Saturday, March 7, 2026

कोमिंटर्न की तीसरी कांग्रेस की पृष्ठभूमि

 

                                  

2015 में ब्रिल से जान रिडेल के संपादन और अनुवाद मेंटु द मासेज: प्रोसीडिंग्स आफ़ द थर्ड कांग्रेस आफ़ द कम्युनिस्ट इंटरनेशनल, 1921’ का प्रकाशन हुआ । यह कांग्रेस 22 जून से 12 जुलाई तक मास्को में चली थी । इसने दुनिया भर के अपने समर्थकों को जनता के पास जाने का संदेश दिया था । पूंजी की ताकत को तोड़ने के लिए सर्वहारा की बहुसंख्या का कम्युनिस्ट समाज के लिए बड़े पैमाने पर उठ खड़ा होना जरूरी समझा गया । इस काम को कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में होना था क्योंकि वे सर्वहारा वर्ग के संघर्षों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी रहती हैं । उस समय यूरोप की राजनीतिक हालत में भारी बदलाव नजर आ रहा था । अब उथल पुथल के समय की जगह ऐसा समय था जब समाजवादी क्रांति की सम्भावना टल गयी थी । ऐसे समय के लिए कोमिंटर्न ने उपरोक्त नीति सूत्रबद्ध की थी । उस समय क्रांति की योजना जरूरी थी क्योंकि क्रांति तत्काल की कार्यसूची से दूर हो गयी थी और मजदूर वर्ग भी संगठित होने के बावजूद रक्षात्मक मुद्रा में था । इस बदलाव के बारे में सदस्यों में मतभिन्नता थी । 55 देशों से 600 से अधिक प्रतिनिधि इस कांग्रेस में आये थे और उनमें भी इस सवाल पर अनिश्चितता थी । उनमें से ज्यादातर लोगों की राय उससे अलग थी जो आखिरकार मानी गयी । किताब में शामिल तीन सप्ताह की बहसों को देखने से इस वैश्विक आंदोलन की जटिलता का अंदाजा लगता है । इन बहसों में जो भी सवाल उठे वे अब भी महत्वपूर्ण लगते हैं । 

कांग्रेस में अनेक किस्म के विचार थे लेकिन अंत में उनमें से दो विकल्पों के बीच सबकी राय आ गयी । वामपंथी रुख के समर्थकों का मानना था कि कम्युनिस्ट अल्पमत में होने के बावजूद साहसिक पहलकदमी से मजदूरों को गोलबंद कर सकते हैं । कांग्रेस में रणनीति और कार्यनीति के सिलसिले में जो प्रस्ताव पेश हुआ उसमें संशोधन हेतु जो प्रस्ताव आये उनमें यह रुख सबसे अधिक प्रकट हुआ । दूसरी ओर लेनिन के समर्थन से दक्षिणपंथी रुख मौजूद था जिसके मुताबिक मजदूर वर्ग के रोज रोज के संघर्षों में जड़ जमाकर ही कम्युनिस्ट क्रांति की ओर कदम बढ़ा सकते हैं । आखिरकार कांग्रेस ने आगे के लिए जिस रणनीति को अपनाने का फैसला किया उससे इस सदी में भी क्रांतिकारी ताकतों को दिशाबोधक रोशनी मिल सकती है । रिडेल ने इस कांग्रेस की विरासत को सूत्रबद्ध करते हुए बताया है कि

1 मजदूरों के बहुमत को कम्युनिज्म के पक्ष में लाने के लिए उनके रोज रोज के संघर्ष में शामिल होने की रणनीति अपनायी गयी । जनता की ओर के नारे में इसे व्यक्त किया गया और क्लारा जेटकिन ने लेनिन के शब्द लेकर कहा कि सत्ता पर विजय हासिल करने की पूर्वशर्त जनता को अपने पक्ष में जीत लेना है ।

2 सर्वहारा के संघर्ष के साझा मोर्चे में पूंजीवाद विरोधी विविध ताकतों को जोड़ने का अभियान चलाया गया । छह महीने बाद इस रुख को विस्तारित करते हुए मजदूर आंदोलन की गैर क्रांतिकारी ताकतों को भी लेकर संयुक्त मोर्चा बनाने की नीति ली गयी ।

3 अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में संक्रमणकालीन मांगों को शामिल किया गया । ये ऐसी मांगें थीं जो पूंजीवादी संपत्ति के अधिकार और सत्ता पर हमला करती थीं । समग्रता में देखने पर ये मांगें पूंजीपति वर्ग की ताकत को कमजोर करती थीं, सर्वहारा को संगठित करती थीं और सर्वहारा की तानाशाही हेतु संघर्ष के विभिन्न चरणों को अलगाती थीं ।

4 इसका विश्लेषण किया गया कि पूंजीवादी अर्थतंत्र में उतार चढ़ाव किस तरह पूंजीवाद विरोधी चेतना को प्रोत्साहित करते हैं । इनसे पूंजीवाद के खात्मे की उम्मीद पैदा होती है ।

5 तीखे मतविरोध और ढेर सारी गलतियों के बावजूद खुली बहस और समझौते की भावना से कोमिंटर्न से जुड़ी विभिन्न ताकतों के बीच सैद्धांतिक एकता हासिल की गयी ।

किताब में जो दस्तावेज हैं उनमें बहस और प्रस्ताव तो हैं ही, कार्यकारिणी, आयोग और विशेष बैठकों का ब्योरा भी है जो कांग्रेस से पहले और कांग्रेस के दौरान भी होती रहीं । इन्हें बत्तीस दस्तावेजों के रूप में रखा गया है जो अंग्रेजी में पहली बार इस संग्रह में छप रहे हैं । कांग्रेस से पंद्रह महीने पहले की घटनाओं का भी जिक्र हुआ है जिनके कारण कांग्रेस में बहुत सारे विवाद हुए । रिडेल का मत है कि कोमिंटर्न की मार्च 1919 में स्थापना के साथ ही विवाद शुरू हो गये थे । 1920 के दौरान मजदूरों को जो अनुभव हुए उनके कारण अंतर्विरोध और भी तेज हुए । 1920 की जून-जुलाई में कोमिंटर्न की दूसरी कांग्रेस संपन्न हुई । इसके बाद करोड़ों क्रांतिकारी मजदूर इसमें शामिल हुए । बहुतेरे देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की सदस्यता में भारी बढ़ोत्तरी हुई । उसी दौरान इटली और जर्मनी में क्रांति के प्रयासों को धक्का लगा । इन दोनों ही देशों में मजदूर क्रांति के सबसे करीब थे । मजदूरों की क्रांतिकारिता में विश्वयुद्ध के बाद गिरावट नजर आ रही थी । इस हालत में अपनाये जाने वाले रुख के मामले में कम्युनिस्टों में मतभेद था । कुछ का कहना था कि जो भी ताकत बढ़ी है उसके बल पर धावा बोल देना चाहिए जबकि कुछ अन्य लोग क्रांति के उतार के लिहाज से नीति बनाना चाहते थे । कोमिंटर्न के नेतृत्व में भी यह मतभेद प्रकट हुआ ।

1920 में जर्मनी में सेना में एक विद्रोह हुआ । मजदूरों की उसके विरोध में गोलबंदी हुई । उसके प्रति कम्युनिस्टों के रुख को लेकर मतभेद उभरे । सेना के दक्षिणपंथी अफ़सरों ने बर्लिन पर कब्जा कर लिया और सामाजिक जनवादियों की सरकार से लड़ाई शुरू की और संवैधानिक शासन को मानने से इनकार कर दिया । इसके विरोध में जर्मनी के मजदूरों ने आम हड़ताल कर दी । सेना के विद्रोह को चार दिनों में दबा दिया गया लेकिन मजदूरों ने हड़ताल जारी रखी और दक्षिणपंथी हिंसा के विरुद्ध प्रभावी कदम उठाने की मांग की । हथियारबंद मजदूरों ने औद्योगिक इलाके समेत कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया । उनके विरोध में सेना ने कूच किया और जल्दी ही पूंजीवादी ताकतों ने हालात पर काबू कर लिया । मजदूरों को 1918 के बाद पहली बार इतना बेहतर मौका मिला था लेकिन वे इसका फायदा उठाने में नाकामयाब रहे । इस मामले में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की गलतियों की आलोचना हुई । एक, जब आम हड़ताल हुई तो केंद्रीय नेतृत्व ने शुरू में इसका समर्थन करने से इनकार किया । उनका तर्क था कि हड़ताली लोग दमनकारी बुर्जुआ सरकार का पक्ष ले रहे हैं । कुछ इलाकों में पार्टी ने मजदूर संगठनों के व्यापक मोर्चे में भाग लिया जिसमें पूंजीवाद समर्थक ताकतें भी थीं । एक समय पार्टी ने सभी मजदूर पार्टियों और ट्रेड यूनियनों की सरकार का सशर्त समर्थन करने का इरादा जाहिर किया । संघर्ष के अंतिम दौर में जब सेना ने औद्योगिक इलाके में मजदूरों का दमन करने के लिए हमला किया तो पार्टी ने जनसंहार बचाने और इलाके में शांति की खातिर समझौते का पक्ष लिया । जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के इस रुख की आलोचना कोमिंटर्न ने बड़े हिस्से ने की थी । कार्ल रादेक ने कहा कि पार्टी की शुरुआती हिचक और बाद में संयुक्त मजदूर सरकार का सशर्त समर्थन पार्टी की निष्क्रियता का सबूत है । हंगरी के बेला कुन ने मजदूर आंदोलन की सभी धाराओं के साथ एकता को प्रतिक्रांतिकारी कदम कहा । जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी में भी एकाधिक गुट बन गये । लेनिन ने मजदूरों की संयुक्त सरकार के बारे में रुख का 1920 की मई और जून में आलोचनात्मक समर्थन किया । बहरहाल इस कांग्रेस में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के रुख पर तो बहस नहीं हुई लेकिन अगली कांग्रेस में कोमिंटर्न के नेताओं ने पार्टी नेतृत्व के दक्षिणपंथी भटकाव और निष्क्रियता की जमकर आलोचना की । कोमिंटर्न की यह आलोचना पार्टी के भीतर की वामपंथी आलोचना के मेल में ही थी ।

