Tuesday, November 19, 2019

अंबेडकर के बुद्ध


                       
                                     
अंबेडकर के बौद्ध बनने के बारे में अक्सर इस सोच के साथ बात होती है मानो अशोक के बौद्ध होने की घटना की पुनरावृत्ति हुई हो । स्वाभाविक बात तो यह थी कि इस घटना को अंबेडकर के समय संदर्भ में रखकर समझने की कोशिश की जाती लेकिन धर्मांतरण के विरोध में खड़ी ताकतें तो इसकी याद भी मिटा देना चाहती हैं । साफ है कि अंबेडकर यह काम अपने समय के हिसाब से कर रहे थे । इसके लिए उन्होंने बुद्ध को नए समय के मुताबिक प्रासंगिक बनाया । बुद्ध के इस नवीनीकरण को अंबेडकर की इस किताब के सहारे देखा जा सकता है । यह किताब 1956 में काठमांडू में बौद्धों के एक सम्मेलन में दिया गया उनका भाषण है । 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद 20 नवंबर को उन्होंने यह भाषण दिया था । इस भाषण में जो बातें उन्होंने सूत्र रूप में कहीं उन्हें विस्तारित करके 2 दिसंबर को पुस्तिका का रूप दिया । यह उनका आखिरी लेखन साबित हुआ । 6 दिसंबर को उनका देहांत हो गया । आश्चर्य नहीं कि सवर्ण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकारों ने बाबरी मस्जिद की शहादत के लिए यही तारीख तय की      
बाबा साहब अंबेडकर के धर्मांतरण के तथ्य को उजागर करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उनके तईं धर्म बदलने का अधिकार सामाजिक लोकतंत्र का सबूत है । चाहे अंतर्जातीय विवाह का मामला हो या धर्मांतरण का, उनकी बातें और काम लोकतंत्र को महज औपचारिक बनाए रखने के विरुद्ध लक्षित हैं । लोकतंत्र को वे समता और स्वतंत्रता से अलग करके देखने के पक्ष में नहीं थे । पेशे के चुनाव में स्वतंत्रता के जरिए वे सामाजिक गतिशीलता हासिल करना चाहते थे तो अंतर्जातीय विवाह के जरिए स्त्री स्वाधीनता की गारंटी करना चाहते थे । धर्मांतरण का अधिकार मनुष्य के बालिग होने पर स्वतंत्र पहचान बनाने के उसके हक से जुड़ा हुआ है बालिग व्यक्ति जिस तरह स्वतंत्र तरीके से अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए आजाद होता है उसी तरह अपना जीवनसाथी और धर्म चुनने की आजादी भी उसका हक है यह सवाल जातिप्रथा के उन्मूलन की उनकी कोशिश से भी सम्बद्ध है व्यक्ति की जाति का निर्धारण जैसे जन्मना नहीं होना चाहिए उसी तरह उसके धर्म का निर्धारण भी उसके जन्म के आधार पर नहीं होना चाहिए धार्मिक स्वतंत्रता के भीतर ही धर्मांतरण का अधिकार भी आता है धर्मांतरण पर पाबंदी की कोशिश का मतलब धार्मिक स्वतंत्रता की समाप्ति है । इसलिए यह धार्मिक स्वतंत्रता मनुष्य की निजी अनुल्लंघनीय स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है । इन तमाम स्वाधीनताओं के आधार पर वे लोकतंत्र को राजनीतिक सीमा से मुक्त करके समाज में एक जीवन पद्धति के बतौर स्थापित करना चाहते थे ।
बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के उनके फैसले का भी सन्दर्भ व्यापक है । स्वाधीनता से पहले न केवल अंबेडकर बल्कि बहुतेरे बौद्धिक जन इस धर्म के बारे में लिख पढ़ रहे थे । हिंदी के विद्यार्थी राहुल सांकृत्यायन के नाम से भली भांति परिचित हैं । उन्होंने राहुल नाम बुद्ध के पुत्र से लिया था और बौद्ध भी बने थे । उनके ही साथी हिंदी के मशहूर कवि नागार्जुन का नाम भी प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक के नाम से लिया हुआ है । इन दोनों ने अपने मूल नाम छोड़कर न केवल बुद्ध से जुड़े नाम अपनाए बल्कि सामंती विरासत से प्राप्त जातिगत पहचान से भी मुक्ति पाने की कोशिश की । दोनों का संबंध कम्यूनिस्ट आंदोलन से था । इस आंदोलन की प्रेरणा भी बुद्ध के साथ अपने को जोड़ने के उनके फैसले के पीछे जरूर रही होगी । अकारण नहीं था कि अंबेडकर ने बुद्ध को मार्क्स के साथ जोड़ा ।
इस जुड़ाव का रिश्ता स्वाधीनता आंदोलन से भी था । हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन को पूरी दुनिया के उपनिवेशों में जारी मुक्ति आंदोलनों का अंग समझा जाता था । आजादी के आंदोलन के भीतर भी यह चेतना 1920 के बाद तेजी से बढ़ने लगी थी । गांधी से लेकर भगत सिंह तक लगभग प्रत्येक स्वाधीनता सेनानी ने विदेशों में चलने वाले लोकतांत्रिक आंदोलनों के साथ खुद को जोड़ा था । उपनिवेशवाद से पीड़ित पड़ोसियों में बौद्ध धर्म को मानने वालों की तादाद अधिक थी । उस समय चीन, जापान, बर्मा और श्रीलंका को ही हम अपना पड़ोसी मानते थे और जानते थे कि आजादी के बाद हमारी किस्मत इनके साथ नत्थी रहने वाली है । बुद्ध और बौद्ध धर्म में तत्कालीन व्यापक रुचि को इस सन्दर्भ में भी देखा जाना चाहिए । बुद्ध में व्यापक रुचि का सबूत उस जमाने में लिखी अनेकानेक हिंदी किताबें हैं । इन किताबों के लेखक परशुराम चतुर्वेदी से लेकर रामवृक्ष बेनीपुरी तक थे । बुद्ध के प्रति इस अनुराग का सीधा संबंध भारत के उपनिवेशोत्तर सपने से था । तब कौन सोच सकता था कि एक समय ऐसा आएगा जब साम्राज्यवादी अमेरिका की गैर बराबर दोस्ती से देश को आत्मविश्वास हासिल होगा । खास बात कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में वामपंथ की मजबूत उपस्थिति थी । सबको मालूम था कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध सबसे सुसंगत मोर्चा कोमिंटर्न (तीसरा इंटरनेशनल) के नेतृत्व में खुला हुआ था । इसका नेतृत्व रूस की कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी । स्वाधीनता के लिए संघर्षरत दुनिया की लगभग सभी उपनिवेशवाद विरोधी ताकत के साथ लेनिन की पार्टी का सक्रिय संवाद था । इस विशेष स्थिति के चलते मार्क्स के चिंतन का गहरा प्रभाव हमारे देश के बौद्धिक समुदाय पर भी था । बुद्ध के साथ मार्क्सवाद के संवाद की यह लम्बी परम्परा स्वाधीनता के बाद भी लम्बे समय तक बनी रही । अचरज की बात नहीं है कि हिंदी साहित्य में नक्सल आंदोलन की सबसे सुसंगत साहित्यिक अभिव्यक्ति लेकर आने वाले गोरख पांडे ने भी एक लेख लिखा ‘बौद्ध दर्शन और धर्मनिरपेक्षता’ । सनद रहे कि यह लेख सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में आयोजित दर्शन की एक संगोष्ठी में प्रस्तुत किया गया था । जिस तरह मार्क्सवाद के साथ संवाद के लिए अंबेडकर ने बुद्ध के चिंतन को नया रूप दिया था उसी तरह गोरख पांडे ने धर्मनिरपेक्षता से उसके रिश्ते को व्याख्यायित करने के लिए बौद्ध धर्म और बौद्ध दर्शन को एक दूसरे से अलगाया और बौद्ध दर्शन में भावना की जगह बुद्धि की प्रबलता को माना ।       
