Thursday, December 23, 2021

शिक्षा और स्वतंत्रता

 

                                      

                                                              

1994 में रटलेज से बेल हुक्स की किताब ‘टीचिंग टु ट्रान्सग्रेस: एजुकेशन ऐज द प्रैक्टिस आफ़ फ़्रीडम’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका ने किताब की शुरुआत एक कालेज में अध्यापिका के बतौर अपने स्थायित्व के साथ जुड़े अनुभव से की है । उन्हें स्थायित्व न मिलने का भय उतना नहीं था जितना स्थायी होने का था क्योंकि इसके बाद वे अकादमिक बंधनों में कैद हो जातीं । स्थायित्व मिलते ही उन पर अवसाद छा गया । महीने भर के लिए वे बहन के पास चली गयीं । बहन मनोचिकित्सक थीं । उनसे समस्या बतायी तो बहन ने याद दिलाया कि बचपन से ही लेखिका का सपना लिखते रहने का था । रंगभेद वाले अमेरिका के दक्षिणी प्रांतों की अश्वेत स्त्रियों के लिए तीन विकल्प होते थे । पहला कि वे विवाह कर लें । दूसरा कि वे घरेलू सेविका का काम करें । बुद्धिमान स्त्रियों के लिए तीसरा रास्ता अध्यापन का था ।

लेखिका की प्रतिभा को देखते हुए सभी लोग उनके अध्यापक होने के बारे में निश्चिंत थे । इसके उलट लेखिका का सपना लिखते रहने का था । उन्हें अध्यापन केवल दाल रोटी चलाने के लिए जरूरी लगता था, गम्भीर काम तो लेखन ही महसूस होता था । लिखना ही उन्हें निजी पहचान बनाने का सही रास्ता समझ आता, अध्यापन तो अपने समुदाय की सेवा जैसा लगता था क्योंकि तब अश्वेतों के लिए अध्यापन और शिक्षा राजनीतिक काम थे । इनकी जड़ें नस्लभेद विरोधी संघर्ष में थीं । अश्वेतों के सभी स्कूलों में लेखिका को शिक्षा क्रांति जैसा काम महसूस होता था । इन स्कूलों की सभी अश्वेत शिक्षिकाएं अश्वेत युवतियों को विदुषी, चिंतक और सांस्कृतिक योद्धा बनाने के मकसद से मेहनत करती थीं । उनको बहुत जल्दी इस बात की सीख मिल गयी कि शिक्षा के प्रति समर्पण के जरिये गोरे नस्लभेदी उपनिवेशीकरण की रणनीति का प्रतिवाद किया जा सकता है । हालांकि उन शिक्षिकाओं ने ये बातें कभी सिद्धांत के रूप में नहीं कहीं लेकिन व्यवहार मे वे उपनिवेशवाद विरोधी प्रतिरोध के क्रांतिकारी शिक्षाशास्त्र पर अमल कर रही थीं । इन स्कूलों में अश्वेत बालक-बालिका ही पढ़ते थे और उनमें जो भी प्रतिभाशाली नजर आते उन पर शिक्षिकाओं की खास नजर रहती थी । वे सभी अश्वेत समुदाय की उन्नति के मकसद से इस काम में लगी हुई थीं । इसके लिए वे अपने विद्यार्थियों को जानने की कोशिश करती थीं ।

वे अपने शिक्षार्थियों के माता-पिता, उनके आर्थिक हालात, घर द्वार और मानसिक स्थिति के बारे में जानती थीं । लेखिका को उन्हीं शिक्षिकाओं से पढ़ने का अवसर मिला जिन्होंने उनकी माता, मौसी और मामाओं को पढ़ाया था । परिवार की इसी अनुभव संपदा के संदर्भ में उनकी क्षमता और प्रयास का आकलन किया जाता था । आचरण, बोलचाल और आदतों के मूल पहचान में आ जाते थे । स्कूल में उन्हें बहद मजा आता था । विचारों की वजह से खुद का बदलाव खासा रोमांचकारी अनुभव था । ऐसे भी बहुत सारे विचारों का उन्हें सामना करना पड़ा जो घर की मान्यताओं को चुनौती देते थे । इनसे सम्पर्क खतरे की सिहरन पैदा करता था । घर पर तो लोगों की आकांक्षा के हिसाब से खुद को पेश करना पड़ता था लेकिन स्कूल में ऐसी किसी जवाबदेही से मुक्ति का आनंद हासिल होता था, वहां विद्रोही विचारों के संसर्ग में खुद को नये सांचे में ढालने की आजादी भी मिलती थी ।

कानूनी तौर पर नस्लभेद के खात्मे के बाद स्कूल के हालात पूरी तरह बदल गये । खालिस अश्वेत बच्चों के स्कूलों में शिक्षण जिस तरह का मकसद हुआ करता था वह वातावरण मिश्रित नस्ली स्कूलों में नहीं रहा । ज्ञान अब सूचना मात्र रह गया । इसका रिश्ता जीवन और आचरण से नहीं रह गया । नस्लभेद विरोधी संघर्ष से उसका रिश्ता टूट गया । विद्यार्थियों से सीखने की ललक और उत्साह की जगह पर आज्ञाकारी होने की उम्मीद की जाने लगी । जब वे गोरों के मिश्रित स्कूल में दाखिल हुईं तो ऐसे शिक्षक दुर्लभ हो गये जो मानते थे कि अश्वेत बच्चों की शिक्षा के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता की जरूरत होती है । अब शिक्षक गोरे थे जिनके शिक्षण से नस्ली पूर्वाग्रह मजबूत होते थे । अश्वेत बच्चों के लिए शिक्षा अब आजादी का माध्यम नहीं रह गयी । लेखिका का दिल स्कूल से उखड़ गया । कक्षा में मजा आना बंद हो गया । स्कूल अब भी राजनीतिक जगह थी लेकिन वहां वर्चस्व के विरोध की राजनीति नहीं होती थी । हमें कदम कदम पर इस नस्ली मान्यता का प्रतिवाद करना होता था कि अश्वेत लोग गोरों से हीन होते हैं । इस भारी बदलाव से लेखिका को शिक्षा की इस भूमिका की अनुभूति हुई कि वह मुक्ति का व्यवहार होने के साथ ही प्रभुत्व का व्यवहार भी हो सकती है । ऐसे गोरे अध्यापक विरल थे जो इस वातावरण का प्रतिरोध करते थे । वे शिक्षा को मुक्ति का साधन समझते थे । धीरे धीरे कुछ अश्वेत अध्यापक भी अध्यापन हेतु आये जिन्होंने अपने समुदाय के पक्षपात का आरोप झेलते हुए भी अश्वेत बच्चों का ध्यान रखना शुरू किया ।

इस भीषण नकारात्मक अनुभव के बावजूद शिक्षा की मुक्तिकारी क्षमता में लेखिका का विश्वास कायम रहा । विश्वविद्यालयी शिक्षा की शुरुआत में वे विद्रोही अश्वेत बौद्धिक होने की सम्भावना से उत्तेजित थीं । कक्षा में अध्यापकों में इस किस्म की उत्तेजना की उपस्थिति न होने से उन्हें भारी निराशा होती । वहां पहली सीख यही मिली कि अधिकारियों के आज्ञापालन से ही विद्यार्थी बने रहना सम्भव है । कक्षा से चिढ़ होने लगी फिर भी वे स्वतंत्र चिंतक होने के दावे पर अड़ी हुई थीं । ऐसे में विश्वविद्यालय और कक्षा कैदखाने की तरह लगने लगे । वहीं पहली किताब का लेखन पूरा हुआ हालांकि उसका प्रकाशन बरसों बाद हो सका । लेखन के साथ ही अध्यापन की भी राह हमवार हो रही थी लेकिन कक्षा का भयावह माहौल रोजमर्रा का अनुभव था । अधिकतर अध्यापक कक्षा में प्रभुत्व का अभ्यास करते और आपसी संवाद की बुनियादी कुशलता भी उनमें नहीं थी । उन्हें सबसे पहली सीख यही मिली कि किस तरह का अध्यापक नहीं होना चाहिए । कक्षा में अक्सर उन्हें ऊब का अनुभव होता । शिक्षा की ऐसी पद्धति जिसमें सूचना को याद रखना और समय आने पर ज्ञान के नाम पर उसे उगल देना ही लक्ष्य हो, लेखिका को कभी आकर्षित नहीं कर सकी । इस पद्धति को फ़्रेयरे जानकारी की बैंक पद्धति कहते हैं जिसमें धन को एकत्र किया जाता है ताकि उसे बाद में खर्चा जा सके । इसकी जगह लेखिका को गम्भीर आलोचनात्मक विचारक बनना था ।

