Monday, February 24, 2020

अछरिया हमरा के भावेले



पुस्तकालय के बारे में हम उस समय बात कर रहे हैं जब दिल्ली के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में घुसकर विद्यार्थियों की पुलिस द्वारा निर्मम पिटाई के दृश्य प्रकट हुए हैं पुस्तकालय के भीतर घेरकर होने वाले इस उत्पीड़न को शताब्दी वर्ष में जलियांवाला बाग की तर्ज पर विद्यार्थियों ने जामियावाला बाग कहा अचरज की बात लाठी चार्ज नहीं था । अचरज की बात इसके बाद हुई जब जामिया के विद्यार्थियों ने परिसर के बाहर कुछ किताबों के साथ प्रतिरोध का पुस्तकालय खोल दिया । इस पुस्तकालय का नाम (फ़ातिमा शेख सावित्रीबाई फुले लाइब्रेरी) भी प्रतीकात्मक था इस पहल ने प्रतिरोध के नितांत नए मुहावरे को जन्म दिया । सहसा नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में आयोजित धरनों में इस किस्म के पुस्तकालय देश भर में चलने लगे । विद्यार्थियों ने इन्हें वैकल्पिक जानकारी की जगह के रूप में चलाने की कोशिश की । इन पुस्तकालयों ने किताबों के ऐसे पाठकों को जन्म दिया जिनकी शायद पहले कभी किताबों में रुचि न रही होगी । हाल के दिल्ली दंगों में मुस्तफ़ाबाद में इस तरह का एक पुस्तकालय भी जला दिया गया कोरोना के चलते प्रतिरोध के प्रदर्शन तो सिमट गए लेकिन पुस्तकालय चलाने वाले इसे जारी रखने के नए तरीके सोच रहे हैं इससे सचल पुस्तकालय का भी रूप दिया जा सकता है संचालकों का सोचना है कि पाठक सामाजिक बदलाव के सक्रिय वाहक होंगे असल में इन विरोध प्रदर्शनों ने भी उन औरतों को घर से पहली बार बाहर निकाला जो हमेशा घर के भीतर ही रही थीं उनके हाथ में किताब का पहुंचना इससे आगे का कदम था साथ में बच्चों के लिए अलग प्रभाग खोला गया पुस्तक से उनके परिचय से कहानी आगे चली तो उनको सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाने की जरूरत महसूस हुई । इस परिघटना से शिक्षा, किताब और समाज तथा सरकार के आपसी रिश्तों के बारे में बहुत सी बातें करने की गुंजाइश पैदा होती है   
हम सभी जानते हैं कि जहां सबसे कम आजादी होती है यानी जेल, वहां भी पुस्तकालय होता है इस अकेले तथ्य से मनुष्य के जीवन में किताब का महत्व समझा जा सकता है इसके साथ यह भी तथ्य है कि जब तानाशाही की आहट आती है तो उसके पहले शिकार किताब और पुस्तकालय होते हैं । जरूरी नहीं कि तानाशाही खुलेआम और हिंसक रूप में ही सामने आए बहुधा वह एक व्यवस्थित विभेदकारी तंत्र के रूप में मौजूद रहती है इस तंत्र में बहिष्करण और नियंत्रण के हथियार के रूप में ज्ञान का सुविधासम्पन्न वर्गों ने इस्तेमाल किया है लेकिन फिर उसी ज्ञान को जब लोगों ने अपने लिए इस्तेमाल करना शुरू किया तो वह ज्ञान खतरनाक समझा जाने लगता है ज्ञान की यह यात्रा बहुत ही रोमांचक रही है । इस प्रक्रिया को गोरख पांडे के मशहूर गीतअजदिया हमरा के भावेलेके इस बंद से सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है- दिनवा खदनिया सोना निकललीं, रतिया लगवलीं अंगूठा । सगरी जिनिगिया करजे में डूबल, कईल हिसबवा झूठा । हिसबवा अइसन हम नाहिं मनबो, अछरिया हमरा के भावेले ।इस बंद में जिक्र ग्रामीण इलाके का नहीं खनिज के क्षेत्र का है । दुख है कि वहां भी कर्ज के लिए अंगूठा लगाना पड़ता है । प्रेमचंद के लेखन पर ध्यान दें तो कर्ज के चलते किसान को मजदूर होना पड़ता है और वहां भी कर्ज साथ चला आता है । सारी जिंदगी कर्ज में डूबने का तथ्य ही किसान और मजदूर के बीच साझा है । इस नियति से मुकाबले के लिए अक्षर को हथियार बनाना जरूरी लगता है । तभी एक अन्य गीत में गोरख लिखते हैं- अक्षर अक्षर पंक्ति पंक्ति को छापामार करो ।
