2025
में यूनिवर्सिटी आफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस से डेविड मैकनेली की किताब ‘स्लेवरी ऐंड
कैपिटलिज्म: ए न्यू मार्क्सिस्ट हिस्ट्री’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक जो भी
गुलामी के बारे में लिखता है वह आजादी के बारे में लिखता है । गुलामी के विरोध में
सच्ची आजादी का हम इंतजार कर रहे हैं । इसलिए अचरज नहीं कि गुलाम लोगों ने सबसे
पहले आजादी को सामाजिक मूल्य के बतौर पहचाना था । उदारवाद ने इसे स्वायत्त मनुष्य
का अंतर्निहित गुण माना था । गुलामों की परिभाषा के अनुसार उत्पीड़ितों के लक्ष्य
के रूप में आजादी का जन्म ऐतिहासिक प्रक्रिया में होता है । सही बात है कि दमितों
की मुक्तिकारी परियोजना का अक्सर दमन ही हुआ है ।
इसके बावजूद आजादी का सपना गुप्त रूप से आशा के रूप में शक्ल बदलकर जिंदा
रहता है । इस आकांक्षा के बने रहने का कारण है कि आखिरकार मनुष्य का वस्तूकरण
आंशिक ही हो सकता है । इस किताब में अटलांटिक की दुनिया का अध्ययन किया गया है और
वहां गुलाम मनुष्य को संपत्ति के रूप में देखा जाता था लेकिन इस मान्यता को हमेशा
धक्का लगता रहता था । कानून, किताब, रस्म और व्यवहार में कोड़े, जंजीर, जेल और
निगरानी के जरिए गुलामी के सिद्धांत को लागू करने की हरचंद कोशिश ही इसकी
मुश्किलों का बयान करने के लिए काफी है । गुलामी संबंधी दस्तावेजों में हर कहीं
उसे तोड़ने की कोशिशों के सबूत मिल जाते हैं । औजार तोड़ देना, खाना चुरा लेना, काम
में सुस्ती, नाता जोड़ना, जंगल में भाग जाना, पढ़ने का प्रयास, हुक्म न मानना और
ध्रुवतारे के सहारे उत्तर दिशा जाने की कोशिश आम घटना बन गये । इन सभी तरीकों से
गुलामों ने सामाजिक मौत के विरुद्ध जीवन के गीत गाये । इन कोशिशों के अमिट निशान
उत्पीड़ितों के अभिलेखागार में मौजूद हैं । ध्यान से सुनिए तो अब भी उनके बीच आजादी
की खुसफुस सुनाई देगी ।
किताब
में आजादी की इसी चाहत को सत्य का पैमाना माना गया है । वैसे भी आलोचना सिद्धांत
की बुनियाद मानव मुक्ति में उसकी रुचि है । आजादी का प्रत्येक विरोध मानव जीवन के
अंतिम लक्ष्य के साथ धोखा है । इसका अर्थ यह है कि सत्य के साथ होना पक्षपात है ।
आत्मनिर्णय की सामुदायिक ताकतों द्वारा व्यवहार में सक्षम जीवन की तलाश करना उत्पीड़न
और गुलामी की प्रत्येक परिस्थिति का विरोध है । मैल्कम X ने कहा था कि
सत्य उत्पीड़क के विरुद्ध उत्पीड़ितों के पक्ष में खड़ा होना है । ऐसी प्रतिबद्धता की
घोषणा फिलहाल चलन से बाहर कर दी गयी है । आजकल तो तमाम विद्वान यही साबित करने में
लगे रहते हैं कि गुलामों में कभी आजादी की चाहत ही नहीं रही । कहा तो यह भी जा रहा
है कि मुक्ति के मुकाबले गुलामों के लिए जिंदा रहना अधिक जरूरी था । इन विद्वानों
का कहना है कि मुक्ति तो पश्चिम की अमूर्त धारणा है । इसके मुकाबले उनके लिए
गुलामी का दैनिक यथार्थ ज्यादा बड़ी कठिनाई थी । इस तरह के सोच की परम्परा बहुत पुरानी
है । बहुत पहले यूजीन जेनोवीज ने कहा था कि बंधक लोगों ने हालात को मंजूर कर लिया
था । गुलामी से आजाद जीवन के मुकाबले समर्पण उन्हें अधिक लाभकर नजर आया था । उनके
अनुसार गुलामी में ही किसी तरह बचे रहने का तरीका निकालना गुलामों की सबसे बड़ी
चिंता थी । यह भी कहा जा रहा है कि मूल्य के स्तर पर मुक्ति के मुकाबले पारिवारिक
जीवन को गुलामों ने वरीयता दी ।
इस
सोच के पीछे व्यक्तिवाद की खास तरह की धारणा काम करती है । इस धारणा के मुताबिक
कोई भी व्यक्ति अपनी सक्रियता के लिए तभी अबाध स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है जब
वह स्वामी हो । इसके तहत संपत्ति का स्वामित्व ही अधिकार और आत्मवत्ता के
स्वामित्व का स्रोत माना जाता है । यह धारणा अनुचित है और निम्न वर्गों के वर्तमान
उभार के समय संदिग्ध भी है । इस समय अश्वेत, पारलिंगी, फिलिस्तीनी या मजदूर वर्ग
दुनिया को बदलने की दावेदारी जता रहे हैं । निम्न वर्गों की यह सक्रियता सत्ता की संरचनाओं
