Monday, December 2, 2024

फिर फिर नवउदारवाद

 

             

                                

पिछले तीस सालों से अधिक समय से हम सभी जिस माहौल में रह रहे हैं उसके भयावह नतीजे अब प्रत्यक्ष हैं । यह समय सोच विचार की दुनिया में बहुत ही विवाद का रहा । उदाहरण के लिए इसके साथ जुड़े वैश्वीकरण पर शुरू से ही संदेह उठाया जाता रहा । यहां तक कि निजीकरण की प्रकृति पर भी सवाल उठते रहे । बहरहाल इस दौर की परिणति की अनुभूति तेजी से बढ़ रही है । युद्ध, अनिश्चय और तबाही की अनुगूंजें हवाओं में व्याप्त हैं । ऐसे में एक सोच के मुताबिक नवउदारवाद का दौर अब समाप्त हो चला है । इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि जो कुछ हो रहा है वह नवउदारवाद का ही प्रसार है । स्पष्ट है कि इस दौर का जायजा लेने का सही समय आ चुका है । नवउदारवाद नामक इस परिघटना के भीतर आर्थिकी से लेकर संस्कृति तक बहुत कुछ आता है इसलिए उनका भी निदर्शन आवश्यक हो जाता है ।

नवउदारवाद के साथ तमाम तरह की पुरानी विषमताओं की वापसी हुई है । इस तथ्य को उजागर करते हुए 1999 में वेस्टव्यू प्रेस से एडोल्फ़ रीड जूनियर के संपादन में ‘विदाउट जस्टिस फ़ार आल: द न्यूलिबरलिज्म ऐंड आवर रिट्रीट फ़्राम रेशियल इक्वलिटी’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब में शामिल बारह लेख पांच भागों में हैं । पहले भाग के लेखों में नस्ल और विषमता के सिलसिले में उभरी नई कट्टरता का जिक्र है । दूसरे भाग के लेख नस्ल, विचारधारा और नीति निर्माण के बारे में खोखली बातों का रहस्य भेदन करते हैं । तीसरे भाग में नस्लवाद विरोधी सरकारी नीति पर हमलों और विचारधारा का विश्लेषण किया गया है । चौथे भाग में अश्वेत समायोजन की नई लहर का विवेचन है । पांचवें भाग में सारी बातों का समाहार प्रस्तुत किया गया है । संपादक की राय है कि 1980 दशक में रीगनवाद की सफलता से उत्साहित होकर समूचे 1990 के दशक में अमेरिकी राजनीति में दक्षिणपंथी झुकाव आया तथा उदारवादी तत्वों ने इसे मजबूरी मान लिया । जनता से उनकी दूरी बढ़ती गयी और उन्हें खास हितों का हिमायती माना जाने लगा । कहा जाने लगा कि हाशिये के अपने समर्थकों से दूरी बनाने और मुख्य धारा के मतदाता के पास जाने की जरूरत है । मुख्य धारा का यह मतदाता खाता पीता गोरा पुरुष था । जो डेमोक्रेटिक पार्टी 1960 के दशक के बाद से ही वाम उदार राजनीति का स्वाभाविक केंद्र समझी जाती थी उसके भीतर इस विचार ने जड़ जमा लिया ।

आज भले ही नवउदारवाद के साथ चरम दक्षिणपंथी राजनीति को जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन कभी इसे नव सामाजिक आंदोलन के साथ उपजी राजनीतिक धारा के साथ भी जोड़ा गया था । सबूत के तौर पर 2000 में मैकमिलन से देव टोक की किताब ‘ग्रीन पोलिटिक्स ऐंड नियो-लिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ ।

नवउदारवाद के साथ दुनिया में जो बदलाव आये उनमें से एक नगरीकरण की नयी लहर का उदय भी था । इस लहर की विशेषताओं को नगरों के कुलीनीकरण (जेंट्रीफ़िकेशन) की प्रक्रिया कहा गया । इस दौर की विशेषता बताते हुए 2002 में ब्लैकवेल पब्लिशिंग से नील ब्रेन्नेर और निक थियोडोर के संपादन में ‘स्पेसेज आफ़ नियोलिबरलिज्म: अर्बन रिस्ट्रक्चरिंग इन नार्थ अमेरिका ऐंड वेस्टर्न यूरोप’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की भूमिका के अतिरिक्त किताब में तीन भाग हैं । पहले भाग के चार लेखों में नवउदारवाद के शहरीकरण की सैद्धांतिकी पर विचार किया गया है । दूसरे भाग में भी चार ही लेख हैं जिनमें शहर और राज्य की पुनर्संरचना के रास्तों और उनसे पैदा होनेवाले अंतर्विरोधों का विवेचन है । तीसरे भाग में तीन लेख हैं जिनमें सत्ता, बहिष्करण और अन्याय के नए भूगोल को समझने की कोशिश की गयी है ।

इसे पूंजीवाद के नये हमले के बतौर देखने के अनुरोध के साथ 2004 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से जेरार्ड ड्यूमेनिल और डामीनिक लेवी की फ़्रांसिसी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘कैपिटल रिसर्जेन्ट: रूट्स आफ़ द नियोलिबरल रेवोल्यूशन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ । अनुवाद डेरेक जेफ़र्स ने किया है । लेखक का मानना है कि सत्तर और अस्सी के दशक में पूंजीवाद में जो बदलाव आया उसे बताने के लिए नवउदारवाद शब्द का प्रयोग किया जाता है । अमेरिका ने फैसला किया था कि मुद्रास्फीति से लड़ने के लिए वह ब्याज दर की बढ़ोत्तरी पर कोई रोक नहीं लगाएगा लेकिन पूंजी के हिंसक उभार के इस दौर को परिभाषित करने वाले अनेक फैसलों में से वह एक फैसला था । दूसरे विश्वयुद्ध से लेकर सत्तर दशक के अंत तक का समय कीन्सीय अर्थशास्त्र, पूर्ण रोजगार, सामाजिक कल्याण, शिक्षा और सेहत की सार्वत्रिक सुलभता का समय विकसित समाजों में था । पूंजीवाद की चुनौतियों को हल करने और समाजवाद से लड़ने के लिए उन नीतियों की तात्कालिक जरूरत थी । नवउदारवाद ने इसी व्यवस्था को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नष्ट करने का बीड़ा उठाया ताकि पूंजीवाद के स्वाभाविक नियमों की एक बार फिर से प्रतिष्ठा हो सके ।

2005 में डेविड हार्वे की किताब ‘ए ब्रीफ़ हिस्ट्री आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से हुआ । फिर 2007 में इसका पेपरबैक संस्करण छपा । किताब में मार्गरेट थैचर और रोनाल्ड रीगन से शुरू करके चीन तक इसके प्रसार की कथा कही गई है । वे बताते हैं कि 1978-80 के साल भविष्य के इतिहासकारों की नजर में दुनिया के समाजार्थिक हालात में क्रांतिकारी बदलाव के साल दिखेंगे । दुनिया की आबादी के पांचवें हिस्से कम्युनिस्ट शासनवाले देश में 1978 में देंग शियाओ पिंग ने उदारवाद की राह पकड़ी । आगामी दो दशकों तक चीन रूपांतरण के इसी रास्ते पर अभूतपूर्व विकास दर के साथ चलता रहा । 1979 में अमेरिका के रिजर्व बैंक के नए गवर्नर ने कार्यभार ग्रहण किया और कुछ ही महीनों में देश की मौद्रिक नीति को बदल डाला । मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए बेरोजगारी को भी बर्दाश्त किया गया । इसी साल ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर प्रधानमंत्री बनीं । उन्हें ट्रेड यूनियनों की ताकत को ध्वस्त करने और मुद्रास्फीति जनक ठहराव पर काबू पाने का मतादेश मिला था । अगले साल अमेरिका में रोनाल्ड रीगन का चुनाव राष्ट्रपति पद पर हुआ और उन्होंने रिजर्व बैंक की नीतियों को खुला समर्थन देना शुरू किया । इसके साथ ही मजदूरों की ताकत को कम करने, उद्योगों, खेती और संसाधनों के दोहन पर नियम कायदे कमजोर करने तथा देश और दुनिया के स्तर पर वित्त की सत्ता को आजाद करनेवाली नीतियों को आक्रामक तरीके से लागू किया जाने लगा । इन्हीं केंद्रों से इस क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत हुई जिसने चारों ओर फैलकर दुनिया की पूरी तरह से नई तस्वीर बना दी । हार्वे का कहना है कि इतने बुनियादी बदलाव संयोग से नहीं होते । इसलिए उस प्रक्रिया को समझना जरूरी है जिसके सहारे पुरानी दुनिया में से वैश्वीकरण की यह नई दुनिया पैदा हुई । देंग शियाओ पिंग, थैचर और रीगन ने उन विचारों को लोकप्रिय बना दिया जिनकी मान्यता मुट्ठी भर लोगों के बीच सीमित थी हालांकि यह काम बिना किसी बाधा के नहीं संपन्न हुआ ।

इसके बाद वे नवउदारीकरण को समझने की कोशिश करते हैं । इसे वे खास तरह का राजनीतिक अर्थतांत्रिक व्यवहार बताते हैं जिसमें माना जाता है कि निजी संपत्ति, मुक्त बाजार और मुक्त व्यापार के मजबूत सांस्थानिक ढांचे में लोगों की स्वतंत्र उद्यमशीलता को खोल देने से ही मानव जीवन में खुशहाली लाई जा सकती है । सरकारों का काम इसी ढांचे को बनाना और टिकाए रखना है । राज्य को मुद्रा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखनी होगी । उसे निजी संपत्ति के अधिकारों और बाजार के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक सेना, सुरक्षा, पुलिस और कानून-अदालत का इंतजाम भी करना होगा । जमीन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा या पर्यावरण प्रदूषण जैसे जिन क्षेत्रों में बाजार नहीं है वहां भी जरूरी कदम उठाकर खरीद बिक्री का बाजार स्थापित करना भी राज्य की जिम्मेदारी होगी । इन कामों के अलावे अन्य किसी काम में राज्य को हाथ नहीं डालना चाहिए । बाजार के संचालन में तो राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए क्योंकि उसके पास बाजार संबंधी सूचनाओं का अभाव होता है और लोकतांत्रिक शासन पद्धति में तो मजबूत स्वार्थी समूहों द्वारा राज्य पर पूर्वाग्रही हस्तक्षेप का दबाव डालने की आशंका बनी रहेगी ।

1970 दशक के बाद से राजनीतिक आर्थिक आचरण में सर्वत्र स्पष्ट नवउदारवादी झुकाव लक्षित किया जाने लगा । विनियमन, निजीकरण और तमाम सामाजिक क्षेत्रों से राज्य की वापसी रोजमर्रा की बात हो गई । सभी देशों ने स्वेच्छा से या दबाव के चलते इस नवउदारवादी मंत्र के किसी न किसी रूप को अपनाया और तदनुसार अपनी नीतियां बनाईं । नवस्वाधीन दक्षिण अफ़्रीका और चीन ने भी इसी रास्ते पर कदम बढ़ाए । नवउदारवाद के पैरोकारों ने शिक्षा में, मीडिया में, राजकीय संस्थानों में और वैश्विक वित्त तथा व्यापार को नियंत्रित करनेवाले अंतर्राष्ट्रीय निकायों में महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा जमाया । कुल मिलाकर नवउदारवाद वर्चस्वशील विमर्श बन गया । हम सबके सोचने के तरीके में इसका प्रसार इस कदर हो गया है कि दुनिया में रहने और उसे समझने के हमारे सहजबोध का लगभग अंग बन गया है ।

बहरहाल नवउदारीकरण की प्रक्रिया में पुराने सांस्थानिक ढांचों और शक्तियों का निर्माणोन्मुख ध्वंस तो होना ही है, इसके साथ ही श्रम विभाजन, सामाजिक संबंधों, कल्याणकारी प्रावधानों, तकनीकी मिलावटों, जीने और सोचने के तरीकों, पुनरुत्पादक गतिविधियों, जमीन से लगाव और दिल की आदतों के मामले में भी काफी टूट फूट होनी है । नवउदारवाद बाजार विनिमय को सबसे बड़ी नैतिक शक्ति मानता है और इसीलिए वह बाजार में कायम संविदा परक संबंधों के महत्व पर जोर देता है । इसका कहना है कि बाजार आधारित लेनदेन के बढ़ने के साथ ही सामाजिक कल्याण का भी विस्तार होगा । इसलिए वह समस्त मानवीय गतिविधि को बाजार में ले आना चाहता है । इसके लिए सूचना निर्माण और भारी आंकड़ों के संग्रह, भंडारण, स्थानांतरण, विश्लेषण और उपयोग में सक्षम तकनीक की जरूरत पड़ेगी ताकि विश्व बाजार में होनेवाले फैसलों को सही दिशा दी जा सके । इसीलिए नवउदारवाद में सूचना तकनीक पर इतना जोर दिया जाता है । इन तकनीकों ने बाजार आधारित भारी लेन देन में समय और दूरी को काफी घटा दिया है ।

वैश्विक बदलावों और उनके प्रभावों के बारे में काफी कुछ लिखा गया है लेकिन नवउदारवाद के उदय और विस्तार की राजनीतिक आर्थिक कहानी आम तौर पर कम मिलती है । किताब में इसी कहानी को साफ करने की कोशिश की गई है । हार्वे को लगता है कि इस कहानी को समझने से शायद वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था के बारे में सोचना सम्भव हो सकेगा ।

2005 में ही प्लूटो प्रेस से अल्फ़्रेड साद-फ़िल्हो और डेबोरा जान्सटन के संपादन में ‘नियो-लिबरलिज्म: ए क्रिटिकल रीडर’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की भूमिका के अलावे किताब तीन खंडों में बांटी गई है । पहले में नवउदारवाद की सैद्धांतिकी के सिलसिले में सात विद्वानों के लेख संग्रहित हैं । दूसरे खंड में दुनिया और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में इसके अनुप्रयोग का विश्लेषण करते हुए चौदह लेख संग्रहित हैं । तीसरे खंड में अलग अलग मुल्कों में इसके अनुभव का जायजा लेते हुए नौ लेख शामिल किये गये हैं । किताब इस परिघटना को समझाने के लिहाज से तैयार की गयी है ।

अगले साल तक इस परिघटना के साथ बाजार का रिश्ता अच्छी तरह से समझ में आने लगा । इस वजह से भी 2006 में पालग्रेव मैकमिलन से रिचर्ड रोबिन्सन के संपादन में ‘द नियो-लिबरल रेवोल्यूशन: फ़ोर्जिंग द मार्केट स्टेट’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब में शामिल तेरह लेखों को चार भागों में संयोजित किया गया है । पहले भाग के दो लेखों में इस नयी धारणा को स्पष्ट किया गया है । दूसरे भाग के पांच लेखों में क्रमश: चिली के जरिए लैटिन अमेरिका, रूसी गणराज्य, इंडोनेशिया और दक्षिण पूर्व एशिया, अफ़्रीकी महाद्वीप और चीन में नवउदारवाद के हिसाब से कायम राजकाज का परीक्षण किया गया है । तीसरे भाग के तीन लेखों में नवउदारवादी खेमे के अंदरूनी टकरावों का विवेचन किया गया है । तीसरे भाग में भी तीन ही लेख हैं जिनमें इस व्यवस्था का भविष्य समझने की कोशिश की गयी है ।