पुस्तकालय में किताब सुरक्षित रखी रहती है । आप सोच सकते हैं कि एक बार पढ़ लिए जाने के बाद उसे रखने की जरूरत क्या है । इससे ही भाषा के जादू का पता चलता है । वह बार बार नया अर्थ संप्रेषित करने में सक्षम होती है क्योंकि पढ़ने का काम शून्य में नहीं होता । नए नए जीवन संदर्भ उसी पाठ का नया अर्थ खोलते हैं । जिस तरह एक ही मनुष्य सब समय साथ रहने के बावजूद उम्र के अलग अलग पड़ावों पर भिन्न भिन्न हो जाता है उसी तरह किताब भी हमारे साथ बार बार नया रिश्ता बनाती है । किस्सों कहानियों का ही उदाहरण लें । उनको बार बार सुनने देखने से उनकी रोचकता घटती नहीं है । उनमें झूठ भी छिप जाता है । किताब की इसी क्षमता ने उसे वैचारिक लड़ाई का सबसे कारगर उपाय बनाए रखा है । वह भी समाज के शक्ति संबंधों से बाहर नहीं होती इसलिए अक्सर शासक ही उसकी क्षमता से लाभ उठाते हैं और बार बार छले जाने के बावजूद लोग एक बार फिर छले जाते हैं लेकिन जब उनका टाट उलटने पर जनता आमादा हो जाती है तो वह भी इस हथियार का बेहतरीन इस्तेमाल करती है । वही समय होता है जब राजकुमारी की मिथकीय कैद की तरह की बंदिश से किताब भी बाहर आ जाती है और उसके जरिए लोग अपनी ताकत का अनुभव करते हैं । ऐसे ही क्षणों का इंतजार प्रत्येक किताब को होता है जब सोती सुंदरी के राजकुमार की तरह कोई पाठक आकर उसका स्पर्श करे और उसके भीतर छिपे अर्थों के खजाने को मुक्त कर दे । इसे लेखक के संचित अनुभव से पाठक के जीवंत अनुभव का संवाद भी कहा जा सकता है ।       
भाषा से किताब बनती है इस भाषा के निर्माण के सिलसिले में प्रसन्न कुमार चौधरी ने अपनी किताबअतिक्रमण की अंतर्यात्रामें बताया है कि जब मनुष्य के हाथ स्वतंत्र हो गए और वह दोनों पैरों के सहारे खड़ा होकर चलने लगा तो उसने उपकरण बनाने शुरू कर दिए उपकरण बनाना प्रकृति के साथ मनुष्य की ऐसी अंत:क्रिया थी जिसके जरिए उसने संसार में अपने रहने लायक वातावरण निर्मित करने की शुरुआत की यह काम वस्तुओं को बदले बिना सम्भव नहीं था और जाने बिना बदलाव नहीं हो सकता स्पष्ट है कि इस कठिन काम के साथ ही उसे वस्तुओं के स्वभाव का ज्ञान होने लगा तो फिर इसके आधार पर नामकरण होने से मनुष्य का शब्द भंडार भी बढ़ने लगा इस विवरण से हम समझ सकते हैं कि खुद भाषा, संसार को बोधगम्य बनाने और बदलने की प्रक्रिया में पैदा हुई चारों ओर फैली हुई जो दुनिया मनुष्य को पूरी तरह अराजक और बेकाबू महसूस होती थी उसमें तर्क नजर आने लगा और भाषा में उस तर्क का प्रतिबिम्ब प्रकट होने लगा । आश्चर्य नहीं कि भाषा समस्त ज्ञान के संग्रह का साधन बन गई । इसी तर्ज पर कहा जाता है कि किताबों में जानकारी का खजाना संचित रहता है । इस खजाने को रखने के अतिरिक्त आगामी पीढ़ियों तक उसे ले जाने का काम किताब और उसके संग्रहालय के जरिए आसान हो जाता है ।  
लेकिन यह भी कोई रहस्य नहीं है कि इतिहास में आम तौर पर जनता के सामूहिक प्रयास से अर्जित समस्त ज्ञान को वर्गों में बंटे समाज में शासकों ने अपने लिए इस्तेमाल किया । इस तरह जिस ज्ञान का उत्पादन समाज के सामूहिक सहकार से हुआ था उसे ही कब्जे और बहिष्करण का साधन बना लिया गया । हम सभी जानते हैं कि संपदा के उत्पादन के सबसे बड़े संसाधन श्रम और जमीन हैं । उनमें जमीन पर कब्जे के मामले में कागज की भूमिका महत्वपूर्ण रही है । मेहनत करने वालों का ज्ञान से बहिष्करण तो  किया ही गया, इसके साथ संसाधनों से उनकी बेदखली में भी अक्षर की भारी भूमिका रही है । इसके चलते स्थिति यहां तक पहुंच गई कि जिस कानून की किताब और उसको लागू करने वालों के बारे में न्याय की पक्षधरता की धारणा बननी चाहिए थी उसके विपरीत उन्हें दमन उत्पीड़न के साथ जोड़कर देखा जाने लगा । हमारे देश में तो भौतिक और आध्यात्मिक संसाधनों पर स्वामित्व के इर्द गिर्द ऊंच नीच की एक अत्यंत कठोर व्यवस्था के रूप में जातिगत भेदभाव भी कायम हुआ । जब किताब इस व्यवस्था के पक्ष में नजर आने लगी तो साधारण जनता में शिक्षित समुदाय के प्रति अविश्वास पैदा हुआ ।
