भोजन परोस रहे हैं । अफ़गानिस्तान वाली शादी में उतना बेहतर तो नहीं लेकिन ठीक ठाक भोजन का इंतजाम है । धन और संस्कृति में अंतर के बावजूद दोनों ही जगह पूरा परिवार इस वैवाहिक समारोह में शरीक है । अमेरिका वाली शादी में जो वीडियो तैयार किया जा रहा है उसके लिए ड्रोन की सहायता से पंद्रह मिनट की आसमानी फ़िल्म शूटिंग हो रही है । इसी तकनीक का इस्तेमाल अफ़गानिस्तान में भी हो रहा है लेकिन वहां पर ड्रोन की ऐसी मौजूदगी स्थानीय लोगों की न तो चाहत थी, न उन्होंने इसे भेजा है । युद्ध ने उन दोनों के बीच ऐसा हिंसक रिश्ता बना दिया है । अनंत युद्ध अब अमेरिकी सामान्य लोगों के दैनन्दिन जीवन का अंग हो चला है । दूर देशों में उनकी सरकार के हस्तक्षेप अत्यंत घातक और क्रूर रहे हैं । कितनी भारी ट्रेजेडी है कि अफ़गानिस्तान की अधिकतर शादियों का अंत दफ़नाने की क्रिया में होता है । अमेरिकी सैनिकों को जबसे यह शंका हुई कि अफ़गानिस्तान के वैवाहिक समारोहों में आतंकी नेता शरीक रहते हैं तबसे आतंकवाद विरोधी कार्यवाहियों में मारे जाने वालों में सामान्य तथा बेगुनाह नागरिकों का अनुपात बेतरह बढ़ गया । सही बात है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद इस तरह के हमलों का भय कम हुआ है लेकिन रोबोट के जरिये हमले की इस नयी तकनीक के आगमन और व्यापक प्रयोग ने किसी भी जगह को सुरक्षित नहीं रहने दिया है । इसी परिघटना को उजागर करते हुए  2020 में यूनिवर्सिटी आफ़ मिनेसोटा प्रेस से रेबेका ए एदेलमैन और डेविड किएरान के संपादन में ‘रीमोट वारफ़ेयर: न्यू कल्चर्स आफ़ वायलेन्स’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब में शामिल बारह लेख तीन हिस्सों में संयोजित हैं । पहले हिस्से के लेखों में भविष्य के युद्धों की तस्वीर खींचने की कोशिश की गयी है । दूसरे हिस्से के लेख तकनीक के जरिये नये तरह के युद्धों से परिचय की प्रक्रिया स्पष्ट करते हैं । तीसरे हिस्से में इन तकनीकों के प्रसार के चलते बने नये माहौल का जायजा लिया गया है । संपादकों ने प्रस्तावना में अपनी साझा रुचि का बयान किया है जिसके तहत अमेरिकी नागरिक अपने देश की ओर से छेड़े गये युद्धों के बारे में जिस तरह समझने की कोशिश करते हैं उसकी छानबीन होनी थी । दोनों ही रीमोट युद्ध के नये माहौल को समझना चाहते थे । 2016 में रटलेज से आयसे गुल अन्तिने और अंद्रिया पेटो के संपादन मेंजेंडर्ड वार्स, जेंडर्ड मेमोरीज: फ़ेमिनिस्ट कनवर्सेशंस आन वार, जेनोसाइड ऐंड पोलिटिकल वायलेन्सका प्रकाशन हुआ । किताब में संपादकों की भूमिका के अतिरिक्त चौदह लेख शामिल हैं जिन्हें चार हिस्सों में बांटा गया है । पहले हिस्से में यौन हिंसा के विभिन्न पहलुओं से जुड़े लेख संकलित हैं । इस हिस्से के शुरू में एक टिप्पणी अंद्रिया पेटो ने लिखी है । दूसरे हिस्से के लेख युद्ध, सेना और प्रतिरोध से जुड़ी यादों की लैंगिकता पर विचार करते हैं । इस हिस्से के शुरू में ओर्ना ससोन-लेवी की लिखी टिप्पणी है । तीसरे हिस्से के लेखों में इन यादों की लैंगिकता को कथा और दृश्य माध्यम में ढालने की विशेष समस्या पर विचार किया गया है । इस हिस्से की टिप्पणी बानू कराका की लिखी है । आखिरी चौथे हिस्से