इस नयी धारणा ने पूरी दुनिया के वातावरण को अनेक स्तरों पर प्रभावित किया । 2007 में ब्लैकवेल पब्लिशिंग से किम इंग्लैंड और केविन वार्ड के संपादन में ‘नियोलिबरलाइजेशन: स्टेट्स, नेटवर्क्स, पीपुल्स’ शीर्षक किताब का प्रकाशन हुआ । किताब तीन भागों में बंटी हुई है । संपादकों ने शुरू में तो एक भूमिका लिखी ही है, प्रत्येक भाग की भी भूमिका लिखी है । पहला भाग मुख्य धारा के आर्थिक विकास और उसके विकल्पों की तलाश पर केंद्रित है । इस भाग के दो लेखों में क्रमश: एशिया प्रशांत और नेपाल के अनुभवों पर विचार किया गया है । दूसरा भाग सरकारों और बाजारों में मध्यस्थों की भूमिका का विवेचन है । इसके तीन लेखों में क्रमश: नवउदारवाद के भूमंडलीय प्रसार में निवेश प्रोत्साहन की होड़ पैदा करनेवाले एजेंटों, वितरण के क्षेत्र में अस्थायी कर्मचारियों की मौजूदगी की परिघटना और अर्जेंटिना के विशेष अनुभव पर बात की गई है । अंतिम तीसरे भाग में सरकारों की सक्रियता पर विचार किया गया है । इस भाग के चार लेख हैं जिनमें नवउदारवाद की विविध छवियों पर प्रकाश डाला गया है ।

2008 में एडिनबरा यूनिवर्सिटी प्रेस से राचेल एस टर्नर की किताब ‘नियो-लिबरल आइडियोलाजी: हिस्ट्री, कांसेप्ट्स ऐंड पोलिटिक्स’ का प्रकाशन हुआ । किताब नवउदारवाद को समझने के लिए एक सुबोध सहायक की तरह तैयार की गयी है ।

2009 में रटलेज से रूथ ब्लैकली की किताब ‘स्टेट टेररिज्म ऐंड नियोलिबरलिज्म: द नार्थ इन द साउथ’ का प्रकाशन हुआ । अचानक इस बात की ओर ध्यान नहीं जाता कि सरकारी आतंकवाद और नवउदारवाद का कोई आपसी रिश्ता भी हो सकता है लेकिन किताब इसी सहकालिकता को उजागर कर देती है । दक्षिणी गोलार्ध में हस्तक्षेप को किताब ने ठीक ही आतंकवाद की संज्ञा दी है ।

विचारों की दुनिया में नवउदारवाद के आगमन और प्रमुखता प्राप्त करने की प्रक्रिया को खोलते हुए 2009 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से फिलिप मिरोवस्की और डाइटर प्लेवे के संपादन में ‘द रोड फ़्राम मोंत पेलेरिन: द मेकिंग आफ़ द नियोलिबरल थाट कलेक्टिव’ का प्रकाशन हुआ । भूमिका डाइटर प्लेवे और उपसंहार फिलिप मिरोवस्की ने लिखा है । इसके अतिरिक्त किताब में तीन हिस्से हैं । पहला हिस्सा विभिन्न राष्ट्रों में नवउदारवाद की अलग अलग परंपराओं का परिचय चार लेखों के जरिए देता है । दूसरा हिस्सा नवउदारवाद ने वैचारिक विरोधियों को नेस्तनाबूद करने के लिए जो रणनीतियां अपनाईं उनके बारे में चार लेखों में चर्चा का है । तीसरा हिस्सा नवउदारवाद की ओर से कार्यवाही के लिए होनेवाली गोलबंदियों की जानकारी तीन लेखों में देता है । भूमिका लेखक के अनुसार नवउदारवाद कोई सुपरिभाषित राजनीतिक दर्शन नहीं है । इसके दोस्तों के साथ ही इसके दुश्मनों ने भी नवउदारवादी विश्व दृष्टियों को लोकप्रिय बनाने में मदद की है । अगर मारगरेट थैचर ने इसे विकल्पहीनता के साथ जोड़ा तो वामपंथी आलोचक इसे केवल आर्थिक परिघटना मानने के दोषी कहे जा सकते हैं । 1980 और 1990 के दशक में नवउदारवाद के आगमन के कारण वामपंथ में गहराती कुंठा के साथ ही दक्षिणपंथ में आत्मविश्वास बढ़ रहा था । हाल के दशकों में वैश्वीकरण विरोधी सामाजिक आंदोलनों में लगभग सभी नवउदारवादी बुराइयों के लिए अमेरिका को आरोपी बनाया गया है ।

2010 में ज़ेड बुक्स से कीन बिर्च और व्लाद माइखनेंको के संपादन में ‘द राइज ऐंड फ़ाल आफ़ नियोलिबरलिज्म: द कोलैप्स आफ़ ऐन इकोनामिक आर्डर?’ शीर्षक किताब का प्रकाशन हुआ । दोनों संपादक भूगोल के अध्यापन से जुड़े हैं । संपादकों की भूमिका और उपसंहार के अतिरिक्त किताब को दो भागों में बांटा गया है । पहला भाग नवउदारवाद के उत्थान पर केंद्रित सात लेखों का है तो दूसरा भाग नवउदारवाद के पतन पर केंद्रित छह लेखों का है ।

कहने की जरूरत नहीं कि नवउदारवाद भी पूंजीवाद की तरह ही संकट से कभी मुक्त नहीं रहा । 2011 में इसे उजागर करते हुए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से जेरार्ड ड्यूमेनिल और डामिनिक़ लेवी की किताब ‘द क्राइसिस आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ ।

2011 में पालिटी से कोलिन क्राउच की किताब ‘द स्ट्रेन्ज नान-डेथ आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ ।  

इस परिघटना के दीर्घ इतिहास और उसके राजनीतिक प्रतिफलन को रेखांकित करते हुए 2012 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से डैनिएल स्टेडमान जोन्स की किताब ‘मास्टर्स आफ़ द यूनिवर्स: हायेक, फ़्रीडमान, ऐंड द बर्थ आफ़ नियोलिबरल पालिटिक्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि नवउदारवाद के विचार कोई नए नहीं । महामंदी के बाद से इन विचारों की ओर नेता और नौकरशाह दौड़ लगाते रहे हैं । किताब में इसी बात का कारण तलाशने की कोशिश है कि ब्रिटेन और अमेरिका की राजनीति में बीसवीं सदी की आखिरी चौथाई से 2008 के संकट तक बाजार में नवउदारवादी यकीन क्यों काबिज रहा । दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से जो आर्थिक व्यवस्था कायम थी उस पर सत्तर के दशक के पूर्वार्ध तक तमाम किस्म के संकट नजर आने लगे थे ।      

2013 में वर्सो से पियरे दार्दो और क्रिश्चियन लवाल की फ़्रांसिसी में 2009 में प्रकाशित किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘द न्यू वे आफ़ द वर्ल्ड: आन नियोलिबरल सोसाइटी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ । अनुवाद ग्रेगोरी इलियट ने किया है । अंग्रेजी अनुवाद के लिए लेखक ने अलग से भूमिका लिखी है । उनका कहना है कि नवउदारवाद अभी मौजूद है । 2008 के संकट के बाद बहुतेरे लोगों को इसकी समाप्ति की झूठी आशा बन गयी थी इसलिए मूल फ़्रांसिसी संस्करण में पहला वाक्य यही था । अनेक अर्थशास्त्रियों को उस संकट के बाद राज्य की वापसी और बाजार की नकेल कसे जाने का भ्रम पैदा हुआ था । इस किस्म के भ्रम से राजनीतिक गोलबंदी में बाधा आती है । इस भ्रम की वजह नवउदारवाद की सही समझ का अभाव था । इस संकट से उन नीतियों की वापसी की कौन कहे, उनको दोगुने उत्साह से लागू किया जाने लगा । सरकारों ने कल्याणकारी मदों में कटौती और भी तेज कर दी । इस आधार पर लेखकों को लगता है कि इसके यूरोप और विश्वव्यापी प्रतिरोध के लिए इसकी पैदाइश और कार्यपद्धति का विश्लेषण बेहद जरूरी है ।     

इसके इतिहास को ही समझने के लिहाज से 2015 में ज़ोन बुक्स से वेन्डी ब्राउन की किताब ‘अनडूइंग द डेमोज: नियोलिबरलिज्म’स स्टील्द रेवोल्यूशन’ का प्रकाशन हुआ ।

इसका प्रभाव राजनीति की दुनिया में लोकतंत्र के गम्भीर क्षरण के रूप में देखा जाता है । यह क्षरण वित्तीकरण के साथ बेहद गहराई से जुड़ा हुआ है । इस बात को ही समझाते हुए 2024 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस से ब्रायन जज की जरूरी किताब ‘डेमोक्रेसी इन डिफ़ाल्ट: फ़ाइनैन्स ऐंड द राइज आफ़ नियोलिबरलिज्म इन अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि हालिया इतिहास पर उड़ती निगाह डालने से भी पता चलता है कि चालीस सालों में घटित लगभग प्रत्येक घटना ने बाजार के लिए मुनाफ़ा बढ़ाने में मदद ही की है ।     

नवउदारवाद की समाप्ति का दावा करने वालों के प्रतिनिधिस्वरूप  2024 में आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी प्रेस से जान क़िगिन की किताब ‘आफ़्टर नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक कोरोना की तालाबंदी से बाहर आने के बाद सबको ही बुनियादी किस्म का बदलाव महसूस हो रहा है । काम और जीवन, सरकार और राजनीति तथा अर्थतंत्र के बारे में सवाल तो पहले भी उठ रहे थे लेकिन अब तो इन सबका खात्मा हो गया लगता है । 

नवउदारवाद की शुरुआत सभी लोग लैटिन अमेरिका से मानते हैं । उस महाद्वीप पर अमेरिकी प्रभाव को मजबूत करने के लिए हिंसक तानाशाही थोपने की घटनाओं में इसके आरम्भिक लक्षण देखे जाते हैं । लैटिन अमेरिका का मेक्सिको देश अमेरिका के सबसे करीब है इसलिए उसके हस्तक्षेप भी सबसे अधिक इसी देश में हुए । इस इतिहास की परीक्षा के मकसद से 2024 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से क्लादियो लोमनित्ज़ की किताब ‘सावेरिनटी ऐंड एक्सटार्शन: ए न्यू स्टेट फ़ार्म इन मेक्सिको’ का प्रकाशन हुआ । किताब में लेखक के छह व्याख्यान एकत्र किये गये हैं जिनमें मेक्सिको में जारी प्रचंड राजकीय हिंसा को समझने के लिए मानवशास्त्र की धारणाओं का उपयोग किया गया है । वे मेक्सिको में राज्य का नया रूप विकसित होते हुए देख रहे हैं । इसकी शुरुआत नवउदारवाद के आगमन के साथ 1980 और 1990 दशक में ही हो गयी थी । 2006 में मादक द्रव्यों पर हमले के दौरान इसे मजबूती मिली । फिलहाल उसका विकास तीव्र गति से हो रहा है । आश्चर्य नहीं कि 1997 में ही मैकमिलन प्रेस लिमिटेड से हेनरी वेल्टमेयर, जेम्स पेत्रास और स्टीव विउ की संयुक्त रूप से लिखी किताब ‘नियोलिबरलिज्म ऐंड क्लास कंफ़्लिक्ट इन लैटिन अमेरिका: ए कम्पेयरेटिव पर्सपेक्टिव आन द पोलिटिकल इकोनामी आफ़ स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट’ का प्रकाशन हुआ । इस सिलसिले में यह भी याद दिलाना विषयांतर नहीं समझा जाना चाहिए कि हमारे देश में इस परिघटना के आगमन के समय भी ढांचागत समायोजन की शब्दावली लोकप्रिय हुई थी । सभी जानते हैं कि चिले में राष्ट्रपति अलेंदे की हत्या के बाद स्थापित सरकार ने नवउदारवादी निजाम का पहला प्रयोग किया था । उस प्रयोग को याद करते हुए 2023 में यूनिवर्सिटी आफ़ पिट्सबर्ग प्रेस से पाब्लो पेरेज़ अहुमादा की किताब ‘बिल्डिंग पावर टु शेप लेबर पालिसी: यूनियन्स, एम्प्लायर एसोसिएशंस, ऐंड रिफ़ार्म इन नियोलिबरल चिले’ का प्रकाशन हुआ । इसी सवाल पर 2023 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से सेबास्तियन एडवर्ड्स की किताब ‘द चिली प्रोजेक्ट: द स्टोरी आफ़ द शिकागो ब्वायेज ऐंड द डाउनफ़ाल आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । शुरू में नवउदारवाद के विकास का कालक्रमानुसार सूची है । 1938 के लिपमैन कोलोकियम से इसका आरम्भ हुआ जब बुद्धिजीवियों की एक सभा में नवउदारवाद के बारे में विचार विमर्श हुआ । दूसरी घटना के रूप में फ़्रीडमैन का शिकागो विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में 1946 में आना बताया गया है । इसके अगले साल मोंत पेलेरिन सोसाइटी की पहली बैठक हुई और हायेक को उसका अध्यक्ष चुना गया । इसी क्रम में शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसरान चिली के कैथोलिक विश्वविद्यालय के साथ सहयोग के मकसद से चिली गये । अगले साल दोनों के बीच सहयोग पर मुहर लग गयी । फिर चिली के विद्यार्थी अर्थशास्त्र के अध्ययन हेतु शिकागो आये । लौटकर दो साल बाद वे चिली में अध्यापक हुए ।

नवउदारवाद की प्रयोगभूमि के रूप में चिली में जो कुछ हुआ उसका विश्लेषण विवेचन बहुत ध्यान से किया गया है क्योंकि उस प्रयोग में ही इसके लक्षण प्रकट हो गये थे । आश्चर्य नहीं कि 2022 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से काथ्या अराउजो की किताब ‘द सर्किट आफ़ डिटैचमेंट इन चिली: अंडरस्टैंडिंग द फ़ेट आफ़ ए नियोलिबरल लेबोरेटरी’ का प्रकाशन हुआ । नवउदारवादी समाजार्थिक व्यवस्था के प्रसार से व्यक्ति और समाज पर पड़े असर की खोज इस किताब का मकसद है । सामाजिक बंधन और राजनीतिक भविष्य की जांच परख इसमें की गयी है । इसके लिए चिली के हालात की चीरफाड़ हुई है क्योंकि वह नवउदारवाद की प्रथम प्रयोगशाला था । इस काम के लिए पिनोशे की तानाशाही की जरूरत पड़ी थी । चिली के लोग महसूस करते हैं कि उनके देश का बदलाव ऐतिहासिक था । उनका यह अहसास उनके रोज ब रोज के ठोस अनुभव पर आधारित है । जीवन चलाने के लिए उनका पारम्परिक ज्ञान सहसा अपर्याप्त हो चला है । बदलाव सामाजिक ही नहीं, नितांत निजी स्तर पर भी हुए हैं । दूसरी ओर सामाजिक रिश्तों पर लोकतंत्रीकरण का दबाव पैदा हुआ है । कानूनों और संस्थाओं के जरिये बदलाव के चलते व्यक्तियों से नयी अपेक्षा भी की जाने लगी है ।                

इस प्रवृत्ति को प्रबल विचारधारा मानते हुए 2024 में क्राउन से जार्ज मोनबियाट और पीटर हचिंसन की किताब ‘इनविजिबुल डाक्ट्रिन: द सीक्रेट हिस्ट्री आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों के मुताबिक यह हमारे समय की सबसे प्रबल विचारधारा है और हमारे जीवन के लगभग प्रत्येक पहलू पर असर डालती है । दुर्भाग्य से उसका कोई नाम नहीं है । जिन्होंने इसका नाम सुना हो वे भी इसे परिभाषित नहीं कर पाते । इसकी गुमनामी ही इसकी ताकत का लक्षण और कारण है । हमारे समय के तमाम संकटों को इसने ही जन्म दिया है । विषमता, बच्चों की गरीबी, निराशा की महामारी, दूसरे देशों में काम कराना और टैक्स चोरी, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली, संरचना का ध्वंस, लोकतंत्र का क्षरण, वित्तीय उथल पुथल, आधुनिक ढपोरशंखी नेताओं का वैश्विक उदय, पारिस्थिकीय संकट और पर्यावरणिक विनाश इनके कुछ उदाहरण हैं । इन सबको हम अलगाकर देखते हैं । एक के बाद एक संकट टूटा पड़ रहा है फिर भी हम उनके साझा स्रोत को नहीं समझ पाते । ये सभी उसी विचारधारा के परिणाम हैं जिसका नाम नवउदारवाद है । उसकी व्याप्ति इतनी अधिक हो चुकी है कि हम उसे विचारधारा भी नहीं मानते ।