इस अविश्वास की अभिव्यक्ति लोक मानस में अनेक रूपों में हुई । इन रूपों की सृजनात्मकता के प्रभाव से कभी कभी शिष्ट साहित्य में भीचत्वारि मूर्ख पंडिता:’ जैसा व्यंग्य प्रकट हुआ । किताब के प्रति इस संशय के चलते अनुभव की प्रामाणिकता को अधिक महत्व दिया गया । अनुभव की प्रामाणिकता पर यह जोर वैधता के वैकल्पिक स्रोत की खोज तो था ही, उसके सहारे ज्ञान पर विशेषाधिकार प्राप्त समूहों की इजारेदारी का प्रतिरोध भी खड़ा किया जा रहा था । ज्ञान पर प्रभु वर्गों के कब्जे का विरोध करने वालों को भी अनुभव जन्य ज्ञान की सीमा का अंदाजा रहा होगा तभी किताब की दुनिया को दूसरे के हाथ में पूरी तरह छोड़ देने की जगह उस क्षेत्र में भी दखल देने का प्रयास बीच बीच में होता रहा । इसी प्रयास की अभिव्यक्ति पुस्तकों की दुनिया से संघर्षरत जनता के लगाव में होती है । इसके चलते ही लगभग प्रत्येक बदलाव के आंदोलन के साथ किताब का गहरा संबंध रहा है । रूसी बोल्शेविक क्रांति के बारे में लिखते हुए जान रीड ने बताया है कि युद्ध के मोर्चे पर रेल से भरकर किताबें भेजी जाती थीं और गरम तवे पर पानी की बूंद की तरह छन्न से समाप्त हो जाती थीं । राजनीतिक चेतना बढ़ने के साथ पढ़ने की भूख का रिश्ता राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा ‘मेरी जीवन यात्रा’ के पहले भाग में वर्णित है जिसमें उनका कहना है कि रौलट कानून का विरोध जब देश में शुरू हुआ तो बाहर खाना खाने वाले लोग उन होटलों में जाते जहां अखबार भी पढ़ने के लिए उपलब्ध होते । उस समय वे पंजाब में थे । उन्होंने यह भी बताया है कि जब पंजाब के अखबारों से सही खबरें नहीं मिलतीं तो बाहर से आने वाले अखबारों का सही सूचनाओं के लिए इंतजार होता था । इससे लगता है कि प्रतिबंध से कभी जानकारी की भूख को दबाया नहीं जा सकता । प्रतिबंध लगाने से वह भूख अपनी तुष्टि के लिए वैकल्पिक साधन खोज लेती है । बहुत सम्भव है इसी तरह के माहौल ने सार्वजनिक पुस्तकालयों को जन्म दिया हो !  
शिक्षा संस्थानों के साथ जुड़े पुस्तकालय की मौजूदगी तो सहज ही समझ में आती है लेकिन हम जिस तरह के पुस्तकालय की शताब्दी मना रहे हैं वह एक सार्वजनिक पुस्तकालय है । इस तरह का कोई पुस्तकालय इस मान्यता के बिना चल नहीं सकता कि ज्ञान पर उनका भी अधिकार है जो किसी शिक्षा संस्थान तक नहीं पहुंच सकते । यह ज्ञान पर उत्पादकों के दावे की अघोषित अभिव्यक्ति है । शिक्षा संस्थानों के बाहर के ये पुस्तकालय साथ ही सार्वजनिक वाचनालय भी होते हैं । निजी परिक्षेत्र से बाहर सार्वजनिक संसार के निर्माण में इन जगहों का योगदान अभूतपूर्व रहा है । आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना और संचालन के लिए जिस तरह के जानकार मतदाता की जरूरत पड़ती है उसके लिए भी इन जगहों ने ऐसी भूमिका निभाई जिसके चलते भागीदारीपरक लोकतंत्र को सामाजिक आधार मिला । अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए पुस्तकालयों ने अपने रूप भी बदले हैं । जिस जमाने में उनकी महिमा के साथ धार्मिक पवित्रता जुड़ी होती थी उस समय किताब भी देवालयों में सुरक्षित रखी जाती थी । उसके बाद आधुनिक शिक्षा के साथ नए किस्म के पुस्तकालय आए । पहले शिक्षा तक जनता की पहुंच को सीमित करने के लिए विभिन्न समुदाय उससे जुड़े संस्थानों से बाहर रखे जाते थे । इन बहिष्कृत समुदायों में स्त्री और निचले तबकों के लोग होते थे । बाद में जब शिक्षा को धार्मिक संस्थानों की जकड़ से बाहर लाया गया तो उसके धर्मनिरपेक्षीकरण के साथ ही पुस्तकालयों का निर्माण शुरू हुआ । इसके बावजूद बहिष्करण की पुरानी आदतें बहुत समय तक जारी रहीं । वर्जीनिया वुल्फ़ ने बताया है कि एक समय शिक्षा संस्थानों के साथ ही पुस्तकालयों तक भी स्त्रियों की रसाई नहीं होती थी । ऐसी स्थिति में खासकर स्त्रियों ने शेक्सपियर आदि अंग्रेजी लेखकों के नाम पर क्लब स्थापित करके ज्ञान की अपनी प्यास बुझाई और उच्च शिक्षा से बाहर रह जाने की कुछ हद तक क्षतिपूर्ति की । मार्क्स की पुत्री एलीनोर के बारे में सभी जानते हैं कि इसी प्रक्रिया में उन्होंने तमाम साहित्यिक हलकों तक अपनी जानकारी विस्तारित की । नवोदित राज्य पर ज्ञान के सार्वभौमिक प्रसार का इतना जोरदार दबाव था कि सरकारी कर्मचारियों के लिए एक समय दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी जैसे पुस्तकालय खोले गए । कार्यालयों के केंद्र शहरी इलाकों में बच्चों ने अपने लिए बाल पुस्तक क्लब बनाए । जिला पुस्तकालय भी कई