Wednesday, May 27, 2026

साहित्य का इतिहास लेखन: नयी दृष्टि, नये प्रश्न

 

         

                                            

किसी भी समाज को समय समय पर अपने इतिहास को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत पड़ती है । कभी कभी यह काम समूची दुनिया को तो कभी देश विशेष को करना पड़ता है । इसका कारण मानव समाज की अपनी प्रकृति है । वह एक साथ वैश्विक और स्थानीय होता है । हम चाहें या न चाहें समूची दुनिया में होने वाले बदलाव हमें प्रभावित करते हैं । उदाहरण के लिए यह समय सारी दुनिया में बहिष्कारी राष्ट्रवाद का है । हम सभी जानते हैं कि ऐसा राष्ट्रवाद अपने साथ युद्ध और साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा लेकर आता है । ऐसे में सबको ही इतिहास की परीक्षा शुरू करनी पड़ती है । इतिहास आम तौर पर दुधारी तलवार की तरह होता है और उसे विभिन्न शक्तियां अपने स्वार्थ के पक्ष में व्याख्यायित करती हैं । उदाहरण के लिए अमेरिका अपनी स्थापना की ढाई सौवीं सालगिरह मनाने जा रहा है । यह अवसर वहां के शासकों के लिए दुनिया भर में धौंस धमकी का वातावरण बनाने का हो गया है तो जनता इसी अवसर का इस्तेमाल लोकतांत्रिक संवैधानिक मूल्यों के दावे के लिए कर रही है । न केवल इतना बल्कि बहुतेरे लोग इसी मौके पर अमेरिकी स्वाधीनता और स्थापना की दो सौवीं सालगिरह को भी याद कर रहे हैं जब साठ के विद्रोही दशक ने अमेरिका की अंतरात्मा को झकझोर डाला था । साहित्य में उसे गिंसबर्ग की ऐतिहासिक कविता हाउल के सहारे याद किया जाता है, समाज में अश्वेत समुदाय की ओर से नागरिक अधिकार के लिए चले आंदोलन के बहाने याद करते हैं तो पूरी दुनिया के साथ वियतनाम युद्ध के युवा विरोध के लिए भी उस सालगिरह को याद किया जा रहा है । युद्ध के विरोध ने ही साहित्य में मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा करने वाले साहित्य को ऐतिहासिक मूल्य प्रदान किया और अतीत से निकालकर इस तरह के साहित्य को फिर से प्रासंगिक बनाया गया ।  इतिहास के बारे में संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं होते । इनकी अभिव्यक्ति भाषा और साहित्य में भी होती है । इसी अवसर पर लैटिन अमेरिकी देश अपने उपनिवेशवाद विरोधी लेखकों को याद कर रहे हैं ताकि अमेरिकी साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा का लोकप्रिय प्रतिरोध खड़ा कर सकें ।    

 

