Monday, June 13, 2011

अनिल कुमार बरुआ के लिए


आप मेरी आत्मा में बदल गये हैं और एकदम अकेले में ही आपसे बातचीत करने में सक्षम हूँ । आप अपने होने से एक संतोष थे और न होने से अजीब किस्म की बेचैनी बन गए हैं । आपके नाम और हमारी पार्टी के बीच एकदम तदाकारता थी ।

मेरी छवि में आप एक खूबसूरत फ़ोटोग्राफ़ रहे, फिर मुझे लगता है कि मैंने दिल्ली में आपको देखा था । लंबे, मोटे, गोरे, मोटे शीशे का चश्मा पहने- मत कहिए कि आप ऐसे नहीं थे । अपने इस विश्वास को मैं खंडित नहीं होने देना चाहता कि मैं आपसे मिला हूँ ।

गोलियाँ, सिर्फ़ गोलियाँ । मुझे नहीं लगता कि भारतीय इतिहास के किसी मोड़ पर गोलियों ने इतना अधिक खून पिया होगा । लोग कहेंगे कि यही इतिहास की प्रसव वेदना है लेकिन यह शब्द इस घड़ी के लिए कितना छोटा है । टुकड़े टुकड़े हिंदुस्तान बंजर हो रहा है । छत्तीसगढ़, बंबई, सीवान, रोहतास, डिब्रूगढ़- लोग कहेंगे ये जिले हैं लेकिन आस्था के आधारों का टूटना बहुत बड़ी क्षति है ।

आपका प्रांत बहुत खूबसूरत था न? था- अजीब है । एक आदमी जिस धरती पर पैदा होता है, बड़ा होता है वह उसके लिए साँस की तरह होती है । मेरे लिए तो आप ही असम थे । मैं भारतीय हूँ लेकिन कितना दुर्भाग्यशाली कि इसके बीसियों प्रांतों में से कुल चार पाँच ही देख पाया हूँ । देखना भी क्या देखना । लेकिन केवल देखने से भी देशवासी होने की तमीज पैदा होती है । तो कलकत्ता तक गया । आपके यहाँ न जा सका ।

लोग लोग लोग असंख्य लोग । जीने के लिए लड़ते हुए । फिर उनका एक छोटा सा हिस्सा थोड़ा बाहर निकला तो हर जगह अपरिचय अपमान । ऐसे ही लोगों के भीतर से उनका नेतृत्व निकलता है । फूल की खुशबू की तरह । कैसे कहूँ- यह उनके बीच भी होना है और उनके आगे होना भी ।

देश के एक सीमाप्रांत में एक ऐसे राज्य में जो अधिकांश लोगों के लिए संस्कृति मात्र है बड़ा खतरनाक है यह शब्द ठीक लज्जा की तरह अत्यधिक रोमांटिकता सिर्फ़ इसलिए भरता है ताकि मनुष्य को गायब कर दे तो ऐसी जगह आदमी की क्रोध की भाषा को विकसित करने के संघर्ष के आप नामाराशि थे । इतने दिनों से आपका नाम सुनता आ रहा था कि याद भी नहीं आ रहा कि कब पहली बार सुना ।

मैं आपसे पहली बार बात नहीं कर रहा हूँ अंतिम बार भी नहीं कर रहा हूँ । अभी बहरहाल सैकड़ों ऐसे लोग हैं और कहूँ तो रोज पैदा भी हो रहे हैं कालोह्यं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी लेकिन अब तार जब एक बार टूट जाता है तो फिर जोड़ने में----बहुत मुश्किल है । एकदम नहीं कोई भी एक आदमी दूसरे में नहीं बदल सकता । मनुष्य इररिप्लेसेबल है । अगर हालात यही रहे कामरेड तो हो सकता है कुछ दिनों में अधिकतर लोग जीवित लोगों से बात ही न कर पायें केवल मृतात्माओं से ही उनका संवाद संभव रह जाय ।

Sunday, June 12, 2011

चंद्रशेखर के लिए


अंबेडकर, गांधी, लोहिया, जयप्रकाश की कौन बात करे विवेकानंद भी वहीं खड़े थे जहाँ वह हत्या हुई । स्वतंत्रता आंदोलन के शरीर तो शरीर आत्मा तक के ध्वंस पर वह हत्या हो रही थी । उसके बाद से अपना प्रेम और अपनी नफ़रत बहुत कीमती हो गये हैं । सही सही पहचान हो कि किसको देखकर बोला भी न जाय तो किसी को देखकर हृदय के उमड़ आने की क्षमता पैदा हो जाती है ।

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मौत हमारे जीवन में कई तरह से प्रवेश करती है । लंबी बीमारी के बाद बूढ़ों के क्रमशः ठंडे होते हाथ पाँव के जरिए । और कभी एक बच्चा है, उसकी गेंद कोलतार की सड़क के बीचोबीच पहुँच गयी । एकदम तने हुए धनुष के तीर की तरह वह छूटा । तभी बिजली की तेजी से आती हुई मारुती कार से टकराकर गुड्डे की तरह उछला और बस । मुँह से गाढ़े लाल रंग के पेंट की एक लकीर रिसने लगती है । कोई और हरकत नहीं । ऐसे भी । पता नहीं क्या होता है ठीक मौत के पहले- शायद एक अकल्पनीय बेचैनी और फिर एक अनंत काली चादर सी विश्रांति- पता नहीं । लेकिन मृत्यु एकदम अप्रत्याशित ढंग से आ जाय तो? पता नहीं । चिता पर लाश को डाल दीजिये । कपड़े भभक उठते हैं । रोहन डिसूजा का कुर्ता कि पिता की शर्ट? सब पहचान खत्म । कपड़ा खत्म । एक झोंका आग का और बाल चिरचिराकर स्वाहा । रोज कंघी से सँवारो । मारकंडेय सिंह के सुरक्षा कर्मियों ने इसी को पकड़कर हिलाया था तो तकिये पर गुच्छे की तरह गिरते थे । और झड़ने से बचाने के लिए दवा खरीदी । समाप्त । धीरे धीरे शरीर तथ्य हो जाता है । भावनायें अलग । फिर चिता से बाहर लटकता पाँव चट से टूटकर गिरनेवाला हो तो बाँस से उसे उल्टा तोड़कर फिर से चिता में फेंक दो । सूँ सूँ, सर टूटा- भड़ाक । लंबा इंतजार । धीरे धीरे एक आदमी भस्म हो जाता है ।

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यह भारतीय राष्ट्र की एकता थी जो स्टेनगन और सेल्फ़ लोडिंग राइफ़ल से पहचानी जाती थी । गोली चली सीवान में और आवाज दिल्ली में सुनाई पड़ी । ये अचानक बदन पर इतने धक्के क्यों लग रहे है? और हाथ स्वतः किसी सहारे के लिए उठ जाते हैं लेकिन चेतना लुप्त होती जा रही है । ये हो क्या रहा है? पता नहीं ।

