2024
में ब्रिल से माइक ताबेर के संपादन में ‘द फ़ाउंडिंग आफ़ द रेड ट्रेड यूनियन
इंटरनेशनल: प्रोसीडिंग्स ऐंड रेजोल्यूशंस आफ़ द फ़र्स्ट कांग्रेस, 1921’ का प्रकाशन
हुआ । किताब में संपादकीय प्रस्तावना के अतिरिक्त इसके दस्तावेज संकलित किये गये
हैं । इस संगठन की एक ही कांग्रेस 1921 में मास्को में हो सकी । इसे प्रोफ़िंटर्न
भी कहा जाता है । इसका मकसद ट्रेड यूनियनों के विश्व आंदोलन को जन्म देना था ताकि
दसियों लाख मजदूरों के संघर्ष के आधार पर पूंजीवाद को खत्म करके सर्वहारा का शासन
स्थापित किया जा सके । शुरू के सालों में इस संगठन में दुनिया भर के आंदोलनों में
शामिल लोग जुड़े और अंतर्राष्ट्रीय वर्ग संघर्ष के लिहाज से इसका भारी महत्व भी बना
। कोमिंटर्न के भीतर यह सबसे बड़ा संगठन साबित हुआ । इसके इस महत्व के बावजूद
कोमिंटर्न के इतिहास के अध्येताओं की ओर से इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया ।
कुछ अध्येताओं ने तो इसके बारे में नकारात्मक बातें भी लिखीं । मसलन ज्योफ़्री
स्वेन के अनुसार मजदूर आंदोलन के इतिहास में इसका स्थान कभी पादटिप्पणी से अधिक
नहीं होगा । राबर्ट सर्विस ने भी कोमिंटर्न के इन सहायक संगठनों का कुछ खास असर
मंजूर नहीं किया । ई एच कार ने माना कि इसकी स्थापना बहुत उत्साह के साथ की गयी
लेकिन कोई प्रत्याशित नतीजा नहीं निकला । इसका इतिहास जिन लोगों ने लिखा उन्होंने
भी इसे कोमिंटर्न का परिशिष्ट ही माना । कोमिंटर्न के एक इतिहासकार ने इसके
निर्माण को उपयोगी नहीं माना । इसे विफल प्रयास भी कहा गया । इन सबसे इस संगठन के
अंतर्विरोधों को समझने में मदद मिलती है । केवल एक किताब में इस संगठन का संतुलित
मूल्यांकन हुआ है । इसमें इसकी खूबियों और खामियों का जिक्र करते हुए इसके विकास
के विभिन्न चरणों का वर्णन किया गया है । प्रस्तुत किताब में इसकी स्थापना
कांग्रेस के दस्तावेज संग्रहित हैं ताकि पाठक इसका स्वतंत्र मूल्यांकन कर सकें ।
साथ ही इस संग्रह का मकसद लेनिन के समय कोमिंटर्न की जीवंतता को भी पाठकों के
सामने प्रस्तुत करना है । उस समय दुनिया भर में इसके दसियों लाख सदस्य और समर्थक
थे । उस दौरान कोमिंटर्न ने अनेक सहायक संगठनों का निर्माण किया जिनका अपना
स्वतंत्र इतिहास है । उनकी खूबियां भी अपने किस्म की थीं और उनके नेता भी स्वतंत्र
व्यक्तित्व के स्वामी थे । इनकी स्वायत्तता और स्वतंत्र पहल हुआ करती थी ।
प्रोफ़िंटर्न भी इसी तरह का संगठन था । इन सहायक संगठनों का प्रभाव कोमिंटर्न की
विभिन्न देशों की शाखाओं से अलग भी हुआ करता था । इन संगठनों के इतिहास के सहारे
शुरुआती कोमिंटर्न को समझा जा सकता है ।
प्रथम
इंटरनेशनल में यूरोप और उत्तरी अमेरिका की मजदूर सभाओं और ट्रेड यूनियनों का
प्रतिनिधित्व था क्योंकि उस समय तक मजदूर वर्ग की राजनीतिक पार्टियों का व्यापक
उभार नहीं हुआ था । इसके कारण उसने वर्ग संघर्ष में ट्रेड यूनियनों को केंद्रीय