इस विचारधारा के अनुसार सबसे जरूरी बदलाव यह हुआ कि सार्वजनिक संसाधनों का तेजी से निजीकरण शुरू हुआ । उसके नतीजों की झलक दिखलाते हुए 2024 में डब्ल्यू डब्ल्यू नार्टन & कंपनी से मेहरसा बरादरन की किताब ‘द क्वाइट कू: नियोलिबरलिज्म ऐंड द लूटिंग आफ़ अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । किताब की कहानी 2018 की 8 नवंबर को सुबह ही कैलिफ़ोर्निया के नागरिकों से शहर को खाली कराने की घोषणा से शुरू हुई है । जंगल में लगी आग काबू से बाहर हो चुकी थी और तेजी से फैल रही थी । शहर से बाहर निकलने के रास्ते उसकी गिरफ़्त में आते जा रहे थे । बुजुर्गों को बाहर निकालना सबसे मुश्किल था । एक बुजुर्ग को अपनी पहिये वाली कुर्सी छोड़कर रेंगकर बाहर आना पड़ा था । एक और बुजुर्ग दंपति अपने कुत्ते और बिल्ली के साथ कुर्सी पर बैठे ही रह गये थे । आग लगातार सत्रह दिनों तक भयंकर तबाही मचाती रही और चौरासी लोग उसमें मारे गये । जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा पड़ने से इस तरह की आगजनी की घटनाएं लगभग आम बात हो चली हैं । कैलिफ़ोर्निया की इस आग के पीछे एक अन्य कारण यह भी था कि गैस आपूर्ति करने वाली सरकारी संस्था ने बरसों से अपने उपकरणों की मरम्मत ही नहीं करायी थी । मरम्मत कराने के लिए आवश्यक धन खर्च करने को कंपनी तैयार ही नहीं थी । अपनी जिम्मेदारी छुड़ाने के लिए सरकारें इस तरह की आगजनी को कुदरती दुर्घटना कहती हैं ताकि कोई मुआवजा ही न देना पड़े । वह तो एक अदालत ने कुदरत को इस भारी जिम्मेदारी से बरी किया और सरकारी कंपनी को दोषी ठहराया ।       

कहने की जरूरत नहीं कि नवउदारवाद के आगमन के साथ ब्रिटेन की प्रधानमंत्री का प्रसिद्ध कथन जुड़ा है जिसमें उन्होंने इसके विकल्प की सम्भावना से इनकार किया था । तब उनके कथन के संक्षेप से टिना नामक एक शब्द ही अस्तित्व में आया था । इसी माहौल को लक्षित करते हुए 2024 में पालग्रेव मैकमिलन से जेनिफ़र क्लेग और रिचर्ड लैंसडाल-वेलफ़ेयर की किताब ‘इंटेलेक्चुअल डिसएबिलिटी इन ए पोस्ट-नियोलिबरल वर्ल्ड’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने अंत से शुरू किया है । आखिरी अध्याय के उपसंहार में उन्होंने लिखा है कि जब तक कोई काम हो नहीं जाता तब तक असम्भव ही लगता है । इस कथन का तात्पर्य यह कि हालात जितने भी कठिन लगते  हों उनमें बदलाव हो जाता है अगर बेहतर हालात की कल्पना आम लोगों के दिल दिमाग में उभरने लगे । इसकी शुरुआत 2010 में हुई जब तीन दिनों तक अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों ने नाटिंघम में एक सम्मेलन में मौजूदा हालात और उनमें बदलाव पर गहन चिंतन किया । 

हमारे समय को नवउदारवाद का समय मानकर उसका निदान करने की वकालत करते हुए 2023 में यूनिवर्सिटी आफ़ टोरंटो प्रेस से लोइस हार्डर, कैथरीन केलाग और स्टीव पैटेन के संपादन में ‘नियोलिबरल कनटेन्शन्स: डायग्नोजिंग द प्रेजेन्ट’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना और जानी ब्रोदी के उपसंहार के अतिरिक्त किताब के चार हिस्सों में कुल ग्यारह लेख संकलित किये गये हैं । संपादकों का कहना है कि 1980 दशक से ही नवउदारवाद हमारे सामाजिक जीवन पर छाया रहा है इसलिए शोध भी उस पर ही केंद्रित रहे हैं । कीन्सीय कल्याणकारी राज्य के संकट में फंस जाने पर उपजा नवउदारवाद व्यापक सामाजिक रूपांतरण का भी वाहक बना ।    

इस परिघटना को दुनिया के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग समयों पर अपनाया गया । ऐसी स्थिति में अत्यंत स्वाभाविक था कि उन क्षेत्रों के विशेष इतिहास से प्रभावित होकर इसका रूप और अनुभव भी खास होता । पूर्वी यूरोप के विशेष संदर्भ में 2024 में रटलेज से वेरोनिका पेहे और जोआन्ना वाव्रिन्याक के संपादन में ‘रेमेम्बरिंग द नियोलिबरल टर्न: इकोनामिक चेंज ऐंड कलेक्टिव मेमोरी इन ईस्टर्न यूरोप सिन्स 1989’ का प्रकाशन हुआ । इस किताब में कुल अठारह लेख संकलित हैं जिनमें पहला लेख संपादकों की लिखी प्रस्तावना है । शेष लेखों को कुल तीन हिस्सों में संयोजित किया गया है । संपादकों का कहना है कि 1989 में न्यू यार्क में मकानों की खरीद बिक्री के व्यवसायी ने सरकार के बेजा खर्च पर ध्यान आकर्षित करने के लिए एक सूचना लगायी । जल्दी ही अनेक देशों में इसका अनुकरण शुरू हुआ । नवउदारवाद के समर्थकों ने इस अभियान में जोश से भाग लिया । इसके चलते सरकार के कल्याणकारी कामों में कटौती का माहौल बनाया गया और विदेशी कर्ज को चुकाने का बहाना बनाने में आसानी हुई । बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की यह सबसे प्रमुख परिघटना थी जिसके तहत नवउदारवाद को पहले आर्थिक विचारधारा के बतौर और बाद में सामाजिक सांस्कृतिक आचरण के रूप में अपनाया गया ।   

नवउदारवाद को अतीत की बात मानते हुए 2023 में हेमार्केट बुक्स से नील डेविडसन की किताब ‘ह्वाट वाज नियोलिबरलिज्म?: स्टडीज इन द मोस्ट रीसेन्ट फेज आफ़ कैपिटलिज्म, 1973-2008’ का प्रकाशन हुआ । किताब के लेखक का निधन बासठ साल की उम्र में हो गया । उस समय समकालीन पूंजीवाद के बारे में इस किताब की पांडुलिपि लगभग अंतिम रूप में आ चुकी थी । अन्य अधूरी किताबों को भी अंतिम रूप देने में दोस्त मित्र जुटे हुए हैं । जब उनका निधन हुआ तब ट्रम्प का कार्यकाल समाप्त नहीं हुआ था । स्वाभाविक है कि लेखक ने इसमें कुछ संशोधन किये होते और कुछ दोहरावों को दुरुस्त किया होता । मूल पांडुलिपि में यथासंभव बहुत ही कम हस्तक्षेप किया गया है ताकि लेखक की आवाज सुरक्षित रहे । इसकी समाप्ति की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए  2023 में रटलेज से डेविड कायला की किताब ‘द डिक्लाइन ऐंड फ़ाल आफ़ नियोलिबरलिज्म: रीबिल्डिंग द इकोनामी इन ऐन एज आफ़ क्राइसेज’ का प्रकाशन हुआ । इसी क्रम में 2023 में ही यूनिवर्सिटी आफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस से राबर्ट फ़्लेचर की किताब ‘फ़ेलिंग फ़ारवर्ड: द राइज ऐंड फ़ाल आफ़ नियोलिबरल कनजर्वेशन’ का प्रकाशन हुआ ।

नवउदारवाद ने विषमता और भेदभाव के पारम्परिक ढांचों का पुनरुत्पादन किया । इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए 2022 में पालग्रेव मैकमिलन से जे जेस्से रामिरेज़ की किताब ‘रूल्स आफ़ द फ़ादर इन द लास्ट आफ़ अस: मैस्कुलिनिटी एमांग द रूइन्स आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । इस परिघटना को उसके सही नाम से पुकारते हुए 2022 में काउंटर पंच से अलेक्जेंडर काकबर्न और जेफ़्री सेंट क्लेयर की किताब ‘ऐन आर्गी आफ़ थीव्स: नियोलिबरलिज्म ऐंड इट्स डिसकनटेन्ट्स’ का प्रकाशन हुआ । 2010 में लेखकों को लगा कि वर्तमान व्यवस्था के लिए नवउदारवाद थोड़ा नरम शब्द है । बीस साल से लेखक इसी शब्द का इस्तेमाल करते आ रहे थे और उन्हें इसकी अपर्याप्तता का अहसास हमेशा होता रहा था । उस दौरान लिखे लेखों को एकत्र और संपादित करके यह किताब तैयार की गयी है । इसमें पिछली सदी के आखिरी दशकों में मध्यमार्गी शासकों द्वारा अपनायी गयी नवउदारवादी नीतियों और कामों का विरोध किया गया है । लेखकों में से एक का निधन दसेक साल पहले ही हो गया था । देहांत से पहले उन्होंने संग्रह तैयार कर लिया था । जेफ़्री ने उनके निधन के बाद के भी कुछ लेखों को शामिल किया है ताकि उस दौर की निरंतरता दिखायी जा सके । 

इस परिघटना के सबसे ताजा नतीजे दक्षिणी गोलार्ध की श्रमशक्ति पर नजर आ रहे हैं । इस पहलू के बारे में 2023 में ब्रिल से अनीता हैमर और इमानुएल नेस के संपादन में ‘ग्लोबल रप्चर: नियोलिबरल कैपिटलिज्म ऐंड द राइज आफ़ इनफ़ार्मल लेबर इन द ग्लोबल साउथ’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना और पश्चलेख के अतिरिक्त किताब में शामिल बारह लेख पांच हिस्सों में हैं । पहले में दक्षिण पश्चिम एशिया, दूसरे में अफ़्रीका, तीसरे में दक्षिण एशिया, चौथे में दक्षिण पूर्व एशिया और आखिरी पांचवें हिस्से में लैटिन अमेरिका पर केंद्रित लेख रखे गये हैं । किताब में वर्तमान कामगारों के लगातार बढ़ते अनौपचारिक और अस्थायी समूह का विस्तृत विश्लेषण करने की कोशिश की गयी है । इस समूह का बड़ा हिस्सा दक्षिणी गोलार्ध में रहता है लेकिन उत्तरी गोलार्ध के देशों में भी उसका बहुत तेजी से विस्तार हो रहा है । इस परिघटना का प्रभाव न केवल दक्षिणी गोलार्ध के श्रमिकों पर पड़ा बल्कि सारी दुनिया के कामगार इसकी चपेट में आये । दुनिया भर के श्रमिकों पर इसके प्रभाव का विवेचन करते हुए 2018 में एजेन्डा पब्लिशिंग से रोनाल्डो मुन्क की किताब ‘रीथिंकिंग ग्लोबल लेबर: आफ़्टर नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ ।

उत्तरी गोलार्ध में नवउदारवाद ने जिस राजनीतिक प्रवृत्ति को जन्म दिया है उसका विश्लेषण करते हुए 2023 में डि ग्रूटेर से मैतियास सैडेल की किताब ‘नियोलिबरलिज्म रीलोडेड: आथरिटेरियन गवर्नमेंटलिटी ऐंड द राइज आफ़ द रैडिकल राइट’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने सबसे पहले नवउदारवाद और फ़ासीवाद की जुगलबंदी का सवाल उठाया है । इसी सवाल का उत्तर खोजने के क्रम में किताब लिखी गयी है । हालिया वित्तीय संकट और उससे उबरने के क्रम में नवउदारवाद का अत्यंत हिंसक, क्रूर और अन्यायी रूप नजर आया । इसके साथ ही चरम दक्षिणपंथ का उदय हुआ जो न केवल लोकतांत्रिक देशों की राजनीति के मुद्दे तय करने में कामयाब हो रहा है बल्कि सामाजिक संजाल, मीडिया, सड़क, चिंतकों और शिक्षा जगत में भी घुसकर अपने पक्ष में खास किस्म के सहजबोध का निर्माण कर रहा है । इसके कारण विमर्शों और नीतियों में आप्रवासियों, स्त्रियों, समलिंगी समूहों और गरीबों के विरुद्ध नफरत व्याप्त हो गयी है ।    

अमेरिका में इसकी शुरुआत की प्रक्रिया का संबंध रोनाल्ड रीगन से रहा । 2022 में बेरेट-कोएह्लर से टाम हार्टमैन की किताब ‘द हिडेन हिस्ट्री आफ़ नियोलिबरलिज्म: हाउ रीगनिज्म गटेड अमेरिका ऐंड हाउ टु रेस्टोर इट्स ग्रेटनेस’ का प्रकाशन हुआ । किताब की प्रस्तावना ग्रेग पलास्त ने लिखी है ।

अमेरिका में इसकी लम्बी यात्रा का जायजा लेते हुए 2022 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से गैरी गेर्स्टल की किताब ‘द राइज ऐंड फ़ाल आफ़ द नियोलिबरल आर्डर: अमेरिका ऐंड द वर्ल्ड इन द फ़्री मार्केट एरा’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि इक्कीसवीं सदी की इस दूसरी दहाई में अमेरिकी राजनीतिक जीवन में बुनियादी बदलाव नजर आ रहे हैं । कोरोना की मार से पहले भी ऐसी घटनाएं घट रही थीं जिनके बारे में दस साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । ट्रम्प की जीत, सांडर्स का उभार, खुली सरहद और मुक्त व्यापार पर सवाल, पापुलिज्म और देसी राष्ट्रवाद का उत्थान, ओबामा की हैसियत में गिरावट आदि ऐसी ही चीजे हैं । अमेरिकी लोकतंत्र पर गहरा संकट है और इस संकट की ही नाटकीय झलक सरकार के मुख्यालय पर 6 जनवरी 2021 को भीड़ द्वारा हमले में मिली । इन सभी किस्म के बदलावों को लेखक उस राजनीति का पतन मानते हैं जिसका निर्माण सत्तर और अस्सी के दशक में हुआ, नब्बे के दशक और इस इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में उसका प्रभुत्व नजर आया । इसे नवउदारवादी व्यवस्था कहा जा सकता है । इसी व्यवस्था का उत्थान पतन इस किताब का मुख्य प्रतिपाद्य है । यह हमारे समय का इतिहास है ।

इस किताब में राजनीतिक व्यवस्था के नाम से अमेरिकी राजनीति में चुनावों के परे प्रवाहमान विचारधाराओं और नीतियों को पुकारा गया है । विगत सौ साल के भीतर अमेरिका में दो तरह की राजनीतिक व्यवस्थाएं नजर आयीं । एक को लेखक ने न्यू डील की व्यवस्था कहा है जिसका जन्म 1930 और 1940 के दशक में हुआ, 1950 और 1960 के दशक में वह परवान चढ़ी तथा 1970 के दशक में उसमें उतार आया । उसके बाद से नवउदारवाद का जन्म हुआ, 1990 और 2000 के दशकों में इसने ऊंचाई हासिल की और 2010 के दशक से इसका भी पराभव जारी है । इन दोनों राजनीतिक व्यवस्थाओं के केंद्र में राजनीतिक अर्थशास्त्र का अपना विशेष कार्यक्रम भी मौजूद रहा है । न्यू डील व्यवस्था के पीछे यह विश्वास काम कर रहा था कि पूंजीवाद को खुला मैदान देने से आर्थिक दुर्घटना पैदा होती है । इसका प्रबंधन ऐसे मजबूत केंद्रीय निकाय द्वारा किया जाना चाहिए जो सार्वजनिक हित में अर्थव्यस्था को लगाये । इसके ठीक विपरीत नवउदारवादी व्यवस्था इस यकीन पर आधारित है कि सरकारों के बंधनकारी नियंत्रण से बाजार को आजाद कराना होगा क्योंकि वृद्धि, नवाचार और आजादी पर अंकुश लगा हुआ है । नवउदारवादी व्यवस्था के उन्नायकों ने उस प्रत्येक चीज को खत्म कर डाला जिसका निर्माण न्यू डील की व्यवस्था ने चालीस साल में किया था । अब इसका भी खात्मा हो रहा है । ऐसे ही 2021 में द यूनिवर्सिटी आफ़ नार्थ कैरोलाइना प्रेस से डैनिएल राबर्ट मैकक्लूर की किताब ‘विंटर इन अमेरिका: ए कल्चरल हिस्ट्री आफ़ नियोलिबरलिज्म, फ़्राम द सिक्सटीज टु द रीगन रेवोल्यूशन’ का प्रकाशन हुआ ।               

