Tuesday, June 21, 2011

नामवर सिंह के बहाने साहित्य और कला पर बातचीत

नामवर सिंह ने साक्षात्कारों के अपने संग्रह 'कहना न होगा' में एक जगह कहा है कि सभी कलाओं की तरह कविता का भी अंतिम उद्देश्य है संगीत हो जाना । कविता के साथ यह खासी झंझट है । उसका विधान इतने तत्वों से रचा हुआ है कि उसके बारे में कोई इकहरी बात कहना खतरनाक है । लेकिन एक बात तय है कि कविता भाषा में की जाती है और भाषा की सभी अर्थ संभावनायें इसमें भरी होती हैं । उसका एक छोर दर्शन को छूता है तो दूसरा संगीत को । इस द्वंद्व को सबसे पहले सुकरात ने उठाया था अपने अंतिम संवाद में, हालाँकि अर्थ की विविधताओं के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि इस अर्थ में कि काव्य दर्शन से अलग है और संगीत की ओर बढ़ने में यह अलगाव निहित है । यह द्वंद्व आज तक हल नहीं हो पाया है कि कविता में अर्थ कहाँ निहित है उसके दर्शन में या उसके संगीत में । इसी को आम तौर पर लोग अंतर्वस्तु और रूप का अंतर कहते हैं । इस द्वंद्व को हल करने के लिए कुछ कलावादियों ने कहा कि अंतर्वस्तु जिस रूप में प्रकट हुई है वही अंतर्वस्तु है । लेकिन यह द्वंद्व का समाहार नहीं है क्योंकि अन्य कलाओं में यह प्रकट है । उदाहरण के लिए ताजमहल का रूप वही है जो उसकी अंतर्वस्तु है । किसी पेंटिंग अथवा मूर्ति की अंतर्वस्तु वही है जो उसका रूप है । इसीलिए इन कलाओं का अनुवाद नहीं किया जा सकता, न उनकी अनुपस्थिति में उनका अर्थ समझाया जा सकता है । इस मामले में कविता का मुख्य उपकरण, भाषा, थोड़ा भिन्न है । रंग, स्वर, आकार, विभिन्न आकृतियाँ प्रकृति में पहले से ही मौजूद थे । यह अलग बात है कि इनका उपयोग मनुष्य उसी रूप में नहीं करता जिस तरह वे मौजूद हैं । फिर भी आधारभूत तत्वों की मौजूदगी पहले से रही है । लेकिन भाषा मनुष्य का अपना सामाजिक उत्पादन है । वह प्रकृति के अनुकरण नहीं बल्कि उसके साथ अंतःक्रिया का परिणाम है । निश्चित रूप से शब्दों के अर्थ, अर्थात वे वस्तुएँ जिन्हें शब्द द्योतित करते हैं, पहले से मौजूद हैं । यहाँ तक कि शब्दों के आकार और उनकी ध्वनियाँ कई बार वस्तुओं और क्रियाओं का अनुकरण करते हैं । पर भाषा इतने तक ही सीमित नहीं है । अमूर्तन से ही भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता का विस्तार हुआ । यहाँ सवाल आता है अर्थ का । केदार नाथ सिंह ने एक कविता में लिखा है कि 'बाल छड़ीदा' की अगम अथाह निरर्थकता के सामने नतमस्तक हूँ । अगर उनका उद्देश्य यह है कि शब्दों के अर्थ उतने ही नहीं जितने शब्दकोश में लिखे हैं तब तो ठीक है । अन्यथा अगर यह निरर्थकता का स्वस्ति गायन है तो खतरनाक है । भाषा का कोई भी शब्द अथवा शब्द समूह किसी न किसी वस्तु अथवा परिघटना की व्याख्या करता है । चूँकि यह वस्तुगत जगत जिसकी वह व्याख्या करता है, इतना उलझा हुआ है, इतना विराट है, इसमें एक साथ ही संतुलन भी है और बिखराव भी, कि भाषा का उलझ जाना स्वाभविक है । लेकिन चूँकि वह वस्तुगत जगत में गहरे धँसी हुई है इसीलिए उसे समझे जाने की योग्यता प्राप्त हो जाती है । यहीं एक गुत्थी सुलझती है । हालाँकि भिन्न भिन्न भाषाएँ एक दूसरे के बोलनेवाले की समझ में नहीं आ सकतीं फिर भी उसमें कही गई बात का दूसरी भाषा में अनुवाद संभव है । इस पर कोई कोई कहते हैं कि अनुवाद में कविता मर जाती है । इस अर्थ में कोई भी वस्तु अथवा विचार इसीलिए विशिष्ट होता है कि उसका कोई विकल्प नहीं होता । तभी सामान्यता और प्रतिनिधित्व अपना कार्य शुरू करते हैं । भाषा स्वयं एक प्रतिनिधित्व है । अन्यथा एक पत्थर, आँसू की एक बूँद, एक फूल और एक औरत को एक लाइन में खड़ा कर देने से जो अर्थ पैदा होगा उसका भी विकल्प कोई कविता नहीं हो सकती । भाषा प्रकृति और मानव समाज को मनुष्य की ओर से समझने के प्रयास का परिणाम है । अब सवाल है कि मनुष्य प्रकृति का अंग है कि नहीं । अत्यंत स्पष्ट है कि तमाम कोशिशों के बावजूद यदि उसे प्रकृति की गोद में वापस नहीं ले जाया जा सका तो अवश्य मनुष्य अपनी किसी अंतर्निहित विशिष्टता के कारण प्रकृति के अन्य तत्वों से अलग हुआ । भाषा प्रकृति से उसकी स्वाधीनता का लक्षण है । प्रकृति और मानव समाज को समझने के लिए उसने भाषा में अर्थ की अनेक ध्वनियाँ पैदा कीं । कविता के अर्थ की सभी ध्वनियों, जिसमें उसके रूप के जरिए भी पैदा होने वाली सभी संभवतम ध्वनियाँ भी शामिल हैं, के स्रोत इस व्यापक सामाजिक व्यवहार में ही खोजे जा सकते हैं । इस सामाजिक व्यवहार में भावावेग भी शामिल हैं और बुद्धिग्राह्य तर्क भी । इसीलिए कविता की छायाएँ मात्र भावावेग को छूकर उड़ती नहीं फिरतीं बल्कि वह बुद्धि द्वारा समझी भी जाती है । लेकिन यदि कविता अथवा साहित्य मात्र इतने ही होते तो लोकगीतों और लोगों की आपसी बातचीत से भी काम चल जाता । हालाँकि अर्थ के संप्रेषण के सबसे अधिक साधन इसी खजाने में से प्राप्त किए जा सकते हैं । लेकिन आधुनिक या छपा हुआ साहित्य भाषा के सामाजिक पुनरुत्पादन के सबसे जटिल और उत्तम प्रयास हैं । यथार्थ की जटिलता को समझने और उसे अभिव्यक्त करने के ये नवीनतम प्रयास हैं । उनके सृजन और ग्रहण में वही सामाजिक प्रक्रिया मूर्तिमान होती है । इसीलिए जो साहित्य यथार्थ की सबसे सही तस्वीर पेश करता है वह मात्र समाज से भाषा लेता नहीं बल्कि समाज को नई भाषा देता भी है ।


No comments:

Post a Comment