Wednesday, March 24, 2021

धर्म के आवरण में विद्रोह की अनूठी अभिव्यक्ति

 

             

                                                   

कनक तिवारी की 2021 में सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर से प्रकाशित किताबविद्रोही वेदान्ती का भारत बोध (विवेकानन्द को समझने की कोशिश)’ को इस दौर की महत्वपूर्ण पुस्तक के बतौर देखा जाना चाहिए बताने की जरूरत नहीं कि आधुनिक काल में सांस्कृतिक अनुपनिवेशन के प्रयासों का भरपूर गहरा रंग आध्यात्मिक भी था उस समय धर्म के आवरण में जिन लोगों ने भारत को जगाने की कोशिश की उन सबमें स्वामी सहजानन्द सरस्वती, स्वामी दयानन्द सरस्वती और महर्षि अरविन्द के साथ ही विवेकानन्द का नाम अग्रणी रूप से शामिल किया जाता है वह समय जिस विराट आलोड़न का था उसमें ढेर सारे धार्मिक लोग राजनेता की तरह दिखाई देते हैं तो अनेक राजनेता धार्मिक भाषा में बातचीत करते सुनाई पड़ते हैं रोमांचक यह तथ्य है कि इन सबसे किसी किसी तरह हिन्दी के साहित्यकारों का भी रिश्ता रहा है इस रिश्ते की सबसे जीवंत कड़ी राहुल सांकृत्यायन हैं जिन्होंने तमाम धर्मों के भीतर की आवाजाही तो की ही, धर्म की सीमा लांघकर समाज के क्षेत्र में भी उतरे यह आलोड़न केवल हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं था इस्लाम के भीतर भी अल्लामा इकबाल से लेकर मौलाना अबुल कलाम आजाद तक तमाम ऐसे लोग रहे जिन्हें इस ढांचे के सहारे देखा जा सकता है उस समय के इन प्रयासों की निरंतरता आज तक कायम है इसी वजह से इनके नाम का उपयोग या दुरुपयोग चलता रहता है

किताब में नन्दकिशोर आचार्य और डाक्टर नरेन्द्र देव वर्मा की लिखी भूमिकाओं को भी शामिल किया गया है । इस तरह की किताबों में भूमिका की उपयोगिता पर विचार किया जाना चाहिए । लेखक की राय उसके विश्लेषण में अनुस्यूत होती है, भूमिका उसके सीधे अभिग्रहण में मध्यस्थ की अनावश्यक चेष्टा बनकर रह जाती है । आचार्य जी की भूमिका तो फिर भी पुस्तक के लिए पाठक को तैयार करती है लेकिन नरेन्द्र जी की भूमिका पाठक को अपनी संस्कृतनिष्ठ भाषा और समझ से डरा देती है । किताब में जिस व्यक्ति की चर्चा है वह फ़ुटबाल प्रेमी भी था । अज्ञेय ने असम के सत्राधिकारों की चर्चा करते हुए धार्मिकों के मानवीय पक्ष को उभारने पर जोर दिया था । नरेन्द्र जी ने अपनी भूमिका से मनुष्य विवेकानन्द को दैवी स्वरूप प्रदान कर दिया है । सबसे बेहतर तो बिना किसी भूमिका के किताब का प्रकाशन होता लेकिन भूमिका को कम से कम कथ्य पर अर्थ थोपने का दायित्व नहीं निभाना चाहिए ।    

इन भूमिकाओं के बिना भी पुस्तक का कथ्य अत्यंत संप्रेषणीय बन पड़ा है । कनक तिवारी ने स्पृहणीय स्पष्टता और बल के साथ विवेकानन्द के सहारे ऐसे योद्धा वेदान्ती की छवि प्रस्तुत की है जिसने न केवल दुनिया में हिंदू धर्म और तत्व दर्शन का डंका बजाया बल्कि उसे इतना समावेशी बताया कि इस समय उसमें कट्टरता प्रविष्ट कराने के लिए उसके इस समावेशी स्वरूप को समाप्त करना खास विचार के अंध पथिकों का एकमात्र लक्ष्य बन गया है । अमेरिका में आयोजित धर्म संसद में विवेकानन्द की मौजूदगी के रोमांचक वर्णन से किताब की शुरुआत होती है । इस अनोखी धर्म संसद में, जो फिर कभी न हो सकी, विवेकानन्द का संबोधन ही अद्भुत थामेरे अमेरिकी बहनों और भाइयों। इस संबोधन की विशेषता को खोलते हुए लेखक ने कहा कि किसी भारतीय की ओर से गोरे अमेरिकी लोगों को बंधु कहना भारत देश को ऊपर उठाकर संसार में नस्ली बराबरी की आकांक्षा को व्यक्त करना है । दूसरी विशेषता इस संबोधन में भाइयों से पहले बहनों को रखना है । यह तो सचमुच बेहद क्रांतिकारी बात थी और इसे केवल भाषाई चमत्कार या खेल नहीं समझा जाना चाहिए । अवश्य इसमें स्त्री की श्रेष्ठता स्वीकार करने का आग्रह है । इस प्रसंग को पढ़ते हुए पाठक तथ्यों से आगे जाकर भावावेश का अनुभव करने लगता है । असल में उनकी किताब वर्तमान वातावरण का ध्यान रखकर तैयार की गयी है । इस समय हम सब देख रहे हैं कि विषमता और गरीबी पैदा करने वाली नीतियों के वास्तविक प्रभाव को छिपाने के लिए झूठा गौरव बोध पैदा किया जा रहा है और इसके लिए अतीत की मनमानी व्याख्या की जा रही है ।

लेखक ने विभिन्न शीर्षकों के तहत विवेकानन्द के बारे में विचार किया है । ये लेख संवादधर्मी शैली में लिखे गये हैं । उनमें गहरे लगाव और प्रचंड क्षोभ से उपजी भावावेशी रचनात्मकता भरी पड़ी है । इनके प्रांजल प्रवाह को देखकर बहुधा प्रतीत होता है कि ये लिखित न होकर व्याख्यानों के मुद्रित रूप हैं । वैसे किताब के अंत में शामिल तीन परिशिष्टों में से एक व्याख्यान है भी । ये तीनों परिशिष्ट छतीसगढ़ के साथ विवेकानन्द के जीवंत जुड़ाव का संदर्भ लिये हुए हैं । रायपुर के रामकृष्ण मिशन के एक स्वामी आत्मानंद इनके केंद्र में हैं । व्याख्यान में सूत्ररूप में किताब में कही गयी बातों को लिख दिया गया है । शेष अध्याय वैसे तो अलग अलग शीर्षकों से विभाजित हैं लेकिन कुछ बातों का दुहराव एकाधिक अध्यायों में हुआ है ।

भारत में विवेकानन्द की बौद्धिक उपस्थिति लगातार बनी रही है । तमाम अन्य लोगों की तरह ही उनके प्रति पूजाभाव के चलते व्यवहार में उनके विचारों की सक्रिय उपयोगिता बहुत सीमित कर दी गयी है । उनकी लोकप्रियता के कारण उनको भुनाने की कोशिश भी निरंतर चलती रही है । इस समय तो खासकर उन पर खास तरह के हिंदुत्व के निर्माण के लिए कब्जा जमाने की ललक विशेष बढ़ी हुई नजर आ रही है । लेखक को इस माहौल का खयाल बना हुआ है । वे लिखते हैं ‘उनके शिकागो सम्बोधन के सौ वर्ष पूरे होने पर बहुत सावधानी और चतुराई के साथ एक बार फिर विश्व हिन्दू परिषद और संघ परिवार ने विवेकानन्द को अपने विचारों का पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपनी भविष्यमूलक सियासी सम्भावनाओं को ध्यान में रखकर प्रचार कर दिया’ (पृष्ठ 280) । लेकिन लेखक का निष्कर्ष है किविवेकानन्द का राष्ट्रवाद पूरी तौर पर संघ के सैद्धांतिक सोच और रणनीतिक क्रियात्मकताओं के खांचे में फिट नहीं बैठता । इसलिए राष्ट्रीय स्वयं संघ को विवेकानन्द से मूल नहीं, अतिरिक्त लगाव है’ (पृष्ठ 283)