इस आकांक्षा को अधिकारीगण अक्सर खतरे के बतौर देखते थे । प्रतिभाशाली समझे जाने वाले गोरे मर्द विद्यार्थियों को अपनी खुद की बौद्धिक राह चुनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता लेकिन हाशिये के विद्यार्थियों से जी हुजूरी की उम्मीद की जाती थी । उनकी जरा सी भिन्नता को भी संदेह की नजर से देखा जाता । असहमति की अभिव्यक्ति को प्रतिभाविहीनता पर परदा डालने का बहाना करार दिया जाता । हाशिये के जो विद्यार्थी गोरों के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में दाखिल होते उन्हें अध्ययन करने की जगह गोरों की बराबरी का इच्छुक समझा जाता । इसके लिए उन्हें बस उनकी नकल करते रहना होता । लगातार पूर्वाग्रह का सामना करने की वजह से कुछ भी सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया में भारी व्यवधान पैदा हो जाता । ऐसे में लेखिका को शिक्षण के बारे में वैकल्पिक रुख की खोज बनी हुई थी । इस क्रम में उनका परिचय ब्राजील के मशहूर शिक्षाशास्त्री पाउलो फ़्रेयरे के क्रांतिकारी लेखन से हुआ । अब लेखिका को अपना  मनचाहा गुरु मिल गया । लगा कि वे शिक्षा को मुक्तिकारी गतिविधि समझते हैं । उनके लेखन और खुद के अनुभवों के आधार पर लेखिका ने शिक्षण की अपनी मान्यतायों को आकार देना शुरू किया ।

तब तक नारीवादी सोच से भी उनका जुड़ाव हो चुका था । उस नजरिये से उन्होंने फ़्रेयरे के लेखन को देखना आरम्भ किया । लगा कि यदि वे शिक्षा को मुक्तिकारी गतिविधि मानते हैं तो इस कोशिश का समर्थन जरूर करेंगे । एक ओर फ़्रेयरे को वे नारीवादी नजर से देख रही थीं तो दूसरी ओर नारीवाद की सीमाओं को फ़्रेयरे के सहारे समझ रही थीं । स्त्री अध्ययन के विभागों पर गोरी स्त्री अध्यापिकाओं का ही दबदबा था । जब कभी किसी अश्वेत लेखिका का जिक्र आता भी था तो उसे अश्वेत अध्ययन के मातहत मान लिया जाता । गोरी अध्यापिकाओं को अश्वेत लेखिकाओं के लेखन को समझने और समझाने में कोई रुचि नहीं होती थी । इस अरुचि के बावजूद बेल हुक्स ने नारीवाद के भीतर घुसपैठ का प्रयास बंद नहीं किया । वहां कम से कम पारम्परिक शिक्षण पर सवाल उठाने की गुंजाइश तो थी ही । वहां विद्यार्थी अकादमिक दुनिया के बाहर भी चिंतक के रूप में जीवन सार्थक करने की सम्भावना टटोल सकते थे । विद्यार्थी शिक्षण की प्रक्रिया की आलोचना भी कर सकते थे । ऐसी आलोचना को हमेशा प्रोत्साहित तो नहीं किया जाता था लेकिन उसकी गुंजाइश तो थी ही । उसी गुंजाइश के सहारे विद्यार्थी शिक्षा को मुक्ति के साधन के रूप में बरतने की कोशिश कर सकते थे ।

अध्यापन का दायित्व निभाते हुए वे अपनी अश्वेत अध्यापिकाओं, फ़्रेयरे के लेखन और नारीवादी आलोचनात्मक शिक्षण पर ही भरोसा करतीं । जिस तरीके से उन्हें उच्च शिक्षा मिली थी उससे अलग तरीके से पढ़ाने की कोशिश करतीं । उनकी पहली मान्यता थी कि कक्षा को ऊबाऊ जगह होने की बजाय उत्तेजक अनुभव होना चाहिए । अगर कक्षा में ऊब तारी होने लगे तो उसे दूर करने के तरीके खोजने होंगे । फ़्रेयरे के लेखन या नारीवाद में भी कक्षा को आनंद में बदलने पर विचार नहीं किया गया है । इसकी जरूरत तो शिक्षाशास्त्रियों ने बतायी है लेकिन उच्च शिक्षा में इसकी भूमिका के बारे में गम्भीर सोच विचार नहीं हुआ है । सीखने की प्रक्रिया में गम्भीरता को जितना महत्व दिया गया है उसके चलते कक्षा की उत्तेजना और आनंद को नुकसानदेह समझा जाता है । यदि कोई अध्यापक कक्षा में बौद्धिक उत्तेजना पैदा करने की चाहत के साथ प्रवेश करता है तो यह बात निर्धारित संकीर्ण सीमाओं को पार कर जाने जैसा होती है । इसके लिए न केवल पूर्व स्वीकृत सीमाओं का अतिक्रमण करना होता है बल्कि यह भी मानना होता है कि शिक्षण का कोई एक तयशुदा तरीका नहीं होता । उसमें लचीलापन आवश्यक होता है जिससे स्वत:स्फूर्त रूप से उसकी दिशा बदली भी जा सकती है । विद्यार्थियों को समरूपी समूह मानने की जगह विशेष व्यक्तियों के रूप में देखना होता है और उनकी खास जरूरतों के मुताबिक संवाद करना होता है । कक्षा के अपने नकारात्मक अनुभवों पर विचार करते हुए उन्होंने तय किया कि कक्षा की उत्तेजना के साथ बौद्धिक प्रेरणा का भी संतुलन बनाया जायेगा ।

लेखिका का यह भी मानना है कि केवल वैचारिक उत्तेजना से ही सीखने की प्रक्रिया को उत्तेजक नहीं बनाया जा सकता । इसके लिए कक्षा में मौजूद समस्त विद्यार्थियों की रुचि एक दूसरे के बारे में भी होनी चाहिए । इसका मतलब कि सबको एक दूसरे की आवाज को सुनना होगा और उनकी उपस्थिति को मंजूर करना होगा । अधिकांश कक्षाओं में विद्यार्थियों को अध्यापक की ही मौजूदगी का अभ्यास होता है इसलिए यह बात क्रांतिकारी लगती है । इसे कह देने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि शिक्षण के दौरान सचेत रूप से इसे अमल में लाना होगा । इसके लिए अध्यापक को सबकी मौजूदगी मूल्यवान माननी होगी । मानना होगा कि प्रत्येक विद्यार्थी कक्षा के माहौल को प्रभावित करता है । उनके इस योगदान का इस्तेमाल संसाधन के बतौर करना होगा । इस संसाधन के रचनात्मक इस्तेमाल से कक्षा को सीखने सिखाने की खुली प्रयोगशाला में बदला जा सकता है । इस प्रक्रिया की शुरुआत से पहले अध्यापक को ही शिक्षा का एकमात्र स्रोत समझने की पारम्परिक मान्यता का खंडन करना होगा । कक्षा में अध्यापक बस थोड़ा अधिक जिम्मेदार होता है क्योंकि कोई भी सांस्थानिक संरचना कक्षा के सिलसिले में उसे प्राथमिक तौर पर जवाबदेह बनाती है । इसके बावजूद सच यही है कि कक्षा में बौद्धिक उत्तेजना का निर्माण केवल अध्यापक नहीं कर सकता । इसे सामूहिक रूप से ही अंजाम दिया जा सकता है । इसके लिए कक्षा को भी एक समुदाय समझना होगा तभी उसका माहौल सामुदायिक प्रयास से निर्मित होगा । शिक्षा और शिक्षण को वे ऐसा काम समझती हैं जिसमें बदलाव और नवीनता की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है । इसका मकसद सीखने की प्रक्रिया में शिक्षार्थी की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना है । इन क्रांतिकारी मान्यताओं वाली बेल हुक्स का निधन 15 दिसम्बर 2021 को हो गया ।    

