Thursday, July 13, 2023

कोलाहल के विरुद्ध कविता के पक्ष में

 

       

                                   

युवा कवि अच्युतानंद मिश्र की कविता केंद्रित इस किताब में पंद्रह लेख और कविता केंद्रित एक साक्षात्कार संकलित हैं । इनका मूल स्वर बहस का है । यह बहस कविता की ओर से समूचे वातावरण से तो की ही गयी है, वातावरण की विशेषता को भी दर्ज किया गया है । लेखक ने इसी बहाने समाज में कविता की हैसियत और उसकी भूमिका को भी दर्ज किया है । इस काम को शुरू में ही लेखक ने संपन्न कर लिया है । इससे आगामी विवेचन की सुपुष्ट पृष्ठभूमि बन गयी है ।

लेखक विज्ञान के भी सुधी अध्येता हैं इसलिए एकाधिक जगहों पर उसकी अंतर्दृष्टि का सहारा विषय की प्रकृति को समझाने के लिए किया है । इसका भी उदाहरण पहले ही लेख से लिया जा सकता है जहां वे कविता की द्वैध स्थिति को समझाने के लिए रसायन विज्ञान का उल्लेख करते हैं जिसमें दो या दो से अधिक भिन्न गुण वाली वस्तु मिलकर तीसरी चीज बनाती हैं । इस नयी वस्तु में दोनों शामिल रहते हैं लेकिन एक दूसरे से मिले हुए । इसे कविता की प्रकृति के समान बताने के लिए वे कविता को ‘दृश्य-अदृश्य, अन्तर-बाह्य, मनुष्य-प्रकृति के संयोग से बनती हुई’ कहते हैं । इसको थोड़ा और साफ करने के लिए वे आग का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि ‘जब आग पैदा होती है तो हर पत्थर का अस्तित्व दूसरे के महत्त्व को स्थापित करता है । किसी एक को अधिक महत्त्वपूर्ण और दूसरे को कम महत्त्वपूर्ण नहीं माना जा सकता ।’ इस तरह कविता की प्रकृति में निहित जटिलता को वे वर्ण्य वस्तु की जटिलता के तुल्य बताते हैं ।

कविता के बारे में शुरू के दो सैद्धांतिक लेखों के बाद किताब हिंदी की आधुनिक दुनिया में प्रवेश करती है । इन लेखों में लेखक ने कविता की बहुत ही व्यापक धारणा बनायी है । लेखक के समूचे व्यक्तित्व को तो वह निचोड़ती ही है, समूची कायनात में व्याप्त है । भाषा में उसकी अलहदगी बाद की घटना है । उसमें भी काव्य की भाषा का विशेष हो जाना और भी आगे के विलगाव का द्योतक है । इस आरम्भिक समझ के बाद जब वे आधुनिक हिंदी कविता में घुसते हैं तो उनका यह प्रवेश इतना भव्य हो जाता है कि लगता है, लेखक पाठक की उंगली पकड़कर किसी कुशल पथ प्रदर्शक की तरह कविता की दुनिया में उसका प्रवेश करा रहा हो । असल में आधुनिक हिंदी कविता की दुनिया इतनी उलझी हुई है कि बहुतेरे सिद्ध लोग भी उसके नाम पर आंय-बांय बोलने लगते हैं । लेखक के कवि होने के कारण इस कविता की संवेदना और शिल्प पर उनकी पकड़ अचूक है । आलोचना लिखने के नाम पर वे कविता की भाषा से होड़ नहीं करते जैसा अधिकांश लोग करते हैं बल्कि कविता को समझने के लिए उत्सुक पाठक उनके दिमाग में मौजूद रहता है जिसके लिए वे इन कवियों और उनके लेखन का ताला खोलना चाहते हैं इसलिए बहुधा वे अबूझ होने से बच जाते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे पाठक के आलोचनात्मक विवेक का सरलीकरण करते हैं । प्रसंगवश यह जानना दिलचस्प होगा कि लेखक ने आधुनिकता की पहचान और उसकी आलोचना करने वाली वैचारिकी का गहन अध्ययन किया है इसलिए वे हिंदी कविता की इस दुनिया को खोलने और देखने की बहुत ही परिष्कृत भाषा को अर्जित और इस्तेमाल करते हैं । सरलीकरण से बचने की जगह लेखक का प्रयास जटिल को साधने का रहा है । इसके लिए उन्होंने अंतर्बाह्य या रूप-अंतर्वस्तु संबंधी द्वैत को सिरे से नकारा है और इनके घनिष्ठ संगुम्फन को व्यक्त करने लायक विवेक को कायम रखने का खतरा उठाया है । स्वाभाविक है कि ऐसी किताब को पढ़ना किसी भी समझदार पाठक के लिए आह्लादकारी साबित होगा ।  

इन कवियों पर लेखन के साथ लेखक का खुद का कविता लेखन और पाश्चात्य वैचारिकी पर लेखन भी चलता रहा इसलिए इन लेखों में विशेष तरह की समृद्धि आयी है । इन लेखों में रचनात्मक संवेदनशीलता के साथ ही वैचारिक विश्लेषण आपस में रासायनिक योग की तरह घुले मिले हैं । लम्बी सांस की तरह लेखक ने दीर्घावधि में ये लेख लिखे हैं । शुरू के सैद्धांतिक लेखों के बाद जिन कवियों के बारे में भी लिखा गया, केंद्र में आधुनिक हिंदी कविता के दो महापुरुष रहे हैं । निराला और मुक्तिबोध पूरी किताब के आस्वाद को तय करने में लगभग केंद्रीय भूमिका निभाते हैं । बात किसी भी कवि की हो रही हो लेखक के लिए ये दोनों कवि प्रतिमान की तरह मौजूद रहते हैं । लगता है लेखक को यकीन है कि इन दोनों की कविता आपस में भिन्न होने से आधुनिक हिंदी कविता के समूचे विस्तार को इन दोनों ही की चर्चा के सहारे समेटा जा सकता है ।       

कहने की जरूरत नहीं कि छायावादी रचनाकारों में निराला के साथ ही परवर्ती लेखन का सबसे अधिक संवाद दिखायी देता है । थे भी वे छायावाद में थोड़ा अलग । वैसे इस पर विचार किया जाना चाहिए कि निराला की जगह छायावाद में कहीं इस वजह से तो नहीं रही कि छायावाद को जितना समझा जाता है उससे अधिक ही क्रांतिकारी धारा मौजूद रही हो । इस नाते लेखक ने जिस तरह परवर्ती कविता को छायावाद से दूर जाते हुए देखा है उस पर विचार की जरूरत है । न केवल निराला बल्कि समूचे छायावाद के प्रकृति वर्णन को लेखक ने जिस निगाह से देखा है वह बहुत ही नया है और छायावाद के पुन:पाठ की प्रेरणा देता है । इसके बावजूद वे इस रूढ़ मान्यता के कहीं कहीं शिकार हो गये प्रतीत होते हैं कि छायावाद को तोड़कर ही नये कवि अपनी जगह बना सके थे । नयी कविता की मुक्तिबोधीय समझ को लेखक ने पुष्ट और परिवर्धित किया है तथा उसकी प्रतिध्वनि परवर्ती कवियों के सोच विचार में पायी है ।

परवर्ती लेखकों में जिन पर लेखक की निगाह ठहरी है उनमें रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा उल्लेखनीय हैं । अच्युतानंद मिश्र की इस किताब की एक खूबी यह भी है कि इससे पाठक को आधुनिक हिंदी कविता की पर्याप्त विविधता के दर्शन हो जाते हैं । इस विविधता के तहत ऊपर जिन कवियों का जिक्र हो चुका है उनके अतिरिक्त लीलाधर जगूड़ी को भी लेखक ने अपने समय को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना है । अरुण कमल को भी लेखक ने हमारे समय की निशानदेही करने के लिए जरूरी समझा है । कुछ अन्य कवियों में विजय कुमार, नरेंद्र जैन और अनामिका की कविताओं पर स्वतंत्र लेख के अलावे संग्रह में दो लेख अपने समय से जुड़े सवालों पर हैं । कोई भी समय केवल वर्तमान से निर्मित नहीं होता बल्कि अतीत को भी अपने साथ संस्कारित करता है । इसके सबूत के बतौर इस किताब में एक लेख कबीर की समकालीनता पर भी है । कहने की जरूरत नहीं कि कविता के बहाने अपने समय की गुत्थियों को समझने का गहन प्रयास लेखक ने इस किताब में किया है ।

हिंदी में आलोचना लिखने वालों का एक संप्रदाय अगर भाषा और अभिव्यक्ति में कविता से होड़ लेता है तो एक और लेखक समूह ऐसा भी है जिसकी किसी भी टिप्पणी में विचारणीय रचनाकार का नाम हटा दीजिए तो किसी भी दूसरे रचनाकार पर नया नाम डालकर इसे लागू कर सकते हैं । इस तरह की प्रचलित समीक्षकीय आलोचना से दूर अलग किस्म की आलोचना लिखने का साहस अच्युतानंद मिश्र ने किया है कदाचित इसलिए भी इस किताब को पाठक कम ही मिले । ध्यान देने की बात है कि किताब में सरोकार की एकता के बावजूद एक कवि के सिलसिले में कही गयी बात को दूसरे कवि के बारे में बात करते हुए दोहराया नहीं गया है । सभी कवियों के प्रसंग में उनकी काव्य संवेदना को सूत्र रूप में जिस तरह व्यक्त किया गया है उसके उदाहरण देने में इस लेख की सीमा से बाधा पैदा होती है । पाठक को निश्चय ही लेखक की विश्लेषण क्षमता का सबूत देने वाली यह बात प्रत्येक कवि के संदर्भ में नजर आयेगी । नमूने के तौर पर केवल कुछेक वाक्यांश उद्धृत किये गये हैं । यह किताब न केवल वर्तमान कविता विरोधी शोरगुल से भरे समय में कविता को जीवित रखने की कोशिश है बल्कि कविता की आलोचना के छिछलेपन को चुनौती देने का गम्भीर प्रयास भी करती है । किसी भी सार्थक विचार विमर्श के लिए इसे पढ़ा जाना चाहिए । गहन और दीर्घ चिंतन से निकले इन लेखों में ढेर सारे वाक्य सूक्तियों की तरह चमक उठते हैं ।

उदाहरण के लिए किताब का पहला ही वाक्य देखा जा सकता है ।‘कविता का सम्बन्ध समय से है, समाज से है, मनुष्य से है, लेकिन कविताएँ अपनी प्रकृति में, अपनी संरचना में, अपनी बुनावट में स्वायत्त होती हैं ।’इस सीधे सादे वाक्य से पता चलता है कि लेखक को वर्ण्य विषय की जटिलता का पता है । पूरी किताब में लेखक ने इस जटिलता का निर्वाह किया है । न तो उन्होंने अपने समय से मुख मोड़ा है, न समाज को अपनी निगाह से ओझल होने दिया है और न ही कविता की स्वायत्त बुनावट को कहीं क्षति पहुंचाई है । मनुष्य के मामले में उन्होंने उसकी शाश्वत धारणा के मुकाबले कालबद्ध किया है और पचास के दशक के ठोस मनुष्य की विशेषता को बारम्बार रेखांकित किया है । इसी मनुष्य की नवीनता को उजागर करने के कारण वे छायावाद के निषेध को इस समय की मनोवृत्ति से जोड़ते हैं । इस विशेषता को रेखांकित करने की सायास कोशिश पर यूरोपीय सोच में मौजूद युद्धोत्तर मनुष्य की विशेषता की छाया को लक्षित करना बहुत मुश्किल नहीं है । कदाचित इसलिए भी उनके विचार जगत में प्रगतिशील कविता और उससे निर्मित परवर्ती विरासत की मौजूदगी कम है । कह सकते हैं कि उनके विवेचन में नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल या वीरेन डंगवाल की अनुपस्थिति अनायास नहीं है । इसका अपवाद अरुण कमल ही हैं जिनके प्रसंग में केदारनाथ सिंह, नागार्जुन और त्रिलोचन का जिक्र आया है और सभी जानते हैं कि अपवाद से नियम की पुष्टि ही होती है ।         

