Tuesday, September 4, 2012

बल्ली भाई : एक कवि एक योद्धा


   (बल्ली सिंह चीमा के साठ साल होने पर जो स्मारिका छपेगी उसके लिए ये टिप्पणी लिखी है )          
                                                               
अस्सी का दशक हिंदी में नए किस्म के कवियों की फ़ौज की आमद के लिए जाना जाएगा जिनकी कविताएँ छपने से पहले ही लोगों की जुबान पर चढ़ गईं । बल्ली सिंह चीमा इसी फ़ौज के उम्दा सिपाही हैं । बल्ली भाई के साथ ही इनमें थे अदम गोंडवी, राम कुमार कृषक, गोरख पांडे और अनेकानेक ऐसे कवि जिनकी कविता के लिए, राम विलास जी ने जो बात नागार्जुन के लिए कही वही बात हम कह सकते हैं कि इनकी कविताओं में लोकप्रियता और कला का मुश्किल संतुलन सहज ही सधा हुआ है । देखा तो बल्ली भाई को बहुत बाद में लेकिन एक पतली सी किताब ‘खामोशी के खिलाफ़’ के जरिए पहला परिचय बेहद पहले तकरीबन 1980 में ही हो गया था ।
इन कवियों में क्या है जो साझा है, इसकी तलाश करते हुए हमें राजनीतिक संदर्भ देखने होंगे क्योंकि तकरीबन ये सभी कवि राजनीतिक हैं और किसी न किसी तरह से वामपंथ की क्रांतिकारी धारा से जुड़े हुए हैं । आपातकाल के बाद जो नया राजनीतिक वातावरण बना उसकी एक सचाई अगर जनता पार्टी की सरकार का बनना है तो दूसरी और ज्यादा प्रासंगिक सचाई प्रतिरोध की ऐसी ताकतों के खामोश संघर्षों की छिपी हुई खबरों का सामने आना है जो सतह पर नहीं तैर रही थीं । ये ताकतें देश भर में फैले हुए नक्सलवादी कार्यकर्ता थे जिन्हें पुलिस ने फ़र्जी मुठभेड़ों और गैर कानूनी नजरबंदी में यंत्रणा देकर मार डाला था । आपातकाल के बाद बने वातावरण में इस आंदोलन की उपस्थिति एक जीवंत प्रसंग की तरह रही और उसी दौर में इस तीसरी धारा का हस्तक्षेप भारत के राजनीतिक पटल पर क्रमश: बढ़ता गया । भाकपा (माले) से जुड़े हुए जन संगठनों का उदय हुआ और बिहार के क्रांतिकारी किसान आंदोलन में इसे ठोस अभिव्यक्ति मिली । यही वातावरण इन कवियों के उभार और उनकी कविता की लोकप्रियता को समझने की कुंजी है ।
वह दौर ऐसा था कि सहज ही कुछ प्रतीक नई अर्थवत्ता के साथ उभर आए । उदाहरण के लिए भगत सिंह शुरू से ही क्रांति के प्रतीक रहे थे लेकिन उस समय एक ही साथ गोंडा, बनारस, इलाहाबाद और उत्तर प्रदेश के छोटे छोटे कस्बों तक में उनका शहादत दिवस मनाया जाने लगा । उस दौर में कांग्रेसी सत्ता के विरुद्ध लड़ रही ताकतों ने भगत सिंह के प्रतीक में एक नया अर्थ भरा और उनके बहाने आज़ादी की लड़ाई की इकहरी तस्वीर को चुनौती दी । यह तस्वीर शासकों की सुविधा के लिए निर्मित की गई थी । भगत सिंह गांधी की समझौतावादी नीति, जिसका मुखौटा अहिंसा थी, के विरुद्ध क्रांतिकारी धारा के रहनुमा के बतौर पेश किए गए । उसी दौर में गुरुशरण सिंह का नाटक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ लोकप्रिय हुआ जिसका मुख्य प्रतिपाद्य आज़ादी की लड़ाई का यही द्वंद्व था । बल्ली सिंह चीमा की मशहूर गज़ल के एक शेर ‘बो रहे हैं अब बंदूकें लोग मेरे गाँव के’ में बंदूकें बोने वाले गाँव के लोगों की तस्वीर के पीछे उनके अपने समय में सशस्त्र संघर्ष करने वाले किसान तो हैं ही, भगत सिंह की बचपन की वह कथा भी है जिसमें पिता से वे बताते हैं कि खेत में बंदूक बो रहा हूँ । इसी समझ को स्वर देते हुए वे एक शेर में कहते हैं:
       ‘हम नहीं गांधी के बंदर ये बता देंगे तुम्हें,
       हर युवा को भगत सिंह, शेखर बनाना है हमें।’ 
किसान आंदोलनों की आँच के कारण स्वाभाविक था कि इन कवियों की कविताओं में ग्रामीण माहौल और मजदूर-किसान उपस्थित हों । लेकिन इनके गाँव मैथिलीशरण गुप्त के ‘अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों न इसे सबका जी चाहे’ के आदर्शीकरण से पूरी तरह अलग और सामंती बंधनों के नीचे कराहते और उसे बदलने की कोशिश करते हुए चित्रित हैं । ये गाँव उनके तईं एक वैपरीत्य रचने में सहायक हैं सुख के द्वीपों के बरक्स दुख के सागर:
         ‘सवेरा उनके घर फैला हुआ है,
           अँधेरा मेरे घर ठहरा हुआ है।’
गाँव के किसान इन बंधनों को चुपचाप बर्दाश्त करने की बजाए उसके विरुद्ध विद्रोह करते हुए दिखाए गए हैं । एक गज़ल के शेर तो प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ का मानो पुनर्पाठ करते हैं:
        ‘अब भी होरी लुट रहा है अब भी धनिया है उदास,
         अब भी गोबर बेबसी से छट्पटाएँ गाँव में।’
गाँव के लोगों के सामंती उत्पीड़न में गुलामी के समय से कोई खास फ़र्क नहीं आया है इसे भी चिन्हित करने के लिए वे इसी उपन्यास का सहारा लेते हैं:
         ‘अब भी पंडित रात में सिलिया चमारन को छलें,
          दिन में ऊँची जातियों के गीत गाएं गाँव में।’
यह चित्रण स्वाभाविक रूप से सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए संघर्षरत दलित जातियों के लिए हालात बदलने की प्रेरणा बन जाता है ।