Tuesday, December 14, 2021

एक भारत ऐसा भी

 

            

                          

भाषा सिंह की किताब ‘अदृश्य भारत: मैला ढोने के बजबजाते यथार्थ से मुठभेड़’ का प्रकाशन 2012 में पेंगुइन बुक्स से हुआ । किताब को एकाधिक अर्थों में नायाब कहा जा सकता है । हिंदी को इसका सौभाग्य है कि सबसे पहले यह इसी भाषा में छपी है । भविष्य में इसी किस्म की किताबों के बल पर हिंदी को याद रखा जायेगा । किताब के शीर्षक के अंतर्विरोध से अधिक जोरदार तरीके से इसकी विषयवस्तु को नहीं पेश किया जा सकता था । जो यथार्थ है, वह भी बजबजाता हुआ, वही अदृश्य है! असल में तो उसे अदृश्य बना दिया गया है । बहुतेरे लोगों ने ध्यान दिलाया है कि असुविधाजनक को परे हटा देने की इसी बाजीगरी पर हमारी सभ्यता टिकी हुई है । भाषा की यह किताब इसे अनावृत करने की गम्भीर कोशिश है । कहने की जरूरत नहीं कि इस पूरे मामले का एक जातिगत पहलू है । इस मामले में सचमुच उलटा आरक्षण का तंत्र काम करता है । इस पेशे में शायद ही कोई सवर्ण शामिल होगा इसके बावजूद बेशर्म ढंग से आरक्षण समाप्त करने की मांग की जाती है ।

वैसे तो सभ्यता का इतिहास ही बर्बरता का भी इतिहास रहा है लेकिन हमारे देश में विशेष रूप से इसे संस्थाबद्ध कर दिया गया है । इसे देखने के लिए जिस निगाह की जरूरत है वह केवल डी-क्लास होने से ही हासिल नहीं होगी, उसके लिए डी-कास्ट होना भी लेखिका ने जरूरी माना है । सौभाग्य की बात कि यह बात वे वामपंथ का विरोध करने के लिए नहीं कहतीं । यह सीख देने वाले भी वामपंथी  कार्यकर्ता ही रहे हैं । भाषा पेशे से पत्रकार हैं इसलिए उनके लेखन में सूक्ष्म पर्यवेक्षण के साथ ही संवेदनशील प्रस्तुति भी है । लेखिका की भूमिका के अतिरिक्त बेजवाड़ा विल्सन और मैत्रेयी पुष्पा की सम्मतियों को भी किताब में शामिल किया गया है । लगभग प्रत्येक अध्याय निजी स्पर्श के साथ लिखा गया है और कोई न कोई ऐसी कहानी सुनाता है जो आम तौर पर पता नहीं होती । कथा के बीच बीच में खुद की खींची तस्वीरें भी लेखिका ने लगायी हैं जिनसे कथा की व्यथा दोगुनी हो जाती है । एक अंग्रेजी मुहावरे का हिंदी अनुवाद करें तो वे कमरे में हाथी की मौजूदगी दिखा देती हैं । इसे हाथी कहना भी सच पर परदा डालने की तरह है । मैला कहें तो कमरे में उसकी मौजूदगी की बात ही अरुचिकारक मान ली जायेगी ।

भूमिका में ही लेखिका ने दो ऐसी बातों का उल्लेख किया है जिसके लिए भरपूर निगाह की जरूरत होती है । सबसे पहली बात कि मैला ढोने वाले इन लोगों में स्त्रियों की बहुतायत होती है । इनकी जिंदगी में दाखिल होना तभी सम्भव है जब आप साथ पानी पीने और खाने की हिचक दूर कर लें । खाने के सिलसिले में पहली बात कि खूब तीखा और चटपटा स्वाद जीवन की नीरसता को भगाने में मदद करता है । न केवल इतना बल्कि सिर पर खूब सुगंधित तेल लगाने का चलन भी इन स्त्रियों में होता है । यह उनके जीवन का रागरंग है । दूसरी ओर सिर पर मल उठाने की कठिनाइयों का असर इतना गहरा होता है कि मैले की दुर्गंध उनके दिमाग में घुसी रहती है । ढेर सारी स्त्रियों का बयान है कि चमड़ी खुरचकर निकाल देने की इच्छा होती है । गर्भस्थ शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास पर इस काम के असर को जिस वेदना के साथ भाषा ने दर्ज किया है वह हिला देने वाला है । किताब की यह बड़ी विशेषता है कि रुदन और सहानुभूति के मुकाबले संघर्ष और विकल्प खोजने की चाहत को उकेरा गया है । दूसरा पहलू यह कि इनके भोजन में हल्दी का इस्तेमाल न के बराबर होता है । लेखिका से भी उन्होंने अपना काम न देखने की गुजारिश की ताकि पीली दाल और कढ़ी खाने की उनकी भी इच्छा मर न जाये ।      

प्रत्येक अध्याय किसी न किसी इलाके की खूबी को उजागर करता है । कश्मीर संबंधी पहला ही अध्याय ढेर सारी नयी जानकारियों से भरा हुआ है । यह बात शेष भारत में लोगों को शायद ही पता होगी कि कश्मीर में सीवर न होने की वजह से वहां फ़्लश वाले शौचालय न के बराबर हैं । शहरी इलाकों में भी सेप्टिक टैंक में मल को जमा किया जाता है । रोज रोज जिन शौचालयों को साफ किया जाता है उनके मुकाबले इन्हें बहुत समय बाद साफ करना होता है लेकिन खतरा अधिक होता है । सफाई का काम रात भर में पूरा कर लेना होता है क्योंकि दिन होते ही पड़ोसी शोर मचाने लगते हैं । कश्मीर की अपनी विकराल समस्याओं के भीतर इस समुदाय की मांग पर ध्यान देने का समय न सरकार के पास है न आंदोलनकारियों के पास । इस काम में लगे अधिकतर लोग इसे किस्मत मानकर किये जाते हैं लेकिन बच्चों को स्कूल में जिस तरह से कलंकित किया जाता है उसका दर्द सबकी जुबान से सुनायी पड़ा । अधिकतर स्त्रियां विवाह के लिए ऐसे घर पसंद करती हैं जहां यह काम न होता हो । इन चाहतों और शिकायतों की राह बदलाव की सम्भावना को लेखिका ने लक्ष्य किया है । प्रत्येक प्रांत की बात करते हुए लेखिका ने इस बात का जिक्र जरूर किया है कि इस काम को नाम क्या दिया गया है । कश्मीर में इसे टच पाजिन कहा जाता है और करने वाले समुदाय को वातल । मल को सीधे खेत में ले जाकर डालने की प्रथा भी शायद वहीं चलन में है ।                        