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एक तथ्य के अतिरिक्त यह हत्या जनतंत्र की विफलता थी । किसी ने कहा है कि सबकी स्वतंत्रता की हद दूसरे की नाक है । इस जमाने में नाकें इतनी लंबी हो गई थीं कि जगह जगह बेवजह टकराने लगीं । बीच की जगह एकदम सिकुड़ गई और धार की तरह खून गिरने लगा, भेजा बिखरने लगा । यह खून जगह जगह कतरा कतरा गिरा था, तब भी बहुत बच गया था । धारा की तरह यहीं गिरा और जम गया । शायद यह मजनू का कटोरा था । इधर उधर किसी ने उसे गले लगाने की हिम्मत ही नहीं की । कल्पना ने अंततः हिम्मत की लेकिन जैसे हाथ काँप गया हो और सब कुछ खत्म । लेकिन खत्म कैसे? जिस देश में सभी अंतर्विरोध हत्या से ही हल हो रहे हों वहाँ अस्सी करोड़ रहते हैं लोग; और अभी तो आने वाले बच्चे भी हैं । उनकी फ़िक्र भी तो है ।

Sunday, May 22, 2011

मोबाइल महिमा


मेरे कुछ मित्र आजकल मोबाइल से त्रस्त होने का सुख उठा रहे हैं । उनका कहना है कि मोबाइल उन्हें चैन नहीं लेने देता । जो चैन नहीं लेने देता अर्थात सरकार उसकी तो चाकरी में कोई दिक्कत नहीं । मोबाइल ने मनुष्यों को उनकी जिंदगी में दाखिल कर दिया है और इससे उन्हें कठिनाई हो रही है । सोचता रहा कि आखिर तब वे मोबाइल फेंक क्यों नहीं देते लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि ब्लैकबेरी का मोबाइल स्टेटस बनाने के भी काम आता है । वे इससे त्रस्त होने का रोना रोते रहेंगे बस । यह उदारीकरण से पैदा हुए उपभोक्तावादी मध्यवर्ग में बुद्धिजीवियों के भी शामिल हो जाने का संकेत है ।

ये लोग अपने लिए तो सारी सुविधा और ध्यान की अपेक्षा करते हैं लेकिन लोगों से थोड़ी दूरी बनाकर रखना चाहते हैं । वे चाहेंगे कि उनकी बात फ़ोन, टी वी, अखबार सबके जरिए सुनी जाय लेकिन उन्हें किसी और की बात न सुननी पड़े । चिंताजनक है इस बुद्धिजीवी वर्ग का विकास क्योंकि इतना मानवद्रोह और अहंकार उन्हें कल लोगों से दूर कर देगा तो फिर इस शिकायत का वक्त भी नहीं रह जायेगा कि लोग उनकी बात नहीं सुन रहे हैं ।

Thursday, May 19, 2011

लोकतंत्र के नये पहरुए


पहले लोकतंत्र विशेष्य हुआ करता था और इसके पहले कोई विशेषण लगाया जाता था । आजकल विशेषण विहीन होकर यही विशेषण बन गया है । बुर्जुआ बुद्धिजीवी इसके पहले संसदीय तो वामपंथी पूँजीवादी का विशेषण लगाया करते थे । अब पूँजीवाद और संसद दोनो पर्यायवाची हो गये हैं और एक के अदृश्य होते ही दूसरा भी अदृश्य हो गया है । अब लोकतंत्र के विशेषण होने से लोकतांत्रिक राजनीति आदि की चर्चा और चिंता की जाती है ।
इसके एक पहरेदार तेल के कारण इसे पसंद करते हैं । तेल का एक पर्यायवाची स्नेह भी है इसलिए कह सकते हैं उन्हें लोकतंत्र से स्नेह है । स्नेहवश वे लोकतंत्र फैला रहे हैं । वे पहले एक दूसरे नाम से इराक में लोकतंत्र फैला रहे थे । आजकल लीबिया पर उनकी कृपा है । पहले वे बुश के नाम से जाने जाते थे आजकल ओबामा कहे जाते हैं ।
दूसरे लोग माओवाद का विरोधी होने से लोकतंत्र के मुरीद हुए थे । इसका अंदाजा 'नया पथ' का माओवाद विरोधी अंक पढ़कर लगा । तीसरे प्रकार की जनता अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद लोकतंत्र प्रेमी हुई है । इन्हें नंदन नीलकेनी का सरकार के एक प्रोजेक्ट का प्रमुख होना खतरा नहीं लगता लेकिन लोकपाल विधेयक बनाने वालो की कमेटी में प्रशांत भूषण का होना लोकतंत्र के लिए खतरा लगता है ।

Monday, May 2, 2011

'त्रिशूल' के बहाने

आज जबकि सांप्रदायिकता विरोधी संघर्ष का एक दौर तकरीबन पूरा हो चुका है और इस समुद्र मंथन से निकले अमृत का अधिकांश भाग मध्यवर्ती और दलित जातियों के राजनीतिक ठेकेदारों के हाथ आ चुका है, उस दौर को फिर से याद करना सचमुच रोमांचक है । शिवमूर्ति की 'हंस' के अक्टूबर नवंबर '93 के अंकों में प्रकाशित लम्बी कहानी 'त्रिशूल' सम्प्रदायिकता के चरम उभार के पूर्वी उत्तर प्रदेश के समाज और राजनीति का चित्रण करती है। शिवमूर्ति की कहानियों की विशेषता यह है कि इनमें वे परिस्थितियों को उनकी अन्तिम परिणति तक पूरी तल्खी के साथ आगे बढ़ने देते हैं। जहां और कथाकार सन्तुलन खो देते है और कथा में स्वयं उपस्थित होकर अपना रोष व्यक्त करने लगते हैं, शिवमूर्ति वहाँ भी घटनाओं और परिस्थितियों को स्वयं उनके ही तर्क से संचालित होने देते है और इस प्रक्रिया में उनकी कहानियों में ऐसी स्पष्टता और तीखापन आ जाता है जो 'त्रिशूल' को निश्चय ही साम्प्रदायिकता की समस्या पर लिखी अन्य कहानियों से अलग कर देता है। इसमें न सिर्फ उस समाज की, जिसमें साम्प्रदायिक गुंडे दहाड़ते घूम रहे थे, बल्कि उस प्रशासनिक मशीनरी की भी, जो उन्हें संरक्षण देने मात्र से आगे बढ़कर खुद उनका हिस्सा बन गयी थी, बेबाक चीरफाड़ की गयी है। यही इस कहानी की शक्ति है और इसी के कारण शुद्ध राजनीतिक कहानी होते हुए भी यह अपने पर बहस करवा ले गयी।