2022 में रटलेज से जानेट याकोबसन और एलिज़ाबेथ बर्नस्टाइन के संपादन में ‘पैराडाक्सेज आफ़ नियोलिबरलिज्म: सेक्स, जेंडर, ऐंड पासिबिलिटीज फ़ार जस्टिस’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना समेत किताब में कुल छह लेख संकलित हैं । किताब जेंडर न्याय के लक्ष्य से संपादित की गयी है । नारीवादियों के एक अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक सहकार का प्रतिफल यह किताब है । उनके बीच बहस से एक पत्रिका की रूपरेखा तय हुई । पत्रिका में प्रकाशित लेखों की विविधता चकित करनेवाली थी इसलिए उसके संपादकों ने काम जारी रखा । धीरे धीरे महसूस हुआ कि सभी लेखों में नवउदारवादी अर्थतंत्र जनित समस्याओं की प्रतिध्वनि है । लेखों में इस सामान्य विषय की प्रमुखता के मुकाबले उसके असरात का विश्लेषण प्रमुख है ।  

2022 में रटलेज से फ़ेर्नान्दो लोपेज़-कास्तेलानो, कारमेन लिज़ारागा और रोजर मंज़ानेरा-रुइज़ के संपादन में ‘नियोलिबरलिज्म ऐंड अनइक्वल डेवलपमेन्ट: अल्टरनेटिव्स ऐंड ट्रांजीशंस इन यूरोप, लैटिन अमेरिका ऐंड सब-सहारन अफ़्रीका’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना और पश्चलेख के अतिरिक्त किताब के बारह लेख दो भागों में हैं । पहले भाग के तीन हिस्से हैं जिनमें क्रमश: उप सहाराई अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका और यूरोप में नवउदारवाद के विकास की परीक्षा की गयी है । दूसरे भाग में विकल्पों और संक्रमणों से जुड़े लेख हैं । 

2021 में पालग्रेव मैकमिलन से सुसान गैर, तमार हेगर और ओमरी हेर्ज़ोग की संयुक्त किताब ‘कंप्लायंस ऐंड रेजिस्टेन्स विदिन नियोलिबरल एकेडमिया: बायोग्राफिकल स्टोरीज, कलेक्टिव वायसेज’ का प्रकाशन हुआ । किताब की शुरुआत तीनों लेखिकाओं के अलग अलग देशों से अलग अलग समयों पर बैठकों में शरीक होने की मुश्किलों से होती है । सुसान आस्ट्रेलिया, तमार इजरायल और ओमरी के लंदन में होने की कठिनाई का वर्णन करने के बाद बताया जाता है कि कोरोना के दौरान ऐसी बैठकें आम थीं । स्क्रीन पर मौजूद चेहरे के कारण वास्तविक मानव सम्पर्क बहुत कम हो गया था । धीरे धीरे विगत दो सालों से इसे ही सामान्य समझा जाने लगा है । 2018 के बाद से नवउदारवादी उच्च शिक्षा की कहानी ज़ूम के उल्लेख के बिना लिखी नहीं जा सकती । इस किताब के लेखन के लिए भी इंटरनेट पर लगातार ऐसी बैठकें तीनों के बीच हुईं । ज़ूम और ईमेल के जरिए आपसी असहमति को स्वर दिया गया, लेखन को साझा किया गया और एक दूसरे के काम लायक सामग्री आपस में वितरित की गयी । दोस्ती हो जाने के नाते इन सबके साथ ही जलवायु संकट, महामारी, आस्ट्रेलिया में लगी आग, इजरायल में भड़की हिंसा, शैक्षिक सफलता, विफलता और उससे पैदा तनाव तथा पारिवारिक नाटक और छुट्टियों की योजना भी बातचीत के केंद्र में आते जाते रहे । पारदेशीय सहकारी शोध और लेखन इसी तरह से होता है । उसमें पेशेवर जीवन के साथ निजी जीवन भी घुल मिल जाता है । महामारी से पहले प्रत्यक्ष मुलाकातों की जरूरत ऐसे कामों के लिए पड़ती थी । इसकी शुरुआत महामारी से पहले हुई थी इसलिए एक बार प्रत्यक्ष मुलाकात के बाद तीनों अलग अलग देशों में अपनी मेज पर बैठकर ही इसे लिखने का काम संपन्न कर सकीं । तीनों ने नवउदारवाद के प्रभाव संबंधी अपने अपने अनुभव लिखे । अपने जीवन पर इसके विनाशकारी असर पर विचार किया । अनुशासन और देश की भिन्नता के बावजूद सबके अनुभव साझा भी थे । उन अनुभवों की भिन्नता और साझेपन के चलते ही लेखिकाओं को अपनी यह किताब विशेष महसूस होती है ।

2020 में वर्सो से डाइटर प्लेवे, क्विन स्लोबोदियन और फिलिप मिरोव्सकी के संपादन में ‘नाइन लाइव्स आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । स्लोबोदियन और प्लेवे की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब के चार भागों में संकलित लेख लगाए गए हैं । पहले भाग में बाजारवाद के परे नवउदारवादी विज्ञान से जुड़े लेख हैं । दूसरे भाग में आर्थिक मनुष्य से परे नवउदारवादी कर्ताभाव का विवेचन है । तीसरे भाग में अमेरिकी सर्वसम्मति के परे नवउदारवादी अंतर्राष्ट्रीयतावाद को देखने की कोशिश है । चौथे भाग में रीगन, थैचर और पिनोशे के बाद भी नवउदारवाद के असर का विश्लेषण है । किताब का जन्म 2016 की एक संगोष्ठी से हुआ था । नवउदारवाद के बारे में विचार विमर्श के लिए आहूत यह तीसरी संगोष्ठी थी । पहली दो गोष्ठियों पर आधारित किताबों का प्रकाशन हो चुका है । इसमें नवउदारवाद की समाप्ति के दावों पर सवाल उठाया गया है । ट्रम्प के चुनाव के बाद एक अर्थशास्त्री ने नवउदारवाद के खात्मे की घोषणा की । कुछ लोगों ने शोक संदेश भी लिख मारे । अमेरिका में नव फ़ासीवाद के हाथों इसका जनाजा उठने का तर्क दिया गया । पचीस साल पहले क्लिंटन के चुने जाने पर लैटिन अमेरिका के एक नेता ने भी इसकी घोषणा की थी । एशियाई वित्तीय संकट के समय भी ऐसी ही बातें हुईं और 2008 वाले संकट के बाद तो इसे तय मान लिया गया ।

सिद्ध है कि फिलहाल सबको एक नये समय में प्रवेश का अनुभव हो रहा है जिसे कुछ लोग पुराने समय का अंत समझ रहे हैं तो उसी तरह अन्य लोग इसे पुराने का ही विस्तार समझना चाहते हैं । इनमें आपसी मतभेद जो भी हों सभी एकमत हैं कि अस्थिरता और संकट के नये दौर का सामना मानव प्रजाति को करना पड़ रहा है । यह संकट एकायामी न होकर बहुमुखी और बहुस्तरीय है । जैसे जैसे इसकी परतें खुल रही हैं उनमें से युद्ध, हिंसा, अन्याय, तानाशाही और असहायता के नित नये रूप प्रकट हो रहे हैं । हाल के दिनों में बढ़ी धार्मिकता का भी इससे संबंध हो सकता है जो फिलहाल धर्मांधता के बतौर नजर आ रही है । पूंजी की आक्रामता से उत्पन्न इस क्रूर विचार ने सारी धरती को मनुष्य के रहने लायक वातावरण से वंचित कर दिया है लेकिन इस आपत्ति में भी हताशा की जगह नयी पीढ़ी नये सपनों के साथ लड़ने भिड़ने पर आमादा है । इसके सबूत के तौर पर 2025 में इमेराल्ड पब्लिशिंग से हेनरी वेल्टमेयर की किताब ‘लैटिन अमेरिकन पोलिटिक्स इन द नियोलिबरल एरा: द चेंजिंग डायनामिक्स आफ़ क्लास स्ट्रगल’ का प्रकाशन हुआ ।                  

      

       

Monday, October 21, 2024

फिलिस्तीन पर हमला

 

विगत एक साल से इजरायल ने फिलिस्तीन को बरबाद करने की नीयत से उस पर बर्बर हमला किया है । अब उस युद्ध का विस्तार बड़े इलाके में हो रहा है और यूक्रेन युद्ध के बाद यह भी उसी तरह की लड़ाई में शामिल हो चुका है जिसका अंत नहीं नजर आ रहा । बहुतेरे लोग इसके इर्द गिर्द तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका भी जता रहे हैं । समूची दुनिया, खासकर पश्चिमी देशों में जनता और शासक इस युद्ध की वजह से एक दूसरे के विरोध में खड़े हो गये हैं । अमेरिकी चुनावों  में दोनों पार्टियों की ओर से राष्ट्रपति पद के दावेदार किसी न किसी तरह फिलिस्तीन का पक्ष लेने की जगह इजरायल के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं वहीं उच्च शिक्षा के सभी केंद्रों में वियतनाम युद्ध के विरोध की लहर के बाद फिलिस्तीन के पक्ष में विद्यार्थियों के धरनों और प्रदर्शनों की बाढ़ आयी हुई है । डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी के रूप में जो बाइडेन की जगह कमला हैरिस के आगमन के पीछे भी फिलिस्तीन के जनसंहार के मामले में बाइडेन की चुप्पी और इजरायल को शह देने की भूमिका थी । हाल में इंग्लैंड के संसदीय चुनाव में लेबर पार्टी की जीत के साथ ही फिलिस्तीन समर्थक प्रत्याशियों की जीत भी चर्चा का विषय रही । अन्य पश्चिमी देशों में भी यह मुद्दा लोगों को प्रभावित कर रहा है । शासक वर्ग और जनता, खासकर नयी पीढ़ी के युवकों के बीच इस मसले पर अलगाव की खाई चौड़ी होती जा रही है । यह युवा शिक्षा और बौद्धिकता से जुड़ा है । शिक्षित समुदाय के फिलिस्तीन के पक्ष में खड़े होने की वजह से किताबों की दुनिया में भी यह सवाल छाया हुआ है । हमारे देश की आधिकारिक नीति तो फिलिस्तीन के साथ है लेकिन दुर्भाग्य से वर्तमान शासक दक्षिणी गोलार्ध से अलगाव झेलकर भी इजरायल की ओर झुके नजर आ रहे हैं और फिलिस्तीन के पक्ष में प्रदर्शन करने पर अघोषित रोक जैसी लगाये हुए हैं । यह बात खास तौर पर दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए भी लग रही है कि फिलिस्तीन के साथ हमारे देश का रिश्ता बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है ।         

इसका सबूत देते हुए 2023 में मानचेस्टर यूनिवर्सिटी प्रेस से विक्टोर कत्तन और अमित रंजन के संपादन में ‘द ब्रेकअप आफ़ इंडिया ऐंड फिलिस्तीन: द काजेज ऐंड लीगेसीज आफ़ पार्टीशन’ का प्रकाशन हुआ । लूसी चेस्टर ने इसकी प्रस्तावना लिखी है और पेनी सिनानोग्लू ने इसका पश्चलेख लिखा है । संपादकों की भूमिका के अतिरिक्त किताब के चार हिस्सों में दस लेख संकलित किये गये हैं । पहले में भारत के विभाजन, दूसरे में फिलिस्तीन के विभाजन पर विचार करने के बाद तीसरे हिस्से के लेखों में इन दोनों मामलों की तुलना की गयी है । आखिरी चौथे हिस्से के लेखों में इन दोनों विभाजनों का प्रभाव दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के क्षेत्रीय संदर्भ में परखा गया है । इस किताब की खास बात यह याद दिलाना है कि इन दोनों देशों का विभाजन एक ही ब्रिटिश सत्ता ने 1947 में किया था । लूसी चेस्टर का कहना है कि इतिहास बताने की साम्राज्यी पद्धति का प्रतिकार करते हुए वर्तमान साम्राज्यवाद का मुकाबला करने के क्रम में यह किताब तैयार हुई है और बताती है कि हमारे वर्तमान को आकार देने में अब भी साम्राज्यवाद प्रमुख भूमिका निभा रहा है । इसमें साम्राज्यवाद की बात करते हुए उपनिवेशक केंद्र पर ध्यान देने की जगह जमीनी हकीकत का बयान किया गया है ताकि भारत और फिलिस्तीन के भविष्य का आकलन किया जा सके । इस किताब में संग्रहित सामग्री से पता चलता है कि इन दोनों देशों के हालिया इतिहास आपस में जुड़े हुए हैं । ये दोनों देश दो बड़े इलाकों को प्रभावित भी करते हैं इसलिए उनका यह इतिहास केवल इन देशों का ही नहीं बल्कि उन क्षेत्रों का भी इतिहास बन जाता है । यह इतिहास साम्राज्य के विस्तार की ही कहानी नहीं कहता । इसके मुकाबले इसमें दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की आपस में उलझी प्रक्रियाओं का विश्लेषण मिलेगा । इन प्रक्रियाओं में हिंसा, राजनीति में धर्म की भूमिका, बहुसंख्यावादी राजनीति और साम्राज्यी सत्ता तंत्र की दीर्घकालीन मौजूदगी शामिल हैं । इनका जिक्र करते हुए उपनिवेशवाद के विरोध के तरीकों, साम्राज्यी तकनीकों और राष्ट्रवाद के ऐसे पहलुओं पर बात की गयी है जिनके बारे में इनका इतिहास अलग अलग लिखने से बात करना मुश्किल होता । किताब के विभिन्न अध्यायों के लेखकगण स्थापित विद्वानों के साथ नवोदित अध्येता भी हैं । इन सबने सांस्कृतिक, राजनीतिक और कानूनी इतिहास लिखने के साथ ही समाजशास्त्रीय आयामों का भी उल्लेख किया है ।

ब्रिटेन द्वारा भारत और पाकिस्तान को सत्ता का हस्तातंरण साम्राज्य के खात्मे की जगह उसको नये रूप में जारी रखने की रणनीति के तहत किया गया था । इसके लिए भारत का विभाजन आवश्यक नहीं था । ब्रिटेन के शासक अन्य तरीके भी आजमा सकते थे लेकिन इस क्षेत्र में अपने निहित स्वार्थ को जारी रखने के लिहाज से विभाजन उनको सबसे बेहतर रास्ता महसूस हुआ । असल में विभाजन ऐसा तरीका था जो नियंत्रण कायम रखने के लिए अंग्रेजी साम्राज्य पहले से आजमाता रहा था । साम्राज्य की विरासत को समझने के लिए औपनिवेशिक की निरंतरता को आजादी के बाद भी देखना होगा । 1947 और 1948 की घटनाओं का द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी दुनिया से बहुत ही गहरा रिश्ता है । संयुक्त राष्ट्र संघ ने फिलिस्तीन के हवाले से तय किया कि विश्व व्यवस्था के पुनर्निर्माण में संप्रभुता का दावा नृजातीय आधार पर ही सुना जायेगा । राष्ट्र निर्माण के सिलसिले में इस आधार को लागू करने की ताकत भी संयुक्त राष्ट्र संघ को फिलिस्तीन के कारण ही हासिल हुई । कुछ लोगों का कहना है कि विभाजन और अनुपनिवेशन की प्रक्रिया आपस में जुड़ी हुई है और अब भी समाप्त नहीं हुई है । विभाजन की इस प्रक्रिया से उपजा दर्द अब भी इस इलाके को सताता रहता है । भारत के दो देशों में विभाजन के बाद से पाकिस्तान के शासकों द्वारा जिस राष्ट्रवाद की पैरोकारी की जाती है उसका प्रतिकार स्थानीय संस्कृति या क्षेत्रीय इतिहास में मौजूद है । इस तरह राष्ट्रीय और क्षेत्रीय इतिहास के बीच निरंतर तनाव बना रहता है ।

