Saturday, November 7, 2020

89 के तीस साल बाद: कुछ किताबों के बहाने

 

                                    

                                                      

लगता है जैसे हमारे वर्तमान में अतीत घुसा आ रहा हो । कोई साल नहीं बीतता जो किसी घटना की सालगिरह न हो । पिछला साल मार्क्स के जन्म का दो सौवां साल और 1968 के विद्रोहों का पचासवां साल था । उससे पिछला रूसी क्रांति की शतवार्षिकी था । मार्क्स के अनन्य मित्र और सहकर्मी एंगेल्स के जन्म की दो सौवीं सालगिरह इस साल है । सदी के मोड़ पर इतिहास ने हमारी चेतना को इस कदर जकड़ रखा है कि वाम या दक्षिण किसी भी खेमे को पूरी जीत की खुशी मनाने की हिम्मत नहीं हो रही । हो सकता है यह तथ्य अनदेखा ही गुजर जाए कि यह साल भी एक ऐसी घटना की तीसवीं सालगिरह है जिसे केवल घटना कहना उसके साथ न्याय नहीं होगा । बर्लिन की दीवार के गिरने से जो प्रक्रिया शुरू हुई वह अमेरिकी कारनामों और लैटिन अमेरिकी देशों की घटना-दुर्घटनाओं के चलते नजर भले न आए लेकिन अनेक रूपों में अब भी जारी है । इसमें उस समय तो वामपंथ की हार नजर आई थी लेकिन जो जीत हुई थी उसके भयावह परिणाम पहले तो बोस्निया हर्जेगोविना में, फिर अकेली विश्वशक्ति के उद्दंड आचरण में और उसके बाद पूंजीवाद के आदमखोर चरित्र की वापसी में प्रकट हुए । 

कहने की जरूरत नहीं कि 1989 में जब एकाएक सोवियत संघ और उसके समर्थक पूर्वी यूरोप के शासन गिरने शुरू हुए तो समूची दुनिया में वामपंथी ताकतों को बड़ा सदमा लगा । इसलिए उसको समझने या उसके बारे में बातचीत भी तत्काल नहीं शुरू हुई । उस समय तो अंतों का कानफोड़ शोर गूंज रहा था । इतिहास के अंत से लेकर विचारधारा के अंत तक की ऐसी दम्भपूर्ण प्रबल घोषणाएं सुनाई पड़ती थीं कि लगता था मानवता भविष्यविहीन हो गई है । इस भविष्यविहीन समय में जो यथार्थ उभरना शुरू हुआ उसमें इतनी हिंसा थी कि दिमाग काम नहीं करता था । फिर तो अंतहीन युद्ध और बरबादी की शुरुआत हुई । एकबारगी आरम्भिक झटके से उबरने के बाद उस विमर्श को पहचानने की कोशिश होने लगी जो समूची बीसवीं सदी में उस ऐतिहासिक क्रांति और उससे उपजी सत्ता के चलते निर्मित हुआ था । यहां तक कि उस साल की विशेषता को भी ग्रहण करने में थोड़ा समय लगा था ।     

जिस तरह 68 का तूफ़ानी साल साल भर के भीतर लगभग समूची दुनिया को उलट पुलट गया था उसी तरह का तूफ़ानी साल 1989 भी था । इसके बारे में 2004 में वारविक विश्वविद्यालय के रोबिन ओके की किताब ‘द डिमाइस आफ़ कम्युनिस्ट ईस्ट यूरोप: 1989 इन कानटेक्स्ट’ का प्रकाशन आर्नल्ड द्वारा हुआ । किताब में उस दौर को ऐतिहासिक मानते हुए एक साथ सभी मुल्कों में कम्युनिस्ट सत्ता के बिखराव को समझने की कोशिश की गई है । लेखक मानते हैं कि यह साल 1789, 1848 या 1917 जितना ही निर्णायक था । पूर्वी यूरोप के देशों में कम्युनिस्ट सत्ता के बिखराव पर चीत्कार भरा आनंद देखने में आया था । उसके कारणों, गतिपथ और नतीजों का विवेचन इस किताब का घोषित मकसद है ।

इस संदर्भ में सबसे पहले यह याद करना उचित होगा कि बर्लिन की दीवार गिरने के साथ जिस शीतयुद्ध का खात्मा माना जा रहा था उसकी वापसी की आहट भी सुनाई दे रही है । 2018 में मंथली रिव्यू प्रेस से जेरेमी कुज़्मारोव और जान मरकियानो की किताब ‘द रशियंस आर कमिंग, अगेन: द फ़र्स्ट कोल्ड वार ऐज ट्रेजेडी, द सेकंड ऐज फ़ार्स’ का प्रकाशन हुआ । हाल के दिनों में रूस के शैतानीकरण की कोशिशों के संदर्भ में यह किताब लिखी गई है । यहां तक कि अभी 2020 में प्लूटो प्रेस से ग्रेग मैकलागिन की किताब ‘रशिया ऐंड द मीडिया: द मेकिंग आफ़ ए न्यू कोल्ड वार’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि 1980 दशक में शीतयुद्ध की राजनीति और प्रचार के चलते अस्थिरता का जन्म हुआ । तब लेखक किशोर थे और परमाणु युद्ध की आशंका से जी छुड़ाने के लिए किताबों में डूबे रहते थे । ये किताबें हिरोशिमा और नागासाकी के बारे में थीं, उनमें अमेरिका और सोवियत संघ की शत्रुता का जिक्र होता था तथा उनमें लोकतंत्र और आजादी की भी व्याख्या होती थी । इनमें कम्युनिज्म को शैतानी बताया जाता था । फिर लेखक ने रूस के अतिरिक्त अन्य जगहों के क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ाई शुरू की । इन सबसे दिमाग में भारी भ्रम फैला लेकिन शीतयुद्ध के बारे में जानने समझने का और कोई रास्ता भी नहीं था ।

बाद में वे संचार अध्ययन में स्नातक हुए और विश्वविद्यालय से 1988 में रीगन गोर्बाचोव की शिखर वार्ता की छपी खबरों का विश्लेषण कर शोधोपाधि प्राप्त की । उस समय दोनों महाशक्तियों की वैचारिक शत्रुता ठंडी पड़ती महसूस हो रही थी । इसके बाद सोवियत संघ की बदलती छवि पर आगे शोध करने का निश्चय किया । पूर्वी यूरोप के शासन भहरा रहे थे, शीतयुद्ध की पहचान बर्लिन की दीवार गिरा दी गई थी और 1991 के आते आते जर्मनी का एकीकरण हुआ तथा सोवियत संघ समाप्त हो गया । शीतयुद्ध अतीत की बात हो गई और लोग परमाणु बम की बात लगभग पूरी तरह भूल गए । इसके बावजूद शीतयुद्ध की भाषा नहीं समाप्त हुई । दस से भी कम सालों में पुतिन के रूप में मीडिया ने नया दुश्मन खोज लिया और उसी भाषा में उसकी तस्वीर गढ़ी जाने लगी ।        

2008 में सेंट्रल यूरोपीयन यूनिवर्सिटी प्रेस से ओक्साना सर्किसोवा और पीटर अपोर के संपादन में ‘पास्ट फ़ार द आईज: ईस्ट यूरोपीयन रिप्रेजेन्टेशंस आफ़ कम्युनिज्म इन सिनेमा ऐंड म्यूजियम्स आफ़्टर 1989’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों का कहना है कि कम्युनिस्ट शासन के बिखराव और प्रतिबंधित सूचनाओं के खुलने से पूर्वी यूरोप का अतीत नए रूप में प्रकट हो रहा है । इस सिलसिले में उन्हें दृश्य और लिखित दस्तावेजों की तुलनात्मक उपयोगिता की परीक्षा जरूरी लगती है । पहले लिखित पाठ की प्रामाणिकता अधिक समझी जाती थी । उसके मुकाबले नए समय में छवियों का संसार अधिक प्रभावी हो चला है ।  

2008 में सेंट्रल यूरोपीयन यूनिवर्सिटी प्रेस से मिशाल कोपेचेक के संपादन में ‘पास्ट इन द मेकिंग: हिस्टारिकल रिविजनिज्म इन सेंट्रल यूरोप आफ़्टर 1989’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों का कहना है कि इस साल को ठीक ही मध्य और पूर्वी यूरोप में युग विभाजक साल माना जाता है । इस साल न केवल समाजार्थिक और राजनीतिक संगठन में बुनियादी फेरबदल हुआ बल्कि व्यक्तियों के जीवन प्रवाह में भी मोड़ आया । व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न चरण व्यापक इतिहास के बदलावों की संगति या विसंगति से जुड़े होते हैं और इनके चलते ही इतिहास की धारा सीधी रेखा में नहीं चलती । इस साल पुराने शासनों की जगह उदार लोकतंत्र का आगमन सुनाई पड़ा । इसके साथ वैश्वीकरण और उत्तर आधुनिकता का भी अनुभव हुआ । 

2008 में द यूनिवर्सिटी आफ़ मिशिगन प्रेस से कैथरीन पेन्स और पाल बेट्स के संपादन में ‘सोशलिस्ट माडर्न: ईस्ट जर्मन एवरीडे कल्चर ऐंड पोलिटिक्स’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों का कहना है कि 1989 में जर्मनी के एकीकरण ने पूर्वी जर्मनी के साम्यवादी प्रयोग को समाप्त भले कर दिया लेकिन उस प्रयोग का ऐतिहासिक आकलन शेष है । इस एकीकरण ने जर्मनी के इतिहास को शीतयुद्ध की छाया से अचानक मुक्त कर दिया । एकीकृत जर्मनी के अतीत की बात होने लगी । असल में शीतयुद्धोत्तर भूराजनीति में जर्मनी की जगह बदल गई जिससे उसके अतीत को नई रोशनी में देखना जरूरी लगने लगा ।

2009 में यूनिवर्सिटी आफ़ कैलिफ़ोर्निया प्रेस से जोशुआ क्लोवर की किताब ‘1989: बाब डिलन डिडन’ट हैव दिस टु सिंग एबाउट’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक यह साल दुनिया में कई बदलावों के लिए याद रखा जाएगा । फ़्रांसिसी क्रांति की दो सौवीं सालगिरह के इस साल में बास्तील का किला टूटने के दिन पेरिस में अमीर देशों की संस्था जी-7 का सम्मेलन हो रहा था । चीन में तिएनमान चौराहे पर हुए छात्र प्रदर्शनों का दमन इसी साल हुआ । पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच की बर्लिन की दीवार भी इसी साल गिरी । इस तरह यह साल 1945 के बाद सर्वाधिक घटनाओं से भरा हुआ साल रहा । इस तीव्र बदलाव को ही समझने के क्रम में 2004 में वारविक विश्वविद्यालय के रोबिन ओके की किताब ‘द डिमाइस आफ़ कम्यूनिस्ट ईस्ट यूरोप: 1989 इन कानटेक्स्ट’ का प्रकाशन आर्नल्ड द्वारा हुआ । किताब में उस दौर को ऐतिहासिक मानते हुए एक साथ सभी मुल्कों में कम्यूनिस्ट सत्ता के बिखराव को समझने की कोशिश की गई है ।   

2011 में प्लूटो प्रेस से गारेथ डेल के संपादन में ‘फ़र्स्ट द ट्रांजीशन, देन द क्रैश: ईस्टर्न यूरोप इन द 2000स’ का प्रकाशन हुआ । किताब पूर्वी यूरोप के मुल्कों में समाजवादी सत्ता के ढहने के बाद की प्रक्रिया का अध्ययन करने के लिहाज से छापी गई है । शुरू में संपादक की भूमिका के अलावा एक लेख 1989 को मार्क्स की नजर से विश्लेषित करते हुए शामिल किया गया है । इसके बाद किताब दो भागों में विभाजित है । पहले भाग में तीन लेखों में पुतिन के समय वर्गों और सत्ता की स्थिति का विवेचन है । दूसरे भाग के छह लेख क्रमश: लातविया, यूक्रेन, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी तथा सर्बिया में बाजारोन्मुखी सुधारों और तज्जनित संकट का वर्णन करते हैं । अंत में संपादक ने उपसंहार लिखा है ।

पूर्व समाजवादी देशों में पिछले तीस सालों के हालात जानने में क्रिस्टेन घोडसी की किताबों से बहुत मदद मिलती है । उनकी पहली किताब 2010 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से ‘मुस्लिम लाइव्स इन ईस्टर्न यूरोप: जेन्डर, एथनिसिटी, ऐंड द ट्रान्सफ़ार्मेशन आफ़ इस्लाम इन पोस्ट सोशलिस्ट बुल्गारिया’ का प्रकाशन हुआ । किताब इन मुल्कों के एक नए पहलू को सामने ले आई है । दूसरी 2011 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से ‘लास्ट इन ट्रान्जीशन: एथनोग्राफीज आफ़ एवरीडे लाइफ़ आफ़्टर कम्युनिज्म’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका का कहना है कि बीसेक साल पहले सोवियत साम्राज्य ध्वस्त हुआ था । इतिहास के करवट बदलते ही एक समूची राजनीतिक आर्थिक प्रणाली अतीत की बात हो गई । वह व्यवस्था इतनी क्रांतिकारी विचारधारा पर आधारित थी कि बीसवीं सदी के शायद ही किसी व्यक्ति पर उसका असर न रहा हो । 1945 के बाद समूची दुनिया में दैनन्दिन जीवन ऐसी वैश्विक होड़ से संचालित होता था जिसके चलते धरती ही हिंसक आत्मसंहार की ओर बढ़ी प्रतीत होने लगी थी । तापवृद्धि और जलवायु बदलाव के इस दौर में इसकी याद शायद ही किसी को हो कि कुछ ही दिन पहले परमाणु युद्ध के विनाश की आशंका सबको हुआ करती थी । लेखिका की किशोरावस्था आपसी विनाश की इसी आशंका में बीता था । इनकी विचारधारा बहुत सहज थी । समझना बस यही था कि मुनाफ़े की जड़ क्या है, वर्ग टकराव से मानव इतिहास आगे बढ़ता है और हम सब अधिकाधिक सामाजिक न्याय की ओर प्रगति कर रहे हैं । तीसरी 2015 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से ‘द लेफ़्ट साइड आफ़ हिस्ट्री: वर्ल्ड वार II ऐंड द अनफ़ुलफ़िल्ड प्रामिस आफ़ कम्यूनिज्म इन ईस्टर्न यूरोप’ का प्रकाशन हुआ । चौथी किताब ‘रेड हैंगओवर: लीगेसीज आफ़ ट्वेन्टीएथ-सेन्चुरी कम्यूनिज्म’ का प्रकाशन 2017 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से  हुआ । किताब को चार भागों में बांटा गया है । पहले भाग के चार लेखों में समाजवाद के खात्मे के बाद की अवस्था के बारे में विवेचन है । दूसरे भाग के तीन लेखों का विषय अलग हुए टुकड़ों को फिर से एकत्र करने की प्रक्रिया का अध्ययन है । तीसरे भाग में भी तीन ही लेख हैं और इनमें इतिहास को मिटा देने की कोशिशों का जायजा लिया गया है । चौथे भाग के पांच लेखों के जरिए इन मुल्कों में स्थापित लोकतांत्रिक शासन की समस्याओं को उजागर किया गया है । उनकी सबसे नई किताब ‘ह्वाइ वीमेन हैव बेटर सेक्स अंडर सोशलिज्म: ऐंड अदर आर्गुमेन्ट्स फ़ार इकोनामिक इनडिपेंडेन्स’ का प्रकाशन 2018 में नेशन बुक्स से  हुआ है । पिछले दो दशकों से लेखिका पूर्वी यूरोप में राजकीय समाजवाद से राजनीतिक और आर्थिक संक्रमण के सामाजिक असरात का अध्ययन कर रही हैं । बर्लिन की दीवार गिरने के कुछ महीने बाद ही उन्होंने इस क्षेत्र की यात्रा की लेकिन शोध 1997 से शुरू किया । इन यूरोपीय देशों में कम्यूनिस्ट विचारधारा के खात्मे का सामान्य लोगों पर पड़े प्रभाव की पड़ताल करने में उन्हें रुचि थी । उन्हें इस पूरे क्षेत्र में नवउदारवादी पूंजीवाद द्वारा मचाई तबाही के दर्शन हुए । उन्होंने देखा कि अनियंत्रित मुक्त बाजार ने स्त्रियों को पहले के समाजी हालात में हासिल आर्थिक स्वाधीनता खत्म करके उन्हें पुरुषों पर फिर से निर्भर बना दिया है । सभी समझ सकते हैं कि समाजवादी शासन की समाप्ति का सबसे नुकसानदेह असर स्त्री समुदाय को झेलना पड़ा । इसी प्रसंग में सामाजिक बदलाव को स्त्री समुदाय की निगाह से समझने के लिए 2007 में इंडियाना यूनिवर्सिटी प्रेस से जेनेट एलिस जानसन और ज्यां सी राबिन्सन के संपादन में ‘लिविंग जेंडर आफ़्टर कम्यूनिज्म’ शीर्षक किताब प्रकाशित हुई । संपादकों की भूमिका के अलावे किताब चार भागों में बंटी है ।     

