Monday, August 29, 2022

तमस: भीष्म साहनी की सर्वोत्तम उपलब्धि

 

               

                                                

हमारे देश में जब भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की बात होगी भीष्म साहनी के उपन्यास तमस का जिक्र जरूर आयेगा । स्वाधीनता की पचहत्तरवीं सालगिरह में इसकी याद की एक वजह यह है कि स्वाधीनता के साथ ही हमें देश का विभाजन भी मिला था । भीष्म साहनी ने अपनी आत्मकथा में बताया है कि इसका लेखन विभाजन के बाद तत्काल नहीं, बहुत बाद में महाराष्ट्र के भिवंडी दंगे के बाद के मंजर को देखकर हुआ । प्रेरणा स्वाधीनता के बाद जारी दंगों में से एक से मिली, कहानी भारत विभाजन के समय की है और उसका फिर से पाठ हम तब कर रहे हैं जब सांप्रदायिक विभाजन गहरा रहा है । इस तरह यह कहानी पचहत्तर सालों में फैली हुई है जिस पूरे दौरान कभी तेज, कभी मद्धम जारी घटनाक्रम की अनुगूंज इसमें सुनी जा सकती है । विभाजन की कहानी को इतने समय बाद सुनाने से लेखक को सुविधा मिल गयी है कि वह स्मृतियों को अखंड कथाप्रवाह का रूप दे सके । इसी वजह से इसकी कलात्मक खूबियों का जिक्र भी जरूरी है जिनके सहारे उपन्यासकार ने पाठक पर भरपूर प्रभाव छोड़ने वाले कथानक की रचना की है ।

इस रचना में विरोधी तत्वों के समक्षीकरण की जबर्दस्त भूमिका है । कथा का समय वह है जब हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन की प्रमुख चालक राजनीतिक शक्ति यानी कांग्रेस लगभग थकान की अवस्था में आ चुकी थी । हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के माहौल में ये संगठन ही सक्रिय थे, कांग्रेस निष्क्रिय कारक बनकर रह गयी थी । सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और स्वतंत्रता आंदोलन का मुखामुखम ही उपन्यास की घटनाओं को आपस में जोड़ता है । आश्चर्य की बात कि खुद भीष्म साहनी उस समय कांग्रेस में भरपूर सक्रिय थे लेकिन यथार्थ के प्रति उनकी निष्ठा ही है जिसके चलते वे उपन्यास में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के समक्ष कांग्रेस की अप्रासंगिकता को देख और दिखा पाये । उपन्यास दो खंडों में है । पहला खंड शहर पर केंद्रित है और दूसरा खंड देहात पर । दोनों ही खंडों में घटनास्थल बहुत छोटा है । समूचे वातावरण का प्रतिनिधित्व करने के लिए उन्होंने सचेत रूप से इन स्थानों को चुना है । घटनाओं के कोलाज को आपस में पिरोकर उन्होंने देश के त्रासद विभाजन की कथा बुनी है । इसके प्रत्येक दृश्य पर उनकी मेहनत साफ देखी जा सकती है ।

दोनों खंडों के केंद्र में दो जगहें हैं जिनके इर्द गिर्द उसका कथानक घूमता है हालांकि किसी भी रचना की तरह इसमें भी पर्याप्त स्वर वैविध्य है । पहले खंड में नत्थू द्वारा सुअर का मारा जाना तो दूसरे खंड में गुरुद्वारा की भीड़ ने लगभग केंद्रीय भूमिका निभायी है । इन दोनों दृश्यों को बुनने में भीष्म साहनी ने कुशल कारीगर जैसी सावधानी का परिचय दिया है । पहले दृश्य में सुअर को मारने के परिश्रम की पृष्ठभूमि में नत्थू को जिस तरह लगातार पत्नी की याद आती रहती है उससे इस कृत्य की अमानवीयता घनीभूत होकर प्रकट होती है । उसके इस सहज मानवीय सुख से विरत करने वाली ताकत पांच का नोट है जिसे बार बार नत्थू महसूस करता रहता है । सहज सुख की इच्छा और धन के लोभ के बीच ऐसे अंतर्द्वंद्व की बहुत कम मिसालें कथा साहित्य में नजर आती हैं । इस द्वंद्व में धन की जीत भी बहुत मानीखेज है ।

