2026
में ब्रिल से जान रिडेल की किताब ‘लेनिन’स कोमिंटर्न
रीविजिटेड’
का
प्रकाशन हुआ । इसकी प्रस्तावना में माइक ताबेर का कहना है कि कोमिंटर्न अब तक का
विश्व क्रांतिकारी आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे प्रभावशाली संगठन था । 1919
में इसकी स्थापना हुई और दुनिया के लगभग प्रत्येक देश में इसके सदस्य और समर्थक थे
। उनकी संख्या लाखों में थी । दुनिया के उत्पीड़ित जनगण में उसने आशा और सहानुभूति
की लहर जगायी । इसी वजह से शासक वर्ग के लोग इससे डरते और नफ़रत करते थे । लेनिन
द्वारा स्थापित कोमिंटर्न की विरासत ने पिछली सदी के असंख्य कार्यकर्ताओं और
योद्धाओं को सामाजिक बदलाव के लिए प्रेरित किया ।
इसके अतिरिक्त विद्यार्थियों और शोधार्थियों में इसने अपनी गतिकी और आकर्षण
को समझने की रुचि भी पैदा की ।
इसके
बावजूद 1980 दशक से पहले कोमिंटर्न के बारे में अंग्रेजी में बहुत कम प्रकाशित
सामग्री सुलभ थी । लोगों के मन में इसकी छवि सुनी सुनायी बातों के आधार पर बनी थी
। प्रकाशित सामग्री और दस्तावेजों के अभाव में कोमिंटर्न की समूची जटिलता का
वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन बेहद मुश्किल काम था । 1983 में जान रिडेल के संपादन में
कोमिंटर्न से जुड़े दस्तावेजों के प्रकाशन की परियोजना शुरू हुई तो स्थिति बदली ।
इससे कोमिंटर्न के बारे में समझ बढ़ी और गहरायी । पिछले चार दशकों में दो संग्रह
कोमिंटर्न की तैयारी के छापे गये । शुरुआती चार कांग्रेसों के कार्यवृत्त से जुड़े
चार संग्रह तैयार किये गये और छपे । एक संग्रह इसकी कार्यकारिणी की बैठकों के बारे
में था । चार अन्य संग्रहों में कोमिंटर्न के सहायक संगठनों तथा उनके सम्मेलनों का
विवरण था । प्रस्तुत किताब को इस श्रृंखला और कोमिंटर्न की परिचायिका के रूप में
देखा जाना चाहिए । शुरू से प्रकाशन की इस परियोजना ने अपने लिए कुछ नियम तय किये
थे ।
कोमिंटर्न
की बात अधिक से अधिक सामने आ सके इसलिए संपादकों ने केवल प्रस्तावना लिखने तक खुद
को सीमित रखा था । पाठक को इससे दस्तावेजों के आधार पर अपनी राय बनाने की आजादी
मिली । आजकल के पाठक इन दस्तावेजों को अच्छी तरह समझ सकें इसलिए जरूरी टिप्पणियों
को जगह दी गयी । इनके जरिए अपरिचित घटनाओं और व्यक्तियों को भी सुबोध बनाया गया ।
दस्तावेजों की मूल भाषा जर्मन या रूसी थी । अनुवाद को सावधानी के साथ ग्राह्य
बनाया गया । कम्युनिस्ट आंदोलन के अध्येताओं के लिए तो यह लाभकर था ही, इसका लक्ष्य युवा
विद्रोहियों,
कामगारों
और कार्यकर्ताओं को सामाजिक बदलाव के संघर्ष में मदद करना था । वे दुनिया बदलने की
लड़ाई में कोमिंटर्न की सीख और विरासत का हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे ।
अधिकांश
सामग्री कोमिंटर्न की कांग्रेसों और सम्मेलनों के कार्यवृत्त थे । इस तरह के लेखन
के बारे में माना जाता है कि उसे पढ़ना रुचि नहीं जगाता । एक सुविधा थी कि लिखित
व्याख्यान के मुकाबले मौखिक वक्तव्यों में स्वाभाविकता होती है । वक्ता अपनी बात
सूत्रों में गढ़कर नहीं बोलते । इससे लेनिन के कोमिंटर्न को देखने की मजेदार खिड़की
खुलती है । इनसे पाठक भी उन सम्मेलनों और बैठकों में बैठे हुए कल्पित कर सकते हैं
और उन बहसों को जीवंत तरीके से सुन सकते हैं । वे प्रतिनिधियों के बीच उपलब्ध
सूचनाओं के आधार पर प्रस्तावित वैकल्पिक कार्ययोजनाओं की वैधता को परख सकते हैं ।
वे गलतियां होती देख सकते हैं और उनको सुधारने की कोशिश भी समझ सकते हैं । इन
बैठकों के कार्यवृत्त के सहारे पाठक भी कोमिंटर्न को सौ साल पहले गुजरे जमाने की
घटना समझने की जगह उसे जीवंत आंदोलन की तरह देख सकते हैं ।
जान
रिडेल ने कोमिंटर्न के बारे में यह काम किसी अकादमिक रुचि की वजह से नहीं किया ।
इसके पीछे उनका समाजवादी कार्यकर्ता का भाव था । 1958 में वे कनाडा में समाजवादी
आंदोलन में शरीक हुए । जब क्यूबा की क्रांति को विफल करने के लिए अमेरिका ने
अभियान चलाया तो उसके विरोध में कनाडा की गोलबंदी के साथ रिडेल सक्रिय रहे । 1970
दशक के पूर्वार्ध तक वे कनाडा में नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे इसलिए कनाडा
की पुलिस उनके पीछे पड़ गयी । इसके बाद वे न्यू यार्क चले आये और 1983 से इस काम
में लग गये । इस विराट काम को उन्होंने पूरा होने लायक संग्रहों का रूप दिया ।
जर्मन और फ़्रांसिसी पर उनका अधिकार था लेकिन इस काम के लिए उन्होंने रूसी भाषा पर
भी अधिकार प्राप्त किया और उससे अंग्रेजी में अनुवाद करने लगे । धीरे धीरे इस काम
को उन्होंने सामूहिक परियोजना में बदल दिया । दुनिया भर के सहयोगियों का समूह
उन्होंने बना लिया । अनुवाद,
टंकण, प्रूफ़ शोधन, संपादन और
पुस्तकालयों में शोध का काम ढेर सारे महारथियों ने साथ मिलकर किया क्योंकि उन्हें
