जबसे देश का शासन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के
हाथ आया है तबसे हमारे देश के बौद्धिक समूह में गहरी बेचैनी है । इस
बेचैनी से ढेर सारा लेखन हुआ । आम तौर पर यह लेखन अंग्रेजी में हुआ और इसने हिंदी को लगभग भाजपा के लिए खुला छोड़ दिया । योगेन्द्र यादव भी उन्हीं लेखकों में हैं लेकिन उनकी चिंता के घेरे में हिंदी का पाठक भी रहा इसलिए कभी कभी हिंदी में भी उन्होंने लिखा । अपने लेखन से उन्होंने एक संग्रह ‘गणराज्य का स्वधर्म’
शीर्षक से तैयार किया है । इसे 2026 में सेतु प्रकाशन ने छापा है । इसमें लेखक के
मूल हिंदी में लिखे कुछ लेख तथा अंग्रेजी से अनूदित बहुत सारे लेखों को शामिल किया
गया है ।
इस बात को सभी जानते हैं कि राजनीतिशास्त्र
के अध्येता योगेन्द्र यादव उन अकादमिक लोगों में से हैं जो उच्च शिक्षा और समाज को
आपस में जोड़ने में विश्वास करते हैं । उनका ज्ञान बांझ नहीं है बल्कि उनके
राजनीतिक व्यवहार से सीधे जुड़ा है । उच्च शिक्षा की सर्वोच्च संस्था का सदस्य रहते
हुए भी इस व्यवहार से उन्होंने अपने आपको काटा नहीं । लोहिया के समाजवाद से
प्रभावित कुछेक ईमानदार चिंतकों में उनकी गिनती की जा सकती है । जीवन और राजनीति
में उनके प्रयोग बंद नहीं हुए हैं इसलिए किसी स्थिर खांचे में उन्हें शामिल करना
मुश्किल है । अपनी बौद्धिक यात्रा में वे लगातार चलते रहे । समाजवादी चिंतकों में
किशन पटनायक उनको सबसे अधिक आकर्षित करते हैं । इस संग्रह में भी बहुधा उनका जिक्र
आया है । किताब समर्पित ही उनके साथ सच्चिदानन्द सिन्हा और अशोक सेकसरिया को की
गयी है ।
समाजवादियों का एक वर्ग अगर वर्तमान
शासन का विरोधी है जिसके पास भी कुछ प्रांतों में सत्ता रही तो एक दूसरा वर्ग
सत्ता की मलाई खाने के लिए वर्तमान सत्ताधारियों की गोद में बैठा है । योगेन्द्र
समाजवादियों के भीतर के उन विरल लोगों में हैं जिन्होंने इन सबसे दूरी रखी । बीच
में इस समूह के अन्य लोगों के साथ वे भी आम आदमी पार्टी में गये लेकिन फिर से
आंदोलनधर्मी ऊर्जा के साथ रहने के लिए अलग हो गये । उनके लेखन के इस संग्रह पर
उनकी इस यात्रा की छाया नजर भी आती है ।
इन लेखों को उन्होंने किताब में
शामिल करते हुए आठ खंडों में व्यवस्थित किया है । भारत गणराज्य का स्वधर्म, भारतीय
राष्ट्रवाद का मर्म, साम्प्रदायिकता की चुनौतियाँ, सेकुलरवाद की गलतियाँ,
राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल, सांस्कृतिक स्वराज के तकाजे तथा स्वधर्म से स्वराज तक-
इन खंडों के नाम हैं । खंडों की इस सूची से स्पष्ट है कि उन्होंने वर्तमान शासन के प्रत्येक कदम के
पीछे कार्यरत
वैचारिक आग्रह की बहुत
ही गहन आलोचनात्मक समीक्षा की है ।
नरेंद्र मोदी की सरकार के तीन कार्यकाल और सत्ता पर कब्जा अभियान के विस्तार की वजह से ढेर सारे विरोधी भी उनकी जीत में अपनी कमजोरी की खोज कर रहे हैं । योगेन्द्र जी ने भी इस किताब में ऐसे लेख तो शामिल किये ही, इस धारा के अन्य लेखकों की किताबों की तारीफ भी की है । इस तरह के लेखन में योगेन्द्र जी का योगदान उन सवालों की पहचान है जिन पर उनके मुताबिक भाजपा के विरोधी निरुत्तर हो जाते हैं । इनमें सबसे गम्भीर सवाल राष्ट्रवाद का है । इस सवाल पर योगेन्द्र जी को भाजपा के विरोधी पूरी तरह शस्त्रविहीन लगते हैं । इस आत्मालोचना के क्रम में वे शासकीय राष्ट्रवाद के साम्प्रदायिक रुख को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं । इस मामले में एंडरसन ने ठीक ही एक किस्म की सर्वसम्मति का उल्लेख किया है
