Tuesday, March 3, 2026

रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल

 

                             

2024 में ब्रिल से माइक ताबेर के संपादन में ‘द फ़ाउंडिंग आफ़ द रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल: प्रोसीडिंग्स ऐंड रेजोल्यूशंस आफ़ द फ़र्स्ट कांग्रेस, 1921’ का प्रकाशन हुआ । किताब में संपादकीय प्रस्तावना के अतिरिक्त इसके दस्तावेज संकलित किये गये हैं । इस संगठन की एक ही कांग्रेस 1921 में मास्को में हो सकी । इसे प्रोफ़िंटर्न भी कहा जाता है । इसका मकसद ट्रेड यूनियनों के विश्व आंदोलन को जन्म देना था ताकि दसियों लाख मजदूरों के संघर्ष के आधार पर पूंजीवाद को खत्म करके सर्वहारा का शासन स्थापित किया जा सके । शुरू के सालों में इस संगठन में दुनिया भर के आंदोलनों में शामिल लोग जुड़े और अंतर्राष्ट्रीय वर्ग संघर्ष के लिहाज से इसका भारी महत्व भी बना । कोमिंटर्न के भीतर यह सबसे बड़ा संगठन साबित हुआ । इसके इस महत्व के बावजूद कोमिंटर्न के इतिहास के अध्येताओं की ओर से इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया । कुछ अध्येताओं ने तो इसके बारे में नकारात्मक बातें भी लिखीं । मसलन ज्योफ़्री स्वेन के अनुसार मजदूर आंदोलन के इतिहास में इसका स्थान कभी पादटिप्पणी से अधिक नहीं होगा । राबर्ट सर्विस ने भी कोमिंटर्न के इन सहायक संगठनों का कुछ खास असर मंजूर नहीं किया । ई एच कार ने माना कि इसकी स्थापना बहुत उत्साह के साथ की गयी लेकिन कोई प्रत्याशित नतीजा नहीं निकला । इसका इतिहास जिन लोगों ने लिखा उन्होंने भी इसे कोमिंटर्न का परिशिष्ट ही माना । कोमिंटर्न के एक इतिहासकार ने इसके निर्माण को उपयोगी नहीं माना । इसे विफल प्रयास भी कहा गया । इन सबसे इस संगठन के अंतर्विरोधों को समझने में मदद मिलती है । केवल एक किताब में इस संगठन का संतुलित मूल्यांकन हुआ है । इसमें इसकी खूबियों और खामियों का जिक्र करते हुए इसके विकास के विभिन्न चरणों का वर्णन किया गया है । प्रस्तुत किताब में इसकी स्थापना कांग्रेस के दस्तावेज संग्रहित हैं ताकि पाठक इसका स्वतंत्र मूल्यांकन कर सकें । साथ ही इस संग्रह का मकसद लेनिन के समय कोमिंटर्न की जीवंतता को भी पाठकों के सामने प्रस्तुत करना है । उस समय दुनिया भर में इसके दसियों लाख सदस्य और समर्थक थे । उस दौरान कोमिंटर्न ने अनेक सहायक संगठनों का निर्माण किया जिनका अपना स्वतंत्र इतिहास है । उनकी खूबियां भी अपने किस्म की थीं और उनके नेता भी स्वतंत्र व्यक्तित्व के स्वामी थे । इनकी स्वायत्तता और स्वतंत्र पहल हुआ करती थी । प्रोफ़िंटर्न भी इसी तरह का संगठन था । इन सहायक संगठनों का प्रभाव कोमिंटर्न की विभिन्न देशों की शाखाओं से अलग भी हुआ करता था । इन संगठनों के इतिहास के सहारे शुरुआती कोमिंटर्न को समझा जा सकता है ।

प्रथम इंटरनेशनल में यूरोप और उत्तरी अमेरिका की मजदूर सभाओं और ट्रेड यूनियनों का प्रतिनिधित्व था क्योंकि उस समय तक मजदूर वर्ग की राजनीतिक पार्टियों का व्यापक उभार नहीं हुआ था । इसके कारण उसने वर्ग संघर्ष में ट्रेड यूनियनों को केंद्रीय महत्व दिया था । ट्रेड यूनियनों को पूंजी और श्रम के बीच छापामार लड़ाई का साधन तो माना ही गया, मजूरी श्रम और पूंजी की सत्ता वाली व्यवस्था से पार पाने की संगठित शक्ति भी उन्हें कहा गया । मजदूर वर्ग की सम्पूर्ण मुक्ति के व्यापक हित में मजदूरों के संगठन केंद्र के बतौर सचेत काम की अपेक्षा भी उनसे की गयी थी । इस संगठन ने विभिन्न देशों के हड़ताली मजदूरों की मदद के लिए अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के ठोस अभियान संचालित किये । उनकी लड़ाई को मजबूती प्रदान करने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद भी जुटाई गयी । इस तरह इसने मजदूर वर्ग की आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता की शानदार परम्परा शुरू की । मार्क्स ने इस एकजुटता को ही इंटरनेशनल का बुनियादी काम बताया था । उनका मानना था कि इस जीवनदायी सिद्धांत को दुनिया के सभी देशों के मजदूरों में ठोस आधार प्रदान करने से वांछित उद्देश्य की प्राप्ति हो सकती है ।

प्रथम इंटरनेशनल का इतिहास मार्क्सवादियों और बाकुनिन के समर्थक अराजकतावादियों के बीच निर्णायक संघर्ष के लिए भी महत्व का है । इस संघर्ष की वजह से दुनिया भर के मजदूर आंदोलन में दरार पड़ गयी । इसमें एक ओर तो मार्क्सवादी लोग अनेक जगहों पर सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टियों और ट्रेड यूनियनों के निर्माण में लगे तो दूसरी ओर बाकुनिन के समर्थक विभिन्न देशों में अराजक और संघाधिपत्यवादी राजनीति के हामी हुए । 1889 में दूसरे इंटरनेशनल की स्थापना के समय तक मजदूर और समाजवादी पार्टियों ने भरपूर ताकत अर्जित कर ली थी । उनके साथ ही ट्रेड यूनियनों का भी विकास हुआ जिनके संघ भी राष्ट्रीय स्तर पर संगठित हुए । दूसरे इंटरनेशनल ने मजदूर वर्ग की इन पार्टियों के साथ ट्रेड यूनियनों को भी सदस्यता दी । 1901 में ट्रेड यूनियन केंद्रों के अंतर्राष्ट्रीय सचिवालय का गठन हुआ । इसकी पहल जर्मनी की यूनियनों की थी । इसका कारण था कि पार्टियों और यूनियनों का विकास स्वतंत्र रूप से हो रहा था । सचिवालय को 1913 में इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियंस (इफ़्टू) कहा गया । इसके भीतर वामपंथी लोगों की धारा भी थी जो सैन्यवाद तथा इसी तरह के अन्य सवालों पर राजनीतिक अभियान चलाते थे । इसका गठन आपस में सूचना के आदान प्रदान के लिए किया गया था और विश्व स्तर पर ट्रेड यूनियन कार्यवाही इसके कार्यक्रम का अंग नहीं थी फिर भी इसने पार्टियों से अलग ट्रेड यूनियनों की स्वतंत्रता का दावा दूसरे इंटरनेशनल में मजबूत किया । इसका कहना था कि सर्वहारा के मुक्ति संग्राम में पार्टी के समान ही महत्वपूर्ण भूमिका यूनियन को भी निभानी है । इसके बावजूद ये दोनों संगठन अलग हैं । इनकी प्रकृति और सीमा की भिन्नता ही इनकी स्वतंत्र कार्यवाही का स्रोत है । इसके बावजूद इस संघर्ष में ऐसा साझा इलाका बढ़ता जा रहा है जहां दोनों के समन्वय से लाभ होगा । इस तरह पार्टी और ट्रेड यूनियनों के बीच सहकार विकसित होगा ।

जर्मनी और ब्रिटेन की यूनियनें सबसे मजबूत थीं और उन्हें सुधारवादी कहा जाता है । वे पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर ही प्राप्य सुधारों के लिए संघर्ष करने तक के ही पक्ष में थीं । वे ट्रेड यूनियन निष्पक्षता का प्रचार करती थीं । इसका मतलब था कि यूनियनों को व्यापक राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों से दूरी बरतनी चाहिए तथा पगार या काम के हालात जैसे रोजमर्रा के सवालों पर अधिक ध्यान देना चाहिए । राजनीति को राजनीतिक पार्टियों के लिए छोड़ देना ये लोग सही समझते थे । इसी से अपने देश के नियोक्ता वर्ग के राष्ट्रीय हितों के साथ खड़े होने की राह तैयार हुई । इस राष्ट्रवादी वैचारिक नजरिए के नतीजे प्रथम विश्वयुद्ध में पूरी तरह सामने आये । इस युद्ध ने पूरी दुनिया में समाजवादी पार्टियों को राष्ट्रीय आधार पर बांट दिया । इसी तरह ट्रेड यूनियन आंदोलन भी राष्ट्रीय विभाजन का शिकार हुआ । जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों के मजदूर संघ अपने देशों की पूंजीवादी सरकारों के समर्थन में खड़े हो गये । उन्होंने युद्ध प्रयासों के पक्ष में नागरिक शांति या पवित्र सहयोग की घोषणा कर दी । इसके साथ ही दूसरे इंटरनेशनल का पतन हो गया और 1901 में स्थापित ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल भी बिखर गया । इस रुख का विरोध जल्दी ही पार्टियों के साथ ट्रेड यूनियन में भी प्रकट हुआ । 1915 में ज़िम्मरवाल्ड सम्मेलन ने युद्ध प्रयासों के समर्थन की नीति को खारिज कर दिया । अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन को फिर से खड़ा करने की कोशिश होने लगी ।

