Friday, March 4, 2016

विचारधारा

              
अंग्रेजी शब्द Ideology का हिंदी अनुवाद विचारधारा है । फ़्रांसिसी दार्शनिक देस्तु द त्रासी ने सबसे पहले इसके फ़्रांसिसी प्रतिशब्द Ideologic का 1797 में इस्तेमाल किया था । इसे उन्होंने विचारों के विज्ञान के अर्थ में प्रस्तावित किया था । ज्ञानशास्त्र और भाषा सिद्धांत में इसका यही अर्थ उन्नीसवीं सदी से पहले तक समझा जाता रहा । पश्चिमी दुनिया में इसके अर्थों में समय समय पर बदलाव आते रहे हैं । रेमंड विलियम्स ने ‘की वर्ड्स’ में बताया है कि नेपोलियन बोनापार्त ने इसका नकारात्मक प्रयोग लोकतंत्र के समर्थकों के लिए किया था क्योंकि उसके मुताबिक ये ‘जनता को ऐसी सत्ता प्रदान करते हैं जिसका प्रयोग करने में वह अक्षम होती है’ और इसी प्रसंग में ज्ञानोदय के सिद्धांतों को ‘आइडियोलाजी’ कहा था । उसके बाद से ही इसका प्रयोग नकारात्मक अर्थ में समूची उन्नीसवीं सदी में होता रहा ।
आज भी समाजवादी या लोकतांत्रिक नीतियों के जरिए समाज में सचेत बदलाव की कोशिशों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है । क्रांतिकारी प्रयासों को भी विचारधारा से प्रतिबद्ध कहने का चलन रूढ़िवादी हलकों में इसी अर्थ के कारण है । अर्थ की इस नकारात्मकता का विस्तार हुआ तो अमूर्त, अव्यावहारिक या उन्मादी सिद्धांत के संकेत भी इससे निकलने लगे । मार्क्स-एंगेल्स ने ‘जर्मन विचारधारा’ में अपने समकालीन विद्रोही विचारकों की आलोचना के लिए ‘विचारधारा’ के इसी ‘अमूर्त’ अर्थ को ग्रहण किया है । उनके अनुसार किसी भी युग के प्रभुत्वशाली विचार उस युग के प्रभावी भौतिक संबंधों की वैचारिक अभिव्यक्ति होते हैं । यथार्थ की जगह इन प्रभावी भौतिक संबंधों को विचार के रूप में पेश किया जाता है इसलिए इसमें वास्तविक यथार्थ उलटा दिखाई पड़ता है । उनका कहना था कि यह परिघटना ऐतिहासिक जीवन प्रक्रियाओं से उसी तरह पैदा होती है जिस तरह हमारे शरीर की बनावट के कारण आंख की रेटिना पर वस्तुओं का उलटा प्रतिबिंब बनता है । इस तरह विचारधारा अमूर्त और झूठी चेतना होती है । शासक वर्ग के ‘विचारक’ इसके वाहक होते हैं क्योंकि वे विचारधारा की सचाई का भ्रम खड़ा करते हैं । एंगेल्स का यकीन था कि कानून और राजनीति जैसी प्रत्यक्ष विचारधाराएं भी ठोस भौतिक हितों से दूर होती हैं तथा दर्शन और धर्म जैसी उच्च विचारधाराएं तो और भी दूर होती हैं लेकिन उनका वास्तविक सामूहिक हितों से संबंध होता है ।
लेकिन मार्क्स और एंगेल्स के ही लेखन में इसका एक दूसरा अर्थ भी प्रकट हुआ है । ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में एक योगदान’ की भूमिका में उन्होंने बताया है कि मनुष्य उत्पादन की भौतिक स्थितियों के रूपांतरण के कार्यभार के प्रति विचारधारा की दुनिया में सचेत होता है । यदि विचारधारा के भ्रम वाले अर्थ को ग्रहण किया जाए तो इस कथन का मतलब साफ नहीं होगा । इसी सकारात्मक अर्थ में लेनिन ने समाजवाद को सर्वहारा वर्गीय संघर्ष की विचारधारा कहा है । उनके अनुसार पूंजीवादी संबंधों में अपने आप पैदा होने वाले मजदूरों की लड़ाइयों में समाजवाद की विचारधारा का प्रवेश बाहर से कराया जाता है । इसके बाद ‘बुर्जुआ विचारधारा’ के बरक्स ‘सर्वहारा विचारधारा’ का इस्तेमाल होने लगा यानी विचारों की ऐसी व्यवस्था जो किसी वर्ग के मुफीद हो ।
शब्द की इसी अनेकार्थता को रेखांकित करते हुए टेरी ईगलटन ने अपनी किताब ‘आइडियोलाजी : ऐन इंट्रोडक्शन’ में विचारधारा के दसाधिक अर्थ गिनाए हैं- 1) सामाजिक जीवन में अर्थ, चिन्ह और मूल्य पैदा होने की प्रक्रिया; 2) विशेष सामाजिक समूह या वर्ग से जुड़े हुए विचार समूह; 3) प्रभुत्वशाली राजनीतिक सत्ता को वैधता देने में सहायक विचार; 4) इसी तरह के छद्म विचार; 5) व्यवस्थित विकृत संप्रेषण; 6) किसी कर्ता को हैसियत प्रदान करने वाला; 7) सामाजिक हितों से प्रेरित चिंतन के रूप; 7) अस्मिता चिंतन; 8) सामाजिक रूप से आवश्यक भ्रम; 9) विमर्श और सत्ता का संयोग; 10) ऐसा माध्यम जिसमें सचेत सामाजिक अभिकर्ता अपनी दुनिया के बारे में सचेत होते हैं; 11) सक्रिय करने वाले विश्वास-समूह; 12) भाषिक और परिघटनात्मक यथार्थ का भ्रम; 13) ऐसा अपरिहार्य माध्यम जिसमें व्यक्ति किसी सामाजिक संरचना में अपने संबंध निबाहते हैं; 14) सामाजिक जीवन को प्राकृतिक यथार्थ में बदलने वाली प्रक्रिया । स्पष्ट है कि प्रसंगानुसार इसके अर्थों में बदलाव आता रहा है ।
          