लेखक ने लम्बे समय तक विवेकानन्द की रचनाओं का सावधान पाठ किया है इसलिए निश्चिंत है कि ऐसी कोई चेष्टा विवेकानन्द को किसी एक विचार के भीतर सीमित न कर सकेगी । असल में विवेकानन्द की पारम्परिक रूप से गढ़ी मूर्ति के विरोध में इतने तथ्य पड़ते हैं कि ऐसा करना आसान न होगा । उन अप्रचारित तथ्यों पर लेखक ने इसीलिए कई बार जोर दिया है । उनके अपने भाई भूपेंद्रनाथ दत्त पर समाजवादी विचारों का प्रभाव तो था ही, वे उन कुछ गिने चुने भारतीयों में थे जिन्होंने रूस की यात्रा करके लेनिन से मुलाकात की थी । खुद विवेकानन्द भी इतने विद्रोही तो थे ही कि कुछ विचारकों ने उन्हें ‘वेदान्ती समाजवाद’ का प्रवर्तक बताने की गुंजाइश उनके भीतर पायी है । इसी सिलसिले में लेखक ने बहुधा इस तथ्य का उल्लेख किया है कि उस समय के क्रांतिकारियों की गिरफ़्तारी पर उनके पास विवेकानन्द का साहित्य बरामद होता था । विवेकानन्द के इस पहलू को और भी अधिक उभारते हुए लेखक बताते हैं किदुनिया के इतिहास में आज तक किसी भी विचारक ने यह बात नहीं कही जो स्वामी जी ने सौ बरस से पहले कह दी थी कि हम सर्वहारा की संस्कृति लाएं’ (पृष्ठ 298) । इसे जरूर उन्होंने परम्परिक शब्दावली में पेश करते हुए ‘शूद्र राज’ के आगमन की घोषणा के रूप में व्यक्त किया । इसके आगमन की सम्भावना का उन्होंने स्वागत किया था ।  

इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान देना होगा कि उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस में भी धार्मिक संकीर्णता न थी । प्रसिद्ध है कि वे विभिन्न धर्मों का आचरण कुछ दिनों के लिए करते थे । इसी विरासत के चलते उनके इस प्रतिभाशाली शिष्य ने गर्व से घोषित किया कि सभी धर्म सत्य हैं । न केवल इतना बल्कि जाति से अब्राह्मण होने के चलते उन्हें गेरुआ वस्त्र धारण करने के बावजूद यदा कदा अपमानित भी होना पड़ा था । अपने गुरु को वेलूर मठ तक सीमित रखने की जगह उन्होंने ऐसा संस्थान बना दिया कि देश-विदेश में उनकी कीर्ति का स्थायी स्तम्भ खड़ा रहेगा । रामकृष्ण मठ केवल भवन और परिसर नहीं होते, बल्कि वहां के साधुओं को किसी भी आपदा में सामाजिक सेवा करते देखा जा सकता है । इसी वजह से लेखक ने विवेकानन्द को ‘केवल भगवा साधु के रूप में स्वीकार करने से इंकार’ किया है और कहा है कि ‘विवेकानन्द इस देश के पहले साधु विचारक हैं जिन्होंने आध्यात्मिक उन्नति के साथ गरीब आदमी की भौतिक समृद्धि की बात की थी’ (पृष्ठ 294) ।

1863 1902 तक कुल 39 साल की उम्र पाने वाले इस बेचैन संन्यासी की वैचारिक यात्रा बेहद रोमांचकारी रही । इस यात्रा का विवेचन करते हुए लेखक ने तपन रायचौधुरी के मत का उल्लेख किया है जिनके मुताबिकउनके व्यक्तित्व के कम से कम तीन आयाम हैं। इन तीन आयामों को इस तरह गिनाया हैउनकी प्रतिक्रिया या समझ स्वयं के आत्मिक विकास और उसे परिपूर्णता तक पहुँचाने की कशिश रही है। दूसरे आयाम को वे उनकी अमेरिका और यूरोप यात्रा से जोड़ते हैं और इसकी विशेषता के रूप मेंभारत की समस्याओं को देखकरव्यथापूर्ण कोलाहल के चलते कोई रास्ता या हल तलाशने की कोशिश के कारण उनमें अस्तव्यस्त लेकिन धार्मिक अवधारणाओं और वेदान्त की शिक्षाओं के प्रभाव से एक तरह की समझ का यौगिकबताते हैं । इसके बादतृतीयत: उन्होंने एक बेहतर विकल्प ढूंढा । संसार के सभी धर्मों में अन्तर्निहित एक शाश्वत सत्य है’ (पृष्ठ 281)

विवेकानन्द की धार्मिक उदारता का उत्थान लेखक ने महात्मा गांधी के रूप में देखा है । इस सिलसिले में एक तथ्य का उन्होंने एकाधिक बार जिक्र किया है कि महात्मा गांधी विवेकानन्द से मिलने वेलूर मठ गये थे लेकिन विवेकानन्द के अस्वास्थ्य के चलते वह विराट सम्भावना आकार न ले सकी । गांधी के छुआछूत विरोधी आंदोलन के स्रोत को विवेकानन्द में देखते हुए वे कहते हैंहम बहुत श्रेय देते हैं कि छुआछूत के खिलाफ, दरिद्र नारायण को लेकर, साध्य और साधन के रिश्ते का सारा आंदोलन महात्मा गांधी ने कियालेकिन सच यह है किवह सब का सब एक दशक या उससे अधिक पहले सबसे पहले स्वामी विवेकानन्द ने इस धरती पर रोपा था’ (पृष्ठ 296) । इस सन्दर्भ में तिवारी जी ने इस बात पर भी क्षोभ प्रकट किया है कि स्वामी जी के सरोकारों को संविधान में यथोचित जगह न मिल सकी, उन्हें राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के खाते में डाल दिया गया ।

स्वामी जी की शिष्या सिस्टर निवेदिता की मार्फत लेखक ने बहुत ही महत्व के पहलू को उजागर किया है । उनके मुताबिकराजनीतिक नस्ल का औपचारिक राष्ट्रवाद यूरोप में अवतरित और विकसित हो चुका था । उससे अलग हटकर विवेकानन्द ने भारत को एक औपचारिक राजनीतिक इकाई के राष्ट्रवाद के रूप में परिणित करने का विकल्प ढूंढने से पहले राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत कर दिया था’ (पृष्ठ 280) । इसीलिए लेखक श्री तिवारी विवेकानन्द को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक मानने के मुकाबले भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीयताका प्रतीक कहना बेहतर समझते हैं ।                       

