Tuesday, December 20, 2016

इंटरनेशनल का यूरोप व्यापी विकास और फ़्रांको-प्रशियाई युद्ध का विरोध


1860 दशक का उत्तरार्ध और 1870 दशक का पूर्वार्ध सामाजिक टकरावों से भरा हुआ समय था । जिन ढेर सारे मजदूरों ने विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया उन्होंने इंटरनेशनल से संपर्क साधने का फैसला किया । इंटरनेशनल की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल रही थी और सीमित साधनों के बावजूद जनरल कौंसिल ने अपने यूरोपीय प्रभागों के साथ एकजुटता की अपीलों का जवाब देने और चंदा एकत्र करने में कभी कोताही नहीं बरती । उदाहरण के लिए जब मार्च 1869 में ऐसा ही हुआ जब बासेल में 8000 रेशम के रंगरेजों और फीता बुनकरों ने समर्थन की अपील की । जनरल कौंसिल अपने कोश से तो मात्र 4 पौंड ही भेज सकी लेकिन इसके द्वारा जारी सर्कुलर के चलते विभिन्न देशों में अनेक मजदूर समूहों ने 300 पौंड एकत्र किया । इससे भी महत्वपूर्ण था न्यूकैसल के इंजीनियरिंग मजदूरों का काम के घंटे 9 तक ही सीमित रखने का संघर्ष जिसमें इंटरनेशनल के भेजे दो दूतों, जेम्स कोन (कोहेन, आज्ञात) और इकारियस ने मालिकों द्वारा महाद्वीप से अन्य मजदूर ले आने की कोशिशों को रोकने में प्रमुख भूमिका निभाई । इस हड़ताल की सफलता पूरे देश में समारोह में तब्दील हो गई और इससे अंग्रेज पूंजीपतियों को चेतावनी मिली । उसके बाद से उन्होंने समुद्र पार से मजदूर भर्ती करना छोड़ दिया ।
1869 में समूचे यूरोप में इंटरनेशनल का प्रचुर विस्तार हुआ । बहरहाल इस मामले में ब्रिटेन अपवाद रहा । अगस्त में बर्मिंघम में संपन्न ट्रेड्स यूनियन कांग्रेस ने संस्तुति की कि इसके सभी सदस्य संगठन इंटरनेशनल में शामिल हो जाएं । लेकिन यह अपील अनसुनी रही और संबद्धता का स्तर कमोबेश 1867 के समान ही रहा । हालांकि यूनियन के नेताओं ने साझेदारीवादियों के विरुद्ध मार्क्स का पूरी तरह साथ दिया लेकिन सैद्धांतिक मुद्दों के लिए उनके पास खास समय नहीं था और वे क्रांतिकारी तेवर में पगे भी नहीं । इसी कारण से मार्क्स लंबे समय तक जनरल कौंसिल से अलग इंटरनेशनल के ब्रिटिश संघ की स्थापना का विरोध करते रहे ।
प्रत्येक यूरोपीय देश में जहां भी इंटरनेशनल थोड़ा मजबूत था उसके सदस्यों ने मौजूदा संगठनों से पूरी तरह स्वायत्त नए संगठनों को जन्म दिया, अपनी संख्या के मुताबिक स्थानीय प्रभाग बनाए और/या राष्ट्रीय संघों का निर्माण किया । बहरहाल ब्रिटेन में यूनियनें ही इंटरनेशनल की मुख्य ताकत थीं और स्वाभाविक रूप से उन्होंने अपने सांगठनिक ढांचों को बरकरार रखा । इसके अतिरिक्त लंदन स्थित जनरल कौंसिल को विश्व मुख्यालय और ब्रिटेन के लिए नेतृत्व के दो काम एक साथ करने होते थे । जो भी हो ट्रेड यूनियनों की संबद्धता के चलते इसके प्रभाव में लगभग 50000 मजदूर थे जबकि उसी समय समूचे महाद्वीप में इटरनेशनल की अग्रगति जारी थी ।
फ़्रांस में द्वितीय साम्राज्य की दमनकारी नीतियों के चलते 1868 का साल इंटरनेशनल के लिए गंभीर संकट का साल बन गया । एकमात्र रुएं को छोड़कर इसके सभी प्रभाग लुप्त हो गए । बहरहाल अगले साल संगठन को पुनर्जीवन मिला । बासेल कांग्रेस के बाद तोलें अब इसका नेता नहीं रह गया था, वार्लिन जैसे नए नेता जिन्होंने साझेदारीवाद से नाता तोड़ लिया था वे नेता बने । 1870 में इंटरनेशनल के विस्तार का चरम क्षण आया लेकिन उसकी असली सदस्य संख्या उस काल्पनिक संख्या से काफी कम थी जो कुछ लेखकों के दिमाग की उपज और लोगों में प्रचारित थी । यह बात भी याद रखनी चाहिए कि पर्याप्त वृद्धि के बावजूद संगठन फ़्रांस में उस समय मौजूद 90 विभागों में से 38 में जड़ें नहीं जमा सका था । यह संभव है कि पेरिस में सदस्यता 10000 तक पहुंच गई रही हो, जिसमें अधिकांश की संबद्धता सहकारी सोसाइटियों, ट्रेड एसोसिएशनों और प्रतिरोध सोसाइटियों के जरिए इंटरनेशनल से थी । कड़ाई से लगाए गए अनुमान रुएं और ल्यों में तीन तीन हजार की संख्या का संकेत करते हैं (इन जगहों पर सितंबर 1870 में विद्रोह के फलस्वरूप जनता के कम्यून की घोषणा हुई थी जिसे बाद में रक्त में डुबा दिया गया) । इनके अतिरिक्त मार्सेलीज मे 4000 से कुछ अधिक सदस्य थे । पूरे देश में कुल सदस्य 30000 से कुछ अधिक होने का अनुमान है । इस तरह हालांकि फ़्रांस में इंटरनेशनल सही मायनों में जन संगठन नहीं बना फिर भी इसका आकार बड़ा था तथा इसमें व्यापक रुचि पैदा हुई थी । इसका अंदाजा हम जनरल कौंसिल को पोजीटिविस्ट प्रोलेतेरियन्स आफ़ पेरिस की ओर से सौंपे गए सदस्यता के आवेदन से लगा सकते हैं । 1870 के बाद से ब्लांकी के कुछ अनुयायियों ने भी प्रूधोंपंथी नरमदली प्रेरणा से बने संगठन के प्रति अपनी शुरुआती हिचक पर विजय पाई और मजदूरों में इसके प्रति उत्साह देखकर खुद भी इसमें शामिल होना शुरू किया । निश्चय ही 1865 के बाद से काफी पानी बह चुका था जब तोलें और फ़्रिबोर्ग द्वारा स्थापित इंटरनेशनल के फ़्रांसिसी प्रभागों को सम्मानजनक “अध्ययन सोसाइटी” जैसा कुछ समझा जाता था । फ़्रांस में संगठन के निर्देश अब सामाजिक टकराव और राजनीतिक गतिविधि को बढ़ावा देने पर केंद्रित होते थे ।
बेल्जियम में 1868 की ब्रसेल्स कांग्रेस के बाद का समय संघाधिपत्यवाद के उदय, अनेकानेक विजयी हड़तालों और इंटरनेशनल से ढेर सारी मजदूर सोसाइटियों की संबद्धता का समय था । 1870 दशक के पूर्वार्ध में सदस्य संख्या बढ़कर दसियों हजार तक पहुंच गई, शायद समूचे फ़्रांस की सदस्य संख्या को भी पार कर गई । इसी देश में इंटरनेशनल कुल आबादी में सदस्यों की सघनता तथा समाज में प्रभाव के मामले में सर्वोच्च स्थिति में पहुंचा ।
स्विट्ज़रलैंड में भी इस दौरान सकारात्मक विकास दिखाई पड़ा । 1870 में कुल सदस्य संख्या 6000 थी (कुल लगभग 700000 कामगारों में), जिसमें जेनेवा के 34 प्रभागों के 2000 और जूरा इलाके से 800 सदस्य शामिल हैं । बहरहाल कुछ ही दिनों बाद बाकुनिन की गतिविधियों ने संगठन को दो बराबर हिस्सों में बांट दिया । अप्रैल 1870 में रोमान्डे फ़ेडरेशन की कांग्रेस में दोनों हिस्सों का टकराव ठीक इसी सवाल पर हुआ कि इंटरनेशनल एलायंस फ़ार सोशलिस्ट डेमोक्रेसी को फ़ेडरेशन में शामिल किया जाए या न किया जाए । जब सिद्ध हो गया कि दोनों पक्षों में कोई समझौता होना असंभव है तो दो समानांतर कांग्रेसों की कार्यवाही चलती रही । जनरल कौंसिल के हस्तक्षेप के बाद ही सुलह करने पर सहमति हुई । लंदन से जुड़ा हुआ समूह थोड़ा छोटा तो था लेकिन रोमान्डे फ़ेडरेशन का उसी के हिस्से आया । बाकुनिन से जुड़े हुए समूह को जूरा फ़ेडरेशन नाम अपनाना पड़ा हालांकि इंटरनेशनल के साथ इसको फिर से संबद्धता प्रदान कर दी गई ।