युद्ध जब लम्बा खिंचने लगा तो उसके बोझ से मजदूर अपना विक्षोभ अधिकाधिक जाहिर करने लगे और प्रतिरोध की घटनाओं में तेजी आयी । मजदूरों को इसमें यूनियन के नेताओं का सहयोग नहीं मिला । इससे सचेत मजदूरों में पुरानी यूनियनों से नाता तोड़ने और नये क्रांतिकारी मजदूर संगठन बनाने की प्रवृत्ति पैदा हुई । यूनियन अधिकारियों के असहयोग के बावजूद मजदूरों के संघर्ष धीमे नहीं हुए । 1917-18 में युद्धरत देशों में हड़तालों की लहर आयी । जुझारूपन का माहौल व्याप्त था । 1917 में रूसी क्रांति की जीत से इस भाव को भड़का दिया । दुनिया भर के विद्रोही मजदूर अपनी सत्ता के सपने से रोमांचित हो उठे । सभी जगहों पर लाखों मजदूर इन रूसी मजदूरों की राह पर चलने को बेचैन हो गये । 1918 में विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ स्थिति बदल गयी । यूरोप में देश दर देश क्रांति का उभार हुआ और बड़े वर्गीय टकराव फूट पड़े । एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका में उपनिवेशवाद के विरुद्ध विद्रोह रोज रोज की बात हो चले ।

ऐसी हालत में मजदूर ट्रेड यूनियनों में संगठित होने लगे क्योंकि ये उन्हें अपने बुनियादी हितों की रक्षा का पहला साधन प्रतीत होती थीं । युद्ध से पहले दुनिया भर की यूनियनों  में जितने सदस्य थे उसके चार गुना सदस्य युद्ध बीतने के बाद दर्ज किये गये । यूनियनों की ताकत बढ़ने के साथ ही उनकी प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय कार्यवाही की मांग होने लगी । रूसी यूनियनों ने आगे आकर जुझारू वर्ग संघर्ष के आधार पर ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल के फिर से गठन की बात शुरू की । 1918 में उन्होंने मास्को में एक विश्व ट्रेड यूनियन सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव रखा लेकिन साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा रूस पर प्रतिबंध की वजह से यह सम्मेलन न हो सका । इस बीच दूसरे इंटरनेशनल के ट्रेड यूनियन अधिकारी अपना संगठन बनाने में जुटे । क्रांतिकारी उभार के मद्देनजर वे अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क बनाना चाहते थे । 1919 में दूसरे इंटरनेशनल का पुनर्गठन हुआ और उसी के साथ इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियन्स की स्थापना की गयी । एम्स्टर्डम में इसका स्थापना सम्मेलन हुआ इसलिए इसे एम्स्टर्डम इंटरनेशनल भी कहा जाता है । इसने अपने आपको ऐसे दबाव समूह के रूप में देखा जो अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों को लोकतांत्रिक बनाये रखने के लिए कटिबद्ध थी । उसने कहा कि लीग आफ़ नेशंस को प्रतिक्रिया और उत्पीड़न का केंद्र बनने से रोकने की जिम्मेदारी मजदूर वर्ग की है और इसके लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होकर लीग को नियंत्रित करने की ताकत हासिल करनी होगी । इससे कुछ ऐसे भी श्रमिक संघ जुड़े थे जो इसके पहले से मौजूद रहे थे इसलिए स्वतंत्र और समानांतर निकायों की तरह काम करते रहे ।

उस समय के विश्व ट्रेड यूनियन आंदोलन में संघाधिपत्यवादी प्रवृत्ति भी काफी मजबूत थी । इसके समर्थक अपने आपको बाकुनिन के अराजकतावाद से जोड़ते थे, दोनों एक दूसरे का साथ देते थे लेकिन दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व भी था । स्पेन, फ़्रांस और इटली में इनका बोलबाला था । कुछ यूरोपीय देशों के अतिरिक्त अमेरिका में भी इनकी यूनियनें कार्यरत थीं । इनमें फ़्रांसिसी सबसे अधिक संगठित थे । इन लोगों का मानना था कि वर्ग संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है तथा श्रम और पूंजी के बीच टकराव असमाधेय होता है । पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूर वर्ग का शोषण भौतिक ही नहीं नैतिक भी होता है । वे लोग राजनीति को यूनियन गतिविधि से बाहर की चीज मानते थे । यूनियन के सदस्य उसके बाहर अपनी विचारधारा के अनुसार राजनीति करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन यूनियन में वे अपने विचार नहीं थोप सकते । पूंजीवाद के उन्मूलन और समाज को फिर से बनाने के लिए वे यूनियनों को प्राथमिक क्रांतिकारी औजार मानते थे । आंदोलन के सहारे यूनियन मजदूरों की अवस्था में सुधार के उनके प्रयासों का समन्वय करती है । इनमें काम के घंटों में कमी या वेतन की बढ़ोत्तरी आदि शामिल हैं । ये प्रयास ट्रेड यूनियन आंदोलन का एक पहलू हैं । यह तो आम हड़ताल या जन उभार के जरिए सम्पूर्ण मुक्ति की तैयारी है । आज ट्रेड यूनियन प्रतिरोध का औजार है लेकिन भविष्य में उत्पादन और वितरण की नयी व्यवस्था तथा समाज के पुनर्गठन की बुनियाद होगा । उनके मुताबिक इसके लिए मजदूर वर्ग को नियोक्ताओं के विरुद्ध सीधी कार्यवाही करनी होगी ।

इन मान्यताओं के बावजूद ट्रेड यूनियन आंदोलन की मुख्य धारा में इन्होंने कभी विभाजन नहीं पैदा किया । साथ रहते हुए भी वाम अल्पसंख्यक की तरह इनका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहा । इनका स्वतंत्र इंटरनेशनल बनाने के लिए जो सम्मेलन हुआ उसमें कोई आम सहमति न बन पाने से सूचना ब्यूरो बनाने का ही फैसला हो सका । प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इनके भीतर भी वही फूट नजर आयी जो अन्य समाजवादी पार्टियों में नजर आयी थी । इनके फ़्रांसिसी नेतृत्व ने तो फ़्रांस की सरकार का साथ उसके युद्ध प्रयासों में दिया लेकिन इनका युद्ध विरोधी गुट ज़िम्मरवाल्ड आंदोलन के साथ गया । इसमें युद्ध समर्थक समाजवादियों के उन्मादी राष्ट्रवाद का विरोध करने वाले शामिल थे ।

कोमिंटर्न के नेताओं की योजना में रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल का गठन नहीं था । सांगठनिक रूप से स्वतंत्र ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की धारणा बोल्शेविक नेताओं के दिमाग में नहीं थी । अनेकानेक कारणों से इसकी स्थापना हुई । कम्युनिस्ट आंदोलन और रूसी क्रांति के साथ सभी वामपंथी यूनियनों की सहानुभूति और संबद्धता बताने की जरूरत नहीं है । इस क्रांति के चलते ही इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियन्स के सभी घटक इसकी ओर खिंच आये । इसमें शामिल इटली और स्पेन की यूनियनें 1919 में कोमिंटर्न की स्थापना के साथ इसमें आने का प्रयास करने लगीं । उनके साथ कुछ अन्य देशों की यूनियनें भी कोमिंटर्न की ओर आकर्षित हुईं । शुरू में महज कोमिंटर्न का ट्रेड यूनियन विभाग खोलने की योजना थी । उसकी दूसरी कांग्रेस में इस आशय का प्रस्ताव भी पारित हुआ । इसी दिशा में मास्को आने पर कुछ ट्रेड यूनियन नेताओं की अनौपचारिक बैठकें और मंत्रणा भी होती रही । इसी क्रम में सात देशों के ट्रेड यूनियन आंदोलन के प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षरित एक घोषणा भी 15 जुलाई 1920 को जारी की गयी जिसमें रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल बनाने का प्रस्ताव था । कोमिंटर्न के साथ इस प्रस्तावित निकाय के सांगठनिक संबंध के बारे में स्पष्टता नहीं थी ।  