इसीलिए साहित्य का इतिहास लेखन बिना किसी दृष्टि के नहीं हो सकता । उसकी इसी दृष्टि को दर्शन कहते हैं और इसके ही अध्ययन के लिए साहित्येतिहास दर्शन का अनुशासन बनाया गया है । यह दर्शन या अनुशासन साहित्य को देखने का एक नजरिया है । इसका विकास साहित्य के बारे में रूपवादी और संरचनावादी दृष्टिकोण के विरोध में हुआ क्योंकि ये दृष्टिकोण साहित्यिक रचना को रचनाकार अर्थात लेखक और उसके ग्रहीता अर्थात पाठक से पूरी तरह अलगाकर उसे स्वायत्त पाठ’ में बदल देते हैं । किसी कृति के अर्थ को खोलने के लिए ये दृष्टियां समाज और इतिहास का हस्तक्षेप जरूरी नहीं मानतीं और इसके लिए केवल अन्य पाठों का संदर्भ ग्रहण करने और उनके परिप्रेक्ष्य में ही किसी भी रचना के विश्लेषण पर जोर देती हैं । हालांकि कलावाद अनिवार्य तौर पर इतिहास का विरोध नहीं करता, बल्कि कभी कभी इतिहास को ही अपने में ढाल लेता है । इसके बारे में कला के प्रसिद्ध सामाजिक इतिहासकार आर्नल्ड हाउजर ने कला का इतिहास दर्शनमें अलाइस रीग्ल और हाइनरिह वोल्फ़्लिन नामक दो जर्मन विचारकों के मतों का उल्लेख किया है जो मानते थे कि कला का इतिहास कलाकार के नाम के बिना भी लिखा जा सकता है क्योंकि विकास तो असल में कला की तकनीकों का होता है । कला की इन तकनीकों में समय समय पर होने वाले बदलावों में एक पैटर्न होता है और वह पैटर्न ही उसका इतिहास कहा जा सकता है । इसके लिए वे विकास की जगह उद्विकास की धारणा प्रस्तावित करते हैं जिसमें वनस्पतियों के विकास की तरह कला के विकास में भी आंतरिक गुणों की वृद्धि ही दिखाई पड़ती है, बाहरी परिस्थितियों का प्रभाव प्रत्यक्ष नहीं होता । इसलिए वे कला के इतिहास के संदर्भ में बाहरी परिस्थितियों का उल्लेख जरूरी नहीं समझते । इस मान्यता के विरोध में आर्नल्ड हाउजर इतिहास की ऐसी धारणा का पक्ष लेते हैं जिसमें आंतरिक तर्क से विकास तो हो ही, युगांतरकारी बदलावों के कारक कला के भीतर की तकनीकें ही न हों बल्कि इन बड़े बदलावों की वजह बाहरी समाज में होने वाले परिवर्तनों के गहरे प्रभाव हों । इस तरह हाउजर के कला इतिहास लेखन में कला की आंतरिक तकनीकों के साथ ही व्यापक सामाजिक हालात का भी हस्तक्षेप होता है । इसका कारण यह है कि कला की तकनीक में आने वाले बदलावों की मुख्य वजह कलाकार के मन में परिवर्तन की अमूर्त इच्छा मान ली जाती है ।          

 

प्रसिद्ध जर्मन साहित्य चिंतक राबर्ट वाइमान ने ‘स्ट्रक्चर एंड सोसाइटी इन लिटरेरी हिस्ट्री’ में कहा है कि साहित्य के इतिहास दर्शन के निर्माण के लिए साहित्य की मूल ऐतिहासिक प्रकृति और उसकी अपनी खास सामाजिक भूमिका की समझदारी जरूरी है  इसके लिए रचना के लिखे जाने के समय के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और वर्तमान की सामाजिक सांस्कृतिक जरूरतों की समझ के बीच संवादी संबंध स्थापित करने की कोशिश करनी पड़ती है  असल में साहित्य का कोई भी इतिहास वर्तमान से असंपृक्त रहकर नहीं लिखा जा सकता । इसका बुनियादी कारण एक सार्वभौमिक तथ्य है और वह यह कि आम तौर पर तो साहित्येतिहास में कोई गम्भीर बदलाव नहीं आता लेकिन कभी कभी समाज में बदलाव की गति तेज हो जाती है तो तेजी से बदलते सामाजिक संदर्भ में अतीत का साहित्य हमेशा नयी अर्थवत्ता प्राप्त करता है  साहित्यिक रचनाओं में इसी प्रक्रिया में नये अर्थ या मूल्य पैदा होते हैं और उनकी प्रासंगिकता को फिर से पहचाना जाता है  इस साहित्यिक प्रासंगिकता के संधान को ही वे किसी भी रचना की उसके सृजन के समय में अवस्थित  विगत अर्थवत्ता’ और उसके भीतर इस समय की सीमा को पारकर पढ़े जाने के नये समय में बनी वर्तमान सार्थकता’ के बीच का संवादी गुण मानते हैं  दोनों समयों के बीच इस संवाद के लिए वे कला और यथार्थ तथा व्यक्ति और समाज के बीच नये और जटिल संबंधों की परिष्कृत समझदारी अत्यंत आवश्यक मानते हैं । इसी तरह उनका यह भी कहना है कि किसी भी साहित्यिक उत्पादन की कलात्मक संरचना उसके सामाजिक कार्य संपादन से भी जुड़ी होती है  इसी सामाजिक भूमिका को निभाने के क्रम में सामाजिक गतिविधि के रूप में साहित्य के कलात्मक लेखन और उसके सामाजिक पठन के बीच में वह बुनियादी रिश्ता बनता है जो अपनी प्रकृति में ऐतिहासिक होता है  यह लेखक के रूप में व्यक्ति के आत्म और उसके सामाजिक अस्तित्व के बीच एकता और अंतर्विरोध की कल्पनाजन्य अनुभूति है  इसमें तात्कालिक रूप से ही सही व्यक्ति का समाजीकरण और समाज का वैयक्तीकरण होता है  अतीत के अधिकांश महान लेखन की यही सामाजिक भूमिका रही है और वर्तमान में फिर से उसे नये सामाजिक वातावरण के संदर्भ में पूरी तरह   नयी नजर से पढ़ने की भी यही सच्ची भूमिका है  