जिलों में मौजूद हैं । इन सबके साथ विकसित पुस्तक संस्कृति ने जाति आधारित छुआछूत को रेल की तरह ही कुछ हद तक दूर किया । स्कूल कालेज जाने वाले विद्यार्थियों को जब पाठ्यक्रम से बाहर की किताबें पढ़नी होतीं तो वे खासकर उपन्यास आदि अपनी पाठ्य पुस्तकों के साथ छिपाकर ले जाते । स्कूली अनुशासन के पक्षधर लोग इन रोचक किताबों को विध्वंसक समझकर उनके बस्तों की जांच करते थे । पाठ्यक्रम के बाहर की इस पढ़ाई ने एक समय विद्यार्थियों में साहित्यिक संवेदना पैदा करने में जबर्दस्त भूमिका निभाई । स्कूल के बाहर के वृहत्तर समाज में कवि सम्मेलन और मुशायरों ने भी किताब और उससे जुड़ी सांस्कृतिक चेतना को लोकप्रिय बनाने में बहुत मदद की है ।
हमारे देश में स्वाधीनता आंदोलन के समय ही आज की अधिकांश भाषाओं का सर्वोत्तम लेखन और प्रकाशन हुआ । कारण वह चेतना थी जिसे भारतेंदु नेनिज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूलकहकर वाणी दी थी । औपनिवेशिक उत्पीड़न का एक रूप अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व भी माना जाता था । इसके विरोध का प्रभावी तरीका देशी भाषाओं की उन्नति समझा जाता था । इस उन्नति में केवल लिखना या छपाई ही नहीं था बल्कि उस लिखे और छपे को लोगों तक ले जाना और उनके द्वारा इसे पढ़ा जाना भी इसमें शामिल था । इसके लिए शिक्षा और साक्षरता के प्रसार के साथ पुस्तकालय और वाचनालय की व्यवस्था भी आवश्यक थी । इस पुस्तकालय का भी उस आंदोलन के साथ गहरा नाता रहा है । इस वैचारिक हलचल का ताप स्वाधीनता के बाद तक बना रहा था । इसके चलते उत्तर प्रदेश और बिहार में हिंदी भाषा में ज्ञान के प्रचार के लिए अनुवाद और स्वतंत्र लेखन के प्रकाशन का जिम्मा बहुत हद तक कुछ सरकारी संस्थानों ने निभाया था । तेलंगाना आंदोलन के साथ जुड़ी तेलुगु पहचान और आंध्र प्रदेश के सवाल ने उस आंदोलन से पुस्तकालयों को जोड़ा ।   
स्पष्ट है कि पुस्तकालय केवल कोई इमारत नहीं होता बल्कि सम्पूर्ण सामाजिक ढांचा होता है । किताब में जो जानकारी कूटबद्ध होती है उसे हासिल करने के जरिए हम अपनी सीमित दुनिया से बाहर निकलते हैं । भूगोल की किताब में बने नक्शे को खोलने की उत्तेजना से ही दुनिया अपनी सम्पूर्णता में हमारे लिए बोधगम्य हो पाती है । इसके अतिरिक्त भी किताब ने मनुष्य की बेहद नाजुक मसलों में मदद की है । बोरिस पोलेवोई की असली इनसानपढ़कर अवसाद से बाहर निकलते लोगों की मौजूदगी हमारे समाज में मुश्किल नहीं है । कोरोलेंको के उपन्यास अंधा संगीतज्ञके सहारे हमें संसार को समझने के सर्वथा भिन्न तरीके का पता चलता है । इन उदाहरणों से साफ है कि किताब हमें खुद के साथ बाहर को समझने बूझने में बहुत मदद करती है ।    
बहुत निजी स्तर पर कहें तो किताब हमारी आत्मा का आईना होती है । अंग्रेजी कहावत है कि मनुष्य की पहचान उसके संगियों से होती है और उसी तर्ज पर कह सकते हैं कि हमारी रुचि का पता उन किताबों से चलता है जो हमें पसंद होती हैं । इसके चलते भी हम कई बार उन किताबों का नाम नहीं लेते जिन्हें पढ़ना पसंद होने के बावजूद सामाजिक तौर पर अच्छी नहीं मानी जातीं । अगर कोई जान ले कि हम कौन सी किताब पढ़ते हैं तो एक तरह से हम उस व्यक्ति के सामने नंगे हो जाते हैं । व्यक्ति की तरह ही देश, सभ्यता और संस्कृति भी अपना परिष्कार और स्तर साबित करने के लिए अक्सर किताबों के नाम गिनाते हैं । सभी संस्कृतियों के पास गिनाने के लिए कोई न कोई ऐसी किताब होती है जो उसकी चरित्रगत विशेषता का लक्षक बन जाती है । यह तो सही बात है कि जरूरत के मुताबिक इन साभ्यतिक विशेषताओं का आविष्कार होता रहता है फिर भी नाम किताब का ही गिनाया जाता है । इस नश्वर संसार में एक हद तक वे अमरता प्राप्त करने का साधन भी होती हैं । लेखक का नाम किताब के रूप में उसके देहावसान के बाद भी बचा रहता है ।    