रोमान्डे फ़ेडरेशन के नेता निकोलाई उतिन (1845-83), जिन्होंने जेनेवा में इंटरनेशनल के पहले रूसी प्रभाग की स्थापना की थी, और जोहान्न फिलिप बेकर थे जिन्होंने 1868 की गर्मियों से लेकर फ़रवरी 1870 तक बाकुनिन के साथ जुड़ाव के बावजूद ध्यान रखा कि समूचा स्विस संगठन उनके हाथों में न चला जाए । जो भी हो, जूरा फ़ेडरेशन की मजबूती से इंटरनेशनल के भीतर अराजक-संघाधिपत्यवादी धारा के निर्माण के महत्वपूर्ण दौर का पता चलता है । इसके सबसे प्रमुख व्यक्तित्व युवा जेम्स गिलौमे (1844-1916) थे जिन्होंने लंदन के साथ विवाद में मुख्य भूमिका निभाई ।
इस दौर में बाकुनिन के विचार अनेक नगरों में फैलना शुरू हुए । खासकर वे दक्षिण यूरोप में फैले लेकिन जिस देश में वे सबसे तेजी से पनपे वह था स्पेन । असल में आइबेरियाई द्वीप समूह में इंटरनेशनल का विकास पहली बार नेपल्स के अराजकतावादी जिसेप फ़नेली की गतिविधियों के जरिए हुआ जिसने बाकुनिन के अनुरोध पर अक्टूबर 1868 से वसंत 1869 के बीच इंटरनेशनल के प्रभागों और एलायंस फ़ार सोशलिस्ट डेमोक्रेसी (जिसका वह सदस्य था) के समूहों की स्थापना में मदद के लिए बार्सिलोना और मैड्रिड की यात्राएं कीं । उसकी यात्राओं का मकसद पूरा हुआ । लेकिन उसने अक्सर सभी व्यक्तियों को एक साथ दोनों अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के दस्तावेज पढ़ने के लिए दिए । यह तरीका तत्कालीन बाकुनिनवादी भ्रम और सैद्धांतिक संग्रहवाद का अच्छा नमूना है । स्पेनी मजदूरों ने इंटरनेशनल की स्थापना एलायंस फ़ार सोशलिस्ट डेमोक्रेसी के सिद्धांतों के साथ की । फिर भी फ़नेली ने अनसेल्मो लोरेन्ज़ो (1841-1914) जैसे महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं को इंटरनेशन की ओर खींच लाने सफलता पाई । पहले लोरेन्ज़ो ने प्रूधों की किताबें पढ़ी थीं जिनका स्पेनी अनुवाद भविष्य के स्पेनी राष्ट्रपति फ़्रांसिस्को पी वाइ मार्गल (1824-1901) ने किया था । हालांकि इंटरनेशनल के विचारों का ढेर सारा मिलावटी रूप प्रचारित था फिर भी वे संगठित होने और संघर्ष के लिए उत्सुक पंख तौल रहे मजदूर आंदोलन तक पहुंचने में कामयाब रहे । बासेल कांग्रेस में स्पेनी प्रतिनिधि रफ़ाएल फ़ार्गा पेलिकेर (1840-90) ने दर्जनों प्रभागों की मौजूदगी की बात बताई ।
उत्तरी जर्मन महासंघ में मजदूर आंदोलन के दो राजनीतिक संगठनों- लासालपंथी जनरल एसोसिएशन आफ़ जर्मन वर्कर्स और मार्क्सवादी सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी आफ़ जर्मनी- की मौजूदगी के बावजूद इंटरनेशनल को लेकर कोई उत्साह नहीं था तथा इससे जुड़ने के लिए भी बहुत कम अनुरोध आए । इसके शुरुआती तीन सालों में जर्मन लड़ाकुओं ने अधिकारियों द्वारा दमन के भय से वस्तुत: इसके अस्तित्व की उपेक्षा की । लेकिन 1868 के बाद तस्वीर कुछ हद तक बदली जब इंटरनेशनल की ख्याति और सफलता की गूंज पूरे यूरोप में व्याप्त हो गई । उसके बाद से दोनों प्रतिद्वंद्वी पार्टियां इसकी जर्मन शाखा का प्रतिनिधित्व करना चाहने लगीं । लासालपंथियों के नेता जोहान्न बाप्टिस्ट फ़ोन श्वाइट्ज़र (1833-75) ने अपने जनरल एसोसिएशन को इंटरनेशनल से संबद्ध करने का आवेदन कभी नहीं दिया इसलिए उनके विरोध में लीबक्नेख्त ने मार्क्स के विचारों से अपने संगठन की निकटता का सहारा लेना चाहा लेकिन इंटरनेशनल के साथ उनके संगठन सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी आफ़ जर्मनी की संबद्धता वास्तविक की बजाय औपचारिक (या एंगेल्स के शब्दों में एकतरफ़ा) ही थी जिसमें भौतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता न्यूनतम थी । इसकी स्थापना के एक साल के भीतर पंजीकृत इसके लगभग 10000 सदस्यों में से निजी तौर पर एकाध सौ ने ही इंटरनेशनल की सदस्यता ली (संबद्धता के प्रशियाई कानूनों के तहत यही प्रक्रिया मान्य थी) । कहा जा सकता है कि जर्मनी में इंटरनेशनल की धीमी प्रगति के लिए किसी भी कानूनी बाध्यता के मुकाबले जर्मन लोगों की कमजोर अंतर्राष्ट्रीयता की भावना अधिक जिम्मेदार थी और 1870 के उत्तरार्ध में उसमें ह्रास ही आया क्योंकि आंदोलन भी आंतरिक मसलों में ज्यादा उलझा रहा ।
जर्मनी की कमजोरी की भरपाई दो अच्छी खबरों से हुई । मई 1869 में नीदरलैंड में इंटानेशनल के पहले प्रभागों की स्थापना हुई तथा एम्सटर्डम और फ़्रीसलैंड में उनका धीरे धीरे विकास शुरू हुआ । इसके बाद जल्दी ही इटली में भी इंटरनेशनल ने दस्तक दी जहां पहले यह कुछेक केंद्रों में ही मौजूद थी जिनका आपस में बहुत कम या कोई सम्पर्क नहीं था ।
इससे भी अधिक या कम से कम प्रतीकात्मक तथा आशाजनक खबर अटलांटिक के दूसरे किनारे की हलचलों की थी जहां हाल के वर्षों में पहुंचे हुए प्रवासियों ने संयुक्त राज्य में इंटरनेशनल के पहले प्रभागों की स्थापना शुरू की । बहरहाल संगठन जन्म से ही दो कमजोरियों से ग्रस्त था जिनसे उसे कभी मुक्ति नहीं मिली । लंदन से बार बार प्रेरित किए जाने के बावजूद यह न तो विभिन्न संबद्ध समूहों की राष्ट्रवादी प्रकृति से ऊपर उठ सका और न ही नई दुनिया में जन्मे मजदूरों को अपनी ओर खींच सका । दिसंबर 1870 में जब उत्तरी अमेरिका के लिए इंटरनेशनल की केंद्रीय कमेटी की स्थापना जर्मन, फ़्रांसिसी और चेक प्रभागों ने की तो यह इंटरनेशनल के इतिहास में इस मामले में विचित्र थी कि इसमें केवल ‘विदेश में जन्मे’ सदस्य थे । इस असंगति का सबसे खटकने वाला पहलू यह था कि संयुक्त राज्य में इंटरनेशनल कभी अंग्रेजी भाषा में पत्र नहीं निकाल सका ।
यूरोप के बीचोबीच टकराव का मतलब यह था कि तत्कालीन राष्ट्रवादी लफ़्फ़ाजी से अलग मजदूर आंदोलन को स्वतंत्र रुख अपनाने में मदद करना सबसे बड़ी प्राथमिकता हो गई । फ़्रांको-प्रशियाई युद्ध के सवाल पर अपने पहले संबोधन में मार्क्स ने फ़्रांसिसी मजदूरों का आवाहन किया कि वे लुई बोनापार्त (1808-73) को भगा दें और 18 साल पहले उसके द्वारा स्थापित साम्राज्य को मिटा दें । दूसरी ओर जर्मन मजदूरों की जिम्मेदारी थी कि वे बोनापार्त की पराजय को फ़्रांसिसी जनता पर हमले में बदल जाने से रोकें:
“आर्थिक परेशानी और राजनीतिक विभ्रम वाले पुराने समाज के विपरीत एक नया समाज पैदा हो रहा है जिसका अंतर्राष्ट्रीय नियम शांति होगा क्योंकि इसका राष्ट्रीय शासक सर्वत्र श्रमिक ही होगा । इस नए समाज का अग्रदूत इंटरनेशनल वर्किंग मेन’स एसोसिएशन है ।”
इस दस्तावेज की 30000 प्रतियां (जेनेवा में छपी 15000 जर्मनी और 15000 फ़्रांस के लिए) विदेश नीति के मसले पर इंटरनेशनल का पहला महत्वपूर्ण वक्तव्य हैं । इसके समर्थन में उत्साह के साथ बोलने वाले अनेक लोगों में से एक जान स्टुआर्ट मिल (1806-73) थे । उन्होंने लिखा: ‘इसमें एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो इसमें नहीं होना चाहिए था । इससे कम शब्दों में यह बात कही भी नहीं जा सकती थी ।’

सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी के नेता विलहेल्म लीबक्नेख्त और आगस्त बेबेल (1840-1913) ही उत्तरी जर्मन महासंघ के ऐसे दो संसद सदस्य थे जिन्होंने युद्ध के लिए विशेष बजट पर वोट देने से इनकार किया और इंटरनेशनल के फ़्रांस स्थित प्रभागों ने जर्मन मजदूरों के लिए दोस्ती और एकजुटता के संदेश भेजे । फिर भी फ़्रांस की पराजय ने यूरोप में राष्ट्र-राज्यों के, उनके अंधराष्ट्रवाद समेत, नए और अधिक शक्तिशाली युग के जन्म पर मुहर लगा दी ।

Monday, December 19, 2016

इंटरनेशनल में प्रूधोंपंथियों की पराजय


इंटरनेशनल के एकदम शुरू के ही दिनों से फ़्रांस में, फ़्रांसिसी भाषी स्विट्ज़रलैंड में, वालोनिया में और ब्रसेल्स नगर में प्रूधों के विचारों का दबदबा था । उनके अनुयायियों, खासकर तोलें और अर्नेस्ट एडुवार्ड फ़्रिबोर्ग (अज्ञात) ने 1864 की स्थापना बैठक, 1865 के लंदन सम्मेलन, जेनेवा और लूसान की कांग्रेसों में अपने विचारों के चलते छाप छोड़ी थी ।
4 सालों तक ये साझेदारीवादी इंटरनेशनल के सर्वाधिक नरम दली रहे । संगठन में बहुमत वाली ब्रिटिश ट्रेड यूनियनें भी मार्क्स के पूंजीवाद विरोध से सहमत नहीं थीं लेकिन संगठन की नीतियों पर उनका वैसा प्रभाव नहीं था जैसा प्रभाव डालने में प्रूधों के अनुयायी सक्षम थे ।
इस फ़्रांसिसी अराजकतावादी के सिद्धांतों के आधार पर साझेदारीवादियों का कहना था कि मजदूरों की आर्थिक मुक्ति उत्पादक सहकारी समितियों और जनता का एक केंद्रीय बैंक स्थापित करके हासिल की जा सकती है । किसी भी क्षेत्र में राजकीय हस्तक्षेप के प्रचंड विरोधी ये लोग जमीन और उत्पादन के साधनों के समाजीकरण का विरोध करने के साथ ही हथियार के रूप में हड़ताल के प्रयोग के भी विरोधी थे । उदाहरण के लिए 1868 में भी इंटरनेशनल के कई प्रभाग संघर्ष के इस रूप को नकारात्मक और अर्थतंत्र विरोधी मानते थे । इस मामले में हड़तालों के बारे में लीग प्रभाग की रिपोर्ट प्रतीकात्मक थी: ‘हड़ताल एक संघर्ष है । इसीलिए यह जनता और पूंजीपति वर्ग के बीच खदबदाती हुई नफ़रत को बढ़ा देती है । जिन दो वर्गों को एक दूसरे के साथ घुलना मिलना और एकताबद्ध होना चाहिए उन्हें एक दूसरे से और दूर ले जाती है ।’ जनरल कौंसिल की समझ और थीसिस से इससे अधिक दूरी शायद ही हो सकती थी ।
बिना शक मार्क्स ने इंटरनेशनल में प्रूधों का प्रभाव घटाने के लिए चले लंबे संघर्ष में मुख्य भूमिका निभाई । इसके नेताओं के सैद्धांतिक विकास के लिए उनके विचार बुनियाद की तरह काम करते थे और संगठन के भीतर हरेक निर्णायक टकराव में जीत हासिल करके इन विचारों को बुलंद रखने की अद्भुत क्षमता का उन्होंने प्रदर्शन किया । उदाहरण के लिए सहकारिता के सिलसिले में उन्होंने 1866 में अस्थायी जनरल कौंसिल के प्रतिनिधियों के लिए निर्देश, विभिन्न प्रश्न में उन्होंने पहले ही घोषित किया:
“सामाजिक उत्पादन को मुक्त तथा सहकारी श्रम की एक बड़ी तथा सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था में बदलने के लिए आम सामाजिक परिवर्तनों की, समाज की सामान्य परिस्थितियों में बदलाव की जरूरत पड़ती है जिसे पूंजीपतियों तथा जमींदारों से छीनकर खुद उत्पादकों को, समाज की संगठित ताकतों को, यानी राजकीय सत्ता को सौंपे बिना कभी मूर्त नहीं किया जा सकता है ।”
उन्होंने मजदूरों को सलाह दी कि “वे सहकारी स्टोर की बजाय सहकारी उत्पादन उत्पादन पर ध्यान दें । सहकारी स्टोर वर्तमान आर्थिक व्यवस्था की सतह को ही छूता है जबकि सहकारी उत्पादन इसकी जड़ पर ही चोट करता है ।” बहरहाल मजदूर खुद ही प्रूधोंपंथी सिद्धांतों से परे हट रहे थे । सबसे आगे बढ़कर हड़तालों की बाढ़ ने साझेदारीवादियों की धारणा की गलती का उन्हें यकीन दिला दिया । सर्वहारा वर्ग के संघर्षों ने दिखा दिया कि हड़तालें वर्तमान हालात में सुधार के तात्कालिक साधन के बतौर तो जरूरी हैं ही, भविष्य के समाज निर्माण के लिए आवश्यक वर्गीय चेतना को भी मजबूत बनाती हैं । जीते जागते वास्तविक स्त्री-पुरुषों ने अपने अधिकारों और सामाजिक न्याय की मांग के लिए पूंजीवादी उत्पादन को रोक दिया और इस तरह इंटरनेशनल में तथा समूचे समाज में भी शक्ति संतुलन को बदल दिया । किसी भी सैद्धांतिक बहस के मुकाबले अधिक जोरदार तरीके से पेरिस के तांबा मजदूरों, रूएं और ल्यों के बुनकरों तथा सेंट एटीन के कोयला खनिकों ने इंटरनेशनल के फ़्रांसिसी नेताओं को जमीन और उद्योगों के समाजीकरण की जरूरत समझा दी । और मजदूरों के आंदोलन ने दिखा दिया कि प्रूधों की मान्यताओं के विपरीत समाजार्थिक सवालों को राजनीतिक सवाल से अलगाया नहीं जा सकता ।
1868 में 6 से 13 सितंबर तक ब्रसेल्स कांग्रेस संपन्न हुई । इसमें फ़्रांस, ब्रिटेन, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, स्पेन (1 प्रतिनिधि) और बेल्जियम (पचपन) से कुल 99 प्रतिनिधियों ने भाग लिया । इसी में अंतिम तौर पर साझेदारीवादियों के पंख कतर दिए गए । सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब सदन ने उत्पादन के साधनों के समाजीकरण संबंधी डी पाएपे के प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया- इसके जरिए समाजवाद के आर्थिक आधार को परिभाषित करने के मामले में निर्णायक कदम आगे बढ़ाया गया । यह काम महज कुछ बुद्धिजीवियों के लेखन में नहीं हुआ था बल्कि एक महान अंतर्राष्ट्रीय संगठन के कार्यक्रम में इसे अपनाया गया था । खदानों और परिवहन के बारे में कांग्रेस ने घोषणा की:
1 कोयला खानें, अन्य खानें और खदानें तथा रेलवे सामान्य सामाजिक हालात में समुदाय की संपदा होने चाहिए, जिसका प्रतिनिधित्व राज्य करता है, उस राज्य को भी न्याय के कानून के अधीन होना चाहिए ।
2 कोयला खानें, अन्य खानें और खदानें तथा रेलवे को राज्य वर्तमान व्यवस्था की तरह पूंजीपतियों की कंपनियों को नहीं, बल्कि कामगारों की कंपनियों को संचालन हेतु देगा जो अनुबंध के तहत समाज के लिए रेलवे आदि के तार्किक और वैज्ञानिक संचालन की गारंटी करेंगी और वह भी उस कीमत पर जो कामचलाउ खर्च के जितना भी संभव हो उतना करीब हो । इसी अनुबंध के तहत राज्य को कंपनी का लेखा जोखा जांचने का भी अधिकार सुरक्षित होगा ताकि वह इजारेदारी के पुनर्गठन की किसी भी संभावना को देख सके । एक अन्य अनुबंध के जरिए कंपनियों के प्रत्येक सदस्य और उनके कामगारों के बीच आपसी अधिकारों की गारंटी होनी चाहिए ।
भू-संपत्ति के मामले पर सहमति बनी कि:
“आधुनिक समाज के आर्थिक विकास के चलते खेती लायक जमीन को समाज की साझा संपत्ति में बदलने की सामाजिक आवश्यकता पैदा होगी, तथा राज्य की ओर से जमीन को भी कृषि कंपनियों को खानों और रेलवे के मामले में बताई गई शर्तों के अनुरूप शर्तों पर ही दिया जाएगा ।”
नहरों, सड़कों और टेलीग्राफ पर भी यही बातें लागू होंगी:
“यह मानते हुए कि सड़कों और संचार के अन्य साधनों को भी साझी सामाजिक दिशा की जरूरत है कांग्रेस समझती है कि उन्हें भी समाज की साझा संपत्ति होना चाहिए ।”
अंत में पर्यावरण के बारे में कुछ मजेदार बातें कही गईं:
“यह मानते हुए कि निजी हाथों में जंगलों को छोड़ देने से पेड़ों का विनाश होता है जो वसंत की संरक्षा के लिए और उसी क्रम में जमीन की उत्तम गुणवत्ता के लिए तथा साथ ही आबादी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए जरूरी होते हैं, कांग्रेस समझती है कि जंगलों को समाज की साझा संपत्ति होना चाहिए ।”
इस प्रकार ब्रसेल्स में इंटरनेशनल ने राजकीय प्राधिकार द्वारा उत्पादन के साधनों के समाजीकरण के बारे में पहली बार स्पष्ट वक्तव्य दिया । जनरल कौंसिल की यह महत्वपूर्ण जीत थी और एक बड़े मजदूर संगठन के राजनीतिक कार्यक्रम में पहली बार समाजवादी सिद्धांत प्रकट हुए ।
इसके अतिरिक्त कांग्रेस ने फिर से युद्ध के सवाल पर बहस की । बेकर ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसे संक्षेप में बाद में मार्क्स ने बाद में कांग्रेस के प्रकाशित प्रस्तावों में शामिल भी किया, उसमें कहा गया:
“सभी युद्धों को खत्म करने में केवल मजदूरों का स्पष्टत: तार्किक हित है, और यह हित आर्थिक और राजनीतिक, व्यक्तिगत और राष्ट्रीय है क्योंकि आखिरकार उन्हें ही अपने खून और मेहनत से लड़ने वालों के बीच जीत हार की कीमत चुकानी पड़ती है, चाहे वे जीतने वालों के देश के हों या हारने वालों के देश के ।”
मजदूरों का आवाहन किया गया कि वे सभी युद्धों को ‘गृहयुद्ध’ मानें । डी पाएपे ने इसके विरोध के लिए आम हड़ताल के इस्तेमाल की भी सलाह दी जिस प्रस्ताव को मार्क्स ने ‘बेवकूफी’ कहकर खारिज कर दिया लेकिन असल में जिसका मकसद ऐसी वर्ग चेतना को जन्म देना था जो केवल आर्थिक संघर्षों के परे जाने में सक्षम हो ।
इंटरनेशनल का समूहवादी रुझान अगर ब्रसेल्स कांग्रेस से शुरू हुआ था तो अगले साल 5 से 12 सितंबर तक संपन्न बासेल कांग्रेस ने इसे और ठोस रूप दिया और प्रूधोंपंथ को उसके घरेलू मोर्चे फ़्रांस से भी उखाड़ फेंका । इस बार कांग्रेस में प्रतिनिधियों की संख्या 78 थी जो केवल फ़्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, ब्रिटेन और बेल्जियम से ही नहीं आए थे बल्कि विस्तार का प्रमाण देते हुए स्पेन, इटली और आस्ट्रिया से तथा अमेरिका से नेशनल लेबर यूनियन का भी एक प्रतिनिधि मौजूद थे । इस प्रतिनिधि तथा विलहेल्म लीबक्नेख्त (1826-1900) की मौजूदगी ने कांग्रेस को और शानदार बना दिया तथा इसमें आशा भर दी । लीबक्नेख्त मजदूर वर्ग की पहली संगठित राजनीतिक शक्तियों के प्रतिनिधि थे (कुछ ही हफ़्ते पहले आइजेनबाख में स्थापित सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी आफ़ जर्मनी की ओर से) । इंटरनेशनल द्वारा पूंजी की सत्ता को चुनौती देने के आवश्यक आधार क्षेत्र का साफ तौर पर विस्तार हो रहा था और कार्यवाही के दस्तावेजों तथा गतिविधियों के बारे में कांग्रेस के समक्ष प्रस्तुत आम रिपोर्टों से उपस्थित मजदूरों में उत्साह का संचार हुआ ।
भू-संपत्ति के बारे में ब्रसेल्स कांग्रेस के प्रस्तावों की फिर से पुष्टि की गई, पक्ष में 54 विपक्ष में 4 वोट पड़े और 13 प्रतिनिधियों ने मतदान में भाग नहीं लिया । फ़्रांसिसी प्रतिनिधियों में से यूजीन वार्लिन (1838-71) समेत, जो बाद में पेरिस कम्यून के प्रमुख व्यक्तित्व बने, ग्यारह ने एक नए पाठ का भी अनुमोदन किया जिसमें घोषित था ‘कि समाज को अधिकार है कि वह जमीन का निजी मालिकाना खत्म कर दे और इसे समुदाय की संपत्ति बना दे ।’ इस पर दस प्रतिनिधि मतदान से अनुपस्थित रहे चार (तोलें समेत) ने विरोध में वोट दिया । बासेल के बाद फ़्रांस में इंटरनेशनल साझेदारीवादी नहीं रही ।

