Tuesday, July 23, 2019

आक्सफ़ोर्ड की मार्क्स सहायिका


             
                                     
2019 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से मैट विडाल, टोनी स्मिथ, तोमास रोट्टा और पाल प्रेव के संपादन में द आक्सफ़ोर्ड हैंडबुक आफ़ कार्ल मार्क्सका प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना के बाद किताब के छह भागों में चालीस लेख शामिल किए गए हैं । पहले भाग के उन्नीस लेख मार्क्स की बुनियादी कोटियों पर केंद्रित हैं । दूसरे भाग में पांच लेख हैं जिनमें मजदूर, वर्ग और सामाजिक विभाजनों का विवेचन है । तीसरे भाग के तीन लेख पूंजीवादी राज्य और उसके दिशाकाश पर विचार करते हैं । चौथे भाग में भी पांच लेख हैं जिनमें पूंजीवाद के केंद्रकों में पूंजी संचय, संकट और वर्ग संघर्ष की छानबीन की गई है । पांचवें भाग में फिर पांच लेख हैं जिनका विषय हाशिये और अर्ध हाशिये के मुल्कों में पूंजी संचय, संकट और वर्ग संघर्ष है । अंतिम छठवें भाग के तीन लेख पूंजीवाद के विकल्पों का खाका पेश करते हैं । संपादकों का प्रस्तावना में दावा है कि इक्कीसवीं सदी में भी मार्क्स के विचारों और सिद्धांतों की प्रासंगिकता सदा की तरह कायम है । उनके देहांत के बाद उनके विचारों का असर राजनीति, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिक अर्थशास्त्र, इतिहास, दर्शन, भूगोल, मानवशास्त्र, कानून, पारिस्थितिकी, साहित्य अध्ययन, जन संचार और प्रबंधन पर भी पड़ा । उनको दफ़नाने की कोशिशों से उनकी ताकत का पता चलता है । पूंजीवाद की उनकी गहन आलोचना का आज भी कोई सानी नहीं है ।
इस आलोचना के चलते अर्थतंत्र, संस्कृति और राजनीति के संगठन का भीतरी तर्क और उसकी संरचना अनावृत हो जाती है । इन गहरी संरचनाओं को उजागर करने के बाद मार्क्सवाद चुनौतियों पर जीत पाने का रास्ता सुझाता है । इसके लिए उन्होंने मौजूदा सामाजिक संरचनाओं की आलोचना के साथ साथ विचारधारा और मनुष्य की रचनात्मक भूमिका का विश्लेषण किया । मानव अभिकर्ता के ठोस रूप में मजदूर वर्ग को पूंजीवाद के पार ले जाने में सक्षम समूह स्वीकार किया । आज के समय मार्क्सवाद की प्रासंगिकता का कारण संपत्ति की विषमता और शोषण, कार्य स्थल पर और समाज में अलगाव, वित्त, वित्तीकरण और वैश्वीकरण जनित अस्थिरता, भंगुर संसदीय लोकतंत्र को खतरे में डालने वाली राजनीतिक उथल पुथल, लैंगिक और नस्ली उत्पीड़न, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण का  विध्वंस, साम्राज्यवाद, मौद्रिक कटौती, प्रवासी संकट, बेरोजगारी तथा रोजगार की असुरक्षा हैं । पूंजीवाद के प्रत्येक बड़े संकट ने मार्क्स के विचारों में रुचि बढ़ाई । ऐसा 1857, 1873, 1929, 1973 और 2008 में हुआ ।
मार्क्सवाद के आलोचकों ने तो 1991 में सोवियत संघ के पतन के साथ ही उसे मृत घोषित कर दिया था और चीन के पूंजीवादी रूपांतरण की भविष्यवाणी कर दी थी । विडम्बना यह कि सोवियत संघ के पतन और चीन के पूंजीवाद की ओर बढ़ने के साथ पूंजीवाद के बारे में मार्क्स की बात सही साबित हुई । वह ऐसा विश्व बाजार बना जिसमें सामाजिक जीवन का प्रत्येक पहलू विक्रेय माल में बदल गया । 1840 दशक में मार्क्स ने जिस वैश्वीकृत वित्तीय विषमतापूर्ण अर्थतंत्र का पूर्वानुमान किया था वह इक्कीसवीं सदी में प्रकट हुई है । इसमें अंतर्विरोधों, टकरावों और संकटों समेत पूंजीवादी विकास के उनके बताए सभी नियम मौजूद हैं । उन्होंने जिन सामाजिक संरचनाओं और अंतर्विरोधों की बात की थी वे वैश्विक स्तर पर खुल रहे हैं । माल की व्याप्ति और मुनाफ़े की पागल आकांक्षा से कुछ भी और कोई भी अछूता नहीं बचा है । पूंजीपति वर्ग वैश्विक संपदा के अधिकाधिक हिस्से पर कब्जा करता जा रहा है । अनंत वृद्धि और अपार संचय की पूंजीवादी होड़ ने जलवायु परिवर्तन और आसन्न पार्यावरणिक विनाश को जन्म दिया है । जब तक समाज पूंजीवादी रहेगा तब तक उसके सर्वाधिक गहन विश्लेषक और क्रांतिकारी आलोचक के बतौर मार्क्स भी प्रासंगिक बने रहेंगे ।
जैसे जैसे मार्क्स में लोगों की रुचि बढ़ रही है उसी के समानांतर शक्षिक जगत में भी उनके विचारों के बारे में जिज्ञासा का प्रसार हो रहा है । हालिया वित्तीय संकट से पहले ही यह दिखाई देने लगा था । गूगल पर उनके बारे में सूचना खोजने वालों की संख्या 1977 से 1995 के बीच हर साल 1551 से 2208 के बीच रही है । 2005 में यह संख्या 7993 हो गई तो 2015 में 20136 । इसके बाद के दो सालों में इस संख्या में हल्की गिरावट देखी गई है । लगता है कि 1970 और 1980 के दशक में मार्क्सवाद संबंधी रुचि में कमी की वजह कुछ 1968 के विद्रोही आंदोलनों की पराजय और कुछ पूंजी के खुले वर्गीय हमले के समक्ष मजदूर वर्ग आंदोलन का बिखराव था । पूंजी ने यह हमला मुनाफ़े की गिरती दर को थामने और अवरोध से पार पाने के लिए 1970 दशक में किया था । एक और वजह सोवियत और चीनी समाजवाद का भरोसेमंद विकल्प के बतौर उभर न पाना भी थी ।
मार्क्स ने अपनी शब्दावली भी बनाई थी जिसका उपयोग मार्क्सवादी लोग आसानी से कर लेते हैं । उपयोग मूल्य, विनिमय मूल्य या द्वांद्वात्मक भौतिकवाद जैसी शब्दावली को समझना नए लोगों के लिए मुश्किल होगा । ऐसी स्थिति में संपादकों के अनुसार यह सहायिका नए जिज्ञासु के साथ किसी विशेषज्ञ के लिए भी मददगार हो सकती है । मार्क्स के बौद्धिक प्रसार की अंतरअनुशासनिकता को देखते हुए सहायिका में दार्शनिकों और इतिहासकारों के साथ समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों और राजनीतिविदों से भी लिखवाया गया है । सहायिका में विवेचित विभिन्न विषयों का परिचय देने से पहले संपादकों ने मार्क्स की संक्षिप्त बौद्धिक जीवनी प्रस्तुत की है ।
इस जीवनी में उनकी पद्धति पर विशेष ध्यान दिया गया है क्योंकि उनके शोध की शैली उनके निष्कर्षों से कम महत्व की नहीं है । कह सकते हैं कि इस पद्धति के कारण उनका लेखन दीर्घजीवी और प्रासंगिक बना हुआ है । जब उनका जन्म हुआ था उस समय त्रिएर में पुलिस निगरानी और उत्पीड़न आम बात थी । उनके स्कूल पर पुलिस का छापा पड़ा था और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए होने वाली सभा के चलते एक विद्यार्थी गिरफ़्तार हुआ था तथा प्रधानाध्यापक को निगरानी में रखा गया था । उच्च शिक्षण में कवि सभा में शामिल हुए जो राजनीतिक बहसों के लिए छद्म नाम से बनाई गई थी । पिता ने बर्लिन विश्वविद्यालय भेजा जहां पारिवारिक पेशे कानून के बदले दर्शन की ओर झुकाव पैदा हुआ । हाल में ही गुजरे हेगेल के आरम्भिक लेखन के विध्वंसक पहलू को सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध समूह में शामिल हो गए । ये लोग नास्तिकता, लोकतंत्र और गणतांत्रिकता की वकालत करते थे । बर्लिन में शोध के लिए निर्धारित चार साल पूरे हो चुके थे लिहाजा जेना विश्वविद्यालय में शोध प्रबंध जमा करके उपाधि अर्जित की । शिक्षा जगत में इस समूह के किसी भी सदस्य को जगह नहीं मिली थी इसलिए सभी स्वतंत्र लेखक बने या पत्रकारिता में जमे । मार्क्स भी राइनिशे जाइटुंग से जुड़े । उन्होंने इसे युवा हेगेलपंथियों का मुखपत्र बना दिया । प्रेस की आजादी, नास्तिकता, जंगल की लकड़ी पर स्थानीय लोगों के अधिकार, तानाशाही का विरोध और मोजेल घाटी के किसानों की गरीबी और दुर्दशा के लिए प्रशियाई राज्य की जिम्मेदारी जैसे विषयों को उठाया । उनके संपादक बनने के साल भर बाद अखबार को बंद कर दिया गया ।
मार्क्स पेरिस चले आए और फ़्रांसिसी तथा जर्मन क्रांतिकारियों के बीच संवाद विकसित करने के लिए एक पत्रिका निकालने की योजना बनाई । एक अंक निकलकर पत्रिका बंद हो गई क्योंकि प्रशिया ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया और जर्मनी आने वाली प्रतियों को जब्त कर लिया । साथ ही मार्क्स तथा पत्रिका से जुड़े अन्य लोगों के लिए वारंट जारी कर दिया । इस एक अंक में मार्क्स के दो और एंगेल्स के भी दो लेख शामिल थे । इनमें से एक राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना की रूपरेखा था । इसी लेख ने मार्क्स की गवेषणा का क्षेत्र बदल दिया । एंगेल्स के साथ पत्र व्यवहार हुआ और मुलाकात भी हुई । दोनों के बीच जीवन भर की दोस्ती का आरम्भ हुआ ।
वहीं रहते हुए हेगेल के अधिकार दर्शन की आलोचना में पहली बार जर्मन तानाशाही को उखाड़ फेंकने के लिए क्रांति की जरूरत बताई । इसमें ही पहली बार वर्ग विश्लेषण दिखाई पड़ा और मनुष्य की सार्वभौमिक मुक्ति के लिए सर्वहारा की मुक्ति को पूर्वशर्त घोषित किया । फिर यहूदी प्रश्न पर लिखते हुए पहली बार मानव मुक्ति के लिए पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने की बात की । पूंजीके दूसरे जर्मन संस्करण के पश्चलेख में उन दिनों को याद करते हुए मार्क्स ने बताया कि हेगेल की आलोचना करते हुए भी उनके द्वंद्ववाद का गहरा असर उन पर था जिसके मुताबिक ज्ञान के विकास के लिए सैद्धांतिक मान्यताओं के अंतर्विरोधों की परीक्षा करनी होती है और उन पर विजय पानी होती है । मार्क्स के मुताबिक हेगेल के दर्शन में भौतिक यथार्थ, विचार का साकार रूप था, लेकिन इस मान्यता के विपरीत मार्क्स ने माना कि विचार, मानव मस्तिष्क द्वारा प्रतिबिम्बित और चिंतन में अनूदित भौतिक यथार्थ होता है । उनका यह भी मानना था कि सामाजिक यथार्थ की सही समझ के लिए अध्ययन की विषयवस्तु के आंतरिक संबंधों का गहन विश्लेषण जरूरी होता है, तभी उसकी समग्रता में उसे ग्रहण किया जा सकता है ।
पेरिस में ही उन्होंने पूंजीवाद का अध्ययन शुरू कर दिया था । इसका फल आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियांहै । इनमें मौजूद अलगाव की उनकी धारणा सबसे अधिक मशहूर हुई । इसमें उन्होंने अपरिवर्तनीय मानव स्वभाव की जगह पर मानव प्राणी की ऐसी धारणा प्रस्तुत की जो सृजनात्मक मानव श्रम के रूप में खुद को सामाजिक तौर पर व्यक्त करता है । प्रकृति के साथ प्रत्यक्ष अंत:क्रिया के जरिए ही मनुष्य की सचेतन सृजनात्मक जीवनक्रिया प्रकट होती है । पूंजीवादी अर्थतंत्र इसी मानव सार से लोगों अलग कर देता है । पगारजीवी श्रमिक चार किस्म के अलगाव का शिकार होता है- अपने श्रम के फल से, उत्पादन प्रक्रिया से, मानव सार से और एक दूसरे से । इसी अलगाव का नतीजा निजी संपत्ति होती है । इस अलगाव के बिना पूंजीवादी अर्थतंत्र नहीं रह सकता है । अपनी पत्रकारिता के चलते फ़्रांस से देश निकाला हुआ । उन्हें बेल्जियम जाना पड़ा और वहां के अखबारों में समकालीन राजनीति के बारे में कुछ भी न लिखने का वादा करना पड़ा ।
एंगेल्स के साथ जो अगला काम किया उसका नतीजा जर्मन विचारधाराथी । उसमें अपने ऐतिहासिक भौतिकवादी नजरिए को ठोस रूप देना शुरू किया । इससे पहले मार्क्स ग्यारह सूत्री फ़ायरबाख थीसिसको कलमबद्ध कर चुके थे । शोध और व्यावहारिक राजनीति में संतुलन साधते हुए कम्युनिस्ट पत्राचार समितिबनाई । अगले साल ही वे कम्युनिस्ट लीगमें शामिल हुए और इसके लिए कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्रतैयार किया । इसमें उनके आगे के काम की सूचना देने वाली धारणाओं के दर्शन होते हैं । घोषणापत्र की प्रवाहपूर्ण शैली के चलते इन धारणाओं पर नजर नहीं पड़ती । काम के घंटे, श्रम की तीव्रता, मजदूर पर मशीन की प्रभुता और अतिउत्पादन जनित संकट की पूंजीवादी प्रवृत्ति जैसी धारणाओं का विकास उन्होंने आगे किया । इसके प्रकाशन के बाद बेल्जियम भी छोड़ना पड़ा । जर्मनी वापस आकर न्यू राइनिशे जाइटुंग शुरू किया और अखबार 1848 की यूरोपव्यापी क्रांतियों का मुखपत्र बन गया । फिर फ़्रांस भागना पड़ा और वहां से आखिरी शरण के बतौर लंदन ।
लंदन में आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का लगातार सामना करना पड़ा । एंगेल्स ने निरंतर आर्थिक मदद की लेकिन सेहत ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया । पत्नी को चेचक हो गई । वे ठीक तो हुईं लेकिन मार्क्स के काम की गति मंद पड़ गई । तमाम दिक्कतों से जूझते हुए भी मार्क्स ने अपना सैद्धांतिक काम जारी रखा और तब तक के लगभग सभी अर्थशास्त्रियों का लिखा छान मारा । पूंजीवाद की उनकी समझ ने सरकारों को तो उनका दुश्मन बना ही डाला था उनके कुछ साथी भी उनसे अलग हो गए । लंदन में रहते हुए ही 1848 की क्रांतियों की समीक्षा करते हुए लुई बोनापार्त की अठारहवीं ब्रूमेरलिखी । इसमें उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवादी पद्धति को घटनाक्रम के विश्लेषण में लागू किया । लंदन में ही जीवन के सबसे विशाल काम पूंजीकी तैयारी की और एक मसौदा लिखा । इसे ग्रुंड्रिसके नाम से जाना जाता है । इसमें उन्होंने अपनी पद्धति के बारे में स्पष्ट किया । दार्शनिक पृष्ठभूमि, ज्ञान की अतृप्त प्यास और विस्तृत विवरण को मेहनत के साथ सहेजने के चलते उनका विश्लेषण सबसे विशेष साबित हुआ । खुद के लिखे से संतुष्ट न होने की आदत के चलते पूंजीके प्रकाशन में पर्याप्त विलम्ब हुआ । इसी बीच हेर फ़ोग्ट ने भी बेवजह ढेर सारा समय लिया । लिखाई के दौरान भी राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे । सबूत इंटरनेशनल में उनका काम है । इसमें ही बाकुनिन से उनका मतभेद हुआ जो क्रांतिकारी कार्यवाही को सैद्धांतिक काम से अलग और अधिक महत्वपूर्ण मानते थे ।

