Tuesday, January 10, 2023

कोरोना के दूरगामी प्रभाव

 

         

                            

कोरोना की तीसरी लहर के चीन में फूट पड़ने की अफवाहों के बीच समूची दुनिया के साथ हमारे देश की साँस भी अटक गयी । संयोग से चीन के प्रतिवाद के साथ ही हमारे देश में भी इसके राजनीतिक पहलू को उजागर किया गया । असल में पहली लहर में यूरोप और अमेरिका तथा ब्राजील और दूसरी लहर ने भारत में जैसी भारी तबाही मचायी थी उसके चलते इसका नाम सुनते ही लोगों के प्राण सूख गये । सहसा निर्मम लाकडाउन से लेकर अस्पतालों और श्मशानों की मारामारी के भयावह चित्र याददाश्त में ताजा हो आये । शासकों की इस क्रूर लापरवाही की बात छोड़ दें तो भी इस महामारी के घटिया राजनीतिक इस्तेमाल का इतिहास जानना हमारे वर्तमान समय को समझने के लिए अत्यंत जरूरी है । तब के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे चीनी बीमारी कहा था । उनके इस रुख के कारण अमेरिका के वासी चीनियों के लिए बहुत भारी दिक्कत पैदा हो गयी थी । हमारे देश में भी ठेले पर फल बेचनेवालों से लेकर तबलीग के लोगों तक की बदनामी की कोशिशों में राजनीतिक पहलू देखना मुश्किल नहीं होना चाहिए ।

इन सबके साथ ही यह भी याद रखना होगा कि टीके लगाने के मामले में भी पर्याप्त राजनीति हुई थी । शुरू में टीके के निर्माताओं ने खूब मुनाफा कमाया । टीके की उपलब्धता भी प्रांतों की सरकारों के राजनीतिक रंग के हिसाब से थी । जब टीका मुफ़्त लगने लगा तो देश भर में उसे प्रधानमंत्री की कृपा के रूप में प्रचारित किया गया । दुनिया में सबसे अधिक टीका लगाने का कीर्तिमान बनाने का दावा उसी तरह था जैसे सबसे ऊंची मूर्ति लगाने का तमगा हासिल करने की होड़ थी । फिलहाल उस टीके के दुष्प्रभावों पर भी बात शुरू हो गयी है । देश के आत्ममुग्ध शासक का झंडा सबसे ऊपर फहराने के चक्कर में मृतकों को भी टीके के प्रमाणपत्र जारी किये गये । उस समय जो हुआ उसका सबसे भयावह रूप लाशों का अपमान था । गंगा का शववाहिनी रूप तो गुजराती कवयित्री पारुल खक्कर ने भी पहचाना और दर्ज किया था । लाभ लोभ के पुजारियों ने लाशों को ढोने का किराया तो मनमाना वसूल किया ही, उनके कपड़ों को ठीक करके बाजार में दुबारा बेचने का किस्सा भी सामने आया । जन प्रतिनिधियों तक ने इस अमानवीय भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हाथ धोये । जो निजी अस्पताल उनके काले धन को सफेद करने के तहत खोले गये हैं उन्होंने महामारी में अकूत कमाई की । अचरज नहीं कि पूंजीवाद के नरभक्षी स्वरूप का हवाला देते हुए राधिका देसाई ने 2023 में प्रकाशित अपनी किताब ‘कैपिटलिज्म, कोरोनावायरस ऐंड वार: ए जियोपोलिटिकल इकोनामी’ में हालिया यूक्रेन युद्ध के साथ कोरोना को भी सबूत के बतौर गिनाया है । इसके प्रकट होते ही युवल नोआ हरारी ने निजता के हनन की आशंका जतायी थी । ध्यान रखना चाहिए कि कोरोना के दौरान सरकारों ने जो कुछ भी किया उसकी पृष्ठभूमि पहले ही तैयार हो चुकी थी । शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल मंचों का इस्तेमाल शुरू हो चुका था । सामाजिक दूरी तो बहरहाल हमारे समाज का बहुत ही पुराना और क्रूर सच रहा है ।

कोरोना के समय जो भी उपाय सरकारों ने आजमाये उनमें पारम्परिक सामाजिक पदानुक्रम घटने की जगह और मजबूत हुआ । इस पहलू को उजागर करते हुए 2022 में एडिनबरा यूनिवर्सिटी प्रेस से जान माइकेल राबर्ट्स की किताब ‘डिजिटल, क्लास, वर्क: बिफ़ोर ऐंड ड्यूरिंग कोविड-19’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि 2019 के अंत में चीन में एक रहस्यमय विषाणु के फैलने की खबर मिलने लगी थी । अगले माह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे दुनिया के लिए खतरनाक घोषित कर दिया । कुछ ही महीनों में यह दुनिया भर में फैल गया और असंख्य लोगों की मौत की वजह बना । इसे जल्दी ही वैश्विक महामारी घोषित कर दिया गया । सार्स और मेर्स जैसे पूर्वजों के मुकाबले इसमें कुछ नयी बातें थीं । इसका संक्रमण बिना किसी लक्षण के भी हो सकता था । दिल को प्रभावित और नुकसान पहुंचाने की क्षमता इसमें थी । इस पर कड़ी खोल होने के कारण यह शरीर में लम्बे दिनों तक सुरक्षित रह सकता था । अलावे इसने सामाजिक आचरण को भी बुनियादी रूप से बदला है । तकनीक, श्रमिक और काम में ये बदलाव सबसे अधिक प्रत्यक्ष हैं । बड़ी आबादी ने घर से काम करना शुरू किया । इससे कामगार के साथ ही नियोक्ता को भी लाभ हुआ । कामगारों का श्रम संबंधी तनाव बहुत अधिक हो गया । घर से काम के चलते काम के घंटे बेतरह बढ़ गये । कार्यालय से जुड़ी बैठकें लगभग आम बात हो गयीं और ईमेलों की आवाजाही में खासी बढ़त दर्ज की गयी । इसके भी समाजार्थिक पहलू नजर आये । घर से काम करनेवालों में मध्यवर्गीय कर्मचारी अधिक थे । कोरोना के खात्मे के बाद भी घर से काम करने की परिघटना कुछ हद तक जारी है । यह भी मजदूरों के मुकाबले कर्मचारियों के साथ अधिक हो रहा है । घर से काम करनेवालों की बहुतायत भी अमीर इलाकों में ही थी । गरीब बस्तियों के मजदूरों को खुद को खतरे में डालकर भी मेहनत के काम करने पड़े । आखिर हाथ से बोझ उठाने वाले मजदूर तो वर्क फ़्राम होम की अय्याशी नहीं पा सकते! इसी पहलू का अध्ययन इस किताब में किया गया है । डिजिटल श्रम के इस सामाजिक आयाम का विश्लेषण करना इसका घोषित मकसद है ।    

