Tuesday, January 31, 2017

जलवायु परिवर्तन और अमिताभ घोष

       
                                                   
2016 में पेंग्विन से अमिताभ घोष की किताब ‘द ग्रेट डीरेंजमेन्ट: क्लाइमेट चेन्ज ऐंड द अनथिंकेबल’ का प्रकाशन हुआ । मुख्य रूप से उपन्यास लेखक होने के बावजूद अमिताभ घोष लगातार अपने समय के महत्वपूर्ण सवालों पर वैचारिक लेखन करते रहते हैं । एक और उपन्यासकार अरुंधती राय इससे भी आगे जाकर आंदोलनों में शामिल होती हैं । इन दोनों ने ही पोखरण विस्फोट पर बेहतरीन किताबें लिखीं । किताब को अमिताभ ने तीन हिस्सों में बांटा है । पहले हिस्से में कहानियां सुनाने के बाद दूसरे हिस्से में इतिहास और तीसरे हिस्से में राजनीति की बात की गई है ।
कहानी की शुरुआत उन्होंने खुद से ही की है और बताया है कि उनके पूर्वज अब के बांग्लादेश के रहने वाले थे और पद्मा नदी के तीर पर उनका गांव था । 1850 दशक में कभी नदी ने रास्ता बदला और गांव को लील गई । लेखक के पूर्वज पश्चिम दिशा की ओर सरकते सरकते बिहार में गंगा नदी के तीर पर आकर स्थिर हुए । यह तो खैर पानी की कारस्तानी थी लेकिन पानी की तरह हवा भी खतरनाक हो सकती है । 1988 में कांगो में कार्बन डाई आक्साइड का बादल एक झील से उठा और आस पास के गांवों पर मातम बनकर छा गया । इस हादसे में 1700 मनुष्य और अनगिनत जानवर मारे गए । जरूरी नहीं कि भयानक खबरें तूफान की शक्ल में ही आएं । हवा के हिंसक होने की घटना यूं भी हो सकती है । दिल्ली और बीजिंग के लोगों के फेफड़े इसका प्रमाण हैं ।
इन सबके बावजूद जलवायु संबंधी बदलाव साहित्यिक कथा लेखन में पर्याप्त गंभीरता के साथ प्रकट नहीं हो रहा है । जलवायु परिवर्तन की बात कथेतर लेखन का अंग मानी जाती है । जहां कहीं यह कथा साहित्य में आता भी है तो उसे आलोचक गंभीरता से नहीं लेते । इसका उल्लेख होते ही संबंधित कथा को विज्ञान कथा की विधा में गिन लिया जाता है । ऐसा लगता है मानो साहित्यिक कल्पना के लिहाज से जलवायु परिवर्तन किसी अन्य ग्रह की कथा हो । मानव अस्तित्व के लिए खतरनाक बन चुकी इस परिघटना के बारे में अगंभीरता अकल्पनीय है । इसे तो दुनिया भर के लेखकों का प्रमुख सरोकार होना चाहिए लेकिन ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है । कारण क्या है ? वैश्विक तापवृद्धि को वर्णन के भीतर लाना मुश्किल हो गया है ? हम ऐसी हालत में पहुंच चुके हैं कि मुश्किल चीजें ही आसपास मौजूद होंगी । जो साहित्यिक रूप इन मुश्किलों को व्यक्त नहीं कर सकेंगे वे असफल साबित होंगे । सूचना की कमी तो इसका कारण नहीं ही है । कम ही लेखक दुनिया भर में जारी जलवायु संबंधी उथल पुथल से अपरिचित होंगे । फिर भी जब उपन्यासकार जलवायु परिवर्तन के बारे में लिखते हैं तो लगभग हमेशा ही कथेतर में चले जाते हैं । शायद इसकी वजह कथा साहित्य की हमारी धारणा है । असल में तो जलवायु परिवर्तन का सवाल संस्कृति का सवाल भी है । संस्कृति खास तरह से रहने की इच्छा को जन्म देती है और हमारे रहन सहन के तरीके से मुख्य तौर पर कार्बन अर्थतंत्र का संचालन होता है । जिस संस्कृति का हमने निर्माण किया है वह दुनिया को गढ़ने वाले पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के इतिहास से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है । हमारी सांस्कृतिक गतिविधियों में यह इतिहास घुला मिला है । युद्ध, पर्यावरणिक विनाश या तरह तरह के संकट हमारे सांस्कृतिक सृजन में प्रकट होते रहे हैं फिर जलवायु परिवर्तन के बारे में ऐसा दुराव क्यों ? हम लोगों को खुद से पूछना होगा कि अपनी रचनाओं में हम किस हद तक बाजार से प्रभावित होते हैं । उदाहरण के लिए स्थापत्य में शीशे और धातु के सहारे खड़ी होने वाली चमकदार इमारतें किसकी इच्छा को संतुष्ट करती हैं । उपन्यासकार के बतौर जब हम किसी पात्र को आकार देने के लिए विभिन्न ब्रांडों का उल्लेख करते हैं तो एक हद तक बाजार के असर में होते हैं । इस बात के मद्दे नजर यह पूछना और भी जरूरी हो जाता है कि जलवायु परिवर्तन में ऐसा क्या है कि गंभीर कथा साहित्य में उसका प्रवेश वर्जित है । जिस समय हमारे ज्यादार शहर मनुष्य के रहने लायक नहीं रह गए हैं उस समय के हमारे सांस्कृतिक सृजन को देखकर भविष्य के लोग तो यही नतीजा निकालेंगे कि हम आत्म-चेतस युग में रहने की जगह महान विक्षिप्ति के दौर में जीवित थे ।
इसके बाद अमिताभ फिर एक निजी प्रसंग की ओर वापस आते हैं । 17 मार्च 1978 को जब दिल्ली में अचानक तूफान आया था तो अमिताभ दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे थे और साथ ही पत्रकारिता भी कर रहे थे । संयोग से वे तूफान के ऐन बीच में आ गए । एक इमारत की बालकनी में छिपकर उनकी जान बची थी । चारों ओर साइकिलें, स्कूटर, लैम्प पोस्ट, टिन के छज्जे और चाय की दुकान हवा में चक्कर काट रहे थे । शोर खत्म होने के बाद शांति पसर गई थी । बालकनी से बाहर निकलते ही विनाशलीला के दर्शन हुए । बसें उलट गई थीं, स्कूटर पेड़ों में फंसे हुए थे, दीवारें इमारतों से अलग हो गई थीं और कमरों के भीतर छत से लटके पंखे तुड़ मुड़ गए थे । तूफान में 30 लोग मरे और 700 घायल हुए थे । यह विनाशलीला कुल चार मिनट चली थी । यह अभूतपूर्व था । इसके लिए अखबारों को सही शब्द ही नहीं सूझा ।
इस घटना का साक्षी होने के चलते जीवन भर वे इस तरह की घटनाओं के विश्लेषण में रुचि लेते रहे लेकिन उनके किसी उपन्यास में, अन्य प्राकृतिक दुर्घटनाओं की मौजूदगी के बावजूद इस तूफान के अनुभव का रचनात्मक उपयोग न हो सका । उन्हें लगता है कि ऐसा कोई वर्णन अविश्वसनीय लगेगा शायद इस वजह से इसका चित्रण न हो पाया हो । ऐसी असंभव स्थिति का उपयोग तभी करना चाहिए जब कोई अन्य उपाय न बचे । लेकिन आधुनिक उपन्यास के जन्म से पहले तो कथा के भीतर असंभाव्यता की प्रचुर उपस्थिति रहती ही थी । आधुनिक उपन्यास में कथा का यह ढंग छिपा रहता है । उपन्यास में अश्रुतपूर्व पृष्ठभूमि में चला जाता है और दैनंदिन उभरकर प्रत्यक्ष हो जाता है । पहले की कथा में बताया जाता था जबकि आधुनिक उपन्यास में दिखाया जाता है । कथा का यह नया तरीका बुर्जुआ जीवन के खुशनुमा रोजमर्रा के मेल में था । अघट और अप्रत्याशित को चेतना से बाहर कर दिया गया था । यह चीज केवल कला तक ही नहीं सीमित रही, विज्ञान में भी पहुंच गई थी । भौगोलिक इतिहास को क्रमिक बदलावों के वर्णन में तब्दील कर दिया गया था । प्रकृति भी वर्तमान की गति का ही अनुगमन करती प्रस्तुत की जाती थी । वास्तविकता तो ऐसी थी नहीं लेकिन उस पर परदा डालने के लिए तबाही और विनाश को हाशिये पर धकेल दिया गया था । यह काम भूगर्भ विज्ञान और उपन्यास में एक साथ हुआ । हद तो तब हो गई जब कथा के पुराने तरीके को आदिम के साथ जोड़ दिया गया । कहा गया कि जब मनुष्य प्राकृतिक घटनाओं को नहीं समझ पाता था तो सूर्यग्रहण, भूकम्प, बाढ़ या पुच्छल तारे जैसी परिघटनाओं को भूत, प्रेत या अप्राकृतिक तत्वों की कारस्तानी बता देता था ।
लगता है कि निश्चिंत बुर्जुआ जीवन का यह माहौल जलवायु परिवर्तन के साथ समाप्त हो चला है । विचित्र लगेगा लेकिन उन्नीसवीं सदी में सचमुच कथा साहित्य और भूगर्भ विज्ञान में प्रकृति व्यवस्थित और नम्र मालूम पड़ती थी । आदिम और भीषण के बरक्स यही आधुनिक विश्व दृष्टि थी । बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक इस सोच की प्रमुखता बनी रही । इसे वे उपन्यास से जुड़ी हुई विडम्बना कहते हैं कि यथार्थवादी वर्णन में ही यथार्थ पर परदा डाला जाता था । अब तो हम ऐसे ही समय में जी रहे हैं जिसमें अचानक जलप्लावन, सैकड़ों साल में कभी कभी आने वाले तूफान, बरसों चलने वाला सूखा, अभूतपूर्व गर्मी, धरती का धंसना और बादल फटने की घटनाएं आम हो चली हैं । 2012 में न्यूयार्क में तबाही बरपाने वाला सैन्डी तूफान मौसम वैज्ञानिकों के लिए भी अत्यंत असंभावित था । वैसा तूफान उस क्षेत्र के मौसम वैज्ञानिक इतिहास में कभी नहीं आया था । इसलिए उसके खतरों को भांपने और तदनुसार आपात कदम उठाने में चूक हुई । असल में बात इतनी ही नहीं है । अमिताभ का कहना है कि इसका संबंध नियमित बुर्जुआ जीवन में बढ़ते विश्वास से उपजे सहज बोध से है । स्वभावत: लोग अघट के लिए तैयार रहते हैं लेकिन पृथ्वी की असंभाव्यता के उनके सहज बोध की जगह धीरे धीरे एकरूपवाद में विश्वास आ बैठता है । इसको आंकड़ों और संभावना पर टिके सरकारी आचरण का भी बल प्राप्त हो जाता है । उदाहरण के लिए इटली के 2009 के विराट भूकम्प के पहले आने वाले झटकों के चलते सहज बोध के आधार पर लोग घरों की जगह खुली जगहों पर निकल आए लेकिन सरकारी हस्तक्षेप के चलते उन्हें घरों में लौटना पड़ा । नतीजतन जब भूकम्प आया तो घर के भीतर फंसकर ज्यादा लोग मारे गए । न्यूयार्क में जब सैंडी आया तो ऐसा कोई सहज बोध नहीं था । अमेरिकी नागरिकों के लिए तूफान में मरने की बात दूर देश की बात थी । इसी तरह ब्राज़ील में 2004 में जब कटरीना तूफान समुद्री तट से टकराया तो लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ । वैश्विक तापवृद्धि के जमाने में कोई भी जगह सुरक्षित नहीं रही, व्यवस्थित बुर्जुआ जीवन की प्रत्याशा को हर कहीं चुनौती मिल रही है । लगता है कि धरती ही आलोचक होकर उपन्यास में व्यक्त यथार्थ की सीमा समझा रही हो । इस युग की मौसम संबंधी घटनाएं वर्तमान कथा लेखन और आम समझ को मुंह चिढ़ा रही हैं । गंभीर गद्य कथा लेखन की गद्यात्मक दुनिया में इनका समायोजन मुश्किल हो रहा है ।
अमिताभ का कहना है कि कुल कहानी इतनी ही नहीं रही है । असंभव को लेखन के भीतर ले आने के लिए अतियथार्थवादी या जादुई यथार्थवादी उपन्यास के रूप भी आजमाने पड़े हैं । फिर भी इन उपन्यासों में व्यक्त घटनाओं और वर्तमान मौसम संबंधी घटनाओं में अंतर है । वर्तमान घटनाएं न तो अति यथार्थ हैं न जादुई यथार्थ । ये असंभव घटनाएं वास्तविक हैं । इसलिए इन्हें जादुई या रूपकात्मक तरीके से रखना उचित नहीं है । इससे उनकी वास्तविकता का अपहरण हो जाएगा । इन घटनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके जरिए लंबे समय से उपेक्षित मानवेतर तत्वों की मौजूदगी और उनकी निकटता के बारे में हम सचेत हुए हैं । इनके कारण हमें पता चल रहा है कि मनुष्य कभी अकेला नहीं था । जिन चीजों को वह अपनी संपदा मानता रहा है उनमें अन्य प्राणियों का भी साझा है । लोग समझ रहे हैं कि जंगल जैसी कुछ चीजें हमारी चिंतन प्रक्रिया में प्रविष्ट हो सकती हैं । लगता है कि धरती ने भी देकार्तीय द्वैत पर टिकी हमारी सोच को संशोधित करने का बीड़ा उठा लिया है जिसके तहत बुद्धि और कर्तापन मनुष्य तक सीमित कर दिया जाता था और अन्य सभी सजीव चीजों को उनसे रहित मान लिया जाता था । इसका मतलब है कि मानवेतर ताकतें हमारी सोच में हस्तक्षेप करने में सक्षम रही हैं और हमारे अनजाने वे इसे आकार भी देती रही हैं । इन संभावनाओं का संबंध साहित्यिक कथा लेखन से है । वैसे तो उपन्यासों में भूत प्रेतों की उपस्थिति रही है लेकिन जलवायु परिवर्तन से उद्भूत चीजों और अतिप्राकृतिक तत्वों में भेद है । भूत प्रेत फिर भी अतीत के मनुष्य होते हैं लेकिन तूफान आदि का मानव समाज से कोई रिश्ता नहीं दिखाई देता है । लेकिन ये प्राकृतिक घटनाएं भी तो मानव आचरण के ही संचयी परिणाम हैं । पुराने जमाने की प्राकृतिक घटनाओं के मुकाबले वर्तमान समय की घटनाओं से हमारा ज्यादा गहरा रिश्ता है । हमारे ही कृत्य अकल्पनीय रूपों में हमारे पास लौट आए हैं । साहित्य जिस नजर से प्रकृति को देखने का आदी रहा है उससे वैश्विक ताप वृद्धि जनित घटनाओं को देखना कठिन है । प्रकृति को हम सुरम्य समझते हैं वह इतनी बलवान, प्रचंड और खतरनाक तरीके से उठ खड़ी हुई है कि लयात्मक या रोमांटिक मुद्रा में उसके बारे में लिखना प्राय: असंभव हो गया है । इन हालात की अभिव्यक्ति के लिए नई भाषा की जरूरत है ।