प्रत्येक प्रांत की स्थिति के बयान में कोई न कोई नयी बात है लेकिन कश्मीर के बाद पश्चिम बंगाल और गुजरात की हालत सबसे हाहाकारी नजर आती है । गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ही आज देश के प्रधानमंत्री हैं । उनके मुताबिक इस काम में कोई आध्यात्मिक अनुभव जरूर शामिल है बरना सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी इस काम को एक ही समुदाय न जारी रखता । उनके इस नजरिये पर किसी कार्यकर्ता की टिप्पणी ध्यान देने लायक है कि इसी परम आध्यात्मिक सुख का अनुभव खुद मोदी क्यों नहीं लेते । इसी तथ्य के साथ जाति प्रथा के साथ इसका रिश्ता खुल जाता है । यदि यह भी अन्य कामों की तरह का काम होता तो क्यों एक ही जाति इस काम को किये चली जा रही है । इसी तरह पश्चिम बंगाल के मामले में पिछली वाम सरकार और उसके विपक्षी तृणमूल के नेताओं का एक समान रुख नजर आता है । लेखिका ने सत्ता और राजनीति की दुनिया में इस समुदाय की चिंता की अनुपस्थिति को अच्छी तरह से रेखांकित किया है । बंगाल में उन्हें शौचालयों की सफाई के लिए बाजार में बिकता हुआ खास तरह का उपकरण दिखा जिसे कामवालियां खरीदती हैं । मल को सिर पर उठाकर ले जाने वाली बाल्टी नगरपालिका की ओर से उपलब्ध करायी जाती है । अदालत में झूठा हलफ़नामा लगाने के लिए ऐसे शौचालयों को तोड़ दिया जाता है । देश की लगभग सभी सरकारें इस प्रथा की मौजूदगी से इनकार करती हैं । इन कर्मियों के पुनर्वास के लिए आवंटित धन कागज में खर्च हो जाता है लेकिन संबंधित समुदाय के लोगों को ऐसी किसी योजना की कोई भी जानकारी नहीं दिखी ।

लेखिका ने इन सफाई कर्मियों के एक ऐसे रुख का सबूत दिया है जो उनकी मानवीयता को भद्रलोक की मानवता से बहुत ऊपर उठा देता है । सीवर बिछाने के मामले में आम तौर पर दलित बस्तियों और मुस्लिम इलाकों के साथ भेदभाव बरता जाता है । सफाईकर्मी स्त्रियों ने प्राय: लेखिका से बताया कि इन घरों में फ़्लश वाले शौचालय लगाने से सुविधा तो हो जायेगी लेकिन इनकी आर्थिक अवस्था ऐसी नहीं कि वे ऐसे शौचालय लगवा सकें । वे सभी अपना काम छोड़ना चाहती हैं, उनमें से बहुतेरी स्त्रियों ने टोकरी को जला दिया और फिर कभी मैला न उठाने की कसम खायी लेकिन कोई अन्य काम उन्हें करने का सुभीता हासिल नहीं होता । कई बार तो नगरपालिका से आवंटित आवास की सुविधा को जारी रखने के लिए भी ये अपने परिवार के किसी न किसी सद्स्य को इस पेशे में डाल देते हैं । कानूनन यह पेशा अपराध है लेकिन इस अपराध का दंड बहुतेरा सरकारों के मुकाबले इन सफाईकर्मियों को ही भुगतना पड़ता है । जो कानून उन्हें मुक्त करता वही उन्हें अपराधी बना देता है ।            


 

मधुमती और उसके वर्तमान संपादक

हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का दीर्घ गौरवशाली इतिहास रहा है । आधुनिक काल के आरम्भ में लगभग सभी साहित्यकार किसी न किसी पत्रिका के संपादन से जुड़े थे । उस जमाने में पत्रिका के प्रकाशन का महत्व भारतेंदु हरिश्चंद्र की नये जमाने की मुकरी के उस पद से समझी जा सकती है जिसमें वे अखबार के सातवें या आठवें दिन आने पर अपनी खुशी जाहिर करते हैं । वह उन्हें देश विदेश के हाल सुनाता है और ‘घर बैठे ही जोड़े तार’ । उसके साथ जुड़े छापाखाना को वे सयाना काम करने वाला बताते हैं । भारतेंदु मंडल के सभी सदस्य पत्रिकाओं का संपादन किया करते थे । तब देश में प्रथम स्वाधीनता संग्राम को दमन के बल पर कुचले कम ही दिन हुए थे और बकौल भारतेंदु भारतवासी सिर भी नहीं हिला सकते थे । ऐसे माहौल में तरह तरह के उपायों से इन साहित्यकारों ने पत्रिकाओं के माध्यम से देश की हालत का बयान किया । इसीलिए उस समय की पत्रिकाओं में साहित्यिक और साहित्येतर सामग्री को अलगाना मुश्किल होता है । आजादी के बाद जाकर साहित्यिक पत्रकारिता की पहचान अलग बनी । इसके बावजूद साहित्येतर सामग्री भी धर्मवीर भारती संपादित ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में जगह पाती रही । अजादी के बाद विभिन्न प्रदेशों के साथ केंद्र सरकार ने भी पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया ।      

आम तौर पर जिन पत्रिकाओं पर सरकारी ठप्पा लग जाता है उनकी गुणवत्ता संदेह के घेरे में आ जाती है । इस आम चलन के एकाधिक अपवाद भी रहे हैं । इस अपवाद का सबसे जोरदार उदाहरण देवेंद्र सत्यार्थी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘आजकल’ थी । कहा जा सकता है कि उसकी गुणवत्ता के पीछे स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों का दबाव था । असल में अंग्रेजी शासन की पराधीनता को तत्कालीन बौद्धिक राजनीतिक के साथ भाषा और साहित्य के स्तर पर भी अनुभव करते थे । इसीलिए भारतेंदु ने लिखा कि ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ । उस जमाने में हिंदी भाषा को मजबूत बनाने का काम देशभक्ति से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था । साहित्य की उन्नति को इसका माध्यम समझा गया । यही कारण है कि उस समय के अधिकांश राजनेता साहित्य, खासकर हिंदी साहित्य का न केवल ज्ञान रखते थे बल्कि साहित्यकारों से भी उनकी निकटता हुआ करती थी । साहित्यकार भी खुद को स्वाधीनता आंदोलन का अंग महसूस करते थे । प्रेमचंद ने देश की आजादी के काम आने वाली किताबें लिखने की जो इच्छा जाहिर की उसके मूल में यही भावना थी । रवींद्र नाथ ठाकुर के बारे में कहना मुश्किल है कि उनके भीतर देश की आजादी का चिंतक बड़ा था या साहित्यकार । ऐसे ही वातावरण में परम घुमंतू देवेंद्र सत्यार्थी इन सबके नजदीक रहे । स्वाभाविक था कि इस विरासत ने उनके संपादन को अलग तेवर दिया । उनके संपादन छोड़ने के बाद लम्बे समय तक इस पत्रिका की कोई छाप नहीं बन सकी । काफी समय के बाद पंकज बिष्ट के कुशल संपादन में फिर से उसका पुराना गौरव लौटा था । इसके पीछे भी एक साहित्यिक वातावरण का योगदान था । खुद पंकज बिष्ट साहित्य और कला को बदलाव के मामले में अग्रधावक (अवांगार्द) मानने के वातावरण में जवान हुए थे । दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षा संस्थान के अध्यापक भी एक पत्रिका का संपादन करते थे । विद्यार्थी भी इन पत्रिकाओं के पाठक तथा लेखक हुआ करते थे । ध्यान देने की बात है कि इन दोनों ही समयों में इस पत्रिका में प्रकाशित सामग्री में साहित्य के अवांतर प्रसंग भी हुआ करते थे । हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं को वैचारिक समझ की उन्नति के लिए सामाजिक विज्ञान से जुड़े लोग भी देखा करते थे । सिद्ध है कि वातावरण के अतिरिक्त उस व्यक्ति संपादक का भी महत्व पत्रिका की गुणवत्ता के साथ नाभिनालबद्ध है ।    