रिडेल की गम्भीरता और उनके समर्पण पर विश्वास था । उन्होंने तमाम वामपंथी धारा के
लोगों का सहयोग इस काम में लिया । उनका यह खुला और उदार नजरिया भी काम के साथ आगे
बढ़ता गया । शुरुआती दस सालों में पांच संग्रह छपे । इसके बाद रिडेल कनाडा लौट गये
। वहां वे क्यूबा और फिलिस्तीन तथा बोलीविया समेत ढेर सारे देशों के साथ एकजुटता
के अभियान चलाते रहे । साथ ही अमेरिकी हमलों के प्रतिरोध में भी भाग लेते रहे ।
कोमिंटर्न के बारे में प्रकाशन की परियोजना को ब्रिल ने अपनाया और शेष संग्रह भी
छपे । अब यह किताब उस परियोजना की भूमिका के बतौर छप रही है ।
इसके
कुछ अध्याय कोमिंटर्न की शुरुआत का कालानुक्रमिक विवरण हैं । कुछ फ़ासीवाद, मजदूरों की सरकार, रणनीति और
कार्यनीति,
संगठन
और केंद्रीयता,
लोकतांत्रिक
अधिकार तथा औपनिवेशिक और जातीयता जैसे खास मुद्दों से जुड़े हुए हैं । इसमें शामिल
लेख उस संग्रह के बारे में अलग अलग मौकों पर लिखे गये थे इसलिए उनमें थोड़ा दुहराव
भी मिलेगा । इन लेखों को संग्रह के सूचीपत्र की तरह भी देखा जा सकता है । इससे
पाठकों को खास मुद्दों पर अलग अलग संग्रहों को देखने की प्रेरणा मिल सकती है ।
लेनिन द्वारा स्थापित कोमिंटर्न की विरासत आज की दुनिया के लिए भी ताबेर को
प्रासंगिक लगती है ।
इसके
बाद उन्होंने परियोजना का संक्षिप्त परिचय दिया है । इसके तहत प्रकाशित आरम्भिक
संग्रह पाथफ़ाइंडर प्रेस से जान रिडेल के संपादन में छपे । प्रकाशित सामग्री का
अधिकांश हिस्सा पहली बार अंग्रेजी में आया था । इसके बाद के संग्रह ब्रिल और
हेमार्केट बुक्स से छपे । इसका पहला संग्रह 1907 से 1916 के बीच के वे दस्तावेज थे
जिन्हें लेनिन ने कोमिंटर्न की तैयारी के बतौर दर्ज किया था । ये तैयारी के वर्षों
में लेनिन के इस दिशा में किये संघर्षों के सबूत हैं । प्रथम विश्वयुद्ध की आहट
मिलते ही लेनिन ने द्वितीय इंटरनेशनल के भीतर वापपक्ष गठित करने का प्रयास किया ।
युद्ध छिड़ने के बाद उन्होंने द्वितीय इंटरनेशनल से नाता तोड़ लिया और कोमिंटर्न के
बारे में सोचने लगे थे । उसी दौर की बहसों को इसमें रखा गया है । बहस के मुद्दे
साम्राज्यवाद की प्रकृति,
राष्ट्रों
के आत्मनिर्णय का अधिकार,
युद्ध
के विरुद्ध संघर्ष और मजदूर वर्ग की अंतर्राष्ट्रीय एकता थे । यह संग्रह 1984 में
छपा था ।
दूसरा
संग्रह 1918 से 1919 के दस्तावेजों का है । यह समय जर्मन क्रांति और सोवियत सत्ता
की स्थापना का था । इनमें स्थापना कांग्रेस की तैयारी की झलक मिलती है । नवम्बर
1918 में जर्मनी में क्रांति हुई जिसके कारण प्रथम विश्वयुद्ध सहसा रुक गया और
विश्व क्रांति का नया रास्ता खुल गया ।
जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर की बहसों का पता इस दौर के दस्तावेजों
से चलता है । इन घटनाओं के बारे में रूसी बोल्शेविक नेताओं की राय भी देखने को
मिलती है । सोवियत सत्ता के बारे में लेनिन और काउत्सकी की बहस भी पाठकों को नजर
आती है । कोमिंटर्न की स्थापना कांग्रेस की तैयारी के प्रमाण भी इस समय के
दस्तावेजों में सुरक्षित हैं । इसे 1986 में छापा गया था ।
तीसरा
संग्रह स्वाभाविक रूप से 1919 की स्थापना कांग्रेस के कार्यवृत्त का है । मार्च
में 20 देशों के प्रतिनिधियों ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मध्य यूरोप और एशिया के
क्रांतिकारी उभार की चर्चा की और कोमिंटर्न के गठन का फैसला किया । कांग्रेस की
बहसों,
रपटों
और पारित प्रस्तावों का संग्रह इसमें किया गया । विश्व क्रांतिकारी प्रगति के
माहौल में इस आंदोलन की नयी उठान का पता इससे चलता है । 1987 में इसे छापा गया ।
अगले
साल 1920 में दूसरी कांग्रेस हुई । इसमें मजदूर वर्ग की रणनीति और कार्यक्रम, राष्ट्रीय मुक्ति
संघर्ष,
ट्रेड
यूनियनों के क्रांतिकारी बदलाव,
मजदूर-किसान
एकता, बुर्जुआ संसदों
और चुनावों में भागीदारी तथा कम्युनिस्ट पार्टियों की संरचना और उनकी जिम्मेदारी
के सवाल पर उग्र वाम तथा दक्षिणपंथी नजरिए से ढेर सारी तीखी बहसें हुईं । उस समय
आंदोलन के लिए ये सवाल बेहद अहम थे । इसलिए इन तमाम ज्वलंत सवालों पर इस कांग्रेस
के फैसले शुरुआती कोमिंटर्न के लिए भारी महत्व के रहे । 1991 में इसे दो खंडों में
छापा गया था ।
1920
में ही बाकू कांग्रेस का आयोजन कोमिंटर्न ने किया । उस समय मध्य एशिया और यूरोप के
क्रांतिकारी संघर्षों के कारण नयी सुबह की उम्मीद मेहनतकशों में उपजी थी । मुख्य
रूप से मध्य एशिया के 2000 प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए थे । बहस इस सवाल पर हुई कि
औपनिवेशिक दुनिया के किसान और मजदूर साम्राज्यवादी शोषण से कैसे आजाद होंगे । वहां
के शासक वर्ग ने जो जातीय और धार्मिक विभाजन पैदा किया है उस पर विजय प्राप्त करते
