Monday, February 16, 2026

लेनिन का कोमिंटर्न

 

                                   

                                                       

2026 में ब्रिल से जान रिडेल की किताब लेनिनस कोमिंटर्न रीविजिटेडका प्रकाशन हुआ । इसकी प्रस्तावना में माइक ताबेर का कहना है कि कोमिंटर्न अब तक का विश्व क्रांतिकारी आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे प्रभावशाली संगठन था । 1919 में इसकी स्थापना हुई और दुनिया के लगभग प्रत्येक देश में इसके सदस्य और समर्थक थे । उनकी संख्या लाखों में थी । दुनिया के उत्पीड़ित जनगण में उसने आशा और सहानुभूति की लहर जगायी । इसी वजह से शासक वर्ग के लोग इससे डरते और नफ़रत करते थे । लेनिन द्वारा स्थापित कोमिंटर्न की विरासत ने पिछली सदी के असंख्य कार्यकर्ताओं और योद्धाओं को सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित किया ।  इसके अतिरिक्त विद्यार्थियों और शोधार्थियों में इसने अपनी गतिकी और आकर्षण को समझने की रुचि भी पैदा की ।

इसके बावजूद 1980 दशक से पहले कोमिंटर्न के बारे में अंग्रेजी में बहुत कम प्रकाशित सामग्री सुलभ थी । लोगों के मन में इसकी छवि सुनी सुनायी बातों के आधार पर बनी थी । प्रकाशित सामग्री और दस्तावेजों के अभाव में कोमिंटर्न की समूची जटिलता का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन बेहद मुश्किल काम था । 1983 में जान रिडेल के संपादन में कोमिंटर्न से जुड़े दस्तावेजों के प्रकाशन की परियोजना शुरू हुई तो स्थिति बदली । इससे कोमिंटर्न के बारे में समझ बढ़ी और गहरायी । पिछले चार दशकों में दो संग्रह कोमिंटर्न की तैयारी के छापे गये । शुरुआती चार कांग्रेसों के कार्यवृत्त से जुड़े चार संग्रह तैयार किये गये और छपे । एक संग्रह इसकी कार्यकारिणी की बैठकों के बारे में था । चार अन्य संग्रहों में कोमिंटर्न के सहायक संगठनों तथा उनके सम्मेलनों का विवरण था । प्रस्तुत किताब को इस श्रृंखला और कोमिंटर्न की परिचायिका के रूप में देखा जाना चाहिए । शुरू से प्रकाशन की इस परियोजना ने अपने लिए कुछ नियम तय किये थे ।

कोमिंटर्न की बात अधिक से अधिक सामने आ सके इसलिए संपादकों ने केवल प्रस्तावना लिखने तक खुद को सीमित रखा था । पाठक को इससे दस्तावेजों के आधार पर अपनी राय बनाने की आजादी मिली । आजकल के पाठक इन दस्तावेजों को अच्छी तरह समझ सकें इसलिए जरूरी टिप्पणियों को जगह दी गयी । इनके जरिए अपरिचित घटनाओं और व्यक्तियों को भी सुबोध बनाया गया । दस्तावेजों की मूल भाषा जर्मन या रूसी थी । अनुवाद को सावधानी के साथ ग्राह्य बनाया गया । कम्युनिस्ट आंदोलन के अध्येताओं के लिए तो यह लाभकर था ही, इसका लक्ष्य युवा विद्रोहियों, कामगारों और कार्यकर्ताओं को सामाजिक बदलाव के संघर्ष में मदद करना था । वे दुनिया बदलने की लड़ाई में कोमिंटर्न की सीख और विरासत का हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे ।