कोरोना को टीके के सहारे समाप्त करने की आशा पर हालिया अफवाह ने पानी फेर दिया है । जिन लोगों को उसका संक्रमण हुआ था उनमें सेहत की समस्याओं के बने रहने को देखते हुए नये तरीके से सोचने की जरूरत पड़ रही है । अभी 2023 में विली ब्लैकवेल से डान गोल्डेनबेर्ग और मार्क डिक्टर की किताब ‘अनरावेलिंग लांग कोविड’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना हालिया कोरोना महामारी के प्रसंग में दिखायी पड़ा कि शुरुआती संक्रमण की समाप्ति के बाद भी बहुतेरे मरीजों में इसके लक्षण लम्बे समय तक बने रहे । जो मरीज अस्पताल में भर्ती हुए उनमें से अधिकतर को ये लक्षण महीनों बने रहे । ये लक्षण उनमें भी बने रहे जो हल्के बुखार तक ही या बिना किसी लक्षण के संक्रमित हुए थे । अनुमान लगाया जा रहा है कि इन लक्षणों से निपटना भविष्य के सेहत संबंधी उपायों के लिए बड़ी चुनौती होगी । फिलहाल तो इस परेशानी को ठीक से समझा भी नहीं जा सका है ।

कोरोना के समय हमारे देश की सरकार ने जो निर्देश जारी किये उसे आम तौर पर लोगों ने लाख दिक्कतों के बावजूद मान लिया था लेकिन एकाधिक देशों में नागरिकों ने इतने बड़े पैमाने पर सरकारी हस्तक्षेप की कानूनी वैधता पर सवाल उठाये थे । इस सिलसिले में 2022 में रटलेज से जोएल ग्रोगन और एलिस डोनाल्ड के संपादन में ‘रटलेज हैंडबुक आफ़ ला ऐंड द कोविड-19 पैंडेमिक’ का प्रकाशन हुआ । माइकेल ओ’फ़्लाहेर्ती ने इस किताब की प्रस्तावना लिखी है । संपादकों की भूमिका और अंतिम लेख के अतिरिक्त इस किताब में सैंतीस लेख संकलित हैं । इन्हें कुल पांच हिस्सों में संयोजित किया गया है । पहले में शासन और लोकतंत्र, दूसरे में मानवाधिकार, तीसरे में कानून का राज, चौथे में विज्ञान, भरोसा और निर्णय प्रक्रिया तथा आखिरी पांचवें हिस्से में आपात स्थिति से जुड़े लेखों के साथ आखिरी लेख में कोरोना के बाद की सम्भावना पर विचार किया गया है । कानून पर केंद्रित होने के बावजूद संपादकों ने कोरोना के दौरान उद्घाटित समाजार्थिक विषमताओं के जिक्र से बात शुरू की है । ये विषमताएं गहरे जड़ जमाये हुई थीं । नजर आया कि महामारी का लाभ उठाकर बहुतेरी सरकारों ने नागरिकों के अधिकारों और आजादी पर हमला किया । आर्थिक बोझ पड़ते ही कल्याणकारी मदों में सबसे पहले कटौती की गयी । कहने की जरूरत नहीं कि इसका नुकसान सबसे अधिक समाज के कमजोर तबकों पर पड़ा ।             

यह महामारी जिन व्यापक परिघटनाओं से जुड़ी है उनकी विवेचना हेतु 2022 में स्प्रिंगेर से मोहम्मद असलम खान की किताब ‘सिटीज ऐंड मेगा रिस्क्स: कोविड-19 ऐंड क्लाइमेट चेंज’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि कोरोना जैसी महामारी और जलवायु परिववर्तन महानगरों की समस्याओं के बतौर सामने आये हैं । कोरोना ने खासकर काम को कार्यस्थल तक सीमित रखने की जगह उसे घरों तक पहुंचा दिया, समाजीकरण की प्रक्रिया को बहुत दिनों के लिए बाधित कर दिया, शिक्षा प्रदान और ग्रहण करने की पद्धति में बुनियादी बदलाव लाया तथा मनोरंजन, व्यवसाय और व्यायाम की सार्वजनिक व्यवस्था तहस नहस हो गयी । इस अनुभव से लाभ उठाकर नये तरीके से सोचने की जरूरत पैदा हो गयी है क्योंकि न तो महानगर कम होने जा रहे हैं और न ही कोरोना जैसी महामारियों का खात्मा होने जा रहा है । असल में कोरोना का गहरा रिश्ता वर्तमान जलवायु परिवर्तन से है जिसके पारिस्थिकीय और समाजार्थिक पहलू प्रकट हो रहे हैं । समझ में आता जा रहा है कि मनुष्य, मानवेतर प्राणी जगत और इस धरती की सेहत एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं । एक को नुकसान होने से शेष भी स्वस्थ नहीं रह सकते ।      