हुए साझा वर्ग हितों के लिए कैसे लड़ेंगे । इसे 1993 में छापा गया ।
1922
की कांग्रेस आखिरी कांग्रेस थी जिसमें लेनिन ने भाग लिया । उसमें जिन बहुतेरे
सवालों पर बात हुई वे अब भी हमारी रुचि के विषय बने हुए हैं । संयुक्त मोर्चे का
निर्माण,
किसानों
और मजदूरों की सरकार,
साम्राज्यवाद
विरोधी एकजुटता, अंतर्राष्ट्रीय
मांगें और अंतर्राष्ट्रीय संगठन आदि मसले उनमें शामिल थे । प्रतिनिधियों के मत तरह
तरह के थे । फ़ासीवाद के उदय,
वर्साई
संधि की व्यवस्था के अंत,
औपनिवेशिक
देशों में क्रांति तथा स्त्री मुक्ति जैसे सवालों पर मजेदार बहसें हुईं । इसके
दस्तावेजों का संग्रह 2012 में ब्रिल से छपा ।
इससे
साल भर पहले 1921 में कोमिंटर्न की तीसरी कांग्रेस हुई । इसमें तीखा राजनीतिक
संघर्ष हुआ । त्रात्सकी और लेनिन शुरू में अल्पमत में थे लेकिन फिर प्रतिनिधियों
का बहुमत उनके पक्ष में आ गया । बहस का मुद्दा यह था कि सत्ता पर क्रांतिकारी
कब्जे की प्रक्रिया में मजदूर वर्ग की बहुसंख्या का समर्थन नेताओं का छोटा सा समूह
किस तरह हासिल करे । इसके लिए उसे किस तरह की आक्रामक पहल लेनी होगी । बहस का
समापन कम्युनिस्ट रणनीति और कार्यनीति के सूत्रीकरण में हुआ । सोवियत संघ और उसके
द्वारा हाल ही में अपनायी गयी नयी आर्थिक नीति के बारे में भी बहस हुई । इस संग्रह
में कार्यवृत्त के साथ 32 परिशिष्ट शामिल किये गये । इन्हें पहले कभी छापा नहीं
गया था । इनसे परदे के पीछे की बातचीत का अंदाजा लगता है । ब्रिल से इसे 2015 में
छापा गया ।
1922
से
1923
के
बीच कोमिंटर्न की कार्यकारिणी की तीन विस्तारित बैठकें हुईं । इनके कार्यवृत्त और
प्रस्तावों का संग्रह माइक ताबेर के संपादन में छपा । इन्हें लघु कांग्रेस भी कहा जा
सकता है जिनमें दुनिया भर के कम्युनिस्ट नेताओं ने संयुक्त मोर्चे से लेकर फ़ासीवाद
से लड़ाई तक विभिन्न रणनीतिक सवालों से लेकर पहलों तक पर बातचीत की । इस प्रचुर
सामग्री से लेनिन के समय विश्व क्रांतिकारी आंदोलन तथा कोमिंटर्न के परवर्ती विकास
को समझने में मदद मिलती है । इसका प्रकाशन ब्रिल से 2018 में हुआ ।
इसके
बाद के संग्रह सहायक संगठनों पर केंद्रित हैं । पहला संग्रह माइक ताबेर और मारिया
द्याकोनोवा के संपादन में कम्युनिस्ट स्त्री आंदोलन का है । 1920 में इसकी शुरुआत
हुई और यह दुनिया का पहला वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी स्त्री संगठन था ।
इसने स्त्री मुक्ति का कार्यक्रम बनाया,
स्त्री
अधिकारों के संघर्ष में भाग लिया और कम्युनिस्ट आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी
बढ़ाने के लिए काम किया । इस संग्रह में संगठन के सम्मेलनों के कार्यवृत्त और
प्रस्ताव तथा दुनिया भर में हो रहे काम की रपटें शामिल की गयी हैं । इसकी अधिकांश
सामग्री पहली बार अंग्रेजी में सुलभ हुई है । आधी सामग्री तो पहली बार छपी है । 2022 में ब्रिल ने इसे
छापा ।
1921
में
स्थापित रेड ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल की पहली कांग्रेस की कार्यवाही और प्रस्तावों का
संग्रह माइक ताबेर के संपादन में छपा । इसे संक्षेप में प्रोफ़िंटर्न कहा जाता है ।
क्रांतिकारी संघर्ष में दुनिया के लाखों कामगारों को खींच लाने के लिए ट्रेड
यूनियनों का वैश्विक आंदोलन खड़ा करने के मकसद से इसे गठित किया गया था । इस
कांग्रेस में मजदूर आंदोलन की विविध धाराओं का प्रतिनिधित्व हुआ जिनमें बिग
हिल हेवुड और टाम मान जैसी मशहूर हस्तियां भी शामिल थीं । ट्रेड यूनियनों के
लक्ष्य और कार्यभार,
यूनियनवादी
वर्ग संघर्ष की प्रकृति और यूनियन की रणनीति और कार्यनीति के सवाल पर विभिन्न
धाराओं के बीच जीवंत और यदा कदा तीखी बहसें भी हुईं । 2024 में इसे ब्रिल ने
छापा ।
कम्युनिस्ट
यूथ इंटरनेशनल भी कोमिंटर्न का महत्वपूर्ण सहायक संगठन था । बीसवीं सदी के
पूर्वार्ध में द्वितीय इंटरनेशनल से जुड़े समाजवादी युवा आंदोलन से इसका विकास हुआ
और इसने कोमिंटर्न की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । 1919 और 1921 में इसकी दो
कांग्रेस हुईं जिनकी कार्यवाही और प्रस्ताव माइक ताबेर और बाब श्वार्ज़ के संपादन
में संग्रहित किये गये हैं । यह सामग्री पहली बार अंग्रेजी में आयी है । इसमें
सम्मेलनों के दस्तावेजों के अतिरिक्त नेताओं की बैठकों की कार्यवाही भी शामिल है ।
इन बैठकों में लड़ाकूपन,
युवकों
की अग्रदूत की भूमिका,
कोमिंटर्न
के साथ संबंध के अतिरिक्त क्रांतिकारी युवा संगठन की प्रकृति और उसके कार्यभार के
बारे में लगातार बहसें होती रही थीं । इसे भी ब्रिल से छापा गया है ।
इन
संग्रहों के अतिरिक्त जान रिडेल,
विजय
प्रसाद और नसीफ़ मुल्ला के संपादन में ‘लिबरेट द कालोनीज!
