Sunday, January 25, 2026

सत्ता में समाजवाद

 

                                   

                                                              

2023 में स्प्रिंगेर से रोलैंड बोअर की किताब सोशलिज्म इन पावर: आन द हिस्ट्री ऐंड थियरी आफ़ सोशलिस्ट गवर्नेन्सका प्रकाशन हुआ । सत्ता में समाजवादी पार्टियों को सौ साल से अधिक का सैद्धांतिक और व्यावहारिक अनुभव हो चुका है इसलिए उसके विश्लेषण की जरूरत आ गयी है । इसी मकसद से लेखक ने यह किताब लिखी है । इसको लिखने के क्रम में एंगेल्स द्वारा समाजवादी शासन के बारे में लिखे का विश्लेषण जरूरी लगा तो वह स्वतंत्र किताब हो गयी । फिर चीन के बारे में अलग से किताब लिखी गयी । इन दोनों के बाद ही इस किताब को पूरा किया । सैद्धांतिक दृष्टि के लिए लेखक ने मार्क्स और एंगेल्स के लेखन को आधार बनाया है और शुरू के दो अध्याय उनको समर्पित हैं । इसके बाद सोवियत संघ के अनुभव पर आगे के तीन अध्याय लिखे गये हैं । इसके बाद ही पूर्वी एशिया पर निगाह डाली गयी है । इसके तहत एक अध्याय उत्तरी कोरिया पर लिखा गया है । इसके बाद चीन के बारे में शेष अध्याय लिखे गये क्योंकि लेखक ने उसे इस मामले में सबसे आगे बढ़ा हुआ प्रयोग माना है । सर्वहारा क्रांतियों के उपरांत पैदा समाजवादी शासन जैसे शासन के रूप अब तक आजमाए नहीं गये हैं । यह रूप पश्चिम यूरोप के राष्ट्र राज्य से अलग किस्म का है । उपनिवेशों की स्थापना करने वाले साम्राज्यों से भी यह अलग है और इसका स्वरूप संघीय भी नहीं है । ऐसी स्थिति में शासन के इस विशेष स्वरूप की ही गवेषणा करने के उद्देश्य से यह किताब तैयार की गयी है । इस विषय पर अंग्रेजी में बहुत कम किताबों से मदद मिलने की आशा है ।

किताबों की इस कमी का कारण पश्चिमी उदारवादी नजरिये से समाजवादी विकास को देखने का पूर्वाग्रह है । इसके तहत पूंजीवादी राष्ट्र राज्य का पश्चिमी ढांचा ही मानक के बतौर थोप दिया जाता है । यह मानक उन देशों के साथ कोई न्याय नहीं कर पाता जिनका इतिहास, संस्कृति और प्रशासन की परम्परा अलग हो । इस उदारवादी पश्चिमी मानक का असर बहुतेरे पश्चिमी मार्क्सवादियों पर भी बहुत गहरा रहा है जिसके कारण वे समाजवादी शासन के वास्तविक अनुभवों को खारिज कर देते हैं । सत्ता में समाजवाद को उसकी ही शर्तों पर समझने के मामले में किताबों की भारी कमी है । जो भी थोड़ी किताबें उपलब्ध हैं उनका उपयोग करने के अतिरिक्त लेखक ने मुख्य रूप से संबंधित देशों की सामग्री पर भरोसा किया है । इन देशों में रहने वाले लेखक के मित्रों ने बहसों और बातचीत के जरिए लेखक को बहुतेरी उलझनों को सुलझाने में मदद भी की है । इनमें कुछ लोग विश्वविद्यालयों के विख्यात अध्यापक और विद्वान भी हैं ।