द्वारा की जा रही हिंसा और सामाजिक टकराव के बीच जारी है । हिंसा के इस वातावरण ने
उन्हें पचाने में सफलता नहीं पायी है । नीचे से इतिहास लेखन की धारा संग्रहालयों से
इसी प्रतिरोधी सक्रियता के निशान खोज लाती है । इन निशानों के सहारे निम्न वर्गों द्वारा
खुद को बनाने की प्रक्रिया खुलती जाती है । यह निर्माण प्रतिरोधी व्यवहार से साकार
होता है लेकिन दमन और उत्पीड़न से बचा रहता है । इस तरह दमन के भीतर से निम्न वर्गों
की सक्रियता का जन्म होता है ।
जो
लोग गुलामों मे समर्पण को ही एकमात्र सत्य समझते हैं उन इतिहासकारों के मुकाबले
गुलामों के मालिक उनकी सक्रियता को अधिक अच्छी तरह समझते थे । गुलामी की व्यवस्था
में गुलाम की अनिच्छित मेहनत तो मालिक की संपत्ति होती थी लेकिन उनकी नैतिक दुनिया
पर मालिक का कोई नियंत्रण नहीं होता था । गुलामों के आवागमन पर रोक, पलायित और
विद्रोही गुलामों को दंड की घटनाओं से इसी बात की पुष्टि होती है । गुलामी के
बुनियादी अंतर्विरोध को व्यक्त करते हुए सिडनी मिंज़ ने कहा कि इसमें मनुष्यों के
खास समूह के साथ मानवेतर प्राणियों की तरह बरताव करना पड़ता है । गुलाम लेकिन होते
मनुष्य ही हैं और इस बात को गुलामों के मालिक भी जानते हैं । कहने की जरूरत नहीं
कि मनुष्यो में मशीनों के विपरीत स्वतंत्र इच्छा होती है । इसका अर्थ कि उनमें
आजादी की चाहत मनुष्य होने के नाते होती ही है । जो उत्पीड़ित हैं उनको अपनी चाहत
की पूर्ति के लिए संघर्ष करना होता है । इस समूची प्रक्रिया को हम अपने देश की
जाति व्यवस्था के प्रसंग में अच्छी तरह समझ सकते हैं ।
हेगेल
की सोच में बाकी जो भी समस्या हो लेकिन उन्होंने जब मालिक और गुलाम के बीच
द्वंद्वात्मक रिश्ते की बात की थी तो उसके पीछे उनकी यही मान्यता थी । गुलाम की
स्वतंत्र सक्रियता उसका निहित गुण नहीं होती । इसे इतिहास के क्रम में दूसरों के
साथ व्यवहारिक संघर्ष से अर्जित करना होता
है । अपनी दावेदारी के अवसर पर गुलाम व्यक्ति मालिक के भय पर काबू पा लेता है ।
हेगेल लिखते हैं कि स्थापित व्यवस्था के नकार में खड़ा होकर वह अपने आपको पा लेता
है । हेगेल द्वारा प्रतिपादित निम्न वर्गों की इस स्वतंत्र सक्रियता को दूषित करने
वाले तत्वों के बारे में मार्क्स को जरूर पता रहा होगा । इसलिए टकराव के इस ढांचे
को उन्होंने व्यक्तियों के सामाजिक संबंधों में देखा । उन्होंने निम्न वर्गों की
इस सक्रियता को उनके सामाजिक गुण के रूप में कल्पित किया जिसे सत्ता और संपत्ति के
दायरे में सामूहिक कार्यवाही से अर्जित किया जाता है । इसे वे वर्ग संघर्ष कहते
हैं । संघर्ष की यह प्रक्रिया संघर्ष करने वाले को भी बदलती है । इसी कारण सामूहिक
गोलबंदी को आत्म निर्माण की सामूहिक क्रिया के बतौर समझा गया । इस तरह निम्न
वर्गों की सक्रियता सामूहिक कार्यवाही के परिणाम के बतौर सामने आती है । इसी
गतिविधि में मनुष्य अभिकर्ता के रूप में विकसित होता है । अपने आपको बदलने की
सामाजिक प्रक्रिया की इस धारणा में ही अपनी मुक्ति की नैतिकता भी शामिल रहती है
।
इस
तरह मुक्ति की उदार व्यक्तिवादी सोच के विपरीत उसकी सामाजिक धारणा का जन्म होता है
। असल में गुलामों के लिए गुलामी सामाजिक मृत्यु की तरह थी क्योंकि वे नातेदारी के
रिश्तों से अलगाव में ही होते थे । इसलिए मुक्ति का मतलब उनके लिए सामाजिक संबंध
और एकजुटता, परिवार, नातेदारी, समुदाय और वर्ग की पहचान की पुन:प्राप्ति भी था ।
इसी तरह आजादी उनके लिए ऐसा सामाजिक संकेतक था जो प्रतिरोध और मुक्ति के अभिकर्ता
के रूप में उनकी पहचान को इसी प्रक्रिया में मजबूती के साथ स्थापित भी करता था ।
इसी वजह से आजादी उनके लिए किसी संप्रभु व्यक्ति का कोई पूर्वनिर्धारित गुण नहीं
था बल्कि अस्तित्व की ऐसी प्रक्रिया थी जिसके साथ टकराव अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था
। आजादी ऐसी चीज थी जिसको अभी हासिल किया जाना था । वह चतुर्दिक व्याप्त गुलामी के