 

उनका कहना है कि लिखना और पढ़ना इतिहास में मनुष्य की समग्र सामाजिक गतिविधि का अंग बना रहा  है  हमारे इतिहास के बारे में इसी किस्म के नजरिए से देखने पर मनुष्य प्रजाति का अब तक का समूचा इतिहास सामाजिक बदलावसंघर्ष और नियंत्रण की ऐसी समग्र प्रक्रिया के बतौर दिखाई पड़ता है जिसमें  प्रकृति के साथ मनुष्य का द्वंद्वात्मक रिश्ता तो शामिल रहता ही है, उसके इस संघर्ष और सहकार के द्वंद्व के साथ ही वर्गों और व्यक्तियों के संघर्ष तथा सांस्कृतिक जरूरतों और सौंदर्यात्मक गुणों का उदय और विकास भी शामिल होता है    

 

सिमोन सेबाग मोन्टफ़ायर ने विश्व इतिहास की अपनी किताब में इतिहास द्वारा वर्तमान के प्रभावित होने का बेहद रोचक विवरण प्रस्तुत किया है । उनके मुताबिक इब्न खल्दून के माता पिता प्लेग में नहीं रहे सर वाल्टर रेले अपना इतिहास समाप्त करने से पहले ही मृत्युदंड के शिकार हो गये इतिहास इस तरह भी वर्तमान को आकार देता रहा है इसी वजह से इतिहास लेखन जरूरी, सम्मानजनक लेकिन खतरनाक पेशा हो जाता है इसी तरह चीन के भी विश्व इतिहासकार सिमा क़्विन को बादशाह को बदनाम करने के आरोप में मृत्युदंड और दरबारी हिंजड़ा होने का विकल्प प्रदान किया गया था उसने हिंजड़ा होना चुना ताकि इतिहास को पूरा कर सके उसे लगा कि जनता तक सच ले जाने की कीमत तो उसे चुकानी होगी  

 

विचारणीय विषय में तीन पारिभाषिक पद मौजूद हैं-साहित्यइतिहास और दर्शन । इन सभी विशेष पदों की थोड़ी व्याख्या इस अनुशासन की समझ के लिए जरूरी है । कलात्मक रचनाएं होने के नाते साहित्यिक कृतियां अतुलनीय दिखाई पड़ती हैं और इसीलिए इतिहास लेखन के लिए आवश्यक किसी भी समूहन से इनकार करती हैं । दूसरी ओर इतिहास का अनुशासन मुख्य तौर पर राजनीतिक और समाजार्थिक बदलावों पर ध्यान देता है । अगर हम सतही तौर पर देखें तो इन बदलावों में किसी भी व्यवस्था का अभाव दिखाई पड़ेगा । इतिहास लिखने के लिए ऊपर से अव्यवस्थित दिखाई पड़ने वाले इन बदलावों के बीच कोई व्यवस्था स्थापित करनी पड़ती है । ‘कार्य-कारण श्रृंखला’ और ‘प्रगति’ जैसी धारणाओं के जरिए इस घटना प्रवाह में व्यवस्था कायम की जाती है । आम तौर पर इसे ही इतिहास दर्शन कहा जाता है । साहित्यिक इतिहास के लिहाज से इस इतिहास दर्शन को परिष्कृत करना पड़ता है क्योंकि साहित्य के बदलाव समाज या अर्थतंत्र के बदलावों से थोड़ा अलग तरीके के होते हैं । हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में एक ढाँचा प्रस्तावित किया था । वही इस बात का प्रमाण है कि साहित्य के इतिहास लेखन के लिए रचनाओं और रचनाकारों का परिचय देने से आगे बढ़कर एक ऐतिहासिक दृष्टि अपनाने की जरूरत पड़ती है ।