इस प्रक्रिया का अध्ययन नई सदी के आगमन से पहले या कहें कि बर्लिन की दीवार गिरने के दस साल बाद ही शुरू हो गया था । सबूत है कि 1998 में रटलेज से स्यू ब्रिजेर और फ़्रान्सेस पाइन के संपादन में ‘सर्वाइविंग पोस्ट-सोशलिज्म: लोकल स्ट्रेटेजीज ऐंड रीजनल रिस्पान्सेज इन ईस्टर्न यूरोप ऐंड द फ़ार्मर सोवियत यूनियन’ का प्रकाशन हुआ । किताब की खास बात समाजवादी शासनों के खात्मे के बाद की प्रक्रिया की इकहरी तस्वीर पेश करने की जगह अलग अलग देशों में उसकी विशेषता को प्रकट करना है । किताब की प्रस्तावना लिखते हुए सी एम हान ने इस प्रक्रिया की तुलना इंग्लैंड में अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध के बदलावों से की है जब वहां के प्रधानत: ग्रामीण समाज को आर्थिक संगठन और संपत्ति संबंधों के मामले में भारी बदलाव झेलना पड़ा था । कार्ल पोलान्यी और ई पी थाम्पसन जैसे इतिहासकारों ने बताया कि इन बदलावों का दूरगामी असर नैतिकता और सामुदायिकता जैसी मान्यताओं पर पड़ा था । तीसरी दुनिया के ग्रामीण समाजों को भी ऐसे ही बदलावों से बीसवीं सदी में गुजरना पड़ा था । उसी तरह के बदलाव बाजार आधारित पूंजीवाद और निजी संपत्ति से भिन्न आधार पर समाज का संगठन करने का सपना देखने वाले दूसरी दुनिया के देशों को झेलने पड़ रहे हैं । इन समाजों को ग्रामीण तो नहीं कहा जा सकता, इनमें पर्याप्त उद्योगीकरण हुआ था । ऐसे में पहले के बदलावों के साथ इसकी तुलना करने में थोड़ी मुश्किल पेश आती है । किसी भी गम्भीर समाज-विज्ञानी के समक्ष यह सवाल पैदा होगा ।      

1989 में जो बिखरा उस सोवियत संघ को एक अनूठे प्रयोग के लिए भी याद किया जाना चाहिए । सोवियत संघ बहुजातीय राष्ट्र था । उस प्रयोग का असर यूगोस्लाविया और चेकोस्लोवाकिया जैसे पूर्वी यूरोप के अन्य बहुजातीय राष्ट्रों पर भी पड़ा था । इस पहलू पर केंद्रित 1998 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से रोनाल्ड ग्रिगोर सनी की किताब ‘द सोवियत एक्सपेरिमेन्ट: रशिया, द यू एस एस आर, ऐंड द सक्सेसर स्टेट्स’ का प्रकाशन हुआ । इसी पहलू पर इस अध्येता ने 2001 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से टेरी मार्टिन के साथ मिलकर ‘ए स्टेट आफ़ नेशन्स: एम्पायर ऐंड नेशन-मेकिंग इन द एज आफ़ लेनिन ऐंड स्तालिन’ का संपादन किया । इसी पहलू पर ध्यान देते हुए 2001 में कार्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस से टेरी मार्टिन की किताब ‘द एफ़र्मेटिव ऐक्शन एम्पायर: नेशन्स ऐंड नेशनलिज्म इन द सोवियत यूनियन, 1923-1939’ का प्रकाशन हुआ । इसी मसले पर 2013 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से जेरेमी स्मिथ की किताब ‘रेड नेशंस: द नेशनलिटीज एक्सपीरिएन्स इन ऐंड आफ़्टर द यू एस एस आर’ का प्रकाशन हुआ ।

सोवियत संघ के बिखराव ने बहुजातीय राष्ट्रों के प्रयोग के लिए भी समस्याओं को जन्म दिया । 2002 में रटलेज से इयान जेफ़्रीस की किताब ‘द फ़ार्मर यूगोस्लाविया ऐट द टर्न आफ़ द ट्वेंटी-फ़र्स्ट सेंचुरी: ए गाइड टु द इकोनामीज इन ट्रांजीशन’ का प्रकाशन हुआ । युगोस्लाविया को सोवियत रूस के मुकाबले अधिक लोकतांत्रिक समाजवादी मुल्क माना जाता था । शायद समाजवादी व्यवस्था ही उसे एक देश के रूप में इकट्ठा रखने में कामयाब था । सोवियत संघ के साथ जब युगोस्लाविया भी ढहा तो उसके न केवल टुकड़े हो गए, बल्कि इन टुकड़ों में ऐसी मारकाट चली कि यूरोप के इस देश की छवि गृहयुद्ध में उलझे अफ़्रीकी मुल्कों जैसी हो गई । इसी तकलीफदेह संक्रमण का विवेचन इस किताब की विशेषता है ।

सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप की व्यवस्था के लोकतंत्र विरोधी होने की बात तो बहुत की जाती रही है लेकिन उन समाजों के भीतर की गतिशीलता को समझने की गम्भीर कोशिश नहीं हुई । उस गतिशीलता को उजागर करने की कोशिश के तहत 2002 में प्लूटो प्रेस से लास्ज़लो कूर्ती की किताब ‘यूथ ऐंड द स्टेट इन हंगरी: कैपिटलिज्म, कम्यूनिज्म ऐंड क्लास’ का प्रकाशन हुआ । इसी तरह 2008 में द यूनिवर्सिटी आफ़ मिशिगन प्रेस से कैथरीन पेन्स और पाल बेट्स के संपादन में ‘सोशलिस्ट माडर्न: ईस्ट जर्मन एवरीडे कल्चर ऐंड पोलिटिक्स’ का प्रकाशन हुआ । इसके जरिए हंगरी के अतिरिक्त एक और मुल्क की आधुनिकता का स्वरूप स्पष्ट होता है । संपादकों का कहना है कि 1989 में जर्मनी के एकीकरण ने पूर्वी जर्मनी के साम्यवादी प्रयोग को समाप्त भले कर दिया लेकिन उस प्रयोग का ऐतिहासिक आकलन शेष है । जर्मनी के ही सिलसिले में 2009 में स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से बेन्जामिन रोबिन्सन की किताब ‘द स्किन आफ़ द सिस्टम: आन जर्मनी’ज सोशलिस्ट माडर्निटी’ का प्रकाशन हुआ । इसी आधुनिकता के एक और प्रतिफलन को रेखांकित करते हुए 2011 में यूनिवर्सिटी आफ़ पिट्सबर्ग प्रेस से किम्बर्ली एलमैन ज़ारेकोर की किताब ‘मैनुफ़ैक्चरिंग ए सोशलिस्ट माडर्निटी: हाउसिंग इन चेकोस्लोवाकिया, 1945-1960’ का प्रकाशन हुआ ।

पूर्वी यूरोप के देशों के बिखराव का जायजा लेते हुए 2003 में रौमन ऐंड लिटिलफ़ील्ड पब्लिशर्स से एलन डब्ल्यू काफ़्रुनी और मैगनुस राइनेर के संपादन में ‘ए रूइन्ड फ़ोर्ट्रेस?: नियोलिबरल हेजेमनी ऐंड ट्रान्सफ़ार्मेशन इन यूरोप’ का प्रकाशन हुआ । यूरोप के हाल के बदलावों के लिहाज से यह उपयोगी किताब है । संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब में शामिल ग्यारह लेख तीन भागों में संयोजित हैं । पहले भाग के लेखों में यूरोपीय संघ में एकीकरण और उससे नवउदारवादी प्रभुत्व के जुड़ाव का विवेचन है । दूसरे भाग के लेख इस प्रभुत्व से उपजे आर्थिक बदलावों का विश्लेषण करते हैं । तीसरे भाग के लेखों में पुरानी व्यवस्था के साथ बदलाव की नयी व्यवस्था के टकराव के संदर्भ में किसी नये रास्ते की तलाश पर जोर दिया गया है । इस तलाश का कारण एकीकरण की नवउदारवादी प्रक्रिया से उपजी वर्तमान तबाही और उथल पुथल है । इस क्षेत्र के अध्ययन की इसी प्रक्रिया को विस्तार देते हुए 2003 में येल यूनिवर्सिटी प्रेस से टिमोथी स्नाइडर की किताब ‘द रीकंस्ट्रक्शन आफ़ नेशंस: पोलैंड, यूक्रेन, लिथुआनिया, बेला रूस 1569-1999’ का प्रकाशन हुआ । इस प्रक्रिया में समाज के भीतर पैदा सामाजिक बिखराव को समझने और नयी राजनीति के स्वरूप की पहचान के मकसद से 2003 में रटलेज से पेत्र कोपेकी और कस मुद्दे के संपादन में ‘अनसिविल सोसाइटी?: कंटेन्शस पोलिटिक्स इन पोस्ट-कम्यूनिस्ट यूरोप’ का प्रकाशन हुआ । असल में उस क्षेत्र में कम्युनिस्ट शासन की समाप्ति से उदारपंथी बौद्धिकों को मजबूत सिविल सोसाइटी के निर्माण की उम्मीद बंधी थी लेकिन असल जीवन में लूट खसोट और हिंसा का माहौल कायम हुआ । इसे संपादकों ने उत्तर-कम्युनिस्ट राजनीति का अंधेरा पक्ष कहा है और नौ लेखों में विभिन्न देशों में इस प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयास किया है । चेकोस्लोवाकिया में वैश्वीकरण से उत्पन्न कुछ बदलावों को रेखांकित करते हुए 2003 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस से जैक़्वी ट्रू की किताब ‘जेंडर, ग्लोबलाइजेशन, ऐंड पोस्टसोशलिज्म: द चेक रिपब्लिक आफ़्टर कम्यूनिज्म’ का प्रकाशन हुआ ।

2004 में पालग्रेव मैकमिलन से जानोस कोरनाइ और सुसान रोजे-एकरमान के संपादन में ‘बिल्डिंग ए ट्रस्टवर्दी स्टेट इन पोस्ट-सोशलिस्ट ट्रांजीशन’ का प्रकाशन हुआ । किताब में संपादक की भूमिका के अतिरिक्त ग्यारह अध्याय हैं जिन्हें तीन भागों में संयोजित किया गया है । किताब इस विडम्बना को रेखांकित करती है कि पूर्ववर्ती शासन व्यवस्था की तमाम आलोचनाओं के बावजूद उसकी समाप्ति के बाद समाजवादोत्तर देशों में भरोसेमंद शासन तंत्र की स्थापना नहीं हो सकी है । पहले भाग के लेखों में भरोसे और संस्थान निर्माण के रिश्तों को स्पष्ट किया गया है । दूसरे भाग में भ्रष्टाचार के राज्य पर कब्जे की असलियत को उजागर करने वाले लेख हैं । तीसरे भाग में उस विचित्र लोकतंत्र की ओर इन देशों के संक्रमण की कथा कही गयी है जो इन देशों में कायम किया गया । ठीक इसी लोकतंत्रीकरण के हवाल देखने के लिए जान एस ड्राइज़ेक और लेस्ली टेम्पल मैनहोम्स की किताब ‘पोस्ट-कम्यूनिस्ट डेमोक्रेटाइजेशन: पोलिटिकल डिस्कोर्सेज एक्रास थर्टीन कंट्रीज’ का प्रकाशन पहली बार कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से 2002 में हुआ था । 2004 में उसका इलेक्ट्रानिक संस्करण प्रकाशित हुआ है । तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में रूपांतरण को समझने के लिहाज से माइकेल मैकफ़ाउल और कैथरीन स्टोनर-वेइस के संपादन में ‘आफ़्टर द कोलैप्स आफ़ कम्यूनिज्म: कंपेरेटिव लेसन्स आफ़ ट्रांजीशन’ का प्रकाशन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से सबसे पहले 2004 में हुआ । फिर 2007 में वह दोबारा छपी । 2010 में इसका पहला पेपरबैक संस्करण प्रकाशित हुआ है ।

शासन के अतिरिक्त इस संक्रमण का आर्थिक पक्ष भी है । इसे समझने के लिए 2004 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ओलिविएर ब्लांशार्ड की किताब ‘द इकोनामिक्स आफ़ पोस्ट-कम्यूनिस्ट ट्रांजीशन’ का दुबारा प्रकाशन हुआ । पहली बार 1997 में यह किताब छपी थी । इसी तरह 2009 में एडवर्ड एल्गर से पाल ड्रागोस अलीगिका और एंथनी जे इवान्स की किताब ‘द नियोलिबरल रेवोल्यूशन इन ईस्टर्न यूरोप: इकोनामिक आइडियाज इन द ट्रांजीशन फ़्राम कम्यूनिज्म’ का प्रकाशन हुआ । भूमिका और उपसंहार के अतिरिक्त किताब में लेखकों के नौ लेख शामिल हैं जिन्हें तीन भागों में संयोजित किया गया है । पहले भाग में पूर्वी यूरोप में पश्चिम के आर्थिक विचारों के प्रसार पर विचार किया गया है । दूसरे भाग में आर्थिक विचारों के प्रसार की समझ और विश्लेषण के लिए उपयुक्त ढांचों का विवेचन है । तीसरे भाग में अलग अलग मामलों में नवउदारवादी विचारों की विविधता और बदलाव को देखने की कोशिश की गई है । एक देश के भीतर इस अति दुखदायी प्रक्रिया का जायजा लेते हुए 2004 में पीटर लैंग से गारेथ डेल की किताब ‘बीट्वीन स्टेट कैपिटलिज्म ऐंड ग्लोबलाइजेशन: द कोलैप्स आफ़ द ईस्ट जर्मन इकोनामी’ का प्रकाशन हुआ । जो संक्रमण हुआ उसने भांति भांति के पूंजीवाद को जन्म दिया । इस विविधता के निदर्शन के लिए 2007 में पालग्रेव मैकमिलन से डेविड लेन और मार्टिन म्यांट के संपादन में ‘वेराइटीज आफ़ कैपिटलिज्म इन पोस्ट-कम्यूनिस्ट कंट्रीज’ का प्रकाशन हुआ । किताब एक बहुत अछूते विषय का विश्लेषण करती है इसलिए रुचिकर है ।

2005 में पालग्रेव मैकमिलन से योर्ग हफ़्शमिड के संपादन में ‘इकोनामिक पालिसी फ़ार ए सोशल यूरोप: ए क्रिटिक़ आफ़ नियो-लिबरलिज्म ऐंड प्रोपोजल्स फ़ार अल्टरनेटिव्स’ शीर्षक किताब का प्रकाशन हुआ । संपादक की भूमिका में बताया गया है कि हाल में यूरोप में काफी बदलाव आए हैं । 2004 की एक मई को समाजवादी खेमे के पूर्वी यूरोप के आठ देश यूरोपीय संघ में शामिल हुए । इससे पूर्व-पश्चिम का पारंपरिक विभाजन खत्म हुआ और समूचे यूरोप के विकास की रणनीति बनाने की राह साफ हुई । दो महीने से भी पहले यूरोपीय संविधान बना था ताकि इसे आर्थिक एकीकरण से आगे जाकर संविधान आधारित राजनीतिक संघ में परिणत किया जाए । सोचा यह गया था कि पूर्ण रोजगार की गारंटी के साथ ‘यूरोपीय सामाजिक माडल’ खड़ा किया जाएगा जिसमें होड़ जनित बेहतर रोजगार के अवसरों के साथ ही जनता का घनिष्ठ सामाजिक एकीकरण और शासन में उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी होगी । इस कदम से दुनिया में यूरोप की स्थिति मजबूत होती तथा पूरी दुनिया से गरीबी खत्म करने के लिए रणनीतिक कदम उठाने और पर्यावरण की बेहतरी के लक्ष्य को हासिल करने में गति आती । यूरोप के एकीकरण का यह सुखद सपना तो टूटा ही, खुद यूरोप के कुछेक देशों के लिए यह एकीकरण मुसीबत की वजह बन गया और कुछेक देशों में संघ से बाहर निकलने की मांग लोकप्रिय मांग बन गयी । जिस कदम को समूची दुनिया में सहकार का अलमबरदार होना था वही बहिष्करण की नयी लहर का कारण साबित हुआ ।  

