Wednesday, April 13, 2011

गोरख पांडेय : एक डायरी


(यह डायरी इमर्जेंसी के दिनों में लिखी गयी । इसमें तत्कालीन दौर के साथ गोरख की निजी जिन्दगी भी दिखाई पड़ती है । याद रहे कि गोरख पाण्डे स्किजोफ़्रेनिया के मरीज रहे थे और इसी बीमारी से तंग आकर उन्होंने आत्महत्या भी की थी । अनेक जगहों पर डायरी की टीपें लू शुन की कहानी 'एक पागल की डायरी' की याद दिलाती हैं । चाहें तो उस कहानी की तरह इसे भी रूपक की तरह पढ़ सकते हैं अर्थात उनको महसूस हो रहे त्रास को आपात्काल के आतंक का रूपक समझकर । इसमें संवेदनशील कवि की अपनी ही बीमारी से जूझते हुए रचनाशील बने रहने की बेचैनी दर्ज है । आर्नोल्ड हाउजर ने लिखा है कि कलाकार अक्सर असामान्य होते हैं लेकिन सभी असामान्य लोग कलाकार नहीं होते । गोरख पांडेय की यह डायरी एक कवि की डायरी है- इसका अहसास कदम कदम पर होता है । स्किजोफ़्रेनिया का वह पहला हमला था । तनाव को आता हुआ वे महसूस करते हैं । फिर विवेक साथ छोड़ने लगता है । काल्पनिक प्रेम होने लगते हैं । कल्पना में ही मुलाकातें, कल्पना में ही प्रेमिका दुश्मन भेजती है । कल्पना में दुश्मनों से मुकाबला और उनकी पराजय । लेकिन जब कविता में यही अनुभूतियाँ प्रकट होती हैं तो उनकी परिपक्वता देखते ही बनती है । दोस्तों की भारी फ़ौज, उनके साथ स्त्रियों से लेकर तरह तरह के विषयों पर अनन्त बहसें । जिनका जिक्र इस डायरी में आया है उन सबका परिचय भाकपा (माले) से हो चुका था । सभी साथ हैं पर गोरख बनारस से भागते हैं । दिल्ली आने पर पुराने साथियों में थकान दिखाई पड़ती है । अन्तिम कविता में वे इन्हीं साथियों को पुकार रहे हैं । यह डायरी प्रोफ़ेसर सलिल मिश्र से प्राप्त हुई है - गोपाल प्रधान ।)
6---3---1976
कविता और प्रेम - दो ऐसी चीजें हैं जहाँ मनुष्य होने का मुझे बोध होता है । प्रेम मुझे समाज से मिलता है और समाज को कविता देता हूँ । क्योंकि मेरे जीने की पहली शर्त भोजन, कपड़ा और मकान मजदूर वर्ग पूरा करता है और क्योंकि इसी तथ्य को झुठलाने के लिये तमाम बुर्जुआ लेखन चल रहा है, क्योंकि मजदूर वर्ग अपने हितों के लिये जगह जगह संघर्ष में उतर रहा है, क्योंकि मैं उस संघर्ष में योग देकर ही अपने जीने का औचित्य साबित कर सकता हूँ-----
इसलिये कविता मजदूर वर्ग और उसके मित्र वर्गों के लिये ही लिखता हूँ । कविता लिखना कोई बड़ा काम नहीं मगर बटन लगाना भी बड़ा काम नहीं । हाँ, उसके बिना पैंट कमीज बेकार होते हैं ।
8---3---1976 पाल्हामऊ गाँव (जौनपुर)
श्यामा को विभाग में सूचना दी कि दो-एक दिन मुझे यहाँ नहीं रहना है । वह उदास थी । धीरे धीरे वह मेरे ऊपर हावी होती जा रही है । मैं होने दे रहा हूँ ।
2 बजे बस स्टेशन टुन्ना के साथ । रिक्शे पर टुन्ना से कहा- कहो तो मैं एक कविता बोलूँ-
उसने जीने के लिये खाना खाया
उसने खाने के लिये पैसा कमाया
उसने पैसे के लिये रिक्शा चलाया
उसने चलाने के लिये ताकत जुटायी
उसने ताकत के लिये फिर रोटी खाई
उसने खाने के लिये पैसा कमाया
उसने पैसे के लिये रिक्शा चलाया
उसने रोज रोज नियम से चक्कर लगाया
अन्त में मरा तो उसे जीना याद आया
मिश्रा की शादी में शरीक हुए । मिश्रा वर की तरह चमक रहा है । बारात की तरह बारात । शादी की तरह शादी ।
9---3---1976
जौनपुर से गाजीपुर । पहिये खराब होते हुए । बसें रूकतीं और भागतीं । रामजी की शादी । ज्यादा खुला और निकट का माहौल । मीठा, चाय, पान, सिगरेट और दोस्त बहुतायत । रामजी की पत्नी दिखी । खूबसूरत लड़की । खुश है । रामजी उछलते कूदते । धर्म और अध्यात्म के विरुद्ध भाषण । चितरंजन, कृष्णप्रताप वगैरह । टुन्ना, अमित, महेश्वर । विनय भाई की कविताएँ । अद्भुत सहजता बच्चों सरीखी ।
नेतन क दंवरी से जिनगी पुआल भईल ।
10---3---1976
रास्ते में । वापसी । पैसा । महेश्वर प्रधान । मैं । पैसा । महेश्वर । तनाव । मैं । पैसा । तनाव । महेश्वर । मैं । तनाव ।
11---3---1976
श्यामा नहीं दिखी । विभाग में परसों आई थी । कल नहीं । आज भी नहीं ।
12---3---1976
आज विभाग नहीं गया । खूब सोया । होली आयी । लड़के, लड़कियाँ घरों को चले । होली खेलने । रात को छात्रावास में कोई लड़का बहुत तेज चीखा- तेरी बहन की-- । चीखती हुई यौनवर्जना । होली ।
ठप सा पड़ा हुआ है
देश
आपात स्थिति
सिर्फ़ चलती है
थम गयी है हलचल
शोर बन्द है
शान्ति बन्दूक की नली से
निकलती है
कामरेड,
कहीं कुछ हो रहा है ?
मुझे निराश मत करो
कामरेड,
बताओ कहीं कुछ हो रहा है ?
यह पहाड़ हड्डी पसली एक करता है
फिर भी महंगू चुपचाप
ढो रहा है
क्या यही सच है कामरेड
कि विचार और क्रिया में
दूरी हमेशा बनी रहती है
कामरेड, कितना मुश्किल है सही होना
कहीं कुछ हो रहा है कामरेड !
13---3---1976
परसों ललित कला की प्रदर्शनी देखी । साथ में अवधेश जी, श्रीराम पाण्डेय ।
एक मर्द का कन्धे से ऊपर का भाग औरत के जांघों और नाभि के बीच गायब हो गया है । प्रधान जी इस सिलसिले में टिप्पणी करते हैं कि एक व्यक्ति पीछे से उन्हें टोक देता है । बाद में पता चलता है कि वह चतुर्थ वर्ष का कला-छात्र है । उसके विचार से 'हम जितना समझते हैं वह ठीक है ।' वह कहना यह चाहता है कि वैसे तो हमारी समझ के पल्ले बहुत कुछ नहीं पड़ रहा मगर जो पड़ रहा है वह हम जैसे गंवारों के लिये काफ़ी है । फिर खड़े खड़े कला पर बहस ।
एक-- चित्रकार अपनी भावनाओं के अनुसार चित्र बनाता है । दर्शक उसे अपनी भावनाओं के अनुसार समझता है । अगर चित्र दर्शक के मन में कोई अनुभूति उपजाने में समर्थ हो जाता है तो चित्रकार सफल है ।
दो-- क्या हमें हक है कि चित्र में व्यक्त कलाकार की भावना को जानें ? या वह मनमानी ढंग से कुछ भी सोचने के लिये छोड़ देता है ? क्या चित्रकार हमें अनिश्चित भावनाओं का शिकार बनाना चाहता है ? क्या वह अपना चित्र हमारे हाथ में देकर हमसे पूरी तरह दूर और न समझ में आने योग्य रह जाना चाहता है ? क्या उसे हमारी भावनाओं के बारे में कुछ पता है ?
अन्ततः क्या कलाकार, उसकी कृति और दर्शक में कोई संबंध है ? या तीनों एकदम स्वतंत्र एक दूसरे से पूर्णरूपेण अलग इकाइयां हैं ?
एक तरफ़ कलाकार आपातस्थिति की दुर्गा का गौरव चित्रित कर रहा है, दूसरी तरफ़ कलाकार आपातस्थिति को चित्र में लाना अकलात्मक समझकर खारिज कर देता है । ये दोनों एक ही स्थिति के मुखर और मौन पहलू नहीं हैं ?
बहुतायत उन चित्रों की है जिनमें सारी दुनिया सेक्स की धुरी पर घूमती नजर आती है । सचित्र कोकशास्त्र को शरमाकर अमूर्त बनाने की क्या जरूरत है ?
पेंसिल से बरगद का तना बनाया है किसी ने । खूबसूरत । वह लंका पर दिखने वाली लड़की जो मुझसे ऊब गयी थी, पता चला कि धर की सहछात्रा है । विधु वर्मा भी हैं । मैं विधु को देखता हूँ । धर ने बेंत से मोर बनाया है । बड़ा सा । बाहर खड़ा है ।
Of nature the ancients loved to sing the beauty:
Moon and flowers, snow and wind, mist, hills and streams.
But in our days poems should contain verses steely.
And poets should form assault teams.
The body is in jail
But thy spirit, never.
For the great cause to prevail
Let thy spirit soar, higher.
Every morning the sun, emerging over the wall
Beams on the gate, but the gate is not yet open
Inside the prison lingers a gloomy fall
But we know outside the sun has risen.
Nostalgically a flute wail in the ward
Sad grows the tone, mournful the melody.
Miles away, beyond passes and streams in infinite melancholy
A lonely wife mounts a tower to gaze abroad.
14---3---1976
आशा करना मजाक है
फिर भी मैं आशा करता हूँ
इस तरह जीना शर्मनाक है
फिर भी मैं जीवित रहता हूँ
मित्रों से कहता हूँ -
भविष्य जरूर अच्छा होगा
एक एक दिन वर्तमान को टालता हूँ
क्या काम करना है ?
इसे मुझे तय नहीं करना है
लेकिन मुझे तय करना है
मैं मित्रों को बुलाउँगा -
कहूँगा -
हमें (हम सबको) तय करना है
बिना तय किए
इस रास्ते से नहीं गुजरना है ।
मुझे किसी को उदास करने का हक नहीं
हालांकि ऐसे हालात में
खुश रहना बेईमानी है ।
हिंदी में कौन सुंदर लेखिका है ? महेश्वर के कमरे में बात आती है । एक लेखिका की विलेन जैसी छवि पर अटक जाती है । क्या पूर्वी उत्तर प्रदेश में सुंदर औरतें हैं ? पहले मैं सोचता था कि नहीं हैं । मेरा यह भ्रम चूर चूर हो गया । मध्यमा में जिस लड़की को चाहता था वह देवरिया के एक गाँव की थी । गोरी, कमल की लम्बी पंखुड़ी सी बड़ी आँखें मुझे अब तक याद हैं । याद है, किस तरह उसने एक बार हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा था, मैं सितार के कसे तारों की तरह झनझना उठा था ।
पिछले दिसम्बर तक जिस लड़की को चाहता था वह आजमगढ़ से आयी थी । उसने खुद को सजाने संवारने में कोई कसर नहीं रखी थी । बाब्ड, बेलबाटम, मासूम, कटार सी तीखी । लचीली, तनी हुई, प्रेम से डूबती, घृणा से दहकती । मैंने उसे कविता दी थी--
-----हिंसक हो उठो
मेरे लुटे हुए प्राण----
अन्ततः वह हिंसक हो उठी ।
सवाल यह नहीं कि सुन्दर कौन है । सवाल यह है कि हम सुन्दर किसे मानते हैं । यहाँ मेरे subjective होने का खतरा है । लेकिन सच यह है कि सौन्दर्य के बारे में हमारी धारणा बहुत हद तक काम करती है । हम पढ़े लिखे युवक फ़िल्म की उन अभिनेत्रियों को कहीं न कहीं सौन्दर्य का प्रतीक मान बैठे हैं जो हमारे जीवन के बाहर हैं । नतीजतन बालों की एक खास शैली, ब्लाउज, स्कर्ट, साड़ी, बाटम की एक खास इमेज हमारे दिमाग में है । हम एक खास कृत्रिम स्टाइल को सौन्दर्य मानने लगे हैं । शहर की आम लड़कियाँ उसकी नकल करती हैं । जो उस स्टाइल के जितना निकट है हमें सुन्दर लगती है ।
फिर भी हम स्टाइल को पसन्द करते हैं, ऐसा मानने में संकोच करते हैं । फ़िल्में, पत्रिकाएँ लगातार औरत की एक कामुक परी टाइप तस्वीर हमारे दिमागों में भरती हैं, लड़कियों को हम उसी से टेस्ट करते हैं । हम विचारों के स्तर पर जिससे घृणा करते हैं भावनाओं के स्तर पर उसी से प्यार करते हैं । भावनाएँ अस्तित्व की निकटतम अभिव्यक्ति हैं । यह हुआ विचार और अस्तित्व में सौन्दर्यमूलक भेद । यह भेद हमारे अंदर चौतरफ़ा वर्तमान है ।
हमें कैसी औरत चाहिए ?
निश्चय ही उसे मित्र होना चाहिए । हमें गुलाम औरत नहीं चाहिए । वह देखने में व्यक्ति होनी चाहिए, स्टाइल नहीं । वह दृढ़ होनी चाहिए । चतुर और कुशाग्र होना जरूरी है । वह सहयोगिनी हो हर काम में । देखने लायक भी होनी चाहिए । ऐसी औरत इस व्यवस्था में बनी बनायी नहीं मिलेगी । उसे विकसित करना होगा । उसे व्यवस्था को खतम करने में साथ लेना होगा । हमें औरतों की जरूरत है । हमें उनसे अलग नहीं रहना चाहिए ।
15---3---1976
दिन मे खूब सोया । सपना देखा । पिता की गिरफ़्तारी हुई । सरकारी लोन न लौटाने की वजह से । मैंने घर का काम सम्हाला । खेत में काम करते वक्त जूता बदला ।
बदला शहर कि साथ में जूता भी बदल गया
बदले थे ब्रेख्त ने वतन जूतों से जियादह
लीडर ने भी देखा न था कब जूता चल गया
मिलते हैं अब गवाह सबूतों से जियादह
शाम को गम्भीर मानसिक जड़ता और दबाव । गोया बोल ही न सकूं । न हंस सकूं । महेश्वर, अमित, प्रधान, जलेश्वर सब इसे लक्ष्य करते हैं । यह परेशानी काफ़ी दिनों बाद हुई है । एक चट्टान सी दिमाग पर पड़ी हुई है । मैं हंसने की, हल्का होने की कोशिश करता हूं । लेकिन नाकामयाब । लगता है, भीतर ही भीतर कोई निर्णय ले रहा हूं । दुःखों के भीतर से और दुखी होने का निर्णय - ऐसा लगता है । अमित के कमरे में चाय पी । महेश्वर और कभी कभी प्रधान ने गाना गाया । जलेश्वर ने उर्दू शायर की नकल की । जड़ता कुछ टूटी । तब तक मैंने फ़ैसला भी कर लिया । मैं सु को पत्र लिखूंगा । लिखूंगा--
पता नहीं यह पत्र आप तक पहुंचे या नहीं । फिर भी लिख रहा हूं । आप को ताज्जुब होगा ।
आप नाराज भी होंगे । फिर भी मैं अपने आपको रोक नहीं पा रहा ।
आप को मेरे व्यवहारों से मेरे न चाहते हुए भी कष्ट पहुंचा । (मैंने लिखा है न चाहते हुए । आप गुस्से में इसका अर्थ चाहते हुए लगा सकते हैं । उन दिनों आप मेरे प्रति जितना खौफ़नाक पूर्वाग्रह के शिकार थे, उसमें सहज ढंग से मेरी हर बात का उल्टा ही अर्थ आपके दिमाग में आया होगा ।)
खैर, जब आपने मेरे प्रति हमलावर रुख अख्तियार किया, तब भी मैं आप पर नाराज नहीं हो सका । नाराज हुआ तो सिर्फ़ एक आदमी पर । उस पर, जिसने मेरे ऊपर हमले की योजना बनायी ।
नाराजगी से ज्यादा सदमा लगा मुझे । पूरी तरह गलत समझ लिये जाने का सदमा । आप लोगों की निगाह में वे तमाम लोग सही हो गये जो झूठ और पाखण्ड के साये में पलते हैं । मैं गलत हो गया । अगर इसे अहंकार न मानकर तथ्य का विवरण देना समझा जाय तो मैं अपने बारे में कह सकता हूं कि मैंने कदम कदम पर पाखण्ड और दमन के खिलाफ़ बगावत की है । मैंने अतीत में एक लड़की से सम्बन्ध इसीलिए तोड़ा था कि उसके साथ मेरा सम्बन्ध पूरी तरह से पाखण्ड और दमन पर आधारित था । उसे एक सेकण्ड के लिए भी न चाह सका । साथ ही वह सम्बन्ध मेरे पिता द्वारा बचपन में पैसे के आधार पर तय किया गया था । पिता से नफ़रत करने और उनके निर्णयों को नष्ट करने की कड़ी में यह घटना भी हुई थी ।
अपने बारे में सफाई देना जरूर कष्टप्रद स्थिति है । मुझे कतई पसन्द नहीं । फिर भी मैं तमाम बार बौखला सा उठता हूं कि मुझे क्यों इस तरह गलत समझा गया । आपने पूछा था कि मैं आपको दलाल समझता हूं ? मैं आपसे जानना चाहता था कि क्या आप मुझे लम्पट और व्यभिचारी समझते हैं ? आपके पास इसका प्रमाण नहीं है । आपको ताज्जुब होगा कि मुझे लड़कियाँ लगातार फ़ेवर करती हैं । इसका कारण मुझे नहीं पता । लेकिन यह तथ्य है । आपको ताज्जुब होगा यह भी जानकर कि आज तक पूरे जीवन में दो-चार वाक्य अगर मैंने किसी लड़की से कहे हैं, तो वह यही है । उसने मुझे खुद ही बात करने (या सुनने !) के लिए अप्रत्यक्ष तरीके से कहा था । इसका यह मतलब नहीं कि मैं उससे प्रभावित न था । प्रभावों के बावजूद मैं टालने की कोशिश करता रहा था ।
वह अंततः हिंसक हो उठी । मैंने उसे पढ़ने को एक कविता दी थी । उसमें कहीं लुटे हुए प्राणों को 'हिंसक' होने को कहा गया है । उसने हिंसक होकर, मुझे लगता है, कविता की सलाह को लागू कर दिया । लेकिन किसके ऊपर हिंसा ? उन पर जो हिंसा के लगातार शिकार हैं या उन पर जो हिंसा से शिकार बनाते हैं ?
उसे मुझसे सिर्फ़ शिकायत यह हो सकती है कि उसके सामने खुलकर मैंने अपने अतीत और वर्तमान की परिस्थितियों को नहीं रखा । इस काम में उसने भी मुझे मदद नहीं दी । एक तो मैं खुद इस मामले में बहुत काम्प्लिकेटेड हो गया हूं, दूसरे जब भी प्रयास किया उसने नकारात्मक रुख अपनाया । कई बार तो लगा कि उससे बात करते ही शायद रो पड़ूंगा या ऊल-जलूल बक जाऊंगा । सो, रुक गया । फिर परिस्थिति और जटिल होती गयी ।