इस इतिहास के साथ ही अस्मिता के निर्माण का सवाल भी जुड़ा हुआ है । सभी जानते हैं कि उपनिवेशवाद ने खास पहचानों को ही वैध माना था । इसके कारण भिन्न भिन्न समूहों को साथ रख दिया गया था । ऐसा भारत के साथ फिलिस्तीन में भी हुआ था । इसके लिए धर्म को एकदम नया स्वरूप दिया गया । उसे आचरण के क्षेत्र से विस्तारित करते हुए राष्ट्रवादी प्रतीक और एकताकारी शक्ति में बदला गया । धर्म की सामाजिक पहचान बनाने की नीति ने पाकिस्तान के सपने में बड़ी भूमिका निभायी । इसके खतरे भी सामने आये । लोकतंत्र का अर्थ बहुत हद तक बहुसंख्यकवाद समझा जाने लगा । पाकिस्तान में राजनीतिक सत्ता या राष्ट्रीय विमर्श के बदलाव के अनुरूप जाति, क्षेत्र, भाषा और लिंग आधारित पहचानों में भी बदलाव आये । वहां जाति की मौजूदगी के बावजूद उसके अस्तित्व से इनकार किया जाता है । भारत में राज्य का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष घोषित हुआ लेकिन समाज ऐसा नहीं बन सका । इससे राज्य की धर्मनिरपेक्षता भी प्रभावित हुई । इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बाबरी मस्जिद का ध्वंस था । यह भी तर्क दिया जाने लगा कि पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों की रक्षा पर ही भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रक्षा निर्भर है । दूसरी ओर भारत और फिलिस्तीन में राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान बहुसंख्या के शासन की मांग ने एशिया और अफ़्रीका के भी परवर्ती शासनों का रूप निर्धारित किया । दक्षिण अफ़्रीका के रंगभेदी शासन का अंत इस विरासत का सबसे ताजा फल था ।

इस किताब का महत्व यह साबित करने में भी है कि किसी भी जगह का इतिहास संबद्ध इतिहास के रूप में ही लिखा जा सकता है । पारदेशीय इतिहास के लिए भौगोलिक इकाइयों को अलग और स्वतंत्र न मानकर सम्पूर्ण का अंग मानना चाहिए ताकि उनके साझे संदर्भ अच्छी तरह प्रकट हों । असल में इतिहास के कर्ता व्यापक परिप्रेक्ष्य में औपनिवेशिक या राष्ट्रीय सरहदों की सीमा से बाहर ही काम करते हैं । देशों की सरहदों के भीतर ही सीमित रहने से वर्तमान विभाजनों को अतीत पर भी थोपा जाने लगता है । किताब के लेखकों का कहना है कि लोकतंत्र और बहुसंख्यावादी राष्ट्रवाद इस समय की भी समस्याओं की जड़ में है । वर्तमान को समझने के लिए भी इस अतीत को खंगालना जरूरी है ।

संपादकों के अनुसार दोनों देशों के विभाजनों के बावजूद जनता, भूगोल, औपनिवेशिक संस्थान, नीति और कानून की बहुतेरी उलझनें बनी हुई हैं । इन दोनों विभाजनों के बीच अंतर भी थे और उनके बारे में भी कुछ लेखकों ने ध्यान खींचा है लेकिन इन दोनों को एक साथ देखने से बहुसंख्यावादी राजनीति, धार्मिक हिंसा और राजनीतिक सत्ता के असमान बंटवारे जैसी आज की कुछ समस्याओं के स्रोत पहचाने जा सकते हैं । इस किताब की एक और बड़ी खूबी इन विभाजनों के साथ दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की वर्तमान उलझनों को जोड़कर देखने में निहित है । इनके विभाजन एक ही साल अगस्त से नवंबर के बीच हुए । इन दोनों ही जगहों पर विभाजन को लेकर तीखी बहस चली जिसमें अगर कुछ लोग समर्थन कर रहे थे तो कुछ लोग विरोध भी कर रहे थे । इन्हीं दोनों देशों के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा में आत्म निर्णय की धारणा जुड़ी । पश्चिमी दुनिया के बाहर अनुपनिवेशन की परिघटना भी इनके साथ जुड़ी हुई है । बहुत से विद्वान लीग आफ़ नेशंस और संयुक्त राष्ट्र संघ को विचार, संस्थान और नीति के मामले में बहुत अलग नहीं मानते लेकिन दोनो के बीच उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों के उदय तथा तीसरी दुनिया के नवोदित देशों की मौजूदगी ने भारी अंतर पैदा किया था । इसी वजह से द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की दुनिया उससे पहले की दुनिया से अलग हो गयी । हालांकि 1919 के पेरिस शांति सम्मेलन और कोमिंटर्न में पश्चिमेतर देशों  का प्रतिनिधित्व था लेकिन इन पहलों में सरकारी नीतियों को सूत्रबद्ध करने की क्षमता तब तक नहीं आयी जब तक अनुपनिवेशन की लहर में राजसत्ता पर नयी ताकतों ने कब्जा नहीं कर लिया । 1945 से 1989 के बीच सौ से अधिक देश यूरोपीय उपनिवेश न रहकर स्वतंत्र देश बन गये । इस नयी परिस्थिति के चलते लीग आफ़ नेशंस और संयुक्त राष्ट्र संघ के बीच एक और बड़ा अंतर संपादकों ने बताया है कि सोवियत संघ न केवल संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना में शामिल था बल्कि सुरक्षा परिषद में अपनी हैसियत का असर डालकर उसने उपनिवेशों की मुक्ति की प्रक्रिया को तेज भी कराया । स्वाधीनता के बाद ये देश संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य हुए और उन्होंने जिस भाषा का प्रवेश कराया वह उनके औपनिवेशिक प्रभुओं के लिए अब तक अनसुनी थी । इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय कानून पर पश्चिम का दबदबा खत्म हो गया । समाजवादी खेमे और तीसरी दुनिया के इन्हीं देशों के कारण आत्म निर्णय समेत मानवाधिकार की समूची धारणा का प्रवेश संयुक्त राष्ट्र संघ में हुआ । इस नयी समझ की परीक्षा भारत और फिलिस्तीन के मामले में हुई । आत्म निर्णय का अधिकार इसके बाद किसी का एकाधिकार नहीं रह गया । अब उसका इस्तेमाल सभी लोग कर सकते थे । अब यह तर्क देना सम्भव नहीं रह गया कि पराधीन देश के वासी सरकार चलाने की क्षमता नहीं रखते ।

विभाजन को भी देखने की निगाह अब तक औपनिवेशिक प्रभुओं की कारगुजारी तक ही सीमित रही है । इसके मुकाबले इस किताब में विभाजन के पक्ष अथवा विपक्ष में तथा उसके परिणामों से निपटने के मामले में जन समुदाय को केंद्र में रखा गया है । लंदन में बनने वाली नीतियों को समझने के साथ उनको जमीन पर लागू करने वालों को भी समझना संपादकों को जरूरी लगा । जिन लोगों पर इन विभाजनों का सीधा प्रभाव पड़ा, जिस तरह विभाजन के बाद की हिंसा में आबादियों को इधर उधर होना पड़ा उसने दक्षिण एशिया में भारत, पाकिस्तान और बांगलादेश तथा मध्य पूर्व में इजरायल, फिलिस्तीन और जार्डन की राष्ट्रीय पहचान को बहुद हद तक निर्धारित किया । पहचान के साथ भूगाग के संबंध पर अब भी बहस होती रहती है । कुछ लोगों के लिए विभाजन उत्सव की तरह था तो कुछ लोगों के लिए यह त्रासदी था । जो विजयी हुए उनके लिए विभाजन नयी सत्ता के जन्म की पीड़ा था और जो पराजित रहे उनके लिए वह सदमे और निराशा का बायस बना, उनके अपने लोग बिछुड़े, जमी जमायी गृहस्थी उजड़ गयी, पुराने घरबार छूटे और अजनबी लोगों के साथ परदेस में बसना पड़ा । शहरों और गांवों के नाम बदले गये । पंजाब का लायलपुर बदलकर फ़ैसलाबाद हो गया और फिलिस्तीन के अल-मजदल को इजरायल ने वहां के मूलवासियों को गाजा पट्टी में भगाकर उसका नाम अस्केलान कर दिया । विभाजन का खेल पश्चिमी देशों का जाना पहचाना था, उपनिवेशित देशों के लिए यह मुसीबत नयी थी । धर्म के आधार पर बंटवारे का जो खेल उस समय साम्राज्यवाद की ओर से खेला गया उसने अब अपने असली रंग दिखाने शुरू किये हैं ।         

साफ है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की जिस अंतर्राष्ट्रीय गतिकी का परिणाम भारत और फिलिस्तीन की आजादी में निकला उस विरासत पर वैचारिक हमला करने की नीयत से ही वर्तमान सरकार न केवल इजरायल के पक्ष में झुकी नजर आ रही है बल्कि हमारे स्वाधीनता आंदोलन से हासिल लोकतांत्रिक मूल्यों को भी दफन करना चाहती है । उपनिवेशों की आजादी में सोवियत संघ और कोमिंटर्न के कारण जो गहरा वाम रंग घुला हुआ है उसको बदनाम करने की मंशा से ही संघ प्रमुख ने अपने हालिया उद्बोधन में वोकिज्म (जागरूकता) और सांस्कृतिक मार्क्सवाद को निशाने पर लिया ।                                              

इस साल तो जैसे इस मसले पर किताबों की बाढ़ आयी हुई है । 2024 में अदर प्रेस से एन्ज़ो ट्रावेर्सो की इतालवी पुस्तिका के फ़्रांसिसी अनुवाद का अंग्रेजी अनुवाद ‘गाज़ा फ़ेसेज हिस्ट्री’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद विलार्ड वुड ने किया है । लेखक ने खुद भी इसे संक्षिप्त निबंध कहा है और फिलिस्तीन के विरुद्ध हालिया इजरायली युद्ध को इसकी पृष्ठभूमि बताया है । 7 अक्टूबर 2023 के हमास के हमले की संसार भर में निंदा हुई लेकिन इस औचक हमले का बदला लेने के लिए जब इजरायल ने हिंसक युद्ध छेड़ा तो उसके प्रति ठंडी प्रतिक्रिया दिखायी पड़ी । अगर किसी ने शर्माते हुए मुद्दे पर मुंह खोला भी तो दयाभाव से ही बोला । इजरायल की नीति के आलोचकों ने भी सहानुभूति और एकजुटता का प्रदर्शन जरूरी समझा । इजरायल की निंदा करते हुए भी हमास का कलंकीकरण करना अधिकांश अखबार नहीं भूले । दक्षिणी गोलार्ध के देशों ने एकमत से गाजा की तबाही पर अपना गुस्सा जाहिर किया । इसके विपरीत पश्चिमी देशों की अधिकतर सरकारों और मीडिया ने इजरायल का साथ दिया । इस तरह पश्चिमी बौद्धिक और व्यापक जनमत के बीच चौड़ी खाई बन गयी । इसी वजह से यह निबंध लिखा गया और इसलिए लेखक का साफ कहना है कि इसमें तटस्थता नहीं मिलेगी ।  

यह युद्ध हमारी धरती के साथ हो रहे गैर जिम्मेदाराना रवैये का अंग है । हेमार्केट बुक्स से कैथरीन नतानेल और इलान पापे के संपादन में ‘फिलिस्तीन इन ए वर्ल्ड आन फ़ायर’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों के मुताबिक दुनिया में इस समय आग लगी हुई है । युद्ध और तापमान वृद्धि के कारण जंगल, जमीन और घर जल रहे हैं । नफ़रत और नस्लभेद की विचारधाराओं के कारण निराशा, तानाशाही, उपनिवेशवाद, अपराध, उत्पीड़न और गरीबी में भयावह विस्तार हो रहा है । इसी साल वर्सो से गिडियन लेवी की किताब ‘द किलिंग आफ़ गाजा: रिपोर्ट्स आन ए कैटास्ट्राफी’ का प्रकाशन हुआ । पाठकों को याद होगा कि फिलिस्तीन पर हमले से पहले इजरायल में नेतन्याहू की सरकार के लोकतंत्र विरोधी फैसलों के विरोध में भारी जन प्रदर्शन हो रहे थे । इस संकट से पार पाने की सरकारी रणनीति के बतौर भी इस युद्ध को देखा जा रहा है । इजरायल के संकट को उजागर करते हुए वर्सो से ही साउल फ़्राइडलांडेर की किताब ‘डायरी आफ़ ए क्राइसिस: इजरायल इन टर्मायल’ का प्रकाशन हुआ । इजरायल में जो संकट खड़ा हुआ था उसका कारण नेतन्याहू की सरकार द्वारा न्यायपलिका को कब्जे में लेने की कोशिश था । इस कोशिश के विरोध में उस छोटे से देश की जनता तो लाखों की संख्या में सड़क पर थी ही, युवल नोआ हरारी जैसे संसार भर में मशहूर बहुत से इजरायली बुद्धिजीवी भी प्रदर्शनों में शामिल थे । इस दौर की वैश्विक विशेषता है कि सभी तानाशाह लोकतंत्र की स्वतंत्र संस्थाओं को अपनी चेरी बनाने की जुगत लगा रहे हैं । सारे संसार में लोकतंत्र की समाप्ति का इतना संगठित प्रयास आधुनिक इतिहास में सौ साल पहले फ़ासीवाद के समय ही हुआ था । नतीजा यह कि लगभग सभी देशों में राजहठ और प्रजाहठ की टक्कर जारी है । पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका में शासक समूह जिस तरह जनमत की उपेक्षा करते हुए इजरायल का साथ दे रहा है उसके पीछे धन की ताकत है । अमेरिकी चुनावों में धन के प्रभाव की बाबत सभी जानते हैं लेकिन पहली बार शिक्षण संस्थानों की नींव में धन की ताकत का निर्लज्ज प्रदर्शन हो रहा है । इसी पहलू के बारे में वनवर्ल्ड से इलान पापे की किताब ‘लाबीइंग फ़ार ज़ायोनिज्म: आन बोथ साइड्स आफ़ द अटलांटिक’ का प्रकाशन हुआ । बीकन प्रेस से अतेफ़ अबू सैफ़ की किताब ‘डोन’ट लुक लेफ़्ट: ए डायरी आफ़ जेनोसाइड’ का प्रकाशन क्रिस हेजेज की प्रस्तावना के साथ हुआ । एक साल पहले ब्रिटेन में इसे कामा प्रेस ने छापा था । इस डायरी के अलग अलग हिस्से पहले भी अंग्रेजी, स्पेनी, फ़्रांसिसी, इतालवी आदि पत्र पत्रिकाओं में छप चुके हैं । डायरी की शक्ल में यह किताब इजरायल द्वारा फिलिस्तीन में जारी जनसंहार को दर्ज करती है । लेखक का मानना है कि इस तरह के ही लेखन से ही हत्यारों की सुनायी झूठी कहानियों पर से परदा उठेगा । वर्सो से माया विंड की किताब ‘टावर्स आफ़ आइवरी ऐंड स्टील: हाउ इजरायली यूनिवर्सिटीज डिनाइ फिलिस्तीनियन फ़्रीडम’ का प्रकाशन नादिया अबू अल-हज की प्रस्तावना और रोबिन डी जी केल्ली के पश्चलेख के साथ हुआ । नादिया ने प्रस्तावना में बताया है कि 24 जुलाई 2023 को इजरायली संसद ने कानून बनाकर सरकार के असंवैधानिक नियमों को रद्द करने के सर्वोच्च अदालत के वैध अधिकार को समाप्त कर दिया । संसदीय विपक्ष ने मतदान का पूरी तरह बहिष्कार किया । सारी दुनिया की खबरों में इस कानून को इजरायली लोकतंत्र के लिए खतरा बताया गया । इस घटना ने इजरायल के भीतर नेतन्याहू की सरकार को पूरी तरह अलोकप्रिय बना दिया है । फिलिस्तीन पर हमले ने उनकी सरकार को दक्षिणपंथ की दिशा में बहुत दूर तक ढकेल दिया है । अमेरिकी शासक समूह को वर्तमान इजरायली प्रशासन अकारण नहीं पसंद आ रहा है ।     

