Wednesday, September 12, 2012

अनजानी जगह की यात्रा या पूर्वोत्तर का रहस्यीकरण


     
 (अनिल यादव की किताब की शेष के लिए लिखी समीक्षा)                                                   
अंतिका से प्रकाशित अनिल यादव का यात्रावृत्त ‘वह भी कोई देस है महराज’ पूर्वोत्तर के सभी प्रांतों की आतंकवादी गतिविधियों के उभार के समय की गई यात्रा का कुशल कहानीकार के हाथों लिखा वर्णन है । इस यात्रा के पहले लेखक अवसाद के लंबे दौर से गुजर चुका था और यह यात्रा उस अवसाद से बाहर निकलने की जद्दोजहद का अंग थी । यात्रा में एक साथी शाश्वत भी था जो निरंतर वर्णन में मौजूद रहता है । लेखक कहानीकार तो है ही, पेशेवर पत्रकार भी है इसलिए अतीत और प्रकृति की फाँस अथवा स्त्रियों की मौजूदगी के मोहक जाल में उलझने की बनिस्बत वर्तमान में अधिक ठोस तरीके से धँसा रहता है । अलग बात है कि पत्रकारीय उदासीनता हावी नहीं होती और कथाकार की भाषा रस बनाए रहती है । अनिल के पर्यवेक्षण इतने जबर्दस्त हैं कि डीटेल्स अनायास ही चले आते हैं ।
किताब का शीर्षक काबिले गौर है । कल्पना करिए कि ‘वह’ की जगह ‘यह’ होता यानी ‘यह भी कोई देस है महराज’ तो फ़र्क पड़ता या नहीं । स्वाभाविक रूप से ‘वह’ लिखकर लेखक ने पूर्वोत्तर को भिन्न कर दिया है और इस तरह पूर्वोत्तर में जो भी हो रहा है उसकी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा लिया है जबकि सच्चाई यह है कि वहाँ के हालात की जिम्मेदारी से केंद्र के प्रतिनिधि राज्यपाल, स्थानीय सरकारें या समूचा देश मुँह नहीं मोड़ सकता । इस बात को पूर्वोत्तर के अनेक बुद्धिजीवियों ने उठाया है कि आखिर किन वजहों से पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्यपाल सेना से रिटायर्ड अफ़सर ही होते हैं ।
यह भाव पूरी पुस्तक में गहराई से मौजूद है जिसकी वजह से इसकी रुचिकर पठनीयता के बावजूद समस्याओं के संदर्भ साफ होने की जगह आप अपने आपको ऐसी जगह की यात्रा करते पाते हैं जो विचित्र है और जिसके निर्माण में बाहर की एजेंसियों की भूमिका उतनी नहीं है जितना वहाँ के लोगों का तथाकथित स्वभाव । यात्रा की शुरुआत ही एक ऐसी ट्रेन से होती है जो ‘देश के सबसे रहस्यमय और उपेक्षित हिस्से की ओर जा रही थी इसलिए अंधेरे में उदास खड़ी थी ।’       
उसके बाद यात्रा के दौरान क्रमशः पूर्वोत्तर के बारे में हिंदी भाषी इलाकों में प्रचलित विश्वासों को लेखक पाठकों के सामने खोलता चलता है और एक तरह का टकराव भी इसी क्रम में खुलता जाता है । आम हिंदी भाषी की पढ़ाई लिखाई या निजी अनुभवों के आधार पर पूर्वोत्तर की जो छवि बनती है उसे बेहद खूबसूरती से लेखक इस तरह समेटता है ‘बचपन में पढ़ी समाजिक विज्ञान या भूगोल की किताब में छपे चित्रों से जानता था, वहाँ चाय के बागान हैं जिनमें औरतें पत्तियाँ तोड़ती हैं । पहले वहाँ की औरतें जादू से बाहरी लोगों को भेड़ा बनाकर अपने घरों में पल लेती थीं । चेरापूँजी नाम की कोई जगह है जहाँ दुनिया में सबसे अधिक बारिश होती है ।’ बहरहाल पाठक को इससे उम्मीद पैदा होती है कि इन अंधविश्वासों से भिन्न पूर्वोत्तर की वैकल्पिक तस्वीर उसे देखने को मिलेगी ।
यात्रा के आगे बढ़ने के साथ पूर्वोत्तर भारत के साथ शेष भारत के संबंध परत दर परत खुलना शुरू होते हैं जो बहुत सहज नहीं प्रतीत होते । मसलन एक युवा सरदार जी ने अपनी सीट बदल ली थी क्योंकि सामने एक नागा की सीट थी । लेखक की टिप्पणी गौर तलब है ‘शायद उसकी आधी ढकी, भीतर तक भेदती आँखों ने उनके मन के परदे पर हेड हंटिंग, कुकुर भात, और आतंकवाद की कोई हारर फ़िल्म चला दी होगी-----’। उम्मीद पैदा होती है कि इससे अलग तस्वीर लेखक के संस्मरणों से उभरेगी ।