ऐसा ही साहित्यिक उत्थान एक अन्य सरकारी पत्रिका ‘उत्तर प्रदेश’ के सिलसिले में देखा गया जब श्री विजय राय ने उसका संपादन का भार ग्रहण किया । उस पत्रिका का प्रतिबंधित साहित्य विशेषांक संग्रहणीय उपलब्धि था । वीर सावरकर के 1857 पर लिखे से लेकर रवींद्रनाथ ठाकुर की रूस की चिट्ठी समेत तमाम दुर्लभ सामग्री का संग्रह उस अंक में विजय राय ने किया था । संपादकीय नजरिया असल में किसी भी पत्रिका की जान होता है क्योंकि उस नजरिये का जन्म खास सामाजिक वातावरण से होता है । प्रकाशित सामग्री की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि वह संपादकीय स्वेच्छाचार के हिसाब से नहीं हो सकती क्योंकि पाठकों का विशाल समुदाय भी परोक्ष दबाव बनाये रहता है । इन सबको संतुलित करते हुए किसी गुणवत्ता वाली सरकारी साहित्यिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन निश्चय ही श्लाघनीय काम है । सभी जानते हैं कि ऐसी जगहों पर निहित संकीर्ण स्वार्थ वाले राजनेताओं और नौकरशाहों से निरंतर सम्पर्क किसी भी रचनात्मक काम के लिए भरपूर प्रतिकूल माहौल बना देता है । इस प्रत्यक्ष सीमा के बावजूद राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ ने पिछले वर्षों में संपादक ब्रजरतन जोशी के संपादन में हिंदी की दुनिया में अपनी खास पहचान बनायी है ।

किसी भी पत्रिका की गुणवत्ता के लिए संपादक की योग्यता से अधिक उसकी रुचि का महत्व होता है । इस मामले में बिना किसी अपवाद के कहा जा सकता है कि ब्रजरतन जोशी ने मधुमती को लगभग मिशन की तरह बना लिया है । इसके लिए वे लेखकों से व्यक्तिगत सम्पर्क करते हैं । अन्य जगहों पर उनकी प्रकाशित सामग्री को परखकर उनसे उनकी रुचि के विषयों पर लिखने का आग्रह करते हैं । लेखक स्वभाव से अभिमानी होता है इसलिए उसे नितांत औपचारिक या व्यावसायिक की जगह निजी संस्पर्श आकर्षित करता है । ब्रजरतन जी खुद लेखक होने के कारण इस खूबी से परिचित हैं इसलिए लेखकों से लिखने का आग्रह करने में इसका उपयोग भी करते हैं । समीक्षा के सिलसिले में भी वे रचना का चुनाव सोच समझकर करते हैं और फिर सुयोग्य व्यक्ति से समीक्षा कराते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि समीक्षा से साहित्य जगत की रुचि का परिष्कार होता है ।

इसके अतिरिक्त उन्होंने राजस्थान की स्थानीय मनीषा को अखिल भारतीय स्तर पर उजागर करने का बेहद आवश्यक कार्य किया है । राजस्थान की सामान्य छवि केवल शौर्य के साथ जोड़ दी गयी है । इसे व्यापक बनाते हुए दर्शन, पर्यावरण तथा अन्यान्य अनुशासनों की मौलिक प्रतिभाओं को रेखांकित करने वाले लेख इसमें छापे गये हैं । आखिर अनुपम मिश्र के पर्यावरण संबंधी शोध और लेखन के केंद्र में राजस्थान ही तो है । हिंदी के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार के बाहर की व्यापक दुनिया को बहुतेरे लोग नहीं जानते । इस संकीर्णता की शिकायत मध्य प्रदेश और राजस्थान के विद्वान अक्सर करते रहते हैं । राजस्थान के ढेर सारे मनीषियों की उपलब्धियों को सामने लाकर उन्होंने इस पत्रिका का बुनियादी कर्तव्य पूरा किया है । इस मामले में न केवल विद्वत्ता बल्कि शैल्पिक रचनात्मकता को रेखांकित करने का प्रयास तो अनूठा रहा है । इस रचना के सभी कर्ता सदियों से संचित कौशल के स्वामी होते हैं । उनकी जादू भरी कारीगरी को उजागर करना प्रतिभा की बहुरंगी छटा के प्रति सश्रद्ध विनय को जन्म देता है ।  

पत्रिका की पहचान बनाने में उसके गांधी विशेषांक का भी भरपूर योगदान रहा । कहना न होगा कि आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर स्वाधीनता संग्राम के इस अपूर्व योद्धा का पुण्य स्मरण बेहद जरूरी था । महात्मा गांधी पर केंद्रित इस अंक में लिखने वालों ने गांधी को किसी विगत परिघटना की तरह याद नहीं किया बल्कि वर्तमान संदर्भ उनकी चर्चा के पीछे से बोल रहा था । गांधी ने शहादत का वरण किया और सच्चे लोकतांत्रिक जीवन की कीमत चुकायी । राजसत्ता में मद और अहंकार की किसी भी बढ़ोत्तरी के जीवंत प्रतिरोध के रूप में गांधी अभी बहुत दिनों तक बने रहेंगे । अकारण नहीं इस देश के सामान्य जन उस संत के साथ अपने को एकमेक करके देखते और समझते हैं । सूट-बूट और आडम्बर की बहुतायत के इस समय में वह ‘अधनंगा फकीर’ फिर से प्रासंगिक हो गया है । समग्र अनुपनिवेशन की उनकी परियोजना वर्तमान हालात के लिहाज से बहुत ही महत्व की हो गयी है । उन पर विशेषांक निकालकर मधुमती ने देश की बहुमूल्य सेवा की है । इन सब वजहों से मधुमती पत्रिका न केवल राजस्थान बल्कि समग्र हिंदी भाषी बौद्धिक समुदाय की पसंदीदा पत्रिका के रूप से स्थापित हो गयी है । इसके कारण तमाम अध्येता और विद्वान बिना किसी संकोच के इस पत्रिका में लिखते रहते हैं ।

बहुत सम्भव है कि भविष्य में राजस्थान साहित्य अकादमी की उज्ज्वल पहचान इस पत्रिका के माध्यम से समूचे देश में निखार पाये । किसी भी ऐसे प्रयास का यही सार्थक उपयोग हो सकता है । किसी भी सरकारी संपत्ति को सार्वजनिक इसी अर्थ में कहा जाता है । इस सार्वजनिक संसाधन का सही रचनात्मक उपयोग यही होगा कि संबंधित प्रदेश की प्रतिभा, विरासत और उपलब्धियों को राष्ट्रीय पहचान मिले । इस मामले में मधुमती ने स्थानीय कवियों, कहानीकारों और रचनाकारों को राष्ट्रीय स्तर का मंच मुहैया करा रही है । हमारे देश भारत के इस नायाब प्रांत की नानाविध छवियों के राष्ट्रीय उद्घाटन की दिशा में मधुमती ने कुछ शुरुआती मजबूत ठोस कदम उठाये हैं । उसे अभी लम्बी यात्रा करनी है । इस यात्रा में उसकी रचनात्मक प्रतिष्ठा ही उसकी पूंजी है और इसे सामने लाकर मधुमती निश्चय ही स्तुत्य प्रयास कर रही है । उसे रंगारंग विद्वत्ता से भरे राजस्थान की पारम्परिक और नवीन कामयाबी को मंच प्रदान करने के लिए भांति भांति के प्रयोग करने हेतु तैयार रहना होगा । रचना को किसी भी अनुशासन में बांधना सम्भव नहीं होता इसलिए उसकी अभिव्यक्ति को अवसर भी तभी दिया जा सकता है जब संसाधनों का सृजनात्मक अभिनिवेश किया जाये ।         