अंबेडकर की इस पुस्तिका पर देश के भीतर और दुनिया भर में व्याप्त मार्क्सवाद के तत्कालीन आकर्षण की छाया है । उस समय के बौद्धिकों में रूस की बोल्शेविक सत्ता का आकर्षण तो था ही, 1949 में चीन की क्रांति भी संपन्न हो चुकी थी । उसके ठीक पड़ोसी देश नेपाल में वह सम्मेलन चल रहा था जिसमें अंबेडकर भाषण दे रहे थे । चीन के बौद्धों में मार्क्सवाद का गहरा असर था शायद इसलिए भी वे इस पुस्तिका में मार्क्सवाद से संवाद करना जरूरी समझ रहे थे । इस अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति के साथ हमारे देश के वातावरण ने भी उन्हें मार्क्सवाद के साथ संवाद के लिए प्रेरित किया होगा । 1952 के पहले आम चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी संसद में दूसरा सबसे दल बनकर उभरी थी । उस पहले ही चुनाव में सबसे अधिक वोट एक कम्युनिस्ट प्रत्याशी को मिले थे । केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत कई विधानसभाओं में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी की मजबूत मौजूदगी थी । कुछ ही समय बाद दूसरे चुनाव में पहली विपक्षी सरकार का गठन कम्युनिस्टों के नेतृत्व में होना था । ‘हिन्दी-चीनी भाई भाई’ का जमाना था । इन सब चीजों का गहरा प्रभाव इस पुस्तिका पर दिखाई पड़ता है ।        
मार्क्सवाद के साथ संवाद बनाने की अंबेडकर की इसी प्रवृत्ति का परिणाम है कि एक पाश्चात्य मार्क्सवादी अंतोनियो ग्राम्शी के साथ उनकी तुलना करते हुए 2013 में रटलेज से कोसिमो ज़ीन के संपादन मेंद पोलिटिकल फिलासफीज आफ़ अंतोनियो ग्राम्शी ऐंड बी आर अंबेडकर: इटिनेरेरीज आफ़ दलित्स ऐंड सबअल्टर्न्सका प्रकाशन हुआ । किताब के शुरू में संपादक की लंबी भूमिका और अंत में उपसंहार के अलावा पांच भाग हैं । पहले भाग के तीन लेखों में निम्न वर्गों और दलितों को इतिहास के कर्ता के रूप में देखने और स्थापित करने की प्रक्रिया का विवरण है । दूसरे भाग के दो लेखों में बौद्धिकों के प्रकार्य का विश्लेषण किया गया है । तीसरे भाग के तीन लेखों में निम्नवर्गीयता और सहजबोध का संबंध समझाया गया है । चौथे भाग के दो लेखों में दलित साहित्य, निम्नवर्गीयता और चेतना के निर्माण को देखा गया है । अंतिम पांचवें भाग में तीन लेखों में निम्न वर्गों तथा दलितों के धर्म की चर्चा की गई है । कहने की जरूरत नहीं कि दलित समस्या पर विचार के मामले में एक मशहूर मार्क्सवादी विचार की सृजनात्मक विश्लेषण क्षमता का मेल अंबेडकर की पद्धति से नजर आता है जिसमें दलित प्रश्न पर एकांगी तरीके से नहीं बल्कि समग्रता के साथ सोचा गया है ।