हालांकि कई मामलों में मैं अपने आपको मूर्ख मानता हूं लेकिन वह बिल्कुल मूर्ख साबित हुई । कभी कभी सोचता हूं कि उसने गद्दारी की । लेकिन फिर लगता है कि यह उसके प्रति शायद ज्यादती होगी । (मजे की बात यह है कि वह मुझे ही गद्दार समझती है !)
वैसे तो आपको पत्र लिखकर धन्यवाद देने की बहुत पहले से इच्छा थी मगर इस बीच दो तीन घटनाओं ने मुझे उत्तेजित कर दिया । उसने अपने एक सहपाठी से मेरे बारे में बिल्कुल एकांगी सूचनाएं दीं । याने कि झूठ बोल गई । मैंने इसके लिए उसे एक बार अप्रत्यक्ष ढंग से डांटा था । फिर आप लंका पर दिखाई पड़े । कई बार आपसे बात करने की इच्छा हुई । लेकिन आप कहीं फिर मुझे गलत न समझ बैठें, इसलिए रोक गया ।
आपको मेरे या मेरे किसी मित्र के व्यवहार से कष्ट पहुंचा हो तो मुझे सख्त अफ़सोस है । मुझे आपसे कभी कोई शिकायत, कोई नाराजगी कतई नहीं रही । उसके प्रति जरूर गुस्सा रहा है, जो मेरा ख्याल है कि समय के साथ धीरे धीरे खतम हो जायेगा----
(हां, आपको सूचित कर दूं कि किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को चाहा जाना अपराध नहीं है । गैर जिम्मेवारी और झूठ अपराध है । नारी मित्र चुनने का पूरा अधिकार मुझे है । मैं इसके लिए कानून के पोथों को गैर जरूरी मानता हूं । किसी का मूल्यांकन करते वक्त हमें अपने दृष्टिकोण का भी मूल्यांकन करना चाहिए ।)
बहुत बहुत धन्यवाद
आपका
16---3---1976
होली खेली गयी । खाना हुआ । सोये । शाम को शहर की ओर । महेश्वर, प्रधान, अमित, जलेश्वर, बलराज पाण्डेय । बलराज पाण्डे पत्नी से झगड़कर हास्टल अकेले आये । अस्पताल में अनिल नाम के प्यारे से बच्चे को अबीर लगाया गया । अमित हैदराबाद से अनुत्साहित और विवर्ण सा लौटा । विनोद जी को बुखार है और सिर में काफ़ी दर्द ।
लंका से अस्सी की ओर बढ़ने पर देखा कि नी के घर के पास एक और मकान उठ रहा है । काफ़ी उठ चुका है । अस्सी पर कालोनी की ओर मुड़ने वाले रास्ते की तरफ़ निगाह गयी ।
फिर तेरे कूचे को जाता है खयाल
दिले - गुमगश्ता मगर याद आया
शेखर इन्तजार ही कर रहा था । बहुत प्यारा लड़का है । इस शहर में एकमात्र आदमी जिसने हम सभी को अपने घर निमंत्रित किया था । वैसे रास्ते में नेपाली कवि श्री शेखर वाजपेयी जी मिले । मीठा, पूड़ियां, नमकीन, शराब, गोश्त- उसने सब कुछ खिलाया । हम प्रसन्न हुए । फिर अस्सी चौराहे पर देखा कि शास्त्री जी की दुकान बदल गयी है । बड़ी और खूबसूरत सजावट । केदार जी ने मस्ती में अबीर चारों तरफ़ छिड़क दिया ।
पाण्डे जी के साथ उनके घर । राय जी से परिचय हुआ, उनके पड़ोसी हैं । काशी विद्यापीठ में रिसर्च । दोनों की पत्नियां । महेश्वर औरतों के अलग होने से क्षुब्ध हैं । पान, सिगरेट । अन्त में मेरे मुंह से निकलता है - आप लोग जरा स्वतंत्र होइए भाई ।
नन्दू के घर - रास्ते में चन्दन भाई और क्रिस्टोफ़र । गोरख दा, उनके बच्चे, मां, दीदी सब घर पर । वहां भी मीठा मिला । लौटते रास्ते में नन्दू मिले । भांग में मस्त । कई लोगों के साथ चाय पीने चले । साथ में धर भी हो गया है । वहां गाना और कविता । भांग की कुल्फ़ी ली जा चुकी है । धर कलकत्ता की खुशखबरी देता है । डायनामाइट । टूटना । निकलना । लौटे । पैदल ही जाना है । पैदल ही आना है । महेश्वर के कमरे में चाय बनी । फिर थककर सो गये । सुबह देर से उठे । लगा, शाम हो गयी है ।
आज शाम को लंका घूमे । दिन में कपड़ साफ़ किया । पत्र लिखा । स्वप्न देखा कि एक बस ड्राइवर खड्ड में गिरने से बस को रोकने के लिए उसे पीछे मोड़ने की कोशिश कर रहा है । अब थीसिस पर कुछ काम शुरू करना है ।
18---3---1976
प्रधानमंत्री का कहना है-
विरोधियों की गैर जिम्मेदाराना
हरकतें देखते हुए-
उन्हें प्रधानमंत्री बने रहना है ।
उन्हें मालूम नहीं
उनके पिता जब प्रधानमंत्री थे
तब उन्होंने प्रधानमंत्री
होना चाहा था ।
होने के बाद भी
उन्हें मालूम है कि प्रधानमंत्री
होना उन्होंने चाहा न था ।
उनका लड़का भी नहीं चाहता
प्रधानमंत्री होना
लेकिन नहीं चाहने के बावजूद
हो जायेगा
तब बतायेगा- उसे बने रहना है ।
एक बिल्कुल बेहूदा जीवन । पंगु, अकर्मण्य समाज विरोधी जीवन । क्या जगह बदल देने से कुछ काम कर सकूंगा ? मैं बनारस तत्काल छोड़ देना चाहता हूं । तत्काल । मैं यहां से बुरी तरह ऊब गया हूं । कुछ भी कर न पा रहा । मुझे कोई छोटी मोटी सर्विस पकड़नी चाहिए । और नियमित लेखन करना चाहिए । यह पंगु, बेहूदा, अकर्मण्य जीवन मौत से बदतर है । मुझे अपनी जिम्मेदारी महसूस करनी चाहिए । मैं भयानक और घिनौने सपने देखता हूं । लगता है, पतन और निष्क्रियता की सीमा पर पहुंच गया हूं । विभाग, लंका, छात्रावास लड़कियों पर बेहूदा बातें । राजनीतिक मसखरी । हमारा हाल बिगड़े छोकरों सा हो गया है । लेकिन क्या फिर हमें खासकर मुझे जीवन के प्रति पूरी लगन से सक्रिय नहीं होना चाहिए ? जरूर कभी भी शुरू किया जा सकता है । दिल्ली में अगर मित्रों ने सहारा दिया तो हमें चल देना चाहिए । मैं यहां से हटना चाहता हूं । बनारस से कहीं और भाग जाना चाहता हूं । मैं जड़ हो गया हूं, बेहूदा हो गया हूं । बकवास करता हूं । कविताएं भी ठीक से नहीं लिखता । किसी काम में ईमानदारी से लगता नहीं । यह कैसी बकवास जिंदगी है ? बताओ, क्या यही है वह जिंदगी जिसके लिए बचपन से ही तुम भागमभाग करते रहे हो ? तुमने समाज के लिए अभी तक क्या किया है ? जीने की कौन सी युक्ति तुम्हारे पास है ? बेशक, तुम्हे न पद और प्रतिष्ठा की तरफ़ कोई आकर्षण रहा है न अभी है । मगर यह इसीलिए तो कि ये इस व्यवस्था में शोषण की सीढ़ियां हैं ? तो इन्हें ढहाने की कोई कोशिश की है ? कुछ नहीं कुछ नहीं । बकवास खाली बकवास । खुद को पुनर्निर्मित करो । नये सिरे से लड़ने के लिए तैयार हो जाओ ।
मैं दोस्तों से अलग होता हूं
एक टूटी हुई पत्ती की तरह
खाई में गिरता हूं
मैं उनसे जुड़ा हूं
अब हजारो पत्तियों के बीच
एक हरी पत्ती की तरह
मुस्कुरा उठता हूं ।
मेरे दोस्तो के हाथ में
हथकड़ियां
निशान मेरी कलाई पर
उभरते हैं
हथकड़ियां टूटती हैं
जासूस मेरी निगाहों में
झांकने से डरते हैं ।
22---3---1976
फिर अद्भुत दुर्घटना हो रही है । सु आया 4-5 दिन पहले । बीस तारीख की शाम को गी भी लंका पर दिखी । बाल बांध रखे थे । बहुत सीधी-सादी लड़की लग रही थी । बगल से उसका चेहरा दिखाई पड़ा । दुखी-सी लगी । महेश्वर आदि ने दूर आगे जाकर उसे करीब से देखा । मैंने किसी से कहा- 'चलो । उन्हें छोड़ आयें । वह हमारे घर आयी हैं ।' वह एक दुकान पर कुछ खरीदने के लिए रुकी । मैं वहां रुककर दुकान से उसके उतरने का इन्तजार करता रहा । घबराहट और उत्तेजना में तेजी से इधर उधर टहलता रहा । वह उतरी । एक बार उसने मेरी तरफ़ देखा । फिर मैं और सारे दोस्त लौट पड़े । के पी, प्रधान, महेश्वर, टुन्ना, अमित सबने उसे देखा । महेश्वर ने कहा- गुरू, मैं तुमसे ईर्ष्या करता हूं । मेरे अंदर किसी भी लड़की के बारे में यह सोचने की इच्छा क्यों नहीं उभरती कि वह हमारे घर आयी है । चलो, उसे छोड़ आयें । मेरे अंदर प्रेम की यह भावना क्यों नहीं उभरती ? वह बहुत भावुक हो गया है । कल, यानी इक्कीस को दिन में हम सभी अस्सी तक गये थे । कोई नहीं दीखा । आज शाम को सु एक महिला के साथ हम सबके करीब से गुजरा । वह गम्भीर लग रहा था । बाद में हम उसके घर की तरफ़ से अस्सी तक गये । फिर दूसरी तरफ़ से लौट आये । शेखर से उसकी बातें नहीं हुईं । यह अच्छी बात नहीं है । वैसे मैंने मिलने को उससे लिख दिया है । मैं अपनी तरफ़ से कोई शिकायत नहीं रहने देना चाहता ।
24---3---1976
कितना गहरा डिप्रेशन है । लगता है मेरा मस्तिष्क किन्हीं सख्त पंजों द्वारा दबाकर छोटा और लहूलुहान कर दिया गया है । जड़ हो गया हूं । कुछ भी पढ़ने-लिखने, सुनने समझने की इच्छा ही नहीं होती । ठहाके बन्द हो गये हैं । सुबह इन्तजार करता रहा । कोई नहीं आया ।
फ़ैज की कविता 'तनहाई' -
फिर कोई आया दिलेजार ! नहीं, कोई नहीं
राहरौ होगा, कहीं और चला जायेगा ।
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का गुबार
लड़खड़ाने लगे एवानों में ख्वाबीदा चिराग
सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुजर
अजनबी खाक ने धुंधला दिए कदमों के सुराग
गुल करो शमएं, बढ़ा दो मयो-मीना-ओ-अयाम
अपने बेख्वाब किवाड़ो को मुकफ़्फ़ल कर लो
अब यहां कोई नहीं, कोई नहीं आयेगा ।
मुझे शक हो रहा है कि मेरे देखने, सुनने, समझने की शक्ति गायब तो नहीं होती जा रही है । अगर मेरे पत्र के बाद उन्हें देखा, तो निश्चय ही वे सम्बन्धों को फिर कायम करना चाहते हैं । अगर नहीं, तो हो सकता है कि मैंने भ्रमवश किसी और को देखकर उन्हें समझ लिया हो । यह खत्म होने की, धीरे धीरे बेलौस बेपनाह होते जाने की, धड़कनें बन्द कर देने वाले इन्तजार की सीमा कहां खत्म होती है ? क्या जिन्दगी प्रेम का लम्बा इन्तजार है ? अगर मैं रहस्यवादी होता तो आसानी से यह कह सकता था । लेकिन मैं देखता हूं, देख रहा हूं, कि बहुत से लोग प्रेम की परिस्थितियों में रह रहे हैं । अतः मुझे अपने व्यक्तिगत अभाव को सार्वभौम सत्य समझने का हक नहीं है । यह एक छोटे भ्रम से बड़े भ्रम की ओर बढ़ना माना जायेगा । मुझे प्रेम करने का हक नहीं है, मगर इन्तजार का हक है । स्वस्थ हो जाऊंगा, कल शायद खुलकर ठहाके लगा पाऊंगा ।
25---3---1976
तुम्ही कहो कि तेरा इन्तजार क्यों कर हो
दर्द, तनहाई, खमोशी ही बहुत ज्यादा है
तुम्ही कहो कि मुझे तुमसे प्यार क्यों कर हो
मैं तुम्हे एक बहुत ही उत्पीड़ित और उग्र आत्मा मानता हूं । मैं तुम्हे सचमुच चाहता हूं । मैं तुम्हे सुखी देखना चाहता हूं । लेकिन मेरी प्रिय, क्या अच्छा न होगा कि हम एक दूसरे को बिल्कुल भूल जाएं । तुम जिद पकड़ लेती हो तो फिर मान ही नहीं सकती । मैं तुम्हारा सम्मान करता हूं । तुम्हारी सुविधा के लिए भरसक प्रयास करता हूं । लेकिन तुम क्या करती हो ? तुम्हारे लिए कितनी दूर दूर तक अपने आपको झुका लेता हूं । बखुशी । लेकिन तुम हो कि झुकने का नाम नहीं लेतीं । तुम सु को क्यों नहीं मेरे पास भेजती हो ? मैं क्या करूं कि तुम्हे सुखी और तनावमुक्त बना सकूं ?
25---3---1976
घबरा गया, दो बजे वहां उसके कालेज जाना है । दूबे से कहा, उसने मोटर साइकिल किसी की ली । जाने को तैयार हो गया । तब तक मिश्रा आया । साइकिल से । मैं, मिश्रा, यादव, दूबे ttc चले । TTC पुस्तकालय में वही उसकी चिरपरिचिता दर्शन में सहपाठिनी बैठी है । उसने मुझे देखकर मुंह फेर लिया । क्लासों में उसे ढूंढ़ा । एक जगह लगा, वह है । फिर इन्तजार करने लगा । मिश्रा ने बताया, वह पुस्तकालय के सामने खड़ी है । गया, नहीं दिखी । मिश्रा पीछे लान की ओर गया । वह वहां दो तीन लड़कियों के साथ बैठी है । तो छुप रही है । मुझे लगा, मुझसे छुप रही है । तुरन्त चल देने को कहता हूं मिश्रा से । फिर रुक जाता हूं । 4 की घंटी बजती है । लड़कियां मोटर पर बैठने के लिए आती हैं । वह भी । वह आंख बन्द किए, गहरी मुस्कान के साथ धीरे धीरे चलती हुई बस में चली जाती है । मिश्रा के साथ चल देता हूं । खुश हूं । उसे देखकर । वह कालेज में लड़कों के साथ घुलमिल गयी है । किसी लड़के के साथ एक खाली कमरे में बैठने की वजह से वह कमरा लाक कर दिया गया है । वह एन्जाय कर रही है । अच्छी बात है । मुझे लग रहा है कि मैं उसके पीछे गलत पड़ा हूं । उन दिनों वह मुझे चाहती थी । अब वह नहीं, मैं उसे चाहता हूं । फ़र्क है, बहुत बड़ा फ़र्क । नहीं । खैर सुधीर मिलता है तो उससे बात करूंगा । उसके बाद खत्म । वैसे इसे खत्म ही समझा जाना चाहिए । वह मेरे साथ हो भी गयी तो टूटते स्वास्थ्य, अभावग्रस्त गृहस्थी के माहौल में उस अत्यन्त सजीव लड़की को, जिसे भरपूर जीने का हक है, मैं परीशान ही करूंगा । नहीं, मुझे उसके प्रति एक लिजलिजा मोह घिर आया है । जबकि वह उच्छल, उन्मुक्त, सहज, स्वस्थ, सुखी नजर आ रही है । उसे किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं । उसे मुझे प्यार करने की वजह से कष्ट नहीं । अगर प्यार नहीं तब भी मेरी तरफ़ से कष्ट नहीं । नहीं, नहीं, नहीं ।
मुझे मेरे प्यार ने खुद-ब-खुद सौंप दिया
हत्यारों के हाथ में
एक लम्बे अर्से तक उसका इन्तजार किया
चुपचाप समूचे अस्तित्व से मैंने
इन्तजार किया
वह झटके में दिखाई पड़ी
आवाज दी, उसने मेरी आवाज दोहरायी
ठहरो आ रही हूं
फिर अंधेरे में गायब हो गयी
मैंने खुद को एक नदी की तरह
उसकी ओर बहते हुए पाया
उसने मुझे मुस्करा कर देखा
मैंने उत्तेजित कण्ठ से मुक्ति का गीत गाया
बार बार मुझे लगा- इतना प्यार सह
नहीं सकूंगा या तो उसके पैरों पर
गिरकर रो पड़ूंगा या दुश्मन
हमला करेगा मैं उसकी मार से
जीवित रह नहीं सकूंगा ।
चुपचाप, समूचे अस्तित्व से उसका
इन्तजार किया
वह मुझे फूलों में मिली
जब धूप पंखुड़ियों को जला देती है
वह खिड़कियों पर मिली जब उनके
बन्द होने का वक्त होता है
वह मिली ट्रेन की थरथराती सीटियों में
जब प्लेटफ़ार्म खाली हो चुकते हैं
एक दिन अस्पताल में बिना दवा के
कराहती दम तोड़ रही थी कि मिली
उसने मेरी ओर देखा- देर हो चुकी है
मैंने अपराधी की तरह सिर झुका लिया ।
मिली वह मुझे मगर तब जब कि
शेर उसके मासूम शरीर पर अपने
खूनी पंजे जमा चुका था-
मैंने सोचा-
शेरों के राज्य में प्यार की हिफ़ाजत
के लिए हथियार और साहस बेहद जरूरी हैं
और सभी नरभक्षियों का बेमुरौव्वत
सफ़ाया कर दिया जाना चाहिए ।
एक दिन इशारे से बुलाकर उसने कहा-
देखो, मैं इस मकान में कैद हूं
किसी तरह बाहर निकालो
ओह, तुम उस राजकुमार के इन्तजार में हो
जो घोड़े पर सवार तलवार चमकाते हुए आयेगा
और जंजीरें काटकर तुम्हे उड़ा ले जायेगा ?
ऐसा, नहीं प्रिय, राजकुमार एक धोखा है
एक स्वप्न जो कभी पूरा नहीं होगा
आओ मिलजुलकर आदमी की तरह
बेड़ियां काटें ।
उसने कहा- मेरे हाथ कोमल हैं
और ये तो फूल हैं जिन्हे तुम जंजीरें
कहते रहते हो, सो, मुझे मेरे हाल पर
छोड़ दो, मुझे बाहर धकेलते हुए
उसने दरवाजा धड़ाम से बन्द किया ।
लेकिन वह मेरी निगाहों में थी नसों में
खून की तरह बहती और धड़कती हुई
रात का स्वप्न और दिन की कल्पना थी
वह मेरे लिए मेरे अस्तित्व से ज्यादा जरूरी थी
एक दिन वह फिर मिली अज्ञान, भूख और
थकान से टूटी हुई- मेरी जेब खाली थी
मजबूरी से उसे देखा, क्षमा मांगी, मानो
गलती हो गयी हो
उसने कहा- तुम धोखा दे रहे हो किस
बूते पर मुझसे उम्मीद की ?
मैंने कहा- झूठ और लूट के दौर में
हमारे पास सिर्फ़ दो ही रास्ते हैं-