ऊपर हमने पश्चिमी देशों में फिलिस्तीन के साथ जिस एकजुटता का जिक्र किया है उसको स्पष्ट तौर पर उभारने के मकसद से आइ बी तौरिस से रोजमेरी सेइग के संपादन में ‘बिकमिंग प्रो-फिलिस्तीनियन: टेस्टिमोनियल्स फ़्राम द ग्लोबल सोलिडरिटी मूवमेंट’ का प्रकाशन हुआ । इस किताब के संपादन की प्रेरणा लंदन में फिलिस्तीन के समर्थन में मई 2021 में लगभग दो लाख लोगों के विशाल प्रदर्शन से मिली । हालिया इजरायली हमले के बाद भी इसी तरह के प्रदर्शन हो रहे हैं । इन प्रदर्शनों ने बड़े पैमाने पर उदारपंथी लोगों को फिलिस्तीन समर्थकों में बदल डाला है ।      

 

Saturday, October 12, 2024

मार्क्स के बाद

 

              

                           

2025 में रटलेज से जेमी एडवर्ड्स और ब्रायन लाइटर की किताब ‘मार्क्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों ने इसमें मार्क्स के बाद उनके सिद्धांत के विकास का मोटा खाका प्रस्तुत किया है । मार्क्स के निधन के समय किसी को अनुमान नहीं था कि उनकी विरासत इतना समृद्ध और उनका असर इतना गहरा होगा । लंदन प्रवास की कठिन स्थिति तो आखिरकार दुरुस्त हुई लेकिन गरीबी और बौद्धिक गुमशुदगी उनके साथ लगी रही । समाजवादियों और बौद्धिकों के बहुत छोटे अंतर्राष्ट्रीय समूह में ही उनका नाम सुना जाता था । पूंजी को मान्यता मिली लेकिन कभी उसे मुख्यधारा में शामिल नहीं किया गया । प्रथम इंटरनेशनल का नेता तो वे रहे लेकिन संगठन बिखर चुका था और उसका कोई असर नहीं बचा था । निधन के कुछ ही समय बाद उनके विचारों का तेजी से प्रसार हुआ । इसमें एंगेल्स की भूमिका बहुत ही महत्व की रही । उन्होंने मार्क्स के लेखन के प्रसार का ढेर सारा तरीका आजमाया । पहले भी वे मार्क्स के सहयोगी रह चुके थे । जवानी में ही मार्क्स ने इंग्लैंड के मजदूर वर्ग की दशा पर उनकी पुस्तक को प्रशंसा प्रदान की । इसके बाद उनका संयुक्त लेखन पवित्र परिवार, जर्मन विचारधारा और कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र रहा । इस सहकार के अतिरिक्त उन्होंने मार्क्स का आर्थिक सहयोग हमेशा किया । लंदन में प्रवास के समय एंगेल्स ने अपने कारखाने में काम के बदले जो कुछ पाया उससे मार्क्स की मदद करते रहे ताकि मार्क्स अपना अध्ययन जारी रख सकें । उनके लेखन के प्रचार प्रसार में भी एंगेल्स की भारी भूमिका रही । अर्थशास्त्र की आलोचना में योगदान की उन्होंने लम्बी समीक्षा लिखी । पूंजी की तो अपने नाम से या बिना नाम की बहुतेरी समीक्षाओं का लेखन एंगेल्स ने किया । मार्क्स के निधन के बाद उनकी किताबों के फिर से प्रकाशित होने के मौके पर भूमिकाओं के लेखन का दायित्व भी एंगेल्स ने उत्साह से निभाया । मार्क्स के लेखन के उनके निधन के बाद प्रकाशन में एंगेल्स ने अपना शेष जीवन लगा दिया । पूंजी के दूसरे और तीसरे खंड के संपादन के साथ उन्होंने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत के बतौर छपी पांडुलिपि भी तैयार की ।

मार्क्स के लेखन के प्रसार के अतिरिक्त भी एंगेल्स ने स्वतंत्र काम किये । इनमें ड्यूहरिंग मतखंडन तथा प्रकृति में द्वंद्ववाद प्रमुख हैं । वे विज्ञान में रुचि के कारण इस क्षेत्र में अध्ययन करते रहते थे । उन्होंने इन किताबों में बताया है कि हेगेल की पद्धति को इस युग की वैज्ञानिक प्रगति को भी समझने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है । मार्क्स ने वर्ग संघर्ष को द्वंद्वात्मक सामाजिक बदलाव की समझ के लिए लागू किया था लेकिन एंगेल्स ने कहा कि इतिहास के भीतर जो प्रक्रिया काम करती है वही प्रक्रिया प्रकृति में भी कार्यरत है । उसी प्रक्रिया से मानव चिंतन के विकास को भी समझा जा सकता है । उन्होंने भौतिकवाद और द्वंद्ववाद के संश्लेषण के सहारे कम्युनिस्ट विश्व दृष्टिकोण विकसित करने की कोशिश की । आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने मार्क्सवाद को ऐसा विज्ञान बना दिया जिसे मार्क्स ने भी सम्भव नहीं समझा था । मार्क्स की उनकी व्याख्या में जो भी कमी हो उन्होंने नवजात मार्क्सवादी आंदोलन को मजबूत और स्पष्ट दार्शनिक बुनियाद उपलब्ध करायी और उसे अंतिम रूप दिया ।

सैद्धांतिक योगदान के अतिरिक्त भी एंगेल्स ने सारे यूरोप की समाजवादी पार्टियों को व्यावहारिक सलाह देने का भी काम जारी रखा । इनमें जर्मनी की पार्टी से उनका खास रिश्ता था । उसकी स्थापना 1875 में दस साल पहले स्थापित दो पार्टियों के विलय से हुई थी । सरकार ने 1878 से 1890 तक इस पार्टी को प्रतिबंधित रखा । प्रतिबंध की समाप्ति के बाद वह देश की सबसे बड़ी पार्टी बन गयी । इसे चुनावों में मिली भारी सफलता के बाद इसमें सुधारवाद की मजबूत प्रवृत्ति पैदा हुई । एंगेल्स ने दो चरणों की नीति का सुझाव दिया जिसके मुताबिक उसे पहले जनता की बहुसंख्यक आबादी को अपने पक्ष में करना था । इससे पहले सशस्त्र विद्रोह विफल होता और पार्टी का अस्तित्व बिखर जा सकता था । बहुमत हासिल करने के बाद पार्टी को पूंजीपतियों के साथ अनिवार्य सशस्त्र संघर्ष में जीत मिलनी तय थी । सुधारवादियों ने इस सम्भावना को नकारते हुए उन्हें अपनी राजनीति के पक्के समर्थक में बदल दिया ।

जर्मनी की पार्टी दूसरे इंटरनेशनल का सदस्य थी । इसे समाजवादी इंटरनेशनल भी कहा जाता है । 1889 से 1916 तक यह सक्रिय रहा । सारी दुनिया की समाजवादी पार्टियों के बीच संवाद और सहकार विकसित करने के लिए प्रथम इंटरनेशनल के वारिस के बतौर इसकी स्थापना हुई थी । इसका घोषित मकसद था समाजवादी क्रांति संपन्न करना । इसने यूरोप और अमेरिका के विभिन्न शहरों में कुल पंद्रह कांग्रेसें कीं जिनमें सदस्य पार्टियों के प्रतिनिधिगण प्रस्तावों और कार्ययोजना पर बहस करने के बाद उसे पारित करते थे ।

तीस साल तक काउत्सकी इसके नेता के बतौर सक्रिय रहे । बीसवीं सदी के मार्क्सवादियों पर एंगेल्स के मुकाबले काउत्सकी का असर अधिक रहा । उन्हें रूढ़ मार्क्सवादी भी कहा जाता है । ऐतिहासिम भौतिकवाद की कट्टरता से उन्हें जोड़ा जाता है जिसके अनुसार उत्पादक शक्तियां समाज के आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चरित्र को निर्धारित करती हैं । इस सूत्र में अन्य कारकों के आपसी संवाद की कोई जगह या गुंजाइश नहीं थी इसलिए इसे भोड़ा मार्क्सवाद भी कहा जाता है । वे वर्ग संघर्ष के पक्षधर थे और पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए मजदूरों को आर्थिक और राजनीति तौर पर संगठित करने के हामी थे । संसदीय सुधार के रास्ते समाजवाद के पक्षधर लोगों को वे अवसरवादी मानते थे और इस रास्ते पर चलने में व्यवस्था के भीतर समाहित हो जाने का खतरा देखते थे । इसकी जगह वे जन कार्यवाही और मजबूत समाजवादी पार्टी के पक्ष में खड़े थे । उनके समकालीन एडुअर्ड बर्नस्टाइन को सुधारवाद का प्रमुख सैद्धांतिक नेता और प्रवर्तक माना जाता है । उन्होंने काउत्सकी की सभी मान्यताओं का खंडन किया । उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद को झूठ कहा । उनके अनुसार पूंजीवाद के नाश की मार्क्स की भविष्यवाणी सही नहीं निकली और पूंजीवाद ने बदलते हालात के मुताबिक खुद को ढाल लिया और जीवित रहने में सक्षम हुआ । समाजवाद वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की जगह इसमें क्रमिक सुधार के जरिये हासिल किया जा सकता है । उनका यह भी कहना था कि बदलाव की ताकत सर्वहारा की जगह पार्टी होगी । समाजवाद लाने के लिए सर्वहारा के अधिनायकत्व की कोई जरूरत नहीं है । समाजवादी समाज में राज्य की भूमिका उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण कायम करने की जगह समाजार्थिक सुधारों को प्रोत्साहित करने की होगी । उनके ये विचार बहुत विवादास्पद रहे और उन पर मूल सिद्धांतों को तिलांजलि देने का आरोप लगा और आंदोलन में फूट पड़ गयी ।                                                                                                                                                                                                  

समाजवादी इंटरनेशनल की स्थापना विभिन्न देशों में कार्यरत समाजवादी पार्टियों की गतिविधियों को आपस में जोड़ने के लिए हुई थी ताकि मजदूर वर्ग में अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता बढ़े । प्रथम विश्वयुद्ध ने इसके सामने भारी चुनौती खड़ी कर दी क्योंकि सदस्य पार्टियों को युद्ध के प्रति रुख तय करना पड़ा । फ़्रांस, रूस और ब्रिटेन की पार्टियों ने अपनी सरकारों के युद्ध प्रयासों के समर्थन की राह चुनी । उन्हें लगा कि मजदूर वर्ग द्वारा हासिल उपलब्धियों की रक्षा के लिए आक्रांताओं से लड़ना होगा । इसके विपरीत जर्मनी तथा कुछ अन्य देशों की पार्टियों ने युद्ध के विरोध का रास्ता चुना और मजदूरों की अंतर्राष्ट्रीय क्रांति के बल पर युद्ध की समाप्ति की योजना भी बनायी । दोनों के बीच तीखा वाद विवाद हुआ और आखिरकार 1916 में इस इंटरनेशनल का अंत हो गया ।

इसके बाद मार्क्सवाद के विकास की कहानी लेनिन की है । सिद्धांतकार और क्रांतिकारी होने के साथ ही वे सोवियत संघ के प्रमुख भी रहे । मध्यवर्गीय परिवार में उनका जन्म और लालन पालन हुआ तथा कानून की पढ़ाई उन्होंने की थी । उसी दौरान उन्हें मार्क्सवाद में रुचि पैदा हुई और 1887 में जार की हत्या का षड़यंत्र रचने के आरोप में बड़े भाई को फांसी होने के बाद प्रतिबद्ध मार्क्सवादी हो गये । 1895 में उनका परिचय मार्क्सवादी चिंतक ज्यार्जी प्लेखानोव से हुआ । धीरे धीरे उनकी ख्याति प्रवासी मार्क्सवादी क्रांतिकारियों और समाजवादी इंटरनेशनल में बढ़ती गयी । सुधारवादी समाजवादियों की उन्होंने जमकर आलोचना की और उनमें क्रांतिकारी निष्ठा की कमी महसूस करते हुए उनसे अलग हो गये । रूसी क्रांति के पहले के दो दशकों में वे बोल्शेविक पार्टी के नेता के रूप में स्थापित हो गये । रूसी क्रांति में बोल्शेविक और मेंशेविक गुट सामने आये और उन गुटों के बीच कुछ मामलों में सैद्धांतिक मतभेद उभरे ।

इन दोनों गुटों की भिन्न भिन्न मान्यताओं का सैद्धांतिक महत्व जो भी हो वास्तविक घटनाक्रम के समक्ष इन्हें लागू करना मुश्किल हुआ । फ़रवरी 1917 में जन विक्षोभ के कारण जार की सत्ता उखाड़ फेंकी गयी । अस्थायी सरकार का गठन हुआ जिसमें शामिल उदारवादी नेतागण रूस में भी लोकतांत्रिक सरकार का गठन करना चाहते थे । यह सरकार भी हालात में सुधार नहीं  ला सकी इसलिए विक्षोभ बढ़ता गया । सत्रह साल के निर्वासन के बाद लेनिन रूस लौटे और अक्टूबर 1917 में बोल्शेविकों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया तथा कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना की । इसके बाद 1918 से 1922 तक पश्चिमी देशों की मदद से खड़ी ताकतों के साथ नवोदित सत्ता को भयंकर गृहयुद्ध में लगे रहना पड़ा । इसमें लाखों लोग मारे गये । बोल्शेविकों की जीत हुई और 1922 में सोवियत संघ की स्थापना हुई । बोल्शेविकों को उम्मीद थी कि रूसी क्रांति के असर से पश्चिमी देशों में भी क्रांति का ज्वालामुखी फूट पड़ेगा और इस तरह रूसी क्रांति विश्वक्रांति का अगुआ दस्ता होगी लेकिन पश्चिमी देशों में क्रांति नहीं हुई जिसके कारण सोवियत संघ आर्थिक रूप से कमजोर बना रहा और उसे विश्व समुदाय से अलगाव भी झेलना पड़ा । इसके बाद दो साल में ही लेनिन का निधन हो गया । उनके आखिरी दौर के लेखन से पार्टी में नौकरशाही विकसित होने की चिंता जाहिर होती है । अतिशय केंद्रीकरण और प्राधिकार की बढ़ती मजबूती के खतरों से भी उन्होंने इन टिप्पणियों में सावधान किया है ।

लेनिन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान साम्राज्यवाद का विवेचन है । उनके इसी विवेचन ने विश्वयुद्ध को क्रांतिकारी युद्ध में बदल देने की सैद्धांतिक समझ प्रदान की । साम्राज्यवाद के अपने विश्लेषण में उन्होंने कहा कि यह विश्व व्यवस्था अपनी सबसे कमजोर कड़ी पर टूट जायेगी और रूस में ऐसा ही हुआ । साम्राज्यवाद संबंधी अपने अध्ययन के बल पर ही उन्होंने मार्क्स के उपनिवेशवाद विरोध को आगे बढ़ाते हुए तीसरी दुनिया के मुक्ति आंदोलनों के साथ मार्क्सवादी आंदोलन को जोड़ा । देश के बाहर की दुनिया में इस दायित्व को निभाने के साथ क्रांति और उसके बाद की सत्ता की समझ के लिए उन्होंने मार्क्स की राज्य संबंधी धारणा का भी विवेचन किया । 