पूर्वी यूरोप के देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की अजीबो गरीब स्थिति को बताने के लिए 2005 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से मार्टिन मेवियस की किताब ‘एजेन्ट्स आफ़ मास्को: द हंगारियन कम्यूनिस्ट पार्टी ऐंड द ओरिजिन्स आफ़ सोशलिस्ट पैट्रियाटिज्म 1941-1953’ का प्रकाशन हुआ । इसके दूसरे पहलू को सामने लाने के लिए 2006 में हार्पर कालिन्स ई बुक्स की ओर से माइकेल कोर्डा की किताब ‘जर्नी टु ए रेवोल्यूशन: ए पर्सनल मेमायर ऐंड हिस्ट्री आफ़ द हंगारियन रेवोल्यूशन आफ़ 1956’ का प्रकाशन हुआ । इसे निर्विवाद तथ्य की तरह मान लिया जाता है कि रूस के प्रभाव से ही पूर्वी यूरोपीय मुल्कों में क्रांतियां हुईं । इसीलिए इन क्रांतियों की स्वतंत्र भूमिका पर ध्यान नहीं दिया जाता रहा है । लेकिन बिना स्थानीय गोलबंदी के ये बदलाव संभव नहीं थे । इन्हीं स्थानीय पहलों को एक देश के संदर्भ में रेखांकित करते हुए यह किताब लिखी गई है । 2006 में मासाचुसेट्स इंस्टीच्यूट आफ़ टेकनोलाजी प्रेस से जानोस कोरनाइ की आत्मकथा ‘बाइ फ़ोर्स आफ़ थाट: इररेगुलर मेमोयर्स आफ़ ऐन इंटेलेक्चुअल जर्नी’ का प्रकाशन हुआ । साढ़े चार सौ पृष्ठों की यह आत्मकथा इक्कीस अध्यायों में हंगरी के समाजवादी बनने से लेकर फिर से पूंजीवाद की ओर लौटने की कहानी को निजी और शैक्षणिक यात्रा के जरिए बयान करती है ।

समाजवादी शासन गिरने के बाद उन देशों में जो कुछ हुआ उसे ठीक ठीक परिभाषित करने की कठिनाई के चलते ही 2007 में पालग्रेव मैकमिलन से डेविड लेन के संपादन में ‘द ट्रान्सफ़ार्मेशन आफ़ स्टेट सोशलिज्म: सिस्टम चेन्ज, कैपिटलिज्म आर समथिंग एल्स?’ का प्रकाशन हुआ । संपादक के मुताबिक 1986 में जब गोर्बाचेव ने पेरेस्त्रोइका की शुरुआत की तो वे विश्व समाजवादी व्यवस्था के मुखिया थे । उसमें मध्य और पूर्वी यूरोप, एशिया तथा लैटिन अमेरिका में स्थित 16 देश हुआ करते थे । इनके अतिरिक्त सात अफ़्रीकी देश खुद को मार्क्सवादी-लेनिनवादी कहा करते थे । इन देशों में केंद्रीय स्तर पर नियोजित अर्थतंत्र था, कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभुत्व था तथा सामाजिक कल्याण, विज्ञान और शिक्षा की सांगोपांग सरकारी व्यवस्था थी । इसे पूंजीवाद का विकल्प माना जाता था । इनमें पेरेस्त्रोइका के जरिए बाजारोन्मुख सुधारों की शुरुआत की गयी, केंद्रीय नियंत्रण ढीला किया गया और चुनाव आधारित बहुल राजनीतिक प्रणाली को प्रोत्साहित किया गया । मकसद था कि पश्चिमी ताकतों के साथ सम्पर्क संबंध बनाया जाये । इसके नतीजे सोवियत संघ के लिए निहायत अवांछित निकले । आर्थिक वृद्धि में तेजी से गिरावट आयी, मुद्रास्फीति तेजी से चढ़ी और जनता का मोहभंग क्रमश: प्रत्यक्ष होने लगा । चुनाव आधारित लोकतंत्र के चलते राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई । इसी रूपांतरण को समझने के लिए किताब में चार भाग बनाकर विभिन्न लेखों के जरिए हालात का जायजा लिया गया है । पहले भाग में इन देशों की सामाजिक शक्तियों के साथ इस रूपांतरण के रिश्ते को परखा गया है । दूसरे भाग में मध्य और पूर्वी यूरोप के देशों में इस रूपांतरण के नतीजों का विश्लेषण है । तीसरे भाग के लेख इन देशों के नये शासनों के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का विवेचन प्रस्तुत करते हैं । आखिरी चौथे भाग के लेख व्यवस्था बदले बिना सुधार की वैकल्पिक सम्भावनाओं की बात करते हैं । साफ है कि अब भी इन देशों में आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है । किताब इस सचाई की ओर हमारा ध्यान खींचती है । बाद में 2014 में रटलेज से इन्हीं डेविड लेन की किताब ‘द कैपिटलिस्ट ट्रान्सफ़ार्मेशन आफ़ स्टेट सोशलिज्म: द मेकिंग ऐंड ब्रेकिंग आफ़ स्टेट सोशलिस्ट सोसाइटी, ऐंड ह्वाट फ़ालोड’ का प्रकाशन हुआ । इसमें बीस लेखों के जरिए लेखक ने राजकीय समाजवाद के निर्माण और उसकी बाजारोन्मुख समाजवादी आलोचना तथा बदलाव के बाद के विचित्र हासिल का विवेचन किया है ।    

शेरोन ज़ुकिन की किताब ‘बियांड मार्क्स ऐंड टीटो: थियरी ऐंड प्रैक्टिस इन यूगोस्लाव सोशलिज्म’ का प्रकाशन कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से बहुत पहले 1975 में हुआ था लेकिन 2008 में इसका इलेक्ट्रानिक संस्करण प्रकाश में आया है । एक समय ऐसा भी था जब सोवियत संघ के शासन के तरीके के विकल्प में यूगोस्लाविया और टीटो का नाम लिया जाता था । टीटो का नाम गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों में नेहरू और नासिर के साथ लिया जाता था । किताब इसी परिघटना को समझने के क्रम में लिखी गई थी ।

89 के बाद माहौल के बदलाव ने अतीत को भी नयी निगाह से देखने का मौका मुहैया कराया । इसके तहत 2008 में न्यू एकेडेमिया पब्लिशिंग से बलाज़ अपोर, पीटर अपोर और ई ए रीस के संपादन में ‘द सोवियताइजेशन आफ़ ईस्टर्न यूरोप: न्यू पर्सपेक्टिव्स आन द पोस्ट वार पीरियड’ का प्रकाशन हुआ । इसी तरह 2008 में ही सेंट्रल यूरोपीयन यूनिवर्सिटी प्रेस से ओक्सानास र्किसोवा और पीटर अपोर के संपादन में ‘पास्ट फ़ार द आईज: ईस्ट यूरोपीयन रिप्रेजेन्टेशंस आफ़ कम्यूनिज्म इन सिनेमा ऐंड म्यूजियम्स आफ़्टर 1989’ का प्रकाशन हुआ । इस अतीत के निर्माण पर 2008 में सेंट्रल यूरोपीयन यूनिवर्सिटी प्रेस से मिशाल कोपेचेक के संपादन में ‘पास्ट इन द मेकिंग: हिस्टारिकल रिविजनिज्म इन सेंट्रल यूरोप आफ़्टर 1989’ का प्रकाशन हुआ । 2010 में सोशल साइंस रिसर्च सेंटर की ओर से ‘रेमेम्बरिंग कम्यूनिज्म’ का प्रकाशन हुआ जिसमें तमाम लोगों के लेख संकलित हैं । मारिया तोदोरोवा ने इसकी भूमिका लिखी है जिसमें उनका कहना है कि ‘वास्तविक समाजवाद’ के खात्मे के बाद संग्रहालयों के खुलने, संस्मरणों के प्रकाशन के चलते पूर्व समाजवादी मुल्कों के इतिहास में रुचि का विस्तार हुआ है । 2014 में सेन्ट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी प्रेस से मारिया तोदोरोवा, औगुस्ता दिमाउ और स्तेफान त्रोएब्स्त के संपादन में ‘रेमेम्बरिंग कम्यूनिज्म: प्राइवेट ऐंड पब्लिक रिकलेक्शंस आफ़ लिव्ड एक्सपीरिएन्स इन साउथईस्ट यूरोप’ का प्रकाशन हुआ ।

इस इलाके विभिन्न देशों के अतीत खुलने के प्रसंग में 2011 में ब्रिल से यानिस सिग केलोस की किताब ‘नेशनलिज्म फ़्राम द लेफ़्ट: द बुल्गारियन कम्यूनिस्ट पार्टी ड्यूरिंग द सेकंड वर्ल्ड वार ऐंड द अर्ली पोस्ट-वार ईयर्स’ का प्रकाशन हुआ । बुल्गारिया के ही बारे में 2013 में कार्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस से मेरी सी न्यूबर्गर की किताब ‘टोबैको ऐंड द मेकिंग आफ़ माडर्न बुल्गारिया’ का प्रकाशन हुआ । किताब में उन्नीसवीं सदी में बुल्गारिया के आधुनिकीकरण से शुरू करके कम्यूनिस्ट शासन तक के लम्बे इतिहास में तम्बाकू की भूमिका की छानबीन की गई है । इसी क्रम में बुल्गारिया के राजनीतिक इतिहास के साथ जोड़कर सामाजिक बदलावों को भी परखा गया है ।

अतीत के स्मरण का एक पहलू इन देशों की बौद्धिक समृद्धि का उत्खनन भी था । 2010 में लेक्सिंगटन बुक्स से कोस्टिका ब्रैडटन और सेर्गेई अलेक्स आउशाकिने के संपादन में ‘इन मार्क्स’ शैडो: नालेज, पावर, ऐंड इंटेलेक्चुअल्स इन ईस्टर्न यूरोप ऐंड रशिया’ शीर्षक किताब का प्रकाशन हुआ । संपादकों की भूमिका के अतिरिक्त किताब चार भागों में बांटी गई है । पूर्वी यूरोप की मार्क्सवादी बौद्धिक समृद्धि को उजागर करने के चलते किताब महत्वपूर्ण है । संपादकों ने प्रस्तावना में बताया है कि मार्क्सवाद राजनीतिक आंदोलन से पहले बहुमुखी दार्शनिक विचार था । इसमें मानव समाज और मानव इतिहास के बारे में कुछ धारणाएं शामिल हैं और मनुष्य की संभावनाओं को साकार करने के साधनों पर विचार किया गया है । बौद्धिकों ने सबसे पहले इस विचार को अपनाया और खास तरह की राजनीतिक भाषा में प्रस्तुत किया । इसे इतिहास की नियति साबित करने के लिए बौद्धिकों की लगातार जरूरत पड़ती रहती है । ये लोग मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के लेखन से तमाम विचारों, धारणाओं और शब्दावली का आयात करके न केवल पुष्ट इतिहास दर्शन का निर्माण करते हैं बल्कि वास्तविक जीवन से उत्पन्न तमाम चुनौतियों का समाधान भी प्रस्तुत करते हैं । इसके विरोधियों को भी इसी तरह दार्शनिक मोर्चे पर उनका खंडन करना पड़ता है ।

आज या समाजवादी दुनिया के लम्बे उथल पुथल से भरे इतिहास में यह बात भूल जाती है कि इस खित्ते में इस्लाम के अनुयायियों की आबादी भी अच्छी खासी थी । समाजवादी व्यवस्था और विचारों का ही असर है कि कट्टरपंथ के उदय के साथ इस इलाके का कोई जुड़ाव दिखाई नहीं देता । इस पहलू को उजागर करते हुए 2010 में रटलेज से रोलैन्ड डैनरायथर और ल्यूक मार्च के संपादन में ‘रशिया ऐंड इस्लाम: स्टेट, सोसाइटी ऐंड रैडिकलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की भूमिका और उपसंहार के अतिरिक्त किताब में बारह लेख संकलित हैं । आम तौर पर रूस के साथ ईसाइयत जुड़ी रही है । इस चक्कर में लोग भूल जाते हैं कि रूस में दस प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है और रूस में दूसरा सबसे बड़ा धर्म इस्लाम ही है । सारी दुनिया की राजनीति में इस्लाम जिस तरह चर्चा में आया उस तरह रूस में इस्लाम के सवाल पर बात नहीं होती । सोवियत संघ के पतन और इस्लाम में मूलगामी प्रवृत्तियों के उभार के चलते रूस में इस्लाम का सवाल जटिल हो गया है ।

सोवियत संघ के पतन के बाद बदलाव की दृष्टि से पोलैंड का नाम सबसे अधिक सुनाई पड़ा था । 2011 में मंथली रिव्यू प्रेस से तेदेउष कोवालिक की पोलिश में 2009 में छपी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘फ़्राम सोलिडैरिटी टु सेलआउट: द रेस्टोरेशन आफ़ कैपिटलिज्म इन पोलैंड’ का प्रकाशन हुआ । अनुवाद एलिज़ा लेवान्दोव्सका ने किया है । किताब में पिछले बीस सालों में पोलैंड में आए बदलावों पर लेखक के लिखे लेखों का संग्रह किया गया है । अनुवाद के दौरान अंग्रेजी भाषी पाठकों का ध्यान रखा गया है । इसी मसले पर भिन्न निगाह से 2013 में ब्रिल से जैक एम ब्लूम की किताब ‘सीइंग थ्रू द आइज आफ़ द पोलिश रेवोल्यूशन: सालिडैरिटी ऐंड द स्ट्रगल अगेन्स्ट कम्यूनिज्म इन पोलैंड’ का प्रकाशन हुआ ।

नवउदारीकरण की वित्तीकरण की लहर ने पूर्वी यूरोप के देशों को नये किस्म से पुनर्गठित किया । इन हालात का बयान करते हुए 2011 में पालग्रेव मैकमिलन से दानिए लागाबोर की किताब ‘सेन्ट्रल बैंकिंग ऐंड फ़ाइनैन्शियलाइजेशन: ए रोमानियन एकाउन्ट आफ़ हाउ ईस्टर्न यूरोप बीकेम सबप्राइम’ का प्रकाशन हुआ ।

जर्मनी की राजधानी में बनी दीवार शीतयुद्ध का जीवंत स्मारक थी । 2011 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से एडिथ शेफ़र की किताब ‘बर्न्ड ब्रिज: हाउ ईस्ट ऐंड वेस्ट जर्मन्स मेड द आयरन कर्टेन’ का प्रकाशन हुआ । किताब की प्रस्तावना पीटर श्नाइडर ने लिखी है । इस भूमिका में उन्होंने लेखिका की पद्धति की विशेषता यह चिन्हित की है कि वे व्यापक स्तर पर जर्मनी के विभाजन और एकीकरण की सामान्य कथा सुनाने की जगह किसी एक मसले के सहारे समस्या की पर्याप्त गहराई से पड़ताल करती हैं । वे विभाजक सीमा के दोनों ओर के दो कस्बों की कहानी के जरिए इस विभाजन की त्रासदी को उजागर करने का प्रयास करती हैं । वे प्रचुर संग्रहालयी सामग्री के बल पर ग्रामीण जर्मनी को प्रत्यक्ष कर देती हैं । उनके उठाए गए सवाल ऐतिहासिक महत्व के तो हैं ही, उनमें मानवीय और साहित्यिक परिप्रेक्ष्य भी भरपूर है । दो करीबी कस्बों के दोस्ताना रिश्तों के आपस में शत्रु बन बैठे देशों और परस्पर विरोधी व्यवस्थाओं के रिश्तों में बदलने की त्रासदी को लेखिका ने शिद्दत से उठाया है ।

2012 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से पालिना ब्रेन और मेरी न्यूबर्गर के संपादन में ‘कम्यूनिज्म अनरैप्ड: कनजम्पशन इन कोल्ड वार ईस्टर्न यूरोप’ का प्रकाशन हुआ । किताब में पूर्वी यूरोप के समाजवादी खेमे के देशों में रोजमर्रा के जीवन में उपभोग का अध्ययन किया गया है । समाजवादी सामूहिकता के आदर्श और उपभोग के निजी चरित्र के बीच के तनाव को भी उभारने और समझने का प्रयास किया गया है ।

सोवियत संघ के पतन के बावजूद इतिहास की निरंतरता की याद दिलाते हुए 2014 में मेहरिंग बुक्स से डेविड नार्थ की किताब ‘द रशियन रेवोल्यूशन ऐंड द अनफ़िनिश्ड ट्वेन्टीएथ सेन्चुरी’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि प्रथम विश्वयुद्ध के साथ बीसवीं सदी की शुरुआत 2014 से मानने के सवाल पर लगभग सभी सहमत हैं लेकिन सदी के खात्मे का सवाल विवादों के घेरे में है । तारीख के हिसाब से तो हम इक्कीसवीं सदी में आ गए हैं लेकिन डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी बीसवीं सदी की छाया से दुनिया बाहर नहीं आ सकी है । जीवंत उपस्थिति के अतिरिक्त उसकी विरासत का सवाल भी उठता रहता है । 2014 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से मार्क आर बेसिंगेर और स्टीफेन कोटकिन के संपादन में ‘हिस्टारिकल लीगेसीज आफ़ कम्युनिज्म इन रशिया ऐंड ईस्टर्न यूरोप’ का प्रकाशन हुआ । किताब में कुल ग्यारह लेख संकलित हैं जिनमें पहला संपादकों की प्रस्तावना है ।