संघाधिपत्यवादी यूनियनों ने 1020 के अंत में बर्लिन में एक सम्मेलन किया जिसमें रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की स्थापना कांग्रेस में शामिल होने का फैसला तो हुआ लेकिन कोमिंटर्न के साथ मतभेद भी खुलकर जाहिर किया गया । दूसरी ओर मास्को से यह अपील की गयी कि जुझारू ट्रेड यूनियनें एम्सटर्डम इंटरनेशनल से नाता तोड़ लें और नये क्रांतिकारी केंद से जुड़ें । इस विवाद को मास्को बनाम एम्सटर्डम भी कहा गया है । नये केंद्र की ओर अधिकाधिक यूनियनों को जाते देखकर एम्सटर्डम केंद्र चिंतित हुआ और उसने बहुत सारे मास्को समर्थक जुझारू वामपंथी यूनियनों को निष्काषित किया । 1920 की लंदन कांग्रेस में एम्सटर्डम इंटरनेशनल ने ट्रेड यूनियन में किसी बाहरी केंद्र द्वारा अपनी विचारधारा के अनुरूप युद्ध संबंधी रुख का प्रचार करने की निंदा की । मई 1921 में उन्होंने फैसला कर लिया कि कोई भी ट्रेड यूनियन एक साथ दो इंटरनेशनलों से नहीं जुड़ सकता । इसका मतलब था कि मास्को केंद्र से जुड़े यूनियनों को एम्सटर्डम के इस केंद्र को छोड़ना होगा । निष्काषन तेजी से होने लगे । खासकर जर्मनी में बहुत सारे व्यक्तियों और स्थानीय यूनियनों को बाहर कर दिया गया । फ़्रांस में भी यही प्रक्रिया चली जिसके चलते सुधारवादी और क्रांतिकारी यूनियनों ने अपने अपने केंद्र चुन लिये । प्रचार किया जाता है कि कोमिंटर्न ने अपना ट्रेड यूनियन केंद्र स्थापित करके मजदूर आंदोलन में दरार डाल दी लेकिन लेखक इसे पूरी तरह सच नहीं मानते । एम्स्टर्डम समूह से बाहर आने और रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल में शामिल होने की अपील को ट्रेड यूनियन का विभाजन नहीं कहा जा सकता । इसकी जगह इस समूह ने ट्रेड यूनियन एकता का पक्ष लिया । जिन्होंने इन लोगों को बाहर निकाला था उनका भी इन्होंने साथ दिया और अपने समूह में उन्हें भी शामिल किया ।

इसे लेखक ने रेड इंटरनेशनल आफ़ लेबर यूनियन्स कहा है । इन शब्दों का संक्षेप रीलू होता है । रीलू के नेता सोलोमन ए लोज़ोव्सकी रहे । उनका असली नाम सोलोमन अब्रामोविच द्रिद्ज़ो था । बोल्शेविक पार्टी में गोपनीयता के लिहाज से लोज़ोव्सकी अपनाना पड़ा । 1908 से 1911 तक उन्होंने बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच एकता की भरपूर कोशिश की । इसमें विफल रहने पर उन्होंने रूसी क्रांतिकारी आंदोलन से अपने को अलग कर लिया । निर्वासित होकर वे पेरिस में रहे और फ़्रांसिसी मजदूर आंदोलन में सक्रिय रहे । रूसी निर्वासितों के बीच एकता की कोशिश भी वे इस दौरान करते रहे । क्रांति के बाद रूस लौटकर बोल्शेविक पार्टी में वे शामिल हुए और पहले की तरह मजदूर आंदोलन में सक्रिय हुए । क्रांति के बाद संयुक्त समाजवादी सरकार के गठन का उन्होंने प्रस्ताव किया और नयी सरकार के कुछ कदमों की आलोचना की । उनको पार्टी से निकाल दिया गया और 1919 के अंत में ही फिर से दाखिला मिला । इस इतिहास के कारण वे रीलू के नेता पद की पहली पसंद नहीं थे । शुरू में रूसी ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन के नेता तोम्सकी को रीलू का महासचिव बनाने की योजना थी लेकिन कांग्रेस से कुछ ही समय पहले पार्टी के साथ विरोध के कारण उन्हें मास्को से दूर भेज दिया गया था । वे कांग्रेस में भाग नहीं ले सके इसलिए मजबूरी में लोज़ोव्सकी को नेता चुनना पड़ा । त्रोत्सकी ने बाद में लिखा कि उन्हें इस पद पर अस्थायी बंदोबस्त के बतौर मंजूर किया गया था और पहला मौका मिलते ही उनकी जगह किसी अन्य नेता को ले आना था ।

लोज़ोव्सकी को विभिन्न भाषाओं का ज्ञान तो था ही, यूरोपीय मजदूर आंदोलन की गहरी जानकारी भी थी इसलिए चुने जाने के बाद वे इस काम के लिए अपरिहार्य हो गये और उनका विकल्प कभी खोजा नहीं जा सका । शुरू में वे स्तालिन के समर्थक रहे लेकिन बाद में 1949 में उनकी गिरफ़्तारी हुई और 1952 में उन्हें गायब कर दिया गया । मुकदमे के दौरान उन्होंने खुद को सही साबित करने का प्रयास किया और अपने साथियों का साथ हिम्मत से दिया ।

रीलू की स्थापना कांग्रेस 3 जुलाई 1921 को हुई । इसमें 41 देशों के 380 प्रतिनिधि शामिल थे । कांग्रेस में कम्युनिस्टों का बहुमत था । अनेक देशों में वे ट्रेड यूनियनों के नेता थे । जहां नेता नहीं थे वहां भी स्थापित यूनियनों में मजबूत अल्पसंख्यक समूह थे । जहां उनका प्रभाव कम था वहां भी उन्हें महत्वपूर्ण समझा जाता था । कांग्रेस में खासकर स्पेन और फ़्रांस से संघधिपत्यवादी ताकतें भी थीं । फ़्रांस में उन्हें निकाल दिया गया और उन्होंने स्वतंत्र यूनियन बना ली । इसके अतिरिक्त इटली, अमेरिका और कनाडा से भी इस धारा की यूनियनों के नेता आये थे । इनके अलावे उनके समर्थक व्यक्ति यूरोप के अन्य देशों से भी आये थे । एम्सटर्डम इंटरनेशनल से जुड़ी दो यूनियनों का भी प्रतिनिधित्व कांग्रेस में हुआ । नार्वे की यूनियन के आधिकारिक प्रतिनिधि मौजूद थे तो इटली से दो पर्यवेक्षक शामिल हुए थे । कुछ देशों के प्रतिनिधिमंडल विभाजित थे । मसलन जर्मनी के प्रतिनिधिमंडल में बहुमत स्थानीय यूनियनों की थी जिनके केंद्र में कम्युनिस्ट थे । उनके साथ कुछ प्रतिनिधि संघाधिपत्यवादी यूनियनों के भी थे । इसी तरह फ़्रांसिसी प्रतिनिधिमंडल में कुछ लोग कोमिंटर्न के साथ काम करने के पक्ष में थे तो कुछ उसका विरोध करते थे । इटली के प्रतिनिधिमंडल में कम्युनिस्ट अल्पसंख्या में थे । उनके साथ आधिकारिक पर्यवेक्षक भी महज सूचना हेतु आये हुए थे । अमेरिका और कनाडा के प्रतिनिधिमंडल में स्थानीय यूनियनों में सक्रिय कम्युनिस्ट थे । इंडस्ट्रियल वर्कर्स आफ़ द वर्ल्ड ने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजा था जिसके सदस्यों ने कांग्रेस के सभी मुख्य फैसलों का विरोध किया । इनके अतिरिक्त विलियम ज़ेड फ़ोस्टर थे जो यूनियन संघर्षों में तो शामिल रहते थे लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं थे । इसी तरह कांग्रेस के प्रतिनिधियों में अमेरिका के विलियम डी हेवुड और ब्रिटेन के टाम वुड जैसे मशहूर लोग थे । कहा जा सकता है कि इस स्थापना कांग्रेस में विश्व ट्रेड यूनियन आंदोलन की विविध धाराओं का प्रतिनिधित्व था । इसी वजह से इस कांग्रेस में खूब जीवंत बहसें  हुईं । सबने खुलकर बोला और सबकी बातें ध्यान से सुनी भी गयीं ।

Sunday, March 1, 2026

फ़ासीवाद का सिद्धांत और व्यवहार

 

                                      

                                                                             

1999 में प्लूटो प्रेस से डेव रेंटन की किताब ‘फ़ासिज्म: थियरी ऐंड प्रैक्टिस’ का प्रकाशन हुआ । किताब फ़ासीवाद को महज विचारों के क्षेत्र में देखने की प्रवृत्ति के विरोध में लिखी गई है । लेखक के मुताबिक कुछ चिंतक इटली में मुसोलिनी या जर्मनी में हिटलर के कारनामों को देखने की जगह फ़ासीवादी विचारकों के बौद्धिक विकास की मार्फ़त फ़ासीवाद को परिभाषित करते हैं । फ़ासीवादी आंदोलन की जगह फ़ासीवादी बौद्धिकों पर ध्यान केंद्रित करने के चलते ये चिंतक फ़ासीवाद के क्रांतिकारी पहलू पर अधिक जोर देते हैं और उसे थोड़ा सकारात्मक प्रवृत्ति के बतौर पेश करते हैं । अपने अध्ययन के लिए ये लोग फ़ासीवादी पार्टियों के आधिकारिक बयानों पर अधिक भरोसा करते हैं । 2020 में इसका नया संस्करण छपा । लेखक ने किताब का मकसद ही बताया है कि फ़ासीवाद की राजनीति के विध्वंसक होने की व्याख्या इसमें की गयी है । उसकी यह विध्वंसात्मकता आंदोलन के दौर में भी रहती है और सत्ता पर कब्जे के बाद बढ़ जाती है । इतिहास में ढेर सारे उदाहरण मिलते हैं जिसमें विध्वंसक पार्टियों की सरकार बन जाने के बाद वे नर्म हो जाते हैं लेकिन फ़ासीवादी सत्ता में आने के बाद और भी कट्टर हो जाते हैं । मजदूर, समाजवादी और उनके नस्ली दुश्मनों का जीवन उनके शासन के बाद वही नहीं रह जाता जो उसके पहले का होता है । लेखक का सवाल है कि ऐसा कैसे होता है । इसका उत्तर उन्हें ऐसे लेखकों से मिला जिन्होंने विश्वयुद्धों के बीच फ़ासीवाद की क्रूरता की सही भविष्यवाणी की थी । वे लोग चरम वामपंथी थे । फ़ासीवाद के असल में सबसे पुराने और अदम्य विरोधी इतालवी और जर्मन मार्क्सवादी थे । इन वामपंथियों के लेखों और भाषणों से फ़ासीवाद के बारे में सुसंगत सिद्धांत तैयार किया जा सकता है । फ़ासीवाद विचार होने की जगह संगठन और शासन था । जहां भी इसका उदय हुआ वहां इसकी राजनीति समान रही । इन लेखकों के मुताबिक फ़ासीवाद को विचारधारा की जगह खास तरह का प्रतिक्रियावादी जन आंदोलन समझना चाहिए । इनका यह भी कहना था कि चूंकि पारम्परिक दक्षिणपंथी राजनीति के मुकाबले फ़ासीवाद अपना जनाधार बनाता है इसलिए संकट के समय नये रंगरूट प्रशिक्षित करने की इसमें क्षमता होती है और ये रंगरूट मजदूरों, बेरोजगारों और युवकों में से आते हैं । आम तौर पर इन समूहों को वामपंथियों का समर्थक समझा जाता है । यही वजह है कि संख्या में कम होने के बावजूद उनकी वृद्धि तेजी से होती है । इसके कारण मार्क्सवादी मानते थे कि फ़ासीवादी विचारधारा के लक्ष्य और उसके सदस्यों की आकांक्षा में तनाव बना रहता है । यह अंतर्विरोध बहुतेरे नतीजों को जन्म देता है । उसके कारण किसी विरोधी पार्टी से वे पराजित हो सकते हैं या सत्ता में काबिज होने के बावजूद उनमें कट्टरता बढ़ सकती है । इसके ही कारण सत्ता में आने के बाद उनके रुख में नरमी की सम्भावना पूरी तरह खारिज हो जाती है ।