इस दौरान आपदा में जिस तरह मुट्ठी भर लोगों ने अवसर की तलाश की उसे खोलते हुए 2022 में वन सिगनल पब्लिशर्स से जे डेविड मैकस्वेन की किताब ‘पैंडेमिक, इंक: चेजिंग द कैपिटलिस्ट्स ऐंड थीव्स हू गाट रिच ह्वाइल वी गाट सिक’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि किताब में वर्णित कहानियों को जानकर पाठक को यकीन नहीं होगा लेकिन सच यही है कि जब लोग कीड़ों-मकोड़ों की तरह मौत के मुंह में समा रहे थे तो चंद थैलीशाहों को अपने मुनाफ़े की चिंता लगी हुई थी । यह सब पूरी तरह से अस्वीकार्य था लेकिन इसे जानना जरूरी है ताकि हमारे सिर पर सवार उस मशीन की कार्यपद्धति का परिचय मिले जो देश की बुरी हालत के लिए जिम्मेदार है । उस मशीन को लेखक ने पूंजीवाद का नाम दिया है और प्रचंड लोभ को उसका सह उत्पाद बताया है । हालत यह थी कि लोग मर रहे थे और लुटेरे खुलेआम डाका डाल रहे थे । विडम्बना थी कि आम लोग इस हालत पर क्षुब्ध होने के अलावे कुछ कर नहीं पा रहे थे । इन कहानियों को बयान करने का मकसद यह है कि भविष्य में ऐसी आपदा के आने पर कुछ बेहतर प्रबंध की प्ररणा मिल सके ।           

बताने की जरूरत नहीं कि जिन देशों में धुर दक्षिणपंथी तानाशाहों का शासन था वहीं जनता को इस महामारी की सबसे बुरी मार झेलनी पड़ी । इसकी बड़ी वजह उन शासकों का महत्वोन्माद भी था । उन्होंने प्रकृति की ताकत को अपनी ताकत से अधिक मानने से इनकार किया और सेहत तथा सुरक्षा के इंतजामात करने में घातक लापरवाही की । इनमें से एक उन्मादी ट्रम्प को इस उपेक्षा की कीमत चुनावी पराजय के रूप में अदा करनी पड़ी । कोरोना के दौरान अमेरिका के हालात के बारे में 2022 में हेमार्केट बुक्स से रे लिन बार्न्स, केरी लेइ मेरिट और योहुरू विलियम्स के संपादन में ‘आफ़्टर लाइफ़: ए कलेक्टिव हिस्ट्री आफ़ लास ऐंड रिडेम्पशन इन पैंडेमिक अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ है । ट्रम्प के साथ के एक अन्य शासक, बोलसोनारो को भी ब्राजील में पराजय का मुख देखना पड़ा । इन दोनों के आचरण की समानता न केवल कोरोना के समय की लापरवाही और उसके चलते चुनावी हार में दिखायी दी बल्कि ब्राजील के हालिया घटनाक्रम में उनकी प्रतिक्रिया की समानता भी ट्रम्प के आचरण के साथ देखी जा रही है । इन दोनों के तीसरे दोस्त अभी काबिज तो हैं लेकिन उनके बारे में भी कयास है कि चुनावी पराजय अगर हुई तो अपने दोस्तों की तरह ही आचरण कर सकते हैं । इन तीनों के बीच एक और समानता देखी जा रही है कि इन सबके साथ फ़ासीवाद की वापसी की सम्भावना जुड़ी हुई है । लोकतंत्र की स्थापित संस्थाओं और परम्पराओं को इन सबने तार तार कर दिया है । ऐसा करते हुए भी उन्होंने इसका मुखौटा बरकरार रखा है । उनके इस आचरण से साबित हुआ कि व्यापक जनता में लोकतंत्र की चाहत बहुत ही अधिक है । इसके कारण ये शासक उसको नोच फेंकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं । इस लोकतंत्र की हिफ़ाजत करने और उसे समृद्ध करने की जरूरत इस समय बेतरह बढ़ गयी है । इस जरूरी काम को फिलहाल वामपंथी ताकतें ही अंजाम दे सकती हैं ।  

इन सभी कहानियों को याद रखना जरूरी है ताकि पता रहे कि आपदा जनित यह सब असामान्यता हमारे जीवन में स्वाभाविक नहीं थी बल्कि आपदा का लाभ उठाते हुए इसका प्रवेश कराया गया है । सर्वसुलभ जनस्वास्थ्य की प्रभावी व्यवस्था को पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष का एक जरूरी पहलू बनाने के लिए भी इसे याद रखना बेहद आवश्यक है । इसे भी याद रखना होगा कि स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण ने इस महामारी को और भी घातक बनाने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी । अंग्रेजी राज के दौरान देश की आजादी के लिए संघर्षरत नेताओं और बौद्धिकों ने जिस तरह अकाल को प्राकृतिक आपदा मानने के विरोध में तर्क देते हुए साबित किया था कि इसे तत्कालीन शासन के कारनामों ने भयावह बनाया । उसी तरह कोरोना की आपदा में भी शासकीय कुप्रबंध ने भारी भूमिका निभायी । जिस तरह दीर्घकालीन कुपोषण से मामूली बुखार भी जानलेवा हो जाता है उसी तरह जनता की सेहत संबंधी देखरेख की व्यवस्था को मुनाफ़े के पूंजीवादी तर्क के हवाले कर देने से कोरोना संक्रमण दुनिया भर में ऐसी तबाही मचाने में सक्षम हुआ । कोरोना के जमाने में जिन ताकतों ने लाशों पर लाभ कमाया वे उसकी समाप्ति के बाद भी पूर्ववत अपने काम में लिप्त हैं । सरकार भी सार्वजनिक और निजी भागीदारी का नमूना पेश करते हुए अपनी नीतियों से उनकी मदद लगातार कर रही है । कोरोना के दौरान उच्च शिक्षा संस्थानों के बंद रहने से सरकार को पर्याप्त चैन मिला था क्योंकि विद्यार्थियों के आंदोलन न के बराबर हो रहे थे । इस तात्कालिक चैन को स्थायी करने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में कमाई के केंद्रीय संस्थान खोल दिये गये हैं और नयी शिक्षा नीति के नाम पर तमाम बुनियादी बदलाव किये जा रहे हैं । इन सभी बदलावों से उन समुदायों को शिक्षा से बाहर धकेला जा रहा है जिन वंचित समुदायों ने शिक्षा को सामाजिक उन्नयन का रास्ता मानकर बड़े पैमाने पर दाखिला लिया था ।