अधिकांश सामग्री कोमिंटर्न की कांग्रेसों और सम्मेलनों के कार्यवृत्त थे । इस तरह के लेखन के बारे में माना जाता है कि उसे पढ़ना रुचि नहीं जगाता । एक सुविधा थी कि लिखित व्याख्यान के मुकाबले मौखिक वक्तव्यों में स्वाभाविकता होती है । वक्ता अपनी बात सूत्रों में गढ़कर नहीं बोलते । इससे लेनिन के कोमिंटर्न को देखने की मजेदार खिड़की खुलती है । इनसे पाठक भी उन सम्मेलनों और बैठकों में बैठे हुए कल्पित कर सकते हैं और उन बहसों को जीवंत तरीके से सुन सकते हैं । वे प्रतिनिधियों के बीच उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर प्रस्तावित वैकल्पिक कार्ययोजनाओं की वैधता को परख सकते हैं । वे गलतियां होती देख सकते हैं और उनको सुधारने की कोशिश भी समझ सकते हैं । इन बैठकों के कार्यवृत्त के सहारे पाठक भी कोमिंटर्न को सौ साल पहले गुजरे जमाने की घटना समझने की जगह उसे जीवंत आंदोलन की तरह देख सकते हैं ।    

जान रिडेल ने कोमिंटर्न के बारे में यह काम किसी अकादमिक रुचि की वजह से नहीं किया । इसके पीछे उनका समाजवादी कार्यकर्ता का भाव था । 1958 में वे कनाडा में समाजवादी आंदोलन में शरीक हुए । जब क्यूबा की क्रांति को विफल करने के लिए अमेरिका ने अभियान चलाया तो उसके विरोध में कनाडा की गोलबंदी के साथ रिडेल सक्रिय रहे । 1970 दशक के पूर्वार्ध तक वे कनाडा में नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे इसलिए कनाडा की पुलिस उनके पीछे पड़ गयी । इसके बाद वे न्यू यार्क चले आये और 1983 से इस काम में लग गये । इस विराट काम को उन्होंने पूरा होने लायक संग्रहों का रूप दिया । जर्मन और फ़्रांसिसी पर उनका अधिकार था लेकिन इस काम के लिए उन्होंने रूसी भाषा पर भी अधिकार प्राप्त किया और उससे अंग्रेजी में अनुवाद करने लगे । धीरे धीरे इस काम को उन्होंने सामूहिक परियोजना में बदल दिया । दुनिया भर के सहयोगियों का समूह उन्होंने बना लिया । अनुवाद, टंकण, प्रूफ़ शोधन, संपादन और पुस्तकालयों में शोध का काम ढेर सारे महारथियों ने साथ मिलकर किया क्योंकि उन्हें रिडेल की गम्भीरता और उनके समर्पण पर विश्वास था । उन्होंने तमाम वामपंथी धारा के लोगों का सहयोग इस काम में लिया । उनका यह खुला और उदार नजरिया भी काम के साथ आगे बढ़ता गया । शुरुआती दस सालों में पांच संग्रह छपे । इसके बाद रिडेल कनाडा लौट गये । वहां वे क्यूबा और फिलिस्तीन तथा बोलीविया समेत ढेर सारे देशों के साथ एकजुटता के अभियान चलाते रहे । साथ ही अमेरिकी हमलों के प्रतिरोध में भी भाग लेते रहे । कोमिंटर्न के बारे में प्रकाशन की परियोजना को ब्रिल ने अपनाया और शेष संग्रह भी छपे । अब यह किताब उस परियोजना की भूमिका के बतौर छप रही है ।

इसके कुछ अध्याय कोमिंटर्न की शुरुआत का कालानुक्रमिक विवरण हैं । कुछ फ़ासीवाद, मजदूरों की सरकार, रणनीति और कार्यनीति, संगठन और केंद्रीयता, लोकतांत्रिक अधिकार तथा औपनिवेशिक और जातीयता जैसे खास मुद्दों से जुड़े हुए हैं । इसमें शामिल लेख उस संग्रह के बारे में अलग अलग मौकों पर लिखे गये थे इसलिए उनमें थोड़ा दुहराव भी मिलेगा । इन लेखों को संग्रह के सूचीपत्र की तरह भी देखा जा सकता है । इससे पाठकों को खास मुद्दों पर अलग अलग संग्रहों को देखने की प्रेरणा मिल सकती है । लेनिन द्वारा स्थापित कोमिंटर्न की विरासत आज की दुनिया के लिए भी ताबेर को प्रासंगिक लगती है ।