महत्व दिया था । ट्रेड यूनियनों को पूंजी और श्रम के बीच छापामार लड़ाई का साधन तो
माना ही गया, मजूरी श्रम और पूंजी की सत्ता वाली व्यवस्था से पार पाने की संगठित
शक्ति भी उन्हें कहा गया । मजदूर वर्ग की सम्पूर्ण मुक्ति के व्यापक हित में
मजदूरों के संगठन केंद्र के बतौर सचेत काम की अपेक्षा भी उनसे की गयी थी । इस
संगठन ने विभिन्न देशों के हड़ताली मजदूरों की मदद के लिए अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता
के ठोस अभियान संचालित किये । उनकी लड़ाई को मजबूती प्रदान करने के लिए बड़े पैमाने
पर आर्थिक मदद भी जुटाई गयी । इस तरह इसने मजदूर वर्ग की आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय
एकजुटता की शानदार परम्परा शुरू की । मार्क्स ने इस एकजुटता को ही इंटरनेशनल का
बुनियादी काम बताया था । उनका मानना था कि इस जीवनदायी सिद्धांत को दुनिया के सभी
देशों के मजदूरों में ठोस आधार प्रदान करने से वांछित उद्देश्य की प्राप्ति हो
सकती है ।
प्रथम
इंटरनेशनल का इतिहास मार्क्सवादियों और बाकुनिन के समर्थक अराजकतावादियों के बीच
निर्णायक संघर्ष के लिए भी महत्व का है । इस संघर्ष की वजह से दुनिया भर के मजदूर
आंदोलन में दरार पड़ गयी । इसमें एक ओर तो मार्क्सवादी लोग अनेक जगहों पर सामाजिक
जनवादी मजदूर पार्टियों और ट्रेड यूनियनों के निर्माण में लगे तो दूसरी ओर बाकुनिन
के समर्थक विभिन्न देशों में अराजक और संघाधिपत्यवादी राजनीति के हामी हुए । 1889
में दूसरे इंटरनेशनल की स्थापना के समय तक मजदूर और समाजवादी पार्टियों ने भरपूर
ताकत अर्जित कर ली थी । उनके साथ ही ट्रेड यूनियनों का भी विकास हुआ जिनके संघ भी
राष्ट्रीय स्तर पर संगठित हुए । दूसरे इंटरनेशनल ने मजदूर वर्ग की इन पार्टियों के
साथ ट्रेड यूनियनों को भी सदस्यता दी । 1901 में ट्रेड यूनियन केंद्रों के
अंतर्राष्ट्रीय सचिवालय का गठन हुआ । इसकी पहल जर्मनी की यूनियनों की थी । इसका
कारण था कि पार्टियों और यूनियनों का विकास स्वतंत्र रूप से हो रहा था । सचिवालय
को 1913 में इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियंस (इफ़्टू) कहा गया । इसके भीतर
वामपंथी लोगों की धारा भी थी जो सैन्यवाद तथा इसी तरह के अन्य सवालों पर राजनीतिक
अभियान चलाते थे । इसका गठन आपस में सूचना के आदान प्रदान के लिए किया गया था और
विश्व स्तर पर ट्रेड यूनियन कार्यवाही इसके कार्यक्रम का अंग नहीं थी फिर भी इसने
पार्टियों से अलग ट्रेड यूनियनों की स्वतंत्रता का दावा दूसरे इंटरनेशनल में मजबूत
किया । इसका कहना था कि सर्वहारा के मुक्ति संग्राम में पार्टी के समान ही
महत्वपूर्ण भूमिका यूनियन को भी निभानी है । इसके बावजूद ये दोनों संगठन अलग हैं ।
इनकी प्रकृति और सीमा की भिन्नता ही इनकी स्वतंत्र कार्यवाही का स्रोत है । इसके
बावजूद इस संघर्ष में ऐसा साझा इलाका बढ़ता जा रहा है जहां दोनों के समन्वय से लाभ
होगा । इस तरह पार्टी और ट्रेड यूनियनों के बीच सहकार विकसित होगा ।