                                 

Wednesday, December 1, 2021

कविता में सभ्यता समीक्षा

                                      

प्रसन्न कुमार चौधरी की एकमात्र कविता ‘सृष्टि-चक्र’ के बारे में हिंदी बौद्धिकों के बीच बहुत कम बातचीत हुई । इसका कारण यह भी था कि हिंदी साहित्य और उसकी शैक्षणिक दुनिया से उनका लगभग कोई रिश्ता नहीं रहा । सबसे पहले इसके एक हिस्से का प्रकाशन ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में हुआ । शेष हिस्से ‘वागर्थ’ में छपे । वागर्थ वाला हिस्सा अलग से पुस्तिका के रूप में नीलाभ प्रकाशन से भी छपा था । दोनों हिस्सों को मिलाकर वर्तमान शीर्षक ‘मन एव मनुष्याणां--- सृष्टि-चक्र: एक लम्बी कविता’ है । यह कविता बीसवीं सदी के आखिरी दशकों में लिखी गयी थी और प्रकाशन भी उसी समय हुआ था । कविता तीन हिस्सों में विभाजित है जिनमें दूसरे हिस्से में एक टी ब्रेक भी है । वैश्वीकरण का दौर होने से कविता में बहुतेरे वैश्विक संदर्भ आये हैं जिन्हें अंत में बता दिया गया है । टी ब्रेक का हिस्सा सीधे अंग्रेजी में है । उसका काव्यानुवाद भी कर दिया गया है । बहुतेरी जगहों पर उपनिषद से संस्कृत के टुकड़े भी कविता में आते रहते हैं । कविता का अर्थ तो कभी उसके सौंदर्य को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता लेकिन इस लेख में उसके वक्तव्य को प्रकट ही किया जा सकता है । उसके रूप और शिल्प की विशेषताओं का जिक्र किसी अन्य प्रसंग में किया जायेगा ।    

महाकाव्यात्मक वितान की कविता होने के चलते इसका रिश्ता अपने समय से भी था । वह समय हमारे देश में नव उदारवादी वैचारिकी के उदग्र प्रवेश का था । तीस साल पुरानी बात होने के बावजूद ध्यान में रखना होगा कि उस समय की निरंतरता में हम अब तक बने हुए हैं । उस समय को ढेर सारे कारणों से बदलाव का समय माना जाता है । उस समय जो भी हो रहा था उसमें सूचना-संचार क्रांति के साथ उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण का भी खेल चल रहा था । सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में समाजवादी शासन का खात्मा होने से दुनिया के पैमाने पर समाजवादी खेमे का पतन हुआ था । विचारों की दुनिया में सब कुछ नया और उत्तर उपसर्ग के साथ प्रकट हो रहा था । यह सब कुछ इतनी तेजी से घटित हो रहा था कि इसके लिए ‘शाक थेरापी’ की रणनीति का नाम ही दिया गया । योजनाबद्ध तरीके से संभलने का मौका दिये बगैर चोट पर चोट की जा रही थी । सार्वजनिक क्षेत्र को नेस्तनाबूद करने की मुहिम चल पड़ी थी । दुनिया भर में सरकार के कल्याणकारी व्यय में कटौती की सलाह दी जा रही थी । उसी रणनीति का इस्तेमाल हालिया कोरोना के दौरान भी किया गया । ताबड़तोड़ हमला शासकों की बहुत पुरानी रणनीति रही है ।

वही दौर है जब अमेरिका की वैश्विक चौधराहट को वैश्वीकरण का नाम दिया गया । हमला सबसे पहला संस्कृति के क्षेत्र में महसूस किया गया । खानपान की विविधता को कुचलते हुए पिज्जा बर्गर की सार्वभौमिकता स्थापित हुई । टेलीविजन के बक्से से अमेरिकी सीरियल प्रसारित होने लगे । देश बेचेहरा सा होता जा रहा था । विश्व बाजार से होड़ की कौन कहे, घर के भीतर तक बाजार घुस आया । उपभोक्ता सामग्री के बाजार में पश्चिमी कंपनियों के उत्पाद ही नजर आते थे । अचरज की तरह यह एकाधिकार प्रतियोगिता के नाम पर कायम हुआ । देश के तत्कालीन विद्वान प्रधानमंत्री ने इस वैचारिक हमले की अगुवाई की थी । 

उस समय सरकारी नियंत्रण के विरोध में जो उग्र वैचारिक हमला किया जा रहा था उसका मूलमंत्र आजादी था । याद करना गैर मुनासिब न होगा कि विश्व-ग्राम के नारे के साथ ही कर लो दुनिया मुट्ठी में जैसे वाक्य केवल विज्ञापन तक सीमित नहीं थे । उस समय सपने अपार वैभव के भी दिखाये गये थे । लिव लाइफ़ किंगसाइज भी फटेहाल जनता को सपने बेचने की कला थी । समूची दुनिया का तीव्र अमेरिकीकरण करने के प्रयास जोर शोर से हो रहा था । इस समग्र माहौल की छाया इस दीर्घ वितान की कविता पर थी ।

कविता की शुरुआत एक स्त्री की यात्रा के आरम्भ से होती है । इस प्रकरण में ध्यान देना होगा कि नवउदारीकरण ने एकाधिक कारणों से मुक्ति के जिस आख्यान को हवा दी उसका लक्ष्य स्त्री थी । हजार किस्म के सामाजिक बंधनों की कैद उस पर थी जिससे मुक्ति की वास्तविक आकांक्षा का दोहन पूंजीवाद के इस नवोत्थान के समय किया गया । इस काम में सौंदर्य के बाजार का सबसे अधिक उपयोग किया गया । इस पहलू को उजागर करते हुए कवि ने तीक्ष्णता का परिचय दिया है । वे कहते हैं-

तुम्हारा सुन्दर होना ही काफी नहीं

दिखना भी होगा तुम्हें सुन्दर                    एक शासक की तरह

असुन्दर का सुन्दर दिखना/ फिलहाल हमारे यहाँ सभ्यता की यही परिभाषा है’

कहना न होगा कि फिलहाल सुंदरता को जिस कदर शासकीय युक्ति में बदल दिया गया है उसकी झलक कवि को बहुत पहले ही मिल गयी थी । दिखने और होने के बीच के इस द्वंद्व को और भी बेहतर तरीके से प्रस्तुत करते हुए वे थोड़ी देर बाद फिर कहते हैं  दिखना यहाँ होने से कहीं ज्यादा अर्थ रखता है’ । इसको बिना सवाल किये ही स्वीकार करने की बजाय कवि प्रश्न करता है कि आखिर,

‘क्यों सुन्दर होना हार जाता है सुन्दर दिखने से

जीवन होना हार जाता है जीवन दिखने से

न्याय होना हार जाता है न्याय दिखने से’

दिखने और होने के बीच का यह द्वंद्व स्त्री तक ही सीमित नहीं रह जाता, स्त्री समूची धरती का प्रतीक बन जाती है जब हम सुनते हैं कि ‘किसी स्टीरॉयड के सहारे कब तक दौड़ेगी कोई सभ्यता’ और इसीलिए ‘चेक-अप के लिए अस्पताल में आने लगी है धरती’ । धरती की इस दशा को स्त्री की दशा बताते हुए लेखक भयावह बिम्ब प्रस्तुत करते हैं-‘फूलमती की तरह कोठे से नारी निकेतन/और नारी निकेतन से कोठे पर आती जाती रहती है’ । कहां तो यह अवस्था और कहां बखान! दोनों के बीच होने और दिखने का फर्क स्पष्ट है ।

'यक्षी,  सुना तुमने     दुनिया बदल रही है

जो सपना था साकार हो रहा

जो साकार था सपना हो रहा’

यह बदलाव वही है जिसका ढोल सोवियत संघ के पतन के बाद खूब पीटा गया । यह बदलाव कितना क्रूर और अमानवीय है!  

