Friday, January 17, 2020

फ़ासीवाद से लड़ाई


                
                               
(इस किताब को पढ़ते हुए लगातार महसूस होता रहा कि बात किसी अन्य देश की नहीं, अपने ही प्यारे भारत की हो रही है । वर्तमान तो बहुत कुछ इतना ही भयावह है, भविष्य के बारे में कुछ कहना मुश्किल है । जब इस अंधेरी सुरंग से बाहर निकलेंगे तो शायद हमारे पास भी ऐसी ही कुछ गुमनाम कथाएं होंगी । तानाशाहों की कब्र पर फूल उगेंगे और उनसे जूझने की बेखौफ़ लड़ाई के किस्से याद रखे जाएंगे । जो बच्चे आज लाठी खा रहे हैं कल के आजाद देश का निर्माण वही करेंगे ।)
2019 में वर्सो से डैनिएल सोनाबेन्ड की किताब ‘वी फ़ाइट फ़ासिस्ट्स: द 43 ग्रुप ऐंड देयर फ़ारगाटेन बैटल फ़ार पोस्ट-वार ब्रिटेन’ का प्रकाशन हुआ । किताब में 43 यहूदियों के उस समूह की कहानी बताई गई है जिसने फ़ासीवाद से लड़ाई लड़ी थी । इस समूह ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन में फ़ासीवादियों का मुकाबला किया था । इस समूह के बारे में लेखक को यहूदी होने के बावजूद पता नहीं था । यहूदी इतिहास के जानकार उनके अन्य दोस्तों को भी इस समूह के बारे में कुछ खास पता नहीं था । ये लड़ाइयां अक्सर रविवार को होती थीं । लेखक को अचानक पता चला कि उनके पितामह इस समूह के सदस्य रहे थे । असल में सत्रह साल की उम्र में फ़ासिस्टों की नुक्कड़ सभाओं की खबर इस समूह तक पहुंचाने का काम वे किया करते थे । वे थोड़ा डरपोक थे इसलिए असली लड़ाई में शामिल नहीं होते थे । इससे पहले परिवार के किसी सदस्य को उन्होंने अपनी इस सक्रियता के बारे में कुछ भी नहीं बताया था । उनको इस समूह के संस्थापक की लिखी और 1993 में छपी किताब का पता चला । उसे पढ़ने के बाद लेखक ने इसे व्यापक स्तर पर प्रचारित करने का इरादा बनाया । पहले कोशिश की कि फ़िल्म या टेलीविजन के माध्यम का इस्तेमाल करें लेकिन सफलता नहीं मिली । फिर इस समूह के बारे में शोध शुरू किया । इसी समय पता चला कि न्यू यार्क की एक फोटोग्राफर का संबंध समूह के संस्थापक से है । वहां पहुंचकर संस्थापक का साक्षात्कार किया तो ढेर सारी कहानियों का पता चला । उनकी किताब पढ़ने और साक्षात्कार के बाद भी लेखक ने गहन शोध जारी रखा ।
समूह के संस्थापक की किताब ही जानकारी का एकमात्र स्रोत थी । समूह के सदस्यों को शिकायत थी कि लेखक ने समूह के प्रभाव का अतिरंजित वर्णन किया है । उन्होंने केवल कुछ बड़ी घटनाओं का विस्तार के साथ उल्लेख करके रोजमर्रा के कष्टसाध्य काम की उपेक्षा की है । सदस्यों का कहना था कि लेखक ने उन्हें व्यर्थ ही कमान्डो कहा है । असल वे युवा लोग थे और गलती करके उससे सीखते थे । इनमें शामिल होने वालों को स्कूल में यहूदी होने के नाते अपमान झेलना पड़ा था इसलिए बहुत कम उम्र में ही वे फ़ासीवाद के विरोध में काम करना शुरू कर चुके थे । स्कूलों के बाहर भी हालात अच्छे नहीं थे । अभिभावकों की दुकानों पर हमले हो रहे थे । कुछ कुछ इसके चलते भी बीसवीं सदी के अधिकांश बेहतरीन मुक्केबाज यहूदी रहे । उन्हें स्कूल से ही मुक्केबाजी शुरू करनी होती थी । इन हालात में बदतरी आई जब 1934 में ब्रिटिश यूनियन आफ़ फ़ासिस्ट्स का गठन हुआ ।