मार्क्स ने तीन साल लगाकर 1472 पृष्ठों की पांडुलिपि तैयार की जिसके आधार पर अर्थशास्त्र की आलोचना में एक योगदानसे शुरू होकर पूंजी’, ‘भू-संपत्ति’, ‘पगारजीवी श्रमिक’, ‘राज्य’, ‘विदेश व्यापारऔर विश्व बाजारशीर्षक किताबें लिखी जानी थीं । बाद में उन्होंने योजना में कुछ बदलाव किया और लगकर पूंजीके तीन खंडों की पांडुलिपि तैयार की । छपाई के लिए पहले खंड को आखिरी रूप देते हुए भी शोध जारी रखा । बाद के संस्करणों में उन्होंने संशोधन और परिष्कार जारी रखा । आखिरकार तीसरे संस्करण के लिए संशोधन के पूरा होने और दूसरे तथा तीसरे खंड को आखिरी रूप देने से पहले ही उनका देहांत हो गया । बाद में एंगेल्स ने शेष दो खंड संपादित करके छपवाए । अब नई नोटबुकों के मिलने और छपने से उनके लेखन पर नई रोशनी पड़ रही है । जिन किताबों को वे पढ़ते थे उनसे नोट लेने की उनकी आदत के चलते उनके गवेषणा के तरीके को समझने में आसानी हुई है । कृषि विज्ञान में रुचि होने के कारण मृदा विज्ञान की खोजों के आधार पर उन्होंने पूंजीके बाद के संस्करण में संशोधन किए थे । पहले खंड की छपाई के बाद के शोधों में उन्होंने स्थानीय जलवायु पर मानव गतिविधि के असर संबंधी मान्यताओं पर ध्यान दिया था । उनकी नोटबुक में जंगल की कटाई से तापमान और बारिश पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख है । पशुओं को बांधकर रखने से उनकी सेहत में आने वाले बदलावों का भी जिक्र इनमें है । इन नोटबुकों से उनके शोध संबंधी परिश्रम का पता चलता है । अपनी परियोजना वे पूरी नहीं कर सके । असल में जो काम उन्होंने अपने लिए तय किया था उसे पूरा करना एक आदमी के लिए सम्भव भी नहीं था ।

Thursday, June 20, 2019

सिल्विया का क्रांतिकारी जीवन


               
1999 में प्लूटो प्रेस से मेरी डेविस की किताब सिल्विया पैंकहर्स्ट: ए लाइफ़ इन रैडिकल पोलिटिक्सका प्रकाशन हुआ । किताब की प्रस्तावना सिल्विया के पुत्र रिचर्ड पैंकहर्स्ट ने लिखी है । उनके अनुसार यह किताब जीवनी की जगह विश्लेषण है । उनके समय के राजनीतिक और अन्य किस्म के आंदोलनों तथा तमाम किस्म के लेखन पर विचार करके उनके समर्थकों और विरोधियों की सोच, पूर्वाग्रहों और आकांक्षाओं पर रोशनी डाली गई है । इस विवेचन से उनकी रूढ़िवादी माता और बहन से उनके अलगाव की वजह भी पता चलती है । उनकी विभिन्न मोर्चों की सक्रियता को लेखिका ने एक सूत्र में पिरो दिया है । इनके आपस में जोड़ने वाले तीन तत्व हैं- नारीवाद और समाजवाद की पक्षधरता तथा नस्लवाद का विरोध । इनसे मिलकर ही उनकी सोच का चौथा आयाम निर्मित होता है और वह है फ़ासीवाद विरोध ।
फ़ासीवाद के उनके सक्रिय विरोध का इतिहास 1919 से शुरू होता है जब उन्होंने बोलोना में फ़ासीवादी गिरोहों द्वारा समाजवादियों और आम नागरिकों की निर्मम पिटाई देखी । अपने फ़ासीवाद विरोध के चलते अक्सर वे बर्नार्ड शा से भी टकराईं क्योंकि उन्होंने मुसोलिनी की सरकार का समर्थन किया था । सिल्विया ने देखा था कि मुसोलिनी की सत्ता हिंसा और आतंक पर टिकी हुई है, इटली में स्कूलों का सैन्यीकरण हो रहा है, लड़कों को सैनिक बनने की सीख दी जा रही है, लड़कियों से जल्दी शादी करके सैनिक पैदा करने की अपील की जा रही है । यह भी दिखाई पड़ा कि सभी ऊंचे पद फ़ासिस्ट पार्टी के सदस्यों के लिए लगभग आरक्षित हैं । न केवल इतना बल्कि फ़ासिस्ट पार्टी के भीतर स्त्री सदस्य पुरुष सदस्यों से हीन मानी जाती हैं । इसके अतिरिक्त महसूस हुआ कि प्रेस की स्वतंत्रता का अपहरण हो गया है और केवल फ़ासिस्ट प्रेस की आवाज सुनाई देती है । कुल मिलाकर फ़ासीवाद प्रतिक्रियावादी और दमनकारी था । धीरे धीरे इस तथ्य को राजनीति से परहेज रखने वाले लेखकों ने भी समझा । सिल्विया को फ़ासीवाद में न केवल नागरिक अधिकारों का हनन नजर आया बल्कि स्त्रियों और मजदूरों का दमन भी इससे जुड़ा हुआ महसूस हुआ ।         
सिल्विया का नस्लवाद विरोध उपनिवेशवाद विरोध तक जाता है । अधिकतर जीवनी लेखकों ने सिल्विया के इस पहलू की उपेक्षा की है लेकिन इस किताब में उसे दर्ज किया गया है । इससे सिल्विया के आखिरी दौर को समझने में मदद मिलती है । इसके चलते ही उन्होंने इथियोपिया की आजादी का पक्ष लिया । उन्होंने माना कि मुसोलिनी के फ़ासीवाद का पहला शिकार इटली है तो दूसरा शिकार इथियोपिया है । अन्य मुद्दों पर सक्रियता के दौरान भी वे इथियोपिया के सवाल को नहीं भूलीं । इस पर जोर देने से दुनिया भर में फ़ासीवाद के कारनामों के उजागर करने का उन्हें मौका मिला । इस तरह सिल्विया ने अपने समय में नस्लवाद और उपनिवेशवाद के विरोध को समाजवाद और नारीवाद के साथ जोड़कर ऐतिहासिक योगदान किया ।        