जब फ़ासीवाद की शुरुआत हुई तो शायद ही राजनीति की कोई अन्य धारा इससे सहमत हुई । इसके विरोधियों की तादाद सचमुच ही बहुत अधिक थी । उदारवादी, रूढ़िवादी, ईसाई, अराकतावादी, नारीवादी तथा अनगिनत अन्य इसके विरोध में थे । इनमें से किसी ने भी मार्क्सवादियों की तरह तेजी से हिंसा की फ़ासीवादी क्षमता को नहीं पहचाना । जब फ़ासीवादी जीते उस समय यूरोपीय वामपंथ में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचार ही हावी थे । राजनीति के बारे में उनके रुख का समर्थन लाखों लोग करते थे । मार्क्सवादी कोई अकेले नहीं थे, उनके साथ तमाम अन्य धाराओं के लोग भी थे । क्रांति में यकीन करने वाले इसकी ओर आकर्षित होते थे और जन विद्रोह के लिए ये प्रतिबद्ध रहते थे । उनसे अलग वे थे जो जन विद्रोह में तो यकीन नहीं करते थे लेकिन मजदूरों और अन्य निम्नवर्गीय समूहों के अधिकारों में क्रमिक प्रगति के सहारे बदलाव लाना चाहते थे । इनके भी समर्थक लाखों थे । इन दोनों के बीच भी बहुतेरे लोग सक्रिय रहा करते थे ।

बीसवीं सदी के अंत में मार्क्सवाद की यह हैसियत नहीं रह गयी । सामाजिक जनवादी राजनीति में दक्षिणपंथ की ओर झुकाव आया । बहुतेरे देशों में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन ढह गया और कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी अपने आपको भंग करना शुरू कर दिया । लेकिन जब फ़ासीवाद के उदय के समय पर ध्यान दें तो यह हालत अभी भविष्य के गर्भ में थी । इसलिए इस किताब में फ़ासीवाद की समझ और उसके मुकाबले के सिलसिले में मार्क्सवादी रुख का प्राधान्य मिलता है । क्लारा जेटकिन, त्रात्सकी और डैनिएल गुएरिन जैसे लोगों के बीच यही साझा रुख था । 1920 और 1930 के दशक में यूरोप में फ़ासीवाद का मुकाबला करने के मामले में इनकी भाषा समान थी और हिटलर के उदय का प्रतिरोध करने का उनका नजरिया भी साझा था । इन मार्क्सवादियों ने सबसे पहले फ़ासीवाद विरोध की नीति सूत्रबद्ध की ।

उनका मानना था कि फ़ासीवाद दक्षिणपंथी राजनीति का खास हिंसक और विध्वंसक रूप है । सामाजिक संकट के समय इसमें तेजी से बढ़ने की क्षमता है और अगर इसकी उपेक्षा की गयी तो जनता को संगठित करने की वामपंथी ताकत को यह नष्ट कर देगा । यह वंचितों और मजदूरों द्वारा व्यवस्था में बदलाव की मांगों को दसियों साल पीछे धकेल देगा । अगर यह आकलन सही है तो इसका सीधा मतलब विरोधियों द्वारा फ़ासीवाद का मुकाबला करना सबसे जरूरी काम बन जाता है । इसकी जरूरत तब भी सबसे अधिक रहती है जब भेदभाव के अन्य रूप व्यापक हों या दक्षिणपंथी राजनीति के अन्य रूप अधिक लोकप्रिय नजर आते हों । बहुत सम्भव है कि उस समय मजदूरों का शोषण हो रहा हो और नस्ल तथा लिंग के आधार पर भेदभाव भी बहुत हो । इसके बावजूद फ़ासीवाद नकारात्मक बदलाव का अनियंत्रित कारक होता है इसलिए आज जो कुछ सीमित नजर आ रहा है उसे वह सामान्य व्यवस्था का अंग बना दे सकता है । जनता की तकलीफ को वह भयानक स्तर पर ले जाने में सक्षम होता है । इसी तरह जहां भी फ़ासीवाद को शिकस्त दी जाती है वहां उत्पीड़न के अन्य रूप भी कमजोर पड़ जाते हैं । फ़ासीवाद के विरोध की इस नीति पर केवल मार्क्सवादी सहमत नहीं थे, उस समय तमाम अन्य लोग भी इस रुख से इत्तफ़ाक रखते थे ।

1920 दशक के मध्य में इतिहास में पहली बार इस रुख को किसी महत्वपूर्ण समूह ने अपनाया जब उस समय के मार्क्सवादियों ने इटली के बाहर फ़ासीवाद के खतरे के विरोध में अभियान चलाना शुरू किया । उन्होंने कहा कि मुसोलिनी ने अब जर्मनी समेत अन्य देशों के अपने अनुकर्ताओं को प्रेरित करना आरम्भ कर दिया है । जब यह चेतावनी पहली बार दी जा रही थी तो हिटलर महज क्षेत्रीय नेता था । उसे चुनावी सफलता बहुत कम मिली थी । फ़ासीवाद से लेकर रूढ़िवाद तक बहुतेरे नेताओं से उसे होड़ करनी पड़ रही थी । इन नेताओं के पास धन अधिक था, मीडिया में उनकी पहुंच बेहतर थी और अपने विरोधियों से हिंसक बदला लेने की स्वतंत्र व्यवस्था भी इनके पास थी । ऐसी हालत में हिटलर की तमाम कमजोरियों के बावजूद मार्क्सवादियों ने कहा कि जर्मनी के वामपंथ के समक्ष वही सबसे गम्भीर खतरा है । तब वे फ़ासीवाद की बढ़त और सत्ता पर उसके कब्जे की भविष्यवाणी कर रहे थे । जिन लोगों ने उस खतरे को पहचाना और उससे सावधान किया उनकी बात सुनी जानी चाहिए । उस समय यूरोपीय राजनीति में दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग की लगभग अन्य सभी ताकतें उनकी बातों को अनसुना कर रही थीं । लेखक को उम्मीद है कि आज के हालात में उनका रुख हमारे भी काम आ सकता है ।

किताब के पहले संस्करण में लेखक ने विस्तार से 1945 के बाद फ़ासीवाद के पुनर्जन्म की कहानी बतायी थी लेकिन इस संस्करण से उसे लगभग पूरी तरह हटा दिया है । हटाने की वजह यह नहीं कि लेखक फ़ासीवाद के पुनरुत्थान के खतरों से अनजान हैं बल्कि वे लम्बे समय से इस सवाल पर लिखते और सोचते रहे हैं । ढेर सारे पत्रकार और इतिहासकार इस समय के राजनेताओं को सख्त नापसंद करते हैं और फ़ासीवाद की फिर से याद करते हैं । जिन प्रक्रियाओं को वे अपने समय में खारिज कर रहे हैं उनकी प्रतिध्वनि उन्हें अतीत में सुनायी पड़ती है । इसके बावजूद लेखक को वर्तमान दक्षिणपंथ अनेक मामलों में फ़ासीवाद से फ़ासीवाद से अलग महसूस हो रहा है । लोभ होता है कि फ़ासीवाद को उसके दोयम लक्षणों के आधार पर परिभाषित किया जाए । मसलन मुसोलिनी द्वारा अपने विरोधियों की वास्तविक हत्या की जगह उनका मजाक उड़ाने की इच्छा और हिंसा की धमकी पर जोर दिया जाए या हिटलर के प्रसंग में मुक्त व्यापार की वैश्विक संस्थाओं के समक्ष कराधान और आर्थिक संरक्षण के पहलू को उभारा जाए । इससे बस यह होगा कि वर्तमान में जिन बातों को हम नापंसद करते हैं उनको ही फ़ासीवाद की विशेषता समझ लेंगे और इस तरह फ़ासीवाद की हमारी धारणा में उसकी क्रूरता मद्धम हो जाएगी ।