इसके बाद उन्होंने परियोजना का संक्षिप्त परिचय दिया है । इसके तहत प्रकाशित आरम्भिक संग्रह पाथफ़ाइंडर प्रेस से जान रिडेल के संपादन में छपे । प्रकाशित सामग्री का अधिकांश हिस्सा पहली बार अंग्रेजी में आया था । इसके बाद के संग्रह ब्रिल और हेमार्केट बुक्स से छपे । इसका पहला संग्रह 1907 से 1916 के बीच के वे दस्तावेज थे जिन्हें लेनिन ने कोमिंटर्न की तैयारी के बतौर दर्ज किया था । ये तैयारी के वर्षों में लेनिन के इस दिशा में किये संघर्षों के सबूत हैं । प्रथम विश्वयुद्ध की आहट मिलते ही लेनिन ने द्वितीय इंटरनेशनल के भीतर वापपक्ष गठित करने का प्रयास किया । युद्ध छिड़ने के बाद उन्होंने द्वितीय इंटरनेशनल से नाता तोड़ लिया और कोमिंटर्न के बारे में सोचने लगे थे । उसी दौर की बहसों को इसमें रखा गया है । बहस के मुद्दे साम्राज्यवाद की प्रकृति, राष्ट्रों के आत्मनिर्णय का अधिकार, युद्ध के विरुद्ध संघर्ष और मजदूर वर्ग की अंतर्राष्ट्रीय एकता थे । यह संग्रह 1984 में छपा था ।

दूसरा संग्रह 1918 से 1919 के दस्तावेजों का है । यह समय जर्मन क्रांति और सोवियत सत्ता की स्थापना का था । इनमें स्थापना कांग्रेस की तैयारी की झलक मिलती है । नवम्बर 1918 में जर्मनी में क्रांति हुई जिसके कारण प्रथम विश्वयुद्ध सहसा रुक गया और विश्व क्रांति का नया रास्ता खुल गया ।  जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर की बहसों का पता इस दौर के दस्तावेजों से चलता है । इन घटनाओं के बारे में रूसी बोल्शेविक नेताओं की राय भी देखने को मिलती है । सोवियत सत्ता के बारे में लेनिन और काउत्सकी की बहस भी पाठकों को नजर आती है । कोमिंटर्न की स्थापना कांग्रेस की तैयारी के प्रमाण भी इस समय के दस्तावेजों में सुरक्षित हैं । इसे 1986 में छापा गया था ।

तीसरा संग्रह स्वाभाविक रूप से 1919 की स्थापना कांग्रेस के कार्यवृत्त का है । मार्च में 20 देशों के प्रतिनिधियों ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मध्य यूरोप और एशिया के क्रांतिकारी उभार की चर्चा की और कोमिंटर्न के गठन का फैसला किया । कांग्रेस की बहसों, रपटों और पारित प्रस्तावों का संग्रह इसमें किया गया । विश्व क्रांतिकारी प्रगति के माहौल में इस आंदोलन की नयी उठान का पता इससे चलता है । 1987 में इसे छापा गया ।

अगले साल 1920 में दूसरी कांग्रेस हुई । इसमें मजदूर वर्ग की रणनीति और कार्यक्रम, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष, ट्रेड यूनियनों के क्रांतिकारी बदलाव, मजदूर-किसान एकता, बुर्जुआ संसदों और चुनावों में भागीदारी तथा कम्युनिस्ट पार्टियों की संरचना और उनकी जिम्मेदारी के सवाल पर उग्र वाम तथा दक्षिणपंथी नजरिए से ढेर सारी तीखी बहसें हुईं । उस समय आंदोलन के लिए ये सवाल बेहद अहम थे । इसलिए इन तमाम ज्वलंत सवालों पर इस कांग्रेस के फैसले शुरुआती कोमिंटर्न के लिए भारी महत्व के रहे । 1991 में इसे दो खंडों में छापा गया था ।