कम्युनिज्म ऐंड कोलोनियल फ़्रीडम 1917-1924’
का
प्रकाशन 2019
में
लेफ़्टवर्ड से,
जान
रिडेल और माइक ताबेर के संपादन में क्लारा जेटकिन की ‘फ़ाइटिंग फ़ासिज्म’ का प्रकाशन 2017 में हेमार्केट
बुक्स से तथा माइक ताबेर के संपादन में इसी तरह हेमार्केट बुक्स से 2021 और 2023 में द्वितीय इंटरनेशनल
की बहसों के दस्तावेजों के दो संग्रह छापे गये हैं । कुछेक
किताबों और संग्रहों के छपने से अधिक यह कहानी एक व्यक्ति के चालीस साला एकनिष्ठ
समर्पण की लोमहर्षक दास्तान है ।
जान
रिडेल का कहना है कि मार्क्स और एंगेल्स ने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र में
मजदूरों के अंतर्राष्ट्रीय क्रांतिकारी संघर्ष का जो आवाहन किया था उससे दो सौ साल
तक मजदूर आंदोलन अनुप्राणित रहा । सामाजिक मुक्ति के इस आंदोलन को ही आगे ले जाने
की कोशिश कोमिंटर्न ने की । उसके इन्हीं प्रयासों को उजागर करने के मकसद से प्रकाशन
की यह योजना चली । इसमें
1919 से 1923 के दौरान की उसकी गतिविधियों
को सामने लाया गया जिस समय लेनिन या उनके साथियों ने इसका नेतृत्व किया । रूसी किसानों
और मजदूरों की क्रांति के वैश्विक प्रसार की आकांक्षा से इसकी स्थापना हुई थी । दस
साल के भीतर ही इस पर स्तालिन का असर दिखायी देने लगा और 1943 में इसे समाप्त कर
दिया गया । फिर भी शुरुआती दिनों में इसने यूरेशिया, अफ़्रीका और अमेरिकी
महाद्वीप के अनेक देशों में पूंजीवाद विरोधी उभार की प्रेरणा दी । खासकर चीन, वियतनाम और क्यूबा
की क्रांतियों का उससे गहरा रिश्ता रहा ।
कोमिंटर्न
की सबसे स्थायी उपलब्धि रणनीति और कार्यनीति के स्तर पर ऐसी धारणाओं को प्रस्तुत करने
में है जिनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है । प्रस्तावों के अतिरिक्त इन
धारणाओं का विकास मौखिक बहसों में भी हुआ । इन बहसों के बारे में विस्तृत लिखित साक्ष्य
मौजूद हैं । कोमिंटर्न की विश्व कांग्रेसों में ये बहसें होती थीं और इन कांग्रेसों
की अवधि अक्सर एकाधिक हफ़्तों तक भी होती थी । इन धारणाओं को इस समय के कार्यकर्ताओं
और विद्वानों को सर्व सुलभ कराने के लिए यह परियोजना शुरू हुई थी । लेनिन के समय के
विश्व क्रांतिकारी आंदोलन के दस्तावेजों को अनूदित, संपादित और प्रकाशित करने की योजना के
तहत यह काम हुआ । अनुमान था कि दसेक साल में दर्जन भर मोटी किताबों के प्रकाशन के साथ
काम पूरा हो जाएगा । भरोसा था कि कोमिंटर्न के समय का सामाजिक और राजनीतिक माहौल दुनिया
भर में बदल चुका है फिर भी कोमिंटर्न के विचार प्रासंगिक हैं ।
कोमिंटर्न
की सक्रियता ने क्रांतिकारी मार्क्सवाद को वैश्विक शक्ति में बदल दिया था । दर्जनों
राजनीतिक पार्टियों और अनेक सहकारी संगठनों में करोड़ो सदस्य संगठित थे । सोवियत संघ
की राजधानी मास्को से इनको भौतिक और बौद्धिक नेतृत्व मिलता था । इसके लिए नेताओं और
प्रकाशनों का व्यवस्थित तंत्र काम करता था । कोमिंटर्न का असर उसके सहकारी संगठनों
के जरिए संसार भर में फैलता था । इनका आपसी समन्वय साम्राज्यवाद विरोधी एकजुटता,
राष्ट्रीय और नस्ली उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष तथा युवकों, स्त्रियों और ट्रेड
यूनियनों की पहल के जरिए होता था ।
आज
भी सामाजिक विकल्प की कल्पना में कोमिंटर्न की भाषा और धारणाओं का उपयोग थाती की तरह
किया जा सकता है । समाज की कल्पना के अतिरिक्त इसकी याद से नीतियों के मूल्यांकन
और परीक्षण का भी वस्तुगत आधार पैदा होता है । रिडेल ने उसी याद को खोजने, सहेजने
और आगामी पीढ़ियों तक ले जाने की कोशिश इन संग्रहों के माध्यम से की है । समाजवादी
धरोहर का उत्खनन इन प्रकाशनों से हुआ है ।
इन
दस्तावेजों की प्राप्ति का कारण है कि कोमिंटर्न ऐसे दौर में पैदा हुआ जब
इलेक्ट्रानिक और फ़िल्म जैसे माध्यम शैशवावस्था में थे और उसने अपने दस्तावेजों को
दर्ज करने पर ध्यान दिया था । लगभग 7000 पृष्ठों में इन दस्तावेजों के ग्यारह
संग्रह छप चुके हैं और बारहवां भी छपने वाला है । लेनिन
के जीवनकाल में कोमिंटर्न की चार आरम्भिक कांग्रेसें हुई थीं और रिडेल उनके ही
दस्तावेजों को महत्वपूर्ण समझते हैं । ये दस्तावेज विभिन्न भाषाओं में 1920 के दशक में छपे थे
लेकिन सोवियत संघ में मौजूद इसके संग्रहालय तक पहुंचना मुश्किल था । प्रकाशन परियोजना
के कर्मियों को अलग अलग देशों के पुस्तकालयों की खाक छाननी पड़ी थी । इस तरह के कुछ
संग्रह भी उपलब्ध थे । हाल के दिनों में इन दस्तावेजों के चीनी अनुवादों का भी संग्रह
छपा है । ये अनुवाद इंटरनेट पर मुफ़्त मिल सकते हैं । दस्तावेजों के संग्रह को अकादमिक
दुनिया में दोयम दर्जे का काम माना जाता है इसलिए किसी ने अड़ंगा लगाने में रुचि नहीं
ली ।
पहले