जब भी इतिहास लिखा जाता था तो इतिहास लेखक उसे वृत्तांत से अलगाने के लिए अलग अलग घटनाओं को आपस में जोड़ने का कोई न कोई ढाँचा बनाते थे लेकिन उसे अलग से सूत्रबद्ध करने की जरूरत उन्हें नहीं महसूस होती थी । जर्मन दार्शनिक हेगेल ने इसे पहली बार व्यवस्थित किया । उन्होंने माना कि असली इतिहास विचारों का होता है और मानव समाज किसी न किसी परम विचार को अमली जामा पहनाने के लिए प्रयासरत रहता है । इसी क्रम में इतिहास आगे बढ़ता है यानी ‘प्रगति’ होती है । इसी आधार पर उन्होंने विचारों का विकास रुक जाने पर उसे ‘इतिहास का अंत’ कहा । दर्शन का एक अंग सौंदर्यशास्त्र माना जाता है और इसीलिए सभी दार्शनिक सौंदर्यशास्त्र पर भी लिखते हैं । हेगेल ने भी ‘हाइडेलबर्ग लेक्चर्स आन ऐस्थेटिक्स’ शीर्षक पुस्तक लिखी जिसमें सौंदर्यशास्त्र के अंग के बतौर साहित्य के कुछेक सवालों पर प्रकाश डाला गया है । उदाहरण के लिए आधुनिक काल में पुनर्जागरण के बाद जन्मी मानव समाज की विवेक दृष्टि से उन्होंने गद्य के उदय को जोड़ा है । उनका कहना था कि आधुनिक काल की तर्कणा की अभिव्यक्ति गद्य में ही संभव है । इसी तरह उन्होंने उपन्यास को ‘मध्य वर्ग का महाकाव्य’ कहा था । हिंदी में आम तौर पर इस परिभाषा की व्याख्या करते हुए मध्य वर्गका वही अर्थ समझा जाता है जो इस समय प्रचलित है जबकि हेगेल के समय इसका मतलब उभरता हुआ शहरी बुर्जुआ वर्ग होता था । अर्थात इस परिभाषा के अनुसार उपन्यास उभरते हुए बुर्जुआ वर्ग का महाकाव्य है । साहित्य का माध्यम भाषाएं होती हैं । इनके भी उत्थान पतन को व्यापक ऐतिहासिक बदलावों के संदर्भ में ही समझा जा सकता है अन्यथा कुछ भाषाओं को आधुनिक कहना संभव नहीं होता, न ही कुछ को प्राचीन । साहित्य की भाषा के रूप में किसी भाषा की जगह दूसरी भाषा के आगमन के पीछे भाषा में निहित कोई गुण नहीं होता, बल्कि अनेक साहित्येतर आर्थिक और राजनीतिक कारण होते हैं ।

 