जर्मनी
और ब्रिटेन की यूनियनें सबसे मजबूत थीं और उन्हें सुधारवादी कहा जाता है । वे पूंजीवादी
व्यवस्था के भीतर ही प्राप्य सुधारों के लिए संघर्ष करने तक के ही पक्ष में थीं । वे
ट्रेड यूनियन निष्पक्षता का प्रचार करती थीं । इसका मतलब था कि यूनियनों को व्यापक
राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों से दूरी बरतनी चाहिए तथा पगार या काम के हालात जैसे रोजमर्रा
के सवालों पर अधिक ध्यान देना चाहिए । राजनीति को राजनीतिक पार्टियों के लिए छोड़ देना
ये लोग सही समझते थे । इसी से अपने देश के नियोक्ता वर्ग के राष्ट्रीय हितों के साथ
खड़े होने की राह तैयार हुई । इस राष्ट्रवादी वैचारिक नजरिए के नतीजे प्रथम विश्वयुद्ध
में पूरी तरह सामने आये । इस युद्ध ने पूरी दुनिया में समाजवादी पार्टियों को राष्ट्रीय
आधार पर बांट दिया । इसी तरह ट्रेड यूनियन आंदोलन भी राष्ट्रीय विभाजन का शिकार हुआ
। जर्मनी,
फ़्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों
के मजदूर संघ अपने देशों की पूंजीवादी सरकारों के समर्थन में खड़े हो गये । उन्होंने
युद्ध प्रयासों के पक्ष में नागरिक शांति या पवित्र सहयोग की घोषणा कर दी । इसके
साथ ही दूसरे इंटरनेशनल का पतन हो गया और 1901 में स्थापित ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल
भी बिखर गया । इस रुख का विरोध जल्दी ही पार्टियों के साथ ट्रेड यूनियन में भी
प्रकट हुआ । 1915 में ज़िम्मरवाल्ड सम्मेलन ने युद्ध प्रयासों के समर्थन की नीति को
खारिज कर दिया । अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन को फिर से खड़ा करने की कोशिश होने
लगी ।
युद्ध
जब लम्बा खिंचने लगा तो उसके बोझ से मजदूर अपना विक्षोभ अधिकाधिक जाहिर करने लगे
और प्रतिरोध की घटनाओं में तेजी आयी । मजदूरों को इसमें यूनियन के नेताओं का सहयोग
नहीं मिला । इससे सचेत मजदूरों में पुरानी यूनियनों से नाता तोड़ने और नये
क्रांतिकारी मजदूर संगठन बनाने की प्रवृत्ति पैदा हुई । यूनियन अधिकारियों के
असहयोग के बावजूद मजदूरों के संघर्ष धीमे नहीं हुए । 1917-18 में युद्धरत देशों
में हड़तालों की लहर आयी । जुझारूपन का माहौल व्याप्त था । 1917 में रूसी क्रांति
की जीत से इस भाव को भड़का दिया । दुनिया भर के विद्रोही मजदूर अपनी सत्ता के सपने
से रोमांचित हो उठे । सभी जगहों पर लाखों मजदूर इन रूसी मजदूरों की राह पर चलने को
बेचैन हो गये । 1918 में विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ स्थिति बदल गयी । यूरोप में
देश दर देश क्रांति का उभार हुआ और बड़े वर्गीय टकराव फूट पड़े । एशिया, अफ़्रीका और
लैटिन अमेरिका में उपनिवेशवाद के विरुद्ध विद्रोह रोज रोज की बात हो चले ।
ऐसी
हालत में मजदूर ट्रेड यूनियनों में संगठित होने लगे क्योंकि ये उन्हें अपने
बुनियादी हितों की रक्षा का पहला साधन प्रतीत होती थीं । युद्ध से पहले दुनिया भर
की यूनियनों में जितने सदस्य थे उसके चार
