Friday, August 7, 2026

चेखव से अनुराग

 

          

                     

(पुस्तक वार्ता के संपादक भारत भारद्वाज ने किताब के बारे में लिखने को कहा तो जो लिखा उसे 2009 के मार्च-अप्रैल अंक में जगह मिली थी । उसका ही थोड़ा संशोधित रूप पेश है ।)

गाजीपुर जिले के सुल्तानपुर गांव की मेरी दुनिया में दो लोग रोशनी लेकर आते थे- मेरे बड़े भाई अवधेश प्रधान तब काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ रहे थे और गांव पर रखी उनकी पत्रिकाओं का ढेर मेरी पढ़ने की भूख  मिटाता था तथा दूसरे थे चचेरे भाई आनंद प्रधान जो पिता के साथ पतरातू रहते थे, हजारीबाग में पढ़ते थे और जब भी गांव आते तो अपने साथ हिंदी की ढेर सारी नयी पत्रिकाएं लेकर आते । इन्हीं लोगों के जरिए मेरे जीवन में चेखव का प्रवेश हुआ । ‘एक क्लर्क की मौत’ की आखिरी पंक्तियों की खूबसूरती और तांगेवाले का अपने घोड़े के गले लिपटकर अपना दुख बताने की मजबूरी मेरे बालमन को भिगो देती । दसवीं कक्षा उत्तीर्ण होने के बाद आगे पढ़ने बनारस आ गया ।

बीसवीं सदी का अस्सी का वह दशक हिंदी क्षेत्र के सांस्कृतिक आंदोलन में वामपंथ की गैर संसदीय जुझारू धारा के उत्थान का समय था । बिहार के किसानों की सभाओं में गोरख पांडे के साथ लाखों लोग ‘हिलेले झकझोर दुनिया’ गाते । बनारस में ‘अभियान’ नामक नुक्कड़ नाटक की टीम बनी । नाटक करना सिखाने के लिए दिल्ली से शम्सुल इस्लाम आये थे । हमारी नाटक टीम में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यापक रामनारायण शुक्ल और अनेक विद्यार्थी थे । तब की अनेक मित्रताएं अब भी बनी हुई हैं । टीम का एक पसंदीदा नाटक चेखव की कहानी ‘गिरगिट’ के आधार पर तैयार किया गया था । कमसिन होने के कारण मैं इसमें कुत्ते की भूमिका निभाता था । पुलिसिया नौकरशाही के आतंक को मारक व्यंग्य के जरिए चेखोवियन हास्य के साथ इसमें जिस तरह तहस नहस किया गया है, वह अपने आप में मिसाल है ।

कुलवक्ती क्रांतिकारी राजनीति का फैसला किया तो पूर्वाभ्यास के बतौर लम्बे अरसे के लिए गांव आया । गांव में भाकपा-माले के कार्यकर्ताओं का आना-जाना शुरू हो चुका था । पिछड़ी जातियों और ब्राह्मण परिवारों के कई नौजवान उनके साथ थे । इन्हीं नौजवानों को लेकर नाटक टीम बनायी गयी । टीम के पास क्रांतिकारी गीत थे और था ‘गिरगिट’ नाटक । गांव के पारम्परिक शक्ति केंद्रों को यह पहल नागवार गुजरी । उन्होंने हमारे दल का उपहास करते हुए इसे गिरगिट पार्टी कहना शुरू किया । वे दिन भी क्या दिन थे ! कोटवां-नरायनपुर में सामंतों और पुलिस के भय से एक भी आदमी नाटक देखने नहीं आया लेकिन नाटक खत्म हो जाने के बाद दलितों की बस्ती में शानदार दावत हुई । बरेसर में नाटक के व्यंग्य से चिढ़कर एक सिपाही ने थप्पड़ मारा । बाराचवर में अंबेडकर जयंती पर कार्यक्रम के बाद रात के अंधेरे में छिपकर दलित जाति का एक इंसपेक्टर हमसे मिलने आया । मुहम्मदाबाद में बस से उतरते हुए एक दलित नर्तक ने हाथ मिलाते हुए दो रुपए का सिक्का मुट्ठी में रहने दिया । राजनीति और सांस्कृतिक सक्रियता का मेल कराने का माध्यम चेखव बनते रहे ।