के लेख नारीवादी पुन:कल्पना की खासियत को रेखांकित करते हैं । इस हिस्से की टीप आर्लीन अवाकियन की लिखी है । कहने की जरूरत नहीं कि हमारी सभ्यता में स्त्री और पुरुष के बीच के सामाजिक विभाजन की निगाह से युद्ध, जनसंहार या राजनीतिक हिंसा की बात आम तौर पर नहीं की जाती । ऐसे में यह किताब इस सामान्य परिघटना का यह विशेष पहलू उजागर करती है । युद्ध से, जिन पर हमला किया गया उन बाहरी मुल्कों में जो हुआ सो तो हुआ ही देश के भीतर भी ढेर सारे बदलाव आये । उन्हें स्पष्ट करते हुए 2018 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से कैथलीन बेल्यू की किताब ‘ब्रिंग द वार होम: द ह्वाइट पावर मूवमेंट ऐंड पैरामिलिटरी अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका का कहना है कि जिसे नस्ली अहंकार, गोरा राष्ट्रवाद या नस्ली दक्षिणपंथ कहा जा रहा है उस आंदोलन की व्यापकता को इन शब्दों से पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता इसीलिए वे इसे श्वेत सत्ता की स्थापना का आंदोलन कहना उचित समझती हैं ।

पिछले दिनों के युद्ध आम युद्धों से अलग आयाम लिये हुए थे । इसे समझने के क्रम में 2021 में पोलिटी से एंथनी किंग की किताब ‘अर्बन वारफ़ेयर इन द ट्वेन्टी-फ़र्स्ट सेन्चुरी’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि इस समय अमेरिका या यूरोपीय देश अन्य देशों में जो लड़ाइयां लड़ रहे हैं उनमें शहरी युद्ध का आयाम नया जुड़ा है । असल में हमलावर देशों के सैनिक जिन देशों में लड़ने गये थे उन देशों में भी नगरीकरण हो चुका था । उदाहरण उन्होंने इराक के शहर मोसुल का दिया है जहां भारी बमबारी के जरिये आइसिस के आतंकियों को तो परास्त कर दिया गया लेकिन शहर पूरी तरह बरबाद हो गया । घर, सरकारी और व्यावसायिक इमारतें, कारखाने, दुकानें, मस्जिद और अस्पताल तहस नहस हो गये थे । गलियों में मलबा जमा था । पानी, बिजली और मल निकासी की व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी थी । अमेरिकी सैनिकों को भी वह भयावह बरबादी याद रही । आइसिस के लोगों ने शहर में शहीद होने का रास्ता चुना था । मोसुल इराक का दूसरा सबसे बड़ा शहर था । 2014 में आइसिस ने इस पर कब्जा होने के बाद खिलाफ़त की घोषणा कर दी थी । दो साल के अपने शासन के दौरान आइसिस ने जो कुछ किया उसके चलते अंतर्राष्ट्रीय जनमत उनके विरोध में हो गया था । 2016 में अमेरिकी सैनिकों के साथ इराक के सैन्य बल ने हमला बोला । शहर में दो लाख इमारतें थीं । आइसिस के लड़ाके पांच पांच की छोटी टुकड़ियों में शहर भर में फैले हुए थे । गली गली में उन्होंने बारूदी सुरंगें बिछायी थीं । शहर की लड़ाई में अमेरिकी सेना की टुकड़ियों के आगे आगे बुलडोजर चलते थे ताकि गलियों को मलबे से साफ किया जा सके । उनके पीछे टैंक और तोपें गोले दागते हुए बढ़ते थे । आसमान से हेलिकाप्टर से गोलियों की बारिश होती रहती थी । आइसिस के लड़ाकुओं के साथ पचीस हजार शहरी भी हलाक हुए । लेखक के मुताबिक इस सदी की शहरी लड़ाइयों की एक झलक मोसुल की इस लड़ाई से मिलती है । शहरी युद्ध अब धीरे धीरे सामान्य होता जा रहा है । इसे युद्ध का शहरीकरण भी कहा जा सकता है । विडम्बना कि जिन जगहों को आधुनिकता का वाहक होना था वे ऐसे विनाश का वाहक बन रही हैं ।           