भीतर से निकाली जानी थी । साथ ही यह कभी पूरी तरह समाप्त कोई अंतिम परिणाम नहीं होती
थी । इसे लगातार विकसित होते रहना था । यह हमेशा ही अपूर्ण रहने वाली सामूहिक
सामाजिक परियोजना थी । मनुष्यता के प्राक इतिहास से मानव इतिहास में प्रवेश करने
का यही मतलब है । इन बातों को उदार व्यक्तिवादी निगाह से देखना सम्भव नहीं है ।
गुलामी के अधिकांश इतिहास इसी उदार व्यक्तिवादी नजरिए के शिकार रहे हैं । इसलिए
उनमें निम्न वर्गों द्वारा मुक्ति की सामूहिक कोशिश का निशान नहीं मिलता ।
इस
बाध्यकारी सीमा से मुक्ति के लिए इस किताब में डब्ल्यू ई बी ड्यु बोइस, सी एल आर
जेम्स और सिल्विया विंटर की क्रांतिकारी अश्वेत परम्परा के तीन प्रतिनिधि पाठों से
प्रेरणा ली गयी है । इन तीनों पाठों में गुलाम कामगारों के सामूहिक संघर्षों को
आधुनिक वर्ग संघर्ष के ही विभिन्न रूप माना गया है । इस तरह लेखक का मानना है कि
नयी दुनिया के प्लांटेशनों पर काम करने वाले ये सभी गुलाम कामगार आधुनिक मजदूर
वर्ग का हिस्सा थे । ड्यु बोइस का कहना है कि दक्षिणी अमेरिका के जो भी प्रांत
गृहयुद्ध में गुलामी के समर्थन में लड़ रहे थे उनकी आर्थिक ताकत को कम करने में
गुलाम मजदूरों द्वारा प्लांटेशन का काम छोड़कर बड़े पैमाने पर पलायन की निर्णायक
भूमिका थी । गुलामों द्वारा इस तरह इकट्ठा काम छोड़ना काम के हालात के विरोध में आम
हड़ताल ही थी । इसमें लगभग पांच लाख गुलाम शामिल थे । वे प्लांटेशन पर आधारित
अर्थव्यवस्था को जाम करना चाहते थे और इसका उपाय उन्हें काम छोड़ना लगा । इसी तरह
सी एल आर जेम्स ने हैती की 1791 की क्रांति का विश्लेषण करते हुए कहा कि उत्तर के
मैदानों के विशाल चीनी मिलों में सैकड़ों की संख्या में साथ रहने और काम करने वाले
लोग आधुनिक सर्वहारा के सबसे नजदीकी समूह थे इसलिए ही उनका विद्रोह इतना संगठित था
। गुलामी और पूंजीवाद संबंधी बहस में इन दोनों का योगदान नीचे से उठने वाले वर्ग
संघर्ष के रूपों पर ध्यान देना है । इसके अलावा उन्होंने गुलामी के सामाजिक
टकरावों के पूंजीवादी चरित्र पर भी बल दिया । सिल्विया विंटर ने भी यही राह अपनायी
। साथ ही उन्होंने गुलाम सर्वहारा के निर्माण में नस्ल और वर्ग की द्वंद्वात्मकता
पर भी ध्यान दिया । उनका कहना था कि नयी दुनिया में अश्वेत वह पहला समुदाय है
जिसका निर्माण वैश्विक उत्पादन संबंधों ने किया है । वे वर्ग और नस्ल के निर्माण
को एक ही वैश्विक प्रक्रिया का नतीजा मानती हैं । उनके मुताबिक अश्वेत मनुष्य के
व्यवस्थित अवमूल्यन के साथ ही श्रमशक्ति के व्यवस्थित शोषण की प्रक्रिया भी चली । दलित
समुदाय के साथ सामाजिक व्यवहार में इस प्रक्रिया की झलक देखी जा सकती है । विंटर
ने प्लांटेशन को उस वैश्विक प्रक्रिया का अंग कहा है जिसमें श्रमशक्ति का नस्लीकरण
हुआ । इसी उदीयमान नस्ली पूंजीवाद को वे श्रमशक्ति के वस्तूकरण के जरिए समझती हैं
।
हाल
के दशकों में इतिहासकारों ने इन चिंतकों के लेखन का जिक्र तो किया लेकिन उनकी
दावेदारी से परहेज किया । खासकर प्लांटेशन के गुलाम कामगारों को आधुनिक मजदूर वर्ग
का कहने को असावधानी के साथ बढ़ा चढ़ाकर कही बात समझा गया । इस इनकार से आलोचना
सिद्धांत कमजोर हुआ और द्वंद्वात्मक आलोचना का स्वर मंद पड़ा । असल में उत्पीड़ितों
की दुनिया में धक्का देने वाला सच बोला जाना चाहिए । जानकारी को दबाने वाले इनकार
के तंत्र को तोड़ा ही जाना चाहिए । जिस समाज में नस्ली पूंजीवाद की क्रूर सच्चाई से
इनकार करने की बीमारी हो वहां धक्का लगने वाला सच बोलना होगा । उन अर्थों को सामने
लाना होगा जिनसे जी चुराया जाता है । इसी भावना के साथ इस किताब में इन चिंतकों के
लेखन से प्रेरणा ली गयी है । अब तो बहुतेरे लोग मानने लगे हैं कि नयी दुनिया की
गुलामी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति का अंग थी । इसके बावजूद उदार चिंतन के प्रभाव के
कारण इसको सैद्धांतिक मजबूती नहीं मिल पाती । इसका कारण यह है कि पूंजीवाद को