हमने शुरू में कहा कि जेल में पुस्तकालय होते हैं लेकिन कारखानों में पुस्तकालय नहीं होते । कार्यालयों में होते हैं लेकिन कारखानों में नहीं होते । इस मामले में पूंजीवाद ने भी ज्ञान से बहिष्करण की पुरानी जाति और लिंग आधारित व्यवस्था का ही लगभग पुनरुत्पादन किया है । मानसिक श्रम की जगहों पर तो किताब होगी लेकिन शारीरिक श्रम की दुनिया को उससे बाहर रखा जाएगा । मार्क्स ने अपने सबसे प्रसिद्ध ग्रंथपूंजीके पहले खंड में कहा है कि पूंजी के निर्माण की असलियत को देखना हो तो बाहरी दिखावे से हटकर उत्पादन की उस असली जगह पर जाना होगा जिसके प्रवेशद्वार पर ही बिना काम के अंदर घुसने से रोकने का संदेश लिखा रहता है । हम सभी जानते हैं कि इस जगह पर पूंजी का निर्माण जिस चीज के जरिए होता है वह समय है । पूंजी के उत्पादन के लिए जरूरी है कि कामगार अपना समय पढ़ने में न लगाए । पूंजी के नजरिए से पढ़ने में समय लगाना उसका दुरुपयोग है । इसलिए पुस्तकालय खोलना और चलाना परोक्ष रूप से मनुष्य के खाली समय पर उसके अधिकार का समर्थन करना भी है ।
हमारे अपने समय की सबसे बड़ी समस्या के रूप में फ़्रेडरिक हैरी पिट्स ने 2018 में पालग्रेव मैकमिलन से प्रकाशित किताब क्रिटीकिंग कैपिटलिज्म टुडे: न्यू वेज टु रीड मार्क्स में बताया है कि पूंजीवादी समाज में शोषण का प्रमुख केंद्र कारखाना होता है लेकिन इस नए समय में पूरा समाज ही कारखाना बन गया है । जो लोग मनुष्य को अपना सम्पूर्ण व्यक्तित्व हासिल नहीं करने देना चाहते वे उसे केवल धन पैदा करने की मशीन बनाना चाहते हैं मुनाफ़े की उनकी भूख खाली समय को भी लाभप्रद बना देना चाहती है हम सभी देख रहे हैं कि लगातार मनुष्य के समूचे समय का दोहन करने की कोशिश हो रही है सभी सामाजिक गतिविधियों को बाजार के दायरे में लाया जा रहा है नींद पर भी विजय पाने के लिए प्रयोग चल रहे हैं ताकि निरंतर जागरण के बावजूद मनुष्य की कर्यक्षमता को बरकरार रखा जा सके इसका प्रयोग उन सैनिकों पर किया जा चुका है जो दूसरे देशों में जाकर चुने हुए लोगों का एक ही गोली से कत्ल कर लेते हैं इसके साथ ही काम के निश्चित आठ घंटे बीते युग की बात होते जा रहे हैं । बार बार काम के घंटे बढ़ाने की चेष्टा कारखानों के मालिक तो करते ही हैं, सरकार भी उनकी इस कोशिश का गाहे ब गाहे बेशर्मी से समर्थन करती है । तमाम किस्म के कामों में अब बारह घंटे का काम नियम बनता जा रहा है ।  
जाहिर है कि यह भी लड़ाई का एक नया मोर्चा है । शासक वर्ग हमेशा ही लोगों के समय से लाभ अर्जित करने और मुनाफ़े के लोभ में नए नए कामों को लाभदायक बनाने के लिए मनुष्य को धन पैदा करने की मशीन मात्र में बदलने की कोशिश करता है । इसकी टक्कर में लगभग सभी संघर्षों ने ज्ञान पर जनता के अधिकार को साबित करने के लिए किताब को हथियार के बतौर इस्तेमाल किया है । यह संघर्ष केवल किताब के लिए संघर्ष कभी नहीं रहा इसमें समय पर अपना हक जताने से लेकर स्वाभिमान के दावे तक बहुत सी चीजें शामिल होती हैं संस्कृति के उच्च समझे जाने वाले कर्म कभी सामान्य लोगों को नहीं करने दिए जाते पढ़ना और लिखना ऐसे ही ऊंचे समझे जाने वाले कर्म हैं उनके करने के लिए दलित वंचित समुदाय को बहुत लम्बा सफर तय करना पड़ता है       
                             

Sunday, February 2, 2020

अर्धसत्य का मार्क्सवाद


              
                                
मार्क्सवाद को कफन देकर दफ़ना चुके बौद्धिक अनंत विजय की 2019 में वाणी से बहुमूल्य (795 रुपये) पुस्तकमार्क्सवाद का अर्धसत्यका प्रकाशन उपेक्षा करने लायक घटना नहीं है थोड़ी सी लोकचेतना का सहारा लें तो कह सकते हैं कि इस किताब की सींग पूंछ का पता नहीं चलता । ढेर सारी कतरनों को जोड़कर माहौल का लाभ उठाने के लिए किताब का रूप इसे दिया गया है । फिर भी इस पुस्तक के प्रचंड महत्व के अनुरूप टेलीविजन के परदे की मशहूर अभिनेत्री और तेज तर्रार सांसद तथा भाजपा नेत्री तथा भारत सरकार के उच्च शिक्षा की देखरेख करने वाले मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ख्यातिलब्ध पूर्वमुखिया स्मृति ईरानी ने इसका भव्य विमोचन किया । त्रिपुरा में मिली चुनावी जीत के तत्काल बाद लेनिन की मूर्ति गिराकर उसके सिर से फ़ुटबाल खेलने के बाद