2025
में फ़रार, स्त्रास ऐंड गीरू से जान कसीदी की किताब ‘कैपिटलिज्म ऐंड इट्स
क्रिटीक्स: ए हिस्ट्री फ़्राम द इनडस्ट्रियल रेवोल्यूशन टु एआइ’ का प्रकाशन हुआ । लेखक मानते हैं कि
इतिहास की सभी किताबों की तरह उनकी किताब भी अपने समय का उत्पाद है । इसका खयाल बर्नी
सांडर्स के चुनाव अभियान के समय आया था और आखिरी संपादन ट्रम्प की दूसरी जीत के बाद
हुआ । सांडर्स ने अमेरिकी अर्थतंत्र पर मुट्ठी भर खरबपतियों के कब्जे के विरुद्ध सामान्य
कामगारों के हित में उसके संचालन का वादा किया था । ट्रम्प तो खुद ही खरबपति है इसके
बावजूद उसने कामगारों की बात की और एक बार नहीं दो बार उसने ऐसा किया । अमेरिकी पूंजीवाद
से यह मोहभंग दीर्घकालीन परिघटना रही है । 2018 में देखा गया कि अठारह से उनतीस साल
के बीच की आबादी में पूंजीवाद के मुकाबले समाजवाद अधिक आकर्षण पैदा कर रहा था । ऐसा
केवल अमेरिका तक सीमित नहीं था । 2017 में ब्रिटेन में भी एक सर्वेक्षण में पूंजीवाद
से अधिक सद्गुण समाजवाद में लक्षित किये जा रहे थे । लेखक ने समकालीन पूंजीवाद के संक्षिप्त
इतिहास के रूप में अपनी किताब की कल्पना की थी । साथ ही उससे जुड़ी बहसों को भी इसमें
जगह मिलनी थी । समय सोवियत संघ के पतन से अब तक का होना था ।
जल्दी
ही उन्हें अंदाजा हुआ कि आधुनिक पूंजीवाद की जो भी आलोचना है उसकी जड़ ब्रिटेन में औद्योगिक
पूंजीवाद के उदय में है । चाहे सवाल इजारेदारी का हो या तकनीक के असर अथवा विषमता का
हो बहसें उसी समय शुरू हुई थीं । एडम स्मिथ मुनाफ़े की होड़ के विरोधी नहीं थे लेकिन
ईस्ट इंडिया कंपनी की औपनिवेशिक इजारेदारी के विरोध में थे । उन्हें लगा कि ये तो पुराने
धन्नासेठों की तरह काम कर रही है । इसी तरह जब कारखानों के औद्योगिक स्वरूप का उत्तरी
इंग्लैंड में विस्तार हुआ तो बहुतेरे दस्तकारों ने सूती मिलों और उनकी मशीनों को तोड़ा
क्योंकि वे उनकी आजीविका पर हमला कर रही थीं । तब उन्हें आधुनिकता का शत्रु कहकर खारिज
किया जाता था । अब कृत्रिम बुद्धि से अनगिनत रोजगार खत्म होने जा रहे हैं तो उन मशीन
तोड़कों की चिंता को समझा जा सकता है ।
उसी समय पूंजीवाद की एक और विशेषता सामने आयी थी कि अमीरी और गरीबी के बीच की खाई
बढ़ती जा रही थी । उसी समय बड़ी मछली द्वारा छोटी मछलियों को खाने का रूपक पूंजीवाद
को समझाने के लिए गढ़ा गया और गरीबी बढ़ने के साथ अमीरी बढ़ने के रिश्ते को भी पहचाना
गया था ।
इसी
वजह से लेखक ने परियोजना और विस्तारित किया । सब कुछ को समेटने की उम्मीद उन्हें
एकदम नहीं है । 1950 दशक में समाजवादी चिंतन का इतिहास जी डी एच कोल ने सात खंडों
में लिखा था । पूर्वजों वाले पहले खंड में ही पचास प्रमुख लोगों के बारे में लिखना
पड़ा था । लेखक को कम जगह में अपनी बात समेट लेने में इस तथ्य से मदद मिली कि
सदियों के दौरान पूंजीवाद पर लगे आरोपों में सुसंगति रही है । अक्सर इसे निर्मम,