2015 में वाइकिंग से डोमिनिक लाइवेन की किताब ‘द एन्ड आफ़ जारिस्ट रशिया: वर्ल्ड वार I ऐंड द मार्च टु रेवोल्यूशन’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का मानना है कि प्रथम विश्वयुद्ध के केंद्र में रूस था । इस तरह किताब रूसी क्रांति का अंतर्राष्ट्रीय इतिहास भी बन जाती है । रूस के यूरोपीकरण की कोशिश ने आधुनिक रूस के इतिहास और उसकी जनता पर सबसे अधिक प्रभाव डाला । लेखक का कहना है कि प्रथम विश्वयुद्ध के बिना भी बोल्शेविक सत्ता पर कब्जा तो कर सकते थे लेकिन उस पर कब्जा बनाए रखना युद्ध के बिना सम्भव न था । दूसरी ओर रूस ने उस युग में जो अंतर्राष्ट्रीय भूमिका निभाई उसकी अनदेखी हुई है । लेखक को लगता है कि अब तक प्रथम विश्वयुद्ध को ब्रिटिश, अमेरिकी, जर्मन और फ़्रांसिसी निगाह से देखा गया है लेकिन उन्हें उम्मीद है कि अगर इसे रूस की निगाह से देखा जाए तो अलग तस्वीर उभरेगी ।

जिस शासन का अंत हुआ उसकी अन्य तमाम खूबियों के साथ कला और संस्कृति बेहद महत्व का अंग था । समूची दुनिया को प्रभावित करने और पूंजीवाद विरोधी मूल्य के बतौर कला संस्कृति की रक्षा और प्रोत्साहन को इन देशों ने लड़ाई का हथियार बना दिया था । 2016 में सेंट्रल यूरोपीयन यूनिवर्सिटी प्रेस से जेरोम बाज़िन, पास्कल द्यूबोर्ग ग्लातिनी और प्योत्र प्योत्रोव्सकी के संपादन में ‘आर्ट बीयान्ड बार्डर्स: आर्टिस्टिक एक्सचेन्ज इन कम्यूनिस्ट यूरोप [1945-1989]’ का प्रकाशन हुआ । प्योत्र प्योत्रोव्सकी ने किताब की प्रस्तावना की शक्ल में आलोचनात्मक कला इतिहास की रूपरेखा पेश की है । इसके बाद संपादकों की लिखी भूमिका है । किताब में शामिल पैंतीस लेखों को चार भागों में बांटा गया है । सबसे पहला भाग कलाकारों के आवागमन पर केंद्रित है । दूसरे भाग में कलाकृतियों के आवागमन का विश्लेषण है । तीसरे भाग में पारदेशीय वैचारिक एकता का उल्लेख है । आखिरी चौथे भाग में यूरोप को परिभाषित करनेवाले तत्वों की पहचान करने की चेष्टा है । 2018 में प्लूटो प्रेस से बाब डेन्ट की किताब ‘पेंटिंग द टाउन रेड: पोलिटिक्स ऐंड आर्ट्स ड्यूरिंग द 1919 हंगारियन सोवियत रिपब्लिक’ का प्रकाशन हुआ ।

कला संस्कृति की दुनिया से ही जुड़े एक काम, अनुवाद के सिलसिले में 2019 में यूनिवर्सिटी आफ़ मासाचुसेट्स प्रेस से नतालिया कामोव्निकोवा की किताब ‘मेड अंडर प्रेशर: लिटररी ट्रान्सलेशन इन द सोवियत यूनियन, 1960-1991’ का प्रकाशन हुआ । सभी जानते हैं कि शीतयुद्ध की वैचारिक लड़ाई में सोवियत संघ ने प्रचार प्रसार के लिए अनुवाद को रणनीति के बतौर अपनाया था । राजकीय निर्देशन में अनुवाद की इस विशाल परियोजना पर बहुत कम विचार हुआ है । लेखिका ने इस सरकारी परियोजना को किताब में समझने की कोशिश की है । यह अनुवाद साहित्यिक था । इस तरह के अनुवाद के लिए लगाव की जरूरत होती है । साहित्य के प्रति अनुवादकों के लगाव, लिखित और उच्चरित शब्द के प्रति उनके सम्मान और ज्ञान के प्रसार की उनकी आकांक्षा ने अनेकानेक रचनाओं को नई संस्कृति में नया जीवन प्रदान किया । साहित्य और भाषाओं से लगाव के चलते अनुवादकों ने आधुनिक साहित्य की अलक्षित रचनाओं को चुना और तमाम बाधाओं के बावजूद उनके अनुवाद प्रकाशित कराने का रास्ता खोजा । किताब लिखने के दौरान लेखिका की मुलाकात इस काम में लगे तमाम प्रतिभाशाली लोगों से हुई । किताब का लेखन लेखिका के नगर पीटर्सबुर्ग में हुआ । यह नगर पूरी दुनिया में अपने स्थापत्य, कला और साहित्य के लिए मशहूर है । इसके अनुवादकों की चर्चा कम ही होती है जिन्होंने मास्को के अनुवादकों के साथ मिलकर बीसवीं सदी में रूसी साहित्य, अनुवाद और प्रकाशन की दुनिया ही बदल दी । उनमें से अनेक अनुवादक अब भी जीवित हैं । सामान्य जीवन में भी वे अपने पेशे की तरह ही पृष्ठभूमि में मौजूद रहते हैं । उन्होंने चुन चुनकर दुनिया भर के श्रेष्ठ साहित्य से रूसी जनता को परिचित कराया ।

लेखिका ने जब किताब पर काम प्रारम्भ किया तो अनुवादकों ने उनको एक दूसरे के बारे में बताना शुरू किया । धीरे धीरे इसकी जद मे मास्को के अनुवादक भी आ गए । इनकी याददाश्त में अंतर्विरोध थे, उनके विचार भी भिन्न भिन्न थे लेकिन उन्हें एक सूत्र में बांधने वाली चीज साहित्यानुराग और अनुवाद की ताकत पर भरोसा थी । सोवियत संघ के समूचे जीवनकाल में अनूदित साहित्य में रूसी पाठकों की रुचि बनी रही । उन्हें राजनीतिक वजहों से विदेश यात्रा का अवसर नहीं मिलता था । ऐसी स्थिति में दूसरे देशों के बारे में जानकारी हासिल करने का स्रोत बहुत हद तक अनूदित साहित्य ही था । दुर्लभ विदेशी साहित्य के अनुवाद खरीदने के लिए लोग घंटों कतार में खड़े रहते थे । इसके अतिरिक्त दोस्तों से उधार लेकर पढ़कर अगले रसिक को दे देते थे । पाठक इसे मनोरंजन के साथ ज्ञान का स्रोत भी समझते थे ।

उस समय अनुवादकों को दूसरी दुनिया का बाशिंदा समझा जाता था । उन्हें विदेशी भाषाएं मालूम होती थीं । रूस में माध्यमिक शिक्षा का अनिवार्य अंग विदेशी भाषा होती लेकिन उसके अध्यापन के तरीके के चलते शायद ही कोई उसे बोल समझ पाता । ऐसे में अनुवादकों को श्रद्धा से देखा जाता । विदेशी भाषा में उनकी दक्षता के कारण विदेशी माहौल और विदेशी साहित्य की उनकी जानकारी प्रामाणिक मानी जाती । सोवियत संघ से बाहर की दुनिया उनके सम्पर्क के भीतर होने की आशंका के चलते सरकार भी चौकन्ना रहती थी । मास्को और पीटर्सबुर्ग इनके केंद्र थे ।

जिस क्षेत्र में समाजवाद का प्रभाव था उस क्षेत्र में नयी पहचानों का निर्माण हो रहा है । इनमें से एक उदीयमान पहचान की विशेषता बताते हुए 2018 में पालग्रेव मैकमिलन से आयन ला और मार्टिन कोवात्स की किताब ‘रीथिंकिंग रोमा: आइडेन्टिटीज, पोलिटिसाइजेशन ऐंड न्यू एजेन्डाज’ का प्रकाशन हुआ । इसी तरह 2018 में आइ बी तौरिस से अलुन थामस की किताब ‘नोमाड्स ऐंड सोवियत रूल’ का प्रकाशन हुआ ।

2018 में लेक्सिंगटन बुक्स से स्तेफानो बोतोनी की किताब ‘स्तालिन’स लीगेसी इन रोमानिया: द हंगारियन आटोनोमस रीजन, 1952-1960’ का प्रकाशन हुआ । 2018 में रटलेज से आग्नेश्का म्रोज़िक और स्तानिस्लाव होलुबेक के संपादन में ‘हिस्टारिकल मेमोरी आफ़ सेंट्रल ऐंड ईस्ट यूरोपीयन कम्युनिज्म’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब के तीन भागों में ग्यारह लेख संकलित हैं । पहले भाग के लेखों में उत्तर समाजवादी यूरोप में वाम की यादगार का विश्लेषण है । दूसरे भाग के लेखों में मध्य और पूर्वी यूरोप में यादगारी भूदृश्य की परीक्षा है । तीसरे भाग के लेख 1989 के पहले चल रही स्मृति की राजनीति का विवेचन करते हैं ।                 

2019 में इंडियाना यूनिवर्सिटी प्रेस से अनस्तासिया लख्तिकोवा, एंजेला ब्रिंटलिंगर और इरिना ग्लुश्चेंको के संपादन में ‘सीजन्ड सोशलिज्म: जेंडर ऐंड फ़ूड इन लेट सोवियत एवरीडे लाइफ़’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की भूमिका के अतिरिक्त किताब के तीन भागों में ग्यारह लेख संकलित हैं । पहले भाग के लेखों में घरेलू या सार्वजनिक रसोई में स्त्रियों के लगाने के रुख के बारे में बताया गया है । दूसरे भाग में उत्पादकों, वितरकों और उपभोक्ताओं के संघर्ष और समर्पण का बयान है । तीसरे भाग के लेख अभाव से उत्पन्न भोजन की आदतों का विश्लेषण है । इसके अतिरिक्त डायने पी कोएनकर ने पश्चलेख भी लिखा है ।

2020 में स्प्रिंगेर से मेरी डेलेनबाग-लोसे की किताब ‘इनवेन्टिंग बर्लिन: आर्किटेक्चर, पोलिटिक्स ऐंड कल्चरल मेमोरी इन द न्यू/ओल्ड जर्मन कैपिटल पोस्ट-1989’ का प्रकाशन हुआ । किताब जर्मनी के इस नगर को ऐतिहासिक महत्व प्रदान करने की प्रक्रिया की छानबीन करती है ।

2020 में पालग्रेव मैकमिलन से अलेक्सांद्र एकिमोव और गेन्नादी कज़ाकेविच के संपादन में ’30 ईयर्स सिन्स द फ़ाल आफ़ द बर्लिन वाल: टर्न ऐंड ट्विस्ट्स इन इकोनामीज, पोलिटिक्स, ऐंड सोसाइटीज इन द पोस्ट-कम्युनिस्ट कंट्रीज’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब के चार भागों में कुल सोलह लेख संकलित हैं । पहले भाग के लेखों में उत्तर-कम्युनिस्ट देशों के हाल का बयान है । दूसरे भाग के लेख रूस के मूल्यों, सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े हुए हैं । तीसरे भाग के लेखों में मध्य एशिया के समाजार्थिक हालात का जायजा लिया गया है । आखिरी चौथे भाग के लेखों में इतिहास, उदारवाद, संस्कृति और राजनीतिक बदलाव के मामले में पूरब और पश्चिम की तुलना की गई है । 

2020 में पालग्रेव मैकमिलन से जूडिथ मैककिनी की किताब ‘रशियन वीमेन ऐंड द एन्ड आफ़ सोवियत सोशलिज्म: एवरीडे एक्सपीरिएन्सेज आफ़ इकोनामिक चेन्ज’ का प्रकाशन हुआ । गोर्बाचेव को सोवियत संघ का समापन किए पचीस साल बीते और कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव पद ग्रहण किए तीस साल । उनके शासन में देश के योजना आधारित केंद्रीय अर्थतंत्र और उत्पादन के साधनों पर राज्य के अधिकार से बाजार और निजी मालिकाने की प्रधान भूमिका वाली अर्थव्यवस्था में संक्रमण हुआ था । इसके बाद न तो वह अमेरिकी अर्थतंत्र की तरह का देश बना न  पहले जैसा ही रह सका । सही बात है कि कुछ मामलों में राज्य के नियंत्रण की वापसी हुई है लेकिन सामान्य रूसी जनता का जीवन पूरी तरह से बदल चुका है । व्यवस्था और नीतियों में बदलाव के अतिरिक्त तकनीकी प्रगति भी इसका बड़ा कारण है ।

2020 में कार्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस से माया नाडकर्णी की किताब ‘रीमेन्स आफ़ सोशलिज्म: मेमोरी ऐंड द फ़्यूचर्स आफ़ द पास्ट इन पोस्टसोशलिस्ट हंगरी’ का प्रकाशन हुआ ।

2020 में यू सी एल प्रेस से जोनाथन बाख और मिचल मुराव्सकी के संपादन में ‘री-सेन्टरिंग द सिटी: ग्लोबल म्यूटेशंस आफ़ सोशलिस्ट माडर्निटी’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब में शामिल बीस लेख छह भागों में संयोजित हैं ।

किताबों की इस सूची को देखने से अनुमान होता है कि शीतयुद्ध की वापसी के इस दौर में रूस और चीन के विरुद्ध संगठित प्रचार अभियान के साथ ही नवउदारवादी वैचारिकी को ऊंचाई पर ले जाकर राजकीय कल्याण की किसी भी प्रक्रिया को संदिग्ध बना देने का प्रयास जारी है । तीस साल बाद भी समाजवाद का नाम दुनिया की एकमात्र महाशक्ति को परेशान करने के लिए काफी है । इस सुनियोजित लड़ाई के साथ ही उस भूभाग को दिमाग से अदृश्य बना देने का नतीजा है कि आम तौर पर पहले जिन इलाकों में समाजवादी शासन हुआ करता था वहां की हलचलों की कोई सूचना तक नहीं मिलती । आज भी उन क्षेत्रों में स्थिरता कायम नहीं हो सकी है और पूंजीवाद अपनी इस विफलता को सामने नहीं आने देना चाहता ।

महामारी के इस दौर में अर्थतंत्र की बर्बर निरंकुशता पर सामाजिक अंकुश लगाने के उस मानव प्रयास को इतिहास से मिटा देने की महीन और मोटी कोशिशों के बावजूद दुनिया के किसी न किसी हिस्से से उसके प्रति दुर्निवार आकर्षण की खबर आती रहती है । मनुष्य को गरिमा और सम्मान का जीवन प्रदान करने के उस प्रयास ने न केवल कामगारों बल्कि स्त्री, बालक, युवक और अशक्त लोगों को जैसा सामाजिक जीवन उपलब्ध कराया था उसका अध्ययन आज भी आधुनिकता के साथ सहकार और मानवीय सरोकार पर आधारित सामुदायिक जीवन गढ़ने के रचनात्मक तरीकों को आजमाने की प्रेरणा देता रहेगा ।      

Saturday, October 17, 2020

मार्क्सवाद की समझ

 

                   

2019 में डेमोक्रेसी ऐट वर्क से रिचर्ड डी वोल्फ़ की किताब ‘अंडरस्टैंडिंग मार्क्सिज्म’ का प्रकाशन हुआ । पतली सी इस किताब में लेखक का कहना है कि 2008 के गम्भीर पूंजीवादी संकट की बेचैनी से ब्रेक्सिट, ट्रम्प, प्रवासी और विदेशी विरोधी दक्षिणपंथी लहर पैदा हुई है । 1929 के पूंजीवादी संकट के बाद घटी घटनाओं का दुहराव होता हुआ दिखाई दे रहा है । आर्थिक गिरावट का भय व्याप्त है । शिक्षा, मीडिया या सामाजिक आंदोलन संकट के दुहराव से निपटने का रास्ता नहीं बता पा रहे । हताशा और क्रोध में लोग किसी भी किस्म के बदलाव के साथ चले जा रहे हैं । शीतयुद्ध के पचास साला इतिहास को देखते हुए इस क्षोभ का दक्षिणपंथ के पक्ष में चले जाना बहुत आश्चर्यजनक नहीं है । आर्थिक संकट के लिए जिम्मेदार राजनीतिक संस्थान के विरोध का उन्हें यही तरीका समझ आ रहा है । अधिकांश समाजवादी पार्टियों ने नव उदारवाद का पल्ला थामकर जनता को विकल्पहीन बना दिया था । धीरे धीरे उन्हें अपनी गलती समझ आ रही है और वे वर्तमान समाजार्थिक हालात की बुनियादी आलोचना करना शुरू कर चुके हैं । अब व्यवस्था परिवर्तन की बातें हो रही हैं । इसी क्रम में पूंजीवाद की आलोचना की मार्क्सवादी परम्परा से उनका परिचय हो रहा है । मार्क्सवाद तथा उससे व्युत्पन्न सामाजिक बदलावों के बारे में आसान लेखन की मांग हो रही है । किताब इसके उत्तर में लिखी गई है । इसमें वर्तमान समस्याओं के वास्तविक समाधान का आधार प्रस्तावित किया गया है और विषमता, अस्थिरता और प्रतिक्रियावादी राजनीति पर आधारित समकालीन पूंजीवादी व्यवस्था की कलई उतारी गई है । मार्क्सवाद सदा से पूंजीवाद की आलोचना का हथियार रहा है । इस संघर्ष में दोनों ने एक दूसरे को बदला है । पूंजीवाद की अतियों और गिरावट की रोशनी में जब मार्क्सवाद फिर से प्रकट हुआ है तो इस समय के लिहाज से उसका नवीकरण होगा ।