इसके समर्थकों में अखबारों के मालिक भी थे । इनके साथ ही कुलीनों और मध्यवर्ग तथा मजदूर वर्ग में भी इनका समर्थन बढ़ने लगा । इनकी भीड़ भरी सभाओं में विरोधियों पर हमले किए जाते । इन झगड़ों में लोग घायल होते । फ़ासिस्टों की क्रूरता उजागर होने लगी । जर्मनी में जब उनके कारनामों की खबरें बाहर आने लगीं तो समर्थन घटना शुरू हुआ । समर्थक अखबार ने भी समर्थन कम कर दिया । धीरे धीरे ऐसे कट्टर नेताओं का आगमन हुआ जो यहूदियों की आबादी पर खुलेआम हमलों का आवाहन करते थे । इन भड़काऊ भाषणों के चलते यहूदियों के घरों, दुकानों और उपासना स्थलों पर तोड़फोड़ हुई और कुछ व्यक्तियों पर भी शारीरिक हमले हुए । इन हमलों को खामोशी से सहने की जगह यहूदी समुदाय ने आत्मरक्षा के उपाय किए और फ़ासीवाद विरोधी संगठनों में शामिल हुए । इन संगठनों में सबसे मजबूत कम्युनिस्ट पार्टी थी । इसका नतीजा यह निकला कि यहूदियों ने थोक के भाव कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली । कम्युनिस्ट पार्टी ने भी फ़ासिस्टों की तरह सभाओं का आयोजन शुरू किया । इसके चलते जो टकराव होते उन्हें अखबार, नेता और पुलिस राजनीतिक होड़ के रूप में प्रचारित करते जिनमें गलती दोनों तरफ से हुई साबित की जाती ।
कुछ यहूदी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण किए बिना फ़ासीवाद से लड़ना चाहते थे । ऐसे लोग ब्रिटेन के यहूदियों के एक आधिकारिक संगठन से कुछ करने की उम्मीद लगा बैठे । उस संगठन के पदाधिकारी विवाद से बचना चाहते थे और डरते थे कि कोई बात होने पर यहूदी विरोध बढ़ जाएगा । उन्होंने फ़ासीवाद का भी विरोध करने से इनकार कर दिया । नतीजतन युवा यहूदियों में इस संगठन से चिढ़ का भाव उपजा । इस अंतराल को पाटने के लिए यहूदियों के अन्य संगठन सामने आए । इनका महासंघ स्थापित हुआ । इधर फ़ासीवादी संगठन ने यहूदियों के इलाके से जुलूस निकालने की घोषणा की । महासंघ ने विरोध का फैसला किया । पुलिस ने फ़ासीवादी संगठन का जुलूस निकालने के लिए स्थानीय निवासियों की जत्थेबंदी को हटाने के लिए हिंसा का सहारा लिया । फिर भी जुलूस को रोकने में महासंघ सफल रहा । इस सफलता ने लड़ाकुओं के उपर्युक्त समूह की स्थापना की प्रेरणा प्रदान की । दूसरी तरफ फ़ासीवादी समूह ने अपनी असफलता के प्रतिकार स्वरूप यहूदी बस्ती में आतंक का राज बरपा करने का प्रयास किया । उन्होंने यहूदी समुदाय पर छिटपुट हमले तेज कर दिए । इन लड़ाइयों में यहूदी नौजवानों ने बहादुरी का परिचय दिया । इनसे उनके भीतर फ़ासीवाद विरोधी राजनीतिक समझ का भी विकास हुआ । इन्होंने ही दस साल बाद उपर्युक्त जुझारू समूह का निर्माण करके विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद फ़ासीवादियों का जीवन दूभर कर दिया ।
बहरहाल फ़ासीवादियों के नेता ने अपने संगठन में कुछ बदलाव किए और उसे आसन्न युद्ध के विरोध करने के लिए तैयार किया । अब उसने शांतिवादी का चोला धारण करके हिटलर और मुसोलिनी के साथ सहयोग की वकालत शुरू की और चर्चिल केयुद्धोन्मादका विरोध किया । युद्ध शुरू हो जाने के बाद उस संगठन ने अपनी कोशिशों में तेजी लाई और शांतिपूर्ण समझौते के लिए अभियान चलाया । इस बदलाव के बावजूद यहूदियों पर उनके हमलों में कमी नहीं आई । फ़ासीवादियों के संगठन एकाधिक थे । एक के दिशा बदलने से उससे अधिक कट्टर दूसरा