सैमुएल मोइन का कहना है कि हमारे जमाने में तलवारों को गलाकर हल के फाल में नहीं बदला गया बल्कि उन्हें पिघलाकर ड्रोन बना लिये गये हैं । इन ड्रोनों की तमाम भूलों के बावजूद मानना होगा कि उनके हमले में सबसे कम गंदगी होती है । अमेरिका ने हमलों में उनके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से साबित कर दिया है कि युद्ध की हिंसक परिघटना को वह मानवीय बनाना चाहता है ।  मानवीयता की इतनी मासूम धारणा ! कहने की शायद जरूरत नहीं कि हिंसा को भी सहनीय और सुंदर बनाने का वर्तमान प्रयोग अनूठा है और इसके पीछे भी मुनाफ़ा कमाने की वही नृशंस आकांक्षा है जिसकी शुरुआत पूंजी पैदा करने के लिए उठाये गये पहले कदम से हो जाती है । ड्रोन की नयी तकनीक की आर्थिकी को समझना मुश्किल नहीं है । इस नयी तकनीक के साथ ही बड़े पैमाने पर निगरानी के लिए भी तकनीक का चलन बढ़ा है । प्रत्येक किस्म के अपराध का समाधान निगरानी की इस तकनीक में खोजा और बताया जा रहा है । सभी जानते हैं कि अधिकतर छोटे अपराधों के मूल में विषमता होती है और इसके चलते गरीब तबकों को दागी या दोषी समझने की एक व्यापक सामाजिक प्रक्रिया भी जारी रहती है । तकनीकी संजाल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसे एक ही बार लगा लेना पर्याप्त नहीं होता बल्कि उसके सुचारु और कारगर संचालन के लिए निरंतर धन लगाना पड़ता है । इस तरह यह तकनीक ही उपभोक्ता के लम्बे समय तक दोहन का साधन भी बन जाती है । युद्ध को छोड़ भी दें तो सामान्य सामाजिक जीवन में तकनीक के साथ जुड़ी क्रूरता का सबसे मारक उदाहरण गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण की वह वैज्ञानिक विधि है जिसके कारण आबादी में लिंगानुपात बेहद खतरनाक तरीके से असंतुलित हो गया है ।                         

आधुनिक समय की हिंसा के विरोध में उपजे विक्षोभ को काबू करने के लिए दमनकारी संस्थाओं का जाल बिछाया गयादुनिया के विभिन्न देशों में पुलिस नामक संस्था का विकास अलग अलग कारणों से हुआ होगा लेकिन उसकी संसारव्यापी उपस्थिति से साबित होता है कि लगभग सभी सरकारों को इसकी जरूरत दुनिया भर में पड़ी और एक देश की सरकार ने दूसरे देश से सीखा कि स्थानीय आबादी को काबू करने के लिए कैसे उसी समुदाय के भीतर के लोगों का सहारा लिया जाये । हाल के दिनों में अमेरिका में अश्वेत समुदाय के उत्पीड़न के साथ पुलिस की व्यवस्थित संलग्नता के कारण उसके खात्मे की बात बहुत तेजी से उठी है । इस प्रसंग में हमें अन्य तमाम देशों के साथ अपने देश के उदाहरण को भी देखना होगा । भारत में पुलिस की स्थापना का गहरा रिश्ता अंग्रेजी राज को कायम रखने से है । अंग्रेजी राज की स्थापना दुनिया भर में उपनिवेश बनाने की तत्कालीन जरूरत का परिणाम थी । यह जरूरत अकूत मुनाफ़ा कमाने की इच्छा से उपजी थी । मुनाफ़ा कमाने के लिए जिस तरह का शोषण होना था उसे बर्दाश्त करना लोगों के लिए बहुत ही मुश्किल था । शासितों के इस विक्षोभ को नियंत्रित करने के लिए सामाजिक नियंत्रण के पुलिसिया तरीके को आजमाया गया । इसके कारण ही दुनिया भर में पुलिस की इस विशाल