गुना सदस्य युद्ध बीतने के बाद दर्ज किये गये । यूनियनों की ताकत बढ़ने के साथ ही
उनकी प्रभावी अंतर्राष्ट्रीय कार्यवाही की मांग होने लगी । रूसी यूनियनों ने आगे
आकर जुझारू वर्ग संघर्ष के आधार पर ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल के फिर से गठन की बात
शुरू की । 1918 में उन्होंने मास्को में एक विश्व ट्रेड यूनियन सम्मेलन आयोजित
करने का प्रस्ताव रखा लेकिन साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा रूस पर प्रतिबंध की वजह
से यह सम्मेलन न हो सका । इस बीच दूसरे इंटरनेशनल के ट्रेड यूनियन अधिकारी अपना
संगठन बनाने में जुटे । क्रांतिकारी उभार के मद्देनजर वे अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क
बनाना चाहते थे । 1919 में दूसरे इंटरनेशनल का पुनर्गठन हुआ और उसी के साथ
इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियन्स की स्थापना की गयी । एम्स्टर्डम में इसका
स्थापना सम्मेलन हुआ इसलिए इसे एम्स्टर्डम इंटरनेशनल भी कहा जाता है । इसने अपने
आपको ऐसे दबाव समूह के रूप में देखा जो अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों को लोकतांत्रिक
बनाये रखने के लिए कटिबद्ध थी । उसने कहा कि लीग आफ़ नेशंस को प्रतिक्रिया और
उत्पीड़न का केंद्र बनने से रोकने की जिम्मेदारी मजदूर वर्ग की है और इसके लिए
उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संगठित होकर लीग को नियंत्रित करने की ताकत हासिल
करनी होगी । इससे कुछ ऐसे भी श्रमिक संघ जुड़े थे जो इसके पहले से मौजूद रहे थे
इसलिए स्वतंत्र और समानांतर निकायों की तरह काम करते रहे ।
उस
समय के विश्व ट्रेड यूनियन आंदोलन में संघाधिपत्यवादी प्रवृत्ति भी काफी मजबूत थी
। इसके समर्थक अपने आपको बाकुनिन के अराजकतावाद से जोड़ते थे, दोनों एक दूसरे का
साथ देते थे लेकिन दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व भी था । स्पेन, फ़्रांस और इटली में
इनका बोलबाला था । कुछ यूरोपीय देशों के अतिरिक्त अमेरिका में भी इनकी यूनियनें
कार्यरत थीं । इनमें फ़्रांसिसी सबसे अधिक संगठित थे । इन लोगों का मानना था कि
वर्ग संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है तथा श्रम और पूंजी के बीच टकराव असमाधेय होता है
। पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूर वर्ग का शोषण भौतिक ही नहीं नैतिक भी होता है । वे
लोग राजनीति को यूनियन गतिविधि से बाहर की चीज मानते थे । यूनियन के सदस्य उसके
बाहर अपनी विचारधारा के अनुसार राजनीति करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन यूनियन में
वे अपने विचार नहीं थोप सकते । पूंजीवाद के उन्मूलन और समाज को फिर से बनाने के
लिए वे यूनियनों को प्राथमिक क्रांतिकारी औजार मानते थे । आंदोलन के सहारे यूनियन
मजदूरों की अवस्था में सुधार के उनके प्रयासों का समन्वय करती है । इनमें काम के घंटों