अपने समय को लेखक जिस निगाह से देखना चाहता है सम्भवत: उस निगाह के लिए इनकी उपस्थिति किंचित असुविधाजनक है इसलिए उन्हें इस आधुनिकता के आंगन से बाहर रखना ही उनको जायज लगा होगा । सम्भव है लेखक ने इन कवियों की संवेदना को छायावादी काव्य संवेदना का ही विस्तार मान रखा हो । इस सचेतन बहिष्करण से और कुछ हो या न हो छायावादी काव्य संवेदना की जीवन क्षमता का पता लगता है । असल में स्वाधीनता के बाद आजादी की लड़ाई के दौर के साहित्य की विरासत का सवाल बेहद महत्व का बन गया । इसके मूल में देश की हकदारी का सवाल भी परोक्ष रूप से जुड़ा था । माना जाये या न माना जाये साहित्य की दुनिया से प्रगतिशील धारा को बाहर करने का प्रयास देश पर किसानों और कामगारों के अधिकार को नकारने से जुड़ा हुआ था । मुक्तिबोध को प्रगतिशील साहित्य से अलगाकर नयी कविता के खित्ते में डालने का अभियान इसी प्रयास का अंग था ।

जिस तरह अरुण कमल की कविता के प्रसंग में वे प्रगतिशील कविता की याद करते हुए वर्तमान परिदृश्य को भरा पूरा बनाना चाहते हैं उसी तरह अनामिका के बारे में लिखकर वर्तमान की एक बड़ी परिघटना को रेखांकित करते हैं । उन पर विचार करते हुए लेखक ने स्त्री लेखन के बहाने कविता की भाषा के बारे में बेहद महत्त्वपूर्ण बातें दर्ज की हैं । वे कहते हैं ‘सत्ता और ताकत की भाषा, विरुद्धों के सामंजस्य पर टिकी हुई है । हाँ और नहीं का युग्म उनकी टकराहट और गर्जना दरअसल उसके होने को प्रमाणित करता है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नकार में भी एक तरह का स्वीकार मौजूद रहता है । स्त्री काव्यभाषा के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बाइनरी से निकलने की है क्योंकि चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक, दोनों ही रास्ते से ताकत को ही वैधानिक बनाया जाता है ।’ अच्युतानंद मिश्र की आलोचना में इस तरह की सूझभरी बातें सर्वत्र बिखरी हुई हैं ।                                      

इस बेहद महत्त्वपूर्ण किताब के सिलसिले में उद्दात की जगह उदात्त का प्रयोग करने की सलाह देना अनधिकार चेष्टा नहीं समझा जाना चाहिए । एकाध अन्य जगहों पर भी प्रूफ़ की गलतियां खीर में कंकड़ की तरह खटकती हैं । इसका कारण हिंदी के प्रकाशकों की एक खराब आदत है । वे प्रूफ़ पढ़ने का खर्च बचाने के लिए लेखक से ही प्रूफ़ पढ़वाते हैं । असल में लेखक जब भी गलत टंकित देखता है तो उसका दिमाग उसे सही पढ़ता है । इस कारण शुद्ध छपाई के लिए लेखक से भिन्न व्यक्ति को प्रूफ़ दिखाना ठीक होता है ।

इस किताब को असहमति के लिए भी अवश्य पढ़ा जाना चाहिए । अपने समय को देखने के लिए उन्होंने जिन उत्तर आधुनिक चिंतकों का सहारा लिया है उनकी सोच पर विवाद रहे हैं लेकिन उन्हें खारिज करने के लिए भी हत्या, हिंसा, नफ़रत और लोभ तथा अनिश्चय से बने इस समय को देखने के उपकरणों को टटोलना तो चाहिए ही ताकि बची खुची संवेदना की नमी के सहारे सार्थक प्रतिरोध खड़ा किया जा सके । लेखक ने इसी वजह से बहुधा संवेदना का न केवल उल्लेख किया है बल्कि उसे कविता का आधार भी माना है । इस संवेदना का मूल उन्होंने मनुष्य की सामाजिकता में देखा है जिस पर हमला उन्हें वर्तमान की क्रूर सचाई लगता है ।          

 

Sunday, July 9, 2023

कोमिंटर्न की वैश्विकता

 


2023 में वर्सो से ब्रिजिट स्टूडेर की 2020 में छपी जर्मन किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘ट्रावेलर्स आफ़ द वर्ल्ड रेवोल्यूशन: ए ग्लोबल हिस्ट्री आफ़ द कम्युनिस्ट इंटरनेशनल’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद डेफ़िड रीज राबर्ट्स ने किया है । लेखिका ने 1980 में शोध के लिए रोजा ग्रिम को चुना । इनका जन्म ओदेसा के एक यहूदी परिवार में हुआ था । वे स्विट्ज़रलैंड के मजदूर आंदोलन में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरन बहुत सक्रिय थीं । स्विट्ज़रलैंड की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में थीं । कोमिंटर्न में काम करने मास्को गयी थीं । इस तरह स्त्री आंदोलन में लेखिका की रुचि उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन की ओर ले गयी । कोमिंटर्न और स्विट्ज़रलैंड की कम्युनिस्ट पार्टी के रिश्तों के बारे में छानबीन शुरू की तो 1990 में मास्को का संग्रहालय देखा । सोवियत संघ के बिखराव के बाद भी इसी क्षेत्र में काम जारी रखा । थोड़ा अंतराल के बाद कोमिंटर्न पर फिर काम शुरू किया । 1930 दशक में मास्को में रहने वाले विदेशी कम्युनिस्टों के बारे में लिखा जिसका अंग्रेजी में 2015 में अनुवाद हुआ और सराहा गया । एक समीक्षक ने सवाल उठाया कि आखिर क्यों इन लोगों ने स्तालिन के सामने अपना सिर झुकाया था । इस सवाल ने छानबीन को विस्तारित करने की प्रेरणा दी । अब लेखिका ने उन सभी लोगों के जीवन की छानबीन का बीड़ा उठाया । इससे शोध का देशकाल बहुत बढ़ गया । समझ आया कि यह एक अद्भुत राजनीतिक प्रयोग था जिसमें भविष्य की बेहतरी का प्रयास वैश्विक पैमाने पर व्यवस्थित, समन्वित और तार्किक तरीके से होना था । मास्को आने वाले सभी विदेशी कम्युनिस्टों को कोमिंटर्न की ओर से एक प्रश्नावली दी जाती थी जिसे भरकर जमा करना होता था । उसमें भारत से आये मानवेंद्र नाथ राय ने व्यवसाय की जगह क्रांतिकारी लिखा था । कोमिंटर्न ने उन्हें भी हजारों अन्य लोगों की तरह वैतनिक रूप से बहाल किया था । इस तरह वे विश्व क्रांति की कल्पना, तैयारी और व्यवहार के लिए आवश्यक तार्किक विश्लेषण तथा अति जटिल और परिष्कृत संगठन के उस अद्भुत अपूर्व राजनीतिक प्रयोग से घनिष्ठ तौर पर जुड़े थे । कलकत्ता से थोड़ी दूर के ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ था । वे पक्के उपनिवेशवाद विरोधी थे और भारत की आजादी के संघर्ष लायक वैचारिक हथियारों की खोज उन्हें मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट आंदोलन के करीब लेकर आयी थी । 1920 में कोमिंटर्न की दूसरी विश्व कांग्रेस में उन्होंने अपनी पहली पत्नी एवेलिन ट्रेन्ट के साथ भाग लिया था और उसके बाद से ही अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन की सेवा में लग गये । उन्होंने खुद भी लिखा है कि 1919 में पत्नी के साथ यूरोप जाने के बाद से ही भारत की आजादी के लिए लिखते, पढ़ते, संगठन बनाते और प्रचार करते यूरोप के अधिकांश देशों में घूमते रहे । वे उजबेकिस्तान, चीन और सोवियत संघ आते जाते रहे लेकिन हमेशा अवैध रूप से । इसके चलते कैद या देश निकाले का खतरा हमेशा बना रहता था । भारत लौटने के बाद उन पर गुप्त तरीके से मुकदमा चलाया गया और जेल की लम्बी सजा भी भुगतनी पड़ी ।

किताब में इसी तरह के पेशेवर क्रांतिकारियों के जीवन और हालात का जायजा लिया गया है जिन्हें मास्को में वैतनिक रूप से रखा गया था । उन्हें समय समय पर सामाजिक और राजनीतिक रिश्तों में क्रांतिकारी बदलाव लाने के मकसद से इधर उधर भेजा जाता था । सवाल है कि गिरफ़्तारी, यातना और मौत का खतरा होने के बावजूद लोग वैश्विक पेशेवर क्रांतिकारी होना चुनते क्यों थे , सुरक्षित जीवन की आरामदेह सुविधाओं के मुकाबले वे अनिश्चित घुमंतू जीवन आखिर क्यों अपनाते थे और कोमिंटर्न के काम में खुद को क्यों झोंक देते थे । कभी उनका समय भी आयेगा इस उम्मीद के सहारे समूचे जीवन की बाजी लगाना आम लोगों को बेवकूफी लग सकती है लेकिन क्रांतिकारी के लिए यह सहज था । हमारे व्यक्तिवादी वर्तमान से देखने पर यह सम्पूर्ण प्रतिबद्धता किसी दूसरी दुनिया की बात लग सकती है ।  लेकिन उन लोगों के लिए कोमिंटर्न के प्रयास उनके देशों की लड़ाइयों में जीत के आश्वासन का साकार रूप थे । यह अंतर्राष्ट्रीय संगठन विश्वव्यापी पूंजीवाद विरोधी क्रांति का न केवल पहला संगठित प्रयास था बल्कि साथ ही वह उपनिवेशवाद, नस्लभेद और साम्राज्यवाद विरोधी विश्व राजनीति का अगुआ था । प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की उथल पुथल में यह तमाम उपनिवेशों की आजादी के आंदोलनों के लिए वैचारिक स्पष्टता के अलावे सांगठनिक, भौतिक और मानव संसाधन भी उपलब्ध कराता था ।

1917 में सत्ता पर कब्जा करने के बाद बोल्शेविकों ने यूरोपीय ताकतों के उन तमाम गोपनीय समझौतों को प्रकाशित कर दिया जिनमें उन्होंने समूचे संसार को आपस में बांट देने की योजना बना रखी थी । 1919 में कोमिंटर्न की स्थापना कांग्रेस के घोषणापत्र में लेनिन और त्रात्सकी ने अफ़्रीका और एशिया की गुलामी को समाप्त करने का वादा किया था । सोवियत सत्ता ने एकदम शुरू से ही जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता दी थी । फ़िनलैंड और एस्टोनिया ने अपनी स्वाधीनता घोषित की लेकिन उन्हें अपनी आजादी के लिए खुद लड़ना पड़ा क्योंकि सोवियत सत्ता और उसकी विरोधी सेनाओं के बीच युद्ध चल रहा था । कोमिंटर्न के अंतर्राष्ट्रीय मुक्तिकारी स्वरूप के चलते मजदूरों के अतिरिक्त स्त्रियों, अश्वेतों और युवाओं के साथ अन्य सामाजिक समूहों को भी इसके साथ जुड़कर काम करने की प्रेरणा मिली । इसने जुड़ाव का ऐसा नया बोध पैदा किया जिसमें जातीय, राष्ट्रीय, लैंगिक या अन्य कोई सामाजिक पहचान गौण हो जाती थी । इसकी वजह थी कि कम्युनिस्टों के लिए अंतर्राष्ट्रवाद महज सरहदों का खात्मा या संकीर्ण राष्ट्रवाद से छुटकारा नहीं था । यह तो पूंजीवाद, वर्गीय उत्पीड़न, उपनिवेशवाद, नस्लभेद और स्त्री शोषण के खात्मे का अभिन्न अंग था ।

इस सामूहिक राजनीतिक चुनौती को क्रांतिकारियों ने खुशी खुशी स्वीकार किया क्योंकि मंजिल उन्हें नजर आ रही थी । जारशाही का अंत और सत्ता पर बोल्शेविकों का कब्जा नये युग की शुरुआत थी । इसने रूस को विशाल क्रांतिकारी परियोजना की प्रयोगशाला में बदल दिया । आखिर वह भूमंडल का छठवां हिस्सा जो था । रूसी क्रांति के प्रभाव से मुक्ति की व्यापक प्रक्रिया शुरू हो जाने का उन्हें भरोसा था । यूरोप व्यापी लोकतंत्रीकरण के लिए मौजूदा शक्ति संबंधों पर गम्भीर सवाल उठने लगे थे । रूसी क्रांति के प्रभाव से सारी दुनिया में बदलाव की जो लहर आयी उससे सचमुच क्रांतिकारी अंतर्राष्ट्रीयता का अनुभव हुआ । 1923 में जर्मनी की क्रांति के कुचले जाने से पहले एकाधिक लहरें आयीं ।