हमारे समय में तकनीक बड़ी ताकत बनकर उभरी है । जिस तकनीक को सबके लिए समावेशी होना चाहिए था वही सामाजिक बहिष्करण का माध्यम बन गयी है । कोरोना के दौरान जिनके घरों में इंटरनेट की सुविधा या आधुनिक महंगे फोन नहीं थे वे प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक से वंचित ही रहे । यहां तक कि कोरोना काल में विकसित निजी जीवन में शासकीय हस्तक्षेप की आपातकालीन संस्कृति को बहुत कुछ स्थायी बनाने का भी व्यवस्थित प्रयास जारी है । जनता का सामान्य जीवन जितना ही अधिक तकनीक के सम्पर्क में आता जायेगा उतना ही अधिक उसे नियंत्रित करने के सरकारी प्रयास भी तेज होंगे । इसके लाभ सीधे सीधे शासन में मौजूद ताकतों को मिल रहे हैं । निजता की रक्षा भी आगामी समय में लोकतांत्रिक जीवन का एक जरूरी मुद्दा बनेगा । कोरोना ने सचमुच ऐसे समय की शुरुआत कर दी है जब न केवल फ़ासीवाद के पुनरागमन के बतौर तानाशाही के नये रूप प्रकट हो रहे हैं बल्कि उससे जूझते हुए सामाजिक आंदोलनों को भी लोकतंत्र के नये आयाम गढ़ने के अवसर मिल रहे हैं ।                           

                       

Tuesday, December 20, 2022

शीतयुद्ध की वापसी

 

                

                           

हाल में ही खबर आयी कि इंडोनेशिया में मार्क्सवाद को गैरकानूनी बना दिया गया है । सरकार के इस कदम के विरोध में वाम प्रकाशकों ने मुहिम चलायी । इसके बावजूद आशंका बनी कि ऐसे ही कदम अन्य तमाम मुल्कों में भी उठाये जा सकते हैं । इस खबर से दोनों विश्वयुद्धों के बीच के माहौल की याद हो आयी जब समाजवाद के विरुद्ध असली हथियारबंद लड़ाई की जगह पर वैचारिक लड़ाई दुनिया भर में लड़ी गयी थी । अमेरिका के नेतृत्व में संचालित इस अभियान में लगभग सभी पूंजीवादी शासन वाले देशों में वामपंथी बौद्धिकों को हाशिये पर डाला गया । असली युद्ध न होने के बावजूद अमेरिका और रूस, दोनों देशों में युद्ध की तैयारी हमेशा जारी रहती थी । संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का कामकाज इनकी तनातनी के चलते गतिरोध का शिकार हो जाता था । माना जाता था कि इस वैश्विक खेमेबंदी के चलते बहुत नुकसान हो रहा है । जब नब्बे के दशक में सोवियत संघ का पराभव हुआ तो इसे शीतयुद्ध की समाप्ति मानकर खुशी जाहिर की गयी । ऐसी उम्मीद थी कि हथियारों का जखीरा एकत्र करने में जो संसाधन लगाये जा रहे हैं उनका निवेश अब जनकल्याण के लिए होगा । जिस आशा के साथ यह खुशी जाहिर की गयी थी वह कपूर की तरह जल्दी ही बिला गयी । अचरज की तरह शीतयुद्ध की जगह गर्मयुद्ध ने ले ली और एकाधिक शक्ति केंद्रों के रहने से कायम शक्ति संतुलन तिनके के महल की तरह बिखर गया । एक ही शक्ति केंद्र के बतौर अमेरिका रह गया जिसकी साम्राज्यी महत्वाकांक्षा खुलकर प्रत्यक्ष होने लगी । एकाधिक देशों के साथ धौंस धमकी का निर्लज्ज अमेरिकी बरताव रोज रोज की बात हो गया ।     