शिवमूर्ति की ईमानदारी मात्र इसमें नहीं है के साम्प्रदायिक तत्वों को उन्होंने उनके सही नाम से पुकारा है। बलात्कारियों, गँजेड़ियों, दारूबाजों और हत्यारों के इस गिरोह को इसी नाम से पुकारना सचमुच साहस की बात है। कथानायक के पड़ोसी शास्त्री जी, जो कहानी के शुरू में एक भले पड़ोसी की तरह आते हैं, अंत तक जाते जाते कथानायक के नौकर महमूद और खुद कथानायक के हत्यारे की तरह नज़र आने लगते हैं। उनके माध्यम से एक जुनूनी साम्प्रदायिक का चरित्र धीरे धीरे खुलता है। ऊपर से सभ्य नज़र आने वाले बहुतेरे लोग जो तनाव के दिनों में हत्यारे, बलात्कारी और लुटेरे हो गये थे उनका प्रतिनिधित्व इस कहानी में 'आस्था के प्रचारक' शास्त्री जी ने किया है और उनके साथी हैं सभी तरह के लम्पट।

इससे भी आगे बढ़कर शिवमूर्ति की ईमानदारी इसमें है कि साम्प्रदायिकता के विरोध की जो रणनीति वे सही समझते हैं उससे भी उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के प्रकट कर दिया है। इसकी व्याख्या के लिये थोड़ा कथा सूत्र को देखा जाय। दरअसल कहानी का केन्द्रीय चरित्र है कथानायक का नौकर महमूद। महमूद नाम उसे साम्प्रदायिक तनाव के दिनों में संदिग्ध बनाता चला जाता है। जैसे-जैसे तनाव गहराता है सभी पड़ोसी, स्पष्टत: जिनमें शास्त्री जी सबसे आगे हैं, एक हिन्दू मुहल्ले में मुसलमान की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं कर पाते लेकिन कथानायक के अड़ जाने पर चुप रह जाते हैं। बाद में शास्त्री जी के बेटे के स्कूल से बिना बताये अपने रिश्तेदार के यहाँ चले जाने पर शास्त्री जी महमूद के खिलाफ़ अपने बेटे के अपहरण की नामजद रपट दर्ज कराते हैं। महमूद को पुलिस पकड़ ले जाती है। चूंकि कथानायक एक प्रसाशनिक अधिकारी है इसलिए वह इनसे उनसे मिलकर उसे छुड़वाता है लेकिन महमूद को ले जाते हैं मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व। कथानायक उसे वापस घर ले आता है लेकिन इस प्रक्रिया में महमूद एक आदमी से मुसलमान में इस कदर बदला जा चुका है कि वह कथानायक के घर न रुककर अपने घर के लिये चला जाता है। लेकिन कहानी में इतना ही नहीं है। आदमी को अकेला कर देने वाली इस दमघोंटू घेरेबन्दी के खिलाफ़ प्रतिरोध के स्वर भी है। एक तो है स्वयं कथानायक, इस कहानी का 'मैं'। यह कथानायक पिछ्ड़ी जाति से है लेकिन यह उसकी प्रधान पहचान नहीं है न इस नाते वह साम्प्रदायिकता विरोधी है। यहाँ तक जब उससे क्लब का चपरासी सिर्फ़ ओ बी सी होने के नाते मदद मांगने आता है तो वह उसे इस बात के लिए फटकारता है। वह तो साम्प्रदायिक भाईचारे में भोला विश्वास रखने वाला एक उदारमना हिन्दू है जो नहीं चाहता कि विभिन्न धर्मों के ईश्वर आपस में लड़े। लेकिन वह स्वयं जिन तर्कों और चरित्रों से प्रभावित होता है वे अवश्य उसकी साम्प्रदायिकता विरोधी चिंतन की दिशा का संकेत देते हैं। एक बार जब शास्त्री जी यह तर्क देते हैं कि वे पचासी प्रतिशत हिन्दुओं को संगठित करना चाहते हैं तो कथानायक को किसी राजनीतिक कार्यकर्ता का भाषण याद आता है जो बताता था कि सवर्ण ब्राह्मणवादी धार्मिक ठेकेदारों ने हिन्दू समुदाय के पचासी प्रतिशत दलित पिछड़ों को मानवीय अधिकारों और गरिमा से वंचित रखा हुआ है। कथानायक सोचता है 'एक इनका पचासी प्रतिशत और एक उनका पचासी प्रतिशत'। एक समय और जब कथानायक महमूद को छुड़वाने जिलाधिकारी आवास गया है तो वहाँ किसी लोकगायक पाले की लाश के साथ प्रदर्शनकारी ग्रामीण जन समुदाय की भारी भीड़ आई हूई है। वहीं उसे पाले के बारे में पता चलता है जो भाजपाई विधायक गुलाब सिंह और उनकी पार्टी की हिन्दुत्ववादी विचारधारा के खिलाफ़ लोगों में लोकप्रिय गीत रचता था, उन्हें सुनाता था इसीलिए गुलाब सिंह ने उसकी हत्या करवा दी। पाले के गीत औए तर्क सभी भाजपा के खिलाफ़ सपा- बसपा की ओर से दिये जाने वाले तर्कों के प्रतिनिधि हैं। वह "पार्टीबाज रामभक्तों के लिए कहता था कि इनकी 'माया' में मत फंसिए। यह मारीच की संतान हैं। --- ऐसे रामराज्य से भगवान बचाये जिसमें ब्राह्मण के फलने फूलने के लिए शूद्र का सिर काटा जाना अनिवार्य होता है।" अनेकश: कहानी में हिन्दू धर्मग्रन्थों और हिन्दू देवताओं के चारों तरफ का मिथकीय आवरण चिरपरिचित बसपाई तर्कों से ध्वस्त किया जाता है। प्रतिरोध का एक तीसरा स्तर भी है जहाँ क्लब में दरोगा जी और मिसिर जी आपस में लड़ जाते हैं क्योंकि मिसिर जी ने मुख्यमन्त्री को गाली दी और चूँकि दरोगा जी मुख्यमंत्री की जाति के हैं इसलिए वे चौकीदार से मिसिर जी का लगवाया भाजपाई झंडा मंगवाकर उससे जूता पोंछने चल देते हैं। साम्प्रदायिकता विरोध के इन तीनों स्तरों में कमोबेश लेखक का विश्वास है।