इसी क्रम में अमिताभ 2004 में आई सुनामी की चर्चा करते हैं । इसके बारे में लिखने के लिए वे अंडमान-निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर गए थे । शहर शरणार्थियों से भरा हुआ था लेकिन तबाही बहुत नहीं हुई थी । सेना के वायुयान से हालात को निकट से देखने वे निकोबार गए । वहां समुद्र के किनारे मलक्का नामक कस्बे में घरों के फ़र्श ही रह गए थे, कहीं कहीं दीवारों के ठूंठ खड़े थे । इसके विपरीत नारियल के पेड़ सही सलामत झूम रहे थे । विचित्र बात यह दिखाई पड़ी कि तबाही किनारे से केवल आधे मील की दूरी तक हुई थी । जो लोग अधिक संपन्न थे उन्होंने अपने आवास समुद्र के किनारे बनाए थे इसलिए असर उन्हीं पर अधिक पड़ा था । इन मध्यवर्गीय शिक्षित लोगों को यकीन था कि असंभवप्राय घटनाएं तो कल्पनालोक में घटती हैं । वायुसेना के क्वार्टरों में बड़े अधिकारियों के मकान समुद्र के नजदीक बने थे, छोटे अधिकारी सुरक्षित दूरी पर रहते थे । जब सुनामी आई तो कमांडर का घर सबसे पहले धराशायी हुआ । सेना का यह आवासीय पैटर्न राजकीय अभियंताओं ने बनाया था । सेना और सरकार के सहयोग से बसावट के इस विक्षेप को अंजाम दिया गया था । जिन्होंने यह नक्शा तैयार किया था उनके लिए स्वर्ग में खास जगह आरक्षित होनी चाहिए ! यह नक्शा औपनिवेशिक दिमाग की उपज था । उसी दिमाग ने बाम्बे, मद्रास, न्यूयार्क, सिंगापुर और हांगकांग जैसे नगरों को समुद्र के तट पर बसाया था । समुद्र के तट पर बसना समृद्धि और शिक्षा का प्रतीक बन गया था । समुद्र के किनारे होने से संपत्ति कीमती हो जाती थी । जल के पास बसने का औपनिवेशिक स्वप्न पूरी दुनिया में मध्यवर्गीय जिंदगी में समा चुका है । हालांकि पुराने जमाने में लोग भरण पोषण की सुविधा के लिए समुद्र में जाते थे लेकिन स्थायी निवास समुद्र से दूर बनाते थे । पुराने जमाने के यूरोपीय नगर समुद्र से थोड़ा हटकर नदी या घाटी के किनारे बसे हुए हैं । एशियाई देशों में भी यही दिखाई पड़ता है । लगता है कि पुरानी दुनिया में समुद्र के क्षोभ से बचने के लिए सुरक्षा सहज बोध का अंग था । सोलहवीं सदी में जब यूरोप का विश्वव्यापी प्रसार शुरू हुआ तो भी यह सावधानी बरती जाती थी । सत्रहवीं से उन्नीसवीं सदी के दौरान औपनिवेशिक नगर निर्माण में समुद्र की निकटता को वरीयता दी गई और अब यही निर्माण जलवायु परिवर्तन के सीधे निशाने पर आ गए हैं । 1660 दशक में यूरोपीय साम्राज्य द्वारा निर्मित होने के कारण मुम्बई और न्यूयार्क अनेक भिन्नताओं के बावजूद इस मामले में समान हैं ।
2012 में न्यूयार्क में सैंडी तूफान की तबाही के बाद अमिताभ घोष ने मुम्बई की भौगोलिक विचित्रता के बारे में सोचना शुरू किया । उन्हें फिर याद आया कि मुम्बई तो बंगाल की खाड़ी के मुकाबले अरब सागर के किनारे है और अरब सागर में कोई तूफान बहुत दिनों से नहीं आया है । 2004 की सुनामी भी भारत के पूर्वी हिस्से को प्रभावित कर सकी थी । फिर उन्होंने पश्चिमी तट पर तूफानों और भूकम्प के बारे में जानने की कोशिश शुरू की । अगर इस क्षेत्र में बहुत दिनों से ऐसा कुछ नहीं हुआ है तो निकट भविष्य में ऐसा होने की संभावना बढ़ जाती है । पिछले एकाध दशक में इस इलाके में भी तूफानों के संकेत मिले हैं । 2007 में अरब सागर में आए तूफान का असर ईरान, ओमान और पाकिस्तान पर पड़ा था । पता यह भी चला कि 1618 में पहली बार बाम्बे में बादल फटने और तूफान की घटना हुई थी । इसमें दो हजार लोग मारे गए थे । फिर 1740 में भीषण तूफान आया । इसके बाद 1783 में आए तूफान में 400 लोग मरे । उन्नीसवीं सदी में भी समुद्री तूफान आए जिनमें सबसे भयंकर 1854 में आया था । इसके बाद किसी बड़ी हलचल की सूचना नहीं मिलती लेकिन अब बदलाव आ रहे हैं । 2009 में तूफान आया था और 2015 में पहली बार इस इलाके में बंगाल की खाड़ी से अधिक हलचल दिखाई पड़ी है । मुम्बई में पहले जब तूफान आते थे तो शहर की आबादी खास नहीं थी । अब इसकी विराट आबादी के चलते भारी बरसात भी मुश्किल पैदा कर दे रही है । 26 जुलाई 2005 को आई बारिश में 500 लोग मरे और लोगों को महसूस हुआ कि मुम्बई में जिंदगी दुबारा पहले जैसी नहीं रहेगी । लेकिन दस साल बाद फिर से जब भारी बारिश का कहर बरपा तो 2005 के मुकाबले पानी कुल एक तिहाई बरसने के बावजूद नजारा वैसा ही दिखाई पड़ा । मुम्बई में तूफान की तैयारी उस तरह की नहीं है जिस तरह की तैयारी बंगाल की खाड़ी वाले हिस्से में है । मियामी और अन्य तटीय नगरों की तरह ही मुम्बई में भी कीमती इमारतें उसी इलाके में बन रही हैं जिधर समुद्री तट है । अगर खरीदारों को खतरे की सूचना दी जाएगी तो संपत्ति की कीमतें घटनी तय है । पिछले दो दशकों के वैश्वीकरण के दौरान भू संपदा के मालिकान की ताकत में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी आई है । खतरों से आंख मूंदकर ही विकास हो रहा है । मुम्बई के साथ खतरे की सबसे बड़ी बात ट्राम्बे स्थित भाभा परमाणु संयंत्र है । थोड़ी दूर तारापुर में एक और परमाणु संयंत्र है । इन्हें समुद्र के किनारे ठंडा रखने के लिए बनाया जाता है लेकिन जलवायु परिवर्तन के मद्दे नजर ये बहुत बड़ी मुसीबत बन गए हैं । जलवायु परिवर्तन से पैदा हालात से व्यक्तिगत स्तर पर निपटना कठिन है इसके लिए सरकारों की योजना की जरूरत है । चीन या हालैंड जैसी सरकारों के अलावे और कोई इस दिशा में सोच भी नहीं रहा है ।
औपनिवेशिक नगरों की स्थापना शुरुआती वैश्वीकरण के दौरान हुई थी । इनके साथ पश्चिम की समृद्धि बढ़ाने वाला व्यापार भी जुड़ा हुआ है । इन नगरों ने उन्हीं प्रक्रियाओं के चालक की भूमिका निभाई है जिससे अब इन्हें खुद ही खतरा पैदा हो गया है । शायद इसीलिए इन नगरों में शुरू में बसने वालों ने अपने मूल निवास छोड़ने में हिचक महसूस किया था । पारसी लोग सूरत और नवसारी छोड़कर बाम्बे नहीं आना चाहते थे इसलिए उन्हें आर्थिक लोभ देना पड़ा । इसी तरह चीन में किंग वंश के अधिकारियों को हांगकांग बसाने के अंग्रेजों के फैसले पर अचरज हुआ था कि ऐसी डांवाडोल जगह पर आवास कैसे बनाए जा सकते हैं । धीरे धीरे पीढ़ियों से अर्जित ज्ञान को किनारे करके लोग समुद्र के पास बसने लगे । फ़ुकुशिमा में मध्य युग में समुद्री तट पर पत्थरों की बाड़ लगाकर चेता दिया गया था कि इसके बाद न बसें फिर भी न केवल बसावट बनी बल्कि वहीं परमाणु संयंत्र लगा दिया गया । हालांकि प्रत्येक संस्कृति में जल के साथ प्रलय जैसी धारणाओं की मौजूदगी चेतावनी के रूप में थी फिर भी औपनिवेशिक आधुनिकता की आंधी में इन्हें साहित्यिक कल्पना बताकर किनारे किया गया । इनका लोप न केवल नए नगरों के संस्थापकों के दिमाग से हुआ बल्कि साहित्यिक कल्पना के क्षितिज से भी ये गायब हो गए । पश्चिम में भी साहित्य की दुनिया में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से पहले प्रकृति की भीषणता और विनाशक शक्ति कम नहीं हुई थी । लेकिन उपनिवेश के चालकों और आधुनिक नगरों के संस्थापकों ने इससे काफी पहले पृथ्वी की विध्वंसक शक्ति के प्रति उपेक्षा अर्जित कर ली थी । इसकी छानबीन के क्रम में अमिताभ खास तरह की चिंतन प्रक्रिया की पहचान करते हैं जिसके तहत चीजों को निरंतरता में नहीं देखा जाता, उन्हें संबद्ध विराटता से विच्छिन्न कर दिया जाता है ।
उपन्यास के भीतर से इस प्रक्रिया को समझने के लिए वे विभिन्न उपन्यासों की बात करते हुए बताते हैं कि उपन्यास किसी स्थान के टुकड़े को चुनता है जहां वह कहानी को अवस्थित करे, इसके लिए उस स्थान को उसकी शेष पारिस्थितिकी से अलगाया जाता है । यह स्थान सीमित होकर राष्ट्र-राज्य मात्र रह गया है । इसी तरह का बरताव काल के साथ भी किया जाता है । महाकाव्यों के विपरीत उपन्यास में युगों या अब्दों की समय सीमा नहीं अपनाई जाती, पूरी कहानी को कुछेक पीढ़ियों के जीवनकाल में समाप्त करना पड़ता है । जलवायु परिवर्तन हमारे सामने सोचने की इस आदत के लिए चुनौती पेश कर रहा है । पृथ्वी में होने वाले बदलाव अब आपको निरंतरता और विराटता में ही स्पष्ट हो सकते हैं । सुंदरबन को डुबोने वाला पानी मियामी तट को भी प्लावित कर रहा है । चीन के साथ पेरू में भी रेगिस्तान बढ़ रहा है । दावानल आस्ट्रेलिया के साथ टेक्सास और कनाडा में भी फैल रहा है । मौसमी और भूगर्भीय ताकतें हमारे जीवन को हमेशा से प्रभावित करती रही हैं लेकिन उनका दबाव इतना अनवरत और प्रत्यक्ष कभी नहीं रहा था । उनका कहना है कि पिछली दो सदियों में हमने विचारों और उनकी अभिव्यक्ति में मानवेतर तत्वों को जिस तरह बहिष्कृत कर रखा था वह समाप्त हो चला है ।
इन मानवेतर तत्वों को साहित्य, खासकर कथा में प्रवेश करने से रोकने के लिए हमने विज्ञान कथा को साहित्य की मुख्य धारा से बाहर कर दिया है । यह अलगाव किसी दिन अचानक नहीं, धीरे धीरे और क्रमश: हुआ है । फिर भी इसका संबंध एक घटना से है । 1815 में बाली से 300 किलोमीटर पूरब भूकम्प के चलते ज्वालामुखी फूट पड़ा था । लावा और धूल सारी दुनिया में छा गया । सूरज छिप गया और तापमान तीन डिग्री से छह डिग्री तक नीचे गिर गया । आगामी अनेक वर्षों तक जलवायु की गड़बड़ी जारी रही । दुनिया के अनेक हिस्सों में 1816 को गरमी रहित वर्ष माना जाता है । इसी साल बायरन और शेली परिवार जेनेवा में घूमने गया था । बारिश में घिरे होने से उन्होंने भूतों की कहानियां लिखने का फैसला किया । मेरी शेली ने फ़्रैंकस्टीन लिखना शुरू किया । 1818 में छपने पर इस उपन्यास की बड़ी चर्चा हुई । उस समय इसे विज्ञान कथा नहीं माना गया था । बाद में इसे पहली विज्ञान कथा माना गया । हमें जानना होगा कि आधुनिकता में आखिर क्या ऐसा था कि साहित्य की मुख्य धारा से विज्ञान कथा को अलगाने की जरूरत पड़ी । ब्रूनो लातूर का कहना है कि आधुनिकता प्रकृति और संस्कृति के बीच काल्पनिक विभाजन पैदा करने पर आधारित है । इसमें प्रकृति को विज्ञान के हवाले कर दिया जाता है और संस्कृति से उसे दूर कर दिया जाता है । इस विभाजन का इतिहास अपने आपमें एक महाकाव्य है । हालांकि साहित्यिक संस्कृति की निगाह से देखने पर पता चलता है कि इस विभाजन का लगातार विरोध हुआ है । यह विरोध कविता में ज्यादा हुआ है, उपन्यास में कम । आधुनिकता के आरम्भ में साहित्य और विज्ञान में दूरी नहीं, निकटता थी । उन्नीसवीं सदी में भी यह हेल मेल जारी रहा था । इसके पक्ष में ढेर सारे प्रमाण अमिताभ ने गिनाए हैं । बाद में शुद्धीकरण के उत्साह में दोनों के भीतर से मिश्रित चीजों को हटाया गया । इसी क्रम में विज्ञान कथा को साहित्य की मुख्य धारा से बाहर करने की जरूरत पड़ी । सिर्फ़ विधाओं की सफाई के लिए ही इस विभाजन की उपयोगिता है । फिलहाल इस विभाजन के खत्म होने की आशा अमिताभ घोष को नहीं है । उनको लगता है कि जैसे जैसे इस विभाजन पर सवाल उठेंगे गंभीर साहित्य के संरक्षक उतना ही ऊंची दीवार खड़ी करते जाएंगे । इस विभाजन के चलते साहित्य को ही नुकसान पहुंचा है । वैसे जलवायु परिवर्तन की अभिव्यक्ति के लिए नई विधा भी पैदा हो रही है जिसमें भविष्य के गर्भ में निहित तबाहियों की कहानी कही जा रही है लेकिन मानव जनित जलवायु परिवर्तन तो हालिया अतीत और वर्तमान को भी समेटे हुए है । इन्हें अब भी मौजूदा यथार्थ के मुकाबले दूरस्थ अद्भुत का ही अंग समझा जा रहा है ।
अमिताभ का कहना है कि कला के भीतर जलवायु परिवर्तन के प्रवेश पर प्रतिबंध का एक कारण इसके साथ जुड़े हुए तत्व भी हैं । कोयले की तरह काली चीज साहित्य के भीतर कैसे समाए । कोयले की भौतिकता ही स्थापित व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाती है । पश्चिमी संसार में 1870 से प्रथम विश्व युद्ध तक जारी लोकतंत्र के प्रसार के पीछे कोयला खनिक रहे हैं । कोयले की भौतिकता से तेल की भौतिकता अलग होती है । तेल निकालने के लिए ज्यादा मजदूरों की जरूरत नहीं पड़ती इसीलिए इसके राजनीतिक प्रभाव कोयले के विपरीत रहे हैं । शायद इसीलिए अमेरिकी और ब्रिटिश साम्राज्य के नेताओं ने बड़े पैमाने पर तेल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया । सही बात यह है कि कोयला मजदूरों के जुझारू संघर्षों से भयभीत होकर ही द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कोयले की जगह तेल के इस्तेमाल पर जोर दिया जाने लगा । कला के लिए कोयले के विपरीत तेल का सौंदर्यीकरण आसान होता है । तेल के साथ चमचमाती मोटरकार और सड़क का उत्तेजक प्रसंग जुड़ा होता है । दूसरी बात यह है कि उपन्यास को हमने व्यक्ति चरित्रों से जोड़कर देखा है और सामूहिकता को इससे बाहर रखा है । असल में उपन्यास से समूह की बहिष्कृति भी बीसवीं सदी में यूरोपीय उपन्यास लेखन से बना प्रतिमान है । अन्यथा तालस्ताय से लेकर चिनुआ अचेबे तक समूह की भरपूर उपस्थिति दिखाई पड़ती है । कार्बन उत्सर्जन में त्वरण और सामूहिकता से परहेज आधुनिकता के एक खास पहलू के नतीजे हैं जो समय को एक ही दिशा में आगे जाती हुई प्रगति समझती है । लगातार और नाक की सीध में प्रगति की धारणा बीसवीं सदी की साहित्यिक और कलात्मक कल्पना को रूपायित करने वाली शक्ति रही है । ऐसी प्रगति में जीत हार निश्चित है और हार उस लेखन की हुई है जिसमें समूह की बलशाली मौजूदगी थी । इस तरह का कथा साहित्य यथार्थ के नजदीक होने के बावजूद पिछड़ेपन से जुड़ा समझे जाने के चलते पराभूत हुआ । व्यक्ति केंद्रित लेखन में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव व्यक्त नहीं हो पा रहे हैं इसीलिए जिन्हें बाहर कर दिया गया था वैसे लेखकों की प्रासंगिकता फिर से उभर रही है । असल में तो धरती नामक आलोचक ही राजनीति, अर्थशास्त्र और साहित्य में समूह की धारणा की वापसी करा रहा है ।