Thursday, March 3, 2016

ग्राम्शी


अंतोनियो ग्राम्शी (1891-1937) को मार्क्सवादी चिंतकों की परंपरा में अनेक कारणों से विशेष स्थान प्राप्त है । वे इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे । उनका जन्म सार्दीनिया द्वीप में हुआ था । पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न होने और कर्ज के चलते पुलिस के पीछे पड़ने की वजह से परिवार को लगातार भटकना पड़ता । अंतत: पिता घोटाले में फंसे और उन्हें जेल हो गई । ग्राम्शी की पढ़ाई छूट गई और उन्हें तमाम तरह के अस्थाई काम करने पड़े । स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के चलते उनकी लंबाई पाँच फ़ीट से कम ही रह गई और पीठ पर कूबड़ निकल आया था । वे हमेशा ही उद्योगीकृत उत्तरी इटली के मुकाबले खेतिहर सार्दीनिया के पिछड़ेपन के खिलाफ़ रहे । तूरिन विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के दौरान मजदूर आंदोलनों के संपर्क में आए और कम्युनिस्ट हो गए । कम्युनिस्ट अखबारों में निरंतर राजनीतिक सवालों पर लिखते रहे । इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि के बतौर रूस की यात्रा की । देश में मुसोलिनी की फ़ासिस्ट सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद चले दमन में तबाह पार्टी को खड़ा करने की कोशिश के दौरान गिरफ़्तार हुए और जेल में ही मृत्यु हो गई । सरकारी सेंसरशिप को धोखा देने के लिए उन्होंने लेखन की एक खास शैली विकसित की और उसी में डायरियों का लेखन किया । उदाहरण के लिए कम्युनिस्ट पार्टी लिखने की जगह वे मैकियावेली के प्रिंस की तर्ज पर इसे माडर्न प्रिंस (आधुनिक राजकुमार) लिखते या सर्वहारा वर्ग की जगह सबाल्टर्न क्लास (निम्न वर्ग) । कम्युनिस्ट नेता के लिए वे आर्गेनिक इंटेलेक्चुअल (आंगिक बुद्धिजीवी) शब्द का प्रयोग करते थे जिसे वे बुर्जुआ बौद्धिक के लिए प्रयुक्त ट्रेडिशनल इंटेलेक्चुअल के विपरीत समझते थे । हेजेमनी या प्रभुत्व की उनकी धारणा का वैचारिक-सांस्कृतिक आंदोलन से गहरा संबंध है । वे राज्य को सिर्फ़ दमनात्मक प्रविधियों तक ही सीमित नहीं मानते थे बल्कि सहमति निर्मित करने में सहायक औजारों को शासन पद्धति के लिए सामाजिक सहमति लेने के लिहाज से अधिक महत्वपूर्ण समझते थे । इसी क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित करना उन्हें पार्टी का कर्तव्य लगता था । उन्हें इसकी भूमिका चलायमान युद्धके मुकाबले मोर्चेबंदी के युद्ध में निर्णायक महसूस होती थी । जिसे ‘पश्चिमी मार्क्सवाद’ कहा गया उसका जनक ग्राम्शी को ही माना जाता है ।      


आधार और अधिरचना

  