से मौजूद अनुवादों पर भरोसा करने की जगह दस्तावेजों के नये अनुवाद आज की भाषा में किये
गये । इसके लिए रिडेल ने लोगों को प्रशिक्षित किया । इसमें उन्होंने समाजवादी धारा
के कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त मजदूर वर्ग के इतिहास में रुचि लेने वाले युवकों को एकत्र
किया । कोमिंटर्न के कामकाज की प्रमुख भाषा 1920 दशक में जर्मन थी इसलिए
अधिकांश दस्तावेज भी इसी भाषा में उपलब्ध थे । इसके अतिरिक्त फ़्रांसिसी और रूसी में
भी कुछ दस्तावेज थे । कभी कभी सर्बो-क्रोएशियन, चेक, इतालवी और स्पेनी में
भी कुछ मिल जाता था । इनके विशेषज्ञों से अनुवाद में मदद ली गयी । जैसे जैसे इस परियोजना
के बारे में लोगों को पता चलता गया उन्होंने आगे बढ़कर मदद की पेशकश की । इस तरह सौ
से अधिक कार्यकर्ता इस काम में शामिल हुए । अनुवादों को मूल के अधिक से अधिक निकट लाने
के लिए उनकी जांच परख बार बार की गयी । इसमें थोड़ा समय तो लगा लेकिन अनुवादों की गुणवत्ता
भरोसे के लायक हुई । सबने आपस में भी एक दूसरे से सीखा तथा मदद ली और दी ।
रुकावटें आती रहीं लेकिन काम बढ़ता रहा । पहले दस सालों में छह संग्रह छप गये । इन संग्रहों
को थाम्पसन और हाब्सबाम जैसे स्थापित इतिहासकारों की प्रशंसा प्राप्त हुई । इनका उपयोग
तमाम समाजवादी कार्यकर्ताओं के साथ विश्वविद्यालयी अध्यापकों ने भी खुले दिल से किया
। परियोजना को दस साल में समाप्त हो जाना था लेकिन समय उम्मीद से अधिक लग गया ।
मार्च
1919 में गठित कोमिंटर्न को रिडेल मजदूर वर्ग द्वारा जुझारू अंतर्राष्ट्रीय संघ
बनाने की तीसरी बड़ी कोशिश मानते हैं । इन सभी प्रयासों को प्रेरणा 1848 में छपे
कम्युनिस्ट घोषणापत्र से ही मिली । उसमें पूंजी के स्वामियों और शोषित कामगारों के
बीच टकराव को वैश्विक माना गया था । यह घोषणापत्र प्रवासी क्रांतिकारी जर्मन
मजदूरों की बहुसंख्या वाले एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन के लिए लिखा गया था । 1848 की
यूरोपव्यापी क्रांति की लहर में इसके अनेक सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी
। जल्दी ही इस क्रांति का क्रूर दमन हुआ और इस दमन की वजह से संगठन भी बिखर गया ।
एक दशक बाद जब मजदूर आंदोलन फिर से जागा तो उस अंतर्राष्ट्रवाद की भी वापसी हुई ।
1864 में स्थापित इस संगठन को प्रथम इंटरनेशनल भी कहा जाता है । इसमें तमाम तरह की
वैचारिक धाराओं के लोग शामिल थे । पहले इसमें पुरुष ही थे लेकिन 1867 में इसमें
कार्यकर्ता और नेता के बतौर स्त्रियों की आमद भी हुई । लेनिन ने इसे समाजवाद के
लिए सर्वहारा के अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष की बुनियाद डालने वाला बताया । इसे व्यापक
मजदूर वर्ग का समर्थन मिला । शुरू से ही इसमें मार्क्स और एंगेल्स ने अगुआ की
भूमिका निभाई । उस समय मजदूर वर्ग अपने आपको यूनियनों, पार्टियों और अन्य वर्गीय
संगठनों के माध्यम से संगठित करना शुरू कर रहा था । दुनिया में मजदूरों की सरकार
के पहले प्रयोग पेरिस कम्यून में इसके सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । उसकी
उपलब्धियों और कमजोरियों के बारे में मार्क्स ने एक जोरदार पुस्तिका भी लिखी ।
उसके मूल्यांकन के सवाल पर बाकुनिन इससे अलग हो गये और 1876 में इसका भी अवसान हो
गया ।
बाद
के वर्षों में यूरोप के अनेक द्शों में समाजवादी पार्टियों का उदय हुआ । 1889 में
उन्होंने नये इंटरनेशनल का गठन किया । इनमें तीन देश प्रमुख थे- जर्मनी की सोशल
डेमोक्रेटिक पार्टी और उससे जुड़ी ढेर सारी ट्रेड यूनियनें, ब्रिटेन की बहुतेरी
अराजनीतिक ट्रेड यूनियनें और कुछ छोटे राजनीतिक समूह तथा फ़्रांस की मजबूत क्रांतिकारी
परम्परा के बावजूद आपस में विरोधी समूहों के आंदोलन । इसने कोई आधिकारिक नाम तो
नहीं रखा लेकिन इसे दूसरा या समाजवादी इंटरनेशनल कहा जाता है । विभिन्न देशों और
इलाकों में इसके समर्थकों को अलग अलग तरह की समाजार्थिक स्थितियों का सामना करना
पड़ता था । जर्मनी और ब्रिटेन में उद्योगीकरण होने से वहां के मजदूर संगठित थे
इसलिए वहीं यह इंटरनेशनल भी सबसे मजबूत था । इनके अतिरिक्त अन्य घटक खेतिहर देशों
के थे जहां किसान बहुतायत में थे और मजदूरो की तादाद कम थी । इससे जुड़े समाजवादी
उन देशों में तो संगठित थे ही जिनके पास औपनिवेशिक साम्राज्य था लेकिन वे उन देशों
में भी थे जिन देशों को उपनिवेशवाद के तहत दबाकर रखा गया था । सरकारी दमन के तहत
इन्हें गिरफ़्तारी से लेकर प्रतिबंध तक झेलना पड़ता था । इनकी राजनीतिक संस्कृति में
भी पर्याप्त विविधता थी । इनकी बैठकों में उपनिवेशित देशों के लोगों की भी मौजूदगी
होती थी । इनकी विश्व कांग्रेसों में उपनिवेशवाद का सैद्धांतिक विरोध करते हुए