गांव में भूमिहार जाति के सामंतों का दबदबा था । उन्होंने रामलीला में अभिनय के लिए टीम के साथियों पर दबाव बनाना शुरू किया । रामलीला में जो नाटक होते उनमें निम्न कहाने वाली जातियों के लड़कों को स्त्रियों की या गौण पात्रों की भूमिका निभानी होती । इसी वजह से उनमें भाग लेने का सवाल मूल्यों की लड़ाई बन गया । बड़ी तनातनी हुई । बहरहाल वह दौर उत्तर प्रदेश में पुलिस बल को अबाध शक्ति देकर समाज को कथित तौर परअपराधमुक्तकराने की दीर्घकालीन राजनीति की शुरुआत का था । भारी पैमाने पर फ़र्ज़ी मुठभेड़ हो रही थी । लिहाजा हमारा नाटक और पुलिस की मनमानी का विरोध करने वाली नागरिक समाज की ऐसी ही कुछ गतिविधियां प्रशासन के लिए सिरदर्द बनने लगीं । तीन थानों की पुलिस ने मिलकर औपन्यासिक कल्पना का परिचय देते हुए सात लोगों के साथ ऐसी मुठभेड़ की कथा लिखी जिसमें केवल एक व्यक्ति पकड़ा गया, शेष सभी भाग गये थे । सालों की मुकदमेबाजी के बाद सभी निर्दोष साबित हुए लेकिन टीम बिखर गयी । जिंदगी की भागमभाग में चेखव का साथ लम्बे समय के लिए छूट गया । कभी कहीं कोई मौका मिला तो कुछ देख सुन लिया । इस बीच चेखव की दुनिया गायब नहीं हुई । वह दोमुंहे बौद्धिकों और बेलगाम तथा हास्यास्पद नौकरशाहों की मार्फ़त बार बार उपस्थित होती रही ।

अध्यापकीय जीवन की शुरुआत काफ़्काई तरीके से हुई । जिस कालेज में नियुक्ति का आदेश उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग ने थमाया वहां पहुंचने के लिए कस्बे में उतरा तो किसी को पता नहीं था कि वह है कहां । किसी एक व्यक्ति ने बताया कि मंडी समिति जाइए । वहां पता लगा कि कल ही वह इंटर कालेज के बगल में चला गया है । वहां गये तो एक इमारत में ताला लगा था । प्रिंसिपल और क्लर्क का इंतजार सामने की चाय दुकान में बैठकर किया । प्रिंसिपल किसी अन्य कालेज से सेवानिवृत्त होकर जनसेवा करने आये थे । क्लर्क स्थानीय चीनी मिल में कर्मचारी थे । नियुक्ति जिलाधिकारी के कार्यालय में होनी थी । कालेज को सरकारी अनुदान नहीं मिला था इसलिए वेतन का भुगतान चीनी मिल से होना था । इस तरह वह कालेज था और नहीं भी था । हम अध्यापक थे और नहीं भी थे । हमें वेतन मिलता था और नहीं भी मिलता था । ऐसी अजीब दुनिया में पुराने मित्र आलोक श्रीवास्तव आये और वर्जीनिया वुल्फ़ की किताब ए रूम आफ़ वनस ओनअनुवाद हेतु दे गये । उसके प्रकाशन के बाद चेखव की जीवनी लिखने का प्रस्ताव किया तो पुरानी मुहब्बत याद आ गयी और उत्साहपूर्वक झट से राजी हो गया । उनमें व्यावसायिक धूर्तता कम महसूस हुई ।