फ़िनलैंड ने जैसे ही आजादी की घोषणा की वहां गृहयुद्ध छिड़ गया । नवम्बर क्रांति के फलस्वरूप जर्मनी में कैसर को गद्दी छोड़नी पड़ी । आस्ट्रिया-हंगरी में बादशाहत का अंत हुआ । तुर्की में भी यही घटित हुआ । पोलैंड, आस्ट्रिया और जर्मनी में मजदूरों और सैनिकों की सोवियतों के गठित होने से बावेरिया और हंगरी के सोवियत गणराज्यों की घोषणा हुई । इटली में कारखानों और खेती की जमीनों पर कामगारों ने कब्जा कर लिया । आयरलैंड ने आजादी की घोषणा कर दी और काला सागर में फ़्रांसिसी नाविकों ने विद्रोह कर दिया । यूरोप के बाहर अमेरिका में अश्वेतों के संघर्ष ने गोरे शासकों के कान खड़े कर दिये और हड़तालों के चलते व्यवसाय पर संकट आया । कोरिया और चीन में जापानी उपनिवेशवाद और यूरोपीय साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारी जन प्रदर्शन हुए । बहरहाल यूरोप में हिंसक प्रतिक्रिया भी नजर आयी और बड़े पैमाने पर लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा ।

विरोध, विक्षोभ, विद्रोह और क्रांति की इस लहर का नेतृत्व तो वर्दीधारी अथवा नागरिक कामगारों ने किया लेकिन इनमें स्त्रियों और युवाओं जैसे सामाजिक और राजनीतिक तौर पर हाशिये पर मौजूद तबकों ने भी हिस्सा लिया । कलाकार, स्थपति, पत्रकार, वकील, विक्रेता और घरेलू स्त्रियों का भी क्रांतिकारी कायाकल्प हुआ । सबके लिए आशा की नयी दुनिया खुल गयी थी । लेखिका का कहना है कि रूसी क्रांति से पैदा लहर का इन सामाजिक समूहों के हितों के साथ कैसे मेल बैठ गया इसे समझने के लिए रूसी क्रांति को प्रबोधन, उद्योगीकरण और पश्चिमी आधुनिकता के अंतर्विरोधी चरित्र की आलोचना के साथ दक्षिणी गोलार्ध में व्याप्त क्रांतिकारी धाराओं और स्वाधीनता आंदोलनों तथा विचारों और व्यवहार के मेल के मेल के रूप में समझना होगा । बोल्शेविकों ने खुद को मजदूरों के वर्ग संघर्ष की आवाज के बतौर स्थापित करने के साथ ही वाम नारीवादियों, उपनिवेशवाद विरोधी कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का भी समर्थन किया ताकि संघर्षों की विविधता के भीतर एकजुटता पैदा की जा सके ।

लेनिन को यकीन था कि प्रथम विश्वयुद्ध से गृहयुद्ध और क्रांति की राह खुलेगी और उनका यकीन सही साबित हुआ । इसके बावजूद उनको लगता था कि क्रांति की यह लहर उतर जायेगी क्योंकि क्रांतिकारी ताकतें छोटे छोटे समूहों में बंटी थीं और मजदूर जनता दूसरे इंटरनेशनल की सुधारवादी पार्टियों की पिछलग्गू बनी हुई थी । यूरोप के मजदूर वर्ग के समर्थन के बिना सत्ता में बने रहना उनको सम्भव नहीं दिखायी दे रहा था । उन्हें जर्मनी की क्रांति से आशा थी जिसके बाद अन्य देशों में क्रांति होनी सम्भावित थी । इसीलिए बोल्शेविक नेताओं ने क्रांतिकारी ताकतों को नये इंटरनेशनल, कोमिंटर्न में संगठित किया । 1919 में विदेशी कम्युनिस्ट पार्टियों से महज तीन प्रतिनिधि शामिल हुए और इनमें भी जर्मनी की पार्टी का ही कुछ राजनीतिक प्रभाव था । तब कम्युनिस्ट पार्टी कहलाने वाली पार्टियां बहुत कम थीं । रूसी पार्टी ने भी 1918 में अपना यह नाम रखा था । जर्मनी में उन्हें स्पार्टाकस समूह कहा जाता था । बोल्शेविकों के साथ एकजुटता जाहिर करने के लिए जर्मनी के समूह ने 1918 के अंत में खुद को कम्युनिस्ट पार्टी कहा । इसके बावजूद उसके नेतागण रूसी पार्टी के दबदबे की आशंका से भरे हुए थे । रोजा लक्जेमबर्ग ने पश्चिमी यूरोप में कम्युनिस्ट पार्टियों के गठन तक नये इंटरनेशनल की स्थापना न करने को सोचा था ।

इसके बावजूद कोमिंटर्न ने समय की मांग को पूरा किया । सामाजिक जनवाद का सुधारवादी रुख पिट चुका था और मजदूर आंदोलन का भविष्य अस्पष्ट था । कोमिंटर्न की दूसरी विश्व कांग्रेस तक मजदूरों के पक्ष में लड़ने वाली प्रत्येक धारा का प्रतिनिधित्व था । केवल सामाजिक जनवादी धारा का कोई नहीं मौजूद था । उस समय विश्व क्रांति की चाहत बहुत मजबूत थी । नये इंटरनेशनल को वैचारिक रूप से मजबूत बनाया जाना था और सुचारु सांगठनिक ढांचा तैयार होना था । संगठन के लिए कार्यकर्ता और सम्पर्कों का जाल जरूरी थे । इसे प्रचार और मुहिम के मंच की जगह जुझारू संगठन में बदलने की जरूरत थी । दूसरी कांग्रेस ने कोमिंटर्न की कार्यपद्धति तय करने के साथ ही क्रांतिकारी गतिविधियों की एकता का वैश्विक आधार खड़ा किया । पूंजीवादी विश्व्व्यवस्था को ध्वस्त करने और विश्व क्रांति को संपन्न करने के लिए राजनीतिक ढांचा और वैश्विक सम्पर्क का निर्माण आवश्यक था । बोल्शेविकों को लग गया था कि उन्हें लम्बे समय तक अकेले ही रहना है । ऐसी स्थिति में ठोस सैद्धांतिक समझ और व्यावहारिक कौशल से युक्त पेशेवर क्रांतिकारियों की फौज चाहिए । मजबूत दुश्मन को स्वत:स्फूर्त कार्यवाहियों से नहीं हराया जा सकता । उसके लिए प्रशिक्षित और कुशल नेताओं के साथ ही जनता को भी वैचारिक रूप से तैयार करना होगा ।

Wednesday, June 21, 2023

पूंजीवाद क्या है?

 


 

(यह व्याख्यान कोचीन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के हरित केंद्र के लिए दिया गया था । तब यूक्रेन युद्ध बस शुरू ही हुआ था । कोरोना की छाया भी इसमें नजर आयेगी ।  मौखिक को लिखित में आकांक्षा भट्ट ने बदला और उसे मैंने संपादित किया । श्रोताओं का ध्यान रखते हुए केरल का भी जिक्र आता रहा। व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर भी हुआ ।)

सबसे पहली बात तो यही है कि पिछले एकाध दिनों से ऐसा घटनाक्रम शुरू हुआ है, जिसने समूची दुनिया को चिंता में डाल दिया है। कह लीजिये कि कोरोना से पूरी दुनिया ही प्रभावित रही थी। उसके बाद और उससे पहले से विश्व में जिस तरह का आर्थिक संकट आया हुआ था, उसमें कोरोना के आ जाने के बाद से और ज्यादा भीषण संकट पैदा हुआ। उसके बाद से राजनीति में चरम दक्षिणपंथी प्रवृतियाँ पूरी दुनिया में सामने आयी हैं । यह जो हाल-हाल का घटनाक्रम है, उसमें लग रहा है कि इतिहास का दोहराव हो रहा है। युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और पूरी दुनिया साँस रोके इस नये संकट का सामना करने के लिए दिमागी रूप से तैयार हो रही है। यह पूरी प्रक्रिया यानी आर्थिक संकट आना, फिर राजनीति में खास प्रवृत्तियों की शुरुआत होना पहली बार नहीं हो रहा है । आप सब जानते हैं कि पीछे भी 1929 ई. में जब एक मंदी आयी थी  तो ऐसा माना जाता है कि उस मंदी से उबरने के क्रम में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ा । फिर उसने एक हद तक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को ऐसी राहत दी, जिसके चलते मंदी से उसको निज़ात मिली। जो कुछ उस समय हुआ अर्थात फासीवाद का आना, आर्थिक संकट और फिर युद्ध । वह विराट युद्ध था जिसमें जन-धन की बड़े पैमाने पर क्षति हुई । बहुत सारे लोगों का कहना है कि इन संकटों के जरिये पूंजीवाद अपने आपको फिर से संगठित करता है। मार्क्स ने पूंजीवाद के बारे में लिखा था इसमें ऐसी बीमारी पैदा होती है जिस बीमारी का नाम इसके पहले कभी नहीं सुना गया था और उसको उन्होंने ‘एपिडेमिक’ कहा।

मैं जब कम्युनिस्ट घोषणापत्र पढ़ रहा था तो लग रहा था कि  कैसे 19वीं शताब्दी की शब्दावली इस समय लागू हो सकती है? तो उन्होंने कहा कि एपिडेमिक। एपिडेमिक किस चीज का? ओवर प्रोडक्शन का। उनके अनुसार जो पूंजीवाद है इसमें ओवर प्रोडक्शन का एपिडेमिक पहली बार देखने में आया । उन्होंने कहा कि  इससे पहले इसके बारे में कभी सुना ही नहीं गया था और यह सच्चाई है कि आमतौर पर पूंजीवाद के पहले जो मनुष्य की आबादी थी उसके सामने हमेशा ही संकट रहा था। कभी भी उसकी जरुरत लायक चीजों का उत्पादन उतने बड़े पैमाने पर नहीं हो पाता था, जितना पूंजीवाद के आने के बाद से हुआ और इसके बाद से अति उत्पादन की महामारी, एक नए तरह की महामारी जिसका कभी पहले नाम नहीं सुना गया था, प्रकट होती है ‘पूंजीवाद’ के भीतर। इसीलिए बहुत लोगों का कहना है कि ये संकट, यह युद्ध जैसी जो चीजें हैं, उनके जरिये पूंजीवाद स्वयं को पुनर्संगठित करता है। यह जो अति उत्पादन है, यह महामारी पूंजीवाद के पहले कभी नहीं सुनी गयी थी, इससे जो समस्या पैदा होती है उस समस्या को पूंजीवाद, संकट व युद्ध के जरिये हल करता है।

पूंजीवाद में एक मानव विरोधी विचार अन्तर्निहित है । आप सब जानते हैं कि इस महामारी के समय जब कोरोना पहली बार फूटा तो बहुत सारे लोगों ने और  पश्चिमी चिंतकों ने इस बात को कहा कि चूँकि इस बीमारी से वृद्ध लोगों का ज्यादा निधन हो रहा है तो इसके कारण एक हद तक  हमें यह लाभ मिला है कि ये जो पेंशन देना पड़ता है बहुत दिनों तक उनके ज़िंदा रहने के कारण लोगों को तो वह बोझ थोड़ा कम हो रहा है अर्थव्यवस्था पर। इसी को हमारे देश के प्रधानमंत्री ने एक बहुत ही बदनाम किस्म के मुहावरे में ढाला- ‘आपदा में अवसर’। पूंजीवाद जितना मानव विरोधी विचार है, वह समय-समय पर प्रकट होता रहता है। इस महामारी के दौरान भी ठीक ढंग से प्रकट हुआ है और अब युद्ध के जरिये फिर से प्रकट हो रहा है । इसलिए इससे जो जन-धन की हानि होती है उससे पूंजीवाद को कोई करुणा जैसी चीज नहीं पैदा होती बल्कि उसको इसके जरिये जो अति उत्पादन हो गया है चीजों का, एक हद तक उसे खपाने का अवसर मिलता है।

युद्ध एक तरह से पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं के लिए त्वरण का काम करते हैं। इससे बड़े पैमाने पर कपड़ों का उत्पादन और हथियारों का उत्पादन और इस तरह के तमाम काम जैसे सड़कें बिछाना, रेलें बिछाना ताकि सामान को पहुँचाया जा सके मोर्चे तक । इस तरह बड़े पैमाने पर आर्थिक हलचल शुरू हो जाती है। इस नाते पूँजीपति आमतौर पर युद्ध का विरोध नहीं करते और इसीलिए मार्क्सवादी लोग बहुत पहले से युद्ध विरोधी और शान्ति आंदोलनों के पक्षधर रहे हैं। वे लोग इस बात को जानते हैं कि युद्ध आमतौर पर पूंजीवाद के लिए उसको नवीकृत करने का अवसर प्रदान करते हैं। इस तरह यह जो पूंजीवादी व्यवस्था है, वह मानव विरोधी है और लोगों को हिंसा और युद्ध के मुँह में धकेलती है। इस व्यवस्था का मानव इतिहास में आगमन भी दरअसल प्राकृतिक और स्वाभाविक नहीं है । आप सब जानते हैं कि पूंजीवाद जब आया, तो जानता था कि अपना स्थायित्व वह केवल और केवल आर्थिक समृद्धि के बल पर हासिल नहीं कर सकता इसलिए उसने प्राकृतिक और स्वाभाविक होने का मिथक भी गढ़ा ।