Monday, June 17, 2019

लोकतंत्र और मार्क्स-एंगेल्स


                  
                                       
2000 में स्टेट यूनिवर्सिटी आफ़ न्यू यार्क प्रेस से अउगस्त एच निम्ज़, जूनियर की किताब मार्क्स ऐंड एंगेल्स: देयर कंट्रीब्यूशन टु द डेमोक्रेटिक ब्रेकथ्रूका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि मार्क्स-एंगेल्स की परियोजना के साथ राजनीतिक लोकतंत्र के विरोध की बात बीसवीं सदी में संसार भर में सत्य की तरह मानी जाती थी, यह किताब उसका खंडन करने के लिए लिखी गई है । इसी क्रम में मार्क्स-एंगेल्स को केवल चिंतक बना देने का भी खंडन किया गया है । उनका कहना है कि मार्क्स-एंगेल्स उन्नीसवीं सदी में होनेवाले लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रबल योद्धा थे । इन्हीं आंदोलनों के जरिए लोकतंत्र के लिए सदियों से जारी संघर्ष में निर्णायक जीत मिली थी । मार्क्स-एंगेल्स के इस योगदान का कारण उनका चिंतक से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ता होना था । इसी वजह से वे अपने राजनीतिक कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से प्रसारित कर सके थे । 1848 की क्रांतिकारी उथल पुथल में अपनी सक्रिय भागीदारी के चलते ही वे लोकतंत्र के लिए जारी संघर्ष में प्रभावी हस्तक्षेप लायक निष्कर्ष निकाल सके थे । असल में उनके लिए समाजवाद के लिए संघर्ष में ही लोकतंत्र की अग्रगति निहित थी ।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लोकतंत्र की स्थापना के अध्येता इसके पीछे सार्वभौमिक मताधिकार, निर्वाचित संसद के प्रति सरकार की जवाबदेही और नागरिक अधिकारों को हासिल करने के आंदोलनों के क्रम में मजदूरों के संगठन की ताकत मानते हैं । इस मजदूर वर्ग का निर्माण तो पूंजीपति वर्ग ने किया था लेकिन उसके आर्थिक संघर्षों में राजनीतिक चेतना पैदा करने में मार्क्स-एंगेल्स की निर्णायक भूमिका रही थी । इस उन्नत चेतना के चलते ही वे व्यापक लोकतांत्रिक आकांक्षा के पुरस्कर्ता बने । उस समय कम्यूनिस्ट अपने आपको लोकतांत्रिक आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज मानते थे । उनके सक्रिय सिद्धांतकार के रूप में मार्क्स-एंगेल्स ने लोकतांत्रिक क्रांति के साथ साथ राष्ट्रीयता के सवाल को मजबूती से उठाया । उस समय लोकतंत्र के लिए लड़ने वालों में तुलनात्मक रूप से सबसे सुसंगत स्वर उनका ही महसूस होता है । लोकतंत्र के लिए योद्धाओं में से एक के देहांत के बाद उनके साथी ने शेष उम्र इस लड़ाई में गुजारी । उनके बारे में किसी और नजरिए से सही तस्वीर नहीं बनती ।
उन्हें सक्रिय आंदोलनकारी के मुकाबले महान चिंतक साबित करनेवाले ब्रिटिश पुस्तकालय के उनके अध्ययन का हवाला देते हैं । अपने आखिरी महाग्रंथ पूंजीके लेखन की तैयारी के लिए वे लगातार इस पुस्तकालय में पढ़ते रहते थे । इस सोच के पीछे बौद्धिकों का खुद को महत्वपूर्ण समझना है । मार्क्स विचारों की इस महत्ता से सहमत नहीं थे । उनके मुताबिक विचारों के कार्यान्वयन के लिए सक्रिय मनुष्य की व्यावहारिक ताकत की जरूरत होती है । मार्क्स-एंगेल्स क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे और समझते थे कि लिखे को सक्रिय व्यवहार में उतारना होगा और इस अनुभव के आधार पर लिखना सीखना होगा । पूंजीके लेखन के दौरान भी वे पार्टी निर्माण का काम करते रहे । इस काम के चलते ही उनके विचार छोटी सी समाजवादी धारा से बाहर फैलकर शेष लोकप्रिय क्रांतिकारी विचारों से अधिक प्रभावशाली बन सके । मजदूर वर्ग की स्वतंत्र राजनीतिक कार्यवाही आजीवन उनका मार्ग निर्देशक सिद्धांत बना रहा । 1848 की क्रांतियों की पराजय के जरिए इतिहास की वास्तविक गति ने सिद्ध कर दिया कि लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने की इच्छा और माद्दा न तो बुर्जुआ उदारवादियों में है और न ही मध्य वर्गीय सुधारवादियों में । किसानों और शहरी निम्न बुर्जुआ के साथ मिलकर सर्वहारा ही इसकी जीत की गारंटी कर सकता है ।
इसी प्रसंग में लेखक ने मार्क्स के बारे में दो भ्रमों का उल्लेख किया है । एक कि उन्हें किसानों की चिंता नहीं थी । दूसरे कि उनका परिप्रेक्ष्य विकासशील देशों पर लागू नहीं होता । इनका निराकरण करने के अतिरिक्त लेखक ने इस बात पर जोर दिया है कि मार्क्स-एंगेल्स के बीच जितना भी अंतर हो लेकिन राजनीतिक कार्यवाही के मामले में उनमें जबर्दस्त एकता थी । मार्क्स के देहांत के बाद एंगेल्स की राजनीतिक सक्रियता को देखने से इस बात की पुष्टि होती है । किताब के लिखने में लेखक को मार्क्स-एंगेल्स समग्र से मदद मिली है । उनके कथन के सही संदर्भ को समझने के लिए प्रचलित संक्षिप्त उद्धरणों की जगह लम्बे उद्धरण दिए गए हैं । सही बात है कि उनका लिखा सब कुछ समान महत्व का नहीं है । फिर भी लेखक ने उनकी चिट्ठियों को भी भरपूर तवज्जो दी है । इस मामले में एंगेल्स के अंतिम दशक के पत्रों में बहुत महत्व की बातें हैं । अपनी किताबों में जो बातें वे नहीं कह सके थे उन्हें इन चिट्ठियों में दर्ज किया है । इसके अतिरिक्त प्रथम इंटरनेशनल की जनरल कौंसिल की बैठकों के विवरण भी खासे महत्व के लगते हैं ।
किताब के लिखने के आम माहौल के बतौर वे सोवियत खेमे के पतन और पूंजीवाद के वैश्विक संकट का उल्लेख करते हैं । इन दोनों का परिणाम दुनिया भर में फ़ासीवाद का उभार है । मार्क्स-एंगेल्स ने इस परिणति का विकल्प प्रस्तावित किया था । इसीलिए उनके बारे में जानना जरूरी है । उन्होंने लोकतंत्र के लिए संघर्ष को जरूरी समझा था और इसे सामाजिक क्रांति का अविभाज्य घटक माना था । दुर्भाग्य से इस सबक को बीसवीं सदी की क्रांतियों में पर्याप्त रूप से याद नहीं रखा गया था । उनकी राजनीति का असली मूल्यांकन वर्ग संघर्ष यानी सर्वहारा की लड़ाइयों के साथ जुड़े व्यवहार की प्रयोगशाला में ही होगा ।

Thursday, May 30, 2019

मार्क्सवाद की नवीनता


          
                           
(जयपुर में जलेस की ओर से आयोजित कार्यशाला में बोलना साहित्य और विचारधारा पर था लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मार्क्सवाद पर जारी काम के चलते बोला मार्क्सवाद के उतार चढ़ाव पर । बोलने के बाद कुछ चर्चा भी हुई जिसके आलोक में कुछ सुधार किया गया है । मूल वक्तव्य की अनौपचारिकता को भी कम कर लिया गया है । बोले को लिखे में सलमान ने बदला है । इसके बाद संपादन हुआ ।)
सोवियत संघ के पतन के बाद कहा जाने लगा कि मार्क्सवाद समाप्त हो गया है । लेकिन इक्कीसवीं सदी की बदलती हुई परिस्थितियों में ढेर सारा नया काम हो रहा है । इस सिलसिले में याद रखना होगा कि मार्क्स ने जो कहा कि दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की व्याख्या की है लेकिन सवाल तो उसे बदलने का है । तो मार्क्स के इस कथन की व्याख्या इस तरह की जाती है जैसे व्याख्या करना कोई बुरी बात हो । असल में इसका मतलब है- इस तरह की व्याख्या जो बदलने की प्रेरणा दे । मार्क्सवाद व्याख्या का निषेध नहीं करता । इस संदर्भ में देखना होगा कि बदले हुए समय की व्याख्या मार्क्सवाद कर पा रहा है या नहीं और कि इस व्याख्या से हम बदलाव के उपकरण तलाश कर पा रहे हैं या नहीं ।
मार्क्सवाद के बारे में आम धारणा है कि वह पुराने जमाने की बात हो गया है । इसे हम सब अपनी सभाओं में बुजुर्गों की बहुतायत से समझ सकते हैं । लेकिन पिछले दिनों तमाम नए लोग सामने आए हैं जो नए समय की चुनौतियों के समक्ष बदलाव की सम्भावना के लिए लगातार काम कर रहे हैं । कहने का मतलब यह है यह जो नया समय है इसको व्याख्यायित करने में, इसको समझने में और मूलतः इसको बदलने में मार्क्सवाद कोई उपकरण उपलब्ध करा रहा है कि नहीं इस दृष्टि से पिछले दिनों मैंने कुछ एक चीज़ों का अध्ययन किया । इस सिलसिले में हमें सफलता को पैमाना बनाने की जगह प्रयास को पैमाना बनाना होगा । नागार्जुन ने तो लिखा ही है ‘जो नहीं हो सके पूर्णकाम उनको प्रणाम’ तो कहने का मतलब है कि सफलता से अधिक महत्व प्रयास का है क्योंकि यह जो व्यवस्था है बनाई हुई पूंजीवाद की उसमें सफल लोग हमेशा मुठ्ठी भर ही हो सकते हैं, ज्यादातर लोग वंचित ही होते हैं, हारे हुए ही होते हैं । इसके मद्देनजर यह भी कि पिछले दिनों चुनावी क्षेत्र में जो परिवर्तन आया उसके समक्ष बहुत सारे लोगों ने बहुत सारी बातें कहीं लेकिन उस राजनीतिक परिवर्तन से सबसे बड़ी सीख जो हमें लेनी चाहिए वह यह कि डट करके काम करना होगा । पिछले दिनों का जो राजनीतिक परिवर्तन है उसने और कुछ बताया हो या न बताया हो यह तो बताया ही है कि अगर टिक कर के, एड़ी टिकाकर के काम करते रहते हैं तो फिर अनुकूल परिस्थितियों में बदलाव आता है ।
इसके मद्देनजर मुझे यह लगा कि मार्क्सवाद के सिलसिले में नए समय में क्या हो रहा है उसे देखा जाए और इस पूरे मामलें में यह सामान्य सी लगती बात अच्छी तरह से समझ में आई कि