संगठन केंद्र में आ जाता था । इनमें एक सांसद भी थे जिनके संगठन का घोषित मकसदसंगठित यहूदीपन की गतिविधियों का रहस्योद्घाटन और विरोध करनाथा । उन्होंने एक दक्षिणपंथी क्लब बना रखा था और उसके 135 सदस्यों के नाम दर्ज कर रखे थे । संख्या कम लग सकती है क्योंकि सांसद महोदय इसमें केवल कुलीनों और बड़े लोगों को शामिल करना चाहते थे । इससे फ़ासीवाद विरोधियों के इस संदेह की पुष्टि हुई कि ऊंचे पदों पर बैठे लोग फ़ासीवाद के समर्थक हैं । 1940 के अंत तक एक हजार फ़ासिस्टों की गिरफ़्तारी हुई । उन्हें आरामदेह जगहों पर कैद में रखा गया । वे लोग आखिरकार प्रभावशाली लोग थे फिर भी इस गिरफ़्तारी का तात्कालिक कारण यह था कि हिटलर इंग्लैंड के मुहाने तक आ पहुंचा था । ऐसे में इन्हें आजाद छोड़ने में खतरा था ।             


Monday, January 6, 2020

जलियांवाला बाग के सौ साल बाद


            
                                               
जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को बैशाखी के दिन अंग्रेजी सरकार ने अमृतसर में जो हत्याकांड रचा उसकी अनुगूंज पिछले सौ सालों में कभी गुम नहीं हुई रह रहकर उसका जिक्र होता रहा उस हत्याकांड के कातिल के संरक्षक पंजाब के तत्कालीन लेफ़्टिनेन्ट गवर्नर माइकेल ओ’डायर को गोली मारने वाले ऊधम सिंह की अस्थियों को देश लाकर सम्मान सहित दफ़नाने का मामला हो या उस जघन्य नरसंहार के लिए ब्रिटेन की सरकार के माफ़ी मांगने का सवाल हो, जलियांवाला बाग किसी न किसी वजह से बीते सौ सालों में हमेशा चर्चा में बना रहा । उस हत्याकांड को अंजाम देने वाले जनरल डायर को सजा तो नहीं मिली लेकिन समय से पहले उसे सेवानिवृत्त कर दिया गया । इसके बाद उसकी मदद के लिए तत्कालीन सैन्य अधिकारियों ने ब्रिटेन में चंदा जुटाया था । समाज के विशेषाधिकार सम्पन्न समुदाय की ऐसी आपराधिक एकजुटता दुर्लभ नहीं है । तबसे अब तक इस तरह की वर्गीय एकता के अनेक उदाहरण दुनिया भर में मिल सकते हैं । न केवल ब्रिटेन मे बल्कि हमारे देश में भी उसकी याद अभी हाल में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने नागरिकता संशोधन विरोधी प्रदर्शनों के हालिया दमन के सिलसिले में दिलाई । उसकी याद ताजा कराते हुए नागरिकता संशोधन विधेयक विरोध के सिलसिले में हिंसक पुलिस दमन को आंदोलनकारियों ने जामियावाला बाग कहा ।    
ब्रिटेन की राजनीति में फिर से वह प्रमुख मुद्दे के बतौर सामने आया ब्रिटेन के हालिया चुनाव में लेबर पार्टी के घोषणापत्र में इसके लिए माफ़ी मांगने का वादा किया गया इस वादे से इस मसले की संवेदनशीलता और प्रासंगिकता का पता चलता है । कहने की जरूरत नहीं कि उसके बाद से निर्दोष लोगों के उत्पीड़कों के लिए डायर का नाम विशेषण की तरह इस्तेमाल होने लगा । आम जनता इसी तरह अन्यायी उत्पीड़कों को लम्बे समय तक याद रखती है । ध्यान देने की बात यह भी है कि इस घटना के पीछे जिस तनाव का हाथ था उसका कारण रौलट कानून थे जिनके तहत शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगा दी गई थी । शासन के बनाए उत्पीड़क कानूनों के विरोध का हिंसक दमन तब से लेकर आज तक के शासकों की आदत बनी हुई है । इन कानूनों का विरोध करने के चलते ट्रिब्यून के संपादक को हिरासत में ले