लेकिन दुर्भाग्य से जब लेखक नागालैंड से पाठकों का परिचय कराता है तो उसी फ़िल्म की पुष्टि करता है । वह बताता है ‘यह खुला तथ्य है कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी वेतन का दस प्रतिशत, ग्रेड-2 कर्मचारी 20 प्रतिशत और ग्रेड-1 सेवाओं के अफ़सर न्यूनतम 30 प्रतिशत टैक्स देते हैं । साथ ही अंडरग्राउंड के प्रतिनिधि होने का स्वांग करने वाले लफंगों की वसूली अलग चलती है ।’ फिर ‘1880 की गर्मियों में फ़ौज के लौटने के बाद खोनोमा के 50 लड़ाकुओं ने सात बंदूकें लेकर चार दिन में अस्सी मील मणिपुर के जंगलों में चलकर कछार के बालाधन चाय बागान पर धावा मारा । उन्होंने बगान जला दिया और बगान के मैनेजर मिस्टर ब्लिथ और सोलह मजदूरों के सिर काट ले गए ।’ लेखक के इस वर्णन के बाद आखिर किस वजह से शेष भारत को यह यकीन नहीं होगा कि पूर्वोत्तर में आतंकवाद और हत्या कोई ऐसी समस्या नहीं जिसका समाधान खोजना जरूरी हो वह तो वहाँ के लोगों की आदत में शरीक है । इस तरह के अपुष्ट विवरण पूरी किताब में अनेक जगहों और प्रसंगों में पाए जाते हैं । मसलन मेघालय के आतंकवाद के बारे में लेखक का कहना है ‘दरअसल मेघालय का आतंकवाद आयातित है जिसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है ।--खुफ़िया रपटों के मुताबिक एचएनएलसी (मेघालय का उग्रवादी संगठन) की वसूली का पचहत्तर प्रतिशत हथियारों की कीमत, प्रशिक्षण की फ़ीस और ऐक्शन में विशेषज्ञों के निर्देशन के मूल्य के रूप में एनएससीएन (नागालैंड का संगठन) के पास चला जाता है ।’ इस प्रवृत्ति को महज कुछेक संगठनों तक सीमित मानने की बजाए लेखक एक तरह से समूचे समाज में व्याप्त मानता है जब वह मावलाई में संयोग से पहुँच जाता है और देखता है कि ‘एक बड़ी पुलिया के नीचे नाला बह रहा था । बर्फीले पानी में एक झबरा पिल्ला जान बचाने के लिए जूझ रहा था । किनारे पर कुछ खासी बच्चे थे जो घात लगाकर हर बार उसके किनारे तक आने का इंतजार करते, जैसे ही वह कगार पर चढ़ने को होता एक लकड़ी से पानी में वापस गिरा देते थे । कीचड़ में लथपथ पिल्ला किकियाता तो बच्चे उत्तेजना से चीखते थे ।’ संभव है यह दृश्य लेखक को दिखाई पड़ा हो लेकिन ऐसा वाकया शेष भारत में नहीं घटता इसका दावा कोई नहीं कर सकता । फिर भी लेखक इसे पूर्वोत्तर की मानसिकता के एक नमूने के बतौर पेश करते हैं ।    
इस प्रवृत्ति का विरोध इसलिए जरूरी है क्योंकि ऐसे मिथक मुल्क को पूर्वोत्तर के बारे में गंभीरतापूर्वक सोचने से रोकते हैं । जरूरी है कि पूर्वोत्तर के बारे में इस तरह से सोचने की बजाय यह ध्यान दिया जाय कि सारी दुनिया में चल रही हवा से पूर्वोत्तर भी प्रभावित होता है । l अलगाववाद हो अथवा आतंकवाद दुनिया के अनेक मुल्क इसकी जद में हैं और इनके पैदा होने का दारोमदार कुछ न कुछ हमारी केंद्रीय सरकार पर भी आता है ।
लेखक की भाषा इतनी आकर्षक है कि ये अपुष्ट मिथक खूब आसानी से संप्रेषित हो जाते हैं और सहज चेतना का अंग होकर पूर्वोत्तर के किसी भी मनुष्य को देखते ही वही हारर फ़िल्म चला देने में मदद करते हैं । लेखक अपनी इस काव्यात्मक भाषा का ब्यौरा खुद देता है अपनी डायरी का एक अंश उद्धृत करके ‘ब्रह्मपुत्र में इस सूने, जर्जर, स्टीमर की डेक पर पड़े-पड़े दूर से आते रेडियो के धुंधले, चटख गाने सुनने में अजीब सा सुख है । अचानक सुरों का फौव्वारा फूट पड़ता है, किनारे मंडराते कौवों के शोर में न जाने कहाँ खो जाता है फिर कहीं और उभरता है । यह सुख किसी संगीत समारोह में नहीं मिल सकता । वहाँ प्रतीक्षा, व्याकरण और ढेर सारी ऊब होती है । यहाँ संगीत लहरों में घुल गया है जिसकी लय पर स्टीमर हिल रहा है । दूर एक मोटर बोट का इंजन घरघरा रहा है । एक पतली सी नाव सनसनाती, सूरज में सुराख बनाती घुसी जा रही है ।’ यही रेशमी भाषा दुर्भाग्य से हिंदी के नए कथाकारों में प्रचलित है । यह भाषा भीषण का वर्णन बर्दाश्त नहीं कर पाती और ऐसे प्रसंग आने पर उपमा, रूपक आदि अलंकारों का वितान रचने लगती है । अनिल यादव की इस किताब की शक्ति होने के साथ साथ समस्याओं का बड़ा स्रोत यह भाषा है ।