मार्क्सवाद कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो बहुत स्थिर रहने वाली वस्तु हो या वह एक ही जगह टिककर रह जाए बल्कि उसमें निरंतर विकास भी होता रहा है, बदलाव भी आते रहे हैं क्योंकि वह एक जीवन्त रचना है । वह ऐसा दर्शन नहीं है जिसे प्राप्त कर लिया गया है और फिर सुरक्षित बचा हुआ है जिसे समय समय पर प्रकट कर देना है । बल्कि चूंकि समाज से आने वाले लोग ही मार्क्सवाद की ताकत होते हैं और यह समाज अपनी तरह से उन लोगों का निर्माण करता रहता है । इसीलिए हर एक दौर में उसे नये तरह से व्याख्यायित भी किया जाता है क्योंकि जब मनुष्य बदलता है तो सब कुछ बदलता है । परिस्थितियों के बदलने से हमारी पार्टियों में, लेखकों में समाज से आने वाले लोगों की मानसिकता भी आती है और उसके हिसाब से बहुत कुछ बदलता जाता  है । स्पष्ट है कि मार्क्सवाद एक जीवन्त दर्शन है इसलिए वह कहीं जाकर स्थिर हो गया है ऐसा हमें नहीं मानना चाहिए ।
इसके मद्देनजर आप ध्यान दीजिएगा तो दिखेगा कि बीसवीं सदी का जो मार्क्सवाद था और यह जो नये समय का मार्क्सवाद है इसमें कुछ फर्क है । इक्कीसवीं सदी का मार्क्सवाद के नाम से बाकायदा वेनेजुएला में यूगो शावेज ने इसे चलाया था । मतलब कि इक्कीसवीं सदी का मार्क्सवाद यह एक पद है जो बताता है कि इक्कीसवीं सदी में मार्क्सवाद नये किस्म का है, जो बीसवीं सदी से थोड़ा भिन्न किस्म का  है । उसकी जो भिन्नता है उसमें एक तो यह कि साहित्य की दृष्टि से बीसवीं सदी के मार्क्सवाद में, सोवियत मार्क्सवाद में भी और उसके समानांतर जो पाश्चात्य मार्क्सवाद विकसित हुआ उसमें भी, साहित्य की एक बहुत गहरी भूमिका रही है । सोवियत मार्क्सवाद में भी लगातार साहित्यकारों का जिक्र किया जाता था और जो पश्चिमी मार्क्सवाद है, जो पाश्चात्य मार्क्सवाद है जिसको वेस्टर्न मार्क्सिज्म बोलते हैं उसमें भी साहित्यकारों की बड़ी उपस्थिति रही है । साहित्य से जुड़े जो लेखक थे वे भी बहसों में उदाहरण के बतौर सामने आते रहे हैं । उस दौर के मुकाबले महसूस किया जा रहा है कि इक्कीसवीं सदी में मार्क्सवाद के भीतर साहित्य की उपस्थिति थोड़ी कम हो गई है । इस प्रसंग में यह ध्यान दीजिएगा कि उन्नीसवीं सदी में, मार्क्स के समय में भी साहित्य की उपस्थिति उतनी ज्यादा नहीं थी तो इसका मतलब यह है कि कुछ ऐसे दौर होते हैं जब शायद दूसरे बड़े सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं और सारी वैचारिक ऊर्जा उनको समझने में खपानी पड़ती है । तो संभवतः इसी कारण से कुछ लोगों का यह कहना है कि इस दौर में मार्क्सवाद का जो उभार हुआ है उसमें साहित्यिक प्रसंग की उपस्थिति थोड़ी कम है बीसवीं सदी के मुकाबले में और उसके मुकाबले  दूसरे सवालात ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं । जो दूसरे सवालात ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं उसका कारण यह है कि बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि यह जो हमारा पूंजीवाद है, जो हमारे समय का सबसे बड़ा यथार्थ है वह पूंजीवाद भी अपने उन्नीसवीं सदी के दिनों में लौट रहा है । जैसे जैसे निजीकरण बढ़ रहा है, जैसे जैसे अस्थायित्व बढ़ रहा है, वैसे वैसे एक तरह से वह अपने पुराने रूप में लौट रहा है । यह जो पूंजी के चरित्र में बदलाव आ रहा है उसके इर्द गिर्द जो दूसरे सवाल हैं, व्यापक सवाल हैं वे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं और शायद उसी कारण से साहित्य का प्रसंग थोड़ा पीछे रह गया है ।
दूसरा जो आमतौर पर लोगों का कहना है वह यह कि बीसवीं सदी में  दोनों, फिर मैं कह रहा हूं सोवियत मार्क्सवाद के भीतर भी और उसके समानांतर जिसे आप पश्चिमी मार्क्सवाद कहते हैं उसके भीतर भी, एक तरह से मार्क्सवाद का एकेडमाईजेशन हो गया था । कहने का मतलब यह कि वह जीवंत प्रसंगों के मुकाबले एक तरह से पढ़ने लिखने की चीज़ ज्यादा हो गया था और फिर पाश्चात्य मार्क्सवाद  में जिन भी व्यक्तियों का आप नाम सुनेंगे वो कहीं न कहीं किसी न किसी विश्वविद्यालय से जुड़े हुए थे और सोवियत मार्क्सवाद के भीतर भी यही हालत थी । उसके मुकाबले इक्कीसवीं सदी के मार्क्सवाद में जो जनांदोलन है इन जनांदोलनों ने अपनी ऊर्जा दी हुई है और जनांदोलनों के साथ संवाद करते हुए मार्क्सवाद के नये नये क्षेत्र खुल रहे हैं । आम तौर  पर ये दो फर्क बीसवीं सदी के मार्क्सवाद से  इक्कीसवीं सदी के मार्क्सवाद में महसूस किये जा रहे हैं । देखा जा रहा है कि जो एकेडमाईजेशन था  मार्क्सवाद का, उसके मुकाबले वह इस दौर में जनांदोलनों से ज्यादा संवाद करता हुआ नज़र आ रहा है । एक तरह से कह लीजिए तो मार्क्सवाद के लिए यह अच्छा ही है अच्छा इसलिए है कि क्योंकि इस क्रम में वह लगातार समकालीन हो रहा है ।
यह एक विकास  हो रहा है मार्क्सवाद का । अच्छा अब आप ध्यान दीजिएगा इस समय की स्थिति के बारे में तो बहुत सामान्य तौर पर भी देखने से एक चीज़ समझ में आ रही है कि सोवियत संघ के खिलाफ पूंजीवाद के पास सबसे बड़ा वैचारिक अस्त्र  क्या था सोवियत संघ के खिलाफ, पूंजीवाद के पास सबसे बड़ा वैचारिक अस्त्र था ‘लोकतंत्र’ और आप यह भी ध्यान दीजिएगा कि लोकतंत्र के नाम पर ही अमेरिका ने सेनाएं भेजी थीं । कारण कि लोकतंत्र एक ऐसा विचार था जिसके बारे में पूंजीवादी बुद्धिजीवी कहते थे कि वह सोवियत संघ में नहीं है । लोकतंत्र पश्चिमी देशों के पूंजीवादी बौद्धिकों के पास वह सबसे बड़ा डंडा था जिससे जब चाहे सोवियत संघ और मार्क्सवाद वालों को पीट दिया करते थे । अब हुआ यह है कि ऊपर से भी देखने पर नज़र आ रहा है कि लोकतंत्र खुद पश्चिमी देशों में गायब हो रहा है । खुद पश्चिमी देशो में यह महसूस किया जा रहा है कि लोकतंत्र गायब हो रहा है । जैसे जैसे पश्चिमी देशों में लोकतंत्र गायब हो रहा है वैसे वैसे उसके बरक्स मार्क्सवाद के भीतर जो लोकतंत्र की दृष्टि थी उसको समझने की नये ढंग से कोशिश की जा रही है । क्योंकि पूंजीवाद का यह दावा था कि हमारे लोकतंत्र की जड़ है निजी संपत्ति । इससे पता चलता है कि यह अर्थतंत्र वाला सवाल उतना गैर वाजिब नहीं है । लोकतंत्र के बारे में तमाम उदारवादी चिंतकों का यही कहना था कि उसकी पैदाइश होती है निजी संपत्ति से क्योंकि संपत्ति आपके पास है तो आप एक तरह से अधिकारसंपन्न हैं । इस समय जो लोकतंत्र गायब हो रहा है वह केवल इस अर्थ में गायब नहीं हो रहा कि लोगों को अहसास हो रहा है कि उनके वोट का महत्व नहीं रह गया है, वे वोट कहीं भी दें, चुने वही लोग जायेंगे जो वाल स्ट्रीट की पसंद हैं  बल्कि इसके समानांतर आर्थिक क्षेत्र में भी यही होता दिखाई दे रहा है । आर्थिक क्षेत्र में इस दौर में बहुत ही लोकप्रिय ढंग के नारे में अमेरिका में इस बात को कहा गया । अर्थशास्त्र के नोबेल विजेता जोसेफ स्तिग्लित्ज़ ने इस द्वैत को सामने लाया कि निन्यानबे पर्सेंट बनाम एक पर्सेंट, यानी जो संपत्ति का विभाजन है वह एक तरह से आबादी को निन्यानबे प्रतिशत बनाम एक प्रतिशत में विभाजित करना चाहता है । स्पष्ट है कि जो लोकतंत्र का क्षरण हो रहा है वह सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र में अभिव्यक्त नहीं हो रहा बल्कि वह संपत्ति के क्षेत्र में भी दिखाई देता है कि संपत्ति का संकेद्रण होता जा रहा है । तेजी से संपत्ति का संकेद्रण होता जा रहा है और उसी के बरक्स हमें यह दिखाई दे रहा है कि एक तरह से लोकतंत्र गायब हो रहा है ।