बाजार के साथ ही जोड़कर देखा जाता है । उत्पादन संबंध, शोषण और वर्ग संघर्ष
जैसे तत्वों पर कम ध्यान दिया जाता है । इस किताब में ऐतिहासिक भौतिकवाद की जिस आलोचनात्मक
धारा का अनुगमन किया गया है उसमें समाज का स्वरूप उसे आकार देने वाले बुनियादी उत्पादक
और पुनरुत्पादक टकरावों से अलग नहीं होता । इसी कारण नयी दुनिया की गुलामी की पूंजीवादी
प्रकृति पर किताब का जोर प्लांटेशन सर्वहारा की धारणा को भी मान्यता देता है ।
लेखक
बताते हैं कि किताब के अलग अलग अध्यायों में इस मान्यता का विस्तार है लेकिन इन
लेखकों की बातों को ही दुहराया नहीं गया है । किताब उनके पाठ के घेरे से बाहर
निकलती है और यात्रा साहित्य, प्लांटेशन मालिकों के दस्तावेज तथा डायरी, गुलामों
की कहानी के साथ राजनीतिक अर्थशास्त्र और हालिया ऐतिहासिक विद्वत्ता का भी उपयोग
करती है । इतिहास और सिद्धांत निर्माण के लिए ऐसा करना उन्हें जरूरी लगा ।
पूंजीवाद और गुलामी की सैद्धांतिक समझ के लिए लेखक ने राजनीतिक अर्थशास्त्र की
मार्क्सवादी आलोचना से जरूरी धारणाओं को ग्रहण किया है । असल में इतिहास में
उदारवाद की प्रभुता की एक पहचान सिद्धांत की उपेक्षा भी है । इसके तहत समाज का जो
सहजबोध बनता है उसमें आलोचनात्मक चिंतन से परहेज किया जाता है । सिद्धांत की
उपेक्षा से तथ्यों को ही निरपेक्ष सत्य मानने की भूल पैदा होती है । सिद्धांत की अवहेलना
करके तथ्य पर यह अतिरिक्त जोर बौद्धिक जड़ता की ओर ले जाता है जिससे यथास्थिति के प्रति
सहनीय रुख का जन्म होता है । गुलामी और पूंजीवाद संबंधी अधिकांश इतिहास लेखन तमाम मूल्यवान
शोध के बावजूद इसी विंदु पर फंसा हुआ है । इस जड़ता को तोड़ने के लिए इस किताब में ऐतिहासिक
गवेषणा के साथ आलोचना सिद्धांत का भी मेल किया गया है । आम तौर पर यह रुख चलन के बाहर
है । पूंजीवाद के नये इतिहास लेखन की धारा सदी के आरम्भ में लोकप्रिय हुई थी लेकिन
उसमें भी पूंजीवाद और उसके राजनीतिक अर्थशास्त्र की ओर वापसी की स्पष्ट इच्छा के बावजूद
सिद्धांत से यह दुराव अच्छा माना जाता है ।
इसके
उदाहरण के बतौर लेखक ने हाल में छपी एक किताब का जिक्र किया है जिसका शीर्षक ‘स्लेवरी’ज कैपिटलिज्म’ है । इस शीर्षक के बावजूद संपादकों
ने इस सवाल में अरुचि जाहिर की है कि गुलामी को पूंजीवाद माना जाए या नहीं । तमाम
तरह की गवेषणा के बावजूद एक समीक्षक का कहना है कि पूंजीवाद और गुलामी के प्रसंग
में आर्थिक सिद्धांतों को ले आने से विषय के प्रति पूरा न्याय नहीं हो सकता ।
नतीजे के तौर पर उल्लिखित किताब में तथ्यों के प्रति उन्नीसवीं सदी जैसा पूजाभाव
नजर आता है । इसके चलते विश्लेषण के नाम पर वर्णन मात्र परोसा जाता है । पूंजीवाद
के ऐसे नये इतिहासकार पूंजीवाद को परिभाषित करने की झंझट से मुक्त होकर व्यवस्था
के जमीनी साक्ष्य खोजते रहते हैं । लेखक का कहना है कि जमीनी साक्ष्य जरूरी हैं और
इस मोर्चे पर भी उनकी किताब में कोताही नहीं बरती गयी है । इसके बावजूद अनुभवजन्य
सबूत की बहुतायत सिद्धांत निर्माण की जगह नहीं ले सकती । सिद्धांत के अभाव में
व्यवस्था का कोई ऐतिहासिक अर्थ ही नहीं निकलेगा । किसी भी ऐतिहासिक परिघटना का अर्थ
संपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया में निहित सामान्य दिशा, गतिपथ, टकराव और अंतर्विरोध
के जरिए ही निकलता है । प्लांटेशन पूंजीवाद की व्यवस्थित कार्यपद्धति को रूई की गांठ
के ही विश्लेषण से नहीं समझा जा सकता ।
मार्क्स
ने अपने ग्रंथ पूंजी में यही तो कहा कि पूंजीवाद का विश्लेषण किसी एक माल से शुरू कर
सकते हैं लेकिन फिर अन्य मालों के साथ उसके रिश्ते को देखते हुए आगे बढ़ना होता है ।
यहां से उस श्रम की ओर जाना होता है जिससे इन सभी मालों का जन्म होता है । मतलब कि
माल का सामाजिक अर्थ समझने के लिए उसे समूची सामाजिक प्रक्रिया के रिश्ते में रखकर
देखना होता है । मार्क्स ने जब विभिन्न मालों का मशहूर समीकरण बनाया तब वे माल को ऐतिहासिक
