Sunday, March 1, 2026

फ़ासीवाद का सिद्धांत और व्यवहार

 

                                      

                                                                             

1999 में प्लूटो प्रेस से डेव रेंटन की किताब ‘फ़ासिज्म: थियरी ऐंड प्रैक्टिस’ का प्रकाशन हुआ । किताब फ़ासीवाद को महज विचारों के क्षेत्र में देखने की प्रवृत्ति के विरोध में लिखी गई है । लेखक के मुताबिक कुछ चिंतक इटली में मुसोलिनी या जर्मनी में हिटलर के कारनामों को देखने की जगह फ़ासीवादी विचारकों के बौद्धिक विकास की मार्फ़त फ़ासीवाद को परिभाषित करते हैं । फ़ासीवादी आंदोलन की जगह फ़ासीवादी बौद्धिकों पर ध्यान केंद्रित करने के चलते ये चिंतक फ़ासीवाद के क्रांतिकारी पहलू पर अधिक जोर देते हैं और उसे थोड़ा सकारात्मक प्रवृत्ति के बतौर पेश करते हैं । अपने अध्ययन के लिए ये लोग फ़ासीवादी पार्टियों के आधिकारिक बयानों पर अधिक भरोसा करते हैं । 2020 में इसका नया संस्करण छपा । लेखक ने किताब का मकसद ही बताया है कि फ़ासीवाद की राजनीति के विध्वंसक होने की व्याख्या इसमें की गयी है । उसकी यह विध्वंसात्मकता आंदोलन के दौर में भी रहती है और सत्ता पर कब्जे के बाद बढ़ जाती है । इतिहास में ढेर सारे उदाहरण मिलते हैं जिसमें विध्वंसक पार्टियों की सरकार बन जाने के बाद वे नर्म हो जाते हैं लेकिन फ़ासीवादी सत्ता में आने के बाद और भी कट्टर हो जाते हैं । मजदूर, समाजवादी और उनके नस्ली दुश्मनों का जीवन उनके शासन के बाद वही नहीं रह जाता जो उसके पहले का होता है । लेखक का सवाल है कि ऐसा कैसे होता है । इसका उत्तर उन्हें ऐसे लेखकों से मिला जिन्होंने विश्वयुद्धों के बीच फ़ासीवाद की क्रूरता की सही भविष्यवाणी की थी । वे लोग चरम वामपंथी थे । फ़ासीवाद के असल में सबसे पुराने और अदम्य विरोधी इतालवी और जर्मन मार्क्सवादी थे । इन वामपंथियों के लेखों और भाषणों से फ़ासीवाद के बारे में सुसंगत सिद्धांत तैयार किया जा सकता है । फ़ासीवाद विचार होने की जगह संगठन और शासन था । जहां भी इसका उदय हुआ वहां इसकी राजनीति समान रही । इन लेखकों के मुताबिक फ़ासीवाद को विचारधारा की जगह खास तरह का प्रतिक्रियावादी जन आंदोलन समझना चाहिए । इनका यह भी कहना था कि चूंकि पारम्परिक दक्षिणपंथी राजनीति के मुकाबले फ़ासीवाद अपना जनाधार बनाता है इसलिए संकट के समय नये रंगरूट प्रशिक्षित करने की इसमें क्षमता होती है और ये रंगरूट मजदूरों, बेरोजगारों और युवकों में से आते हैं । आम तौर पर इन समूहों को वामपंथियों का समर्थक समझा जाता है । यही वजह है कि संख्या में कम होने के बावजूद उनकी वृद्धि तेजी से होती है । इसके कारण मार्क्सवादी मानते थे कि फ़ासीवादी विचारधारा के लक्ष्य और उसके सदस्यों की आकांक्षा में तनाव बना रहता है । यह अंतर्विरोध बहुतेरे नतीजों को जन्म देता है । उसके कारण किसी विरोधी पार्टी से वे पराजित हो सकते हैं या सत्ता में काबिज होने के बावजूद उनमें कट्टरता बढ़ सकती है । इसके ही कारण सत्ता में आने के बाद उनके रुख में नरमी की सम्भावना पूरी तरह खारिज हो जाती है ।

जब फ़ासीवाद की शुरुआत हुई तो शायद ही राजनीति की कोई अन्य धारा इससे सहमत हुई । इसके विरोधियों की तादाद सचमुच ही बहुत अधिक थी । उदारवादी, रूढ़िवादी, ईसाई, अराकतावादी, नारीवादी तथा अनगिनत अन्य इसके विरोध में थे । इनमें से किसी ने भी मार्क्सवादियों की तरह तेजी से हिंसा की फ़ासीवादी क्षमता को नहीं पहचाना । जब फ़ासीवादी जीते उस समय यूरोपीय वामपंथ में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचार ही हावी थे । राजनीति के बारे में उनके रुख का समर्थन लाखों लोग करते थे । मार्क्सवादी कोई अकेले नहीं थे, उनके साथ तमाम अन्य धाराओं के लोग भी थे । क्रांति में यकीन करने वाले इसकी ओर आकर्षित होते थे और जन विद्रोह के लिए ये प्रतिबद्ध रहते थे । उनसे अलग वे थे जो जन विद्रोह में तो यकीन नहीं करते थे लेकिन मजदूरों और अन्य निम्नवर्गीय समूहों के अधिकारों में क्रमिक प्रगति के सहारे बदलाव लाना चाहते थे । इनके भी समर्थक लाखों थे । इन दोनों के बीच भी बहुतेरे लोग सक्रिय रहा करते थे ।