किसी भी व्यवस्था के स्थायी होने के लिए या दीर्घजीवी होने के लिए जरुरी होता है कि मनुष्यों के विचारों को उसी के अनुरूप ढाला जाय। यानी मनुष्य यह मानने लगें कि यह व्यवस्था स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। किसी भी व्यवस्था का काम केवल और केवल समृद्धि अथवा दमन के जरिए नहीं चल सकता बल्कि विचारों की दुनिया पर भी उसे कब्जा करना पड़ता है। इसलिए पूंजीवाद ने बहुत सारी चीजों को इस तरह से प्रस्तुत किया जिससे लगा कि यह मानव स्वभाव का अंग है। व्यक्तिवाद को मानव स्वभाव के बतौर स्थापित किया गया और यह कहा गया कि पूंजीवाद चूँकि इसे सबसे अधिक संतुष्ट कर सकता है इसलिए पूंजीवाद मानव स्वभाव के अनुकूल व्यवस्था है। पूंजीवाद ने कोशिश यही की कि उसके जो आधारभूत मूल्य हैं, जो पूंजीवादी समाज व्यवस्था को टिकाये रखने में मदद करते हैं, उन मूल्यों को शाश्वत बना दिया जाए। उदाहरण के लिए आप सब जानते हैं कि प्रतियोगिता या होड़, यह ऐसी चीज है जो पूंजीवाद के साथ लगी हुई है और इसका व्यक्तिवाद से गहरा संबंध है । पूंजीवाद ने यह स्थापित करने की कोशिश की कि यह ऐसी चीज है जो मानव स्वभाव का अभिन्न अंग है। उसी तरह उसने यह स्थापित करने की कोशिश की कि ‘स्वार्थ’ मानव स्वभाव का अंग है । इस तरह से उसने यह बताने की कोशिश की कि पूंजीवाद कोई अप्राकृतिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह मानव स्वभाव के सबसे  अनुकूल व्यवस्था है और इसीलिए इसे ख़त्म करना असंभव है। जब तक मनुष्य के भीतर ये चीजें  मौजूद रहेंगी, उदाहरण के लिए- होड़, व्यक्तिवाद, स्वार्थ आदि, तब तक पूंजीवाद बना ही रहेगा। इसलिए पूंजीवाद ने आमतौर पर अपने आपको इतिहास से ऊपर रखा या यह सिद्ध करने की कोशिश की कि वह हमेशा से मौजूद रहा है क्योंकि मानव स्वभाव का वह स्वाभाविक अंग है। इस तरह विचारों के क्षेत्र में उसने अपने आप को इतिहासोपरि, अर्थात यह सिद्ध करने की कोशिश की कि उसकी पैदाइश नहीं हुई है बल्कि वह हमेशा से मौजूद था, क्योंकि वह मानव स्वभाव का अंग था। ऐसा बोलकर पूंजीवाद ने अपने आपको दीर्घजीवी या स्थायी बनाने के लिए वैचारिक जगत में एक  तरह की बात स्थापित की। इसीलिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम यह जानें और इस बात पर जोर दें कि पूंजीवाद का एक विशेष दौर में मानव सभ्यता में, मानव समाज में आगमन हुआ है न कि हमेशा से मानव समाज पूंजीवादी रहा है।

इस आगमन के साथ जो हुआ उसके बारे में मार्क्स ने भी लिखा कि पूंजीवाद ने पुरानी जड़ता को तोड़ दिया और समाज में बहुत तेज़ गति पैदा कर दी । सामाजिक विकास में यह ऐसी व्यवस्था है जिसने प्राचुर्य को जन्म दिया। इससे पहले अभाव का एक स्थायी भाव था हमारी मानव सभ्यता में लेकिन पूंजीवाद ने पहली बार मानव सभ्यता के इतिहास में प्राचुर्य को जन्म दिया। इसी के आधार पर उन्हें यह अनुमान हुआ कि अब मानव समाज ऐसे कालखण्ड में प्रवेश कर सकता है जिसमें उसे बहुत बुनियादी जरूरतों के लिए लगातार चिंतित रहने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी बल्कि मनुष्य के बतौर उसके शरीर की जो आवश्यकताएँ हैं, उन आवश्यकताओं की संतुष्टि के उपरान्त उसकी जो मेधा है, उसका जो मस्तिष्क है, उस मस्तिष्क की जो अपार संभावनाएँ हैं, उन अपार संभावनाओं को खोल देने का अवसर तभी प्राप्त हो सकता है जब उसकी जो शारीरिक ज़रूरतें हैं, उसकी जो भौतिक जरूरतें हैं,  उन भौतिक जरूरतों के लिए चिंतित रहने की जरूरत और समय समाप्त हो जाए। जब एक बार यह समय समाप्त हो जायेगा तो उन्होंने लिखा कि अब तक का इतिहास मनुष्य का प्राक्इतिहास है यह प्री-हिस्ट्री है। यह जो वर्ग विभाजित समाज है यह मानव समाज की प्री-हिस्ट्री है। इसके खात्मे के बाद मानव सभ्यता वास्तव में अपने  इतिहास में प्रवेश करेगी जब वह अपनी भौतिक जरूरतों से ही बंधे होने का जो समय था उससे मुक्त होकर वास्तव में जो उसकी चेतना है, उस चेतना के निवेश से खुलने वाली अपार संभावना की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

इससे पहले मनुष्य की जो ऊर्जा थी वह उसकी भौतिक जरूरतों को ही पूरा करने की चिंता और प्रयास में समाप्त हो जाया करती थी। कहने का मतलब यह है कि पूंजीवाद एक विशेष दौर में सामने आया जब यह संभावना उसने समाज में पैदा की। इसी प्रक्रिया में उसने कुछ ऐसे अंतर्विरोधों को जन्म दिया जिनको वह खुद ही हल नहीं कर सकता था। इसका कारण क्या था? कारण यह था कि उसका जन्म सामन्ती समाज में हुआ था । जिस सामन्ती समाज में पूंजीवाद का जन्म हुआ वह समाज स्वाभाविक तौर पर श्रेणी विभाजन या क्लास डिवीज़न वाला समाज था । यह विभाजन पूंजीवाद के भीतर भी मौजूद है, लेकिन उसकी किस्म अलग है। पहले सामंती समाज में जो श्रेणी विभाजन था वह दूसरे किस्म का था और उसमें था - विशेषाधिकार। किस तरह का विशेषाधिकार? जन्मजात विशेषाधिकार । ये विशेषाधिकार पदवी के हिसाब से, कुल गोत्र के हिसाब से यानी बहुत तरीकों से मौजूद थे। बहुत सारे लोगों ने शुरू में उन समाजों का मजाक उड़ाना शुरू किया तो इस बात को लिखा कि विवाह के लिए दोनों ही खानदानों की सैंकड़ों पीढ़ियों में पहले से आ रही शुद्धता का ध्यान रखा जाता था। जिस बात को आज भारतीय समाज के लिए कहा जाता है कि वह विवाह के लिए बहुत पुरानी रक्त शुद्धता खोजता है वह यूरोप में एक समय में बहुत अधिक था। सौ-सौ पीढ़ी पहले तक का इतिहास खंगाला जाता था विवाह के लिए। उस समाज में व्यक्ति की पहचान इस बात से जुड़ी हुई थी कि वह किस खानदान, किस गोत्र से है? और उसके हिसाब से उसे विशेषाधिकार हासिल थे । यह विशेषाधिकारों पर टिकी हुई जो व्यवस्था थी, सामन्ती व्यवस्था थी, उसे पूंजीवाद ने तोड़ा।

हम सब जानते हैं कि पूंजीवाद के विकास के तीन चरण रहे हैं। उसकी शुरुआत व्यापारिक पूंजीवाद  के दौर से हुई और यह जो व्यापारिक पूंजीवाद है; आप लोग थोड़ा माफ़ करियेगा मुझे क्योंकि साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते मुझे कई बार साहित्य के प्रसंगों का भी  उल्लेख करना पड़ेगा । असल में साहित्यिक परिघटनाओं को भी समझने में हम कई बार इसकी मदद लेते हैं। उदाहरण के लिए यह जो उपन्यास नाम की विधा है उसके बारे में कहा जाता है कि उपन्यास मध्यवर्ग का महाकाव्य है। आमतौर पर हम लोग इसका अर्थ यह लेते हैं कि मिडिल क्लास का। लेकिन हम यह देखें कि आखिर यह मिडिल क्लास है क्या चीज? आधुनिक समय के हिसाब से हम समझते हैं कि जो अतिसंपन्न तबका है यानी जो मुट्ठी भर धनकुबेर हैं और दूसरी तरफ जो मेहनतकश समुदाय है इन दोनों के बीच में जो है उसे मध्यवर्ग कहा जाता है। हम आमतौर पर आज इसका यह अर्थ लेते हैं। लेकिन शुरू के दिनों में जिस अर्थ में हीगल ने इस बात को कहा था, मूलतः यह हीगल का कथन है कि उपन्यास मध्यवर्ग का महाकाव्य है, उनके जमाने में मध्यवर्ग किसे कहा जाता था? आज की यह परिभाषा उस समय नहीं थी। असल में उस समय व्यापारी वर्ग को मध्यवर्ग कहा जाता था और वह शहरों में ज्यादा केन्द्रित था और इसीलिये उसे बर्गर भी कहा जाता था। यूरोप में शहरों के नाम के आगे बुर्ग जैसे पीटर्सबुर्ग आदि मिलेंगे। तो उस बुर्ग में रहनेवाले जो लोग थे उन्हें बर्गर कहा जाता था। यह समुदाय पैदा हुआ उस सामन्ती समाज में, उस खेतिहर समाज में । जो खेतिहर समाज था उसमें आमतौर पर जो लोग थे, जो क्लासेज थे, उन क्लासेज को आमतौर पर आप एक ओर लैंडलार्ड कहते हैं यानी जमीन के मालिकान और दूसरी तरफ जिनको आप भूदास कहते हैं वो लोग थे। इन दोनों बड़े वर्गों के बीच, यानी लैंडलॉर्ड और भूदास के बीच जो नया वर्ग पैदा हुआ वह व्यापारी किस्म का था और शहर केन्द्रित था । उसे ही उस समय मिडिल क्लास कहा गया। कारण कि भूदास बहुत नीचे था और लैंडलॉर्ड बहुत ऊपर था । ऐसे में यह उदीयमान मध्यवर्ग या यह नवोदित मध्यवर्ग दरअसल व्यापारी वर्ग था और पूंजीवाद का जो आरम्भ है वह इसीलिए व्यापारिक पूंजीवाद है। इसके अतिरिक्त पूंजीवाद का क्रमशः विकास हुआ है। पूंजीवाद ने जन्म लिया था सामन्ती समाज में तो व्यापारिक पूंजीवाद के रूप में जन्म लिया था ।

तब स्वाभाविक रूप से उसके भीतर एक तरह की क्रांतिकारिता मौजूद थी। क्रांतिकारिता किसलिए मौजूद थी? क्रांतिकारिता इसलिए मौजूद थी, क्योंकि उसे ऐसे समाज का सामना करना पड़ रहा था जो ऊँच-नीच की पुराने किस्म की व्यवस्था पर आधारित था। जहाँ पर लैंडलार्ड और सर्फ़ थे, एक ऐसे समाज में उसे संघर्ष करना पड़ रहा था, अपनी हैसियत प्राप्त करने के लिए। ऐसी स्थिति में उसने कुछ नये मूल्य अपनाये जो बड़े ही क्रांतिकारी मूल्य थे उस समय को देखते हुए । इसी सिलसिले में एक पहलू पर ध्यान देना उचित होगा । जब यूरोप से भागकर लोग अमेरिका गये थे, और पूंजीवाद के इतिहास में यह भी एक खास बात है कि जिस तरह युद्धों से आबादियों का घटना होता है उसी तरह आबादी का दबाव एक पलायन के कारण कम हुआ था । बहुत बड़ा पलायन हुआ था तब जब यूरोप से अमेरिका में लोग भागकर गये थे । इसलिए अमेरिका इस बात पर गर्व करता है कि यूरोप जैसा सामंती इतिहास अमेरिका का नहीं रहा और इसलिए वह अपने आप को लोकतंत्र की जननी भी कहता है क्योंकि उसके यहाँ यूरोपीय सामंती किस्म का अतीत नहीं रहा है। वहाँ के पूंजीवाद की अपने किस्म की विशेषताएँ हैं जिसके बारे में हम आगे  के किसी व्याख्यान में बातचीत करेंगे।