सामाजिक संबंध के रूप में विश्लेषित कर रहे थे । ऐसा कोई भी विश्लेषण सिद्धांत के बिना
सम्भव नहीं । लेखक ने एक और इतिहासकार का जिक्र करते हुए बताया कि वे रूई के
कारोबार में बाजार या पूंजीवाद के प्रवेश को नापने की जगह पर इस बाजार की ठोस
कार्यपद्धति को समझना अधिक उपयोगी कहते हैं । इस रुख के बारे में लेखक का कहना है
कि माल और पूंजी के प्रवाह, कीमत का निर्माण, मुनाफ़े की दर, मौद्रिक और वित्तीय
औजार, पूंजी निवेश के रूप और श्रम प्रिक्रिया के वैश्विक संजाल के व्यवस्थित
अंतर्संबंधों की समझ के बिना बाजार की कार्यपद्धति को किस तरीके से समझा जा सकता
है । अगर नयी दुनिया की गुलामी का अध्ययन विश्व पूंजीवाद के एक पहलू के बतौर करना
है तो रूई की किसी गांठ को सामाजिक ऐतिहासिक रिश्तों की गतिमान व्यवस्था के भीतर
रखकर देखना होगा ।
लेखक के अनुसार उनकी किताब नयी दुनिया की गुलामी की पूंजीवादी प्रकृति को समग्रता में देखने की वकालत करती है । उनका यह भी कहना है कि पूंजीवाद की समाजार्थिक गतिकी ही अंतर्विरोधी होती है । इसी गतिकी और वर्ग संघर्ष के जरिए यह समूची व्यवस्था उत्पादित और पुनरुत्पादित होती रहती है । पूंजीवाद के पुनरुत्पादन का बुनियादी नियम है माल उत्पादक इकाइयों द्वारा अधिशेष का उत्पादन और अधिग्रहण । विक्रेय माल के उत्पादन में लगे कारखाने मजदूर के श्रम से अतिरिक्त मूल्य पैदा करते हैं और उसको निजी संपदा की तरह हथिया लेते हैं । उनके इस काम के साथ बाजार की होड़ भी नत्थी रहती है । शोषण के इस कारोबार को अधिकाधिक मुनाफ़ा पैदा करने के मकसद से अलग अलग पूंजीपति आपस में होड़ के साथ चलाते हैं । इस तरह यह समूची व्यवस्था आंगिक समग्रता के साथ चलती रहती है । इसके भीतर बदलाव इसकी अंतर्विरोधी गतिकी के कारण ही आते हैं ।
गुलामी की तरह पूंजीवाद भी वैश्विक प्रक्रिया है । इन दोनों के विकास को समझने के लिए इनकी अंत:क्रिया पर निगाह रखनी होगी । पूंजीवाद के नये इतिहास उसकी द्वंद्वात्मक गतिशीलता को अच्छी तरह ग्रहण नहीं कर पाते इसलिए उनमें फंसाव नजर आता है । उनका यह रुख अबोध नहीं है । तमाम अकादमिक शोध शासक सामाजिक शक्तियों और चिंतन के रूपों के दायरे में ही चलते हैं । आलोचना सिद्धांत से परहेज जाने अनजाने मौजूदा उदार पूंजीवादी आम समझ की ओर ले जाता है । मसलन बहुत सारे अध्ययन एडम स्मिथ की भोंड़ी नकल करते हुए पूंजीवाद की पहचान को व्यापार और वित्त तक सीमित कर देते हैं । यह उदार परिप्रेक्ष्य इतिहासकारों और समाज विज्ञानियों के मानसिक क्षितिज को खासकर अमेरिका में काफी सीमित कर देता है । अमेरिका में पूंजीवाद के उदय से संबंधित एक किताब के संपादक कहते हैं कि उनके लेखकों को अमेरिका को बनाने वालों के मुकाबले उसे बेचने वालों और इस बिक्री के लिए वित्त का प्रबंध करने वालों में अधिक रुचि है । इसी तरह पूंजीवाद का नया इतिहास लिखने वाले विद्वान गुलामों की खरीद बिक्री से जुड़े वित्तीय औजारों में अधिक रुचि लेते हैं । गुलामी और वित्त के आपसी रिश्ते से जितना भी अधिक जानकारी मिले, इस पर अधिक ध्यान देने से उत्पादन में गुलाम कामगार की भूमिका ओझल होती है । इसी तरह व्यापार और वित्त पर अधिक जोर देने से लगता है कि आधुनिक समाज की सारी समस्याओं की जड़ वही है । इससे पूंजीवाद की बीमारियां धोखाधड़ी और बैंकों से कर्ज की लूट मात्र नजर आती हैं । इस नजरिए से अध्ययन करने वाले एक इतिहासकार का दावा है कि पूंजीवाद कुल मिलाकर भरोसे का खेल है । इससे तो पूंजीवाद का इतिहास या राजनीतिक अर्थशास्त्र समझना मुश्किल होगा ।
