Saturday, March 7, 2026

कोमिंटर्न की तीसरी कांग्रेस की पृष्ठभूमि

 

                                  

2015 में ब्रिल से जान रिडेल के संपादन और अनुवाद मेंटु द मासेज: प्रोसीडिंग्स आफ़ द थर्ड कांग्रेस आफ़ द कम्युनिस्ट इंटरनेशनल, 1921’ का प्रकाशन हुआ । यह कांग्रेस 22 जून से 12 जुलाई तक मास्को में चली थी । इसने दुनिया भर के अपने समर्थकों को जनता के पास जाने का संदेश दिया था । पूंजी की ताकत को तोड़ने के लिए सर्वहारा की बहुसंख्या का कम्युनिस्ट समाज के लिए बड़े पैमाने पर उठ खड़ा होना जरूरी समझा गया । इस काम को कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में होना था क्योंकि वे सर्वहारा वर्ग के संघर्षों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी रहती हैं । उस समय यूरोप की राजनीतिक हालत में भारी बदलाव नजर आ रहा था । अब उथल पुथल के समय की जगह ऐसा समय था जब समाजवादी क्रांति की सम्भावना टल गयी थी । ऐसे समय के लिए कोमिंटर्न ने उपरोक्त नीति सूत्रबद्ध की थी । उस समय क्रांति की योजना जरूरी थी क्योंकि क्रांति तत्काल की कार्यसूची से दूर हो गयी थी और मजदूर वर्ग भी संगठित होने के बावजूद रक्षात्मक मुद्रा में था । इस बदलाव के बारे में सदस्यों में मतभिन्नता थी । 55 देशों से 600 से अधिक प्रतिनिधि इस कांग्रेस में आये थे और उनमें भी इस सवाल पर अनिश्चितता थी । उनमें से ज्यादातर लोगों की राय उससे अलग थी जो आखिरकार मानी गयी । किताब में शामिल तीन सप्ताह की बहसों को देखने से इस वैश्विक आंदोलन की जटिलता का अंदाजा लगता है । इन बहसों में जो भी सवाल उठे वे अब भी महत्वपूर्ण लगते हैं । 

कांग्रेस में अनेक किस्म के विचार थे लेकिन अंत में उनमें से दो विकल्पों के बीच सबकी राय आ गयी । वामपंथी रुख के समर्थकों का मानना था कि कम्युनिस्ट अल्पमत में होने के बावजूद साहसिक पहलकदमी से मजदूरों को गोलबंद कर सकते हैं । कांग्रेस में रणनीति और कार्यनीति के सिलसिले में जो प्रस्ताव पेश हुआ उसमें संशोधन हेतु जो प्रस्ताव आये उनमें यह रुख सबसे अधिक प्रकट हुआ । दूसरी ओर लेनिन के समर्थन से दक्षिणपंथी रुख मौजूद था जिसके मुताबिक मजदूर वर्ग के रोज रोज के संघर्षों में जड़ जमाकर ही कम्युनिस्ट क्रांति की ओर कदम बढ़ा सकते हैं । आखिरकार कांग्रेस ने आगे के लिए जिस रणनीति को अपनाने का फैसला किया उससे इस सदी में भी क्रांतिकारी ताकतों को दिशाबोधक रोशनी मिल सकती है । रिडेल ने इस कांग्रेस की विरासत को सूत्रबद्ध करते हुए बताया है कि

1 मजदूरों के बहुमत को कम्युनिज्म के पक्ष में लाने के लिए उनके रोज रोज के संघर्ष में शामिल होने की रणनीति अपनायी गयी । जनता की ओर के नारे में इसे व्यक्त किया गया और क्लारा जेटकिन ने लेनिन के शब्द लेकर कहा कि सत्ता पर विजय हासिल करने की पूर्वशर्त जनता को अपने पक्ष में जीत लेना है ।

2 सर्वहारा के संघर्ष के साझा मोर्चे में पूंजीवाद विरोधी विविध ताकतों को जोड़ने का अभियान चलाया गया । छह महीने बाद इस रुख को विस्तारित करते हुए मजदूर आंदोलन की गैर क्रांतिकारी ताकतों को भी लेकर संयुक्त मोर्चा बनाने की नीति ली गयी ।

3 अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में संक्रमणकालीन मांगों को शामिल किया गया । ये ऐसी मांगें थीं जो पूंजीवादी संपत्ति के अधिकार और सत्ता पर हमला करती थीं । समग्रता में देखने पर ये मांगें पूंजीपति वर्ग की ताकत को कमजोर करती थीं, सर्वहारा को संगठित करती थीं और सर्वहारा की तानाशाही हेतु संघर्ष के विभिन्न चरणों को अलगाती थीं ।

4 इसका विश्लेषण किया गया कि पूंजीवादी अर्थतंत्र में उतार चढ़ाव किस तरह पूंजीवाद विरोधी चेतना को प्रोत्साहित करते हैं । इनसे पूंजीवाद के खात्मे की उम्मीद पैदा होती है ।