लैटिन अमेरिका के देश तो हमेशा ही अमेरिकी हस्तक्षेप का शिकार होते रहे थे । अब हस्तक्षेप का विस्तार मध्य पूर्व तक हुआ । इस प्रसंग में इराक की लड़ाई तो पूरी तरह से अमेरिकी साम्राज्यवाद का मुजाहिरा थी जब किसी देश के भीतर घुसकर उसके शासक को फांसी दे दी गयी । उस अपराध में अमेरिका ने इंग्लैंड समेत तमाम देशों को भागीदार बनाया । युद्ध की बात हो तो सबसे हालिया युद्ध के जिक्र से बचना मुश्किल है । विगत कुछ महीनों से यूक्रेन में युद्ध जारी है । रूस का तर्क है कि यूक्रेन को नाटो में शामिल करके पश्चिमी देश उसके दरवाजे तक पहुंच जाना चाहते हैं और इससे उसकी सीमा की रक्षा को खतरा पैदा हो गया है । रूस के विरोधियों का तर्क है कि पुतिन ने ज़ारशाही के जमाने के रूसी साम्राज्य की स्थापना की खातिर यह युद्ध छेड़ा है । इन परस्पर विरोधी तर्कों से अलग किस्म की एक परिघटना देखने में आयी है जिसके बारे में अभी कम ध्यान दिया गया है । हाल में रटलेज से कास्पर रेकावेक की किताब ‘फ़ारेन फ़ाइटर्स इन यूक्रेन: द ब्राउन-रेड काकटेल’ का प्रकाशन हुआ । किताब ऐसे योद्धाओं से साक्षात्कार पर आधारित है जो विदेशों से यूक्रेन में रूस से लड़ने के लिए गये हैं । ये विदेशी योद्धा किसी दक्षिणपंथी अंतर्राष्ट्रीय संजाल के अंग हैं । इस प्रवृत्ति से पश्चिमी देशों के राजनेताओं को भी चिंता हो रही है । इस तरह के तमाम दक्षिणपंथी आतंकी समूह तमाम देशों में राजनीतिक अस्थिरता के स्रोत बनते जा रहे हैं । इस सिलसिले में याद दिलाने की जरूरत नहीं कि अफ़गानिस्तान में रूसी दखल से लड़ने के लिए जिस पुनरुत्थानवादी प्रवृत्ति को हवा दी गयी उसने बाद में भस्मासुर की भूमिका निभायी ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हिटलर की पराजय में सोवियत संघ की निर्णायक भूमिका के कारण उसकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ी लेकिन क्रांति के समय से ही उसके विरोध में जो वैचारिक और व्यावहारिक अभियान पश्चिमी देशों ने चलाया हुआ था उसे उन्होंने तनिक भी मद्धिम नहीं पड़ने दिया । एक हद तक इस अभियान ने भी सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के शासन के बिखरने में मदद की । सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर अमेरिका ने युद्धोत्तर दुनिया में अपनी बरतरी का दावा पेश किया था । इसी तरह ब्रेटन वुड्स की संस्थाओं की मार्फत उसने विश्व अर्थतंत्र को भी अपने लाभ के हिसाब से नियंत्रित करने की योजना बनायी । सोवियत संघ का पतन उसके लिए इतनी भारी सफलता थी कि फ़ुकुयामा ने इतिहास के ही अंत की घोषणा कर डाली थी । इतिहास का अंत तो क्या होता नये जमाने की लड़ाइयों को जायज ठहराने के लिए सभ्यताओं के बीच टकराव का बहाना बनाया गया ।

फिलहाल शीतयुद्ध की वापसी के जो संकेत सुने जा रहे हैं उनका विश्वव्यापी वैचारिक पहलू तो है ही, ठोस रूप से चीन के साथ जारी टकराव की निरंतरता भी है । इस संघर्ष में युद्ध के नये नये रूप अपनाये जा रहे हैं । क्यूबा के साथ लड़ाई के लिए व्यापार प्रतिबंध का जो तरीका आजमाया जाता रहा है उसकी अमानवीयता को इराक में पूरी दुनिया ने देखा जब दवाओं के अभाव में बच्चों तक को जान से हाथ धोना पड़ा था । चीन के साथ टकराव में भी इसी तरह के तमाम उपाय किये जा रहे हैं जिससे उसे आर्थिक रूप से अशक्त बनाकर झुकाया जा सके । लगातार जारी इस टकराव की बानगी हाल में छपी कुछ किताबों से मिल सकती है । बताते चलें कि नवउदारवाद के साथ आये वैश्वीकरण को अब पश्चिमी देश ही धता बता रहे हैं और उन देशों में संकीर्ण तथा नफ़रती राष्ट्रवाद का बड़े पैमाने पर उभार हुआ है । इसके मुकाबले चीन ने आर्थिक मोर्चे पर वैश्वीकरण का खूब लाभ लिया हालांकि इसके कारण उसके अर्थतंत्र और समाज में समस्याओं की बाढ़ आ गयी । फिलहाल यह होड़ अत्यंत नाजुक दौर में पहुंच गयी है । हाल में सिमोन & शूस्टर से प्रकाशित क्रिस्टोफर मिलर की किताब ‘चिप वार: द फ़ाइट फ़ार द वर्ल्ड’स मोस्ट क्रिटिकल टेकनोलाजी’ से इस संघर्ष के नये मोर्चों की एक झलक मिल सकती है ।

इसी तरह से व्यापार युद्ध भी लड़ाई का एक नया मोर्चा है । इस मसले पर राहुल नाथ चौधरी के संपादन में ‘द चाइना-यू एस ट्रेड वार ऐंड साउथ एशियन इकोनामीज’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना और उपसंहार के अतिरिक्त किताब के बारह लेख चार हिस्सों में संयोजित हैं । पहले हिस्से के लेखों में चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध के वैश्विक आर्थिक असर, दूसरे में क्षेत्रीय अर्थतंत्र की सम्भावना, तीसरे में हिस्से में वरीयता प्राप्त सहभागियों के लाभ और आखिरी चौथे हिस्से में तकनीकी श्रेष्ठता से जुड़े लेख शामिल किये गये हैं । इसी प्रसंग में  ट्राइकान्टिनेन्टल से विजय प्रसाद की प्रस्तावना के साथ ‘द यूनाइटेड स्टेट्स इज वेजिंग ए न्यू कोल्ड वार: ए सोशलिस्ट पर्सपेक्टिव’ का प्रकाशन हुआ । इसमें जान बेलामी फ़ास्टर, जान रास और डेबोरा वेनेज़ियाले के लेख शामिल हैं । विजय प्रसाद का कहना है कि विश्व आर्थिक मंच की हालिया बैठक में हेनरी किसिंजर ने कहा कि यूक्रेन में रूस के लिए संतोषजनक संधि का प्रयास करना होगा । उनके अनुसार अब लड़ाई यूक्रेन की आजादी की नहीं बल्कि रूस के विरुद्ध हो गयी है । अधिकतर राजनयिकों के विरोध के बावजूद किसिंजर ने नये शीतयुद्ध की सम्भावना पर आपत्ति प्रकट की । विजय प्रसाद का मत है कि अमेरिका में दूरगामी लाभ के लिए तात्कालिक नुकसान का बुरा नहीं माना जाता । शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद से ही अमेरिकी शासनतंत्र अपने मुल्क की बरतरी की वकालत करता रहा है और इसके लिए तमाम खतरों को उठाने में परहेज नहीं बरतता । साफ है कि लाभ मुट्ठी भर लोगों को होता है और नुकसान साधारण लोगों को उठाना पड़ता है । इराक के तेल पर धन्नासेठों के एकाधिकार के लिए निम्न वर्ग से भरती सैनिकों के बलिदान को ही उनकी देशसेवा माना जाता है । इसी सोच के चलते मनुष्यता के सम्मान और प्रकृति के दीर्घजीवन की परवाह नहीं की जाती । फिलहाल रूस और चीन के विरुद्ध युद्धोन्माद के पीछे यही सोच काम कर रही है ।