इस सवाल पर भले बहस न हुई हो कोमिंटर्न की दूसरी कांग्रेस ने कार्यक्रम और सिद्धांत के मोर्चे पर जो फैसले लिये उनके आधार पर आगामी कांग्रेस की बहसें हुईं । यह कांग्रेस असल में कोमिंटर्न की बुनियाद डालने वाली साबित हुई । यह ऐसी पार्टियों का संघ बना जिनके दसियों हजार सदस्य थे और जिनकी जड़ें मजदूरों के संघर्ष में गहरे धंसी हुई थीं । इसके प्रतिनिधियों और अतिथियों में तमाम धाराओं के लोग हुआ करते थे । इनमें एशिया के क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों से लेकर पश्चिम के अराजकतावादियों और वामपंथी सामाजिक जनवादियों तक शामिल थे । 1919 की स्थापना कांग्रेस में कम्युनिस्ट पार्टियों की भूमिका के बारे में कोई बात नहीं हुई थी लेकिन इस कांग्रेस में पार्टी का निर्माण कोमिंटर्न की प्रमुख रणनीति माना गया । कम्युनिस्ट पार्टियों की भूमिका और प्रकृति, संसद और ट्रेड यूनियन चुनावों में भागीदारी, शोषण के विरुद्ध किसान संघर्ष तथा उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष पर जो बहसें तीसरी कांग्रेस में हुईं उनके बारे में प्रस्ताव इसी कांग्रेस में रखे गये थे । कोमिंटर्न की लोकप्रियता से उपजी चुनौती पर भी इस कांग्रेस में बहस हुई । इस लोकप्रियता के कारण इसमें ऐसे समूह भी शरीक हो रहे थे जिन पर दूसरे इंटरनेशनल के सिद्धांत और व्यवहार का गहरा असर था । इन पार्टियों पर पत्रकारों, सांसदों और अधिकारियों की पकड़ बहुत अधिक थी । ऐसी स्थिति में कोमिंटर्न ने दाखिले की इक्कीस शर्तें तय कीं ताकि तीखे वर्ग संघर्ष में कोमिंटर्न की पार्टियों को एकताबद्ध होकर फैसले लेने में आसानी हो । मजदूर आंदोलन में कम्युनिस्टों का वैचारिक और वास्तविक प्रभुत्व हासिल करने के लिहाज से रणनीति की नींव रखी गयी । इस कांग्रेस में युद्ध की वजह से विजय की आशा का भी माहौल था । इसके कारण जुझारूपन बढ़ाने का पक्ष मजबूत था । इस नीति का एक अन्य कारण पोलैंड और सोवियत संघ का युद्ध भी था ।

पोलैंड ने सोवियत संघ पर हमला करके यूक्रेन की राजधानी किएव पर कब्जा कर लिया । सोवियत सेना ने बदले में पोलैंड के बहुतेरे हिस्सों को कब्जे में ले लिया । इस कांग्रेस के दौरान ही सोवियत सेना वार्सा पहुंचने वाली थी तभी ब्रिटेन और फ़्रांस की सरकारों ने पोलैंड के शासकों को सैन्य सहायता देने की कोशिश की । यूरोप के मजदूर इस साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के विरोध में खड़े हो गये । इस कांग्रेस ने पोलैंड के पूंजीवादी शासन को खत्म कर मजदूरों और किसानों के स्वतंत्र गणतंत्र की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया । लेनिन इस युद्ध में जीत को लेकर आश्वस्त थे । उम्मीद यह भी थी कि वार्सा पर कब्जा होते ही जर्मनी जीत लेने के लिए कुछ करने की जरूरत ही नहीं रहेगी । इस आशा का भी योगदान कांग्रेस के हमलावर रुख के प्रस्ताव में निहित था । कांग्रेस स्थगित हुई और उसके कुछ ही सप्ताह बाद सोवियत सेना को अपनी सीमा पर वापस लौटना पड़ा था । संधि हुई और सात साल से जारी युद्ध का अंत हुआ । बहरहाल इस युद्ध ने जो माहौल बनाया उसमें तीसरी कांग्रेस से पहले दुस्साहसवादी आक्रामकता की नीति के पक्षधर लोग आगे आये ।                                         

इस कांग्रेस के स्थगन के तीन सप्ताह बाद कोमिंटर्न ने अजरबैजान के बाकू में एक कांग्रेस का आयोजन किया जिसमें एशिया में राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लड़ने वाले शामिल हुए । इसमें शामिल 37 देशों के 2050 प्रतिनिधियों में से तिहाई लोगों का कम्युनिस्ट आंदोलन से संबंध नहीं रहा था । पोलैंड युद्ध से उपजी आशा की गूंज इस कांग्रेस के विभिन्न अधिवेशनों में कायम रही । जिनोव्येव ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का प्रतिनिधियों से आवाहन किया । उनके आवाहन से प्रतिनिधियों में उत्साह की लहर दौड़ गयी और सभा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी । उधर मध्य एशिया में भी साम्राज्यवादी युद्ध समाप्ति की ओर थे । अगले दो सालों में ब्रिटेन ने अपनी सेनाओं को इस इलाके से हटा लिया । 16 मार्च 2021 को सोवियत संघ और ब्रिटेन ने संधि की जिससे सोवियत संघ की साम्राज्यवादी घेरेबंदी में दरार पड़ी । रूसी साम्राज्य के एशियाई इलाकों में लाल सेना की मदद से आजादी हासिल हुई । इसके बावजूद आजाद हुए ये देश अपनी सीमाओं के बाहर औपनिवेशिक और अर्ध औपनिवेशिक प्रभुत्व पर हमला करने में सक्षम नहीं थे । बाकू कांग्रेस को इसलिए जाना जाता है कि इसने एशिया भर में कम्युनिस्ट आंदोलन को फैलाने की प्रेरणा दी । पश्चिम और पूरब के देशों को अहसास हुआ कि पूरब की जनता पूंजीवाद विरोधी विश्व आंदोलन में ताकत के साथ अपनी भूमिका निभा सकती है ।

एक अन्य घटना भी ध्यान देने लायक है । बाकू कांग्रेस के दौरान ही इटली में मजदूरों ने कारखानों पर कब्जा कर लिया और कौंसिलों के अधीन उत्पादन का काम शुरू हुआ । इसकी शुरुआत धातु उद्योग से हुई और जल्दी ही रेल तथा अन्य उद्योग इसकी चपेट में आ गये । देहात में भी इसकी लहर फैली और समूचा देश क्रांति के मुहाने पर आ गया । बहरहाल समाजवाद समर्थक ट्रेड यूनियनों के संघ ने इसे तात्कालिक यूनियन लक्ष्य के लिए संघर्ष से अधिक कुछ नहीं माना और कोमिंटर्न की इटली शाखा ने भी उन्हें इससे आगे ले जाने से इनकार कर दिया । पार्टी और यूनियन के नेताओं ने संघर्ष को तेज करने या व्यापक मांगों से जोड़ने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया । सरकार ने वेतन बढ़ाकर और मजदूरों के नियंत्रण का झूठा आश्वासन देकर इस आंदोलन का शमन कर दिया । इससे वहां की क्रांतिकारी ताकतों को भारी धक्का लगा । समाजवादी पार्टी इसलिए विफल रही क्योंकि उसका सोच और व्यवहार 1914 के पहले के समाजवाद से बंधा हुआ था । क्रांतिकारियों को महसूस हुआ कि क्रांति के लिए नये तरह की पार्टी की जरूरत है । संबद्धता हेतु बनायी गयी इक्कीस शर्तों और दूसरी कांग्रेस के अन्य फैसलों में ऐसी ही पार्टी की कल्पना उन्हें नजर आयी । इस प्रस्तावित क्रांतिकारी पार्टी को अनुशासित विश्व आंदोलन के साथ एकरूप होना था । समाजवादी पार्टी के वाम धड़े ने सुधारवादियों को पार्टी से निकालने की मांग की । उनका कहना था कि इनकी वजह से पार्टी मरणासन्न हो गयी है । समाजवादी पार्टी के सुधारवादी इक्कीस शर्तों को इटली में लागू करने में लगातार टाल मटोल करते रहे । कोमिंटर्न ने अपनी शर्तों को तत्काल लागू करने पर जोर दिया और इटली के समाजवादियों के साथ अपनी बहस को विभिन्न भाषाओं में छाप दिया । जल्दी ही इटली की समाजवादी पार्टी में बोर्दिगा के नेतृत्व में वामपंथी धड़ा खड़ा हो गया । इनके ही साथ ग्राम्शी भी आकर मिल गये । उन्हें कोमिंटर्न के फैसलों का ऊपरी मन से समर्थन करने वाले एक गुट से भी दूरी बनानी पड़ी । इस क्रांतिकारी नेतृत्व ने नीचे की शाखाओं और इकाइयों में सदस्य भरती किये और अपने प्रकाशन शुरू किये ।

दूसरी कांग्रेस के बाद के साल जर्मनी, फ़्रांस और चेकोस्लोवाकिया की पार्टियों ने कोमिंटर्न की सदस्यता ग्रहण की जबकि इटली की पार्टी ने उसका साथ छोड़ा । इन घटनाओं की प्रमुखता तीसरी कांग्रेस की बहसों में रही । जर्मनी की पार्टी द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध में जब अपने देश की सरकार का समर्थन किया गया तो उनसे अलग होने वालों ने नयी पार्टी बनायी । इस पार्टी ने मजदूर संघर्षों में सक्रिय भाग लिया, इक्कीस शर्तों का समर्थन किया और कोमिंटर्न की सदस्यता ली । इसी तरह फ़्रांस में भी सोशलिस्ट पार्टी के भीतर का वाम धड़ा मजबूत हुआ और पूरी की पूरी पार्टी कोमिंटर्न के साथ आ गयी । पार्टी के नेता और अखबार पुराने ही रहे । इटली की सोशलिस्ट पार्टी में इक्कीस शर्तों के सवाल पर तीन तरह की राय थी । उनके बीच मतविभाजन होने पर कम्युनिस्ट समूह अलग हो गया और उसने इटली की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की । कोमिंटर्न ने इसे मान्यता दे दी लेकिन शेष समूह भी कोमिंटर्न में दाखिले का प्रयास करते रहे और तीसरी कांग्रेस से कम्युनिस्ट समूह के निष्काषन की बात पर विचार करने का अनुरोध किया । बहरहाल इस आपसी उठापटक से कम्युनिस्ट समूह और कोमिंटर्न को भारी नुकसान हुआ और मजदूरों के बीच उनकी सदस्यता और समर्थन में भारी गिरावट आयी । इसने इटली में फ़ासीवादी ताकतों के उत्थान के लिए खाली जगह भी मुहैया की । फ़ासीवादी हमले एकतरफा गृहयुद्ध की तरह जारी थे । मजदूरों और किसानों के संगठनों को तोड़ा जा रहा था, समाजवादी नगर प्रशासन को समाप्त किया जा रहा था और समाजवादी तथा कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की खुलेआम हत्या हो रही थी । आर्थिक गिरावट के कारण भारी बेरोजगारी थी । इसके बावजूद मजदूरों ने स्थानीय स्तर पर हड़तालें कीं और फ़ासीवाद विरोधी मोर्चे में शामिल हुए । फ़ासीवादी गिरोहों को पूंजीपतियों से धन मिल रहा था, वे पेशेवर अपराधी थे और पुलिस तथा सेना का उन्हें समर्थन प्राप्त था । इसलिए बिखरे और स्वत:स्फूर्त प्रतिरोध के समक्ष वे भारी पड़ते थे ।