इस बात का जिक्र जानबूझकर कर रहा हूं । रामविलास शर्मा ने निराला के प्रकाशकों पर व्यंग्य करते हुए लिखा कि निराला की किताबें बिकती नहीं थीं लेकिन उनके प्रकाशकों की कोठियां खड़ी हो जाती थीं । हिंदी के अधिकांश प्रकाशक कोशिश करते हैं कि किताबों के सर्वाधिकार उनके पास सुरक्षित रहें ताकि लेखक कहीं और से दुबारा छपा न सके । इसके सहारे वे पाठकों से मूल्य तो अधिक वसूलते हैं लेकिन अपने मुनाफ़े से लेखक अथवा अनुवादक को बढ़ा हुआ मेहनताना नहीं देते । इसके विपरीत आलोक ने बिस्सोवा शिम्बोर्स्का की कविताओं के अनुवाद का सर्वाधिकार अनुवादक को दिया था । तकरीबन अंग्रेजी स्रोतों का सहारा लेकर लिखी जीवनियों का भी सर्वाधिकार उन्होंने लेखकों को दिया था । इन्हीं कारणों से राजी हुआ तो उन्होंने आठ सौ पृष्ठों की अंग्रेजी में लिखी चेखव की एक जीवनी की फोटोप्रति सौंपी । हंस में लीदिया एविलोवा के संस्मरणों का हिंदी अनुवाद पढ़ चुका था । आलोक की दी हुई जीवनी पढ़कर चेखव की दूसरी छवि मन में बनी । शंका समाधान के लिए कुछ और सामग्री खोजी । संयोग से कृष्णमोहन सिंह के पास प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मास्को से छपीअंतोन चेखव ऐंड हिज टाइम्सअंग्रेजी में मिल गयी । उदारता के साथ उन्होंने दे दी । अब भी वह पास रखी है । पुरानी दोस्त शुभ्रा नगालिया रूसी भाषा की जानकार हैं इसलिए उनसे भी बहुत सारे मुद्दों पर सलाह मशविरा किया । नाटककार राजेश कुमार तब शाहजहांपुर में थे । उनसे चेखव के नाटकों का संग्रह मिला जिसकी भूमिका राजेंद्र यादव ने लिखी थी । उनकी किताबएक काल्पनिक इंटरव्यूकी सूचना अवधेश प्रधान ने दी । राजेंद्र यादव को पत्र लिखा तो तत्काल जवाब देकर उन्होंने अपनी उन किताबों के नाम बताये जिनमें चेखव पर उनका लिखा संग्रहित था । पुस्तक मेले से ये किताबें लीं । कथाकार हृदयेश ने कहानियों का संग्रह उपलब्ध कराया । आलोक ने पुष्पा भारती की पुस्तकशुभागतामें से चेखव वाला अंश भेजा । इतनी तैयारी के बाद लिखना शुरू किया तो पारिवारिक समस्याओं ने आ घेरा ।

ये नितांत व्यक्तिगत थीं लेकिन इनके कारण दो बार लिखना स्थगित करना पड़ा । कालेज से मुक्ति मिली तो दूसरी झंझट में जा पड़ा । महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने कालेज से आजाद तो किया लेकिन कोई राहत नहीं मिली । लाभ यह रहा कि मुम्बई आकर आलोक से मिला और पहला मसौदा दिखाया । दोनों को यह संतोषजनक नहीं लगा । गोर्की और ओल्गा के संस्मरणों का अनुवाद किया । इनसे चेखव के जीवन के बारे में मेरी धारणा पुष्ट हुई । चेखव की चिट्ठियों के बारे में निर्मल वर्मा का लेख देखा । मसौदे में थोड़ा संशोधन किया लेकिन तब तक वर्धा से विदाई की नौबत आ गयी ।

लौटकर दिल्ली आया तो शुरू में व्यस्तता रही । बाद में इग्नू में सलाहकार का रोजगार मिला तो कुछ राहत मिली । फिर एकाध अध्याय लिखे तब तक सिलचर जाने का बानक बन गया । स्थिर होकर पूरी पांडुलिपि देख गया । लिखना पूरा किया । आलोक ने टंकित प्रति भेजी । उसे अवधेश प्रधान को दिखाया । पढ़कर अनेक संशोधन उन्होंने खुद किये और सुधार के अनेक सुझाव दिये । साथ ही तोलस्तोय की जीवनी लिखने का भी परामर्श दिया जो दिमाग में अटका हुआ है ।