5 तीखे मतविरोध और ढेर सारी गलतियों के बावजूद खुली बहस और समझौते की भावना से कोमिंटर्न से जुड़ी विभिन्न ताकतों के बीच सैद्धांतिक एकता हासिल की गयी ।

किताब में जो दस्तावेज हैं उनमें बहस और प्रस्ताव तो हैं ही, कार्यकारिणी, आयोग और विशेष बैठकों का ब्योरा भी है जो कांग्रेस से पहले और कांग्रेस के दौरान भी होती रहीं । इन्हें बत्तीस दस्तावेजों के रूप में रखा गया है जो अंग्रेजी में पहली बार इस संग्रह में छप रहे हैं । कांग्रेस से पंद्रह महीने पहले की घटनाओं का भी जिक्र हुआ है जिनके कारण कांग्रेस में बहुत सारे विवाद हुए । रिडेल का मत है कि कोमिंटर्न की मार्च 1919 में स्थापना के साथ ही विवाद शुरू हो गये थे । 1920 के दौरान मजदूरों को जो अनुभव हुए उनके कारण अंतर्विरोध और भी तेज हुए । 1920 की जून-जुलाई में कोमिंटर्न की दूसरी कांग्रेस संपन्न हुई । इसके बाद करोड़ों क्रांतिकारी मजदूर इसमें शामिल हुए । बहुतेरे देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की सदस्यता में भारी बढ़ोत्तरी हुई । उसी दौरान इटली और जर्मनी में क्रांति के प्रयासों को धक्का लगा । इन दोनों ही देशों में मजदूर क्रांति के सबसे करीब थे । मजदूरों की क्रांतिकारिता में विश्वयुद्ध के बाद गिरावट नजर आ रही थी । इस हालत में अपनाये जाने वाले रुख के मामले में कम्युनिस्टों में मतभेद था । कुछ का कहना था कि जो भी ताकत बढ़ी है उसके बल पर धावा बोल देना चाहिए जबकि कुछ अन्य लोग क्रांति के उतार के लिहाज से नीति बनाना चाहते थे । कोमिंटर्न के नेतृत्व में भी यह मतभेद प्रकट हुआ ।

1920 में जर्मनी में सेना में एक विद्रोह हुआ । मजदूरों की उसके विरोध में गोलबंदी हुई । उसके प्रति कम्युनिस्टों के रुख को लेकर मतभेद उभरे । सेना के दक्षिणपंथी अफ़सरों ने बर्लिन पर कब्जा कर लिया और सामाजिक जनवादियों की सरकार से लड़ाई शुरू की और संवैधानिक शासन को मानने से इनकार कर दिया । इसके विरोध में जर्मनी के मजदूरों ने आम हड़ताल कर दी । सेना के विद्रोह को चार दिनों में दबा दिया गया लेकिन मजदूरों ने हड़ताल जारी रखी और दक्षिणपंथी हिंसा के विरुद्ध प्रभावी कदम उठाने की मांग की । हथियारबंद मजदूरों ने औद्योगिक इलाके समेत कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया । उनके विरोध में सेना ने कूच किया और जल्दी ही पूंजीवादी ताकतों ने हालात पर काबू कर लिया । मजदूरों को 1918 के बाद पहली बार इतना बेहतर मौका मिला था लेकिन वे इसका फायदा उठाने में नाकामयाब रहे । इस मामले में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की गलतियों की आलोचना हुई । एक, जब आम हड़ताल हुई तो केंद्रीय नेतृत्व ने शुरू में इसका समर्थन करने से इनकार किया । उनका तर्क था कि हड़ताली लोग दमनकारी बुर्जुआ सरकार का पक्ष ले रहे हैं । कुछ इलाकों में पार्टी ने मजदूर संगठनों के व्यापक मोर्चे में भाग लिया जिसमें पूंजीवाद समर्थक ताकतें भी थीं । एक समय पार्टी ने सभी मजदूर पार्टियों और ट्रेड यूनियनों की सरकार का सशर्त समर्थन करने का इरादा जाहिर किया । संघर्ष के अंतिम दौर में जब सेना ने औद्योगिक इलाके में मजदूरों का दमन करने के लिए हमला किया तो पार्टी ने जनसंहार बचाने और इलाके में शांति की खातिर समझौते का पक्ष लिया । जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के इस रुख की आलोचना कोमिंटर्न ने बड़े हिस्से ने की थी । कार्ल रादेक ने कहा कि पार्टी की शुरुआती हिचक और बाद में संयुक्त मजदूर सरकार का सशर्त समर्थन पार्टी की निष्क्रियता का सबूत है । हंगरी के बेला कुन ने मजदूर आंदोलन की सभी धाराओं के साथ एकता को प्रतिक्रांतिकारी कदम कहा । जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी में भी एकाधिक गुट बन गये । लेनिन ने मजदूरों की संयुक्त सरकार के बारे में रुख का 1920 की मई और जून में आलोचनात्मक समर्थन किया । बहरहाल इस कांग्रेस में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के रुख पर तो बहस नहीं हुई लेकिन अगली कांग्रेस में कोमिंटर्न के नेताओं ने पार्टी नेतृत्व के दक्षिणपंथी भटकाव और निष्क्रियता की जमकर आलोचना की । कोमिंटर्न की यह आलोचना पार्टी के भीतर की वामपंथी आलोचना के मेल में ही थी ।