1920 में ही बाकू कांग्रेस का आयोजन कोमिंटर्न ने किया । उस समय मध्य एशिया और यूरोप के क्रांतिकारी संघर्षों के कारण नयी सुबह की उम्मीद मेहनतकशों में उपजी थी । मुख्य रूप से मध्य एशिया के 2000 प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए थे । बहस इस सवाल पर हुई कि औपनिवेशिक दुनिया के किसान और मजदूर साम्राज्यवादी शोषण से कैसे आजाद होंगे । वहां के शासक वर्ग ने जो जातीय और धार्मिक विभाजन पैदा किया है उस पर विजय प्राप्त करते हुए साझा वर्ग हितों के लिए कैसे लड़ेंगे । इसे 1993 में छापा गया ।

1922 की कांग्रेस आखिरी कांग्रेस थी जिसमें लेनिन ने भाग लिया । उसमें जिन बहुतेरे सवालों पर बात हुई वे अब भी हमारी रुचि के विषय बने हुए हैं । संयुक्त मोर्चे का निर्माण, किसानों और मजदूरों की सरकार, साम्राज्यवाद विरोधी एकजुटता, अंतर्राष्ट्रीय मांगें और अंतर्राष्ट्रीय संगठन आदि मसले उनमें शामिल थे । प्रतिनिधियों के मत तरह तरह के थे । फ़ासीवाद के उदय, वर्साई संधि की व्यवस्था के अंत, औपनिवेशिक देशों में क्रांति तथा स्त्री मुक्ति जैसे सवालों पर मजेदार बहसें हुईं । इसके दस्तावेजों का संग्रह 2012 में ब्रिल से छपा ।  

इससे साल भर पहले 1921 में कोमिंटर्न की तीसरी कांग्रेस हुई । इसमें तीखा राजनीतिक संघर्ष हुआ । त्रात्सकी और लेनिन शुरू में अल्पमत में थे लेकिन फिर प्रतिनिधियों का बहुमत उनके पक्ष में आ गया । बहस का मुद्दा यह था कि सत्ता पर क्रांतिकारी कब्जे की प्रक्रिया में मजदूर वर्ग की बहुसंख्या का समर्थन नेताओं का छोटा सा समूह किस तरह हासिल करे । इसके लिए उसे किस तरह की आक्रामक पहल लेनी होगी । बहस का समापन कम्युनिस्ट रणनीति और कार्यनीति के सूत्रीकरण में हुआ । सोवियत संघ और उसके द्वारा हाल ही में अपनायी गयी नयी आर्थिक नीति के बारे में भी बहस हुई । इस संग्रह में कार्यवृत्त के साथ 32 परिशिष्ट शामिल किये गये । इन्हें पहले कभी छापा नहीं गया था । इनसे परदे के पीछे की बातचीत का अंदाजा लगता है । ब्रिल से इसे 2015 में छापा गया । 

1922 से 1923 के बीच कोमिंटर्न की कार्यकारिणी की तीन विस्तारित बैठकें हुईं । इनके कार्यवृत्त और प्रस्तावों का संग्रह माइक ताबेर के संपादन में छपा । इन्हें लघु कांग्रेस भी कहा जा सकता है जिनमें दुनिया भर के कम्युनिस्ट नेताओं ने संयुक्त मोर्चे से लेकर फ़ासीवाद से लड़ाई तक विभिन्न रणनीतिक सवालों से लेकर पहलों तक पर बातचीत की । इस प्रचुर सामग्री से लेनिन के समय विश्व क्रांतिकारी आंदोलन तथा कोमिंटर्न के परवर्ती विकास को समझने में मदद मिलती है । इसका प्रकाशन ब्रिल से 2018 में हुआ ।