‌ इसके लिए किसी ने एक शब्द ही दिया ‘डालरोक्रेसी’ यानी डेमोक्रेसी डालरोक्रेसी हो गया है । अर्थात जो राजनीतिक दुनिया है उस राजनीतिक दुनिया में पैसा बोलने लगा है । असल में एक व्यक्ति एक वोट कोई एक ऐसी चीज़ नहीं थी जो मंत्र की तरह थी बल्कि यह है कि सबको बराबर अधिकार है लेकिन धीरे-धीरे कानून के स्तर पर भी तब्दीली हो गई है जैसे कि अमेरिका ने कहा कि जो कारपोरेट है उसके भी चंदे को व्यक्ति का चंदा माना जाएगा । इसका मतलब कि अगर वह व्यक्ति का चंदा हो गया तो व्यक्ति का अधिकार कारपोरेट को मिलने लगा । साफ है कि पूंजीवाद का जो स्वतंत्रता का मुलम्मा था उसके भीतर से धन की जो वास्तविक सत्ता है वह सामने चली आई है । इसके कारण जो लोकतंत्र है उसका क्षरण हो गया है । वो गम्भीरतापूर्वक क्षरित हुआ है । नये नये मुहावरे सामने आए हैं जो इस परिघटना को अभिव्यक्त कर रहें हैं । इनसे पता चलता है कि कैसे जो बहुजन है, जो जनता है वह अधिकार विहीन होती जा रही है और संपत्ति की तरह ही अधिकारों का भी संकेंद्रण हो रहा है । तो ऊपर से ही देखने में यह दिखाई दे रहा है, जैसा मैंने कहा कि इसका राजनीतिक पहलू भी है, एक तरह से कानूनी पहलू भी है और आर्थिक पहलू भी है । यह सब दिखाई पड़ रहा है लोकतंत्र के क्षरित होने में ।
यह जो बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ है उसके बरक्स देखा जा रहा है कि मार्क्सवाद कैसे लोकतंत्र को देखता है । मार्क्सवाद में जो लोकतंत्र का सवाल है उसमें सबसे पहली बात यह है कि इसमें वह सवाल सामाजिक है । अब यह भी एक पहलू है इक्कीसवीं सदी के मार्क्सवाद के प्रसंग में कि राजनीतिक की बजाए सामाजिक का महत्व बढ़ा है । बीसवीं सदी में राजनीतिक पहलू की जो प्रधानता हो गई थी उसकी बजाए इस दौर में सामाजिक की प्रधानता पर जोर दिया जा रहा है । इस प्रसंग में ध्यान दीजिएगा कि खुद मार्क्स के चिंतक और उनके लेखन में सामाजिक पहलू बहुत महत्वपूर्ण है । उनके लेखन में सामाजिक क्रांति शुरू होती है, सामाजिक वर्गों  का टकराव होता है तो वहां सामाजिक बहुत महत्वपूर्ण है । यहां तक कि अर्थतंत्र को भी वह समाज के मातहत ले आना चाहते थे । तो यह जो लोकतंत्र है  मार्क्सवाद के भीतर वह समाज के वंचितों की अधिकारसंपन्नता के लिए है, वह समाज के विभिन्न तबकों की हिस्सेदारी से व्याख्यायित होता है । लोकतंत्र का सवाल उनके यहां सिर्फ प्रतीकात्मक या औपचारिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के रूप में नहीं है बल्कि सामाजिक अधिकारसंपन्नता के अर्थ में है । लोकतंत्र के सवाल पर जैसे जैसे पूंजीवाद में लोकतंत्र का क्षरण हुआ है वैसे वैसे खुद मार्क्सवाद के भीतर लोकतंत्र जिस रूप में मौजूद है उसको लोग देखने की कोशिश कर रहे हैं, लोकतंत्र को समझने की कोशिश कर रहे हैं ।
इस प्रसंग में एक और ठोस संदर्भ से बात करना उचित होगा । हमने बुर्जुआ लोकतंत्र की ताकत को महसूस किया है । हमने देखा है कि वह समाज के विभिन्न तबकों के भीतर पैदा होने वाली आकांक्षाओं से खूब अच्छी तरह समायोजन बिठाने में सफल रहा है । समाज के वंचित समुदायों की आकांक्षा को स्वर देने वाले प्रतिनिधियों ने चुनावों की व्यवस्था को बहुरंगी बनाया है । इस क्रम में जिन तबकों का स्वाभाविक नेतृत्व वामपंथ के पास होना चाहिए था या जिन अगुआ तत्वों की पहली पसंद वाम को होना चाहिए था वे स्थापित राजनीतिक दलों के सहारे या नए दल बनाकर संसद में प्रवेश पाते रहे । इसे बुर्जुआ लोकतांत्रिक व्यवस्था की क्षमता के बतौर स्वीकार करना होगा । पिछले दिनों लोकतंत्र का जो क्षरण हुआ उसके साथ ही व्यवस्था की इस क्षमता में भी गिरावट आई है । इसके साथ खुद इन तबकों के उभरने वाले कार्यकर्ताओं के भीतर वाम के प्रति आकर्षण बढ़ा है । दूसरी ओर जब बुर्जुआ वर्ग लोकतंत्र को मटियामेट करने पर आमादा है तो वामपंथ को इसकी औपचारिकता को सार्थक बनाने की जिम्मेदारी निभानी होगी । मार्क्सवाद में मौजूद लोकतांत्रिकता को पहचानकर इस आपसी समृद्धि को संपन्न किया जा सकता है । नये समय के सवालों को संबोधित करने के मामले में तमाम नए लोगों को यह दृष्टिकोण ज्यादा कारगार प्रतीत हो रहा है यानी सामाजिक पर जोर देने से आज जो सामाजिक उभार हो रहें हैं उनके साथ संवाद करने के लिए आपको एक जगह मिल जा रही है । यह एक पहलू है जो इस बीच बदला है ।
कुछ लोग कहते हैं मार्क्सवाद के तीन स्रोत और तीन घटक तत्व हैं । यह बहुत लोकप्रिय है । लेनिन ने  तो लेख ही लिखा है- थ्री सोर्सेज आफ मार्क्सिस्म । इस प्रसंग में कहा जा रहा है कि भाई ये स्रोत तो मार्क्स के पहले के थे, जिन्होंने मार्क्स को कांट्रीब्यूट किया था यानी मार्क्स ने इनमें से चीज़ों को लिया और उन्हें एक नई शक्ल दे दी- ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्र, फ़्रांसिसी समाजवाद और जर्मन दर्शन । कहते हैं कि ये तीन स्त्रोत हैं मार्क्सवाद के, लेनिन ने लिखा है कि ये तीन स्रोत हैं जिनसे मार्क्स ने लिया और जिसे उन्होंने नई शक्ल दे दी । कुछ लोगों का कहना है कि उसके बाद कुछ और विकास नहीं हो सकता है? क्योंकि अगर उसके बाद कांट्रीब्यूशन नहीं हो सकता है तो आप यह मान लेंगे कि वह तो स्थिर हो गया है मार्क्सवाद । लेकिन हम मानते हैं कि मार्क्सवाद एक जीवंत रचना है, व्यवहार से जुड़ी हुई चीज़ है तो इसका मतलब व्यवहार के दरमियान कुछ तो जुड़ेगा । इस बात को मैं थोड़ा मुक्तिबोध के हवाले से कहना चाहता हूं । मुक्तिबोध ने कहा कि जब आप रचना को ढालते हैं, अन्तिम शब्दों में तब तक भी बदलाव चलते रहते हैं । कहने का मतलब यह है कि अगर यह व्यवहार का सिद्धांत है, व्यवहार को गाइड करने वाला सिद्धांत है तो फिर यह जहां पर था वहां पर स्थिर कैसे रह सकता है ! सिद्धांत को लागू करने के दौरान, व्यवहार के दौरान उसमें और भी समृद्धि आ सकती है अगर वह जीवित मनुष्य के बीच होने वाला काम है तो ।
अब उस लिहाज़ से लोगों का कहना है कि साठ के दशक में कुछ ऐसे आंदोलन चले, जिन्हें उस समय और बाद के बहुत दिनों तक भी मार्क्सवाद से एक तरह की विरोधिता में देखा जाता था । उनमें से तीन आंदोलनों का विशेष रूप से ज़िक्र करना ठीक होगा । एक है जिसको हम सब लोग जानते हैं ‘नारीवाद’ । दूसरा जिससे बहुत हद तक हमारे देश के दलित साहित्य को भी प्रेरणा मिली यानी अमेरिका का ‘ब्लैक मूवमेंट’ । तीसरा पर्यावरण का सवाल । ये तीन ऐसे सवाल थें जो साठ के दशक में बहुत ही मजबूती से उठे पश्चिमी देशों में । इतिहास की अनेक तरह की विडम्बनाएं होती हैं उन विडम्बनाओं में से यह भी एक बात थी कि उस समय और बाद के बहुत दिनों तक इन इन आंदोलनों को मार्क्सवाद के विरोधी के रूप में देखा जाता था । बहुत दिनों तक यह प्रक्रिया चलती रही ।‌ इन्हें नव सामाजिक आंदोलन भी कहा गया । यह साठ के दशक में उभरा और बहुत दिनों तक लगा कि यह मार्क्सवाद के विरोधी विचार हैं लेकिन पिछले दिनों हालात में बदलाव आए हैं । कुछ इन आंदोलनों के भीतर की आत्म-समीक्षा के चलते, कुछ व्यापक समाजार्थिक और राजनीतिक बदलाव के चलते और कुछ मार्क्सवादियों की नई पौध के आने के चलते- इन तीनों ही आंदोलनों के साथ मार्क्सवाद का एक संवाद बना है और धीरे-धीरे यह संवाद आगे बढ़ा है । इन आंदोलनों में भी, उदाहरण के तौर पर पर्यावरण को लीजिए तो पर्यावरण आंदोलन के सभी लोग एक दौर तक मानते रहे, जब तक उनको पश्चिमी देशों में लोकतंत्र के भीतर अवसर दिखता रहा, कि कोई नई पार्टी बना लेने से इस व्यवस्था में चुनाव लड़के बदलाव किये जा सकते हैं । धीरे-धीरे नवउदारवाद का जब मानवभक्षी स्वरूप उभरा तब पर्यावरणवादियों को भी लगा कि पूंजीवाद के खिलाफ पूरी तरह से युद्ध किये बगैर पर्यावरण के सवाल को हल नहीं किया जा सकता । तब सवाल उठा कि पूंजीवाद से लड़ने के लिए सबसे कारगार कौन सी विचारधारा है । तो उसका जवाब मिला मार्क्सवाद ।