इस सवाल पर भले बहस न हुई हो कोमिंटर्न की दूसरी कांग्रेस ने कार्यक्रम और सिद्धांत के मोर्चे पर जो फैसले लिये उनके आधार पर आगामी कांग्रेस की बहसें हुईं । यह कांग्रेस असल में कोमिंटर्न की बुनियाद डालने वाली साबित हुई । यह ऐसी पार्टियों का संघ बना जिनके दसियों हजार सदस्य थे और जिनकी जड़ें मजदूरों के संघर्ष में गहरे धंसी हुई थीं । इसके प्रतिनिधियों और अतिथियों में तमाम धाराओं के लोग हुआ करते थे । इनमें एशिया के क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों से लेकर पश्चिम के अराजकतावादियों और वामपंथी सामाजिक जनवादियों तक शामिल थे । 1919 की स्थापना कांग्रेस में कम्युनिस्ट पार्टियों की भूमिका के बारे में कोई बात नहीं हुई थी लेकिन इस कांग्रेस में पार्टी का निर्माण कोमिंटर्न की प्रमुख रणनीति माना गया । कम्युनिस्ट पार्टियों की भूमिका और प्रकृति, संसद और ट्रेड यूनियन चुनावों में भागीदारी, शोषण के विरुद्ध किसान संघर्ष तथा उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष पर जो बहसें तीसरी कांग्रेस में हुईं उनके बारे में प्रस्ताव इसी कांग्रेस में रखे गये थे । कोमिंटर्न की लोकप्रियता से उपजी चुनौती पर भी इस कांग्रेस में बहस हुई । इस लोकप्रियता के कारण इसमें ऐसे समूह भी शरीक हो रहे थे जिन पर दूसरे इंटरनेशनल के सिद्धांत और व्यवहार का गहरा असर था । इन पार्टियों पर पत्रकारों, सांसदों और अधिकारियों की पकड़ बहुत अधिक थी । ऐसी स्थिति में कोमिंटर्न ने दाखिले की इक्कीस शर्तें तय कीं ताकि तीखे वर्ग संघर्ष में कोमिंटर्न की पार्टियों को एकताबद्ध होकर फैसले लेने में आसानी हो । मजदूर आंदोलन में कम्युनिस्टों का वैचारिक और वास्तविक प्रभुत्व हासिल करने के लिहाज से रणनीति की नींव रखी गयी । इस कांग्रेस में युद्ध की वजह से विजय की आशा का भी माहौल था । इसके कारण जुझारूपन बढ़ाने का पक्ष मजबूत था । इस नीति का एक अन्य कारण पोलैंड और सोवियत संघ का युद्ध भी था ।

पोलैंड ने सोवियत संघ पर हमला करके यूक्रेन की राजधानी किएव पर कब्जा कर लिया । सोवियत सेना ने बदले में पोलैंड के बहुतेरे हिस्सों को कब्जे में ले लिया । इस कांग्रेस के दौरान ही सोवियत सेना वार्सा पहुंचने वाली थी तभी ब्रिटेन और फ़्रांस की सरकारों ने पोलैंड के शासकों को सैन्य सहायता देने की कोशिश की । यूरोप के मजदूर इस साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के विरोध में खड़े हो गये । इस कांग्रेस ने पोलैंड के पूंजीवादी शासन को खत्म कर मजदूरों और किसानों के स्वतंत्र गणतंत्र की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया । लेनिन इस युद्ध में जीत को लेकर आश्वस्त थे । उम्मीद यह भी थी कि वार्सा पर कब्जा होते ही जर्मनी जीत लेने के लिए कुछ करने की जरूरत ही नहीं रहेगी । इस आशा का भी योगदान कांग्रेस के हमलावर रुख के प्रस्ताव में निहित था । कांग्रेस स्थगित हुई और उसके कुछ ही सप्ताह बाद सोवियत सेना को अपनी सीमा पर वापस लौटना पड़ा था । संधि हुई और सात साल से जारी युद्ध का अंत हुआ । बहरहाल इस युद्ध ने जो माहौल बनाया उसमें तीसरी कांग्रेस से पहले दुस्साहसवादी आक्रामकता की नीति के पक्षधर लोग आगे आये ।                                         

