2026 में मंथली रिव्यू प्रेस से इयान आंगुस की किताब ‘मेटाबोलिक रिफ़्ट्स: कैपिटलिज्म’स एसाल्ट आन द अर्थ सिस्टम’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि धरती के समूचे तंत्र का विकास लम्बे समय में हुआ है और इसमें समुद्र, मिट्टी और वातावरण की भौतिक सामग्री और ऊर्जा की गति को नियंत्रित करने वाले अनेक चक्रों ने अपनी भूमिका निभायी है । इसमें सजीव तत्वों ने प्रत्येक चरण में महत्वपूर्ण कर्तव्य का पालन किया है । जब भी इसमें व्यवधान आया तो जीवों को अनूकूलन करना पड़ा । जिनके लिए बदलाव बड़े और तेज थे वे अनुकूलन नहीं कर सके और समाप्त हो गये । उदाहरण के लिए लाखों साल पहले ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण जब हवा में कार्बन डाइ आक्साइड बेतरह बढ़ गया और तापमान भी दोगुना हो गया तो धरती का 96 फ़ीसद जीवन नष्ट हो गया था ।
लगभग बारह हजार साल पहले हुए जलवायु
परिवर्तन के कारण शिकारी संग्राहकों की छोटी छोटी टोलियों में रहने वाले प्राणियों
को मौका मिला और उन्होंने कुछ स्थिर मौसम वाले इलाकों में खेती की शुरुआत की ।
इसके बाद बड़े और स्थायी समाजों का निर्माण हुआ जिसके चलते उन्हें स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक माहौल में
दबदबा कायम करने का मौका मिला । इसके बाद आंगुस सीधे पूंजीवाद पर आते हैं । इसमें
भी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जीवाश्म ईंधन की ताकत से उसके विस्तार ने पर्यावरण
पर मनुष्य के दबदबे को खासी तेजी दे दी । इसके कारण धरती पर जीवन के समर्थन की
व्यवस्था अभूतपूर्व रूप से कमजोर पड़ने लगी । आज गरमी, आग, बाढ़ और प्रदूषण संबंधी जो भी समस्या नजर आती है वह धरती
के दीर्घकालीन संकट की शुरुआत भर है । अगर बुनियादी बदलाव नहीं किये गये तो भविष्य
की तबाही इससे कई गुना भयंकर होगी ।
1861 में मार्क्स ने लिखा कि डार्विन
का विकास सिद्धांत मानव इतिहास के प्राकृतिक आयाम का आधार मुहैया कराता है । कुछ
वर्ष बाद जब उन्होंने अर्थशास्त्र पर शोध शुरू किया तो लिखा कि मिट्टी के उपजाऊपन
में गिरावट संबंधी जर्मन कृषि रसायनज्ञ का शोध सभी अर्थशास्त्रियों से अधिक महत्व
का है । कहा जा सकता है कि प्रकृति से मनुष्य के अलगाव के बारे में मार्क्स के
विचारों का आधार उक्त शोध था । इससे ही मार्क्सवादी पारिस्थितिकी और इकोसमाजवाद की
आधारभूमि बनायी जा सकती है । इससे बीसेक साल पहले ही मार्क्स और एंगेल्स ने अपने
भौतिकवादी दर्शन का खाका तैयार कर लिया था जिसके मुताबिक जीने के लिए मनुष्य को आस
पास से भोजन, हवा, पानी और अन्य जरूरी चीजों को हासिल करना होता है ।
मार्क्स ने कहा कि प्रकृति मनुष्य का अजैविक शरीर है । वह ऐसा आवश्यक अंग है जो
हमारे जैविकीय अंगों से अलग है । अगर मनुष्य को जीवित रहना है तो उसे प्रकृति के
साथ निरंतर का संवाद कायम करना होगा । उस समय तक मार्क्स चयापचय से अनजान थे लेकिन
भूतद्रव्य और ऊर्जा के निरंतर प्रवाह के बारे में तो गंभीरता से सोचना शुरू कर ही
दिया था जिससे धरती पर जीवन सम्भव होता है । समाज और प्रकृति के आपसी रिश्तों के
बारे में उनकी समझ में यही धारणा केंद्रीय भूमिका निभाती है । पूंजीवाद द्वारा इसी
रिश्ते पर हमले को वे देख पा रहे थे ।
कभी कभी शरीर में ऐसी बीमारी हो जाती
है जिसमें शरीर के अंग ही शरीर पर हमला कर देते हैं उसी तरह पूंजीवाद भी प्रकृति
का हिस्सा होने के बावजूद उस पर हमला करता है । धरती पर जीवन की समर्थक व्यवस्था
पर निर्भर होने के बावजूद वह इसे नष्ट करता है । जीवन चक्र में टूटन का यही सिद्धांत
मार्क्स ने विकसित किया जिसमें मुनाफ़े और वृद्धि पर केंद्रित पूंजीवादी व्यवस्था
धरती पर जीवन चलाने वाले प्राकृतिक चक्र में व्यवधान डालती है । हाल फिलहाल तक
पर्यावरण के बारे में सोचने और लिखने वाले मानते थे कि मार्क्स ने प्रकृति के बारे
में कुछ खास नहीं कहा है इसलिए वर्तमान पर्यावरणिक सरोकारों के लिहाज से उनका लेखन
प्रासंगिक नहीं है । इस मान्यता पर 2000 में छपी जान बेलामी फ़ास्टर की किताब ने
सवाल उठाया । तबसे ही पर्यावरण की समस्या पर मार्क्स की गवेषणा पर बातचीत शुरू हुई
और इसी क्रम में जीवन चक्र में टूटन की धारणा सामने आयी ।