साम्प्रदायिकता विरोधी यह रणनीति अकेले उनका विश्वास नहीं है। दरअसल परम्परागत वामपंथ और लोकतान्त्रिक चिन्तन से जुड़े अधिकांश बुद्धिजीवियों की मान्यता थी और है कि साम्प्रदायिकता को हिन्दू समुदाय के भीतर के जाति विभाजन को उभारकर पराजित किया जा सकता है। यह समझना कोई मुश्किल नहीं है कि अक्सर प्रश्न को मण्डल बनाम मन्दिर के दायरे में समझा जाता है। इस चिन्तन के समर्थक न सिर्फ सोशलिस्ट हैं जो पहले से ही वर्ग संघर्ष की जगह वर्ण संघर्ष को प्रधानता देते आये हैं बल्कि जनता दल से अपने गंठजोड़ से मोहग्रस्त परम्परागत वामपंथी भी, खासकर मण्डल कमीशन की घोषणा के बाद और साम्प्रदायिकता के उभार की स्थिति में, इसी चिन्तन के पैरोकार बन बैठे। बहुतेरे लोगों को माकपा के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत की लालू यादव की वह कसीदाकारी भूली न होगी कि लालू ने अतीत में साम्प्रदायिकता को परास्त किया, वर्तमान में भी उसे दबाये हुए हैं और अब हमें इसका राज़ बताकर आगे भविष्य में साम्प्रदायिकता से लड़ने का रास्ता दिखायेंगे। उनमें से एक खेमा तो धर्म की मार्क्सवादी धारणा में खामी ढूँढ़ने और उदार हिन्दू परम्परा के जय गान को ही अपना कार्यभार बना बैठा। इसीलिए दूधनाथ सिंह यदि इस कहानी की आलोचना करते हैं तो इसे परम्परागत वामपंथी चिंतन की विडंबना के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है! यह तो वही बात हुई कि गुड़ तो खायेंगे लेकिन गुलगुले से परहेज करेंगे। फिर भी चूंकि इस कहानी में साम्प्रदायिकता विरोध की एक ख़ास समझ को उभार कर लाया गया है इसलिए उस समझ की थोड़ी गहरी जांच आवश्यक है।

इस सवाल पर बहस की निश्चित रूप से आवश्यकता है कि क्या साम्प्रदायिकता अथवा ब्राह्मणवाद को पराजित करने में दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यकों का कोई गंठजोड़ सक्षम है? क्या दलित- पिछड़े और अल्पसंख्यक अपनी इन्हीं अस्मिताओं के कारण अनिवार्यतः सांप्रदायिकता विरोधी और धर्मनिरपेक्ष हैं ? मुझे लगता है कि इस सवाल पर सोचते हुए शिवमूर्ति और उन्हीं की तरह अनेक बुद्धिजीवी विचारधारा के महत्व को भूल जाते हैं । विचारधारा का महत्व ही यह होता है कि जिस वर्ग की सेवा के लिए वह काम करती है, उस वर्ग के अलावे अन्य वर्गों को भी वह अपने समर्थन में खड़ा कर लेती है । विचारधारा इस बात की गुंजाइश बनाती है कि कोई वर्ग अपने वर्ग हितों को समूचे समाज के हितों के बतौर पेश करे । इसीलिए उसका असर तत्संबंधी वर्ग से अलग भी पड़ता है । सांप्रदायिकता एक विचारधारा है और इसीलिए उसके समर्थन में सवर्ण जातियों के अतिरिक्त भी बहुतेरे अन्य सामाजिक समुदायों को हम खड़ा पाते हैं । इसके मुकाबले दलित- पिछड़ा- अल्पसंख्यक गंठजोड़ की क्या स्थिति है ? यह सही बात है कि किसी न किसी रूप में सामाजिक रूप से दलित/ पीड़ित होने के कारण ये समुदाय आपस में एकता महसूस कर रहे हैं और पिछले दिनों जनता दल या सपा- बसपा के रूप में इन्होंने कुछ राजनीतिक दलों को आधार और मजबूती भी प्रदान की है । लेकिन इनकी आपसी एकता को बनाए रखने और राजनीतिक- आर्थिक तंत्र को इनके हित में इस्तेमाल करने के लिए आवश्यक है कि इन समुदायों की आर्थिक और राजनीतिक आकांक्षाओं को विचारधारा के स्तर पर संगठित किया जाए। यहाँ तक कि डॉ लोहिया ने भी राजनीति की इस अनिवार्यता को समझते हुए ही इन समुदायों की मांगों को क्षेत्रीय असमनता-सामाजिक न्याय-विकेन्द्रीकरण इत्यादी के इर्द-गिर्द सूत्र बद्ध किया। इसके मुकाबले आज के जनता दल और सपा- बसपा जैसे राजनीतिक दल इन समुदायों के भयादोहन मात्र पर जीवित हैं । इस संबंध में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि सांप्रदायिकता को पराजित करने के बाद आप कौन सा समाज निर्मित करना चाहते हैं ? यदि इन जातियों/ समुदायों में विचारधारात्मक संघर्ष के जरिए जनतांत्रिक मूल्यों का प्रवेश न कराया जाय तो अंततः ये भी किसी प्रतिक्रियावादी शासन तंत्र के आधार हो सकते हैं । इन समुदायों में भी परिवार के स्तर पर पितृसत्तात्मक ढाँचा, ग्राम केंद्रित चेतना के चलते निरंकुश राजसत्ता के प्रति भक्ति, पूँजीवादी- सामंती मूल्यों के प्रवेश की संभावना इत्यादि ऐसे तत्व हैं जो अंततः, यदि उन्हीं की चेतना पर उनके नेता खड़े रहे तो, उन्हें भी भाजपाई बना दे सकते हैं । सामाजिक रूप से उनका दलित- पिछड़ा अथवा अल्पसंख्यक होना इस बात का आधार मुहैय्या करता है कि वे किसी जनतांत्रिक समाज के निर्माण के आधार हो सकें लेकिन बाकी काम एक सचेत विचारधारात्मक प्रयास की माँग करता है ।