इस प्रस्तावना के बाद लेखक ने पहले अध्याय में पूंजीवादी अर्थतंत्र की मार्क्सी आलोचना की ताकत और उपयोगिता को परखने की कोशिश की है । मार्क्स के समय के मुकाबले अब पूंजीवाद विश्व व्यवस्था बन चुका है । इस क्रम में उसमें बहुतेरे बदलाव आए हैं फिर भी इसका सार ऐसी अर्थव्यवस्था है जो गुलामी और सामंतवाद या अन्य किसी व्यवस्था से भिन्न है । वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और वितरण का पूंजीवादी तरीका उसी बुनियादी संरचना, गति, गलती और अन्याय पर टिका हुआ है जिसकी तीखी आलोचना मार्क्स ने की थी । सवाल है कि मार्क्स जैसे आलोचकों की बात पर ध्यान क्यों दिया जाए । उत्तर में लेखक बताते हैं कि किसी भी समाज के प्रशंसकों के मुकाबले उसके आलोचक उसे भिन्न नजर से देखते हैं । संतुलित और समझदार राय कायम करने के लिए इस पर ध्यान देना उचित होगा । मान लीजिए अगर आपको किसी परिवार का अध्ययन करना है तो उसे संसार का सर्वोत्तम परिवार मानने वाले से ही बात करके सही नतीजा नहीं मिलेगा । पूंजीवाद के मामले में इस किस्म के रुख के साथ मुसीबत यह है कि प्रशंसकों और आलोचकों के बीच बेहद तीखा टकराव रहता है । मानना ही होगा कि मार्क्स, मार्क्सवाद या समाजवाद जैसे शब्द कुछ लोगों के लिए काफी दिनों से डरावने रहे हैं । अमेरिका में तो शीतयुद्ध की शुरुआत से पहले ही पूंजीवाद के आलोचकों को खतरनाक घोषित कर दिया गया था । मार्क्स या मार्क्सवाद से भय और नफ़रत व्यापक पैमाने पर सिखाई जाती है । इसीलिए अधिकतर अमेरिकी उनके विचारों पर कोई ध्यान नहीं देते । अध्यापक उनके लेखन को खारिज करते रहे हैं इसीलिए उन अध्यापकों से दीक्षित शिक्षार्थी भी उनको देखने या समझने की जहमत नहीं उठाते । वह तो 2008 के संकट ने साबित कर दिया कि अस्थिरता पूंजीवाद की विशेषता बनी हुई है । इसी तरह विषमता की मौजूदगी ने पूंजीवाद की कल्याणकारी क्षमता के झूठ पर से परदा उठा दिया । इन सब बातों के चलते पूंजीवाद के आलोचकों को समझने की कोशिश विगत दशकों में शुरू हुई है । इन आलोचकों में मार्क्स का नाम सबसे ऊपर है ।

दूसरे अध्याय में लेखक ने इस बात पर विचार किया है कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में आखिर युवा मार्क्स को पूंजीवाद की आलोचना क्यों करनी पड़ी । इसका जवाब एक हद तक अठारहवीं सदी की फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों में निहित है । मार्क्स ने इन क्रांतियों के नारों को खासकर अपनाया । फ़्रांस से स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तथा अमेरिका से लोकतंत्र की धारणा लेकर उन्हें आधुनिक समाज में साकार करना चाहा । अपने समय के ढेर सारे युवकों की तरह उनको भी यकीन था कि पूंजीवाद इन धारणाओं को अमलीजामा पहनाने में मदद करेगा । लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनको पूंजीवाद के इस वादे में अंतर्विरोध नजर आने शुरू हुए । गुलामी और सामंतवाद की जगह पूंजीवाद की स्थापना तो हुई लेकिन क्रांतियों के इन नारों की दिशा में उसकी बढ़त का कोई सबूत नहीं दिखा । असलियत में तमाम किस्म के सामाजिक विभाजन पैदा हो गए । मार्क्स को यह पूंजीवाद का छल प्रतीत हुआ । वे इस धोखे के शोध में जुट गए । इसी गहन शोध का नतीजा पूंजीवाद की आलोचनात्मक समझ में उनके योगदान के रूप में निकला । उन्होंने पाया कि पूंजीवाद की अपनी संरचना और उसके सामाजिक परिणाम ही इन नारों के साथ उसके छल के प्रमुख कारण हैं । इस अनुभूति के बाद उन्होंने इन नारों को अपना लिया । तब उन्हें लगा कि इन नारों को अमल में लाने के लिए पूंजीवादी अर्थतंत्र को बदलने की जरूरत है ।  

इस फैसले पर पहुंचने के लिए उन्होंने गहन ऐतिहासिक शोध किया । गुलामी और सामंती अर्थतंत्र संबंधी शोध से उन्हें काफी दृष्टि मिली । गुलामी में मालिक और गुलाम होते हैं । काम गुलाम करते हैं और मालिक निगरानी करते हैं । इस व्यवस्था में गुलाम को कुछ भी स्वतंत्रता या लोकतंत्र हासिल न था । सामंती अर्थतंत्र में भूमिधर और भूदास आ बिराजे । अंतर यह था कि भूदास, गुलाम की तरह भूमिधर की निजी संपदा न थे । इनके मुकाबले पूंजीवाद भिन्न था । क्रांतियों ने गुलामी और भूदासता को उखाड़ फेंका । लोग बालिग मताधिकार का प्रयोग करके लोकतंत्र के मातहत रह सकते थे । इस भिन्नता के बावजूद पुरानी व्यवस्था से इसकी कुछ समानता भी थी । इस समानता को ही शोषण के बतौर मार्क्स ने स्थापित किया । गुलाम के परिश्रम से पैदा वस्तुओं और सेवाओं पर मालिक का पूरा अधिकार होता था और वही तय करता था कि उसका कितना हिस्सा गुलाम को लौटना है । इस गुलाम के कार्यदिवस को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है । पहला वह जिसके पैदावार को उसको ही लौटाया जाएगा । इसे मार्क्स गुलाम का ‘अनिवार्य श्रम’ कहते हैं । बचे हुए हिस्से की मेहनत की पैदावार मालिक के पास जानी है । इसे मार्क्स ‘अतिरिक्त श्रम’ कहते हैं । यही तर्क सामंतवाद के साथ भी लागू होता है । भूदास को जमीन का जो टुकड़ा अपने भरण पोषण के लिए मिलता है उस पर की गई मेहनत की पैदावार उसके काम आती है । यह उसका अनिवार्य श्रम है । बचे हुए समय की मेहनत से होने वाली पैदावार भूमिधर के पास जाती है और वह अतिरिक्त श्रम है । ठीक यही पूंजीवाद में मजदूर के साथ होता है । इसे शोषण इसीलिए कहा गया क्योंकि मेहनत करने वाले की मेहनत से पैदा वस्तुओं और सेवाओं का एक हिस्सा उसकी जगह कोई और हड़प जाता है । आबादी का दो हिस्सों में विभाजन तो सारत: कायम रहता है, बस उसके रूप बदलते जाते हैं । पूंजीवाद भी उसी तरह की व्यवस्था है जिसमें मुट्ठी भर लोग बहुसंख्यक जनता पर शासन करते हैं । इसमें नियोक्ता और कर्मचारी के रूप में पुराना विभाजन ही कायम रहता है । नियोक्ता नेताओं को काबू में रखते हैं और उनके जरिए सामाजिक विकास की दिशा तय करते हैं । स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पक्ष में पूंजीवाद के न होने का कारण उसका आंतरिक संगठन है जिसमें कुछ ही लोग सभी तरह के फैसले लेते हैं । कर्मचारी इन फैसलों के भागीदार नहीं होते लेकिन इनके नतीजे उन्हें ही भुगतने पड़ते हैं ।

मार्क्स का देहांत 1883 में हुआ । बाद के वर्षों में संसार भर में लोगों ने उनके विचारों से प्रेरणा ली । दुनिया के सभी देशों में मार्क्सवाद विविध रूपों में फैला । उनके लेखन में ज्यादातर आर्थिक सवालों पर विचार किया गया है । वे उस समय के बौद्धिक थे जब शिक्षा और साक्षरता भी बहुत कम लोगों को उपलब्ध थी । दर्शन की शिक्षा ग्रहण की थी लेकिन बाद में आसपास की स्थिति को समझने के क्रम में अर्थशास्त्र की ओर मुड़े । इसमें उन्होंने कहा कि अनादि काल से लोग अतिरिक्त का उत्पादन करते रहे हैं । प्रत्येक समाज में मनुष्य श्रम की बदौलत जीवित रहा है । अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति का रूपांतरण ही श्रम है । लेकिन कुछ लोग हमेशा से ऐसे रहे हैं जो दूसरों की मेहनत पर निर्भर रहे हैं । इनके लिए शेष लोगों को खुद की जरूरत से अधिक का उत्पादन करना पड़ता रहा है । खुद के इस्तेमाल से अधिक इसी उत्पादन को मार्क्स अतिरिक्त कहते थे ।

तीसरे अध्याय में उनका कहना है कि मार्क्स का योगदान अधिकतर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में है । जब यूरोप में बहुत कम लोग शिक्षित या साक्षर हुआ करते थे उस समय के वे प्रतिबद्ध बौद्धिक थे । उनकी औपचारिक शिक्षा दर्शन में हुई थी लेकिन आस पास की दुनिया में रुचि के चलते जल्दी ही वे अर्थशास्त्र की ओर चले आये । मार्क्स का कहना था कि प्रत्येक ज्ञात मानव समाज में लोग अधिशेष का उत्पादन और वितरण करते आ रहे हैं । असल में प्रत्येक समाज में मनुष्य अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए श्रम की बदौलत प्रकृति का रूपांतरण करके जीवित रहा है । इस प्रक्रिया में वह अपने दिमाग और मांसपेशियों का इस्तेमाल प्रकृति को उपभोग्य उत्पाद में बदलने के लिए करता है । लेकिन सभी लोग श्रम नहीं करते । सभी मानव समाजों में एक हिस्सा ऐसा रहा है जो खुद श्रम करने की जगह दूसरों के श्रम से पैदा अधिशेष से जीवन यापन करता रहा है । जो उत्पादक होते हैं वे अधिशेष का उत्पादन करते हैं । समाज व्यवस्था के आलोचक होने के नाते मार्क्स इन दोनों के बीच भेद पर जोर देते हैं । कुछ कामगार ऐसे हैं जो अधिशेष का उत्पादन करते हैं और कुछ उस अधिशेष से लाभ उठाते हैं । इस भेद के चलते ही व्यवस्था के प्रति दोनों के रुख में अंतर देखा जाता है । मालिकों को मिलने वाले अधिशेष के चलते उनका हित मौजूदा व्यवस्था के बने रहने में होता है । मानव श्रम के शोषण की पहले की व्यस्थाओं के मुकाबले पूंजीवाद में यह शोषण नौकरी की औपचारिकताओं के परदे में छिपा रहता है । अपने ग्रंथ ‘पूंजी’ के पहले खंड में मार्क्स ने इसी परदे को तार तार करके अधिशेष के उत्पादन और वितरण की पूंजीवादी व्यवस्था को नंगा कर दिया । मशीन और कच्चे माल की लागत को घटा देने के बाद भी कामगार के श्रम से पैदा मूल्य उसको वेतन के रूप में चुकाये हुए मूल्य से अधिक होता है । पूंजीवादी व्यवस्था में यही अधिशेष अतिरिक्त मूल्य कहा जाता है । उत्पाद की बिक्री पर यह अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति को मुनाफ़े के रूप में हासिल हो जाता है । इसका एक हिस्सा वह कच्चे माल और उपकरणों की खरीद पर खर्च करता है, दूसरा हिस्सा श्रमिक को वेतन के रूप में देता है और तीसरे हिस्से को हड़प लेता है । इस व्यवस्था की समानता दास प्रथा से होने के कारण ही मार्क्स ने इसे पगारजीवी गुलामी कहा है । शोषण की इस व्यवस्था के चलते ही पूंजीवाद स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और लोकतंत्र जैसे अपने वादों को लागू नहीं कर सकता । इसीलिए इन्हें हासिल करने के लिए समाज से मनुष्य के शोषण की व्यवस्था समाप्त करनी होगी । अगर समाज के मुट्ठी भर लोग अधिकांश जनता द्वारा उत्पादित अधिशेष पर कब्जा कर लेते हैं और उसका मनमाना वितरण करते हैं तो यह बात फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों के घोषित प्रगतिशील मूल्यों के विरोध में जाती है और उन घोषणाओं को व्यर्थ कर देती है । अतिरिक्त मूल्य संबंधी मार्क्स के चिंतन को समझें तो पूंजीवादी समाज में मौजूद आजादी भ्रम साबित होती है । आजादी हासिल करने के लिए इस व्यवस्था को बदलना होगा । मार्क्स कहते हैं कि शोषक समाजों में उत्पादित अधिशेष का उपयोग इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए किया जाता है । यही कारण है कि मालिकों को केवल अर्थतंत्र ही नहीं, बल्कि राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में भी बरतरी प्राप्त होती है ।

शोषण और अधिशेष संबंधी विवेचन के सहारे मार्क्स वर्ग की नयी धारणा निर्मित करते हैं जो वर्ग की पारम्परिक धारणा से अलग है । मार्क्स से पहले वर्ग की बात करते समय लोग संपत्ति या ताकत के आधार पर आबादी को विभिन्न समूहों में विभाजित करते थे । संपत्ति का आधार लेने वाले अमीर गरीब या मध्य वर्ग के ऊपर और नीचे का विभाजन करते थे । ताकत पर जोर देने वाले शासक शासित का भेद बताते थे । मार्क्स ने वर्ग की इन पुरानी धारणाओं का इस्तेमाल सामाजिक आलोचना के लिए किया लेकिन साथ ही अतिरिक्त मूल्य के अपने विश्लेषण पर आधारित वर्ग की नयी धारणा का भी विकास किया । इसमें अधिशेष के उत्पादकों का वर्ग था, उसका अधिग्रहण करने वालों का वर्ग था और इसके वितरण में हिस्सा पाने वालों का वर्ग था । इनके बीच के टकरावों के चलते ही पूंजीवाद स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और लोकतंत्र के अपने वादों को निभाने में नाकाम रहता है । इस तरह मार्क्स ने वर्ग की अपनी धारणा से दिखा दिया कि सत्ता और संपत्ति के असमान वितरण के पुराने सामाजिक आलोचक उन सामाजिक अन्यायों को दूर करने में क्यों अक्षम रहे । वे आलोचक यह समझ नहीं सके कि सत्ता और संपत्ति के असमान सामाजिक वितरण में कमी लाने के लिए अधिशेष के संगठन को बदलना जरूरी है । उन्होने स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और लोकतंत्र के वादे को साकार करने के लिए शोषण का खात्मा जरूरी नहीं समझा । अधिशेष के उत्पादन और वितरण के संदर्भ में ही मार्क्स ने वर्गीय टकरावों पर ध्यान दिया ।

चौथे अध्याय की शुरुआत मार्क्स द्वारा पूंजीवादी अर्थतंत्र के विवेचन से होती है । मार्क्स का विवेचन माल से शुरू होता है । इसका मतलब कि किसी भी वस्तु को उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचने के लिए बाजार की मध्यस्थता से होकर गुजरना पड़ता है । पूंजीवादी उद्यम कच्चा माल और मजदूर की श्रम शक्ति को खरीदते हैं इनके जोड़ से पैदा होने वाले माल को बेचते हैं । पूंजीवाद की बड़ी विशेषता यह है कि इसमें श्रम शक्ति खरीदी और बेची जाती है । इस तैयार माल की बिक्री से पूंजीपति को जो धन प्राप्त होता है वह उसके उत्पादन की लागत से अधिक होता है । यही अतिरिक्त पूंजी है । मार्क्स के इस विश्लेषण से एक नतीजा निकलता है कि पूंजीपति, उत्पादक मजदूरों की मजदूरी कम करने की फ़िराक में हमेशा रहता है । इसी तरह वह काम का समय और उसकी गति भी बढ़ाना चाहता है । कारण कि वे जितना अधिक मूल्य पैदा करेंगे और बदले में उन्हें जितना कम देना पड़ेगा उतना अधिक अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति को हासिल होगा । जितना अधिक उसे अतिरिक्त मूल्य हासिल उतना अधिक धन वह पूंजीवादी व्यवस्था को कायम रखने में लगायेगा । दूसरी ओर उत्पादक मजदूर अपनी मजदूरी बढ़ाने की मांग करते हैं क्योंकि उनका और परिवार का जीवन स्तर इसी पर निर्भर होता है । पिछले तीन सौ सालों से सफलता के साथ पूंजीवाद अपना पुनरुत्पादन करता रहा और दुनिया भर में प्रमुख उत्पादन पद्धति के बतौर फैला । फिर भी उसने साबित किया कि संपत्ति के साथ ही वह दरिद्रता का भी उत्पादन करता है । दरिद्रता को पूंजीवाद समाप्त नहीं कर सका । असल में दरिद्रता को समाप्त करने के लिए पूंजीवादी अर्थतंत्र को बदलना जरूरी है ।