लेखक का कहना है कि क्रांतिकारी प्रक्रिया के जरिए सत्ता पर कब्जा करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी और शासन के वास्तविक संचालन में बुनियादी अंतर होता है । लेनिन ने कहा ही था कि सत्ता पर कब्जा करना अपेक्षाकृत आसान होता है । इस कब्जे के बाद समाजवाद का निर्माण उसके मुकाबले अधिक कठिन काम होता है । समाजवादी प्रशासन स्थिर होने की जगह विकासमान प्रक्रिया होता है । यह पूर्वप्रदत्त नहीं होता और इसीलिए बदलाव की गुंजाइश इसमें बनी रहती है । यह काम मार्क्सवादी पद्धति से संपन्न होता है । पश्चिमी उदारवादी आलोचना के प्रभाव में होने की जगह ये बदलाव संबंधित समाजों की समस्याओं और मार्क्सवाद से प्रभावित होते हैं । ये देश समाजवादी निर्माण के सिलसिले में मार्क्सवाद लेनिनवाद को अपनाने का प्रयास करते हैं । इस मामले में बुनियादी सिद्धांतों और विशेष परिस्थितियों के बीच सामंजस्य बनाने की कोशिश की जाती है । ये परिस्थितियां स्थायी नहीं होतीं और सांस्कृतिक परम्पराओं और इतिहासों की खासियत से पैदा होती हैं । इसके साथ ही जिन समस्याओं का समाधान करना होता है उनका भी प्रभाव शासन की नीतियों पर पड़ता है । बुनियादी सिद्धांत भी लागू करने के देशकाल के अनुरूप ढाले जाते हैं । उनमें बदलाव और नयापन भी आता है । इस प्रक्रिया में सिद्धांत समृद्ध भी होते हैं ।

इसके बाद वे समाजवादी राजनीति या समाजवादी राज्य की जगह पर समाजवादी शासन शब्द के इस्तेमाल का कारण बताते हैं । कारण कि एंगेल्स ने राज्य के सभी रूपों को जनता की सत्ता से अलगाया हुआ मानते हैं । इसी वजह से राज्य हमेशा समाज के साथ अलगाव और तनाव की स्थिति में होता है । समाजवादी व्यवस्था में इसके विपरीत सार्वजनिक सत्ता समाज में निहित होती है और इसलिए उसे पारम्परिक अर्थों में राज्य नहीं कहा जा सकता । इस कारण से लेनिन के बाद से ही इसे सर्वहारा राज्य या समाजवादी राज्य कहा जाता रहा जो नया है और इतिहास में इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती । इसे वे गुणात्मक रूप से भिन्न किस्म का राज्य मानते हैं जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के माध्यम से ग्रामीण और शहरी कामगार ही स्वामी होते हैं और राज्य समाज में निहित होता है । लेखक ने भी एंगेल्स के अनुकरण में इसे समाजवादी शासन कहा है । उनका कहना है कि चीन में आधिकारिक दस्तावेजों में इसी तरह की शब्दावली का प्रयोग किया जाता है ।

लेखक को किताब की सीमाओं का अनुमान है । मार्क्स-एंगेल्स, सोवियत संघ, उत्तरी कोरिया और चीन के अलावे भी पूर्वी यूरोप के देश, पूर्वी एशिया के अन्य देश, लैटिन अमेरिका और अफ़्रीका के भी बहुतेरे देशों को समाजवादी शासन के अध्ययन में शामिल किया जाना चाहिए लेकिन उसके लिए अपेक्षित योग्यता का अभाव लेखक को महसूस होता है । अपनी सीमा के भीतर ही किये गये इस अध्ययन में लेखक ने मार्क्स द्वारा राज्य के मौजूदा रूपों की समीक्षा की रूपरेखा प्रस्तुत करने के बाद यह भी समझने की कोशिश की कि उनके मुताबिक क्रांति के बाद समाजवादी शासन में राज्य का क्या होगा । इसके तहत सर्वहारा की तानाशाही की धारणा को भी समझा गया है । पेरिस कम्यून के अनुभव का भी जिक्र इस संदर्भ में हुआ है । मजदूरों के शासन के इस प्रथम प्रयोग का संपूर्ण विश्लेषण मार्क्स नहीं कर सके थे । एंगेल्स ने इसे आगे बढ़ाया । क्रांति के बाद के शासन संबंधी मार्क्स के अनुमान को भी प्रस्तुत करने की कोशिश लेखक ने की है । मार्क्स ने इस दिशा में अधिक प्रयास नहीं किया क्योंकि इस मामले में कोई ठोस अनुभव नहीं था । एंगेल्स ने मार्क्स के अधूरे काम की दिशा में आगे बढ़ते हुए समाजवादी शासन के कुछ बुनियादी सिद्धांत और सूत्र दिये । सबसे पहले तो उन्होंने अब तक के राज्य के रूपों को अलगाया हुआ सार्वजनिक सत्ता माना । समाजवादी निर्माण के लिहाज से भी उन्होंने कुछ जरूरी बातें कहीं । पेरिस कम्यून को उन्होंने सर्वहारा की तानाशाही से जोड़ा । इसके अतिरिक्त सर्वहारा सत्ता के आरम्भिक दौर में बल प्रयोग की भूमिका पर भी उन्होंने जोर दिया । उन्होंने ही राज्य के लोप का भी महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत किया । अराजकतावादी कहते थे कि समाजवादी सत्ता का पहला काम राज्य का उन्मूलन होगा । इसके उत्तर में एंगेल्स ने जोर दिया कि समाजवादी सत्ता के अंतिम काम के बतौर राज्य अपने आप समाप्त हो जाएगा । यह काम तत्काल नहीं होगा बल्कि इसमें लम्बा समय लगेगा । उन्होंने समाजवादी शासन के जो सूत्र दिये वे थे कि सार्वजनिक सत्ता बनी रहेगी लेकिन वह समाज से अलग होने की जगह उसमें धंसी होगी । इसका आधार वर्ग संघर्ष नहीं होगा इसलिए इसका चरित्र राजनीतिक नहीं होगा । शासन का मतलब समाज के वास्तविक हितों के लिए वस्तुओं का प्रशासन और उत्पादन की प्रक्रियाओं का प्रबंधन होगा । इससे आरम्भिक साम्यवाद में रूपांतरण की जमीन तैयार होगी ।