इसके बाद अमिताभ घोष अभिव्यक्ति के भाषिक माध्यम की सीमाओं की बात शुरू करते हैं । कुत्ते की भौं भौं, चिड़ियों की चहचहाहट और हवा की सांय सांय की आवाजें कथा के लिए रेडियो पर सुनाए जाने वाले समाचार से कम महत्वपूर्ण नहीं होतीं । शब्दों में ही चिंतन नहीं होता, छवियों की भी सोच विचार में भूमिका होती है । कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी के चलते  जलवायु परिवर्तन के बारे में कथा साहित्य के मुकाबले टेलीविजन, फ़िल्म और दृश्य माध्यम अधिक सहजता से बात कर पाते हैं । छपाई की तकनीक के आविष्कार ने भाषा की केंद्रीयता को मजबूत करने में निर्णायक भूमिका निभाई है । इस तकनीक ने पुरानी किताबों के साथ जुड़े रेखांकन आदि चित्रात्मक तत्वों को बेदखल कर दिया । यहां तक कि सजावट को भी कथा से निकालकर कला के खाते में डाल दिया गया । लेकिन इंटरनेट के आगमन ने बाजी पलट दी है और चित्रात्मक उपन्यास सामने आ रहे हैं ।
किताब के पहले हिस्से में इतनी बातें बताने के बाद अमिताभ इतिहास संबंधी दूसरे हिस्से में प्रवेश करते हैं । उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन के इतिहास इस हालत के लिए पूंजीवाद को जिम्मेदार ठहराते हैं । इसमें अमिताभ साम्राज्य और साम्राज्यवाद को भी समान रूप से जिम्मेदार महसूस करते हैं । हालांकि पूंजीवाद और साम्राज्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं लेकिन उनका आपसी रिश्ता सीधा सादा नहीं रहा है । अगर साम्राज्य को एक कारक के रूप में शामिल किया जाएगा तो एशिया नए हालात के केंद्र में आ जाएगा । उसकी केंद्रीयता का प्रमुख पहलू संख्या है । जलवायु परिवर्तन के शिकारों में समूची दुनिया के गरीब तो हैं ही, लेकिन उनकी सबसे बड़ी तादाद एशियाई मुल्कों की होगी । महज शिकारों के कारण नहीं बल्कि एक और वजह से संख्या का महत्व है । 1980 दशक के बाद एशियाई मुल्कों के बढ़ते उद्योगीकरण ने जलवायु परिवर्तन की गति तेज कर दी । एशियाई मुल्कों में यह बदलाव नहीं आता तो भी धरती पर जलवायु संकट देर सबेर आना ही था । आखिर जलवायु संकट के संकेत 1930 दशक से ही मिलने लगे थे । एशियाई मुल्कों के अर्थतंत्र में त्वरण से बहुत पहले 1950 दशक के उत्तरार्ध में ही वातावरण में कार्बन डाइ आक्साइड का संकेंद्रण 300 कण प्रति लाख कण तक पहुंच चुका था ।  उस समय भी पश्चिमी देशों द्वारा उत्सर्जित कार्बन इतनी तेजी से बढ़ रहा था कि वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का संकेंद्रण कम होने का नाम नहीं ले रहा था । एशियाई उद्योगीकरण के चलते संकट थोड़ा जल्दी आ पहुंचा और सबको महसूस होने लगा । इस बात को मान लेने के साथ सवाल उठता है कि एशियाई देशों में उद्योगीकरण बीसवीं सदी के आखिरी हिस्से में ही क्यों शुरू हुआ । इस सवाल का भोला सा जवाब यह दिया जाता है कि उद्योगीकरण की जनक तकनीक का आविष्कार इंग्लैंड में हुआ और उसके प्रसार के अनुरूप ही उद्योगीकरण का भी विस्तार हुआ । यह बखान उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के तापवृद्धि के इतिहास से मेल भी खाता है ।
लेकिन इस इतिहास में एक पेंच है । कार्बन सघन अर्थतंत्र के आगमन से पहले तकनीक के मामले में पुरानी दुनिया और पश्चिम में बहुत बड़ा अंतराल नहीं था । सदियों से मौजूद व्यापारिक रिश्तों के चलते विचार और तकनीक में कोई भी नयापन दूर दूर तक फैल जाता था । गहन और दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का आरम्भ भी सुदूर स्थानों पर लगभग समान समय पर हुआ । शेल्डन पोलाक ने शोध करके बताया है कि भाषाओं का बोलीकरण यूरोप और एशिया में एक साथ हुआ है । दोनों ही जगहों पर इसकी प्रेरणा भी इस्लाम के प्रसार से उपजी गतिकी थी । शोध से अब यह भी बात सामने आ रही है कि सोलहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक दुनिया भर में तीव्र और समानांतर परिवर्तन हुए । यही समय जलवायु में भी विराट बदलावों का समय है । इससे लगता है कि आधुनिक काल से पहले के सामाजिक बदलावों की जड़ें जलवायु परिवर्तन में रही हैं क्योंकि जलवायु में बदलाव पृथ्वी के अलग अलग हिस्सों को प्रभावित करता है । जो भी हो तथ्य यह है कि आधुनिक काल से पहले यूरोप, मध्य पूर्व और भारत के बीच तकनीक और ज्ञान का आदान प्रदान तेजी से होता था । पश्चिमी ज्ञान विज्ञान के विकास में पश्चिमेतर के योगदान को धीरे धीरे स्वीकार किया जाने लगा है । उस जमाने में दार्शनिक विचारों का प्रवाह इतना तेज था कि देकार्त के देहान्त के दस बरस के भीतर ही उसके विचारों का पता मुस्लिम, जैन और हिंदू दार्शनिकों को चल गया था । इसका मतलब कि आधुनिकता का कीटाणु पश्चिम से शेष दुनिया में फैला नहीं भी हो सकता है । हो सकता है दुनिया भर में यह परिघटना एक ही समय में पैदा हुई हो । इस संभावना की चर्चा को पश्चिम की आधुनिकता ने अपनी विशिष्टता पर जोर देने के लिए दबा दिया । इसके बावजूद कम से कम जापान के मामले में पश्चिम का दावा खारिज हो जाता है । उसकी आधुनिकता पश्चिम से अलग और उसके समानांतर पैदा हुई । इस बात की व्यापक मान्यता के पीछे जापान की आर्थिक ताकत भी थी । अब चीन, भारत और अन्य अनेक देशों की आर्थिक ताकत में बढ़ोत्तरी के साथ स्पष्ट होता जा रहा है कि आधुनिकता के ढेर सारे रूप हैं जो पुराने समाज के भीतर पनपे ।
इसी तरह जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल का भी लंबा पश्चिमेतर इतिहास है । इसे भुला दिए जाने के बावजूद इस इतिहास से औद्योगिक क्रांति से पहले और तत्काल बाद की उदीयमान आधुनिकताओं के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है । चीन में कोयले का इस्तेमाल बहुत पहले से हो रहा था । तब ब्रिटेन से पहले ही चीन बड़े पैमाने के कोयला अर्थतंत्र में दाखिल क्यों नहीं हो सका । इसका जवाब शायद यह है कि ब्रिटेन की तरह चीन में कोयले के भंडार तक सुगम पहुंच नहीं थी । चीन के सिचुआन प्रांत में तेल और गैस का भी इस्तेमाल होता था । बर्मा में भी तेल का उपयोग होता था । इसकी जानकारी अंग्रेज यात्रियों को थी । कुछ अंग्रेजी कंपनियों के साथ बर्मा के शासकों ने तेल का व्यापार भी किया था । कहा जा सकता है कि आधुनिक तेल उद्योग के निर्माण की दिशा में शुरुआती कदम बर्मा में उठाए गए । लेकिन 1885 में इंग्लैंड ने बर्मा पर हमला करके उसके तेल के स्रोतों पर कब्जा कर लिया इसलिए इस शुरुआत के संभावित परिणामों के बारे में केवल कयास ही लगाया जा सकता है । अगर बर्मा आजाद होता तो वह पेट्रोलियम अर्थतंत्र में आसानी से दाखिल हो सकता था । तेल के उत्पादन का अनुभव उन्नीसवीं सदी के मध्य में बर्मा से अधिक किसी देश को नहीं था । लेकिन तेल के इतिहासकार आधुनिक तेल उद्योग की शुरुआत कर्नल ड्रेक से मानते हैं । यह भी प्रमाण है कि पश्चिमी आधुनिकता खुद के सिवा किसी और को आधुनिकता के आरम्भ का श्रेय नहीं दे सकती । पानी के जहाज के मामले में भी अमिताभ ने इस बात के प्रमाण दिए हैं कि इंग्लैंड के पहले ही भारत के लोगों को इस तकनीक की भरपूर जानकारी थी । इसी वजह से पानी के जहाजों के ज्यादातर कामगार भारतीय हुआ करते थे । कोयला और पानी के जहाज संबंधी भारतीय प्रयास अंग्रेजों ने नष्ट कर दिए । पूरब में बंगाल और पश्चिम में बाम्बे इन कोशिशों के पारंपरिक केंद्र थे । भारत के जहाजों को इंग्लैंड के बंदरों पर जाने से रोकने के लिए ब्रिटेन की संसद में कानून बनाया गया । कहने की जरूरत नहीं कि अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में औद्योगिक नवीनता के लिए पानी के जहाजों की तकनीकी वरीयता आवश्यक थी । इस क्षेत्र में भारतीय प्रतिभाओं की मौजूदगी के ढेर सारे प्रमाण अमिताभ ने दिए हैं । ब्रिटिश उद्योगों की जरूरतों के लिहाज से भारत को ढालने के लिए यहां कार्बन अर्थतंत्र की संभावना खत्म की गई और कच्चे माल की आपूर्ति के लिए इसे सौर आधारित कृषि अर्थतंत्र बनाए रखा गया । वैश्विक कार्बन अर्थतंत्र को पश्चिम के पक्ष में निर्णायक शक्ल देने में भाप की तकनीक के शुरुआती दिनों में एशिया और अफ़्रीका में यूरोपीय ताकतों की राजनीतिक और सैनिक उपस्थिति की महत्वपूर्ण भूमिका थी । उसके बाद से ही कार्बन सघन तकनीकों ने पश्चिमी ताकतों को लगातार आगे बनाए रखा जिसके चलते आधुनिकता के एक ही माडल ने बाकी रूपों को दबाकर, समाहित करके और पचाकर अपना वर्चस्व कायम कर लिया । पश्चिमी ताकतों को जीवाश्म ईंधन से हासिल बरतरी अफीम युद्ध में निर्णायक तौर पर दिखाई पड़ी जब नेमेसिस नामक जहाज के नेतृत्व में हथियारबंद जलपोतों ने तबाही मचाई थी । कार्बन उत्सर्जन शुरू से ही ताकत के साथ निकटता से जुड़ा रहा है । मुक्त व्यापार और अबाध बाजार के नाम पर लड़ा गया पहला बड़ा युद्ध अफीम युद्ध था और तबसे ही यह साफ है कि सैनिक और राजनीतिक ताकत के बिना पूंजीवादी उद्योग और व्यापार फल फूल नहीं सकते । राजकीय हस्तक्षेप इसकी बढ़त के लिए हमेशा जरूरी रहा है । सेना की मदद के बिना एशिया में स्थानीय व्यापार पर पश्चिमी पूंजी का प्रभुत्व कायम नहीं हो सकता था ।
इस इतिहास के बाद अमिताभ एक सवाल उठाते हैं कि अगर प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही साम्राज्य बिखर गया होता तो क्या एशियाई अर्थतंत्रों में पहले ही तेजी आ जाती । अगर इसका उत्तर हां है तो क्या साम्राज्यवाद ने एशियाई और अफ़्रीकी मुल्कों के आर्थिक विस्तार को रोककर जलवायु संकट को टालने में मदद की । जलवायु संकट संबंधी वैश्विक बातचीत में चीन, भारत और अन्य देशों के रुख से यही निष्कर्ष निकलता है । कार्बन अर्थतंत्र के जटिल इतिहास को मान लेने का यह मतलब नहीं कि ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के मामले में वैश्विक न्याय का तर्क कमजोर हो जाता है । इससे साबित होता है कि दुनिया के गरीब देश इसलिए गरीब नहीं हैं कि वे आलसी या उदासीन हैं । उनकी गरीबी कार्बन अर्थतंत्र द्वारा निर्मित विषमता का परिणाम है । कार्बन अर्थतंत्र का परिणाम संपदा है और दक्षिण के गरीबों को ऐतिहासिक तौर पर इस संपदा से वंचित रखा गया है । वितरण संबंधी न्याय की मांग है कि उन्हें इस अर्थतंत्र का अधिक लाभ मिलना चाहिए । लेकिन इस तर्क में ही भारी छल छिपा हुआ है । हमारे पास अपने ही विनाश की कीमत पर समृद्धि अर्जित करने का रास्ता बचा है ।
इसी क्रम में अमिताभ उन नेताओं और परंपराओं की याद दिलाते हैं जो असीम उद्योगीकरण के विरुद्ध एशियाई मुल्कों में सुनाई पड़ी थीं । इस सिलसिले में वे भारत में गांधी और चीन में ताओ, कन्फ़ूशियसी और बौद्ध परंपराओं का जिक्र करते हैं । पूंजीवादी आधुनिकता के इस प्रतिरोध पर धीरे धीरे काबू पाया जा सका । जिन एशियाई देशों में पहले पहल उद्योगीकरण हुआ वे पश्चिम के रास्ते पर नहीं चले । कोरिया और जापान ने अलग राह अपनाई । इन देशों में अलग अलग किस्म की पर्यावरणिक चिंता भी इसके पीछे थी । चीन की एक संतान की नीति की भी अमिताभ प्रशंसा करते हैं । अगर ये सब रुकावटें न होतीं तो खतरे का निशान बहुत पहले ही पार हो चुका होता । इस बात को भी कहा जाना जरूरी है कि भारत और चीन पर आज जलवायु बदलाव के लिए जो भी जिम्मेदारी डाली जाए, दोनों देशों में ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने जलवायु वैज्ञानिकों से बहुत पहले दुनिया की बहुसंख्यक आबादी द्वारा औद्योगिक सभ्यता को अपनाने के खतरों को पहचाना था । हालांकि वे अपने देशवासियों को वैकल्पिक रास्ते पर नहीं ले जा सके लेकिन जिस दुनिया में कार्बन सघन अर्थतंत्र को ही संपदा समझा जाता है वहां भौतिक त्याग के पक्ष में बोलने के लिए उन्हें यथोचित सम्मान दिया जाना चाहिए । जलवायु संबंधी भरपाई की मांग तो जायज है लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि संकट को जन्म देने में थोड़ी भागीदारी हमारी भी है ।