फिलहाल महत्त्व की बात यही है कि जो सामंती समाज था उससे विद्रोह पूंजीवाद ने अपने शुरुआती जीवन में किया । हम सब जानते हैं कि बहुत सारी जगहों पर सामंती प्रभुओं के साथ पूंजीपतियों की लड़ाई हुई है । जो व्यापारी वर्ग था उसे सामंती किस्म के समाज में जो सामंती प्रभु थे उनके साथ लड़ना पड़ता था। जो सामंती प्रभु थे वे यह समझते थे कि हमारा पावर ये क्यों नहीं मान रहा है? इस बात को अगर जातिगत रूप से भी समझें तो जाति प्रथा केवल भारत में ही नहीं रही है, एक तरह का ऊँच-नीच का भाव पूरी दुनिया में मौजूद रहा है और यह यूरोप में भी मौजूद रहा है। इसलिए एक हद तक यह माना जाता था कि व्यापार का कर्म करने वाले जो लोग हैं वे लोग थोड़ा नीचे के लोग हैं। उदाहरण के लिए जो ऐसे लोग हैं जिनके पास बड़ी खेती या जमींदारी है तो उन्हें कुछ काम नहीं करना पड़ता, शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता । चूँकि उन्हें शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता तो इसी को श्रेष्ठता से जोड़ दिया गया। दास और उसके मालिक के बीच में यह एक बड़ा विभाजन था कि शारीरिक श्रम करना दास का काम था जबकि उसका मालिक शारीरिक श्रम से आजाद रहता था। तबसे ही शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच एक तरह का श्रेष्ठताबोध बन गया कि शारीरिक श्रम करनेवाले हीनतर लोग हैं और मानसिक श्रम करने वाले, यानी जो शारीरिक श्रम नहीं करते हैं वे लोग ऊँची स्थिति में हैं । ऐसे में स्वाभाविक तौर पर जो जमींदार हुआ करते थे वे अपने आपको ऊँचा समझते थे और जो व्यापारिक समुदाय था उनको हीनतर समझते थे । हीगल ने इस बात को लिखा है, जिसको आप सिविल सोसाइटी कहते हैं आज के दौर में यानी स्टेट से अलग जिसको आप नागरिक समाज कहते हैं वह, और दूसरा ये जो  रूल ऑफ़ लॉ की धारणा है ये पूंजीवाद के व्यापारिक दौर की उत्पत्ति है। जो व्यापारिक पूंजीवाद था, जो व्यापारी समुदाय था वह यह कह रहा था कि- स्टेट यानी राज्य यानी सरकार यानी  सत्ता तो सत्ता तो है बादशाह के हाथ में या उसकी सेना के पास ताकत है। ऐसी स्थिति में हम क्या हैं? हम नागरिक समाज हैं और इसलिए इसमें जो नगर है और जिससे धारणा पैदा हुई सिटिजन की यानी नागरिक की, उसमें सिटी को ध्यान में रखिए। मैंने पहले ही कहा कि बर्गर, बर्ग यानी शहर, नगर।

जो उदीयमान पूंजीपति था, जो पूंजीवादी समुदाय था वह नगर केन्द्रित था और इसलिए यह चीज सामने आयी। उसके कारण ही राज्य से अलग एक अस्तित्व, एक भिन्न किस्म का समूह, एक भिन्न किस्म की जगह या स्पेस निर्मित हुआ। यही बाद में सिविल सोसाइटी ओर्गेनाइजेशन की बहुत महत्वपूर्ण अवधारणा में प्रतिफलित हुआ । खासकर नवउदारवाद के आने के बाद से यह   प्रतिष्ठित हुई और उसके पीछे बात ही यह थी कि जो सरकारी कामकाज है उससे अलग हम समाज में सुधार के लिए प्रयास करेंगे। यह धारणा हीगल  से आती है और यह  व्यापारिक पूंजीवाद की देन है। व्यापारिक पूंजीवाद में व्यापारी समूहों ने कहा कि हम सरकार के भीतर नहीं हैं, हम अलग समूह हैं और इसलिए हमारी इस समूह के बतौर एक स्वतंत्रता है, एक स्वायत जगह है और इसको मान्यता दी जानी चाहिए। उसी तरह से रूल ऑफ लॉ यानी संविधान की जो बात सामने आयी यह  भी बात उसी से सामने आयी कि जो व्यापारिक लेन-देन है वह बिना रूल ऑफ लॉ के चल ही नहीं सकता है। इसके लिए समझौता या संविदा की जरूरत होती है । कहने का मतलब कि हमने इतना सामान आपको दिया और बदले में यह लेने का मुझे अधिकार है। यह जो बात है कि लेन देन का एक क़ानून होना चाहिए  ।  पुराने ज़माने में राजा की इच्छा ही कानून था लेकिन उसके मुकाबले यह बात कि नहीं, कानून एक अलग चीज़ है। वह एक अलग चीज़ है और उससे समाज शासित होगा, बजाय इसके कि किसी की इच्छा से शासित हो। इन दोनों ही धारणाओं के मूल पूंजीवाद के इस शुरुआती चरण में हैं । एक, सिविल सोसाइटी की धारणा जिसे नागरिक समाज आप कह सकते हैं इस अर्थ में कि वह नगर केन्द्रित था।

आप सब जानते हैं कि मार्क्स ने जो प्रमुख अंतर्विरोध बताये मानव सभ्यता के, उनमें एक था शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच का अंतर्विरोध। दूसरा था देहात और शहर के बीच का अंतर्विरोध। यह भी बहुत बड़ा अंतर्विरोध है। मैं आपके प्रांत में दो बार गया और इस बात को पहले भी हम जानते थे कि वह अंतर्विरोध आपके यहाँ उतना नहीं रह गया है लेकिन उत्तर प्रदेश या बिहार के इलाकों में जब आप आइएगा तो आपको यह विरोध, यह अंतर स्पष्ट दिखाई पड़ेगा नगर और देहात के बीच । यह भी एक अंतर्विरोध पैदा हुआ पूंजीवाद के आने के साथ ही । पूंजीवाद केन्द्रित था नगरों में । रूल ऑफ लॉ और सिविल सोसाइटी की जो धारणाएँ हैं वे भी व्यापारिक पूंजीवाद के आगमन के साथ जुड़ी हुई हैं। यह जो नया दौर था, जो व्यापारिक पूंजीवाद के साथ आया उसमें सामंती समाज की आलोचना के आधार पर ही व्यापारिक पूंजीवाद या यह जो समुदाय था, जो व्यापारी समूह था, यह अपने को सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित कर सकता था इसलिए सामन्ती समाज की आलोचना की सबसे क्रांतिकारी आवाजें इसी दौर में पूंजीवाद के भीतर पैदा होती हैं। 

जिसे आप लोकतंत्र कहते हैं उस लोकतंत्र की अवधारणा भी दरअसल उसी दौर की अवधारणा है जब पूंजीवाद विकसित हो रहा था सामंती समाज के गर्भ में, और अपने लिए सामाजिक मान्यता प्राप्त करने की कोशिश कर रहा था। इसके लिए फिर से आपको एक धारणा की ओर मैं ले जाना चाहता हूँ और वह है- सिविल सोसाइटी और स्टेट की धारणा। स्टेट यानी राजसत्ता और सिविल सोसाइटी यानी नागरिक समाज। यह अंतर्विरोध हीगल के यहाँ बहुत गहराई से मौजूद है । मैंने आपको बताया कि सिविल सोसाइटी को वे बहुत महत्वपूर्ण तत्व के रूप में देखते हैं क्योंकि सामन्ती समाज से लड़ते हुए पूंजीवाद का जो विकास हो रहा है उस समय उसके हाथ में एक हथियार के बतौर यह धारणा मौजूद है । राजसत्ता के पैदा होने के साथ लोकतंत्र की धारणा पैदा होती है । इसके मूल में था थर्ड स्टेट। थर्ड स्टेट का मतलब हुआ कि एक तरफ राजसत्ता है दूसरी तरफ चर्च यानी धर्मसत्ता। इन दोनों के अलावा थर्ड स्टेट कहा जाता था जो आम लोग थे उनको। पूंजीवाद ने, पूंजीपतियों ने, पूंजीपति समूहों ने व्यापारिक पूंजीवाद के दौर में राजनीतिक सामाजिक रूप से सिर्फ मान्यता प्राप्त करना ही महत्वपूर्ण नहीं समझा बल्कि उन्होंने सत्ता को, राजसत्ता को भी अपने लिए एक टूल के बतौर, एक उपकरण के बतौर इस्तेमाल करने के लिए उस पर कब्जा करना आवश्यक समझा। उन्हें लगा कि केवल सिविल सोसाइटी का होना ही महत्वपूर्ण नहीं है, केवल यही महत्वपूर्ण नहीं है कि नियम कानून से सब कुछ चले, यह नहीं कि जिसकी जैसी मर्जी हो उसके हिसाब से चलने लगे। यह नहीं कि मेरी इच्छा है इसलिए ऐसा हो जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए बल्कि कुछ नियमों के आधार पर इस समाज का संचालन होना चाहिए- इतने तक ही रह करके पूंजीवाद को अपने लिए बहुत सुखद वातावरण नहीं महसूस हुआ। उसे यह जरूरी लगा कि जो राजसत्ता है, सत्ता है, जो स्टेट पावर है तो उस स्टेट पावर को भी हमारे कब्जे में होना चाहिए।

तो उस स्टेट पावर को अपने कब्जे में लाने के लिए उसने लोकतंत्र के विचार का समर्थन किया जिसमें सार्विक मताधिकार की स्थापना जरूरी प्रतीत हुई । हम सब जानते हैं कि सार्विक मताधिकार एकदम से, एक ही बार में हासिल होने वाली चीज़ नहीं है और इस बात को विस्तार से एरिक हॉब्सबॉम ने अपनी नाइनटीन्थ सेंचुरी ट्रायोलॉजी में बताया कि कैसे मताधिकार क्रमशः विस्तारित हुआ है। और उसके विस्तारित होने में किस चीज़ ने योगदान दिया या नारा क्या था? नारा यह था कि पहले वोट देने का या मत देने का जो अधिकार था स्वाभाविक रूप से वह संपत्ति के आधार पर सीमित हुआ करता था, जब शुरू हुआ तब। कहने का मतलब कि जब मताधिकार शुरू हुआ तो वह संपत्ति के आधार पर दिया जाता था और उस ज़माने में शिक्षा भी महत्वपूर्ण चीज हुआ करती थी। तो शिक्षा और सम्पत्ति इनके हिसाब से मताधिकार दिया जाता था। लेकिन मज़दूरों ने क्रमशः आंदोलन करके मताधिकार को विस्तारित करने का एक अभियान चलाया और उस अभियान को विश्व इतिहास में, मजदूर आंदोलन के इतिहास में चार्टिस्ट आंदोलन के नाम से जाना जाता है। हम सब जानते हैं कि यह जो चार्टिस्ट आंदोलन है इसका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि चार्टर ऑफ डिमांड, पांच मांगों का एक चार्टर था और प्रति वर्ष जब भी संसद बैठती थी तो बड़े पैमाने पर हस्ताक्षर करा के मजदूर लोग, बैलगाड़ियों में भरकर उसे ले जाते थे और संसद को सौंपते थे। जिस पर हस्ताक्षर कराकर ले जाया जाता था वह चार्टर ऑफ़ डिमांड था। उसी के आधार पर उस आंदोलन को चार्टिस्ट आन्दोलन कहा गया और उस चार्टिस्ट आंदोलन में यह जो मताधिकार है उसको विस्तारित करने की मांग होती थी। जिसे लोकतंत्र कहते हैं उसे तो स्वाभाविक रूप से पूंजीवाद ने राजसत्ता पर अपने कब्जे के लिए धारणा के बतौर सामने लाया। धारणा यह थी कि जिस पर शासन किया जाना है उसकी सहमति की आवश्यकता है, उसकी सहमति के बगैर कोई भी चीज लादी नहीं जा सकती है। अब यह जो सहमति है वह किस तरह से हासिल की जा सकती है? उस सहमति को हासिल करने के क्रम में प्रतिनिधिमूलक या कह लीजिये संसदीय प्रणाली का उदय हुआ। इस तरह लोकतंत्र के लिए प्रतिनिधिमूलक संसदीय प्रणाली का व्यवहार, यह व्यापारिक पूंजीवाद के प्रमुख वैचारिक अस्त्रों में था लेकिन जो प्रतिनिधित्त्व था उसे पूंजीवाद स्वाभाविक रूप में सीमित रखना चाहता था संपत्तिवान वर्गों के ही हाथ में। उसे क्रमशः विस्तारित करने के लिए चार्टिस्ट आंदोलन ने बहुत लंबी लड़ाई चलाई और वह लड़ाई कई बरसों तक चलती रही थी। उस लड़ाई के जो पहलू थे उनके और कुछ पहलुओं के  बारे में अगले व्याख्यानों में हम लोग बात करेंगे। 