पत्रकार होने के चलते मीडिया की उपस्थिति से पैदा होने वाले असरात को लेखक ने बखूबी देखा और दर्ज़ किया है । उदाहरण के लिए मेघालय के बारे में हमें पूरी कहानी शुरू होने से पहले ही यह सूचना मिलती है ‘---दरबार तो तीन दिन पहले मोटफ़्रान चौक पर लगा था । आज टी वी चैनल के लिए उसका पुनर्मंचन किया जा रहा था ।’ उस समय मेघालय में जो गोलबंदी चल रही थी उसके बारे में सूचना देते हुए लेखक बताता है पुराने राजा माँग कर रहे हैं ‘भारत सरकार संविधान में संशोधन कर यहाँ की पुरानी राज-व्यवस्था बहाल कर दे क्योंकि वह हर लिहाज से वर्तमान भ्रष्ट और अन्यायी लोकतंत्र से बेहतर पाई गई है ।’ आगे इन राजाओं के तर्क भी लेखक ने प्रस्तुत किए हैं ‘लघु राज्यों के राजा अपने लोगों को समझा रहे थे कि 15 जनवरी 1947 को असम के राज्यपाल अकबर हैदरी और खासी राज्यों के बीच जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक रक्षा, मुद्रा और विदेश मसलों को छोड़कर बाकी सारे मामले उनके अधीन होने चाहिए थे ।’ राजाओं के मुताबिक बाद में इस समझौते का उल्लंघन हुआ और लेखक के अनुसार ‘इस झगड़े का नतीजा यह है कि आज के मेघालय में पारंपरिक, भारत सरकार का और जिला परिषद का- तीन कानून एक साथ चलते हैं, जिनके मकड़जाल में लोग झूलते रहते हैं ।’ इसी तरक एक प्रसंग तब उभरता है जब लेखक बताता है कि उस समय अमिताभ बच्चन के ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में भाग लेने के लिए टेलीफ़ोन से लोग जवाब देते और इसी वजह से नए लड़के टेलीफ़ोन बूथ के बाहर लाइन लगाकर अपनी बारी का इंतजार करते रहते थे । बीमारी की तरह फैले इस नशे में डूबे एक बच्चे को खोजते हुए उसका बाप आया और बच्चे को लाइन में पाकर पीटता हुआ जो बोला वह लोगों की चिढ़ और हास्य से उपजा कमाल का वक्तव्य है ‘जो अपने घर में लगी आग बुझाने की बजाए उस घोड़मुँहे अजनबी के साथ जुआ खेलने जा रहा हो उसके बाल बच्चों के मुँह में तो भगवान भी दाना नहीं डालेगा ।’ इसी तरह जंगल देखने के लिए जब लेखक अरुणाचल जाता है तो गाइड द्वारा रास्ते से बाघ के गुजरने की आशंका जताने पर उसे लगता है कि यात्रा को रोमांचक बनाने की यह तकनीक गाइड ने खोज रखी है ।            
ऐसा नही कि सर्वत्र लेखक ने पूर्वोत्तर का मिथकीकरण ही किया हो । अनेक जगहों पर तो ऐसे प्रसंग हैं जिन पर भरोसा ही नहीं होगा अगर आप पूर्वोत्तर में न रहे हों लेकिन व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूँ कि ऐसी घटनाएँ संभव हैं और वे इन समाजों की विशेषता हैं । उदाहरण के लिए अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट बनवाना पड़ता है जिसके लिए लगी लाइन में लेखक अपनी जगह एक परेशान आदमी को दे देता है तो वह न सिर्फ़ लेखक को अपने घर ले जाता है बल्कि पूरे गाँव में उसे घुमाता है । इसके बाद लेखक को विदा करने सुबह समूचा गाँव सड़क पर आता है । इसी तरह का वर्णन माजुली द्वीप की यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं का है । इनमें से एक साधु की तस्वीर को पेश करते हुए लेखक को उत्तरी भारत के बाबा याद आते हैं ‘(महंत नारायण चंद्र देव गोस्वामी) की हँसी में असामान्य वैराग्य था और बोलने में स्तब्ध कर देने वाली सादगी इस जमाने में भी बची हुई थी । सहज ही मुझे राइफ़लों से घिरे, लंबी गाड़ियों में घूमने वाले, सोने से लदे तुंदियल प्रवचनकारी बाबाओं की याद आई जो यदि वहाँ खड़े होते तो स्वर्ग का टिकट ब्लैक करने वाले लफंगों की तरह नजर आते ।’ लेखक को ये साधु इस हद तक प्रभावित करते हैं कि ‘मैंने खुद को सोचते हुए पाया कि अगर कभी मेरा कोई धर्म हुआ तो वह ऐसा ही सादा, इकहरा और पवित्र होगा ।’ लेकिन इस मामले में भी वह इसे चिन्हित करने से नहीं चूकता कि स्तरों में ऊँची जाती के हिंदुओं के ही प्रवेश ने जनजातियों को इसाइयत की ओर धकेला है । यही निस्संग आलोचनात्मकता कहीं कहीं पुस्तक को सामान्य यात्रा वृत्तों से अलगाती है ।
किन्हीं किन्हीं प्रसंगों में निश्चय ही लेखक को सामान्य लोगों के जरिए राजनीतिक समस्या को बेहतर तरीके से समझने में सहायता मिली है । मसलन जब लेखक आसाम पहुँचा था तो उस समय उल्फ़ा द्वारा बिहारी लोगों की हत्या का दौर चल रहा था । इस मुहिम का कारण समझने के लिए लेखक विद्वानों के बजाए कुछ सामान्य लोगों की राय उद्धृत करता है । दुलू दा नाम के एक सज्जन ने उन्हें बताया ‘अहा बसर एलेक्शन होबो । हत्या खेल में पालिटिक्स है । सब निर्वाचन का खेल है रे भाई टी ।--जो पाल्टी बिहारी भगाने का सपोर्ट करेगा उसको देसी, विदेसी सब मुसलमान सपोर्ट करेगा ।’ इसी तरह का दूसरा आदमी लेखक को बताता है ‘बिहारियों ने यहाँ आकर अपनी मेहनत से खेत, मकान, दुकान बना लिया है । असमिया को लगने लगा है कि ये भुच्चड़ असम को हड़प कर बिहार बना डालेंगे ।’