मार्क्स ने इतिहास को देखने की अपनी दृष्टि को स्पष्ट करते हुए राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में एक योगदानशीर्षक पुस्तक की भूमिका में एक पैराग्राफ लिखा जिसमें आधार-अधिरचना का ढांचा वर्णित है । उसकी किसी भी व्याख्या से अधिक स्पष्ट वह उद्धरण ही है इसलिए उसे देखना लाभदायक होगा । उनका कहना हैअपने जीवन के सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया में मनुष्य कुछ निश्चित संबंध बनाते हैं जो उनकी इच्छा से स्वतंत्र तथा अपरिहार्य होते हैं । ये उत्पादन संबंध भौतिक उत्पादक-शक्तियों के विकास के एक निश्चित चरण से जुड़े हुए उत्पादन के संबंध हैं । उत्पादन के इन संबंधों का कुल योग समाज की आर्थिक संरचना का निर्माण करता है । यही वह वास्तविक नींव है जिस पर कानूनी और राजनीतिक अधिरचना उठती है और जिससे सामाजिक चेतना के निश्चित रूप जुड़ते हैं । उत्पादन का तरीका ही सामान्य रूप से सामाजिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक जीवन-प्रक्रिया को रूप देता है । मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि इसके उलट उनका सामाजिक अस्तित्व ही उनकी चेतना को निर्धारित करता है ।
        
यह कथन मनुष्य के सामाजिक जीवन और उसकी चेतना, जो साहित्य तथा अन्य तमाम किस्म के सृजनात्मक उपलब्धियों का कारण होती है, के बीच रिश्ते की भौतिकवादी समझ को व्यक्त करती है । इस बुनियादी प्रस्थापना के बाद इसी भूमिका में सामाजिक परिवर्तन की अपनी समझ को व्याख्यायित करते हुए वे आगे कहते हैंविकास की एक मंजिल पर आकर समाज की भौतिक उत्पादक शक्तियां उन्हीं उत्पादन संबंधों से टकराने लगती हैं जिनके बीच अब तक वे रह रही थीं ।---अब उत्पादक शक्तियों के विकास को आकार देने की बजाय ये संबंध उनके पांवों में बेड़ियां बन जाते हैं ।आगे वे इसी टकराव के जरिए बदलाव को घटित होता हुआ बताते हैं । कहते हैंतब सामाजिक क्रांति का युग शुरू होता है । आर्थिक नींव में बदलाव के साथ समूची भारी भरकम अधिरचना में कमोबेश तेजी से बदलाव आता है ।आर्थिक नींव और अधिरचना में बदलाव के बीच अंतर करते हुए वे कहते हैंऐसे बदलाव पर विचार करते हुए हमें दो किस्म के बदलावों में हमेशा फ़र्क करना चाहिए- उत्पादन की आर्थिक स्थितियों में भौतिक बदलाव, जिसे प्राकृतिक विज्ञानों की तरह सटीक ढग से निर्धारित किया जा सकता है, और कानूनी, राजनीतिक, सौंदर्यशास्त्रीय अथवा दार्शनिक, यानी संक्षेप में ऐसे विचारधारात्मक रूपों में बदलाव, जिनके जरिए लोग इस टकराव के बारे में सचेत होते हैं, के बीच फ़र्क करना चाहिए ।’   

इतिहास में परिवर्तन की मार्क्स की इस धारणा को लेकर उनके जीवनकाल में ही विवाद शुरू हो गए थे इसलिए उन्हें इसे और अधिक व्याख्यायित करना पड़ा था । थोड़ी सफाई देते हुए एंगेल्स ने जोसेफ ब्लाख को 21-22 सितंबर 1890 को लिखे अपने पत्र में स्पष्ट किया है ‘---अगर कोई इस बात को तोड़-मरोड़कर कहता है कि आर्थिक तत्व एकमात्र निर्धारक तत्व है तो वह इस प्रस्थापना को बेतुके जुमले में बदल देता है । आर्थिक स्थिति आधार है लेकिन अधिरचना के कई तत्व, वर्ग संघर्ष और उसके परिणामों के राजनीतिक स्वरूप, जैसे कि किसी निर्णायक युद्ध के बाद विजयी वर्ग द्वारा कायम किया गया संविधान, कानून संबंधी चीजें, और खासकर इन तमाम वास्तविक संघर्षों की इनके भागीदारों के दिमाग पर पड़ने वाली छायाएं, राजनीतिक, कानूनी, दार्शनिक सिद्धांत, धार्मिक मत और फिर जाकर जड़सूत्र प्रणालियों के रूप में उनका विकास, यह सब भी ऐतिहासिक संघर्षों के गतिपथ पर अपना असर डालते हैं, और कई मामलों में खासकर उनके स्वरूपों का निर्धारण करते हैं ।’ आधार-अधिरचना का मार्क्सवादी ढांचा इतना विवादास्पद है कि इस प्रकरण में किसी अन्य विद्वान की व्याख्या की अपेक्षा मार्क्स-एंगेल्स की धारणा को मूल में देखना ही सबसे अधिक उपयोगी होगा ।  