लेनिन के निधन के बाद रूसी सत्ता मार्क्स के सपनों से दूर होती लगी । स्तालिन ने कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता तो मजबूत की ही, पश्चिमी देशों की क्रांति न होने की स्थिति में एक देश में समाजवाद के निर्माण का सिद्धांत भी पेश किया । इसके लिए सोवियत संघ में तेज उद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की जरूरत थी जिसे केंद्रीकृत योजना से ही करना सम्भव समझा गया । इस नीति को सफलता भी मिली जिससे सोवियत संघ शक्तिशाली देश के रूप में उभरा । हालांकि इसकी भारी कीमत भी रूस को चुकानी पड़ी । कहा जाता है कि खेती के जबरन समूहीकरण से अकाल पड़ा, उपभोक्ता सामग्री का अभाव पैदा हुआ और नागरिकों के जीवन स्तर में गिरावट आयी । यह भी आरोप लगा कि सत्ता ने समाज के प्रत्येक पहलू पर नियंत्रण कायम कर लिया । इसके लिए प्रतिबंध, प्रचार, जासूसी और आतंक का सहारा भी लिया गया ।

रूसी क्रांति ने विश्व इतिहास को गहरे प्रभावित किया । दुनिया के बहुतेरे देशों में कम्युनिस्ट क्रांतियों को इससे प्रेरणा मिली । माओ, कास्त्रो और हो ची मिन्ह ने चीन, क्यूबा और वियतनाम में क्रांति की अगुआई की । इन सबने औपनिवेशिक और नव औपनिवेशिक पूंजीवादी ताकतों का राज उखाड़ फेंकने और उद्योगों के राष्ट्रीकरण, भूमि सुधार तथा योजनाबद्ध अर्थतंत्र के आधार पर अपने देशों की आर्थिक विषमता दूर करने का लक्ष्य अपनाया । इन सभी देशों में क्रांति का आधार किसान रहे । इनमें से किसी ने पूंजीवादी देशों से सहायता की आशा नहीं की । सोवियत संघ जब तक था तब तक इनकी सहायता करता रहा लेकिन उनको भागीदार बनाने की जगह संसाधनों के दोहन या भूराजनीति में उनका उपयोग भी किया ।

एक ओर रूस में मार्क्सवाद का यह विकास हुआ तो दूसरी ओर पश्चिमी यूरोप में विभिन्न बौद्धिक मार्क्सवादी प्रवृत्तियों का उभार हुआ जिन्हें पश्चिमी मार्क्सवाद का नाम दिया गया । इस इलाके में क्रांतिकारी आंदोलनों की विफलता और रूसी शासन से उपजी निराशा के कारण ये मार्क्सवादी अब तक मार्क्सवादी में मौजूद आर्थिक केंद्रीयता से दूर हुए । इसकी जगह उन्होंने उस वैचारिक तंत्र पर ध्यान दिया जिसके जरिये शासक वर्ग जनता की सहमति प्राप्त करता है । कुल मिलाकर पश्चिमी मार्क्सवाद आर्थिक और राजनीतिक तत्वों के मुकाबले सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक परिघटना पर अधिक जोर देता रहा । इन लोगों ने अपने सिद्धांतों में अन्य विचार सरणियों को समाहित करना चाहा और हेगेल के मार्क्स द्वारा त्यक्त बहुतेरे विचारों का पुनरुत्थान भी किया ।

लूकाच को पश्चिमी मार्क्सवाद का संस्थापक माना जाता है । शुरू में उन्हें साहित्य का आलोचक समझा गया । विश्वयुद्ध के बाद उन्होंने मार्क्सवाद अपनाया और 1923 में इतिहास और वर्ग चेतना संबंधी उनकी किताब छपी । उन्होंने इसमें विचार किया कि पूंजीवाद के विरुद्ध विकसित पश्चिमी देशों के सर्वहारा वर्ग ने विद्रोह क्यों नहीं किया । उनका कहना था कि एक ओर पूंजीवाद गम्भीर संकट से गुजर रहा था जिसके चलते सामान्य सामाजिक वातावरण भी समस्याग्रस्त प्रतीत हो रहा था । उस समय अगर सर्वहारा वर्ग इसका सचेत और जोरदार प्रतिरोध करता तो वह बलपूर्वक खुद को कायम नहीं रख पाता । इस अनुकूल स्थिति के बावजूद सर्वहारा समुदाय को बुर्जुआ राज्य, कानून और अर्थतंत्र ही एकमात्र सम्भव स्थिति महसूस हुई । समाज का वही स्वाभाविक आधार लगा । लूकाच को इसकी एकमात्र वजह विचारधारा समझ आयी जिसने सर्वहारा को विद्रोह करने से रोक दिया था इसलिए सर्वहारा को वैचारिक परिपक्वता पाने में मदद करना उनको दायित्व महसूस हुआ ।

लूकाच के चिंतन में सम्पूर्णता की धारणा का भारी महत्व है । हेगेल और मार्क्स के लेखन में भी इसका महत्व था । उनका कहना था कि विशेष के सरल प्रतीत होने के बावजूद वह किसी व्यापक परिक्षेत्र का अंग होता है इसलिए इस विशेष की समझ के लिए सम्पूर्ण के भीतर उसकी अवस्थिति की जानकारी जरूरी होती है । इसी आधार पर लूकाच ने कहा कि मार्क्स की द्वंद्वात्मक पद्धति के तहत सामाजिक तथ्यों का विवेचन समग्रता में हुआ है । इसी आधार पर वे मार्क्सवाद और बुर्जुआ चिंतन के बीच का भेद आर्थिक पहलू पर मार्क्स के जोर के मुकाबले उनके चिंतन और पद्धति में समग्रता की मौजूदगी में निहित मानते हैं । वे इस मामले में इतनी दूर गये कि मार्क्स की गवेषणा से प्राप्त निष्कर्षों के पूरी तरह गलत साबित होने पर भी उनकी पद्धति के सही होने में उसकी प्रासंगिकता मानते हैं । उनके अनुसार इस पद्धति में अलग अलग तथ्य न केवल एक दूसरे से जुड़े विश्लेषित किये जाते हैं बल्कि इन तथ्यों को ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया के खास क्षणों के बतौर भी देखा जाता है । समग्रता का यह विकास भी लूकाच के अनुसार किसी ध्येय की ओर लक्षित और प्रगतिमान होता है ।

इस समग्रता के घटक सामाजिक संबंधों और उनकी गतिशीलता को समझने में होने वाली कठिनाई को स्पष्ट करने के लिए लूकाच ने रैकरण की धारणा पेश की । किसी सामाजिक और राजनीतिक विश्वदृष्टि के लिए लूकाच भी लेनिन की ही तरह विचारधारा नाम का इस्तेमाल करते हैं और मानते हैं कि लोगों के दिमाग में इसका विकास पूंजीवादी व्यवस्था में उनके सामने प्रतिदिन जिस तरह यथार्थ प्रकट होता है उसके आधार पर अपने आप होता है । वे वस्तुपूजा संबंधी मार्क्स के विवेचन का भी उल्लेख करते हैं जिसके तहत मनुष्यों के बीच के सामाजिक संबंध वस्तुओं के बीच संबंध के रूप में प्रकट होते हैं । इसके आधार पर उनका कहना था कि पूंजीवाद के तहत सामाजिक जीवन का प्रत्येक पहलू चूंकि बाजार के प्रभुत्व में होता है इसलिए वस्तुपूजा हमारे अनुभव को पूरी तरह आकार देने लगती है और मनुष्य की समस्त चेतना पर उसकी छाप अंकित हो जाती है । मनुष्य न केवल वस्तुओं और अन्य लोगों को बल्कि खुद को भी गणनीय मूल्य का धारक समझने लगता है । उसके गुण और उसकी क्षमता उसके व्यक्तित्व के अंग नहीं रह जाते बल्कि अन्य किस्म की वस्तुओं में बदल जाते हैं । जितना ही अधिक हम दुनिया को और अपने आपको विक्रेय वस्तु की तरह देखते हैं उतना ही यह पूंजीवादी व्यवस्था हमें स्वाभाविक और अपरिहार्य प्रतीत होती जाती है । ऐसे में मनुष्य का कर्तापन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के भीतर अपनी जीवन पद्धति, कार्यपद्धति और चेतना के समायोजन तक ही सीमित रह जाता है । लूकाच का कहना था कि इस स्थिति पर विजय प्राप्त करना सर्वहारा के लिए ही सम्भव है क्योंकि वे न केवल इस व्यवस्था से शोषित होते हैं बल्कि मूल्यों का सृजन भी करते हैं । वे ही इतिहास के कर्ता होते हैं क्योंकि वे पूंजीवादी व्यवस्था को न केवल चलाते हैं बल्कि वे ही इस पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ सकते हैं । उनको इस क्रांतिकारी कार्यभार की चेतना से संपन्न करने में वे भी लेनिन की तरह पार्टी की अग्रणी भूमिका देखते हैं । दुनिया को पूरी तरह बदलने की प्रक्रिया में सर्वहारा अपने आपको, सामाजिक जगत को और अपने क्रांतिकारी दायित्व को समझ पाता है ।

लूकाच का यह चिंतन मार्क्स के भौतिकवाद के मुकाबले हेगेल के प्रत्ययवाद से अधिक प्रभावित लगता है । उन्होंने मार्क्स की तर्ज पर यह तो माना कि ऐतिहासिक बदलाव सर्वहारा ही लायेगा लेकिन उनका सर्वहारा मार्क्स के मुकाबले हेगेल का परम विचार अधिक प्रतीत होता है । उसका कार्यभार भी आर्थिक प्रभुत्व से मुक्त वर्गविहीन समाज की स्थापना नहीं है । हालांकि वे व्यवहार और विचार को आपस में जुड़ा हुआ मानते हैं लेकिन बहुधा उनके लेखन में विचार या चेतना सामाजिक बदलाव लाने में सक्षम स्वतंत्र कर्ता की तरह नजर आता है । मार्क्स ने जिन्हें खारिज किया था उन युवा हेगेलपंथियों की तरह वे घोषित करते हैं कि चेतना में सुधार अपने आपमें क्रांतिकारी प्रक्रिया है । बाद में उन्होंने इस तरह के विचारों के लिए अपनी आलोचना भी की लेकिन पश्चिमी मार्क्सवाद ने उनकी आलोचना को नजरअंदाज करते हुए उनके इन्हीं भाववादी सूत्रों को अपनाया ।

उनके ही समकालीन ग्राम्शी ने भी पश्चिमी मार्क्सवाद पर बहुत असर डाला । इन दोनों में अंतर यह था कि लूकाच का प्रभाव बहुत तेजी से पड़ा था जबकि ग्राम्शी का लेखन बहुत समय तक गुमनामी में रहा । उनके लेखन का प्रसार 1970 दशक में ही आकर हो सका । उनका जन्म इटली के देहाती इलाके में हुआ था तथा उनको गरीबी और शारीरिक विकारों से जीवन भर जूझना पड़ा था । उन्होंने भाषा विज्ञान का अध्ययन शुरू किया था लेकिन आर्थिक दिक्कतों के अलावे राजनीतिक सक्रियता की वजह से पढ़ाई पूरी न कर सके । उनके अध्ययन के दौरान ही इटली के औद्योगिक मजदूर वर्ग का उदय हुआ और उनके संघर्षों ने ग्राम्शी की चेतना के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायी । 1924 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बने जिसके कारण रूसी कम्युनिस्ट नेताओं के सम्पर्क में आये । आम तौर पर वे रूसी नेताओं से सहमत थे लेकिन प्रत्येक देश की परिस्थिति के अनुसार क्रांतिकारी रणनीति के अनुकूलन पर जोर देते थे । इसके कारण वे इटली के फ़ासीवादी शासकों के निशाने पर आ गये । 1926 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और 1937 में रिहाई के कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया । जेल में रहते हुए उन्होंने प्रचुर लेखन किया और बाद में उसे उनकी नोटबुकों के बतौर छापा गया । उनके इस लेखन में विचारधारा का केंद्रीय महत्व है ।

उनका कहना था कि शासक वर्ग अपना प्रभुत्व केवल दमनात्मक तंत्र के जरिये ही नहीं कायम करता बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व के सहारे भी वह समाज में अपना दबदबा बनाता है । मार्क्स और लेनिन के लेखन के आधार पर उनका कहना था कि शासक वर्ग अपने विचारों के प्रसार के लिए धर्म, शिक्षा और मीडिया जैसे प्रमुख संस्थानों पर नियंत्रण स्थापित करता है । शासक वर्ग की इस कोशिश की खास पद्धति का उन्होंने विस्तार से विश्लेषण किया । ग्राम्शी का यह भी कहना था कि विचारधारा का मतलब महज विचारों को रोपना ही नहीं होता बल्कि उसमें रुख और दिशा का परिष्कार भी शामिल होता है । इस पहलू को शामिल करने से ग्राम्शी ने विचारधारा की धारणा को मार्क्स से भी आगे विस्तारित किया । वे उसे जीवन जीने के तरीके तक उठा देते हैं और साबित करते हैं कि इसी वजह से वह तार्किक आलोचना के विरोध में खड़ी हो जाती है । असल में उनकी समस्या समग्र विचारधारा की बजाय बुर्जुआ विचारधारा थी जिसके स्थान पर वे सर्वहारा विचारधारा को स्थापित करना चाहते थे । संस्कृति को प्रमुखता प्रदान करते हुए उन्होंने माना कि सत्ता पर कब्जे से पहले इस क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित करना आवश्यक है । वे मानते थे कि औद्योगिक देशों में कोई भी वर्ग अपने आर्थिक हितों के आधार पर अथवा केवल दमनात्मक तंत्र के सहारे सत्ता पर कब्जा नहीं कर सकता । इसकी जगह बुर्जुआ मूल्यों को चुनौती देने के लिए मजदूर वर्ग को अपनी सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करना होगा । इसी नाते वे पारम्परिक बौद्धिकों और आंगिक बौद्धिकों में अंतर करते थे । पारम्परिक बौद्धिक खुद को स्वायत्त समझते हैं लेकिन यथास्थिति के पक्षधर होते हैं जबकि आंगिक बौद्धिक खास सामाजिक तबकों के हितों को अभिव्यक्त करने के लिए उनके साथ गहराई से जुड़े होते हैं । कारण कि निम्न वर्ग अपने हितों को अच्छी तरह अभिव्यक्त नहीं कर पाते । इसलिए वैकल्पिक विचारधारा के निर्माण की जरूरत होती है ताकि वे बुर्जुआ वर्चस्व को चुनौती देना शुरू कर सकें ।