इस खतरे का मुकाबला करने में यूनियनें विफल साबित हुईं और समाजवादी उसी सरकार पर दबाव डालने की नीति पर चलते रहे जो फ़ासीवाद को प्रोत्साहित कर रही थी । कम्युनिस्टों ने खतरे को पहचाना और उनसे लड़ने के लिए इकाइयां बनायीं । दुर्भाग्य से वे इस खतरे का मुकाबला करने के लिए मजदूरों के भीतर की अन्य धाराओं के साथ एकता बनाने की कोशिश से चूक गये । बोर्दिगा ने बुर्जुआ कानूनी तंत्र को बचाने के नारे का विरोध किया क्योंकि वे उसे फ़ासीवाद का पर्याय मानते थे । कोमिंटर्न की तीसरी कांग्रेस के समय तक मजदूरों ने फ़ासीवाद के विरोध में स्वतंत्र संगठन बना लिया लेकिन इसके साथ समाजवादी और कम्युनिस्ट, दोनों नहीं थे । चेकोस्लोवाकिया की स्थिति बहुत खास थी । 1919 में इसका निर्माण वर्साइ संधि द्वारा चेक, जर्मन, स्लोवाकियाई और रूथेनियाई जनता को मिलाकर किया गया था । इन सबकी अलग अलग समाजवादी पार्टियां थीं । चेकोस्लोवाकिया की कम्युनिस्ट पार्टी इन सब पार्टियों का मिश्रण थी । इन सबको मिलाकर चालीस लाख की सदस्यता होती थी । 1920 में ही चेक डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी में क्रांतिकारी ताकतों का बहुमत हो गया । नतीजे के तौर पर दक्षिणपंथी समूह ने अलग समाजवादी पार्टी बना ली । वामपंथियों की कांग्रेस में दो तिहाई स्थानीय संगठनों ने प्रतिनिधि भेजे । कांग्रेस में मार्क्सवादी वाम को जबर्दस्त समर्थन मिला । यह समूह कोमिंटर्न का साथ तो दे रहा था लेकिन इक्कीस शर्तों के बारे में अलग राय रखता था और पहले के सामाजिक जनवादियों के साथ एकता कायम रखना चाहता था । दक्षिणपंथी समूह ने अलग कांग्रेस की और मूल पार्टी की निरंतरता का दावा किया । दोनों समूहों के बीच संपत्ति को लेकर मुकदमेबाजी शुरू हुई । दक्षिणपंथियों की ओर से पुलिस आयी और वामपंथियों से मुख्यालय खाली करा लिया । वामपंथी यूनियनों ने विरोध में हड़ताल की । एक सप्ताह बाद सेना के दमन से हड़ताल खत्म हुई । इस विफलता से क्रांतिकारी मजदूरों को पार्टी की नेतृत्व क्षमता पर भरोसा घटा । कोमिंटर्न की सदस्यता लेने की कोशिश के दौरान भी बहस जारी थी । शर्तों पर पार्टी नेतृत्व और सदस्यों ने मुहर लगायी और कोमिंटर्न की सदस्यता ली । इसके बाद भी जर्मन भाषी कम्युनिस्टों का एक समूह इस पार्टी का विरोध वामपंथी नजरिए से करता रहा ।

जिन भी देशों का जिक्र हुआ है उनकी वस्तुगत स्थितियों के बारे में बहस थी । मान तो सभी रहे थे कि यह समय क्रांतिकारी अग्रगति का है लेकिन उसकी निकटता के बारे में बहस थी । कुछ लोग मानते थे कि तत्काल हमले के मुकाबले मोर्चेबंदी के हालात पैदा हो गये हैं । इस मान्यता की आलोचना तीसरी कांग्रेस में रादेक ने की । जिन लोगों का ऐसा मानना था वे दुस्साहसिक कदमों के मुकाबले आम संघर्षों में जनता को ले आने के पक्ष में थे । चेकोस्लोवाकिया की इस बहस में हंगरी के कम्युनिस्ट भी शामिल हुए । हंगरी के निर्वासित नेतागण जर्मन भाषा के अखबारों में लिखा करते थे और जर्मन वामपंथ की प्रमुख आवाज थे । यही लोग कोमिंटर्न के भीतर भी वाम धारा की मुखर आवाज थे । दूसरी कांग्रेस के बाद कोमिंटर्न ने मास्को स्थित केंद्रीय कार्यकारिणी को मजबूत करना शुरू किया तो उसके लिए सदस्य पार्टियों से नेताओं की मांग की गयी । ये पार्टियां अपने नेताओं को मास्को भेजने में हिचक रही थीं । ऐसी स्थिति में हंगरी के निर्वासित नेता बहुत काम के निकले और कोमिंटर्न के रोज रोज के कामों में जिनोव्येव, बुखारिन और रादेक का साथ देने लगे ।

2021 की जनवरी में जर्मनी की पार्टी ने सभी मजदूर पार्टियों और यूनियनों के नाम खुला पत्र जारी किया जिसमें मजदूरों की आय कायम रखने, बुनियादी जरूरत की वस्तुओं की कीमतों पर अंकुश लगाने और भोजन की आपूर्ति सुरक्षित रखने जैसी मांगों पर मजदूर आंदोलन की सभी धाराओं को साथ लाने की अपील की गयी थी । यह पत्र स्टूटगार्ट की स्थानीय इकाई द्वारा गैर कम्युनिस्ट मजदूरों के भी साथ एकता बनाने की नीयत से तैयार किया गया था । यह पत्र संयुक्त मोर्चे की नीति की पहली झलक था जिसे कोमिंटर्न ने साल भर बाद अपना लिया । मजदूरों के सभी बड़े संगठनों के नेताओं ने पत्र को खारिज कर दिया लेकिन कम्युनिस्टों की इस अपील को इन संगठनों की कतारों में भरपूर समर्थन मिला । पार्टी के भी वामपंथी धड़ें ने इस पहल का विरोध किया और कोमिंटर्न की कार्यकारिणी के नेताओं ने भी इससे असहमति जाहिर की । लेनिन के हस्तक्षेप पर इस मामले को तीसरी कांग्रेस में बहस के लिए स्थगित कर दिया गया । इस मामले से कोमिंटर्न की कार्यपद्धति से उपजे अंतर्विरोध का पता चलता है । इस अंतर्विरोध का असर सदस्य पार्टियों पर भी पड़ा । जर्मनी तथा इटली के प्रसंग में कोमिंटर्न पर आरोप लगा कि उसका नेतृत्व सदस्य पार्टियों में फूट पैदा कर रहा है । कोमिंटर्न के नेताओं का तर्क था कि इन पार्टियों के भीतर क्रांतिकारी वामपंथ की मजबूती के कारण ये विभाजन हो रहे हैं । इस विवाद में जर्मनी की पार्टी के कुछ केंद्रीय कमेटी के सदस्यों ने इस्तीफा दिया और उनकी जगह ऐसे लोग नेतृत्व में आये जो साहसिक पहलकदमी के पक्ष में थे ।

जर्मनी की इन घटनाओं के बारे में तीसरी कांग्रेस में बहस हुई । नया नेतृत्व पार्टी को क्रांतिकारी राह पर ले जाने की कोशिश कर रहा था तभी कोमिंटर्न की कार्यकारिणी का एक प्रतिनिधिमंडल अचानक बर्लिन पहुंचा । इसमें बेला कुन के साथ दो अन्य साथी भी थे । ये सभी वामपंथी धड़े के थे । इनको भेजने की वजह का पता नहीं चलता लेकिन पार्टी के भीतर की जिन घटनाओं पर तीसरी कांग्रेस में बात हुई उन पर इनका असर था । संदेह किया जाता है कि जर्मन पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन के लिए ऐसा किया गया था लेकिन वह तो पहले ही हो चुका था । इसकी एक और भी वजह बतायी जाती है कि जर्मनी के मामले में कुछ ऐसे अंतर्राष्ट्रीय बदलाव आने जा रहे थे जिनका जायजा लेने के लिए ये लोग भेजे गये थे । जर्मनी के भारी उद्योगों के इलाके पर फ़्रांस कब्जा करने जा रहा था । बावेरिया की दक्षिणपंथी सरकार जिन हथियारबंद गिरोहों को संरक्षण दे रही थी उनसे हथियार लेने का दबाव मित्र राष्ट्रों का था । एक औद्योगिक इलाके पर कब्जे के लिए पोलैंड और जर्मन सिपाहियों के बीच टकराव हो रहा था जिससे दोनों देशों के बीच युद्ध भड़कने की आशंका पैदा हो गयी थी । एक अन्य व्याख्या के मुताबिक बेला कुन रूस का दबाव कम करना चाहते थे । पश्चिमी देशों में आंदोलन तेज होने से रूस को थोड़ी राहत मिलती । अगर जर्मनी की पार्टी सरकार को उखाड़ फेंकने के नारे के साथ सड़क पर उतर जाती तो बेहद अच्छा होता । जेटकिन ने भी इस मत की पुष्टि की है । हमलावर रुख अपनाने के पक्ष में नया वामपंथी नेतृत्व था ही इसलिए रूसी चाहत का उससे मेल हो गया । हालांकि कोमिंटर्न के तत्कालीन निर्देशों से इस तरह की किसी भी हरकत की भनक नहीं मिलती ।  

नये नेतृत्व ने जो हमलावर रुख अपनाया उसकी झलक क्षतिपूर्ति संकट पर उसके वक्तव्य से मिलती है । उसमें कहा गया कि मित्र राष्ट्रों की मांगों को मानने या न मानने से मजदूरों को कुछ भी हासिल नहीं होगा । बुर्जुआ सरकार को उखाड़ फेंकने की सीधी कार्यवाही से ही मदद मिल सकती है । केंद्रीय कमेटी की बैठक में अनुमान लगाया गया कि सरकार बाहरी और घरेलू टकरावों के बढ़ने से संकट में आने वाली है । ऐसे में मजदूरों की मांगों को पूरा करवाने के लिए बड़ी गोलबंदी की जरूरत है । सरकार द्वारा पार्टी के मजबूत गढ़ों पर पुलिस बल द्वारा दमन की खबर थी । ऐसे में आम हड़ताल के विकल्प पर कमेटी विचार कर रही थी । कोई निश्चित फैसला तो नहीं हुआ लेकिन बैठक में क्रांति हो जाने की उम्मीद जतायी जा रही थी । निष्क्रियता से बाहर निकलने का आवाहन मजदूरों से किया गया । हमलावर सरकारी ताकतों का मुंहतोड़ जवाब देने की आशा सर्वहारा से की गयी । असल में पार्टी के भीतर वामपंथी साथियों का एक ऐसा समूह बन गया था जो प्रकाशनों पर नियंत्रण रखता था और कुछ हद तक स्वतंत्र होकर काम करता था । इन लोगों ने राष्ट्रीय विद्रोह की तैयारी कर ली थी और केंद्रीय कमेटी को उस दिशा में धकेल रहे थे ।