व्यवस्था का उदय हुआ । सामाजिक नियंत्रण के सभी औजारों की तरह समय समय पर इस व्यवस्था को भी चुस्त दुरुस्त करना पड़ता है । असल में पुलिस में भर्ती होनेवाले व्यक्ति उसी समाज का अंग होते हैं जिसको नियंत्रित करने की जिम्मेदारी उन्हें निभानी पड़ती है इसलिए उनका अमानवीकरण विशेष तौर पर जरूरी होता है । ऐसी सारी व्यस्थाओं का नवीकरण भी उपर्युक्त कारण से समय समय पर आवश्यक होता है । पुलिस व्यवस्था में आये हालिया बदलावों को समझने के लिहाज से 2021 में वर्सो से मार्क नियोक्लीयस की किताब ‘ए क्रिटिकल थियरी आफ़ पुलिस पावर’ का प्रकाशन हुआ । इस किताब की शुरुआत 2014 में फ़र्गूसन में माइकेल ब्राउन की पुलिसिया हत्या के विरोध में प्रदर्शन करने वालों पर आंसूगैस की बौछार से हुई है । लेखक बताते हैं कि हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों पर आंसूगैस की ऐसी बौछार दुनिया भर में सामान्य बात हो गयी है । फिलहाल सरकारों का सबसे लोकप्रिय हथियार आंसूगैस नजर आ रही है । सवाल है कि सरकारें आखिर अपने ही नागरिकों पर आंसूगैस का इस्तेमाल क्यों कर रही हैं । एक जमाने में इस रसायन का इस्तेमाल युद्ध में खूब हुआ करता था । युद्ध में उस पर प्रतिबंध  लगने के बाद जिस तरह उसका इस्तेमाल पुलिस की ओर से अपने ही नागरिकों पर हो रहा है उससे सिद्ध है कि पुलिस का प्राथमिक काम अब समुदाय की जरूरतों पर केंद्रित नहीं रह गया है । पुलिस अब अपने देश के ही विक्षुब्ध नागरिकों के साथ सैनिक हिंसा का सरकारी औजार बन गयी है । आंसूगैस का अधिकाधिक प्रयोग पुलिस के सैन्यीकरण का सबूत है । आंसूगैस से आगे अब हिंसा के नये औजारों में वाटर कैनन, ड्रोन, स्टन ग्रेनेड, टैंक, अवरोधक आभरण और हथियारबंद गाड़ी तक शामिल हो गये हैं । पुलिस धीरे धीरे अर्ध सैनिक बल में बदलती जा रही है । इन सबके चलते तमाम लोग इस दौर में सैन्यीकरण की इस नयी अवस्था को पहचानने की कोशिश कर रहे हैं । पुलिस की इस नयी भूमिका को लम्बे इतिहास में समझने के लिहाज से 2021 में लिवराइट पब्लिशिंग से एलिज़ाबेथ हिंटन की किताब ‘अमेरिका आन फ़ायर: द अनटोल्ड हिस्ट्री आफ़ पुलिस वायलेन्स ऐंड ब्लैक रेबेलियन सिन्स द 1960ज’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने कहानी की शुरुआत एक रेस्टोरेन्ट में अश्वेत विद्यार्थियों द्वारा बैठकर भोजन करने के आग्रह से की है । इस सत्याग्रह में सबसे पहले तीन विद्यार्थी आये । उन्हें डराने के लिए पुलिस का सिपाही डंडा फटकारते हुए आया । जब वे नहीं गये तो होटल के मालिक ने उस दिन होटल ही बंद कर दिया । अगले दिन इसी आग्रह के साथ दो दर्जन विद्यार्थी आये । उसके अगले दिन पचास अश्वेत और तीन गोरे विद्यार्थी पहुंचे यह घटना 1960 के आरम्भ की है । यह खबर तेजी से फैली और विरोध फैलता चला गया । कुछ ही दिनों में तेरह प्रांतों के पचपन नगरों में इस तरह के विरोध सत्याग्रह शुरू हो गये । इसी प्रसंग में 2021 में हेमार्केट से डेविड कोरिया और टाइलर वाल के संपादन में ‘वायलेन्ट आर्डर: एसेज आन द नेचर आफ़ पुलिस’ का प्रकाशन हुआ । इसकी प्रस्तावना राचेल हेर्ज़िंग ने लिखी है । हेर्ज़िंग का कहना है कि 2020 की गर्मियों में महामारी और मंदी से उपजे संकट के अतिरिक्त विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ भी नजर आयी । 