इन सभी कवियों ने गज़ल को नए ढाँचे में ढालकर अपनी बात कही है । हिंदी कविता की परंपरा से परिचित लोग जानते हैं कि गज़ल का प्रतिरोध के लिए उपयोग कोई नई बात नहीं है । दुष्यंत कुमार ने बहुत पहले इस विधा का सृजनात्मक उपयोग मारक व्यंग्य के साथ राजनीतिक संदेश देने के लिए किया था । एक जगह वे दुष्यंत के मुहावरे का उपयोग करते हुए भी उनसे आगे जाने का संकेत करते हैं:
         ‘इस जमीं से दूर कितना आसमाँ है,
          फेंककर पत्थर मुझे ये देखना है।’
बल्ली सिंह चीमा ने इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सहज खड़ी बोली में ऐसी सफलता के साथ गेय गज़लें लिखीं कि वे लोगों की जुबान पर न सिर्फ़ चढ़ गईं बल्कि अनेकशः उनका नारों की तरह इस्तेमाल भी किया गया । कविता की लोकप्रियता का प्रमाण अगर स्मृति में उसका बैठ जाना है तो बल्ली भाई की गज़लें इसका प्रतिमान हैं ।
उन्होंने अपने अन्य सहधर्मियों के साथ जो गज़लें और गीत लिखे उनके जरिए आपातकाल के बाद का समूचा राजनीतिक इतिहास अपनी गतिमयता के साथ समझा जा सकता है । मसलन उनके इस शेर को पढ़ते ही गोरख के गीत ‘बोलो ये पंजा किसका है’ की याद आ जाती है:
        ‘तुम तो कहते थे हैं उनके कर कमल,
        देख लो वो हाथ खंजर हो गया।’
व्यंग्य की एक मिसाल उनकी ये पंक्तियाँ हैं जिनमें वे दमन की सरकारी भाषा का मज़ाक उड़ाते हैं:
       ‘रोटी माँग रहे लोगों से किसको खतरा होता है,
       यार सुना है लाठी चारज हलका हलका होता है।’
लेकिन अन्य कवियों के मुकाबले बल्ली सिंह चीमा की कविताओं में व्यंग्य से अधिक आक्रोश दर्ज़ हुआ है । जैसी सहज दृढ़ता बल्ली भाई के भीतर मिलने पर नजर आती है वैसी ही सहज दृढ़ता उनकी कविताओं के भीतर समा गई है । आसानी से लेकिन मजबूती से उनकी कविता बड़ी बात कह जाती है:
       ‘तेलंगाना जी उठेगा देश के हर गाँव में,
       अब गुरिल्ले ही बनेंगे लोग मेरे गाँव के।’         

Monday, September 3, 2012

हिंदी अनुवाद की भूमिका


(एंथनी ब्रेवेर की किताब का हिंदी अनुवाद मैंने किया है जो ग्रंथशिल्पी प्रकाशन से 'साम्राज्यवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत' शीर्षक से छपेगी। उसके लिए अमर फ़ारूक़ी ने अलग से भूमिका लिखी है। प्रस्तुत लेख उसी का हिंदी अनुवाद है।)    
            
साम्राज्यवाद का इतिहास कैरिबियाई सागर में क्रिस्टोफर कोलम्बस के (1492) और हिंद महासागर में वास्को डि गामा के (1498) प्रवेश से शुरू होता है । पहली घटना का परिणाम अमरिकी महाद्वीप की विजय था तो दूसरी घटना का नतीजा एशिया और अफ़्रीका के अनेक हिस्सों की गुलामी निकला । सन 1500 के बाद की लगभग तीन सदियों तक स्पेन, पुर्तगाल, नीदरलैंड, इंग्लैंड और फ़्रांस वे प्रमुख यूरोपीय देश थे जो गैर यूरोपीय मुल्कों में उपनिवेश कायम करने में लगे रहे । स्पेन और पुर्तगाल सोलहवीं सदी की प्रमुख औपनिवेशिक शक्ति थे । वर्तमान संयुक्त राज्य (अमरीका) के दक्षिण के समूचे अमरीकी महाद्वीप को उन्होंने आपस में बाँट लिया (पुर्तगाल के मुकाबले स्पेन का प्रभुत्व अमरीका में अधिक विस्तृत था) । दुनिया के जिस हिस्से को लैटिन अमरीका कहा गया वह उन्नीसवीं सदी के पूर्वाध तक प्रत्यक्ष यूरोपीय शासन के मातहत रहा । एशिया में चीन से लेकर फारस की खाड़ी तक पुर्तगाल के अनेक उपनिवेश थे । सत्रहवीं सदी में इनकी जगह डच (नीदरलैंड) ने ले ली । सन 1600 आते आते एशिया और यूरोप के बीच उत्तमाशा अंतरीप के रास्ते होने वाले समुद्री व्यापार पर डच ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिकार हो गया । उस समय एशिया और यूरोप के बीच व्यापार मुख्य रूप से एशियाई गोल मिर्च (और लौंग, जायफर और जावित्री जैसे कुछ अन्य मसालों) का था । एशिया के आपसी व्यापार पर भी डच कंपनी का ही दबदबा था । पुर्तगाली और डच लोगों ने अपनी प्रभुता को स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर हिंसा का सहारा लिया । बहुत ही कम कीमत पर (या मुफ़्त) माल प्राप्त करने के लिए और एशिया में समुद्री व्यापार का पारंपरिक व्यावसायिक जाल तोड़ देने के लिए वे अपनी उन्नत सैन्य शक्ति का सहारा लेते थे । चूँकि इंडोनेशिया में भी मसालों का उत्पादन होता था इसलिए डचों ने उस क्षेत्र में उपनिवेश बनाये । जिस डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्रहवीं सदी की शुरुआत में उत्तमाशा अंतरीप (आज के दक्षिण अफ़्रीका में) पर कब्जा किया था उसी ने यूरोपीय प्रवासियों को अंतरीप के इर्द गिर्द फ़ार्मिंग शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया और इस तरह दक्षिण में गोरों के उपनिवेश बनने और स्थानीय लोगों पर उनकी जीत की प्रक्रिया शुरू हुई ।