चोरी या बगावत
उसने मुझे नफ़रत से देखा- पाखण्ड है
तुम्हारी हरेक बात, हर शब्द एक छल है
उसने मेरे मुंह पर थूक दिया और वहीं
सूखे गोश्त की गठरी सी ढेर हो गयी
मैंने उसे फिर से आवाज दी- उठो, मेरी
प्राण, मुक्ति की लड़ाई देश देश में शुरू
हो चुकी है आओ हम भी शामिल हों
जीवन को बेहतर बनाने के लिए अगर
लड़ते हुए मारे भी गये हम
सम्मानित ही होंगे
इस बार आवाज लगाते लगाते मेरे
फेफड़ों में दर्द शुरू हो गया था
सोचा था- इस बार प्यार मुझे जरूर
मिलेगा
लेकिन मिले हत्यारे
उन्होने कहा- तुमको वैधानिक तरीकों
से फांसी दी जायेगी
काफ़ी पियो, घबराओ नहीं
मैंने कहा- अगर मैं अपराधी हूं
मुझे सिर्फ़ प्यार के सामने ही सफाई देनी है
अगर मैंने कभी विश्वास तोड़ा है
मुझे गोली मार दो
अगर मैंने कभी नफ़रत के सामने घुटने टेके हैं
मुझे गोली मार दो
अगर सचमुच प्रेम जुर्म है तब मेरे साथ
उसे भी गोली मार दो जिसने प्यार को
सम्भव कहा था
उसने मेरे सिवा और कोई दूसरी शर्त नहीं
रखी थी
मगर हत्यारे क्या सुनते हो हो कर हँस
पड़े- हमें उसी ने भेजा है
उन्होंने कहा- तुम्हारे ऊपर नाजायज
तरीके से माल हड़पने का आरोप है
जबकि कानून में व्यक्तिगत सम्पत्ति
को पवित्र माना गया है ।
आखिरकार, मुझे मेरे प्यार ने खुद-ब-खुद
सौंप दिया हत्यारों के हाथ में ।
27---3---1976
26 को विभाग में कविता पढ़ी । लड़के हल्के फुल्के ढंग की चीज सुनना चाहते थे । वह बिल्कुल गम्भीर नहीं होना चाहते थे । बोर हो गये । लेकिन मैंने जबरन सुनाया । एक लड़की, जो काफ़ी दिनों से मुझे अपनी ओर प्रेरित करना चाहती है, पढ़कर चलते वक्त, कह पड़ी,'बहुत बोर किया' । मैं हक्का बक्का था । सचमुच मुझ पर उसने बड़ी चोट की । इसका प्रभाव यह हुआ कि कुछ देर तक मैं उसकी ओर बगैर देखे पड़े रहने के बाद, कुछ गुस्से में और कुछ खुशी में देखने लगा । वह बाल वगैरह झटकने लगी, उत्तेजित और खुश । फिर मैंने withdraw कर लिया । वह खुश रही, फिर दुखी हो गयी । वह जरा छरहरी नहीं है । वर्ना ठीक है । लड़कियां बहुत अच्छी होती हैं । गी बहुत अच्छी है । रात में यादव ने बताया कि वह काफ़ी गम्भीर थी आज । मुझे सुनकर फिर उसके प्रति मोह जगा । यह ठीक नहीं । उसे खुश रहने का हक है । वैसे पता है कि नकली जिन्दगी जीने के लिए वह खुद को तैयार कर चुकी है । नकली जिन्दगी, झूठ, खुशी ये सब हमारी औरत की शोभा हैं । हमें चाहिए कि उनके बदलाव का उपाय करें लेकिन इसकी तकलीफ क्या वे झेल पायेंगी ? यह बिना व्यवस्था के बदले नहीं हो सकता ।
खुश रहो जहां भी रहो तुम जाने जिगर
कभी कभी हमें भी याद कर लिया करना
28---3---1976
आज खूब सोया । कुछ नहीं किया । अब लिखने बैठ रहा हूं ।
29---3---1976
को अंधेरा, रास्ते में बारिश ।
30---3--1976
को बारिश, फिर रोशनी ।
31---3---1976
दवा की तलाश में गोदौलिया ।
दवा नहीं मिली । संयोग से सु मिला । hello. वह मुस्कुराया । फिर चौराहे तक साथ साथ आये । चाय पीने की बात उसने अस्वीकार की । मैंने कहा- कभी मिलिए । उसने सिर थोड़ा झुकाकर सोच की मुद्रा अपनायी । फिर स्वीकार के लहजे में सिर हिलाया । मैंने गर्मजोशी से हाथ मिलाया । शाम को जैसे उसका इन्तजार करता रहा । वह निश्चित रूप से उसके द्वारा भेजा गया था लंका पर । फिर जब बुला रहा हूं तो क्यों नहीं आता ?
शायद उसने stand बदल दिया है !
मैं इन्तजार में जड़ हो जाता हूं । लिख पढ़ नहीं पाता । थीसिस का काम पड़ा है नहीं कर पाता । मैं यह सब क्या कर रहा हूं ? यह मूर्खता, यह मेरी प्रचण्ड और घातक मूर्खता । मुझे क्या करना चाहिए ? कुछ समझ नहीं पाता । अगर वह नकार रही है तो वह आयी ही क्यों उस दिन ? क्या यह देखने कि अभी तक मैं उसके पीछे जा सकता हूं या नहीं । अपनी ताकत आजमाने ? अगर यह बात है तो उसे खुश होना चाहिए क्योंकि मैं गया उसके पीछे । मैंने उसे follow किया । लेकिन अगर वह सचमुच contact बनाना चाहती है तो उसे क्यों नहीं भेजती । शायद उसने आने से इन्कार कर दिया हो । नहीं, वह आने से इन्कार नहीं करेगा । वही नहीं भेजती । तब इसके दो कारण हो सकते हैं । पहला, वह चाहती है कि मैं college जाकर उससे बातें करूं । दूसरा, यह कि वह इस किस्से का अन्त चाहती है । अगर अन्त चाहती है । तो कोई बात नहीं (टुन्ना से साभार) अगर नहीं चाहती तो मुझे जाना चाहिए या नहीं । मुझे जाना चाहिए । लेकिन मैं डर जाता हूं कि वहां जाकर अगर परिस्थितियां नार्मल नहीं मिलीं तो मैं बात न कर सकूंगा । इसीलिए तो मुझे सु की जरूरत महसूस होती रही है । अगर सु मुझे हेल्प नहीं करता तो क्या वह मेरी c में प्रतीक्षा करती रहे, मैं कभी जा न सकूं और सब कुछ खत्म हो जाए, सब कुछ खत्म हो जाए । अच्छा, यह सब कुछ खत्म हो जाए । मैंने अपनी तरफ़ से सारी बातें स्पष्ट कर दी हैं । उसे तमाम मौका है, सोचने समझने का । मैं इन्तजार करूंगा । खत्म हो जाने तक । अच्छा है ।
1---4---1976
हवाई प्यार की दुनिया में सब कुछ अनोखा है । आप जिसे चाहते हैं, उससे बात नहीं कर सकते । उसके लिए मर मिटना चाहते हैं, मगर उससे एक शब्द तक आप बोल नहीं सकते ।
उसकी इच्छा है कि college में मैं उससे मिलूं और बात करूं । यह नहीं हो सकता । मैं कायर, हृदयहीन , भग्नाकुल, जड़, स्तब्ध हो गया हूं । उसने मुझे कई बार माफ़ किया है । मैं उसके सामने छोटा, बहुत छोटा लग रहा हूं । वह साहस में, उदारता में,समझ में हर चीज में मुझसे आगे निकल गयी है । सु से आशा लगाना हम सबके लिए गलत है । यह कैसा प्यार कि एक तीसरा आदमी, भले ही वह बहुत करीबी हो, मदद करे, तब चले वर्ना ठप हो जाय । नहीं, हममें प्यार व्यार कुछ नहीं, एक हवाई आकर्षण है जो सिर्फ़ लहूलुहान करके जमीन पर औंधे मुंह गिरा देता है । तब लगता है कि जमीन सचमुच कितनी खुरदुरी और सख्त है । मैं उससे क्षमा मागूंगा, कभी सीधे बोल न पाने के लिए क्षमा । वह शायद क्षमा कर भी दे, मगर मैं खुद को कतई क्षमा नहीं कर सकता । मैं उसके साथ खिलवाड़ करता रहा हूं । नहीं, यह गलत है । मैं उसे चाहता रहा हूं । मगर शायद अब हम इतने दूर चले आये हैं कि पीछे लौटने के रास्ते बन्द हो चले हैं । April's fool No. 1 I am.
2---4---1976ऽ
आज फिर तनाव । नसों का दबते चले जाना, उसी पर केन्द्रित हो जाना, सोचना कि मैं गलत हूं, कमजोर, कायर, बुद्धू, डरपोक हूं । फिर पत्र लिखा । तनाव कुछ कम हुआ । लू शुन की कहानी 'साबुन' पढ़ता हूं ।
3---4---1976
दूसरी बार अस्सी पर मेरे दुश्मनों द्वारा हमले की पूरी योजना । लेकिन मेरे दुश्मन काफ़ी कमजोर हैं । दिमागी तौर पर वे काफ़ी कमजोर हैं । वे मजे से असफल कर दिये जाते हैं । मैं, महेश्वर, प्रधान, टुन्ना, शेखर दुकान में चाय पीते हैं । सु बाहर बुलाता है । मैं उसे अन्दर बुलाता हूं । फिर आता है । वह निहायत झूठी बातें सुनाता है । बेसिर पैर की बातें । मैं दृढ़तापूर्वक उसके झूठ को चुनौती देता हूं । वह निःशब्द हो जाता है । वे सबके सब झूठे, घृणित, लण्ठ और षड़यन्त्रकारी हैं । वह लड़की षड़यन्त्रकारी है । चाहे किसी ने भी उसके साथ जो कुछ भी कार्रवाई की हो, मैंने न तो उसे कभी अपमानित करने की चेष्टा की, न ही कुछ कहा, लेकिन उसने बार बार मेरी नीयत पर घृणित शक के साथ अपमानजनक रुख अख्तियार किया । वह सही मायनों में एक झूठी, गद्दार, हरामी, जलील औरत हो गयी है । षड़यन्त्रकारियों के साथ मिल गयी है । यह उसका अन्तिम और सही मूल्यांकन है । इसके सिवा उसे और मूल्य देना अपने आपको अपमानित करना है । मैं उसके समूचे व्यक्तित्व से अपनी ईमानदारी, सहजता और (मूर्खता की हद तक बढ़ी हुई) भावुकता में निश्चय ही आगे बढ़ गया हूं ।
8---4---1976
सोया, बार बार नींद टूटी । गलत सपने देखे । अवसन्न हो गया हूं । वह औरत मुझे भीतर से तोड़ती चली जा रही है । स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा है । थीसिस का काम जरा भी नहीं खिसका । मैं अवसन्न हो रहा हूं ।
10---4---1976
आतंक----प्यार----आतंक----अन्त । जीवन फिर शुरू हो जाता है । चीजें खत्म होती हैं फिर शुरू हो जाती हैं ।
11---4---1976
मेरा पूरा पतन हो गया है । यह मेरी आर्थिक परिस्थिति से अभिन्न रूप से जुड़ा है । मुझे पहले खाना जुटाने का काम करना चाहिए । यह सीख है । सारे अनुभव बताते हैं कि आदमी को दो जून पेट भरने का इन्तजाम करना चाहिए और बातें बाद में आती हैं । लेकिन मैं हवा में प्यार की सोचता रहा हूं । मैं हवा में तिरता सा रहा हूं । बिना देश और दुनिया की परिस्थितियों का विचार किए प्यार के बारे में बेहूदा कल्पनाएं करता रहा हूं । नतीजा कि मैं ही सब कुछ हूं । समाज के बिना एक व्यक्ति कुछ नहीं है । वह बोल नहीं सकता, वह मुस्कुरा नहीं सकता, वह सूंघ नहीं सकता, वह आदमी नहीं बन सकता । मुझे इसके लिए दण्डित किया जाना चाहिए कि एक घृणापूर्ण दम्भ के अलावा मेरे पास कुछ देने को नहीं रह गया है ।
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सामाजिक चेतना सामाजिक संघर्षों में से उपजती है । व्यक्तिगत समस्याओं से घिरे रहने पर सामाजिक चेतना या सामाजिक महत्व की कोई चीज उत्पादित करना मुमकिन नहीं । व्यक्तिगत समस्याएं जहां तक सामाजिक हैं, सामाजिक समस्याओं के साथ ही हल हो सकती हैं । अतः व्यक्तिगत रूप से उन्हें हल करने के भ्रम का पर्दाफाश किया जाना चाहिए ताकि व्यक्ति अपनी भूमिका स्पष्ट रूप से समझ सके और समाज का निर्णायक अंग बन सके ।
13---4---1976
कल रामजी भाई आये । विनोद जी का आपरेशन । महेश्वर से बातचीत फिर शुरू हुई । गिरीश आया (यों कहें कि टपका) पाण्डेय भी ।
आज फिर अजीब सी उदासी, जड़ता । चाय, सिगरेट, काम कुछ नहीं । थीसिस लिखो । इस बेहूदगी को करो ताकि बेहूदा लोग यह न समझें कि तुम बेहूदगी भी नहीं कर सकते थे ।
भारी मात्रा में साहित्यिक उत्पादन की जरूरत है । और कुछ न हो पा रहा है ।
षड़यन्त्रकारी मेरे पीछे पड़े हैं । मेरे खिलाफ़ बड़ी आसानी से षड़यन्त्र सफल हो सकते हैं । कारण कि मैंने अपनी कोई दीवार नहीं बनायी जहां से छुप कर बचाव और हमला कर सकूं । सचाइयों के सिवा मेरे पास कोई ताकत नहीं । तो क्या सिर्फ़ सच से अपनी हिफ़ाजत की जा सकती है ? हां, की जा सकती है अगर उसे समझ के साथ कारगर ढंग से उपयोग में लाया जाय । सच और मूर्खता में सम्बन्ध नहीं हो सकता । मूर्खतापूर्ण सच सामाजिक रूप से हानिकारक व्यंग्य हो जाता है । सच, साहस और समझ तीनों मिलकर ही एक दूसरे को मजबूत करते हैं और स्वयं पुरअसर होते हैं । सत्य नपुंसक होने पर झूठ से भी गन्दा लगता है । सत्य को बल दो, साहस करो ताकि झूठ को घुटने टेक देना पड़े । अगर सच के लिए लड़ना है तो तलवार की धार पर चलना सीखना पड़ेगा ।
डोल रहे हैं चांद सितारे
धरती डोल रही है
शासन डांवाडोल न होगा
रानी बोल रही है
बटीं रस्सियां जाल बुनाए
सागर पर फैलाए
लहरें और मछलियां सारी
होशियार हो जाएं
तूफ़ानों को रोक न पायी तो
विष घोल रही है
13---4---1976
आज शाम को Ass और dog लंका पर से गुजरते दिखे । Ass and dog. I felt almost heated with anger and shame. I feel myself one of the most wretched beings. But for what? For love. A hateful word, a word which signifies my degradation, insult, humiliation before a wretched woman of beautiful appearance. The woman who made me follow her second time and exposed me to the ghasty sounds and bloody theeth of hounds was point of my life. I felt as if I will not be able to continue if I do not get her company. I wanted to approach her very respectfully and she treated me as an insect so that the real insects of fraud forgery were transformed into respected men. The second time I got strangled in the conspiracy of that charming lady who played my love to kill me with the help of ass and dog. That lady of dogs and asses is so sweet that she can easily sell her on highest costs in the sweet and socially established markets of living skin.
I, a man of extraordinary foolishness and weekness for eye charm, have placed myself under such a humiliating position that I can not forgive myself on this time. I am unforgivable before me and before the exploited people of my country. I tried to break the barriers of claas on the basis of love. It only means that I tried to neglect the real questions being in the heart of the society.
I made a conspiratorial type of girl my judge. I gave her all powers to make last judgement upon me. And she judged. She judged me by the standards of her charming skin which she knew can not be undermined in the market. I took her as a human personality. And she was conspiracy of living skin in the market-place where all dogs and asses follow her with watery mouth and sparkling eyes. She saw that I neglected her most important aspect, her charming skin and on which she ever prided. And she threw me in the area of hounds and asses to be eaten. They have started eating. They came and see me and felt enjoyed that I have been so captivated by their supreme lady. The lady with sweet smiles and glazy eyes, the lady with murderous skills and conspiratorial plans, the lady whom I loved with whole existence, the lady who made the dogs capable of eating me. That grand lady of dogs and asses became my judge. A pure beast, a beast without any respect and attraction for human qualities like sincerity, simplicity etc. , a beast of lust and robust flesh, a beast eager of eating human flesh. That grand lady out of a beast or that pure beast out of a lady was made my judge with the help of my utter foolishness, and urge for a friendly company of a woman. I am defeated in a war with the hateful beasts like dogs and asses because I 'loved' (how ironical the word sounds in my ears!) a wretched beast of a woman playing love with me and conspiring to kill me. I am by chance saved, but I find no wayout of humiliation, torture and shame in which I have placed myself with the help of this conspiracy called love.
I loved a woman and I conspired against myself because I loved a conspirator woman. She is now instructing her dogs and asses who can fill my ears with the sounds of shame and degradation and who can bite me whenever they get chance.