में कमी या वेतन की बढ़ोत्तरी आदि शामिल हैं । ये प्रयास ट्रेड यूनियन आंदोलन का एक
पहलू हैं । यह तो आम हड़ताल या जन उभार के जरिए सम्पूर्ण मुक्ति की तैयारी है । आज ट्रेड
यूनियन प्रतिरोध का औजार है लेकिन भविष्य में उत्पादन और वितरण की नयी व्यवस्था तथा
समाज के पुनर्गठन की बुनियाद होगा । उनके मुताबिक इसके लिए मजदूर वर्ग को नियोक्ताओं
के विरुद्ध सीधी कार्यवाही करनी होगी ।
इन
मान्यताओं के बावजूद ट्रेड यूनियन आंदोलन की मुख्य धारा में इन्होंने कभी विभाजन नहीं
पैदा किया । साथ रहते हुए भी वाम अल्पसंख्यक की तरह इनका स्वतंत्र अस्तित्व बना रहा
। इनका स्वतंत्र इंटरनेशनल बनाने के लिए जो सम्मेलन हुआ उसमें कोई आम सहमति न बन पाने
से सूचना ब्यूरो बनाने का ही फैसला हो सका । प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान इनके भीतर भी
वही फूट नजर आयी जो अन्य समाजवादी पार्टियों में नजर आयी थी । इनके फ़्रांसिसी नेतृत्व
ने तो फ़्रांस की सरकार का साथ उसके युद्ध प्रयासों में दिया लेकिन इनका युद्ध विरोधी
गुट ज़िम्मरवाल्ड आंदोलन के साथ गया । इसमें युद्ध समर्थक समाजवादियों के उन्मादी राष्ट्रवाद
का विरोध करने वाले शामिल थे ।
कोमिंटर्न
के नेताओं की योजना में रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल का गठन नहीं था । सांगठनिक रूप
से स्वतंत्र ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की धारणा बोल्शेविक नेताओं के दिमाग में नहीं थी
। अनेकानेक कारणों से इसकी स्थापना हुई । कम्युनिस्ट आंदोलन और रूसी क्रांति के साथ
सभी वामपंथी यूनियनों की सहानुभूति और संबद्धता बताने की जरूरत नहीं है । इस क्रांति
के चलते ही इंटरनेशनल फ़ेडरेशन आफ़ ट्रेड यूनियन्स के सभी घटक इसकी ओर खिंच आये । इसमें
शामिल इटली और स्पेन की यूनियनें
1919 में
कोमिंटर्न की स्थापना के साथ इसमें आने का प्रयास करने लगीं । उनके साथ कुछ अन्य
देशों की यूनियनें भी कोमिंटर्न की ओर आकर्षित हुईं । शुरू में महज कोमिंटर्न का
ट्रेड यूनियन विभाग खोलने की योजना थी । उसकी दूसरी कांग्रेस में इस आशय का
प्रस्ताव भी पारित हुआ । इसी दिशा में मास्को आने पर कुछ ट्रेड यूनियन नेताओं की
अनौपचारिक बैठकें और मंत्रणा भी होती रही । इसी क्रम में सात देशों के ट्रेड
यूनियन आंदोलन के प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षरित एक घोषणा भी 15 जुलाई 1920 को
जारी की गयी जिसमें रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल बनाने का प्रस्ताव था । कोमिंटर्न
के साथ इस प्रस्तावित निकाय के सांगठनिक संबंध के बारे में स्पष्टता नहीं थी
।
संघाधिपत्यवादी
यूनियनों ने 1020 के अंत में बर्लिन में एक सम्मेलन किया जिसमें रेड ट्रेड यूनियन
इंटरनेशनल की स्थापना कांग्रेस में शामिल होने का फैसला तो हुआ लेकिन कोमिंटर्न के
साथ मतभेद भी खुलकर जाहिर किया गया । दूसरी ओर मास्को से यह अपील की गयी कि जुझारू