25 मई को जार्ज फ़्लायड की हत्या से पहले ही कोरोना की उलझनों, आर्थिक मंदी और पुलिस के हाथों गाहे ब गाहे अश्वेतों की हत्या से सामूहिक गुस्सा खलबला रहा था । जार्ज फ़्लायड की हत्या के बाद उसका प्रबल विस्फोट हुआ और हजारों लोगों ने सड़क पर उतरकर पुलिसिया हिंसा में अंतर्निहित नस्लभेद को चुनौती दी । इसमें कोई दो राय नहीं कि इसमें 2014 और 2015 के पुलिसिया अत्याचार की याद भी शामिल रही होगी इसलिए उस समय के नारे ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ को इस समय के प्रदर्शनों में दुहराया गया । असल में 2014 की घटनाओं के बाद पुलिस सुधार के ढेर सारे सुझाव आये जिनका मकसद अश्वेत समुदाय के प्रति उसकी हिंसा में कमी और पुलिस व्यवस्था में सामुदायिक भरोसे को लौटाना था । उस योजना के तहत लोगों को शरीर पर लगाने के लिए कैमरे बेचे गये थे, पूर्वाग्रह संबंधी प्रशिक्षण दिया गया था, स्थानीय स्तर पर पुलिस के काम की निगरानी के लिए दल गठित किये गये थे और जन सम्पर्क जैसे कुछ सजावटी उपाय किये गये थे । इन सबके बावजूद फ़्लायड की हत्या की घटना सबके लिए सदमे की तरह थी । इसीलिए इस हत्या के बाद पुलिस को ही समस्या की जड़ के बतौर चिन्हित किया गया । उसके लिए जनता के धन का आवंटन रोक देने की मांग अपने आप सामने उभरकर आयी ।

इसके एक कदम आगे जाकर एक के बाद एक विभिन्न शहरों में पुलिस विभाग के खात्मे के प्रयास होने लगे । असल में यह कोई बचकानी भावना नहीं थी, बल्कि लोग साल दर साल स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मुकाबले धन का आवंटन घेरेबंदी और नियंत्रण के उपायों के लिए होता बेबस भाव से देख रहे थे और प्राथमिकता के इस विचलन से खासा नाराज थे । तमाम संगठनों ने इन मांगों को लोकप्रिय बनाने के लिए मेहनत की थी । पुलिस व्यवस्था, नस्लभेद और धन के आवंटन में प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार जनता के बीच लोकप्रिय सवाल के रूप में उभर आये । तमाम मीडिया संस्थानों ने भी अश्वेत समुदाय की जीवन रक्षक नीतियों के पक्ष में धन के आवंटन हेतु पुलिस व्यवस्था पर धन की बरबादी का विरोध शुरू कर दिया । यह मुद्दा इतना उछला कि राष्ट्रपति चुनाव में भी अधिकांश प्रत्याशियों ने इसके विरोध में बोलना जरूरी समझा । दूसरी ओर तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुलिस के आमूल खात्मे की बात को उठाया । पुलिस की ओर से इस मांग पर तत्काल प्रतिक्रिया आयी । फ़्लायड और पुलिस व्यवस्था में बदलाव की बात करने वालों पर सारा दोष धरा गया । विरोध प्रदर्शनों के विस्फोट को दबाने के लिए पुलिस के साथ अर्ध सैनिक बल भी जुट गये । पुलिस ने देश भर में सहायता संबंधी गुहार पर ध्यान देना कम कर दिया और बंदूक की संस्कृति तथा अपराध दर में बढ़त का प्रचार किया ताकि पुलिस की मौजूदगी को सही साबित किया जाये । शासन ने भी इस पहलू को लपक लिया और साहसिक उपायों की विफलता की घोषणा कर दी । इसके तुरंत बाद ही प्रदर्शनकारियों पर गोरे दक्षिणपंथी समूहों की ओर से हिंसक हमले होने लगे । ऐसे एक हमलावर को खुले पुलिस