आखिरकार क्रांतिकारी मजदूरों से हथियार छीनने के लिए सैन्य टुकड़ियों ने औद्योगिक इलाके में हमला किया । बहाना चोरी के दमन का बनाया गया । पुलिस ने पहले टकराव बचाने की कोशिश की इसलिए कोई झड़प नहीं हुई फिर भी पार्टी ने हड़ताल और बहिष्कार की नीति अपनायी और पूरे इलाके में इसका असर हुआ । एक जगह मजदूरों की उत्तेजक सभा हो रही थी और सभा के बाद नेताओं की गिरफ़्तारी के लिए पुलिस आयी । हथियारबंद टकराव शुरू हुआ और पुलिस तथा मजदूरों के बीच हिंसक टकराव दूसरे दिन भी जारी रहा । पार्टी नेताओं की उम्मीद के विपरीत विद्रोह औद्योगिक इलाके के बाहर नहीं फैला और दस दिन में सेना ने क्रूरता के साथ विद्रोह का दमन कर दिया । पार्टी ने बम धमाकों और अपहरण के जरिए विद्रोह को अन्य इलाकों में विस्तारित और तेज करने की योजना भी बनायी । केंद्रीय कमेटी का साथ नहीं मिला और तकनीकी साधनों की भी कमी थी इसलिए यह कोशिश नाकामयाब रही और आपसी विवाद बढ़ गये । एकाध और जगहों पर भी हिंसक झड़पें हुईं । सरकार ने आपात स्थिति की घोषणा करके तमाम पाबंदियां थोप दीं । अगले दिन समूचे जर्मनी में आम हड़ताल का आवाहन पार्टी ने किया । यह आवाहन युद्ध के खतरे और दमन तथा प्रतिक्रांति के सवाल पर होनी थी । मजदूरों पर हिंसक हमलों का अत्यंत संक्षेप में जिक्र था । बेरोजगारी दूर करने, मजदूरों और यूनियनों द्वारा उत्पादन के संगठन तथा सेना और हथियारों की आवाजाही पर रोक जैसी मांगें उठायी गयी थीं । दिन उचित नहीं था क्योंकि अगले दिन ईस्टर की छुट्टी थी । समाजवादियों ने हड़ताल का विरोध किया । पार्टी के प्रभाव वाले औद्योगिक इलाके में हड़ताल हुई । अन्य इलाकों में इसका मिला जुला असर रहा । कहीं कहीं हड़ताली मजदूरों और हड़ताल के विरोधियों में भी झड़पें हुईं । तीसरी कांग्रेस में भी इन आपसी झड़पों का जिक्र आया । हफ़्ते भर में हड़ताल की आधिकारिक वापसी कर ली गयी । इस कार्यवाही का दमन बहुत ही भयंकर तरीके से हुआ । छह हजार गिरफ़्तार हुए, चार हजार को जेल की सजा मिली, आठ को आजीवन कैद और चार को मौत की सजा दी गयी । पार्टी के डेढ़ सौ सदस्यों की हत्या हुई और हजारों क्रांतिकारी मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया गया । सामाजिक जनवादियों ने कम्युनिस्टों के इस दुस्साहस की निंदा की और उन्हें यूनियनों से निकाल बाहर किया । गैर कम्युनिस्ट मजदूरों में अविश्वास फैल गया और पार्टी की सदस्यता में बुरी तरह गिरावट आयी और वह पहले की आधी रह गयी । इसके बावजूद पार्टी के वाम धड़े ने इसे मजदूरों की सक्रियता के आदर्श के बतौर पेश किया और भविष्य में इस तरह की कार्यवाहियों की जरूरत बतायी । कम्युनिज्म के बारे में प्रचार को गहराने और फैलाने की जरूरत महसूस हुई । इसके तहत पार्टी ने पीड़ित मजदूरों के लिए मदद जुटाने तथा मई दिवस के कार्यक्रमों में व्यापक एकता बनाने की नीति अपनायी । समाजवादियों ने कम्युनिस्टों के विरुद्ध मार्क्स के लेखन का इस्तेमाल किया और बाकुनिन की उनकी आलोचना को जर्मनी के कम्युनिस्टों की आलोचना में बदल दिया । उन्होंने इसे कोमिंटर्न द्वारा दूसरे देशों में गड़बड़ी फैलाने का भी आरोप लगाया ।

इसके बाद रिडेल ने कोमिंटर्न के मुख्यालय में इन घटनाओं की प्रतिक्रिया का ब्योरा दिया है । शुरू में इन घटनाओं की सूचना मिलते ही बधाई दी गयी । कहा गया कि 1919 के बाद पहली बार शोषकों का शासन समाप्त करने के लिए जर्मनी के मजदूर लड़ रहे हैं । उन्हें आगे इसी तरह के संघर्षों की तैयारी का संदेश दिया गया । लेकिन लेनिन के एक पत्र में अलग तरह की राय मिलती है । पार्टी की कार्यवाही पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार करते हुए उन्होंने बेला कुन के अति वामपंथी रुझान का जिक्र किया । इसकी सीधी आलोचना की जगह उन्होंने कार्यकारिणी और आगामी कांग्रेस के भीतर बहस और सुधार करने का सुझाव दिया । जर्मनी की पार्टी ने केंद्रीय कमेटी की ओर से कांग्रेस की रिपोर्ट तैयार करते हुए रक्षात्मकता से आक्रामकता की ओर बढ़ने का स्वागत किया । उन्होंने कहा कि पार्टी की कार्यवाही में अनेक कमजोरियों के बावजूद यह कदम अतीत से आगे बढ़ा हुआ था और जनता का नेतृत्व हासिल करने के लिए जरूरी था ।                                                                                

उसी दौरान जिनोव्येव ने घोषित किया कि आगामी कांग्रेस का आयोजन तय समय से पहले किया जाएगा । इसका कारण इटली, जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया में उभरी दक्षिणपंथी प्रवृत्तियों का मुकाबला करना बताया गया । असल में कोमिंटर्न के रूसी नेताओं में भी मतभेद थे ।                                                                                   

                                                                                                                                                                                                     

Tuesday, March 3, 2026

रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल

 

                             

2024 में ब्रिल से माइक ताबेर के संपादन में ‘द फ़ाउंडिंग आफ़ द रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल: प्रोसीडिंग्स ऐंड रेजोल्यूशंस आफ़ द फ़र्स्ट कांग्रेस, 1921’ का प्रकाशन हुआ । किताब में संपादकीय प्रस्तावना के अतिरिक्त इसके दस्तावेज संकलित किये गये हैं । इस संगठन की एक ही कांग्रेस 1921 में मास्को में हो सकी । इसे प्रोफ़िंटर्न भी कहा जाता है । इसका मकसद ट्रेड यूनियनों के विश्व आंदोलन को जन्म देना था ताकि दसियों लाख मजदूरों के संघर्ष के आधार पर पूंजीवाद को खत्म करके सर्वहारा का शासन स्थापित किया जा सके । शुरू के सालों में इस संगठन में दुनिया भर के आंदोलनों में शामिल लोग जुड़े और अंतर्राष्ट्रीय वर्ग संघर्ष के लिहाज से इसका भारी महत्व भी बना । कोमिंटर्न के भीतर यह सबसे बड़ा संगठन साबित हुआ । इसके इस महत्व के बावजूद कोमिंटर्न के इतिहास के अध्येताओं की ओर से इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया । कुछ अध्येताओं ने तो इसके बारे में नकारात्मक बातें भी लिखीं । मसलन ज्योफ़्री स्वेन के अनुसार मजदूर आंदोलन के इतिहास में इसका स्थान कभी पादटिप्पणी से अधिक नहीं होगा । राबर्ट सर्विस ने भी कोमिंटर्न के इन सहायक संगठनों का कुछ खास असर मंजूर नहीं किया । ई एच कार ने माना कि इसकी स्थापना बहुत उत्साह के साथ की गयी लेकिन कोई प्रत्याशित नतीजा नहीं निकला । इसका इतिहास जिन लोगों ने लिखा उन्होंने भी इसे कोमिंटर्न का परिशिष्ट ही माना । कोमिंटर्न के एक इतिहासकार ने इसके निर्माण को उपयोगी नहीं माना । इसे विफल प्रयास भी कहा गया । इन सबसे इस संगठन के अंतर्विरोधों को समझने में मदद मिलती है । केवल एक किताब में इस संगठन का संतुलित मूल्यांकन हुआ है । इसमें इसकी खूबियों और खामियों का जिक्र करते हुए इसके विकास के विभिन्न चरणों का वर्णन किया गया है । प्रस्तुत किताब में इसकी स्थापना कांग्रेस के दस्तावेज संग्रहित हैं ताकि पाठक इसका स्वतंत्र मूल्यांकन कर सकें । साथ ही इस संग्रह का मकसद लेनिन के समय कोमिंटर्न की जीवंतता को भी पाठकों के सामने प्रस्तुत करना है । उस समय दुनिया भर में इसके दसियों लाख सदस्य और समर्थक थे । उस दौरान कोमिंटर्न ने अनेक सहायक संगठनों का निर्माण किया जिनका अपना स्वतंत्र इतिहास है । उनकी खूबियां भी अपने किस्म की थीं और उनके नेता भी स्वतंत्र व्यक्तित्व के स्वामी थे । इनकी स्वायत्तता और स्वतंत्र पहल हुआ करती थी । प्रोफ़िंटर्न भी इसी तरह का संगठन था । इन सहायक संगठनों का प्रभाव कोमिंटर्न की विभिन्न देशों की शाखाओं से अलग भी हुआ करता था । इन संगठनों के इतिहास के सहारे शुरुआती कोमिंटर्न को समझा जा सकता है ।

प्रथम इंटरनेशनल में यूरोप और उत्तरी अमेरिका की मजदूर सभाओं और ट्रेड यूनियनों का प्रतिनिधित्व था क्योंकि उस समय तक मजदूर वर्ग की राजनीतिक पार्टियों का व्यापक उभार नहीं हुआ था । इसके कारण उसने वर्ग संघर्ष में ट्रेड यूनियनों को केंद्रीय महत्व दिया था । ट्रेड यूनियनों को पूंजी और श्रम के बीच छापामार लड़ाई का साधन तो माना ही गया, मजूरी श्रम और पूंजी की सत्ता वाली व्यवस्था से पार पाने की संगठित शक्ति भी उन्हें कहा गया । मजदूर वर्ग की सम्पूर्ण मुक्ति के व्यापक हित में मजदूरों के संगठन केंद्र के बतौर सचेत काम की अपेक्षा भी उनसे की गयी थी । इस संगठन ने विभिन्न देशों के हड़ताली मजदूरों की मदद के लिए अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के ठोस अभियान संचालित किये । उनकी लड़ाई को मजबूती प्रदान करने के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद भी जुटाई गयी । इस तरह इसने मजदूर वर्ग की आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता की शानदार परम्परा शुरू की । मार्क्स ने इस एकजुटता को ही इंटरनेशनल का बुनियादी काम बताया था । उनका मानना था कि इस जीवनदायी सिद्धांत को दुनिया के सभी देशों के मजदूरों में ठोस आधार प्रदान करने से वांछित उद्देश्य की प्राप्ति हो सकती है ।