विवेकानन्द को धर्म तक सीमित करने के आग्रह का खंडन करते हुए लेखक ने जोर देकर कहा हैउन्होंने वेदान्त का प्रचार करने से ज्यादा युवकों को फ़ुटबाल खेलने की प्रतीकात्मक सलाह भी दी थी’ (पृष्ठ 252 ) । विवेकानन्द के लेखन के इसी पहलू ने इस समीक्षक को भी सबसे पहले इस संन्यासी की ओर खींचा था । उनके सक्रिय वेदान्त का एक रूप प्रस्तुत करते हुए तिवारी जी कहते हैंविवेकानन्द हजारों युवजनों की एक तरह की सेना संगठित कर उनके जरिए शिक्षा को प्रत्येक द्वार तक ले जाना चाहते थे’ (पृष्ठ 230) । विवेकानन्द के इसी किस्म के विचारों के चलते धर्म के सक्रिय सामाजिक इस्तेमाल के एक अन्य हिमायती तलस्तोय को उनकी ओर आकर्षित किया था । तिवारी जी ने तलस्तोय के विवेकानन्द के लेखन से परिचय के पुष्ट प्रमाण प्रस्तुत किये हैं । लेखक ने देश की सेवा में अमीरों से विवेकानन्द की निराशा का भी उल्लेख किया है । धर्म को भोजन तक सीमित कर देने की मूढ़ता का मजाक उड़ाते हुए ही उन्होंने इसेरसोई धर्मकहा और इसकी संकीर्णता को द्योतित करने के लिए व्यंग्य का शब्द दिया-‘मतछुओवादऔर लिखामतछुओवाद एक मानसिक व्याधि है। छुआछूत का उनका विरोध इतना भीषण था किविवेकानन्द ने विदेशों में जाकर भी हिन्दू धर्म की इस कुप्रथा का उपहास किया’ (पृष्ठ 211) । आज इस तरह का साहस करने वाले को देशद्रोही साबित कर दिया जायेगा । अस्पृश्यता के उनके विरोध को सामने लाते हुए लेखक ने इस बात पर परदा नहीं डाला है किवे वर्णव्यवस्था और जाति प्रथा में भेद करते हैं। विवेकानन्द की इस किस्म की भाषा के बारे में लेखक का ठीक ही निष्कर्ष हैक्रोध भरी उनकी आक्रामक लगती भाषा उनके सन्तप्त अनुभवों के अनुपात में रही है’ (पृष्ठ 219)

लीक से हटकर चलने के कारणउन पर आरोप लगा कि विवेकानन्द अपने गुरु श्रीरामकृष्णदेव की शिक्षाओं से भटक गए प्रतीत होते हैं । रामकृष्ण मिशन की स्थापना को लेकर उन्हें कुछ गुरु भाइयों का विरोध भी सहना पड़ा’ (पृष्ठ 203) । आश्चर्य नहीं कि विवेकानन्द का मानना था कि जो दूसरों के लिए जीवित रहते हैं वे ही जीवित माने जा सकते हैं । अपने इस उत्तर जीवन के कारण भी वे जीवंत और प्रासंगिक बने हुए हैं ।       

लेखक ने विवेकानन्द के विचारों के एक ऐसे पहलू को उभारा है कि दंग रह जाना पड़ता है । शुरू में उन्हें अवश्य अमेरिका पसन्द आया था लेकिन कुछ ही समय बाद क्रांति की सम्भावना उन्हें रूस और चीन में नजर आने लगी थी । इस मामले में विवेकानन्द सचमुच एक भविष्यदर्शी सन्त नजर आते हैं ।     

                     पृष्ठ- 310, मूल्य- 450             

Monday, March 22, 2021

सरहद और शासन


2021 में हेमार्केट बुक्स से हर्षा वालिया की किताब ‘बार्डर & रूल: ग्लोबल माइग्रेशन, कैपिटलिज्म, ऐंड द राइज आफ़ रेशियल नेशनलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । इसकी प्रस्तावना राबिन डी जी केल्ली ने और पश्चलेख निक एस्टेस ने लिखा है । राबिन केल्ली का कहना है कि वर्तमान महामारी के समय खबरों में लोगों की तकलीफ और मृत्यु की छवियों की बाढ़ आयी हुई थी । इसके साथ ही स्वास्थ्यकर्मी महामारी से जूझने की कहानी या विशेषज्ञ अभिमत बता रहे थे । अक्सर ये स्वास्थ्यकर्मी प्रवासी या उनकी संतानें थे । ये सभी युद्ध में टूटे हुए सेनानी थे । उनका मुकाबला केवल कोरोना से नहीं था, वे निजीकरण की शिकार चिकित्सा व्यवस्था और जनता की जगह मुनाफ़े की चिंता करनेवाली सरकारी नीतियों से भी लड़ रहे थे । परदेशियों से नफ़रत फैलाने वाली और नस्लवादी राजनीतिक संस्कृति को झेलते हुए अपना जीवन दांव पर लगाना था । कोरोना संकट के चलते यह जो नया युद्धस्थल पैदा हुआ मीडिया ने आम तौर पर उसकी उपेक्षा ही की । अमेरिकी सरकार ने सीमाओं को बंद करना शुरू किया, शरणार्थियों पर बंदिशें बढ़ा दीं और आप्रवासियों को नजरबंद कर लिया । जिन मजदूरों के काम की वजह से उन्हें संक्रमण की आशंका अधिक थी उनकी रक्षा संबंधी कानूनों को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया गया । सरकारी उपेक्षा की वजह से मूलवासियों के इलाके कोरोना संक्रमण के केंद्र बन गये । कैदियों और जेल कर्मियों में संक्रमण तेजी से फैला । एशियाई बाशिंदों को नस्ली हमलों का शिकार बनाया गया । इस दौरान स्त्रियों को काम पर जाने की मनाही के चलते घर पर बैठना पड़ा और घरेलू हिंसा में काफी बढ़ोत्तरी देखने में आयी । दूसरी ओर दक्षिणपंथी ताकतों ने तमाम नियमों की धज्जी उड़ाते हुए रैलियां निकालीं ।

इस किताब में हर्षा ने बताया है कि ये लड़ाई कोई नयी बात नहीं है । इस बार की महामारी में उसी हमले का ताजा रूप देखने को मिला जो विगत पांच सौ साल से पूंजीवाद धरती पर किये जा रहा है । इसके तहत उसने जमीनों को घेरा, उनके मालिकों को बेदखल किया, उन पर कब्जा जमाया, उनका दोहन किया, शोषण किया, उसे विक्रेय माल में बदला, उपभोग किया, बरबाद किया, प्रदूषण फैलाया, गरीबी पैदा की और उत्पीड़नकारी शासनतंत्र पैदा किया । जनता के विरुद्ध यह लड़ाई सैन्य हिंसा के जरिये सुरक्षा के नाम पर चलायी गयी । इन सब कदमों के फलस्वरूप धरती के अधिकांश बाशिंदों को विस्थापन, कैद, कर्ज, अस्थिरता, गरीबी और अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ रहा है । पिछले दशक में इस हमले के विरोध में अकुपाई, अरब वसंत, कटौती विरोधी आंदोलन, लैटिन अमेरिकी क्रांतियों और नस्ली राजकीय हिंसा के प्रतिरोध की शक्ल में तमाम विद्रोह उठ खड़े हुए थे । इसके साथ ही नस्ली राष्ट्रवाद, स्त्रीद्वेष, नारीहत्या और तानाशाहों की चुनावी जीतों में बढ़ोत्तरी भी नजर आयी । अगर इस समय को समझना है तो किताब इसमें मददगार हो सकती है । इसमें आसान समाधान या उदारवादी नुस्खों से परहेज किया गया है । लेखिका ने विश्वव्यापी समस्याओं की जड़ तलाशने का प्रयास किया है । वे जितनी गम्भीर विचारक हैं उससे उम्मीद भी उनसे ऐसे ही धारदार विश्लेषण की थी । विचार के साथ ही उन्होंने हमारे समाज में व्याप्त नस्ली पूंजीवाद, उपनिवेशवाद, पितृसत्ता, सैन्यवाद का विरोध करने तथा प्रवासियों, मूलवासियों, स्त्रियों और बेघरों के अधिकारों की रक्षा में जीवन खपाया है ।