इसके बाद पांचवें अध्याय में वे पूंजीवादी अधिशेष के वितरण पर ध्यान देते हैं । असल में इस वितरण को देखने से ही पता चलता है कि पूंजीवादी समाज के अन्य तमाम पहलुओं पर इसका कितना गहरा प्रभाव है । इस अधिशेष का सबसे बड़ा हिस्सा तो पूंजीपति खुद के उपभोग में लगाता है । इसका मकसद निजी संतुष्टि के साथ ही शेष आबादी से खुद को अलगाना भी होता है । इससे विषमता पैदा होती और कायम रहती है । फिर ऐसी विचारधारा पैदा होती है जिसमें अधिशेष के उत्पादक और अधिग्रहणकर्ता व्यक्तियों के बीच भेद के लक्षण तय कर दिये जाते हैं । पहले के समाजों में जैसे विषमता को स्वभाव या ईश्वर की देन कहा जाता था उसी तरह पूंजीवादी समाज में इसे योग्यता की उपज मान लिया जाता है । समाज के सभी शासक चाहते हैं कि उनकी हैसियत को स्थायी समझा जाये । खुद के उपभोग से बचा हुआ हिस्सा वे प्रबंधकों और निरीक्षकों पर लगाते हैं क्योंकि अधिशेष के उत्पादन के लिए उनकी जरूरत होती है । उनके काम से अधिशेष का उत्पादन नहीं होता लेकिन उसके उत्पादन के लिए उनकी जरूरत पड़ती है । यह भेद महत्व का है । प्रबंधक कच्चे माल को विक्रेय माल में बदलने हेतु मशीन पर मेहनत तो नहीं करता लेकिन वह उत्पादक श्रमिकों को नियंत्रित करता है । अधिशेष की अबाध आमद के लिए ऐसे लोगों में उसका वितरण जरूरी होता है । ये अनुत्पादक श्रमिक होते हैं लेकिन उत्पादक श्रमिकों से अधिशेष उत्पादित कराने के लिए उसका होना आवश्यक है । पूंजीवाद के पुनरुत्पादन के लिए दोनों का होना जरूरी होने का मतलब उनके बीच के भेद का खात्मा नहीं होता । पूंजीवाद को अपने अस्तित्व के लिए जिसकी भी जरूरत महसूस होती है उन सबको वह अधिशेष का हिस्सा बांटता है । उदाहरण के लिए उत्पादित माल की चोरी की आशंका के चलते उसे सुरक्षा संबंधी अनुत्पादक श्रमिकों को उसका एक हिस्सा प्रदान करना पड़ता है । सलाहकारों, वकीलों और सरकारों को भी उसमें से ही कुछ कुछ हिस्सा देना पड़ता है ।

इस पूरी जटिल व्यवस्था के केंद्र में पूंजीपति होता है । एक ओर उसे उत्पादक श्रमिकों से अधिकतम अधिशेष हड़पना होता है तो दूसरी ओर उसे अनुमान लगाना होता है कि पूंजीवाद के बने रहने के लिए इस अधिशेष को विभिन्न हिस्सेदारों में किस तरह वितरित किया जाये । इसलिए भी पूंजीवाद का विकास एक समान नहीं होता । अलग अलग पूंजीपति वर्तमान और भविष्य का आकलन अलग अलग करते हैं । कुछ आकलन सटीक बैठते हैं तो कुछ गड़बड़ा जाते हैं । उनमें आपसी संदेह और किसी संयोजन के प्रति गहनतर संदेह के चलते विकास की इस असमानता को काबू करना सम्भव नहीं रह जाता । इसके कारण ही विकसित और अविकसित क्षेत्र पैदा होते रहते हैं और उनकी अदला बदली जारी रहती है ।

छठवें अध्याय में वे मार्क्स के विश्लेषण में अंतर्विरोध की भूमिका को उजागर करते हैं । समाज को गढ़ने वाली तत्कालीन प्रवृत्तियों के साथ ही उसके विपरीत काम करने वाली प्रवृत्तियों को भी पहचानते हैं । इन सबके भीतर भी कार्यरत उन विरोधी तत्वों को भी वे खोजते हैं जिनके चलते समाज अलग अलग दिशाओं में चलता नजर आता है । अंतर्विरोध में मार्क्स की गति का कारण हेगेल हैं जिनका मानना था कि सब कुछ अंतर्विरोधी है । मार्क्स ने इसी तरह पूंजीवाद को अंतर्विरोध से भरा हुआ पाया । वे बताते हैं कि उत्पादक कामगारों से प्रत्येक पूंजीपति अधिकतम अधिशेष हासिल करना चाहता है ताकि विभिन्न अंशधारकों में उसका संतोषजनक वितरण कर सके । जितना अधिक मिले उतना अधिक रकम व्यवस्था को कायम रखने में लगायी जा सकती है इसलिए उनकी लालच का कारण पूंजीवादी व्यवस्था को जारी रखने की होड़ है । मजदूरों की मजदूरी घटाकर अधिशेष बढ़ाया जा सकता है । कम मजदूरी पर बाहर से मजदूर बुलाना पूंजीवाद के लिए नयी बात नहीं है । इससे बेकार हो गये मजदूरों में विक्षोभ का जन्म होता है । मजदूरी कम करने से जो लाभ हुआ होता है वह इस विक्षोभ को काबू करने के उपायों में स्वाहा हो जाता है । कम मजदूरी वाले कामगारों की निष्ठा भी कम ही होती है । इसी तरह के तमाम अंतर्विरोध पैदा होते जाते हैं । कमाई बढ़ाने का एक और रास्ता मजदूरों की जगह मशीनों का इस्तेमाल है । मजदूरी घटाने के इन तमाम उपायों से सबसे घनघोर अंतर्विरोध पैदा होता है जिसके तहत मजदूर के पास धन की कमी का मतलब वस्तुओं की बिक्री में भी घटोत्तरी हो जाती है । मजदूरी संबंधी लागत में कमी आने से उत्पादित वस्तु को बेचने की चाहत का विरोधी तत्व पैदा हो जाता है । पूंजीवादी प्रक्रिया में ही पूंजीपति की सफलता का निषेध मौजूद होता है । इस अंतर्विरोध से बाहर निकलने का कोई रास्ता पूंजीवाद के भीतर नहीं निकलता । इस अंतर्विरोध से ही चक्रीय संकट उपजता है । मजदूरी संबंधी लागत घटाने से उत्पादित माल की मांग भी घट जाती है । पूंजीवादी व्यवस्था इसी तरह उतार चढ़ाव के चक्र में चलती है । इन अंतर्विरोधों के कारण ही पूंजीवादी व्यवस्था अस्थिर बनी रहती है । पूंजीवाद में जैसी समाजर्थिक अस्थिरता रहती है वैसी अस्थिरता अगर किसी व्यक्ति में नजर आये तो उसे इलाज कराना पड़ता है ।

मार्क्स का कहना है कि पूंजीवाद विषमता और अस्थिरता को जन्म देता है । इसलिए भी इस व्यवस्था को बदलना बेहद जरूरी है । मार्क्स के लेखन से हम पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्विरोधों, कमियों और अन्यायों को समझ पाते हैं । जिस तरह अधिशेष का अधिग्रहण और वितरण होता है उसके चलते ही स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व और लोकतंत्र को पूंजीवाद साकार नहीं कर सकता । अधिशेष के संगठन का विश्लेषण करके उन्होंने यह भी बताया कि पूंजीवाद की जगह जो व्यवस्था आयेगी उसमें अधिशेष के उत्पादक ही उसका अधिग्रहण करेंगे और उत्पादक तथा अनुत्पादक कामगार मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से तय करेंगे कि कैसी सामाजिक सेवा के बदले अधिशेष का कितना हिस्सा मिलना चाहिए ।

 

Thursday, October 15, 2020

विश्व पूंजीवाद और लोकतंत्र का अधिग्रहण

 

               

                                                

(सदी की शुरुआत में प्रकाशित इस किताब को पढ़ते हुए लग रहा था कि वर्तमान भारत की कथा पढ़ रहा हूं ।)

2001 में द फ़्री प्रेस से नोरीना हर्ट्ज़ की किताब ‘द साइलेन्ट टेकओवर: ग्लोबल कैपिटलिज्म ऐंड द डेथ आफ़ डेमोक्रेसी’ का प्रकाशन हुआ । किताब की शुरुआत 20 जुलाई 2001 से होती है जब वैश्वीकरण के विरोध में दुनिया भर से प्रदर्शनकारी जेनोआ में एकत्र हुए थे । निर्वाचित प्रतिनिधियों को विरोध की आवाज सुनाने के लिए इंटरनेट के जरिए इसकी गोलबंदी की गयी थी । उस दिन जी8 समूह की सालाना बैठक होनी थी । वैश्वीकरण विरोधी तमाम अभियानों से जुड़े लोगों को वहां एकत्र होना था । तरह तरह की भाषाओं में अलग अलग मुद्दों से सरोकार रखने वालों की जुटान होनी थी । लेखिका ने पिछले प्रदर्शनों के बारे में जो कुछ पढ़ा सुना था उसके आधार पर आंसू गैस के लिए तैयार थीं । उसके असर से बचने के लिए नीबू और सिरका रख लिया था तथा चेहरे को ढकने के लिए रूमाल लपेट लिया था । फिर भी इटली की पुलिस की क्रूरता के समक्ष यह सब नाकाफी साबित हुआ ।

पुलिस की क्रूरता से अधिक अचम्भा उन्हें प्रदर्शनकारियों की इस रंग बिरंगी दुनिया में उत्पन्न प्रचंड एकजुटता और सामुदायिकता से हुआ । साथ ही उनमें नेताओं और कारपोरेट व्यवसायियों के प्रति जबर्दस्त मोहभंग भी दिखाई पड़ा । वे सभी चुप्पी के षड्यंत्र को तोड़ने पर आमादा थे । शांतिवादी प्रदर्शनकारी नौजवान वाटर कैनन का धक्का पीठ पर झेल रहे थे । एक युवती ने लेखिका से कहा कि वह इस मकसद के लिए जान देने को तैयार है । यह सब कुछ बर्लिन की दीवार ढहने के बारह बरस बाद ही हो रहा था । रूस के समाजवादी शासन को समाप्त हुए बस दस बरस हुए थे । विरोध प्रदर्शन करने वालों के इस समूह में पेशेवर राजनेता कोई न थे । सभी सामान्य लोग थे । उनमें घरेलू स्त्रियों, स्कूल शिक्षकों-शिक्षिकाओं, कस्बे और शहरों के बाशिंदों की तादाद अच्छी खासी थी । पूरी दुनिया में सरकारों की निष्ठा और कारपोरेशनों के मकसद के बारे में सवाल उठ रहे हैं । लोगों को लग रहा है कि पूंजीवाद की कुछ ज्यादा ही खुराक ले ली गयी है, मुक्त बाजार ने कठोर सचाइयों पर परदा डाल दिया है और सरकारें हमारे हितों की देखरेख नहीं कर रही हैं । विकास की कीमत कुछ ज्यादा ही चुकानी पड़ रही है और वाणिज्य के शोर में लोगों की आवाजें गुम हो गयी हैं ।

थैचर के सत्ता में आने के साथ मुक्त बाजार के नाम पर आक्रामक पूंजी के जिस नये दौर की शुरुआत हुई थी और जिसकी नकल बाद में दुनिया भर में की गयी उसके खात्मे की आहट सुनायी देने लगी है । तमाम सड़कों को सोने से मढ़वा देने और अमेरिकी सपने के हकीकत में बदलने के वादों पर यकीन करने के लिए आज कोई तैयार नहीं है । अमीरी के रिसकर नीचे पहुंचने का सिद्धांत झूठी गप निकली । बाजार के अदृश्य हाथ से संचालित समाज भी न केवल अपूर्ण बल्कि अन्यायी साबित हुआ । शीतयुद्ध के बाद उभरने वाली दुनिया में एकता की जगह बिखराव नजर आने लगा । इसमें भ्रम, अंतर्विरोध और अस्थिरता का दबदबा हो गया । लोगों की राय, उनके अभिमत चुनाव की जगह धार्मिक संस्थानों, बाजार और सड़क पर व्यक्त होने लगे । लोगों और पार्टियों की निष्ठा निश्चित नहीं रह गयी । ब्रिटेन की लेबर पार्टी निजीकरण की मुहिम चलाने लगी । सरकारों की जिम्मेदारी कारपोरेट घरानों ने संभाल ली, नेताओं से अधिक ताकतवर व्यवसायी हो गये और व्यावसायिक हित सिर चढ़कर बोलने लगे । ऐसे में उनकी मनमानी पर रोक लगाने और नीति निर्माण पर असर डालने का एकमात्र तरीका विरोध प्रदर्शन ही रह गया । इनकी व्याप्ति का बड़ा कारण यही माहौल है ।

सरकार पर कारपोरेट जगत के इस गुपचुप कब्जे को थैचर और उनके साथी रीगन के शासन संभालने के साथ जोड़ा जाना उचित होगा । इन दोनों शासकों ने बलपूर्वक सरकार और राजनीति को कारपोरेट घरानों के हाथ में गिरवी रख दिया । साथ ही लोकतंत्र को मटियामेट करने का बीड़ा उठाया । उनकी कोशिशों के दूरगामी नतीजे निकले । इसके चलते आज की तारीख में राजनीति अधिकाधिक विक्रेय माल में बदलती जा रही है । इस माहौल को लेखिका ने बेनेटान के विज्ञापनों से तुलनीय बताया है जिनमें तस्वीर दर तस्वीर देखने वाले को धक्का तो लगता है लेकिन कुछ न कर पाने की असहायता भी महसूस होती है । युद्ध, गरीबी और एड्स के बारे में इस किस्म के विज्ञापन जारी करने के अतिरिक्त यह कंपनी और कुछ नहीं करती । उसका मकसद इन विज्ञापनों के सहारे अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाना होता है, कोई सार्वजनिक बहस चलाना या लोगों में संवेदना जगाना नहीं । उन विज्ञापनों की तरह ही राजनेता आजकल चुनाव जीतने के लिए अपने विरोधियों के बारे में धक्का पहुंचाने वाला प्रचार करते हैं । उनके बारे में कोई सनसनीखेज आरोप प्रचारित करके मतदाता के सामने खुद को रक्षक की तरह पेश करते हैं । हालात को बदलने के हवाई वादे करते हैं । उनकी बातों का सचाई से कोई लेना देना नहीं होता । उनके वादे बेनेटान के विज्ञापनों की तरह के वादे होते हैं जिनकी हकीकत तस्वीर तक ही सिमटी रहती है । राजनीतिक समाधान ब्रांडेड कपड़ों की तरह एकरंगा होते हैं । पार्टियों के भेद से उनके वादों में अंतर नहीं आता । सभी पार्टियों के नेता मुक्त अर्थतंत्र, उपभोक्तावाद, वित्तीय ताकत और खुले व्यापार की वकालत करते हैं । इसे वे जिस भी तरह से पेश करें, अगुआ कारपोरेट घराना ही होता है जिसकी सेवा सरकार करती है और नागरिक उसके उपभोक्ता होते हैं ।

लेखिका का कहना है कि सर्वसम्मति के बावजूद यह व्यवस्था सफल नहीं हो पा रही है । कुल वैचारिक घटाटोप और पूंजीवाद की जीत के उद्घोष के बावजूद दरारें प्रकट होना शुरू कर चुकी हैं अन्यथा लोग इतनी भारी तादाद में दुकानों की बजाय सड़क पर क्यों नजर आते । अगर नेता नागरिकों की चाहत के मुकाबले कारपोरेट घरानों के हितों से संचालित हो रहे हैं तो लोकतंत्र का अर्थ ही क्या है ।