अठारहवीं सदी की शुरुआत में फ़्रांस और इंग्लैंड बड़ी औपनिवेशिक ताकतों के रूप में उभरे । सौ साल तक दोनों दुनिया पर प्रभुत्व के लिए लड़ते रहे जो नेपोलियन के युद्ध कहे जाते हैं । नेपोलियन की हार के साथ सौ साल के लिए इंग्लैंड की बढ़त की गारंटी हो गयी । 1815 से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध के छिड़ने तक अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवादी अर्थतंत्र पर बिटेन ही हावी रहा । इस युग में ब्रिटेन की नौसैनिक ताकत को चुनौती देने वाला कोई नहीं था जिसकी वजह से वह विशाल साम्राज्य को बना और टिका सका । बहरहाल अंतत: बिटेन के अर्थतंत्र ने उसे दुनिया की प्रधान औपनिवेशिक शक्ति बना डाला । अठारहवीं सदी के मध्य से शुरू हुए इंग्लैंड के उद्योगीकरण ने उसे दुनिया का सबसे आगे बढ़ा हुआ अर्थतंत्र बना दिया । यह निरा संयोग नहीं कि औद्योगिक क्रांति के पहले चरण को उसी दौर में (1760-80) गति मिली जब अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल (और बिहार और उड़ीसा के कुछ हिस्सों) को जीता । प्लासी (1757) और बक्सर (1764) की लड़ाई ने कंपनी को भारत की बड़ी भूभागीय ताकत बना दिया । कंपनी के कर्मचारियों ने जहाजों में भर कर बंगाल की प्रत्यक्ष लूट का माल तो इंग्लैंड भेजा ही, पूर्वी भारत के राजस्व ने कंपनी को इस लायक बना दिया कि वह इस राजस्व का प्रयोग करके घरेलू बाज़ार में सूती वस्त्रों की खपत के लिए कच्चा माल खरीद ले और बदले में कोई कीमती धातु भारत न लाये । इस तरह भारत से इंग्लैंड को कर की निरंतर अदायगी का प्रवाह शुरू हुआ । सोलहवीं सदी से जारी अटलांटिक गुलाम व्यापार में फ़्रांस और ब्रिटेन की भागीदारी (अफ़्रीका से पकड़े गये गुलाम अटलांटिक को पार कर गन्ने, तंबाकू और कपास के प्लांटेशनों पर काम करने के लिए अमरीकी महाद्वीप लाये जाते थे) से भी इन देशों के अर्थतंत्र को बेहिसाब मुनाफ़ा हुआ ।
1870 दशक से ब्रिटेन के आर्थिक दबदबे को जर्मनी और अमरीका से चुनौती मिलने लगी । दोनों का उद्योगीकरण तेजी से उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ । अमरीकी गृहयुद्ध (1861-65) में अधिक विकसित उत्तरी राज्यों की जीत ने अमरीकी अर्थतंत्र के विकास को तीव्र कर दिया और 1871 में जर्मनी के राजनीतिक एकीकरण ने उसे तेजी से यूरोप में इंग्लैंड का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बना दिया । 1900 आते आते अमरीका दुनिया का अगुआ औद्योगिक मुल्क बन गया । यहाँ इस बात पर जोर देना होगा कि जिन देशों का उद्योगीकरण बाद में हुआ उनका आर्थिक विकास ब्रिटेन से कुछ अलग तरीके से हुआ । ब्रिटेन के उद्योग पर लंबे समय तक छोटे और मँझोले स्तर के व्यवसायियों का दबदबा रहा जो गलाकाटू होड़ के माहौल में काम करते थे । दूसरी ओर जर्मनी जैसे अर्थतंत्र होड़ या छोटे पैमाने का व्यवसाय नहीं झेल सकते थे क्योंकि उन्हें इंग्लैंड की बराबरी करनी थी । जर्मन उद्योग बड़े पैमाने के उद्योगीकरण की शुरुआत से ही बड़े व्यवसायियों के कब्जे में था । ये उद्यम अपने व्यवसाय के लिए अक्सर राज्य पर निर्भर रहते थे । उन्हें जो अनेक ठेके मिलते वे हथियारों के उत्पादन से जुड़े होते थे । ब्रिटेन के मामले में उद्योग को राज्य का समर्थन अप्रत्यक्ष था । एडम स्मिथ जैसे बुर्जुआ अर्थशास्त्री आर्थिक प्रक्रियाओं में राजकीय हस्तक्षेप के खिलाफ़ थे । उन्होंने माना कि बाज़ार निर्वैक्तिक और तार्किक रूप से काम करता है और आदर्श स्थितियों में समाज के अबाध विकास की गारंटी करता है । 1860 दशक तक मुक्त व्यापार पर आधारित प्रतियोगितापरक पूँजीवाद ब्रिटिश अर्थतंत्र की विशेषता था । बाद में उद्योगीकृत होने वाले देशों के अर्थतंत्र में शुरू से ही इजारेदारी की प्रवृत्ति दिखायी पड़ने लगी थी । आम तौर पर 1870 दशक से 1890 दशक के बीच ही पश्चिमी अर्थतंत्रों में इजारेदारी (अर्थात अर्थतंत्र के किसी सेक्टर में कुछ बड़े उद्यमों का दबदबा) व्यापक हुई । अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवादी अर्थतंत्र में 1873 से 1895 तक चलने वाली मंदी ने इजारेदारी की प्रक्रिया को त्वरित कर दिया क्योंकि बड़ी संख्या में उद्योग मजबूरन या तो बंद हुए या अधिक सफल व्यवसायियों को बिक गये जिससे बाज़ार में कम ही उद्योग रह गये । इस प्रक्रिया ने इजारेदारी की प्रवृत्ति को मजबूत किया ।
नयी औद्योगिक ताकतों के उदय के साथ ही उपनिवेशों के लिए होड़ तेज हो गयी । अफ़ीकी महाद्वीप का उपनिवेशीकरण, जिसको ‘अफ़्रीका की छीनाझपटी’ कहा जाता है, 1875 से 1900 के बीच पूरा हो गया । अमरीका ने 1890 दशक से, शुरू में स्पेन की कीमत पर, कैरिबियाई और पूर्वी एशियाई देशों में उपनिवेश कायम करना शुरू किया । रूस भी इटली और बेल्जियम के साथ, मध्य और पूर्वी एशिया में अपना भूभागीय नियंत्रण बढ़ाकर, उपनिवेशों की इस दौड़ में शामिल हो गया । तुर्की और चीन का विभाजन किया जा रहा था । और बीसवीं सदी के पहले दशक तक जापान ऐसे उद्योगीकृत देशों की सूची में शामिल हो गया जो कब्जाने के लिए उपनिवेश तलाश रहे थे । दूसरे देशों के भूभाग कब्जाने की इच्छा, बाज़ार और कच्चे माल की जरूरत के चलते बढ़ गयी । कभी कभी सीधे कब्जे की बजाए ‘अनौपचारिक’ नियंत्रण बेहतर समझा जाता था (मसलन चीन और अर्जेंटिना में) । साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच तनाव बढ़ने से झगड़े पैदा हुए जिनके चलते प्रथम विश्वयुद्ध हुआ । इस युद्ध में जर्मनी का एक मकसद ब्रिटेन और फ़्रांस को कुछ उपनिवेश छोड़ने के लिए मजबूर करके एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमरीका का पुनर्विभाजन करना था ।