प्रस्ताव पारित हुए ।
इसकी
अंदरूनी बहसों में वैश्विक मजदूर आंदोलन के आरम्भ से लेकर उस समय तक रणनीतिक
विकल्पों का सवाल छाया रहता था । इनमें एक महत्वपूर्ण मुद्दा अराजकतावाद से जुड़ा
हुआ था । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मजदूर आंदोलन में यह धारा प्रबल थी ।
प्रथम इंटरनेशनल में मार्क्स और एंगेल्स का इस धारा के साथ विवाद मशहूर है । अराजक
लोग किसी भी तरह की राजनीति का विरोध करते थे । इसके तहत चुनावों में भागीदारी से
लेकर राजनीतिक सुधार तथा कानून निर्माण के लिए संघर्ष से परहेज तक शामिल था ।
कांग्रेसों में इनके प्रतिनिधि कम ही आते थे लेकिन किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप पर
लगातार आपत्ति दर्ज करते थे । उनके कारण 1891 में नियम बनाना पड़ा कि राजनीतिक
कार्यवाही के समर्थक संगठन ही दूसरे इंटरनेशनल के सदस्य हो सकते हैं । 1893 और
1896 में भी ऐसे ही प्रस्ताव पारित हुए जिनकी वजह से अराजक धारा इंटरनेशनल से बाहर
हो गयी ।
आम
हड़ताल भी बहस का मुद्दा रही । इसे फ़्रांस के प्रतिनिधियों ने उठाया जो
संघाधिपत्यवाद के प्रभाव में थे । उनके मुताबिक ट्रेड यूनियनें क्रांतिकारी बदलाव
का अनिवार्य औजार है । उन्होंने आम हड़ताल को युद्ध के खतरे का मुकाबला करने के
मामले में मजदूर वर्ग का सर्वोत्कृष्ट और सर्वाधिक कारगर हथियार माना । आम हड़ताल
की क्षमता को बढ़ा चढ़ाकर देखने की इस प्रवृत्ति के विरोध में इसकी सम्भावना को सिरे
से खारिज करने की प्रवृत्ति का जन्म हुआ । आम हड़ताल की धारणा का सबसे प्रबल विरोध
जर्मनी की ट्रेड यूनियनों और उनकी समर्थक डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी की ओर से
आया । जर्मनी में यूनियनों का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा था और इसके साथ ही
उनमें नौकरशाही का विकास हो रहा था । उस समय जर्मनी में मजदूर आंदोलन के सामने
बहुत कानूनी बाधाएं थीं । 1890 में समाजवादी गतिविधियों पर रोक तो हट गयी थी लेकिन
राजनीतिक और यूनियन गतिविधियों पर रोक बरकरार थी । ऐसे में नेताओं को लगता था कि
आम हड़ताल से उनके संगठन को सरकार गैरकानूनी घोषित कर सकती है ।
आम
हड़ताल का संबंध मई दिवस के समारोहों से भी था । 1889 की स्थापना कांग्रेस में ही
अमेरिकी प्रतिनिधियों के प्रस्ताव पर 1 मई को सारी दुनिया में आठ घंटे के काम के
दिन के लिए मजदूरों के प्रदर्शनों और हड़तालों के लिए मंजूर कर लिया गया था । उसके
बाद से ही मई दिवस अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन की ताकत और एकजुटता का प्रतीक हो
गया था । उसे मनाने के तरीके पर भी अनेक कांग्रेसों में बहस हुई । खासकर जर्मनी की
यूनियनों ने उस दिन हड़ताल के आवाहन का विरोध किया और उसकी जगह मई महीने के पहले
रविवार को जुलूस आदि का प्रस्ताव पेश किया । पांच कांग्रेसों में प्रस्ताव पारित
हुए कि जहां सम्भव हो वहां मई दिवस पर हड़ताल हो लेकिन शेष बातों को संबद्ध देश की
स्थितियों के अनुरूप तय किया जाय । रूस में 1905 की क्रांति में आम
हड़ताल ने केंद्रीय भूमिका निभाई थी । इससे समूचे यूरोप के समाजवादियों में तेज बहस
छिड़ गयी कि पूंजीवाद विरोधी संघर्षों और खासकर साम्राज्यवादी युद्ध के प्रतिरोध में
संघर्ष के इस रूप का कैसे इस्तेमाल किया जाए । इंटरनेशनल के शुरुआती दिनों में इन दोनों
सवालों पर सबसे अधिक बहसें हुईं । इन बहसों पर प्रथम इंटरनेशनल की बहसों की छाया थी
।
1900 के
आते आते बहसों के मुद्दे बदलने लगे क्योंकि साम्राज्यवाद के उदय के चलते विश्व राजनीति
में भारी बदलाव आने लगे ।
राजनीतिक
सत्ता हासिल करने की रणनीति के मामले में बहस सुधार अथवा क्रांति के विंदु पर केंद्रित
रही । प्रत्येक सवाल पर प्रस्ताव कहते थे कि मजदूरों के सवाल राजनीतिक सत्ता से जुड़े
हैं इसलिए उस पर पूंजीपतियों और जमींदारों के दबदबे को खत्म करके मजदूर के शासन की
स्थापना जरूरी है । लगभग सभी घटक यह भी मानते थे कि इसके लिए मजदूरों की स्वतंत्र पार्टी
का होना जरूरी है तथा पूंजीपति वर्ग और उसकी पार्टियों को राजनीतिक समर्थन नहीं देना
चाहिए । कुछ मसलों में सुधार हेतु संघर्ष का समर्थन करते हुए भी इंटरनेशनल के घटक समूची
पूंजीवादी व्यवस्था को सुधार लायक नहीं समझते थे । उनके मतानुसार इस समूची समाज व्यवस्था
का आमूल चूल बदलाव आवश्यक था । इस सवाल पर जर्मनी के मशहूर समाजवादी बर्नस्टीन की राय
का उत्तर देना आवश्यक समझा गया । शुरू में वे मार्क्स के समर्थक थे लेकिन 1890 दशक में धीरे धीरे
मार्क्सवाद की राजनीति से दूर होते गये । 1899 में उन्होंने समाजवादी
आंदोलन के क्रांतिकारी मकसद को किताब लिखकर सिरे से खारिज किया । उनकी राय को संशोधनवादी