बीसवीं सदी के अंत में मार्क्सवाद की यह हैसियत नहीं रह गयी । सामाजिक जनवादी राजनीति में दक्षिणपंथ की ओर झुकाव आया । बहुतेरे देशों में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन ढह गया और कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी अपने आपको भंग करना शुरू कर दिया । लेकिन जब फ़ासीवाद के उदय के समय पर ध्यान दें तो यह हालत अभी भविष्य के गर्भ में थी । इसलिए इस किताब में फ़ासीवाद की समझ और उसके मुकाबले के सिलसिले में मार्क्सवादी रुख का प्राधान्य मिलता है । क्लारा जेटकिन, त्रात्सकी और डैनिएल गुएरिन जैसे लोगों के बीच यही साझा रुख था । 1920 और 1930 के दशक में यूरोप में फ़ासीवाद का मुकाबला करने के मामले में इनकी भाषा समान थी और हिटलर के उदय का प्रतिरोध करने का उनका नजरिया भी साझा था । इन मार्क्सवादियों ने सबसे पहले फ़ासीवाद विरोध की नीति सूत्रबद्ध की ।

उनका मानना था कि फ़ासीवाद दक्षिणपंथी राजनीति का खास हिंसक और विध्वंसक रूप है । सामाजिक संकट के समय इसमें तेजी से बढ़ने की क्षमता है और अगर इसकी उपेक्षा की गयी तो जनता को संगठित करने की वामपंथी ताकत को यह नष्ट कर देगा । यह वंचितों और मजदूरों द्वारा व्यवस्था में बदलाव की मांगों को दसियों साल पीछे धकेल देगा । अगर यह आकलन सही है तो इसका सीधा मतलब विरोधियों द्वारा फ़ासीवाद का मुकाबला करना सबसे जरूरी काम बन जाता है । इसकी जरूरत तब भी सबसे अधिक रहती है जब भेदभाव के अन्य रूप व्यापक हों या दक्षिणपंथी राजनीति के अन्य रूप अधिक लोकप्रिय नजर आते हों । बहुत सम्भव है कि उस समय मजदूरों का शोषण हो रहा हो और नस्ल तथा लिंग के आधार पर भेदभाव भी बहुत हो । इसके बावजूद फ़ासीवाद नकारात्मक बदलाव का अनियंत्रित कारक होता है इसलिए आज जो कुछ सीमित नजर आ रहा है उसे वह सामान्य व्यवस्था का अंग बना दे सकता है । जनता की तकलीफ को वह भयानक स्तर पर ले जाने में सक्षम होता है । इसी तरह जहां भी फ़ासीवाद को शिकस्त दी जाती है वहां उत्पीड़न के अन्य रूप भी कमजोर पड़ जाते हैं । फ़ासीवाद के विरोध की इस नीति पर केवल मार्क्सवादी सहमत नहीं थे, उस समय तमाम अन्य लोग भी इस रुख से इत्तफ़ाक रखते थे ।

1920 दशक के मध्य में इतिहास में पहली बार इस रुख को किसी महत्वपूर्ण समूह ने अपनाया जब उस समय के मार्क्सवादियों ने इटली के बाहर फ़ासीवाद के खतरे के विरोध में अभियान चलाना शुरू किया । उन्होंने कहा कि मुसोलिनी ने अब जर्मनी समेत अन्य देशों के अपने अनुकर्ताओं को प्रेरित करना आरम्भ कर दिया है । जब यह चेतावनी पहली बार दी जा रही थी तो हिटलर महज क्षेत्रीय नेता था । उसे चुनावी सफलता बहुत कम मिली थी । फ़ासीवाद से लेकर रूढ़िवाद तक बहुतेरे नेताओं से उसे होड़ करनी पड़ रही थी । इन नेताओं के पास धन अधिक था, मीडिया में उनकी पहुंच बेहतर थी और अपने विरोधियों से हिंसक बदला लेने की स्वतंत्र व्यवस्था भी इनके पास थी । ऐसी हालत में हिटलर की तमाम कमजोरियों के बावजूद मार्क्सवादियों ने कहा कि जर्मनी के वामपंथ के समक्ष वही सबसे गम्भीर खतरा है । तब वे फ़ासीवाद की बढ़त और सत्ता पर उसके कब्जे की भविष्यवाणी कर रहे थे । जिन लोगों ने उस खतरे को पहचाना और उससे सावधान किया उनकी बात सुनी जानी चाहिए । उस समय यूरोपीय राजनीति में दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग की लगभग अन्य सभी ताकतें उनकी बातों को अनसुना कर रही थीं । लेखक को उम्मीद है कि आज के हालात में उनका रुख हमारे भी काम आ सकता है ।