माइकेल हडसन की किताब ‘द डेस्टिनी आफ़ सिविलाइजेशन: फ़ाइनैन्स कैपिटलिज्म, इंडस्ट्रियल कैपिटलिज्म आर सोशलिज्म’ इस मामले में और भी नये पहलुओं को उभारती है । उनका कहना है कि विश्व अर्थतंत्र के सबसे बड़े तनाव का कारण फिलहाल का अमेरिकी वर्चस्व है । दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सभी वैश्विक आर्थिक निकायों की नीतियों को अमेरिकी राजनय ही आकार देता रहा है । शीतयुद्ध में सोवियत संघ की पराजय के बाद तो उसकी ताकत आसमान चूमने लगी है । सोवियत संघ के खात्मे के बाद के बीस सालों में आक्रामक सैन्य पहलों द्वारा उसने अपनी ताकत को सुदृढ़ किया है । 2008 के बाद इसकी आक्रामकता आत्मघाती होती जा रही है । तमाम देश उसके घेरे से बाहर निकलने लगे हैं । इसके कारण अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद दूसरे देशों की आय और संपत्ति हथियाकर अपनी ताकत को बुलंद रखने की उसकी क्षमता घटती जा रही है । दुनिया के स्तर पर उसका टकराव अब चीन के साथ हो रहा है । लेखक ने इस टकराव को अर्थव्यस्था के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय रूपांतरण की प्रक्रिया के रूप में चित्रित किया है । इस टकराव को केवल दो आर्थिक महाशतियों की होड़ के बतौर समझना वे सही नहीं मानते । यह दो राजनीतिक आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच का टकराव है । ये दोनों समाजवादी और पूंजीवादी नहीं हैं बल्कि यह टकराव औद्योगिक अर्थतंत्र और किरायाजीवी वित्तीय तंत्र के बीच का टकराव बन गया है । हडसन के अनुसार अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशी सहायता और अपने अर्थतंत्र के हित में दूसरे देशों के शोषण पर निर्भर रह गयी है ।

हमारा यह समय इतिहास की नजर से नयी सहस्राब्दी में प्रवेश का समय है । इसमें न केवल राजनीतिक बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी पुराने टकराव नयी शक्ल में सामने आ रहे हैं । फ़्रांसिसी क्रांति ने दुनिया के पैमाने पर बादशाहत के खात्मे के जिस युग का आगाज किया था उस पर अब तक का सबसे बड़ा संकट आया है । पूरी दुनिया में तानाशाहों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है और लोकतंत्र को बचाने तथा नये सिरे से गढ़ने की लड़ाई नये दौर में पहुंच गयी है । वैश्विक पूंजी ने सत्ता के साथ मिलकर जनता के जीवन और अधिकारों पर हमला बोल दिया है । हालिया महामारी इसका केवल एक रूप थी । प्रकृति और पर्यावरण के दोहन से मानव प्रजाति के जीने लायक हालात मुश्किल होते जा रहे हैं । शोषण और दमन के नवीन हथियारों को आजमाने का यह समय वैचारिक मोर्चे पर भी गहन युद्ध के संकेत लेकर आ रहा है । शिक्षा की प्रबल भूख के समय ही सामान्य लोगों को उससे वंचित किया जा रहा है । इस अंधेरे दौर में खुशी की बात यह है कि लोगों ने पूरी तरह समर्पण नहीं किया है । इस दौर में मुक्ति की आकांक्षा नये रूपों में प्रकट हो रही है और पूंजी की विराट ताकत को समझने और उससे जूझने की तैयारी ही इस समय के टकराव की प्रमुख वजह है ।     

Sunday, December 4, 2022

आलोचना की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष

 

          

                                     

हिंदी की दुनिया में मैनेजर पांडे के योगदान को आलोचना की हैसियत बढ़ाने के लिए बहुत समय तक याद किया जायेगा । इस बात का मतलब साहित्य के भीतर आलोचना की विधा से ही नहीं है । यदि यह विधा मात्र का सवाल होता तो प्रेमचंद को साहित्य की सबसे बेहतरीन परिभाषा जीवन की आलोचना नहीं प्रतीत होती । जिस तरह लोकतंत्र केवल ऊपर की संस्थाओं में जीवित नहीं रह सकता यदि उसे नीचे से जनता की सक्रियता का रस न मिले उसी तरह विधा के बतौर भी आलोचना को फलने फूलने के लिए खास माहौल के खादपानी की जरूरत होती है । आलोचना के जीवन के लिए समाज में बदलाव की आकांक्षा के साथ ही उसके लिए सक्रिय ताकतों की मौजूदगी आवश्यक है । आश्चर्य नहीं कि हिंदी में आलोचना के सर्वोत्तम क्षण स्वाधीनता आंदोलन के समय के छायावाद और प्रगतिशील साहित्यांदोलनों का दौर रहा है । इस सामान्य तथ्य की स्वीकृति भी इतनी आसान नहीं रही । इसकी मान्यता के लिए कठिन और जटिल वैचारिक संघर्ष करना पड़ता रहा है । मैनेजर पांडे इस संघर्ष के सहभागी और अगुआ रहे । उनके समूचे लेखन को समझने के लिए इसके बिना अन्य कोई राह सही न होगी ।