इस कांग्रेस के स्थगन के तीन सप्ताह बाद कोमिंटर्न ने अजरबैजान के बाकू में एक कांग्रेस का आयोजन किया जिसमें एशिया में राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लड़ने वाले शामिल हुए । इसमें शामिल 37 देशों के 2050 प्रतिनिधियों में से तिहाई लोगों का कम्युनिस्ट आंदोलन से संबंध नहीं रहा था । पोलैंड युद्ध से उपजी आशा की गूंज इस कांग्रेस के विभिन्न अधिवेशनों में कायम रही । जिनोव्येव ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का प्रतिनिधियों से आवाहन किया । उनके आवाहन से प्रतिनिधियों में उत्साह की लहर दौड़ गयी और सभा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी । उधर मध्य एशिया में भी साम्राज्यवादी युद्ध समाप्ति की ओर थे । अगले दो सालों में ब्रिटेन ने अपनी सेनाओं को इस इलाके से हटा लिया । 16 मार्च 2021 को सोवियत संघ और ब्रिटेन ने संधि की जिससे सोवियत संघ की साम्राज्यवादी घेरेबंदी में दरार पड़ी । रूसी साम्राज्य के एशियाई इलाकों में लाल सेना की मदद से आजादी हासिल हुई । इसके बावजूद आजाद हुए ये देश अपनी सीमाओं के बाहर औपनिवेशिक और अर्ध औपनिवेशिक प्रभुत्व पर हमला करने में सक्षम नहीं थे । बाकू कांग्रेस को इसलिए जाना जाता है कि इसने एशिया भर में कम्युनिस्ट आंदोलन को फैलाने की प्रेरणा दी । पश्चिम और पूरब के देशों को अहसास हुआ कि पूरब की जनता पूंजीवाद विरोधी विश्व आंदोलन में ताकत के साथ अपनी भूमिका निभा सकती है ।

एक अन्य घटना भी ध्यान देने लायक है । बाकू कांग्रेस के दौरान ही इटली में मजदूरों ने कारखानों पर कब्जा कर लिया और कौंसिलों के अधीन उत्पादन का काम शुरू हुआ । इसकी शुरुआत धातु उद्योग से हुई और जल्दी ही रेल तथा अन्य उद्योग इसकी चपेट में आ गये । देहात में भी इसकी लहर फैली और समूचा देश क्रांति के मुहाने पर आ गया । बहरहाल समाजवाद समर्थक ट्रेड यूनियनों के संघ ने इसे तात्कालिक यूनियन लक्ष्य के लिए संघर्ष से अधिक कुछ नहीं माना और कोमिंटर्न की इटली शाखा ने भी उन्हें इससे आगे ले जाने से इनकार कर दिया । पार्टी और यूनियन के नेताओं ने संघर्ष को तेज करने या व्यापक मांगों से जोड़ने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया । सरकार ने वेतन बढ़ाकर और मजदूरों के नियंत्रण का झूठा आश्वासन देकर इस आंदोलन का शमन कर दिया । इससे वहां की क्रांतिकारी ताकतों को भारी धक्का लगा । समाजवादी पार्टी इसलिए विफल रही क्योंकि उसका सोच और व्यवहार 1914 के पहले के समाजवाद से बंधा हुआ था । क्रांतिकारियों को महसूस हुआ कि क्रांति के लिए नये तरह की पार्टी की जरूरत है । संबद्धता हेतु बनायी गयी इक्कीस शर्तों और दूसरी कांग्रेस के अन्य फैसलों में ऐसी ही पार्टी की कल्पना उन्हें नजर आयी । इस प्रस्तावित क्रांतिकारी पार्टी को अनुशासित विश्व आंदोलन के साथ एकरूप होना था । समाजवादी पार्टी के वाम धड़े ने सुधारवादियों को पार्टी से निकालने की मांग की । उनका कहना था कि इनकी वजह से पार्टी मरणासन्न हो गयी है । समाजवादी पार्टी के सुधारवादी इक्कीस शर्तों को इटली में लागू करने में लगातार टाल मटोल करते रहे । कोमिंटर्न ने अपनी शर्तों को तत्काल लागू करने पर जोर दिया और इटली के समाजवादियों के साथ अपनी बहस को विभिन्न भाषाओं में छाप दिया । जल्दी ही इटली की समाजवादी पार्टी में बोर्दिगा के नेतृत्व में वामपंथी धड़ा खड़ा हो गया । इनके ही साथ ग्राम्शी भी आकर मिल गये । उन्हें कोमिंटर्न के फैसलों का ऊपरी मन से समर्थन करने वाले एक गुट से भी दूरी बनानी पड़ी । इस क्रांतिकारी नेतृत्व ने नीचे की शाखाओं और इकाइयों में सदस्य भरती किये और अपने प्रकाशन शुरू किये ।