उपनिवेशों के लिए इस अंधी दौड़ और उन्नीसवीं सदी के अंत में पूँजीवाद द्वारा प्रदर्शित कुछ नयी विशेषताओं की पृष्ठभूमि में एक सैद्धांतिक प्रश्न के रूप में साम्राज्यवाद का विश्लेषण शुरू हुआ । साम्राज्यवाद की उदारवादी और मार्क्सवादी आलोचना बीसवीं सदी के शुरुआती दो दशकों में कमोबेश साथ साथ ही उभरी । विचारधारा के बतौर उन्नीसवीं सदी का उदारवाद आम तौर पर मुक्त व्यापार, प्रतियोगी पूँजीवाद, आर्थिक मामलों में राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप और मताधिकार के विस्तार के जरिए जनवादीकरण से प्रतिबद्ध था । अंतर्राष्ट्रीय पूँजीवादी अर्थतंत्र में जब तक ब्रिटेन का बोलबाला रहा तब तक मुक्त व्यापार का सिद्धांत कोई समस्या नहीं था जिसका मतलब था दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बाज़ारों और कच्चे माल के स्रोतों तक ब्रिटेन की अबाध पहुँच । लेकिन जर्मनी और अमरीका जैसे प्रतियोगियों के उभार के बाद इस धारणा को बनाए रखना कठिन हो गया । ब्रिटेन में उदारवादियों के भी एक हिस्से की ओर से माँग होने लगी कि बाहर से आने वाली निर्मित वस्तुओं पर कराधान के जरिए स्थानीय उद्योग को संरक्षण दिया जाए । इसी तरह जर्मनी और अनेक नव उद्योगीकृत देशों ने कराधान के ऐसे ढाँचे विकसित किये जिनका मकसद अपने नवजात उद्योगों की रक्षा करना था । राजनीतिक अर्थशास्त्रियों ने मुक्त व्यापार की धारणा पर लगातार हमला किया । यह तो उदारवादी चिंतकों का भी सरोकार था जो प्रतियोगी पूँजीवाद के लिए इजारेदारियों द्वारा पैदा किए गए खतरे से परेशान थे । इन चिंतकों के सामने यह बात स्पष्ट थी कि उपनिवेशों के लिए अंधी दौड़ और पूँजीवाद में विकसित नयी, नकारात्मक प्रवृत्तियों में घनिष्ठ रिश्ता है । उन्हें किसी वजह से भरोसा था कि ऐसा पूँजीवाद संभव है जो ‘अच्छा’ हो । इसी ऐतिहासिक संदर्भ में हाब्सन की किताब इंपीरियलिज्म : ए स्टडी (1902) लिखी गयी । हाब्सन की किताब को साम्राज्यवाद की पहली गंभीर उदारवादी आलोचना माना जा सकता है । जल्दी ही साम्राज्यवाद की मार्क्सवादी समझ भी तीन बुनियादी किताबों के जरिए सामने आई : रूडोल्फ़ हिलफ़रडिंग की फ़ाइनेंस कैपिटल (1910); रोजा लक्जेमबर्ग की द एकुमुलेशन आफ़ कैपिटल (1913) और द एकुमुलेशन आफ़ कैपिटल : ऐन एंटी क्रिटीक (1915 में लिखित); और वी आई लेनिन की इंपीरियलिज्म : द हाइएस्ट स्टेज आफ़ कैपिटलिज्म (1916) । हालाँकि इस समझ के निशान उपनिवेशवाद की मार्क्स की आलोचना में खोजे जा सकते हैं लेकिन हिलफ़रडिंग, लक्जेमबर्ग और लेनिन की कोशिश इजारेदारियों के विकास की पृष्ठभूमि में, जिसके चलते साम्राज्यवादी शत्रुता में तेजी आयी थी, मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य से साम्राज्यवाद को सैद्धांतिक तौर पर परिश्रमपूर्वक समझने की थी । बाद का तकरीबन समूचा मार्क्सवादी लेखन, अगर इनकी आलोचना हो तो भी, इन अगुआ किताबों से प्रेरित रहा है ।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उदारवादी विचारधारा में घटोत्तरी बुर्जुआ चिंतकों द्वारा साम्राज्यवाद की आलोचना के प्रति अनिच्छा में प्रतिबिंबित हुई । इस दौर में इस मुद्दे पर उदारवादी मत को गहराई देने वाला एकमात्र लेखन जोसेफ शूम्पीटर का लंबा लेख ‘द सोशियोलोजी आफ़ इंपीरियलिजम्स’ (1919) ही कहा जा सकता है । मार्क्सवादी बौद्धिक परंपरा में इस मुद्दे पर गहरी बहसें हुईं जो आज भी जारी हैं । आज जबकि मार्क्सवादी खासकर सोवियत संघ के पतन के बाद पूँजी द्वारा अपने प्रभुत्व को कायम रखने की नयी रणनीतियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं तब उनके बौद्धिक प्रयासों में अंतर्निहित विचारों को जानना ज्यादा जरूरी है । एंथनी ब्रेवेर की किताब मार्क्सिस्ट थियरीज आफ़ इंपीरियलिज्म को लंबे समय से इस विषय की सर्वोत्तम प्रवेशिका माना जाता रहा है । इसमें कुछ अत्यंत जटिल मुद्दों और कठिन धारणाओं को स्पष्ट रूप से समझाया गया है जिनका अवगाहन साम्राज्यवाद संबंधी मार्क्सवादी चिंतन की विभिन्न धाराओं को समझने के लिए जरूरी है । ब्रेवेर की किताब को हिंदी में सुलभ कराने वाले इस अनुवाद के जरिए बड़े पाठक वर्ग को मौका मिलेगा कि वह इस क्लासिकल अध्ययन के सहारे साम्राज्यवाद संबंधी मार्क्सवादी सिद्धांतों को अधिक आत्मविश्वास के साथ देखे ।                 

Tuesday, July 10, 2012

मार्क्सवादी दर्शन के बारे में


                                