14---4---1976
Last night slept a lot. Now feeling better. Miss Sinha has recovered her health. She was seen standing on the balcony by someone. It is good. I feel better because now there is no reason for feeling. Some persons feel always bad. They acquire a habit of such felings. Therefore, do not adjust themselves to different conditions. I am regaining my strength because I have released the violence perpetrated on me through different channels. And I must be ready to face it even it comes from any side. It does not matter. Enemy is enemy, whatsoever he (or she) may be. I must not care. I must be ready to retaliate properly. If I live under such conditions of life, I will be compelled to face violence. So, it does not matter where does it come from. The main thing is violence exercised on me from hateful beasts. I know, I can not be challenged in my sincerity. I mean that violence also must be opposed with sincerity.
Begin my pen,
Begin with the words of fire and pain
Begin my pen
Begin with loud laughter
The musical attack on the pickpocket's soverign
Begin my pen,
Begin with the pulses beating
And thoughts bursting out of brain
Begin my pen,
With the arms raised and eyes open
Begin my pen
Begin to change the world
And to create fighters
Out of crushed women
And men
Begin my pen.
21---6---1976
महीनों बाद डायरी के पन्ने पलटे हैं । दिल्ली की ओर । अपर इण्डिया ट्रेन में । शे*, रा* शे*, मिश्रा, नन्दू, रमेश आदि कई मित्रों के बीच स्टेशन पर बहुत मैत्रीपूर्ण माहौल । मैं महीनों बाद हल्का महसूस कर रहा हूं । मानो एक जड़ हो गयी परिस्थिति से मुक्त हो गया हूं । दिल्ली पहुंचकर काम की तलाश में जुट जाना है, नये सिरे से पूरी ताकत के साथ जीने और संघर्ष करने की कोशिश करनी है । वह अपनी तमाम बेहूदा हरकतों के साथ ट्रेन में याद आ रही है । साफ़ साफ़ पता चल गया है कि मेरे लगातार अवसन्न रहने का कारण क्या था ? इस अद्भुत कमजोरी पर विजय हासिल करना मेरे लिए निहायत जरूरी है । वर्ना मैं इसी तरह फिर टूट जाऊंगा ।
_______
सुबह अपर इण्डिया में । 22----6---76
रात में ठण्ढ और स्मृतियों की बाढ़ । जैसे चेतना गाढ़े दर्द की तरह बह रही हो । सुबह दर्द । उदासी । अपरिचित चेहरों के बीच । अलीगढ़ में चाय पी । 2*30 पैसे । दिल्ली में रोटियां सस्ती हो रही हैं और तुम लोग महंगा करते जा रहे हो ? चांदी वाले सेठ लेटे हैं । बगल के सेठ बच्चे जासूसी उपन्यास पढ़ते हैं । रात में जो औरत अपने पति के स्टेशन पर छूट जाने के डर से रो रही थी, पति और बच्चे के साथ खुश है । वह बिल्कुल निश्चिन्त और सुरक्षित है ।
24---6----1976
दिल्ली । गालिबो मीर की दिल्ली, ताज ओ तख्त की दिल्ली, हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली । परसों से यहां हूं । कोई काम नहीं । विभास के मैत्रीपूर्ण व्यवहार से आश्वस्त हूं । बीच बीच में बनारस की दुर्घटनाएं याद आती हैं ।
_________
यह लम्बी यात्रा है-
जंगलों, पहाड़ों, खाइयों और
सुरंगों से होकर
तुम आगे बढ़ते जाना
पीछे मत देखना
जहां तक जा चुके हो- उसके
पीछे थकने के बाद
खूबसूरत फूलों की घाटियां
दिखाई पड़ेंगी और तुम
पत्थर हो जाओगे ।
मां ने नन्हे बेटे को
हिदायत दी सिर पर प्यार से
हाथ रखते हुए ।
बन्द करो कहानियां
ओह ! मैंने कभी कल्पना भी
न की थी ।
रोशनी आंखों में चुभ रही है
बत्तियां बुझा दो ।
हालत यहां तक पहुंच चुकी है
तुम रोशनी से डरने लगे हो
दूब की हरी पत्ती तुम्हे भद्दा मजाक
लगती है
कहां तो हम एक साथ हो रहे थे
हमने सिपाहियों की एक
टुकड़ी बना ली थी
उत्साह में ऊभ चूभ होते हुए
आवाज बुलन्द की थी-
अब आदमी का शोषण
आदमी नहीं करेगा ।
हालत यहां तक पहुंच चुकी है
कि तुम्हे कुछ शब्दों से चिढ़
हो रही है- जैसे शोषण,
गोया बार बार दोहराने से
इनका अर्थ खतम हो चुका हो
तुमने हथियार रख दिया है
सोचते हो कि तुम्हारा हारा हुआ
युद्ध अगली पीढ़ियां लड़ेंगी ।
हालत यहां तक पहुंच चुकी है-
भेड़ियों का हमला और तेज हो चुका है
गांव गांव से बच्चों को
रातो रात उठा लिया जाता है
खून के साथ वे दिल और दिमाग
भी चाट रहे हैं ।
जंगल- व्यवस्था के भीतर
आदमी की तरह बोलने
चलने और हाथ उठाने पर
पाबन्दी लगा दी गयी है
अब आगे से रेंग कर चलना होगा
लूट की जुबान
शहद घोलकर बोलनी होगी
इजाजत है तो सिर्फ़ यह कि
हाथों से अपने साथियों का
गला घोंट दो ।
वह नन्हा सा लड़का जंगलों
पहाड़ों, घाटियों, सुरंगों से
होकर आगे बढ़ता है ।
उसके हाथ में एक तलवार है
और निगाहों में बदले की आग ।
उसने ठोकरें खायीं
रोटियों के बजाय
उसने देखी है-
फ़रेब पर लिपटी हुई खूबसूरत
रंगों की चमक
वह तुम्हे भी आवाज देता है-
आओ,
एक एक कर साथियो,
मेरे पास आओ,
अभी हमें बहुत दूर जाना है
सफ़र लम्बा है
मगर आदमी के लिए
मुश्किल नहीं है
मेरे साथ आओ,
साथियो,
एक एक इन्च जमीन के लिए
हमें हजारों साल लड़ना पड़ा है
सम्मान की एक रोटी
हमारे लिए
मौत के बाद का स्वप्न बनी
रही है
हमारे सिरों पर
आकाश के सिवा
दूसरी छत तलवार की होती है
आओ, मेरे साथ आओ
साथियों,
मैं पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती हुई
भूख और अपमान
का भविष्य हूं
तुमको कहानी बुरी लगती है
और तुम्हे उसका पात्र होना
स्वीकार नहीं ।
लेकिन तुम कहां खड़े हो ?
तुम्हारे पास इसका जवाब है ?
एक अर्से से मैं बोलता रहा हूं
खून और आग को
निचोड़ कर मैंने शब्दों में रख दिया
सोचता था-
मैं कहूंगा- 'क्रान्ति'
और तूफ़ान आ जायेगा
महल ढहने लगेंगे
तमाम जन्जीरें चरमरा कर
टूट जायेंगी
और हम मुक्त होकर खुशी से
नाच उठेंगे ।
एक मात्र मन्जिल थी-
आजादी
सोते और जागते हुए
मेरे होठो पर थरथराता था
एक शब्द- आजादी
मगर क्या हुआ ?
धीरे धीरे हम टूटते चले गये
हमने एक दूसरे पर अविश्वास
करना सीख लिया
अब वे शब्द हमारी छातियों
पर पत्थरों की तरह
पड़े हुए हैं ।
क्या हुआ ?
कितने लोगों ने सोचने
की दिशा बदल दी
कइयों ने पीछे लौटना ही
वाजिब समझा
और एक हमसफ़र
ने कान में
फुसफुसा कर कहा था-
हम लोग गलत थे
फिर से सोचना ।
उस लड़के का क्या हुआ ?
वह अब भी बढ़ता है जंगलों
पहाड़ों, खाइयों से होकर,
एक हाथ में तलवार
और निगाहों में बदले की आग
उसको शुरू में यह भी पता न था
दुश्मन कौन है ? कहां है ?
उसकी जमीन, उसका सुख
उसकी मेहनत, उसका फल
कौन लूट रहा है
उसके स्वप्न कहां गिरवी रखे
गये हैं
कहां कैद हैं उसकी उम्मीदें ।
कल तक उसे यह भी पता न
था । उसने एक राक्षस का
नाम सुना था और बढ़ता
रहा था आगे और आगे
अब हालात बदल चुके हैं-
वह जानता है-
राक्षस का एक सही नाम
जमींदार है, दूसरा नाम है
दलाल पूंजीपति तीसरा
नाम साम्राज्यवादी
और वे समाजवाद या
जनतन्त्र की आड़ में
हमला कर रहे हैं ।
वह दुश्मन को पहचानता
है जो सफलता की ओर
पहला बड़ा कदम है ।
तुम शब्दों के जादू से
बंधे रहे
'क्रान्ति' एक लम्बी लड़ाई
जो तुम्हारे लिए
जादू थी
तुमने ठोकरें खायी नहीं
भरभरा कर गिर पड़े थे ।
तुम्हे जमीन सख्त लगने
लगी । दुश्मन की
परछाइयां तुम्हारे सपने
भी रौंदने लगीं
अब तुम सोचते हो-
आने वाली पीढ़ियां
लड़ेंगी-
आने वाली पीढ़ियां
जरूर लड़ेंगी
लेकिन मौजूदा लड़ाई को
टाला नहीं जा सकता ।
जंगलों में या अंधेरी
कोठरियों में, सीलन भरे
तहखानों में तुम्हारी पहले से
ज्यादा जरूरत है
एक भी पैर जख्मी होता
है तुम्हारी अंगुलियां
जरूरी हो जाती हैं
शब्द जादू नहीं हैं
मगर अभियान के
लिए सैनिक गीत
मांगते हैं
सोचने का साहस करो
साहस के साथ लड़ो
अभी तो लड़ाई शुरू हुई है
अगली पीढ़ियां लड़ेंगी
मगर उन्हे कौन माफ़ करेगा
जिन्होने दुश्मन के सामने
घुटने टेक दिये ?
वह नन्हा मुन्ना आगे
बढ़ता है हाथ में तलवार
और निगाहों में बदले की
आग
सुनो, वह तुम्हे भी
पुकार रहा है ।
________
भारी बूट, चमकते कपड़े,
सिर पर टोप लगाये
सरकस के हाथी पर बैठे
जब दो बौने आये
मची खलबली दर्शकगण में-
यह भी खूब तमाशा
हाथी नाच रहा है कत्थक
बौने बजा रहे हैं तासा-
ढिम ढिम ढिम ढिम
तड़ तड़ ढिम ढिम
सुनो भाइयो,
बहनो, सुन लो
अद्भुत है यह हाथी
हाथी ने आंखें मटकायीं
ये हैं मेरे साथी ।
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एक सूत्र और
बाबू भोलाराय ने जमाने के रंग ढंग खूब देखे हैं । उनको पता रहता है कि दुनिया अब किधर जा रही है । उनको यह भी पता रहता है कि क्या करने से बेड़ा पार होगा और क्या करने से गर्क हो जायेगा ।
उनका दावा है कि उनके बाल धूप में नहीं सफ़ेद हुए हैं ।
इस बीच उनके सामने एक कठिनाई आई । वह आई और उनके सामने बैठ गई । उन्होने ठोकर लगाई । फिर भी टस से मस न हुई ।
कठिनाई भी अजब चीज है । भोलाबाबू जैसे लोग भी कभी कभी परेशान हो जाते हैं । 'अरे भाई, अब तो भागो जरा मेरे बालों की सफ़ेदी का तो खयाल करो ।' लेकिन कठिनाई जाती नहीं थी ।
दिमाग भिड़ाओ तो हर कठिनाई रफ़ा हो जाती है । भोलाबाबू ने दिमाग भिड़ाना शुरू किया ।
लेकिन इसके पहले कि कठिनाई कैसे दूर की जाय यह जानना जरूरी है कि वह है क्या ?
भोलाबाबू ने देखा कि यह कठिनाई अजब है । एक तो यह देश के पैमाने पर है । दूसरे सूतों से बुनी हुई है ।
20 सूत्र, फिर पांच सूत्र फिर जोड़ा गया तो 24 सूत्र निकले । यह नहीं कि हिसाब में कोई गलती हुई थी । नहीं, सारा सांख्यिकी विभाग यही गिनने में लगा हुआ था । और यह विभाग बड़ी से बड़ी संख्याएं गिनने का आदी हो चुका है । भले उनका रिश्ता कागज से अलग की किसी चीज से न हो ।
तो उसमें एक सूत गरीबी को घटा देने और धीरे धीरे दूर कर देने का है । गरीबी कम होगी, फिर और कम होगी और भाग जायेगी । एक जमाना था कि भोलाबाबू गरीबी को मानते ही नहीं थे । वह बताते थे कि यह तो मन की मैल है । मन साफ रखो, गरीबी साफ है । वह सफाईपसन्द आदमी हैं । इसलिए गरीबी को सफ करने की बात करते थे उसे भगाने की नहीं । वह कहते थे- एक करोड़पति को देखो । वह करोड़पति है । लेकिन वह और पैसा इकट्ठा करना चाहता है । वह अपने को गरीब समझता है । उसके मन में मैल है । वह गरीब है । मन को साफ करो । गरीबी साफ हो जायेगी । मन चंगा तो कठौती में गंगा । भोलाबाबू जोश में आ जाते और उनको जो उनसे तर्क कर रहे होते ऐसी निगाह से देखते मानो भिनभिनाती हुई मक्खियां हों ।
खैर, एक उनकी पार्टी का हुक्म निकला कि गरीबी को भगाना है । यह एक मजबूत सूत है ।
भोलाबाबू को अपना बयान बदलने में देर नहीं लगी । उन्होने कहा- भाई गरीबी तो है ही । कितने लोग भूखों मर रहे हैं । कितनों को रोजी नहीं । कितने गरीबी की रेखा के नीचे हैं । गरीबी को कौन नहीं मानता ? मैं तो पहले से ही कह रहा हूं कि वह है । पहले कहता थाकि वह मन में है । लेकिन अब वह बाहर भी है । अगर कोई चीज बाहर नहीं होगी तो मन में आयेगी कहां से ? मन तो एक आईना है । जैसी चीज सामने आयेगी वैसा ही अक्स आईने में उभरेगा ।
तो गरीबी है । सूत के अनुसार उसे भगाना भी है । हालांकि भोलाबाबू जैसे गांधीवादी के लिए भगाना श्ब्द शोभा नहीं देता । उन्होने कहा कि भगाने में डण्डा लेना पड़ता है । वह चीज नहीं भागती तो डण्डा उठाना पड़ता है । फिर उसके पीछे दौड़ना पड़ता है । गांधी जी होते तो कहते हम गरीबी में सुखी हैं । उसको भगाने से हिंसा होगी । हिंसा भारी अपराध है । गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ कभी हिंसा का नारा नहीं दिया था । क्यों ? इसलिए कि इससे वे भागेंगे और हम लोगों को हिंसक कहेंगे । वे भागें नहीं हमें हिंसक नहीं कहें इसीलिए तो गांधी जी हमें बन्दूक के सामने लेट जाने की सलाह देते थे । हमारी छतियां छलनी हो जाएं । हमारे ऊपर घोड़े सरपट दौड़ते चले जाएं । गांधी जी कहते थे हमें चूं भी नहीं करना चाहिए । बड़ा पाप होगा । गांधी जी कहते थे पापी होने से गुलाम होना अच्छा है । आखिर हम भगवान के गुलाम ही तो हैं ।
भोलाबाबू जोश में आते तो चौराहे पर पान चबाते हुए बोलते ही चले जाते । वह अक्सर कहते कि गांधी जी होते तो ऐसा नहीं होता वैसा नहीं होता । वह जुलूस देखते और कह पड़ते गांधी जी होते तो आजाद देश में जुलूस कौन निकाल पाता ?
लेकिन भोलाबाबू के सामने कठिनाई क्या थी ? क्या गरीबों को भगाना था ? इसके लिए तो वह पुलिस और फ़ौज को काफ़ी मानते थे । गरीब लोग दंगा फ़साद पर उतर आते हैं । मजदूर मिल में काम बन्द कर देते हैं । किसान भी उनके सुर में सुर मिलाते रहते हैं । सबके लिए सरकार उपाय कर रही है । हमारे चौराहे के पास पुलिस की नयी चौकी खुली है । डण्डा पड़ेगा तो गरीबी वैसे ही भाग जायेगी ।
उन्होने कहा कि नसें बन्द कराना बेहद जरूरी है । गरीब लोग इस मामले में सबसे गड़बड़ी पैदा करते हैं । अरे भाई, रोटी से खाने के लिए नमक नहीं और बच्चे पैदा किये जा रहे हो ? तो नसें बन्द कराओ । यह भी एक सूत है और देश भर में फैला हुआ है । बच्चे, बूढ़े, जवान- सभी का पवित्र कर्तव्य है कि नसबन्दी कराएं और देश की सेवा करें ।
तो, भोलाबाबू की कठिनाई कोई ऐसी वैसी चीज न थी । वह भारी थी । उनके नाक के नीचे बैठी थी और टस से मस न होती थी ।
भोलाबाबू ने कई बार कोशिश की थी उनका शानदार बंगला हो, मोटरकार हो और दरवाजे पर बजाने के किए एक घण्टी लगी हो । उन्होने सपना देखा था कि एक दिन घण्टी बजी थी और उन्होने नौकर से कहलवा भेजा था कह दो वह जनता के काम से बाहर गये हैं । वह नींद में खलल पसन्द न करते थे ।
तमाम कोशिशों के बावजूद भोलाबाबू एक दवाखाने में मुंशी का काम करते रह गये थे । वह रोज हजारों का हिसाब करते मगर उनकी मासिक तनख्वाह 150 से 200 पर जाकर रुक गयी थी । यह जरूर था कि तीज त्यौहार पर वह मालिक के घर निमन्त्रित होते रहते थे । कभी कभी उनकी सब्जी भी खरीदने जाते और उनका पान का ब्यौरा बन जाता ।
जब बीस सूत बने उसके बाद बाद 4 सूत और बने तो उनका दिमाग ठनका । सूतों ने एक कमाल का काम किया था । वे देश भर में फैले हुए थे और गरीबी जैसी कई चीजें भागती चली जा रही थीं । लोग जेलों में बन्द किये गये थे और कोई चूं तक नहीं कसता था । डण्डे पड़ते थे और जुलूस गायब थे । उन्होने सोचा था कि ये सूत तो जादुओं में जादू हैं । एक सूत्र लागू होता है और समस्या काफ़ूर हो जाती है ।
कठिनाई यह थी कि ये सूत्र कैसे गढ़े जाते हैं ? गढ़े तो जाते ही होंगे । गांधी जी होते तो ऐसे सूत गढ़ने के चर्खे भी बनाते । एक चर्खा मेरे पास भी होता । और दुनिया का रंग कुछ और होता ।