प्रथम इंटरनेशनल का इतिहास मार्क्सवादियों और बाकुनिन के समर्थक अराजकतावादियों के बीच निर्णायक संघर्ष के लिए भी महत्व का है । इस संघर्ष की वजह से दुनिया भर के मजदूर आंदोलन में दरार पड़ गयी । इसमें एक ओर तो मार्क्सवादी लोग अनेक जगहों पर सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टियों और ट्रेड यूनियनों के निर्माण में लगे तो दूसरी ओर बाकुनिन के समर्थक विभिन्न देशों में अराजक और संघाधिपत्यवादी राजनीति के हामी हुए । 1889 में दूसरे इंटरनेशनल की स्थापना के समय तक मजदूर और समाजवादी पार्टियों ने भरपूर ताकत अर्जित कर ली थी । उनके साथ ही ट्रेड यूनियनों का भी विकास हुआ जिनके संघ भी राष्ट्रीय स्तर पर संगठित हुए । दूसरे इंटरनेशनल ने मजदूर वर्ग की इन पार्टियों के साथ ट्रेड यूनियनों को भी सदस्यता दी । 1901 में ट्रेड यूनियन केंद्रों के अंतर्राष्ट्रीय सचिवालय का गठन हुआ । इसकी पहल जर्मनी की यूनियनों की थी । इसका कारण था कि पार्टियों और यूनियनों का विकास स्वतंत्र रूप से हो रहा था । सचिवालय को 1913 में इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियंस (इफ़्टू) कहा गया । इसके भीतर वामपंथी लोगों की धारा भी थी जो सैन्यवाद तथा इसी तरह के अन्य सवालों पर राजनीतिक अभियान चलाते थे । इसका गठन आपस में सूचना के आदान प्रदान के लिए किया गया था और विश्व स्तर पर ट्रेड यूनियन कार्यवाही इसके कार्यक्रम का अंग नहीं थी फिर भी इसने पार्टियों से अलग ट्रेड यूनियनों की स्वतंत्रता का दावा दूसरे इंटरनेशनल में मजबूत किया । इसका कहना था कि सर्वहारा के मुक्ति संग्राम में पार्टी के समान ही महत्वपूर्ण भूमिका यूनियन को भी निभानी है । इसके बावजूद ये दोनों संगठन अलग हैं । इनकी प्रकृति और सीमा की भिन्नता ही इनकी स्वतंत्र कार्यवाही का स्रोत है । इसके बावजूद इस संघर्ष में ऐसा साझा इलाका बढ़ता जा रहा है जहां दोनों के समन्वय से लाभ होगा । इस तरह पार्टी और ट्रेड यूनियनों के बीच सहकार विकसित होगा ।

जर्मनी और ब्रिटेन की यूनियनें सबसे मजबूत थीं और उन्हें सुधारवादी कहा जाता है । वे पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर ही प्राप्य सुधारों के लिए संघर्ष करने तक के ही पक्ष में थीं । वे ट्रेड यूनियन निष्पक्षता का प्रचार करती थीं । इसका मतलब था कि यूनियनों को व्यापक राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों से दूरी बरतनी चाहिए तथा पगार या काम के हालात जैसे रोजमर्रा के सवालों पर अधिक ध्यान देना चाहिए । राजनीति को राजनीतिक पार्टियों के लिए छोड़ देना ये लोग सही समझते थे । इसी से अपने देश के नियोक्ता वर्ग के राष्ट्रीय हितों के साथ खड़े होने की राह तैयार हुई । इस राष्ट्रवादी वैचारिक नजरिए के नतीजे प्रथम विश्वयुद्ध में पूरी तरह सामने आये । इस युद्ध ने पूरी दुनिया में समाजवादी पार्टियों को राष्ट्रीय आधार पर बांट दिया । इसी तरह ट्रेड यूनियन आंदोलन भी राष्ट्रीय विभाजन का शिकार हुआ । जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों के मजदूर संघ अपने देशों की पूंजीवादी सरकारों के समर्थन में खड़े हो गये । उन्होंने युद्ध प्रयासों के पक्ष में नागरिक शांति या पवित्र सहयोग की घोषणा कर दी । इसके साथ ही दूसरे इंटरनेशनल का पतन हो गया और 1901 में स्थापित ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल भी बिखर गया । इस रुख का विरोध जल्दी ही पार्टियों के साथ ट्रेड यूनियन में भी प्रकट हुआ । 1915 में ज़िम्मरवाल्ड सम्मेलन ने युद्ध प्रयासों के समर्थन की नीति को खारिज कर दिया । अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन को फिर से खड़ा करने की कोशिश होने लगी ।

युद्ध जब लम्बा खिंचने लगा तो उसके बोझ से मजदूर अपना विक्षोभ अधिकाधिक जाहिर करने लगे और प्रतिरोध की घटनाओं में तेजी आयी । मजदूरों को इसमें यूनियन के नेताओं का सहयोग नहीं मिला । इससे सचेत मजदूरों में पुरानी यूनियनों से नाता तोड़ने और नये क्रांतिकारी मजदूर संगठन बनाने की प्रवृत्ति पैदा हुई । यूनियन अधिकारियों के असहयोग के बावजूद मजदूरों के संघर्ष धीमे नहीं हुए । 1917-18 में युद्धरत देशों में हड़तालों की लहर आयी । जुझारूपन का माहौल व्याप्त था । 1917 में रूसी क्रांति की जीत से इस भाव को भड़का दिया । दुनिया भर के विद्रोही मजदूर अपनी सत्ता के सपने से रोमांचित हो उठे । सभी जगहों पर लाखों मजदूर इन रूसी मजदूरों की राह पर चलने को बेचैन हो गये । 1918 में विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ स्थिति बदल गयी । यूरोप में देश दर देश क्रांति का उभार हुआ और बड़े वर्गीय टकराव फूट पड़े । एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका में उपनिवेशवाद के विरुद्ध विद्रोह रोज रोज की बात हो चले ।

ऐसी हालत में मजदूर ट्रेड यूनियनों में संगठित होने लगे क्योंकि ये उन्हें अपने बुनियादी हितों की रक्षा का पहला साधन प्रतीत होती थीं । युद्ध से पहले दुनिया भर की यूनियनों  में जितने सदस्य थे उसके चार गुना सदस्य युद्ध बीतने के बाद दर्ज किये गये । यूनियनों की ताकत बढ़ने के साथ ही उनकी प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय कार्यवाही की मांग होने लगी । रूसी यूनियनों ने आगे आकर जुझारू वर्ग संघर्ष के आधार पर ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल के फिर से गठन की बात शुरू की । 1918 में उन्होंने मास्को में एक विश्व ट्रेड यूनियन सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव रखा लेकिन साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा रूस पर प्रतिबंध की वजह से यह सम्मेलन न हो सका । इस बीच दूसरे इंटरनेशनल के ट्रेड यूनियन अधिकारी अपना संगठन बनाने में जुटे । क्रांतिकारी उभार के मद्देनजर वे अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क बनाना चाहते थे । 1919 में दूसरे इंटरनेशनल का पुनर्गठन हुआ और उसी के साथ इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियन्स की स्थापना की गयी । एम्स्टर्डम में इसका स्थापना सम्मेलन हुआ इसलिए इसे एम्स्टर्डम इंटरनेशनल भी कहा जाता है । इसने अपने आपको ऐसे दबाव समूह के रूप में देखा जो अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों को लोकतांत्रिक बनाये रखने के लिए कटिबद्ध थी । उसने कहा कि लीग आफ़ नेशंस को प्रतिक्रिया और उत्पीड़न का केंद्र बनने से रोकने की जिम्मेदारी मजदूर वर्ग की है और इसके लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होकर लीग को नियंत्रित करने की ताकत हासिल करनी होगी । इससे कुछ ऐसे भी श्रमिक संघ जुड़े थे जो इसके पहले से मौजूद रहे थे इसलिए स्वतंत्र और समानांतर निकायों की तरह काम करते रहे ।

उस समय के विश्व ट्रेड यूनियन आंदोलन में संघाधिपत्यवादी प्रवृत्ति भी काफी मजबूत थी । इसके समर्थक अपने आपको बाकुनिन के अराजकतावाद से जोड़ते थे, दोनों एक दूसरे का साथ देते थे लेकिन दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व भी था । स्पेन, फ़्रांस और इटली में इनका बोलबाला था । कुछ यूरोपीय देशों के अतिरिक्त अमेरिका में भी इनकी यूनियनें कार्यरत थीं । इनमें फ़्रांसिसी सबसे अधिक संगठित थे । इन लोगों का मानना था कि वर्ग संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है तथा श्रम और पूंजी के बीच टकराव असमाधेय होता है । पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूर वर्ग का शोषण भौतिक ही नहीं नैतिक भी होता है । वे लोग राजनीति को यूनियन गतिविधि से बाहर की चीज मानते थे । यूनियन के सदस्य उसके बाहर अपनी विचारधारा के अनुसार राजनीति करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन यूनियन में वे अपने विचार नहीं थोप सकते । पूंजीवाद के उन्मूलन और समाज को फिर से बनाने के लिए वे यूनियनों को प्राथमिक क्रांतिकारी औजार मानते थे । आंदोलन के सहारे यूनियन मजदूरों की अवस्था में सुधार के उनके प्रयासों का समन्वय करती है । इनमें काम के घंटों में कमी या वेतन की बढ़ोत्तरी आदि शामिल हैं । ये प्रयास ट्रेड यूनियन आंदोलन का एक पहलू हैं । यह तो आम हड़ताल या जन उभार के जरिए सम्पूर्ण मुक्ति की तैयारी है । आज ट्रेड यूनियन प्रतिरोध का औजार है लेकिन भविष्य में उत्पादन और वितरण की नयी व्यवस्था तथा समाज के पुनर्गठन की बुनियाद होगा । उनके मुताबिक इसके लिए मजदूर वर्ग को नियोक्ताओं के विरुद्ध सीधी कार्यवाही करनी होगी ।

इन मान्यताओं के बावजूद ट्रेड यूनियन आंदोलन की मुख्य धारा में इन्होंने कभी विभाजन नहीं पैदा किया । साथ रहते हुए भी वाम अल्पसंख्यक की तरह इनका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहा । इनका स्वतंत्र इंटरनेशनल बनाने के लिए जो सम्मेलन हुआ उसमें कोई आम सहमति न बन पाने से सूचना ब्यूरो बनाने का ही फैसला हो सका । प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इनके भीतर भी वही फूट नजर आयी जो अन्य समाजवादी पार्टियों में नजर आयी थी । इनके फ़्रांसिसी नेतृत्व ने तो फ़्रांस की सरकार का साथ उसके युद्ध प्रयासों में दिया लेकिन इनका युद्ध विरोधी गुट ज़िम्मरवाल्ड आंदोलन के साथ गया । इसमें युद्ध समर्थक समाजवादियों के उन्मादी राष्ट्रवाद का विरोध करने वाले शामिल थे ।

कोमिंटर्न के नेताओं की योजना में रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल का गठन नहीं था । सांगठनिक रूप से स्वतंत्र ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की धारणा बोल्शेविक नेताओं के दिमाग में नहीं थी । अनेकानेक कारणों से इसकी स्थापना हुई । कम्युनिस्ट आंदोलन और रूसी क्रांति के साथ सभी वामपंथी यूनियनों की सहानुभूति और संबद्धता बताने की जरूरत नहीं है । इस क्रांति के चलते ही इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियन्स के सभी घटक इसकी ओर खिंच आये । इसमें शामिल इटली और स्पेन की यूनियनें 1919 में कोमिंटर्न की स्थापना के साथ इसमें आने का प्रयास करने लगीं । उनके साथ कुछ अन्य देशों की यूनियनें भी कोमिंटर्न की ओर आकर्षित हुईं । शुरू में महज कोमिंटर्न का ट्रेड यूनियन विभाग खोलने की योजना थी । उसकी दूसरी कांग्रेस में इस आशय का प्रस्ताव भी पारित हुआ । इसी दिशा में मास्को आने पर कुछ ट्रेड यूनियन नेताओं की अनौपचारिक बैठकें और मंत्रणा भी होती रही । इसी क्रम में सात देशों के ट्रेड यूनियन आंदोलन के प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षरित एक घोषणा भी 15 जुलाई 1920 को जारी की गयी जिसमें रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल बनाने का प्रस्ताव था । कोमिंटर्न के साथ इस प्रस्तावित निकाय के सांगठनिक संबंध के बारे में स्पष्टता नहीं थी ।  