इसमें प्रस्तुत सबूतों से व्यवस्था को धक्का पहुंचेगा । शरणार्थी संकट की आसान व्याख्या खोजनेवालों को भी धक्का लगेगा । इस प्रचलित मान्यता को भी धक्का लगेगा कि अमेरिका और कनाडा आप्रवासियों के देश हैं । ट्रम्प शासन की आप्रवास नीतियों के विरोधी भी बहुधा यह मंत्र दुहराते हैं और कहते हैं कि आप्रवासियों के वंशज होने के नाते रोजगार की तलाश में अमेरिका आनेवालों को रोकने के लिए दीवार खड़ी करना अनैतिक है । सचाई यह है कि इस जगह के मूलवासियों को मिटाकर और काले लोगों को चूसकर यूरोप के इन आप्रवासियों ने अपना मुल्क बनाया है । सभी आधुनिक लोकतंत्र बहिष्करण और परदेशी से नफ़रत के आधार पर खड़े किये गये हैं । यूरोप से यहां आकर आजादी का स्वप्नलोक निर्मित करने की कथा में कोई सच नहीं है । अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया मेहनती लोगों की लोकतांत्रिक चाहत का नतीजा नहीं हैं बल्कि वे पूंजीवादी प्रसार और नस्ली विचारधारा के हिंसक उत्पाद हैं । इन्हें बनानेवाले हथियारबंद उपनिवेशकों के साथ शेयरधारक कंपनियों की आमद हुई । उन्हें सहारा देने के लिए औपनिवेशिक राजकीय मशीनरी मिली और अपहृत श्रमिकों की शक्ल में पूंजी की ताकत हासिल थी ।

इसमें उपनिवेशवाद के इतिहास और उसके नस्ली, पितृसत्ताक और राष्ट्रवादी आधारों की चीरफाड़ तो की ही गयी है, साथ ही वर्तमान का संदर्भ भी स्पष्ट है । ट्रम्प, बोलनसारो, मोदी, ओर्बान या दुतेर्ते के मातहत दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के उभार में इतिहास खुद को दुहरा नहीं रहा । न तो यह 1930 दशक के फ़ासीवाद की आवृत्ति है और न ही नवउदारवाद की समाप्ति है । इसमें नवउदारवादी तर्क की निरंतरता तो है ही, चरम दक्षिणपंथी कट्टरता और कारपोरेट हितों का मेल भी है । इनके साथ विक्षुब्ध कामगारों का एक हिस्सा भी आ जुड़ा है । इन सबको मिलाकर भय पर आधारित एक नवफ़ासीवादी, सर्वसत्तावादी आंदोलन खड़ा हुआ है जो अब भी नवउदारवादी तर्क से ही संचालित है । कल्याणकारी राज्य के अवशेष हटाकर ऐसा विस्तृत सैनिक-पुलिस राज्य खड़ा किया जा रहा है जो सीमाओं को सुरक्षित रखने के नाम पर पूंजी के लिए अनुकूल हालात पैदा कर रहा है । राष्ट्र-राज्य कारपोरेट घराना हो गया है और वर्तमान अस्थिर दुनिया में उसे सुरक्षित रखने के बहाने चंद धन्नासेठ उस पर कब्जा कर बैठे हैं । इसकी जगह वालिया ने राष्ट्रवाद, पूंजीवाद और निजीकरण को तथा आप्रवासी अल्पसंख्यक के राक्षसीकरण को सुरक्षा के लिए असली खतरा बताया है । सबको उदार अधिकार प्रदान करने की मौजूदा व्यवस्था को क्रांति के जरिए उलट देने की जरूरत उन्हें महसूस होती है । असल में वैश्विक मजदूर वर्ग की एकजुट ताकत आ/प्रवासी की धारणा के चलते कमजोर हुई है ।

आप्रवासी की पहचान तो राज्य की थोपी हुई पहचान है । इसी पहचान के आधार पर नागरिकता से जुड़े अधिकार तय होते हैं, मजदूरों को आपस में बांटा जाता है, ठेका मजदूरों की भारी फौज तैयार की जाती है और विद्रोही तथा खतरनाक मजदूरों को निर्वासन के जरिए हटा देने की ताकत राज्य को मिलती है । राष्ट्र-राज्य के निर्माण, सरहद खड़ी करने तथा उनकी रक्षा और स्पष्टता के लिए सरंजाम बनाने और समेकन, बहिष्करण तथा अपराधीकरण की विचारधारा के पुनरुत्पादन के लिए यह पहचान जरूरी है ।

नस्ली राष्ट्रवाद ने पर्यावरणिक खतरे के लिए आप्रवासियों के साथ ही देश के गरीब बाशिंदों को जिम्मेदार ठहराया है । जलवायु संकट के बहाने इनको खदेड़ा जा रहा है और तापवृद्धि, दावानल तथा विकराल विषमता की जिम्मेदारी से पूंजीवाद मुक्त हो गया है । इस आधुनिक नस्लभेद को बनाने में उदारवादी भी मौन सहायक हो जा रहे हैं । वे भी पर्यावरण की समस्या को हल करने के लिए कारपोरेट घरानों के सुझाये नुस्खों की वकालत करते हैं तथा शरणार्थी समस्या को राहत आदि से ही हल करना चाहते हैं । जब तक आप्रवासी के बारे में यह नजरिया रहेगा तब तक उनकी असलियत नजर नहीं आयेगी । वे तो वैश्विक श्रम शक्ति की जान हैं और उनकी भटकन का स्रोत युद्ध, पूंजी प्रवाह, सरकारों और वित्तीय/आर्थिक संस्थानों की नीतियों, नस्ली और पितृसत्ताक सुरक्षा तंत्र तथा सरहदों के आर पार के कामगारों के संघर्षों में निहित हैं । जो लोग उनके सही समेकन को इस समस्या का समाधान समझते हैं वे आप्रवासी को पैदा करने वाली ऐतिहासिक ताकतों पर परदा डालना चाहते हैं । वे मानव आपदा को समाप्त करने और धरती को बचाने की अपनी ताकत को भी जाहिर नहीं होने देना चाहते ।

मतलब कि जिसे आम तौर पर आप्रवासियों का संघर्ष कहा जाता है वह असल में वर्ग संघर्ष है । संयोग नहीं कि आप्रवासी विरोधी कानूनों के साथ ही देशद्रोह संबंधी कानून भी बनाये जा रहे हैं । बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में अमेरिका से अक्सर समाजवादियों, कम्युनिस्टों और ट्रेड यूनियन नेताओं को निकाल बाहर किया जाता था । इसीलिए मजदूर नेताओं ने जोर देकर देश निकाले की इस व्यवस्था की मुखालफ़त की थी क्योंकि किसी एक पर भी हमला सब पर हमला मानना होगा । इसके चलते ही वालिया इसे आप्रवासी समस्या या आप्रवासी अधिकार की लड़ाई मानने की जगह पूंजी और साम्राज्य की नस्लभेदी और पितृसत्ताक व्यवस्था के विरुद्ध वैश्विक संघर्ष मानती हैं । 

Saturday, March 13, 2021

किसान आंदोलन और लोकतंत्र

 

आखिरकार देश के प्रधानमंत्री ने किसान आंदोलन के सवाल पर जो वैचारिक अभियान शुरू किया उससे ही बात शुरू करना उचित होगा । कारण कि देश के मुखिया होने के नाते उनके श्रीमुख से निकले शब्द समूह का विशेष महत्व होता है । उनके भाषण से उपजा आंदोलनजीवी नामक शब्द खास तौर पर चर्चित हुआ । इस शब्द के चुनाव में उनकी रुचि प्रकट हुई है । जानने की बात है कि आंदोलन का संबंध दोलन से है और इसे जीवन का प्रमाण माना जाता है । किसी भी शांत पड़े प्राणी के जीवित रहने की परीक्षा उसके हिलने डुलने से होती है । इस तरह आंदोलन को जैविकीय रूप से जीवित रहने का सबूत तो कहा ही जा सकता है, लेकिन उससे भी जरूरी चीज है स्वतंत्र विचार बनाने और उसे व्यक्त करने की आदत जिसके खत्म होने से जैविकीय जीवन के बावजूद मनुष्य मृतक की तरह ही गिना जायेगा । मतभेद को किसी आंदोलन के रूप में व्यक्त करना न केवल लोकतांत्रिक शासन के लिए सेहतमंदी की बात है बल्कि बौद्धिक वातावरण के लिए भी आवश्यक है । संस्कृत में कहा गया हैमुंडे मुंडे मतिर्भिन्नाअर्थात मनुष्य की विशेषता ही है मतिभिन्नता । यदि इस पर ही प्रतिबंध लगा दिया जाये तो मानवजाति की विशेषता समाप्त हो जायेगी ।