लोकप्रिय संस्कृति और जन संस्कृति

लिबरेशन के विशेषांक (अप्रैल, 1996) में प्रकाशित 'भारतीय सिनेमा में औरतें' नामक लेख में अमरेश मिश्र ने हंटरवाली और रंगीला जैसी फ़िल्मों को क्रांतिकारी रंग में पेश किया है, जिससे पाठकों में भ्रम ही फैलेगा । लगता है कि अमरेश मिश्र लोकप्रिय संस्कृति और जन संस्कृति को एक ही समझते हैं । यह चिंतन का एक गलत तरीका है ।

लोक संस्कृति तो निश्चय ही लोकप्रिय संस्कृति से अलग है । लोक संस्कृति में जन जीवन के सुख-दुख और अंतर्विरोध सामुहिक लेकिन स्वतःस्फूर्त रूपों में प्रकट होते हैं। जन संस्कृति के निर्माता इसका कच्चे माल के बतौर उपयोग करते है, लेकिन कच्चे माल के बतौर ही, कयोंकि इसमें जनता की आकांक्षायें भ्रूण रूप में मौजूद होती है; यह आकांक्षायें शासकवर्गीय विचारधारा, जनता के पिछड़े चिन्तन और परम्पराओं से प्रभावित रहती है। इसलिए जन संस्कृति का निर्माण लोकसंस्कृति का अतिक्रमण करके ही किया जा सकता है।

दूसरी तरफ, लोकप्रिय संस्कृति की रचनायें लोकसंस्कृति की तरह सामुहिक उत्पाद नहीं होती। उनका उत्पादन व्यक्तिगत रूप से होता है। चूँकि उनका उत्पादन जनता के चिन्तन के स्तर को उठाये बिना उन्हें आकर्षित करने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है इसलिए उनमें न सिर्फ़ तत्कालीन प्रभावी चिन्तन पद्धति के मजबूत प्रभाव होते है बल्कि वे इसे बल भी प्रदान करती है। हिन्दी जासूसी उपन्यासों, टी वी धारावाहिकों और लोकप्रिय फिल्मों के अध्ययन भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। इनमें शासक वर्गीय राष्ट्रवाद, मर्दाना शूरवीरता के सामंती मिथकों को परोसा जाता है; अक्सर ये राज्यतंत्र का समर्थन करते हैं और अगर कभी विरोध करते भी हैं तो फासिस्ट दृश्टिकोण से।

संस्कृति के लोकप्रिय और क्लासिकेल रूप के बीच विरोध पर विचार करते हुए एक बात पर ध्यान देना जरूरी है। जहाँ लोकप्रिय संस्कृति प्रत्यक्ष यथार्थ को प्रतिबिम्बित करती है और मजबूत भी बनाती वही क्लासिकेल संस्कृति में इसके विरोध का एक तत्व शामिल रहता है। इसीलिए क्लासिकेल संस्कृति में कई बार जनता का विक्षोभ भी दिखाई पड़ जाता है। इस मामले में क्लासिकेल संस्कृति और जन संस्कृति में एक समानता है कि दोनों यथास्थिति में परिवर्तन की आकांक्षा से पैदा होती है हालांकि उनकी दिशा अलग अलग भी हो सकती है। इसलिए जन संस्कृति के निर्माताओं को एक तरफ क्लासिकेल संस्कृति से और दूसरी तरफ लोक संस्कृति से सीखना चाहिए।

इसकी बजाय अमरेश लोकप्रिय संस्कृति को गौरवान्वित करते हैं। इससे एक गम्भीर समस्या पैदा हो जाती है। उदाहरण के लिए, इसी लेख में उनका कहना है कि नायिका उदारहिन्दू परम्परा से केवल इसीलिए मुक्त है क्योंकि वह पारसी परिवार में पैदा हूई है। इस वक्तव्य का मतलब है कि भारत में हर एक आदमी हिन्दू या मुस्लिम परम्परा, पारसी या ईसाई परम्परा से ग्रस्त है और वही उनकी चेतना को निर्धारित करती है। और फिर, चूँकि हिन्दू बहुसंख्यक है इसलिए परम्परा का उनका बोध सबसे गहरा है। सम्पूर्ण साहित्यिक और सांस्कृतिक सृजन इन परम्पराओं से प्रभावित रहा है। इसलिए, जहाँ समूचे पश्चिम में अधार्मिक, आधुनिक, वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण रहा है वहीं भारत में प्रभावी उदार हिन्दू मानस की मुख्य विशेषता पारलौकिकता रही है जिसकी प्रमुख अभिव्यक्ति उस नैतिक दृष्टिकोण में होती है जो वह औरतों के बारे में अपनाता है। दूसरी तरफ़, समूचे पश्चिम में मुक्त व्यक्तियों के समाज की मुख्य विशेषता इहलौकिकता रही है और इसकी प्रमुख अभिव्यक्ति उस ऐंद्रिक दृष्टिकोण में होती है जो वह औरतों के बारे में अपनाता है। यह सच नहीं भी हो सकता है लेकिन वे इसे इसी तरह पेश करते हैं।

नारी मुक्ति के उनके एजेंडे का चरम लक्ष्य औरत के शरीर, और सटीक ढंग से कहे तो, उसकी ऐंद्रिक भूमिका को स्थापित करना है। यह आश्चर्यजनक नहीं कि यह सब सिर्फ़ 'फुटपाथ' साहित्य और ब्लू फिल्मों में दिखाई पड़ सकता है। इसी उद्देश्य से वे पश्चिम को एक नमूने की तरह प्रस्तुत करते हैं। इसके स्रोतों को वे कभी पारसी पारिवारिक पृष्ठभूमि में खोजते हैं और कभी समूची इण्डो-पर्शियन परम्परा को उर्दू काव्य की एक विशेष शाखा तक सीमित कर देते हैं। यह सब मार्क्सवादी विश्लेषण तो कतई नहीं है।

Wednesday, April 6, 2011

मुक्तिबोध की कविता 'भूल गलती' की एक व्याख्या

गजानन माधव मुक्तिबोध की इस कविता का अर्थ समझने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है । इस कविता में फ़ारसी बहुल शब्दावली का मुक्तिबोध ने उपयोग किया है । इससे यह भ्रम उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है कि वे शायद मुगलिया दरबार की किसी घटना के बारे में कविता लिख रहे हैं । लेकिन इसके जरिए वे केवल मध्ययुगीनता का वातावरण तैयार करना चाहते हैं जिसमें शासक की क्रूरता बुद्धि, विवेक और ज्ञान सबके ऊपर शासन करती है । सुलतान के दरबार का समूचा वर्णन वस्तुतःअप्रस्तुत है, प्रतीकवत आया है और असली कथा गलती और ईमान के बीच विरोध के इर्द गिर्द चक्कर काटती है । पुनः प्रस्तुत की भाषा भी ऐसी है कि उससे कविता की मनोवैज्ञानिक व्याख्या की इच्छा पैदा हो सकती है । हमारे जीवन की जो भूलें हैं, वे ही स्वार्थ के हथियारों से सुसज्जित होकर समूचे व्यक्तित्व पर काबिज हो जाती हैं तथा सच्चाई और ईमान को खत्म करना इसके लिए जरूरी हो जाता है । मनोविज्ञान एक तरह से कालातीत विज्ञान होने का दावा करता है और इसके आधार पर की गयी व्याख्या से कविता की समय सम्बद्धता खत्म हो जाने का खतरा पैदा हो जाता है । इस कविता को पूरी तरह से समझने के लिए मुक्तिबोध और उनके समय को थोड़ा और गहराई से जानना होगा ।

मुक्तिबोध कम्युनिस्ट आन्दोलन से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे । 1946 में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में आन्ध्र प्रदेश के तेलंगाना इलाके में हैदराबाद के निजाम के विरुद्ध किसानों का सशस्त्र संघर्ष चला जिसमें दो सौ गाँवों को मुक्त करा लिया गया था और इन मुक्त गाँवों में किसानों की अपनी सरकार स्थापित हो गयी थी । किन्तु 1947 में भारत के स्वतन्त्र होने पर जो कांग्रेसी सरकार आई उसने किसानों के इस आन्दोलन को बर्बरतापूर्वक कुचलने का निश्चय किया । जनरल करियप्पा की फ़ौजें गाँव दर गाँव किसानों को रक्त में डुबोती रहीं और साथ ही साथ इसका प्रचार भी चलता रहा कि देश में जनतन्त्र का शासन स्थापित हो रहा है । तमाम मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी इसी भ्रम के शिकार रहे और अन्ततः 1952 में इस आन्दोलन को कुचल दिया गया । शासन की क्रूरता और बुद्धिजीवियों का स्वार्थमूलक व्यामोह ही इस कविता की तमाम भ्रामक शब्दावली के भीतर का सत्य है । चूँकि कविता उपरोक्त तीनों ही स्तरों पर एक साथ संचरित होती है, इसीलिये विशेषकर जटिल हो जाती है ।

भूल गलती--------------------------------------------------------------------------खामोश !!

कवि कहता है कि हमारे व्यक्तिगत अथवा सामाजिक जीवन की जो भूलें और गलतियाँ हैं, वही आज लोहे के कवच से अपने आपको सुरक्षित बनाकर दिल के तख्त पर बैठ गयी हैं और शासन चला रही हैं । आज का जो शासन है उसमें शासक न सिर्फ़ खुद लौह कवच धारण किये हुए है बल्कि लोगों पर आतंक जमाने के लिए उसने भाँति भाँति के हथियार भी एकत्र कर लिये हैं । उसके हथियारों की चमक दूर दूर तक दिखाई देती है और उसकी आँखों से भी ऐसी रोशनी निकल रही है जैसे किसी नोकदार तेज पत्थर की नोक पर चिलक रही हो । उसके आतंक के समक्ष सबने समर्पण कर दिया है । सामने लोग कतारबद्ध सलाम की मुद्रा में झुके हुए हैं और उनका गूँगापन उनकी बेबसी है । यह समूचा दृश्य एक ऐसे दरबार में घटित हो रहा है, जो अत्यन्त भव्य है, उसमें अनगिनत खम्भे हैं और उन खम्भों के बीच अनगिनत मेहराबें पड़ी हुई हैं । (दरबारे आम वह जगह थी जहाँ बादशाह जनता के समक्ष अपने निर्णय सुनाता था) । शासक को जिस अपराधी के बारे में फ़ैसला सुनाना है, वह स्वयं ईमान है । तात्पर्य यह कि गलती के शासन के लिए ईमान को कैद करना जरूरी हो जाता है । कैद करके हथकड़ी पहनाकर ईमान को शसक के सामने खड़ा किया गया है । कैदी का चेहरा घावों की आड़ी तिरछी लकीरों से कटा पिटा है और ये घाव उसकी बेचैनी के हैं । इन घावों के कारण उसका चेहरा इतना भयानक हो गया है कि जिस पर नजर डालने से दिल काँप उठता है और हाय निकल आती है । ऐसा नहीं कि घावों अथवा कैद होने के कारण उसका कद छोटा हो गया हो । हालाँकि उसके जिस्म पर कपड़ों की जगह गरीबी और परेशानी के चिन्ह लत्ते मात्र लटक रहे हैं और खून के लम्बे लाल दाग भी उन लत्तों पर दिखाई दे रहे हैं । फिर भी उसका स्वाभिमान सुरक्षित है । जहाँ अन्य सभी लोग निगाह झुकाए हुए हैं वहीं वह सिर ऊँचा कर सीधे शासक की आँखों में आँखें डाले हुए है, वह निडर है और उसकी भी आँखों से अग्नि स्फुलिंग के समान नीली बिजली के टुकड़े निकल रहे हैं । चतुर्दिक खामोशी पसरी हुई है लेकिन शासक के आतंक और कैदी की निडरता के बीच आँखों ही आँखों में संवाद जारी है ।

सब खामोश------------------------------------------------------------------शाही मुकाम में !!