वस्तुतः शिवमूर्ति जैसे बुद्धिजीवियों की ईमानदारी की इस सीमा के पीछे परंपरागत वामपंथ की एक ग्रंथि है । किसी से पूछिये कि हिंदी इलाके से वामपंथ बेदखल क्यों हो गया । सोसलिस्ट बुद्धिजीवियों के पास इसका एक सरल उत्तर है कि चूंकि कम्युनिस्ट जाति को महत्व नहीं देते थे और जाति तथा धर्म भारत की विशिष्टता हैं इसीलिए जहाँ इसका सर्वाधिक संकेंद्रण है, अर्थात हिंदी क्षेत्र, वहाँ की विशिष्टता अथवा जमीनी सच्चाई के साथ कम्युनिस्ट जुड़ ही नहीं सके । ऐसा लगता है कि परंपरागत वामपंथ ने भी इसे स्वीकार कर लिया है और इसीलिए जब जब हिंदी इलाके में विस्तार की योजना बनाई जाती है तो जनता दल अथवा सपा की पूँछ पकड़ने की अनिवार्यता सामने लाई जाती है । इसके लिए जाति और धर्म संबंधी अपनी मान्यताओं में संशोधन के लिए भाँति भाँति की सैद्धांतिक कसरतें की जाती हैं । इस सामान्य तथ्य से आँख मूँद ली जाती है कि इस परिघटना के पीछे कांग्रेस के प्रति मुख्यधारा के कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों का भी कुछ हाथ है । चूंकि हिंदी इलाके के मध्यम जातियों की राजनीतिक- आर्थिक महात्वाकांक्षाएं कांग्रेस की छतरी में समा नहीं पा रही थीं इसीलिए उनका नेतृत्व कोई कांग्रेस विरोधी शक्ति ही कर सकती थी । नेहरू और इंदिरा युग में कांग्रेस से अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी का जो मोह था उसने उसे इस ऐतिहासिक दायित्व को पूरा करने लायक ही नहीं छोड़ा । अब जबकि अतीत में की गयी गलती के गलत सुधार की प्रक्रिया शुरू की गयी है तो चूंकि परंपरागत वामपंथी मध्यम जातियों से कोई वर्ग विभाजन किये बिना, कोई गंभीर सामाजिक परिवर्तन की चेतना पैदा किये बिना उनके साथ एकताबद्ध होना चाहते हैं इसलिए अत्यंत स्वाभाविक प्रक्रिया के बतौर दिखाई यह पड़ता है कि वे इन जातियों के बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी नेतृत्व के पिछ्लग्गू बनकर खड़े हो जाते हैं, न सिर्फ़ व्यावहारिक स्तर पर बल्कि सैद्धांतिक स्तर पर भी । 'त्रिशूल' कहानी एक ऐसा आईना है जिसमें वे अपनी सूरत देख सकते हैं । सांप्रदायिकता के विरोध में कहीं कोई वामपंथी कार्यकर्ता नहीं, कहीं कोई कम्युनिस्ट आवाज इस कहानी में मौजूद नहीं है । सब कुछ जैसे मात्र एक जातिवादी परिघटना है- मंडल विरोधी सांप्रदायिकता के पक्ष में मंडल समर्थक उसके पक्ष में ।

सांप्रदायिकता और उसके विरोध की रणनीति की इसी भ्रामक समझ के चलते 'त्रिशूल' में एक खास तरह का दूरदृष्टि दोष है । सांप्रदायिकता विरोध के नायक मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के पिछले राज में एक ऐसी घटना घटी थी जिसे धर्म निरपेक्ष बुद्धिजीवी समुदाय अक्सर सुविधापूर्वक भूल जाता है। यू पी सिमेन्ट कॉर्पोरेशन की तीन फैक्ट्रियों को मुलायन सिंह ने वि हि प के अध्यक्ष विष्णु हरि डालमिया के सुपुत्र संजय डालमिया को निजी अथवा राजनीतिक सम्बन्धों के एवज में औने पौने दामों पर बेच दिया था। मजदूरों ने धरना देकर डालमिया साहब को फैक्ट्रियों पर कब्जा करने नहीं दिया। तब उत्तर प्रदेश की पुलिस ने, जो भाजपाइयों के सामने आते ही गिड़गिड़ाने लगती थी, इस पूँजीपति को कब्जा दिलाने के लिये अति उत्साह में तीस से ऊपर मजदूरों को गोलियों से भून दिया। यह किसका लहू था, कौन मरा?

दूरदृष्टि दोष युक्त 'त्रिशूल' में इसी लिए महमूद का मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथ में पड़ जाना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। महमूद का खो जाना 'त्रिशूल' में वर्णित घटनाओं की तार्किक परणति है। इसके मुकाबले आप 'गर्म हवा' फ़िल्म के नायक को रखकर देखिए। महमूद को तो वर्गीय चेतना से लैस कोई लोकतांत्रिक आन्दोलन ही उसकी अर्थवत्ता प्रदान कर सकता है। यदि साम्प्रदायिकता के विरोध में इतना कमजोर और लिजलिजा मोर्चा लगा दीख रहा हो तो महमूद का खो जाना ही तर्क संगत है।

अब रहता है अंतिम प्रश्न कि साहित्यकार का यह दायित्व बनता है या नहीं। शिवमूर्ति उस भाषा और उस इलाके के कथाकार है जहाँ प्रेमचन्द नामक एक कथाकार हुए थे। साहित्य और राजनीति रिश्ते पर उन्होंने एक बार लिखा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली सच्चाई है। क्या यह उन्होनें इस लिए लिख दिया था के साहित्यकार लोग आमतौर पर साहित्य को दुनिया में सब कुछ के आगे समझते है या फिर इसमें कुछ तत्व है? प्रेमचन्द के साहित्य से बढ़कर इसका प्रमाण और किया होगा। जिस समय कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता आन्दोलन का वैचारिक प्रभाव अपने चरम पर था उस समय उनके एक उपन्यास 'गबन' के एक पात्र देवीदीन खटिक ने कहा कि इन कांग्रेसियों का अगर राज आजाए तो यह तो गरीबों को पीसकर पी डालेंगे। और तो और 'गोदान' में जो एक मात्र कांग्रेसी चरित्र है वे हैं इलाके के जमींदार राय साहब। ध्यान रखिए कि कांग्रेस के बारे में प्रेमचन्द का यह चिन्तन न सिर्फ़ 1947 से पहले का है बल्कि 1937 से भी पहले का है जब पहली कांग्रेसी सरकारें बनी थीं। प्रेमचन्द के कहने का अगर कुछ अर्थ है तो यही कि साहित्यकार लोकप्रिय राजनीति को सिर्फ़ उसके ऊपरी प्रभाव से नहीं बल्कि ठोस सामाजिक अंतर्धाराओं में भी देखकर जांचता है। समाज के ऊपरी दर्जे पर चलने वाली राजनीति को जो जमीनी आलोचना है उसे भी स्वर देना साहित्य का ही काम है तभी वह वर्तमान में अवस्थित होकर भविष्य को देख पाता है। अब यदि मुलायम सिंह के डाला के मजदूरों के प्रति व्यवहार या संजय डालमिया और जयंत मलहोत्रा जैसे धन पशुओं के साथ उनके सम्बन्ध या मुलायम सिंह की ही पुलिस द्वारा मारे गये मेरट के हरिजनों और कांशीराम जी के सिद्धांतों के सम्बन्ध की विवेचना आशा हम साहित्य से न करें तो और किससे करें?