शोषक, विषमताकारी, अस्थिर और विध्वंसक कहते हुए भी इसकी व्याप्ति और जीत की क्षमता
को मान लिया गया है । इसे अर्थतंत्र के साथ ही ऐसी विचारधारा भी स्वीकार किया गया
जो जीवन के साथ दिमाग पर भी कब्जा कर लेती है ।
पूंजीवाद
की आलोचना और प्रतिरोध का जायजा लेते हुए लेखक ने इस व्यवस्था की विविधता को भी
उजागर किया है । पूंजीवाद के स्वरूप में होने वाले बदलावों को दर्ज करने के बावजूद
लेखक ने इसे पूंजीवाद का इतिहास मानने से परहेज किया है । इसमें उत्पादन के
आंकड़ों, मजदूरी की दर और तकनीकी बदलावों पर भी बात की गयी है और इनके साथ राजनीतिक
इतिहास का भी जिक्र है इसके बावजूद केंद्र में लेखकों और आलोचकों का जीवन और लेखन
है । सिद्धांतों और विवेचनाओं पर बात करते हुए लेखक ने इस बात पर ध्यान दिया है कि
उन लेखकों के समय और माहौल में आसपास की दुनिया उनको कैसी महसूस होती थी । इस तरह
इस किताब में आलोचकों की निगाह से पूंजीवाद का इतिहास बताने की कोशिश है । जिन
आलोचकों की बात की गयी है उनमें अधिकतर अर्थशास्त्री रहे हैं लेकिन सभी नहीं । दो
तो समूह हैं- मशीन तोड़क और निर्भरता के सिद्धांतकार । निर्भरता के सिद्धांतकारों
ने 1950 और 1960 के दशक में उत्तर औपनिवेशिक देशों के विकास में अवरोधों पर जोर
दिया था । जिन व्यक्तियों का उल्लेख है उनमें से कुछ ने सामान्य शिक्षकों का जीवन
बिताया हालांकि उनके विचार सामान्य नहीं थे । अन्य लोग भद्र विद्वान, पत्रकार
लेखक, समाजवादी क्रांतिकारी और ऐसे अर्थशास्त्री थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय
संगठनों के लिए काम किया । उनमें से एक एंगेल्स ऐसे थे जो क्रांतिकारी होने के साथ
सूती मिल के पूंजीवादी मालिक भी थे । एक और एरिक विलियम्स थे जिनका जीवन इतिहासकार
के बतौर शुरू हुआ लेकिन बाद में अपने देश ट्रिनिदाद टोबैगो के प्रधानमंत्री बने ।
रोजा और रोबिन्सन के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों का भी जिक्र इस किताब में हुआ है ।
आयरलैंड की नारीवादी अन्ना ह्वीलर और फ़्रांसिसी लेखक फ़्लोरा त्रिस्तन ने पुरुष और
स्त्री के संयुक्त जनरल यूनियन के गठन का प्रस्ताव किया और कारखानों के स्त्री
कामगारों के उभार की बात की । एक अन्य स्त्री इतालवी लड़ाकू सिल्विया फ़ेदरीची थीं
जिन्होंने न्यू यार्क में घरेलू काम के पगार का सवाल उठाया । उन्होंने घरेलू काम
की बात की जिसके लिए तब तक कोई पगार नहीं मिलती थी और इसे स्त्रियों की जिम्मेदारी
समझा जाता था । उन्होंने बताया कि यह पगारविहीन श्रम पूंजीवादी कामगार के बने रहने
और पुनरुत्पादन के लिए जरूरी था । इसके बिना यह व्यवस्था चल ही नहीं सकती ।
पूंजीवाद
का इतिहास बताते समय होड़, तकनीक, उपनिवेशवाद या मुनाफ़ा आदि जैसी निर्वैयक्तिक
ताकतों का ही जिक्र होता है । इस पद्धति
के फायदे हैं, इससे उन व्यापक प्रवृत्तियों का पता चलता है जिन्होंने आधुनिक जीवन