हेगेल के चिंतन से आगे बढ़ते हुए मार्क्स ने कहा कि मनुष्य इतिहास निर्माण की प्रक्रिया में किसी परम विचारका दास नहीं होता, बल्कि वह इतिहास को सचेत रूप से बनाता और बदलता है । यह बदलाव कोई बाहरी घटना नहीं, उसका अपने आपको बनाना और बदलना होता है क्योंकि कोई भी बदलाव मनुष्यों के दिमाग से होकर गुजरता है । साहित्य उस व्यापक सृजनात्मक भंडार का अंग होता है जिसका उत्पादन मनुष्य अपनी सौंदर्यबोधीय संवेदना की संतुष्टि के लिए करता है और इस संवेदना का विकास मनुष्य ने अपने सामाजिक अस्तित्व के उत्पादन के विकास-क्रम में किया है । मार्क्स के चिंतन के प्रभाव से साहित्य के विश्लेषण में ‘नव-इतिहासवाद’ और ‘सांस्कृतिक भौतिकवाद’ की धाराओं का जन्म हुआ । जार्ज लुकाच ने ऐतिहासिक भौतिकवाद और साहित्य-रूपखासकर यथार्थवाद और ऐतिहासिक उपन्यास के रिश्तों की समझ में इजाफा किया । उन्होंने फ़्रांसिसी उपन्यासकार बाल्जाक और रूसी उपन्यासकार तोलस्तोय के प्रसंग में यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि इन दोनों की घोषित विचारधारा के प्रतिक्रियावादी होने के बावजूद याथार्थ के चित्रण की उनकी प्रतिबद्धता उन्हें परिवर्तनकामी ताकतों के साथ खड़ा कर देती है । इसके बाद के प्रमुख मार्क्सवादी सिद्धांतकार रेमंड विलियम्स ने ग्रेट ब्रिटेन में सांस्कृतिक भौतिकवादकी धारणा का विकास किया और संस्कृति अध्ययन का आंदोलन चलाया जिसके तहत साहित्य को समूचे सांस्कृतिक उत्पादन का अंग मानकर उस पर विचार किया जाता था । अभिव्यक्ति के अलग अलग माध्यमों को एक साथ रखकर विचार करने के क्रम में संस्कृति के लोकप्रिय रूपों की भूमिका को भी ठीक से समझा गया ।

कला का इतिहास दर्शनमें आर्नल्ड हाउजर ने आधुनिक समय में भी कला के प्राचीन रूपों के आकर्षण की बात की है और कहा है कि मार्क्स ने भी ग्रीक कवि होमर के सिलसिले में यह सवाल उठाया है और इसका उत्तर बचपन के सार्वकालिक आकर्षण के आधार पर देने की कोशिश की है । भारतीय मार्क्सवादी साहित्य चिंतक रामविलास शर्मा ने साहित्य में मनुष्य के इंद्रियबोध, उसके भावजगत और विचारधारा की उपस्थिति मानी है और इनमें परिवर्तन की गति में भिन्नता स्वीकार की है ।              

 

साहित्य के इतिहास दर्शन पर विचार करने का तात्कालिक संदर्भ भी है । हम सभी जानते हैं कि इतिहास लिखे तो जाते हैं अतीत के बारे में लेकिन इस अतीत को देखने का परिप्रेक्ष्य लेखक के वर्तमान से बनता है । यही कारण है कि समय बदलने के साथ किसी व्यक्तित्व और घटना के बारे में मूल्यांकन भी बदल जाता है । इसी वजह से एक ही कालखंड के बारे में बार बार लिखा जाता है । इतिहास में अनेक बार ऐसा हुआ कि लड़ाई तो वर्तमान काल की थी लेकिन उसमें युद्ध का मैदान अतीत बना । इसलिए इतिहास लेखन बहुधा अनचाहे भी वर्तमान के संघर्ष का क्षेत्र बन जाता है ।    

 

साहित्य के इतिहास दर्शन के अनेक अर्थ ग्रहण किए जा सकते हैं । एक अर्थ तो ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में साहित्य का अध्ययन है । यही अर्थ सबसे अधिक मान्य है । लेकिन इसका एक अर्थ इतिहास के ऐसे लेखन का अध्ययन भी हो सकता है जो साहित्य के अधिक नजदीक हो । इस नजरिए से देखने पर इसका आयाम विस्तृत हो जाता है । इसी प्रसंग में एक और प्रश्न उठाया जाता रहा है कि साहित्य के इतिहास की मुख्य प्रकृति साहित्यिक होती है या ऐतिहासिक । यह सवाल केवल अकादमिक नहीं है और लंबे व्यावहारिक लेखन से साबित हुआ है कि इस अनुशासन में रुचि साहित्य के विचारकों की अधिक रही है, इतिहासकारों की उतनी नहीं रही है । लेकिन हाल के दिनों में इतिहास के भीतर ही उत्तर आधुनिकता के उदय ने ऐसी संभावना पैदा की है कि साहित्य केवल इतिहास का स्रोत ही न रह जाए और विधाओं के बीच की आवाजाही की तरह अनुशासनों के बीच भी आवाजाही पैदा हो । अतीत में इसके उदाहरण रहे हैं । रमेश चंद्र मजुमदार या जवाहर लाल नेहरू के इतिहास लेखन और राहुल सांकृत्यायन के साहित्य लेखन में ऐसे विंदु हैं जो दोनों अनुशासनों के बीच किसी स्थिर-स्थायी विभाजन का निषेध करते हैं । 