Tuesday, March 1, 2016

नक्सलवादी आंदोलन और हिंदी साहित्य

    
हिंदी साहित्य के इतिहास में नक्सलवादी आंदोलन का एक विशेष स्थान है । बंगाल के दार्जिलिंग जिले के छोटे से गांवनक्सलबाड़ीके नाम पर इस आंदोलन का नाम पड़ा । नक्सलवाद को आम तौर पर राजनीतिक आंदोलन की हिंसक धारा के साथ जोड़ा जाता है लेकिन असल में यह स्वातंत्र्योत्तर भारत में किसानों-मजदूरों की मुक्ति का उग्रपंथी आंदोलन है । 1947 की आजादी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की निष्क्रियता और पहले प्रधानमंत्री कीसमाजवादी किस्म के समाजके समर्थन की पृष्ठभूमि में बंगाल के नक्सलवादी आंदोलन ने शिक्षित युवा-बौद्धिक समुदाय को तेजी से आकर्षित किया । पहले बंगाल के साहित्यिक जगत पर इसका प्रभाव पड़ा । फिर हिंदी साहित्य भी इसके प्रभाव में आया । हिंदी कवि धूमिल की एक कविता में सबसे पहले इसका उल्लेख मिलता है । असल में धूमिल हिंदी के आधुनिक साहित्य में खास तरह के संक्रमण का प्रतिनिधित्व करते हैं । हिंदी कविता में साठोत्तरी पीढ़ी ने अराजक विद्रोह का मुहावरा विकसित किया था जिसका गहरा असर धूमिल पर है लेकिन उनके साथ ही व्यवस्थित राजनीतिक विरोध की आवाज भी सुनाई पड़ने लगती है ।
सत्तर के दशक में नक्सलबाड़ी के प्रभाव से ऐसी चेतना का जन्म हुआ जिसमें किसानों-मजदूरों के सशस्त्र संघर्ष की छाया महसूस की जा सकती है । सबसे पहले हिंदी में आलोक धन्वा की कविताओं खासकरगोली दागो पोस्टरऔरजनता का आदमीमें इसे देखा और सराहा गया । जल्दी ही देश में इमर्जेंसी की घोषणा हो गई । इमर्जेंसी के इस दौर में भी दूर दराज के इलाकों में ये कवि सक्रिय थे लेकिन इमर्जेंसी की समाप्ति के बाद इनका प्रभाव बहुत ही गहरा पड़ा । इसके पीछे इमर्जेंसी की समाप्ति के बाद फैले लोकतांत्रिक उभार का योगदान था ।
इनमें से एक कवि गोरख पांडे का जिक्र इसलिए भी जरूरी है कि इस धारा के सांस्कृतिक संगठनजन संस्कृति मंचके वे संस्थापक महासचिव थे । शुरू में उनके भोजपुरी गीत प्रकाशित हुए जिनमें संघर्षशील श्रमिक जनता की पीड़ा और आकांक्षा की अभिव्यक्ति उनकी अपनी भाषा में हुई थी । उस दौर में गोरख के ये भोजपुरी गीत इतने लोकप्रिय थे कि स्थानीय लोग बिना लेखक का नाम जाने भी उन्हें गाते थे ।गुलमिया अब हम नाहीं बजइबो, अजदिया हमरा के भावेलेतथाजनता के आवे पलटनिया, हिलेले झकझोर दुनियाजैसे गीत आज भी संघर्षशील लोगों की जुबान पर रहते हैं । उनका गीतसमाजवाद बबुआ धीरे धीरे आईशासकों के आश्वासन की खिल्ली उड़ाता है और मारक व्यंग्य के साथ समाजवाद के नाम पर असमानता के यथार्थ को उद्घाटित करता है । उनकी हिंदी कविताओं में भी छंद और लय की मौजूदगी के चलते उन्हें अपार लोकप्रियता हासिल हुई । एक कविता द्रष्टव्य हैकविता युग की नब्ज धरो ।/ अफ़्रीका लातिन अमेरिका,/ उत्पीड़ित हर अंग एशिया ,/ आदमखोरों की निगाह में खंजर सी उतरो ।/ उलटे अर्थ विधान तोड़ दो,/ शब्दों से बारूद जोड़ दो,/ अक्षर अक्षर पंक्ति पंक्ति को छापामार करो ।/ श्रम की भट्ठी में गल गलकर,/ जग के मुक्ति अर्थ में ढलकर,/ बन स्वच्छंद सर्वहारा के ध्वज के संग लहरो ।गोरख पांडे ने क्रांतिकारी राजनीतिक कविता का जो लोकप्रिय मुहावरा विकसित किया, वह इस धारा के लगभग सभी कवियों की विशेषता बन गई ।