लिया गया था । तब के पत्रकार आज की पत्रकारिता के विपरीत सरकार के गलत कदमों का विरोध भी किया करते थे । इसी ट्रिब्यून के संस्थापक दयाल सिंह मजीठिया के नाम पर दिल्ली में दयाल सिंह कालेज का नाम रखा गया । पाकिस्तान के प्रति दुर्भावना के इस दौर में याद दिलाना अन्यथा न होगा कि यह कालेज पहले लाहौर में था और विभाजन के बाद दिल्ली लाया गया । दयाल सिंह ने सिख होने के बावजूद प्रावधान किया था कि कालेज का मुखिया सिख नहीं होगा, सिखों के लिए प्रवेश में आरक्षण भी नहीं होगा और कालेज के संचालन में सिख धर्म की संस्थाओं की कोई भूमिका नहीं होगी । दुर्भाग्य से हाल में इस कालेज का नाम बदलकर दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रखने की कोशिश हुई ।
गुलामी के उस कठिन समय में सरकार के विरोधियों की बात अनसुनी नहीं जाती थी । आज तो तमाम विरोध के बावजूद शासकों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती । विरोध के दमन के लिए तब भी पुलिसिया उपायों का सहारा लिया जाता था । इसी वजह से रौलट कानूनों के विरोध में होने वाले जन प्रदर्शनों को रोकने के लिए पंजाब में सख्त निषेधाज्ञा जारी कर दी गई थी । एक हिंसक घटना में किसी अंग्रेज महिला की जान चली गई थी । जिस जगह घटना हुई थी वहां लोगों को घुटने के बल चलते हुए गुजरना होता था । लोगों के इकट्ठा बाहर निकलने पर रोक इतनी कड़ी थी कि मृतकों के अंतिम संस्कार में भी कठिनाई होने लगी थी ।       
उसके सौ साल पूरे होने के अवसर पर 2019 में येल यूनिवर्सिटी प्रेस से किम वागनर की किताबअमृतसर 1919: ऐन एम्पायर आफ़ फ़ीयर & मेकिंग आफ़ मैसेकरका प्रकाशन हुआ ज्ञातव्य है कि वागनर ने लगातार भारत में अंग्रेजी राज के साथ टकरावों के बारे में गम्भीरता के साथ लिखा है । सबसे पहले उन्होंने ठगी के बारे में विस्तार से लिखा था । उसके बाद दूसरी किताब 1857 के गदर के बारे में लिखी । सामूहिक शहादत के इस शताब्दी वर्ष में प्रकाशित किताब के बारे में उनका कहना है कि इससे पहले की दोनों किताबें इस किताब की तैयारी जैसी हैं । लेखक ने इस सवाल पर गहराई से विचार किया है कि गोली से मरने वालों की बात अलग है लेकिन जो लोग घायल थे उन्हें वहीं तड़पने के लिए छोड़ देने की संवेदनहीनता आखिर डायर में पैदा कैसे हुई । पूछताछ के दौरान भी उसे अपने इस कृत्य का कोई पछतावा नहीं था । उसके मुताबिक वह हिंदुस्तानियों की बगावत की हिम्मत को तोड़ देने के लिए उन्हें सीख देना चाहता था । यह सीख जो मर गए उनको नहीं दी जानी थी बल्कि अन्य सम्भावित बागियों को दी जानी थी । इस सोच की तुलना 1857 के विद्रोहियों को सजा देने के तरीके से करते हुए उन्होंने बताया है कि उस समय साथी सिपाहियों के समक्ष तोप के मुंह से बांधकर उड़ा देना सबसे पसंदीदा सजा थी । अंग्रेज अधिकारियों में से बहुतेरे लोगों ने इस सजा को सबसे कम पीड़ादायक और प्रभावकारी भी बताया है । इस तरह की अमानवीयता का कारण अंग्रेजों की नस्ली सोच थी जिसके चलते वे भारतीयों को ऐसा प्राणी समझते थे जिसके साथ अमानवीय बरताव करना उनको जायज लगता था । ध्यान देने की बात है कि उपनिवेशवाद की विचारधारा के पीछे आर्थिक लाभ के प्रबल आकर्षण के साथ ही नस्ली भेदभाव की यह सोच भी काम कर रही थी ।