इसी तरह कहीं कहीं लेखक सतह के नीचे की ताकतों को भी पहचाना है । मसलन चाय बागान के अर्थतंत्र की ताकत का सबूत देते हुए वह कहता है ‘वसूली हद से ज्यादा बढ़ने पर यह चाय लाबी ही थी जिसने प्रफुल्ल महंत की सरकार गिरा दी थी और “आपरेशन बजरंग” का तानाबाना तैयार किया था ।’ लेखक ने मणिपुर के नौजवानों की बेरोजगारी का मार्मिक दृश्य प्रस्तुत किया है ‘मुँह बाँध कर रिक्शा चलाना इम्फाल के पुराने फैशनों में से एक था जिसकी शुरुआत उच्चशिक्षा प्राप्त लड़कों ने शर्म ढकने के लिए दो दशक पहले की थी ।’ लेखक को मणिपुर में एक लड़की मिलती है जो ‘मानने को राजी नहीं थी कि पूर्वोत्तर में एड्स साझे की सूइयों से फैला है । उसने कहा, नशे के व्यापारी पहले लड़कियों को लत लगाते हैं फिर एक पुड़िया फ़ीस वाली वेश्या बना देते हैं । बीमारी वहाँ से फैलती है ।’ शिलांग में लेखक को एक ड्राइवर बताता है कि ‘शिलांग के अंडर ग्राउंड मार्केट में येलो केक (यूरेनियम) बिकने आया’ है ।  कुल मिलाकर लेखक को अपनी अराजक जीवन शैली के गौरवान्वयन और पूर्वोत्तर के मिथकीकरण के बावजूद कहीं कहीं समस्या की गंभीरता को समझने में एक हद तक सफलता मिली है । किन्हीं जगहों पर वे पूर्वोत्तर की अंदरूनी समस्याओं को भी बेहतर तरीके से उभारते हैं । लेकिन वे इस क्षेत्र में केंद्र सरकार के अपराधों पर परदा भी डालते दिखाई पड़ते हैं ।      

Tuesday, September 4, 2012

बल्ली भाई : एक कवि एक योद्धा


   (बल्ली सिंह चीमा के साठ साल होने पर जो स्मारिका छपेगी उसके लिए ये टिप्पणी लिखी है )          
                                                               
अस्सी का दशक हिंदी में नए किस्म के कवियों की फ़ौज की आमद के लिए जाना जाएगा जिनकी कविताएँ छपने से पहले ही लोगों की जुबान पर चढ़ गईं । बल्ली सिंह चीमा इसी फ़ौज के उम्दा सिपाही हैं । बल्ली भाई के साथ ही इनमें थे अदम गोंडवी, राम कुमार कृषक, गोरख पांडे और अनेकानेक ऐसे कवि जिनकी कविता के लिए, राम विलास जी ने जो बात नागार्जुन के लिए कही वही बात हम कह सकते हैं कि इनकी कविताओं में लोकप्रियता और कला का मुश्किल संतुलन सहज ही सधा हुआ है । देखा तो बल्ली भाई को बहुत बाद में लेकिन एक पतली सी किताब ‘खामोशी के खिलाफ़’ के जरिए पहला परिचय बेहद पहले तकरीबन 1980 में ही हो गया था ।
इन कवियों में क्या है जो साझा है, इसकी तलाश करते हुए हमें राजनीतिक संदर्भ देखने होंगे क्योंकि तकरीबन ये सभी कवि राजनीतिक हैं और किसी न किसी तरह से वामपंथ की क्रांतिकारी धारा से जुड़े हुए हैं । आपातकाल के बाद जो नया राजनीतिक वातावरण बना उसकी एक सचाई अगर जनता पार्टी की सरकार का बनना है तो दूसरी और ज्यादा प्रासंगिक सचाई प्रतिरोध की ऐसी ताकतों के खामोश संघर्षों की छिपी हुई खबरों का सामने आना है जो सतह पर नहीं तैर रही थीं । ये ताकतें देश भर में फैले हुए नक्सलवादी कार्यकर्ता थे जिन्हें पुलिस ने फ़र्जी मुठभेड़ों और गैर कानूनी नजरबंदी में यंत्रणा देकर मार डाला था । आपातकाल के बाद बने वातावरण में इस आंदोलन की उपस्थिति एक जीवंत प्रसंग की तरह रही और उसी दौर में इस तीसरी धारा का हस्तक्षेप भारत के राजनीतिक पटल पर क्रमश: बढ़ता गया । भाकपा (माले) से जुड़े हुए जन संगठनों का उदय हुआ और बिहार के क्रांतिकारी किसान आंदोलन में इसे ठोस अभिव्यक्ति मिली । यही वातावरण इन कवियों के उभार और उनकी कविता की लोकप्रियता को समझने की कुंजी है ।
वह दौर ऐसा था कि सहज ही कुछ प्रतीक नई अर्थवत्ता के साथ उभर आए । उदाहरण के लिए भगत सिंह शुरू से ही क्रांति के प्रतीक रहे थे लेकिन उस समय एक ही साथ गोंडा, बनारस, इलाहाबाद और उत्तर प्रदेश के छोटे छोटे कस्बों तक में उनका शहादत दिवस मनाया जाने लगा । उस दौर में कांग्रेसी सत्ता के विरुद्ध लड़ रही ताकतों ने भगत सिंह के प्रतीक में एक नया अर्थ भरा और उनके बहाने आज़ादी की लड़ाई की इकहरी तस्वीर को चुनौती दी । यह तस्वीर शासकों की सुविधा के लिए निर्मित की गई थी । भगत सिंह गांधी की समझौतावादी नीति, जिसका मुखौटा अहिंसा थी, के विरुद्ध क्रांतिकारी धारा के रहनुमा के बतौर पेश किए गए । उसी दौर में गुरुशरण सिंह का नाटक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ लोकप्रिय हुआ जिसका मुख्य प्रतिपाद्य आज़ादी की लड़ाई का यही द्वंद्व था । बल्ली सिंह चीमा की मशहूर गज़ल के एक शेर ‘बो रहे हैं अब बंदूकें लोग मेरे गाँव के’ में बंदूकें बोने वाले गाँव के लोगों की तस्वीर के पीछे उनके अपने समय में सशस्त्र संघर्ष करने वाले किसान तो हैं ही, भगत सिंह की बचपन की वह कथा भी है जिसमें पिता से वे बताते हैं कि खेत में बंदूक बो रहा हूँ । इसी समझ को स्वर देते हुए वे एक शेर में कहते हैं:
       ‘हम नहीं गांधी के बंदर ये बता देंगे तुम्हें,
       हर युवा को भगत सिंह, शेखर बनाना है हमें।’ 
किसान आंदोलनों की आँच के कारण स्वाभाविक था कि इन कवियों की कविताओं में ग्रामीण माहौल और मजदूर-किसान उपस्थित हों । लेकिन इनके गाँव मैथिलीशरण गुप्त के ‘अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका जी चाहे’ के आदर्शीकरण से पूरी तरह अलग और सामंती बंधनों के नीचे कराहते और उसे बदलने की कोशिश करते हुए चित्रित हैं । ये गाँव उनके तईं एक वैपरीत्य रचने में सहायक हैं सुख के द्वीपों के बरक्स दुख के सागर:
         ‘सवेरा उनके घर फैला हुआ है,
           अँधेरा मेरे घर ठहरा हुआ है।’
गाँव के किसान इन बंधनों को चुपचाप बर्दाश्त करने की बजाए उसके विरुद्ध विद्रोह करते हुए दिखाए गए हैं । एक गज़ल के शेर तो प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ का मानो पुनर्पाठ करते हैं:
        ‘अब भी होरी लुट रहा है अब भी धनिया है उदास,
         अब भी गोबर बेबसी से छट्पटाएँ गाँव में।’
गाँव के लोगों के सामंती उत्पीड़न में गुलामी के समय से कोई खास फ़र्क नहीं आया है इसे भी चिन्हित करने के लिए वे इसी उपन्यास का सहारा लेते हैं:
         ‘अब भी पंडित रात में सिलिया चमारन को छलें,
          दिन में ऊँची जातियों के गीत गाएं गाँव में।’
यह चित्रण स्वाभाविक रूप से सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए संघर्षरत दलित जातियों के लिए हालात बदलने की प्रेरणा बन जाता है ।

इन सभी कवियों ने गज़ल को नए ढाँचे में ढालकर अपनी बात कही है । हिंदी कविता की परंपरा से परिचित लोग जानते हैं कि गज़ल का प्रतिरोध के लिए उपयोग कोई नई बात नहीं है । दुष्यंत कुमार ने बहुत पहले इस विधा का सृजनात्मक उपयोग मारक व्यंग्य के साथ राजनीतिक संदेश देने के लिए किया था । एक जगह वे दुष्यंत के मुहावरे का उपयोग करते हुए भी उनसे आगे जाने का संकेत करते हैं:
         ‘इस जमीं से दूर कितना आसमाँ है,
          फेंककर पत्थर मुझे ये देखना है।’
बल्ली सिंह चीमा ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सहज खड़ी बोली में ऐसी सफलता के साथ गेय गज़लें लिखीं कि वे लोगों की जुबान पर न सिर्फ़ चढ़ गईं बल्कि अनेकशः उनका नारों की तरह इस्तेमाल भी किया गया । कविता की लोकप्रियता का प्रमाण अगर स्मृति में उसका बैठ जाना है तो बल्ली भाई की गज़लें इसका प्रतिमान हैं ।
उन्होंने अपने अन्य सहधर्मियों के साथ जो गज़लें और गीत लिखे उनके जरिए आपातकाल के बाद का समूचा राजनीतिक इतिहास अपनी गतिमयता के साथ समझा जा सकता है । मसलन उनके इस शेर को पढ़ते ही गोरख के गीत ‘बोलो ये पंजा किसका है’ की याद आ जाती है:
        ‘तुम तो कहते थे हैं उनके कर कमल,
        देख लो वो हाथ खंजर हो गया।’
व्यंग्य की एक मिसाल उनकी ये पंक्तियाँ हैं जिनमें वे दमन की सरकारी भाषा का मज़ाक उड़ाते हैं:
       ‘रोटी माँग रहे लोगों से किसको खतरा होता है,
       यार सुना है लाठी चारज हलका हलका होता है।’
लेकिन अन्य कवियों के मुकाबले बल्ली सिंह चीमा की कविताओं में व्यंग्य से अधिक आक्रोश दर्ज़ हुआ है । जैसी सहज दृढ़ता बल्ली भाई के भीतर मिलने पर नजर आती है वैसी ही सहज दृढ़ता उनकी कविताओं के भीतर समा गई है । आसानी से लेकिन मजबूती से उनकी कविता बड़ी बात कह जाती है:
       ‘तेलंगाना जी उठेगा देश के हर गाँव में,
       अब गुरिल्ले ही बनेंगे लोग मेरे गाँव के।’         

Monday, September 3, 2012

हिंदी अनुवाद की भूमिका