बासेल कांग्रेस इस मामले में भी मजेदार थी कि मिखाइल बाकुनिन ने प्रतिनिधि के बतौर कार्यवाही में भाग लिया । लीग फ़ार पीस ऐंड फ़्रीडम का नेतृत्व हासिल करने में नाकाम होने के बाद बाकुनिन ने जेनेवा में सितंबर 1868 में इंटरनेशनल एलायस फ़ार सोशलिस्ट डेमोक्रेसी की स्थापना की और दिसंबर में इसने इंटरनेशनल में शामिल होने का आवेदन किया । शुरू में जनरल कौंसिल ने इसको खारिज कर दिया । कारण यह बताया कि इंटरनेशनल एलायंस फ़ार सोशलिस्ट डेमोक्रेसी अब भी एक अन्य समानांतर अंतर्राष्ट्रीय ढांचे से जुड़ा हुआ है और इसका एक लक्ष्य ‘वर्गों में बराबरी’ इंटरनेशनल के आधार स्तम्भ वर्ग उन्मूलन से पूरी तरह से भिन्न है । बहरहाल कुछ ही दिनों बाद एलायंस ने अपने कार्यक्रम में सुधार कर लिया और प्रभागों का अपना जाल बंद करने के लिए भी राजी हो गया जिनमें से अनेक वैसे भी सिर्फ़ बाकुनिन की कल्पना में मौजूद थे । 28 जुलाई 1869 को तदनुसार 104 सदस्यों वाला जेनेवा प्रभाग इंटरनेशनल में शामिल किया गया । मार्क्स बाकुनिन को अच्छी तरह से जानते थे लेकिन इस कदम के नतीजों को उन्होंने कम करके आंका था । क्योंकि इस मशहूर रूसी क्रांतिकारी का प्रभाव तेजी से कई स्विस, स्पेनी और फ़्रांसिसी (तथा पेरिस कम्यून के बाद इतालवी भी) प्रभागों में फैला । बासेल कांग्रेस में अपने करिश्माई व्यक्तित्व और तर्क की जोरदार शैली की बदौलत उन्होंने बहस के नतीजों को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की । उदाहरण के लिए विरासत के अधिकार पर मतदान के समय प्रतिनिधियों ने पहली बार जनरल कौंसिल के प्रस्ताव को खारिज कर दिया । साझेदारीवादियों को आखिरकार शिकस्त देने और प्रूधों के भूत को दफ़नाने के बाद मार्क्स को अब एक और भी कठिन प्रतिद्वंद्वी का मुकाबला करना पड़ा जिसने संघाधिपत्यवादी अराजकतावाद नामक एक नई प्रवृत्ति को जन्म दिया और संगठन का नियंत्रण हासिल करना चाहा ।

Saturday, December 17, 2016

नोम चोम्सकी के विचार


                  
                                       