को शक्ल दी है लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं । इससे फ़ासीवाद का उदय या समाजवाद का
पतन जैसी कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का होना आम तौर पर अपरिहार्य प्रतीत होगा । अलग अलग
समयों पर विभिन्न व्यक्तियों की आलोचना पर ध्यान देने से संयोग का भी अंदाजा लगेगा
। यह भी इतिहास का ही अंग होता है । इससे हम उन अवसरों और विचारों की झलक भी पाते
हैं जिनका अनुगमन नहीं हुआ या वैकल्पिक अर्थव्यवस्थाओं की कल्पना की सम्भावना भी
इनसे खुलेगी ।
उन्नीसवीं
सदी के पूर्वार्ध में पूंजीवाद के वामपंथी और दक्षिणपंथी आलोचक नैतिक तर्क देते थे
कि कारखाने ने मजदूरों को अमानवीय बना दिया है और लम्बे समय से स्थापित सामाजिक
ढर्रे को तोड़ दिया है । ब्रिटेन और फ़्रांस में समाजवाद सुनायी देता था लेकिन उस
समय इसका मतलब बहुत अलग हुआ करता था । आज उसे आम तौर पर पुनर्वितरण और सरकारी दखल
से जोड़कर देखा जाता है । शुरुआती समाजवादियों को सरकार में कोई यकीन नहीं था । वे
उसे ऊपरी लोगों की भ्रष्ट संस्था मानते थे । वे तो स्वशासी सहकारी समुदायों की
स्थापना करना जरूरी समझते थे जिनमें काम और उसकी पगार बराबरी के साथ तय होनी थी । शुरू
में ऐसे समुदायों की स्थापना की कोशिशें नाकामयाब रहीं तो मार्क्स ने इन्हें
काल्पनिक समाजवादी कहा । मार्क्स ने अपने शुरू के लेखन में माना कि औद्योगिक
पूंजीवाद ने मजदूरों को उनके स्व से अलगा दिया है लेकिन उनका मुख्य जोर इस
व्यवस्था की गति के नियमों की खोज और विश्लेषण पर रहा । उन्होंने इस व्यवस्था के
अंदरूनी अंतर्विरोधों पर ध्यान दिया और क्रांतिकारी ताकत के बतौर मजदूर वर्ग के
उभार को रेखांकित किया ।
उन्नीसवीं
सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में अमेरिका में विकराल औद्योगिक साम्राज्य
और उसके अनुरूप राजनीति को वेब्लेन ने निर्ममता के साथ विश्लेषित किया । उसी समय साम्राज्यवाद
का उदय हुआ जिसे लेनिन ने पूंजीवाद की चरम अवस्था कहा । रोजा ने कहा कि पूंजीवादी व्यवस्था
अपने जीवन के लिए प्राक पूंजीवादी समाजों को अपने भीतर समाहित करता है और उन्हें बरबाद
करता है । प्रथम विश्वयुद्ध को लेनिन और रोजा ने अपने सिद्धांतों के सबूत के बतौर देखा
। उन्हें उम्मीद थी कि इससे साम्राज्यवादी देशों में क्रांति की लहर उठेगी लेकिन उनकी
आशा पूरी नहीं हुई । केवल रूस में बोल्शेविकों ने सत्ता पर कब्जा किया और समाजवाद के
निर्माण के कठिन काम में लग गये ।
विश्वयुद्ध
का झटका तो पूंजीवाद ने बरदाश्त कर लिया लेकिन उसकी सबसे कड़ी परीक्षा होनी थी । महामंदी
के दौरान उत्पादन में घटोत्तरी आयी, बेरोजगारी आसमान छूने लगी और राजनीति में चरमपंथ
का बोलबाला हुआ । कार्ल पोलान्यी ने कहा कि अबाध पूंजीवाद से समाजवाद और फ़ासीवाद ही
पैदा हो सकते हैं ।
ऐसे सुधारक भी थे जिन्होंने कम क्रांतिकारी विकल्पों का पक्ष लिया । कीन्स ऐसे ही
एक सुधारक थे । वे मुक्त बाजार के समर्थक तो थे लेकिन उसकी आलोचना भी करते थे ।