। हम भी जानते हैं कि शासक समूह के संकट में फंसते ही पाकिस्तान से युद्ध की पुकार
कोई आज की बात नहीं है । पाकिस्तान के साथ इस होड़ से साम्प्रदायिक लक्ष्य तो सधता
ही है, अमेरिकी साम्राज्यवाद की खुशामद करने का तर्क भी मिल जाता है । इस मसले पर
उनके ही विकासशील समाज अध्ययन केंद्र के राजीव भार्गव द्वारा कुबेर दत्त व्याख्यान
में भारत पाक महासंघ का सुझाव बेहद रचनात्मक था । किताब में योगेन्द्र जी की कोशिश
थोड़ा संतुलन साधने की भी है । इसे भी वे मुस्लिम तुष्टीकरण के भाजपाई आरोप के दबाव
में आत्मालोचना की शक्ल में करते हैं । शुक्र है कि सरकार समर्थक एक विचारक की किताब की समीक्षा करते हुए उन्हें भारी निराशा हुई है ।
किताब का सबसे मजबूत पक्ष भाजपा के राष्ट्रवाद के अभारतीय मूल को उजागर करना है । एकाधिक बार उन्होंने बताया है कि भाजपाई राष्ट्रवाद का सपना यूरोपीय राष्ट्रवाद से गहरे प्रभावित है जिसमें एकता की जगह एकरूपता पर जोर होता है । विस्तार से उन्होंने बताया है कि यूरोपीय देशों के बनाने में भाषा की भूमिका के कारण छोटे छोटे देश बने जबकि भारत में उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष ने इस विशाल बहुभाषी देश को एकता के सूत्र में बांधा । इस उद्देश्य से उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर से
सीखने का परामर्श उचित ही दिया है । भारतीय राष्ट्रवाद की
मौलिकता को समझने के लिए उनका ढांचा बहुत कारगर है । यह बात थोड़ा अमूर्त
तरीके से बहुतेरे लोग कहते हैं लेकिन योगेंद्र जी ने उसे सगुण तरीके से समझाया है
कि उपनिवेशक और उपनिवेशित राष्ट्र का राष्ट्रवाद अलग होगा तथा संबंधित समाजों में
उसकी भूमिका भी अलग होगी । इसलिए
ही वे राष्ट्रवाद का झंडा न छोड़ने की अपील करते हैं । गुजारिश बस इतनी है कि उसके
साम्प्रदायिक और विस्तारवादी विकार से सावधान भी करना ठीक होता । यूरोपीय राष्ट्रवाद के मुकाबले भारत के इस राष्ट्रवाद की सही समझ न होने से वर्तमान शासन कश्मीर, उत्तर पूर्व में मणिपुर और भाषा के मामले में तमिलनाडु के साथ आपत्तिजनक नीति अपनाता है ।
इस मामले में हमारे उग्र राष्ट्रवाद में सैन्यवाद के खतरे को भी लेखक ने अगर देखा होता तो बेहतर होता । हमारे पड़ोस में
सेना की भूमिका सबकी जानी हुई है और जब हम कहते हैं कि भारत को
हिंदू राष्ट्र बनाने की योजना इसे पाकिस्तान बना देने की गंध लिये हुए है तो
पाकिस्तान की राजनीति के इस पहलू को भी ध्यान में रखना होगा । विगत वर्षों में
सीमा के पास के प्रदेशों में बहुत दूर तक नागरिक प्रशासन की जगह सैन्य प्रशासन की
वकालत, सैन्य प्रमुखों के साथ सर संघ चालक की मुलाकात, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और
परीक्षा व्यवस्था में सेना की मदद, इजरायल के साथ निकट सम्पर्क आदि से वर्तमान
शासन की आगे बढ़ने की दिशा का संकेत मिलता है । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि पिछली
भाजपा सरकार के समय पोकरन विस्फोट के समय से ही अमेरिकी ढर्रे के सैन्य औद्योगिक
परिक्षेत्र की आशंका जतायी जाती रही है ।
असल में सभी समाजवादियों में एक हद तक कम्युनिस्ट विरोध होता है जो उन्हें
बहुधा अंधराष्ट्रवाद के सामने निहत्था कर देता है । योगेन्द्र यादव में संयोग से