2015 में सिटी लाइट्स बुक्स से नोम चोम्सकी के राजनीतिक लेखों का एक संकलन हेनरी ए गीरू की भूमिका के साथ ‘बीकाज वी से सो’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ । इस भूमिका में गीरू का कहना है कि एक सामाजिक बौद्धिक के रूप में चोम्सकी की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है । वियतनाम युद्ध से लेकर इराक युद्ध तक वे निरंतर सत्ता के विरुद्ध साहस के साथ बोलते रहे हैं । उनके लेखन और विश्लेषण में सैद्धांतिक दृष्टि भी समाई रहती है । उन्होंने उत्पीड़न और तकलीफ को सामाजिक सरोकार में बदल दिया । उन्होंने सिखाया है कि लोकतंत्र को यदि जीवित रखना है तो उसके लिए लड़ना होगा । उनके लेखन में मौजूदा वैश्विक शक्ति संरचना, उत्पीड़क शासन के नए और पुराने तरीके तथा नव उदारवादी नीतियों से उत्पन्न वैश्विक प्रभुत्व और दमनकारी शासन का स्पष्ट सैद्धांतिक राजनीतिक विश्लेषण रहता है । वे सत्ता की एकायामी समझ को सही नहीं मानते । सत्ता बहुमुखी होती है और अनेकानेक भौतिक तथा प्रतीकात्मक उपायों का सहारा लेती है । खासकर चोम्सकी का मानना है कि शिक्षा व्यस्था भी सत्ता का ही बनाया हुआ एक उपकरण होता है । इसके अलावे सत्ता जन संपर्क का उद्योग की तरह संचालन करती है । वह वर्तमान और उदीयमान सांस्कृतिक उपकरणों का भी उपयोग कल्पना पर कब्जा करने तथा सहमति बनाने के लिए करती है । इन्हीं के जरिए वह अस्मिताओं को आकार देती है और इच्छाओं-आकांक्षाओं को मनोनुकूल रूपों में ढालती है ।
चोम्सकी लोकतंत्र के वादे और असलियत के बीच की खाई को लगातार उजागर करते रहते हैं । ऐसा वे अमेरिका के मामले में तो करते ही हैं, दुनिया के अन्य देशों में भी अगर लोकतंत्रीकरण के नाम पर दमन के विविध तरीकों को छिपाने की कोशिश होती है तो वे उसका पर्दाफाश करते हैं । चोम्सकी ने लोकतंत्र के वादे को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश की है और इसके लिए वे जनता को लोकतंत्र के रचयिता की भूमिका में खड़ा करना चाहते हैं । मनुष्य की सामाजिक कल्पना को आजाद करने के लिए  वैयक्तीकरण और निजीकरण की नवउदारवादी परियोजना पर वे प्रहार करते हैं क्योंकि इसके पीछे विनिमय मूल्य के ही एकमात्र मूल्य रह जाने की मान्यता अंतर्निहित होती है । जहां अन्य बौद्धिक जन शैक्षिक कठघरों और पेशेवर कठोरता में फंस जाते हैं वहीं चोम्सकी संपूर्णता के परिप्रेक्ष्य से सोचते और बोलते हैं । ऐसा करते हुए वे किसी खास ऐतिहासिक मौके पर लोगों के जीवन को आकार देने वाली आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक ताकतों की व्यापक समझ के लिहाज से तमाम किस्म के मुद्दों को आपस में जोड़ते हैं । वैश्विक प्रतिरोध आंदोलनों के भीतर नागरिक, सामाजिक और नैतिक पहलुओं को जोड़ने के प्रमुख साधन के बतौर वे लगभग स्वत:स्फूर्त तौर पर एकजुटता और सामूहिक संघर्ष का तरीका अपनाते हैं । सामाजिक बौद्धिक के बतौर उनकी भूमिका के साथ ही असली लोकतंत्र के स्वरूप का सवाल भी जुड़ा हुआ है । वे इस मोर्चे पर आदर्श और आचरण के बीच की खाई पर उंगली रखते हैं और बताते हैं कि इसकी स्थापना के लिए कौन सी ताकतें जरूरी हैं ।
चोम्सकी आतंकवाद, कारपोरेट सत्ता और अमेरिकी विशेषता के बारे में बात करते हुए ऐसे नक्शे मुहैया कराते हैं जिनके सहारे राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में संभावित प्रतिरोध के नए धरातल तलाशे जा सकें । उन्होंने राजनीतिक और आर्थिक विकल्पों की संभावना पर भी विचार किया है । इसके लिए उन्होंने रचना और प्रतिरोध के सामूहिक बोध की नई भाषा प्रस्तुत की है, जन साधारण की नई समझदारी निर्मित की है तथा राजनीति, संस्कृति, वित्त और पूंजी की अधुनातन संस्थाओं के बीच रिश्तों का पुनर्लेखन किया है । फिर भी इनसे निजात पाने का उन्होंने कोई तैयारशुदा तरीका नहीं बताया है बल्कि ऐतिहासिक सीमाओं के भीतर सृजनात्मक प्रतिरोध के उभरते हुए नए रूपों की पहचान कराई है । उनका लेखन अत्याचार, क्रूरता, वित्तीय बर्बरता और बढ़ती हुई तानाशाही के दिनों में सामाजिक बुद्धिजीवियों की जरूरत के लिहाज से महत्वपूर्ण है । वे बौद्धिक गतिविधियों और राजनीति के बीच विभाजन पैदा करने की कोशिशों का विरोध करते हैं और मानते हैं कि स्कूल के भीतर और बाहर शिक्षा का मतलब सत्य की खोज की बजाय स्वतंत्रता को साकार करना है । उन्होंने बल देकर कहा है कि शिक्षकों, कलाकारों, पत्रकारों और अन्य बुद्धिजीवियों का कर्तव्य लोगों को वह ज्ञान और कौशल मुहैया कराना है जिससे वे आलोचनात्मक चिंतन सीख सकें, शासित होने के विपरीत शासन चलाने की क्षमता अर्जित कर सकें । उनके मुताबिक बौद्धिकों को ऐसा नैतिक रचनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध विकसित करना होगा जो सत्ता को जवाबदेह बनाने के लिए जरूरी है । इससे सबके लिए मुक्त, स्वतंत्र, सम्मानजनक और न्यायपूर्ण जीवन जीने की संभावना बढ़ेगी ।
चोम्सकी का कहना है कि किसी भी स्वस्थ समाज में विश्वविद्यालयों को आर्थिक और सामाजिक न्याय के लिए दबाव बनाना होगा और सार्थक शिक्षा को विध्वंसक भूमिका निभानी होगी । शिक्षा के बारे में उनका यकीन है कि कानूनी हिंसा के युग में उसे शांतिभंग का दायित्व निभाना चाहिए, ऐसे ज्ञान का सृजन करना चाहिए जो यथास्थिति का विरोधी हो । उनका यह भी कहना है कि बुद्धिजीवियों को व्यापक जन समुदाय तक अपनी आवाज पहुंचानी चाहिए और सार्वजनिक जीवन के उन क्षेत्रों में जरूर सुनाई पड़ना चाहिए जहां ज्ञान, मूल्य, सत्ता, पहचान, रचना और सामाजिक सृजन का संघर्ष चल रहा हो । उनका कहना है कि शासन पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए सत्ता अज्ञान का उत्पादन करती है । अज्ञान ऐसा शैक्षिक औजार है जिसके जरिए चिंतन का गला घोंटकर अराजनीतिक वातावरण बनाया जाता है । इससे राजनीति के लिए आवश्यक विवेक और चिंतन की उपेक्षा होने लगती है । इससे सहमति बनाने में आसानी तो होती ही है विरोध को कुचला भी जा सकता है । अज्ञान ऐसा राजनीतिक हथियार है जो ताकतवर लोगों के काम आता है । वित्तीय कुलीन वर्ग और उनके पैरोकार आम जनता को इकट्ठा नहीं होने देना चाहते इसलिए वे उन्हें बिखेरने की कोशिश करते रहते हैं । उनका कहना है कि ऐतिहासिक स्मृति और सामाजिक तथा व्यक्तिगत कर्तापन पर हमले जारी हैं और यह व्यापक राजनीतिक सवालों से जुड़ा हुआ मुद्दा है ।