इसी वजह से वस्तुओं की जड़पूजा संबंधी मार्क्स का विवरण पूंजीवाद के आलोचना सिद्धांत के लिए अपरिहार्य है । पूंजीवाद को अगर सतही तौर पर वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार तथा मुद्रा के प्रवाह मात्र के रूप में देखा जाएगा तो यह कानूनी तौर पर पूरी तरह आजाद और समान व्यक्तियों के बीच स्वैच्छिक बाजार संबंध की तरह नजर आएगा । मार्क्स ने कहा ही था कि ऊपर से यह आजादी, समता, संपत्ति और बेंथम का स्वर्ग नजर आता है । झटका तो तब लगता है जब हम उत्पादन के प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करते हैं । उदार अर्थशास्त्री ऐसा करने से परहेज करते हैं । इसी प्रतिबंधित क्षेत्र में पूंजी की प्रत्यक्ष तानाशाही दिखायी देती है । पूंजी यहीं मजदूर के शरीर को नियंत्रित करती है और उसे उत्पादन के दबावों और खतरों के सामने खुला छोड़ देती है । उत्पादन ही पूंजी का परम लक्ष्य है । इसके बाद ही बाजार विनिमय पर आधारित समाज जबरिया श्रम की व्यवस्था नजर आता है । उदार अर्थशास्त्र जान बूझकर उत्पादन की छानबीन नहीं करता जिससे मनुष्य की उत्पादक गतिविधि प्रकृति के साथ उसकी तकनीकी अंत:क्रिया प्रकट होती है न कि ऐतिहासिक रूप से बनी अलगावकारी और शोषक व्यवस्था नजर आती है । इस व्यवस्था के मूल में ऐसे सामाजिक संबंध होते हैं जो प्रकृति के साथ मनुष्य के चयापचय को भी नियमित करते हैं । इस तरह उत्पादन को उसके साथ जुड़े दमन और शोषण समेत स्वाभाविक बना दिया जाता है ।
मार्क्स की आलोचना इसी जड़पूजा का रहस्यभेदन करती है । उदार राजनीतिक अर्थशास्त्र जिस मामले में इतिहास को आने से रोक देता है उसी मामले में मार्क्स उसका प्रवेश कराते हैं । पूंजी की ऐतिहासिकता पर बल देकर वे उसे स्वाभाविक नहीं रहने देते । इसी वजह से उनके ग्रंथ का पहला खंड पूंजी संचय की प्रक्रिया के मौलिक उद्घाटन के साथ बंद होता है । उनकी यह द्वंद्वात्मक आलोचना पूंजी के सतही आभास को खोल देती है और उसमें इतिहास का प्रवेश कराती है । यह इतिहास बहुत सुखकर नहीं है । वस्तुओं और मुद्रा की गतिविधियों की सतह के नीचे खून और आग से लिखा हिंसक इतिहास नजर आने लगता है । पूंजीवाद के नये इतिहासों में पूंजी की यही कहानी छिपायी जाती है । बैंक, व्यापार और कर्ज के बाजार पर केंद्रित करके पूंजीवाद पर से खून के दाग धोये जाते हैं । इसके बाद बाजार की धोखाधड़ी को सबसे बड़ी आधुनिक बीमारी के रूप में पेश किया जाता है । सही बात है कि एकाधिकारी सत्ता के कारण धोखाधड़ी होती है लेकिन इसी पहलू पर अतिरिक्त जोर देने से पूंजीवाद के बारे में प्रचलित समझ मजबूत होती है ।
उदारवाद
तो बाजार को ही बुनियाद मानता है । आधुनिक समाज की उसकी परिभाषा संप्रभु
व्यक्तियों के बीच मुक्त लेनदेन पर टिकी हुई है । इसमें धोखाधड़ी का खेल अपवाद नजर
आता है जिसे समुचित विनिमय संबंधों के उल्लंघन की तरह ही पेश किया जाता है । यह
कहना साहसिक प्रतीत होने लगता है कि पूंजीवाद ही धोखाधड़ी है लेकिन आलोचना सिद्धांत
की यही मान्यता है । उदार राजनीतिक अर्थशास्त्र इसके उलट बाजार आधारित विनिमय को
व्यवस्था की जान बताता है और श्रमिक के शरीर को ही उत्पादन का स्रोत बताने से जी
चुराता है । इसके बाद तमाम विश्लेषणकर्ता गुलाम व्यापार से जुड़ी जटिल वित्तीय
व्यवस्था का तो विश्लेषण करते हैं लेकिन अपने स्वामी के लिए वस्तुओं और अतिरिक्त
मूल्य का उत्पादन करने वाले कामगार के शोषक संबंध पर उस तरह ध्यान नहीं देते ।
लेखक का यह भी मानना है कि पूंजीवादी संपदा का स्रोत वित्तीय खेल में खोजकर ये
विद्वान लोग न केवल उत्पादन के असली स्रोत पर परदा डालते हैं बल्कि इसके जरिए वे
सामाजिक इतिहास के असली नायकों अर्थात उत्पादकों को अदृश्य कर देते हैं और उनकी
जगह खरीद बिक्री करने वाले निवेशकों को ला बिठाते हैं । इस तरह वे उत्पादकों
द्वारा पूंजी के प्रभुत्व के प्रतिरोध की कहानी को गायब कर देते हैं । उत्पीड़ितों
की सामूहिक सक्रियता और शोषितों द्वारा नयी दुनिया बनाने की सम्भावना पढ़ने वाले की
नजर से ओझल हो जाती है । इसके बाद इतिहास वर्ग संघर्ष से रहित हो जाता है ।
सामाजिक न्याय के लिए एकाधिकार पर प्रतिबंध जैसे बाजारी सुधारों की राजनीति ही बची
रह जाती है । इसके लिए उत्पादन संबंधों में बुनियादी बदलाव की जरूरत नहीं महसूस
होती । सामाजिक और बौद्धिक आलोचना की प्रेरणा पूंजीवाद विरोध नहीं उदारवाद बन जाता