इस सबके बाद किताब के आखिरी हिस्से में वे राजनीति की बात करते हैं । उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने आधुनिक युग की सबसे महत्वपूर्ण धारणा यानी स्वतंत्रता के समक्ष गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है । यह धारणा समकालीन राजनीति के अतिरिक्त मानविकी, कला और साहित्य के लिए भी महत्वपूर्ण रही है । प्रबोधन के बाद से ही स्वतंत्रता के दार्शनिकों ने इसे मनुष्य केंद्रित समझा और माना कि दूसरे मनुष्यों या मानव निर्मित व्यवस्था के अन्याय, उत्पीड़न, विषमता और एकरूपता से बचाव में यह स्वतंत्रता निहित है । प्रकृति से आजादी को स्वतंत्रता का लक्षण माना जाता था । जो अपने पर्यावरण की बेड़ियों को तोड़ सकें उन्हें ही कुछ करने में सक्षम समझा गया । इतिहास तो इन्हीं का होता था अन्य लोगों के अतीत मात्र होते थे । धरती की हलचलों ने जब साबित कर दिया है कि हम कभी मानवेतर तत्वों से आजाद नहीं रहे हैं तो इन धारणाओं पर पुनर्विचार करना होगा । उनके मुताबिक यही सवाल प्रकृति से अलग मानव केंद्रित साहित्य और कला के प्रसंग में भी उठेंगे । आधुनिकता को अपनाने के चक्कर में एशियाई लेखकों ने अपनी परंपरा से नाता तोड़ लिया था । स्वतंत्रता को भौतिक से मुक्त होने के अर्थ में व्याख्यायित किया गया था । जिससे मुक्त होना था उस भौतिक में मानवेतर जगत शामिल था । इस नजरिए से सोचने में पुरानी सोच को झटका तो जरूर लगेगा । लगता है कि लेखक अपने युग का नेतृत्व करने के जोश में धरती पर मंडराते पर्यावरण संबंधी खतरे के प्रति अचेत और असावधान रहे हैं ।
ऐसा केवल लेखकों और साहित्यकारों के साथ नहीं हुआ बल्कि पूरा बौद्धिक संसार ही इसका शिकार रहा प्रतीत हो रहा है । राजनीतीकरण के बावजूद हम लोग व्यापक परिप्रेक्ष्य में जलवायु परिवर्तन के संकट के प्रति उदासीन रहे हैं । राजनीतिक गोलबंदी और जलवायु संकट के बीच यह संबंध विच्छेद सबसे अधिक दक्षिण एशिया के उन्हीं देशों में दिखाई पड़ा जो जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं । भारत में पर्यावरण से जुड़े ढेर सारे संगठन होने के बावजूद गोलबंदियों या बहसों में जलवायु परिवर्तन की बात नहीं सुनाई देती । पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में भी यही हाल है । यह तब है जब समूचे भारतीय उप महाद्वीप में जलवायु परिवर्तन से लोग बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रहे हैं और इन सवालों पर सामाजिक राजनीतिक टकराव भी शुरू हो चुके हैं । पर्यावरणिक तबाही लोगों के जीवन और भरण पोषण पर असर डाल रही है लेकिन राजनीति में धर्म, जाति, भाषा और लिंग आधारित अस्मिता के सवाल जोर पकड़ते जा रहे हैं । साझा हितों और सार्वजनिक दुनिया के बीच पैदा हुई यह फांक राजनीति की प्रकृति में बुनियादी बदलाव का संकेत करती है । शायद अब राजनीति का सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से नाता टूट चुका है ।
साहित्यिक कल्पना के बारे में भी यह सवाल उठता है । राजनीति से जुड़े होने के बावजूद वह सामूहिक जीवन के प्रश्नों से कटी क्यों है । उपन्यास को व्यक्ति से जोड़ देने के कारण शायद कथात्मक कल्पना से समूह गायब हो गया है । वे कहते हैं कि साहित्य और राजनीति को आपस में जोड़ने वाली चीज नैतिकता है । इस शब्द में थोड़ी धार्मिक छाया भी है । इसीलिए राजनीति और साहित्य में शुचिता और प्रामाणिकता महत्वपूर्ण मूल्य बन जाते हैं । अगर साहित्य को प्रामाणिक अनुभूति की अभिव्यक्ति समझा जाएगा तो कथा को झूठ ही माना जाएगा । कथा की शक्ति दुनिया को जस का तस पेश कर देने मात्र में नहीं होती, वह संभाव्य की कल्पना के लिए भी जगह बनाता है । जलवायु संकट ने मानव अस्तित्व के अन्य रूपों की कल्पना करने की चुनौती पेश कर दी है । दुनिया जैसी है उसी तरह से उसके बारे में सोचना सामूहिक आत्महत्या को दावत देना है । उसे जैसा होना चाहिए उसकी कल्पना की जरूरत है । दिक्कत यह है कि चुनौती तब उपस्थित हुई है जब कथा साहित्य किसी और काम में लगा हुआ है । राजनीति और कथा को वैयक्तिक मानने की यही कीमत और विडंबना है । इस मान्यता से संभावना और विकल्प की जगह कम हो जाती है । राजनीति से मानवेतर तत्व वैसे ही बहिष्कृत होता है । अब तो राजनीति और प्रशासन भी अलग हो चुके हैं । प्रशासन के अपने स्वतंत्र अदृश्य संस्थान कायम हो गए हैं । राजनीति बहुत कुछ प्रदर्शन में तब्दील हो गई है इसलिए सत्ता संचालन उससे बाहर होता जा रहा है । इसका ठोस उदाहरण है कि इराक युद्ध के विरोध में लाखों लोग सड़क पर उतरे लेकिन उन्हें भी युद्ध बंद होने की कोई आशा नहीं थी । इससे जाहिर हुआ कि नीतियों को प्रभावित करने की जन समाज में क्षमता नहीं बची । उसके बाद तो लगभग सभी चीजें बेकाबू हो चली हैं । नागरिकों को प्रतिनिधियों द्वारा अपने हितों के प्रतिनिधित्व की उम्मीद नहीं रह गई है । राजनीतिक यथार्थ में यह बदलाव विश्व अर्थतंत्र में पेट्रोल के दबदबे का परिणाम हो सकता है क्योंकि यह कोयले से भिन्न होता है । कोयले के मामले में मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश रहती है । तेल के आगमन के बाद जनता के हाथों से ताकत निकल गई है । लोग शक्ति के उत्पादक नहीं उपभोक्ता मात्र बना दिए गए हैं । ऐसी परिस्थिति में सड़क पर जनता की लोकप्रिय इच्छा के प्रदर्शन से वास्तविक कानून निर्माण और प्रशासन का कोई लेना देना नहीं रह गया है । राजनीति से उसकी अंतर्वस्तु यानी सत्ता की शक्ति का प्रयोग निकाल बाहर कर दिया गया है और वह महज आत्माभिव्यक्ति होकर रह गई है । इसका सबसे बेहतरीन वाहक इंटरनेट है जिसमें सोशल मीडिया के जरिए आत्माभिव्यक्ति के नाना रूप उपलब्ध करा दिए गए हैं । जो जीवन था वह केवल मुजाहिरा होकर रह गया है । यह चीज संवाद से पूरी तरह अलग है क्योंकि संवाद में समीक्षा या सुधार की गुंजाइश रहती है । कारपोरेट शासन के लिए यह सबसे अच्छा वातावरण है । जलवायु परिवर्तन से इनकार के लिए तेल का व्यापार करने वाले कारपोरेट घराने बिना किसी वजह के धन नहीं देते । पश्चिमी देशों में भागीदारीपरक राजनीति की बढ़ती हुई आकांक्षा के पीछे वंचना का यही अहसास है । लेकिन इसी हालत के कारण हिंसा का सहारा लेने वाले चरम नकारपंथी आंदोलन भी पैदा हो रहे हैं । पर्यावरण के कार्यकर्ताओं की हताशा का पता इसी से चलता है कि जो समस्या व्यवस्था ने पैदा की है उसके समाधान के लिए व्यक्तियों की अंतरात्मा को जगाने की बात हो रही है जबकि जरूरत सामूहिक कार्यवाही की है । निजी नैतिकता का सवाल उठाकर हम इस व्यवस्थाजनित समस्या के हल की ओर नहीं बढ़ सकते हैं । गांधी के उदाहरण से हम नैतिक उपायों की अपर्याप्तता समझ सकते हैं । वे भारत को अंग्रेजों से तो आजाद करा सके लेकिन देश को वैकल्पिक आर्थिक रास्ते पर नहीं चला सके । बस वे सर्वभक्षी कार्बन सघन अर्थतंत्र की राह में सरपट दौड़ने को कुछ समय के लिए रोक सके । वर्तमान जलवायु संकट के समक्ष ऐसी राजनीति की सफलता की आशा व्यर्थ है । भविष्य की पीढ़ियां संकट के प्रति अचेत रहने का आरोप नेताओं और राजनीतिज्ञों पर तो लगाएंगी ही, वे कलाकारों और साहित्यकारों से यह भी कहेंगी कि वैकल्पिक संभावना तलाशने की जिम्मेदारी केवल नेताओं और नौकरशाहों की नहीं होती ।
जलवायु परिवर्तन की वैश्विक राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण कारक आज की दुनिया में अंग्रेजी की भूमिका है । अंग्रेजी अब किसी राष्ट्रीय इकाई से जुड़ी नहीं रह गई है । अब वह अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यू ज़ीलैंड की भाषा है जो जासूसी और निगरानी की संरचना को सारी दुनिया में संचालित करने वाली ताकतें हैं । जलवायु संकट में मुख्य बात यह है कि इस भाषा क्षेत्र में मुक्त व्यापार की धारणा का दबदबा है । इसलिए जलवायु परिवर्तन से इनकार सबसे अधिक इसी भाषा क्षेत्र में किया जा रहा है । लेकिन इसी भाषा क्षेत्र में इस मसले पर राजनीतिक पहल भी सबसे मजबूती से ली जा रही है । समूचे अंग्रेजी भाषा क्षेत्र में और खासकर अमेरिका में इन दोनों विपरीत प्रवृत्तियों के बीच का तनाव जलवायु परिवर्तन की सार्वजनिक राजनीति को परिभाषित कर रहा है । इस मामले में हालैंड और डेनमार्क की तरह कोई ठोस कदम उठाने या मालदीव और बांग्लादेश की तरह आस्तित्विक संकट महसूस करने की जगह अमेरिका में यह सवाल राजनीतिक ध्रुवीकरण का बायस बन गया है । दक्षिणपंथी राजनेता इसे समाजवाद और कम्यूनिज्म के साथ जोड़कर षड़यंत्र की तरह प्रचारित कर रहे हैं । इन नेताओं ने पर्यावरण वैज्ञनिकों को डराया धमकाया है । इस राजनीति को कारपोरेट घरानों और तेल के अरबपति व्यापारियों से क्षमता, प्रोत्साहन और धन मिलता है । मीडिया पर भी इनका ही कब्जा है । इसके बरक्स अमेरिका के रक्षा विभाग में जलवायु परिवर्तन से सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर गंभीरता है । अमेरिका के सुरक्षा के सबसे बड़े अफ़सर ने सीनेट को बताया कि जलवायु परिवर्तन से खाद्यान्न और ऊर्जा बाजार में उथल पुथल रहेगी, राज्य कमजोर होंगे, शरणार्थी बढ़ेंगे और दंगों, सामाजिक अशांति तथा लूटपाट में इजाफ़ा होगा । राजनेताओं के लगातार इनकार के बावजूद अमेरिका के साथ मिलकर ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया के सैनिक संस्थान जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने की तैयारी कर रहे हैं । एशियाई देशों के उभार को रोकने के लिए यथास्थिति को बरकरार रखना सबसे बड़ी समस्या हो गई है । जलवायु संकट के शरणार्थियों को देश की सीमा से बाहर रोके रखने के लिए तरह तरह की बंदिशें लगाना पश्चिमी राष्ट्र-राज्य का सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार हो गया है ।
मानवता ने अपने ही विरुद्ध लड़ाई तो छेड़ ही रखी है, धरती के साथ भी युद्धरत है । हम जिस दुनिया में रह रहे हैं उसे साम्राज्य और उसकी विषमताओं ने गढ़ा है । जलवायु संकट ने इन विषमताओं को और बढ़ाने में मदद की है । इसी मायने में जलवायु परिवर्तन के परिणाम साम्राज्य को मजबूत कर रहे हैं । अमिताभ के अनुसार जलवायु संकट के समय की घटनाओं से औपनिवेशिक समय की समानता है । उन्हीं दिनों की तरह अमीर देशों के आम नागरिकों के एक हिस्से का निहित स्वार्थ वहां के शासन को मजबूती पहुंचा रहा है । उसी समय की तरह गरीब देशों के ऊपरी तबके के स्वार्थ, शासक देश के अमीरों के साथ जुड़ गए हैं और दक्षिण के गरीबों को इस संकट की मार झेलने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है ।
किताब के अंत में अमिताभ पेरिस में हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के पाखंड का परदाफ़ाश करते हैं और बताते हैं कि पेरिस के आतंकवादी हमले ने सरकार को पर्यावरण आंदोलनकारियों के विरुद्ध दमन का बहाना मुहैया करा दिया था । पिछले दो दशकों में सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट घरानों ने एक ही काम में महारत हासिल की है और वह है आंदोलनकारियों का दमन । सम्मेलन के सुरक्षित वातावरण से जो समझौता निकला उसमें जलवायु परिवर्तन का दंश झेलने वालों को हुए नुकसान की भरपाई का कानूनी रास्ता बंद कर दिया गया और अमीर देशों की खैरात का उन्हें मुहताज बना दिया गया । इस समूचे निराशाजनक वातावरण में भी कुछ सकारात्मक बातें अमिताभ को दिखाई पड़ रही हैं । सरकारों और जनता के भीतर तत्काल कुछ करने की बेताबी नजर आ रही है, वैकल्पिक ऊर्जा के ठोस समाधान उभरे हैं, दुनिया भर में इस सवाल पर सक्रियता बढ़ी है और पर्यावरण आंदोलन को कुछ जीतें भी हासिल हुई हैं । सबसे बड़ी बात कि इस मसले पर पारंपरिक राजनीतिक ढांचों से बाहर के लोगों का सरोकार गहराया है । हमारे पारंपरिक राजनीतिक ढांचों की सबसे बड़ी सीमा राष्ट्र-राज्य के हितों से उनका जुड़ाव है । अमिताभ को यकीन है कि दुनिया भर में खड़े होने वाले धर्म निरपेक्ष विरोध प्रदर्शन, जड़ता को तोड़कर बुनियादी बदलाव ले आएंगे । उनके सामने एक तो समय की कमी है । दूसरे विभिन्न देशों में कार्यकर्ताओं के दमन के लिए सुरक्षा संस्थानों ने भारी सरंजाम एकत्र कर लिए हैं । आंदोलनों, संगठनों और वैकल्पिक समुदायों को मोर्चा संभालना होगा । यही लोग नए तरह के कला और साहित्य का भी सृजन करेंगे ।                                                                                                                                                     