फिलहाल हम इस पर ज़ोर देना चाहते हैं कि यह जो लोकतंत्र का सवाल है, इसे भले पूंजीवाद ने सामंतवाद के विरोध के लिए अपनाया लेकिन इसमें कॉन्टेंट या कह लीजिए कि इसे आम जनता तक पहुँचाना, यह काम तो शुद्ध रूप से मजदूर वर्ग ने किया है। एक जमाने में जब संसद में आम लोगों का प्रवेश नहीं हुआ करता था यानी मज़दूरों का प्रवेश नहीं हुआ करता था तो उस जमाने में ट्रेड यूनियनें ही मज़दूरों के लिए संसद के समान हुआ करती थीं। इसीलिए समझना होगा कि लोकतंत्र केवल और केवल संसद तक महदूद नहीं है। अगर केवल संसद तक उसे सीमित रखने की कोशिश की जाएगी तो वहाँ भी नहीं रह सकता है। जैसे बिना किसी धरती के हम खड़े नहीं हो सकते हैं, हमें कोई न कोई आधार चाहिए, जिसपर हम खड़ा हो सकें, उसी तरह यह जो लोकतंत्र है, प्रतिनिधिमूलक जो लोकतंत्र है यह तभी खड़ा हो सकता है जब इसका आचरण केवल ऊपरी स्तर पर न रहे बल्कि नीचे से इसके सहारे के लिए विभिन्न संस्थाएँ भी मौजूद रहें। वे संस्थाएं उनको आधार देती हैं तो वो कैसी संस्थाएँ थीं? जैसा हमने कहा उसका एक रूप ट्रेड यूनियनें थीं। मजदूर को वोट देने का भी अधिकार नहीं था फिर धीरे-धीरे उनको यह अधिकार हासिल हुआ और स्त्रियों को यह अधिकार और बाद में मिला है लेकिन उस कहानी को फ़िलहाल छोड़ते हैं हम।

लोकतंत्र पूँजीपति ले आये अपने हित में राजसत्ता पर कब्जा करने के लिए लेकिन वह शुरू से ही वह लड़ाई का मैदान हो गया और उसमें मजदूर भी अपने हस्तक्षेप, अपनी भागीदारी के लिए लड़ने लगे। इस प्रकार यह जो व्यापारिक पूंजीवाद था इसने कुछ ऐसी धारणाओं को जन्म दिया, कुछ ऐसी संस्थाओं को जन्म दिया जिन्होंने समाज के अन्य तबकों का बड़े पैमाने पर राजनीतीकरण किया । उनको भी यह यह बात साफ समझ में आयी कि दरअसल परिवर्तन का स्रोत राजनीतिक सत्ता है इसलिए राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करने के लिए हमें एकताबद्ध होना होगा।

पूंजीवाद ने यह किया कि लोगों को गांवों से उखाड़कर शहर ले आया और यह ऐसा इतिहास है जिसको हमें समझना चाहिए । फैक्ट्रियाँ बन गयीं तो फैक्ट्रियों के लिए मजदूर कहाँ से आएँगे? अब इसको उसी तरह से समझिए कि जैसे जो प्लैटफॉर्म्स हैं, ये प्लैटफॉर्म्स मौजूद थे, ज़ूम मौजूद था, गूगल मौजूद था, फेसबुक मौजूद था लेकिन इस कोरोना महामारी ने इनको हमारे रोज़मर्रा के जीवन में दाखिल कर दिया है । उसी तरह से कारखाने तो ठीक हैं लेकिन उनमें मजदूर के बिना आये तो ऐसे ही है कि आपने कारखाना लगा दिया है और उसका कोई माने मतलब नहीं रह गया है। उसी तरह जैसे गूगलमीट मौजूद था, जैसे ज़ूम मौजूद था लेकिन उसके उपयोगकर्ता बहुत नहीं थे। यूट्यूब भी था लेकिन उसको उतने लोग देखते नहीं थे। यहाँ तक कि ये जो ओटीटी प्लेटफॉर्म आये, बहुत लोकप्रिय हुए, हालांकि ये आये तो बहुत पहले से थे लेकिन इस महामारी के दौरान बहुत लोकप्रिय हुए। इस लोकप्रियता का यही कारण था कि यह जो महामारी आयी उसने इस तरह के चीजों के लिए उपभोक्तावर्ग या एक बाजार पैदा कर दिया । उसी तरह कारखाने तो थे लेकिन उनमें काम कौन करेगा? उनमें काम करने वाले देहात के जो लोग थे वे थे । इन देहात के लोगों में, गाँवों में एक तरह की सामुदायिकता होती है लेकिन अलग-अलग जगहों से आये हुए ये लोग जब एक ही कारखाने में काम करने के लिए इकट्ठा हुए तो शुरू में उनमें बहुत सारे भेद थे । बहुत सारे लोग कहते हैं कि हमारा देश तो जातियों में बंटा हुआ है, धर्मों में बंटा हुआ है, तो मजदूर वर्ग में एकता कैसे होगी? एरिक हॉब्सबाम ने लिखा है कि शुरू में यूरोपीय देशों में भी यही था। प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक में बंटे हुए लोग थे और अलग-अलग देशों के लोग थे।

आप सब जानते हैं कि जिसको फर्स्ट इंटरनेशनल कहते हैं, जिसको कार्ल मार्क्स ने स्थापित किया था वह इसीलिए स्थापित हुआ था कि जब इंग्लैंड के मजदूर हड़ताल करते थे तो इंग्लैंड के पूंजीपति फ्रांस के लोगों को बुला लेते थे अपने यहाँ काम करने के लिए इसलिए मज़दूरों में अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता पैदा करने के लिए इंटरनेशनल की स्थापना की गई थी। तो ये जो फैक्ट्रियां थीं इन फैक्ट्रियों में काम करने के लिए देहातों से जो लोग आये वे स्वाभाविक तौर पर अलग-अलग जगहों से थे फिर भी जो कारखाने बने तो उनमें एक साथ काम करने के कारण उनमें नये किस्म की सामूहिकता का विकास हुआ। इस प्रकार यह जो पूंजीवाद है उसने समाज के निचले तबकों को एक तरह की राजनीतिक चेतना दी। उन्हें एकत्र किया एक जगह पर और उनमें ऐसी भावना पैदा की जिससे वे अपने सामूहिक हितों को पहचानने लगे। उन्होंने देखा कि अगर मजदूरी बढ़ती है तो सबको उससे फायदा होना है । इस तरह उनके सामूहिक हित का जन्म हुआ । यह एक नये किस्म की सामूहिकता थी जिसे पुराने किस्म की सामूहिकता को, जिसको पूंजीवाद ने तोड़ दिया था, उसे तोड़कर फिर से इस नये किस्म की सामूहिकता को मजदूर वर्ग ने अपने लिए अर्जित किया । पूंजीवाद ने इसमें उसे शिक्षित किया और उसका राजनीतीकरण किया और इसी अर्थ में मार्क्स ने कहा कि उसने अपनी कब्र खोदने वालों को पैदा किया है । ये जो मजदूर थे, ये कारखानों में जो काम करते थे उन्होंने जब अपनी चेतना के जरिये यह समझा कि हमारा एक कलेक्टिव इंटरेस्ट है, तो इसी को आप करते हैं- क्लास कॉन्शसनेस। एक क्लास के बतौर या एक समुदाय के बतौर उनको अपनी एकता की अनुभूति हुई अर्थात उसकी चेतना आयी। पूंजीपतियों के भीतर यह चेतना मौजूद थी क्योंकि जब वे सामंतवाद के खिलाफ़ लड़ रहे थे तो सामूहिक ढंग से काम करके ही उन्होंने कुछ मूल्यों को इस समाज में स्वीकार्य बनाया, कुछ संस्थाओं को जन्म दिया जिनके जरिए उन्होंने राजनीतिक सत्ता पर कब्जा किया और राजनीति को नये किस्म का रूप दिया और इस क्रम में उन्होंने मजदूर वर्ग को भी इस बात के लिए शिक्षित किया कि वह भी उनकी पीठ पर चढ़कर और जिस तरह से उन्होंने राजसत्ता पर कब्जा किया उसी तरह से वह भी राजसत्ता पर कब्जा करने का प्रयास करे और जिस तरह उन्होंने राजनीतिक पार्टियाँ बना कर और सामंतों को बेदखल करके राजसत्ता के नए केंद्र स्थापित किये थे यानी संसद आदि उसका अनुकरण करे ।

हम सब जानते हैं कि इस मामले में समझौता हुआ। फ्रांस में तो कोई पुरानी सत्ता रह नहीं गयी लेकिन इंग्लैंड में राजा की सत्ता बनी रही और संसद भी रही लेकिन संसद ऊपर हो गयी । यह समझौता हुआ लेकिन संसद सबसे महत्वपूर्ण हो गयी । संसद का काम क्या है? क़ानून बनाना और कानून के हिसाब से समाज चलेगा। तो यह जो पूरा का पूरा तानाबाना है, इसे पूंजीवाद ने निर्मित किया और सामंतवाद से लड़ने के लिए उसका उपयोग किया। इसी क्रम में उसने मज़दूरों को भी शिक्षित किया कि वे समुदाय के बतौर सामूहिक रूप से अपने हितों को पहचानें और उसे राजनीतिक भाषा में व्यक्त करें, यहाँ तक कि अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन करके राजसत्ता पर कब्जा करने की भी कोशिश करें।

पूंजीवाद के बारे में बहुत सी बातें कही जाती हैं लेकिन मेरा जोर इस बात पर है कि एक विशेष ऐतिहासिक परिस्थिति में पूंजीवाद का जन्म हुआ था और उसने ऐसे हालात पैदा किये क्योंकि वह सामंती समाज से लड़कर विकसित हुआ था और उसी क्रम में उसने ऐसे हालात पैदा किये, उसने कुछ क्रांतिकारी किस्म के मूल्यों और संस्थाओं को जन्म दिया जिससे फिर मजदूर वर्ग ने शिक्षा प्राप्त की लेकिन जो पूंजीवाद था उसने इन्हीं मूल्यों से धोखा किया। जहाँ लोकतंत्र के जरिये, प्रातिनिधिक संसद के जरिये स्थापित होनी थी सत्ता, वहाँ पर पता चला कि धन की सत्ता स्थापित हो गयी । जहाँ सबको प्रतिनिधित्व का एहसास होना था, उसकी बजाय वह धन की सत्ता में तब्दील होता चला गया और इसलिए लोकतंत्र का जो उनका आश्वासन था, उसे उन्होंने ही झूठा साबित कर दिया।

पूंजीवाद की तमाम महान वक्तृताएँ झूठ का पुलिंदा बनकर रह गयीं । जिन मूल्यों को पूंजीवाद ने जन्म दिया उन मूल्यों को वह खुद ही पूरा नहीं कर सकता था। यह एहसास धीरे-धीरे मजदूर समुदाय में आया और इसके कारण मजदूर समुदाय ने इस बात को समझा, मेहनतकश लोगों ने इस बात को समझा। एक नये तरह की एकता के जरिए इस बात को समझा कि अब उन मूल्यों को, उन कार्यभारों को पूरा करना उनकी जिम्मेदारी बन गयी है।