भीष्म साहनी की भाषा अलग से ध्यान खींचती है । उनके पंजाबी होने से भाषा में उसका असर स्वाभाविक है लेकिन भीष्म साहनी टकसाली हिंदी गद्य में पंजाबी के प्रवेश को सचेत रूप से रोकते महसूस होते हैं । उनके कथा साहित्य का परिवेश आम तौर पर औसत शहरी मध्य वर्गीय होता है । उसी माहौल के अनुरूप उनकी भाषा भी होती है । उनके इस प्रयास पर उलझन भी होती है कि मनुष्यों के इतने सहज जीवन का इतने लम्बे समय से कैसे चित्रण किया जा सकता है लेकिन भीष्म साहनी की यही खूबी है । इस उपन्यास के यथार्थ में जो बीहड़पन है उसके चलते उनका यह भाषिक संयम अनेक जगहों पर टूटा है । स्थितियों की विरूपता को वे संयमित भाषा से चित्रित भी नहीं कर सकते थे ।

इसका सबसे बड़ा सबूत दंगो का माहौल बनते ही व्यक्ति की विशेषता की समाप्ति और उसकी सामुदायिक पहचान के प्रमुख हो जाने की त्रासदी को व्यक्त करने के लिए सिख और मुस्लिम समुदाय द्वारा एक दूसरे के सदस्यों को दिया गया नाम है इनमें मुस्लिम समुदाय के लोगों को जिस संज्ञा से पुकारा गया है वह तो अनौपचारिक भाषा के लिए बहुत आम हो गया है लेकिन सिख समुदाय के प्रति नफ़रत को जाहिर करने के लिए कराड़ जैसे शब्द का प्रयोग शायद ही कहीं और हुआ हो यह केवल कुछ शब्दों के प्रयोग का मामला नहीं है, इन शब्दों के प्रयोग से भीष्म साहनी अपने पात्रों के अचेतन में प्रवेश करते हैं कहते हैं कि वर्जित और अश्लील शब्द किसी भी व्यक्ति के अभ्यंतर को जानने का सबसे प्रामाणिक स्रोत है मिलान कुंदेरा ने कहा कि लेखक अपनी मातृभाषा में ही अश्लील हो सकता है इस तरह भीष्म साहनी के आम भाषा व्यवहार से यह विचलन पाठक के लिए उसके सहारे व्यक्त यथार्थ के कोने अँतरों को देखने का जरिया बन जाता है              

आजादी के साथ मिले बंटवारे और उस समय के सांप्रदायिक माहौल के चित्रण में सरहद के दोनों ओर के लेखकों और उनकी धार्मिक संबद्धता से साथ अंतर जाता है यह संयोग नहीं है कि उपन्यास की एक अकारण हत्या का आरोपी मुसलमान है इसी तरह कृष्णा सोबती कीसिक्का बदल गयामें भी उत्पीड़ित स्त्री हिंदू है विभाजन को देखने के नजरिये में यह अंतर आम तौर पर स्पष्ट रहता है आम मानवीय करुणा की भावधारा के भीतर के इस कटु यथार्थ से भी जी नहीं चुराना चाहिए हम सभी जानते हैं कि हमारे मनोभावों का भी समाजशास्त्र होता है  