वैचारिक हमले का अगला कदम वर्तमान पुस्तक के प्रकाशन के साथ उठाया गया है । अनंत विजय जी बहुत दिनों से हिंदी, साहित्य और भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में वामपंथ और मार्क्सवाद के प्रभाव से की जाने वाली व्याख्याओं से उसी तरह निपटने की मुद्रा में खड़े दीखते रहे हैं जिस मुद्रा में धारा 144 के बीच दिल्ली के कनाट प्लेस में कुछ प्रदर्शनकारी ‘गोली मारो सालों को’ चीखते हुए जुलूस निकालते हैं । हाल के दिनों में यह हमला मुद्रा और भाषा से आगे बढ़कर देश के कुछ हिस्सों में ठोस भौतिक तथ्य में भी बदलता रहा है हालांकि इसकी विरासत कुछ लम्बी है जिसके शिकार राष्ट्रपिता भी हुए थे  
वे जिस वैचारिकी से संबद्ध हैं उसके साथ हिंसा तो पहले से ही जुड़ी हुई थी, फिलहाल झूठ का कारोबार भी बड़े पैमाने पर नत्थी हुआ है । इस झूठ की प्रतिष्ठा के लिए पूर्ण असत्य की जगह अर्धसत्य का सहारा लिया जाता है ताकि श्रोता या पाठक समुदाय के साथ छल किया जा सके और लेखक को उसका अपराध बोध भी रहे । इस प्रक्रिया में लेखक ने मार्क्सवाद को भी अपनी इस समझ का शिकार बनाया है । दुनिया में मार्क्सवाद को सिद्धांत और व्यवहार की एकता के बतौर देखा जाता है लेकिन किताब के लेखक ने ‘---मार्क्सवाद को एक सिद्धांत के तौर पर परखने की बिल्कुल कोशिश नहीं की है, बल्कि इस वाद के बौद्धिक अनुयायियों और भक्तों के क्रियाकलापों को सामने रखने का प्रयत्न है ।’ भाषा का छल देखिए कि उनके अपने हलके में विवेक का प्रयोग किए बिना अनुसरण करनेवाले को जो कुछ कहा जाता है उसी लकब को मार्क्सवादियों पर सोचे समझे बिना चिपका दिया गया है । कहते हैं कि आपकी भाषा समूची संस्कृति का लक्षक होती है । आश्चर्य नहीं कि अनंत विजय जी को ‘भक्तों’ की उपस्थिति सर्वत्र नजर आती है । इस भाषा के सहारे वे विवेकवान अनुसरण को भी संदिग्ध बना देते हैं । असल में वह दुनिया उनकी कल्पना से परे है जिसमें बौद्धिक स्वाधीनता और किसी उच्च आदर्श का अनुपालन एक साथ सम्भव होते हैं । मार्क्स के सिद्धांत पर विचार न करने का संकल्प जाहिर करके जब वे मार्क्सवादियों के आचरण पर ही विचार करने चलते हैं तो उम्मीद बनती है कि इनके अलग अलग संगठन उनकी जानकारी में जरूर होंगे । जानकारी तो उनको है लेकिन आखिर अर्धसत्य के रचयिता को हांकने से कैसे रोका जा सकता है ! इस तथ्य को तो वे शायद पूरी तरह खारिज कर देंगे कि मार्क्सवादियों में आपसी मतभेद भी रहे हैं ।
भूमिका में वे मार्क्सवादी व्यवहार के बतौर सोवियत संघ का और अनुयायियों के रूप में फ़िदेल कास्त्रो और माओ का जिक्र करते हैं । कहने को तो वे सिद्धांत के तौर पर देखने से परहेज का दावा करते हैं लेकिन भूमिका में स्त्री प्रश्न पर मार्क्सवादी सैद्धांतिकी से जूझने का प्रयास करते हैं । मार्क्सवाद के अन्य बहुतेरे विरोधियों की तरह वे इस सवाल पर पारम्परिक नैतिकता के पक्ष से मार्क्सवाद पर हमला करते हैं और उपरोक्त अनुयायियों के जीवन को अनैतिक साबित करने की कोशिश करते हैं । असल में बुर्जुआ नैतिकता के सभी विश्वासियों की तरह उनकी आपत्ति भी मार्क्सवाद का स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होना है । ये सभी लोग परिवार की असलियत को उजागर कर देने वाली मार्क्सवादी दृष्टि से खिन्न रहते हैं । उन्हें साहित्य की जानकारी के नाते पता होगा कि महादेवी वर्मा ने अपनी ऐतिहासिक किताब ‘श्रृंखला की कड़ियां’ में परिवार को भी एक कड़ी माना था । बहरहाल महादेवी और स्त्री मुक्ति के प्रसंग से उनकी एक और बात याद आई ।