हिंदी में नक्सलबाड़ी के प्रभाव से क्रांतिकारी साहित्य का जो माहौल बना उसके कारण नागार्जुन और त्रिलोचन जैसे सृजनशील प्रगतिशील कवि प्रासंगिक बने । नागार्जुन ने तो कुछ कविताओं के जरिए इस आंदोलन का अभिनंदन भी किया । उनकी छोटी सी कविताप्रतिहिंसा ही स्थायिभाव है मेरे कवि काएक तरह से प्रतोरोध की हिंसा का अनुमोदन करता है । उन्हीं की कविताभोजपुरहिंदी क्षेत्र में नक्सलवादी आंदोलन का केंद्र बन चुके जिले पर लिखी हुई है और उस भावना को भी अभिव्यक्त करती हैबारूदी छर्रे की खुशबूऔरयही धुँआउनके कवि को ताकत देता है ।
इनकी कविताओं की प्रसिद्धि ने लोकतंत्र के पक्ष में कविता लिखनेवाले रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे लोहिया के विचारों से प्रभावित कवियों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया । इसमें से खासकर सर्वेश्वर ने तो दो नक्सल नेताओं- किष्टा गौड़ और भूमैया- की फाँसी के विरोध में कविता भी लिखी और सवाल पूछते हुए कहाचाक कर जो अजदहों का पेट बाहर आ गये, ऐसे दीवाने वतन यूँ ही गँवाए जायेंगे !’ उनकी कविताओं की मांग ही नहीं बढ़ी, उनमें एक क्रांतिकारी तेवर भी दिखाई पड़ा ।कुआनो नदीकी अधिकांश कविताओं में यह विद्रोही भाव प्रतिबिंबित हुआ ।
उसी माहौल में जिन्होंने कविता लिखना शुरू किया था लेकिन एक पीढ़ी बाद के थे उनमें बल्ली सिंह चीमा ने विपक्ष की कविता की दुष्यंत की याद ताजा कर दी । उन्हीं के साथ के अदम गोंडवी ने लिखाये नयी पीढ़ी पे मबनी है वही जज्मेंट दे ।/ फ़लसफ़ा गाँधी का मौजूँ है के नक्सलवाद है ॥लोकप्रिय लेखन की इस परंपरा में ही भोजपुरी के रमता जी और निर्मोही जैसे लोककवि भी शामिल थे । लेकिन इनसे अलग भी वीरेन डंगवाल, कुमार विकल, दिनेश कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल, पंकज सिंह आदि कवियों ने हिंदी कविता की नक्सल परंपरा की अजस्र धारा को जिंदा रखा है । इस क्रम में उसका फलक विस्तृत हुआ है और पर्यावरण, बेदखली, जाति उत्पीड़न, स्त्री मुक्ति जैसे अन्य सरोकार भी उसकी सीमा में दाखिल हुए हैं ।
कविता के अतिरिक्त कथा साहित्य में विजेंद्र अनिल और मधुकर सिंह की ढेर सारी कहानियों, संजीव के उपन्यासआकाश चंपामें और विशेष रूप से सृंजय की कहानीकामरेड का कोटमें भी इस धारा का साहित्यिक योगदान देखा जा सकता है ।
बांग्ला में नक्सलवादी आंदोलन के प्रभाव से साहित्य-संस्कृति की दुनिया में जो आलोड़न पैदा हुआ उसे ‘मूर्तिभजन’ के नाम से जाना जाता है । बांग्ला नवजागरण की मूलगामी आलोचना के प्रतीक के रूप में उस नवजागरण के पुरोधाओं की मूर्तियों को तोड़ा गया था । इसे साठ के दशक में दुनिया भर में हो रही सांस्कृतिक क्रांति के भारतीय संस्करण के बतौर भी समझा गया । लेकिन हिंदी में ऐसा कोई मूर्तिभंजन नहीं चला । इसका एक कारण बांग्ला नवजागरण और हिंदी नवजागरण की स्थिति का अंतर भी था । जहां बंगाल में प्रभुत्वशाली संस्कृति के निर्माण में नवजागरण के पुरोधाओं को समाहित कर लिया गया था और इसी कारण प्रगतिशील लेखक संघ का गठन तक नहीं हो सका था, वहीं उसके विपरीत हिंदी क्षेत्र के नवजागरण के पुरोधा प्रभावशाली तबकों द्वारा उपेक्षित रहे थे और मजबूत प्रलेस का गठन हुआ था । इसी कारण हिंदी क्षेत्र में उसके प्रभाव ने जन पक्षधर साहित्यिक हलचलों को मजबूती प्रदान की ।