उपन्यास की सबसे बड़ी कलात्मक खूबी विभाजन के माहौल का चित्रण है उपन्यास में देश का विभाजन हुआ नहीं है लेकिन उसके आधार पुख्ता हो चुके हैं । देशों के बीच सरहद की दीवार उठने से पहले विभाजन सामाजिक ताने बाने को बदलता है । इसका बेहद जीवंत चित्रण करते हुए लेखक ने दर्ज किया है ‘मुहल्लों के बीच लीकें खिंच गयी थीं, हिन्दुओं के मुहल्ले में मुसलमान को जाने की अब हिम्मत नहीं थी, और मुसलमानों के मुहल्ले में हिन्दू-सिख अब नहीं आ-जा सकते थे’ । माहौल को जिंदा कर देने में सक्षम इस बिम्बात्मक भाषा को गाहे बगाहे पूरे उपन्यास में देखा जा सकता है । यह भाषा आबादियों के बीच के उस बंटवारे को जीवंत कर देती है जिसके बिना भारत का बंटवारा सम्भव नहीं था । चरज नहीं कि विभाजन के पहले उपन्यास के ऐसे पात्र, जरनैल की हत्या हो जाती है जो विभाजन के विरोध में गांधी के निश्चय का साकार रूप है । उसकी हत्या मानो गांधी की हत्या का पूर्वाभास है । भीष्म साहनी ने इस पात्र को अतिशय समर्पण के साथ खड़ा किया है । जरनैल उन सभी लोगों का प्रतिनिधि बन जाता है जो पागलपन के उस वातावरण में भी मनुष्यता की जीत का सपना पाले हुए थे । इनकी हत्या के बिना देश का विभाजन सम्भव नहीं था । वैसे भी इतना अप्राकृतिक विभाजन दुनिया में शायद ही कहीं हुआ होगा । उस जमाने में किसी भी होशमंद मनुष्य को इसके हो जाने का यकीन कतई नहीं था । मानव इतिहास की यह बड़ी खूबी है कि वह लगातार अपवादों को जन्म देता रहता है फिर भी सहज बोध उसे स्वीकार नहीं करने देता । इस मामले में भी यह उपन्यास हमारे देश के वर्तमान हालात की सचाई को नंगी आंखों से देखने की अपील करता है ।

हमने पहले ही कहा कि किसी भी बड़ी रचना की तरह इस उपन्यास में बहुस्वरीयता है । सहज जीवन जीने वाले सामान्य पात्रों के संप्रदायीकरण से भी त्रासद परिघटना किशोरों का संप्रदायीकरण है । इस बात पर भी यकीन न करने की रवायत रही है और बार बार हमारे इस भोलेपन को समाज की जमीनी हकीकत झुठला देती है फिर भी प्रबुद्ध जन किशोरों के इस कायापलट को स्वीकार नहीं करना चाहते । प्रबुद्ध जन के मुकाबले किशोर मनोविज्ञान की बेहतर समझ रखने के कारण ही सांप्रदायिक तत्व किशोर मानस को प्रदूषित करने पर सबसे अधिक ध्यान देते हैं । उपन्यास हमसे इस सच को देखने की गुजारिश करता है कि सांप्रदायिक सोच का प्रसार किसी भी हदबंदी को मंजूर नहीं करता ।

समस्या की पूरी गहराई को उभारने के लिए भीष्म साहनी ने जिन पात्रों का भी चुनाव किया है उनमें से कोई भी टिपिकल या इकहरे नहीं है, सभी पात्र किसी न किसी दुविधा के साथ मौजूद हैं । अपने देश के पात्र तो भीष्म जी के जाने समझे थे इसलिए इसमें उनको कोई खास मुश्किल न आयी होगी लेकिन आश्चर्य तब होता है जब अंग्रेजी प्रशासन के प्रतिनिधि रिचर्ड को भी इतनी ही जटिलता और संवेदना के साथ चित्रित देखते हैं । लेखक के इस सचेत चुनाव की वजह भी शायद यही है कि वे सामान्य लोगों पर उनके साथ जुड़ी अस्मिता और विचारधारा का असर दिखाना चाहते थे । रिचर्ड जैसे इस संवेदनशील पात्र को भी हम बोलते हुए सुनते हैं कि ‘यहां के लोग कुछ नहीं जानते । ये वही कुछ जानते हैं जो हम इन्हें बताते हैं ।’ इस वाक्य से भी अधिक मारक वाक्य इसके बाद का है ‘ये लोग अपने इतिहास को जानते नहीं हैं, ये केवल उसे जीते भर हैं ।’ हमारे देश में इतिहास के दक्षिणपंथी महिमागान की विडम्बना पर इससे अधिक क्या कहा जा सकता है । रिचर्ड देश की प्रशासनिक सेवा का अधिकारी है और यह कोई दबी छिपी बात नहीं कि आजाद देश में अंग्रेजी राज जिन छायाओं की मौजूदगी से याद किया जाता है उनमें नौकरशाही का मकाम सबसे ऊंचा है । इस सेवा के नायकों के हाल लेखक के मुख से सुनना अच्छा होगा । ‘यह विचार कि हमारा आचरण हमारी मान्यताओं के अनुरूप होना चाहिए, एक ऐसा भोंड़ा आदर्शवाद है जिससे सिविल सर्विस में नाम लिखाते ही अफ़सर अपना पिण्ड छुड़ा लेता है ।’ मनुष्य को संवेदनहीन बना देने वाली यह मशीन वास्तव में शोषण की व्यवस्था को चलाने का सबसे कारगर पुर्जा अकारण साबित नहीं हुई है । शासन करने वालों की जिस खूबी को उसके मुंह से लेखक ने जाहिर करवाया है वह स्वतंत्र भारत में तो कायम रही ही, फिलहाल सबसे अधिक प्रत्यक्ष है । ‘हुकूमत करनेवाले यह नहीं देखते कि प्रजा में कौन सी समानता पायी जाती है, उसकी दिलचस्पी तो यह देखने में होती है कि वे किन-किन बातों में एक-दूसरे से अलग हैं ।’ जब कोई संवेदनशील मनुष्य इतना हृदयहीन पुर्जा हो सकता है तो जो अफ़सर पुर्जा मात्र हैं उनकी क्या बिसात!   