इस किताब में फ़ासीवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत का विवेचन है । इसके बारे में माना जाता है कि फ़ासीवादी राजनीति का वह अखंड विश्लेषण है । इसके विपरीत लेखक का मानना है कि फ़ासीवाद का कोई एक ही मार्क्सवादी सिद्धांत नहीं है । लेखक ने कम से कम इसके तीन रूप देखे और निरूपित किये हैं । एक को लेखक ने फ़ासीवाद का वामपंथी सिद्धांत कहा है जिसमें फ़ासीवाद को पूंजी के हितों के पक्ष में प्रतिक्रांति का एक रूप मानकर उसका विश्लेषण किया जाता है । इस व्याख्या के पक्षधर लोग फ़ासीवादी प्रतिक्रांति की विशेषता की परीक्षा करने की जहमत नहीं उठाते । इटली और जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टियों ने फ़ासीवाद को प्रतिक्रांति के अनेक रूपों में से एक रूप माना । ऐसा करके उन्होंने अपने समर्थकों को निहत्था कर दिया । इसके कारण वे फ़ासीवादियों के विरोध में एकाग्र होकर संगठित होने से चूक गये । दूसरे सिद्धांत को लेखक ने फ़ासीवाद का दक्षिणपंथी सिद्धांत कहा है । इसमें फ़ासीवादी आंदोलन के मूलगामी जन चरित्र पर ही ध्यान दिया जाता है । इस व्याख्या के समर्थक मार्क्सवादी लोग फ़ासीवाद को मूलगामी, विचित्र और पूंजी के लिए खतरनाक समझते हैं । इसके विरोध में वे मध्यमार्गी और यहां तक कि दक्षिणपंथी राजनेताओं तक से गंठजोड़ बना लेते हैं । इस नजरिए को 1920 दशक में इटली और जर्मनी की समाजवादी पार्टियों ने और 1934 के बाद सारी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनाया । इसके कारण फ़ासीवाद की बढ़त के सामने वे भी कुछ नहीं कर सके ।

इन दोनों की जगह लेखक ने फ़ासीवाद का द्वंद्वात्मक सिद्धांत तलाशने का प्रयास किया है । इसके तहत फ़ासीवाद को प्रतिक्रांतिकारी विचारधारा के साथ जन आंदोलन भी माना गया है । यह ऐसी राजनीति है जो अविश्वसनीय तेजी के साथ बढ़ सकती और अकथनीय नुकसान कर सकती है लेकिन अगर इसके सामने लोकप्रिय विपक्ष खड़ा हो जाए तो इसकी बढ़त पर लगाम भी लगायी जा सकती है । इस तरह की चुनौती पेश आने पर यह अपने समर्थकों के सामने बदलाव लाने का चारा भी फेंकती है । लेखक का कहना है कि यही सिद्धांत फ़ासीवाद की सटीक समझ के करीब होने का दावा कर सकता है ।

Saturday, February 21, 2026

संघर्ष और प्रेम का सहकार

 

               

                                                   

नोकिल सिंह की प्रस्तुत काव्य पुस्तिका में कवि की दो कविताओं को रखा गया है । उनके विषय क्रमश: संघर्ष और प्रेम हैं । बहुधा इन दोनों को परस्पर विरोधी भाव माना जाता है लेकिन उनकी सह उपस्थिति का इतिहास भी काफी लम्बा रहा है इसका कारण शायद यह है कि प्रेम एक ऐसा मूल्य है जो मनुष्य की निजी गरिमा को मान्यता देता है जबसे समाज में विषमता की स्थापना हुई तबसे ही प्रेम पर बंधन भी लगने लगे उन सभी बंधनों का प्रतिकार प्रेम का अभिन्न अंग हो गया कहने की जरूरत नहीं कि एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से यदि लगाव होगा तो इसका आधार समानता की भावना ही हो सकता है इतिहास में भी देखा गया कि क्रूरता और विषमता का सह अस्तित्व रहा है अतीत के साथ ही यह बात वर्तमान के लिए भी सच है । आश्चर्य नहीं कि जैसे जैसे विषमता में इजाफ़ा हो रहा है उसी मात्रा में प्रेम के स्थान पर क्रूरता और घृणा की प्रशंसा के गीत गाये जा रहे हैं ।

सभी जानते हैं कि प्रेम के दमन में स्त्रीद्वेष का गहरा असर होता है । सामाजिक रूप से ऊंच नीच की व्यवस्था में प्रेम के गीत जिन्होंने गाये उन्हें बहुतेरा ईश्वरीय प्रेम का सहारा लेना पड़ा । आज उस तरह के किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती इसलिए उसके साथ संघर्ष का अभिन्न जुड़ाव हो जाता है । इस प्रेम को जितना अधिक दबाने की कोशिश की गयी उतनी ही मजबूती से उसने समाज के साथ साहित्य में भी अपनी जगह बनायी है । हो सकता है नफ़रत के पक्ष में माहौल ऐसा बना दिया जाय कि अब साहित्य में प्रेम की केंद्रीयता का तथ्य भी दुहराना पड़े अन्यथा कौन नहीं जानता कि समूची दुनिया में खासकर कविता के क्षेत्र में प्रेम की भावना प्रधान रही है । हमारे देश के सामंती वातावरण में भी प्रेम और रति के भाव से उपजे रस को ही रसराज कहा जाता रहा है । कविता के सिलसिले में प्रेम के महत्व का कथन ही साबित करता है कि प्रेम के लिए माहौल कितना विषाक्त हो गया है । हिन्दी के सभी अध्येता प्रेम के मामले में सूरदास की गोपियों के साहस और मीराबाई के त्याग के अतिरिक्त जायसी नामक सूफी कवि के नाम से परिचित हैं । न केवल इतना बल्कि प्रेम के वर्णन में स्त्री की पराधीनता के प्रत्याख्यान की गुंजाइश पैदा हुई और उसकी झलक नोकिल की कविता में भी मिलती है ।

उत्तर प्रदेश के जायस नामक स्थान के निवासी सूफी कवि ने प्रेम को इतना ऊपर उठा दिया कि उसने प्रेम में मनुष्य को देवत्व प्रदान कर दिया । न केवल सूफी बल्कि उर्दू की समूची कविता में प्रेम की प्रतिष्ठा का जिक्र करने की जरूरत नहीं, वह प्रत्यक्ष है । इस प्रेम का संघर्ष से रिश्ता कू-ए-यार से सू-ए-दार की ओर ले जाने वाले फ़ैज़ से अधिक शायद ही कोई और स्पष्ट कर सके । इसलिए भी इन कविताओं के शिल्प पर रुबाइ का गहरा असर नजर आता है । चार पंक्तियों के इस सुपरिचित काव्य रूप के आकर्षक होने के बावजूद हिन्दी की कविता में इसका अनुकरण नहीं हुआ । इसके मुकाबले ग़ज़ल के अनुकरण में अधिक लोगों ने हाथ आजमाया । थोड़ा बहुत मधुशाला के शिल्प पर इसका प्रभाव नजर आता है । नोकिल की कविता के दोनों ही खंडों में चार पंक्तियों में बात कहने की शैली अपनायी गयी है और यह अनायास नहीं लगता । किन्हीं कारणों से उनके काव्य संस्कार में इस काव्य रूप ने बहुत ही मजबूत जगह बनायी है ।

मनुष्य का सांसारिक अस्तित्व सभी चिंतकों के लिए व्याख्या की चुनौती पेश करता रहा है । एक ओर उसे पशु भी कहा जा सकता है । संस्कृत में आहार, निद्रा, भय और मैथुन को पशुओं और मनुष्यों के बीच साझा कहा गया है । दूसरी ओर उसके किसी भी जैविकीय कर्म में केवल शारीरिक तत्व नहीं होता । मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता शरीर की सीमा के अतिक्रमण की उसकी क्षमता और प्रवृत्ति में निहित है । इसी भूमि पर उसके शुद्ध दैहिक कर्मों में भी अध्यात्म की आभा आ जाती है । इब्न रोश्द ने मनुष्य की समझ बनाते हुए उसके भीतर किसी जड़ पदार्थ, मानवेतर प्राणी और दैवी झलक के तीन स्तरों को पहचाना था । यही खूबी मनुष्य के प्रेम को निरा शारीरिक कर्म नहीं रहने देती और उसे संघर्ष की प्रेरक बना देती है । इसी अर्थ में प्रेम और संघर्ष की आस्तित्विक सहगामिता को देखा जा सकता है । संघर्ष संबंधी नोकिल की काव्य पंक्तियों में उद्बोधन की गूंज अक्सर सुनायी देती रहती है ।

संघर्ष भी प्रेम की तरह ही कविता का सर्वकालिक विषय है । इसका कारण इस संसार में मनुष्य का अस्तित्व है । सभी प्राणियों में सबसे कम सुरक्षा कवच मनुष्य के पास है । इसी वजह से उसे अपने अस्तित्व के लिए लगातार विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते रहना पड़ा । ये परिस्थितियां प्राकृतिक थीं जिनसे जूझने के क्रम में मनुष्य को आवास, वस्त्र और पके भोजन का प्रबंध करना पड़ा । एक समय के बाद ये हालात सामाजिक भी हो गये और मनुष्य को जीवित रहने के लिए अन्य मनुष्यों से ही जानलेवा संघर्ष चलाना पड़ा । इस संघर्ष की भी गूंज साहित्य में हमेशा सुनायी देती रही ।  