पूरी किताब में जब कभी उन्होंने मार्क्सवाद का नाम लिया है तो उसके साथ रोमांटिसिज्म जरूर जोड़ा है । अक्सर वे ‘मार्क्सवाद का रोमांटिसिज्म’ लिखते हैं । इस धारणा से उनकी चिढ़ इतनी गहरी है कि नक्सलियों के रोमांटिसिज्म की भी चर्चा करते हैं । छायावाद के इस शताब्दी वर्ष में कोई तथाकथित साहित्य चिंतक रोमांटिसिज्म का इस तरह से उल्लेख करे उचित नहीं लगता लेकिन उनका यह रुख उनकी चिंतन पद्धति के मूल में है । कहने की जरूरत नहीं कि सामाजिक रूढ़ि का नकार रोमांटिसिज्म की जान है और अनंत विजय जी रूढ़ियों की पक्षधरता में यकीन करते हैं । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि रोमांटिसिज्म का संबंध युवा प्रेम से होता है जिसे मुक्ति का रूप माना जाता है । इस प्रेम में तमाम किस्म की रूढ़ियों का नकार होता है । दुखद यह है कि अनंत विजय जी के मित्रगण इसे लव जेहाद कहते हैं और प्रेमियों को रोमियो गैंग । इसके चलते समाज के प्रति उनका यह नजरिया तो है ही साहित्य के प्रति भी वे यही रुख अपनाते हैं । पूरी किताब का शायद ही कोई लेख ऐसा होगा जिसमें पुरस्कार वापसी की बात न हुई हो । उन्हें यह तथ्य तो जरूर मालूम होगा कि यह साल जलियांवाला बाग हत्याकांड का भी शताब्दी वर्ष है और इस हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड लौटाकर गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने पुरस्कार वापसी को अन्याय के प्रतिकार से जोड़ा था । हिंदी के प्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद ने साहित्य को ‘जीवन की आलोचना’ कहा था । यह दायित्व आखिर साहित्यकार किस तरह निभाएं अगर उन्हें इतनी भी आजादी न मिले । इस प्रसंग में अनंत विजय जी ह्वाट्स ऐप यूनिवर्सिटी और गोदी मीडिया के इस झूठ का भी समर्थन कर बैठते हैं कि यह पुरस्कार वापसी सुनियोजित थी । इस प्रसंग में उन्होंने असहिष्णुता संबंधी बात भी उठाई है और नई सरकार की सहिष्णुता के रूप में कुलपति के बतौर सदानंद शाही की नियुक्ति और निदेशक के रूप में बद्रीनारायण की नियुक्ति का हवाला दिया है । कहते हैं कि अपवादों से नियम की पुष्टि ही होती है । अनंत विजय जी को खबर होगी ही कि इन दोनों में से एक नियुक्ति को रद्द कराने का तकनीकी कारण पैदा करने में उनके दोस्तों ने निर्णायक भूमिका निभाई और इस तरह कुलपति के प्रसंग में नियुक्ति का आदेश निर्गत होने के बाद रद्द होने का वह अकेला उदाहरण बना । न केवल इतना बल्कि जिस बात के खंडन के लिए वे यह उदाहरण ले आए उस असहिष्णुता का ही समर्थन कर बैठे ! पुरस्कार वापसी से उनको इतना धक्का लगा कि उसका विरोध करने के लिए अशोक वाजपेयी को भी वामपंथी मानकर उन्हें भी गरिया बैठते हैं । संस्थानों या प्रतिष्ठान से उनका अनुराग उनके श्रीमुख से अरुंधति राय, महाश्वेता देवी और नयनतारा सहगल तक के बारे में गलतबयानी करा देता है ।    
उनकी भाषा किस हद तक सरकारी है इसका प्रमाण तब मिलता है जब वे नक्सलियों के बौद्धिक समर्थकों को स्लीपर सेल की तरह काम करने वाला बताते हैं । उनकी भाषा में इस कदर जहर भरा है कि विरोध करने को वे लगभग हमेशाछाती कूटनायाबुक्का फाड़नाकहते हैं । इस तरह की सांकेतिक शब्दावली का इस्तेमाल उन्होंने अपने राजनीतिक करीबियों से सीखा है जो जीवन की प्रत्येक घटना को हिंदू या मुस्लिम के चश्मे से देखते हैं । उनकी तरह ही सभी बातों का सरल समाधान खोजने के चक्कर में अनंत विजय जी वामपंथियों के साथ मानवाधिकार समर्थकों आदि को भी पीट देते हैं । राजनीति में चलने वाली मुहिम के साथ उनकी सहमति को आप उनके अग्रलिखित प्रस्ताव में देख सकते हैं । उनका प्रस्ताव है- ‘राजनीति में जिस तरह से कांग्रेस मुक्त भारत पर लम्बा विवाद हुआ, उसी तरह से हिन्दी में विचारधारा मुक्त साहित्य पर भी बहस होनी चाहिए ।उनका कष्ट है किदबे-कुचले मजलूमों  की बातें करते-करते हम अपने गौरवशाली इतिहास को भुलाने लगे ।इस तरह के लेखन से उनकी विरक्ति का स्तर बहुत व्यापक है और इसमें समस्त विमर्श परक लेखन आ जाता है । कहते हैंदलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और अब तो पिछड़ों के साहित्य का एक अलग कोष्ठक तैयार करने की तैयारी हो रही है ।यह बात इनके समर्थन में नहीं, विरोध करने के लिए कही गई है । ध्यान दीजिए कि उनकी चिढ़ प्रगतिशील से लेकर दलित, स्त्री, पिछड़ा लेखन तक व्याप्त है । उनका वाम विरोध उन्हें साहित्य से विचारधारा के बहिष्कार के आह्वान तक ले जाता है । शायद विचारधारा विहीन लेखन का नमूना प्रस्तुत करने के लिए ही उन्होंने यह किताब लिखी है !