‘मेरे बच्चे की टिफिन में डाल देता है

चुपके से कोई हेरोइन के पैकेट

या फिर निगल जाता उसे

स्कूल पहुँचने से पहले’

नशे और युद्ध के सहारे इस सांस्कृतिक हमले को ठोस आकार दिया गया था अन्यथा केवल संस्कृति का विनाश कितना मुनाफ़ा दे सकता था! यह भारी कत्लेआम शब्दों के मामले में भी हुआ । इस नये समय में अचानक शब्दों के अर्थ भी बदलने लगे थे । न्याय का मतलब युद्ध बना दिया गया था और लोकतंत्र को बंदूक के सहारे गरीब मुल्कों के गले उतारा जा रहा था । इसका चित्रण करते हुए कवि कहते हैं

इस शब्द का अभी-अभी कत्ल हुआ है

                  गाढ़ा रक्त बह रहा है

इधर द्वन्द्व में औंधे मुँह गिर पड़ा है यह शब्द

यहाँ किसी ने शब्दों की कै की है

उफ् कितनी दुर्गन्ध है !

बासी शब्दों में रेंगते हैं कीड़े

और आसपास शब्दों का बलगम है’

ऐसे में चुनौती पेश है

और यह है शब्दों का श्मशान

शून्य में शब्द की बात सुनी होगी तुमने

यहाँ देखों शब्दों का शून्य

क्या इस शून्य में नये शब्दों के पौधे लगाओगी ?

शब्दों की जो नयी कारीगरी हो रही है उसमें सभी विचारों को अनुकूलित कर लिया गया है ।

‘साम्यवाद/ गोल कर दी गई स्तालिन की जीन

                      मिक्स की गयी है थोड़ी रोजावाली

                      कम से कम चालीस फ़ीसदी फेरबदल के साथ   

                      डाली गयी है माओजीन  ...............

यह तो कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ हुआ । दूसरी ओर

            ‘उदारवाद/ काफी घटा दी गयी है नपुंसकता इसकी

                      जिनियागिरी की बदौलत’

तथा 

            ‘अनुदारवाद/ सहिष्णु और संयत बना दिया गया है

                      कल का यह ऐंठा हुआ धनी छोकरा’

शब्दों की इस माया का मुकाबला करना होगा

‘तुम हमारी निःशब्द वाणी में,  हमारे निःशब्द कर्म में

नये शब्दों के रूप में अंकुरित होओ 

बनो एक नया संवाद/ एक नया सेतु’

नये को बनाने के इस कार्यभार के साथ कविता का दूसरा खंड शुरू होता है जिसमें

‘जन्मने की अनगिनत संभावनाएं हैं

और उनका निषेध भी

संभावनाओं के अर्थ नहीं होते

लेकिन जन्मने की हर कहानी अर्थवान होती है’

संकट यह है कि

‘प्रतिकृति गढ़ना बन जाता है सबसे बड़ा आदर्श

हम होना चाहते है वह जो दूसरा है

हम लेना चाहते है वह जो उसके पास है

हम जीना चाहते है वह जो दूसरा जीता है

हम खाना चाहते है वह जो दूसरा खाता है

हम लिखना चाहते हैं वह जो दूसरा लिखता है

हम बोलना चाहते हैं वह जो दूसरा बोलता है’

‘फिर प्रतिकृतियों के कंक्रीट और मांसल जंगल में

हम ढूंढ़ते है सृष्टि’

यह जो बार बार जन्मना है उससे परम्परा बनती है और यह परम्परा भी ‘एक नदी चिरन्तन’ और युवती सनातन’ जैसी है । इस नदी की विशेषता यह है कि वह ‘अपनी कोख में सहेजकर लाती है देवमाटी’ और इसलिए महाजननी है । इससे जिस नये का निर्माण होता है उसे पूर्वनिश्चित नहीं किया जा सकता ‘मेरा संतति प्रवाह उनके फ्यूचर प्रोजेक्शन से मेल नहीं खाता था’ । चना या किसी भी सृजन की पूर्वनिश्चित न होने की विशेषता को बहुतेरा रेखांकित किया गया है और इसे मानव समाज में स्वाधीनता हासिल करने की सम्भावना का स्रोत माना जाता है । इस नयी रचना को कवि ‘स्वर-शिशु’ तथा ‘जीवन-राग’ कहता है । इसके भाग्य में विद्रोह आया है ।

जब मार्ग ही प्रवाह बन जाये तब प्रवाह के खिलाफ प्रवाह बनना

लोग कहेंगे सब चलता है

तुम कहना सब नहीं चल सकता            तुम नहीं चलना

लोग कहेंगे इट डजंट मैटर               

तुम कहना इट डज मैटर                 तुम गौर करना

लोग कहेंगे शब्दों के अर्थ में मत उलझो

तुम कहना यह कैसे संभव है              तुम अर्थ पर अमल करना

यह विद्रोह पहले भी हुआ था और फिर जब ‘सब कुछ यंत्रवत होने लगे’ तो दुबारा होगा ।    

असल में मानव सभ्यता के आरम्भ में ही इसके बीज पड़ चुके थे क्योंकि

आरम्भ में अन्न था

अन्न की भूख थी/ भूख की आग थी/ आग की विनाशलीला थी’

और

‘आरम्भ में अन्न था

अन्न से धन था/ धन से लिप्सा थी/ लिप्सा से लीलाएं थीं

इस तरह 'भूख थी और अन्न की महिमा थी’ । इसका ठोस रूप यह था कि ‘अकाल था और खेतों मे लहलहाती बालियां थी’ । भूख की इस सर्वव्यापी मौजूदगी को व्यक्त करने के लिए कवि ने हिंदी भाषी इलाकों की एक लोककथा का सहारा लिया है जिसमें किसी चिड़िया की चोंच का दाना गुम हो जाता है और फिर उसे खोजने की मशक्कत शुरू होती है । इस कोशिश में तमाम नायक असफल साबित होते हैं । इस भूख की दाहकता से विद्रोह की महागाथा का जन्म होता है

‘चिड़ियाँ उड़ी - आग की लपटें उड़ाती

व्रात्यों की धरती से बैस्तील तक

पीटर्सबर्ग से चिङकाङशान पहाड़ों तक

वह उड़ी - उसके विशाल डैनों की फड़फड़ाहट से धरती कांपी

एंडीज से किलिमंजारो तक’

समूची दुनिया में भूख ने विद्रोह के न केवल बीज बोये, बल्कि समता के तमाम विचारों और सपनों को भी जन्म दिया । इन विचारों की विविधता देखने लायक है ।

‘सभ्यता की वीथियों में उसने विचारों के अण्डे जने

सर्वे भवन्तु सुखिनः से सर्वहारा अधिनायकत्व तक’

इन तमाम विचारों के साथ ही

दरारों में छिपे अन्न के दाने और उस चिड़िया की चोंच के बीच

जनतंत्र का भूगोल था’ ‘लेकिन मेरी नन्ही चिड़िया इन्सानियत का वह इतिहास थी

जनतंत्र का भूगोल कई जगह जिसकी विपरीत दिशा में जाता था’

चिड़िया को अन्न मिला । इस प्रयास में उसे बहुत कुछ और भी मिला जिसके सुख से सुकून हासिल हुआ ।

‘श्रम संसार

हृदय संसार

सृजन संसार

चिड़िया अन्न का दाना पा प्रफुल्लमन इसी संसार में देर तक उड़ती रही’

वैश्वीकरण जनित संसार का जादू अपने समूचे वैभव के साथ धरती पर पसरा हुआ था । इसमें

कोवलम बीच पर

एक हंगारी बेलेरीना सबको मंत्रमुग्ध किये थी

उधर अमेजन के जलमहल में

वसंतसेना प्रस्तुत कर रही थी मोहिनी अट्टम’