इंटरनेशनल की बढ़ती ताकत


1866 के उत्तरार्ध के बाद अनेक यूरोपीय देशों में हड़तालों में तेजी आई । मजदूरों की भारी संख्या द्वारा संगठित इन हड़तालों ने उनमें अपने हालात की चेतना को जन्म दिया और संघर्षों की नई और महत्वपूर्ण लहर पैदा हुई ।
हालांकि उस समय की कुछ सरकारों ने जन विक्षोभ के लिए इंटरनेशनल को दोषी ठहराया लेकिन उनमें शामिल अधिकांश मजदूरों को इसके अस्तित्व के बारे में भी पता नहीं था; उनके विरोध प्रदर्शनों का मूल कारण काम और जीवन के कठिन हलात थे जिन्हें सहने के लिए वे मजबूर थे । फिर भी इन गोलबंदियों ने इंटरनेशनल के साथ सम्पर्क और संयोजन के नए दौर को जन्म दिया क्योंकि उसने एकजुटता की घोषणा और आवाहन के जरिए उनका समर्थन किया, हड़तालियों के लिए चंदा जुटाया और मालिकों द्वारा मजदूरों के प्रतिरोध को कमजोर करने की कोशिशों का जवाब देने में मदद की ।
इस दौर में इंटरनेशनल की व्यावहारिक भूमिका के चलते मजदूरों ने उसे अपने हितों की रक्षा करने वाले संगठन के बतौर मानना शुरू किया और कुछेक मामलों में उससे जुड़ने की मांग की । इसके समर्थन से फ़रवरी-मार्च 1867 की पेरिस के तांबा मजदूरों की हड़ताल में पहली जीत मिली । इसके साथ ही फ़रवरी 1867 में मार्शिएन के इस्पात मजदूरों की हड़ताल, अप्रैल 1867 से फ़रवरी 1868 तक चलने वाला प्रोवेन्काल खनिज बेसिन का लंबा विवाद, 1868 के वसंत में चार्लेरोइ खनिकों की हड़ताल और जेनेवा के निर्माण मजदूरों की हड़ताल भी सफल रहे । इन सभी घटनाओं में स्थिति एक समान ही रही: दूसरे देश के मजदूरों ने हड़तालियों के समर्थन में चंदा जुटाया तथा उनके बदले में काम न करने का संकल्प किया अन्यथा वे भाड़े के औद्योगिक हत्यारे बन गए होते । इसके कारण मालिकों को हड़तालियों की अनेक मांगों पर समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा । जो नगर कार्यवाही का केंद्र बने वहां इंटरनेशनल के सैकड़ों नए सदस्य भर्ती हुए । बाद में जनरल कौंसिल की एक रपट में कहा गया: ‘इंटरनेशनल वर्किंग मेन’स एसोसिएशन ने लोगों को हड़ताल में नहीं धकेला, बल्कि हड़तालों ने ही मजदूरों को इंटरनेशनल वर्किंग मेन’स एसोसिएशन की ओर ठेल दिया ।’
इस तरह राष्ट्रीयता, भाषा और राजनीतिक संस्कृति संबंधी विविधताओं से जुड़ी हुई तमाम दिक्कतों के बावजूद इंटरनेशनल ने नाना प्रकार के संगठनों और स्वत:स्फूर्त संघर्षों के साथ एकता और संयोजन हासिल करने में सफलता पाई । इसका सबसे बड़ा गुण यह था कि इसने शुरुआती उद्देश्यों और रणनीतियों की आंशिकता से निर्णायक तौर पर परे जाकर वर्गीय एकजुटता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की जरूरत को जाहिर कर दिया ।
1867 के बाद से ही इन लक्ष्यों को हासिल करने की सफलता से प्राप्त मजबूती तथा व्यापक सदस्यता और अधिक सक्षम संगठन के बल पर इंटरनेशनल ने समूचे यूरोपीय महाद्वीप में अग्रगति बढ़ा दी । खासकर फ़्रांस में यह गतिरोध भंग का साल रहा जहां तांबा मजदूरों की हड़ताल का वैसा ही उत्प्रेरक प्रभाव पड़ा जैसा प्रभाव इंग्लैंड में दर्जियों की हड़ताल का पड़ा था । पेरिस में सद्स्यों की संख्या 1000 के करीब पहुंच गई और ल्यों तथा विएन में सदस्य संख्या 500 के पार हो गई । भूमध्य सागर के दक्षिणी तट पर अल्जीयर्स (बहरहाल जिसमें केवल फ़्रांसिसी मजदूर थे) समेत सात नए प्रभाग स्थापित हुए । बेल्जियम में भी हड़तालों के बाद संबद्धता में बढ़ोत्तरी आई तथा इसी तरह स्विट्ज़रलैंड में भी मजदूरों की लीगों, सहकारी समितियों और राजनीतिक सोसाइटियों ने उत्साह के साथ जुड़ाव का आवेदन किया । अब इंटरनेशनल के केवल जेनेवा में 25 प्रभाग थे जिनमें जर्मन भाषी लोगों का वह प्रभाग भी था जो जर्मन संघ के मजदूरों में प्रचार के लिए आधार का काम करता था ।
लेकिन अब भी ब्रिटेन में ही इंटरनेशनल की उपस्थिति सबसे अधिक थी । 1867 के दौरान दर्जनों अन्य संगठनों की संबद्धता के चलते सदस्यता का आंकड़ा अच्छा खासा 50000 तक चला गया- ध्यान रखें कि सिर्फ़ दो साल में इसे हासिल किया गया था जबकि उस समय यूनियनों में संगठित मजदूरों की कुल तादाद लगभग 800000 रही होगी । किसी भी अन्य देश में इंटरनेशनल की सदस्यता यह स्तर कभी नहीं छू सकी (अगर आबादी के अनुपात में नहीं तो संख्या के मामले में जरूर ही) । बहरहाल 1864-67 की चढ़ान के विपरीत बाद के सालों में ब्रिटेन में एक किस्म का ठहराव रहा । इसकी ढेर सारी वजहें थीं लेकिन मुख्य वजह थी कि, जैसा हमने पहले देखा, इंटरनेशनल फ़ैक्ट्री उद्योगों या अकुशल श्रमिकों की दुनिया में पैठ नहीं बना सका । अकुशल श्रमिकों में एकमात्र अपवाद यूनाइटेड एक्सकेवेटर्स थे जिन्होंने अगस्त 1866 की हड़ताल के बाद संबद्धता ग्रहण की, जबकि उत्तरी और मध्यदेश के बड़े कारखानों में से सदस्यता लेने वाले बिरले संगठनों में से एक मेलेबल आयरनवर्कर्स था । इंटरनेशनल की आवाज न तो कोयला और सूती वस्त्र उद्योगों तक पहुंची, न ही इंजीनियरिंग के मजदूर इससे जुड़े (जिन्होंने अपने तकनीकी कौशल के चलते कभी विदेशी प्रतियोगिता का खतरा महसूस नहीं किया) । इंटरनेशनल से सबसे अधिक तादाद में निर्माण मजदूर जुड़े । 9000 सदस्यों वाली अमल्गेमेटेड सोसाइटी आफ़ कारपेंटर्स ऐंड ज्वाइनर्स के सचिव राबर्ट एपलग्राथ (1834-1924) जनरल कौंसिल के सदस्य थे और इसकी कुल सदस्यता के पांचवें हिस्से का प्रतिनिधित्व करते थे । इसके बाद दर्जी, मोची, बढ़ई, जिल्दसाज, फीता बुनकर, जाल बुनकर, जीनसाज और सिगार बनाने वाले थे- संक्षेप में ऐसे सभी व्यवसायों से जुड़े लोग जिनमें औद्योगिक क्रांति से खास बदलाव नहीं आया था । जनवरी 1867 में लंदन ट्रेड्स कौंसिल ने इंटरनेशनल के साथ सहयोग करने का फैसला किया लेकिन संबद्धता नहीं ग्रहण की । इससे जनरल कौंसिल को अहसास हो गया कि इसका विस्तार मौजूदा प्रभाव क्षेत्र के बाहर नहीं हो सकता ।
मजदूर आंदोलन के बढ़ते संस्थानीकरण ने इंटरनेशनल के जीवन की इस धीमी रफ़्तार में और भी इजाफा किया । रिफ़ार्म लीग के साथ लड़ी गई लड़ाई के चलते बने रिफ़ार्म ऐक्ट के कारण दस लाख से अधिक मजदूरों को मताधिकार मिला । इसके बाद ट्रेड यूनियनों को कानूनी दर्जा मिल गया जिससे उत्पीड़न और दमन का खतरा खत्म हुआ तथा इससे समाज में इस चौथे खम्भे की असली मौजूदगी का अहसास होने लगा । नतीजा यह निकला कि देश के परिणामवादी नेताओं ने सुधार के रास्ते पर चलना जारी रखा । मजदूर वर्ग में अपने फ़्रांसिसी भाइयों के विपरीत शासन के साथ जुड़ाव का बोध गहराता गया क्योंकि उन्होंने भविष्य की अपनी ज्यादातर आशा शांतिपूर्ण बदलाव के साथ जोड़ दी । शेष महाद्वीप में हालात सचमुच बहुत अलग थे । जर्मन संघ में मजदूरी के सवाल पर सामूहिक सौदेबाजी का सवाल ही नहीं था । बेल्जियम में हड़तालों को सरकार युद्ध की कार्यवाही मानकर कुचलती थी । हड़तालें स्विट्ज़रलैंड में तो अपवाद ही थीं जिन्हें बर्दाश्त करना स्थापित व्यवस्था के लिए मुश्किल था । फ़्रांस में घोषणा हुई थी कि 1864 से हड़तालें कानूनी हैं लेकिन आरम्भिक मजदूर यूनियनों को कठोर प्रतिबंधों के तहत ही काम करना पड़ता था ।
1867 की कांग्रेस की यही पृष्ठभूमि थी जिसमें व्यापक आधार पर निरंतर विस्तार से हासिल नई ताकत के साथ इंटरनेशनल एकत्र हुई । द टाइम्स समेत कुछ पूंजीवादी अखबारों ने इसकी कार्यवाही देखने के लिए संवाददाता भेजे । कांग्रेस 2 से 8 सितंबर तक फिर से एक स्विस नगर लूसाने में हुई । इसमें छह देशों से 64 प्रतिनिधि शामिल हुए (इनमें बेल्जियम और इटली से एक एक प्रतिनिधि भी थे) । चूंकि मार्क्स कैपिटल के प्रूफ़ देखने में व्यस्त थे इसलिए तैयारी के लिए लिखे दस्तावेजों के समय जनरल कौंसिल की बैठकों में और कांग्रेस में भी अनुपस्थित रहे । इसका असर साफ साफ महसूस किया गया जिसकी पुष्टि विभिन्न देशों में बढ़ोत्तरी की नीरस रपटों पर कांग्रेस का ध्यान केंद्रित रहने से होती है । इसके साथ ही प्रतिनिधियों की बहुसंख्या के साझेदारीवादी होने के चलते उनके पसंदीदा प्रूधोंपंथी विषयों (मसलन सहकारी आंदोलन और कर्ज का वैकल्पिक उपयोग) पर ज्यादा बातें हुईं ।
इसके अलावे लीग फ़ार पीस ऐंड फ़्रीडम, जिसका स्थापना सम्मेलन इसके तुरंत बाद होने वाला था, के अनुरोध पर युद्ध और सैन्यवाद के सवाल पर भी बातचीत हुई । बहस के दौरान ही इंटरनेशनल के सर्वाधिक सक्रिय और प्रतिभाशाली सिद्धांतकारों में से एक ब्रसेल्स के प्रतिनिधि सेजार डि पाएपे (1841-90) ने वह सूत्र प्रस्तुत किया जो बाद में युद्ध के बारे में मजदूर आंदोलन का शास्त्रीय मत बन गया कि ‘पूंजीवादी व्यवस्था में युद्ध अपरिहार्य हैं’ ।
“अगर जेनेवा (शांति) कांग्रेस के लिए मुझे अपनी भावनाएं व्यक्त करनी हों तो कहूंगा: हम भी शांति से उतनी ही मुहब्बत करते हैं जितनी आप लेकिन हम जानते हैं कि जब तक राष्ट्रीयता या देशभक्ति का सिद्धांत मौजूद है युद्ध होंगे; जब तक अलग अलग वर्ग हैं युद्ध होंगे । युद्ध महज किसी बादशाह की महात्वाकांक्षा का परिणाम नहीं होता-----युद्ध की असली वजह कुछ पूंजीपतियों के हित हैं । युद्ध आर्थिक जगत में असंतुलन का और राजनीतिक दुनिया में संतुलन के अभाव का परिणाम होते हैं ।”