कहा गया । कुछ लोगों ने उनकी राय का समर्थन भी किया था । इसके कारण बेहद तीखी बहसें
हुईं ।
एक
सवाल सरकारों में भागीदारी का भी था । पूंजीवादी सरकारों में समाजवादियों की
भागीदारी का सवाल 1899 में फ़्रांस की सरकार में समाजवादी नेता द्वारा मंत्री का पद
ग्रहण करने के कारण उठा । अब तक अंतर्राष्ट्रीय मजदूर आंदोलन में ऐसे प्रस्ताव
खारिज किये जाते रहे थे इसलिए इस कदम पर तीखी बहस खड़ी हुई । 1900 और 1904 की
कांग्रेसों की बहसों के आधार पर इंटरनेशनल ने पूंजीवादी सरकारों में समाजवादियों
की भागीदारी की निंदा की । न केवल सरकार में भागीदारी बल्कि पूंजीवादी पार्टियों
के समर्थन की सम्भावना को भी खारिज किया गया । इसे वामपंथी खेमे ने सैद्धांतिक
नीति के रूप में ग्रहण किया । इसके पीछे काउत्सकी की धारणा थी कि सभी पूंजीवादी
पार्टियां बेकार हो चुकी हैं ।
इंटरनेशनल
की अधिकांश पार्टियों ने बर्नस्टीन के संशोधवाद और फ़्रांस में सरकार में भागीदारी
को खारिज किया । इससे दूसरे इंटरनेशनल में क्रांतिकारी मार्क्सवादी खेमे के दबदबे
का पता चलता है । इसी क्रांतिकारी खेमे ने 1919 में कोमिंटर्न की स्थापना की । इस
प्रक्रिया में इंटरनेशनल की 1907 की स्टुटगार्ट कांग्रेस का भारी महत्व है । इसने
पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने वाले क्रांति के पक्षधरों और इसी व्यवस्था में समायोजन के
साथ समाजवाद लाने का सपना देखने वाले अवसरवादियों के बीच विभाजन को ठोस रूप दिया ।
आधुनिक साम्राज्यवाद ने दुनिया पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी । महाशक्तियों के
गठबंधनों के बीच महायुद्ध के मुहाने पर यूरोप खड़ा था । रूस की 1905 की क्रांति ने
पूरी दुनिया में आम हड़ताल और प्रदर्शनों को गति दे दी । साम्राज्यवाद के इस उभार
के समय इंटरनेशनल के सामने सवाल खड़ा हो गया कि सैन्यवाद और उपनिवेशवाद के अपने
दीर्घकालीन विरोध को वह कैसे लागू करेगा । कांग्रेस के भीतर ही उसके इन मूल्यों का
विरोध शुरू हुआ और हफ़्ते भर 25 देशों के 884 प्रतिनिधि इस सवाल पर बहस में उलझे
रहे । सभी प्रतिनिधि युद्ध को पूंजीवाद का स्वभाव मानकर इसके विरोध पर पूरी तरह
सहमत थे । उन्होंने नौसेना और थल सेना के आक्रमणों की भी निंदा की । संकल्प पारित
हुआ कि युद्ध छिड़ जाने पर उसको रोकने का प्रयास किया जाएगा । इसके लिए फ़्रांस के
प्रतिनिधियों ने ज्यां जुआरेस की अगुआई में आम हड़ताल का प्रस्ताव किया । बेबेल के
नेतृत्व में जर्मन प्रतिनिधियों ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति प्रकट की । रोजा और
लेनिन ने 1905 की रूसी क्रांति का उदाहरण देते हुए युद्ध के विरोध को क्रांति के
प्रयास से जोड़ा । प्रस्ताव की भाषा ऐसी बनायी गयी जिससे जुआरेस भी संतुष्ट थे और
बेबेल को भी आपत्ति नहीं रही । बोल्शेविकों ने बाद में प्रस्ताव को अस्पष्ट और
अंतर्विरोधी कहा । बेबेल और जुआरेस ने युद्ध में अपने अपने देश के शासकों का साथ
दिया । उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए संघर्ष में यह नीति सही होती लेकिन फ़्रांस और
जर्मनी जैसे देशों के लिए ठीक नहीं थी । इसी तरह उपनिवेशवाद के सवाल पर भी उसे
पूरी तरह खारिज करने का विरोध किया गया क्योंकि उसमें सभ्यता लाने की सम्भावना भी
देखी गयी । माना गया कि यूरोप में समृद्धि के लिए उपनिवेशों पर कब्जा जरूरी है ।
जब काउत्सकी ने उपनिवेशित लोगों के प्रति नरमी का प्रस्ताव रखा तो उनका मजाक उड़ाते
हुए हथियारों की जरूरत बतायी गयी । पारित प्रस्ताव में कहा तो यही गया कि सभ्यता
का तर्क कब्जे और शोषण के लिए परदे का काम करता है लेकिन मत विभाजन में बहुत कम
अंतर था । विरोध में अधिकतर उन देशों के प्रतिनिधि रहे जिनके उपनिवेश थे । इसे
लेनिन सर्वहारा की चेतना में पतन का सबूत माना ।
आप्रवास
के सवाल पर भी ऐसा ही तनाव नजर आया । कुछ प्रतिनिधि चीन और जापान से मजदूरों के
आप्रवास पर प्रतिबंध के पक्ष में थे क्योंकि उन्हें हड़ताल तोड़क की तरह इस्तेमाल
किया जाता था । इस पर जापान के प्रतिनिधि ने आपत्ति जाहिर की । कांग्रेस ने कोई
स्पष्ट राय नहीं प्रकट की । स्त्री मताधिकार के सवाल पर भी उलझन नजर आयी । पुरुष
मताधिकार की लड़ाई पर जोर देने के पक्ष में काफी लोग थे । इसके बावजूद सार्विक
मताधिकार की मांग की गयी । ट्रेड यूनियनों की भूमिका पर भी बहस थी । कुछ लोग
उन्हें वेतन और काम के हालात जैसे रोजमर्रा के मुद्दों तक सीमित रखना चाहते थे और
व्यापक सामाजिक तथा राजनीतिक सवालों से परहेज रखने के हिमायती थे । लेकिन इस मामले
में ट्रेड यूनियनों तथा समाजवादी पार्टियों के बीच घनिष्ठ रिश्ते की नीति ही मानी
गयी और निष्पक्षता की नीति को अमान्य किया गया ।
कहने