उन्होंने अर्थतंत्र को मंदी से बाहर निकालने के लिए टैक्स के इस्तेमाल और सरकारी
व्यय की नीति की वकालत की । इसने सामाजिक बीमा के विस्तार और ब्रेटन वुड्स में
प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सुधारों के साथ मिलकर पूंजीवाद की कुछ समस्याओं
का तात्कालिक समाधान किया । सोवियत संघ के पतन तथा नवउदारवाद के आगमन के साथ वे समस्याएं
अब फिर लौट आयी हैं । इतिहास का अंत तो दो दशक ही चल सका । उसके बाद भयानक
पापुलिज्म ने उलटकर वार किया है ।
लेखक
ने पूंजीवाद के वैश्विक स्वरूप पर सर्वत्र बल दिया है । औद्योगिक पूंजीवाद में
बदलने से पहले से ही उसका यह स्वरूप स्पष्ट था । अमेरिका में ईस्ट इंडिया कंपनी के
जलपोतों ने बोस्टन टी पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । अमेरिकी उपनिवेशों
चाय आयात पर कंपनी के एकाधिकार ने अमेरिकी देशभक्तों को क्रोध दिलाया था लेकिन वह
तो उसके व्यापार का बहुत छोटा हिस्सा था । उसका व्यापार चार महाद्वीपों में फैला था
। औपनिवेशिक पूंजीवाद के दौर में समुद्रों के आरपार सबसे लाभदायक व्यापार तिहरा
लेनदेन का था । इसमें अफ़्रीका से लाखों लोगों को गुलाम बनाकर अमेरिका में काम करने
के लिए लाया जाता था । वे चीनी, कपास और तम्बाकू के बागानों में काम करते थे । यह
बात 1942 में एरिक विलियम्स ने अपनी किताब कैपिटलिज्म ऐंड स्लेवरी में कही कि
उपनिवेशवाद और गुलामों के व्यापार ने औद्योगिक पूंजीवाद के उदय का आधार तैयार किया
। इस बात पर उस समय बहुत गरमागरम बहसें हुई थीं । इसी तरह उपनिवेशवाद के आलोचक
भारतीय अर्थशास्त्री जे सी कुमारप्पा थे जिन्हें पारिस्थितिकीय अर्थशास्त्र का
अग्रदूत माना जा रहा है । इन दोनों ने विश्व पूंजीवादी व्यवस्था के केंद्र और
परिधि के आपसी रिश्ते में काफी रुचि ली थी । यही पहलू बाद में लैटिन अमेरिका के
निर्भरता के सिद्धांतकारों की रुचि का भी विषय बना । पूंजीवाद के वैश्विक स्वरूप
पर लगातार समीर अमीन ने भी लिखा और वैश्वीकरण की तीखी आलोचना की ।
वैश्विक
परिप्रेक्ष्य होने के बावजूद लेखक ने किताब की यूरोकेंद्रीयता को स्वीकार किया है
। इसे उन्होंने विश्व पूंजीवादी व्यवस्था का केंद्र कहा है । इसका कारण यह है कि
ब्रिटेन, जर्मनी और अमेरिका सबसे पहले औद्योगिक पूंजीवाद की ओर चले थे । इनके साथ
फ़्रांस भी शामिल हुआ और उनकी इस नयी व्यवस्था की व्यवस्थित विश्लेषणात्मक आलोचना
शुरू हुई । लेखक ने यह माना है कि बहुत सारे अन्य आलोचकों की बातों को वे जगह की
कमी के कारण शामिल नहीं कर सके हैं । एक तो वे समूचे युग को समेटने वाले लोगों का
जिक्र करना चाहते थे और दूसरे उनकी इच्छा कुछ कम प्रसिद्ध आलोचकों को जगह देने की
थी जिनकी आलोचना में कुछ खास नुक्ता मौजूद था ।
उनका
कहना है कि पूंजीवाद और उसके आलोचकों का यह एक इतिहास है एकमात्र इतिहास नहीं है ।
सभी जानते हैं कि पूंजीवाद की प्रकृति ही लगातार बदलने वाली है । उसके बदलाव के साथ