सिद्ध है कि किसान आंदोलन का सवाल अब केवल खेती के लाभकर होने से ही जुड़ा नहीं रह गया है । इसकी सफलता पर लोकतंत्र और बौद्धिकता की उपस्थिति भी टिकी हुई है । पहले लोकतंत्र की ही बात करते हैं क्योंकि उसकी मौजूदगी अधिक ठोस है । लोकतंत्र को महज राजनीतिक पद्धति समझने वाले इसे चुनाव में मतदान तक सीमित करके देखते हैं । यह भी समझने का प्रयास नहीं किया जाता कि मतदान के लिए मत होना जरूरी है । मत केवल कुछेक नारों या वादों से नहीं बनता । ये नारे या वादे किसी भी राजनीतिक विचारधारा को सटीक तरीके से सूत्रबद्ध करते हैं । लोगों के मत के बनने में किसी राजनीतिक दल के समूचे आचरण का योगदान होता है । सार्वजनिक दुनिया में विचारधारा व्यक्तियों के समूह विशेष के माध्यम से जाती है । इस आधार पर लोग किसी मत को अपनाते हैं । दान उस मत की एक बाह्य अभिव्यक्ति होती है और वह केवल बटन दबाने या मुहर लगाने तक महदूद नहीं होती ।

वैसे मतदान का अधिकार भी किसी की कृपा से प्राप्त नहीं हुआ । इसकी प्राप्ति और मौजूदगी संघर्ष पर निर्भर है । प्रसिद्ध इतिहासकार एरिक हाब्सबाम ने विस्तार से बताया है कि किस तरह कदम दर कदम मताधिकार का विस्तार हुआ और इस विस्तार में मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक चार्टिस्ट आंदोलन का हाथ रहा है । उस आंदोलन के चलते साल दर साल मताधिकार के मामले में संपत्ति और शिक्षा संबंधी शर्तों में ढील दी गयी जिसके कारण नये नये लोग मताधिकार हासिल करते रहे । बहुत बाद में जाकर सभी बालिग पुरुषों को मताधिकार मिल सका । मताधिकार के लिए आंदोलन का अगला चरण बालिग स्त्रियों के मताधिकार के लिए संचालित लड़ाई थी । इसे चलाने वालों को सफ़्रेजेट कहा गया । इसमें खास बात यह थी कि न केवल चुनाव में मताधिकार का सवाल उठाया गया बल्कि समाज की सारी संस्थाओं में स्त्री प्रतिनिधित्व का दावा किया गया । ये अधिकार लड़ाई से हासिल तो हुए ही, मताधिकार के विस्तार से पूंजीवादी व्यवस्था प्रसन्न नहीं हुई क्योंकि पूंजीवाद की आंतरिक संरचना में लोकतंत्र की कोई जगह नहीं होती । मताधिकार और मतदान का संबंध प्रतिनिधित्व से होता है और प्रतिनिधित्व फैसलों को प्रभावित करने के लिए जरूरी होता है । कानून बनाने और शासन चलाने वाले निकायों में जनता का प्रभावी प्रतिनिधित्व नीचे की तमाम संस्थाओं में प्रतिनिधित्व के बिना अधूरा रहता है । शिक्षा संस्थानों में अध्यापक और विद्यार्थी संघों से लेकर कारखानों की ट्रेड यूनियनों तक समूचे समाज में विभिन्न रूपों में जो लोकतांत्रिक आचरण जारी होता है उसके आधार पर ही राष्ट्रीय स्तर पर प्रातिनिधिक संस्थाओं की मजबूती कायम रहती है ।          

मत की औपचारिक अभिव्यक्ति के साथ उसकी थोड़ी मुखर अभिव्यक्ति भी हो सकती है । इस मुखर अभिव्यक्ति को हम आंदोलन कह सकते हैं । मत की इस आंदोलनात्मक मुखर अभिव्यक्ति से सभी तानाशाहों को एतराज होता है । तानाशाह मूल रूप से लोकतांत्रिक आचरण का विरोधी होने के चलते आम तौर पर आंदोलन को तो बदनाम करते ही हैं, कई बार सहानुभूति नामक मानवीय भावना पर भी भारी आपत्ति जाहिर करते हैं । असल में सहानुभूति के इसी मानवीय गुण के कारण हम नितांत अपरिचित की भी मदद के लिए हाथ बढ़ा देते हैं । अत्याचारियों को इससे कठिनाई होती है क्योंकि इससे उनका समर्थन घटता जाता है । ध्यान देने की बात है कि पिछले लगभग सभी अवसरों पर सत्ता के वर्तमान समर्थकों ने इसी पहलू पर एतराज जाहिर किया । उनके लिए दलित को केवल दलित सवाल पर बोलना चाहिए । अल्पसंख्यकों को अन्य किसी भी सवाल पर बोलने का हक नहीं है । जब किसानों ने कारागार में बंदी लोगों का सवाल उठाया तो खुद प्रधान सेवक ने बेकार की बात उठाने की शिकायत की । सच यह है कि कोई भी आंदोलनकारी व्यक्ति आंदोलन के लिए सामाजिक सहानुभूति प्राप्त करना बेहद जरूरी समझता है । इसीलिए आंदोलनों के भीतर न केवल अन्य तबकों के सवालों के साथ जुड़ने की भावना होती है बल्कि बहुधा यह एकजुटता देश की सीमाओं के पार भी चली जाती है । 

लोकतंत्र के सवाल पर इस समय जो बहस हो रही है उसके साथ अनेक प्रसंग जुड़ गये हैं । हम सबने इस परिघटना को शाहीन बाग में देखा और इस आंदोलन में भी देख रहे हैं कि वर्तमान शासकों ने जिस हद तक लोकतंत्र के प्रतीकों की उपेक्षा की उसी हद तक आंदोलनकारियों ने उन्हें अपना लिया । संविधान से लेकर तिरंगे तक देश के लोकतंत्र के साथ जुड़े प्रत्येक प्रतीक को जिस तरह उन विद्रोहियों ने सीने से लगाया उससे देश पर हक जताकर उन्होंने लोकतंत्र को हासिल करने की लड़ाई की याद ताजा कर दी । इसने लोकतंत्र को आकार देने में वामपंथ और मेहनतकश जनता की भूमिका को लम्बे समय के बाद मजबूती से रेखांकित किया । इसे समूची दुनिया में लोकतंत्र की अवहेलना करनेवाले शासकों के विरोध में खड़ी जनता की ओर से देश के संचालन में लोकप्रिय दावेदारी के बतौर देखा जाना चाहिए । इसके मूल में वह इतिहास है जिसमें सामंती समाज में मताधिकार से लेकर आलोचना की जगह बनाने तक एक एक इंच जमीन जनता ने अपने बलिदानी संघर्ष से हासिल की थी । कहते हैं कि जब संसद नहीं बनी थी तो ट्रेड यूनियनें नीचे से लोकतंत्र के आचरण का लोकप्रिय मंच का काम करती थीं । इस समय भी जब इन कानूनों पर बहस के मामले में संसद का गला घोंट दिया गया है तो किसान महापंचायतों ने बहस और बातचीत की वैकल्पिक जगह उपलब्ध करा दी है । यूं ही नहीं है कि देश का संविधान देश की संप्रभुता कोहम भारत के लोगमें अवस्थित करता है । उन्होंने लड़कर लोकतंत्र न केवल हासिल किया बल्कि उसकी बुनियाद भी मजबूत की और आज भी उसे गढ़ रहे हैं ।        