उपन्यास का एक और अल्पदेखा प्रसंग ध्यान देने लायक है । दंगे के बाद राहत केंद्र खुले हैं और उनमें काम करने वाला एक कार्यकर्ता उपन्यास के अत्यंत महत्वपूर्ण अवांतर का प्रतिनिधित्व करता है । भीष्म साहनी ने आत्मकथा में बताया है कि विभाजन के बाद उनको ऐसा ही काम दिल्ली में करना पड़ा था । उनके इस काम की संवेदनहीन मशीनी प्रकृति इस मामले में उतर आयी है । इस प्रसंग की खूबी पद्धति विज्ञान संबंधी भेद से जुड़ी है । सरकारी काम और उसी तरह के दिमाग से सामाजिक समस्या के बारे में सोचनेवाले लोग आंकड़ों को सबसे पवित्र और भरोसे की चीज मानते हैं । इस पद्धति का अहंकार देखिये ‘आप लम्बी हांकने लगते हैं, सारी रामकहानी सुनाने लगते हैं, मुझे रामकहानी नहीं चाहिए, मुझे केवल आंकड़े चाहिए’ । इन ठोस आंकड़ों की कारस्तानी भी भीष्म जी ने अच्छी तरह जाहिर की है । ‘आंकड़ोंवाले बाबू ने अपनी जरूरत की चीज लिख ली थी । बाकी सब भूसी थी’ । लेकिन इस भूसी की ताकत यह थी कि ‘कोई-कोई आपबीती उसे बांध लेती, उसका दिल और दिमाग जकड़ लेती’ । ध्यान दीजिये केवल दिल नहीं, दिमाग भी । शायद वे कहना चाहते थे कि मानव समाज केवल आंकड़ों से नहीं चलता । इस प्रसंग से रामचंद्र शुक्ल की बात याद आ जाती है जिसमें वे देशभक्ति को देश की प्रकृति और मनुष्यों से लगाव से जोड़कर देखते हैं और इसे आंकड़ों की भाषा से अधिक कारगर बताते हैं । बहुत सम्भव है कि साम्प्रदायिकता की समझ के मामले में भी भीष्म साहनी इस बहस को उठाना चाहते रहे हों ।

इस उपन्यास में धार्मिक-साम्प्रदायिक विभाजन के मामले में पारम्परिक धर्मनिरपेक्ष सोच की अभिव्यक्ति तो हुई ही है लेकिन इस अभिव्यक्ति को जिस कलात्मकता के साथ प्रकट किया गया है उसके कारण इतने समय बाद भी इस उपन्यास की प्रासंगिकता बनी हुई है । उसके प्रभाव में अब भी कोई कमी नहीं आयी है । इसका एक कारण प्रमुख उस माहौल की निरंतरता भी है ।