इसी प्रसंग में ध्यान देना होगा कि नब्बे दशक में मजदूर और किसान ही नहीं, सामान्य आंदोलनों में भी उतार आना शुरू हुआ । निजीकरण की नैतिकता ने धीरे धीरे सांस्थानिक ढांचों में भी जगह बनानी शुरू की । निजी संस्थानों के कर्मचारी अपने संस्थान के विरोध में सार्वजनिक मंचों पर नहीं बोलते, ऐसा करने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही हो सकती है । इसीलिए सरकारी नीतियों की आलोचना का स्रोत सार्वजनिक संस्थान हुआ करते थे । वहां आलोचना का अधिकार कर्मचारियों ने लड़कर हासिल किया था । उनमें भी निजी संस्थानों के नियम लागू करने शुरू किये गये और इनके लिए सरकारी सेवा के नियमों का सहारा लिया गया । इस व्यापक माहौल का असर शिक्षण संस्थानों पर भी पड़ा और अध्ययन हेतु आवश्यक आलोचनात्मक विवेक को नुकसानदेह बताया जाने लगा । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि इन संस्थानों में आलोचनात्मक माहौल और विवेक की गारंटी विद्यार्थियों और अध्यापकों की यूनियनें करती थीं । इन्हें बदनाम किया जाने लगा और छात्र संघों के नियंत्रण की परियोजना के तहत लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का नाम लिया जाने लगा । विद्यार्थियों के संगठनों की अप्रासंगिकता के साथ अध्यापक संगठनों की धार भी मंद पड़ती गयी । आदर्श विद्यार्थी उसे बताया जाने लगा जो देश और समाज की चिंता करने की जगह मोटी तनख्वाह के पीछे जान लगा दे । यह भी कहा गया कि युवा को सपनों और आदर्श के मुकाबले व्यवस्था की सेवा को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए । इस माहौल ने पूरे समाज में आलोचनात्मकता को बुरी बात समझाना शुरू किया । स्वाभाविक है कि इस वातावरण ने आलोचना को नुकसान पहुंचाया । मैनेजर पांडे ने अपने एक लेख में आलोचना के वैश्विक क्षरण पर चिंता भी जाहिर की ।

इस अर्थ में उन्होंने हिंदी आलोचना की क्लासिक परम्परा को फिर से जागृत करने की भरपूर कोशिश की । इस काम में उन्हें साहित्य के बाहर के विद्वानों का भी सजग साथ मिला । साहित्येतर अनुशासनों के इन विद्वानों में विशेषकर रणधीर सिंह और एजाज़ अहमद का नाम लिया जाना चाहिए । इन सबकी संगत नब्बे के दशक में जमी जब सोवियत संघ का पतन हो चुका था । यही समय है जब मैनेजर पांडे से निजी मुलाकात हुई । जनेवि में प्रवेश के लिए अभ्यर्थी था । पेरियार छात्रावास में रामतीर्थ पटेल के पास रुका था । वे भी मैनेजर पांडे के ही निर्देशन में शोधरत थे । काहिविवि के अध्यापकों के मुकाबले जनेवि के अध्यापकों में विद्यार्थियों से औपचारिक संबंध रखने का चलन कुछ अधिक महसूस हुआ । इसके चलते नजदीकी अधिक कभी नहीं बनी लेकिन दूर से ही उनके लिखे को पढ़ने और उस पर आपस में बहस करने और सराहने का स्वभाव बना लिया ।

उनकी किताब ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ का प्रकाशन हरियाणा ग्रंथ अकादमी से हुआ था । समीक्षा के लिए उसे जिन पत्रिकाओं को भेजा जाना था उनकी सूची बनाने में मदद की । साथ में प्रदीप तिवारी भी थे । मेरे लिए विद्यार्थी राजनीति की सक्रियता अधिक प्राथमिक होती जा रही थी । बाद में कभी विभाग संबंधी एक मामले में उन्होंने परामर्श किया तो मैंने परस्पर अहस्तक्षेप का तरीका सुझाया । याद करता हूं कि उन्होंने सच में कभी मेरी राजनीतिक सक्रियता की बाबत कुछ नहीं कहा । अन्य लोगों के संस्मरणों से भी अंदाजा मिला कि नामवर जी के मुकाबले पांडे जी कुछ अधिक उदार हैं । उनकी इस उदारता का लाभ बहुतों ने उठाया और खुद उन्होंने भी किन्हीं वजहों से यह लाभ उठाने दिया ।

इस किताब के प्रकाशन से पहले वे ‘शब्द और कर्म’ के अतिरिक्त ‘साहित्य और इतिहास दृष्टि’ का प्रकाशन करवा चुके थे । इन किताबों से उनकी छवि साहित्य के मामले में खास नजरिये के पक्ष में गम्भीर बहस संचालित करने की बनी थी । इस बहस में उन्हें हिंदी के सामान्य पाठकों तक सैद्धांतिक सवालों को ले जाने की चुनौती का सामना करना पड़ता था । भाषा के मामले में उनका यह संघर्ष जीवन भर चला और आखिरकार ‘मुगल बादशाहों की कविता’ तक आते आते उन्होंने संप्रेषणीय भाषा अर्जित कर ली । कक्षाओं में भी उन्हें जटिल धारणाओं को बोधगम्य बनाने के लिए जूझते देखा जाता था । अध्यापन उनके लिए लेखन से पहले का अभ्यास बन जाता था । इस क्रम में हम जैसे विद्यार्थी उन सिद्धांतकारों की बातों से मोटे तौर पर परिचित हो जाते थे जो बौद्धिक दुनिया में बहस के केंद्र में होते थे ।