लेनिन की स्थिति विशेष रही क्योंकि उन्हें सत्ता पर कब्जा करने की क्रांतिकारी प्रक्रिया का अनुभव तो था ही, क्रांति के बाद सत्ता में रहते हुए समाजवादी निर्माण की जटिलता का भी कुछ समय तक अनुभव रहा । क्रांति से पहले ही उन्होंने क्रांति के बाद के राज्य, लोकतंत्र और प्रशासन के रूप के बारे में विचार किया था । इसमें उन्होंने मुख्य तौर पर एंगेल्स के लेखन का सहारा लिया, कभी कभी मार्क्स को भी उद्धृत किया और इनके लेखन को क्रांतिकारी संघर्ष के अनुभव की रोशनी में व्याख्यायित किया । सोवियत सत्ता के शुरुआती व्यावहारिक अनुभव ने भी लेनिन को सिखाया, उन्होंने संस्थानीकरण की ओर सत्ता के संक्रमण को चिन्हित किया तथा इसमें कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के सवाल के साथ ही समाजवादी लोकतंत्र पर भी अपनी बातें कहीं । घटनाक्रम की तेजी के साथ उन्होंने सिद्धांत के मोर्चे पर भी नयी जमीन तोड़ी और बदलती हुई परिस्थिति के साथ समाजवादी प्रशासन के स्वरूप में विकास पर भी बल दिया । समाजवादी सत्ता के तात्कालिक कार्यभार के बतौर उन्होंने किसान और मजदूर जनसमुदाय पर आम नेतृत्व के साथ शासन में कम्युनिस्ट नेतृत्व के सवाल पर विचार करते हुए लौह अनुशासन के साथ मजदूरों के लोकतंत्र को विकसित करने की जरूरत बतायी । सिद्धांत के क्षेत्र में समाजवादी लोकतंत्र को लोकतंत्र का उच्चतम रूप बनाने पर उन्होंने बल दिया और इसे लोकतांत्रिक केंद्रीयता की धारणा के साथ जोड़ा । इस सिलसिले में लेखक ने एंगेल्स द्वारा क्रांति के बाद राज्य के दीर्घकालीन लोप की धारणा की भी परीक्षा की है । 

उनको समाजवादी शासन को देखने का समय बहुत कम मिला इसलिए वे महज कुछ उदीयमान रूपों को ही देख सके थे । असल में तो स्तालिन के समय ही जमीनी हकीकत उभरी । इन तीन दशकों में समाजवादी शासन का रूपरंग प्रकट हुआ । इसका एक प्रमुख पहलू समाजवादी शासन के ढांचे में अनेक अल्पसंख्यक जातियों की स्थिति से जुड़ा हुआ है । जातियों का सवाल बीसवीं सदी में मार्क्सवादी पार्टियों में बहस के केंद्र में था । स्तालिन ने इन बहसों में सिद्धांत के स्तर पर अत्यंत मौलिक योगदान किया । उन्होंने कहा कि संघीय समाजवादी देश की विशेषता के बतौर सांस्कृतिक जातीय स्वायत्तता का प्रस्ताव उचित नहीं है । इसकी जगह उन्होंने वर्ग की एकता पर बल दिया । वर्ग की इस एकता के आधार पर अधिकतम और अभूतपूर्व विविधता की सच्ची और समग्र बुनियाद रखी जा सकती है । ठीक इसी सिद्धांत के आधार पर 1917 के बाद सोवियत संघ में अल्पसंख्यक जातियों के लिए पहली बार सांगोपांग नीति का निर्माण हुआ । इसी नीति ने उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के साथ एकता बनाने का भी आधार उपलब्ध कराया । इसने दुनिया भर के मुक्ति संघर्षों को गति प्रदान की ।