(एंथनी ब्रेवेर की किताब का हिंदी अनुवाद मैंने किया है जो ग्रंथशिल्पी प्रकाशन से 'साम्राज्यवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत' शीर्षक से छपेगी। उसके लिए अमर फ़ारूक़ी ने अलग से भूमिका लिखी है। प्रस्तुत लेख उसी का हिंदी अनुवाद है।)    
            
साम्राज्यवाद का इतिहास कैरिबियाई सागर में क्रिस्टोफर कोलम्बस के (1492) और हिंद महासागर में वास्को डि गामा के (1498) प्रवेश से शुरू होता है । पहली घटना का परिणाम अमरिकी महाद्वीप की विजय था तो दूसरी घटना का नतीजा एशिया और अफ़्रीका के अनेक हिस्सों की गुलामी निकला । सन 1500 के बाद की लगभग तीन सदियों तक स्पेन, पुर्तगाल, नीदरलैंड, इंग्लैंड और फ़्रांस वे प्रमुख यूरोपीय देश थे जो गैर यूरोपीय मुल्कों में उपनिवेश कायम करने में लगे रहे । स्पेन और पुर्तगाल सोलहवीं सदी की प्रमुख औपनिवेशिक शक्ति थे । वर्तमान संयुक्त राज्य (अमरीका) के दक्षिण के समूचे अमरीकी महाद्वीप को उन्होंने आपस में बाँट लिया (पुर्तगाल के मुकाबले स्पेन का प्रभुत्व अमरीका में अधिक विस्तृत था) । दुनिया के जिस हिस्से को लैटिन अमरीका कहा गया वह उन्नीसवीं सदी के पूर्वाध तक प्रत्यक्ष यूरोपीय शासन के मातहत रहा । एशिया में चीन से लेकर फारस की खाड़ी तक पुर्तगाल के अनेक उपनिवेश थे । सत्रहवीं सदी में इनकी जगह डच (नीदरलैंड) ने ले ली । सन 1600 आते आते एशिया और यूरोप के बीच उत्तमाशा अंतरीप के रास्ते होने वाले समुद्री व्यापार पर डच ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार हो गया । उस समय एशिया और यूरोप के बीच व्यापार मुख्य रूप से एशियाई गोल मिर्च (और लौंग, जायफर और जावित्री जैसे कुछ अन्य मसालों) का था । एशिया के आपसी व्यापार पर भी डच कंपनी का ही दबदबा था । पुर्तगाली और डच लोगों ने अपनी प्रभुता को स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर हिंसा का सहारा लिया । बहुत ही कम कीमत पर (या मुफ़्त) माल प्राप्त करने के लिए और एशिया में समुद्री व्यापार का पारंपरिक व्यावसायिक जाल तोड़ देने के लिए वे अपनी उन्नत सैन्य शक्ति का सहारा लेते थे । चूँकि इंडोनेशिया में भी मसालों का उत्पादन होता था इसलिए डचों ने उस क्षेत्र में उपनिवेश बनाये । जिस डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्रहवीं सदी की शुरुआत में उत्तमाशा अंतरीप (आज के दक्षिण अफ़्रीका में) पर कब्जा किया था उसी ने यूरोपीय प्रवासियों को अंतरीप के इर्द गिर्द फ़ार्मिंग शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया और इस तरह दक्षिण में गोरों के उपनिवेश बनने और स्थानीय लोगों पर उनकी जीत की प्रक्रिया शुरू हुई ।
अठारहवीं सदी की शुरुआत में फ़्रांस और इंग्लैंड बड़ी औपनिवेशिक ताकतों के रूप में उभरे । सौ साल तक दोनों दुनिया पर प्रभुत्व के लिए लड़ते रहे जो नेपोलियन के युद्ध कहे जाते हैं । नेपोलियन की हार के साथ सौ साल के लिए इंग्लैंड की बढ़त की गारंटी हो गयी । 1815 से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध के छिड़ने तक अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवादी अर्थतंत्र पर बिटेन ही हावी रहा । इस युग में ब्रिटेन की नौसैनिक ताकत को चुनौती देने वाला कोई नहीं था जिसकी वजह से वह विशाल साम्राज्य को बना और टिका सका । बहरहाल अंतत: बिटेन के अर्थतंत्र ने उसे दुनिया की प्रधान औपनिवेशिक शक्ति बना डाला । अठारहवीं सदी के मध्य से शुरू हुए इंग्लैंड के उद्योगीकरण ने उसे दुनिया का सबसे आगे बढ़ा हुआ अर्थतंत्र बना दिया । यह निरा संयोग नहीं कि औद्योगिक क्रांति के पहले चरण को उसी दौर में (1760-80) गति मिली जब अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल (और बिहार और उड़ीसा के कुछ हिस्सों) को जीता । प्लासी (1757) और बक्सर (1764) की लड़ाई ने कंपनी को भारत की बड़ी भूभागीय ताकत बना दिया । कंपनी के कर्मचारियों ने जहाजों में भर कर बंगाल की प्रत्यक्ष लूट का माल तो इंग्लैंड भेजा ही, पूर्वी भारत के राजस्व ने कंपनी को इस लायक बना दिया कि वह इस राजस्व का प्रयोग करके घरेलू बाज़ार में सूती वस्त्रों की खपत के लिए कच्चा माल खरीद ले और बदले में कोई कीमती धातु भारत न लाये । इस तरह भारत से इंग्लैंड को कर की निरंतर अदायगी का प्रवाह शुरू हुआ । सोलहवीं सदी से जारी अटलांटिक गुलाम व्यापार में फ़्रांस और ब्रिटेन की भागीदारी (अफ़्रीका से पकड़े गये गुलाम अटलांटिक को पार कर गन्ने, तंबाकू और कपास के प्लांटेशनों पर काम करने के लिए अमरीकी महाद्वीप लाये जाते थे) से भी इन देशों के अर्थतंत्र को बेहिसाब मुनाफ़ा हुआ ।