इस नस्लीयता पर विचार करते हुए अमेरिकी अश्वेत चिंतक डब्ल्यू ई बी ड्यु बोइस ने कहा कि बीसवीं सदी ने उपनिवेशों के खात्मे का काम तो पूरा किया लेकिन उपनिवेशवाद के पीछे की नस्ली सोच अ भी जिंदा है । इसके लिए उन्होंने वैश्विक रंगभेद कायम करने के संरचनात्मक तरीके की पहचान की और इससे बने वैश्विक विभाजन को ग्लोबल कलर लाइन का नाम दिया । ड्यु बोइस का मत था कि समूची बीसवीं सदी की समस्या नस्ल की समस्या है । साम्राज्यों के निर्माण की उन्नीसवीं सदी में यूरोपीय औपनिवेशिक ताकतों ने दुनिया भर के संसाधनों और भूभागों पर कब्जा करने के लिए आपस में होड़ लगाई । उनके आचरण में चमड़ी के रंग पर आधारित ऊंच नीच की नस्ली सोच निहित थी । धरती पर गोरों के अधिकार के पीछे इसी तर्क का इस्तेमाल किया गया । बीसवीं सदी में इस साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में आंतरिक अंतर्विरोध पैदा होने लगे और सदी के मोड़ पर ही युद्ध शुरू हो गए । इसी संदर्भ में ड्यु बोइस ने ठीक ही कहा कि साम्राज्यवाद द्वारा निर्मित इस वैश्विक रंगभेद को दुरुस्त करना बीसवीं सदी का कार्यभार है । इसके जरिए ही नई और सार्वभौमिक विश्व व्यवस्था की कल्पना सम्भव है । बीसवीं सदी में कुछ हद तक इस कार्यभार को अंजाम भी दिया गया लेकिन इस काम को पूरा नहीं किया जा सका । नस्लवाद का जो तर्क था वह अब भी सामाजिक पदानुक्रम के लगभग सभी रूपों के साथ जुड़ा हुआ है । इसके लिए भेदभाव के कुछ अन्य रूपों को देखना पर्याप्त होगा उदाहरण के लिए जाति आधारित भेदभाव का तर्क भी मनुष्यों के एक बड़े हिस्से को अमानवीय व्यवहार के लायक समझने पर टिका हुआ है । मनुष्यों के जिस समुदाय को नीचा बताया जाना है उन्हें अपवित्र आदि कहकर भेदभाव को जायज ठहराया जाता है सामाजिक भेदभाव के दूसरे प्रमुख रूप, स्त्री की पराधीनता को भी इसी तार्किक संरचना से मजबूत बनाया जाता है । इसके लिए उसे अबला या निर्भर आदि कहकर उसकी हीनता को आम लोगों की चेतना में प्रतिष्ठित किया जाता है इसके जरिए समाज की बुनियादी इकाई परिवार के संचालन में उनके योगदान को गोपन बना दिया जाता है देहाती इलाकों में चूल्हा चौकी से लेकर शहरी क्षेत्रों की कामगार स्त्रियों तक फैले हुए इस श्रमिक समुदाय की मेहनत को अदृश्य बनाकर समूची सम्पदा के सृजन का पारितोषिक देने की जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा लिया जाता है स्पष्ट है कि मानव समाज में किसी खास समुदाय के साथ हिंसक आचरण के लिए सबसे पहले उसे कमतर दर्जे का साबित करना जरूरी हो जाता है अन्यथा अत्याचार करने वाला अपने आचरण का औचित्य नहीं स्पष्ट कर सकेगा । हम कह सकते हैं कि भारतीयों के साथ अंग्रेजों के क्रूर व्यवहार का आधार उनकी नस्ली सोच थी ।
उपनिवेशवाद के इस रूप को समझकर ही हम भारत के स्वाधीनता संग्राम में कूदने से पहले दक्षिण अफ़्रीका में गांधी की तैयारी का महत्व आंक सकते हैं । प्रसंगवश इस बात को भी याद रखना चाहिए कि जलियांवाला बाग के हत्याकांड ने गांघी को साम्राज्यवाद का जबर्दस्त विरोधी बना दिया था । इससे पहले उनके मन में अंग्रेजों के प्रति कुछ सहानुभूति रही थी, यहां तक कि दक्षिण अफ़्रीका में उनकी सेवाओं के बदले में उन्हें कैसरे-हिन्द की उपाधि भी मिली थी । वह उपाधि तो