दूसरी कांग्रेस के बाद के साल जर्मनी, फ़्रांस और चेकोस्लोवाकिया की पार्टियों ने कोमिंटर्न की सदस्यता ग्रहण की जबकि इटली की पार्टी ने उसका साथ छोड़ा । इन घटनाओं की प्रमुखता तीसरी कांग्रेस की बहसों में रही । जर्मनी की पार्टी द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध में जब अपने देश की सरकार का समर्थन किया गया तो उनसे अलग होने वालों ने नयी पार्टी बनायी । इस पार्टी ने मजदूर संघर्षों में सक्रिय भाग लिया, इक्कीस शर्तों का समर्थन किया और कोमिंटर्न की सदस्यता ली । इसी तरह फ़्रांस में भी सोशलिस्ट पार्टी के भीतर का वाम धड़ा मजबूत हुआ और पूरी की पूरी पार्टी कोमिंटर्न के साथ आ गयी । पार्टी के नेता और अखबार पुराने ही रहे । इटली की सोशलिस्ट पार्टी में इक्कीस शर्तों के सवाल पर तीन तरह की राय थी । उनके बीच मतविभाजन होने पर कम्युनिस्ट समूह अलग हो गया और उसने इटली की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की । कोमिंटर्न ने इसे मान्यता दे दी लेकिन शेष समूह भी कोमिंटर्न में दाखिले का प्रयास करते रहे और तीसरी कांग्रेस से कम्युनिस्ट समूह के निष्काषन की बात पर विचार करने का अनुरोध किया । बहरहाल इस आपसी उठापटक से कम्युनिस्ट समूह और कोमिंटर्न को भारी नुकसान हुआ और मजदूरों के बीच उनकी सदस्यता और समर्थन में भारी गिरावट आयी । इसने इटली में फ़ासीवादी ताकतों के उत्थान के लिए खाली जगह भी मुहैया की । फ़ासीवादी हमले एकतरफा गृहयुद्ध की तरह जारी थे । मजदूरों और किसानों के संगठनों को तोड़ा जा रहा था, समाजवादी नगर प्रशासन को समाप्त किया जा रहा था और समाजवादी तथा कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की खुलेआम हत्या हो रही थी । आर्थिक गिरावट के कारण भारी बेरोजगारी थी । इसके बावजूद मजदूरों ने स्थानीय स्तर पर हड़तालें कीं और फ़ासीवाद विरोधी मोर्चे में शामिल हुए । फ़ासीवादी गिरोहों को पूंजीपतियों से धन मिल रहा था, वे पेशेवर अपराधी थे और पुलिस तथा सेना का उन्हें समर्थन प्राप्त था । इसलिए बिखरे और स्वत:स्फूर्त प्रतिरोध के समक्ष वे भारी पड़ते थे ।

इस खतरे का मुकाबला करने में यूनियनें विफल साबित हुईं और समाजवादी उसी सरकार पर दबाव डालने की नीति पर चलते रहे जो फ़ासीवाद को प्रोत्साहित कर रही थी । कम्युनिस्टों ने खतरे को पहचाना और उनसे लड़ने के लिए इकाइयां बनायीं । दुर्भाग्य से वे इस खतरे का मुकाबला करने के लिए मजदूरों के भीतर की अन्य धाराओं के साथ एकता बनाने की कोशिश से चूक गये । बोर्दिगा ने बुर्जुआ कानूनी तंत्र को बचाने के नारे का विरोध किया क्योंकि वे उसे फ़ासीवाद का पर्याय मानते थे । कोमिंटर्न की तीसरी कांग्रेस के समय तक मजदूरों ने फ़ासीवाद के विरोध में स्वतंत्र संगठन बना लिया लेकिन इसके साथ समाजवादी और कम्युनिस्ट, दोनों नहीं थे । चेकोस्लोवाकिया की स्थिति बहुत खास थी । 1919 में इसका निर्माण वर्साइ संधि द्वारा चेक, जर्मन, स्लोवाकियाई और रूथेनियाई जनता को मिलाकर किया गया था । इन सबकी अलग अलग समाजवादी पार्टियां थीं । चेकोस्लोवाकिया की कम्युनिस्ट पार्टी इन सब पार्टियों का मिश्रण थी । इन सबको मिलाकर चालीस लाख की सदस्यता होती थी । 1920 में ही चेक डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी में क्रांतिकारी ताकतों का बहुमत हो गया । नतीजे के तौर पर दक्षिणपंथी समूह ने अलग समाजवादी पार्टी बना ली । वामपंथियों की कांग्रेस में दो तिहाई स्थानीय संगठनों ने प्रतिनिधि भेजे । कांग्रेस में मार्क्सवादी वाम को जबर्दस्त समर्थन मिला । यह समूह कोमिंटर्न का साथ तो दे रहा था लेकिन इक्कीस शर्तों के बारे में अलग राय रखता था और पहले के सामाजिक जनवादियों के साथ एकता कायम रखना चाहता था । दक्षिणपंथी समूह ने अलग कांग्रेस की और मूल पार्टी की निरंतरता का दावा किया । दोनों समूहों के बीच संपत्ति को लेकर मुकदमेबाजी शुरू हुई । दक्षिणपंथियों की ओर से पुलिस आयी और वामपंथियों से मुख्यालय खाली करा लिया । वामपंथी यूनियनों ने विरोध में हड़ताल की । एक सप्ताह बाद सेना के दमन से हड़ताल खत्म हुई । इस विफलता से क्रांतिकारी मजदूरों को पार्टी की नेतृत्व क्षमता पर भरोसा घटा । कोमिंटर्न की सदस्यता लेने की कोशिश के दौरान भी बहस जारी थी । शर्तों पर पार्टी नेतृत्व और सदस्यों ने मुहर लगायी और कोमिंटर्न की सदस्यता ली । इसके बाद भी जर्मन भाषी कम्युनिस्टों का एक समूह इस पार्टी का विरोध वामपंथी नजरिए से करता रहा ।