चेखव पर हिंदी में जो भी सामग्री मिली उसमें उनके जीवन को अत्यंत रंगीन बनाकर पेश किया गया था । मेरी धारणा अलग किस्म की थी । समयांतर में लीदिया एविलोवा के संस्मरण की एक समीक्षा शायद मस्तराम कपूर ने लिखी थी । उससे बहुत बल मिला । राजेंद्र यादव और पुष्पा भारती ने चेखव की जो चटपटी तस्वीर बनायी है उसका आधार लीदिया के ये संस्मरण ही हैं । इनसे समाज की चीरफाड़ करने वाली  चेखव की पारगामी नजर पाठक के सामने से ओझल हो जाती है । चेखव की सामाजिक आलोचना को अनदेखा करने की यह कोशिश नयी कहानी के दृष्टिकोण के मेल में थी । नयी कहानी ने समस्याओं को यौन कुंठा के इर्द गिर्द सीमित किया था । इसी किस्म का नजरिया चेखव के सिलसिले में भी अपनाया गया । इसके विपरीत चेखव के रूसी जीवनी लेखक लीदिया के संस्मरणों पर बहुत भरोसा नहीं करते । उनके सामने तोलस्तोय और गोर्की की ऊंचाई के कथाकार को समझने की चुनौती होती है । चेखव के समय के रूस मे नौकरशाही का उदय हो रहा था और उसमें अभिव्यक्त बुर्जुआ संस्कृति का पतन सबको प्रत्यक्ष था ।  चेखव के मारक व्यंग्य ने इसके भारी भरकम आवरण को चीरकर उसके छद्म को उजागर कर दिया था । इसीलिए महज कहानियां लिखकर भी उन्होंने महान उपन्यासकारों जैसा सम्मान और यश अर्जित किया था । उनकी जीवनी लिखने के लिए सबसे पहले उनकी इस छैला छवि से मुक्त होना जरूरी था ।

माशा और ओल्गा संबंधी उलझनों को समझने के लिए स्त्रियों की सहजबुद्धि पर भरोसा किया । इसमें सबसे अधिक सहायता पत्नी से मिली । हिंदी के अकादमिक जगत में संदर्भ सूची को बहुत ही पवित्र नजर से देखा जाता है । निकृष्ट लेखन को भी उससे गरिमा प्राप्त हो जाती है । इसके कारण शोध और सृजन एक दूसरे से अलग ही नहीं विरोधी भी बना दिये जाते हैं । इससे हिंदी का ऐसा भारी नुकसान हुआ है किमहाकवि सरल: व्यक्तित्व और कृतित्वजैसी पुस्तकें महत्व की होती जा रही हैं और उनके लेखक सम्मानित और पुरस्कृत होकर आदर्श बने घूम रहे हैं । शिक्षा और संस्कृति के विनाश में सत्ता की रुचि को इनसे खाद पानी मिल रहा है । निराला की साहित्य साधनामें कोई संदर्भसूची नहीं होने से उसे महत्वहीन समझने वाले विवेक को क्या ही कहा जा सकता है । संदर्भ सूची न होने के कारण ही त्रिपुरा के कुलपति ने इसे मामूली कहने की योग्यता भी दिखायी थी ।   

प्रकाशकों में व्यावसायिक धूर्तता का अभाव दुर्लभ होता जा रहा है । सर्वाधिकार की व्यवस्था ने लेखकों को बहुत लाभ नहीं पहुंचाया, प्रकाशक अलबत्ता धन्नासेठ बन बैठे । वे प्रकाशित और बिकी प्रतियों की मनमानी संख्या बताकर लेखक को नाममात्र की रायल्टी देते हैं । कई तो सर्वाधिकार भी लेखक को नहीं देते । भय होता होगा कि सनक में आकर लेखक किताबों को कापीराइट से मुक्त न कर दे । होना तो यह चाहिए कि अनुवाद पर भी अनुवादक का अधिकार हो क्योंकि उस विशेष रूप में वह अनुवादक की रचना है । शमशेर जी को जिन चीजों का अभाव खला था वे इतनी आसानी से सुलभ नहीं होनी ।