इस दुनिया के साथ कठिनाई यह है कि इसमें सब कुछ लगभग पूर्वनिश्चित है ।

‘सबकुछ का अपना नियत समय था,  सब कुछ की अपनी नियत जगह थी

हर काम के अपने अंदाज थे,  अपनी भाषा थी

अपने संकेत थे,  अपने नियत लोग थे,  अपनी आचार संहिता थी

अपने कर्मकांड थे,  अपने अछूत थे,  अपने म्लेच्छ थे’

वैश्वीकरण के नाम पर ऐसी भयानक एकरूपता थोप दी गयी है कि

बच्चे एक ही गीत गाते

एक ही किताब पढ़ते,  एक ही फिल्म देखते

उनके नायक खलनायक एक थे,  उनके खिलौने एक थे

उनके अभिवादन की शैली एक थी

उनके हंसने-मुस्कुराने-बतियाने के अंदाज एक थे

बस्तों के बोझ से उनकी पीठ एक जैसी ही झुकी थी

टेक्स्टबुक दुनिया के वे टेक्स्टबुक बच्चे थे’

आज जिस थोपी गयी एकरूपता के दर्शन हो रहे हैं उसकी शुरुआत को कवि ने बहुत पहले संकेतित किया था । इस नयी दुनिया में बड़ों ने ‘अपनी एकता बच्चों पर थोप दी थी’, विकसितों ने ‘अपनी एकता अविकसितों पर थोप दी थी’ और मनुष्यों ने ‘अपनी एकता प्रकृति पर थोप दी थी’ । इस एकरस दुनिया को

बच्चों की अनुशासनहीनता

अविकसितों के आक्रोश

प्रकृति के प्रकोप से खतरा था’

शायद इसीलिए

‘मन से दुनियां बंटी-बंटी थी

विल्नियस से बेरूत तक

सारायेवो से लॉस एंजेलिस तक

पाटलिपुत्र से प्रिटोरिया तक

एक खूनी युद्ध था’

इस हालत ने अद्भुत नजारा बना दिया जिसमें

‘दुनिया एक थी और युद्धरत थी

एक जैसी स्वचालित राइफलें थीं,  एक जैसे नकाब थे

एक जैसी टैंकभेदी मिसाइलें थीं,  एक जैसे रॉकेट लांचर थे

एक जैसे बम गिरते,  एक जैसी इमारतें गिरतीं

हर जगह हरेक मां एक जैसी ही छाती पीट पीटकर रोती

बच्चे एक जैसे ही दम तोड़ते

दुनिया एक थी और युद्धरत थी’

नवउदारवाद के युग में भूख और विद्रोह के बाद की सबसे भयानक सचाई यह युद्ध ही है । शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद उम्मीद थी कि युद्ध बंद हो जायेंगे । याद करिये कि कुछ ही समय पहले विज्ञान, अंतरिक्ष और उपभोक्ता सामग्री की गुणवत्ता के क्षेत्र में होड़ चलती थी । उसके बाद दुनिया में मानो अनवरत एक युद्ध चल रहा है जिसके प्रभाव सारी मनुष्यता को झेलने पड़ रहे हैं । इसमें

‘शब्द ज्यों ज्यों परिष्कृत होते गये

युद्ध उतने ही भयंकर होते गये

संहार उतने ही प्रलयंकारी होते गये

नरमुंड़ो के ढ़ेर उतने ही ऊँचे उठते गये’

दूसरे हिस्से में ही कविता में टी ब्रेक आया है जिसे कवि ने ‘कविता में गद्य का प्रवेश’ कहा है और भावनात्मक धक्के की सम्भावना के लिहाज से ‘सिर्फ थर्टी प्लस लोगों के लिए’ अनुशंसित किया है । इसमें लगभग शताधिक अंग्रेजी भाषा की पक्तियों को नागरी लिपि में लिखा गया है । कविता का यह सबसे उत्तेजक हिस्सा है । इसको अंग्रेजी में लिखे जाने का कारण शायद यह बताना है कि वैश्वीकरण की आड़ में वस्तुत: पुन:उपनिवेशीकरण का यथार्थ है । यह कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि उस समय के मशहूर राजनीतिवेत्ता रणधीर सिंह भी कहते थे कि अंग्रेजी राज के समय भी हमारे अर्थतंत्र का वैश्वीकरण हुआ था । इस हिस्से में एक युवती का अपनी माता के साथ पर्याप्त उद्धत संवाद है । वह समय ही युवा को लगभग प्रत्येक संकेत से प्रेरित कर रहा था कि पुरानी पीढ़ी बोझ है । मार्गदर्शक मंडल के नाम पर बुजुर्गों को कूड़े में फेंकने की संस्कृति बहुत नयी नहीं है । कृत्रिम का उद्घोष करते हुए पुत्री कहती है

द एज ऑफ आर्टिफीसिअल यूटेरस इज इन मॉम

एण्ड वी हैव बीन फ्रीड फ्रॉम द बर्डेनसम टास्क ऑफ कन्सीविंग

इट इज नाउ हाइ टाइम टु डिसॉलव द इंस्टीट्युशन ऑफ मैरिज,  मॉम

द प्रॉब्लेम ऑफ इन्हेरिटेन्स इज मीनिंगलेस

नोबॉडी इज एनीबॅडीज एअर

एवरीबॉडी इज हिज ओन क्रिएशन

द डे ऑफ इमोशनल टाइ इज नाउ ओवर’

यह संवाद बेहद रचनात्मक तरीके से नये समय के सांस्कृतिक मूल्यों को प्रस्तुत करता है । पुत्री फिर से कहती है

‘हाउ मच सोशली नेसिसॅरी लेबर टाइम हैज बीन वेस्टेड बाइ द ह्यूमनकाइण्ड

इन राइटिंग,  रीडिंग,  इनैक्टिंग

फाल्स,  सेल्फ डेल्युडिंग लव स्टोरिज,  लव सांग्स,  एण्ड लव प्लेज

इन दैट लेबर टाइम वी वुड हैव बिल्ट ऑवर कॉलोनीज ऑन मार्स’

अबाध अर्थोपार्जन और समूचे ब्रह्मांड को उपनिवेशित कर लेने की आत्मघाती लालची वृत्ति को इससे बेहतर तरीके से व्यक्त करना सम्भव नहीं था । पुत्री के इस धृष्ट उद्बोधन के फलस्वरूप

‘डिअर,  योर मॉम इज डेड

डेथ इज हर रेस्पांस’

इसके बाद कविता का समाहार सा करते हुए कवि बताता है कि

इस दुनिया के अपने बेकार माल थे/ अपने कचरे थे

पुरूषार्थ,  ईमान,  कर्त्तव्यबोध,  प्रायश्चित जैसे शब्दों के

कोई खरीददार नहीं थे

एक प्रतिनिधि सभा ने तो इन शब्दों को

शब्दकोश से हटा देने का विधेयक तक पारित कर दिया था’

हमने पहले ही कहा कि सदी के मोड़ पर लिखी और प्रकाशित इस बेहद महत्वपूर्ण कविता पर न के बराबर चर्चा हुई लेकिन इसमें चित्रित यथार्थ और व्यक्त भावनाओं में हमारे देश में हुए तत्कालीन बदलाव की भास्वर झलकी है । वह बदलाव रुका नहीं, अब भी जारी है । इसलिए इस कविता को ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए । इस कविता में तत्कालीन सांस्कृतिक हमले की विध्वंसात्मकता को ठीक से पहचाना गया है । अंतिम हिस्से में हम प्रतिनिधि सभाओं को व्यर्थ बनाने की शुरुआत भी देख सकते हैं ।