Monday, January 16, 2017

चुनाव के सवाल पर मार्क्स की निरंतरता में लेनिन

             
                                                     
2014 में पालग्रेव मैकमिलन से अगस्त एच निम्ज़ की किताब ‘लेनिन’स एलेक्टोरल स्ट्रेटेजी फ़्राम मार्क्स ऐंड एंगेल्स थ्रू द रेवोल्यूशन आफ़ 1905: द बैलट, द स्ट्रीट्स- आर बोथ’ का प्रकाशन हुआ । भूमिका में लेखक ने बात यहां से शुरू की है कि रूसी क्रांति दुनिया की पहली और अकेली क्रांति है जिसमें संसद में भागीदारी का इस्तेमाल मजदूर वर्ग द्वारा राजसत्ता पर कब्जे के लिए किया गया । आज भी जो लोग सड़क और संसद के झमेले में उलझे रहते हैं उनके लिए लेनिन के क्रांतिकारी संसदवाद का महत्व असंदिग्ध है । लेखक ने चार बातें जोर देकर कही हैं । पहली तो यह कि क्रांति के लिए चुनाव और संसद का इस्तेमाल लेनिन से अधिक कुशलता के साथ किसी और ने नहीं किया । इसके लिए उन्होंने लेनिन के समस्त प्रकाशित लेखन में से 1906 से लेकर प्रथम विश्व युद्ध तक गठित चार ड्यूमाओं में रूसी सामाजिक जनवादी लेबर पार्टी को प्रदत्त नेतृत्व समेत सभी चुनावी गतिविधियों का सार प्रस्तुत किया है । यह काम आसान नहीं था क्योंकि किसानों के अलावे अन्य किसी विषय पर लेनिन ने उतनी कलम नहीं चलाई जितनी चुनाव पर । इसमें आसानी इसलिए हो गई क्योंकि अलग अलग अवसरों पर भी लेनिन ने अपने अधिकतर तर्क दोहराए हैं । दूसरी यह कि सड़क और संसद संबंधी लेनिन की नीति की जड़ें मार्क्स और एंगेल्स की राजनीति में हैं । उनके तर्कों के मूल मार्क्स और एंगेल्स की समझ में निहित हैं । मार्क्स के बारे में ज्यादातर लेखन में उनकी चुनाव संबंधी समझ पर बात नहीं की जाती लेकिन लेखक को उनका यह पहलू भी बहुत महत्वपूर्ण प्रतीत हुआ । लेनिन के बारे में भी कुछ कम नहीं लिखा गया लेकिन मार्क्स-एंगेल्स के चुनाव संबंधी चिंतन में लेनिन की राजनीति की जड़ तलाशने वाली कोई किताब लेखक को नहीं दिखी । इस सिलसिले में लेखक का दावा है कि लेनिन की पीढ़ी में दूसरा कोई भी लेनिन से अधिक मार्क्स को नहीं समझ सका था । तीसरी यह कि लेनिन और दूसरे इंटरनेशनल के सामाजिक जनवादियों के बीच विभाजन प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने से पहले ही चुनाव और संसद के इस्तेमाल की सही मार्क्सवादी नीति के सवाल पर हो चुका था । इसके लिए लेखक ने लेनिन के लेखन को कालक्रमिक तरीके से देखा और महसूस किया कि लेनिन को पश्चिमी यूरोपीय मार्क्सवादियों और खुद के बीच असहमति और भिन्नता की जानकारी अच्छी तरह से थी । इस लेखन को देखने से पता चलता है कि जो औपचारिक विभाजन प्रथम विश्व युद्ध के आरम्भ में हुआ असल में वह एक दशक से जारी प्रक्रिया की परिणति था । चौथी कि चुनाव संबंधी लेनिन की नीति के चलते ही 1917 में रूस के अन्य राजनीतिक समूहों के मुकाबले बोल्शेविक आगे निकल सके । यह मार्क्स-एंगेल्स की राजनीति को गहराई से समझने के कारण संभव हुआ । इस अर्थ में रूसी क्रांति कम्यूनिस्ट आंदोलन के जनक द्वय की राजनीति की निरंतरता में घटित हुई थी । लेखक ने इन सब बातों का महत्व समसामयिक आंदोलनों के लिहाज से समझा और समझाया है । आज के अधिकतर आंदोलन सड़क और संसद का संबंध सही ढंग से न समझने के कारण ही अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं । जब लेखक किसी को अपनी इस किताब की विषय वस्तु के बारे में बताते थे तो लोगों को विश्वास नहीं होता था । लेनिन की छवि इस तरह की नहीं है कि उनकी चुनाव संबंधी रणनीति को गंभीर चीज समझा जाए । इस छवि को बनाने में उनके दुश्मनों से कम योगदान उनके दोस्तों का नहीं है । लेनिन के नाम पर एक सदी तक जो कुछ हुआ दुश्मन तो उसका इस्तेमाल लेनिन की मूर्ति पर कोलतार पोतने के लिए करते ही हैं । उनकी मृत्यु के बाद विकसित नौकरशाही की जिम्मेदारी भी जान बूझकर उन्हीं पर डाल दी जाती है । लेकिन एक दशक तक का लेनिन का चुनाव और संसद संबंधी लेखन और क्रियाकलाप उनके दुश्मनों के लिए काफी असुविधाजनक है इसलिए भी उनके इस पहलू पर कम बात की जाती है ।
इस क्रम में लेखक ने इस तथ्य को उभारना जरूरी समझा है कि चुनाव के बारे में सही मार्क्सवादी नीति को सूत्रबद्ध करने के लिए लेनिन को रूसी उदारपंथियों से लड़ना पड़ा था क्योंकि वे मजदूरों और किसानों को अपनी क्रांति विरोधी राजनीति के पक्ष में लामबंद करने की कोशिश करते थे । चुनाव अभियानों के दौरान लेनिन लोकतंत्र और उदारपंथ के बीच अंतर करने पर बल देते थे । रूसी उदारपंथ की इस तीखी आलोचना के चलते भी उदारपंथी कतारों में उन्हें बहुत अच्छी नजर से नहीं देखा जाता । 1848-49 में यूरोपीय उदारपंथ की गतिविधियों की मार्क्स द्वारा की गई आलोचना से लेनिन को इस राजनीतिक प्रवृत्ति के प्रति रुख तय करने में मदद मिली थी । लेखक को यह किताब लिखने की प्रेरणा कुछ लोगों की इस मान्यता से मिली कि अल्पसंख्यक होने के कारण मजदूर वर्ग की पार्टियों को अन्य सामाजिक तबकों की पार्टियों के साथ अनिवार्य रूप से समझौता करना पड़ता है, इसके लिए उन्हें पश्चिमी यूरोपीय सामाजिक जनवादियों की तरह अपनी मांगों को कुर्बान करके सुधारवादी राजनीति करनी पड़ती है । इसी समझ और मान्यता के प्रतिवाद के रूप में लेखक ने चुनाव संबंधी बोल्शेविक नीति की छानबीन की है । लेनिन ने भी ऐसे तर्क सुने थे लेकिन उनके सामने झुके नहीं ।
चुनाव के सिलसिले में लेनिन ने जिन सवालों पर विचार किया वे हैं- अलोकतांत्रिक चुनावों में भाग लिया जाए या उनका बहिष्कार किया जाए, चुनाव अभियान कैसे चलाया जाए, चुनाव में गठबंधन किया जाए या नहीं, चुने हुए प्रतिनिधियों को पार्टी के प्रति जवाबदेह कैसे बनाया जाए, सशस्त्र संघर्ष के साथ चुनावी राजनीति का संतुलन कैसे बिठाया जाए और सबसे आगे बढ़कर मजदूर-किसान संश्रय यानी बहुसंख्यक क्रांतिकारी गठबंधन बनाने के लिए चुनावी/संसदीय प्रक्रिया का किस तरह इस्तेमाल किया जाए । इस समूची प्रक्रिया में पार्टी की अंदरूनी बहसों की छाया बनी रही । इन बहसों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक जनवाद की क्रांतिकारी और सुधारवादी धाराओं के बीच विभाजन का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है । यह विभाजन रूस में क्रांति की पहली कोशिश, उसमें हासिल पराजय, क्रांतिकारी गतिविधियों के पुनरुत्थान और प्रथम विश्व युद्ध के शुरू होने तक लगातार बना रहा । युद्ध छिड़ने पर ड्यूमा के बोल्शेविक प्रतिनिधियों को युद्ध के बारे में उनकी राय के चलते गिरफ़्तार कर लिया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया । फ़रवरी क्रांति के बाद लेनिन ने अक्टूबर में राजसत्ता दखल हेतु सशस्त्र विद्रोह के लिए सही समय चुनने और बोल्शेविकों की ताकत तौलने में चुनाव संबंधी एक दशक के अनुभव का लाभ उठाया । तथ्यों से सिद्ध होता है कि अक्टूबर क्रांति में बोल्शेविक नेतृत्व की सफलता के पीछे भी चुनाव संबंधी मार्क्स-एंगेल्स की समझदारी का योगदान था । पूरी किताब में लेखक ने कोशिश की है कि पाठक को लेनिन की आवाज सुनाई पड़े, लेखक की व्याख्या नहीं ।

किताब के लेखन का समय लेखक के ध्यान में हमेशा बना रहा है । 2010 में दुनिया के अलग अलग मुल्कों में उठा तूफान तीन दशकों की भारी चुप्पी के बाद आया है । इस तूफान का मेल 250 साल पुरानी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में पैदा हुए सबसे गंभीर संकट के साथ हो गया है । इसमें उठान और गिरावट के दौर आएंगे लेकिन 1905 में 35 साला लेनिन की तरह ही इस समय के जिम्मेदार नेताओं को अपने अनुभवों से सीखना होगा । लेखक ने यह किताब भविष्य के इन्हीं लेनिनों को समर्पित की है इस उम्मीद के साथ कि वर्तमान समय ऐतिहासिक साबित होगा ।

Wednesday, January 4, 2017

वोट के लुटेरे

                              
                                               
2012 में सेवेन स्टोरीज से ग्रेग पलास्त की किताब ‘बिलिनेयर्स ऐंड बैलट बैंडिट्स: हाउ टु स्टील ऐन एलेक्शन इन 9 इजी स्टेप्स’ का प्रकाशन हुआ । किताब की भूमिका राबर्ट एफ़ केनेडी जूनियर ने लिखी है । किताब में शामिल कार्टून टेड राल के बनाए हुए हैं । किताब की विषय वस्तु अमेरिकी चुनावों पर थैलीशाहों का बढ़ता कब्जा है ।
भूमिका से पता चलता है कि इस बार ट्रंप के चुनाव में जो कुछ खुलेआम हुआ उसकी प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी । इस प्रक्रिया का एक घटक वहां के सर्वोच्च न्यायालय का सिटिज़ेन्स यूनाइटेड के मामले में 2010 का यह फैसला है कि कारपोरेशन व्यक्ति हैं और तब निश्चित है कि धन ही उनकी बोली होगी । स्वाभाविक है कि जिसके पास जितना अधिक धन होगा लोकतंत्र में उसकी आवाज सबसे ऊंची होगी और गरीब अमेरिकियों की आवाज सुनाई नहीं देगी । सबूत यह है कि पिछले दो दशकों के चुनावों में वही प्रत्याशी विजयी हुए जिन पर सबसे अधिक धन लगाया गया था । लेखक को लगता है कि मजबूत मध्यवर्ग के आधार पर टिका हुआ अमेरिकी लोकतंत्र धीरे धीरे अरबपतियों के अल्पतंत्र में बदलता जा रहा है ।
इस माहौल में भूमिका लेखक को अपने बचपन की याद आती है जब उन्हें लैटिन अमेरिका में अनेक देशों के स्थानीय दलालों के सहयोग से चंद धनी बाहरी लोगों के हाथों में देश के शासन की बागडोर दिखाई पड़ती थी । देश की जमीन और तमाम संसाधन इन्हीं थैलीशाहों के कब्जे में होते थे और राष्ट्रपति का पद इनके बीच ही घूमता रहता था । इस तरह के शासन को चलाने के लिए जनता को धोखे में रखने वाले प्रचारतंत्र, प्रेस पर नियंत्रण, चुनाव में धोखाधड़ी, जनता के संगठनों पर हमले और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर शक्तिशाली और क्रूर पुलिस राज्य को बरकरार रखने की जरूरत होती थी । अब उन्हें अपना देश अमेरिका भी उसी तरह का बनता नजर आ रहा है । उनके मुताबिक देश ऐसी व्यवस्था की गिरफ़्त में आता जा रहा है जिसमें देश के प्रति किसी भी निष्ठा से रहित पारदेशीय बहुराष्ट्रीय निगमों के व्यापारिक हितों की सेवा राजनीति का सबसे बड़ा काम हो गया है । इन ताकतों का सब तरह के संचार माध्यमों पर कब्जा हो गया है । अमेरिका के इतिहास में पहली बार कारपोरेट घरानों और मीडिया के हित एक दूसरे के साथ नत्थी हो गए हैं ।
कारपोरेट घरानों के हाथ में अकूत धन और मीडिया के आ जाने के बाद वे अमेरिकी लोगों को वोट देने से रोककर प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र को स्थायी रूप से अपंग बना देने की साजिश कर रहे हैं । तमाम तरह के ऐसे भेदभावपरक कानून बनाए जा रहे हैं जिनके कारण गरीब, अल्पसंख्यक समुदाय, वरिष्ठ नागरिक और विद्यार्थी मतदान के अधिकार से वंचित होते जा रहे हैं । मतदाताओं का दमन कानूनी अपराध है और इससे बचने के लिए विशेष समुदाय के मतदाताओं को बड़े पैमाने पर जेल में डालकर उनको मताधिकार से वंचित करने का महीन रास्ता अपनाया जाता है । विभिन्न तरह के पहचान पत्रों को अनिवार्य बनाकर भी यह काम किया जाता है ।
1778 में अमेरिका एकमात्र लोकतांत्रिक देश था । आज 166 देशों में लोकतांत्रिक सरकारें हैं । लेखक ने व्यंग्यपूर्वक लिखा है कि हम अमेरिकी एक ओर तो अफ़गानिस्तान और इराक़ में लोकतांत्रिक सरकार बनवाने के लिए कत्लेआम कर रहे हैं और दूसरी ओर अपने ही देश में लोगों को वोट देने से रोकने के तमाम उपाय खोज रहे हैं और उन्हें बेरहमी से लागू कर रहे हैं । इसी सिलसिले में कार्ल रोव ने बताया कि अगर अमेरिका के एक प्रतिशत अश्वेत मतदाताओं में से चौथाई को मतदान से रोक दिया जाए तो चुनाव में बाजी पलटी जा सकती है ।
अरबपति लोग विभिन्न प्रत्याशियों पर किसी देशभक्तिपूर्ण भावना के तहत धन नहीं लुटाते बल्कि वे अमेरिकी जनता के सभी आदर्शों, सपनों और आकांक्षाओं पर प्रहार करने के मकसद से राजनेताओं को खरीदने के लिए यह निवेश करते हैं । सर्वोच्च न्यायालय के उपर्युक्त फैसले को जान मैककेन ने इक्कीसवीं सदी का सबसे बुरा फैसला कहा था । इस फैसले ने प्रत्याशियों पर पूंजी लगाने से कारपोरेट घरानों को रोके रखने के सौ सालों के कानूनी और वैधानिक इतिहास को मटियामेट कर दिया । उनका दिया हुआ चंदा असल में लोकतंत्र का स्वामित्व हासिल करने के लिए चुकाई गई फ़ीस होता है । लेखक के मुताबिक चुनाव अभियान में पूंजी लगाने की इजाजत कानूनी घूसखोरी की अनुमति देना है । कारपोरेट घरानों के चंदे की बदौलत चुनाव जीतने वाले राजनेता बाद में सर्वसुलभ हवा, पानी, जंगल, पहाड़ और सार्वजनिक जमीन को निजी मुनाफ़ाखोरी के लिए जनता से छीनकर कारपोरेट घरानों को सौंप देने का षड़यंत्र करते हैं । तेल, कोयला, गैस और परमाणु ईंधन की खरीद बिक्री का काम करने वाले ये व्यापारी पर्यावरण की परवाह किए बिना धरती और वातावरण को बरबाद करके नरक से भी इन सब चीजों को खींच निकालते हैं और मनुष्य के लिए जिंदगी जीना सबसे कठिन काम बना देते हैं । दूसरी ओर शेयर बाजार ऐसा जुआघर बन चुका है जहां जनता का धन अबाध रूप से लगातार बैंकों के जरिए इन थैलीशाहों की जेब में पहुंचता रहता है ।
लेखक को लगता है कि अमेरिका अब वैसी ही सरकारें बनाता जा रहा है जैसे शासन से छुटकारा पाने के लिए उसने आजादी की लड़ाई लड़ी थी । यूरोपीय बादशाहतों की मनमानी से भागकर इस देश के बाशिंदों ने आजादी मिलने पर लोकतंत्र को अपनाया था । लोकतांत्रिक शासन की इस परंपरा को ध्वस्त करने के लिए जनता को मतदान से वंचित करना पहला कदम है । लोकतंत्र का नाश करने वाली मशीन को ऐसा करने की ताकत पूंजी से मिलती है । लोगों को मतदान के अधिकार के साथ ही साफ हवा, साफ पानी, व्यापार में ईमानदारी और पारदर्शिता तथा कारगर लोकतांत्रिक शासन का भी अधिकार है । लेखक ने नागरिकों से इस अधिकार को वापस हासिल करने की लड़ाई छेड़ने की अपील की है ।