कविता को छंद के बंधन से आजादी दिलाने वाले जानते थे कि कविता में छंद का निर्वाह बहुत कठिन साधना है । आधुनिक मनुष्य की विवेक चेतना की सहज अभिव्यक्ति गद्य में होती है लेकिन कविता मनुष्य की आदिम अभिव्यक्ति होने के कारण सांद्र अभिव्यक्ति के माध्यम के बतौर आकर्षित करती रहती है । सभी युगों में मनुष्य की सबसे तीव्र और सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति कविता में होती रही है इसलिए उसकी ओर खिंचाव हमेशा ही बना रहता है । उसकी अभिव्यक्ति की रूपगत परिष्कृति के कारण ही काव्य हेतुओं में प्रतिभा के साथ अभ्यास को भी महत्व प्रदान किया गया है । नोकिल की कविताओं को पढ़ने से उनमें अभ्यास की कमी महसूस होती है लेकिन यह ऐसा रास्ता है जिस पर चलकर ही आसानी हासिल होती है । इसका बहुत बड़ा कारण उसका भाषा नामक माध्यम है । यह माध्यम भी मनुष्य के संघर्ष से ही उपजा है । प्राकृतिक और सामाजिक वैपरीत्य के मुकाबिल अपनी सामाजिकता की रक्षा के क्रम में मनुष्य ने भौतिक औजारों के साथ इस अत्यंत जटिल तंत्र का भी निर्माण अपने शरीर में उपलब्ध सीमित साधनों से किया । इसने मनुष्य को शेष प्राणियों के मुकाबले गुणात्मक विशेषता प्रदान कर दी । अब वह अपने आसपास के हालात का मुकाबला करने की कोशिश की सफलता या विफलता की विरासत अगली पीढ़ियों को सौंप सकता था ।      

भाषा में कविता को सम्भव करने के लिए उसे पालतू बनाना पड़ता है । उसकी ध्वनियों से लय का सृजन करते हुए भी उससे उत्पन्न अर्थ की रक्षा करनी पड़ती है । भाषा में रचना करने वाले सभी लोग कमोबेश इस प्रक्रिया की जटिलता और समस्याओं से परिचित होते हैं । साथ ही वे इससे हासिल फल से वंचित भी नहीं रहना चाहते । इससे रचनाकार को मानव समुदाय को आगे बढ़ाने वाले का जो सम्मान और सुख मिलता है वही किसी भी कवि की उपलब्धि और विशेषता का स्रोत होता है । कोई भी साहित्यकार इस खासियत से दूर नहीं होना चाहता इसलिए तमाम अपमान, उपहास और अलगाव के बावजूद वह सृजन की जिद नहीं छोड़ता ।

नोकिल की कविता में इस समय के युवा की भाषा से कविता के निर्माण का प्रयास नजर आता है । उनकी इस भाषा में अनेक अपरम्परित शब्द मिलते हैं । कविता में इन शब्दों के प्रयोग से हिंदी की दुनिया अभ्यस्त नहीं है लेकिन बोलचाल में ये शब्द इन्हीं नये अर्थों में प्रयुक्त हो रहे हैं । पढ़ते हुए ये शब्द अक्सर भोजन में कंकड़ की तरह चुभते हैं लेकिन इसी प्रक्रिया में वे हिंदी के नये पाठक तक कविता को लेकर भी जायेंगे । पाठकों से आग्रह है कि इन कविताओं को वे प्रयास की तरह ही देखें । यदि वे इन्हें आलोचनात्मक निगाह से पढ़ेंगे तो लेखक को खुशी मिलेगी । इससे भी आगे बढ़कर वे इस कोशिश को परिष्कृत और संपन्न करें तो इससे बड़ा फल किसी भी लेखक के लिए और कुछ नहीं हो सकता । सभी ईंटें कलश पर ही नहीं लगतीं । कुछ नींव में गुम भी हो जाती हैं । अगर बुनियाद में खप जाने वाले प्रयोगकर्ताओं का जत्था न हो तो किसी भी भाषा में काव्य और साहित्य रचना ठहर जायेगी । उसका विकास ही इसी तरह के कच्चे पक्के प्रयासों की मार्फत होता है । ये कविताएं मंजिल या पड़ाव नहीं उसकी ओर जारी यात्रा का छोटा सा सबूत हैं ।

Monday, February 16, 2026

लेनिन का कोमिंटर्न

 

                                   

                                                       

2026 में ब्रिल से जान रिडेल की किताब लेनिनस कोमिंटर्न रीविजिटेडका प्रकाशन हुआ । इसकी प्रस्तावना में माइक ताबेर का कहना है कि कोमिंटर्न अब तक का विश्व क्रांतिकारी आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे प्रभावशाली संगठन था । 1919 में इसकी स्थापना हुई और दुनिया के लगभग प्रत्येक देश में इसके सदस्य और समर्थक थे । उनकी संख्या लाखों में थी । दुनिया के उत्पीड़ित जनगण में उसने आशा और सहानुभूति की लहर जगायी । इसी वजह से शासक वर्ग के लोग इससे डरते और नफ़रत करते थे । लेनिन द्वारा स्थापित कोमिंटर्न की विरासत ने पिछली सदी के असंख्य कार्यकर्ताओं और योद्धाओं को सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित किया ।  इसके अतिरिक्त विद्यार्थियों और शोधार्थियों में इसने अपनी गतिकी और आकर्षण को समझने की रुचि भी पैदा की ।

इसके बावजूद 1980 दशक से पहले कोमिंटर्न के बारे में अंग्रेजी में बहुत कम प्रकाशित सामग्री सुलभ थी । लोगों के मन में इसकी छवि सुनी सुनायी बातों के आधार पर बनी थी । प्रकाशित सामग्री और दस्तावेजों के अभाव में कोमिंटर्न की समूची जटिलता का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन बेहद मुश्किल काम था । 1983 में जान रिडेल के संपादन में कोमिंटर्न से जुड़े दस्तावेजों के प्रकाशन की परियोजना शुरू हुई तो स्थिति बदली । इससे कोमिंटर्न के बारे में समझ बढ़ी और गहरायी । पिछले चार दशकों में दो संग्रह कोमिंटर्न की तैयारी के छापे गये । शुरुआती चार कांग्रेसों के कार्यवृत्त से जुड़े चार संग्रह तैयार किये गये और छपे । एक संग्रह इसकी कार्यकारिणी की बैठकों के बारे में था । चार अन्य संग्रहों में कोमिंटर्न के सहायक संगठनों तथा उनके सम्मेलनों का विवरण था । प्रस्तुत किताब को इस श्रृंखला और कोमिंटर्न की परिचायिका के रूप में देखा जाना चाहिए । शुरू से प्रकाशन की इस परियोजना ने अपने लिए कुछ नियम तय किये थे ।

कोमिंटर्न की बात अधिक से अधिक सामने आ सके इसलिए संपादकों ने केवल प्रस्तावना लिखने तक खुद को सीमित रखा था । पाठक को इससे दस्तावेजों के आधार पर अपनी राय बनाने की आजादी मिली । आजकल के पाठक इन दस्तावेजों को अच्छी तरह समझ सकें इसलिए जरूरी टिप्पणियों को जगह दी गयी । इनके जरिए अपरिचित घटनाओं और व्यक्तियों को भी सुबोध बनाया गया । दस्तावेजों की मूल भाषा जर्मन या रूसी थी । अनुवाद को सावधानी के साथ ग्राह्य बनाया गया । कम्युनिस्ट आंदोलन के अध्येताओं के लिए तो यह लाभकर था ही, इसका लक्ष्य युवा विद्रोहियों, कामगारों और कार्यकर्ताओं को सामाजिक बदलाव के संघर्ष में मदद करना था । वे दुनिया बदलने की लड़ाई में कोमिंटर्न की सीख और विरासत का हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे ।

अधिकांश सामग्री कोमिंटर्न की कांग्रेसों और सम्मेलनों के कार्यवृत्त थे । इस तरह के लेखन के बारे में माना जाता है कि उसे पढ़ना रुचि नहीं जगाता । एक सुविधा थी कि लिखित व्याख्यान के मुकाबले मौखिक वक्तव्यों में स्वाभाविकता होती है । वक्ता अपनी बात सूत्रों में गढ़कर नहीं बोलते । इससे लेनिन के कोमिंटर्न को देखने की मजेदार खिड़की खुलती है । इनसे पाठक भी उन सम्मेलनों और बैठकों में बैठे हुए कल्पित कर सकते हैं और उन बहसों को जीवंत तरीके से सुन सकते हैं । वे प्रतिनिधियों के बीच उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर प्रस्तावित वैकल्पिक कार्ययोजनाओं की वैधता को परख सकते हैं । वे गलतियां होती देख सकते हैं और उनको सुधारने की कोशिश भी समझ सकते हैं । इन बैठकों के कार्यवृत्त के सहारे पाठक भी कोमिंटर्न को सौ साल पहले गुजरे जमाने की घटना समझने की जगह उसे जीवंत आंदोलन की तरह देख सकते हैं ।    