संरक्षण का वीडियो सबूत भी सामने आया । न केवल पुलिस बल्कि ट्रम्प भी ऐसे हमलावरों को उकसाने वाली अपील करते देखे गये । अक्सर इन गोरे हमलावरों को नाबालिग भी बताने की कोशिश हुई । पूंजीवाद को काफी लम्बे समय तक स्थिर रखने के लिए जो सांस्थानिक उपाय किये जाते रहे हैं वे अधिकतर समाज में मौजूद पारम्परिक विभाजनों को हवा देते हैं । इन विभाजनों के गहराने से उन उपायों के विरोध का व्यापक होना और इस विक्षोभ में लोगों की संगठित भागीदारी मुश्किल हो जाती है । इस तरह हमें सामाजिक नियंत्रण की वह गतिकी स्पष्ट होती है जिसकी सहायता से सत्तातंत्र कायम रहता है ।                           

भूख मिटाने के लिए नियमित भोजन सभी प्राणियों की तरह मनुष्य भी करता है । उसकी यह जैवीकीय जरूरत भी मुनाफ़े का साधन बन गयी है । भोजन आधारित इस प्रक्रिया को इस समय बेहद भिन्न आयाम प्राप्त हुआ है । खेत में पैदा होने वाले अनाज से लेकर भोजन हेतु थाली में परोसे जाने तक की प्रक्रिया बेतरह बदल गयी है । इस पूरी श्रृंखला में कदम कदम पर कारपोरेट घरानों ने दखल दिया है और वे पोषक भोज्य सामग्री की जगह समूची आबादी को जहरीला भोजन करा रहे हैं । इस बात को समझने के क्रम में 2021 में रैंडम हाउस से माइकेल मास की मशहूर किताबहुक्ड: फ़ूड, फ़्री विल, ऐंड हाउ फ़ूड जायंट्स एक्सप्लायट आवर एडिक्शन्सका प्रकाशन हुआ । लेखक ने सात साल की एक लड़की की कहानी से बात शुरू की है । वह मैकडोनाल्ड की एक दुकान के बगल में परिवार के साथ रहने आयी । उसे दुकान का खाना रास आने लगा । परिवार बड़ा था, पिता अपने साथ दुकान से खाने की ढेर सारी चीजें लाने लगे । उस कच्ची उम्र में सबका एक साथ दुकान से लाया भोजन करना उत्सव की तरह लगता था । अपने घर का बना बनाया भोजन छोड़कर धीरे धीरे सभी लोग मैकडोनाल्ड के भोजन के आदी होते गये । खाने में दूध की जगह बर्गर ने लेनी शुरू की । देखा गया कि सब समय ही भूख लगी रहती है । पेट भरा महसूस ही नहीं होता था, भरा होने पर भी मैकडोनाल्ड की कोई चीज खाने में अच्छी लगती । आलू से तो चिढ़ होती लेकिन फ़्रेंच फ़्राई देखते ही मुंह में पानी भर आता । भोजन करने के मामले में रात और दिन का अंतर लगभग समाप्त हो चला । भोजन तमाम किस्म की मानसिक चिंताओं और परेशानियों के साथ जुड़ता चला गया । परेशान हुए तो खाना मंगा लिया, खुश हुए तो दावत कर ली । सोलह साल की उम्र तक उसका वजन सौ किलो से अधिक हो गया । भोजन की मानवीय आदत का दोहन करने के लिए ये कारपोरेट कंपनियां जहरीला रासायनिक मिश्रण तैयार करती हैं । मोटापा तो इसका केवल एक दुष्प्रभाव है । रक्तचाप समेत ढेर सारी स्वास्थ्यगत समस्याओं की जड़ इस किस्म के भोजन में है । बीमार होने के बाद व्यक्तियों के दोहन का सेहत और उपचार संबंधी एक और व्यवस्थित तंत्र काम करने लगता है । इसी तंत्र का एक अंग स्वास्थ्य का बीमा है जिससे लगभग प्रत्येक निकाय मुनाफ़ा कमाता है । सेहत से जुड़ा दवा निर्माण और अस्पताल में इलाज का पूरा ही व्यवसाय स्वतंत्र शोध का विषय है । उसकी घिनौनी हरकतों को कुछ हद तक हम सबने इस महामारी में देखा ।             