कुछ लोगों ने इस कहानी के बारे में कहा है कि यह अत्यंत व्यापक फलक पर साम्प्रदायिकता की समस्या को उठाती है। वस्तुत: इस कहानी का फलक और दायरा अत्यंत छोटा है। साम्प्रदायिकता की समस्या और उससे संघर्ष के प्रश्न पर यह जितनी स्पष्टता प्रदान करती है उससे अधिक भ्रम पैदा करती है। शिवमूर्ति जैसे कथाकार को अनुभव के तथ्य को विचार के सत्य तक उठाना चाहिए था; इसलिए भी कि वे ऐसा करने में समर्थ है। तथ्य में भी अंतर्विरोध होते है और विचारों की ताकत उन अंतर्विरोधों के विकास की दिशा की समझ प्रदान करती है।

अंत मे एक बात और। शिवमूर्ति अपनी कथायात्रा के दृष्टिकोण से भी यह कहानी एक नया पड़ाव है। इसके पहले 'तिरिया चरित्तर' या 'भरत नाट्यम' में एक समाज है जो अमानवीय है, 'कसाईबाड़ा' और 'अकालदण्ड' में एक राजनीति और राज्यतंत्र है जो आदमी की मर्यादा को खंडित करता है लेकिन इस कहानी में राजनीति और समाज दोनों में एक दूसरे की बदौलत जीवनी शक्ति हासिल कर रहे अमानवीय तत्वों की बारिक एकता की समझ है। यह समझ आगे आने वाले दिनों में किसी औपन्यासिक चेतना के उदघाटन का पूर्वाभास लगती है, इसलिए भी यह आलोचना आवश्यक है।

Wednesday, April 27, 2011

बिहारी कौन हैं


मैं जब विश्वविद्यालय आया तो बताया गया कि भोजपुरी बोलने से यहाँ कोई दिक्कत न होगी । जो भी हिंदी भाषी हैं वे असल में भोजपुरी भाषी हैं । इनकी संख्या इस क्षेत्र में 35% है । मुझे अपने पूर्वजों पर गर्व हो आया । एन डी टी वी का त्रिनिडाड पर कार्यक्रम देखकर इसमें बढ़ोत्तरी ही हुई । लोग कहाँ से कहाँ चले गये ! एक वासुदेव पांडे को उनके जन्मस्थान का पता चल गया पर लाखों वासुदेव पांडे अपने मूल भूल गये हैं । 75 साल की बुढ़िया बढ़िया अंग्रेजी बोल रही थी और भोजपुरी गीत गा रही थी । फिजी से एक वामपंथी छात्रनेता आया था तो उसने बताया कि अगर कोई अमेरिका जानेवाला हो तो किसी को कोई खास रुचि नहीं होती है । लेकिन अगर कोई भारत आनेवाला हो तो उसके यहाँ पंद्रह दिन पहले से लोग मिलने के लिये आने लगते हैं । मारीशस से सरिता बूधू आई थीं तो विवाह के गीत भोजपुरी में गाकर सुना रही थीं । यहाँ के भोजपुरी भाषी सलेटी बांगला और भोजपुरी मिलाकर बोलते हैं । इनमें से अधिकांश लोग उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों से 1840 के दशक में चाय बागानों में काम करने के लिये गिरमिटिया की तरह लाये गये थे । वेस्ट इंडीज, अफ़्रीका और उत्तर पूर्व में जब इतने बड़े पैमाने पर लोगों का निष्क्रमण हुआ तो भी 1857 क्यों हुआ ? इसका मतलब उस समय कोई भारी विपत्ति आई रही होगी अन्यथा कृषि से जुड़े लोग इतनी आसानी से अनजान जगहों पर नहीं जाते । क्या जाने आसानी से गये या अफ़्रीका के काले लोगों की तरह जबरदस्ती ले जाये गये !

जब चीन से चाय की आवक बंद हो गयी तो अंग्रेजों को चाय के वैकल्पिक स्रोतों की जरूरत महसूस हुई । तब चाय असम की पहाड़ियों पर घास की तरह उगा करती थी । लोग बुखार होने पर इसका काढ़ा बनाकर पीते थे । अंग्रेजों ने चाय की खेती के लिये इस जगह को मुफ़ीद समझा और पुराने स्वाद के लोभ में चीन से चाय का पौधा लाकर डिब्रूगढ़ में लगाया । पौधा विदेश में पनपने से इनकार कर बैठा । निराश होकर स्थानीय चाय की खेती शुरू की गयी । स्थानीय लोगों ने चाय बागानों में काम करना मंजूर न किया । वजह यहाँ का वातावरण था । सुबह तो जल्दी होती ही है धूप भी काफ़ी तीखी होती है । अफ़ीम का व्यापार जब चीन से होता था तो इस क्षेत्र के लोगों को वह काफ़ी खिलायी गयी थी । तबसे आलस्य यहाँ का स्थायी भाव हो गया है । मनुष्य तो मनुष्य पशुओं को भी सड़क से हटाने में मोटरों के हार्न काम नहीं आते । बहरहाल जैसा कि कहा जाता है भोजपुरी दरबान कुत्ते की तरह भरोसेमंद होता है इसलिये भोजपुरी भाषी जनता प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इन बागानों में बाड़े में बंद पशुओं की तरह रहकर काम करती रही ।

अगर आपने एलेक्स हेली का उपन्यास रूट्स पढ़ा हो तो इनके हालात का कुछ कुछ अंदाजा लगा सकते हैं । घर की याद तो आती थी लेकिन वह याद ही रह सकती थी । मालिक जाने न देता था । 1920-21 के दौरान गांधी जी के असहयोग आंदोलन को चाय बागान के मजदूरों ने घर लौटने का संकेत समझा और झुंड के झुंड घर की ओर चल दिये । तब हाथियों से उनकी रिहायशों को नष्ट करके और हजारों को गिरफ़्तार तथा दो सौ लोगों की जान लेकर इस विद्रोह पर काबू पाया गया । इसके बाद कोई ऐसा प्रयास तो नहीं हुआ लेकिन जिन लोगों की स्थिति कुछ सुधर गयी थी वे एकाध बार घर गये । घर जाने पर और वहाँ के हालात देखकर लौटने की इच्छा मारी गयी ।

इसके लिये आपको विस्थापन के एक और पहलू पर निगाह डालनी होगी । जब ये लोग वतनबदर हुए थे तब तक शायद निचली जातियों में पदनाम अपनाकर श्रेष्ठता का अनुकरण करने का रिवाज शुरू नहीं हुआ था । नाम पूछने पर पेशे के साथ मूलनाम बताते रहे होंगे । जहाँ से आये थे वहाँ तो बाद में पदनाम अपनाये गये लेकिन यहाँ ऐसी कोई जरूरत नहीं महसूस हुई । इसलिये अब भी यहाँ के लोगों के नाम के साथ लोहार, धोबी, कुर्मी, कोइरी ( जो बांगला की प्रकृति के कारण बदलकर कैरी हो गया है ), ग्वाला, नुनिया ( नोनिया ) आदि पदनाम चलते हैं । अंग्रेजों और असमीया लोगों के लिये ये शब्द सामाजिक पदानुक्रम के द्योतक नहीं थे । जब ये लोग कभी लौटकर घर जाते तो उन्हें सामाजिक पदानुक्रम का बोध होता । इसलिये एकाध बार के बाद कभी गये ही नहीं । अब धीरे धीरे मूल स्थानों की स्मृति धुँधली पड़ने लगी है । इन्हें यहाँ के सरकारी कागजों में टी ट्राइब कहा जाता है । फ़िलहाल अनुसूचित जनजाति में शामिल किये जाने की माँग इनके भीतर जोर पकड़ रही है । असम के चूतिया ( सुटिया ), अहोम आदि ऐसे ही माँगकर्ताओं के साथ इनकी भी माँग शामिल कर ली जाती है ।