आंदोलनों में लोगों की भागीदारी अचानक नहीं बढ़ी, इसमें कुछ समय लगा । उनको सरकारों की इस हकीकत को स्पष्ट देखने में वक्त लगा कि वे ऐसी साफ और सुरक्षित दुनिया बनाने में विफल हो गयी हैं जिनमें बच्चों को जीवन बिताना खुशनुमा लगे । जब तक लोगों की जिंदगी में बेहतरी कायम रही उन्होंने व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाये । शेयर बाजार में तेजी थी, ब्याज की दर में कमी आ रही थी । बहुतेरे लोगों को अपना घर हासिल हुआ । घरों में टेलीविजन आया, कारें आयीं । कुल मिलाकर मध्य वर्ग का विस्तार हो रहा था । यह भ्रम बना हुआ था कि ऐसे ही सब कुछ बना या बढ़ता रहेगा । इस पूंजीवादी सपने की गिरफ़्त हम पर बनी रहती है । संचार माध्यमों के जरिए इसको रंग पोतकर प्रसारित प्रचारित किया जाता है और इसकी रंचमात्र आलोचना को सचेत रूप से कुचल दिया जाता है । विरोध प्रदर्शनों में जनता की भारी मौजूदगी के बावजूद प्रचार माध्यमों में उनका जिक्र तक नहीं होता । टेलीविजन को जब कभी खोलकर देखने बैठिये उसमें मुनाफ़ा आधारित समाज व्यवस्था को राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक आधार पर जायज ठहराया जाता है । जब किसी संस्था ने अमेरिकी लोगों के उपभोग के स्तर को देखते हुए साल के एक दिन कोई खरीदारी न करने का विज्ञापन प्रसारित करना चाहा तो सभी टेलीविजन वालों ने इनकार कर दिया हालांकि संस्था विज्ञापन की कीमत देने को तैयार थी । अमेरिकी उपभोक्ता मेक्सिकोवासी से पांच गुना, चीनवासी से दस गुना और भारतीय से तीस गुना अधिक वस्तुओं का उपभोग करता है । एक चैनल ने तो कहा कि संस्था का विज्ञापन अमेरिका की वर्तमान आर्थिक नीति के विरुद्ध और नुकसानदेह है ।

लेखिका के मुताबिक हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां उपभोक्तावाद को ही आर्थिक नीति माना जाता है, कारपोरेट हितों का दबदबा है और संचार मध्यमों से उनकी ही शब्दावली उगली जाती है तथा उनके साम्राज्यवादी शासन तले देश का गला घोंट दिया जाता है । ये कारपोरेशन विकराल वैश्विक दैत्य में बदल चुके हैं जिनके हाथ में अथाह राजनीतिक ताकत है । निजीकरण, खुलापन और तकनीकी उन्नति के चलते शक्ति केंद्र में बदलाव आया है । सबसे बड़े सौ कारपोरेशनों के कब्जे में दुनिया की कुल विदेशी संपदा का पांचवां हिस्सा है और दुनिया के सबसे बड़े सौ अर्थतंत्रों में इक्यावन कारपोरेट प्रक्रम ही हैं । ढेर सारे छोटे देशों का समूचा सालाना बजट इन कंपनियों की कमाई के आगे कुछ भी नहीं है । इन कंपनियों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है । दो या दो से अधिक कंपनियों के विलय के चलते इनकी आर्थिक गतिविधि का आंकड़ा दिमाग को चकरा देने वाली संख्याओं में व्यक्त होता है । सन 2000 में पांच हजार कंपनियों का विलय हुआ था । नतीजतन इनका आकार इतना बड़ा होता जा रहा है कि कोई  सरकार इनके रास्ते में खड़ा होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है । भोजन पकाने की गैस, दवा, पानी, यातायात, सेहत और शिक्षा जैसी सभी आवश्यक सामान उनके जरिए हम तक पहुंचता है । स्कूलों के लिए कंप्यूटर और खेतों की फसलों तक पर उनका कब्जा है जो अपनी मर्जी के मुताबिक चाहे हमारा ध्यान रखें या हमें भूखा मार दें ।

नयी सदी की शुरुआत में दुनिया ऐसी ही है जिसमें सरकारों के हाथ बंधे हैं और जनता कारपोरेट घरानों पर आश्रित हो गयी है । व्यवसायी समाज को चला रहे हैं, नियम वे निर्धारित करते हैं और सरकारों की जिम्मेदारी उन नियमों का पालन कराने की रह गयी है । गतिशील कारपोरेशन घुमंतू भोजनालय की तरह हो गये हैं जिन्हें अपने दरवाजे पर रोके रखने के लिए विभिन्न देशों की सरकारें तरह तरह के प्रलोभन देती हैं । उनकी टैक्स चोरी को अनदेखा कर दिया जाता है । रूपर्ट मर्डोक ने दुनिया भर में केवल छह फ़ीसद टैक्स चुकाया और ब्रिटेन में 1987 से ही भारी कमाई करने के बावजूद टैक्स के बतौर कौड़ी भी नहीं अदा की । सार्वजनिक सेवाओं और संसाधनों के लिए धन की किल्लत होने के बावजूद नेतागण इन कारपोरेट घरानों की जीहुजूरी में लगे रहते हैं । सरकारें पहले भूक्षेत्र के लिए मारामारी करती थीं, अब बाजार में हिस्से के लिए छीनाझपटी में लिप्त रहती हैं । अब उनका प्रमुख काम व्यवसाय के अनुकूल माहौल बनाना है । व्यवसायियों के लिए न्यूनतम कीमत पर सरकारी सेवा और सुविधा मुहैया कराने तक उनकी भूमिका सीमित रह गयी है ।

इस चक्कर में न्याय, समता, अधिकार, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा तक के सवालों को दरकिनार कर दिया जाता है । तेल के बाजार के लोभ में अमेरिका ने तालिबान की सरकार का लम्बे समय तक समर्थन किया । सामाजिक न्याय का मतलब बाजार तक पहुंच रह गया है । सामाजिक सुरक्षा के इंतजामात खत्म कर दिये गये हैं और यूनियन की ताकत कुचल दी गयी है । आधुनिक काल में अमीर गरीब के बीच की खाई कभी इतनी चौड़ी नहीं थी । इस समय संपत्ति का सृजन उसके वितरण से अधिक जरूरी काम नजर आ रहा है । पिछली सदी के अंत में एक आदमी, माइक्रोसाफ़्ट के मालिक बिल गेट्स की संपदा सबसे नीचे की आधी आबादी के बराबर थी । पूंजीवाद को विजय तो मिली लेकिन इस जीत में हिस्सा बहुत कम लोगों को मिला । सरकारों ने इसकी कमियों से आंख मूंद ली है और अपनी ही बनायी नीतियों के चलते इसके दुष्परिणामों से निपटने में अक्षम साबित हो रही हैं ।

व्यवस्था सड़ गयी है । लगभग सभी राजनेता व्यावसायिक घोटालों में गले गले तक डूबे हुए हैं । अमेरिका में यह बात सबसे अधिक प्रत्यक्ष है । राष्ट्रपति भी घोटालों में लिप्त पाये जा रहे हैं । चुनाव में उनके प्रत्याशी बनने की सम्भावना कारपोरेट जगत से धन जुटाने की उनकी क्षमता पर निर्भर हो गयी है । चंदा लेने पर सीमा समाप्त करने के पक्ष में दोनों ही पार्टियों के नेतागण एकजुट हैं । ऐसे में अचरज की बात नहीं कि नेताओं पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है । 1980 के दशक में दुनिया भर में शासन पद्धति के रूप में लोकतंत्र का विस्तार हो रहा था लेकिन 1990 दशक तक मतदान का अनुपात कम होने लगा, पार्टियों की सदस्यता में गिरावट आने लगी और नेताओं के मुकाबले अन्य लोगों की लोकप्रियता में इजाफ़ा होने लगा । दस साल पहले भी जितने लोग सरकारी संस्थाओं में यकीन करते थे उनके मुकाबले ऐसे लोगों की तादाद तेजी से कम होती जा रही है । लोकतंत्र के लिए यह कोई शुभ संकेत नहीं है । राजनीति पर कारपोरेट कब्जे की इसी दुनिया की कहानी किताब में सुनायी गयी है ।

Wednesday, October 14, 2020

लेनिन के 150वें जन्मदिन पर

 

                      

                                        

(लेनिन की 150वीं जयंती पर इंकलाबी नौजवान सभा ने फ़ेसबुक पर बोलने के लिए कहा तो जो कुछ बोल सका उसका लिप्यंतर प्रेमशंकर के सौजन्य से हुआ।)

हम सब जानते हैं कि लेनिन का नाम सोवियत रूस  की क्रांति से जुड़ा है। 1917 की रूसी क्रांति से पहले रूस, पिछड़ा हुआ देश था। लेनिन के बाद के सोवियत संघ के शासक स्तालिन ने कहा था कि लेनिन ने साम्राज्यवाद के दौर का मार्क्सवाद विकसित किया। साम्राज्यवाद के दौर के मार्क्सवाद से उनका तात्पर्य पूंजीवाद की मार्क्सवाद द्वारा विकसित आलोचना के विकास से  है। पूंजीवाद की इस मार्क्सी आलोचना के बाद लेनिन साम्राज्यवाद पर पुस्तक लिखते हैं-  ‘इम्पीरियलिज्म: द हाइएस्ट स्टेज ऑफ कैपिटलिज्म’ । इस प्रकार साम्राज्यवाद के दौर का मार्क्सवाद लेनिन द्वारा विकसित किया गया। रूसी क्रांति का महत्व ही इस बात में था कि वह साम्राज्यवाद के विरोध में की गयी क्रांति थी। रूसी क्रांति के बाद से ही क्रांतियों का केंद्र यूरोप और पश्चिम के बजाय पूर्व की ओर खिसक गया। उसके पहले की क्रांतियों को हम देखें तो 1789 की क्रांति का केंद्र फ्रांस तथा 1848 की क्रांति का केंद्र यूरोप आदि दिखते हैं। इसका मुख्य कारण यह था कि लेनिन ने अत्यंत सचेतन रूप से रूसी क्रांति की बहुत लम्बी तैयारी की थी, ठीक जिस प्रकार भारत में स्वाधीनता आंदोलन की शुरुआत के दौर में कांग्रेस के बनने से पूर्व क्रांतिकारी लोगों द्वारा अंग्रेजी साम्राज्य के विरोध में की गई थी।  तब रूस में यूरोप की सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी मानी जाने वाली सरकार जारशाही का शासन था, जिसके द्वारा कोई भी जनतांत्रिक अधिकार जनता को नहीं दिये गये थे। लेनिन की पार्टी बनने से पहले इसी जारशाही के खिलाफ क्रांतिकारियों का एक समूह कार्यरत था जिसमें लेनिन के बड़े भाई भी शामिल थे। उन्हें जार पर बम चलाने के आरोप में बाद में फांसी दे दी गई। इसी के बाद लेनिन ने तय किया था कि वे राजनीतिक पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) बनाकर जारशाही का मुकाबला करेंगे। इस प्रकार लम्बे दौर में कम्युनिस्ट पार्टी गठित हुई जिसने यह तय किया कि रूसी क्रांति में उपनिवेशित देशों का साथ अहम है क्योंकि तीसरी दुनिया पर हावी साम्राज्यवाद, औपनिवेशिक देशों की संपदा के अकूत शोषण के बल पर पश्चिमी देशों में फल फूल रहा था।

मार्क्स का नारा था कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’। इसके बाद लेनिन ने नारा दिया ‘दुनिया के मजदूरों और उत्पीड़ित राष्ट्रों के जनगण एक हो’। लेनिन यहां ‘उत्पीड़ित राष्ट्रों के जनगण’ का अर्थ उपनिवेशों की संघर्षरत जनता से लेते हैं। इस प्रकार रूसी क्रांति अत्यंत सचेत रूप से मजदूर वर्ग एवम् उपनिवेशवादी विरोधी आंदोलनों को एक करने की कोशिश करती है। इसके बाद ही मार्क्सवाद के शास्त्रीय विमर्श में उपनिवेशवाद विरोध का विमर्श भी शामिल हो गया। हालांकि इसकी झलक मार्क्स के उपनिवेशवाद संबंधी लेखों में भी मिलती है, किंतु इसको व्यवहारिक रूप से लागू करने का श्रेय लेनिन को है। लेनिन की रूसी क्रांति की सफलता के बाद ‘कम्युनिस्ट इंटरनेशनल’ की स्थापना हुई जिसके जरिए लेनिन ने सचेत रूप से सभी उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों व उनके नेताओं को जोड़ने की कोशिश की थी। इतिहास में से इस तथ्य को मिटाने की बहुत कोशिश की गयी है किंतु यह सच है कि अगर हिटलर को रोका जा सका या अगर दुनिया से फासीवाद और नाजीवाद की पराजय हुई तो इसका एकमात्र श्रेय सोवियत संघ को जाता है जिसने हिटलर को दूसरे विश्वयुद्ध में हराकर उस वक्त पूरी मानवता को बचाने में बहुत बड़ा योगदान किया ।

किसानों और उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को साथ लाना रूसी क्रांति का बहुत बड़ा कार्यभार था। इसके लिए लेनिन ने शुरू से ही बहुत तैयारी की थी। भारत में जब तिलक को देशनिकाले की सजा हुई तो उसके विरोध में आयोजित बंबई के मजदूरों की हड़ताल के समर्थन में लेनिन ने पत्र लिखा था । इस तरह से कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ  उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन का संबंध जोड़ने में रूसी क्रांति का बहुत बड़ा योगदान रहा । ध्यान देने की बात है कि कोई भी क्रांति जिस देश में संपन्न होती है वहां की विशेष परिस्थितियों से उपजती है। इसीलिए रूस की खास परिस्थितियों से उपजा नारा शांति का नारा था। शांति के नारे का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि सम्पूर्ण विश्व में पूंजीवाद और साम्राज्यवाद अपने अस्तित्व के लिए युद्ध को अनिवार्य समझता है । तबसे लेकर आज तक यह चीज साम्राज्यवाद के साथ जुड़ी हुई है। आज भी लगातार दुनिया को युद्ध में झोंका जा रहा है । वर्तमान साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा हमेशा कहीं ना कहीं युद्ध भड़काने की कोशिश होती रहती है । ऐसी स्थिति में युद्ध के बजाय रूस के सैनिकों द्वारा शांति का सवाल उठाना अहम बन जाता है और इसी के साथ दूसरा नारा जमीन का उठा। रूस में बहुत बड़ी-बड़ी जमींदारियां थीं, तो जमीन का सवाल और शांति का सवाल ये रूसी क्रांति के सवाल बने। आज भी शांति व जमीन के सवाल बहुत महत्वपूर्ण सवाल बने हुए हैं। 

बीसवीं सदी में रूसी क्रांति के अलावा ऐसी कोई अन्य बड़ी घटना नहीं है जिसके जरिए पूरे विश्व की राजनीति को समझा जा सके। यही कारण था कि रूसी क्रांति से लोकप्रिय हुई विचारधारा के प्रसार को रोकने के लिए अमेरिका की मदद से पूरी दुनिया में शीत युद्ध चलाया गया और शीत युद्ध के जरिए पूरी दुनिया के साथ-साथ स्वयं अमेरिका के भीतर भी वामपंथियों के खिलाफ अभियान चलाया गया । यह वैचारिक लड़ाई लम्बे दौर तक चलती रही और कभी भी अमेरिका अथवा पूंजीवादी देशों ने सोवियत रूस को बर्दाश्त नहीं किया । वे उसके खिलाफ क्रांति के पहले दिन से ही षड्यंत्र करते रहे । इस वैचारिक और भौतिक षड्यंत्र को अस्सी साल तक सफलता के साथ रूस ने झेला । इस लम्बी और कठिन लड़ाई के दबाव के चलते समाजवादी व्यवस्था में बड़े पैमाने पर विकार भी पैदा हुए। आखिरकार सदी के लगभग अंत में उस व्यवस्था ने दम तोड़ दिया।   

लेनिन की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने क्रांति की परिस्थितियों को समझा और स्पष्ट किया। उन्होंने क्रांति की तीन आवश्यक परिस्थितियों का उल्लेख किया। पहली कि खुद शासक वर्ग अपना राज्य पुराने तरीके से न चला पा रहा हो और दूसरी कि जनता भी पुराने तरह के शासन में रहना बर्दाश्त न कर पा रही हो, लेकिन इन दोनों चीजों के होने के बावजूद एक तीसरी चीज की जरूरत पड़ती है । वह है कि क्रांतिकारी ताकतें और संगठन भी अपनी तैयारी के चरम पर हों। उनके मुताबिक ऐसी स्थिति में क्रांति संपन्न हो सकती है ।

रूसी क्रांति के समय अत्यंत प्राचीन स्वप्न पहली बार साकार हुआ कि जनता के हाथ में सत्ता आ गई । इस बात को लेनिन ने रूसी  क्रांति से ठीक पहले एक पुस्तक के रूप में लिखा जिसका नाम था ‘स्टेट ऐंड रेवोल्यूशन’ (राज्य और क्रांति) । इसमें मार्क्स की राज्य संबंधी मान्यताओं को लेनिन ने एक जगह रखकर विस्तार से व्याख्यायित किया । इस किताब में लेनिन ने बताया कि तंत्र तथा सत्ता समाज से ही उत्पन्न होती है किंतु वह खुद को समाज से ऊपर दिखाना शुरू कर देती है । इस सत्ता अथवा तंत्र पर हमेशा ही संपत्तिशाली लोगों का कब्जा रहा है इस प्रकार सत्ता ने हमेशा संपत्तिशाली लोगों के हित में कार्य किये हैं । इसी कारण यह सवाल बहुत दिनों से मौजूद रहा कि जनता अथवा सामान्य जन राज्य पर कब्जा कैसे करें? उसके तंत्र क्या होंगे? कैसे उसे व्यावहारिक रूप प्रदान किया जाएगा? लेनिन रूसी क्रांति के जरिए इस सवाल को हल करते हैं और बहुत पुराना सपना साकार करते हैं ।