किताब के पहले अध्याय में
पारिस्थितिकी के चिंतक के बतौर मार्क्स और एंगेल्स की उपयोगिता स्पष्ट की गयी है ।
साथ ही मार्क्सवाद को इस प्रसंग में खारिज करने वालों से बहस की गयी है । अन्य
लेखकों ने भी यह काम पहले किया है । लेखक का जोर तो मार्क्सवादी इकोसमाजवाद के
वैज्ञानिक आधार को जाहिर करने पर है । उन्होंने धरती पर जीवन को सम्भव बनाने वाले
दो सबसे महत्व के तत्वों पर पूंजीवादी हमले पर अधिक बल दिया है । लेखक ने इसके
बतौर कार्बन और नाइट्रोजन के चक्र का नाम लिया है । पहले भी उन्होंने लिखा था कि
इकोसमाजवाद की सफलता के लिए उसे बेहतर दुनिया की पवित्र आकांक्षा से अधिक होना
होगा । उसे सृष्टि के जन्म और विकास तथा बदलाव और मंजिल की ठोस वैज्ञानिक समझ पर
आधारित होना होगा । समाजवाद के निर्माण का तरीका और उसका स्वरूप इस बात से तय होगा
कि उसे किस तरह की धरती पर खड़ा किया जा रहा है । अगर हमारे कार्यक्रम और गतिविधि
का वैज्ञानिक आधार नहीं होगा तो दुनिया बदलने की हमारी सारी कोशिश व्यर्थ हो जाएगी
।
किताब के चार हिस्से हैं । पहले
हिस्से में जीवन चक्र में टूटन संबंधी सिद्धांत का विकास बताया गया है । इसे लेखक
ने मार्क्सवादी पारिस्थितिकी भी कहा है । इसके तहत शुरू के तीन अध्यायों में मार्क्स
और एंगेल्स के विचारों पर चर्चा के उपरांत ऐसे तीन अचर्चित समाजवादियों के विचारों की
छानबीन की गयी है जो इस क्षेत्र में आगे का काम करते हैं । तीसरे अध्याय में बताया गया
है कि दशकों तक इस पहलू की उपेक्षा के बाद हमारी वर्तमान सदी में मार्क्सवादी पारिस्थितिकी
के पुनरुत्थान में इन विचारों की केंद्रीय भूमिका हो गयी है ।
दूसरे हिस्से में धरती की चयापचयिक
व्यवस्था की परीक्षा प्राकृतिक विज्ञानों के परिप्रेक्ष्य से की गयी है । इसके तहत उन क्रांतिकारी
बदलावों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी का जायजा लिया गया है जिनके कारण
लाखों वर्षों में जैविकीय आवरण की रचना हुई । इसके बाद धरती की प्रणाली को समझाने में
जिन वैज्ञानिकों का योगदान है उनकी चर्चा की गयी है । इसके बाद उन बहुतेरे टूटनों का
जिक्र किया गया है जिनके कारण धरती की समूची व्यवस्था में मनुष्य के निर्णायक
हस्तक्षेप का नया युग शुरू हो चुका है । मानव निर्मित होने के कारण इस युग को वैज्ञानिकों
ने एन्थ्रोपोसीन का नाम दिया है ।
अगला हिस्सा पूंजी बनाम धरती का है जिसके तहत इनके आपसी टकरावों को देखा गया है । असल में बड़े वैश्विक संकटों के पीछे दो सबसे महत्वपूर्ण चयापचयिक चक्र हैं । पूंजीवाद की विशेषता यही है कि वह प्राकृतिक दुनिया से लगातार टकराव में रहता है । कार्बन के चक्र की परीक्षा से पता चलता है कि इसमें व्यवधान से धरती का तापमान बढ़ रहा है । इसी तरह औद्योगिक उत्पादन ने नाइट्रोजन के चक्र को बाधित किया है जिससे खेती की व्यवस्था गड़बड़ा गयी है और सारी दुनिया में मिट्टी खराब हो रही है । इन दोनों के संयुक्त प्रभाव से समुद्र में संकट पैदा हो रहा है ।
आखिरी हिस्से में धरती पर जीवन को बचाए रखने की व्यवस्था की निरंतरता की सम्भावना का विवेचन किया गया है । लगता है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोक देने के बावजूद विपत्तिकारक बदलाव रुकने वाले नहीं हैं । सबसे अंत में वैश्विक विध्वंस से बचने के लिए कारगर आंदोलन की जरूरत और सम्भावना पर जोर दिया गया है । अंत के तीन परिशिष्टों में बताया गया है कि अनुवाद की समस्या ने पारिस्थितिकी संबंधी मार्क्स के विचारों को उभरने नहीं दिया । इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक संगठन एन्थ्रोपोसीन को मान्यता देने में हिचकते रहे । कार्बन डाइ आक्साइड को कम करने की जिन तकनीकों को समाधान के बतौर प्रस्तुत किया जा रहा है उनसे इस जलवायु को बचाना सम्भव नहीं नजर आता । लेखक ने आश्वासन दिया है कि उनकी आगामी किताब में धरती की वर्तमान प्रणाली पर पूंजीवाद के वैश्विक हमले की छानबीन करके प्राणलेवा महामारी की नयी लहर लाने में उसकी भूमिका को उजागर किया जाएगा । साथ ही उसमें हम सबके लिए जीवनदायक हवा और पानी में जहर घोलने में उसकी जिम्मेदारी का भी उद्घाटन किया जाएगा ।
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