इसका एक और पहलू सोवियत संघ के भीतर समाजवादी लोकतंत्र का निर्माण था । इसके तहत चार कदमों का उल्लेख किया गया है । चुनावी लोकतंत्र की दिशा में 1930 दशक के उत्तरार्ध में सार्वभौमिक मताधिकार पर आधारित अनेक प्रत्याशियों के बीच लड़े जाने वाले चुनाव हुए । कार्यस्थल, सामूहिक खेती और रिहाइश की जगहों पर प्राथमिक पार्टी संगठनों के साथ सलाह मशविरे के जरिए सार्थक लोकतंत्र स्थापित करने की कोशिश की गयी । 1936 के संविधान में शोषण से मुक्ति को बुनियादी मानवाधिकार माना गया । इसके साथ तमाम बहुतेरे अन्य अधिकार दिये गये । समाजवादी लोकतंत्र की स्थापना में कम्युनिस्ट पार्टी की अनिवार्य और द्वंद्वात्मक भूमिका स्वीकार की गयी । अन्य समाजवादी देशों ने भी इन पहलुओं को और आगे बढ़ाया । लेखक का कहना है कि राज्य के सामान्य अर्थ से हटकर समाजवादी राज्य की धारणा थी । राज्य के लोप से संबंधित जो बहसें चल रही थीं उनके संदर्भ में स्तालिन की नीतियों को देखने का अनुरोध लेखक ने किया है । इसी सिलसिले में उन्होंने 1939 की अठारहवीं कांग्रेस के उनके भाषण का जिक्र हुआ है जिसमें उन्होंने समाजवाद के दूसरे चरण की धारणा प्रस्तुत की और समाजवादी राज्य के ढांचों की सापेक्षिक परिपक्वता और स्थिरता का उल्लेख किया । उस समय प्रशासन के विभिन्न अंग समाज के भीतर अधिकाधिक अवस्थित थे ।