यह जो पूंजीवाद है, इसने मजदूर समुदाय को देहातों से उखाड़ा और वह बहुत ही दुखद किस्म की कहानी है। आप सब जानते हैं कि जिसको इंग्लैंड का किसान कहा जाता था, पुराने साहित्य में उसकी गंभीर मौजूदगी है। लेकिन हुआ क्या? हुआ यह कि धीरे-धीरे उनके खेत भेड़ों के रेवड़ में बदलने लगे। भेड़ों का रेवड़ माने भेड़ों का झुण्ड उन खेतों में पाला जाने लगा क्योंकि फसलों के मुकाबले, खेती से पैदा होने वाली चीजों के मुकाबले भेड़ों की पीठ पर जो ऊन होता था वह ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। महत्वपूर्ण क्यों हो गया? क्योंकि सर्दियाँ पड़ती थीं और ऊन के आविष्कार ने ज्यादा मुनाफ़े वाला कारोबार इंग्लैंड के देहातों में पैदा किया इसलिए इंग्लैंड के जो खेत थे, जो वहाँ के लोगों के भरण-पोषण के लिए साधन हुआ करते थे, उन खेतों में भेड़ें पाली जाने लगीं और फसलें ख़त्म होने लगीं। इसके चलते बड़े पैमाने पर किसान अपनी जमीनों से उखड़े और इसके लिए एक शब्द भी चलता है – एन्क्लोजर्स। कहने का मतलब यह है कि जो मालिक थे जमीनों के उन्होंने भेड़ों के बड़े रेवड़ रखने के लिए बड़ी जमीनों के टुकड़ों को एन्क्लोजर्स में बदल दिया, मतलब घेर लिया। जो चीजें पहले लोगों के लिए खुली हुई थीं, पशुओं के चरने के लिए जो चारागाह हुआ करते थे, उन्हें एक तरह की निजी संपत्ति में बदला जाने लगा। कृषि के भीतर यह जो बड़ा परिवर्तन हुआ उसके कारण लोग अपने खेतों से उजड़ने लगे । यह ध्यान में रखियेगा कि इंग्लैंड में यह जो प्रक्रिया शुरू हुई थी पूंजीवाद के पनपने की इसी को देखते हुए मार्क्स ने इस बात को लिखा है कि जब वे उपनिवेशों में गये तो उन्होंने जो कुछ अपने देश में किया था, उसी को ज्यादा क्रूरतापूर्ण ढंग से उपनिवेशों में करना शुरू किया। उन्होंने क्या किया? एक तो उन्होंने खेतों को उजाड़ डाला, किसानों को उनकी आजीविका से अलग कर दिया। इसके कारण किसान दर-दर भटकने लगे। जब वे कारखानों में काम करने गये तो उनकी हालत को देखते हुए मार्क्स ने कहा कि ये वेज स्लेवरी है। ये स्लेवरी ही है लेकिन पगारजीवी गुलामी है । लोकतंत्र के प्रसंग में उन्होंने कहा कि प्रतिनिधित्व हम देंगे सबको, लेकिन अंततः वह धन के आधार पर ज्यादा भारी प्रतिनिधित्व में बदल गया, अपने उलट में बदल गया। जैसा उसको होना था उससे उलटी ही चीज में बदल गया। उसी तरह से यह जो मुक्ति थी, जिस मुक्ति को दिलाने का उसने दावा किया था वह मुक्ति भी अंततः स्लेवरी में बदल गयी। उसने जमीन की स्लेवरी से तो आजादी दी लेकिन एक नये किस्म की स्लेवरी में डाल दिया। जो भूदास थे वे जमीन की स्लेवरी से जुड़े हुए थे तो इस ज़मीन की स्लेवरी से तो उनको आजाद किया पूंजीवाद ने लेकिन उन्हें उसने नये तरह की स्लेवरी में डाल दिया। वह स्लेवरी क्या थी? वह वेज स्लेवरी थी। इसे ऐसा कह लीजिये कि मजूरी दासता। यह नये तरह की दासता है। किसी भी तरह यह मुक्ति नहीं है। इस तरह से जो उसके दावे थे वे सभी दावे अपने उलट में परिवर्तित हुए। उन्होंने दावा तो यह किया कि जो ज़मीन की स्लेवरी है उससे मुक्त कर रहे हैं लेकिन नये तरह की स्लेवरी में उन्होंने डाल दिया। और कारखाने तो खड़े हो गए थे लेकिन इन कारखानों के लिए मजदूर कहाँ से आये तो मजदूर यही थे। जो अपने जीवकोपार्जन के साधन से जो अलग कर दिए गये थे वे कारखानों में काम करें। भीख मांग करके गुजारा न करें इसके लिए इंग्लैंड में भिक्षावृत्ति को अपराध घोषित किया गया, उसे अपराध बनाया गया ताकि फैक्ट्रियों में लोग काम करने के लिए आयें। फैक्ट्रियों में यह मुश्किल हुई कि जिस तरह के खुले वातावरण में रह रहे थे लोग उनको एक बंद जगह पर रख दिया गया। उस ज़माने की फैक्ट्रियों की आप कल्पना कीजिये, शुरू-शुरू में टेक्सटाइल के कारखाने थे। टेक्सटाइल के कारखाने में चारों तरफ रुई उड़ रही है। लोगों के नाक में जा रही है और उस वातावरण में उनको बंद जगह पर काम करना होता था। स्वाभाविक तौर पर खेत में जहाँ खुले में काम करना पड़ता था उसके मुकाबले एकदम भिन्न किस्म की काम की यह स्थिति थी इसलिए बहुत सारे लोग उसमें जाना नहीं चाहते थे।  हमारे यहाँ घाघ कवि ने कहा है कि

उत्तम खेती मध्यम बान। निषिद्ध चाकरी भीख निदान।।

यानी सबसे बढ़िया काम है – खेती, वाणिज्य जो है वह मध्यम है। यह उससे भी जुड़ता है जो मैंने शुरू में कहा था कि मध्यम वर्ग दरअसल यही वर्ग था जो वाणिज्य से जुड़ा हुआ था। और किसी की चाकरी करना तो निषिद्ध है। बहुत पुराने जमाने में इसे निषिद्ध माना जाता था। लेकिन अब क्या है कि चूँकि खेती में जो आजादी थी वो आजादी तो छिन गयी क्योंकि खेत रहे नहीं, आजीविका के इन साधनों को घेर करके उसमें किसानों का ही प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया, उनके प्रवेश को चोरी माना जाने लगा। इसके साथ ही निजी सम्पत्ति की अवधारणा भी है । निजी सम्पत्ति की अवधारणा क्या है? सार्वजनिक यानी जो सबके लिए उपभोग की संपत्ति है उसको निजी बना लेना। निजी संपत्ति का अर्थ यह नहीं है कि किसी के हाथ में दो रुपया है तो वह निजी संपत्ति है। निजी संपत्ति मूलतः सामाजिक संपत्ति का निजी अधिग्रहण है। कहने का मतलब यह कि जो एन्क्लोजर्स थे, जो निजी बना लिए गये थे, उनमें किसानों के ही प्रवेश को कानूनी जुर्म बना दिया गया, चोरी बना दिया गया और उन्हें भीख माँगने से भी रोक दिया गया, भिक्षावृत्ति को अपराध बना दिया गया । ऐसी स्थिति में, इन विपरीत स्थितियों में लोग कारखानों में काम करने के लिए मजबूर हुए और इसी को मार्क्स ने वेज स्लेवरी कहा। ये स्लेवरी से मुक्ति तो थी लेकिन यह एक नये तरह की  स्लेवरी थी। पूंजीवाद के दौरान वास्तविक स्लेवरी भी हुई और इसका अगले व्याख्यान में हम लोग जिक्र करेंगे तो हम लोग देखेंगे कि अमरीका में जिस पूंजीवाद का विकास हुआ है उसके बारे में बहुत सारे लोगों का कहना है कि दरअसल इसे रेशियल पूंजीवाद कहा जाना चाहिए। कारण कि रेस सम्बन्धी विचारधारा न होती तो बड़े पैमाने पर अश्वेतों के श्रम की लूट संभव नहीं थी । यह लूट बड़े पैमाने पर हुई और बिना इसके अमरीका की यह अकूत संपत्ति कभी नहीं आ सकती थी ।

वास्तविक गुलामी भी मार्क्स के जमाने में दिखाई पड़ने लगी थी लेकिन उसपर जोर देने के मुकाबले उन्होंने पूंजीवाद के भीतर जो नये तरह की स्लेवरी यानी वेज स्लेवरी थी उसपर जोर दिया। यह नये तरह की गुलामी पैदा हुई। खेतों से जब किसान आजाद हुए तो उनको कारखानों का गुलाम बना दिया गया। इस तरह कारखानों का जन्म हुआ और कारखाने तो थे लेकिन बिना मजदूरों के किसी काम के नहीं थे तो जो मजदूर खेतों से उखड़कर के आये वे कारखानों में इकठ्ठा हुए और इकठ्ठा हुए तो स्वाभाविक तौर पर उनके भीतर सामूहिक चेतना का उदय हुआ । उस सामूहिक चेतना के वशीभूत होकर उन्होंने तरह-तरह के संगठन बनाने शुरू किये और आपस में उनके जो अंतर्विरोध थे यानी धर्म सम्बन्धी अंतर्विरोध, नेशनलटी सम्बन्धी अंतर्विरोध, इन सब पर काबू पाकर उन्होंने नये तरह के अस्तित्व को अर्जित किया- अपने लिए स्वतंत्र अस्तित्व। क्या अस्तित्व था उनका? मेहनतकश होने का। बाक़ी लोग क्या हैं? आराम  से अपनी रोटी कमाते हैं जबकि वे मेहनत के जरिये अपनी रोटी कमाते हैं। इस प्रक्रिया में जो शोषण होता था, उसमें गुलाम होने के मामले में सौ प्रतिशत भी, दासप्रथा के मामले में लगभग कुछ भी दिये बगैर भरण-पोषण के लिए एक साधन, मतलब खाना आपको दे दिया जाएगा सिर्फ जीवित रहने भर और उसके अलावा सौ प्रतिशत उसके श्रम का शोषण किया जाता था। मजदूर के मामले में उतना अधिक नहीं, फिर भी मजदूर को भी उतना ही जीवित रहने देना जितना कि वह हमारे यहाँ काम करने लायक रह सके। इसमें वह व्यवस्था परिवर्तित हो गयी। इस प्रकार इस पूंजीवादी व्यवस्था ने बजाय व्यक्ति को मुक्ति प्रदान करने के नये तरह की दासता को जन्म दिया।

पूंजीवाद के सन्दर्भ में हम लोग जब यह बातचीत कर रहे हैं तो एक चीज को और हमें ध्यान में रखना चाहिए कि हीगल ही थे जिन्होंने एक दार्शनिक सिद्धांत को बड़े पैमाने पर मान्यता दी और वह था– द्वंद्ववाद। द्वंदवाद क्या था? द्वंदवाद यह था कि कोई भी वस्तु एक ही समय में जो है उसका उलटा भी है। ये पूंजीवाद के साथ सबसे ज्यादा लागू होता है। एक ही समय में वह लोकतांत्रिक भी है और अलोकतांत्रिक भी है। एक ही समय में वह मुक्ति भी प्रदान करता है और दासता भी थोपता है। एक ही समय में वह प्राचुर्य को जन्म देता है और उसी समय दरिद्रता को भी पैदा करता है। उसे मार्क्स ने बढ़िया से बताया कि कैसे यह जो भी वादा करता है उस वादे के उलट में प्रतिफलित होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि यह जो कह रहा है उसी को लागू करे बल्कि इसके जो भी वादे हैं इसका वास्तविक जीवन उसके उलट को जन्म देता है। ऐसा सिर्फ इन्हीं मामलों में नहीं हुआ। सबसे आगे बढ़कर जिस मामले में ऐसा हुआ उसके बारे में हम आगे बात करेंगे।

इसके बाद आता है राष्ट्रवाद। राष्ट्रवाद जो वहाँ का है वह पूंजीवाद के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। कारण कि उन देशों की जो पूंजी थी उसे अपनी रक्षा के लिए दूसरे देशों में अपने देश की सत्ता की मदद की आवश्यकता हुआ करती थी और यह मदद राष्ट्रवाद के ही परदे में दी जा सकती थी इसलिए राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। राष्ट्रवाद के साथ ही युद्ध का गहरा सम्बन्ध है। हम सब आज की दुनिया में भी इस बात को देख सकते हैं कि हमारे लिए तो वैश्वीकरण है लेकिन अमरीका के लिए नेशनलिज्म है। कहने का मतलब कि एक ही समय में ग्लोबलाइजेशन भी और राष्ट्रवादी उन्माद भी। ये दोनों परस्पर विरोधी चीजें एक साथ कैसे मौजूद रहती हैं? पूंजीवाद के विश्लेषण में आमतौर पर मार्क्स ने इस बात को दिखाया कि वह कैसे निरंतर अपने विपरीत का उत्पादन करता रहता है और यह सिर्फ नकारात्मक अर्थों में ही नहीं बल्कि सकारात्मक अर्थ में भी और सकारात्मक अर्थ यह कि वह अपने निषेध की ताकतों को भी जन्म देता है। वह क्रमशः उस वर्ग को पैदा करता है जो उसे समाप्त करने वाला है और उसे न सिर्फ पैदा करता है, उनमें एकता की भावना पैदा करता है बल्कि उनको राजनीतिक प्रशिक्षण भी प्रदान करता है। यह राजनीतिक प्रशिक्षण उसने सामंतवाद का विरोध करने के लिए दिया था लेकिन अब चूँकि वह अपने ही विपरीत में बदल चुका है, उसके जो वादे थे उसके उलट काम कर रहा है इसलिए जो मजदूर समुदाय है वह स्वाभाविक रूप से उसका निषेध करने की हद तक जाता है ।