कवि कहता है कि गलती ने ईमान को कैद कर लिया है इस अन्याय को देखकर भी सभी दरबारी जुबान बन्द किए हुए हैं । तमाम मनसबदार अर्थात पदवीधर, तमाम कवि और सूफ़ी अर्थात सन्त, तमाम दार्शनिक (अल गजाली तसव्वुफ़ का दार्शनिक है), तमाम ज्योतिषी (इब्ने सिन्ना एक ज्योतिषी था), तमाम इतिहासकार (अलबरूनी प्रसिद्ध इतिहासकार था), सभी ज्ञानी (आलिम-फाजिल इस्लामी शिक्षा की डिग्रियाँ हैं जो क्रमशः बी ए और एम ए के समतुल्य हैं), सभी सेनापति और सरदार अर्थात सभी शिक्षित, सुसंस्कृत और नेतृत्वकारी लोग चुप हैं । दूसरी तरफ़ ईमान से कहा गया है कि यदि वह कुछ शर्तें मान ले तो उसे जिन्दगी बख्श दी जायेगी लेकिन जिस शर्त को मानने में उसे शर्मिन्दगी महसूस हो ऐसी शर्त मानकर उसे जिन्दगी नहीं चाहिए । वह समर्पण करके शर्मनाक जीवन नहीं बिताना चाहता । वह हठपूर्वक इन्कार कर सिर ताने हुए खड़ा है । वह तो अपनी ही शर्तों पर जीवन बिताएगा, अपना निर्णायक वह स्वयं है । इस समूचे दृश्य को देखकर कोई सोच ही सकता है कि इस बादशाहत के दिन अब गिने चुने हैं, इस पर मौत के काले बादल छाए चले जा रहे हैं, जो रक्षा कवच लोहे का बना हुआ दीख रहा है वह दरअसल मिट्टी का है, और जो बादशाहत है उसमें भी पुरानी अकड़ नहीं है अब तो वह रेत की तरह भुरभुरा हो हो गया है, तथा पहले की जो बादशाही धाक थी उसमें अब कोई दम नहीं रहा अब वह सन्नाटे की तरह खोखली हो गयी है । लेकिन इस सोच के खिलाफ़ सावधान करते हुए कवि कहता है कि साँप कितना भी मरियल दिखे उसके काटे से जहर चढ़ेगा ही चढ़ेगा, और चूँकि लोग यह बात जानते हैं इसीलिए उससे आतंकित भी हैं । यहाँ कवि संकेत से सामन्ती व्यवस्था के बारे में बता रहा है । सन 1952 के जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के बाद ऐसा लगने लगा था कि पुराने जमींदारों का फन कुचल दिया गया है, उनके विषदन्त उखाड़ लिये गये हैं लेकिन इसी असावधानी का विरोध करते हुए कवि कहता है कि नहीं अब भी उसमें पर्याप्त मारक क्षमता बची हुई है । यह भूल रूपी बादशाह अब भी ताकतवर हैं तो इसका कारण यह है कि ये हमारी आपकी कमजोरियों से अपनी ताकत प्राप्त करते हैं । गलती का शासन इसीलिए स्थायित्व प्राप्त कर लेता है कि हम सब अपनी कमजोरियों के चलते उसका विरोध नहीं करते । शासक का जो काले लोहे का रक्षा कवच है वह हमारी आपकी कमजोरियों से ही निर्मित है । उसे पहनकर वह और खूँखार हो गया है । उस शासक की, जिसे आलीजाह कहा जाता है, असलियत यही है कि वह क्रूरता से भरा हुआ है । ईमान को तो उसने कैद किया हुआ ही है, सच की भी आँख निकाल डालता है । सच्चाई और ईमानदारी का दमन करके ही गलती अपना शासन चला सकती है । जितनी भी कोमल भावनाएँ हैं (दिल की बस्तियाँ) उन सबको वह खत्म कर देता है तभी क्रूरता को वैधता प्राप्त होती है । इस तरह चारों तरफ़ से वह हमें, हमारी चेतना को घेर लेता है, हमारे पाँवों के नीचे कोई ठोस आधार नहीं रह जाता, हम बे-सिर-पैर के होजाते हैं, न सोच पाते हैं न चल पाते हैं । उसका जो सरकारी ताम झाम है, पद-प्रतिष्ठा के जो तमाम अवसर हैं, उन्हीं की लालच में उसके गुलाम होकर रह जाते हैं । बुद्धिजीवियों की बुद्धि को खरीदकर वह उन्हें अपना नौकर बना लेता है और वे उसकी क्रूरता के विरुद्ध कुछ नहीं बोल पाते ।

इतने में------------------------------------------------------------------विकट हो जाएगा !!

कवि कहता है कि शासक, जो स्वयं गलती है, ने विद्रोही, जो स्वयं ईमान है, को कैद कर लिया है फिर भी जनता चुप है, दरबारी खामोश हैं और बुद्धिजीवी, जिनमें कवि भी शामिल है, आधारहीन हो गये हैं । न सिर्फ़ वे विरोध नहीं कर सकते, बल्कि कराह भी नहीं सकते । लेकिन तभी जैसे किसी से गुस्ताखी हो गयी हो, जैसे कराह निकल गयी हो उसी तरह एक व्यक्ति इस समूचे मोहपाश को और आतंक को तोड़कर मुक्त हो गया । मुक्तिबोध मार्क्सवादी थे और मार्क्सवाद के अनुसार पूँजीवादी शासन के साथ मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी भी स्वार्थवश हो जाता है परन्तु उन्हीं बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वार्थ के तर्क को तोड़कर मजदूरों के पक्ष में खड़ा हो जाता है और अन्याय के विरुद्ध मजदूरों को संगठित करने लगता है । उक्त बिम्ब के जरिए मुक्तिबोध इसी विचार की पुष्टि कर रहे हैं । कवि कहता है कि उस व्यक्ति के भागते ही मेरी मोहनिद्रा भी टूट गयी और मैं लोगों से भरे हुए दरबार में संभलकर जाग गया । उस व्यक्ति के भागते ही तमाम दरबारी सहम गये । जो लोग कतारों में खड़े थे उनका शासक के साथ जो समझौता था उसके रक्षक हथियार स्वयं उनके स्वार्थ ही थे । शासक यह समझौता टूटने के आतंक से भर उठा । जो तमाम दढ़ियल सेनापति थे, उनके समूचे जीवन का अनुभव दोमुंहेपन का अनुभव था । उनके दिल में कोई और बात रहती थी जुबान पर कोई और तथा इस दोमुंहेपन की सच्चाई को छुपाने के लिए वे चेहरे पर गंभीरता धारण किए रहते थे । उस व्यक्ति के भागने से वे भी सहम गये । लेकिन जिस व्यक्ति ने इस मोह और आतंक के विरुद्ध विद्रोह किया था वह समूची किलेबन्दी को तोड़कर बाहर जा निकला और छापामार युद्ध चलाने के लिए अँधेरी घाटियों, गोल टीलों और घने पेड़ों के इलाके में जाकर छिप गया । लेकिन वह सक्रिय है, कवि को यह अहसास होता है कि वह गुमनाम और अगम्य दर्रों के इलाके में युद्ध के लिए तैयारियाँ जारी रखे हुए है । यह दर्रों का इलाका और कुछ नहीं सच्चाई का इलाका है जिसे गलती ने देश निकाला दे दिया था । इस इलाके में सच्चाई की रोशनी की तेज किरणों की सुबह फैली हुई है । जहाँ शासक पर काले बादल छाए हुए हैं, वहीं सच्चाई के इलाके में सुबह हो रही है । कवि कहता है कि आज सच्चाई और ईमान की जो पराजय हुई है, उसका बदला कल वही विद्रोही लेगा जिसकी चेतना में सच्चाई का संकल्प है और जिसकी आवाज रक्त से लथपथ है । कवि को यह आशा है कि इस शासन के समाप्त हो जाने की जो इच्छा आज कवि के हृदय में गुप्त रूप से अवस्थित है, वर्तमान आतंक के कारण प्रकट नहीं हो पा रही है आगामी दिनों में सच्चाई का सहारा पाकर वही इच्छा ऐसे स्वर्णिम अक्षरों में प्रकट होगी कि उसकी अनदेखी कर पाना असंभव हो जाएगा ।

विशेष

उक्त कविता मुक्तिबोध के काव्य संग्रह 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' से ली गयी है । संग्रह की भूमिका में शमशेर बहादुर सिंह ने संकेत किया है कि मुक्तिबोध की कविता की सर्वप्रमुख विशिष्टता नये और प्राणवान बिम्बों का निर्माण है । इस कविता में दरबार का अत्यन्त जीवन्त बिम्ब कवि ने निर्मित किया है । मुक्तिबोध की लंबी कविताओं में दृश्यों के बाद दृश्य उभरते रहते हैं लेकिन इस कविता में एक ही दृश्य के इर्द गिर्द समूची कविता गढ़ी गयी है । इसीलिए यह कविता मुक्तिबोध की उन कुछेक कविताओं में से है जो सुगठित हैं । नई कविता के कवि की काव्य भाषा भी खास तरह की होती है । उसमें शब्द, बिम्ब और अर्थ एक दूसरे में गुँथे होते हैं । इस कविता में भी फ़ारसी शब्दावली के जरिए मध्ययुगीन वातावरण का निर्माण किया गया है । कविता में बादशाह और कैदी की कथा भी उतनी ही प्रधानता से चलती रहती है जितनी प्रधानता से भूल और ईमान की कथा । लेकिन जैसा कि जयशंकर प्रसाद की कामायनी का विश्लेषण करते हुए मुक्तिबोध ने कहा था कि कथा की प्राचीनता के आवरण को चीरकर रह रह कर प्रसाद के समय का सत्य झाँक जाता है उसी तरह इस कविता के मध्ययुगीन वतावरण और मनोवैज्ञानिक आवरण को चीरकर मुक्तिबोध के समय का सत्य दिखाई पड़ने लगता है । नई कविता के कवियों ने विरासत में निराला की भाषा को पाया था । मुक्तिबोध की विशेषता है सर्वत्र उनकी कविताओं में रिद्म (लय) का पाया जाना । यह लय पानी की लहरों की निरंतर उठान गिरान की तरह एक विशेष आरोह अवरोह के क्रम में चलती है । जैसा कि निराला ने कहा ऐसी कविताओं का सौंदर्य 'आर्ट आफ़ रीडिंग' के जरिए खुलता है । फ़ारसी शब्दावली का इतना प्रचुर उपयोग मुक्तिबोध ने इस कविता को छोड़कर और कहीं नहीं किया है लेकिन इसके बावजूद वे इस प्रयोग में सफल हुए हैं । समूची कविता की अन्तिम चार पंक्तियों में एक भी फ़ारसी शब्द नहीं आया है और वही मुक्तिबोध की स्वाभाविक भाषा है । इन पंक्तियों का मुक्तिबोध की अनेक काव्य पंक्तियों की तरह नारे के बतौर इस्तेमाल किया जा सकता है । धूमिल ने कहा था कि कोई भी कविता सबसे पहले एक सार्थक वक्तव्य होती है । इन अन्तिम पंक्तियों में उसी तरह के वक्तव्य के जरिए कवि का आशावाद प्रकट हुआ है ।

Monday, March 21, 2011

लेकिन फ़िल्म : मिथक का यथार्थ

बीसवीं सदी के नब्बे दशक के शुरू में आई फ़िल्म 'लेकिन' कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थी । इसके गीतों के बाद से ही हिन्दी फ़िल्मों में अच्छे मधुर गीतों का नया दौर शुरू हुआ । इस फ़िल्म से ही डिम्पल कपाड़िया के अभिनय का वह सिलसिला शुरू हुआ जिसमें उनकी अभिनय प्रतिभा ने नयी नयी ऊँचाइयाँ छुईं । इस फ़िल्म से राजस्थान की पृष्ठभूमि पर, राजस्थानी लोकधुनों पर बने गीतों, रेगिस्तान की तकरीबन पेन्टिंग की तरह फ़ोटोग्राफ़ी के जरिये, अच्छी फ़िल्मों का निर्माण शुरू हुआ । इस फ़िल्म को गीतों, डिम्पल की अभिनय क्षमता, परिधान सज्जा और रेगिस्तान की बेहतर फ़ोटोग्राफ़ी के चलते प्रसिद्धि मिली और इन्हीं क्षेत्रों में पुरस्कार भी मिले ।

लेकिन किसी फ़िल्म की जान यह सब नहीं होता । यह तो उसका तकनीकी पक्ष है । कोई फ़िल्म महत्वपूर्ण होती है सामाजिक यथार्थ की अपनी समझ और उसकी प्रस्तुति के चलते । इस नुक्ते नजर से लेकिन को देखने से पहले कुछ चीजों पर स्पष्ट हो लिया जाय । अस्सी के दशक में 'नया सिनेमा' या 'समानान्तर सिनेमा' या फिर 'कलात्मक सिनेमा' का चलन हुआ लेकिन दशक का अन्त आते आते उसका ज्वार उतर गया । इन फ़िल्मों में व्यावसायिक सिनेमा के मुकाबले यथार्थपरक फ़िल्मांकन पर जोर दिया गया । 'लेकिन' कलात्मक फ़िल्म होते हुए भी आपाततः यथार्थपरक फ़िल्म नहीं है । इस फ़िल्म में अनेक हिन्दी फ़िल्मों में प्रयुक्त लोकविश्वासों मसलन पुनर्जन्म, इस जन्म की प्रेमिका के अगले जन्म में मिलने या आत्मा के भटकने आदि का उपयोग किया गया है ।

हिन्दी क्षेत्र में यह विश्वास प्रचलित है कि आदमी की मृत्यु तक यदि उसकी कोई इच्छा अधूरी रह जाय तो आत्मा भटकती रहती है । इसी आत्मा को 'भूत' कहते हैं । 'भूत' का एक अर्थ अतीत भी होता है । फ़िल्म में गुलजार ने मानो इसी भूत को समझने की कोशिश की है । इसके लिए उन्होंने दो युगों को आमने सामने ला खड़ा किया है । एक तरफ़ है डिम्पल जिसके बारे में पहले ही दृश्य में कुछ लोकविश्वासों के प्रयोग से यह महसूस हो जाता है कि वह कोई जीवित लड़की नहीं बल्कि अशरीरी है । उसकी पलकें नहीं झिपतीं, वह ट्रेन के डिब्बे के बाहर निकल गयी लेकिन चिटकनी अन्दर से बन्द है । अपने बारे में वह एक जगह कहती है कि मैं एक फँसा हुआ समय हूँ । दूसरी तरफ़ है विनोद खन्ना; वह एक पुरातत्वविद है, आधुनिक समाज में रहता है किन्तु अपने काम के सिलसिले में अक्सर पुरातन से टकराता है । उसका दावा है कि वह समय को सूँघ लेता है । लेकिन डिम्पल कोई व्यतीत नहीं जिसे समझने में वह माहिर है । वह तो आधुनिक के भीतर फँसा हुआ अतीत है । समय की इन कोटियों के इन्हीं प्रतिनिधि पात्रों की अनेक मुलाकातों के जरिए पूरी कहानी सामने आती है ।

समय क्या है ? उसे हम आम तौर पर एक प्रवाहमान कालधारा के बतौर देखते हैं । इसके सूचक हैं- दिन और रात का होना, ॠतुओं का चक्र अथवा किसी की मृत्यु तो किसी का जन्म । लेकिन समय बदलता भी है । दो भिन्न समयों में इतना अन्तर होता है कि उन्हें हम दो युग भी कहते हैं । ऐसा लगता है कि समूची समाज व्यवस्था के बदल जाने से युग बदल जाता है । इसी आधार पर हम आधुनिक युग और प्राचीन युग जैसी कोटियों का निर्माण करते हैं । लेकिन सामाजिक परिवर्तन में कभी ऐसा नहीं होता कि पुराने और नये के बीच एकदम स्पष्ट विभाजक रेखा खींच ली जाय । पुराने के भीतर ही नये के बीज पड़ जाते हैं और नयी व्यवस्था के बन जाने के बाद भी पुराने के अवशेष बहुत सारी अभिरुचियों, चिंतन प्रणालियों और ढाँचों के रूप में बचे रह जाते हैं । डिम्पल आधुनिक में फँसे हुए किस समय का प्रतिनिधित्व करती है ?