दोस्तो आपने पहली क्लास में ही मार्क्स के बारे में थोड़ी जानकारी हासिल की थी । मार्क्सवादी दर्शन को आम तौर पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद कहा जाता है । इसका मतलब समझने के लिए थोड़ा उस समय की परिस्थिति को देखना होगा । मार्क्स जर्मनी के रहनेवाले थे और उस समय जर्मनी दार्शनिक सोच विचार का गढ़ बना हुआ था खासकर नौजवानों में उस समय हेगेल नाम के दार्शनिक का फ़ैशन था । वे न सिर्फ़ जर्मनी बल्कि दुनिया के बड़े दार्शनिक थे । हेगेल का महत्व बताते हुए एंगेल्स ने लिखा ‘हेगलवादी दर्शन का असली महत्व और उसका क्रांतिकारी स्वरूप—इसी बात में निहित था कि उसने मानव चिंतन और कृत्यों की सारी उपज की अंतिमता पर प्राणघातक प्रहार किया था ।’ नतीजा कि तमाम नए लोग इनके विचारों की ओर आकर्षित हुए । इन्हीं नौजवानों में मार्क्स भी शामिल थे । लेकिन मार्क्स ने बाकी सबसे अलग राह अपनाई । शुरू के ही दिनों में उन्होंने एक टिप्पणी में इसकी झलक दिखलाई जब उन्होंने लिखा ‘दार्शनिकों ने विभिन्न विधियों से विश्व की केवल व्याख्या की है लेकिन प्रश्न विश्व को बदलने का है ।’ बात यह नहीं कि मार्क्सवाद विश्व की व्याख्या करता ही नहीं बल्कि उसकी व्याख्या का उद्देश्य दुनिया को बदलना होता है ।
इस टिप्पणी में उन्होंने अपना काम तय करने के साथ यह भी बताया कि दर्शन है क्या । दर्शन आम तौर पर मनुष्य, संसार और ईश्वर के आपसी रिश्तों की व्याख्या करने की कोशिश होता है । यह इस दुनिया में मनुष्य की स्थिति को समझने की कोशिश से पैदा हुआ है । आधुनिक काल में दर्शन के एक बड़े सवाल को पेश करते हुए एंगेल्स ने लिखा है ‘यह प्रश्न कि आत्मा और प्रकृति में कौन प्राथमिक है ----इस तीक्ष्ण रूप में प्रस्तुत किया गयाः क्या ईश्वर ने संसार का सृजन किया है या संसार अनंत काल से मौजूद है ? दार्शनिकों ने इस प्रश्न के जो उत्तर दिए उन्होंने उनको दो बड़े खेमों में बाँट दिया । जिन्होंने आत्मा को प्रकृति के मुकाबले में प्राथमिकता दी---उनका अपना अलग भाववादी शिविर बन गया । दूसरे जिन्होंने प्रकृति की प्राथमिकता मानी वे भौतिकवाद की विभिन्न शाखाओं में शामिल हुए ।’
उन्होंने द्वंद्ववाद की विकास यात्रा का वर्णन करते हुए लिखा ‘जब हम समग्र प्रकृति या मानवजाति के इतिहास पर या अपने मन की प्रक्रियाओं पर विचार करते हैं तब हमें पहले क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं, संबंधों, विभिन्न तत्वों के योग और संयोजन से बना हुआ एक जाल सा दिखाई देता है जो कहीं खत्म नहीं होता, जिसमें कोई वस्तु स्थिर नहीं रहती, जो जहाँ जैसा था वह वहाँ वैसा नहीं रहता, जिसमें हर वस्तु गतिशील है, परिवर्तनशील है, हर वस्तु का निर्माण होता है और नाश होता है । इस प्रकार हम इस चित्र को पहले समग्र रूप में देखते हैं, उसके अलग अलग हिस्से हमारी नजर में नहीं पड़ते, वे न्यूनाधिक पृष्ठभूमि में ही रहते हैं । हम गति, संक्रमण और परस्पर संबंधों को देखते हैं, किंतु जिन वस्तुओं की यह गति है, ये योग और संबंध हैं, हम उन्हें नहीं देख पाते । विश्व की यह धारणा आदिम और भोली भाली है ।’ तो यह हुआ द्वंद्ववाद का आदिम स्वरूप । इसकी कमी यह थी कि ‘यह धारणा कुल मिलाकर दृश्य जगत के चित्र के सामान्य स्वरूप को तो सही सही व्यक्त करती है लेकिन जिन तफ़सीलों से यह चित्र बना है उनकी व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं है ।’ इसी कमी के चलते चिंतन में अधिभूतवाद का जन्म हुआ जिसकी विशेषता थी कि वह ‘वस्तु और वस्तुओं के मानस चित्र अर्थात विचार’ को ‘एक दूसरे से अलग करके और एक के बाद एक देखता है ।’ लेकिन यह चिंतन प्रणाली ‘एकांगी, संकुचित , अमूर्त हो जाती है---अलग अलग वस्तुओं पर विचार करते समय अधिभूतवादी उनके परस्पर संबंधों को भूल जाता है, उनके अस्तित्व पर विचार करते समय वह उस अस्तित्व के आरंभ और अंत को भूल जाता है, वह उन्हें विराम स्थिति में देखता है, लेकिन उनकी गति को भूल जाता है ।’ इसके बाद द्वंद्ववाद का अगला महत्वपूर्ण विकास हेगेल के दर्शन में दिखाई पड़ता है । ‘इस प्रणाली में- और यही इसकी बहुत बड़ी खूबी है- यह पूरा जगत-प्राकृतिक, ऐतिहासिक तथा बौद्धिक जगत- पहली बार एक प्रक्रिया के रूप में अर्थात सतत प्रवाह, गति, परिवर्तन, रूपांतरण तथा विकास की अवस्था में चित्रित किया गया है और साथ ही साथ उस आंतरिक संबंध को, उस सूत्र को पकड़ने की कोशिश की गई है जिससे इस समस्त गति और विकास को एक क्रमबद्ध व्यवस्था का रूप मिलता है ।’ लेकिन हेगेल भाववादी थे । उनके दर्शन की इस कमी के चलते ‘दार्शनिकों का झुकाव फिर भौतिकवाद की ओर हुआ लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि यह भौतिकवाद अठारहवीं सदी के अधिभूतवादी, सर्वथा यांत्रिक भौतिकवाद से भिन्न था ।---आधुनिक भौतिकवाद की दृष्टि में—इतिहास मानवजाति के विकास की एक प्रक्रिया है और उसका लक्ष्य है इस विकास के नियमों का पता लगाना ।--- आधुनिक भौतिकवाद मूलतः द्वंद्वात्मक है--- ।’                