इस अर्थ में जो पूंजीवाद है वह पैदा तो हुआ एक विशेष ऐतिहासिक दौर में लेकिन यह भी सही बात है कि पूंजीवाद ने हमेशा यह कहा कि वह मानव स्वभाव के सबसे अनुकूल व्यवस्था है और ऐसा उसने इसलिए किया क्योंकि वह यह साबित करना चाहता था कि वह शाश्वत है, हमेशा से मौजूद है। मार्क्स ने इसी बात पर जोर दिया कि वह हमेशा से मौजूद नहीं रहा है बल्कि इतिहास के एक विशेष दौर में पैदा हुआ है और जिस तरह इतिहास के विशेष दौर में पैदा होने वाली सभी चीजें अपने जीवन को समाप्त करके, अपना दायित्व समाप्त करके, अपना ऐतिहासिक दौर समाप्त करके ख़त्म हो जाती हैं उसी तरह से पूंजीवाद के साथ भी होना है। इसने प्राचुर्य के उत्पादन के जिस तरीके को जन्म दिया है उसे यह खुद ही संभाल नहीं सकता और इसीलिए जिस मजदूर वर्ग को इसने जन्म दिया है वो इसको ट्रांसेंड कर जाता है । इसने जिन फलों को जन्म दिया है उन फलों का समूचे समाज को सर्वोत्तम लाभ तभी मिल सकता है जब इसने जिस तरह पुरानी बादशाहत जो खत्म किया, सामंती विशेषाधिकार को ख़त्म किया लेकिन पुनः इसने मुट्ठी भर लोगों के अल्पतंत्र को जन्म दिया। मुट्ठी भर जो धनकुबेर हैं उनके अल्पतंत्र को इसने जन्म दिया है तो उस अल्पतंत्र का निषेध करके ही, उस अल्पतंत्र को ट्रांसेंड करके ही पूंजीवाद ने जिन लाभों को जन्म दिया है उन लाभों को समूचे समाज के लिए लाभकारी बनाया जा सकता है। यह काम भी, पूंजीवाद ने जिस वर्ग को जन्म दिया है वह वर्ग ही कर सकता है और जिस दिन यह अपना कार्यभार पूरा कर लेगा, उस दिन पूंजीपति को, पूंजीवादी व्यवस्था को मजदूर वर्ग ख़त्म कर देगा और उसके लाभों को समूचे समाज के कल्याण के लिए लगाएगा।

इस आशा के साथ, इस यूटोपिया के साथ यह वह दौर था जिसमें पूंजीवाद जब आया तब ऐसे समाज को लेकर आया जिसमें देहातों से उखड़कर शहरों में लोग आये तो तमाम बुद्धिजीवियों को उस जमाने में लगता था कि ये तो गंदगी का पूरा ढेर खड़ा हो गया। शहर क्या थे उस जमाने के? आज के शहरों को देखकर आप उनकी कल्पना नहीं कर सकते। खुली नालियाँ हुआ करती थीं। हैजा बड़े पैमाने पर फैलता था पूरे यूरोप में। महामारी की तरह कालरा फैलता था। इतनी गंदगी थी वहाँ के शहरों में। लोगों को लगता था कि यह तो बहुत खराब किस्म की व्यवस्था आ गयी है और मनुष्य क्या रह गया है? चूंकि जो मजदूर थे उनको संतुष्टि नहीं थी तो क्या होता था? वे आपस में लड़ाई-झगड़े करते थे, तमाम तरह की समस्याएँ थीं तो ऐसी स्थिति में विचारकों ने यह समझा कि इस समाज के मुकाबले दूसरे किस्म का समाज होना चाहिए। इन तमाम लोगों ने इस तरह के वैकल्पिक समाज के सपने देखे और उस तरह के लोगों के साथ मार्क्स का भी संवाद रहा था। ऐसे में ही उन्होंने ऐसे समाज का सपना देखा जिसमें पूंजीवादी व्यवस्था के जो लाभ हैं, जो प्राचुर्य है, लोकतंत्र है, मुक्ति है, इसको समूचे समाज के लिए कल्याणकारी बनाना जरूरी है । इसकी एक्सेस केवल कुछ लोगों को ही न रह जाए। लोकतंत्र का भी क्या है? सत्ता पर कब्जा, केवल मुट्ठी भर लोगों का न रहे बल्कि समूचा समाज वास्तव में अपने आपको अधिकारसम्पन्न महसूस कर सके। यह काम तभी हो सकता है जब पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर जो अल्पतंत्र है इसको समाप्त करके उसे वास्तविक लोकतंत्र की शक्ल दी जाए। भविष्य की मुक्ति को वेज स्लेवरी में बदल देने वाली व्यवस्था के विरोध में उसकी वास्तविक मुक्ति के लिए उन्होंने बहुत ही मशहूर वाक्य का प्रयोग किया कि जहाँ एक का विकास समूचे समाज के विकास की शर्त हो, तब वह प्रत्येक मनुष्य का विकास हो जाता है। जिसको मुक्तिबोध ने लिखा है ‘मुक्ति के रास्ते कभी अकेले में नहीं मिलते, यदि वह है तो सबके साथ है।’ जिस मुक्ति को पूंजीवाद व्यक्तिवाद के रूप में परिभाषित करता था उसके मुकाबले व्यक्ति की मुक्ति को भी समूचे समाज की मुक्ति के अर्थ में परिभाषित करना भी एक स्वप्न था जिसे मार्क्स ने उस जमाने में, पूंजीवाद के लगभग शुरुआती दिनों में देखा । जो व्यापारिक पूंजीवाद था उसने सामंती समाज से मुकाबला करने के लिए जिन मूल्यों को जन्म दिया था स्वयं ही इन मूल्यों को आगे बढ़ाने और पूरा करने में समर्थ नहीं रह गया था। ऐसी स्थिति में उन्हीं मूल्यों को किस तरह मजदूर वर्ग आगे बढ़ा सकता है और पूरे समाज के लिए उस व्यवस्था को लाभकर व्यवस्था में बदल सकता है यह सपना मार्क्स ने देखा था। यहाँ पर ही मैं अपनी बात को ख़त्म करना चाहूँगा।

 

अब आगे मंच संवाद के लिए खुला हुआ है आप सभी लोगों से निवेदन है कि अपने सवालों से इस चर्चा को आगे बढ़ाएँ। 

पहला प्रश्न है कि व्यक्तिवाद से क्या तात्पर्य है? पूंजीवाद ने उसका फायदा कैसे उठाया? और दूसरा प्रश्न यह है कि जब से निजी संपत्ति विकसित हुई क्या वहाँ से पूंजीवाद का जन्म नहीं माना जा सकता है?

 

तो पहली बात तो यह है कि जिसे व्यक्तिवाद कहते हैं उसको पूंजीवाद इसलिए लाया था क्योंकि उसे स्वतंत्र मजदूर चाहिए थे, ऐसे मजदूर नहीं जो बंधक हों क्योंकि बंधन तो दोनों तरफ से हो जाता है न, अगर भूदास है तो वह केवल एक मालिक से ही बंधा हुआ नहीं है बल्कि मालिक भी उससे बंधा हुआ होता है तो इस तरह का बंधन नहीं चाहता था पूंजीवाद। इसलिए उसने व्यक्तिवाद की विचारधारा को प्रचारित कर कहा कि मनुष्य स्वतंत्र है तो किसलिए स्वतंत्र है? वह किसी के यहाँ भी काम कर सकता है लेकिन दूसरी तरफ यह है कि वह काम न करने के लिए स्वतंत्र नहीं है। यह जो पूंजीवाद का व्यक्तिवाद था तो उसने इस अर्थ में पूंजीवाद की मदद की कि उसने कामगार को, जो श्रमिक था उसको अब तक जो भूमि से बंधा हुआ था उसे आजाद कर दिया और इसके कारण उसको स्वतंत्र कामगार मिला लेकिन दूसरी तरफ यह भी हुआ कि उसी के भीतर से एक नये किस्म की दासता भी पैदा हुई और वह यह कि बिना काम किए वह रह नहीं सकता है, उसे जिंदा रहने के लिए काम करना होगा इसीलिए उन्होंने नाम दिया वेज स्लेवरी। पुराने जमाने की यानी जो जमीन से जुड़ी हुई दासता थी उसकी जगह पर ये नये किस्म की दासता है। व्यक्तिवाद ने इस तरह से पूंजीवाद को मदद की कि उसने उसे स्वतंत्र मजदूर दिये जो किसी जगह से बंधे हुए नहीं थे लेकिन दूसरी तरफ उसके फायदे में यह बात इसलिए गयी कि फिर वह भी इन मजदूरों से स्वतंत्र था। इनकी देखभाल करना, इनकी बुरी स्थिति में इनका ध्यान रखना यह सब इसकी जरूरत नहीं थे । इनकी जरूरत तभी तक थी जब तक वे इनके यहाँ काम करते हैं। इस प्रकार से जो व्यक्तिवाद है उसने उसको स्वतंत्र मजदूर दिये और उन मज़दूरों की देखभाल से भी उसे आजादी दिलायी। इस प्रकार से व्यक्तिवाद ने पूंजीवाद की मदद की।    

 

दूसरा जो सवाल है निजी संपत्ति के आगमन का तो यह सही बात है कि जो निजी सम्पत्ति है उसका दो अर्थ  है । एक, इंडीविजुअल कैपिटल और दूसरा है प्राइवेट कैपिटल । इस बात को अर्न्स्ट फिशर ने कहा कि इसके दो अर्थ हैं एक है इंडिविजुअल कैपिटल और दूसरा प्राइवेट कैपिटल। प्राइवेट कैपिटल का अर्थ है – प्राइवेटाइज्ड कैपिटल। यह व्यक्तिगत पूंजी नहीं है बल्कि इसमें सामूहिक संपदा को निजी संपदा में बदल दिया गया है। आप उसके बीस तरह के उदाहरण देख सकते हैं। जैसे ये धरती किसकी है? लेकिन किसी न किसी के नाम कर दी जाती है और उसमें मुख्य बात यह है कि जो सामूहिक संपदा है, उसको बड़े पैमाने पर कुछ लोग हस्तगत कर लेते हैं। तरह-तरह से उसके लिए वे लोग प्रयास करते हैं इसलिए निजी पूंजी का भी एक ही अर्थ नहीं है। इस बात पर ज़ोर दिया है अर्न्स्ट फिशर ने कि उसे इंडीविजुअल कैपिटल के अर्थ में नहीं ग्रहण किया जाना चाहिए, उसे प्राइवेटाइज्ड कैपिटल के अर्थ में समझना चाहिए । मतलब जो सामूहिक संपत्ति है जैसे यह जमीन है और अब तो जमीन के भीतर जो खनिज हैं वे भी धीरे-धीरे उनके कब्जे में आते जा रहे हैं। हवा, वायु तरंगें, ये टूजी, थ्रीजी, फ़ोरजी, ये सब क्या हैं? वायु तरंगें हैं तो यह हवा भी प्राइवेटाइज्ड की जाती है। इसी प्रकार पानी, पानी बोतलों में भरकर लाया जाता है जो नदियों, पहाड़ों और समुद्रों के जरिये आया है या वहाँ पर है तो उसे भी निजी बना दिया जाता है। इन सब जगहों में जो कुछ भी उपलब्ध है उन सब को निजी बना दिया जाता है। इस अर्थ में निजी संपत्ति यानी जो सामूहिक संपदा है उसका निजी अधिग्रहण यह मुख्य बात है। इसके साथ पूंजीवाद का गहरा जुड़ाव है। निजी सम्पत्ति मतलब इंडिविजुअल कैपिटल नहीं। आपके दो प्रश्नों के उत्तर मेरे दिमाग में यही सूझ रहे हैं।