अंबेडकर के साथ मार्क्सवाद के मिलाप की सम्भावना को ही ध्यान में रखकर भाकपा (माले) के महासचिव विनोद मिश्र ने उन्हें ‘क्रांतिकारी जनवादी’ कहा था । मार्क्सवादी लोग यह विशेषण आम तौर पर उन गैर मार्क्सवादियों को देते हैं जिनका चिंतन मार्क्स के चिंतन से सबसे अधिक निकट का होता है । यही नहीं जमीन पर सामंती स्वामित्व को तोड़ने के लिए अंबेडकर की ही तर्ज पर उन्होंने भूमि के राष्ट्रीकरण का प्रस्ताव किया था । वर्ग और जाति की पारस्परिकता का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखाकतिपय ऐतिहासिक परिस्थितियों में यह (वर्ग) खुद को जातियों के रूप में अभिव्यक्त कर सकता है, दूसरी स्थितियों में ये दोनों साथ-साथ गुंथे भी रह सकते हैं, एक दूसरे को ढंक ले सकते हैं और उसी समय एक दूसरे को काट भी सकते हैं । फिर एक भिन्न परिस्थिति में जातियां विखंडित होकर वर्गों का भी निर्माण करती हैं ।जाति और वर्ग के अंतर्संबंध की इस गतिशील समझ ने भाकपा (माले) को दलित महासभा के गठन की प्रेरणा भी दी थी । उन्होंने मार्क्सवाद और अंबेडकर के बीच व्यावहारिक सहकार की गुंजाइश का संकेत करते हुए बतायाबेशक, भारतीय जनवादी क्रांति के फौरी संदर्भ में कार्यवाहियों का मार्क्सवादी कार्यक्रम अंबेडकरवाद के रैडिकल पक्ष के साथ काफी कुछ साझेदारी कर सकता है---’। इसी बात को और भी अच्छी तरह से फिर बताते हैं ‘---मैं स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि रैडिकल अंबेडकरपंथी शक्तियों के साथ किसी मंच में शामिल होना या अंबेडकर जयन्ती समारोह में हमारे लोगों का शरीक होना किसी भी तरह हमारी पार्टी की नीति के खिलाफ नहीं जाता है । हम अंबेडकर को एक रैडिकल जनवादी मानते ही हैं और अपने मुश्तरका जनवादी प्रयासों में हम रैडिकल अंबेडकरपंथी शक्तियों के साथ हाथ मिलाने के बिलकुल पक्षधर हैं ।उन्होंने पार्टी की नीति घोषित किया किजाति उत्पीड़न के खिलाफ और दलितों की सामाजिक समानता के लिए संघर्ष का बीड़ा उठाते समय वर्गसंघर्ष का दायरा बढ़ाना ही मार्क्सवादियों के लिए एकमात्र प्रस्थान बिन्दु हो सकता है ।अंबेडकर का समग्र मूल्यांकन करते हुए उन्होंने लिखासामाजिक-आर्थिक पहलू से अंबेडकर गांधी से, और यहां तक कि नेहरू से भी ज्यादा रैडिकल थे । राजनीतिक रूप से भी वे भारत में राष्ट्र निर्माण की जटिलताओं के बारे में ज्यादा वाकिफ थे । उन्होंने कभी भी तमाम चीजों से ऊपर एक राष्ट्रीय नेता होने का दिखावा नहीं किया, और दलित मुक्ति को स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न अंग बनाने की जोरदार पैरवी की। साथ ही ‘—यही वह सवाल है जिससे स्वतंत्रता के बाद भी भारत जूझ रहा है ।कहना न होगा कि मार्क्सवाद की ओर से अंबेडकर के मूल्यांकन के मामले में इस बेहद रचनात्मक रुख का आधार इस तथ्य में है कि भाकपा (माले) जिन खेत मजदूरों की लड़ाई लड़ रही थी उनकी भारी तादाद दलित जाति से जुड़ी हुई है । बिहार में इस संगठन की नींव रखने वाले जगदीश मास्टर के राजनीतिक जीवन का आरम्भ अछूतिस्तान के लिए आंदोलन से हुई थी ।     