की जरूरत नहीं कि ये सभी मामले हमारे समय के लिए भी प्रासंगिक हैं । इनका आपसी जुड़ाव
भी स्पष्ट है । इसीलिए इन पर विभिन्न समूहों के रुख के मामले में भी संगति नजर आती
है । इन सवालों पर इंटरनेशनल की समझ की अस्पष्टता भी जाहिर हो जाती है । इससे यह भी
साफ होता है कि किस कारण लेनिन आदि क्रांतिकारियों को इससे अलग होना पड़ा था । इसके
बावजूद रिडेल का मानना है कि इसने अंतर्राष्ट्रीय मजदूर वर्ग के आंदोलन को मार्क्सवाद
के झंडे तले एकताबद्ध किया । इसने इस विचार को भी लोकप्रिय बनाया कि समाजवाद की स्थापना
में पहला कदम पूंजीपति को शासक वर्ग की हैसियत से क्रांति के जरिए उखाड़ फेंकना और उसकी
जगह सर्वहारा का शासन कायम करना है ।
1889
की
स्थापना कांग्रेस में ही कहा गया कि श्रम और मनुष्यता की मुक्ति सर्वहारा की अंतर्राष्ट्रीय
कार्यवाही के बिना सम्भव नहीं है । इसके लिए उसे वर्ग आधारित पार्टियों में संगठित
होना होगा । वे ही राजनीतिक सत्ता से पूंजीपति वर्ग को जबरन बेदखल करेंगी और उत्पादन
के साधनों का सामाजिक अधिग्रहण करेंगी । इंटरनेशनल के प्रस्तावों में पूंजीवादी व्यवस्था
का बुनियादी विरोध नजर आता है । मजदूरों के हित में तमाम सुधारों को इंटरनेशनल ने बुलंद
किया । आठ घंटे का कार्यदिवस,
राज्य
प्रायोजित बीमा और पेंशन,
सरकारी
शिक्षा,
स्त्री
मताधिकार,
शरण
पाने का अधिकार आदि उनमें से कुछ उपाय हैं । यह भी कहा गया कि पूंजीवाद की बुराइयों
से इन सुधारों के सहारे निजात नहीं मिल सकती । इसके लिए राजनीतिक सत्ता पर मजदूर वर्ग
के कब्जे का आवाहन किया गया । बड़े उद्योगों से पूंजीवादी स्वामित्व समाप्त करने का
नारा दिया गया और मजदूर वर्ग की मुक्ति को उसका ही कार्यभार समझा गया ।
1
मई
को मजदूर दिवस
1889 की
स्थापना कांग्रेस में ही घोषित कर दिया गया और 1910 में आठ मार्च को कामगार
स्त्री के पूर्ण राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों के संघर्ष हेतु घोषित स्त्री दिवस भी
इसी इंटरनेशनल की देन हैं । इससे संगठित मजदूर वर्ग को सम्भावित क्षमता का अंदाजा
मिला । तमाम देशों में इससे जुड़े सदस्यों तथा समर्थकों और मतदाताओं को मिलाकर बहुत
ही बड़ी संख्या हो जाती है । संसदों तथा क्षेत्रीय और स्थानीय निकायों में ढेर सारे
समाजवादी प्रतिनिधि चुने गये । उस दौर के बहुत सारे मजदूरों को ताकत की इस
बढ़ोत्तरी से गहरा विश्वास पैदा हुआ कि समाज का क्रांतिकारी बदलाव बहुत दूर नहीं है
।
इन
उपलब्धियों के बावजूद रिडेल ने इसकी समस्याओं और कमजोरियों का भी जिक्र किया है ।
लगता है कि कोमिंटर्न का गठन करते हुए उसके नेताओं ने इन कमजोरियों को ध्यान में
रखा और एकताबद्ध तथा अनुशासित संगठन बनाने पर सबसे अधिक जोर दिया । इसकी सबसे बड़ी
समस्या इसी मोर्चे पर थी । वह विभिन्न देशों की पार्टियों और ट्रेड यूनियनों का
संघ था जिनके बीच किसी समन्वित दिशा का अभाव था । शुरू के दिनों में इसने नीति और
रणनीति संबंधी मसलों पर अपने संबद्ध घटकों के लिए नैतिक प्राधिकार के सहारे अनेक
फैसले किये । उस समय एंगेल्स भी किसी मजबूत केंद्र के गठन का विरोध कर रहे थे ।
उन्हें यह आशंका थी कि विभिन्न सुधारवादी धाराओं के मजबूत दबाव से ऐसा कोई भी
केंद्र टूट जाएगा । लेकिन कमजोर केंद्र बाद में बड़ी समस्या की तरह नजर आने लगा ।
फैसलों को लागू करने की कोई व्यवस्था नहीं होने को कमी मानकर 1900 में केंद्रीय
ब्यूरो का गठन किया गया लेकिन समस्या बनी रही । अगर कोई समन्वित कदम उठाया भी गया
तो वह विभिन्न पार्टियों के आपसी संबंध के कारण था न कि किसी केंद्रीय निकाय के
फैसले के चलते । प्रथम इंटरनेशनल में इसके मुकाबले केंद्र मजबूत हुआ करता था ।
इसकी दूसरी बड़ी समस्या भौगोलिक सीमा थी । अनेक देशों में विस्तार के बावजूद यूरोप
और अमेरिका ही इसकी सक्रियता के दायरे में रहे । हालांकि कांग्रेसों के प्रस्तावों
में औपनिवेशिक उत्पीड़न का विरोध किया जाता था लेकिन अधिकांश लोगों को उपनिवेशवाद
विरोधी संघर्षों की खास खबर नहीं थी । इसके अलावे मजदूर वर्ग के सहयोगी के बतौर
किसानों की भूमिका भी इसके प्रस्तावों में नजर नहीं आती । कुल मिलाकर इसकी कथनी और
करनी में अंतर था । प्रथम विश्वयुद्ध के शुरू होते ही इसकी समस्याओं ने विस्फोटक
रूप ग्रहण कर लिया और इसके नेताओं ने अपने सभी वक्तव्यों से किनारा करते हुए अपने
देशों के शासकों का दामन पकड़ लिया । उनके आवाहन पर हजारों मजदूर तोप का चारा बनने
के लिए मोर्चे पर रवाना हुए । उनके इस वैचारिक दिवालिया दृष्टिकोण ने इंटरनेशनल के
इस अध्याय का अंत कर दिया । इन समस्याओं को कोमिंटर्न ने उपनिवेशित देशों के
मुक्ति आंदोलनों और किसान आंदोलन के साथ खुद को जोड़कर और विस्तार देकर हल किया
।