तत्पश्चात एक नवीन चीज सामने आई जिसने मार्क्स को लेनिन से जोड़ा। हम जानते हैं कि जबसे आधुनिक राजनीति पैदा हुई और उसमें प्रतिनिधिमूलक संस्थाएं पैदा हुई उसी समय यूरोप में बादशाहत के साथ लड़कर लोकतंत्र कायम करने के फलस्वरूप राजनीति में एक विचारधारा पैदा हुई जिसे वर्तमान समय में उदारवाद कहा जाता है। यह वर्तमान उदारवाद सामंतवाद के साथ संघर्ष के समय में उन लोगों की विचारधारा थी  जिन्होंने लोकतंत्र का वादा करके जनता को साथ तो लिया था किंतु लेकिन फिर उस लोकतंत्र को इस तरह से परिभाषित किया कि वह सामान्य लोगों का शासन नहीं होगा बल्कि जनता के शासन के नाम पर महज एक औपचारिकता रह जानी थी। इस तरह की औपचारिकता के विरोध में मार्क्स ने स्वयं बहुत दिनों तक लड़ाई लड़ी व उसे केवल राजनीतिक क्रांति न कहकर सामाजिक क्रांति कहा।  लेनिन मार्क्स की इसी विचारधारा को सामने लाते हैं कि समाज में महज राजनीतिक क्रांति नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति होनी चाहिए, जिसमें मजदूर वर्ग के साथ-साथ समाज के सभी तबके शामिल हों। याद दिलाने की जरूरत नहीं कि उनकी पार्टी का नाम क्रांतिकारी सामाजिक जनवादी लेबर पार्टी था। रूसी क्रांति में जिस ‘सोवियत’ शब्द का प्रयोग किया जाता है उसका तात्पर्य पंचायत जैसी एक संस्था से है । क्रांति से पहले, क्रांति के आवेग में क्रांतिकारी संगठनों के कारण सेना में, किसानों में, फैक्ट्रियों में पंचायत जैसी संस्थाओं का निर्माण हो गया था। लेनिन यही कहते हैं कि सत्ता इन सोवियतों को दी जाये। इन संस्थाओं के जरिए जनता का कब्जा शासन पर होगा। राजनीतिक सत्ता अब केवल पूंजीपतियों के हित में कार्य नहीं करेगी, बल्कि उसे जनता के हित में कार्य करना होगा।

 रूसी क्रांति का महत्व इस बात में भी है कि वह वर्तमान लोकतंत्र का वास्तविक रूप सामने लाती है । साथ ही वह यह भी बताती है कि सामान्य लोग कैसे अपनी संस्था के जरिए सत्ता पर कब्जा करेंगे और सत्ता को चलाएंगे। इसी कारण तत्कालीन समय में जर्मनी जैसी फौज की पूरी ताकत को रूस जैसे प्रधानत: किसानी मुल्क ने पराजित किया और इतिहास में अपना नाम दर्ज किया। इतनी बड़ी सेना को एक जगह घेरकर कहीं भी आज तक सरेंडर नहीं कराया जा सका है जितनी बड़ी हिटलर की सेना को रूस ने घेर लिया और जिसे इसके बाद सरेंडर करना पड़ा। जब बाकी पूंजीपति देश (अमेरिका आदि) हिटलर के साथ परदे के पीछे बातचीत तथा होबनॉबिंग कर रहे थे, तब अकेले रूस की जनता जिसके हाथ में राजनीति चलाने का अधिकार रूसी क्रांति ने दिया था, वह उस अधिकार की रक्षा के लिए खड़ी होती है। हिटलर के खिलाफ जो लड़ाई हुई उसमें केवल रूस की सेना नहीं लड़ी, बल्कि जिन जगहों पर हिटलर की सेना का कब्जा हो गया था वहां के सामान्य लोगों ने लड़ाई लड़ी और सामान्य लोगों ने उसे पराजित किया। इसका मुख्य कारण था- रूसी क्रांति। क्योंकि जनता के भीतर की इस लड़ाकू पहलकदमी को रूसी क्रांति ने खोल दिया था। उसने इस उद्देश्य को परिभाषित किया कि यह सिर्फ राजनीतिक क्रांति नहीं है, बल्कि उसके सभी उद्देश्यों में से मात्र एक उद्देश्य राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करना है बल्कि यह पूर्णतया सामाजिक क्रांति है। अर्थतंत्र को पूंजीपतियों से लेकर सामान्य जन के मातहत ले आना इसका लक्ष्य था। इस बहुत पुराने सपने को रूसी क्रांति ने अमलीजामा पहनाया।

लेनिन की 150 वीं वर्षगांठ पर यह विचार आज भी प्रासंगिक है कि राजसत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, उसे जनता के अधिकार में होना चाहिए और यही रूसी क्रांति का लक्ष्य भी था। तमाम आंदोलनकारी या उपनिवेशवादविरोधी जन, जो भी मानवता के पक्ष में खड़े हैं वे रूसी क्रांति के समर्थन में रहे हैं। जब रूस को पूरी तरह घेर लिया गया था तब लेनिन ‘न्यू इकोनामिक पॉलिसी’ नामक नई नीति बनाते हैं जिसमें पूंजीपतियों से लड़ने के लिए थोड़ा वक्त मांगा गया। तारिक अली कहते हैं कि अगर लेनिन रूस में सही समय पर न आये होते तो रूसी क्रांति न हुई होती क्योंकि उस वक्त तत्कालीन प्रोविजनल गवर्नमेंट के समर्थन में बुर्जुआ वर्ग के साथ कुछ उनके  लोग भी जा चुके थे। तब लेनिन ने कहा था कि या तो भयानक नरसंहार होगा या फिर क्रांति के जरिए शांति स्थापित होगी। हम जानते हैं कि लेनिन का अनुमान गलत नहीं था। सबूत है कि उस समय की सरकार ने पूंजीपतियों की सहमति से जनता को मरने देने के लिए मास्को को खाली करने का निर्णय ले लिया था। इसके बाद रूस की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक पार्टी) की सहायता से लेनिन ने सचेतन रूप से कोशिश करके सोवियतों का सम्मेलन बुलाया और सम्मेलन के दौरान सत्ता सम्भालने की घोषणा की। फिर तो सोवियतों ने रूस की सत्ता संभाल ली। कहने की जरूरत नहीं कि रूस दुनिया के बहुभाषिक मुल्क का एकमात्र ऐसा उदाहरण है जिसने विविधता से भरे हुए देश को एक साथ जोड़कर रखना तथा संघीयता को भी अपने वास्तविक रूप में साकार करने जैसी चीजें लम्बे दौर में दुनिया को सिखाईं ।

आज भी हम यह देख रहे हैं कि लगातार पूंजी जैसे-जैसे संकट में आ रही है और दुनिया में दक्षिणपंथी ताकतों का उभार हो रहा है तो  मार्क्सवादी तथा वामपंथी विचारधाराओं पर हमले बढ़  रहे हैं। हम सब जानते हैं कि त्रिपुरा में जब भाजपा की जीत हुई तो उन्होंने लेनिन की एक मूर्ति का सिर गिरा कर जश्न मनाया। इस प्रकार सिद्ध है कि लेनिन जनता की मुक्ति का प्रतीक हैं, शासन पर जनता के कब्जे का प्रतीक हैं और इसलिए जनता के  विरोध में बोलनेवालों के लिए जरूरी हो जाता है कि वे सबसे पहले लेनिन को बदनाम करें ।

Thursday, October 8, 2020

समाजवाद के बारे में कुछ बुनियादी बातें

 

2005 में स्टर्लिंग से माइकेल न्यूमैन की किताब ‘सोशलिज्म: ए ब्रीफ़ इनसाइट’ का प्रकाशन हुआ । चित्रों के साथ उसका नया संस्करण 2010 में वहीं से छपा । किताब में चार अध्याय थे- समाजवादी परंपराएं, क्यूबाई साम्यवाद और स्वीडेन का सामाजिक जनवाद, नव वामपंथ तथा समाजवाद का वर्तमान और भविष्य । इन अध्यायों के अतिरिक्त किताब में आगे के अध्ययन के लिए पुस्तक सूची भी दी गई थी । बाद में इसे आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से इसे 2005 में ‘सोशलिज्म: ए वेरी शार्ट इंट्रोडक्शन’ शीर्षक से छापा गया । 2020 में इसका अद्यतन संस्करण छपा है । इस संस्करण में पांच अध्याय हैं । स्टर्लिंग वाले संस्करण के अतिरिक्त एक अध्याय समाजवाद को लेकर कठमुल्लेपन से बाहर जाकर सोचने के बारे में है ।

लेखक का कहना है कि दक्षिणपंथी अतिवाद, संकुचित राष्ट्रवाद और निरंकुश तानाशाही के वर्तमान राजनीतिक माहौल में समाजवाद के बारे में लिखना बहुत मुश्किल है फिर भी जरूरी है । उन्होंने बताया है कि सौ साल से तमाम समाजवादी यकीन करते रहे थे कि पूंजीवाद का नाश तय है और उसकी जगह समाजवाद आयेगा । इसके उलट हुआ यह कि पूंजीवाद विजयी नजर आ रहा है और बहुतेरे लोगों को लग रहा है कि बचा खुचा समाजवाद इस सदी में पूरी तरह से खत्म हो जायेगा । लेखक को इस मान्यता पर आपत्ति है और वे समाजवाद को वर्तमान के लिए भी प्रासंगिक मानते हैं । उनको आशा है कि उनकी किताब से पाठक को सही फैसला लेने में मदद मिलेगी ।

उनके मुताबिक सबसे पहले सवाल उठता है कि समाजवाद है क्या । इसके समर्थक और विरोधी इसका मतलब स्वत:स्पष्ट मानते हैं फिर भी यह उतना स्पष्ट है नहीं । मसलन एक समय लेनिन ने इसे सोवियत सत्ता और विद्युतीकरण का मेल कहा था । रूस की परम्परा से नाखुश पश्चिम के तमाम लोग इसे लेबर पार्टी की नीतियों से जोड़कर देखते हैं । इसकी धारणा में इतनी विविधता है कि इसे कुछ लोग केंद्रवादी तो कुछ स्थानीयतावादी, कुछ ऊपर से संगठित तो कुछ नीचे से निर्मित, कुछ आदर्श तो कुछ व्यावहारिक, कुछ क्रांतिकारी तो कुछ सुधारवादी मानते हैं । इसे राज्य विरोधी और राज्यवादी, अंतर्राष्ट्रीयतावादी और राष्ट्रवादी, राजनीतिक पार्टी समर्थक और विरोधी, ट्रेड यूनियन पर निर्भर और उससे स्वतंत्र, धनी उद्योगीकृत देशों लायक और गरीब किसान समुदायों से संबद्ध, स्त्री विरोधी और नारीवादी, विकासवादी और पर्यावरणवादी- संक्षेप में सब कुछ बताया जाता है ।

इन सबसे बचने के लिए लेखक ने समाजवाद की कुछ बुनियादी विशेषताओं को चिन्हित किया है । सबसे पहले उन्होंने इसको समतामूलक समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध माना है । इस समता के स्तर और उसे हासिल करने के उपायों के बारे में जो भी मतभेद हों, लेकिन कोई भी समाजवादी संपत्ति और सत्ता की वर्तमान विषमता का पक्ष नहीं लेगा । समाजवादी लोग यह मानते हैं कि पूंजीवाद के तहत समाज के एक हिस्से के लोगों को पूंजी और संपदा की विरासत हासिल होने के चलते विशेषाधिकार और अवसर उपलब्ध होते हैं, जबकि दूसरे हिस्से के लोगों की वंचना के चलते उन्हें उपलब्ध अवसर और उनका प्रभाव सीमित हो जाते हैं । इसीलिए सभी समाजवादी किसी न किसी हद तक पूंजीवादी संपत्ति संबंधों का विरोध करते हैं और ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते हैं जिसमें ढांचागत विषमताओं पर आधारित बाधा का सामना किये बगैर सबके विकास की सम्भावना खुली हो । इस समाज को बनाने के तरीके के मामले में भी उन सबमें इस बात पर सहमति है कि इसका निर्माण सहकार और एकजुटता के मूल्यों के आधार पर होगा । यह बात समाजवाद के तीसरे अभिलक्षण से जुड़ी है ।

मानव जाति के बेहतर भविष्य और आपसी सहकार की उसकी क्षमता में उम्मीद भी समाजवादी सोच का अंग है । नये समाज के निर्माण के लिए इस उम्मीद और उसकी जरूरत की मात्रा के मामले में मतभेद हो सकते हैं । जो लोग कानून जनित ऊंच नीच से मुक्त स्वशासी समुदायों की स्थापना करना चाहते हैं उनके लिए मानव स्वभाव की अच्छाई में भरोसे का भारी महत्व है । यह तो सही है कि फ़ासीवाद के उभार के बाद बुनियादी मानव स्वभाव पर उनका भरोसा टूटा है इसके बावजूद समाजवादी लोग निजी स्वार्थ और होड़ को बुनियादी मानव स्वभाव बताने का हमेशा विरोध करते हैं । इन चीजों को वे पूंजीवादी समाज की ही विशेषता मानते हैं और समझते हैं कि पूंजीवाद के खात्मे के बाद ये भी खत्म हो जायेंगे । इसके अतिरिक्त अधिकांश समाजवादी मानते हैं कि सचेत मानव प्रयास के जरिए दुनिया में बड़े बदलाव लाये जा सकते हैं । यह सच है कि मार्क्स के बहुतेरे व्याख्याताओं ने आर्थिक निर्धारण पर इतना जोर दिया है कि बदलाव लाने में मनुष्य की भूमिका समझने में मुश्किल पेश आती है । इसके बावजूद समाजवादियों ने मौजूदा हालात के सामने कभी समर्पण नहीं किया । वे मानते हैं कि मनुष्य के हालात को तय करने में भाग्य, परम्परा या धर्म का कोई योगदान नहीं होता ।

इन खासियतों के आधार पर समाजवाद को अन्य विचारों से अलगाया जा सकता है ।  इसका मतलब यह नहीं कि उसके भीतर विविधता नहीं है । असल में आधुनिक समाजवाद का जन्म तो उन्नीसवीं सदी के यूरोप में हुआ लेकिन बाद में उसे तमाम किस्म के समाजों के अनुरूप ढाला गया । रूस में 1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद कम्युनिज्म के उभार के चलते खास तरह के समाजवाद का उदय हुआ और इससे यूरोपीय देशों के उपनिवेशों में स्वाधीनता के लिए संघर्षरत लोगों को भारी प्रेरणा मिली । जब इन राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलनों का स्पर्श उसे मिला तो इस प्रक्रिया में खुद कम्युनिस्ट आंदोलन को भी कई रूप मिले । 1949 में चीन की सत्ता पर कब्जा करने से बहुत पहले ही दीख गया था कि माओ ने उसके साथ किसानों को जोड़ने का नया पहलू विकसित किया है । इसी तरह उत्तरी कोरिया और वियतनाम के कम्युनिस्ट आंदोलन की विशेष स्थिति के कारण वहां भी अलग किस्म का समाजवाद पैदा हुआ । उनकी विशेष स्थिति का कारण बहुत हद तक गृहयुद्ध, राष्ट्रीय मुक्ति और उसके बाद का अमेरिकी हस्तक्षेप था ।

कुछ और किस्म के समाजवाद भी देखने में आये । 1948 में इजरायल की स्थापना से बहुत पहले यहूदी लोगों ने किबुत्ज़ आंदोलन के जरिए लघु सहकारी समुदायों का प्रयोग किया था । 1950 के बाद मिस्र के नेतृत्व में आधुनिकता और राष्ट्रवाद के साथ धर्मनिरपेक्ष समाजवाद जैसी चीज का प्रयोग अरब मुल्कों में किया गया । इसी तरह उत्तर औपनिवेशिक अफ़्रीका में, खासकर घाना और तंजानिया में स्थानीय परम्पराओं के साथ समाजवाद का मेल कराने की कोशिश हुई । लैटिन अमेरिका में भी इसी तरह के भांति भांति के प्रयोग किये गये लेकिन अमेरिकी महाशक्ति के हस्तक्षेप के चलते क्यूबा को छोड़कर शेष प्रयोग पराजित हुए ।

लेखक को इस बात का अफसोस है कि समाजवाद की इस भारी विविधता को वे पूरी तरह से इस छोटी किताब में व्याख्यायित नहीं कर पाये । फिर भी जिस हद तक उन्होंने उसके बुनियादी तत्वों को उभारा है उससे उनको उम्मीद है कि इस समय भी समाजवाद की सोच से नौजवानों को प्रेरणा मिलेगी । कहा जा सकता है कि उनकी उम्मीद आधारहीन नहीं है क्योंकि अमेरिका में फिलहाल समाजवाद के प्रति प्रचंड आकर्षण दिखाई दे रहा है और वहां भी इसका एक नया रूप तैयार करने की कोशिश हो रही है । साफ है कि यह गुंजाइश भी समाजवाद की इस विविधता के इतिहास से पैदा हुई है ।