साहित्यकारों की पुरस्कार वापसी से उनकी चिढ़ का मूल उनकी इस धारणा में है कि साहित्यकारों को राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए । उन्हें साहित्य लिखने तक ही सीमित रहना चाहिए । उनकी नजर में साहित्यकार को अपनी सीमा में रहना चाहिए । असल में उनकी यह सोच भी रोमांटिसिज्म विरोध से जुड़ी हुई है । रोमांटिसिज्म व्यक्ति को अपनी तय सीमाओं का अतिक्रमण करना सिखाता है । जमीन पर रहकर भी आसमान छूने की कोशिश करने के लिए प्रेरित करता है । इस किस्म के प्रयास ही यथास्थिति के पक्षधरों को अरुचिकर लगते हैं । शासक वर्ग की सोच हमेशा से स्थापित और प्रतिष्ठित के उल्लंघन को हतोत्साहित करती है । अतिक्रमण उसके लिए खतरनाक होता है । देवताओं को भी उनसे परेशानी होती है जो मनुष्य को बताई गई सीमा को पार करना चाहते हैं । अनायास नहीं कि रोमांटिसिज्म के अंग्रेजी कवि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में थे । उनसे प्रभावित हिन्दी साहित्य का छायावाद, मुक्ति को बड़े मूल्य के रूप में ग्रहण करता है । मुक्ति के सभी अर्थों का विरोध इस किताब में व्यक्त हुआ है । इसके लिए झूठ का सहारा लेकर किए दुष्प्रचार तक को लेखक ने मान्यता दी है । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विरोध के लिए फांसी की सजा के उनके विरोध के विरोध तक में अनंत विजय जी चले जाते हैं । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को बदनाम करने के संघी प्रचार की तर्ज पर वे भी टैक्स देने वालों के धन पर इन्हें ऐश करते बताते हैं । इस सिलसिले को साफ करने के लिए थोड़ा अर्थशास्त्र की जानकारी जरूरी है । उनके कुनबे में इतना ही जानना पर्याप्त होता है कि नोटबंदी से आतंकवाद पर रोक लगी । जिम्मेदार साहित्य चिंतक होने का दावा करने के नाते उन्हें जानना चाहिए कि प्रत्यक्ष कर से बहुत अधिक परोक्ष कर की वसूली होती है और यह परोक्ष कर सभी लोग अदा करते हैं । इस नाते उन्हें अपना टैक्स तो याद रहता है लेकिन माचिस से लेकर आलू प्याज तक के इस्तेमाल पर टैक्स देने वाला भूल जाता है । इसके अतिरिक्त भी टैक्स का यही सदुपयोग है कि उसे सेहत, शिक्षा और अन्य कल्याणकारी मदों में खर्चा जाए । इस नाते जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर टैक्स का धन खर्चना उसका सही उपयोग है । दुख की बात यह कि इन सबके बावजूद राकेश सिन्हा ट्विटर पर उनका समर्थन नहीं करते !         
अनंत विजय जी लेकिन एक सही बात का उल्लेख करते हैं । उनका कहना है कि वामपंथियों ने लोकप्रिय की उपेक्षा की । वैसे यह बात भी मार्क्सवादियों के ही एक हिस्से में प्रचलित रही है । इससे आशा बंधती है कि शायद वे सोशल मीडिया आदि के पक्ष में कोई बात कहेंगे लेकिन अर्धसत्य ने उनका पीछा यहां भी नहीं छोड़ा और एकाधिक जगहों पर उन्होंने फ़ेसबुकिया लेखन का गर्हित भाव से उल्लेख किया है । यदि इस मामले में वे उच्च-भ्रू नजरिए का शिकार हैं तो सवाल है कि आखिर किस मामले में वे लोकप्रिय के साथ खड़े हैं । असल में लोकप्रिय का उनका मानक या तो चेतन भगत हैं जिनका जिक्र शायद चुनाव पूर्व उनकी राजनीतिक सक्रियता के चलते हुआ है । इसके अतिरिक्त उन्होंने अमीष त्रिपाठी जैसे अंग्रेजी लेखक का नाम लिया है जो हिंदू पौराणिक कथाओं को लेकर कथा लेखन कर रहे हैं । हिंदी के लेखक की अंग्रेजी कुंठा उनका पीछा कैसे छोड़ती ! जनता के लिए लोकप्रिय और संपन्न समुदाय के लिए विशेष की पक्षधरता असल में उनकी वर्ण व्यवस्था समर्थक सोच का ही रुचिगत विस्तार है । इस किस्म के गर्हित विभाजन के समर्थन की जगह जनता में शास्त्रीय को लोकप्रिय की तरह ग्रहण करने की क्षमता-योग्यता पैदा करना मार्क्सवादियों ने अपनी जिम्मेदारी माना है । जो कुछ भी श्रेष्ठ है उन सब के आस्वाद का अधिकार सामान्य जन को होना चाहिए । इसे अगर फ़िलहाल चर्चित कवि फ़ैज़ के शब्दों में कहें तोये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे। फ़ैज़ को उनके संगियों ने हिंदू विरोधी बनाया हुआ है । डर है इसे पढ़ने के बाद वे उन्हें भारत पर कब्जा करने की ललकार देने वाला न कहने लगें ! वैसे तोमेहनतकशलिखकर फ़ैज़ ने संदेह की गुंजाइश नहीं रहने दी है लेकिन कुपढ़ लोगों का संग साथ उनसे जो न करा ले । अर्धसत्य की खोज में तो वे निकल ही पड़े हैं ।