मार्क्सवाद के साथ अंबेडकर ने थोड़ी बहस इससे पहलेजाति भेद का उच्छेदमें भी की है । उसके तीसरे अनुभाग में वे समाजवादियों के साथ बहस करते हुए कहते हैंधर्म, सामाजिक स्तर तथा सम्पत्ति- यह सभी ताकत और सत्ता के साधन हैं, जिन्हें दूसरे की स्वतंत्रता नियंत्रित करने के लिए व्यक्ति अपने पास रखता है । इनमें कोई एक समय तो दूसरा दूसरे समय प्रभावकारी होता है ।कुल मिलाकर वे भी वर्गसंघर्ष का दायरा बढ़ाने की वकालत कर रहे थे । असल में वे मार्क्सवाद को आर्थिक संघर्ष तक सीमित करके देख रहे थे लेकिन जहां तक सामाजिक क्रांति का सवाल है मार्क्स खुद ही इसके पक्षधर थे । उत्पादन संबंधों को वेसामाजिक अस्तित्व के उत्पादन की प्रक्रिया में बनाए गए अनिवार्य संबंधसमझते थे । शायद इसीलिए इन उत्पादन संबंधों के जंजीर बन जाने के बाद वे सामाजिक क्रांति की शुरुआत की वकालत करते थे । अपने विश्लेषण में राजनीतिक तत्व के मुकाबले सामाजिक तत्व को उन्होंने हमेशा प्राथमिकता दी । यहां तक कि अर्थतंत्र को भी वे सामाजिक स्वामित्व के मातहत लाना चाहते थे ।                                            

Saturday, October 26, 2019

अरुण माहेश्वरी के मार्क्स


                      
                                           
कार्ल मार्क्स के जन्म को दो सौ साल पूरे हो चुके हैं दुनिया भर में इस अवसर पर तमाम किस्म के आयोजन हुए लेकिन आयोजनों के अतिरिक्त मार्क्स को प्रासंगिक साबित करने में पूंजीवाद के संकट का योगदान कम महत्व का नहीं था मार्क्सवाद का निर्माण ही पूंजीवाद की कब्र खोदने के अस्त्र के रूप में हुआ था मार्क्स का समूचा जीवन और लेखन पूंजीवाद को मटियामेट करने में सक्षम शक्ति और साधन की खोज में बीता था कहने की जरूरत नहीं कि पूंजीवाद के संकट मार्क्सवाद के लिए संजीवनी का काम करते हैं मुक्तिबोध के शब्दों मेंजो तुम्हारे लिए विष है, वह मेरे लिए अन्न है इसके अतिरिक्त पश्चिमी दुनिया तथा अन्य ढेर सारे देशों के नव उदारवाद विरोधी आंदोलनों ने भी उसे जीवंत बनाए रखने में भरपूर मदद की चरम निराशा के दौर में लैटिन अमेरिकी देशों के वाम उभार ने भी उम्मीद को जिंदा रखा तमाम देशों में अति दक्षिणपंथ या फ़ासीवादी विचारों की विजय के बावजूद बीच बीच में किसी किसी मुल्क से जनता के जागरण की खबर आती ही रहती है   
सोवियत संघ के पतन, चीन के तिएन आन मेन की घटना और बर्लिन की दीवार गिरने से मार्क्सवाद के अवसान का जो शोर मचा हुआ था उस पर हाल के दिनों में कुछ विराम लग गया है फिर से मार्क्स की बात होने लगी है प्रचंड विरोधियों को भीमार्क्सवाद का अर्धसत्यलिखना पड़ रहा है ऐसे में सूर्य प्रकाशन मंदिर से इसी साल प्रकाशितबनना कार्ल मार्क्स काके लेखक अरुण माहेश्वरी ने इस किताब के लेखन के जरिए बहुत ही सार्थक हस्तक्षेप किया है किताब में अलग अलग लेखों के जरिए मार्क्स के बचपन, शिक्षा, युवा हेगेल के साथ संवाद तथा हेगेलपंथी समूह से अलग होकर स्वतंत्र सैद्धांतिक राह बनाने की कहानी है लेखक अरुण माहेश्वरी लेखन के साथ पत्रकारिता से भी जुड़े हुए हैं इसलिए उनकी भाषा में प्रचुर संप्रेषणीयता है । लेखक की भाषा के अतिरिक्त पुस्तक की प्रस्तुति भी बेहद सृजनात्मक है । लगभग सभी पृष्ठों पर उस प्रसंग से जुड़े किसी चित्र या संदर्भित किताब की तस्वीर लगाए गए हैं जो प्रसंग उस पृष्ठ पर वर्णित है । इससे पाठक को लिखित के साथ दृश्य का सुख भी मिलता चलता है ।