वह खुद अपनी कहानी विनोद खन्ना से अनेक मुलाकातों में बयान करती है । दूसरी ही मुलाकात में विनोद खन्ना को वह जिस काल की यात्रा कराती है उसमें हम देखते हैं कि एक आदमी रस्सियों से बाँधकर लाया गया, उसे दीवार से लटकती जंजीरों में कसा गया । फिर उसे कोड़ों से पीटा जा रहा है और उसके खून के छींटे दीवार पर बिखर रहे हैं । इस तरह गुलजार हमें बताते हैं कि डिम्पल जिस काल में रहती है उसे हम राजे- रजवाड़ों के अत्याचारों से भरे हुए सामन्ती युग के नाम से जानते हैं । इस अत्याचार का शिकार वह आदमी तो है ही जिसे कोड़ों से पीटा जा रहा है खुद डिम्पल भी उसी अत्याचार का शिकार है । तीसरी मुलाकात में विस्तार से अपने ऊपर हुए जुल्म की दास्तान सुनाती है । वह और उसकी बहन अपने पितातुल्य उस्ताद जी से नाच गाना सीखती हैं । उसका बचपन का एक साथी भी है मैरू । एक दिन स्थानीय राजा भाई परम सिंह के दरबार में उसकी बहन गान और नृत्य कला का प्रदर्शन करती है । राजा उसे अपने पास ही रख लेना चाहता है । उस्ताद जी किसी तरह उसे भगा देते हैं । गुस्साकर राजा उस्ताद जी और डिम्पल को कैद में डलवा देता है । वह इन्तजार करता है कि कब डिम्पल जवान हो और उसे अपने हरम में डाल ले । उस्ताद जी उसे भी पीतल के एक बड़े हन्डे में बिठाकर भगा देते हैं । जिम्मेदारी मैरू की है कि वह उसे रेगिस्तान पार करा दे । एक बार रेगिस्तान पार हो जाये तो भाई परम सिंह की पहुँच से भी पार हो जायेगी । लेकिन मैरू इस काम में सफल नहीं हो पाता । डिम्पल रेगिस्तान में फँस जाती है । वह एक सदी से बैठी है लेकिन उस राह से कोई नहीं गुजरा जो उसे उस काल से बाहर खींच लाये । डिम्पल की यह पूरी कहानी अपनी बुनावट, ताजगी और तीव्रता के चलते लोककथाओं जैसी लगती है । गुलजार की खूबी इस लोककथा का ऐसा उपयोग है जिसमें डिम्पल सामन्ती व्यवस्था की शिकार सभी औरतों के दर्द की आवाज बन जाती है । वह जो एक बार शारीरिक शोषण का शिकार हुई तो आज तक मुक्त नहीं हो सकी । अब तक रेगिस्तान में उसे लोग मारते पीटते और डराते हैं । यह रेगिस्तान फ़िल्म में नहीं बल्कि एक एक आदमी के घर तक फैला हुआ है जहाँ सदियों से पथराई आँखें ल्ये बैठी औरत चौखट पर किसी की आहट का इन्तजार करती है जो उसे इस शाश्वत गुलामी से मुक्ति दिलाये ।

इस लम्बे इन्तजार के बाद विनोद खन्ना से उसकी भेंट होती है । विनोद खन्ना सिर्फ़ पेशे से पुरातत्वविद नहीं है बल्कि पुरातन से उसका लगाव या सहानुभूति आज के जमाने में भी पुराने ढंग के टेलीफ़ोन और पुराने ढंग के ताले के प्रयोग से प्रकट होती है । उसे डिम्पल से मिलने के बाद लगातार यह महसूस होता है कि वही उसका पूर्वजन्म का प्रेमी है । उसे यह भी लगता है कि डिम्पल का प्रेमी उसे आजाद कराने का जो काम पूरा न कर सका था उसकी जिम्मेदारी भी उसी पर है । इसी अहसास के साथ वह लगातार डिम्पल के करीब आता जाता है । लेकिन उसके इर्द गिर्द का बाकी समूचा आधुनिक युग ? बाकी सारे लोग तो अतीत के इस अवशेष को झूठ मानते हैं । उन्हें कतई यकीन नहीं है कि इस जमाने में भी अतीत की उस छाया का वजूद है । यदि उसकी कोई व्याख्या आधुनिक युग के पास है तो परामनोविज्ञान जैसा रहस्यमय शास्त्र ही । तथाकथित आधुनिकता मानो अपने जमाने में मौजूद पुरातनता को पहचानने से इन्कार कर देती है । विनोद खन्ना के साथ दिक्कत यह है कि वह युग के इन दोनों छोरों पर मौजूद है । वह डिम्पल के साथ उसे रेगिस्तान पार करा देने के लिये बेचैन मनुष्य भी है और आधुनिक समय का पुरातत्वविद भी । इसीलिए आश्चर्य नहीं कि हरेक मुलाकात के बाद बीच बीच में डिम्पल से उसका साथ छूट जाता है । यह पुरातनता से समूचे समाज को मुक्त कराने के प्रयासों का अधूरापन ही तो है । डिम्पल एक बार उससे कहती है कि जहाँ जहाँ विनोद खन्ना ने उसे छोड़ दिया था वह उसे फिर वहीं मिलेगी ।

बहरहाल, आधुनिक युग ने तो सामन्तवाद के इन बर्बर अवशेषों को पहचानने से इन्कार कर दिया लेकिन उस युग में लोगों ने इस जुल्म को चुपचाप बर्दाश्त नहीं किया था । असल में विनोद खन्ना भाई परम सिंह के महल से पुरातात्विक महत्व की चीजों को निकाल लाने के काम पर गया हुआ है । एक तरफ़ उसे डिम्पल अपने साथ महल के अतीत में ले जाती है दूसरी तरफ़ महल से चीजों का निकाला जाना भी जारी रहता है । अन्तिम बार जब वह डिम्पल के साथ महल के तिलिस्म में घुसा था तब तक उस्ताद जी ने कैद से डिम्पल को भगवा दिया था । इसके बाद गुस्से से बिफरा हुआ राजा उस्ताद जी को कत्ल करने के इरादे से उनकी कोठरी में घुसता है । इसके बाद की कथा हम सीधे नहीं जान सकते । चीजों को निकालने के काम में लगे मजदूर अचानक विनोद खन्ना को सूचना देते हैं कि महल में एक कब्र मिली है और उसकी खुदाई से एक खोपड़ी बरामद हुई है । विनोद खन्ना खोपड़ी का निरीक्षण करता है । स्वाभाविक तो यही था कि खोपड़ी उस्ताद जी की हो । लेकिन उसे खोपड़ी में एक सोने का दाँत मिलता है तो वह चौंक जाता है । उसने पिछली यादों में देखा था कि भाई परम सिंह का एक दाँत सोने का है । अचानक वह अपने आप से पूछता है कि क्या उस्ताद जी ने भाई परम सिंह को मार डाला था । यहीं उस्ताद जी जैसे सामन्ती युग में लड़ने वाले अन्तिम, लेकिन अकेले नहीं, बहादुर योद्धा की तरह दिखाई देते हैं ।

फ़िल्म यहीं खत्म हो जाती तो सच्चाई के अधिक करीब होती । 'लेकिन' की बुनावट जटिल है । वह वर्तमान और अतीत में एक साथ सफ़र करती है । इस जटिलता के बावजूद समय की समझ और स्त्री उत्पीड़न की समझ के चलते बेजोड़ है ।

Tuesday, March 8, 2011

लोकसभा चुनाव 2004 : कुछ विचार


इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन से मतदान के साथ हमारा देश विकसित देशों की सूची में शामिल होने के और करीब आ गया । संभवतः यह दुनिया का एकमात्र देश है जहाँ तकनीक में असंदिग्ध विश्वास के कारण इसे मतदान के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है । इसका आविष्कर्ता (संभवतः एडिसन) जब इसे लेकर सीनेट के तत्कालीन अधिकारियों के यहाँ गया था तो उन्होंने दल बदलकर मत डालने वाले प्रतिनिधियों की पहचान न हो सकने का तर्क देकर इसे खारिज कर दिया था । अमेरिका में भी आगामी राष्ट्रपति चुनावों में इसका प्रयोग होगा या नहीं, अभी नहीं कहा जा सकता । फिर भी तकनीक से अपने लगाव के कारण हमने इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया । इस तरह हम परमाणु बम, निरक्षरता, भुखमरी जैसे मामलों में अग्रणी देशों की तरह इस मामले में भी अग्रणी हो गए हैं । अंग्रेजी की मशहूर मसल है- जहाँ देवदूत पाँव धरते थर्राते हैं, वहाँ अनाड़ी लपक पड़ते हैं । सच है दुनिया वालो कि हम हैं अनाड़ी ! ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल के मामले में भी यही हुआ । जिन देशों में मतदान से सरकार बनती है उनमें से सिर्फ़ तीन देशों में इस पर प्रतिबन्ध नहीं है और उनमें से एक अमेरिका है । सो चुनाव आयोग और सरकार ने ऐसा बैडमिन्टन खेला कि मुद्दा ही गायब हो गया ।

भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास में यह चुनाव कई कारणों से याद रखा जायेगा । आवारा और बड़ी पूँजी का लोकतन्त्र पर ऐसा प्रभाव शायद ही पहले कभी भारत में देखा गया हो । भाजपा के अनेक विरोधी सांप्रदायिकता विरोध को तात्कालिक और दूरगामी रणनीतियों में बाँटकर देखते हैं । किसी भी राजनीतिक अभियान के तात्कालिक कदम उसके दूरगामी लक्ष्यों को मजबूत करते हैं और दूरगामी लक्ष्यों की रोशनी में तात्कालिक योजनाएं बनाई जाती हैं । जब हम भाजपाई शासन में फ़ासीवाद की आहटें सुन रहे हैं तो ध्यान रखना चाहिए कि जहाँ कहीं फ़ासीवाद आया है वह संसदीय लोकतन्त्र के ही रास्ते आया है । कारण यह है कि पूँजीवाद आम तौर पर तो लोकतान्त्रिक तरीके से ही अपने हितों के पक्ष में सामाजिक सहमति बनाना पसन्द करता है लेकिन पूँजी की आम संरचना में वित्तीय पूँजी के प्रतिक्रियावादी हलकों का दबदबा बढ़ने से जो संकट पैदा होता है उसमें सर्वसत्तावादी राज्य की जरूरत पैदा होने लगती है । ऐसी स्थिति में पहला हमला लोकतन्त्र के दिखावे पर होता है । वैसे भी पूँजीवाद को जो सामन्ती विरासत मिली है उसके कारण पूँजीवादी लोकतन्त्र का आधार कमजोर ही रहा है । उसने अपने वर्गीय हितों को लोकतान्त्रिक माँगों की शक्ल में पेश तो किया लेकिन मजदूर वर्ग को अपनी पीठ पर देखकर सामन्ती ताकतों से समझौता कर लिया और उसके आचरण की नकल करने लगा । कौन नहीं जानता कि सार्वजनिक बालिग मताधिकार एक एक कदम लड़कर हासिल किया गया है अन्यथा पूँजीवाद की अपनी पसन्द तो विशेषाधिकार प्राप्त पुरुष समुदाय तक ही मताधिकार को सीमित रखना था । जब जब पूँजी को अबाध विकास की जरूरत पड़ती है वह मताधिकार को सीमित करने से शुरू कर सर्वसत्तावाद तक पहुँचती है ।

पूँजी के मनमाना शोषण के खिलाफ़ पैदा हो रहे जन विक्षोभ को दबाने के लिए भी ऐसे शासन की जरूरत पड़ती है । इसी सामान्य परिप्रेक्ष्य में हम लोकतन्त्र और चुनाव में हो रहे बदलावों तथा बुद्धिजीवियों की तंगनजरी की परीक्षा करने की कोशिश करेंगे ।

सबसे पहले पूँजी के चरित्र में आए बदलावों पर ध्यान दीजिए । अस्सी का दशक सिर्फ़ उदारीकरण के लिए नहीं बल्कि कम्प्यूटर क्रान्ति और सांप्रदायिकता के लिए भी मशहूर है । उदारीकरण ने आपाततः दो भिन्न परिघटनाओं को जन्म दिया । एक साथ हमने इक्कीसवीं और उन्नीसवीं सदी की ओर कदम बढ़ाए लेकिन इन दोनों में समकालिकता ही नहीं थी बल्कि सहसम्बन्ध भी था । इसी सहसम्बन्ध से कांग्रेस और भाजपा में घालमेल का दौर शुरू हुआ । एक तरफ़ राजीव गांधी हरेक हल के पीछे कम्प्यूटर लटकाते घूम रहे थे, दूसरी तरफ़ रामजन्मभूमि का ताला खोल रहे थे । कांग्रेसी नेता कर्ण सिंह विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष थे और आर एस एस कांग्रेस का प्रचार कर रही थी । नब्बे का दशक आते आते उदारीकरण का दर्शन और आचरण नये दौर में पहुँच गया और सकल घरेलू उत्पाद में प्राथमिक तथा द्वितीयक क्षेत्रों के मुकाबले तृतीयक क्षेत्र का हिस्सा बढ़ने लगा । सट्टा बाजार अर्थतन्त्र का संवेदी सूचकांक बन गया । चुनाव ज्योतिष (और वह भी फलित) तो अस्सी के दशक से ही शुरू हो गया था । अब इसमें सट्टा बाजार की भाषा भी घुस गई है । सटोरियों की शरण में बुद्धि ! सरस्वती के सिर पर लक्ष्मी सवार ! इस प्रक्रिया की परिणति अर्थतन्त्र में पूँजी पतियों की नयी नस्ल पैदा होने में हुई जिसके मुखिया रिलायंस और सहारा जैसे संस्थान थे ।

ठीक इस बदलाव के साथ ही हम लोकतन्त्र में हो रहे बदलावों को भी पढ़ सकते हैं । सबसे पहले राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त दलों को अलगाया गया । फिर मान्यता प्राप्त दलों को ऐसी सुविधाएं दी गयीं जो छोटी पार्टियों को नुकसान पहुँचाती हैं । मसलन दूरदर्शन और रेडियो पर प्रसारण समय के आवन्टन में यह भेदभाव शुरू किया गया । समूचा शासक वर्ग दो ध्रुवीय चुनाव व्यवस्था लागू करने पर आमादा हो गया । गैर मान्यता प्राप्त दलों के प्रत्याशियों के मारे जाने पर चुनाव स्थगित होना बन्द हो गया । मान्यता प्राप्त दलों को मतदाता सूची मुफ़्त दी जाने लगी और अन्य प्रत्याशियों को पैसा लेकर ।

मतदान सम्बन्धी सुधारों की दूसरी खेप फ़ोटो पहचान पत्र से शुरू हुई । भारत जैसे देश में फ़ोटो पहचान पत्र उन्हीं का बनेगा जिनका स्थायी निवास हो जबकि बेघर लोगों की तादाद दिनो दिन बढ़ रही है । स्पष्ट है कि यह कदम फ़र्जी वोट रोकने की बजाए बेघर लोगों का मताधिकर सीमित करता है ।

तीसरी खेप इस बार के चुनावों में लागू हुई है । चुनाव की तिथियाँ तय करने में स्कूलों की परीक्षाओं का तो ध्यान रखा गया लेकिन दूर दराज काम करने जाने वाले खेतिहर मजदूरों की असुविधा को आराम से भुला दिया गया । कोढ़ में खाज यह कि बूथ रैशनलाइजेशन के नाम पर एक तिहाई बूथ रह गये । जिन्हें भी गाँव के बारे में थोड़ी जानकारी हो वे यह समझ सकते हैं कि इसका अर्थ मतदान केन्द्रों का सवर्ण बस्तियों में पहुँच जाना है । जिस भी गाँव में अनबन होती है वहाँ सवर्ण सबसे पहले गरीबों के बाहर जाने का रास्ता रोकते हैं । उनकी बस्ती से गुजरकर वोट डालने जाना साफ तौर पर दलितों की राजनीतिक भागीदारी पर उल्टा असर डालता है । ई वी एम की अविश्वसनीयता के साथ मिलकर ये कदम और कुछ नहीं छोटी पार्टियों को खत्म करने और मताधिकार को सीमित करने के सुनियोजित प्रयास हैं ।

इन कानूनी प्रावधानों के अलावा और भी तरह से तकनीक ने पार्टियों के चरित्र पर प्रभाव डाला है । दूरदर्शन पर राजनीतिक प्रसारण के साथ पार्टियों में चिकने चुपड़े चेहरों और तकनीकदाँ लोगों का महत्व बढ़ गया । फिर मतदाता को रिझाने के लिए फ़िल्मी सितारों की बाढ़ आई । इस बार तो दूरदर्शनी धारावाहिकों के कलाकारों और क्रिकेट खिलाड़ियों की आमद भी अभूतपूर्व पैमाने पर हुई । इनका महत्व आम राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मुकाबले कई गुना निकला ।