चाय बागान की समस्याओं को समझने के लिये अर्थतंत्र में आये बदलावों पर निगाह डालनी होगी । पहले व्यापार संबंधी समझौते द्विपक्षी हुआ करते थे । फ़िर गैट नामक बहुपक्षी समझौता वार्ताओं का दौर चला । तर्क दिया गया कि दोतरफ़ा समझौते में मोलतोल की गुंजायश कम होती है, बहुपक्षी समझौते में हमारी ताकत बढ़ जायेगी । लेकिन ताकत की ऐसी बढ़ोत्तरी हुई कि मारीशस जैसा गन्ना उत्पादक देश भी मंदी के चलते सूचना प्रौद्योगिकी पर जोर दे रहा है । भारत की ताकत में जब इजाफ़ा हुआ तो गेहूँ, कपास, नारियल, हल्दी उत्पादक एक के बाद एक आत्महत्याएँ करने लगे । सबको अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिद्वन्दता की वेदी पर शहीद होना पड़ा । चाय की कीमतों में भी इसी प्रतिद्वन्दता के कारण कमी आई और मालिकों को वाजिब मजदूरी देने में दिक्कत आने लगी । मेरे आने के कुछ ही दिनों बाद असम के किसी मंत्री के बेटे रूपक गोगोइ की हत्या गोलाघाट स्थित चाय फ़ैक्टरी में 250 मजदूरों ने सामूहिक रूप से कर दी । पता चला मजदूरों को 6 महीने से वेतन नहीं मिला था । मालिक ने मैनेजर के जरिये समझौता वार्ता का संदेश भेजा था और कहलाया था कि एक महीने के वेतन का तत्काल भुगतान कर दिया जायेगा । वार्ता में मालिक वादे से मुकर गया और महज एक हफ़्ते के वेतन के लिये राजी हुआ । नतीजतन मजदूर भड़क गये । उन्होंने मालिक को पीटते पिटते मार डाला और लाश को जला दिया । सभी 250 मजदूर थाने गये और अपराध स्वीकारते हुए गिरफ़्तारी दी । पुलिस की समस्या यह कि उसकी सूचना के मुताबिक मुख्य अभियुक्त 73 थे । अगला काम इस भीड़ में से 73 लोगों को अलगाना था । थोड़े दिनों बाद एक और मालिक की हत्या हुइ । खबर आई कि मैनेजर चाय बागान छोड़कर भाग रहे हैं । उन्हें मजदूरों का गुस्सा जो सहना पड़ता । हरेक चाय बागान में पुलिस की तैनाती की गयी । चाय बागान के मजदूर कांग्रेस के परंपरागत समर्थक रहे हैं । धीरे धीरे वे कांग्रेस के पंजे से बाहर आ रहे हैं । इस उद्योग में दबाव इतना अधिक है कि अभी हाल में पश्चिम बंगाल में चाय बागानों में बारह दिन चली हड़ताल के बाद न्यूनतम मजदूरी में कुल दो रुपये की बढ़ोत्तरी पर ही वामपंथी यूनियनों को हड़ताल वापस लेनी पड़ी । हाल में प्रकाशित एक समाचार के मुताबिक चाय बागानों में हरेक साल औसतन एक हजार लोग बुखार, पेचिश, आंत्रशोथ जैसी बीमारियों से मर जाते हैं ।

दुर्गम जगह और दुर्दम प्रकृति

असम विश्वविद्यालय में एक कथा बहुत मशहूर है । कोई अध्यापक दाढ़ी बना रहे थे । बेसिन में छिपकली गिर गई । बार बार कोशिश करे लेकिन बाहर निकलने में नाकामयाब । अध्यापक ने कहा- तुम्हारी और मेरी अवस्था एक ही है । इसका पता तब चला जब जनवरी में कार्यभार ग्रहण करने के बाद सीधे मई में निकलने का मौका मिला ।

सुमो में भरकर अध्यापकों की टोली गुवाहाटी के लिये दोपहर दो बजे चली । रास्ते में बार बार प्रोफ़ेसर विश्वनाथ प्रसाद एक ही बात कहते रहे- सोनापुर पार हो जाये तो निश्चिंत हों । मैंने समझा यह कोई आतंकवाद प्रभावित जगह है । जब पहुँचा तो प्रकृति की दुर्दमनीयता देखकर दंग रह गया । सड़क के एक तरफ़ बीस मीटर खड़ा पहाड़ । दूसरी तरफ़ बीस मीटर नीचे बहती नदी । नदी के पार बांगलादेश की सीमा । खड़े पहाड़ के नीचे हनुमान मंदिर । नदी पानी से भरी नहीं थी । तकरीबन पाँच सौ मीटर दूर तक छोटी छोटी धारायें । विशाल दलदल जैसा दृश्य । पहाड़ लगातार पसीज रहा था । पता चला ऊपर विशालकाय झील है । सुमो के लोग मंदिर में पूजा कर रहे थे । मेरा दिल बैठा जा रहा था । इस जगह के बारे में अनेक कथायें । बरसात के दिनों में अक्सर भूस्खलन होता है । तब यही सड़क जिस पर हम खड़े थे सरककर नदी के पेटे में चली जाती है । एक बार सड़क के साथ ही यात्रियोंसे भरी बस भी नदी में गयी तो लाशें बांगलादेश में मिलीं । उस समय इधर यानी सिलचर से गुवाहाटी जानेवाले इधर और उधर यानी गुवाहाटी से सिलचर आनेवाले उधर कई दिन फँसे रहे थे । छोटा मोटा बाजार आबाद हो गया था । जब पैदल चलकर पार करने लायक हालात हुए तो लोग इधर से उधर हुए । इस प्रक्रिया में जो हौलनाक घटनायें हुईं उनका बयान भी दिल दहलानेवाला है । पहाड़ से लुढ़ककर आते पत्थरों पर पाँव रखकर पार जाना होता था । अगर पत्थर न मिला तो कुछ भी हो सकता था । एक औरत अपनी बच्ची के साथ रास्ता पार कर रही थी । बच्ची का हाथ माँ से छूट गया और बच्ची आहिस्ता आहिस्ता कीचड़ में धँसती नीचे की ओर खिसकती गयी । आधे घंटे के उस बिछोह में कोई कुछ नहीं कर सकता था । माँ भी नहीं । विश्वविद्यालय के कई अध्यापक तब संयोग से बचकर निकल आये थे ।उनमें से एक ने बताया कि पहले उनके पाँव घुटनों तक कीचड़ में धँसे । एक पाँव निकाला तो जूता अंदर ही छूट गया । दूसरा पाँव निकाला तो वह भी नंगा निकला । फिर कमर तक धँसे । पीठ पर का बैग कहीं रह गया । धीरे धीरे गले तक कीचड़ में । सबकी याद आने लगी । तभी पता नहीं कहां से एक पत्थर पकड़ में आया । उसे पकड़कर अपने आपको बाहर निकाला और पार हुए । यह कथा बहुतों की रही । अब आप भारत के सबसे बड़े दर्द '47 के बँटवारे के बारे में सोचिए । बांगलादेश की तरफ़ भी नदी पर ऐसा ही पुल होगा । मैंने कल्पना की अगर दोनों देशों के लोग इस नदी को एक ही पुल से पारकर अपने अपने देश में चले जाते तो क्या बुरा था ! बादल भी उन्हीं का अनुसरण करते और चिड़ियाँ भी ।