                       

Monday, February 29, 2016

श्रम

             
श्रम मानव जाति का स्वभाव है । अन्य सभी प्राणियों से मनुष्य की भिन्नता स्थापित करने में श्रम की निर्णायक भूमिका रही है । इसी पहलू पर जोर देने के लिए फ़्रेडेरिक एंगेल्स ने ‘वानर से नर बनने की प्रक्रिया में श्रम की भूमिका’ शीर्षक पुस्तिका लिखी थी । प्राणी जगत में मनुष्य की विशेषता श्रम की प्रक्रिया में ही पैदा होती है । इसे स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने बताया कि बहुत सारे पशु-पक्षी भी अपनी रहने की जगहों का बड़ी खूबसूरती से निर्माण करते हैं लेकिन सबसे खराब घर बनाने वाला मिस्त्री भी सबसे सुंदर घोंसला बनाने वाली बया से इसी मामले में अलग होता है कि मनुष्य वास्तविक वस्तु को बनाने से पहले अपने दिमाग में उसकी तस्वीर बनाता है । अर्थात श्रम का संबंध भरण पोषण के लिए जरूरी उत्पादन से होता है । इस उत्पादन के लिए मनुष्य अपने शरीर का सृजनात्मक उपयोग करता है । मनुष्य का शरीर प्रकृति का अंग होता है और इस तरह श्रम की प्रक्रिया प्रकृति के साथ मनुष्य की सर्वाधिक घनिष्ठ अंत:क्रिया होती है । मार्क्स मानते हैं कि श्रम ही वह बुनियादी कोटि है जो मनुष्य और प्रकृति के बीच चयापचयी माध्यम है । कहने का मतलब कि श्रम के माध्यम से ही मनुष्य और प्रकृति के बीच एक दूसरे के सहारे जिंदा रहने का रिश्ता बनता है ।
प्रकृति के साथ मनुष्य की श्रम नामक इसी उत्पादक अंत:क्रिया से वस्तुओं का उत्पादन होता है । श्रम के परिणाम से पैदा हुई इन चीजों में मनुष्य का यह उत्पादक श्रम साकार होता है । लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में इस पर पैदा करने वाले का हक नहीं रह जाता, बल्कि उसे वस्तु के बदले मजदूरी दी जाती है । चूंकि मनुष्य अपने श्रम से पैदा होने वाली उस वस्तु में साकार होता है इसलिए उसका न मिलना मनुष्य का अपने आपसे अलग हो जाने की प्रक्रिया बन जाता है । अगर ऐसा न हो तो मजदूर के लिए श्रम आनंद का स्रोत हो जाएगा । अपने श्रम का आनंदोपभोग ही वह क्षण है जब हमारा आत्म-साक्षात्कार होता है । प्राणी के रूप में मनुष्य परिस्थिति का दास होता है जबकि मनुष्य के बतौर श्रम करने के चुनाव और उस श्रम के परिणाम के उपभोग की उसकी क्षमता में उसका कर्तापन उभरकर सामने आता है । सृजनात्मक रूप से सक्रिय होने की क्षमता ही मनुष्य को शेष प्राणी जगत से अलगाती है । इस सक्रिय सृजनात्मकता के लिए मनुष्य को सामाजिक होना आवश्यक होता है । किसी भी वस्तु का उत्पादन कोई भी अकेले नहीं कर सकता । इसी अर्थ में अपने स्वभाव से ही मनुष्य सामाजिक होता है ।
श्रम से ही जुड़ी हुई धारणा ‘श्रम शक्ति’ की है जिसका तात्पर्य श्रम की क्षमता है । प्रकृति प्रदत्त सामग्री के साथ इसी श्रम शक्ति के संयोजन के चलते इस दुनिया को उसका वर्तमान रूप मिला है । प्रकृति के साथ मनुष्य की आपसदारी तभी बनती है जब श्रम शक्ति के निवेश और इतिहास की प्रक्रिया में उसका भी समाजीकरण होता है यानी उसका स्वतंत्र सामाजिक महत्व प्रकट होता है । दुनिया के साथ अपनी श्रममूलक अंत:क्रिया के जरिए ही मनुष्य अपना स्वभाव समझ पाता है । श्रम से प्रकृति को मानव मूल्य प्राप्त होता है । इसका मतलब है कि यह संसार और सारे मूल्य मनुष्य के व्यावहारिक क्रियाकलाप से पैदा होते हैं । लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में यह सब श्रम के उत्पाद की तरह नहीं दिखाई पड़ता । वस्तुओं का अस्तित्व स्वतंत्र सत्ता की तरह नजर आने लगता है । कारण यह है कि पूंजीवाद के तहत कामगार वस्तुओं या मूल्य के उत्पादन में अपनी श्रम शक्ति तो खर्च करते हैं लेकिन इसके प्रबंधन में भागीदारी की या उनके उपभोग की आजादी उन्हें नहीं होती । श्रमिक के लिए श्रम एक सामाजिक गतिविधि की अभिव्यक्ति की जगह बोझ बन जाता है । श्रमिक के लिए पूंजीवादी व्यवस्था में श्रम अपना असली सामाजिक रूप खोकर धन की कमाई के जरिए में बदल जाता है जो आनंद की जगह असंतोष का स्रोत हो जाता है ।
               