मार्क्स के बारे में किसी भी लेखन को कड़ी आलोचना से गुजरना लाजिम है । खुद मार्क्स वर्तमान की ऐसी निर्मम आलोचना के पक्षधर थे जो न तो शासन के कोप से और न अपने निष्कर्षों से सकुचाए । ऊपर से तो लगता है कि समय बुनियादी रूप से बदल गया है इसलिए पुरानी खेमेबंदियों पर भी विराम लग गया होगा । इस सवाल पर भी मार्क्स हमारी मदद करते हैं । उनका कहना था कि चीजें जितना बदलती हैं उतना ही पुराने के समान होती जाती हैं । विषमता या शोषण जैसे तथ्य उसी तरह की चीजें हैं जो तमाम तकनीकी, राजनीतिक, समाजार्थिक और सांस्कृतिक बदलावों के बावजूद समाप्त नहीं हुए । परिवर्तन के साथ निरंतरता की संलग्नता उनकी द्वंद्ववादी पद्धति की जान है । इसीलिए कुछ विद्वान इस दौर में भी शीतयुद्ध की निरंतरता देख रहे हैं । मशहूर मार्क्सवादी रणधीर सिंह एक कविता के सहारे कहते थे कि मार्क्स के अनुयायी भले बदल गए हों लेकिन उनके दुश्मनों में कोई बदलाव नहीं आया है । कुल मिलाकर यह कि मार्क्स के बारे में अतीत की दलबंदियों का खात्मा अब भी नहीं हुआ है । अगर इसके बारे में कोई भी संदेह हो तो जान लें कि हाल में लंदन में उनकी समाधि पर तोड़ फोड़ की गई । उनकी प्रासंगिकता के बारे में इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि दो सौ साल बाद भी कब्र में उनकी मौजूदगी नाकाबिले बर्दाश्त समझी गई ।   
सोवियत संघ के ढहने के बाद दुनिया भर में मार्क्स के अप्रासंगिक होने का जो शोर पैदा हुआ वह थोड़े ही दिनों के बाद बंद हो गया क्योंकि चुनौती न रहने से पूंजीवाद ने अपना मानवभक्षी रूप जाहिर करना शुरू कर दिया । संसार को शांति की आशा थी लेकिन उसकी जगह लगातार चलने वाले युद्धों का आदी बनना पड़ा । ऐसे में आहिस्ता आहिस्ता मार्क्स की चर्चा शुरू हुई । इसकी शुरुआत उनकी जीवनियों से हुई । नए समय की इन जीवनियों पर उनकी निंदा अभियान का असर था । उन्हें आर्थिक चिंतक मानने से भी परहेज करने वाली जीवनियों का प्रकाशन शुरू हुआ । उनको मानवीय साबित करने के लिए चिंतक की जगह व्यक्ति मार्क्स पर ध्यान केंद्रित किया गया । ठीक सदी के मोड़ पर फ़्रांसिस ह्वीन की लिखी जीवनी प्रकाशित हुई । इसके बाद जोनाथन स्पर्बर की लिखी जीवनी में तो कहा ही गया कि उन्हें उनके समय में अर्थात उन्नीसवीं सदी के संदर्भ में समझा जाना चाहिए । इसी क्रम में गारेथ स्टेडमान जोन्स की प्रकाशित हुई जीवनी से लेखक ने अधिकतर तथ्य और उनकी व्याख्या ली है । इस जीवनी में भी व्यक्ति मार्क्स को स्थापित करने पर जोर था । उससे मदद लेने के चलते आरम्भिक अध्यायों में मार्क्स कवि और प्रेमी के बतौर मुख्य रूप से नजर आते हैं ।  
असल में मार्क्स के किसी भी जीवनी लेखक के लिए यह बहुत बड़ी दुविधा होती है कि वह मार्क्स के भीतर राजनीतिक कार्यकर्ता को उभारे या अध्येता को । अगर वह अध्येता मार्क्स पर जोर दे तो आज के ज्ञानानुशासनों में से उन्हें किसमें अवस्थित करे । यह मुश्किल मार्क्स की नहीं थी, वे तो इनके बीच कोई बुनियादी भेद नहीं मानते थे । यह समस्या उनके जीवनी लेखकों की है जो न केवल मार्क्सवाद विरोधी शोरोगुल के शिकार हैं, बल्कि ज्ञानानुशासनों के कठोर विभाजन के माहौल में दीक्षित हैं ।