ट्रेड यूनियनें एम्सटर्डम इंटरनेशनल से नाता तोड़ लें और नये क्रांतिकारी केंद से
जुड़ें । इस विवाद को मास्को बनाम एम्सटर्डम भी कहा गया है । नये केंद्र की ओर
अधिकाधिक यूनियनों को जाते देखकर एम्सटर्डम केंद्र चिंतित हुआ और उसने बहुत सारे
मास्को समर्थक जुझारू वामपंथी यूनियनों को निष्काषित किया । 1920 की लंदन कांग्रेस
में एम्सटर्डम इंटरनेशनल ने ट्रेड यूनियन में किसी बाहरी केंद्र द्वारा अपनी
विचारधारा के अनुरूप युद्ध संबंधी रुख का प्रचार करने की निंदा की । मई 1921 में
उन्होंने फैसला कर लिया कि कोई भी ट्रेड यूनियन एक साथ दो इंटरनेशनलों से नहीं जुड़
सकता । इसका मतलब था कि मास्को केंद्र से जुड़े यूनियनों को एम्सटर्डम के इस केंद्र
को छोड़ना होगा । निष्काषन तेजी से होने लगे । खासकर जर्मनी में बहुत सारे
व्यक्तियों और स्थानीय यूनियनों को बाहर कर दिया गया । फ़्रांस में भी यही
प्रक्रिया चली जिसके चलते सुधारवादी और क्रांतिकारी यूनियनों ने अपने अपने केंद्र
चुन लिये । प्रचार किया जाता है कि कोमिंटर्न ने अपना ट्रेड यूनियन केंद्र स्थापित
करके मजदूर आंदोलन में दरार डाल दी लेकिन लेखक इसे पूरी तरह सच नहीं मानते ।
एम्स्टर्डम समूह से बाहर आने और रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल में शामिल होने की
अपील को ट्रेड यूनियन का विभाजन नहीं कहा जा सकता । इसकी जगह इस समूह ने ट्रेड
यूनियन एकता का पक्ष लिया । जिन्होंने इन लोगों को बाहर निकाला था उनका भी
इन्होंने साथ दिया और अपने समूह में उन्हें भी शामिल किया ।
इसे
लेखक ने रेड इंटरनेशनल आफ़ लेबर यूनियन्स कहा है । इन शब्दों का संक्षेप रीलू होता
है । रीलू के नेता सोलोमन ए लोज़ोव्सकी रहे । उनका असली नाम सोलोमन अब्रामोविच
द्रिद्ज़ो था । बोल्शेविक पार्टी में गोपनीयता के लिहाज से लोज़ोव्सकी अपनाना पड़ा ।
1908 से 1911 तक उन्होंने बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच एकता की भरपूर कोशिश
की । इसमें विफल रहने पर उन्होंने रूसी क्रांतिकारी आंदोलन से अपने को अलग कर लिया
। निर्वासित होकर वे पेरिस में रहे और फ़्रांसिसी मजदूर आंदोलन में सक्रिय रहे ।
रूसी निर्वासितों के बीच एकता की कोशिश भी वे इस दौरान करते रहे । क्रांति के बाद
रूस लौटकर बोल्शेविक पार्टी में वे शामिल हुए और पहले की तरह मजदूर आंदोलन में
सक्रिय हुए । क्रांति के बाद संयुक्त समाजवादी सरकार के गठन का उन्होंने प्रस्ताव
किया और नयी सरकार के कुछ कदमों की आलोचना की । उनको पार्टी से निकाल दिया गया और
1919 के अंत में ही फिर से दाखिला मिला । इस इतिहास के कारण वे रीलू के नेता पद की
पहली पसंद नहीं थे । शुरू में रूसी ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन के नेता तोम्सकी को रीलू
का महासचिव बनाने की योजना थी लेकिन कांग्रेस से कुछ ही समय पहले पार्टी के साथ
विरोध के कारण उन्हें मास्को से दूर भेज दिया गया था । वे कांग्रेस में भाग नहीं