इसी मकसद से उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय सामूहिक विवेक के निर्माण की जरूरत बतायी और इसके लिए भिन्न भिन्न निम्नवर्गीय समूहों के ऐसे संश्रय की वकालत की जो मौजूदा वर्चस्व का सार्थक मुकाबला करने में उन्हें राजनीतिक रूप से सक्षम बनाये । प्रति वर्चस्व की स्थापना की इस लड़ाई का वर्णन करने के लिए उन्होंने सैन्य शब्दावली का इस्तेमाल किया । इसे चलायमान युद्ध की जगह उन्होंने मोर्चेबंदी का युद्ध कहा । इसके तहत दीर्घकालीन वैचारिक संघर्ष में मजदूर वर्ग अपनी पार्टी में संगठित आंगिक बौद्धिकों के निर्देशन में मौजूदा विचारधारा की जगह यथास्थिति को चुनौती देने वाली वैकल्पिक विश्वदृष्टि का वर्चस्व कायम करता है । इसकी जरुरत विकसित पूंजीवादी देशों और समाजों में खास तौर पर पड़ती है क्योंकि वहां शासक वर्ग का सांस्कृतिक और वैचारिक नियंत्रण अधिक गहरा और व्यापक होता है । रूस में इसकी जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि जार के पास राजसत्ता तो थी लेकिन समाज में सांस्कृतिक वर्चस्व नहीं था । इसी वजह से बोल्शेविक पार्टी ने सीधे चलायमान युद्ध में जारशाही को पलट दिया और सत्ता हथिया ली । विकसित पूंजीवादी समाजों में ऐसा तभी हो सकता है जब मोर्चेबंदी के युद्ध में मजदूर वर्ग विजयी हो जाए । ग्राम्शी के मुताबिक सरकारी सत्ता हासिल करने से पहले किसी भी सामाजिक समूह को बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व हासिल करना होता है । इस तरह ग्राम्शी ने भी अपने लेखन के जरिये पश्चिमी मार्क्सवाद को आर्थिक या भौतिक तत्व पर जोर देने के मुकाबले संस्कृति और विचारधारा पर अधिक ध्यान देने की राह सुझाई । सांस्कृतिक वर्चस्व की उनकी धारणा में यह बात शामिल है कि सत्ता संरचना को कायम रखने में संस्कृति संघटक का काम करती है । विचारधारा के निर्माण और बदलाव में उन्होंने बौद्धिकों की भूमिका को भारी महत्व दिया । सामाजिक बदलाव में वैचारिक और सांस्कृतिक संघर्ष का योगदान उन्होंने समझा ।

पश्चिमी मार्क्सवाद में इसके बाद फ़्रैंकफ़र्त स्कूल का स्थान महत्वपूर्ण है । यह नाम बौद्धिकों के एक समूह का है जो फ़्रैंकफ़र्त में 1923 में स्थापित इंस्टीच्यूट फ़ार सोशल रिसर्च से जुड़े थे । अडोर्नो, होर्खाइमर और मार्क्यूज इसके मशहूर अध्येता रहे । बेंजामिन स्कूल से तो नहीं जुड़े थे लेकिन उसके सदस्यों के साथ जरूर जुड़े थे । इसके सदस्यों ने मार्क्स के साथ हेगेल, फ़्रायड, नीत्शे और वेबर से भी प्रेरणा ग्रहण की । 1933 में हिटलर के उदय के साथ संस्थान बंद हो गया और उससे जुड़े बौद्धिकों ने अमेरिका में शरण ली । वहां उन्हें न्यू यार्क के कोलम्बिया विश्वविद्यालय से जुड़ने का मौका मिला । 1953 में अडोर्नो और होर्खाइमर लौटे और स्कूल की फिर से स्थापना की । नये दौर का सबसे महत्वपूर्ण नाम हैबरमास का है जो मार्क्सवाद से और भी दूर चले गये । हर्बर्ट मार्क्यूज जर्मनी नहीं लौटे और अमेरिका ही रहे । वहां साठ के दशक के नव वाम आंदोलन में उनका योगदान बहुत गहरा था । इस स्कूल ने पारम्परिक सिद्धांत के बरक्स आलोचना सिद्धांत का विकास किया । इनका कहना था कि पारम्परिक सिद्धांत में समाज को स्थिर मानकर उसका अध्ययन होता है इसलिए उससे यथास्थितिवाद को ही मजबूती मिलती है । इसके मुकाबले आलोचना सिद्धांत में समाज के प्रसुप्त अंतर्विरोधों को उजागर किया जाता है ताकि उसके बदलाव में मदद मिल सके । इस गवेषणा में खुद पर भी सवाल उठाये जाते हैं । इसके मुकाबले पारम्परिक सिद्धांत तटस्थता का दिखावा करता है । आलोचना सिद्धांत में अंतरअनुशासनिकता को जरूरी समझा गया । सामाजिक संरचनाओं की सांगोपांग आलोचना के लिए तमाम तरह की दृष्टि का समावेश आवश्यक महसूस हुआ । मानव स्थितियों की बेहतरी और मुक्ति के प्रति आलोचना सिद्धांत की निष्ठा घोषित थी । इसके लिए सतह की जगह अंतर्वर्ती अंतर्विरोधों को उजागर करना सही था ताकि बदलाव किसी बाहरी ताकत की जगह व्यवस्था के भीतर से पैदा हो । यह वही तरुण वाम हेगेलपंथ था जिसे मार्क्स ने बहुत पहले खारिज किया था । यांत्रिक तार्किकता की आलोचना भी इस स्कूल ने विकसित की जिसके मुताबिक वे मनुष्य समेत सब कुछ को प्रबंधनीय वस्तु समझे जाने का प्रतिकार करते थे । उनका मानना था कि इस तार्किकता का विकास प्रबोधन के दौरान प्रकृति को काबू करने के लिए किया गया था । बाद में यही सोच समूचे समाज पर नियंत्रण स्थापित करने के तरीके की खोज में बदल गयी । प्रबोधन के दौरान दुनिया को रहस्यों से आजाद करने की जो प्रक्रिया शुरू हुई थी उसने धार्मिक पाखंड से मनुष्य को मुक्त तो किया लेकिन बाद में वही नियंत्रण का माध्यम बन गयी । वस्तुनिष्ठता की प्रभुता कायम होने के बाद सब कुछ गणनीय वस्तुओं में बदल गया । उनका कहना था कि प्रबोधन को चिंतन की ऐसी प्रगति समझा गया जिसका मकसद मनुष्य को भय से मुक्त करना और उनका  स्वामित्व स्थापित करना था । इस तरह समूची धरती प्रबोधन की विजयी विध्वंसात्मकता से भर गयी । उनके अनुसार इस विजय यात्रा की चरम परिणति यूरोप में फ़ासीवादी सत्ता में हुई । पूंजीवादी समाजों में कुशलता और मुनाफ़े को सर्वोच्च स्थान देने के पीछे भी यही सोच काम करती है । इसके बाद मनुष्य उपभोक्ता मात्र रह जाता है और सामाजिक संबंध बाजार के लेनदेन के रिश्तों में बदल जाते हैं । इस तरह की सोच दुनिया के बारे में हमारी समझ को दरिद्र बना देती है और आलोचनात्मक चिंतन को समाप्त करके मुक्ति की सम्भावना को खत्म कर देती है । इसमें विचार का असर ऐतिहासिक घटनाक्रम पर निर्णायक हो जाता है ।

इस स्कूल के लोगों ने संस्कृति उद्योग की धारणा भी प्रस्तावित की । पूंजीवादी समाज में वे कलात्मक सृजन को मुनाफ़े की चाह के मातहत होता देखते हैं । इसके तहत मास संस्कृति पनपती है जिसमें जोर मानकीकरण पर होता है । ये सांस्कृतिक उत्पाद बाजार के नियमों के मुताबिक उत्पादित और वितरित होते हैं । फ़िल्म, टेलीविजन और संगीत की दुनिया में सृजन का उद्देश्य आलोचनात्मकता और रचनात्मकता की जगह मनोरंजन और तात्कालिक संतुष्टि होता है । इसके उपभोक्ताओं के भीतर छद्म आवश्यकता पैदा की जाती है ताकि वे नशे की लत की तरह इसका उपभोग करें । उपभोक्ताओं को लगातार आशा रहती है कि यह नहीं तो अगला उत्पाद उनको तुष्ट कर सकेगा । इस तरह का उपभोक्तावाद ही पूंजीवाद को कायम रखने का उपकरण बन जाता है । संस्कृति के ऐसे वस्तूकरण और मानकीकरण से सांस्कृतिक सर्वसम्मति तैयार होती है जिसके आधार पर मौजूदा सत्ता संरचना मजबूत होती है और आलोचनात्मक चिंतन को क्षति पहुंचती है । इसका सबसे खराब असर होता है कि मनुष्य यथास्थिति का पोषक बन जाता है । संस्कृति के इन उत्पादों के उपभोक्ता समर्पण पर आधारित समाज का निर्माण करते हैं ।  

फ़्रैंकफ़र्त स्कूल में मार्क्यूज का योगदान फ़्रायड के विचारों को मार्क्सवाद के साथ जोड़ने में निहित है । पूंजीवादी समाज की आलोचना के प्रसंग में उन्होंने इच्छा और दमन जैसी फ़्रायडीय धारणाओं का इस्तेमाल किया । उनका कहना था कि पूंजीवादी समाज में बुनियादी सामाजिक ढांचे के लिए आवश्यक इच्छाओं से अतिरिक्त सभी इच्छाओं का दमन किया जाता है । वे ऐसे दमनहीन समाज की कल्पना करते हैं जिसमें मनुष्य की अबाध इच्छा से उपजी रचनात्मकता और संतुष्टि पर श्रम और उत्पादकता का बोझ लदा हुआ न हो । ऐसा समाज इच्छा की दमनहीन उदात्तता के सहारे साकार किया जा सकता है । उनकी किताब वन डाइमेंशनल मैन ने यूरोप और अमेरिका में उनकी बौद्धिक छाप गहराई से अंकित कर दी । इसमें उन्होंने विकसित औद्योगिक समाजों  में मास मीडिया और उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव से मनुष्य के आलोचनात्मक प्रतिरोध की क्षमता के विनाश के साथ यथास्थिति के मौन स्वीकार की भयावहता को रेखांकित किया । उपभोक्ता संस्कृति के तहत झूठी जरूरतों के उत्पादन की बात भी उन्होंने उठायी जिसके कारण व्यक्ति इन उत्पादों को बिना सवाल किये ग्रहण करता जाता है । मार्क्यूज अपने विश्लेषण की आशाजनक विशेषता के कारण ही वामपंथी धारा के करीब माने जाते हैं ।

साफ है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल ने भी मार्क्सवाद के भीतर संस्कृति को महत्वपूर्ण स्थान दिया । मार्क्स ने वैचारिक ऊपरी ढांचे की भूमिका उत्पादन संबंधों की बुनियाद को कायम रखने में सहायक की समझी थी । पश्चिमी मार्क्सवादियों ने उसकी भूमिका को अधिक बढ़ाया । उनके सामने सवाल था कि क्रांति की भौतिक परिस्थिति पश्चिम में परिपक्व थी इसके बावजूद क्रांति नहीं हुई । इस सवाल का उत्तर उन्होंने वैचारिक ऊपरी ढांचे में खोजा और बताया । इस तरह उन्होंने वैचारिक क्षेत्र को प्रभाव डालने की भूमिका सौंपी । उन्होंने माना कि मीडिया और संस्थानों के जरिये प्रवाहित होने वाली वैचारिकी व्यक्ति की चेतना, मूल्यों और आचरण को इस तरह प्रभावित करती है कि यथास्थिति को मजबूती मिलती है और क्रांतिकारी बदलाव कुंद पड़ जाता है । इस नजरिये में संस्कृति बहुत हद तक बुनियादी आर्थिक ढांचे से स्वायत्त होकर काम करती नजर आती है । 

मार्क्यूज को छोड़कर फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के शेष विचारक सांस्कृतिक वर्चस्व पर विजय पाने की सम्भावना के बारे में बहुधा संशयग्रस्त दिखाई देते हैं । वे मानते लगते हैं कि सर्वव्यापी संस्कृति उद्योग और तज्जनित सामाजिक मान्यताओं के कारण आलोचनात्मक चेतना नहीं पैदा होती और इसी वजह से सामाजिक सुधार भी कुंठित हो जाते हैं । 

पश्चिमी मार्क्सवादियों में अल्थूसर का नाम भी महत्वपूर्ण है । उनका जन्म अल्जीरिया में हुआ था लेकिन माता-पिता फ़्रांसिसी थे । पेरिस के इकोल नार्मल में वे अध्यापक रहे । द्वितीय विश्वयुद्ध में फ़्रांसिसी सेना में शामिल हुए लेकिन जल्दी ही जर्मनी की सेना ने उन्हें कैद कर लिया । समूचे युद्ध के दौरान वे युद्धबंदी रहे । युद्ध के बाद उन्होंने फ़्रांसिसी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली लेकिन पार्टी के नेताओं के साथ हमेशा उनके मतभेद रहे । साठ के दशक में मार्क्स और उनके ग्रंथ ‘पूंजी’ पर लिखी दो किताबों की वजह से उनको काफी प्रसिद्धि मिली । उनको हमेशा मानसिक समस्याओं से जूझना पड़ा और 1980 में उन्होंने अपनी पत्नी की हत्या कर दी । पश्चिमी मार्क्सवाद में उस समय बड़े पैमाने पर मानववादी मार्क्स की तस्वीर गढ़ी जा रही थी । इसके लिए मार्क्स के आरम्भिक लेखन का ही आधार ग्रहण किया जाता था जिसमें पूंजीवाद द्वारा थोपे गये अलगाव से मनुष्य की मुक्ति पर जोर दिया गया था । इसका खंडन करने के लिए अल्थूसर ने मार्क्स के लेखन को दो हिस्सों में बांटकर देखने की हिमायत की । उन्होंने मार्क्स का शुरुआती लेखन हेगेल से गहरे प्रभावित माना । फिर जर्मन विचारधारा के बाद मार्क्स के लेखन में उन्होंने निर्णायक बदलाव देखा । इस बाद वाले दौर में मार्क्स ने सामाजिक संरचनाओं की गहन वैज्ञानिक परीक्षा पर जोर दिया । जिसे अल्थूसर ने वैज्ञानिक कहा उसका अर्थ आनुभविक सर्वेक्षण की जगह पद्धतिवैज्ञानिक विश्लेषणात्मक गवेषणा था । उनका कहना था कि मार्क्स ने समाज को उसके अर्थतंत्र, वर्ग संबंध और राजसत्ता जैसे घटक अंगों में विश्लेषित किया और कहा कि किसी एक घटक में होने वाला बदलाव समूची सामाजिक संरचना में ही बदलाव का कारण बन जाता है । इस तरह उन्होंने मार्क्स को अपने समान ही संरचनावादी बना डाला । उनकी सोच ऐतिहासिक भौतिकवाद से काफी दूर चली गयी । उन्होंने अर्थतंत्र के साथ ऊपरी ढांचों को बहुत हद तक स्वायत्त बना डाला और उनके विकास क्रम में भी भिन्नता की वकालत की ।

इसके समर्थन में उन्होंने जोसेफ ब्लाख को 1890 में लिखी एंगेल्स की चिट्ठी का हवाला दिया जिसमें उन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं के निर्धारण में आर्थिक कारक की भूमिका को लेकर स्पष्टीकरण दिया था । अल्थूसर इसे ऐतिहासिक भौतिकवाद में मौजूद अपघटन का विरोधी कहकर इसका स्वागत करते हैं । उन्होंने संरचनाओं को अतिनिर्धारित कहा जिसका अर्थ सरल कार्य-कारण की जगह अनेक तत्वों की आपसी अंत:क्रिया है । इस मामले में वे कानून, संस्कृति और राजनीति को ऐतिहासिक बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते देखते हैं । इसमें किसी एक तत्व की निर्णायक भूमिका को वे तयशुदा नहीं मानते बल्कि ऐतिहासिक परिस्थिति के अनुरूप उनके महत्व में तुलनात्मक अंतर महसूस करते हैं । इन संरचनाओं के विश्लेषण में वे संरचनाओं पर ही ध्यान केंद्रित रखने की वकालत करते हैं । वे व्यक्तियों को सामाजिक प्रक्रियाओं के कर्ता की तरह देखने की जगह उन्हें सामाजिक संरचनाओं का सह उत्पाद समझते हैं । ये व्यक्ति अपनी भूमिका विचारधारा के आधार पर तय करते हैं । उनकी नजर में विचारधारा ऐसी ताकत है जो व्यक्तियों को आर्थिक संरचना की जरूरत के मुताबिक ढालती है । इसीलिए उनका कहना था कि शासक वर्ग दमनात्मक राज्य उपकरणों के साथ ही वैचारिक राज्य उपकरणों का भी इस्तेमाल करता है । शिक्षा, मीडिया और नागरिक संगठन जैसे ये वैचारिक उपकरण मौजूदा समाजार्थिक संबंधों को कायम रखते हैं ।