इस बार चुनावशास्त्री (नजूमी) भी एक पार्टी की तरह बहस में उतरे । इस बहस में कई तरह के मुद्दे उठाए गए हैं इसलिए उन पर विस्तार से विचार करने की जरूरत है । मेरे एक मित्र ने कहा कि इस बार इन अटकलों पर इतने सवाल उठ खड़े हुए हैं कि अब इसकी जिन्दगी लम्बी नहीं होगी । लेकिन इस बात पर ध्यान दें कि फ़िल्मों में माफ़िया का पैसा लगा होने की सूचना से उनकी लोकप्रियता को शुरुआती झटका लगा लेकिन फ़िल्मों का बनना जारी रहा । इसी तरह क्रिकेट में सट्टेबाजी और फ़िक्सिंग का तथ्य सामने आने पर उसको शुरुआती झटका लगा लेकिन पूँजी निवेश इतना जबर्दस्त था कि क्रिकेट जारी रहा । ऐसे ही चुनावी फलित ज्योतिष सामान्य अर्थों में पत्रकारिता नहीं है । गंगा कोई नदी है ? कामधेनु क्या गाय है ? यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है । इसमें बड़ी पूँजी लगी हुई है । अनेक बुद्धिजीवियों का जीवन इसी से चलता है । बोर्दू ने हरेक जगह दिखने की इच्छा को एक स्वतन्त्र शक्ति माना है जो बौद्धिकों को मौके के मुताबिक अपने आपको ढाल लेने के लिए विवश कर देती है ।

यह शास्त्र सबसे पहले दो ध्रुवीय राजनीतिक गोलबन्दी की पूर्वाशा करता है । प्रसिद्ध चुनाव ज्योतिषी योगेन्द्र यादव ने कहा कि बहुकोणीय मुकाबला इस शास्त्र के लिए दुःस्वप्न की तरह होता है । अगर दो से अधिक दलों के बीच काँटे की टक्कर दुःस्वप्न है तो स्वप्न क्या है यह कहने की जरूरत नहीं रह जाती । दरअसल ऐसी ही परिस्थिति में एक का नफ़ा दूसरे का सीधे नुकसान होता है । लेकिन दो ध्रुवीय राजनीति लोकतन्त्र के लिए बहुत अच्छी नहीं होती । पूँजीपतियों को यही प्रणाली पसन्द आती है क्योंकि इसमें सर्वानुमति बनाने में आसानी होती है, खरीदार कम होते हैं, बहुत मोलतोल नहीं होता । भारत जैसे देश में विभिन्न सामाजिक समुदायों के भीतर राजनितिक चेतना की बढ़ोत्तरी के साथ चुनावों का बहुध्रुवीय होना निश्चित है । यह शास्त्र बौद्धिकों के भीतर दो ध्रुवीयता की चाहत बढ़ाकर सच्चाई को समझने की उनकी शक्ति को कम करता है और छोटी पार्टियों को प्रोत्साहित करता है कि वे अपनी पहचान किसी बड़े संश्रय के साथ जोड़ लें ।

इन सब चीजों का गहरा सम्बन्ध सभ्य समाज (सिविल सोसाइटी) से भी है । ऐतिहासिक तौर पर यह सभ्य समाज पूँजीवाद के विकास के साथ अस्तित्व में आया और कमोबेश उसकी मनपसन्द शासन पद्धति के लिए मतनिर्माताओं की तरह काम करता रहा है । भारत में यह सभ्य समाज आखिर कितना सभ्य है ? इसमें कुछ अवकाश प्राप्त नौकरशाह, मोटी सुविधायें ग्रहण करने वाले पत्रकार, प्रोजेक्ट प्रेमी प्रोफ़ेसरान और एन जी ओ मालिकान शामिल हैं । आम तौर पर ये सभी अपने साम्राज्य में खुली प्रतियोगिता से भयभीत, प्रचंड जातिप्रेमी, आरक्षण विरोधी और खामोश क्रूरता के साथ काम करने वाले होते हैं । इन्होंने चुनाव ज्योतिष पर रोक लगने की सम्भावना के मद्दे नजर सूचना की स्वतन्त्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल उठाया ।

पैसे और रसूख के आधार पर बँटे हुए समाज में कोई भी अधिकार निरपेक्ष नहीं होता । ऐसे समाज में हरेक अधिकार और समानता असरदार के लिये अधिक और कमजोर के लिये कम में बदल जाती है । सी एन एन, रूपर्ट मरडोक, आब्जर्वर और एन डी टी वी का सूचना का अधिकार कई बार गरीबों के सूचना के अधिकार का गला घोंटने के काम आता है । संचार माध्यमों में किस हद तक समझौता परस्ती आई है इसका उदाहरण अरुन्धती राय के एक लेख का हश्र है । यह लेख आई जी खान स्मृति व्याख्यानमाला के अन्तर्गत दिया गया भाषण था । 'हिन्दुस्तान' में छपे उस लेख को जब 'हिन्दू' ने अंग्रेजी में छापा तो इसमें से रिलायंस और सहारा जैसे संस्थानों के नाम तो गायब थे ही, ऐसे संदर्भ भी गायब थे जो असुविधाजनक हो सकते थे । अब तो यही कहा जा सकता है कि सर्वे गुणाः कांचनमाश्रयन्ति ।

इन सबके बावजूद यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि तकनीकप्रेमी सुविधाभोगी शासक वर्ग के प्रचारक व्यापक भारतीय समाज की राजनीतिक जिन्दगी पर नियन्त्रण कर सकेंगे । इन चुनावों में जनसमुदाय ने अपनी हैसियत दर्ज करा दी है । यह मत सांप्रदायिकता के विरोध में तो होगा ही, उदारीकरण के समूचे दर्शन के विरोध में भी होगा । यह शासकों द्वारा जनता को भेंड़ मानकर मनमानी करने के विरोध में भी होगा । लेकिन एक और परिघटना पर ध्यान देना आवश्यक है ।

पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक नेताओं का एक स्वतन्त्र वर्ग तैयार हुआ है । तथाकथित स्थिरता इसी वर्ग की चाहत है । पाँच साल तक किसी भी स्थिति में सांसद और विधायक बने रहने से अनेक आर्थिक तथा अन्य सुविधाएं प्राप्त होती हैं । बहुत पहले इंग्लैंड में राजनीतिक सुधारों के लिए एक आंदोलन हुआ था जिसे चार्टिस्ट आंदोलन कहा जाता है । उसकी सारी माँगें पूरी हो चुकी हैं सिवा इस माँग के कि हरेक वर्ष चुनाव होना चाहिए । इस माँग के पीछे तर्क यह था कि सामाजिक स्थितियों में होने वाला परिवर्तन इसी तरह संसदीय राजनीति में प्रतिबिम्बित हो सकता है । आज कौन कहेगा कि एक जमाने में स्थिरता को भी लोकतन्त्र के लिये घातक समझा जाता था । स्थिरता का आकांक्षी यह राजनीतिक वर्ग पिछली सरकार के अनेक गुनाहों के बावजूद सत्ता में उसके बने रहने के अनेक कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण था ।

इसी प्रक्रिया में इस वर्ग के हित वित्तीय घरानों के साथ जुड़ते गये हैं । उत्तर प्रदेश के पिछले दिनों के अनुभव बताते हैं कि कोई भी राजनीतिक दल, कोई भी जनप्रतिनिधि ऐसा नहीं रह गया है जो बिकाऊ न हो । हो सकता है त्रिशंकु संसद की हालत में केन्द्रीय सरकार का गठन भी होटलों में तिजोरी लेकर बैठे उद्योगपति करें । एन डी ए की ही सरकार बने और पाँच साल तक चले इसके लिए तिजोरियाँ जब खुलेंगी तो क्या होगा कहना मुश्किल है ।

वैसे भी गैर भाजपाई सरकार से बहुत आशा करना आर्थिक नीतियों पर बनी आम सहमति की उपेक्षा करना होगा ।

Thursday, March 3, 2011

छोटे बदलावों के पक्ष में


इस विषय पर कोई भी बात शुरू करने की राह में कई तरह की बाधाएं हैं । आधुनिक भारतीय समाज के बुद्धिजीवी समुदाय का निर्माण जिन परिस्थितियों व प्रक्रियाओं के दरम्यान हुआ है उसके चलते किसी भी तरह के मूलगामी परिवर्तन को अपनी चेतना का अंग बना लेना उसके लिए कठिन है । इस समुदाय में ज्ञान विज्ञान के विविध अंगों के अध्ययन अध्यापन से जुड़ा तबका इसकी मुख्यधारा का निर्माण करता है । असल में दूसरे विश्व युद्ध के बाद की दुनिया सापेक्षिक रूप से स्थिर रही है । इस स्थिरता के दौरान ही ज्ञान विज्ञान की विविध शाखाओं में अध्ययन की पद्धतियों का निर्माण और विकास हुआ है । इसके चलते इस समुदाय में अनुशासन का विशेषीकरण और चिंतन में यथास्थितिवाद के तत्व गहरे जड़ जमाए हुए हैं । ज्ञान के विविध अनुशासनों की आंतरिक संरचना की स्वायत्तता पर आवश्यकता से अधिक बल देने से विशेषीकरण और अन्ततः ज्ञान और क्रिया के बीच भेद पैदा हो जाता है । ज्ञान का यह विशेष स्वरूप समाज में यथास्थितिवाद को ही मजबूत करता है । ज्ञान का यह दर्शन विशेष तरह के जीवन दर्शन को भी जन्म देता है जिसमें ज्ञान के सामाजिक सरोकार कमजोर होते हैं अथवा यूँ कहें कि संवेदनाहीन ज्ञान का प्रसार होता है । कोई भी सामाजिक सरोकार सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य की गैर मौजूदगी में पैदा ही नहीं हो सकता । सामाजिक सरोकार परिवर्तनेच्छा का ही फल होता है और यथास्थिति पैदा करने वाली ज्ञान पद्धति सामाजिक संवेदना को नष्ट करने वाले जीवन दर्शन को जन्म देती है । इस तरह यह समुदाय किसी बुनियादी परिवर्तन को अपनी चेतना का अंग नहीं बना पाता और जाने अनजाने यथास्थिति की ही शक्तियों को मजबूत करता है ।

दूसरी बाधा जड़ क्रान्तिकारियों की ओर से है । इनका सबसे ज्वलन्त समुदाय क्रान्ति के नीचे किसी परिवर्तन को स्वीकार ही नहीं कर पाता । इस समुदाय की भावना और चेतना का निर्माण रूस और चीन की क्लासिकल क्रान्तियों की आँच में हुआ है । अतः वह भारत में भी उसी क्रान्ति के नये संस्करण की आशा करता है । जो कुछ व्यवस्थित क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी हैं उन्होंने क्रान्ति के नियामक तत्व वर्ग संघर्ष को एक स्वातत्त ज्ञान पद्धति में बदल डाला है । यह पूरी पद्धति अंततः व्याख्या के लिये व्याख्या बनकर रह जाती है और इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाती । क्यों ऐसा होता है कि कुछ काल उत्थान के होते हैं और कुछ पतन के जबकि वर्ग संघर्ष दोनों कालों में मौजूद रहता है ? क्यों ऐसा होता है कि टकराव के बाद एक ऐसा सामाजिक संश्लेष पैदा होता है जो पहले के समाज से भिन्न और संघर्षरत दोनों तरह की शक्तियों की कल्पना से परे होता है ? द्वन्द्ववाद की भोंड़ी समझ के आधार पर किसी वास्तविक परिवर्तन को न तो समझा जा सकता है न ही उसे अंजाम दिया जा सकता है ।

प्रश्न इस विन्दु पर टिका हुआ है कि सामाजिक आलोड़न की प्रक्रिया क्या है ? हमारे समाज का निर्माण, और जब मैं समाज कह रहा हूँ तो इसमें समाज के ज्ञानात्मक प्रतिबिम्ब भी शामिल हैं, एक बहुत ही जटिल रचना विधान है । विभिन्न परिघटनाएं और प्रक्रियाएं इतिहास के किसी मोड़ पर पैदा होती हैं और फिर अपने विकास का स्वायत्त मार्ग पकड़ती हैं लेकिन वे एक दूसरे से जुड़ी भी होती हैं । एक संरचना में आने वाला परिवर्तन दूसरी अनेक संरचनाओं में परिवर्तन का कारण बन जाता है । इस तरह कुछ प्रक्रियाएं आगे बढ़ जाती हैं कुछ पीछे रह जाती हैं । इसी को एंगेल्स ने इतिहास की प्रसव वेदना कहा है । इसीलिए किसी भी परिवर्तन को उससे जुड़े हुए अन्य क्षेत्रों में आये परिवर्तनों से अलग करके नहीं देखा जा सकता । हम कह सकते हैं कि समाज की बुनियादी संरचनाओं मेंसे किसी एक का विकास इस हद तक हो जाए कि वह अन्य सभी संरचनाओं को अपना साथ पकड़ने के लिए विवश कर दे तो समग्र सामाजिक आलोड़न की एक प्रक्रिया आरम्भ होती है जिसमें समाज की मुख्य धारा से विच्छिन्न शक्तियाँ, जिन्हें सोई हुई शक्तियाँ भी कहा जाता है, शामिल हो जाती हैं और परिवर्तन के उपरान्त बननेवाला समाज किसी एक वर्ग ही की कल्पना से स्वतंत्र एक नई भूमि पर खड़ा होता है । इसके विरोध में असफल क्रान्तियों का तर्क दिया जा सकता है किन्तु याद रखना चाहिए कि सफल और असफल क्रान्तियों में सूक्ष्म अन्तर होता है क्योंकि कोई भी क्रान्ति अन्तिम नहीं होती ।

इस गम्भीर पृष्ठभूमि की आवश्यकता मात्र इसलिए थी कि जिन परिवर्तनों की बात मैं करने जा रहा हूँ उनकी समझ के लिए जरूरी सैद्धान्तिक आधार तैयार कर सकूँ । इनमें से एक बदलाव तो संघीयता का उदय है । इस परिवर्तन की मैं विशेष रूप से इसलिए चर्चा करना चाहता हूँ कि पिछले लगभग दो सौ सालों से पहले अंग्रेजों और बाद में कांग्रेस के शासन की निरन्तरता में केन्द्रीय शासन की धारणा ही प्रमुख रही है । असल में सामन्ती युग में विराट राष्ट्र की परिकल्पना स्वतःस्फूर्त ढंग से निर्मित सामाजिक ढाँचे से अपेक्षाकृत स्वतन्त्र सैन्य आधारित उपभोगजीवी राज्यतन्त्र की परिकल्पना थी । किन्तु पूँजीवाद ने सामाजिक जीवन को सांस्कृतिक इकाइयों के आधार पर गठित किया और इस तरह गठित उन सामाजिक समूहों के स्वतन्त्र विकास की इच्छा ने राजनीतिक रूप ग्रहण कर राष्ट्रवाद के विकास या छोटी छोटी राष्ट्रीय इकाइयों के गठन का मार्ग पकड़ा । इसी तरह यूरोप की सांस्कृतिक एकता और उसके राष्ट्रों की स्वतन्त्रता के माडल का विकास हुआ । भारत में मराठा, सिख आदि राष्ट्रों के गठन की यह प्रक्रिया शुरू ही हुई थी कि अंग्रेजों ने इसमें हस्तक्षेप किया और वह आधुनिक दमनकारी केन्द्रीकृत राज्यतन्त्र निर्मित किया जो ऊपर से एकीकरण की विचारधारा पर टिका हुआ था । इसी विचारधारा की धारावाहिकता चालीस वर्षों के शान्त कांग्रेसी शासन के दौरान बनी रही । इस विचारधारा की जड़ें कितनी गहरी हैं इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अनेक बुद्धिजीवी कांग्रेस विरोध के बावजूद राष्ट्रीय एकता के कांग्रेसी संस्करण को ही स्वीकार करते हैं । संघीयता की यह धारा एक समान गति से आगे नहीं बढ़ी, बल्कि पिछले तीसेक सालों में अनेक उतार चढ़ावों से गुजरते हुए इसकी धारावाहिकता बनी रही है ।

इसके अलावा कुछ और घटनाओं- परिघटनाओं की ओर मैं आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ । सती कांड के सर्वव्यापी विरोध से जो स्त्री उभार दिखाई पड़ा था, वह परिपक्व होकर अब एक धारा का रूप ले चुका है । इसी तरह रिडल्स आफ़ हिन्दुइज्म प्रकरण से दलित चेतना का उभार दिखाई पड़ा था । उसकी भी निरन्तरता बनी हुई है । भारतीय राज्य के सांप्रदायिकीकरण के चलते मुस्लिम समुदाय में राज्यतन्त्र विरोधी चेतना पैदा हुई । बाबरी मस्जिद के टूटने और बाद में न्यायालयी फ़ैसले के जरिए उसको वैधता मिलने से वह और बढ़ी है । किसानों की शक्ति का जो उभार फ़ार्मर आंदोलन में दिखाई पड़ा था वह अब भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों की देशव्यापी लहर का रूप ले चुका है । ये सभी अलग थलग चीजें नहीं, बल्कि अस्सी के दशक में शुरू हुए उदारीकरण के आगे बढ़ने के साथ साथ ही एक बड़े सामाजिक उत्तर की तरह बढ़ती रही हैं ।