जान रिडेल ने कोमिंटर्न के बारे में यह काम किसी अकादमिक रुचि की वजह से नहीं किया । इसके पीछे उनका समाजवादी कार्यकर्ता का भाव था । 1958 में वे कनाडा में समाजवादी आंदोलन में शरीक हुए । जब क्यूबा की क्रांति को विफल करने के लिए अमेरिका ने अभियान चलाया तो उसके विरोध में कनाडा की गोलबंदी के साथ रिडेल सक्रिय रहे । 1970 दशक के पूर्वार्ध तक वे कनाडा में नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे इसलिए कनाडा की पुलिस उनके पीछे पड़ गयी । इसके बाद वे न्यू यार्क चले आये और 1983 से इस काम में लग गये । इस विराट काम को उन्होंने पूरा होने लायक संग्रहों का रूप दिया । जर्मन और फ़्रांसिसी पर उनका अधिकार था लेकिन इस काम के लिए उन्होंने रूसी भाषा पर भी अधिकार प्राप्त किया और उससे अंग्रेजी में अनुवाद करने लगे । धीरे धीरे इस काम को उन्होंने सामूहिक परियोजना में बदल दिया । दुनिया भर के सहयोगियों का समूह उन्होंने बना लिया । अनुवाद, टंकण, प्रूफ़ शोधन, संपादन और पुस्तकालयों में शोध का काम ढेर सारे महारथियों ने साथ मिलकर किया क्योंकि उन्हें रिडेल की गम्भीरता और उनके समर्पण पर विश्वास था । उन्होंने तमाम वामपंथी धारा के लोगों का सहयोग इस काम में लिया । उनका यह खुला और उदार नजरिया भी काम के साथ आगे बढ़ता गया । शुरुआती दस सालों में पांच संग्रह छपे । इसके बाद रिडेल कनाडा लौट गये । वहां वे क्यूबा और फिलिस्तीन तथा बोलीविया समेत ढेर सारे देशों के साथ एकजुटता के अभियान चलाते रहे । साथ ही अमेरिकी हमलों के प्रतिरोध में भी भाग लेते रहे । कोमिंटर्न के बारे में प्रकाशन की परियोजना को ब्रिल ने अपनाया और शेष संग्रह भी छपे । अब यह किताब उस परियोजना की भूमिका के बतौर छप रही है ।

इसके कुछ अध्याय कोमिंटर्न की शुरुआत का कालानुक्रमिक विवरण हैं । कुछ फ़ासीवाद, मजदूरों की सरकार, रणनीति और कार्यनीति, संगठन और केंद्रीयता, लोकतांत्रिक अधिकार तथा औपनिवेशिक और जातीयता जैसे खास मुद्दों से जुड़े हुए हैं । इसमें शामिल लेख उस संग्रह के बारे में अलग अलग मौकों पर लिखे गये थे इसलिए उनमें थोड़ा दुहराव भी मिलेगा । इन लेखों को संग्रह के सूचीपत्र की तरह भी देखा जा सकता है । इससे पाठकों को खास मुद्दों पर अलग अलग संग्रहों को देखने की प्रेरणा मिल सकती है । लेनिन द्वारा स्थापित कोमिंटर्न की विरासत आज की दुनिया के लिए भी ताबेर को प्रासंगिक लगती है ।

इसके बाद उन्होंने परियोजना का संक्षिप्त परिचय दिया है । इसके तहत प्रकाशित आरम्भिक संग्रह पाथफ़ाइंडर प्रेस से जान रिडेल के संपादन में छपे । प्रकाशित सामग्री का अधिकांश हिस्सा पहली बार अंग्रेजी में आया था । इसके बाद के संग्रह ब्रिल और हेमार्केट बुक्स से छपे । इसका पहला संग्रह 1907 से 1916 के बीच के वे दस्तावेज थे जिन्हें लेनिन ने कोमिंटर्न की तैयारी के बतौर दर्ज किया था । ये तैयारी के वर्षों में लेनिन के इस दिशा में किये संघर्षों के सबूत हैं । प्रथम विश्वयुद्ध की आहट मिलते ही लेनिन ने द्वितीय इंटरनेशनल के भीतर वापपक्ष गठित करने का प्रयास किया । युद्ध छिड़ने के बाद उन्होंने द्वितीय इंटरनेशनल से नाता तोड़ लिया और कोमिंटर्न के बारे में सोचने लगे थे । उसी दौर की बहसों को इसमें रखा गया है । बहस के मुद्दे साम्राज्यवाद की प्रकृति, राष्ट्रों के आत्मनिर्णय का अधिकार, युद्ध के विरुद्ध संघर्ष और मजदूर वर्ग की अंतर्राष्ट्रीय एकता थे । यह संग्रह 1984 में छपा था ।

दूसरा संग्रह 1918 से 1919 के दस्तावेजों का है । यह समय जर्मन क्रांति और सोवियत सत्ता की स्थापना का था । इनमें स्थापना कांग्रेस की तैयारी की झलक मिलती है । नवम्बर 1918 में जर्मनी में क्रांति हुई जिसके कारण प्रथम विश्वयुद्ध सहसा रुक गया और विश्व क्रांति का नया रास्ता खुल गया ।  जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर की बहसों का पता इस दौर के दस्तावेजों से चलता है । इन घटनाओं के बारे में रूसी बोल्शेविक नेताओं की राय भी देखने को मिलती है । सोवियत सत्ता के बारे में लेनिन और काउत्सकी की बहस भी पाठकों को नजर आती है । कोमिंटर्न की स्थापना कांग्रेस की तैयारी के प्रमाण भी इस समय के दस्तावेजों में सुरक्षित हैं । इसे 1986 में छापा गया था ।

तीसरा संग्रह स्वाभाविक रूप से 1919 की स्थापना कांग्रेस के कार्यवृत्त का है । मार्च में 20 देशों के प्रतिनिधियों ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मध्य यूरोप और एशिया के क्रांतिकारी उभार की चर्चा की और कोमिंटर्न के गठन का फैसला किया । कांग्रेस की बहसों, रपटों और पारित प्रस्तावों का संग्रह इसमें किया गया । विश्व क्रांतिकारी प्रगति के माहौल में इस आंदोलन की नयी उठान का पता इससे चलता है । 1987 में इसे छापा गया ।

अगले साल 1920 में दूसरी कांग्रेस हुई । इसमें मजदूर वर्ग की रणनीति और कार्यक्रम, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष, ट्रेड यूनियनों के क्रांतिकारी बदलाव, मजदूर-किसान एकता, बुर्जुआ संसदों और चुनावों में भागीदारी तथा कम्युनिस्ट पार्टियों की संरचना और उनकी जिम्मेदारी के सवाल पर उग्र वाम तथा दक्षिणपंथी नजरिए से ढेर सारी तीखी बहसें हुईं । उस समय आंदोलन के लिए ये सवाल बेहद अहम थे । इसलिए इन तमाम ज्वलंत सवालों पर इस कांग्रेस के फैसले शुरुआती कोमिंटर्न के लिए भारी महत्व के रहे । 1991 में इसे दो खंडों में छापा गया था ।

1920 में ही बाकू कांग्रेस का आयोजन कोमिंटर्न ने किया । उस समय मध्य एशिया और यूरोप के क्रांतिकारी संघर्षों के कारण नयी सुबह की उम्मीद मेहनतकशों में उपजी थी । मुख्य रूप से मध्य एशिया के 2000 प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए थे । बहस इस सवाल पर हुई कि औपनिवेशिक दुनिया के किसान और मजदूर साम्राज्यवादी शोषण से कैसे आजाद होंगे । वहां के शासक वर्ग ने जो जातीय और धार्मिक विभाजन पैदा किया है उस पर विजय प्राप्त करते हुए साझा वर्ग हितों के लिए कैसे लड़ेंगे । इसे 1993 में छापा गया ।

1922 की कांग्रेस आखिरी कांग्रेस थी जिसमें लेनिन ने भाग लिया । उसमें जिन बहुतेरे सवालों पर बात हुई वे अब भी हमारी रुचि के विषय बने हुए हैं । संयुक्त मोर्चे का निर्माण, किसानों और मजदूरों की सरकार, साम्राज्यवाद विरोधी एकजुटता, अंतर्राष्ट्रीय मांगें और अंतर्राष्ट्रीय संगठन आदि मसले उनमें शामिल थे । प्रतिनिधियों के मत तरह तरह के थे । फ़ासीवाद के उदय, वर्साई संधि की व्यवस्था के अंत, औपनिवेशिक देशों में क्रांति तथा स्त्री मुक्ति जैसे सवालों पर मजेदार बहसें हुईं । इसके दस्तावेजों का संग्रह 2012 में ब्रिल से छपा ।  

इससे साल भर पहले 1921 में कोमिंटर्न की तीसरी कांग्रेस हुई । इसमें तीखा राजनीतिक संघर्ष हुआ । त्रात्सकी और लेनिन शुरू में अल्पमत में थे लेकिन फिर प्रतिनिधियों का बहुमत उनके पक्ष में आ गया । बहस का मुद्दा यह था कि सत्ता पर क्रांतिकारी कब्जे की प्रक्रिया में मजदूर वर्ग की बहुसंख्या का समर्थन नेताओं का छोटा सा समूह किस तरह हासिल करे । इसके लिए उसे किस तरह की आक्रामक पहल लेनी होगी । बहस का समापन कम्युनिस्ट रणनीति और कार्यनीति के सूत्रीकरण में हुआ । सोवियत संघ और उसके द्वारा हाल ही में अपनायी गयी नयी आर्थिक नीति के बारे में भी बहस हुई । इस संग्रह में कार्यवृत्त के साथ 32 परिशिष्ट शामिल किये गये । इन्हें पहले कभी छापा नहीं गया था । इनसे परदे के पीछे की बातचीत का अंदाजा लगता है । ब्रिल से इसे 2015 में छापा गया । 