एंगेल्स ने द्वंद्ववाद को परिभाषित करते हुए लिखा ‘द्वंद्वात्मक दर्शन के लिए कोई भी वस्तु अंतिम, निरपेक्ष और पुण्य नहीं है । वह हर चीज में और हर चीज का परिवर्तनशील गुण प्रदर्शित करता है उसके समक्ष निम्नावस्था से ऊपर की ओर उठते हुए अंतहीन विकासक्रम, उत्पत्ति और विनाश की निरंतर प्रक्रिया के अलावा और कोई दूसरी चीज टिक नहीं सकती ।’ दूसरी विशेषता का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि द्वंद्ववाद ‘दुनिया को पहले से ही मौजूद वस्तुओं के समुच्चय के रूप में नहीं, बल्कि प्रक्रियाओं के समुच्चय के रूप में ग्रहण’ करता है ‘जिसमें स्थायी लगने वाली वस्तुएँ ही नहीं बल्कि उसी तरह मानव मस्तिष्क में उनके मानसिक बिंब यानी धारणाएँ भी लगातार पैदा और खत्म होती रहती हैं--’। द्वंद्ववाद का उलटा अधिभूतवाद है जो सबसे ज्यादा एकांगीपन में व्यक्त होता है इसलिए द्वंद्ववाद की एक और विशेषता चीजों को उनकी समग्रता में देखना है । यहाँ इस बात को साफ करना जरूरी है कि यह पद्धति बहुत पुरानी है क्योंकि प्रकृति में विभिन्न वस्तुएँ और मनुष्य के दिमाग में विचार इसी रूप में मौजूद होते हैं । लेकिन इस पुराने द्वंद्ववाद से मार्क्सवाद का अंतर भौतिकवाद को इससे जोड़ देने से पैदा हुआ । भौतिकवाद भी पहले से ही मौजूद था लेकिन द्वंद्ववाद के साथ मिलकर यह एक नए विश्व दृष्टिकोण का रूप ले बैठा ।  
तो ऊपर की बातों से स्पष्ट होता है कि द्वंद्वात्मकता यानी लगातार विकास और कोई भी चीज अंतिम नहीं । भौतिकवाद यानी आत्मा के मुकाबले प्रकृति को प्राथमिकता देना । इस तरह दोनों को मिलाकर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद कहा जाता है । द्वंद्व शब्द से ही स्पष्ट है कि इसके मुताबिक किन्हीं दो चीजों के बीच टकराव होता है । टकराव तभी होगा जब ये दोनों चीजें एक दूसरे से अलग हों लेकिन एक ही जगह मौजूद हों । इसे ही ‘विपरीतों की एकता’ या ‘अंतर्विरोध’ भी कहा जाता है । माओ ने लिखा ‘वस्तुओं में अंतर्विरोध का नियम, यानी विपरीत तत्वों की एकता का नियम, भौतिकवादी द्वंद्ववाद का सबसे बुनियादी नियम है ।’ लेनिन ने इसे ही द्वंद्ववाद का सार माना है । 
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को प्रकृति और मानव चिंतन में तो देखा गया था लेकिन मार्क्स ने इसे समाज के इतिहास पर लागू किया जिसे ऐतिहासिक भौतिकवाद कहते हैं इसके सिलसिले में हम उनकी एक और रचना में व्यक्त उनकी चिंतन पद्धति को देखेंगे । सामाजिक इतिहास के सिलसिले में मार्क्स एंगेल्स की किताब ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ का उल्लेख जरूरी है । उसकी पहली पंक्ति ही सामाजिक इतिहास में द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दृष्टि के प्रयोग की मिसाल है ‘अभी तक का आविर्भूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है ।’ वर्ग संघर्ष का अर्थ ही हुआ परस्पर विरोधी दो मानव समूहों का एक दूसरे के साथ रहना और एक दूसरे के साथ संघर्षरत अवस्था में होना । इसी को मार्क्सवाद सामाजिक विकास का प्रमुख कारण मानता है ।   
माओ ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘अंतर्विरोध के बारे में’ में विस्तार से और खूबसूरती के साथ द्वंद्ववाद के कुछ सूत्रों पर चर्चा की है । उनका कहना है ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के विश्व दृष्टिकोण का कहना है कि किसी वस्तु के विकास को समझने के लिए उसका अध्ययन भीतर से, अन्य वस्तुओं के साथ उस वस्तु के संबंध से किया जाना चाहिए ; दूसरे शब्दों में वस्तुओं के विकास को उनकी आंतरिक और आवश्यक आत्म गति के रूप में देखना चाहिए, और यह कि प्रत्येक गतिमान वस्तु को और उसके इर्द गिर्द की वस्तुओं को परस्पर संबंधित तथा एक दूसरे को प्रभावित करती हुई वस्तुओं के रूप में देखना चाहिए । किसी वस्तु के विकास का मूल कारण उसके बाहर नहीं बल्कि उसके भीतर होता है ; उसके अंदरूनी अंतर्विरोध में निहित होता है । यह अंदरूनी अंतर्विरोध हर वस्तु में निहित होता है तथा इसीलिए हर वस्तु गतिमान और विकासशील होती है । किसी वस्तु के भीतर मौजूद अंतर्विरोध ही उसके विकास का मूल कारण होता है जबकि उसके और अन्य वस्तुओं के बीच के अंतर्संबंध और अंतर्प्रभाव उसके विकास के गौण कारण होते हैं ।’ फिर वे खुद ही सवाल उठाते हैं । ‘क्या भौतिकवादी द्वंद्ववाद बाह्य कारणों की भूमिका को नहीं मानता ?’ उत्तर देते हुए वे कहते हैं ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद का मत है कि बाह्य कारण परिवर्तन के लिए महज परिस्थिति होते हैं जबकि आंतरिक कारण परिवर्तन का आधार होते हैं तथा बाह्य कारण आंतरिक कारणों के जरिए ही क्रियाशील होते हैं ।’ आगे वे अंतर्विरोध की सार्वभौमिकता की चर्चा करते हुए बताते हैं ‘अंतर्विरोध सार्वभौमिक और निरपेक्ष होता है, वह सभी वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया में मौजूद रहता है और सभी प्रक्रियाओं में शुरू से अंत तक बना रहता है ।’ कोई नई प्रक्रिया पैदा कैसे होती है ? इसका वर्णन करते हुए वे बताते हैं ‘जब कोई नई एकता तथा उसके संघटक विपरीत तत्व किसी पुरानी एकता और उसके संघटक विपरीत तत्वों का स्थान लेते हैं तो पुरानी प्रक्रिया के स्थान पर एक नई प्रक्रिया का उदय होता है । पुरानी प्रक्रिया का अंत हो जाता है और नई प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है । इस नई प्रक्रिया में नए अंतर्विरोध होते हैं और उसके अपने अंतर्विरोधों के विकास का इतिहास शुरू हो जाता है ।’ अंतर्विरोधों की सार्वभौमिकता और निरपेक्षता पर विचार करने के बाद वे इनकी विशिष्टता पर विचार करते हैं क्योंकि ये दोनों ही मिलकर अंतर्विरोध की पूरी तस्वीर बनाते हैं । इन दोनों का आपसी रिश्ता बताते हुए वे लिखते हैं ‘इसमें संदेह नहीं कि अंतर्विरोध की सार्वभौमिकता को समझे बिना हम वस्तुओं की गति, वस्तुओं के विकास के सार्वभौमिक कारण या सार्वभौमिक आधार का किसी तरह पता नहीं लगा सकते ; लेकिन अंतर्विरोध की विशिष्टता का अध्ययन किए बिना हम किसी वस्तु की उस मूलवस्तु का किसी तरह पता नहीं लगा सकते जो उस वस्तु को अन्य वस्तुओं से भिन्न बना देती है---।‘ इसका मकसद यह है कि ‘भिन्न भिन्न अंतर्विरोधों को हल करने के लिए भिन्न भिन्न तरीकों को इस्तेमाल करने का उसूल एक ऐसा उसूल है जिसका पालन मार्क्सवादी लेनिनवादियों को सख्ती से करना चाहिए ।’ इसे ही वे लेनिन का ‘ठोस परिस्थितियों का ठोस रूप में विश्लेषण’ कहते हैं । लेकिन एक विशेष स्थिति का जिक्र भी माओ करते हैं जब आम तौर पर लागू होने वाला जोर बदल जाता है और यह मार्क्सवाद तथा कम्युनिस्ट कार्यनीति की खासियत है कि वह एक ही धारणा से चिपकी नहीं रहती बल्कि स्थिति में आने वाले बदलावों के मुताबिक अपनी कार्यनीति भी बदल लेती है । माओ कहते हैं कि यह सोचना सही नहीं होगा कि ‘उत्पादक शक्तियों और उत्पादन संबंधों के बीच के अंतर्विरोध में उत्पादक शक्तियाँ प्रधान पहलू हैं ; सिद्धांत और व्यवहार के बीच के अंतर्विरोध में व्यवहार प्रधान पहलू है ; आर्थिक आधार और ऊपरी ढाँचे के बीच के अंतर्विरोध में आर्थिक आधार प्रधान पहलू है ; और इनकी अपनी स्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं होता । यह धारणा एक यांत्रिक भौतिकवादी धारणा है, द्वंद्वात्मक भौतिकवादी नहीं । यह सच है कि उत्पादक शक्तियाँ, व्यवहार और आर्थिक आधार आम तौर पर प्रधान और निर्णयात्मक भूमिका अदा करते हैं ; जो कोई इस बात से इन्कार करता है वह भौतिकवादी नहीं है । लेकिन इस बात को भी स्वीकार करना होगा कि एक विशेष परिस्थिति में उत्पादन संबंध, सिद्धांत और ऊपरी ढाँचे जैसे पहलू भी प्रधान और निर्णयात्मक भूमिका अदा करते है ।’ इसका उदाहरण देते हुए वे कहते हैं ‘जब उत्पादन संबंधों को बदले बिना उत्पादक शक्तियों का विकास नहीं हो सकता, तब उत्पादन संबंधों में परिवर्तन ही प्रधान और निर्णयात्मक भूमिका अदा करता है । जैसा कि लेनिन ने कहा था “बिना क्रांतिकारी सिद्धांत के कोई क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता” ; ऐसी स्थिति में क्रांतिकारी सिद्धांत की रचना और उसके प्रतिपादन की ही प्रधान और निर्णयात्मक भूमिका होती है ।---जब ऊपरी ढाँचा (राजनीति, संस्कृति आदि) आर्थिक आधार के विकास को अवरुद्ध करता है, तब राजनीतिक और सांस्कृतिक सुधार प्रधान और निर्णयात्मक तत्व बन जाते हैं ।---जहाँ हम यह मानते हैं कि इतिहास के आम विकास के दौरान भौतिक स्थिति ही मानसिक स्थिति का निर्णय करती है तथा सामाजिक अस्तित्व ही सामाजिक चेतना का निर्णय करता है, वहाँ हम यह भी मानते हैं और हमें ऐसा अवश्य मान लेना चाहिए कि मानसिक स्थिति की भौतक सथिति पर, सामाजिक चेतना की सामाजिक अस्तित्व पर तथा ऊपरी ढाँचे की आर्थिक आधार पर भी प्रतिक्रिया होती है । यह मान्यता भौतिकवाद के खिलाफ़ नहीं है ; इसके विपरीत यह यांत्रिक भौतिकवाद से बच जाती है और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर दृढ़ता से कायम रहती है ।’         
अपनी बात का समाहार करते हुए माओ ने लिखा ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दृष्टिकोण के अनुसार अंतर्विरोध वस्तुगत पदार्थों की और मनोगत चिंतन की सभी प्रक्रियाओं में मौजूद होता है और इन सभी प्रक्रियाओं में शुरू से अंत तक बना रहता है ; यही अंतर्विरोध की सार्वभौमिकता और निरपेक्षता है । प्रत्येक अंतर्विरोध और उसके प्रत्येक पहलू की अपनी अपनी विशिष्टताएँ होती हैं ; यही अंतर्विरोध की विशिष्टता और सापेक्षता है । एक विशेष परिस्थिति में विपरीत तत्वों में एकरूपता होती है और इसलिए वे एक ही इकाई में सह अस्तित्व की स्थिति में रह सकते हैं तथा एक दूसरे में बदल सकते हैं ; यह भी अंतर्विरोध की विशिष्टता और सापेक्षता है । किंतु विपरीत तत्वों के बीच संघर्ष लगातार चलता रहता है ; यह संघर्ष तब भी चलता रहता है जबकि विपरीत तत्व सह अस्तित्व की स्थिति में रहते हैं और तब भी जबकि वे एक