1870 दशक से ब्रिटेन के आर्थिक दबदबे को जर्मनी और अमरीका से चुनौती मिलने लगी । दोनों का उद्योगीकरण तेजी से उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ । अमरीकी गृहयुद्ध (1861-65) में अधिक विकसित उत्तरी राज्यों की जीत ने अमरीकी अर्थतंत्र के विकास को तीव्र कर दिया और 1871 में जर्मनी के राजनीतिक एकीकरण ने उसे तेजी से यूरोप में इंग्लैंड का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बना दिया । 1900 आते आते अमरीका दुनिया का अगुआ औद्योगिक मुल्क बन गया । यहाँ इस बात पर जोर देना होगा कि जिन देशों का उद्योगीकरण बाद में हुआ उनका आर्थिक विकास ब्रिटेन से कुछ अलग तरीके से हुआ । ब्रिटेन के उद्योग पर लंबे समय तक छोटे और मँझोले स्तर के व्यवसायियों का दबदबा रहा जो गलाकाटू होड़ के माहौल में काम करते थे । दूसरी ओर जर्मनी जैसे अर्थतंत्र होड़ या छोटे पैमाने का व्यवसाय नहीं झेल सकते थे क्योंकि उन्हें इंग्लैंड की बराबरी करनी थी । जर्मन उद्योग बड़े पैमाने के उद्योगीकरण की शुरुआत से ही बड़े व्यवसायियों के कब्जे में था । ये उद्यम अपने व्यवसाय के लिए अक्सर राज्य पर निर्भर रहते थे । उन्हें जो अनेक ठेके मिलते वे हथियारों के उत्पादन से जुड़े होते थे । ब्रिटेन के मामले में उद्योग को राज्य का समर्थन अप्रत्यक्ष था । एडम स्मिथ जैसे बुर्जुआ अर्थशास्त्री आर्थिक प्रक्रियाओं में राजकीय हस्तक्षेप के खिलाफ़ थे । उन्होंने माना कि बाज़ार निर्वैक्तिक और तार्किक रूप से काम करता है और आदर्श स्थितियों में समाज के अबाध विकास की गारंटी करता है । 1860 दशक तक मुक्त व्यापार पर आधारित प्रतियोगितापरक पूँजीवाद ब्रिटिश अर्थतंत्र की विशेषता था । बाद में उद्योगीकृत होने वाले देशों के अर्थतंत्र में शुरू से ही इजारेदारी की प्रवृत्ति दिखायी पड़ने लगी थी । आम तौर पर 1870 दशक से 1890 दशक के बीच ही पश्चिमी अर्थतंत्रों में इजारेदारी (अर्थात अर्थतंत्र के किसी सेक्टर में कुछ बड़े उद्यमों का दबदबा) व्यापक हुई । अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवादी अर्थतंत्र में 1873 से 1895 तक चलने वाली मंदी ने इजारेदारी की प्रक्रिया को त्वरित कर दिया क्योंकि बड़ी संख्या में उद्योग मजबूरन या तो बंद हुए या अधिक सफल व्यवसायियों को बिक गये जिससे बाज़ार में कम ही उद्योग रह गये । इस प्रक्रिया ने इजारेदारी की प्रवृत्ति को मजबूत किया ।
नयी औद्योगिक ताकतों के उदय के साथ ही उपनिवेशों के लिए होड़ तेज हो गयी । अफ़ीकी महाद्वीप का उपनिवेशीकरण, जिसको ‘अफ़्रीका की छीनाझपटी’ कहा जाता है, 1875 से 1900 के बीच पूरा हो गया । अमरीका ने 1890 दशक से, शुरू में स्पेन की कीमत पर, कैरिबियाई और पूर्वी एशियाई देशों में उपनिवेश कायम करना शुरू किया । रूस भी इटली और बेल्जियम के साथ, मध्य और पूर्वी एशिया में अपना भूभागीय नियंत्रण बढ़ाकर, उपनिवेशों की इस दौड़ में शामिल हो गया । तुर्की और चीन का विभाजन किया जा रहा था । और बीसवीं सदी के पहले दशक तक जापान ऐसे उद्योगीकृत देशों की सूची में शामिल हो गया जो कब्जाने के लिए उपनिवेश तलाश रहे थे । दूसरे देशों के भूभाग कब्जाने की इच्छा, बाज़ार और कच्चे माल की जरूरत के चलते बढ़ गयी । कभी कभी सीधे कब्जे की बजाए ‘अनौपचारिक’ नियंत्रण बेहतर समझा जाता था (मसलन चीन और अर्जेंटिना में) । साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच तनाव बढ़ने से झगड़े पैदा हुए जिनके चलते प्रथम विश्वयुद्ध हुआ । इस युद्ध में जर्मनी का एक मकसद ब्रिटेन और फ़्रांस को कुछ उपनिवेश छोड़ने के लिए मजबूर करके एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमरीका का पुनर्विभाजन करना था ।