उन्होंने उस समय नहीं लौटाई लेकिन उनका दिल जरूर टूट गया । इसके बाद अंग्रेजी साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने की लड़ाई के लिए उन्होंने सबको शामिल करने लायक तरीकों का इस्तेमाल किया इसी वजह से उन्होंने हमेशा साम्प्रदायिक एकजुटता को बरकरार रखने की कोशिश की । उन्होंने तो नहीं लेकिन रवींद्रनाथ ठाकुर ने नाइटहुड की उपाधि लौटाकर सत्ता की बर्बरता के विरोध का नायाब बौद्धिक तरीका खोज निकाला था । रवींद्रनाथ ठाकुर के इस तरीके से ही प्रेरणा लेकर हाल के दिनों में लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाकर विक्षोभ जाहिर किया । इन सभी वजहों से इस हत्याकांड को भारत के स्वाधीनता आंदोलन का निर्णायक मोड़ समझा जाता है
इस प्रसंग में गांधी के नेतृत्व में संचालित साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के दौरान दो बेहद महत्वपूर्ण पहलू उभरकर सामने आते हैं । एक तो यह कि उन्होंने भारत की एकता का कारण उपनिवेशवाद के विरोध में चलने वाली लड़ाई को माना । उनका कहना था कि विविधता से भरे हुए इस देश के लोग आपस में मिलकर उपनिवेशवाद से लड़े और इस क्रम में देश की जनता में चट्टानी एकता पैदा हुई । बहुत सारे लोग रेलवे को भारत को जोड़नेवाला सूत्र समझते हैं लेकिन गांधी का कहना था कि रेल के चलते जनता के आंदोलनों को दबाने के लिए फौज भेजने में अंग्रेजों को आसानी हुई इस तरह इसने भारत की गुलामी को मजबूत बनाने में मदद की उनके रुख को समझने में इस बहस से मदद मिलती है कि भारत के विकास के लिए उस समय रेल के मुकाबले नहरों की अधिक जरूरत थी । विकास के सिलसिले में इस समय जो पागलपन छाया हुआ है उस प्रसंग में गांधी के इस रुख को ध्यान में रखना जरूरी है । सीमित संसाधनों का निवेश राष्ट्र की प्राथमिकता के अनुसार किया जाना चाहिए ।  
इस विराट देश की जनता की विविधता के बावजूद भारतीय के रूप में उसकी एकता का अनुभव उन्हें दक्षिण अफ़्रीका में ही हो गया था जहां गिरमिटिया के रूप में गए लोगों की कोई अलग पहचान नहीं रह जाती थी, वे सभी कुली कहलाते थे । स्वाधीनता आंदोलन के बहुरंगी परिदृश्य में काश्मीर के नेशनल कांफ़रेन्स से लेकर हैदराबाद के निजाम से लड़कर तेलंगाना को भारत में शामिल कराने वाले योद्धाओं तक इस देश के प्रत्येक हिस्से ने उसी मुक्ति संघर्ष के चलते आपसी एकजुटता को महसूस किया और प्रचुर विविधता के बावजूद एक साथ मिलकर रह सके । दूसरे यह कि गांधी ने राष्ट्रवाद की ऐसी धारणा का विकास किया जिसमें भारत में रहने वाले सभी धर्मों, जातियों और संस्कृतियों के लोग इस देश के स्वाभाविक नागरिक थे । इस प्रसंग में जलियांवाला बाग की इस विरासत को भी याद रखना चाहिए कि उसके दो नेताओं के नाम सैफ़ुद्दीन किचलू और सत्यपाल थे ।
वागनर ने इस तथ्य का भी उल्लेख किया है कि अमृतसर में तब मुसलमान बहुसंख्यक हुआ करते थे । इस तथ्य से जाहिर होता है कि विभाजन ने देश को कितनी गहराई से प्रभावित किया । तब से पंजाब की जिस सामासिक संस्कृति का निर्माण हुआ उसकी झलक भारत के त्रासद विभाजन के बावजूद आज भी न केवल पंजाब बल्कि देश भर में यत्र तत्र मिल जाती है । राजनीति की विडम्बना का प्रतिकार लोकप्रिय सांस्कृतिक व्यवहार में होना कोई अचरज की बात नहीं होती ।