 

इतिहास दर्शन के बारे में कोई भी बातचीत बिना हमारे समय का संदर्भ लिये नहीं हो सकती । यह समय न केवल इतिहास विवेक के सामान्य और सम्पूर्ण नाश पर आमादा है बल्कि इतिहास को फिर से सुधारकर राष्ट्रीय अहं की तुष्टि की जा रही है । बाबरी मस्जिद के विध्वंस से अतीत के अपमान का बदला वर्तमान से लेने की जो मुहिम शुरू हुई थी अब उसने भयावह आक्रामकता और असत्य के उत्पादन के राज्यपोषित अभियान का भी साथ ले लिया है । बहुत पहले कुबेरनाथ राय ने आशंका जाहिर की थी कि इतिहास का लेखन राजनीतिक लड़ाई का क्षेत्र बन जा सकता है । हम उनकी इस आशंका को सत्य होते देखने के लिए अभिशप्त हैं । राजनीतिक सत्ता की ओर से इतिहास को इतना नग्न तरीके से कभी अपने क्षुद्र और संकीर्ण स्वार्थ में नहीं लगाया गया था और वह भी अधपढ़ तथा अहम्मन्य शासकों द्वारा ।

असल में कोई भी राजसत्ता या शासन अपने वर्तमान प्रभुत्व से ही तुष्ट नहीं होता । वह शासन की अवधि को स्थायित्व देने के लिए खुद को एकमात्र वैध शासक समूह के रूप में साबित करना चाहता है । इसके लिए उसे लोगों की मानसिकता को अपने तर्क के अनुसार ढालना होता है । राजसत्ता की यह मजबूरी होती है । इसके लिए ही वह इतिहास को अपने हितों की सेवा में लगाती है । कभी कभी यह काम परिष्कृत तरीके से किया जाता है और कभी नितांत भोंड़े रूप में । वर्तमान समय इसी भोंड़ेपन का है जिसमें शासक समूह के व्यक्तियों द्वारा प्रतीकों के उत्पादन हेतु इतिहास के साथ तोड़ मरोड़ का अंधाधुंध प्रयास जारी है । इसमें कभी नानक, कबीर और गोरख एक साथ मिल बैठते हैं तो कभी अशोक और गौतम बुद्ध में समकालिकता स्थापित कर दी जाती है । इस कोशिश को सापेक्षिक स्थायित्व प्रदान करने के लिए स्थापत्य का सहारा लिया जाता है । शासक अक्सर अपनी छाप को स्थायी स्वरूप देने के लिए भवन निर्माण आदि के साथ शहरों के नक्शे तक बदल देने का प्रयास भी करते हैं ।   