जिन भी देशों का जिक्र हुआ है उनकी वस्तुगत स्थितियों के बारे में बहस थी । मान तो सभी रहे थे कि यह समय क्रांतिकारी अग्रगति का है लेकिन उसकी निकटता के बारे में बहस थी । कुछ लोग मानते थे कि तत्काल हमले के मुकाबले मोर्चेबंदी के हालात पैदा हो गये हैं । इस मान्यता की आलोचना तीसरी कांग्रेस में रादेक ने की । जिन लोगों का ऐसा मानना था वे दुस्साहसिक कदमों के मुकाबले आम संघर्षों में जनता को ले आने के पक्ष में थे । चेकोस्लोवाकिया की इस बहस में हंगरी के कम्युनिस्ट भी शामिल हुए । हंगरी के निर्वासित नेतागण जर्मन भाषा के अखबारों में लिखा करते थे और जर्मन वामपंथ की प्रमुख आवाज थे । यही लोग कोमिंटर्न के भीतर भी वाम धारा की मुखर आवाज थे । दूसरी कांग्रेस के बाद कोमिंटर्न ने मास्को स्थित केंद्रीय कार्यकारिणी को मजबूत करना शुरू किया तो उसके लिए सदस्य पार्टियों से नेताओं की मांग की गयी । ये पार्टियां अपने नेताओं को मास्को भेजने में हिचक रही थीं । ऐसी स्थिति में हंगरी के निर्वासित नेता बहुत काम के निकले और कोमिंटर्न के रोज रोज के कामों में जिनोव्येव, बुखारिन और रादेक का साथ देने लगे ।

2021 की जनवरी में जर्मनी की पार्टी ने सभी मजदूर पार्टियों और यूनियनों के नाम खुला पत्र जारी किया जिसमें मजदूरों की आय कायम रखने, बुनियादी जरूरत की वस्तुओं की कीमतों पर अंकुश लगाने और भोजन की आपूर्ति सुरक्षित रखने जैसी मांगों पर मजदूर आंदोलन की सभी धाराओं को साथ लाने की अपील की गयी थी । यह पत्र स्टूटगार्ट की स्थानीय इकाई द्वारा गैर कम्युनिस्ट मजदूरों के भी साथ एकता बनाने की नीयत से तैयार किया गया था । यह पत्र संयुक्त मोर्चे की नीति की पहली झलक था जिसे कोमिंटर्न ने साल भर बाद अपना लिया । मजदूरों के सभी बड़े संगठनों के नेताओं ने पत्र को खारिज कर दिया लेकिन कम्युनिस्टों की इस अपील को इन संगठनों की कतारों में भरपूर समर्थन मिला । पार्टी के भी वामपंथी धड़ें ने इस पहल का विरोध किया और कोमिंटर्न की कार्यकारिणी के नेताओं ने भी इससे असहमति जाहिर की । लेनिन के हस्तक्षेप पर इस मामले को तीसरी कांग्रेस में बहस के लिए स्थगित कर दिया गया । इस मामले से कोमिंटर्न की कार्यपद्धति से उपजे अंतर्विरोध का पता चलता है । इस अंतर्विरोध का असर सदस्य पार्टियों पर भी पड़ा । जर्मनी तथा इटली के प्रसंग में कोमिंटर्न पर आरोप लगा कि उसका नेतृत्व सदस्य पार्टियों में फूट पैदा कर रहा है । कोमिंटर्न के नेताओं का तर्क था कि इन पार्टियों के भीतर क्रांतिकारी वामपंथ की मजबूती के कारण ये विभाजन हो रहे हैं । इस विवाद में जर्मनी की पार्टी के कुछ केंद्रीय कमेटी के सदस्यों ने इस्तीफा दिया और उनकी जगह ऐसे लोग नेतृत्व में आये जो साहसिक पहलकदमी के पक्ष में थे ।