भोजन की तरह ही नींद भी मनुष्य का दैनिक कर्म है । इसे भी पूंजीवादी शासन ने भिन्न भिन्न तरह से शोषित करना शुरू किया । नींद के लिए मच्छर मारने या भगाने के रसायन और मशीनों का इस्तेमाल भी हम सबकी याद में शुरू हुआ है । पूंजीवाद के लिए नींद लाभदायक होने के साथ समस्या भी रही है । इस प्रसंग में 2019 में वर्सो से फ़्रैनी नूडेलमैन की किताब ’फ़ाइटिंग स्लीप: द वार फ़ार द माइंड ऐंड द यू एस मिलिटरी’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के घर के लोग अनिद्रा के शिकार थे इसलिए सुबह सुबह नींद के बारे में ही बातचीत होती थी । उन्हें ऐसे लोगों को देखकर अचरज होता था जिनके लिए नींद कोई समस्या नहीं होती थी । अच्छी नींद आना उनके घर में सौभाग्य समझा जाता था । इसके लिए वे ध्यान और योग के सभी उपायों को आजमाते रहते थे । इसी तरह 2013 में वर्सो से जोनाथन क्रेरी की किताब ‘24/7 : लेट कैपिटलिज्म ऐंड द एंड्स आफ़ स्लीपका प्रकाशन हुआ । यह किताब नये जमाने की मजदूरों की एक प्रमुख समस्या को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में उठाती है । हम सभी जानते हैं कि उत्पादन और उपभोग की सनक के लिए मनुष्य की निद्रा बड़ा व्यवधान है । नींद में उत्पादन तो सम्भव नहीं, उपभोग जरूर होता है । नींद के नाम पर कमाई के मामले में तमाम मनोचिकित्सकों से लेकर मच्छर भगाने तक के उपायों का उद्योग हमारे रोजमर्रा का अनुभव है । मनुष्य की नींद से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए ही काम की रफ़्तार बढ़ायी जाती है । इसके अलावे भी काम के वाजिब घंटों के सवाल पर बहुत पुरानी लड़ाई को याद करने की जरूरत नहीं लेकिन बारह घंटे की ड्यूटी तो हमारी आंखों के सामने आयी है । यहां तक कि काम के बंद होने और दुबारा शुरू होने के बीच इतना कम समयांतराल होता है कि उसके लिए क्लोपेन नामक एक नया शब्द ही चल पड़ा है । इसका मतलब कारखाने के बंद होने के साथ ही उसका खुलना द्योतित होता है । विदेशी कारोबार की उपभोक्ता सेवाओं को गरीब विकासशील देशों में भेजने के साथ यह पहलू उजागर होता गया क्योंकि उन देशों के सोने जागने के साथ मूल देश के समय का मेल नहीं था । उद्योग के अतिरिक्त सैनिक क्षेत्र में इसकी समस्या तब आयी जब अमेरिका ने एशियाई देशों में बड़े पैमाने पर सैनिक हस्तक्षेप किया । इन देशों में तैनात सैनिकों को अपनी दिनचर्या को नये देश के मुताबिक ढालना पड़ता है ।           

2021 में प्लूटो प्रेस से लीह कोवेन की किताब ‘बार्डर नेशन: ए स्टोरी आफ़ माइग्रेशन’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने सबसे पहले यही घोषित किया है कि सरहद हिंसा की जगह होती है । यह नागरिकताविहीन से नागरिक को, बाहरी को देशी से अलगाती है और कागजविहीन मनुष्यों को जन्म देती है । उन सरहदों का जन्म अन्याय के दीर्घकालीन इतिहास से हुआ है । लोगों को आपस में बांटना ही इनकी उपयोगिता है और वे अमानवीकरण का एक बड़ा स्रोत बनी हुई हैं । कहने की जरूरत नहीं कि आधुनिक राष्ट्रवाद का विकास पूंजीवाद के साथ गहरे जुड़ा हुआ है । इस राष्ट्रवाद ने देशों के भीतर और बाहर भीषण रक्तपात को प्रोत्साहित किया । इसके ही कारण अवैध प्रवासी नामक धारणा अस्तित्व में आयी । पहले अखबारों ने इसका प्रचार किया । फिर