इसके बाद उत्तरी कोरिया को देखने की वजह बताते हुए लेखक ने उसकी सबसे अधिक स्थिरता का जिक्र किया है । साथ ही पश्चिमी देशों में उसका सबसे अधिक मजाक उड़ाने और गलतबयानी का भी लेखक ने उल्लेख किया है । इसलिए उनका कहना है कि बाहरी आलोचकों के मुकाबले उस देश को जानने वालों पर भरोसा करना चाहिए । कोरियाई स्रोतों के अतिरिक्त लेखक ने खुद भी उस देश का गहराई से अध्ययन किया है । इनके आधार पर उनका कहना है कि प्रशासन और सिद्धांत के मामले में उत्तरी कोरिया अन्य सभी समाजवादी देशों के समान होते हुए भी कोरियाई शैली की निरंतरता पर विशेष बल देता है । उसके शासन के ढांचों की उत्पत्ति के इतिहास की जानकारी देने के साथ उनके व्यावहारिक संचालन का विस्तार से जिक्र किया गया है । इसका महत्वपूर्ण अंग चुनावी लोकतंत्र है । इन चुनावों का रिश्ता दो संस्थाओं से है । पीपुल्स असेम्बली और पितृभूमि के पुन:एकीककरण हेतु लोकतांत्रिक मोर्चा । इस मोर्चे में सभी राजनीतिक पार्टियों, जन संगठनों और धार्मिक समूहों के लोग शामिल हैं और इसमें चुनाव के लिए विविध प्रत्याशी खड़े होते हैं, उनके बारे में चर्चा होती है और उनका निर्वाचन होता है । इसके बाद पीपुल्स असेम्बली के लिए प्रस्तावित प्रत्याशियों का चुनाव होता है जिसमें सर्वोच्च असेम्बली का चुनाव भी शामिल है । यही असेम्बली देश की सबसे ऊपरी विधायिका है । इसके अलावे सलाह मशविरे वाला लोकतंत्र है जिसमें जनता के साथ शासन का आंगिक जुड़ाव होता है । खेती और उद्योग में भी इस तरह की ही पद्धति अपनायी जाती है । सामूहिक खेती और औद्योगिक कार्यस्थल पर समस्याओं को हल करने और व्यावहारिक योजना बनाने के बारे में विचार विमर्श होता है । इनके जरिए ही पार्टी कमेटियों और योजना आयोगों के फैसलों को लागू किया जाता है । इस प्रक्रिया में ये फैसले जनता के अपने फैसले हो जाते हैं । वैचारिक नेतृत्व वर्कर्स पार्टी आफ़ कोरिया का होता है । देश का मुखिया स्टेट अफ़ेयर्स कमीशन का अध्यक्ष होता है लेकिन सर्वोच्च असेम्बली का नहीं । यह कमीशन कोरिया के समाजवादी लोकतंत्र की समूची व्यवस्था का अंग होता है । यह कमीशन सर्वोच्च असेम्बली के प्रति जवाबदेह होता है । इस तरह यह कमीशन न केवल जवाबदेह बनाया जाता है बल्कि वर्कर्स पार्टी का नेतृत्व मजबूत कानूनी प्रक्रिया के जरिए स्थापित होता है । इसके पीछे के सिद्धांत में जूझे की धारणा का भारी महत्व है । इसका अर्थ जनता की प्राथमिकता है । क्रांतिकारी निर्माण, स्वतंत्रता और आत्म निर्भरता के संघर्ष के जरिए जनता अपनी नियति की मालिक बनती है । इसके साथ ही 1990 दशक की चुनौती के समक्ष सेना को प्रधान क्रांतिकारी शक्ति की मान्यता पैदा हुई जो आर्थिक उन्नति और संप्रभुता की रक्षा के लिए जिम्मेदार है । तीसरा महत्वपूर्ण तत्व जनता की सृजनात्मकता को मुक्त करने से जुड़ा है । इसका मकसद उनकी दैनिक जिंदगी में सुधार लाना भी है । कोशिश समाज और शासन के सभी स्तरों पर विचार और व्यवहार के बीच सामंजस्य ले आना है ।

इसके बाद लेखक ने चीन की समाजवादी व्यवस्था का जायजा लिया है । उन्नीसवीं सदी के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के साथ चीन में समाजवादी लोकतंत्र की धारणा शुरू होती है, माओ की नव जनवाद की धारणा से उसे परिपक्वता मिलती है । फिर लोकतांत्रिक तानाशाही और लोकतांत्रिक केंद्रीयता में उसके घटक तैयार होते हैं । लेखक ने 2012 की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की अठारहवीं कांग्रेस में समाजवादी लोकतंत्र को विकसित करने के संकल्प पर जोर दिया है और वर्तमान कार्यभार को समझने की कोशिश की है । इसमें जनता की इच्छा, कानून का शासन और कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व आपस में अविभाज्य घटक की तरह काम करते नजर आते हैं । इन तीनों में जनता की इच्छा को समाजवादी संदर्भ में लोकतांत्रिक निरीक्षण की व्यवस्था की तरह समझा गया है । इसके तहत ही जनता को देश का मालिक घोषित किया गया है । कानून के शासन की समाजवादी पृष्ठभूमि को लेखक ने स्पष्ट किया है और इसे संविधान की मजबूती तथा लगातार बदलती व्यवस्थित कानूनी ढांचे से जोड़ा है । समाजवादी कानून व्यवस्था के लिए अच्छे कानून जरूरी समझे जाते हैं । तीसरे तत्व कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के बिना समाजवादी लोकतंत्र सम्भव नहीं माना जाता । कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए कानून का शासन स्थापित होता है और इसके जरिए ही पार्टी के प्रस्ताव जनता की इच्छा में ढल जाते हैं । लोकतांत्रिक केंद्रीयता को समूचे देश के शासन की धारणा के बतौर विकसित किया गया है । इस तरह कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व और जनता की इच्छा के बीच कानूनी प्रक्रियाओं की मध्यस्थता शासन को समाज से जोड़ती है ।

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