मार्क्सवाद के बारे में आप जानते ही हैं कि पूंजीवाद आया तो उसके विरोध में तरह तरह की विचारधाराएं सामने आईं । कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र पढ़िए तो उसमें भी लिखा है ‘भांति-भांति के समाजवाद’ । तो उस समय कई तरह के समाजवाद आए थे जिनके साथ वैचारिक होड़ करते हुए मार्क्सवाद ने अपनी बरतरी बनाई । इसी कारण इन पर्यावरणवादियों को भी लगा कि पूंजीवाद से लड़ने के लिए सबसे  मजबूत वैचारिक अस्त्र मार्क्सवाद के पास ही हैं । उसी तरह से स्त्री आंदोलन का भी मामला समझिए । स्त्री प्रश्न पर भी जो लोग लगातार काम कर रहे हैं उनको यह महसूस हुआ कि पूंजीवाद ही पितृसत्ता का सबसे बड़ा पुनरुत्पादक स्रोत है और वे भी इसीलिए मार्क्सवाद के साथ निरंतर संवाद कर रहे हैं और लगातार उस दिशा में विचार विमर्श जारी है । इसके अतिरिक्त जिस तीसरे आंदोलन का जिक्र मैंने किया उसके बारे में आप सब जानते ही होंगे । अमेरिका का अश्वेत आंदोलन अभी पिछले दिनों काफी चर्चित रहा क्योंकि वहां विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की नई फ़ौज निकली थी । हमारे अपने देश की तरह उन लोगों में भी समूचे अमेरिकी सामाजिक जीवन पर सचेत हस्तक्षेप करने की प्रेरणा थी ।   नस्लभेद के विरोध में जो आंदोलन वहां चला था, उसके बाद दूसरे दौर का उभार माना जा रहा है यह ब्लैक मूवमेंट । समझ बनती जा रही है कि वहां पर जो राजसत्ता है वह एक तरह से रेसिस्ट किस्म की है और उसके खिलाफ जो आंदोलन उभरे तो नये नये नारे सामने आए- ‘ब्लैक लाईव्स मैटर’ मतलब कि जो काले लोग हैं उनकी भी जिंदगी का महत्व है । बात सिर्फ इस तरह से ही नहीं है, वह इस तरह से भी है कि जैसे पिछले दिनों हमारे यहां पर लड़कियों ने सवाल उठाया कि रात को बाहर हम क्यूं नहीं घूम सकते, क्या जरुरत है कि हम सिर्फ सब्जी खरीदने के लिए जाएं, सड़क हमारी भी है, उसी तरह से ब्लैक लाईव्स मैटर का मतलब है कि कहीं भी ब्लैक रह सकता है । इस तरह वे मौजूदा सामाजिक वातावरण में अपनी सम्मानपूर्ण उपस्थिति की मांग करते हैं । साफ है कि यह सामाजिक लोकतंत्र से जुड़ता हुआ सवाल है । इस प्रसंग में इस आंदोलन के लोग इस इतिहास को फिर से देखने की कोशिश कर रहे हैं कि खुद मार्क्स ने गृहयुद्ध के समय अब्राहम लिंकन को चिट्ठी लिखी थी इंटरनेशनल की ओर से उनको समर्थन देते हुए । पूरी दुनिया में इंटरनेशनल नाम के संगठन की चर्चा उसी समय हुई जब अब्राहम लिंकन ने उस चिट्ठी का जवाब भेजा था जो लंदन में अमरीका के राजदूत ने जाकर सौंपा था मार्क्स को । कहने का मतलब यह है कि ब्लैक समस्या का मार्क्स को ज्ञान था । वहां से जोड़कर मार्क्सवाद के साथ ब्लैक आंदोलन का क्या रिश्ता रहा है इस पर गंभीरतापूर्वक विचार हो रहा है और यह भी देखा जा रहा है कि ब्लैक मूवमेंट का जो इतिहास है उसमें मार्क्सवाद की कितनी उपस्थिति रही है, वह मार्क्सवाद को नई शक्ल देने में क्या क्या मदद कर सकता है- इस पर भी विचार हो रहा है ।
इस तरह से इस नए दौर के लिए ये तीनों आंदोलन हैं साठ के दशक में जो पैदा हुए, जिनके साथ मार्क्सवाद की एक समय तक विरोधिता समझी जाती रही थी और अब उनके साथ मार्क्सवाद का संवाद शुरू हुआ है । इस क्रम में ये आंदोलन भी बदल रहे हैं तथा खुद मार्क्सवाद भी नए तरह से देखा जा रहा है, नई तरह से समझा जा रहा है । आप सब लोग जानते ही हैं कि मार्क्स ने भी कई बार सोचा कि क्रांति बस आ ही रही है लेकिन फिर एक दौर के बाद उनको लगा कि अब ज्यादा गहरे सैद्धांतिक कामों पर अपनी ऊर्जा को  केंद्रित किया जाए । कहने का मतलब है कि एक दौर में आपको ठहरकर तैयारी करने की जरूरत होती है । मार्क्सवाद के साथ नए हालात का यह संवाद चल रहा है, एक गहरा संवाद चल रहा है और एक नई कल्पना रखी जा रही है । कहा ही जाता है कि सभी एक्सपेरीमेंट एक ही बार में पूरे नहीं होते । पहला एक्सपेरिमेंट पेरिस कम्यून का था जो सत्तर दिन चला । दूसरा एक्सपरीमेंट था रूस जो सत्तर साल चला‌ । इनसे सीखते हुए एक नई परंपरा बनाने की जरूरत पड़ सकती है । नए समाज में उस नई परंपरा को गढ़ने के लिए इन आंदोलनों के साथ संवाद के जरिए एक नया स्वरूप गढ़े जाने की बात चल रही है । इसका एक कारण प्रतिक्रिया की आक्रामकता से भरा हमारा समय भी है ।
अंतिम बात जो मैं कह रहा था वह यह कि यह जो समय है उसमें सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पश्चिमी देशों में भी फासीवाद का गहरा उभार देखा जा रहा है और यह जो फासीवाद का गहरा उभार देखा जा रहा है इस सिलसिले में कई तरह के झमेले खड़े हो गए हैं । अभी थोड़े दिनों पहले राजनीतिशास्त्री कार्ल बाग्स ने एक किताब लिखी । उन्होंने लिखा कि हम लोग जब फासीवाद के बारे में बात करते हैं तो हमारे सामने सिर्फ हिटलर और मुसोलिनी की सत्ता होती है, हम देखते हैं कि इन्होंने राजसत्ता में रहते हुए क्या किया । यह हमारे दिमाग मे रहता है । सच है कि केवल ये ही फासिस्ट नहीं थे, अन्य रूप भी फासिस्म के । इसके अलावे जैसे हम लोग अपने अतीत के एक्सपेरिमेंट से सीखकर नई नई कल्पनाएं गढ़ते हैं उस तरह से हमारे विरोधी भी करते हैं । वे भी अपने पुराने एक्सपेरीमेंट से सीखते हैं और वे भी अपने आप को बदलते हैं । इसलिए इस दौर में फासिस्म के बारे में अगर आपकी यह धारणा है कि वह हिटलर वाला ही होना चाहिए तभी हम उसे फासीवाद कहेंगे । यह रुख मुझे ठीक नहीं लगता । एक उपन्यास था कामू का प्लेग । आप लोगों ने पढ़ा होगा तो उसमें उन्होंने कहा है कि जब जब प्लेग प्रकट होता है तो वह अपने रूप बदल लेता है, और वह इस तरह रूप बदल लेता है कि डाक्टर भी नहीं समझ पाते हैं कि यह प्लेग ही है । उसी तरह फासीवाद भी जब सामने आता है तो वह नए दौर में अपना रूप बदल लेता है । इसीलिए इस दौर में जो फासीवाद आया है वो एक तरह से नए रूप में सामने आया है । इस सिलसिले में आप ध्यान दीजिएगा कि जो हिटलर का उभार था या मुसोलिनी का भी उभार था, वह नाटकीय तरीके से हुआ था और इसीलिए नाटकीय तरीके से उसकी समाप्ति भी हो गई । यहां पर जो फासीवाद आया है उसने लम्बे दौर में अपने लिए जगह बनाई है और इसीलिए बहुत संभव है कि इसको परास्त करने की लड़ाई भी लम्बी होगी ।
शुक्रिया ।