इसकी मात्रा बहुत कम है फिर भी उसकी झलक आत्मालोचना में अक्सर
मिल जाती है । उनमें संवादधर्मी खुलापन अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक ही है जिसका
सबूत असहमत लोगों के साथ इस किताब में संकलित उनकी बहसें हैं ।
भाजपा के सभी उदारपंथी विरोधियों की
तरह योगेन्द्र भी जनता की भाषा से कटे होने के अपराधबोध से घिरे महसूस होते हैं ।
इस सवाल पर वे ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द की वैधता पर सवालिया लहजे में विचार करते हैं
और इसकी जगह दबाव में प्रयुक्त पंथनिरपेक्षता को अधिक सटीक मानते हैं । उनका
प्रस्ताव तो सर्व धर्म समभाव के प्रयोग के पक्ष में है । इस शब्द के प्रयोग में
उन्हें यूरोप की नकल की जगह भारतीय मौलिकता नजर आती है । दिक्कत एक ही है कि आजकल
के अनुपनिवेशन का यह अभियान स्वाधीनता आंदोलन के अभिन्न अंग समाज सुधार के नकार तक
भी ले जा सकता है । समाज सुधार की इस धारा को वैसे भी स्वाधीनता आंदोलन से अलग
करने की प्रचारात्मक के साथ बौद्धिक कोशिश भी जारी रहती है । हम सभी देख रहे हैं
कि वर्तमान शासन की अंतर्वस्तु का निर्माण धार्मिक विभाजन पर जोर के साथ बर्बर निजी
पूंजी की प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रतिगामिता से हुआ है । सामाजिक मोर्चे पर जातिवाद
के विरोध तथा स्त्री मुक्ति के क्षेत्र में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान तथा उसके
बाद जो कुछ हासिल किया गया था वर्तमान सत्ता उन सब पर संगठित तथा योजनाबद्ध हमला
भी कर रही है ।
थोड़ी बात भाषा की भी अन्यथा न होगी । आम तौर पर उनकी भाषा आसान है और पाठक को कायल करने वाली ठंडी तार्किकता उनके लेखन की बहुत बड़ी विशेषता है । भाषा के मामले में हमारे देश की समाजवादी धारा के अगुआ लोहिया ने ऐसी हिंदी विकसित करने की कोशिश की जो सोच विचार के भी क्षेत्र
में अनुपनिवेशन की मदद करे । योगेन्द्र जी ने बहुधा उसी हिंदी का इस्तेमाल किया है । एक समस्या या उलझन का जिक्र आशा है अन्यथा न माना जाएगा । उन्होंने
एक ही धारणा के लिए आभिजात्य के साथ अभिजात शब्द का भी प्रयोग किया है । हिंदी के
लिए यह थोड़ा भ्रामक है । आम तौर पर अभिजात शब्द को विशेषण की तरह हिंदी में प्रयोग
किया जाता है और आभिजात्य को भाववाचक संज्ञा की तरह । पहले के लेखों में उन्होंने दोनों का प्रयोग अलग अलग किया होगा क्योंकि एक ही लेख में दोनों रूपों का प्रयोग नहीं हुआ है लेकिन जब ये लेख किताब में इकट्ठा हुए तो एक ही किताब में दोनों रूप नजर आने लगे । यह करके इस भ्रम को और अधिक बढ़ा दिया गया है ।
कुल मिलाकर किताब बहुत ही समयानुकूल
है और देश के सामने खड़े लगभग सभी सवालों पर हस्तक्षेप करती है । भूमिका में सूचना
दी गयी है कि कुछ ही समय में पहला संस्करण समाप्त हो गया था । यह शुभ संकेत है ।
इसका अर्थ है कि हिंदी का सामान्य पाठक सरकारी प्रचार की आक्रामकता का विकल्प खोज
रहा है । कहने की जरूरत नहीं कि हिंदी क्षेत्र को ही नफ़रत के विषैले प्रचार में
डुबा देने की कोशिश सत्ता की ओर से की जा रही है लेकिन हिंदी भाषी क्षेत्र ही इस
शासन के खात्मे का इलाका बनेगा । इसलिए भी शासन की ओर से इस तरह के लेखन तक पाठक
की पहुंच को सीमित करने का पूरा प्रयास किया जा रहा है । ऐसे विपरीत माहौल में भी
अपनी बुनियादी अवस्थिति पर अड़े रहने का संकल्प तो कम से कम हम भाजपा से सीख ही
सकते हैं ।