इससे हिंदी साहित्य के ऐसे विद्यार्थियों का समूह बन गया जो साहित्य के साथ ही समाज विज्ञान की धारणाओं पर भी अधिकार के साथ बातचीत कर सकते थे । जनेवि के हिंदी विद्यार्थियों की इस योग्यता को हिंदी साहित्य के पारम्परिक विद्यार्थी की छवि से अलग होने का नुकसान भी उठाना पड़ता था । इस स्थिति के चलते विद्यार्थी और अध्यापक में ऐसा रिश्ता बन जाता था जो अनौपचारिक न होने पर भी वैचारिक एकता का भाव लिये होता था । वहां छात्र संघ के चुनावों में प्रत्याशियों को बहुमुखी जानकारी से लैस रहना पड़ता था । उनकी इस तैयारी ने ही उन्हें भारतीय राजनीति में प्रासंगिक बनाये रखा । बहरहाल जब मैं प्रत्याशी था तो एक सवाल के उत्तर में हास्य व्यंग्य का सहारा लेना पड़ा था । पांडे जी भी व्याख्यान और लेखन में इस औजार का अक्सर इस्तेमाल करते थे इसलिए उनको यह युक्ति भा गयी । बाद में उन्होंने निजी बातचीत में इसका जिक्र किया ।

हास्य और व्यंग्य के सहारे वे विरोधी विचारों और उनके प्रवक्ताओं को अक्सर निरस्त्र कर देते थे । जनेवि के विद्यार्थियों की तरह उसके अध्यापकों को भी छिछलेपन के साथ युद्धरत रहना पड़ता था । इस लड़ाई में वे सब लगातार बहस और जानकारी का इतना ऊंचा मानक रखते थे कि प्रतिपक्षी के लिए हल्की बात करना मुश्किल हो जाता था । जनेवि के हिंदी अध्यापकों में पांडे जी के अतिरिक्त नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के पूर्वी या उससे लगे बिहार से थे उस समूचे इलाके में इन अध्यापकों के कारण हिंदी के विद्यार्थियों के बीच साहित्य का जनपक्षी स्वरूप सहज बोध का अंग बन गया था उस अत्यंत गरीब किसानी इलाके के उत्सुक विद्यार्थी जनेवि की ओर बौद्धिक उच्चता की प्रेरणा के लिए देखते थे ये तीनों ही पारम्परिक अध्यापकों के मुकाबले विद्रोही विद्यार्थियों में अधिक लोकप्रिय थे हिंदी साहित्य की प्रगतिशील समझ को स्थापित करने के लिए इनके संघर्ष को याद करना आज बहुत जरूरी है इसका महत्व इस कारण भी अधिक है कि हिंदी भाषी क्षेत्र में वाम आंदोलन की अनुपस्थिति के बावजूद बौद्धिक हलकों में उसे मान्यता दिलाने में इस अथक संघर्ष का योगदान अविस्मरणीय है  

ये अध्यापक हम आकांक्षी विद्यार्थियों की अनेक ऐसी आकांक्षाओं का साकार रूप थे जो आदर्शवादी युवकों के मन में आसपास के वातावरण से पैदा हो जाती थीं उस आदर्शवाद के चलते हमारे मन में चारों ओर फैले सामंती यथार्थ के प्रति गुस्सा जन्म लेता था इस यथार्थ से दूर भागने के क्रम में युवा विद्यार्थियों का समूह दूर पास की तमाम शिक्षण संस्थाओं की ओर भागता था इसी तरह ये अध्यापक भी जनेवि में एकत्र हो गये थे अकारण नहीं कि काहिविवि या इलाहाबाद विश्विविद्यालय से ढेर सारे विद्यार्थी जनेवि में दाखिला लेते थे इस आकर्षण की बड़ी वजह अध्यापकों का यह समूह भी था  

नब्बे के बाद मैनेजर पांडे की सक्रियता का पहलू तत्कालीन वातावरण से अधिकाधिक निर्धारित होता गया मार्क्सवाद की समाप्ति के शोर का मुकाबला करते हुए उन्होंने मार्क्स के और उन पर लिखे लेखों का अनुवाद करके संकट के बावजूद शीर्षक संग्रह तैयार किया एक नितांत निजी हादसे से उबरने का कारण भी यह पुस्तक बनी बाद में भारत के स्वाधीनता आंदोलन के दौरान प्रकाशित दुर्लभ किताबों के नये संस्करण उनकी भूमिका के साथ प्रकाशित हुए इनमें देउस्कर और देव नारायण द्विवेदी कीदेश की बातविशेष रूप से महत्व की साबित हुईं वैश्वीकरण के साथ पुन:उपनिवेशीकरण का जो दौर चला उसके लिहाज से ये किताबें बेहद महत्वपूर्ण थीं

दलित और स्त्री साहित्य के आगमन के बाद हिंदी के प्रगतिशील आलोचकों में पांडे जी ने सबसे पहले उनका स्वागत किया इस लिहाज से पुराने साहित्य को फिर से प्रासंगिक बनाते हुए उन्होंने महादेवी वर्मा की किताबश्रृंखला की कड़ियांपर लिखा और अश्वघोष की वज्रसूची पर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया दलित और स्त्री लेखन का यदि कोई संवाद प्रगतिशील आलोचना से बनता है तो उसका एक कारण पांडे जी की सक्रियता का यह पहलू भी है उन्हें जीवन भर ढेर सारी विपरीत परिस्थितियों से जूझना पड़ा लेकिन इस संघर्ष में उन्होंने कभी हथियार नहीं डाले इसी क्रम में उन्होंने वर्तमान और अतीत के साहित्यिक लेखन का नया पाठ किया और हिंदी के व्यापक पाठक समुदाय को भी उससे परिचित कराया इस काम के लिए लेखन, भाषण और अध्यापन का कुशल उपयोग उन्होंने किया