संघाधिपत्यवादी यूनियनों ने 1020 के अंत में बर्लिन में एक सम्मेलन किया जिसमें रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की स्थापना कांग्रेस में शामिल होने का फैसला तो हुआ लेकिन कोमिंटर्न के साथ मतभेद भी खुलकर जाहिर किया गया । दूसरी ओर मास्को से यह अपील की गयी कि जुझारू ट्रेड यूनियनें एम्सटर्डम इंटरनेशनल से नाता तोड़ लें और नये क्रांतिकारी केंद से जुड़ें । इस विवाद को मास्को बनाम एम्सटर्डम भी कहा गया है । नये केंद्र की ओर अधिकाधिक यूनियनों को जाते देखकर एम्सटर्डम केंद्र चिंतित हुआ और उसने बहुत सारे मास्को समर्थक जुझारू वामपंथी यूनियनों को निष्काषित किया । 1920 की लंदन कांग्रेस में एम्सटर्डम इंटरनेशनल ने ट्रेड यूनियन में किसी बाहरी केंद्र द्वारा अपनी विचारधारा के अनुरूप युद्ध संबंधी रुख का प्रचार करने की निंदा की । मई 1921 में उन्होंने फैसला कर लिया कि कोई भी ट्रेड यूनियन एक साथ दो इंटरनेशनलों से नहीं जुड़ सकता । इसका मतलब था कि मास्को केंद्र से जुड़े यूनियनों को एम्सटर्डम के इस केंद्र को छोड़ना होगा । निष्काषन तेजी से होने लगे । खासकर जर्मनी में बहुत सारे व्यक्तियों और स्थानीय यूनियनों को बाहर कर दिया गया । फ़्रांस में भी यही प्रक्रिया चली जिसके चलते सुधारवादी और क्रांतिकारी यूनियनों ने अपने अपने केंद्र चुन लिये । प्रचार किया जाता है कि कोमिंटर्न ने अपना ट्रेड यूनियन केंद्र स्थापित करके मजदूर आंदोलन में दरार डाल दी लेकिन लेखक इसे पूरी तरह सच नहीं मानते । एम्स्टर्डम समूह से बाहर आने और रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल में शामिल होने की अपील को ट्रेड यूनियन का विभाजन नहीं कहा जा सकता । इसकी जगह इस समूह ने ट्रेड यूनियन एकता का पक्ष लिया । जिन्होंने इन लोगों को बाहर निकाला था उनका भी इन्होंने साथ दिया और अपने समूह में उन्हें भी शामिल किया ।

इसे लेखक ने रेड इंटरनेशनल आफ़ लेबर यूनियन्स कहा है । इन शब्दों का संक्षेप रीलू होता है । रीलू के नेता सोलोमन ए लोज़ोव्सकी रहे । उनका असली नाम सोलोमन अब्रामोविच द्रिद्ज़ो था । बोल्शेविक पार्टी में गोपनीयता के लिहाज से लोज़ोव्सकी अपनाना पड़ा । 1908 से 1911 तक उन्होंने बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच एकता की भरपूर कोशिश की । इसमें विफल रहने पर उन्होंने रूसी क्रांतिकारी आंदोलन से अपने को अलग कर लिया । निर्वासित होकर वे पेरिस में रहे और फ़्रांसिसी मजदूर आंदोलन में सक्रिय रहे । रूसी निर्वासितों के बीच एकता की कोशिश भी वे इस दौरान करते रहे । क्रांति के बाद रूस लौटकर बोल्शेविक पार्टी में वे शामिल हुए और पहले की तरह मजदूर आंदोलन में सक्रिय हुए । क्रांति के बाद संयुक्त समाजवादी सरकार के गठन का उन्होंने प्रस्ताव किया और नयी सरकार के कुछ कदमों की आलोचना की । उनको पार्टी से निकाल दिया गया और 1919 के अंत में ही फिर से दाखिला मिला । इस इतिहास के कारण वे रीलू के नेता पद की पहली पसंद नहीं थे । शुरू में रूसी ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन के नेता तोम्सकी को रीलू का महासचिव बनाने की योजना थी लेकिन कांग्रेस से कुछ ही समय पहले पार्टी के साथ विरोध के कारण उन्हें मास्को से दूर भेज दिया गया था । वे कांग्रेस में भाग नहीं ले सके इसलिए मजबूरी में लोज़ोव्सकी को नेता चुनना पड़ा । त्रोत्सकी ने बाद में लिखा कि उन्हें इस पद पर अस्थायी बंदोबस्त के बतौर मंजूर किया गया था और पहला मौका मिलते ही उनकी जगह किसी अन्य नेता को ले आना था ।

लोज़ोव्सकी को विभिन्न भाषाओं का ज्ञान तो था ही, यूरोपीय मजदूर आंदोलन की गहरी जानकारी भी थी इसलिए चुने जाने के बाद वे इस काम के लिए अपरिहार्य हो गये और उनका विकल्प कभी खोजा नहीं जा सका । शुरू में वे स्तालिन के समर्थक रहे लेकिन बाद में 1949 में उनकी गिरफ़्तारी हुई और 1952 में उन्हें गायब कर दिया गया । मुकदमे के दौरान उन्होंने खुद को सही साबित करने का प्रयास किया और अपने साथियों का साथ हिम्मत से दिया ।

रीलू की स्थापना कांग्रेस 3 जुलाई 1921 को हुई । इसमें 41 देशों के 380 प्रतिनिधि शामिल थे । कांग्रेस में कम्युनिस्टों का बहुमत था । अनेक देशों में वे ट्रेड यूनियनों के नेता थे । जहां नेता नहीं थे वहां भी स्थापित यूनियनों में मजबूत अल्पसंख्यक समूह थे । जहां उनका प्रभाव कम था वहां भी उन्हें महत्वपूर्ण समझा जाता था । कांग्रेस में खासकर स्पेन और फ़्रांस से संघधिपत्यवादी ताकतें भी थीं । फ़्रांस में उन्हें निकाल दिया गया और उन्होंने स्वतंत्र यूनियन बना ली । इसके अतिरिक्त इटली, अमेरिका और कनाडा से भी इस धारा की यूनियनों के नेता आये थे । इनके अलावे उनके समर्थक व्यक्ति यूरोप के अन्य देशों से भी आये थे । एम्सटर्डम इंटरनेशनल से जुड़ी दो यूनियनों का भी प्रतिनिधित्व कांग्रेस में हुआ । नार्वे की यूनियन के आधिकारिक प्रतिनिधि मौजूद थे तो इटली से दो पर्यवेक्षक शामिल हुए थे । कुछ देशों के प्रतिनिधिमंडल विभाजित थे । मसलन जर्मनी के प्रतिनिधिमंडल में बहुमत स्थानीय यूनियनों की थी जिनके केंद्र में कम्युनिस्ट थे । उनके साथ कुछ प्रतिनिधि संघाधिपत्यवादी यूनियनों के भी थे । इसी तरह फ़्रांसिसी प्रतिनिधिमंडल में कुछ लोग कोमिंटर्न के साथ काम करने के पक्ष में थे तो कुछ उसका विरोध करते थे । इटली के प्रतिनिधिमंडल में कम्युनिस्ट अल्पसंख्या में थे । उनके साथ आधिकारिक पर्यवेक्षक भी महज सूचना हेतु आये हुए थे । अमेरिका और कनाडा के प्रतिनिधिमंडल में स्थानीय यूनियनों में सक्रिय कम्युनिस्ट थे । इंडस्ट्रियल वर्कर्स आफ़ द वर्ल्ड ने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजा था जिसके सदस्यों ने कांग्रेस के सभी मुख्य फैसलों का विरोध किया । इनके अतिरिक्त विलियम ज़ेड फ़ोस्टर थे जो यूनियन संघर्षों में तो शामिल रहते थे लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं थे । इसी तरह कांग्रेस के प्रतिनिधियों में अमेरिका के विलियम डी हेवुड और ब्रिटेन के टाम वुड जैसे मशहूर लोग थे । कहा जा सकता है कि इस स्थापना कांग्रेस में विश्व ट्रेड यूनियन आंदोलन की विविध धाराओं का प्रतिनिधित्व था । इसी वजह से इस कांग्रेस में खूब जीवंत बहसें  हुईं । सबने खुलकर बोला और सबकी बातें ध्यान से सुनी भी गयीं ।

Sunday, March 1, 2026

फ़ासीवाद का सिद्धांत और व्यवहार

 

                                      

                                                                             

1999 में प्लूटो प्रेस से डेव रेंटन की किताब ‘फ़ासिज्म: थियरी ऐंड प्रैक्टिस’ का प्रकाशन हुआ । किताब फ़ासीवाद को महज विचारों के क्षेत्र में देखने की प्रवृत्ति के विरोध में लिखी गई है । लेखक के मुताबिक कुछ चिंतक इटली में मुसोलिनी या जर्मनी में हिटलर के कारनामों को देखने की जगह फ़ासीवादी विचारकों के बौद्धिक विकास की मार्फ़त फ़ासीवाद को परिभाषित करते हैं । फ़ासीवादी आंदोलन की जगह फ़ासीवादी बौद्धिकों पर ध्यान केंद्रित करने के चलते ये चिंतक फ़ासीवाद के क्रांतिकारी पहलू पर अधिक जोर देते हैं और उसे थोड़ा सकारात्मक प्रवृत्ति के बतौर पेश करते हैं । अपने अध्ययन के लिए ये लोग फ़ासीवादी पार्टियों के आधिकारिक बयानों पर अधिक भरोसा करते हैं । 2020 में इसका नया संस्करण छपा । लेखक ने किताब का मकसद ही बताया है कि फ़ासीवाद की राजनीति के विध्वंसक होने की व्याख्या इसमें की गयी है । उसकी यह विध्वंसात्मकता आंदोलन के दौर में भी रहती है और सत्ता पर कब्जे के बाद बढ़ जाती है । इतिहास में ढेर सारे उदाहरण मिलते हैं जिसमें विध्वंसक पार्टियों की सरकार बन जाने के बाद वे नर्म हो जाते हैं लेकिन फ़ासीवादी सत्ता में आने के बाद और भी कट्टर हो जाते हैं । मजदूर, समाजवादी और उनके नस्ली दुश्मनों का जीवन उनके शासन के बाद वही नहीं रह जाता जो उसके पहले का होता है । लेखक का सवाल है कि ऐसा कैसे होता है । इसका उत्तर उन्हें ऐसे लेखकों से मिला जिन्होंने विश्वयुद्धों के बीच फ़ासीवाद की क्रूरता की सही भविष्यवाणी की थी । वे लोग चरम वामपंथी थे । फ़ासीवाद के असल में सबसे पुराने और अदम्य विरोधी इतालवी और जर्मन मार्क्सवादी थे । इन वामपंथियों के लेखों और भाषणों से फ़ासीवाद के बारे में सुसंगत सिद्धांत तैयार किया जा सकता है । फ़ासीवाद विचार होने की जगह संगठन और शासन था । जहां भी इसका उदय हुआ वहां इसकी राजनीति समान रही । इन लेखकों के मुताबिक फ़ासीवाद को विचारधारा की जगह खास तरह का प्रतिक्रियावादी जन आंदोलन समझना चाहिए । इनका यह भी कहना था कि चूंकि पारम्परिक दक्षिणपंथी राजनीति के मुकाबले फ़ासीवाद अपना जनाधार बनाता है इसलिए संकट के समय नये रंगरूट प्रशिक्षित करने की इसमें क्षमता होती है और ये रंगरूट मजदूरों, बेरोजगारों और युवकों में से आते हैं । आम तौर पर इन समूहों को वामपंथियों का समर्थक समझा जाता है । यही वजह है कि संख्या में कम होने के बावजूद उनकी वृद्धि तेजी से होती है । इसके कारण मार्क्सवादी मानते थे कि फ़ासीवादी विचारधारा के लक्ष्य और उसके सदस्यों की आकांक्षा में तनाव बना रहता है । यह अंतर्विरोध बहुतेरे नतीजों को जन्म देता है । उसके कारण किसी विरोधी पार्टी से वे पराजित हो सकते हैं या सत्ता में काबिज होने के बावजूद उनमें कट्टरता बढ़ सकती है । इसके ही कारण सत्ता में आने के बाद उनके रुख में नरमी की सम्भावना पूरी तरह खारिज हो जाती है ।