दिल्ली की सरहदों पर महीनों से डटे हुए किसानों की भावना को समझने में राजधानी के मध्य वर्ग को दिक्कत महसूस हो रही है । पिछले कई सालों से सरहद का मतलब देश के उत्तरी या पश्चिमी छोर पर अन्य देशों के साथ सटने या अलगाने वाली वह काल्पनिक रेखा रह गया है जिसकी रक्षा में सेना तैनात रहती है । यह मतलब दिमाग में बिठा देने में सेना या सैनिक की जगह युद्धप्रेमी वर्तमान शासन का भी योगदान है । संयोग से अभी पूरबी या दक्षिणी छोर के साथ यह खेल शुरू नहीं हुआ है हालांकि बीच बीच में इसकी कोशिश कभी कभार होती है । तो दिल्ली ने कभी बार्डर का वह अर्थ समझा ही नहीं था जो इस आंदोलन ने समझना जरूरी बना दिया । उनके लिए बार्डर केवल टोल वसूल करने की जगह हुआ करता था । अभी कुछ दिन पहले सड़क पर कील कांटे लगाकर और कंटीले तारों के गोल छल्ले सजाकर पुलिस ने बार्डर की मूल झलक दिखाने का अभ्यास भी किया है । बहरहाल रोज अखबार में पढ़कर सरहद का नया अर्थ कुछ कुछ स्पष्ट होने लगा । बहुत दिन सुनने के बाद एक झलक पाने के लिए सिंघु बार्डर गया । पता चला किसी भी वाहन पर किसान धरना की जगह पूछिये सही जगह पहुंचा दिये जायेंगे । यह सुनकर ही आश्वस्त हुआ कि आम लोगों में किसान प्रदर्शन के विरोध में जहर बोने में सत्ता सफल नहीं हो सकी है । इसके पहले रागिनी तिवारी का वीडियो संदेश सुनकर थोड़ा आशंकित रहा था लेकिन आम वाहन चालकों के सहयोग की नयी सूचना पाकर काफी निश्चिंत हुआ । दो अन्य मित्रों के साथ धरना स्थल पहुंचा ।

थोड़े दिन पहले ही सुना था कि गणतंत्र दिवस पर घोषित परेड को रोकने के लिए पुलिस ने अवरोध बना और लगा लिये हैं । किसी ने गिनकर पंद्रह स्तरीय रुकावट का जिक्र किया था इसलिए नजदीक जाकर गिना । एक को दूसरे के साथ मोटी जंजीर में बांधकर सचमुच कंक्रीट की पंद्रह भारी कमर भर ऊंची दीवारें लगायी गयी थीं । चिंता से पूछा तो रवि ने बताया कि जब इन विशाल ट्रैक्टरों का हुजूम चलेगा तो यह सब तिनके की तरह बिखर जायेगा । सामने भीमकाय घोड़े बंधे हुए थे । कहते हैं बाबा घोड़ा पालते थे । कभी एक रिश्तेदार के घर उठाकर लोगों ने घोड़े पर बिठाया भी था लेकिन इतने बड़े घोड़ों को नजदीक से कभी देखा न था । आते हुए जो एक का हिनहिनाना सुना था वह अब भी कान में बजता है । पता चला निहंग लोग इन बांके घोड़ों पर सवारी करते हैं । ठीक पास में ग्रंथ साहिब । जो आता, मत्था टेकता । एक बाबा जमीन पर बैठे हाथ उठाकर बच्चों को आशीर्वाद दे रहे थे । तमाम स्त्रियां बच्चों के साथ मजमा लगाये थीं । लगा पूरा पंजाब उमड़कर चला आया है । भारत का कोई भी प्रांत ऐसा नहीं जिसमें सांस्कृतिक विविधता न हो । पंजाब के मामले में तो यह विविधता धार्मिक स्तर पर कुछ अधिक ही है । हिंदू घरों में सिख होना कोई अचरज की बात नहीं । इसके अतिरिक्त आजादी के साथ मिले भारत विभाजन ने उसे चीरकर दो हिस्सों में बांट दिया । पहले से ही पंजाब में इस्लाम की मजबूत सांस्कृतिक उपस्थिति रही है । भूगोल के अलग हो जाने के बावजूद जनजीवन का बड़ा हिस्सा इस मुश्तरका जमीन पर खड़ा है । सिखों की बहुतायत से खालिस्तान समर्थक होने का आरोप लगाना आसान था । मलेरकोटला से आये मुसलमान भाइयों को देखकर उसे सांप्रदायिक मोड़ देने की कोशिश भी हुई । कभी कृष्णा सोबती का कथन देखा था कि दिल्ली के पंजाबी घरों की औरतों को देखकर पंजाब की औरतों की सामाजिक हैसियत का अनुमान लगाना गलत होगा । स्त्रियों की इतनी भारी मौजूदगी सर्वोच्च न्यायालय की समझ में भी नहीं आयी और उसे वे जबरन लायी महसूस हुईं । दस बारह किलोमीटर तक सब कुछ मुफ़्त मिल रहा था । भोजन से लेकर किताब और दवाओं तक बिना किसी मूल्य के उपलब्ध था । पंजाब के लंगर तो मशहूर हैं ही, हरियाणा से छाछ भी लायी जा रही थी । सत्ता ने दोनों प्रांतों को बांटकर आपस में लड़ाने की भरपूर कोशिश की । सतलज नहर के पानी का सवाल उठाकर झगड़ा कराना चाहा लेकिन उन्हें निराश करते हुए हरियाणा ने दिल खोलकर पंजाब का साथ दिया । किसान जनता की इस एकता ने पंजाब और हरियाणा की एकता से आगे जाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक को अपने आगोश में ले लिया है । आंदोलन की ऊर्जा के चलते ही नरेश टिकैत ने मुजफ़्फ़रपुर के दंगों के लिए मुस्लिमों से माफ़ी मांगी और उत्तर में पंचायतों में मुस्लिम किसानों ने पूरी ताकत से हिस्सा लिया ।         

दुनिया का शायद एकमात्र ऐसा धर्म सिख धर्म है जिसकी पवित्र पुस्तक भारतीय कविता का अपूर्व संग्रह है । क्या गजब का धर्म है कि बनारस के संत रैदास को अपना बना लिया और इस तरह कि पंजाब से बनारस आनेवाली ट्रेन का नाम रैदास की यूटोपिया के आधार परबेगमपुरएक्सप्रेस हो गया । खुद गुरु ग्रंथ साहिब भी उस जमाने के लगभग सभी कवियों की कविता को एकत्र करने की कोशिश से उपजा है । कुछ बाद में बजरंग बिहारी तिवारी की नवारुण से छपी पुस्तिकाभक्ति कविता, किसानी और किसान आंदोलनसे पता चला कि गुरु नानक और उनके सभी समकालीन कवियों को इस किसान आंदोलन की मार्फ़त नये तरीके से देखा समझा जा सकता है । संतों ने मनको विवेक के अंकुश से काबू में रखने की सलाह दी थी । हमारा शासक तोमनको काबू करने की कौन कहे, मनमानी करने पर आमादा है । धर्म की ऐसी सामाजिक भूमिका भी धर्म के बारे में मार्क्स के इस कथन को पुष्ट करती लगी कि वह इस दुनिया की हृदयहीन परिस्थितियों का हृदय है, पीड़ित आत्मा की कराह है ।                        