  

Friday, December 30, 2016

नया इंटरनेशनल


1877 में घेन्ट नगर में यूनिवर्सल सोशलिस्ट कांग्रेस संपन्न हुई । इसमें पहले कभी के मुकाबले अधिक देशों का प्रतिनिधित्व हुआ । नौ देशों (फ़्रांस, जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड, ब्रिटेन, स्पेन, इटली, हंगरी, रूस और बेल्जियम) के प्रतिनिधियों का लगभग 3000 मजदूरों ने स्वागत किया । इनमें से कुछ प्रतिनिधियों को किसी अन्य देश के संगठन का (डेनमार्क, संयुक्त राज्य और पहली बार ग्रीस तथा मिस्र के मजदूर समूहों) भी अतिरिक्त जनादेश हासिल था । इंटरनेशनल के डि पाएपे, लीबक्नेख्त, फ़्रांकेल, गिलौमे, हेल्स और अन्य ऐतिहासिक नेता उपस्थित थे और यूरोपीय मजदूर आंदोलन की एक समूची पीढ़ी के लिए संगठन के महत्व की गवाही दे रहे थे ।
डि पाएपे और आगामी बेल्जियन समाजवादी नेता लुई बरट्रांड (1856-1943) द्वारा लिखित समापन वक्तव्य ‘मेनिफ़ेस्टो टु वर्कर्स आर्गेनाइजेशंस ऐंड सोसाइटीज इन आल कंट्रीज’ में कांग्रेस ने ‘जनरल यूनियन आफ़ द सोशलिस्ट पार्टी’ स्थापित करने का आवाहन किया । बहुसंख्यक प्रतिनिधियों ने एक सहमति पत्र पर भी दस्तखत किया:
“चूंकि सामाजिक मुक्ति और राजनीतिक मुक्ति अविभाज्य हैं इसलिए सर्वहारा को संपत्तिशाली वर्गों की समस्त पार्टियों के विरोध में अलग पार्टी में संगठित होना चाहिए और उन सभी राजनीतिक साधनों से खुद को लैस करना चाहिए जो उसकी मुक्ति को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक हों । चूंकि संपत्तिशाली वर्गों के प्रभुत्व के विरोध में चलने वाला संघर्ष का दायरा केवल स्थानीय या राष्ट्रीय होने की बजाए विश्व व्यापी होगा इसलिए इस संघर्ष में सफलता विभिन्न देशों के संगठनों की सामंजस्यपूर्ण और एकताबद्ध कार्यवाही पर निर्भर है । घेन्ट में यूनिवर्सल सोशलिस्ट कांग्रेस के निम्नहस्ताक्षरित प्रतिनिधि फैसला करते हैं कि जिन संगठनों का वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं वे संगठन आपसी औद्योगिक और राजनीतिक प्रयासों में एक दूसरे को भौतिक और नैतिक समर्थन देंगे ।”
1871 के लंदन सम्मेलन के छह साल बाद घेन्ट की इस थीसिस ने सिद्ध किया कि मार्क्स महज समय से कुछ आगे रहे थे । क्योंकि उसी दस्तावेज में पुष्टि की गई:
“हम आंदोलन, प्रचार, जन शिक्षा और एकजुटता के शक्तिशाली साधन के बतौर राजनीतिक कार्यवाही की जरूरत महसूस करते हैं । समाज के वर्तमान संगठन का मुकाबला चारों ओर से एकबारगी और उपलब्ध सभी साधनों से करना होगा ।----समाजवाद को भविष्य के संभावित सामाजिक संगठन के बारे में महज सैद्धांतिक अटकलबाजी नहीं होना चाहिए । इसे वास्तविक और जीवंत, ठोस आकांक्षाओं, तात्कालिक जरूरतों तथा सामाजिक पूंजी और सामाजिक सत्ता को नियंत्रित करने वालों के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग के दैनिक संघर्षों से जुड़ा हुआ होना चाहिए ।”
“पूंजीपति वर्ग से राजनीतिक अधिकार छीन लेना, बिखरे हुए मजदूरों को किसी एसोसिएशन में संगठित करना, प्रतिरोध सोसाइटियों या हड़ताल की कार्यवाही के जरिए काम के घंटों में कमी कराना- यह सब नए समाज के निर्माण में हाथ बंटाना तो है ही, भविष्य की सामाजिक व्यवस्था के सिलसिले में सच्ची खोज में संलग्न होना भी है ।”
“अब तक असंगठित रहे मजदूरों को एकताबद्ध होने दें और संगठन बनाने दें ! जो लोग केवल आर्थिक धरातल पर संगठित हैं उन्हें राजनीतिक धरातल पर उतरने दें, वहां भी वही विरोधी और वही संघर्ष मिलेंगे तथा इनमें से एक धरातल पर हासिल जीत से दूसरे धरातल पर भी विजय की राह खुलेगी !”
“प्रत्येक देश में सभी पूंजीवादी पार्टियों से अलग विशाल पार्टी के रूप में वंचित वर्ग को संगठित होने दें और इस सामाजिक पार्टी को अन्य देशों की वैसी ही सामाजिक पार्टी के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने दें !”
“अपने सभी अधिकारों पर दावा ठोंकने के लिए, समस्त विशेषाधिकारों के उन्मूलन के लिए दुनिया के मजदूरों एक हो !”
बाद के दशकों में मजदूर आंदोलन ने समाजवादी कार्यक्रम अपनाया, समूचे यूरोप में और उसके बाद सारे संसार में फैला और राष्ट्रोपरि समन्वय नए ढांचे बनाए । नामों की निरंतरता के अतिरिक्त (1889 से 1916 तक दूसरा इंटरनेशनल और 1919 से 1943 तक तीसरा इंटरनेशनल) भी इनमें से प्रत्येक ढांचे ने लगातार प्रथम इंटरनेशनल के मूल्यों और सिद्धांतों को याद रखा । इस तरह इसका क्रांतिकारी संदेश असाधारण रूप से उपजाऊ साबित हुआ और समय बीतने के साथ अपने जीवनकाल से भी महत्तर परिणामों को जन्म दिया ।
इंटरनेशनल ने मजदूरों को समझने में मदद की कि श्रम को एक देश में मुक्ति नहीं मिल सकती बल्कि यह वैश्विक लड़ाई है । इसने उनको यह भी अनुभूत कराया कि श्रमिक मुक्ति का यह लक्ष्य उन्हें किसी अन्य ताकत के सहारे प्राप्त करने की जगह संगठन की अपनी क्षमता के बल पर खुद ही हासिल करना है । और कि उन्हें पूंजीवादी उत्पादन पद्धति तथा मजूरी की दासता पर विजय प्राप्त करनी है क्योंकि मौजूदा व्यवस्था के भीतर सुधार के लिए लड़ना जरूरी तो है लेकिन इससे मालिकों के अल्पतंत्र पर उनकी निर्भरता नहीं समाप्त होगी- इस मोर्चे पर मार्क्स का योगदान बुनियादी महत्व का था ।
उस समय की उम्मीद और हमारे समय के अविश्वास के बीच अलंघ्य खाई है । इंटरनेशनल के युग की व्यवस्था विरोधी चेतना और एकजुटता तथा नवउदारवादी प्रतिद्वंद्विता और निजीकरण की बनाई हुई दुनिया के वैचारिक समर्पण और व्यक्तिवाद के बीच जमीन आसमान का अंतर आ गया है । 1864 में लंदन में एकत्र मजदूरों में राजनीतिक भावावेग, आजकल व्याप्त उदासीनता और अर्पण के पूरी तरह विपरीत था ।    

इसके बावजूद चूंकि श्रम की दुनिया उन्नीसवीं सदी जैसी शोषक परिस्थितियों की ओर लौट रही है इसलिए एक बार फिर इंटरनेशनल का प्रोजेक्ट असाधारण तौर पर प्रासंगिक हो गया है । आज की ‘विश्व व्यवस्था’ की बर्बरता, वर्तमान उत्पादन पद्धति जनित पारिस्थितिकीय विनाशलीला, चंद शोषक संपत्तिशालियों और विशाल दरिद्र बहुसंख्या के बीच बढ़ती दूरी, महिला उत्पीड़न, युद्ध की प्रचंड आंधी, नस्लवाद और अंधराष्ट्रवाद ने समसामयिक मजदूर आंदोलन के समक्ष इंटरनेशनल की दो मुख्य खूबियों के आधार पर खुद को संगठित करने की आवश्यकता पैदा कर दी है और वे खूबियां हैं ढांचे की विविधता और लक्ष्य की मूलगामिता । 150 साल पहले स्थापित संगठन के उद्देश्य आज और अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं । बहरहाल वर्तमान की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए नए इंटरनेशनल को दो बातें करनी ही होंगी- इसे बहुलतावादी होना होगा और इसे पूंजीवाद विरोधी होना होगा ।