जब फ़ासीवाद की शुरुआत हुई तो शायद ही राजनीति की कोई अन्य धारा इससे सहमत हुई । इसके विरोधियों की तादाद सचमुच ही बहुत अधिक थी । उदारवादी, रूढ़िवादी, ईसाई, अराकतावादी, नारीवादी तथा अनगिनत अन्य इसके विरोध में थे । इनमें से किसी ने भी मार्क्सवादियों की तरह तेजी से हिंसा की फ़ासीवादी क्षमता को नहीं पहचाना । जब फ़ासीवादी जीते उस समय यूरोपीय वामपंथ में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचार ही हावी थे । राजनीति के बारे में उनके रुख का समर्थन लाखों लोग करते थे । मार्क्सवादी कोई अकेले नहीं थे, उनके साथ तमाम अन्य धाराओं के लोग भी थे । क्रांति में यकीन करने वाले इसकी ओर आकर्षित होते थे और जन विद्रोह के लिए ये प्रतिबद्ध रहते थे । उनसे अलग वे थे जो जन विद्रोह में तो यकीन नहीं करते थे लेकिन मजदूरों और अन्य निम्नवर्गीय समूहों के अधिकारों में क्रमिक प्रगति के सहारे बदलाव लाना चाहते थे । इनके भी समर्थक लाखों थे । इन दोनों के बीच भी बहुतेरे लोग सक्रिय रहा करते थे ।

बीसवीं सदी के अंत में मार्क्सवाद की यह हैसियत नहीं रह गयी । सामाजिक जनवादी राजनीति में दक्षिणपंथ की ओर झुकाव आया । बहुतेरे देशों में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन ढह गया और कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी अपने आपको भंग करना शुरू कर दिया । लेकिन जब फ़ासीवाद के उदय के समय पर ध्यान दें तो यह हालत अभी भविष्य के गर्भ में थी । इसलिए इस किताब में फ़ासीवाद की समझ और उसके मुकाबले के सिलसिले में मार्क्सवादी रुख का प्राधान्य मिलता है । क्लारा जेटकिन, त्रात्सकी और डैनिएल गुएरिन जैसे लोगों के बीच यही साझा रुख था । 1920 और 1930 के दशक में यूरोप में फ़ासीवाद का मुकाबला करने के मामले में इनकी भाषा समान थी और हिटलर के उदय का प्रतिरोध करने का उनका नजरिया भी साझा था । इन मार्क्सवादियों ने सबसे पहले फ़ासीवाद विरोध की नीति सूत्रबद्ध की ।

उनका मानना था कि फ़ासीवाद दक्षिणपंथी राजनीति का खास हिंसक और विध्वंसक रूप है । सामाजिक संकट के समय इसमें तेजी से बढ़ने की क्षमता है और अगर इसकी उपेक्षा की गयी तो जनता को संगठित करने की वामपंथी ताकत को यह नष्ट कर देगा । यह वंचितों और मजदूरों द्वारा व्यवस्था में बदलाव की मांगों को दसियों साल पीछे धकेल देगा । अगर यह आकलन सही है तो इसका सीधा मतलब विरोधियों द्वारा फ़ासीवाद का मुकाबला करना सबसे जरूरी काम बन जाता है । इसकी जरूरत तब भी सबसे अधिक रहती है जब भेदभाव के अन्य रूप व्यापक हों या दक्षिणपंथी राजनीति के अन्य रूप अधिक लोकप्रिय नजर आते हों । बहुत सम्भव है कि उस समय मजदूरों का शोषण हो रहा हो और नस्ल तथा लिंग के आधार पर भेदभाव भी बहुत हो । इसके बावजूद फ़ासीवाद नकारात्मक बदलाव का अनियंत्रित कारक होता है इसलिए आज जो कुछ सीमित नजर आ रहा है उसे वह सामान्य व्यवस्था का अंग बना दे सकता है । जनता की तकलीफ को वह भयानक स्तर पर ले जाने में सक्षम होता है । इसी तरह जहां भी फ़ासीवाद को शिकस्त दी जाती है वहां उत्पीड़न के अन्य रूप भी कमजोर पड़ जाते हैं । फ़ासीवाद के विरोध की इस नीति पर केवल मार्क्सवादी सहमत नहीं थे, उस समय तमाम अन्य लोग भी इस रुख से इत्तफ़ाक रखते थे ।

1920 दशक के मध्य में इतिहास में पहली बार इस रुख को किसी महत्वपूर्ण समूह ने अपनाया जब उस समय के मार्क्सवादियों ने इटली के बाहर फ़ासीवाद के खतरे के विरोध में अभियान चलाना शुरू किया । उन्होंने कहा कि मुसोलिनी ने अब जर्मनी समेत अन्य देशों के अपने अनुकर्ताओं को प्रेरित करना आरम्भ कर दिया है । जब यह चेतावनी पहली बार दी जा रही थी तो हिटलर महज क्षेत्रीय नेता था । उसे चुनावी सफलता बहुत कम मिली थी । फ़ासीवाद से लेकर रूढ़िवाद तक बहुतेरे नेताओं से उसे होड़ करनी पड़ रही थी । इन नेताओं के पास धन अधिक था, मीडिया में उनकी पहुंच बेहतर थी और अपने विरोधियों से हिंसक बदला लेने की स्वतंत्र व्यवस्था भी इनके पास थी । ऐसी हालत में हिटलर की तमाम कमजोरियों के बावजूद मार्क्सवादियों ने कहा कि जर्मनी के वामपंथ के समक्ष वही सबसे गम्भीर खतरा है । तब वे फ़ासीवाद की बढ़त और सत्ता पर उसके कब्जे की भविष्यवाणी कर रहे थे । जिन लोगों ने उस खतरे को पहचाना और उससे सावधान किया उनकी बात सुनी जानी चाहिए । उस समय यूरोपीय राजनीति में दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग की लगभग अन्य सभी ताकतें उनकी बातों को अनसुना कर रही थीं । लेखक को उम्मीद है कि आज के हालात में उनका रुख हमारे भी काम आ सकता है ।

किताब के पहले संस्करण में लेखक ने विस्तार से 1945 के बाद फ़ासीवाद के पुनर्जन्म की कहानी बतायी थी लेकिन इस संस्करण से उसे लगभग पूरी तरह हटा दिया है । हटाने की वजह यह नहीं कि लेखक फ़ासीवाद के पुनरुत्थान के खतरों से अनजान हैं बल्कि वे लम्बे समय से इस सवाल पर लिखते और सोचते रहे हैं । ढेर सारे पत्रकार और इतिहासकार इस समय के राजनेताओं को सख्त नापसंद करते हैं और फ़ासीवाद की फिर से याद करते हैं । जिन प्रक्रियाओं को वे अपने समय में खारिज कर रहे हैं उनकी प्रतिध्वनि उन्हें अतीत में सुनायी पड़ती है । इसके बावजूद लेखक को वर्तमान दक्षिणपंथ अनेक मामलों में फ़ासीवाद से फ़ासीवाद से अलग महसूस हो रहा है । लोभ होता है कि फ़ासीवाद को उसके दोयम लक्षणों के आधार पर परिभाषित किया जाए । मसलन मुसोलिनी द्वारा अपने विरोधियों की वास्तविक हत्या की जगह उनका मजाक उड़ाने की इच्छा और हिंसा की धमकी पर जोर दिया जाए या हिटलर के प्रसंग में मुक्त व्यापार की वैश्विक संस्थाओं के समक्ष कराधान और आर्थिक संरक्षण के पहलू को उभारा जाए । इससे बस यह होगा कि वर्तमान में जिन बातों को हम नापंसद करते हैं उनको ही फ़ासीवाद की विशेषता समझ लेंगे और इस तरह फ़ासीवाद की हमारी धारणा में उसकी क्रूरता मद्धम हो जाएगी ।

इस किताब में फ़ासीवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत का विवेचन है । इसके बारे में माना जाता है कि फ़ासीवादी राजनीति का वह अखंड विश्लेषण है । इसके विपरीत लेखक का मानना है कि फ़ासीवाद का कोई एक ही मार्क्सवादी सिद्धांत नहीं है । लेखक ने कम से कम इसके तीन रूप देखे और निरूपित किये हैं । एक को लेखक ने फ़ासीवाद का वामपंथी सिद्धांत कहा है जिसमें फ़ासीवाद को पूंजी के हितों के पक्ष में प्रतिक्रांति का एक रूप मानकर उसका विश्लेषण किया जाता है । इस व्याख्या के पक्षधर लोग फ़ासीवादी प्रतिक्रांति की विशेषता की परीक्षा करने की जहमत नहीं उठाते । इटली और जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टियों ने फ़ासीवाद को प्रतिक्रांति के अनेक रूपों में से एक रूप माना । ऐसा करके उन्होंने अपने समर्थकों को निहत्था कर दिया । इसके कारण वे फ़ासीवादियों के विरोध में एकाग्र होकर संगठित होने से चूक गये । दूसरे सिद्धांत को लेखक ने फ़ासीवाद का दक्षिणपंथी सिद्धांत कहा है । इसमें फ़ासीवादी आंदोलन के मूलगामी जन चरित्र पर ही ध्यान दिया जाता है । इस व्याख्या के समर्थक मार्क्सवादी लोग फ़ासीवाद को मूलगामी, विचित्र और पूंजी के लिए खतरनाक समझते हैं । इसके विरोध में वे मध्यमार्गी और यहां तक कि दक्षिणपंथी राजनेताओं तक से गंठजोड़ बना लेते हैं । इस नजरिए को 1920 दशक में इटली और जर्मनी की समाजवादी पार्टियों ने और 1934 के बाद सारी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनाया । इसके कारण फ़ासीवाद की बढ़त के सामने वे भी कुछ नहीं कर सके ।