पुराने संस्कृत ग्रंथों में आत्मा के अन्नमय होने की बात सुनी थी और महसूस किया था कि ॠषियों को अपने व्यावहारिक अनुभव से मालूम था कि चेतना के मूल में अन्न ही है । उन्हें पता था कि आत्मा को जागृत रखने की ऊर्जा का स्रोत अन्नमय भोज्य सामग्री है । यदि कोई अन्न की अवहेलना करता है तो वह आत्मा की भी अवहेलना करता है । भारत का किसान आधुनिक काल में भी चर्चा का विषय रहा है । गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को आलसी कहे जाने का विरोध करते हुए बताया है कि खेतों में सोनेवाले किसान बहुत हिम्मती होते हैं । हिंसक जानवरों और प्रकृति की मार का मुकाबला करते हुए खेतों से अन्न पैदा करने वाले इस किसान को वे भारत की मूल आत्मा का आधार समझते थे । जिस पूंजीवादी विकास के प्रतिनिधि के रूप में अंग्रेज इस देश में आये थे उसने इंग्लैंड में भी खेती को तबाह करने के बाद कारखानों के लिए पगारजीवी मजदूर पाये थे । स्वाभाविक था कि वे भारत की खेती में हस्तक्षेप करें । इस हस्तक्षेप का सीधा संबंध उपनिवेशवाद से था । यह ऐसी विश्व व्यवस्था थी जिसमें उपनिवेशित देशों के अर्थतंत्र को उपनिवेशक के हितों के मुताबिक बदला जाना था । इस काम के मकसद के सिलसिले में उत्सा पटनायक और प्रभात पटनायक ने गहराई से शोध किया है । ध्यान देने की बात है कि इससे पैदा होने वाले विक्षोभ को नियंत्रित करने के लिए ही वे तमाम कानून अंग्रेजों ने बनाये थे जिनके पुनरुज्जीवन के चलते देश लोकतंत्र के सूचकांक में निरंतर नीचे को खिसक रहा है । 

इस आंदोलन ने भारत में औपनिवेशिक शासन की ओर से किये गये हस्तक्षेप को खेती किसानी के नजरिये से देखने की प्रेरणा दी है । तबसे भारत की खेती को अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के हितों के मुताबिक ढालने की कोशिश और उस कोशिश के बहादुराना प्रतिरोध का समूचा इतिहास प्रत्यक्ष हो गया है । इसके इर्दगिर्द ही स्वाधीनता आंदोलन की क्रांतिकारी विरासत को भी पहचाना जा रहा है । कहना न होगा कि आजादी के उस आंदोलन ने साहित्य के भीतर खेती किसानी और इस काम में लगे किसानों को नायक के रूप में स्थापित कर दिया । इसमें हिंदी और उर्दू एक साथ रहे । याद करिये कि इकबाल ने कहा किजिस खेत से दहकां को मयस्सर न हो रोटी, उस खेत के हर खोश--गंदुम को जला दो। उस जमाने के प्रेमचंद को किसान जीवन की कहानी और उसकी लूट के विरोध के लिए ही जाना जाता है । उनकी ही परम्परा के लेखक नागार्जुन ने संस्कृत में कृषक शतकम लिखा । कहना न होगा कि औपनिवेशिक शासन की ओर से साम्राज्यी हितों के अनुरूप खेती के पुनर्गठन का विरोध स्वाधीनता की अंतर्धारा थी जिसके चलते समूचा आधुनिक भारतीय साहित्य किसान केंद्रित साहित्य बन गया । 

जिन कानूनों का विरोध किसानों की ओर से हो रहा है उनके कानून बनने की समूची प्रक्रिया से जनता को ओझल कर देने के इस प्रयास का विरोध करने के क्रम में लोग सीख रहे हैं कि असल में कानून किस तरह बनना चाहिए । पहले से रायशुमारी की जो परम्परा चली आयी है उसका भी पता इस आंदोलन के दौरान ही चला है । जो प्रक्रिया पूरी नहीं की गयी थी उसे सर्वोच्च न्यायालय के दखल के बाद किया जा रहा है इससे बड़े पैमाने पर कानून बनाने की संरचना के बारे में जन शिक्षण हो रहा है । इन कानूनों पर हुई बहस से समूचे देश को पता चला कि कुछ ऐसे मामलात हैं जिन पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को ही है । खेती भी ऐसा ही क्षेत्र है । कारण कि सभी राज्यों में खेती एक ही तरह की नहीं होती । केंद्र सरकार ने सीधे कानून बनाकर देश के संघीय ढांचे का उल्लंघन तो किया ही, इस नजर से ये कानून असंवैधानिक भी हैं । इस पहलू से दायर याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने तमाम याचिकाओं की तरह लम्बित रखा है ।   

वर्तमान आंदोलन के संदर्भ में गांधी के हिंद स्वराज के कुछ अंश देखना सही होगा । वे लिखते हैं ‘मेरे मन में हिंदुस्तान का अर्थ वे करोड़ों किसान हैं, जिनके सहारे राजा और हम सब जी रहे हैं । राजा तो हथियार काम में लायेंगे ही । उनका वह रिवाज ही हो गया है ।---किसान किसी के तलवार बल के बस न तो कभी हुए हैं, और न होंगे । वे तलवार चलाना नहीं जानते; न किसी की तलवार से वे डरते हैं । वे मौत को हमेशा तकिया बनाकर सोनेवाली महान प्रजा हैं ।’ इसी किताब में गांधी कानून के सवाल पर बड़ी मजेदार बहस करते हैं और बताते हैं कि अन्यायी कानून को मान लेना पाप और गुलामी है ।             

इस पूरे आंदोलन के दौरान सबसे बड़ी घटना गणतंत्र दिवस की परेड थी । इस मामले में आंदोलन ने सचमुच देश पर दावा ठोंक दिया है । आज सभी लोग यह बुनियादी बात समझ रहे हैं कि संविधान में संप्रभुता देश की जनता को सौंपी गयी है । शाहीन बाग के बाद इस आंदोलन ने देश की आजादी के आंदोलन के लगभग सभी प्रतीकों को शासकों के हाथों से छीनकर जनता को सौंप दिया है । परम्परा से गणतंत्र दिवस की परेड देश की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन होती है । बचपन में इसका एक पहलू स्कूली बच्चों का जुलूस हुआ करता था । टेलीविजन आने के बाद वैसे ही देशवासी निष्क्रिय दर्शकों में बदल चुके हैं । इसलिए घर बैठे राजपथ से गुजरते जुलूस को देखना ही नागरिकों का कर्तव्य रह गया था । जहां से यह जुलूस निकलता है वहां असल में भी नागरिक दर्शक ही होते हैं । शायद पहली ही बार जनगण ने अपने तंत्र में भागीदारी का सामूहिक दावा किया होगा । देखने के लिए टिकरी की परेड को गया तो सोचा कि जैसा माहौल है उसमें कम ही लोग मिलेंगे । सारी सड़कों पर आंख के सामने भारी बोल्डर लगाये जा रहे थे । इसके बावजूद अचरज की तरह हरियाणा या पंजाब से जुड़े सामान्य दिल्ली वासियों को उत्सव की तरह सड़क पर ट्रैक्टरों का स्वागत करते देखा । ऊपर आसमान से हवाई जहाज और हेलीकाप्टर गुजर रहे थे । साथ खड़े ओम बता रहे थे कि जयपुर सबसे नजदीक का वायुसेना का अड्डा है इसलिए वहीं से उड़कर ये राजपथ जा रहे हैं । एक क्षण को लगा कि जो पिता इस सड़क पर ट्रैक्टर चला रहा है बहुत सम्भव है उसका पायलट पुत्र आसमान में अपाचे हेलिकाप्टर संभाल रहा हो । बचपन में नेट नामक जंगी जहाज के बारे में सुना था । बाद में उसकी सही वर्तनी Gnat का पता चला । वे भी तीन की तीर जैसी कतार बनाकर उड़ रहे थे । वह राफेल भी नजर आया जिसका मुकदमा सत्ता के पक्ष में माकूल फैसला सुनाये जाने पर राज्यसभा में ले जाता है । इनमें ही वह विमान भी रहा होगा जो बादलों में छिपकर राडार को धोखा देता है क्योंकि उसकी केवल आवाज सुनायी दे रही थी । अद्भुत नजारा था । सरकार की डरावनी ताकत आसमान को गुंजा रही थी और सड़क पर ट्रैक्टरों का विराट जत्था जनता के स्वागत को स्वीकारता चला जा रहा था । खड़े थे हम टिकरी बार्डर से आनेवालों के स्वागत के लिए लेकिन पता चला उनका रास्ता बदल दिया गया है । ये तो ढांसा बार्डर से उमड़े चले आ रहे हैं । जुलूस का स्वागत घरों की छतों से महिलाएं फूल बरसाकर कर रही थीं । छोटे बच्चे, युवतियां और बूढ़े लोग इस कदर बालोचित उत्साह से भरे थे जैसे इस क्षण की पवित्रता उन्हें रूपांतरित कर देगी । इस व्यापक जन समर्थन को देखकर यकीन हो गया था कि उस दिन की दुर्घटना से लगा धक्का दो दिन से अधिक कायम न रहेगा ।