वस्तुनिष्ठता

                    
वस्तुनिष्ठता मनुष्य द्वारा दुनिया के ज्ञान की प्रक्रिया को बताने के लिए प्रयुक्त एक दार्शनिक प्रत्यय है इसे हम यूरोपीय दर्शन की अनुभववादी परंपरा से जोड़कर देख सकते हैं जिसके अनुसार किसी भी वस्तु का ज्ञान हमें इंद्रिय संवेदन से होता है प्राकृतिक विज्ञानों में इसका महत्व बहुत अधिक है । इसमें यह पूर्व मान्यता होती है कि जिसके बारे में जानना है (ज्ञेय) वह जानने वाले (ज्ञाता) से स्वतंत्र है । यथार्थ, सत्य और विश्वसनीयता जैसी धारणाओं का आधार वस्तुनिष्ठता है । यह ऐसा ज्ञान होता है जिसके प्रमाण के रूप में साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं ।
ऐसा नहीं है कि दर्शन की दुनिया में इसे बिना किसी संदेह के मान लिया गया है क्योंकि ज्ञाता के लिए वह स्वयं भी ज्ञेय हो सकता है । प्रसिद्ध चिंतक लाक ने एक उदाहरण के जरिए इसकी सीमा का उद्घाटन किया । उन्होंने कहा कि अगर आप अपना एक हाथ ठंडे पानी में रखें और दूसरे को गरम पानी में और फिर गुनगुने पानी में दोनों हाथ डालें तो गरम पानी वाले हाथ को वह ठंडा लगेगा जबकि ठंडे पानी वाले हाथ को गरम लगेगा । इस उदाहरण से उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यथार्थ का ज्ञान ज्ञाता की स्थिति से भी प्रभावित होता है । इस तरह से बहुत से लोग मनुष्य द्वारा यथार्थ के यथातथ्य ज्ञान की क्षमता पर संदेह जाहिर करते हैं । समस्या के समाधान के बतौर कहा जाता है कि पैमाने के सहारे हम सच्चाई के काफी निकट पहुंच सकते हैं । लेकिन इस पद्धति पर भी सवाल उठाते हुए लाक ने ध्वनि और रंग के अनुभव का हवाला दिया जो हमारी इंद्रियों की प्रकृति से रूपायित होता है । प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट ने भीवस्तु निज रूपके इंद्रिय संवेदन जन्य ज्ञान की इस सीमा की बात की थी । मनुष्य के कान उसे 20 से 20 हजार तक की बारंबारता की ध्वनि ही सुना सकते हैं । उसकी आंख भी इसी तरह किसी वस्तु के सभी पहलू एक साथ नहीं दिखा सकती है । इसी आधार पर उसने कहा कि वस्तु का हमारा ज्ञान वस्तुत: उसकी प्रतीति है । इसके विरोध में कहा जा सकता है कि मनुष्य होने के नाते हम अपने अनुभव से परे की चीजों के बारे में नहीं जान सकते लेकिन इसी बात से यह भी प्रमाणित है कि हमारे अनुभव से परे भी यथार्थ की सत्ता है ।
देकार्त ने ऐसी स्पष्ट मानसिक छवियों की बात की है जिनमें वस्तुओं की यथार्थ सत्ता के विश्वसनीय संकेतक अंतर्निहित होते हैं । हमारे ज्ञान के वस्तुनिष्ठ होने का दूसरा स्रोत उसकी व्यापक सामाजिक मान्यता होती है । इसके पीछे यह पूर्वमान्यता है कि हमारे अतिरिक्त अन्य अनेक ज्ञाता हैं और उनका सम्मिलित ज्ञान सत्य के निकट हो सकता है । एक और पूर्वमान्यता यह है कि वस्तुगत यथार्थ तार्किक रूप से सुसंगत होता है और इसीलिए अधिकांश लोगों को समान दिखाई देता है । फिर भी वस्तुनिष्ठता दार्शनिक रूप से विवादास्पद प्रश्न है । इसके लिए ऐसे स्वतंत्र निर्धारकों को खोजना होगा जो वस्तुगत यथार्थ के ज्ञान का समर्थन करने वाली आत्मगत छवियों को अलगा सकें । इसी के साथ ज्ञाता और ज्ञेय की एकता का सवाल भी जुड़ा हुआ है क्योंकि चेतन मनुष्य अपने आपको भी अपने ज्ञान का विषय बनाता है । इसे आप मस्तिष्क का दर्शन भी कह सकते हैं । यह गुत्थी अब तक सुलझ नहीं सकी है कि मानव मस्तिष्क में किस सीमा के बाद पदार्थ विचार में बदल जाता है । असल में तो चिंतन का यह विचार पक्ष ही मस्तिष्क के पदार्थ पक्ष को ज्ञान का विषय बनाता है । इन सब विवादों के बावजूद यह निश्चित है कि एक ऐसी दुनिया है जो हमारी चेतना से स्वतंत्र है और हमारे सर्वेक्षण और विश्लेषण का विषय है । इसी दुबिधा के कारण अनादि काल से ज्ञाता और ज्ञेय की भिन्नता और अभिन्नता का झगड़ा चला आ रहा है ।    

   