इन दोनों की जगह लेखक ने फ़ासीवाद का द्वंद्वात्मक सिद्धांत तलाशने का प्रयास किया है । इसके तहत फ़ासीवाद को प्रतिक्रांतिकारी विचारधारा के साथ जन आंदोलन भी माना गया है । यह ऐसी राजनीति है जो अविश्वसनीय तेजी के साथ बढ़ सकती और अकथनीय नुकसान कर सकती है लेकिन अगर इसके सामने लोकप्रिय विपक्ष खड़ा हो जाए तो इसकी बढ़त पर लगाम भी लगायी जा सकती है । इस तरह की चुनौती पेश आने पर यह अपने समर्थकों के सामने बदलाव लाने का चारा भी फेंकती है । लेखक का कहना है कि यही सिद्धांत फ़ासीवाद की सटीक समझ के करीब होने का दावा कर सकता है ।

Saturday, February 21, 2026

संघर्ष और प्रेम का सहकार

 

               

                                                   

नोकिल सिंह की प्रस्तुत काव्य पुस्तिका में कवि की दो कविताओं को रखा गया है । उनके विषय क्रमश: संघर्ष और प्रेम हैं । बहुधा इन दोनों को परस्पर विरोधी भाव माना जाता है लेकिन उनकी सह उपस्थिति का इतिहास भी काफी लम्बा रहा है इसका कारण शायद यह है कि प्रेम एक ऐसा मूल्य है जो मनुष्य की निजी गरिमा को मान्यता देता है जबसे समाज में विषमता की स्थापना हुई तबसे ही प्रेम पर बंधन भी लगने लगे उन सभी बंधनों का प्रतिकार प्रेम का अभिन्न अंग हो गया कहने की जरूरत नहीं कि एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से यदि लगाव होगा तो इसका आधार समानता की भावना ही हो सकता है इतिहास में भी देखा गया कि क्रूरता और विषमता का सह अस्तित्व रहा है अतीत के साथ ही यह बात वर्तमान के लिए भी सच है । आश्चर्य नहीं कि जैसे जैसे विषमता में इजाफ़ा हो रहा है उसी मात्रा में प्रेम के स्थान पर क्रूरता और घृणा की प्रशंसा के गीत गाये जा रहे हैं ।

सभी जानते हैं कि प्रेम के दमन में स्त्रीद्वेष का गहरा असर होता है । सामाजिक रूप से ऊंच नीच की व्यवस्था में प्रेम के गीत जिन्होंने गाये उन्हें बहुतेरा ईश्वरीय प्रेम का सहारा लेना पड़ा । आज उस तरह के किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती इसलिए उसके साथ संघर्ष का अभिन्न जुड़ाव हो जाता है । इस प्रेम को जितना अधिक दबाने की कोशिश की गयी उतनी ही मजबूती से उसने समाज के साथ साहित्य में भी अपनी जगह बनायी है । हो सकता है नफ़रत के पक्ष में माहौल ऐसा बना दिया जाय कि अब साहित्य में प्रेम की केंद्रीयता का तथ्य भी दुहराना पड़े अन्यथा कौन नहीं जानता कि समूची दुनिया में खासकर कविता के क्षेत्र में प्रेम की भावना प्रधान रही है । हमारे देश के सामंती वातावरण में भी प्रेम और रति के भाव से उपजे रस को ही रसराज कहा जाता रहा है । कविता के सिलसिले में प्रेम के महत्व का कथन ही साबित करता है कि प्रेम के लिए माहौल कितना विषाक्त हो गया है । हिन्दी के सभी अध्येता प्रेम के मामले में सूरदास की गोपियों के साहस और मीराबाई के त्याग के अतिरिक्त जायसी नामक सूफी कवि के नाम से परिचित हैं । न केवल इतना बल्कि प्रेम के वर्णन में स्त्री की पराधीनता के प्रत्याख्यान की गुंजाइश पैदा हुई और उसकी झलक नोकिल की कविता में भी मिलती है ।

उत्तर प्रदेश के जायस नामक स्थान के निवासी सूफी कवि ने प्रेम को इतना ऊपर उठा दिया कि उसने प्रेम में मनुष्य को देवत्व प्रदान कर दिया । न केवल सूफी बल्कि उर्दू की समूची कविता में प्रेम की प्रतिष्ठा का जिक्र करने की जरूरत नहीं, वह प्रत्यक्ष है । इस प्रेम का संघर्ष से रिश्ता कू-ए-यार से सू-ए-दार की ओर ले जाने वाले फ़ैज़ से अधिक शायद ही कोई और स्पष्ट कर सके । इसलिए भी इन कविताओं के शिल्प पर रुबाइ का गहरा असर नजर आता है । चार पंक्तियों के इस सुपरिचित काव्य रूप के आकर्षक होने के बावजूद हिन्दी की कविता में इसका अनुकरण नहीं हुआ । इसके मुकाबले ग़ज़ल के अनुकरण में अधिक लोगों ने हाथ आजमाया । थोड़ा बहुत मधुशाला के शिल्प पर इसका प्रभाव नजर आता है । नोकिल की कविता के दोनों ही खंडों में चार पंक्तियों में बात कहने की शैली अपनायी गयी है और यह अनायास नहीं लगता । किन्हीं कारणों से उनके काव्य संस्कार में इस काव्य रूप ने बहुत ही मजबूत जगह बनायी है ।

मनुष्य का सांसारिक अस्तित्व सभी चिंतकों के लिए व्याख्या की चुनौती पेश करता रहा है । एक ओर उसे पशु भी कहा जा सकता है । संस्कृत में आहार, निद्रा, भय और मैथुन को पशुओं और मनुष्यों के बीच साझा कहा गया है । दूसरी ओर उसके किसी भी जैविकीय कर्म में केवल शारीरिक तत्व नहीं होता । मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता शरीर की सीमा के अतिक्रमण की उसकी क्षमता और प्रवृत्ति में निहित है । इसी भूमि पर उसके शुद्ध दैहिक कर्मों में भी अध्यात्म की आभा आ जाती है । इब्न रोश्द ने मनुष्य की समझ बनाते हुए उसके भीतर किसी जड़ पदार्थ, मानवेतर प्राणी और दैवी झलक के तीन स्तरों को पहचाना था । यही खूबी मनुष्य के प्रेम को निरा शारीरिक कर्म नहीं रहने देती और उसे संघर्ष की प्रेरक बना देती है । इसी अर्थ में प्रेम और संघर्ष की आस्तित्विक सहगामिता को देखा जा सकता है । संघर्ष संबंधी नोकिल की काव्य पंक्तियों में उद्बोधन की गूंज अक्सर सुनायी देती रहती है ।

संघर्ष भी प्रेम की तरह ही कविता का सर्वकालिक विषय है । इसका कारण इस संसार में मनुष्य का अस्तित्व है । सभी प्राणियों में सबसे कम सुरक्षा कवच मनुष्य के पास है । इसी वजह से उसे अपने अस्तित्व के लिए लगातार विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते रहना पड़ा । ये परिस्थितियां प्राकृतिक थीं जिनसे जूझने के क्रम में मनुष्य को आवास, वस्त्र और पके भोजन का प्रबंध करना पड़ा । एक समय के बाद ये हालात सामाजिक भी हो गये और मनुष्य को जीवित रहने के लिए अन्य मनुष्यों से ही जानलेवा संघर्ष चलाना पड़ा । इस संघर्ष की भी गूंज साहित्य में हमेशा सुनायी देती रही ।  

कविता को छंद के बंधन से आजादी दिलाने वाले जानते थे कि कविता में छंद का निर्वाह बहुत कठिन साधना है । आधुनिक मनुष्य की विवेक चेतना की सहज अभिव्यक्ति गद्य में होती है लेकिन कविता मनुष्य की आदिम अभिव्यक्ति होने के कारण सांद्र अभिव्यक्ति के माध्यम के बतौर आकर्षित करती रहती है । सभी युगों में मनुष्य की सबसे तीव्र और सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति कविता में होती रही है इसलिए उसकी ओर खिंचाव हमेशा ही बना रहता है । उसकी अभिव्यक्ति की रूपगत परिष्कृति के कारण ही काव्य हेतुओं में प्रतिभा के साथ अभ्यास को भी महत्व प्रदान किया गया है । नोकिल की कविताओं को पढ़ने से उनमें अभ्यास की कमी महसूस होती है लेकिन यह ऐसा रास्ता है जिस पर चलकर ही आसानी हासिल होती है । इसका बहुत बड़ा कारण उसका भाषा नामक माध्यम है । यह माध्यम भी मनुष्य के संघर्ष से ही उपजा है । प्राकृतिक और सामाजिक वैपरीत्य के मुकाबिल अपनी सामाजिकता की रक्षा के क्रम में मनुष्य ने भौतिक औजारों के साथ इस अत्यंत जटिल तंत्र का भी निर्माण अपने शरीर में उपलब्ध सीमित साधनों से किया । इसने मनुष्य को शेष प्राणियों के मुकाबले गुणात्मक विशेषता प्रदान कर दी । अब वह अपने आसपास के हालात का मुकाबला करने की कोशिश की सफलता या विफलता की विरासत अगली पीढ़ियों को सौंप सकता था ।      

भाषा में कविता को सम्भव करने के लिए उसे पालतू बनाना पड़ता है । उसकी ध्वनियों से लय का सृजन करते हुए भी उससे उत्पन्न अर्थ की रक्षा करनी पड़ती है । भाषा में रचना करने वाले सभी लोग कमोबेश इस प्रक्रिया की जटिलता और समस्याओं से परिचित होते हैं । साथ ही वे इससे हासिल फल से वंचित भी नहीं रहना चाहते । इससे रचनाकार को मानव समुदाय को आगे बढ़ाने वाले का जो सम्मान और सुख मिलता है वही किसी भी कवि की उपलब्धि और विशेषता का स्रोत होता है । कोई भी साहित्यकार इस खासियत से दूर नहीं होना चाहता इसलिए तमाम अपमान, उपहास और अलगाव के बावजूद वह सृजन की जिद नहीं छोड़ता ।

नोकिल की कविता में इस समय के युवा की भाषा से कविता के निर्माण का प्रयास नजर आता है । उनकी इस भाषा में अनेक अपरम्परित शब्द मिलते हैं । कविता में इन शब्दों के प्रयोग से हिंदी की दुनिया अभ्यस्त नहीं है लेकिन बोलचाल में ये शब्द इन्हीं नये अर्थों में प्रयुक्त हो रहे हैं । पढ़ते हुए ये शब्द अक्सर भोजन में कंकड़ की तरह चुभते हैं लेकिन इसी प्रक्रिया में वे हिंदी के नये पाठक तक कविता को लेकर भी जायेंगे । पाठकों से आग्रह है कि इन कविताओं को वे प्रयास की तरह ही देखें । यदि वे इन्हें आलोचनात्मक निगाह से पढ़ेंगे तो लेखक को खुशी मिलेगी । इससे भी आगे बढ़कर वे इस कोशिश को परिष्कृत और संपन्न करें तो इससे बड़ा फल किसी भी लेखक के लिए और कुछ नहीं हो सकता । सभी ईंटें कलश पर ही नहीं लगतीं । कुछ नींव में गुम भी हो जाती हैं । अगर बुनियाद में खप जाने वाले प्रयोगकर्ताओं का जत्था न हो तो किसी भी भाषा में काव्य और साहित्य रचना ठहर जायेगी । उसका विकास ही इसी तरह के कच्चे पक्के प्रयासों की मार्फत होता है । ये कविताएं मंजिल या पड़ाव नहीं उसकी ओर जारी यात्रा का छोटा सा सबूत हैं ।