है ।
उदारवाद
का गुलामी से बहुत नजदीकी रिश्ता रहा है । ब्रिटेन पहला पूंजीवादी राष्ट्र राज्य था
और उसने गुलामी के सिद्धांत को स्वीकार किया था । वहां दास को संपत्ति ही माना जाता
था । यह कोई अचरज की बात नहीं कि पूंजीवादी संपत्ति के नाम पर गरीब का हिंसक दमन करने
वाला शासक वर्ग ही प्लांटेशन गुलामी के सबसे विकसित रूपों का जनक हुआ । इसलिए भी इस
किताब में वेस्ट इंडीज और अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों पर अधिक ध्यान दिया गया है जो
दासप्रथा के सबसे बड़े और गतिशील केंद्र बने । ब्रिटेन के उपनिवेश बारबाडोस ने गुलामी
पर आधारित चीनी उद्योग वाले पूंजीवाद की शुरुआत की । नयी दुनिया के दो तिहाई गुलाम
ब्रिटेन के ही उपनिवेशों में काम करते थे । उन्नीसवीं सदी के मध्य में अमेरिका के दक्षिणी
प्रांत सबसे बड़े गुलाम समाज थे । ब्रिटेन के इसी नमूने को अन्य साम्राज्यवादी अनुसरणकर्ता
देशों ने भी अपनाया । स्पेन,
हालैंड
और फ़्रान्स ने ब्रिटेन से युद्ध हारने के बाद नयी दुनिया के अपने उपनिवेशों में औद्योगिक
पैमाने की इसी गुलामी की तकनीक और सामाजिक संबंधों को अपनाया ।
पूंजीवाद के नये इतिहास के बहुत सारे लेखक ऐसे भी रहे जिन्होंने उदारवाद की इस धारा का विरोध करते हुए गुलामी और पूंजीवाद के बीच रिश्ते पर जोर दिया । इसके बावजूद उनके विश्लेषण में मार्क्सवाद की समझ चलताऊ है । अमेरिका में मजदूर वर्ग के समाजवादी आंदोलन ऐतिहासिक तौर पर कमजोर रहे हैं इसलिए मार्क्सवाद की यहां की बौद्धिकता में गहराई कम रही है । ऊपर जिन यूजीन जेनोवीज का नाम आया है उनके समाजशास्त्र में पूंजीवाद का मतलब मुक्त मजदूर और दासप्रथा में मुक्त मजदूर नहीं था इसलिए दासता और पूंजीवाद भिन्न हैं । इस तरह की समझ से दरिद्र सिद्धांत और गलत इतिहास का जन्म होता है । वे दक्षिणी प्रांतों के गुलाम मालिकों को प्राक पूंजीवादी शासक वर्ग कहते हैं । उनका यह भी कहना है कि गुलाम कामगार स्थिर पूंजी थे इसलिए परिभाषा के अनुसार अतिरिक्त मूल्य नहीं पैदा कर सकते । यह भोंड़ा द्वंद्ववाद है जो विश्लेषण की सामग्री पर बाहरी नियम लाकर थोप देता है । औपचारिक समाधान के पक्षधरों को इससे जो भी आकर्षण और मदद मिले ऐसे सिद्धांत से जीवंत इतिहास नहीं बना करता । इसी तरह वाल्टर जान्सन का दावा है कि मार्क्स के नाम से जुड़ी बौद्धिक परम्परा में गुलामी और पूंजीवाद को अलग समझा जाता है । उनका यह दावा मार्क्स, रोजा और लेनिन के लेखन से मेल नहीं खाता । न केवल इतना बल्कि इससे कैरीबियाई मार्क्सवाद की परम्परा की अवमानना भी होती है । सी एल आर जेम्स, सिल्विया विंटर और एमी सेजारे जैसे इन सिद्धांतकारों ने न केवल नयी दुनिया कीगुलामी को पूंजीवादी कार्यपद्धति का अंग माना बल्कि उन्होंने उपनिवेशवाद और नस्लवाद को विश्व पूंजीवाद का घटक माना । अगर इस परम्परा को नजरअंदाज किया गया तो यह कहने वाले मिलते रहेंगे कि मार्क्सवादी इतिहासकार गुलामी को पूंजीवाद मानने से इनकार करते हैं तथा मार्क्सवाद गुलामी और पूंजीवाद को परस्पर विरोधी उत्पादन पद्धति मानता है । सबूत इस तरह के दावों का खंडन करते हैं । इनसे अमेरिकी बौद्धिकता की उस धारा का अज्ञान जाहिर होता है जिसमें मार्क्सवादी आलोचना सिद्धांत और वैश्विक अश्वेत क्रांतिकारी परम्परा आते हैं । इसका ही समाहार काले और लाल के मिलन में हुआ है । किताब में इन बहिष्कृत परम्पराओं से प्रेरणा ली गयी है ।
उनसे अंतर्दृष्टि लेकर नयी दुनिया की गुलामी और विश्व पूंजीवाद के गहन अंतर्संबंधों की छानबीन इसमें की गयी है । ऐतिहासिक भौतिकवाद की भी उस धारा से इसमें मदद ली गयी है जो ऐतिहासिक समय को एकरेखीय नहीं मानता और उसकी जटिल गति को मान्यता देता है । सौ साल हो गये जब असमान और संबद्ध विकास की प्रक्रिया का मार्क्सवादी विवेचन हुआ था । इस सोच के अनुसार अलग अलग ऐतिहासिक कालखंड से जुड़े सामाजिक रूप एक साथ मिलकर जटिल लेकिन एकीकृत इतिहास का निर्माण करते हैं । इसके बावजूद नासमझ विद्वान ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम पर एक के बाद एक के क्रम में भिन्न भिन्न समाजों की एकरेखीय गति को ही दुहराते रहते हैं । इसी तरह की समझ से कुछ अमेरिकी इतिहासकारों का कहना है कि मार्क्स के मुताबिक दासप्रथा आदिम पूंजी संचय के प्रचीन युग से संबद्ध है । ऐसा कहकर वे मार्क्सवाद की भ्रामक छवि का पुनरुत्पादन करते हैं ।