Thursday, December 29, 2016

मार्क्स के बाद: ‘केंद्रीयतावादी’ और ‘स्वायत्ततावादी’ इंटरनेशनल


अब इंटरनेशनल को दुबारा कभी पहले की तरह का नहीं होना था । 1864 में पैदा हुए इस महान संगठन ने 8 सालों तक हड़तालों और संघर्षों का सफलतापूर्वक समर्थन किया, पूंजीवाद विरोधी कार्यक्रम अपनाया और सारे यूरोपीय देशों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और वही हेग कांग्रेस में आखिरकार बिखर गया । बहरहाल मार्क्स के कदम पीछे खींचने के बावजूद कहानी खत्म नहीं हुई । काफी सिकुड़े हुए आकार में और पुरानी राजनीतिक आकांक्षाओं तथा योजना बनाने और लागू करने की क्षमता से हीन दो समूहों का उदय हुआ । उनमें एक था पिछली कांग्रेस से उपजा ‘केंद्रीयतावादी’ बहुसंख्यक समूह जो जनरल कौंसिल के राजनीतिक नेतृत्व में संगठन का समर्थक था । दूसरा था ‘स्वायत्ततावादी’ या ‘संघीयतावादी’ अल्पसंख्यक समूह जो प्रभागों के लिए निर्णय लेने के मामले में पूर्ण स्वायत्तता का हामी था ।
1872 में इंटरनेशनल की ताकत अभी क्षीण नहीं हुई थी । अतीतकाल से ही असमान विकास इसकी विशेषता रही थी । वही विशेषता फिर से दिखाई पड़ी जब कुछ देशों (मसलन ब्रिटेन) में इसकी गिरावट की भरपाई कुछ अन्य देशों (सबसे अधिक स्पेन और इटली) में इसके विस्तार ने कर दी । हेग के नाटकीय नतीजे ने संगठन को विभाजित कर दिया जिसके चलते खासकर ‘केंद्रवादी’ खेमे के अनेक कार्यकर्ताओं को महसूस हुआ कि मजदूर आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय बंद हो चला । नार्थ अमेरिकन फ़ेडरेशन के साथ यूरोप की बहुत कम ताकतों ने ही न्यूयार्क स्थित नई जनरल कौंसिल का साथ दिया । ये थे- स्विट्ज़रलैंड में रोमान्डे फ़ेडरेशन और कुछ जर्मन भाषी प्रभाग जो दोनों ही बेकर के अथक पहल पर आधारित थे, जर्मन सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी ने बेहिचक लेकिन मुश्किल से दृश्य समर्थन दिया, नए खुले आस्ट्रियाई प्रभाग जिन्होंने अदृश्य जर्मनों के विपरीत अपने सदस्यों के चंदे से कुछ धन एकत्र करके भेजा तथा डेनमार्क और पुर्तगाल के दूरस्थ प्रभाग । बहरहाल स्पेन, इटली और नीदरलैंड्स में बहुत कम ने नए निर्देशों का पालन किया । आयरलैंड में अभी संगठन जड़ नहीं पकड़ सका था । 1873 के आते आते फ़्रांस में इंटरनेशनल का कोई प्रभाग नहीं बचा । ब्रिटेन भी था लेकिन वहां हेग कांग्रेस के बहुत पहले से निजी झगड़े चल रहे थे और उनके कारण नवंबर 1872 में ब्रिटिश फ़ेडरल कौंसिल आपस में झगड़ने वाले दो समूहों में बंट गई जिनमें से प्रत्येक समूह देश में इंटरनेशनल का प्रतिनिधि होने का दावा करता था । 16 प्रभागों के नाम पर काम करने वाले हेल्स को हर्मान युंग (1830-1901) और थामस मोटरहेड (1825-84) जैसे इं टरनेशनल के नेताओं का समर्थन प्राप्त था, उन्होंने न्यूयार्क स्थित जनरल कौंसिल को अस्वीकार कर दिया और ब्रिटिश फ़ेडरेशन की ओर से जनवरी 1873 में नई कांग्रेस आयोजित किया । हेल्स और इकारियस दोनों ने कुछ अद्भुत कलाबाजियां दिखाईं । हालांकि उनकी निष्ठा सुधारवाद में थी और चुनाव लड़ने के पक्ष में वे बोलते थे तथा उनकी सोच इंटरनेशनल को ट्रेड यूनियन समर्थन वाली ऐसी राजनीतिक पार्टी में बदलने की थी जो पूंजीपतियों के उदारवादी खेमे के साथ मोर्चा बनाए लेकिन वे आधिकारिक रूप से गिलौमे और बाकुनिन के अनुयायी अनुपस्थितिवादियों के साथ खड़ा हुए । इन घटनाओं के उत्तर में एंगेल्स ने दो सर्कुलर जारी किए जिनमें हेग में लिए गए फैसलों को मान्यता दी गई थी । इन पर मानचेस्टर तथा ‘आधिकारिक’ ब्रिटिश फ़ेडरल कौंसिल के महत्वपूर्ण नेताओं के और जनरल कौंसिल के मशहूर पूर्व सदस्य द्यूपों तथा फ़्रेडरिक लेसनर (1825-1910) के दस्तखत थे । कौंसिल की कांग्रेस जून में संपन्न हुई लेकिन उसमें भाग लेने वालों को इस कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा कि जनरल कौंसिल के न्यूयार्क चले जाने के बाद (जिसे हर कोई संगठन के अंत के बतौर समझ रहा था) ब्रिटिश ट्रेड यूनियनों को अब कोई रुचि नहीं रह गई थी । इस तरह दोनों ही खेमों के साथ समान घटना हुई और वह यह कि उनका तेजी से पतन हुआ ।
‘केंद्रवादियों’ की कांग्रेस उसी जेनेवा नगर में हुई जिसमें इंटरनेशनल की पहली कांग्रेस संपन्न हुई थी । बेकर की कोशिशों के चलते इसमें 30 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिनमें (पहली बार) दो महिलाएं भी शामिल हुईं । लेकिन इनमें से 15 तो जेनेवा से ही थे । अन्य देशों के प्रभागों के प्रतिनिधि जर्मनी, बेल्जियम और आस्ट्रिया-हंगरी से एक एक प्रतिनिधि ही थे । यूरोप में गोलबंदी में घटोत्तरी देखकर जनरल कौंसिल ने न्यूयार्क से प्रतिनिधि न भेजने का फैसला किया और ब्रिटिश फ़ेडरेशन द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि सेराइलेर जेनेवा तक यात्रा न कर सके । असल में तो केंद्रवादी इंटरनेशनल का यही अंत था ।
अटलांटिक के उस पार सोर्ज मशाल जलाए रखने के लिए कड़ी कोशिश कर रहे थे लेकिन वहां नार्थ अमेरिकन फ़ेडरेशन खत्म होने की कगार पर थी । सदस्यता के घटकर 1000 से कम रह जाने के चलते आर्थिक स्थिति खराब थी (उनमें से कुछ ही बकाया चुकाते थे) । इसके चलते चिट्ठियों के लिए टिकट खरीदना भी मुश्किल होता जा रहा था । अब यह केवल अमेरिका से जुड़े मसलों तक सीमित रह गई थी । अमेरिकी मजदूर या तो इसके प्रति उदासीन रहते या शत्रुभाव रखते । नवंबर 1873 में इसने जो मेनिफ़ेस्टो टु द वर्किंग पीपुल आफ़ नार्थ अमेरिका जारी किया था उसके प्रति भी यही रुख रहा । सोर्ज ने महासचिव के पद से इस्तीफ़ा दे दिया और उसके बाद से ढाई सालों का इसका इतिहास एक तरह से पूर्वघोषित मृत्यु की ही दास्तान है । आखिरकार 15 जुलाई 1876 को अंत आ ही गया जब 365 सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले दस प्रतिनिधियों की बैठक हुई और इसके तुरंत बाद वे सेंटेनियल एक्जिबिशन नामक पहले अमेरिकी वर्ल्ड फ़ेयर के साथ आयोजित वर्किंगमेन’स पार्टी आफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स की स्थापना कांग्रेस में भाग लेने चल दिए ।
हालांकि ‘केंद्रीयतावादी’ संगठन एकाध देशों में महज कुछ दिनों तक चला और सिद्धांत के क्षेत्र में वे आगे कोई योगदान न कर सके लेकिन दूसरी ओर स्वायत्ततावादी आगामी कुछ वर्षों तक वास्तविक और सक्रिय अस्तित्व बनाए रखने में कामयाब रहे । स्विस, इतालवी, स्पेनी और फ़्रांसिसी लोगों की भागीदारी वाली सेंट-आइमर कांग्रेस में यह माना गया कि ‘किसी को यह अधिकार नहीं कि वह स्वायत्त फ़ेडरेशनों और प्रभागों को जिसे वे सर्वोत्तम समझें, उस राजनीतिक दिशा और आचरण को खुद के लिए निर्धारित करने और लागू करने के निर्विवाद अधिकार से उन्हें वंचित करे’ । इंटरनेशनल के भीतर संघीय स्वायतता का यही विकल्प ‘दोस्ती, एकजुटता और आपसी रक्षा का गठबंधन’ मुहैया कराता है । ये विचार गिलौमे के थे । बाकुनिन ने इसे थोड़ा और सैद्धांतिक जामा पहनाया होता लेकिन उसके विपरीत इस युवा किंतु समझदार स्विस कार्यकर्ता की नजर जूरा, स्पेन और इटली के परे समर्थन बढ़ाने और लंदन की लाइन के विरोधी सभी फ़ेडरेशनों को अपने पक्ष में कर लेने पर टिकी थी । उसकी कार्यनीति काम आई । नए इंटरनेशनल के जन्म की तैयारी बड़ी बड़ी घोषणाओं के जरिए बात थोपे बिना सावधानी से करनी थी ।
अगले कुछ महीनों में जुड़ने के प्रस्ताव आने शुरू हुए । स्वायत्ततावादियों का गढ़ स्पेन बना रहा जहां प्राक्सेडेस मातेओ सगास्ता (1825-1903) द्वारा संचालित दमन संगठन को फलने फूलने से नहीं रोक सका । दिसंबर 1872 और जनवरी 1873 के बीच संपन्न इसकी कोर्डोबा संघीय कांग्रेस तक इसमें 50 फ़ेडरेशन शामिल हो चुके थे जिनके 300 से अधिक प्रभाग और 25000 से अधिक कुल सदस्य थे (बार्सिलोना में 7500) । 1872 के उत्तरार्ध के बाद नए देशों में भी स्वायत्ततावादियों का समर्थन बढ़ा । दिसंबर में बेल्जियन फ़ेडरेशन की ब्रसेल्स कांग्रेस ने हेग कांग्रेस के प्रस्तावों को शून्य घोषित कर दिया, न्यूयार्क स्थित जनरल कौंसिल को मान्यता नहीं दी और सेंट-आइमर समझौते पर दस्तखत कर दिए । जनवरी 1873 में हेल्स और इकारियस के नेतृत्व में ब्रिटेन के विद्रोहियों ने भी यही राह पकड़ी और अगले महीने डच फ़ेडरेशन भी उनके साथ मिल गई ।
स्वायत्ततावादियों के संपर्क फ़्रांस, आस्ट्रिया और संयुक्त राज्य में भी थे और वे नए इंटरनेशनल में बहुमत में आ गए फिर भी असलियत में यह मोर्चा नानाविध सिद्धांतों का जखीरा बना रहा । इसमें शामिल थे- गिलौमे और श्वाइट्ज़गेबेल (बाकुनिन सार्वजनिक जीवन से 1873 में अलग हो गए और 1876 में उनका देहांत हो गया) के नेतृत्व में स्विस अराजक-सामूहिकतावादी, डि पाएपे के नेतृत्व में बेल्जियन फ़ेडरेशन जिसके लिए जनता का राज्य (फ़ोक्सस्टाट) को सभी सार्वजनिक सेवाओं के प्रबंधन सहित अधिक शक्ति और क्षमता मुख्य बात थी, अतिक्रांतिकारी इतालवी जिन्होंने निश्चित असफलता वाली आम विद्रोह की दृष्टि अपनाई (‘कर्म का प्रचार’) और चुनावों में भागीदारी तथा प्रगतिशील पूंजीवादी ताकतों के साथ एकता के हामी ब्रिटिश यूनियन नेता । 1874 में जनरल एसोसिएशन आफ़ जर्मन वर्कर्स के लासालपंथियों से भी संपर्क स्थापित किया गया ।
ऊपर वर्णित परिदृश्य बताता है कि हेग कांग्रेस में विभाजन के लिए जिम्मेदार प्रधान मतभेद न तो राज्य के साथ समझौता करने के लिए तैयार समूह और क्रांति के लिए अधिक इच्छुक सैद्धांतिक पक्ष के बीच था न ही राजनीतिक कार्यवाही के समर्थकों और इसके विरोधियों के बीच था । इसकी बजाए जनरल कौंसिल के प्रति मूलगामी और व्यापक विरोध का मुख्य कारण 1871 के लंदन सम्मेलन में हड़बड़ी में लिए गए फैसले थे । जूरा और स्पेनी फ़ेडरेशनों तथा नवगठित इतालवी फ़ेडरेशन ने मजदूर वर्गीय राजनीतिक पार्टी बनाने के मार्क्स के आवाहन का कभी समर्थन नहीं किया होता । सबसे बड़ी बात कि उन देशों की समाजार्थिक स्थितियों में यह अकल्पनीय था । बहरहाल थोड़ा लचीला रुख अपनाने से बेल्जियन लोगों का समर्थन बरकरार रहता जो इंटरनेशनल और डच फ़ेडरेशन जैसे नवगठित फ़ेडरेशनों के बीच अनेक वर्षों तक संतुलन बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभा रहे थे । आंतरिक टकराव थोड़ा कम तीखे होते तो ब्रिटेन में विभाजन को रोका जा सकता था जिसका संबंध नीतियों पर असहमति के मुकाबले व्यक्तित्वों की टकराहट से अधिक था । आखिरी बात,  जैसा कुछ स्वायत्ततावादियों ने भांप लिया था कि जनरल कौंसिल को न्यूयार्क स्थानांतरित करने के फैसले ने 1872 के बाद उन्हें अधिक राजनीतिक अवसर दिया और उनकी दावेदारी बढ़ाने में मदद की । बहरहाल मार्क्स की नजर में ‘प्रथम’ इंटरनेशनल ने अपना ऐतिहासिक कार्यभार पूरा कर लिया था इसलिए उसके समाहार का समय आ गया था ।
स्वायत्ततावादियों की ‘पहली’ या उनके कथनानुसार ‘छठवीं’ (इंटरनेशनल की पांच की निरंतरता में) कांग्रेस जेनेवा में 1873 में 1 से 6 सितंबर तक हुई । इसमें बेल्जियम, स्पेन, फ़्रांस, इटली, ब्रिटेन, नीदरलैंड और स्विट्ज़रलैंड से 32 प्रतिनिधियों ने भाग लिया । यह कांग्रेस केंद्रवादियों की कांग्रेस से एक सप्ताह पहले हुई और इसने घोषित किया कि ‘इंटरनेशनल में ने युग की शुरुआत’ हुई है । सर्वसम्मति से इसनें जनरल कौंसिल को भंग करने का फैसला किया और इंटरनेशनल के इतिहास में पहली बार किसी कांग्रेस में अराजक समाज के सवाल पर बहस हुई । सामाजिक क्रांति की प्राप्ति के हथियार के बतौर आम हड़ताल के विचार को समाहित करके इंटरनेशनल के वैचारिक-राजनीतिक शस्त्रागार को समृद्ध किया गया । इस प्रकार अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद के नाम से मशहूर होने वाली प्रवृत्ति की आधारशिला रख दी गई ।
अगली कांग्रेस ब्रसेल्स में 1874 में 7 से 13 सितंबर तक हुई । इसमें सोलह प्रतिनिधि थे- ब्रिटेन से एक (इकारियस), स्पेन से एक और शेष सभी बेल्जियम से थे । इन चौदह में से दो को फ़्रांसिसी (पेरिस) या इतालवी (पालेर्मो) प्रभाग का जनादेश प्राप्त था तथा अन्य दो बेल्जियम में रह रहे लासालपंथी जर्मन प्रवासी थे । गिलौमे ने बताया कि इनमें से एक कार्ल फ़्राह्मे दरअसल जनरल एसोसिएशन आफ़ जर्मन वर्कर्स के प्रतिनिधि थे । समाजवाद के नक्शे पर अराजकतावादी और लासालपंथी विपरीत ध्रुव पर अवस्थित थे इस तथ्य के बावजूद गिलौमे ने उनकी उपस्थिति को प्रोत्साहित किया और इसके लिए 1873 की जेनेवा कांग्रेस द्वारा अनुमोदित नए नियमों का हवाला दिया जिनके तहत प्रत्येक देश के मजदूरों को यह आजादी थी कि अपनी मुक्ति हासिल करने का सर्वोत्तम साधन का वे निर्णय करें । कुल मिलाकर यह इंटरनेशनल अधिकांशत: ऐसी जगह बन गई जहां अत्यंत कमतर (अल्पतम प्रतिनिधित्व वाले) नेता मिलते थे और मजदूरों की भौतिक स्थितियों और उन्हें बदलने के लिए आवश्यक कार्यवाहियों के बारे में अमूर्त बहसें चलाते थे । 1874 में बहस अराजकतावाद और जनता का राज्य (फ़ोक्सस्टाट) के बीच थी और इंटरनेशनल की किसी कांग्रेस में 3 साल बाद भाग लेने वाला डि पाएपे इसमें प्रधान नेता था । अपने एक भाषण में उसने कहा कि ‘स्पेन में, इटली के कुछ हिस्सों में और जूरा में हम अराजकता के समर्थन में हैं (लेकिन) जर्मनी में, निदरलैंड्स में, ब्रिटेन में और अमेरिका में मजदूर राज्य चाहते हैं (बेल्जियम में दोनों के बीच झूल रहे हैं)’ । एक बार फिर कोई सामूहिक फैसला नहीं हो सका और कांग्रेस सर्वसम्मति से सहमत हुई कि ‘प्रत्येक देश में किसी भी फ़ेडरेशन और समाजवादी लोकतांत्रिक पार्टी को यह तय करना है कि कौन सी राजनीतिक दिशा का वह अनुसरण करना चाहती है’ ।
आठवीं कांग्रेस 1876 में 26 से 30 अक्टूबर के बीच बेर्नी में हुई और उसने भी इसी लाइन का अनुसरण किया । इसमें 28 प्रतिनिधि थे जिनमें 19 स्विस (जूरा फ़ेडरेशन से 17), 4 इतालवी, स्पेन और फ़्रांस से दो दो तथा बेल्जियम और नीदरलैंड्स से अकेले डि पाएपे । कार्यवाही से डि पाएपे और गिलौमे के रुख में आपसी विरोधिता का पता चलता है लेकिन अंत में बेल्जियन फ़ेडरेशन के एक प्रस्ताव पर उनमें सहमति बन गई । प्रस्ताव था कि अगले साल विश्व समाजवादी कांग्रेस आयोजित की जाए जिसका आमंत्रण ‘यूरोप की समाजवादी पार्टियों के समस्त गुटों’ को भेजा जाए ।

बहरहाल इस आयोजन से पहले ही इंटरनेशनल की अंतिम कांग्रेस 1877 में 6 से 8 सितंबर के बीच वेरविएर्स में संपन्न हुई । इसमें 22 प्रतिनिधि जमा हुए- 13 बेल्जियम से, स्पेन, इटली, फ़्रांस और जर्मनी से दो दो तथा जूरा फ़ेडरेशन के प्रतिनिधि गिलौमे । इनके अतिरिक्त समाजवादी समूहों से तीन पर्यवेक्षक भी थे जिनका काम केवल सलाह देना था । इन्हीं में से एक पीटर क्रोपाटकिन (1842-1921) भी थे जो बाद में अराजकतावादी कम्यूनिज्म के संथापक बने । कांग्रेस में सक्रिय भागीदारी अराजकतावादियों की ही दिखाई पड़ी । इनमें अंद्रीया कोस्ता (1851-1910) जैसे भी कुछ लोग थे जो जल्दी ही समाजवाद की ओर आ गए । इस प्रकार स्वायत्ततावादी इंटरनेशन ने भी अपना इतिहास खत्म किया । इसका जनाधार केवल स्पेन में था । उनके परिप्रेक्ष्य के मुकाबले समूचे यूरोप के मजदूर आंदोलन की यह अनुभूति भारी पड़ी कि संगठित पार्टियों के जरिए राजनीतिक संघर्ष में भग लेना अत्यंत महत्वपूर्ण है । स्वायत्ततावादी प्रयोग के खात्मे के बाद अराजकतावादियों और समाजवादियों में भी अलगाव निश्चित था ।