अगर आप भारत के नक्शे के पूर्वी छोर पर निगाह डालिए तो सारी बात समझ में आ जायेगी । कलकत्ता से ऊपर न्यू जलपाईगुड़ी के बाद हंस की गर्दन जैसे रास्ते से गुजरते हुए नीचे उतरकर आप गुवाहाटी पहुँचते हैं । फिर गुवाहाटी से बांगलादेश के किनारे किनारे सिलचर । पैमाना लेकर नापेंगे तो देखेंगे कि इस द्रविड़ प्राणायाम में दूरियाँ कितनी बढ़ जाती हैं । अगर सिलचर से कलकत्ता जाना हो तो सबसे कम समय बारह घंटे गुवाहाटी तक, फिर गुवाहाटी से ऊपर चढ़कर न्यू जलपाईगुड़ी से घूमकर नीचे उतरकर कलकत्ता अठारह घंटे । कुल चालीस घंटे जबकि सिलचर से बांगलादेश होते हुए कलकत्ता जाने के लिये सीधी सड़क है । जब बांगलादेश ने हवाई यात्रा की इजाजत दे दी कलकत्ते से सिलचर का सफ़र महज एक घंटे में हो जाता है । क्यों न ऐसा करें कि रेलमार्ग भी माँग लें इस शर्त पर कि रास्ते में डिब्बों से होकर हवा भी आने जाने नहीं दी जायेगी । रेल कहीं से पानी भी नहीं लेगी और विदेशी धरती पर लोग शौचालय का इस्तेमाल भी नहीं करेंगे । कुल मिलाकर भारतीय राष्ट्रवाद कीर्तन या ड्रग्स जैसा नशा है । सूच्यग्रं न दास्यामि विना युद्धेन केशव ! हास्यास्पद अहंकार ।

पहले बांगलादेश से आये विदेशियों के प्रति भय और नफ़रत का वातावरण बनाया गया । इसका यही नतीजा होगा कि फिर आप बिहारी से नफ़रत करेंगे । असम में विदेशी द्वेष और इसी की आड़ में सांप्रदायिकता इतनी नग्न है कि अत्यंत परिष्कृत लोगों की वाणी से भी दबे ढके गालियाँ निकल सकती हैं । भाजपा द्वारा बांगलादेशी शरणार्थियों के विरुद्ध चलाये गये बौद्धिक अभियान का बड़ा गहरा असर हुआ है । लोग यह भूल चुके हैं कि बँटवारे के समय नेहरू जी ने देश के पश्चिम और पूरब दोनों तरफ के देशों के अल्पसंख्यकों को यह लिखित भरोसा दिया था कि उन्हें जब भी जरूरत होगी भारत बाँहें फैलाकर उनका स्वागत करेगा । जिनके विरुद्ध भाजपा बंदूक ताने खड़ी रहती है उन्हें आप कूड़ा बीनते, रिक्शा चलाते और घरों में चौका बरतन करते तथा कपड़ा धोते, पोंछा लगाते पायेंगे । 1971 के बाद वस्तुतः आव्रजन हुआ ही नहीं है । लेकिन मामला तथ्य और तर्क का नहीं आस्था और विश्वास का है ।

पिछले दिनों डिब्रूगढ़ में किसी नामालूम से संगठन ने बंगालियों के बहिष्कार के पर्चे बाँटे । एक दिन में सात सौ बंगाली डिब्रूगढ़ छोड़कर भाग गये । असम के राज्यपाल का वक्तव्य आया कि भागे हुए लोग बांगलादेशी थे । मुख्यमंत्री ने बताया कि ये लोग भारतीय थे । सरकार के ही दो मुख जब आपस में विपरीत बातें बोल रहे हों तो किसे सही माना जाये । दरअसल व्यापार में मारवाड़ियों और सरकारी कार्यालयों में बंगालियों द्वारा सताये गये लोगों की भावनाओं का दोहन बिहारियों और बांगलादेशियों के खिलाफ वक्तव्य देकर यहाँ के राजनेता अक्सर करते हैं । एक फ़र्क मेरे देखे हुए बंगाल और उत्तर पूर्व के बंगालियों में दिखाई पड़ा । अंग्रेजों के संपर्क में पहले आने के कारण बंगाली लोग सरकारी कार्यालयों में भरते गये । उन्हीं की सुविधा के अनुरूप विभिन्न प्रदेशों के सरकारी हलकों में बांगला का बोलबाला रहा । कलकत्ता के भद्र बंगाली और कार्यालयी बाबुओं की संस्कृति में जमीन आसमान का अंतर है । घूस खाने का बहुत ही व्यवस्थित तंत्र सरकारी कार्यालयों के जरिये खड़ा किया गया । छोटे मोटे पदों से सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी भी मकान बनवाकर ठाठ से बुढ़ौती किराये के सहारे गुजारते हैं । एक और मनोवैज्ञानिक कारण दिलीप मंडल ने बताया । उखड़े हुए लोगों और स्थायी रूप से बसे लोगों की संस्कृति में भारी फ़र्क होता है । इसे दिल्ली के पंजाबी और पंजाब के पंजाबी में देखा जा सकता है । उखड़े हुए लोगों को अपनी पहचान जताने का कोई पारंपरिक माध्यम मिलता नहीं इसलिये पैसा ही अहंकार का एकमात्र स्रोत हो जाता है । केंद्र से आनेवाली सहायता का बड़ा हिस्सा इन्हीं कार्यालयों में डकार लिया जाता है । लेकिन इस वाजिब विक्षोभ को जो रास्ता दिखाया जाता है वह खतरनाक है । इसके कारण श्रमिकों को नुकसान उठाना पड़ता है ।