Monday, February 1, 2016

समाजवाद का अनथक योद्धा

               
कामरेड रणधीर सिंह अपने जीवन की अंतिम सांस तक मार्क्सवाद और समाजवाद के पक्ष में लड़ते रहे । अविभाजित भारत के पाकिस्तान की तरफ के इलाके में उनका जन्म हुआ था । उन्होंने अपने बारे में एक लेख लिखा था जिसे वे हरेक मौके पर जरूर प्रकाशित करते थे । उसका शीर्षक थाबायोडाटा के बदले में। उसमें उन्होंने अपने बहाने उस पूरी पीढ़ी के बारे में लिखा जो आजादी के आंदोलन के भीतर वाम विचारधारा के प्रभाव में आई और रही थी । छात्र जीवन से ही कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रियता के कारण जेल हुई । जेल से बाहर आकर परीक्षा देने के लिए अध्यापक से सबसे आसान विषय जानना चाहा तो उन्होंने विद्यार्थी की रुचि के अनुसार राजनीति विज्ञान लेने की सलाह दी और परीक्षा में शामिल होने के लिए आवश्यक हाजिरी दे दी । परीक्षा में रणधीर सिंह को सर्वोच्च अंक मिले । विभाजन के बाद भारत आने पर रणधीर सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया । उनके अध्यापन की लोकप्रियता का यह आलम था कि अमेरिका के मशहूर मार्क्सवादी बर्तेल ओलमैन ने हसरत भरे दिल से रणधीर सिंह जैसा अध्यापक होने की इच्छा प्रकट की थी । दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक आंदोलन में वामपंथी प्रबलता के लिए बहुत कुछ उनकी कोशिशों को जिम्मेदार माना जा सकता है । अपने उसी लेख में उन्होंने अध्यापक रहते हुए राजनीतिक सक्रियता को बरकरार रखने के लिए जिन मूल्यों को अपनाया उनका विस्तार से जिक्र किया है । इसके लिए उन्होंने जे एन यू आने का मोह छोड़ा । तथाकथित संगोष्ठियों में भागीदारी और शोध पत्रों के लेखन से बचते रहे लेकिन विद्यार्थियों या राजनीतिक संगठनों की ओर से बुलाए जाने पर खुशी खुशी बोले । किताबें या लेख भी राजनीतिक जरूरत के तहत ही लिखा । उनकी सबसे महात्वाकांक्षी किताब सोवियत संघ के पतन के बाद उससे उपजे सवालों से जूझते हुए लिखी गई थी ।
2006 में अजंता बुक्स इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित यह वृहदाकार (तकरीबन 1100 पृष्ठों की) पुस्तकक्राइसिस आफ़ सोशलिज्मथी । इसमें एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी द्वारा समाजवाद में संकट की बजाए समाजवाद के संकट पर विचार किया गया था । भूमिका में लेखक ने स्वीकार किया था कि इस पुस्तक को एक दशक पहले ही प्रकाशित हो जाना चाहिए था क्योंकि तब इस विषय पर बहस चल रही थी लेकिन उस समय भी लेखक ने छिटपुट लेखों के जरिए वे बातें प्रस्तुत की थीं जो इसमें विस्तार से दर्ज की गई हैं । पुस्तक के लिखने में हुई देरी की वजह बताते हुए उन्होंने लिखा है कि उन्हें आशा थी कि कोई न कोई इस काम को ज्यादा तरतीब से करेगा और उनकी उम्मीद पूरी हुई क्योंकि इसी बीच इस्तवान मेज़ारोस की किताबबीयांड कैपिटल-टुवार्ड्स ए थियरी आफ़ ट्रांजीशनप्रकाशित हुई जिससे उन्होंने काफी मदद ली । लेकिन यह रणधीर सिंह की विनम्रता है क्योंकि उनकी किताब का स्वतंत्र महत्व था ।
इस किताब की खासियत यह थी कि इसने प्रतिबद्ध वामपंथी कार्यकर्ताओं को वाहियात किस्म की बातों को परे हटाकर सही मुद्दे को पहचानने में मदद की जो घटनाओं की तीव्रता और दुश्मनों के ताबड़तोड़ हमलों के समक्ष कुछ हद तक किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए थे । उस समय तो अनेक लोग यही कहने को महान आविष्कार समझ रहे थे कि मार्क्सवाद में लोकतंत्र की गुंजाइश नहीं है इसलिए विपक्ष न होने से कम्युनिस्ट पार्टी को अपनी गलतियों का पता नहीं चला । रणधीर सिंह ने ठीक ही मजाक उड़ाते हुए लिखा कि क्या इस कमी को दूर करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी अपने को ही विभाजित करके विपक्ष बनाती ! इसी तरह जो लोग कह रहे थे कि पिछड़े देश में क्रांति होने से अथवा एक ही देश में समाजवाद के निर्माण का निर्णय होने से विकृतियों का जन्म हुआ उनके तर्कों को खारिज करते हुए वे कहते हैं कि यह सब विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों के प्रति रूसी कम्युनिस्टों का उत्तर था जिसमें कोई बुनियादी खामी नहीं थी ।
हाल में 2008 में अकार बुक्स से उनकी किताब ‘मार्क्सिज्म, सोशलिज्म, इंडियन पालिटिक्स: ए व्यू फ़्राम द लेफ़्ट’ का प्रकाशन हुआ । उनकी सभी किताबों की तरह इस किताब के भी शुरू में उनका मशहूर लेख ‘बायोडाटा के बदले में’ है । पुस्तक का सबसे बड़ा लेख ‘आफ़ मार्क्सिज्म आफ़ कार्ल मार्क्स’ है जो अलग से पुस्तिका के रूप में भी प्रकाशित हुआ था । मार्क्सवाद, समाजवाद और वाम राजनीति के इस अनथक योद्धा को सलाम !