ही उसके आलोचक भी अपने को नया बनाते रहते हैं । इसके बावजूद उसके संकट की बात सभी लोग
उसकी शुरुआत से उठाते रहे हैं । औद्योगिक पूंजीवाद में उसके समृद्धि के दौर भी आये
हैं जब वह पूरी तरह विश्वविजयी लगता रहा और ऐसे दौर भी आये जब घबराहट और मंदी देखी
गयी । यह कोई अतिकथन नहीं होगा कि पूंजीवाद हमेशा संकटग्रस्त रहा है । एक संकट से निकलता
है तो दूसरे संकट में प्रवेश करने जा रहा होता है ।
इसके
बाद लेखक ने 1857 के वित्तीय संकट का जिक्र किया है ओहायो लाइफ़ इनश्योरेन्स ऐंड
ट्रस्ट कंपनी डूब गयी थी और इससे सट्टा बाजार में घबराहट फैल गयी थी । कंपनी में
जिनका पैसा जमा था वे अपना पैसा निकालने की जल्दी में थे तो दूसरे शहरों में भी
बैंक डूबने लगे । वित्तीय संस्थाओं में भगदड़ मच गयी और उनका भाव गिरकर जमीन पर आ
गया । समुद्र पारकर घबराहट पेरिस और लंदन जा पहुंची और वहां ब्याज की दर ऊपर भागने
लगी क्योंकि कर्ज की किल्लत पड़ गयी । लंदन में बैठे मार्क्स ने इस परिघटना को
उत्तेजक उत्सुकता के साथ देखा । उन्होंने एंगेल्स को लिखा कि इस अमेरिकी संकट की
घोषणा उन्होंने 1850 में ही कर दी थी । उनको उम्मीद थी कि फ़्रांसिसी उद्योग पर
इसका तत्काल असर पड़ेगा । वजह कि फ़्रांस में सिल्क के निर्माण में जितनी लागत आती
है उससे सस्ता सिल्क न्यू यार्क में बिक रहा है । लिवरपूल और ग्लासगो में एकाधिक
बैंक डूबे । एंगेल्स ने जवाब लिखा कि अमेरिकी मंदी जल्दी जाने वाली नहीं है ।
उन्होंने देखा कि कर्ज की किल्लत समूचे यूरोप में पैदा हो गयी है इसलिए वाणिज्य का
हाल आगामी तीन से चार साल तक सुधरने नहीं जा रहा है । मार्क्स और एंगेल्स ने
अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद के खात्मे की जो आशा पाली वह फलीभूत न हो सकी । सरकारों
ने हस्तक्षेप करके बैंकों को बचा लिया । अमेरिका में सोने के भंडार के सहारे
बैंकों में फिर से पूंजी डाली गयी ताकि मुद्रा और कर्ज की साख बनी रहे । ब्रिटेन
में बैंक आफ़ इंग्लैंड को मुद्रा छापने की इजाजत दी गयी । इससे मंदी तो दूर नहीं
हुई लेकिन वित्तीय बिखराव रुक गया । धीरे धीरे बैंक संभले, विश्वास लौटा और
अर्थतंत्र में फिर से जीवन पड़ा ।
लेखक
के मुताबिक विगत दो सौ सालों से यही कहानी नये नये रूपों में प्रकट होती रही है ।
इससे पूंजीवाद की अपने आपको दुरुस्त करने की ताकत का पता चलता है और उसके संकट
मोचक के बतौर सरकारों की क्षमता भी उजागर होती है । कुछ अर्थशास्त्रियों का यह भी
कहना है कि बारम्बार आने वाले इन संकटों के जरिए पूंजीवाद अपने आंतरिक
अंतर्विरोधों को हल करता है । इस तरह के लोगों में रूसी अर्थशास्त्री निकोलाइ
कोंद्रातिएव हैं जिनका मानना है कि पूंजीवाद का विकास पचास सालों की लम्बी अवधि
वाले ऐसे चक्रों से हुई है । इसी तरह के एक और आस्ट्रियाई सिद्धांतकार जोसेफ
शूमपीटर हैं जिनका रचनात्मक विध्वंस का सिद्धांत सिलिकान घाटी के कंप्यूटर उद्योग