दूसरे में रूपांतरित होते हैं और खासकर जब उनका एक दूसरे में रूपांतर हो रहा होता है उस समय यह संघर्ष और ज्यादा स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है ; यह भी अंतर्विरोध की सार्वभौमिकता और निरपेक्षता ही है । अंतर्विरोध की विशिष्टता और सापेक्षता का अध्ययन करते समय हमें प्रधान अंतर्विरोध तथा अप्रधान अंतर्विरोधों के फ़र्क को तथा अंतर्विरोध के प्रधान पहलू और अप्रधान पहलू के फ़र्क को ध्यान में रखना चाहिए ; अंतर्विरोध की सार्वभौमिकता और अंतर्विरोध में निहित विपरीत तत्वों के संघर्ष का अध्ययन करते समय हमें संघर्ष के विभिन्न रूपों के भेद को ध्यान में रखना चाहिए । अन्यथा हम गलतियाँ कर बैठेंगे ।’                
अपनी चिंतन पद्धति को स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने लिखा है ‘जिस सामान्य निष्कर्ष पर मैं पहुँचा और जो एक बार प्राप्त हो जाने के बाद मेरे अध्ययन का पथ प्रदर्शक सूत्र बन गया उसे संक्षेप में इन शब्दों में कहा जा सकता है । अपने जीवन के सामाजिक उत्पादन में मनुष्य ऐसे निश्चित संबंधों में बँधते हैं जो अपरिहार्य और उनकी इच्छा से स्वतंत्र होते हैं । उत्पादन के ये संबंध उत्पादन की भौतिक शक्तियों के विकास की एक निश्चित मंजिल के अनुरूप होते हैं । इन उत्पादन संबंधों का कुल जोड़ ही समाज का आर्थिक ढाँचा है- वह असली बुनियाद है iज्स पर कानून और राजनीति का ऊपरी ढाँचा खड़ा हो जाता है और जिसके अनुकूल ही सामाजिक चेतना के निश्चित रूप होते हैं । भौतिक जीवन की उत्पादन प्रणाली जीवन की आम सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक प्रक्रिया को निर्धारित करती है । मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती बल्कि उलटे उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है । अपने विकास की एक खास मंजिल पर पहुँचकर समाज की भौतिक उत्पादन शक्तियाँ तत्कालीन उत्पादन संबंधों से या- उसी चीज को कानूनी भाषा में यों कहा जा सकता है- उन संपत्ति संबंधों से टकराती हैं जिनके अंतर्गत वे उस समय तक काम करती होती हैं । ये संबंध उत्पादन शक्तियों के के विकास के अनुरूप न रहकर उनके लिए बेड़ियाँ बन जाते हैं । तब सामाजिक क्रांति का युग शुरू होता है । आर्थिक बुनियाद बदलने के साथ समस्त ऊपरी ढाँचा भी कमोबेश तेजी से बदल जाता है ।’ इन दोनों के बीच अंतर बताते हुए ऊपरी ढाँचे का महत्व भी मार्क्स रेखांकित करते हैं ‘एक ओर तो उत्पादन की आर्थिक परिस्थितियों का भौतिक रूपांतरण है जो प्रकृति विज्ञान की अचूकता के साथ निर्धारित किया जा सकता है । दूसरी ओर वे कानूनी, राजनीतिक, धार्मिक, सौंदर्यबोधी या दार्शनिक, संक्षेप में विचारधारात्मक रूप हैं जिनके दायरे में मनुष्य इस टक्कर के बारे में सचेत होते हैं और उससे निपटते हैं ।’ यहीं हम यह भी समझ सकते हैं कि आर्थिक सवालों के लिए होने वाले संघर्ष में राजनीति की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो जाती है । आगे वे इस सूत्र को ऐतिहासिक बदलाव की प्रक्रिया से जोड़ते हुए कहते हैं ‘कोई भी समाज व्यवस्था तब तक खत्म नहीं होती जब तक उसके अंदर तमाम उत्पादन शक्तियाँ जिनके लिए उसमें जगह है विकसित नहीं हो जातीं और नए उच्चतर उत्पादन संबंधों का आविर्भाव तब तक नहीं होता जब तक कि उनके अस्तित्व की भौतिक परिस्थितियाँ पुराने समाज के ही गर्भ में पुष्ट हो चुकतीं ।’ इसी बात को थोड़ा विस्तार से समझाते जुए एंगेल्स ने लिखा ‘इतिहास की भौतिकवादी धारणा का प्रस्थान विंदु यह प्रस्थापना है कि मनुष्य के पोषण के लिए आवश्यक साधनों का उत्पादन और उत्पादन के बाद उत्पादित वस्तुओं का विनिमय प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था का आधार है--- इस दृष्टिकोण के अनुसार सभी सामाजिक परिवर्तनों और राजनीतिक क्रांतियों के अंतिम कारण मनुष्य के मस्तिष्क में नहीं---बल्कि उत्पादन तथा विनिमय प्रणाली में होने वाले परिवर्तनों में निहित हैं । उनका पता प्रत्येक युग के दर्शन में नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था में लगाया जाना चाहिए ।’ इसी आधार पर मार्क्स और एंगेल्स ने पूँजीवाद अपने बारे में जो कहता है उसके आधार पर नहीं बल्कि सचमुच मौजूद स्थितियों के विश्लेषण के आधार पर उसमें निहित अंतर्विरोधों का पता लगाया और स्र्वहारा क्रांति के जरिए उसके विनाश और समाजवाद की स्थापना का सिद्धांत प्रस्तुत किया ।
इस लेख में मार्क्स और एंगेल्स की किताब ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ के अलावा मार्क्स की ‘फ़ायरबाख पर टिप्पणियाँ’ और ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना में एक योगदान’ की भूमिका, एंगेल्स की ‘लुडविग फ़ायरबाख और क्लासिकीय जर्मन दर्शन का अंत’ और ‘समाजवाद : काल्पनिक और वैज्ञानिक’ तथा माओ के लेख ‘अंतर्विरोध के बारे में’ से मदद ली गई है। आगे के अध्ययन के लिए इन किताबों को देखना उपयोगी होगा ।