हम सभी जानते हैं कि हिटलर ने यहूदी से नफ़रत के लिए समूचे ज्ञान का नाश करने का अभियान व्यवस्थित रूप से चलाया था । उनके वंशजों का वर्तमान उत्थान भी इस अभियान की गंध लिये हुए है । गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के संस्थानों पर हमला इसी अभियान का अभिन्न अंग है । निचले स्तर पर भी पाठ्यक्रमों में संशोधन इस नजरिए से किये जा रहे हैं कि देश की आजादी का आंदोलन और भक्ति साहित्य का व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ ही समाप्त हो जाए । कहने की जरूरत नहीं कि इस समय जारी उपनिवेशवाद और साम्राज्य विस्तार का गुणगान भी इसी परियोजना का अंग है । धर्म के भीतर नैतिकता की स्थापना भक्ति आंदोलन का मूल था । आजादी के संघर्ष के ताप से राजसत्ता को जनता के प्रति जिम्मेदार बनाने के प्रयास को भक्ति साहित्य की आत्मा के रूप में स्थापित किया गया था । अब उपनिवेशवाद की प्रशंसा के लिए भक्ति की धारणा को विकृत करना आवश्यक हो गया है इसलिए उसके अर्थ को भ्रष्ट करते हुए शासक की अनैतिकता को भी सही ठहराने को भक्त का प्रमुख कर्तव्य घोषित किया जा रहा है ।                   

हमारे समय की एक बड़ी दुर्घटना लोकतंत्र का लोप है । जब सोवियत संघ का पतन हुआ था तो इसे इतिहास का अंत घोषित करते हुए अमेरिकी चिंतक फ़्रांसिस फ़ुकुयामा ने किसी भी तरह के बुनियादी सामाजिक बदलाव की सम्भावना से इनकार तो किया लेकिन भविष्य में लोकतंत्र का विस्तार को एकमात्र घटना माना । उसे लगा था कि पश्चिमी देशों की ओर से लोकतंत्र का निर्यात शेष दुनिया में किया जाएगा लेकिन दुर्घटना की तरह इन देशों में ही लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगा है । सड़कों पर लोग बादशाहत की वापसी के विरोध में भारी प्रदर्शन कर रहे हैं । बहुतेरे लोगों का कहना है कि लोकतंत्र के क्षरण के साथ साहित्य का भी क्षरण देखा जा रहा है । उनके अनुसार साहित्य का अध्ययन मनुष्य में मानवीय संवेदना के बीज रोपता था जो समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों की व्यापक मौजूदगी के लिए जरूरी है । इसके अभाव में शासन और सोच में तानाशाही का प्रभुत्व चारों ओर कायम हो गया है । साहित्य के इतिहास को साहित्य की इस सामाजिक भूमिका की भी छानबीन करनी होगी ।

ऊपर हमने साठ के दशक के संदर्भ में अश्वेत आंदोलन का जिक्र किया है । साठ के दशक में साहित्य के भीतर अश्वेत समुदाय के साथ स्त्री की भी दावेदारी की गयी थी । इन दोनों का प्रभाव पश्चिमी समाजों तक ही सीमित नहीं रहा । उसने पूरी दुनिया में उपेक्षित समुदायों के उत्थान के नये दौर का सूत्रपात किया था । इन दोनों ही समूहों के उत्थान के साथ पर्यावरण का आंदोलन भी उस समय की चेतना का अभिन्न अंग है । साहित्य को प्रभावित करने से आगे बढ़कर इस दावेदारी ने अब साहित्येतिहास लेखन को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है । इसने साहित्येतिहास में हस्तक्षेप के साथ साहित्य की धारणा पर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है । इस साहित्यिक नवीनता ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य के पुराने रूपों को भी एक हद तक बदलने के लिए बाध्य किया है और उसकी सामाजिक भूमिका को भी नयी जमीन दी है । कला और साहित्य के पुराने मानदंडों में बदलाव के साथ ही साहित्येतिहास के पुराने ढांचे पर भी दबाव पैदा हो रहा है । एक बार फिर से वर्तमान ने हमारे अतीत को प्रभावित करना शुरू किया है । इस नये समय में हमें साहित्य के पारम्परिक लक्षणों से चिपके रहने की जगह नये पाठकों द्वारा साहित्य को दिये जा रहे नये स्वरूप को सराहना होगा । कहने की जरूरत नहीं कि भविष्य उसी पीढ़ी का होने जा रहा है जो इस समय के सृजनात्मक प्रतिरोध के माहौल में जवान हो रही है । लेकिन समाज और राजनीति की तरह ही साहित्य में भी पुराना संस्कार इतनी आसानी से नये के लिए रास्ता नहीं छोड़ेगा ।