Wednesday, May 29, 2019

साक्षात्कार संदीप मील



1 सबसे पहले तो यही तय करना होगा कि किस समय को समकालीन कहा जाय । तमाम विवादों के बावजूद कहा जा सकता है कि पिछली सदी के आखिरी दशक से दुनिया में जो बदलाव शुरू हुए उनकी निरंतरता में हम मौजूद हैं । इस लिहाज से विगत लगभग तीस साल का समय समकालीन कहा जा सकता है । हालांकि वर्तमान समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे विगत तीस सालों की इस दुनिया के चरम परिणामों से हमारा साबका पड़ रहा है लेकिन यही मानना उचित होगा कि सोवियत संघ के पतन के बाद की नवउदारवादी वैचारिकी के प्रभुत्व का समय हमारा समकाल है । स्वाभाविक है कि इस समय के सवालों से जूझते हुए ही मार्क्सवाद का विकास हो रहा है । सोवियत संघ के खात्मे के दौरान और उसके तुरंत बाद अकादमिक दुनिया में उत्तर आधुनिकता का बोलबाला था । आज उसका कोई नामलेवा भी नहीं है । बहसें उन सैद्धांतिक कोटियों में चल रही हैं जिन्हें मार्क्सवादी विद्वानों ने लोकप्रिय बनाया था । सबसे पहले तो खुद मार्क्स का लेखन ही विराट शोध का विषय हो चला है । उनके समग्र लेखन के संपादन और प्रकाशन की परियोजना से संसार भर के चालीस से अधिक मार्क्स विशेषज्ञ जुड़े हुए हैं । प्रस्तावित योजना के अनुसार 140 खंडों में उनके समग्र का प्रकाशन होना है । सभी जानते हैं कि उनके जीवनकाल में लिखित का बहुत थोड़ा हिस्सा ही प्रकाशित हो सका था । देहांत के बाद एंगेल्स ने अनछपी पांडुलिपियों से निकालकर कुछ और प्रकाशित कराया । बचा हिस्सा जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के दफ़्तर में उपेक्षित पड़ा रहा था । रूस में क्रांति के बाद समग्र छापने का काम डेविड रियाज़ानोव के संयोजन में शुरू हुआ । कुछ आंतरिक राजनीति में रुक गया । जर्मनी में रखे दस्तावेजों पर हिटलरी उभार के चलते खतरा पैदा हुआ । उन्हें एम्सटर्डम भेज दिया गया । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फिर काम शुरू हुआ तो रूस में ही उलटफेर हो गया । इस बार उनके बचे हुए दस्तावेजों का अध्ययन और संपादन करके जो प्रकाशन हो रहा है तो मार्क्स के लेखन में मौजूद खुलेपन को लक्षित किया जा रहा है । उनके प्रकाशित लेखन के साथ इस अप्रकाशित सामग्री को मिलाकर देखने से उनकी धरणाओं के निर्माण की प्रक्रिया का पता चल रहा है । इसके साथ वर्तमान दुनिया के अध्ययन के लिए जो मार्क्सवादी कोटियां कारगर सिद्ध हो रही हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण साम्राज्यवाद नामक कोटि है ।
2 पूंजी के वर्तमान आक्रामक स्वरूप को वित्तीय साम्राज्यवाद के रूप में ग्रहण किया जा रहा है । मार्क्स ने बताया था कि पूंजी के निर्माण की प्रक्रिया में ही उसके नाश के तत्व निहित होते हैं । मुनाफ़े के लिए ही इसका निवेश होता है लेकिन मुनाफ़े को साकार करना लगातार कठिन होता जाता है । जब पूंजी के केंद्र में मुनाफ़ा कमाना कठिन हो जाता है तो पूंजी उन क्षेत्रों की ओर भागती है जहां प्राकृतिक संसाधन और मानव श्रम सुलभ और सस्ता हो । इसी क्रम में दुनिया के गैर पूंजीवादी आर्थिक परिक्षेत्र के साथ उसके साम्राज्यवादी संबंध बनते हैं । वास्तविक साम्राज्यवादी संबंध का अनुगमन सांस्कृतिक साम्राज्यवाद भी करता है । इसे फिलहाल के भाषाई परिदृश्य के विश्लेषण के जरिए अच्छी तरह समझा जा सकता है । जिस अंग्रेजी को आधुनिक दुनिया में दाखिल होने का टिकट समझा जा रहा है उसे किसी जमाने में अत्यंत तुच्छ समझा जाता था । अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को पब्लिक स्कूल इसीलिए कहा जाता है कि वहां सामान्य जनता की संतानों को शिक्षा मिलती थी । अन्यथा श्रेष्ठता तो कानवेन्ट की स्कूली शिक्षा में हुआ करती थी जिनका संचालन चर्च की ओर से होता था । अंग्रेजी ही नहीं लगभग सभी यूरोपीय भाषाओं का विकास लैटिन के इस दबदबे से लड़कर हुआ लेकिन साम्राज्यवाद की स्थापना के साथ ये यूरोपीय भाषाएं खुद ही श्रेष्ठता निर्माण के इसी तंत्र का अंग बन गईं । आधुनिक काल में लोकप्रिय संचार माध्यमों में भाषा के दबदबे में आनेवाले बदलावों को देखें तो पूंजी की माया स्पष्ट हो जाती है ।
3 मार्क्स के समय भी सर्वहारा चेतना पर तमाम तरह के परदे थे । उस समय मताधिकार का सवाल बहुत बड़ा सवाल था । आप जानते हैं कि चार्टिस्ट आंदोलन बहुत कुछ मताधिकार के विस्तार के लिए होनेवाला आंदोलन था । मजदूरों को मतदान का अधिकार मिल जाने से उनकी सरकार नहीं बन जाती लेकिन उनके भीतर राजनीतिक सत्ता को हासिल करने की आकांक्षा जरूर पैदा हुई । इसी तरह तकनीक हमेशा से दुधारी तलवार रही है । उसने शुरू में अवश्य लोकतांत्रिक प्रसार का भ्रम पैदा किया लेकिन ध्यान दें तो मार्क्स ने पूंजीवादी समाज के सिलसिले में उत्पादन के सामाजिक स्वरूप और अधिग्रहण की इजारेदारी का जो अंतर्विरोध उजागर किया था वह अंतर्विरोध क्रमश: प्रकट होता जाता है । इसी अंतर्विरोध को काबू में रखने के लिए और बिना किसी समस्या के अधिकाधिक मुनाफा कमाने के लिए पूंजीवाद को लगातार क्रांतिकारी बदलाव करते रहना पड़ता है । हमारे चाहने से पूंजीवाद अपने आपको बदलना बंद नहीं कर देगा । बस यह है कि प्रत्येक नया समाधान आगामी संकट से बाहर निकलने का एक और रास्ता बंद कर देता है । उस समय फिर अब तक न आजमाए गए किसी अन्य तरीके को आजमाना पड़ता है । इसीलिए पूंजी का प्रत्येक नया संकट पिछले संकट से अधिक गम्भीर होता है । इस सिलसिले में याद रखना होगा कि पूंजीवाद के स्वभाव में अस्थिरता होने के बावजूद उसे समाप्त करने के सचेत मानव प्रयास के बिना अपनी ही गति से उसके विनाश की आशा व्यर्थ है । इसी मामले में मार्क्स के सारे प्रयासों के केंद्र में पूंजीवादी शासन को उखाड़ फेंकने वाले कर्ता के रूप में शोषित दमित कामगार मजदूर अवस्थित है और इसके लिए उसकी अपनी पहलकदमी को खोल देने का महत्व समझा जा सकता है । इस कामगार की उनकी धारणा लचीली और व्यापक थी ।
4 आवारा पूंजी का एक महत्वपूर्ण अंतर्विरोध राष्ट्र-राज्य के साथ होता है । इसके बावजूद आंदोलनों के दमन के लिए उसे इसी राज्य की जरूरत पड़ती है । इससे राज्य का वर्गीय चरित्र स्पष्ट होता जाता है । राज्य के सिलसिले में ध्यान देने की बात यह है कि धर्म और पूंजी की तरह ही राज्य भी मनुष्य की ऐतिहासिक रचना होने के बावजूद अपने आपको वर्गों के विभाजन से ऊपर उठा लेता है और समग्र समाज के हितों के प्रतिनिधित्व का भ्रम पैदा करने लगता है । इसलिए जनता के दिमाग में उसके बारे में भी गलतफ़हमी पैदा हो जाती है । कामगारों की राजनीतिक चेतना की उन्नति की दिशा में राज्य के वर्ग चरित्र का रहस्योद्घाटन जरूरी काम होता है । अंतर्राष्ट्रीय पूंजी की सेवा में जनता के आंदोलनों का दमन करके राज्य अपने आपको अधिकाधिक नंगा करता जाता है । इसके चलते मजदूर वर्ग के लिए राष्ट्रवाद की आकांक्षा का नेता बनना भी सम्भव हो जाता है । राष्ट्रवाद आम तौर पर बुर्जुआ वर्ग के हितों की सेवा करता है लेकिन चीन, वियतनाम और क्यूबा जैसे देशों में कमयुनिस्ट क्रांतिकारी आंदोलनों ने राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद किया । लेकिन मजदूर वर्ग का राष्ट्रवाद बुर्जुआ राष्ट्रवाद से भिन्न होता है । उसमें साम्राज्यवाद विरोधी और लोकतांत्रिक रंग अधिक गहरा होना लाजिमी है ।
5 सबसे पहली बात कि मार्क्सवाद के प्रभाव में सांस्कृतिक-साहित्यिक मोर्चे पर जो पहल हुई उसमें जनवाद और आधुनिकता दोनों का असर था । उसने साहित्य संस्कृति को जनता के सृजन के रूप में पेश किया और उस पर शासक समुदाय के मुकाबले जनता का दावा ठोंका । दूसरे विश्वयुद्ध से पहले फ़ासीवाद विरोधी गोलबंदी के दौरान की वह समूची रचनात्मक प्रतिरोध की संपदा हमारी विरासत है । इस विरासत को और अधिक समृद्ध करना हमारा दायित्व है । इस दौर में पूंजी के संकट के चलते दुनिया भर में जो फ़ासीवादी उभार आया है उसके चलते सभी समाजों की पुरानी शासक ताकतों के हाथ में समाज की बागडोर जाने के विरोध में केवल मजदूर नहीं बल्कि उनके समर्थक अन्य बहुत सारे तबके खड़े हो रहे हैं । इसमें अग्रिम मोर्चे पर स्त्रियों के आंदोलन हैं । इसके अतिरिक्त अमेरिका में अश्वेत समुदाय के भीतर भी अलगाव की भावना बढ़ी है । उनके साथ होनेवाले व्यवस्थित अन्याय के विरोध में उठे आंदोलनों ने नए नेतृत्व को जन्म दिया है । इसी तरह स्थानीय निवासियों के आंदोलन भी सामने आए हैं । इन सबकी अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का उभार जारी है । भारत के मामले में इसका अनुवाद स्त्री लेखन, दलित लेखन और आदिवासी लेखन के रूप में हुआ है । इसके कारण बहुत लम्बे समय के बाद साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में आंदोलनों का जिक्र शुरू हुआ है और सृजन की सामाजिक धारणा और व्याख्या बल पकड़ रही है ।
6 न केवल भारत में बल्कि समूची दुनिया में मजदूर आंदोलन एक नए दौर से गुजर रहा है । जिस तरह पूंजी का पुनर्गठन हो रहा है उसी तरह मजदूर आंदोलन का भी पुनर्गठन जारी है । असल में ये दोनों एक दूसरे के न केवल विरोधी हैं बल्कि एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं । पूंजी का हित मजदूरों के असंगठित होने में है । इसके विपरीत मजदूर एकताबद्ध होकर ही पूंजी के सभी तरह के हमलों का मुकाबला कर सकता है । पूंजी ने मुनाफ़ा न हो पाने की स्थिति में शोषण के नए नए क्षेत्र खोजे हैं और इस प्रक्रिया में नए किस्म में मजदूर पैदा किए हैं । मजदूर वर्ग के भीतर इन मजदूरों की आमद अभी नई है । इनमें से प्रौद्योगिकी क्षेत्र के कामगार तो बहुतेरा अपने को पारम्परिक मजदूरों से अलग समझते हैं । इसी तरह मजदूर वर्ग की कतार में सबसे बड़ी आमद महिला कामगारों की है । उनके साथ भी तालमेल बनाने में पारम्परिक मजदूर वर्गीय संगठनों को समय लग रहा है । अभी इन तबकों के विक्षोभ पूरी तरह से राजनीतिक रूप में सामने नहीं आ रहे हैं लेकिन इनका राजनीतीकरण बहुत तेजी से हो रहा है । वैसे भी बदलाव रोज रोज दिखाई देनेवाली प्रक्रिया नहीं होता लेकिन जारी रहता है ।  