सिद्ध
है कि पूंजीवाद के राजनीतिक अर्थशास्त्र की मार्क्सी आलोचना में एकाधिक समयों की
अंतर्विरोधी एकता है । इसमें एक ओर तात्कालिक उत्पादन का एकरेखीय समय है तो उसके
साथ ही परिचलन का चक्रीय समय भी मौजूद है । इनके साथ ही व्यवस्था के पुनरुत्पादन
के दौरान आपस में टकराते समयों की संकटग्रस्त विस्फोटक एकता भी बनी रहती है । इसी
को असमान और संबद्ध विकास कहा जाता है । पूंजी की यही जटिलता होती है जिसमें
पुराने के साथ नया और प्राक आधुनिक के साथ आधुनिक भी जुड़ा रहता है । इसी जटिलता की
वजह से विकास में एकरेखीयता नहीं होती और आधुनिक के साथ मध्ययुगीन भी मौजूद रहता
है । इसी समझ के साथ सी एल आर जेम्स ने कैरीबियाई प्लांटेशन को आधुनिक पूंजीवाद की
अग्रिम चौकी कहा था । उनकी नजर में गुलामी कोई प्राचीन अवशेष नहीं थी बल्कि आधुनिक
व्यवस्था अपने लाभ हेतु इस अति प्राचीन सामाजिक संबंध को संरक्षण दे रही थी । यहां
आकर सिद्धांत और पद्धति के सिलसिले में लेखक ने कुछ नये सूत्र दिये हैं ।
उनकी यह किताब ऐतिहासिक भौतिकवाद को ऐसा शोध कार्यक्रम मानती है जिसका मकसद नया ज्ञान पैदा करना है । इसके लिए विषयानुकूल नयी धारणा बनानी होगी। पहले से स्थापित मान्यताओं को दुहराने से काम नहीं चलेगा । इसके तहत गवेषणा के लिए जिस विषय को चुना गया है हेगेल के मुताबिक उसके स्वतंत्र जीवन के सामने समर्पण करना होता है । शोधकर्ता शोध की सामग्री में अपने आपको डुबा देता है । इससे अलग किसी अन्य पद्धति को अपनाने का मतलब है मानव अनुभव के आगार के प्रति जिम्मेदारी न होना । इसीलिए किताब के आरम्भिक अध्यायों में ब्रिटेन के कैरीबियाई उपनिवेशों और अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों में समेकित गुलाम प्लांटेशन के महत्वपूर्ण मौकों की पड़ताल की गयी है । बाद के अध्यायों में उन धारणाओं को प्रस्तुत किया गया है जो इतिहास के सामाजिक तर्क पर रोशनी डालती हैं । ई पी थाम्पसन की तरह लेखक ने भी धारणा और साक्ष्य के बीच संवाद के जरिए सामाजिक प्रक्रिया के ऐतिहासिक तर्क का विवेचन किया है । उनका यह संवाद सचमुच दोतरफा है । साक्ष्य के संदर्भ में धारणाओं को गहराई और नयी शक्ल मिलती रही है । इसी तरह तथ्यों के ऐतिहासिक अर्थ समूची इतिहास प्रक्रिया लायक नयी धारणाओं के सहारे ही प्रकट होते हैं । सिद्धांत और इतिहास के बीच यह दोतरफा संवाद आवश्यक होता है ताकि सिद्धांत से जी चुराने वाले आनुभविक इतिहास और जीवन रहित अमूर्तन पर आधारित सैद्धांतिक रूपवाद से बचा जा सके ।
इसके लिए जरूरी होता है कि नयी धारणा ऐतिहासिक साक्ष्य के लिए मुफ़ीद तो हो ही, सैद्धांतिक रूप से सटीक भी हो । प्रूदों के बारे में मार्क्स ने कहा कि द्वंद्ववाद जब नयी कोटियों के जन्म और विकास की मांग करता है तो वे इसमें अक्षम हो जाते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि सामाजिक जीवन की जटिल गति लायक नयी कोटियों का निर्माण समस्त आलोचनात्मक ऐतिहासिक शोध हेतु आवश्यक है । इस मामले में लेखक ने अमेरिका में नस्ल और रंगभेद के विनाश संबंधी मार्क्स के अपेक्षाकृत उपेक्षित लेखन को सिद्धांत और राजनीति में ऊंचाई देने की जरूरत महसूस की है । उनका दावा यह नहीं है कि मार्क्स द्वारा कही गयी बातों को ही वे प्रस्तुत कर रहे हैं । उनका बस यही कहना है कि इस विषय के विश्लेषण के लिए उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद की ही कुछ धारणाओं को विकसित किया है । इन्हें धारणा और साक्ष्य के बीच संवाद के ईमानदार प्रयास की तरह देखा जाए ।