असल में मार्क्स को कवि या प्रेमी के बतौर चित्रित करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि मार्क्स को उनके समर्थक और विरोधी कवि या प्रेमी होने के नाते नहीं मिले । जिन्होंने उनके विचारों को अपनाया उन्होंने पूंजीवादी समाज व्यवस्था के उन्मूलन का रास्ता उनके लेखन में पाया । इसी तरह जिन्होंने उन पर लगातार कोलतार पोतने की कोशिश की, कब्र तक में उन्हें चैन से नहीं रहने दे रहे हैं, वे उनके विचारों के क्रांतिकारी असर को समाप्त करने पर आमादा रहे हैं । दुरूह होने के बावजूद मार्क्स के आर्थिक विश्लेषण ने ही उन्हें पूंजीवाद के विरोधियों और समर्थकों के लिए प्रासंगिक बनाए रखा है । पहले एक समय मार्क्स को युवा और परिपक्व में बांटा जाता था । युवा मार्क्स के समर्थक उन्हें आर्थिक निर्धारणवाद से मुक्त बताते । लेकिन हाल के दिनों के शोध और लेखन ने इस कृत्रिम विभाजन को भी अमान्य कर दिया है । दिखाई पड़ा है कि शुरुआती लेखन के बहुत सारे सरोकार अंत तक बने रहे और परवर्ती लेखन में भी हेगेलीय दर्शन का परिप्रेक्ष्य कायम रहा । डेविड हार्वे या मार्चेलो मुस्तो जैसे लेखकों ने जोर दिया है कि उनका आर्थिक लेखन उन्हें वर्तमान के लिए प्रासंगिक बनाता है । यहां तक कि अभी 2019 में प्रकाशित माइकेल हाइनरिह की लिखी मार्क्स की जीवनी में व्यक्ति मार्क्स को प्रतिष्ठित करने वाली अन्य जीवनियों के बारे में वाजिब सवाल उठाते हुए मार्क्स के निर्माण की प्रक्रिया को उजागर करने की कोशिश है । संयोग से उसके पहले खंड में भी मार्क्स के जीवन के उसी काल का विवेचन है जिसे अरुण माहेश्वरी ने अपनी किताब में उठाया है । लेखक ने मार्क्स की जीवनियों की इस आलोचना को नहीं देखा इसलिए मार्क्स के आर्थिक चिंतन के पहलू को कम छुआ है ।
किताब में जीवन के अतिरिक्त विचार का विवेचन करते हुए लेखक ने एकदम शुरुआती समय पर ध्यान दिया है । इस क्षेत्र में उनका भरोसा डगलस मोगाच पर अधिक रहा है । किताब के शीर्षक के अनुरूप ही उन्होंने मार्क्स के वैचारिक निर्माण को उठाया है । इस मामले में हेगेल के असर और फिर उस असर से छुटकारे की कहानी कही गई है । किताब फ़ायरबाख के बारे में मार्क्स के मशहूर सूत्रों के विवेचन के साथ खत्म होती है । फ़ायरबाख से उनके वैचारिक अलगाव को लेखक ने स्वतंत्र विचारक के बतौर मार्क्स के उदय का लक्षक माना है । इस कहानी को भी विस्तार से अनेक लेखकों ने समझने की कोशिश की है । खासकर डेविड लियोपाल्ड की किताबद यंग कार्ल मार्क्ससे उन्हें कुछ अलग किस्म की कहानी मिल सकती थी । असल में मार्क्स के बौद्धिक विकास का यह चरण उनकी अधिकतर जीवनियों में वर्णन की तरह आता है । उनके बौद्धिक विकास की व्याख्या ठीक से नहीं हो पाती । उदाहरण के लिए हेगेल के प्रति उनके लगाव का जिक्र तो होता है लेकिन उसकी कोई संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलती । दार्शनिकों के उस देश में हेगेल ने विद्यार्थियों के इस समूह को किस वजह से आकर्षित किया । हेगेल के चिंतन में निहित क्रांतिकारी