7 न केवल हमारे देश में बल्कि समूची दुनिया में शोषक वर्गों के अबाध शासन के लिए ऊंच-नीच की सामाजिक व्यवस्था मौजूद रही है । आधुनिक बुर्जुआ समाज के आगमन के साथ सामाजिक गतिशीलता बढ़ने से वह अप्रासंगिक होती गई । उदाहरण के लिए गोल्डस्मिथ या शूमेकर जैसे नाम उनके पेशों से आए हैं लेकिन वर्तमान समाज में उनका कोई उपयोग नहीं रह गया । हमारे देश में भी उद्योगीकरण के साथ जाति व्यवस्था ढीली पड़ी लेकिन फिर समाज के सामंती यथार्थ ने उसे और अधिक मारक रूप में पुनर्जीवन दिया । इसे समझने ले लिए मार्क्स के इस सूत्र से भी सहायता मिलती है कि बुर्जुआ वर्ग को अपना शासन चलाने के लिए न केवल उत्पादन के साधनों और राज्य पर कब्जे की जरूरत पड़ती है बल्कि विचारों की दुनिया में भी शासक वर्गीय प्रभुत्व की स्थापना आवश्यक होती है । मार्क्स ने विचारधारा के क्षेत्र में संघर्ष को भी वास्तविक संघर्ष का ही हिस्सा माना और कहा कि बुनियादी ढांचे के सवालों को ऊपरी ढांचे के क्षेत्र में लड़ा और निपटाया जाता है । जातिवाद को ब्राह्मणवादी चिंतन पद्धति टिकाए रखती है और जनता को असंगठित रखने तथा सस्ते मानव श्रमिक की उपलब्धता के लिए इसे आधुनिक बुर्जुआ समाज ने भी अंगीकार कर लिया । औपनिवेशिक काल में सत्ता ने इसका पुनरुत्पादन किया और आज उसका नया दक्षिणपंथी उभार भारतीय समाज में मौजूद जो कुछ भी आधुनिक बोध है उसे मटियामेट करने के लिए प्रतिक्रांति की शक्ल में हुआ है । खुशी की बात उसका जोरदार प्रतिरोध है । जातिवाद के विरोध में इतना गहरा और व्यापक प्रतिरोध पहले कभी नहीं हुआ रहा होगा । यह प्रतिरोध किसी स्थापित राजनीतिक पार्टी की ओर से नहीं हो रहा बल्कि व्यापक सामाजिक आलोड़न का अंग है । शायद हमारे समाज के समस्त पुरातनपंथी अवशेषों का यह संगठित उभार लोकतांत्रिक समाज पर आधारित नए देश के निर्माण की ओर ले जाएगा ।
8 डाक्टर आंबेडकर हमारे देश में क्रांतिकारी जनवादी सोच का प्रतिनिधित्व करते थे । उन्होंने सामाजिक बदलाव को स्वाधीनता आंदोलन की कार्यसूची में जगह दिलाने में कामयाबी हासिल की । इस सिलसिले में एक बात पर गौर करना जरूरी है । मार्क्स के चिंतन में भी सामाजिक तत्व का महत्वपूर्ण स्थान था । वे हमेशा सामाजिक क्रांति और सामाजिक बदलाव की बात करते थे । इस्तवान मेजारोस ने कहा कि बीच के दिनों में मार्क्सवादी चिंतन में यह तत्व कमजोर पड़ा था और सारा जोर राजनीतिक तत्व पर दिया जाने लगा था । इक्कीसवीं सदी के मार्क्सवाद के लिए उन्होंने समग्र सामाजिक रूपांतरण का परिप्रेक्ष्य फिर से वापस लाने पर बल दिया । भारत में किसी भी बुनियादी सामाजिक बदलाव का अभिन्न अंग जातिवाद का उच्छेद होगा । आंबेडकर ने इसके लिए जिस अंतर्जातीय विवाह का रास्ता सुझाया था वह जीवन साथी के चुनाव के मामले में स्त्री स्वतंत्रता की ओर भी ले जाता है । भूसंपदा पर सामंती जकड़बंदी तोड़ने के लिए जमीन का राष्ट्रीकरण उनकी ऐसी मौलिक सोच थी जिसके निहितार्थ प्रकट होने बाकी हैं । मार्क्स और आंबेडकर के आपसी सहकार के लिए सामाजिक बदलाव के आंदोलन में दोनों का पुनर्पाठ आवश्यक है ।
9 इस बात से अक्सर इन्कार किया जाता है कि पूंजीवाद के अस्तित्व के साथ संकट लगे रहते हैं । यह पूंजीवादी समाज अपने एक सिरे पर चरम समृद्धि और दूसरे सिरे पर भारी दरिद्रता का उत्पादन करता है । समाजार्थिक विषमता का निरंतर विकास पूंजीवाद की विशेषता है । लोकतंत्र को वह तब तक ही सहन कर पाता है जब तक हालात सामान्य रहते हैं । संकट के हल के लिए पिछली बार उसने युद्ध का सहारा लिया था । युद्ध भी पूंजीवाद के साथ लगे हुए हैं । सबसे पहले तो पूंजी को राजनीतिक संरक्षण देने के क्रम में सरकारें लड़ाई में मुब्तिला होती हैं । इस अर्थ में वह लगातार युद्धरत रहता है । लेकिन युद्ध में राष्ट्रवाद की भावना भड़काकर जनता के विक्षोभ को दबाया जाता है और सैनिक साजो सामान की खपत के चलते अर्थतंत्र में तात्कालिक तेजी आती है । 2008 के संकट के बाद दुनिया के विभिन्न देशों में दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद का उभार हुआ है । इसे फ़ासीवाद के विश्वव्यापी उभार का नया दौर कहना उचित होगा । इसने शरणार्थियों की विराट फौज को जन्म दिया है । मजदूर वर्ग की वर्गीय एकजुटता को नस्ल, लिंग, भूभाग, भाषा, धर्म आदि के आधार पर विभाजित करके बुर्जुआ शासन के इस दौर को कायम रखने की कोशिश की जा रही है । इसके साथ ही नए तरह की एकजुटता भी उभर रही है । असल में पूंजी का प्रत्येक नया हमला एक ओर जनता की ताकतों को पीछे धकेलता है तो दूसरी ओर विक्षुब्धों की नई फौज भी पैदा करता है ।
10 हमारे देश में कल्याणकारी राज्य की ओर से जो भी कदम उठाए गए उन्होंने पहले की पारम्परिक सत्ता संरचना को नया जीवन दिया । खेती में पूंजीवादी विकास का कोई भी प्रयास सामंती जकड़ को चुनौती देने की जगह उसे ही मजबूत बनाने के काम आया । इससे ग्रामीण जीवन में भारी विकृतियों का जन्म हुआ है । अब खेती पर नया हमला कारपोरेट पूंजी का हुआ है । पारम्परिक सूदखोरों की जगह ग्रामीण बैंकों के राजनीतिक रसूखदार लोगों ने ले ली । भू स्वामित्व के ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव न आने के चलते समूचे समाज में विकास अवरुद्ध पड़ा हुआ है । कोई भी नई चीज स्थापित शक्ति संरचना को बलशाली बनाने के काम आती है । उदाहरण के लिए शिक्षा के चलते सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा मिलना चाहिए था लेकिन शिक्षा के लिए सम्पत्ति की आवश्यकता ने गारंटी कर दी कि शिक्षित लोगों में ऊंची जाति के लोगों की बहुतायत रहे । इसने शिक्षा संस्थानों को लोकतांत्रिक चेतना के निर्माण के बजाय उसका गला घोंटने वाले संस्थानों में बदल दिया । तभी आरक्षण के विरोध में उच्च शिक्षाप्राप्त लोग बहुत अधिक नजर आते हैं ।
11 अंग्रेजी औपनिवेशिक देशों में भारत सबसे महत्वपूर्ण देश था । मार्क्स इंग्लैंड की राजधानी लंदन में रह रहे थे । कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र में ही पूंजीवादी प्रसार की विडम्बना को मार्क्स-एंगेल्स ने लक्षित किया था । वे न केवल पूंजीवाद के बल्कि उसके औपनिवेशिक विस्तार के भी विरोधी थे । उनका भारत संबंधी प्रचुर लेखन ढेर सारी अंतर्दृष्टियों से भरा हुआ है । 1857 के समय न्यू यार्क ट्रिब्यून के लिए लिखे लेखों का तो संग्रह भी उपलब्ध है । इस विद्रोह से चार साल पहले 1853 में ही उन्होंने रेल के प्रसंग में कहा कि इसका लाभ भारतीय लोग तभी ले सकेंगे जब या तो वे अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकें या इंग्लैंड में सर्वहारा का शासन स्थापित हो जाए । उसी समय उन्होंने अंग्रेजी शासन के खात्मे की बात कह दी थी जबकि अस्सी साल बाद जाकर पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हो सका । अब तो अप्रकाशित पांडुलिपियों की उपलब्धता के बाद उनके लेखन में उपनिवेशिक यथार्थ और खासकर हमारे देश जैसे भारी महत्व के उपनिवेश के उल्लेख उम्मीद से ज्यादा मिलने लगे हैं । मशहूर अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक का अनुमान है कि दादा भाई नौरोजी की मुलाकात हिंडमैन के जरिए मार्क्स से हुई रही होगी । क्योंकि मार्क्स के लेखन में मौजूद उपनिवेशवाद विरोधी लेखन की भाषा अनेक जगहों पर नौरोजी से काफी मिलती जुलती है । जिस प्रथम इंटरनेशनल के केंद्र में मार्क्स रहे थे उसे कलकत्ते से कुछ लोगों ने पत्र लिखा और उसकी भारतीय साखा के गठन के संबंध में दिशा निर्देश मांगा था । सम्पर्क करने वाले अंग्रेज रहे होंगे क्योंकि इंटरनेशनल की जनरल कौंसिल की बैठक में पत्र पर विचार करने के बाद स्थानीय मजदूरों को लेकर शाखा बनाने की सलाह दी गई थी । पूंजीवादी विकास के गैर यूरोपीय रास्ते की सम्भावना की तलाश के प्रसंग में भी तमाम यूरोपेतर समाजों के साथ भारत का जिक्र भी अवश्य होना चाहिए ।
12 प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी रणधीर सिंह कहते थे कि मार्क्सवाद के लगभग प्रत्येक विरोधी ने मार्क्स से पहले के समता विरोधी विचारकों के तर्कों को ही दुहराया है । न केवल समता विरोध बल्कि एक हद तक भौतिकवाद विरोध का भी उत्थान मार्क्सवाद के विरोध के साथ हुआ है । इसका अर्थ यह कि मार्क्सवाद का विरोध अलोकतांत्रिक सोच की ओर तो ले ही जाता है उसके साथ ही इहलौकिक चेतना का भी क्षरण होता है । धान दीजिए कि बहुत पहले रोजा ने समाजवाद का विकल्प बर्बरता को बताया था । इस समय तो पूंजीवाद न केवल मानव समाज के लिए बल्कि मनुष्यों के रहने लायक एकमात्र ग्रह धरती के लिए भी विनाशकारी साबित होता जा रहा है ।                                      
13 सही बात तो यह है कि मजदूर की श्रम शक्ति के चलते सारी सम्पदा का सृजन हुआ है । इस बात को कहना या समझना आज जितना आसान है उसकी एकमात्र वजह कार्ल मार्क्स का ग्रंथ कैपिटल ही है । अर्थशास्त्र में तमाम किस्म के तर्कजाल से इस सच्चाई को झुठलाने की चेष्टा की जाती रही है । कार्ल मार्क्स ने अर्थशास्त्र की आलोचना करते हुए इसी रहस्य को उजागर किया । तमाम कच्चा माल और बेशकीमती मशीन मिलकर भी पूंजी का सृजन नहीं कर सकते । पूंजी का सृजन तभी होता है जब वह जीवित मनुष्य का खून चूसती है । इसी तथ्य को बोधगम्य बनाने के लिए मार्क्स को वह ग्रंथ लिखना पड़ा । हीलब्रोनेर का कहना है कि मार्क्स से पहले के किसी अर्थशास्त्री के लिए मजदूर सक्रिय कर्ता था ही नहीं मार्क्स के लेखन में पहली बार अपनी श्रम शक्ति के मालिक के रूप में वह मोलभाव करता हुआ नजर आता है । मार्क्स से पहले के लोग मजदूर की हालत में सुधार करने के लिए अन्य सामाजिक ताकतों से अपेक्षा करते थे । मार्क्स के लेखन में उसकी स्वतंत्र ऐतिहासिक भूमिका उभरती है । मार्क्स के चिंतन की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसे बौद्धिक व्यायाम के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता । इस दुनिया को बदलने के संघर्ष में ही उसका संरक्षण और विकास सम्भव है । वह जीवित मनुष्यों के हाथ में अपने हालात को काबू करने का अस्त्र है । खुद कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र की भूमिका में लेखकद्वय ने कहा कि इसकी बिक्री से उस देश के मजदूर आंदोलन का अनुमान लगाया जा सकता है ।
14 पूंजीवाद के स्वरूप में आनेवाले प्रत्येक बदलाव से संघर्ष के लिए मुश्किल बढ़ती है लेकिन अपने खात्मे के लिए पूंजीवाद हमारा काम आसान नहीं करेगा । शोषण के क्रम में मेहनतकश जनसमुदाय की हालत बुरी होती जाती है । इन परिस्थितियों से जूझने के क्रम में ही मनुष्य इस मशीन की बारीकियों को समझता है । आखिर इन तमाम गूढ़ चीजों का निर्माण मनुष्य ने ही तो किया है । पूंजी और श्रम दोनों ही अंतर्राष्ट्रीय परिघटनाएं हैं । शायद इसीलिए मजदूरों की मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध राजनीतिक पार्टी भी एक अंतर्राष्ट्रीय परिघटना है । पूंजी का शासन राष्ट्र-राज्य की मशीनरी के सहारे चलता है इसलिए उसका प्रतिरोध राष्ट्रीय स्तर पर विकसित होता है लेकिन धीरे धीरे उसका अंतर्राष्ट्रीय आयाम विकसित होता जाता है ।