लोकतंत्र के सिलसिले में बुनियादी मान्यताओं को फिर से जिंदा कर देने के अतिरिक्त इस आंदोलन ने अर्थशास्त्र की दुनिया में जिसे अर्थतंत्र का प्राथमिक क्षेत्र कहा जाता है उस किसानी को विचार की दुनिया में प्रमुखता दिलायी है । पत्रकारिता में इस आंदोलन ने ट्राली टाइम्सजैसी पत्रिका के प्रकाशन के जरिये उस धारा की याद फिर से ताजा कर दी जिसकी परम्परा मार्क्स और गांधी तथा गणेश शंकर विद्यार्थी और आंबेडकर जैसे विचारकों के पत्रकारीय पहलू से जुड़ी है । उसमें आधी पत्रिका पंजाबी में और आधी हिंदी में होने से उस एकजुटता का पता चलता है जिसे वर्तमान शासक पार्टी लाख कोशिशों के बाद भी तोड़ नहीं पा रही है । इसके अतिरिक्त भी आंदोलनों और ज्ञान के आपसी रिश्तों की छानबीन के लिहाज से इस आंदोलन को याद रखा जाना चाहिए । संचार माध्यमों में सोशल मीडिया फिलहाल सबसे अधिक लोकप्रिय है । उसमें शुरू से ही पूंजी और श्रम के बीच जंग छिड़ी हुई है । सरकार की ओर से बार बार इंटरनेट को बाधित करने की कोशिश और आंदोलनकारियों की ओर से उसे वापस हासिल करने का जो नजारा था उसे संसाधनों पर अधिकार की क्लासिक लड़ाई के बतौर दर्ज किया जाना चाहिए ।

इस ऐतिहासिक आंदोलन ने अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां भी बटोरीं । राष्ट्रवाद की सर्वव्यापी उपस्थिति के बावजूद ऐसे मंच रहे हैं जो केवल राष्ट्रों के समूह नहीं होते बल्कि उनके भीतर ऐसे क्षेत्रों से जुड़ी बातों पर सोच विचार होता है जिनका संबंध एकाधिक देशों से होता है । जीवन के तमाम ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें बहुतेरे देश मिलकर काम करते हैं । अंतरिक्ष किसी एक देश का इजारा नहीं है । किसी देश के हवाई जहाज के गुम होने पर भी सभी देश मिलकर उसकी खोज करते हैं । समुद्र में कुछ दूर तक तो पड़ोसी देश अपनी सीमा मानते हैं लेकिन उसके बाद का इलाका सबके लिए खुला होता है । इसी तरह पर्यावरण और धरती की पारिस्थितिकी का सवाल भी अंतर्राष्ट्रीय सहकार के बिना हल नहीं हो सकता । हम सभी जानते हैं कि इन जैसे मामलों के लिए अंतर्राष्ट्रीय करार और संस्थाओं का तंत्र होता है जो संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ ही काम करते हैं । अंतर्राष्ट्रीय सहकार के इन औपचारिक सरकारी रूपों के अतिरिक्त जनता के बीच भी सहकार के तमाम रूप मौजूद होते हैं । इनके कारण भी दुनिया के किसी हिस्से में आयी आपदा में देशों की सरहदों के पार भी सहयोग किया जाता है । शिक्षा के केंद्रों का नाम विश्वविद्यालय होना बताता है कि ज्ञान भी अंतर्राष्ट्रीय सहकार का ही क्षेत्र है ।

इसी तरह आंदोलनों में भी एक पारदेशीय सहकार होता है क्योंकि देश तो बाद में बने, मनुष्य पहले से मौजूद था और उसकी कुछ तकलीफें साझा होती हैं । वैश्वीकरण के बाद इस तरह का सहकार बढ़ता ही गया है । विश्व आर्थिक मंच के मुकाबिल विश्व सामाजिक मंच हाल की बात है । दोनों नामों के बीच का अंतर मनुष्य के बारे में विरोधी नजरियों का इजहार भी था । संकीर्ण राष्ट्रवाद इस सहकार पर तरह तरह की बंदिशें लगाने की चेष्टा करता है । मौजूदा किसान आंदोलन के दौरान कनाडा के राष्ट्रपति से लेकर ग्रेटा थनबर्ग तक इस अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के विभिन्न रूप देखने में आये । पश्चिम के कुछ लोकप्रिय कलाकारों के हस्तक्षेप ने सबको उस दुनिया से परिचित कराया जिसमें कलाकार की सामाजिक भूमिका हुआ करती है ।

सबसे आगे बढ़कर इस आंदोलन ने लोगों के दिमाग में बनावटी (सिंथेटिक) पौराणिक स्मृतियों को बिठा देने की शासकीय कोशिशों के मुकाबले स्वाधीनता आंदोलन की ठोस ऐतिहासिक स्मृतियों को जगा दिया है । डेरा डाले लोगों से सामूहिकता का मनोविज्ञान भी समझने में आ रहा है । चालीस से अधिक संगठनों का सब समय समन्वय इतिहास में बहुत कम मौकों पर हुआ होगा । जिसे आंदोलन कहा जाता है वह कैसे उतार चढ़ाव से होकर गुजरता है इसकी शिक्षा भी नयी पीढ़ी के आंदोलनकारियों को प्रत्यक्ष मिल रही है । इस पीढ़ी का राजनीतीकरण जितनी तेजी से और जितनी कम उम्र में हो रहा है उसने युवाओं को उपभोक्ता मात्र बना देने की योजना को धक्का पहुंचाया है । सभी बार्डरों पर आंदोलनकारियों के साथ ही पुस्तकालय, सिनेमा और गायन का जो समां है उसने इस आंदोलन को जन शिक्षण की अद्भुत प्रयोगशाला में बदल दिया है । इस आंदोलन ने कम से कम यह तो साबित किया कि देश में एक कृषि मंत्री हैं और उनका नाम सबको याद रहेगा । किसानों ने सरकार के साथ पूरी वार्ता के दौरान लंगर से आया भोजन ही ग्रहण किया । इस पर जब एक सरकारी वार्ताकार ने कहा कि आप हमारा दिया खा नहीं रहे तो हम भी आपका दिया नहीं खायेंगे तो एक किसान प्रतिनिधि ने जो जवाब दिया वह किसान के आत्मविश्वास का परिचय देने के लिए बहुत है । हरियाणा के किसान प्रतिनिधि ने अत्यंत सहज भाव से बोला कि हमारा दिया नहीं खाओगे तो क्या घोड़े की लीद खाओगे !