संदेश को अधिकांश जीवनियों में स्पष्ट नहीं किया जाता । खुद मार्क्स ने बताया है कि प्रशियाई शासक समूह ने हेगेल को घिनौनी चीज की तरह छोड़ दिया था । ज्यादातर लोग उन्हें भाववादी मानकर उनका जिक्र सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि मार्क्स ने उनके दर्शन को उलटकर खड़ा कर दिया था । युवा हेगेपंथियों को यह नाम दिया ही गया क्योंकि वे युवा हेगेल का पुनराविष्कार कर रहे थे और उनकी परवर्ती समझौतापरस्ती के विरोध में उनके ही विद्रोही तेवर को सामने रख रहे थे ।
मार्क्स के वैचारिक विकास का वह काल निश्चय ही महत्वपूर्ण था तभी इतने सारे विद्वानों ने उस समय को विवेचन-विश्लेषण के लिए चुना । माहेश्वरी जी ने मार्क्स के पेरिस प्रवास तक के शुरुआती हिस्से को अपनी किताब के लिए रखा । इसी दौर में हेगेलपंथियों से मार्क्स का अलगाव होने लगा था लेकिन यह अलगाव किसी निजी चिढ़ का नतीजा नहीं था, वरन वे जिस मार्ग पर बढ़ रहे थे उसके सूझने के साथ पुराने झाड़ झंखाड़ की सफाई जरूरी हो गई थी । मतलब कि किसी सकारात्मक विकास की दिशा में आगे जाने में पुरानी सोच बाधा बन रही थी इसलिए उसकी आलोचना जरूरी हो गई थी । वे अगर कुछ छोड़ रहे थे तो कुछ अपना भी रहे थे । अखबार के संपादन के क्रम में ही उन्हें आर्थिक सवालों पर ध्यान देने की जरूरत महसूस हुई थी । माहेश्वरी जी ने इस पहलू को उठाया होता तो विचार पक्ष के स्पष्टीकरण में अमूर्त उलझनों से बच सकते थे । वैसे जितना सीमित क्षेत्र उन्होंने अपने लिए चुना है उसमें मार्क्स की वैचारिक विकास यात्रा को खोलने में वे सफल हुए हैं ।
धर्म का सवाल उस समय भी बेहद तीखे वाद-विवाद का केंद्र बना हुआ था इसलिए अत्यंत स्वाभाविक था कि माहेश्वरी जी उस पर अधिक ध्यान देते । यह सवाल हमारे अपने समय के लिए भी बेहद जरूरी हो गया है । हताशा में बहुतेरे मार्क्सवादी सोचते हैं कि धर्म से मनुष्य का छुटकारा असम्भव है । इसके उलट कुछ और लोग सोचते हैं कि नास्तिकता ही वर्तमान की समस्याओं से छुटकारा दिला सकती है । ऐसे में मार्क्स के धर्म संबंधी विवेचन को समझना बहुत जरूरी है । वे मानते थे कि धर्म कुछ खास परिस्थितियों की उपज है । वह इस अन्यायपूर्ण समाज में मनुष्य की आवश्यकता है । इसलिए इस समाज को बदलने से ही मनुष्य के इस अलगाव को समाप्त किया जा सकता है । मार्क्स के जन्म की दो सौवीं सालगिरह में ऐसी ढेर सारी किताबों की जरूरत पहले से बहुत अधिक है ताकि कार्यकर्ताओं की नई खेप उनके विचारों से परिचित हो सके । फिलहाल दक्षिणपंथी उभार का जैसा शोर मीडिया में मचा हुआ है उसमें यह तथ्य दबा दिया जाता है कि तमाम किस्म के अनाचार और अत्याचार के समग्र विरोध की जैसी लहर चल रही है वैसा उभार बहुत कम देखने में आता है । राजनीति में मध्यमार्गी विकल्प की जगह सिकुड़ रही है और अगर इस खाली जगह को दक्षिणपंथ भरता दिखाई पड़ रहा है तो वामपंथ भी अपने को नई परिस्थितियों के आलोक में नवीकृत करता हुआ उसके पीछे चला आ रहा है । आंदोलनों की नई लहर से ढेर सारे नए कार्यकर्ता पैदा हो रहे हैं । उनके शिक्षण के लिहाज से किताब बेहद उपयोगी है ।