किताब के पहले संस्करण में लेखक ने विस्तार से 1945 के बाद फ़ासीवाद के पुनर्जन्म की कहानी बतायी थी लेकिन इस संस्करण से उसे लगभग पूरी तरह हटा दिया है । हटाने की वजह यह नहीं कि लेखक फ़ासीवाद के पुनरुत्थान के खतरों से अनजान हैं बल्कि वे लम्बे समय से इस सवाल पर लिखते और सोचते रहे हैं । ढेर सारे पत्रकार और इतिहासकार इस समय के राजनेताओं को सख्त नापसंद करते हैं और फ़ासीवाद की फिर से याद करते हैं । जिन प्रक्रियाओं को वे अपने समय में खारिज कर रहे हैं उनकी प्रतिध्वनि उन्हें अतीत में सुनायी पड़ती है । इसके बावजूद लेखक को वर्तमान दक्षिणपंथ अनेक मामलों में फ़ासीवाद से फ़ासीवाद से अलग महसूस हो रहा है । लोभ होता है कि फ़ासीवाद को उसके दोयम लक्षणों के आधार पर परिभाषित किया जाए । मसलन मुसोलिनी द्वारा अपने विरोधियों की वास्तविक हत्या की जगह उनका मजाक उड़ाने की इच्छा और हिंसा की धमकी पर जोर दिया जाए या हिटलर के प्रसंग में मुक्त व्यापार की वैश्विक संस्थाओं के समक्ष कराधान और आर्थिक संरक्षण के पहलू को उभारा जाए । इससे बस यह होगा कि वर्तमान में जिन बातों को हम नापंसद करते हैं उनको ही फ़ासीवाद की विशेषता समझ लेंगे और इस तरह फ़ासीवाद की हमारी धारणा में उसकी क्रूरता मद्धम हो जाएगी ।

इस किताब में फ़ासीवाद के मार्क्सवादी सिद्धांत का विवेचन है । इसके बारे में माना जाता है कि फ़ासीवादी राजनीति का वह अखंड विश्लेषण है । इसके विपरीत लेखक का मानना है कि फ़ासीवाद का कोई एक ही मार्क्सवादी सिद्धांत नहीं है । लेखक ने कम से कम इसके तीन रूप देखे और निरूपित किये हैं । एक को लेखक ने फ़ासीवाद का वामपंथी सिद्धांत कहा है जिसमें फ़ासीवाद को पूंजी के हितों के पक्ष में प्रतिक्रांति का एक रूप मानकर उसका विश्लेषण किया जाता है । इस व्याख्या के पक्षधर लोग फ़ासीवादी प्रतिक्रांति की विशेषता की परीक्षा करने की जहमत नहीं उठाते । इटली और जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टियों ने फ़ासीवाद को प्रतिक्रांति के अनेक रूपों में से एक रूप माना । ऐसा करके उन्होंने अपने समर्थकों को निहत्था कर दिया । इसके कारण वे फ़ासीवादियों के विरोध में एकाग्र होकर संगठित होने से चूक गये । दूसरे सिद्धांत को लेखक ने फ़ासीवाद का दक्षिणपंथी सिद्धांत कहा है । इसमें फ़ासीवादी आंदोलन के मूलगामी जन चरित्र पर ही ध्यान दिया जाता है । इस व्याख्या के समर्थक मार्क्सवादी लोग फ़ासीवाद को मूलगामी, विचित्र और पूंजी के लिए खतरनाक समझते हैं । इसके विरोध में वे मध्यमार्गी और यहां तक कि दक्षिणपंथी राजनेताओं तक से गंठजोड़ बना लेते हैं । इस नजरिए को 1920 दशक में इटली और जर्मनी की समाजवादी पार्टियों ने और 1934 के बाद सारी दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपनाया । इसके कारण फ़ासीवाद की बढ़त के सामने वे भी कुछ नहीं कर सके ।

इन दोनों की जगह लेखक ने फ़ासीवाद का द्वंद्वात्मक सिद्धांत तलाशने का प्रयास किया है । इसके तहत फ़ासीवाद को प्रतिक्रांतिकारी विचारधारा के साथ जन आंदोलन भी माना गया है । यह ऐसी राजनीति है जो अविश्वसनीय तेजी के साथ बढ़ सकती और अकथनीय नुकसान कर सकती है लेकिन अगर इसके सामने लोकप्रिय विपक्ष खड़ा हो जाए तो इसकी बढ़त पर लगाम भी लगायी जा सकती है । इस तरह की चुनौती पेश आने पर यह अपने समर्थकों के सामने बदलाव लाने का चारा भी फेंकती है । लेखक का कहना है कि यही सिद्धांत फ़ासीवाद की सटीक समझ के करीब होने का दावा कर सकता है ।

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