Tuesday, December 27, 2016

मार्क्स बनाम बाकुनिन


हेग कांग्रेस के बाद भी कुछ महीनों तक दोनों खेमों के बीच लड़ाई चलती रही लेकिन शायद ही कुछ मामलों में दोनों के मौजूदा सैद्धांतिक और वैचारिक अंतर इसके केंद्र में रहे हों । मार्क्स अकसर बाकुनिन के विचारों का मजाक उड़ाते थे, उन्हें ‘वर्ग समानता’ (एलायंस फ़ार सोशलिस्ट डेमोक्रेसी के 1869 कार्यक्रम के सिद्धांतों के आधार पर) या राजनीतिक अनुपस्थितिवाद के वकील के रूप में पेश करते थे । अपनी ओर से यह रूसी अराजकतावादी व्यक्तिगत आरोपों और प्रवादों के स्तर पर मुकाबला करना पसंद करता था क्योंकि प्रतिद्वंद्वी की सैद्धांतिक क्षमता का उसमें अभाव था । उसके सकारात्मक विचारों का एकमात्र सबूत ला लिबर्ते (ब्रसेल्स का अखबार) के लिए लिखा एक अधूरा खत है जिसे भेजा नहीं गया, विस्मृत रहा और लगातार चलने वाले झगड़ों में बाकुनिन के समर्थकों के किसी काम का नहीं निकला । इससे ‘स्वायत्ततावादियों’ के राजनीतिक विचारों का साफ खुलासा होता है:
“इंटरनेशनल के फ़ेडरेशनों और प्रभागों—के सदस्यों को आपस में जोड़ने वाला नियम एक ही है ।-----और वह है श्रम के शोषकों के विरुद्ध आर्थिक संघर्षों में सभी पेशों और सभी देशों के मजदूरों की अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता । मजदूर वर्ग की स्वत:स्फूर्त कार्यवाही के जरिए उसी एकजुटता का संगठन और पूरी तरह से स्वतंत्र फ़ेडरेशन---ही इंटरनेशनल की वास्तविक और जीवंत एकता का प्राण है । कौन शक कर सकता है कि पूंजीवादी शोषण के विरुद्ध सर्वहारा की इसी जुझारू एकजुटता के अधिकाधिक व्यापक होते संगठन से ही पूंजीपतियों के विरुद्ध सर्वहारा का राजनीतिक संघर्ष पैदा होना चाहिए ? इस सवाल पर मार्क्सवादी और हम एकमत हैं । लेकिन इसके बाद वह सवाल आता है जो हमें गहराई से मार्क्सवादियों से अलगा देता है । हमारा सोचना है कि सर्वहारा की नीति अनिवार्य तौर पर क्रांतिकारी होनी चाहिए जिसका एकमात्र और सीधा उद्देश्य राज्य का विनाश होगा । हम समझ नहीं पाते कि अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता की बात करते हुए राज्य को संरक्षित रखना कैसे संभव है ।----क्योंकि अपनी प्रकृति से ही राज्य उस एकजुटता के साथ घात है और इसीलिए स्थायी युद्ध का कारण है । हम यह भी नहीं समझ पाते कि राज्य के भीतर और उसके जरिए सर्वहारा की मुक्ति या जनसमुदाय की सच्ची आजादी की बात करना कैसे संभव है । राज्य का मतलब ही है अधिकारसंपन्न होना और समस्त अधिकारसंपन्नता के लिए जनसमुदाय की अधीनता और फलत: किसी न किसी शासक अल्पसंख्या के हित में उनका शोषण आवश्यक है । संक्रमण की प्रक्रिया में भी हम संविधान सभा, अस्थायी सरकार या तथाकथित क्रांतिकारी तानाशाही को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि हमारा यकीन है कि जनगण के हाथों में ही क्रांति सच्ची, वास्तविक और ईमानदाराना हो सकती है तथा जब भी यह मुट्ठी भर शासक व्यक्तियों में केंद्रित होगी यह अनिवार्य रूप से और तत्काल प्रतिक्रिया हो जाती है ।”
इस तरह साफ है कि किसी भी तरह के राजनीतिक प्राधिकार, खासकर उसके प्रत्यक्ष रूप राज्य का कट्टर विरोध करने के मामले में बाकुनिन के विचार बहुत कुछ प्रूधों से मिलते जुलते हैं लेकिन उन्हें साझेदारीवादियों के साथ खड़ा कर देना गलत होगा । जहां साझेदारीवादी समस्त राजनीतिक गतिविधि से वस्तुत: अलग रहते थे और इंटरनेशनल के शुरुआती सालों में उनका भारी असर था वहीं स्वायत्ततावादी ‘सामाजिक क्रांति की खास राजनीति के पक्ष में, पूंजीवादी राजनीति और राज्य के नाश के पक्ष में’ लड़ते हैं- जैसा कि गिलौमे ने हेग कांग्रेस के अपने आखिरी हस्तक्षेप में कहा था । इसे माना जाना चाहिए कि वे इंटरनेशनल के क्रांतिकारी घटक थे और कि राजनीतिक सत्ता, राज्य और नौकरशाही के सवालों पर उनके विचार मजेदार आलोचनात्मक योगदान प्रतीत होते हैं ।
फिर स्वायत्ततावादियों की ‘नकारात्मक राजनीति’ जिसे वे कार्यवाही का एकमात्र संभव रूप समझते थे वह कैसे केंद्रवादियों की ‘सकारात्मक राजनीति’ से अलग थी? इटालियन फ़ेडरेशन के प्रस्ताव पर 15-16 सितंबर 1872 को संपन्न सेंट-इमिएर की इंटरनेशन कांग्रेस, जिसमें हेग से लौटते हुए अन्य प्रतिनिधियों ने भाग लिया था, के प्रस्तावों में कहा गया कि ‘सभी राजनीतिक संगठन प्रभुत्व के संगठन ही हो सकते हैं । वे किसी एक वर्ग को लाभ पहुंचाते हैं और जनगण के लिए नुकसानदेह होते हैं । अगर सर्वहारा सारी राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करना चाहता है तो वह खुद प्रभुत्वशाली और शोषक वर्ग हो जाएगा’ । इसी कारण ‘सर्वहारा का पहला काम समस्त सत्ता का नाश है’ और ‘इस नाश के लिए किसी भी तथाकथित अस्थायी और क्रांतिकारी राजनीतिक सत्ता का गठन केवल और बड़ा धोखा साबित होगा तथा सर्वहारा के लिए उतना ही खतरनाक होगा जितना मौजूदा कोई भी सरकार है’ । बाकुनिन ने एक और अधूरे लेख ‘द इंटरनेशनल ऐंड कार्ल मार्क्स’ में जैसा जोर देकर कहा है कि इंटरनेशनल का कार्यभार ‘राज्य और पूंजीवादी दुनिया से बाहर की राजनीति’ में सर्वहारा का नेतृत्व करना था इसलिए उसके कार्यक्रम का सच्चा आधार ‘सहज सरल- पूंजीवाद के विरुद्ध मजदूर के आर्थिक संघर्ष में एकजुटता का निर्माण’ होना चाहिए । असल में तो अगर तमाम बदलावों पर ध्यान दिया जाए तो सिद्धांतों की यह घोषणा इंटरनेशनल के मूल लक्ष्य के अधिक करीब थी और जिस दिशा का संकेत कर रही थी वह लंदन सम्मेलन के बाद मार्क्स और जनरल कौंसिल द्वारा अपनाई गई दिशा से बहुत अलग थी ।
सिद्धांतों और लक्ष्यों के इस गंभीर विरोध ने हेग का माहौल तैयार किया था । जहां बहुसंख्या राजनीतिक सत्ता पर जीत को ‘सकारात्मक’ समझ रही थी वहीं स्वायत्ततावादी राजनीतिक पार्टी को ऐसे उपकरण के बतौर पेश कर रहे थे जो अनिवार्य रूप से पूंजीवादी संस्थाओं के मातहत रहती है और कम्यूनिज्म की मार्क्स की धारणा को भोंड़े तरीके से लासालीय फ़ोक्सस्टाट के समरूप बता रहे थे जबकि मार्क्स उसका अनथक विरोध करते थे । बहरहाल कुछ ही समय बाद जब शत्रुता के उपरांत विवेक पैदा हुआ तो बाकुनिन और गिलौमे ने माना कि दोनों पक्षों की चाहत एक ही है । मार्क्स ने एंगेल्स के साथ लिखी इंटरनेशनल में कल्पित फूटें में दर्ज किया कि समाजवादी समाज की एक पूर्वशर्त राजसत्ता का उन्मूलन है:
“सारे समाजवादी अराजकतावाद को इस कार्यक्रम के रूप में देखते हैं- सर्वहारा आंदोलन का लक्ष्य यानी वर्ग उन्मूलन जब हासिल हो जाता है तो राजसत्ता लुप्त हो जाती है जो उत्पादकों की बहुसंख्या को मुट्ठी भर शोषक अल्पसंख्या के अधीन रखने का काम करती है और फिर सरकार के काम महज प्रशासनिक काम बनकर रह जाते हैं ।”
दोनों के बीच अंतर असमाधेय इसलिए हो जा रहा था क्योंकि स्वायत्ततावादी जोर दे रहे थे कि इस लक्ष्य को तुरंत साकार किया जाए । मार्क्स की नजर में चूंकि स्वायत्ततावादी इंटरनेशनल को राजनीतिक संघर्ष का औजार मानने की जगह भविष्य के ऐसे आदर्श समाज का माडल मानते थे जहां किसी तरह का प्राधिकार नहीं होगा इसलिए बाकुनिन और उनके समर्थक
“सर्वहारा की कतारों में अराजकता को ऐसा अमोघ अस्त्र समझते थे जो शोषकों के हाथों में सामाजिक और राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण को खत्म करता है । इसी बहाने की आड़ में (वे) इंटरनेशनल से संगठन की जगह पर अराजकता को स्थापित करने के लिए कहते हैं जब पुरानी दुनिया उसे कुचल डालने का रास्ता खोज रही है ।”
इस प्रकार हालांकि उनके बीच समाजवादी समाज में वर्गों और राज्य की राजनीतिक सत्ता को उखाड़ फेंकने की जरूरत के बारे में सहमति थी फिर भी दोनों पक्ष इस बदलाव को ले आने के लिए आवश्यक रास्ते और सामाजिक ताकतों के बुनियादी मुद्दों पर विपरीत बातें कह रहे थे । जहां मार्क्स के लिए सर्वोत्कृष्ट क्रांतिकारी कर्ता खास वर्ग, औद्योगिक सर्वहारा था वहीं बाकुनिन इसकी आशा ‘जनता की विशाल भीड़’, तथाकथित ‘लंपट सर्वहारा’ से करते थे जो ‘पूंजीवादी सभ्यता से लगभग अदूषित होने के कारण अपने आंतरिक जीवन और अपनी आकांक्षाओं में, सामूहिक जीवन की तमाम आवश्यकताओं और तकलीफों में भविष्य के समाजवाद के सभी बीज लिए रहता है’ । कम्यूनिस्ट मार्क्स ने सीखा था कि सामाजिक रूपांतरण के लिए खास ऐतिहासिक परिस्थितियों, प्रभावशाली संगठन और जनता में वर्ग चेतना के निर्माण की दीर्घकालीन प्रक्रिया की जरूरत होती है वहीं अराजकतावादी बाकुनिन को यकीन था कि आम जन, तथाकथित ‘भीड़’ की अंतश्चेतना ‘अजेय और न्यायोचित’ तो होती ही है, ‘सामाजिक क्रांति के आरम्भ और उसकी विजय’ के लिए भी अपने आपमें पर्याप्त होती है ।
दूसरी असहमति का संबंध समाजवाद की प्राप्ति के उपकरणों से था । बाकुनिन की ज्यादातर लड़ाकू गतिविधियों में अधिकतर बुद्धिजीवियों की छोटी ‘गुप्त सोसाइटियों’ का निर्माण (या निर्माण की कल्पना) शामिल था जिन्हें वे ‘समर्पित, ऊर्जावान, प्रतिभाशाली व्यक्तियों, सबसे आगे बढ़कर जनता के सच्चे दोस्तों को लेकर निर्मित क्रांतिकारी सेना’ कहते थे जो आम विद्रोह की तैयारी करेंगे और क्रांति को सचालित करेंगे । इसके उलटा मार्क्स मजदूर वर्ग द्वारा खुद की मुक्ति में यकीन करते थे और मानते थे कि ‘सर्वहारा आंदोलन के विकास से’ गुप्त सोसाइटियों का टकराव होगा ‘क्योंकि मजदूरों को शिक्षित करने की बजाए ये सोसाइटियां उन्हें ऐसे मनमाने, रहस्यमय नियमों के अधीन ले आती हैं जो नियम उनकी स्वतंत्रता को नियंत्रित करते हैं और उनकी विवेक-शक्ति को विकृत करते हैं’ । रूस से निर्वासित बाकुनिन मजदूर वर्ग की सीधे क्रांति को प्रोत्साहित न करने वाली सभी राजनीतिक कार्यवाहियों का विरोध करता था जबकि लंदन में स्थायी आवास वाले राज्यविहीन मार्क्स सामाजिक सुधारों और आंशिक लक्ष्यों के लिए गोलबंदी से परहेज नहीं करते थे लेकिन इस बात को पूरी तरह मानते थे कि इनसे पूंजीवादी उत्पादन पद्धति को खत्म करने का मजदूर वर्ग का संघर्ष मजबूत होना चाहिए न कि उसे व्यवस्था में समाहित हो जाना चाहिए ।
इन अंतरों को क्रांति के बाद भी समाप्त नहीं होना था । बाकुनिन की नजर में ‘राज्य का खात्मा सर्वहारा की आर्थिक मुक्ति की पूर्वशर्त या अनिवार्य सहचर’ था । मार्क्स की नजर में राज्य न तो एक दिन में गायब हो सकता था न उसे गायब होना चाहिए । दिसंबर 1873 में अलमानाको रिपब्लिकानो में पहली बार प्रकाशित अपने लेख ‘पोलिटिकल इनडिफ़रेंटिज्म’ में उन्होंने इटली के मजदूर आंदोलन में अराजकतावादियों के वर्चस्व को यह कहते हुए चुनौती दी कि
“अगर मजदूर वर्ग का राजनीतिक संघर्ष हिंसक रूप ग्रहण कर लेता है और अगर मजदूर पूंजीपति वर्ग की तानाशाही की जगह पर अपनी क्रांतिकारी तानाशाही स्थापित करते हैं तो (बाकुनिन के मुताबिक) यह सिद्धांत से गद्दारी का भयंकर कृत्य होगा क्योंकि अपनी रोजमर्रा की कष्टकर सांसारिक जरूरतों को पूरा करने और पूंजीपति वर्ग के प्रतिरोध को कुचल देने के लिए उन्हें अपने हथियार रख देने और राज्य को उखाड़ फेंकने की बजाए राज्य को क्रांतिकारी और संक्रमणकालीन रूप प्रदान करना चाहिए ।”
बहरहाल इस बात को मानना होगा कि हालांकि बाकुनिन कभी कभी पूंजीवादी और सर्वहारा सत्ता के बीच फ़र्क करने से उत्तेजक इनकार करते हैं लेकिन इसके बावजूद उन्होंने पूंजीवाद और समाजवाद के बीच के तथाकथित ‘संक्रमण काल’ के खतरों- खासकर क्रांति के बाद नौकरशाहाना पतन के खतरों को पहले ही देख लिया था । 1870 और 1871 में बाकुनिन ने ‘क्नाउटो-जर्मेनिक एम्पायर ऐंड द सोशल रेवोल्यूशन’ लिखा लेकिन वह अधूरी रही । उसमें लिखा:
“हमें बताया जाता है कि मार्क्स के जनता के राज्य में कोई विशेषाधिकार-संपन्न वर्ग नहीं होगा । सब समान होंगे, न केवल कानूनी और राजनीतिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी ।---इसलिए कोई विशेषाधिकार-संपन्न वर्ग नहीं होगा लेकिन सरकार होगी और ध्यान दीजिए कि यह अत्यंत जटिल सरकार होगी जो आजकल की सभी सरकारों के काम की तरह केवल जनता पर राजनीतिक शासन और प्रशासन से ही संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि वह उनका आर्थिक शासन भी करेगी । इसके तहत वह उत्पादन और संपत्ति का न्यायपूर्ण वितरण, जमीन की खेती, कारखानों की स्थापना और उनका विकास, वाणिज्य का संगठन और दिशा निर्देश और आखिरकार राज्य नामक एकमात्र बैंक के जरिए उत्पादन के लिए पूंजी निवेश का काम अपने हाथों में केंद्रित कर लेगी ।---यह वैज्ञानिक बौद्धिकता का सर्वाधिक कुलीन, तानाशाहीपूर्ण, उद्दंडता से भरा हुआ और सभी सत्ताओं के प्रति अवमानना से भरा हुआ शासन तंत्र होगा । उसमें एक नया वर्ग होगा, वास्तविक और नकलची वैज्ञानिकों और विद्वानों का एक नया पदानुक्रम होगा तथा दुनिया ज्ञान के नाम पर शासन करने वाली अल्पसंख्या और विशाल अज्ञानी बहुसंख्या के बीच विभाजित होगी ।---प्रत्येक राज्य चाहे वह सर्वाधिक गणतंत्रात्मक और सर्वाधिक लोकतांत्रिक राज्य ही क्यों न हो,---सारत: ऊपर से जनता को शासित करने वाली मशीनें ही होते हैं । यह शासन ऐसी प्रतिभाशाली और फलत: विशेषाधिकार संपन्न अल्पसंख्या के जरिए चलाया जाता है जो जनता के वास्तविक हितों को जनता से भी अधिक अच्छी तरह से जानने का दावा करते हैं ।”

अंशत: अर्थशास्त्र के अपने अल्पज्ञान के कारण बाकुनिन द्वारा संकेतित संघीयतावादी रास्ता सचमुच का कोई उपयोगी निर्देश नहीं दे पाता कि भविष्य के समाजवादी समाज के सवाल को कैसे समझा जाए । लेकिन उसकी आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि आगामी बीसवीं सदी के कुछ नाटकों के संकेत दे जाती है ।