जर्मनी की इन घटनाओं के बारे में तीसरी कांग्रेस में बहस हुई । नया नेतृत्व पार्टी को क्रांतिकारी राह पर ले जाने की कोशिश कर रहा था तभी कोमिंटर्न की कार्यकारिणी का एक प्रतिनिधिमंडल अचानक बर्लिन पहुंचा । इसमें बेला कुन के साथ दो अन्य साथी भी थे । ये सभी वामपंथी धड़े के थे । इनको भेजने की वजह का पता नहीं चलता लेकिन पार्टी के भीतर की जिन घटनाओं पर तीसरी कांग्रेस में बात हुई उन पर इनका असर था । संदेह किया जाता है कि जर्मन पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन के लिए ऐसा किया गया था लेकिन वह तो पहले ही हो चुका था । इसकी एक और भी वजह बतायी जाती है कि जर्मनी के मामले में कुछ ऐसे अंतर्राष्ट्रीय बदलाव आने जा रहे थे जिनका जायजा लेने के लिए ये लोग भेजे गये थे । जर्मनी के भारी उद्योगों के इलाके पर फ़्रांस कब्जा करने जा रहा था । बावेरिया की दक्षिणपंथी सरकार जिन हथियारबंद गिरोहों को संरक्षण दे रही थी उनसे हथियार लेने का दबाव मित्र राष्ट्रों का था । एक औद्योगिक इलाके पर कब्जे के लिए पोलैंड और जर्मन सिपाहियों के बीच टकराव हो रहा था जिससे दोनों देशों के बीच युद्ध भड़कने की आशंका पैदा हो गयी थी । एक अन्य व्याख्या के मुताबिक बेला कुन रूस का दबाव कम करना चाहते थे । पश्चिमी देशों में आंदोलन तेज होने से रूस को थोड़ी राहत मिलती । अगर जर्मनी की पार्टी सरकार को उखाड़ फेंकने के नारे के साथ सड़क पर उतर जाती तो बेहद अच्छा होता । जेटकिन ने भी इस मत की पुष्टि की है । हमलावर रुख अपनाने के पक्ष में नया वामपंथी नेतृत्व था ही इसलिए रूसी चाहत का उससे मेल हो गया । हालांकि कोमिंटर्न के तत्कालीन निर्देशों से इस तरह की किसी भी हरकत की भनक नहीं मिलती ।  

नये नेतृत्व ने जो हमलावर रुख अपनाया उसकी झलक क्षतिपूर्ति संकट पर उसके वक्तव्य से मिलती है । उसमें कहा गया कि मित्र राष्ट्रों की मांगों को मानने या न मानने से मजदूरों को कुछ भी हासिल नहीं होगा । बुर्जुआ सरकार को उखाड़ फेंकने की सीधी कार्यवाही से ही मदद मिल सकती है । केंद्रीय कमेटी की बैठक में अनुमान लगाया गया कि सरकार बाहरी और घरेलू टकरावों के बढ़ने से संकट में आने वाली है । ऐसे में मजदूरों की मांगों को पूरा करवाने के लिए बड़ी गोलबंदी की जरूरत है । सरकार द्वारा पार्टी के मजबूत गढ़ों पर पुलिस बल द्वारा दमन की खबर थी । ऐसे में आम हड़ताल के विकल्प पर कमेटी विचार कर रही थी । कोई निश्चित फैसला तो नहीं हुआ लेकिन बैठक में क्रांति हो जाने की उम्मीद जतायी जा रही थी । निष्क्रियता से बाहर निकलने का आवाहन मजदूरों से किया गया । हमलावर सरकारी ताकतों का मुंहतोड़ जवाब देने की आशा सर्वहारा से की गयी । असल में पार्टी के भीतर वामपंथी साथियों का एक ऐसा समूह बन गया था जो प्रकाशनों पर नियंत्रण रखता था और कुछ हद तक स्वतंत्र होकर काम करता था । इन लोगों ने राष्ट्रीय विद्रोह की तैयारी कर ली थी और केंद्रीय कमेटी को उस दिशा में धकेल रहे थे ।