1922 से 1923 के बीच कोमिंटर्न की कार्यकारिणी की तीन विस्तारित बैठकें हुईं । इनके कार्यवृत्त और प्रस्तावों का संग्रह माइक ताबेर के संपादन में छपा । इन्हें लघु कांग्रेस भी कहा जा सकता है जिनमें दुनिया भर के कम्युनिस्ट नेताओं ने संयुक्त मोर्चे से लेकर फ़ासीवाद से लड़ाई तक विभिन्न रणनीतिक सवालों से लेकर पहलों तक पर बातचीत की । इस प्रचुर सामग्री से लेनिन के समय विश्व क्रांतिकारी आंदोलन तथा कोमिंटर्न के परवर्ती विकास को समझने में मदद मिलती है । इसका प्रकाशन ब्रिल से 2018 में हुआ ।

इसके बाद के संग्रह सहायक संगठनों पर केंद्रित हैं । पहला संग्रह माइक ताबेर और मारिया द्याकोनोवा के संपादन में कम्युनिस्ट स्त्री आंदोलन का है । 1920 में इसकी शुरुआत हुई और यह दुनिया का पहला वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी स्त्री संगठन था । इसने स्त्री मुक्ति का कार्यक्रम बनाया, स्त्री अधिकारों के संघर्ष में भाग लिया और कम्युनिस्ट आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए काम किया । इस संग्रह में संगठन के सम्मेलनों के कार्यवृत्त और प्रस्ताव तथा दुनिया भर में हो रहे काम की रपटें शामिल की गयी हैं । इसकी अधिकांश सामग्री पहली बार अंग्रेजी में सुलभ हुई है । आधी सामग्री तो पहली बार छपी है । 2022 में ब्रिल ने इसे छापा ।

1921 में स्थापित रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की पहली कांग्रेस की कार्यवाही और प्रस्तावों का संग्रह माइक ताबेर के संपादन में छपा । इसे संक्षेप में प्रोफ़िंटर्न कहा जाता है । क्रांतिकारी संघर्ष में दुनिया के लाखों कामगारों को खींच लाने के लिए ट्रेड यूनियनों का वैश्विक आंदोलन खड़ा करने के मकसद से इसे गठित किया गया था । इस कांग्रेस में मजदूर आंदोलन की विविध धाराओं का प्रतिनिधित्व हुआ जिनमें  बिग हिल हेवुड और टाम मान जैसी मशहूर हस्तियां भी शामिल थीं । ट्रेड यूनियनों के लक्ष्य और कार्यभार, यूनियनवादी वर्ग संघर्ष की प्रकृति और यूनियन की रणनीति और कार्यनीति के सवाल पर विभिन्न धाराओं के बीच जीवंत और यदा कदा तीखी बहसें भी हुईं । 2024 में इसे ब्रिल ने छापा ।

कम्युनिस्ट यूथ इंटरनेशनल भी कोमिंटर्न का महत्वपूर्ण सहायक संगठन था । बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में द्वितीय इंटरनेशनल से जुड़े समाजवादी युवा आंदोलन से इसका विकास हुआ और इसने कोमिंटर्न की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । 1919 और 1921 में इसकी दो कांग्रेस हुईं जिनकी कार्यवाही और प्रस्ताव माइक ताबेर और बाब श्वार्ज़ के संपादन में संग्रहित किये गये हैं । यह सामग्री पहली बार अंग्रेजी में आयी है । इसमें सम्मेलनों के दस्तावेजों के अतिरिक्त नेताओं की बैठकों की कार्यवाही भी शामिल है । इन बैठकों में लड़ाकूपन, युवकों की अग्रदूत की भूमिका, कोमिंटर्न के साथ संबंध के अतिरिक्त क्रांतिकारी युवा संगठन की प्रकृति और उसके कार्यभार के बारे में लगातार बहसें होती रही थीं । इसे भी ब्रिल से छापा गया है ।

इन संग्रहों के अतिरिक्त जान रिडेल, विजय प्रसाद और नसीफ़ मुल्ला के संपादन में लिबरेट द कालोनीज! कम्युनिज्म ऐंड कोलोनियल फ़्रीडम 1917-1924’ का प्रकाशन 2019 में लेफ़्टवर्ड से, जान रिडेल और माइक ताबेर के संपादन में क्लारा जेटकिन की फ़ाइटिंग फ़ासिज्मका प्रकाशन 2017 में हेमार्केट बुक्स से तथा माइक ताबेर के संपादन में इसी तरह हेमार्केट बुक्स से 2021 और 2023 में द्वितीय इंटरनेशनल की बहसों के दस्तावेजों के दो संग्रह छापे गये हैं । कुछेक किताबों और संग्रहों के छपने से अधिक यह कहानी एक व्यक्ति के चालीस साला एकनिष्ठ समर्पण की लोमहर्षक दास्तान है ।

जान रिडेल का कहना है कि मार्क्स और एंगेल्स ने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मजदूरों के अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी संघर्ष का जो आवाहन किया था उससे दो सौ साल तक मजदूर आंदोलन अनुप्राणित रहा । सामाजिक मुक्ति के इस आंदोलन को ही आगे ले जाने की कोशिश कोमिंटर्न ने की । उसके इन्हीं प्रयासों को उजागर करने के मकसद से प्रकाशन की यह योजना चली । इसमें 1919 से 1923 के दौरान की उसकी गतिविधियों को सामने लाया गया जिस समय लेनिन या उनके साथियों ने इसका नेतृत्व किया । रूसी किसानों और मजदूरों की क्रांति के वैश्विक प्रसार की आकांक्षा से इसकी स्थापना हुई थी । दस साल के भीतर ही इस पर स्तालिन का असर दिखायी देने लगा और 1943 में इसे समाप्त कर दिया गया । फिर भी शुरुआती दिनों में इसने यूरेशिया, अफ़्रीका और अमेरिकी महाद्वीप के अनेक देशों में पूंजीवाद विरोधी उभार की प्रेरणा दी । खासकर चीन, वियतनाम और क्यूबा की क्रांतियों का उससे गहरा रिश्ता रहा ।

कोमिंटर्न की सबसे स्थायी उपलब्धि रणनीति और कार्यनीति के स्तर पर ऐसी धारणाओं को प्रस्तुत करने में है जिनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है । प्रस्तावों के अतिरिक्त इन धारणाओं का विकास मौखिक बहसों में भी हुआ । इन बहसों के बारे में विस्तृत लिखित साक्ष्य मौजूद हैं । कोमिंटर्न की विश्व कांग्रेसों में ये बहसें होती थीं और इन कांग्रेसों की अवधि अक्सर एकाधिक हफ़्तों तक भी होती थी । इन धारणाओं को इस समय के कार्यकर्ताओं और विद्वानों को सर्व सुलभ कराने के लिए यह परियोजना शुरू हुई थी । लेनिन के समय के विश्व क्रांतिकारी आंदोलन के दस्तावेजों को अनूदित, संपादित और प्रकाशित करने की योजना के तहत यह काम हुआ । अनुमान था कि दसेक साल में दर्जन भर मोटी किताबों के प्रकाशन के साथ काम पूरा हो जाएगा । भरोसा था कि कोमिंटर्न के समय का सामाजिक और राजनीतिक माहौल दुनिया भर में बदल चुका है फिर भी कोमिंटर्न के विचार प्रासंगिक हैं । 

कोमिंटर्न की सक्रियता ने क्रांतिकारी मार्क्सवाद को वैश्विक शक्ति में बदल दिया था । दर्जनों राजनीतिक पार्टियों और अनेक सहकारी संगठनों में करोड़ो सदस्य संगठित थे । सोवियत संघ की राजधानी मास्को से इनको भौतिक और बौद्धिक नेतृत्व मिलता था । इसके लिए नेताओं और प्रकाशनों का व्यवस्थित तंत्र काम करता था । कोमिंटर्न का असर उसके सहकारी संगठनों के जरिए संसार भर में फैलता था । इनका आपसी समन्वय साम्राज्यवाद विरोधी एकजुटता, राष्ट्रीय और नस्ली उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष तथा युवकों, स्त्रियों और ट्रेड यूनियनों की पहल के जरिए होता था ।

आज भी सामाजिक विकल्प की कल्पना में कोमिंटर्न की भाषा और धारणाओं का उपयोग थाती की तरह किया जा सकता है । समाज की कल्पना के अतिरिक्त इसकी याद से नीतियों के मूल्यांकन और परीक्षण का भी वस्तुगत आधार पैदा होता है । रिडेल ने उसी याद को खोजने, सहेजने और आगामी पीढ़ियों तक ले जाने की कोशिश इन संग्रहों के माध्यम से की है । समाजवादी धरोहर का उत्खनन इन प्रकाशनों से हुआ है ।     

इन दस्तावेजों की प्राप्ति का कारण है कि कोमिंटर्न ऐसे दौर में पैदा हुआ जब इलेक्ट्रानिक और फ़िल्म जैसे माध्यम शैशवावस्था में थे और उसने अपने दस्तावेजों को दर्ज करने पर ध्यान दिया था । लगभग 7000 पृष्ठों में इन दस्तावेजों के ग्यारह संग्रह छप चुके हैं और बारहवां भी छपने वाला है ।