उपनिवेशों के लिए इस अंधी दौड़ और उन्नीसवीं सदी के अंत में पूँजीवाद द्वारा प्रदर्शित कुछ नयी विशेषताओं की पृष्ठभूमि में एक सैद्धांतिक प्रश्न के रूप में साम्राज्यवाद का विश्लेषण शुरू हुआ । साम्राज्यवाद की उदारवादी और मार्क्सवादी आलोचना बीसवीं सदी के शुरुआती दो दशकों में कमोबेश साथ साथ ही उभरी । विचारधारा के बतौर उन्नीसवीं सदी का उदारवाद आम तौर पर मुक्त व्यापार, प्रतियोगी पूँजीवाद, आर्थिक मामलों में राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप और मताधिकार के विस्तार के जरिए जनवादीकरण से प्रतिबद्ध था । अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवादी अर्थतंत्र में जब तक ब्रिटेन का बोलबाला रहा तब तक मुक्त व्यापार का सिद्धांत कोई समस्या नहीं था जिसका मतलब था दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बाज़ारों और कच्चे माल के स्रोतों तक ब्रिटेन की अबाध पहुँच । लेकिन जर्मनी और अमरीका जैसे प्रतियोगियों के उभार के बाद इस धारणा को बनाए रखना कठिन हो गया । ब्रिटेन में उदारवादियों के भी एक हिस्से की ओर से माँग होने लगी कि बाहर से आने वाली निर्मित वस्तुओं पर कराधान के जरिए स्थानीय उद्योग को संरक्षण दिया जाए । इसी तरह जर्मनी और अनेक नव उद्योगीकृत देशों ने कराधान के ऐसे ढाँचे विकसित किये जिनका मकसद अपने नवजात उद्योगों की रक्षा करना था । राजनीतिक अर्थशास्त्रियों ने मुक्त व्यापार की धारणा पर लगातार हमला किया । यह तो उदारवादी चिंतकों का भी सरोकार था जो प्रतियोगी पूँजीवाद के लिए इजारेदारियों द्वारा पैदा किए गए खतरे से परेशान थे । इन चिंतकों के सामने यह बात स्पष्ट थी कि उपनिवेशों के लिए अंधी दौड़ और पूँजीवाद में विकसित नयी, नकारात्मक प्रवृत्तियों में घनिष्ठ रिश्ता है । उन्हें किसी वजह से भरोसा था कि ऐसा पूँजीवाद संभव है जो ‘अच्छा’ हो । इसी ऐतिहासिक संदर्भ में हाब्सन की किताब इंपीरियलिज्म : ए स्टडी (1902) लिखी गयी । हाब्सन की किताब को साम्राज्यवाद की पहली गंभीर उदारवादी आलोचना माना जा सकता है । जल्दी ही साम्राज्यवाद की मार्क्सवादी समझ भी तीन बुनियादी किताबों के जरिए सामने आई : रूडोल्फ़ हिलफ़रडिंग की फ़ाइनेंस कैपिटल (1910); रोजा लक्जेमबर्ग की द एकुमुलेशन आफ़ कैपिटल (1913) और द एकुमुलेशन आफ़ कैपिटल : ऐन एंटी क्रिटीक (1915 में लिखित); और वी आई लेनिन की इंपीरियलिज्म : द हाइएस्ट स्टेज आफ़ कैपिटलिज्म (1916) । हालाँकि इस समझ के निशान उपनिवेशवाद की मार्क्स की आलोचना में खोजे जा सकते हैं लेकिन हिलफ़रडिंग, लक्जेमबर्ग और लेनिन की कोशिश इजारेदारियों के विकास की पृष्ठभूमि में, जिसके चलते साम्राज्यवादी शत्रुता में तेजी आयी थी, मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य से साम्राज्यवाद को सैद्धांतिक तौर पर परिश्रमपूर्वक समझने की थी । बाद का तकरीबन समूचा मार्क्सवादी लेखन, अगर इनकी आलोचना हो तो भी, इन अगुआ किताबों से प्रेरित रहा है ।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उदारवादी विचारधारा में घटोत्तरी बुर्जुआ चिंतकों द्वारा साम्राज्यवाद की आलोचना के प्रति अनिच्छा में प्रतिबिंबित हुई । इस दौर में इस मुद्दे पर उदारवादी मत को गहराई देने वाला एकमात्र लेखन जोसेफ शूम्पीटर का लंबा लेख ‘द सोशियोलोजी आफ़ इंपीरियलिजम्स’ (1919) ही कहा जा सकता है । मार्क्सवादी बौद्धिक परंपरा में इस मुद्दे पर गहरी बहसें हुईं जो आज भी जारी हैं । आज जबकि मार्क्सवादी खासकर सोवियत संघ के पतन के बाद पूँजी द्वारा अपने प्रभुत्व को कायम रखने की नयी रणनीतियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं तब उनके बौद्धिक प्रयासों में अंतर्निहित विचारों को जानना ज्यादा जरूरी है । एंथनी ब्रेवेर की किताब मार्क्सिस्ट थियरीज आफ़ इंपीरियलिज्म को लंबे समय से इस विषय की सर्वोत्तम प्रवेशिका माना जाता रहा है । इसमें कुछ अत्यंत जटिल मुद्दों और कठिन धारणाओं को स्पष्ट रूप से समझाया गया है जिनका अवगाहन साम्राज्यवाद संबंधी मार्क्सवादी चिंतन की विभिन्न धाराओं को समझने के लिए जरूरी है । ब्रेवेर की किताब को हिंदी में सुलभ कराने वाले इस अनुवाद के जरिए बड़े पाठक वर्ग को मौका मिलेगा कि वह इस क्लासिकल अध्ययन के सहारे साम्राज्यवाद संबंधी मार्क्सवादी सिद्धांतों को अधिक आत्मविश्वास के साथ देखे ।