का बहुत दुलारा सिद्धांत है ।
लेकिन
किताब में शामिल बहुतेरे आलोचक मानते हैं कि पूंजीवाद अपनी कुछ शाश्वत समस्याओं को
हल करने में अक्षम है । वह खुद द्वारा उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की खपत के लिए
आवश्यक मांग पैदा नहीं कर पाता । यहां तक कि जितना मुनाफ़ा और बचत होती है उसके लिए
भी निवेश के अवसर पैदा करने में वह सफल नहीं होता । मार्क्स, हाबसन, रोजा, कीन्स
और रोबिन्सन ने यही बात कही । कीन्स को छोड़कर शेष सभी लोगों ने पूंजीपति और मजदूर
में अर्थतंत्र के विभाजन को बुनियादी समस्या बताया । इससे एक वर्ग ऐसा हो जाता है
जिसे सामान्य जीवन चलाने लायक धन जुटाने में लगातार लगे रहना पड़ता है जबकि दूसरा
वर्ग इतना धन एकत्र कर लेता है कि उसको खर्च करने की चिंता में दुबला होता रहता है
। मार्क्स और उनके समर्थकों को आशा थी कि इस विभाजन से इतनी विषमता पैदा होगी,
सामाजिक खाई इतनी चौड़ी हो जाएगी कि मजदूर इस व्यवस्था को उखाड़ फेंकेंगे ।
उनका
कहना है कि पूंजी का प्रयोग तो बहुत पहले से धन संपदा के विभिन्न रूपों के लिए
होता रहा था लेकिन पूंजीवाद का इस्तेमाल उन्नीसवीं सदी के मध्य से निंदात्मक तौर
पर शुरू हुआ । 1850 में लुई ब्लांक ने पूंजीवाद के बारे में कहा कि बहुतों को
पूंजी से बेदखल करके कुछ लोगों द्वारा उसका अधिग्रहण ही यह व्यवस्था है ।
पूंजीवादी उत्पादन पद्धति की बात करते हुए मार्क्स ने मजदूरों द्वारा पैदा किये
हुए अतिरिक्त मूल्य पर जोर दिया लेकिन उनकी मान्यता भी लुई ब्लांक से मिलती जुलती
ही थी । इसके बाद इसका प्रयोग ऐसी बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के लिए होने लगा
जिसमें उत्पादन के साधन निजी पूंजीपतियों के पास होते हैं और वे प्रबंधकों तथा
मजदूरों को नियुक्त करते हैं । इसके बारे में विवाद है कि पूंजीवाद का जन्म कब हुआ
। लेखक ने इस मामले में जर्मन इतिहासकार जुर्गेन कोका की राय सही मानी है कि
व्यापारिक पूंजीवाद, प्लांटेशन
अर्थतंत्र और औद्योगिक पूंजीवाद एक ही व्यवस्था के विविध रूप हैं । इसका जन्म
पूंजी की व्यापक गोलबंदी और मुनाफ़े के लिए उत्पादन के दौर में हुआ । इसके लिए
सुरक्षित संपत्ति का अधिकार भी जरूरी था । इंग्लैंड में 1770 दशक में इसका जन्म
उन्होंने माना है ।
किताब में पूंजीवाद के जिन आलोचकों का जिक्र है उनके लेखन से लेखक ने भरपूर मदद ली है । उनके जीवन के सिलसिले में अन्य स्रोतों से सहायता ली है ताकि उनके विचारों के ऐतिहासिक संदर्भ साफ हों । यथास्थान उनका जिक्र कर दिया गया है । लेखक को मार्क्स की यह बात हमेशा याद रही कि दुनिया की व्याख्या करने से अधिक जरूरी उसे बदलना है । इसलिए वे पाठकों से आशा करते हैं कि आगामी पीढ़ियों समेत सबके लिए बेहतर भविष्य हेतु अर्थतंत्र को दुरुस्त करने की दिशा में वे सक्रिय हों तो लेखक का श्रम सार्थक होगा ।
No comments:
Post a Comment