ले सके इसलिए मजबूरी में लोज़ोव्सकी को नेता चुनना पड़ा । त्रोत्सकी ने बाद में लिखा
कि उन्हें इस पद पर अस्थायी बंदोबस्त के बतौर मंजूर किया गया था और पहला मौका
मिलते ही उनकी जगह किसी अन्य नेता को ले आना था ।
लोज़ोव्सकी
को विभिन्न भाषाओं का ज्ञान तो था ही, यूरोपीय मजदूर आंदोलन की गहरी जानकारी भी थी
इसलिए चुने जाने के बाद वे इस काम के लिए अपरिहार्य हो गये और उनका विकल्प कभी
खोजा नहीं जा सका । शुरू में वे स्तालिन के समर्थक रहे लेकिन बाद में 1949 में
उनकी गिरफ़्तारी हुई और 1952 में उन्हें गायब कर दिया गया । मुकदमे के दौरान
उन्होंने खुद को सही साबित करने का प्रयास किया और अपने साथियों का साथ हिम्मत से
दिया ।
रीलू
की स्थापना कांग्रेस 3 जुलाई 1921 को हुई । इसमें 41 देशों के 380 प्रतिनिधि शामिल
थे । कांग्रेस में कम्युनिस्टों का बहुमत था । अनेक देशों में वे ट्रेड यूनियनों
के नेता थे । जहां नेता नहीं थे वहां भी स्थापित यूनियनों में मजबूत अल्पसंख्यक
समूह थे । जहां उनका प्रभाव कम था वहां भी उन्हें महत्वपूर्ण समझा जाता था ।
कांग्रेस में खासकर स्पेन और फ़्रांस से संघधिपत्यवादी ताकतें भी थीं । फ़्रांस में
उन्हें निकाल दिया गया और उन्होंने स्वतंत्र यूनियन बना ली । इसके अतिरिक्त इटली,
अमेरिका और कनाडा से भी इस धारा की यूनियनों के नेता आये थे । इनके अलावे उनके
समर्थक व्यक्ति यूरोप के अन्य देशों से भी आये थे । एम्सटर्डम इंटरनेशनल से जुड़ी
दो यूनियनों का भी प्रतिनिधित्व कांग्रेस में हुआ । नार्वे की यूनियन के आधिकारिक
प्रतिनिधि मौजूद थे तो इटली से दो पर्यवेक्षक शामिल हुए थे । कुछ देशों के
प्रतिनिधिमंडल विभाजित थे । मसलन जर्मनी के प्रतिनिधिमंडल में बहुमत स्थानीय
यूनियनों की थी जिनके केंद्र में कम्युनिस्ट थे । उनके साथ कुछ प्रतिनिधि
संघाधिपत्यवादी यूनियनों के भी थे । इसी तरह फ़्रांसिसी प्रतिनिधिमंडल में कुछ लोग
कोमिंटर्न के साथ काम करने के पक्ष में थे तो कुछ उसका विरोध करते थे । इटली के
प्रतिनिधिमंडल में कम्युनिस्ट अल्पसंख्या में थे । उनके साथ आधिकारिक पर्यवेक्षक
भी महज सूचना हेतु आये हुए थे । अमेरिका और कनाडा के प्रतिनिधिमंडल में स्थानीय
यूनियनों में सक्रिय कम्युनिस्ट थे । इंडस्ट्रियल वर्कर्स आफ़ द वर्ल्ड ने आधिकारिक
प्रतिनिधिमंडल भेजा था जिसके सदस्यों ने कांग्रेस के सभी मुख्य फैसलों का विरोध
किया । इनके अतिरिक्त विलियम ज़ेड फ़ोस्टर थे जो यूनियन संघर्षों में तो शामिल रहते
थे लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं थे । इसी तरह कांग्रेस के प्रतिनिधियों
में अमेरिका के विलियम डी हेवुड और ब्रिटेन के टाम वुड जैसे मशहूर लोग थे । कहा जा
सकता है कि इस स्थापना कांग्रेस में विश्व ट्रेड यूनियन आंदोलन की विविध धाराओं का
प्रतिनिधित्व था । इसी वजह से इस कांग्रेस में खूब जीवंत बहसें हुईं । सबने खुलकर बोला और सबकी बातें ध्यान से
सुनी भी गयीं ।
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