आखिरकार क्रांतिकारी मजदूरों से हथियार छीनने के लिए सैन्य टुकड़ियों ने औद्योगिक इलाके में हमला किया । बहाना चोरी के दमन का बनाया गया । पुलिस ने पहले टकराव बचाने की कोशिश की इसलिए कोई झड़प नहीं हुई फिर भी पार्टी ने हड़ताल और बहिष्कार की नीति अपनायी और पूरे इलाके में इसका असर हुआ । एक जगह मजदूरों की उत्तेजक सभा हो रही थी और सभा के बाद नेताओं की गिरफ़्तारी के लिए पुलिस आयी । हथियारबंद टकराव शुरू हुआ और पुलिस तथा मजदूरों के बीच हिंसक टकराव दूसरे दिन भी जारी रहा । पार्टी नेताओं की उम्मीद के विपरीत विद्रोह औद्योगिक इलाके के बाहर नहीं फैला और दस दिन में सेना ने क्रूरता के साथ विद्रोह का दमन कर दिया । पार्टी ने बम धमाकों और अपहरण के जरिए विद्रोह को अन्य इलाकों में विस्तारित और तेज करने की योजना भी बनायी । केंद्रीय कमेटी का साथ नहीं मिला और तकनीकी साधनों की भी कमी थी इसलिए यह कोशिश नाकामयाब रही और आपसी विवाद बढ़ गये । एकाध और जगहों पर भी हिंसक झड़पें हुईं । सरकार ने आपात स्थिति की घोषणा करके तमाम पाबंदियां थोप दीं । अगले दिन समूचे जर्मनी में आम हड़ताल का आवाहन पार्टी ने किया । यह आवाहन युद्ध के खतरे और दमन तथा प्रतिक्रांति के सवाल पर होनी थी । मजदूरों पर हिंसक हमलों का अत्यंत संक्षेप में जिक्र था । बेरोजगारी दूर करने, मजदूरों और यूनियनों द्वारा उत्पादन के संगठन तथा सेना और हथियारों की आवाजाही पर रोक जैसी मांगें उठायी गयी थीं । दिन उचित नहीं था क्योंकि अगले दिन ईस्टर की छुट्टी थी । समाजवादियों ने हड़ताल का विरोध किया । पार्टी के प्रभाव वाले औद्योगिक इलाके में हड़ताल हुई । अन्य इलाकों में इसका मिला जुला असर रहा । कहीं कहीं हड़ताली मजदूरों और हड़ताल के विरोधियों में भी झड़पें हुईं । तीसरी कांग्रेस में भी इन आपसी झड़पों का जिक्र आया । हफ़्ते भर में हड़ताल की आधिकारिक वापसी कर ली गयी । इस कार्यवाही का दमन बहुत ही भयंकर तरीके से हुआ । छह हजार गिरफ़्तार हुए, चार हजार को जेल की सजा मिली, आठ को आजीवन कैद और चार को मौत की सजा दी गयी । पार्टी के डेढ़ सौ सदस्यों की हत्या हुई और हजारों क्रांतिकारी मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया गया । सामाजिक जनवादियों ने कम्युनिस्टों के इस दुस्साहस की निंदा की और उन्हें यूनियनों से निकाल बाहर किया । गैर कम्युनिस्ट मजदूरों में अविश्वास फैल गया और पार्टी की सदस्यता में बुरी तरह गिरावट आयी और वह पहले की आधी रह गयी । इसके बावजूद पार्टी के वाम धड़े ने इसे मजदूरों की सक्रियता के आदर्श के बतौर पेश किया और भविष्य में इस तरह की कार्यवाहियों की जरूरत बतायी । कम्युनिज्म के बारे में प्रचार को गहराने और फैलाने की जरूरत महसूस हुई । इसके तहत पार्टी ने पीड़ित मजदूरों के लिए मदद जुटाने तथा मई दिवस के कार्यक्रमों में व्यापक एकता बनाने की नीति अपनायी । समाजवादियों ने कम्युनिस्टों के विरुद्ध मार्क्स के लेखन का इस्तेमाल किया और बाकुनिन की उनकी आलोचना को जर्मनी के कम्युनिस्टों की आलोचना में बदल दिया । उन्होंने इसे कोमिंटर्न द्वारा दूसरे देशों में गड़बड़ी फैलाने का भी आरोप लगाया ।

इसके बाद रिडेल ने कोमिंटर्न के मुख्यालय में इन घटनाओं की प्रतिक्रिया का ब्योरा दिया है । शुरू में इन घटनाओं की सूचना मिलते ही बधाई दी गयी । कहा गया कि 1919 के बाद पहली बार शोषकों का शासन समाप्त करने के लिए जर्मनी के मजदूर लड़ रहे हैं । उन्हें आगे इसी तरह के संघर्षों की तैयारी का संदेश दिया गया । लेकिन लेनिन के एक पत्र में अलग तरह की राय मिलती है । पार्टी की कार्यवाही पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार करते हुए उन्होंने बेला कुन के अति वामपंथी रुझान का जिक्र किया । इसकी सीधी आलोचना की जगह उन्होंने कार्यकारिणी और आगामी कांग्रेस के भीतर बहस और सुधार करने का सुझाव दिया । जर्मनी की पार्टी ने केंद्रीय कमेटी की ओर से कांग्रेस की रिपोर्ट तैयार करते हुए रक्षात्मकता से आक्रामकता की ओर बढ़ने का स्वागत किया । उन्होंने कहा कि पार्टी की कार्यवाही में अनेक कमजोरियों के बावजूद यह कदम अतीत से आगे बढ़ा हुआ था और जनता का नेतृत्व हासिल करने के लिए जरूरी था ।                                                                                

उसी दौरान जिनोव्येव ने घोषित किया कि आगामी कांग्रेस का आयोजन तय समय से पहले किया जाएगा । इसका कारण इटली, जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया में उभरी दक्षिणपंथी प्रवृत्तियों का मुकाबला करना बताया गया । असल में कोमिंटर्न के रूसी नेताओं में भी मतभेद थे ।                                                                                   

                                                                                                                                                                                                     

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