इसके बाद के संग्रह सहायक संगठनों पर केंद्रित हैं । पहला संग्रह माइक ताबेर और मारिया द्याकोनोवा के संपादन में कम्युनिस्ट स्त्री आंदोलन का है । 1920 में इसकी शुरुआत हुई और यह दुनिया का पहला वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी स्त्री संगठन था । इसने स्त्री मुक्ति का कार्यक्रम बनाया, स्त्री अधिकारों के संघर्ष में भाग लिया और कम्युनिस्ट आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए काम किया । इस संग्रह में संगठन के सम्मेलनों के कार्यवृत्त और प्रस्ताव तथा दुनिया भर में हो रहे काम की रपटें शामिल की गयी हैं । इसकी अधिकांश सामग्री पहली बार अंग्रेजी में सुलभ हुई है । आधी सामग्री तो पहली बार छपी है । 2022 में ब्रिल ने इसे छापा ।

1921 में स्थापित रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की पहली कांग्रेस की कार्यवाही और प्रस्तावों का संग्रह माइक ताबेर के संपादन में छपा । इसे संक्षेप में प्रोफ़िंटर्न कहा जाता है । क्रांतिकारी संघर्ष में दुनिया के लाखों कामगारों को खींच लाने के लिए ट्रेड यूनियनों का वैश्विक आंदोलन खड़ा करने के मकसद से इसे गठित किया गया था । इस कांग्रेस में मजदूर आंदोलन की विविध धाराओं का प्रतिनिधित्व हुआ जिनमें  बिग हिल हेवुड और टाम मान जैसी मशहूर हस्तियां भी शामिल थीं । ट्रेड यूनियनों के लक्ष्य और कार्यभार, यूनियनवादी वर्ग संघर्ष की प्रकृति और यूनियन की रणनीति और कार्यनीति के सवाल पर विभिन्न धाराओं के बीच जीवंत और यदा कदा तीखी बहसें भी हुईं । 2024 में इसे ब्रिल ने छापा ।

कम्युनिस्ट यूथ इंटरनेशनल भी कोमिंटर्न का महत्वपूर्ण सहायक संगठन था । बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में द्वितीय इंटरनेशनल से जुड़े समाजवादी युवा आंदोलन से इसका विकास हुआ और इसने कोमिंटर्न की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । 1919 और 1921 में इसकी दो कांग्रेस हुईं जिनकी कार्यवाही और प्रस्ताव माइक ताबेर और बाब श्वार्ज़ के संपादन में संग्रहित किये गये हैं । यह सामग्री पहली बार अंग्रेजी में आयी है । इसमें सम्मेलनों के दस्तावेजों के अतिरिक्त नेताओं की बैठकों की कार्यवाही भी शामिल है । इन बैठकों में लड़ाकूपन, युवकों की अग्रदूत की भूमिका, कोमिंटर्न के साथ संबंध के अतिरिक्त क्रांतिकारी युवा संगठन की प्रकृति और उसके कार्यभार के बारे में लगातार बहसें होती रही थीं । इसे भी ब्रिल से छापा गया है ।

इन संग्रहों के अतिरिक्त जान रिडेल, विजय प्रसाद और नसीफ़ मुल्ला के संपादन में लिबरेट द कालोनीज! कम्युनिज्म ऐंड कोलोनियल फ़्रीडम 1917-1924’ का प्रकाशन 2019 में लेफ़्टवर्ड से, जान रिडेल और माइक ताबेर के संपादन में क्लारा जेटकिन की फ़ाइटिंग फ़ासिज्मका प्रकाशन 2017 में हेमार्केट बुक्स से तथा माइक ताबेर के संपादन में इसी तरह हेमार्केट बुक्स से 2021 और 2023 में द्वितीय इंटरनेशनल की बहसों के दस्तावेजों के दो संग्रह छापे गये हैं ।

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