सरकारी नीति दस्तावेजों में भी धड़ल्ले से आप्रवासियों को कानून व्यवस्था की समस्या मानना शुरू कर दिया । कहने की जरूरत नहीं कि सरहद की रक्षा के लिए गठित सैन्यबल, जेल और पुलिस जैसे संस्थान, निजी संपत्ति की रक्षा और मजदूरों की हड़ताल तोड़ने के मकसद से ही स्थापित किये गये थे । इनकी जिम्मेदारी शांति की स्थापना नहीं, विषमता को कायम रखना है । कानून के सहारे उन लोगों के मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जाता है जो सरहदों को पार करते हैं । लेखक का कहना है कि कोई भी मनुष्य अवैध नहीं होता ।     

2021 में पोलिटी से बाइउंग-चुल हान की जर्मन भाषा में 2019 में छपी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘कैपिटलिज्म ऐंड द डेथ ड्राइव’ का प्रकाशन हुआ । अनुवाद डैनिएल स्टुएर ने किया है । लेखक का कहना है कि जिसे वृद्धि कहा जाता है वह असल में कैंसर के प्रसार की तरह है । उत्पादन और वृद्धि का वर्तमान उन्माद मृत्यु के उन्माद की तरह ही नजर आ रहा है । उत्पादन बहुत कुछ विध्वंस की तरह हो गया है । वाल्टर बेंजामिन ने कभी फ़ासीवाद के सिलसिले में कहा कि उस समय मनुष्यों को अपना ही संहार चरम सौंदर्यानुभूति महसूस होता है । लेखक के मुताबिक यह बात वर्तमान पूंजीवाद पर पूरी तरह लागू होती है । इस लिहाज से मानवता का इतिहास किसी आत्महंता संक्रामक रोगाणु की तरह प्रतीत हो रहा है । वृद्धि और विनाश एक ही हो गये हैं । फ़्रायड भी इस राय से सहमत प्रतीत होते हैं । सभ्यता के बारे में लिखते हुए उन्होंने महसूस किया कि मनुष्य आत्महंता प्राणी है । कभी कभी उन्हें लगता था कि विवेक का अनुसरण करते हुए वह उच्चतर लक्ष्य की ओर आकर्षित होता है लेकिन अंतत: वह आवेगों के काबू में रहता है । फ़्रायड की किताब के पूरा होने के कुछ समय बाद ही महामंदी आयी । उससे फ़्रायड की इस मान्यता की पुष्टि हुई कि पूंजीवादी अर्थतंत्र में मनुष्य की बर्बरता और आक्रामकता सबसे अधिक व्यक्त होते हैं ।            

2020 में रटलेज से विक्टोरिया ई कोलिन्स और डान एल रोठे की बेहतरीन किताब ‘द वायलेन्स आफ़ नियोलिबरलिज्म: क्राइम, हार्म ऐंड इनइक्वलिटी’ का प्रकाशन हुआ । किताब में नवउदारवाद के सामाजिक असरात का अध्ययन किया गया है । हिंसा और नुकसान की परिघटना का उत्तरी गोलार्ध में विषमता के चलते लगातार पुनरुत्पादन हो रहा है । अमेरिका के एक शहर टोरन्टो का जिक्र करते हुए लेखिका बताती हैं कि वहां सड़क पर कोई न कोई प्रतिदिन अनियंत्रित वासना या धन के लोभ में उन पर हमला करता है । कई बार दिन भर में ये हमले एकाधिक बार होते हैं । ये हमलावर हत्या के उन्माद से ग्रस्त नहीं होते, न ही वे पेशेवर हत्यारे होते हैं । वे किसी कंपनी के अधिकारी या नेता भी नहीं होते जिन्हें मनुष्य की जान से कीमती अपना स्वार्थ महसूस होता है । इनकी बजाय ये सभी हमलावर वाहन चालक होते हैं । पैदल या साइकिल अथवा मोटरसाइकिल से चलते हुए रोज उनको इस समस्या का सामना करना पड़ता है । इन हमलों में जान तो नहीं गयी लेकिन उनको भावनात्मक रूप से काफी चोट लगी । वे मनुष्यों को तो चोटिल करते ही हैं, पर्यावरण, पालतू जानवरों या शहरी जीवन को भी भयंकर नुकसान पहुंचाते हैं ।