अंतिम बात कि स्त्री मुक्ति के सवाल पर बहस हुई और कांग्रेस ने एक रिपोर्ट के पक्ष में मतदान किया जिसमें कहा गया था कि ‘यातायात और परिचालन के साधनों पर राजकीय स्वामित्व स्थापित करना विभिन्न देशों की कोशिशों का लक्ष्य होना चाहिए’ । इंटरनेशनल की किसी कांग्रेस में अनुमोदित यह पहली समूहवादी घोषणा थी । बहरहाल साझेदारीवादी भू-स्वामित्व के समाजीकरण के पूरी तरह से विरोध में रहे और इस सवाल पर गहराई से बहस को अगली कांग्रेस तक के लिए टाल दिया गया ।

Wednesday, December 14, 2016

इंटरनेशनल का निर्माण

                                            
इंटरनेशनल के जीवन में प्रमुख राजनीतिक घटनाओं तथा मुख्य सांगठनिक पड़ावों के बीच सहकालिकता न होने से इसका इतिहास कालानुक्रम में पुनर्निर्मित करना मुश्किल हो जाता है । सांगठनिक तौर पर प्रमुख पड़ाव थे: 1 इंटरनेशनल का जन्म (1864-66) इसकी स्थापना से पहली कांग्रेस (जेनेवा 1866)तक 2 विस्तार का समय (1866-70) 3 क्रांतिकारी उभार और पेरिस कम्यून (1871-72) के बाद दमन 4 विभाजन और संकट (1872-77) । बहरहाल सैद्धांतिक विकास के लिहाज से प्रमुख पड़ाव थे: 1 इसके विभिन्न घटकों के बीच शुरुआती बहस और इसकी स्थापना (1864-65) 2 समूहवादियों और साझेदारीवादियों के बीच प्रभुत्व का संघर्ष (1866-69) 3 केंद्रवादियों और स्वायत्ततावादियों के बीच टकराव (1870-77) । आगे के पैराग्राफों में सांगठनिक और सैद्धांतिक दोनों पहलुओं को समेटा जाएगा ।
ब्रिटेन में सबसे पहले इंटरनेशनल में शामिल होने का आवेदन हुआ; फ़रवरी 1865 में 4000 सदस्यों वाली ओपरेटिव सोसाइटी आफ़ ब्रिकलेयर्स को संबद्धता मिली, इसके बाद जल्दी ही निर्माण मजदूरों और जूता बनाने वालों के संगठन जुड़े । अपने जीवनकाल के पहले साल में आम परिषद ने इंटरनेशनल के सिद्धांतों का प्रचार करने के लिए गंभीर गतिविधि शुरू की । इससे शुद्ध आर्थिक सवालों के पार अपना क्षितिज विस्तारित करने में इसे मदद मिली । इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि फ़रवरी 1965 में स्थापित (चुनाव) सुधार लीग से जुड़े संगठनों में यह भी था ।
फ़्रांस में इंटरनेशनल की यात्रा जनवरी 1865 में शुरू हुई जब पेरिस में इसका पहला प्रभाग स्थापित हुआ । ल्योन और सेन में अन्य बड़े केंद्र जल्दी ही प्रकट हुए । लेकिन इसकी ताकत बहुत सीमित रही, फ़्रांस की राजधानी में इसका आधार नहीं बढ़ सका और इस दौरान अनेक अन्य मजदूर संगठन इससे बड़े बन गए । इंटरनेशनल का वैचारिक प्रभाव बेहद कम था और अन्य ताकतों के साथ इसके संबंध तथा इसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते कोई राष्ट्रीय संघ स्थापित करना भी असंभव हो गया । फिर भी इंटरनेशनल के फ़्रांसिसी समर्थक जो अधिकतर प्रूधों के साझेदारी के सिद्धांतों के अनुयायी थे वे संगठन के पहले सम्मेलन में दूसरे सबसे बड़े समूह के रूप में स्थापित हुए । यह सम्मेलन लंदन में 25 से 29 सितंबर के बीच हुआ था और इसमें इंग्लैंड, फ़्रांस, स्विट्ज़रलैंड, और बेल्जियम से 30 प्रतिनिधि शामिल हुए थे, जिनके साथ जर्मनी, पोलैंड और इटली के भी कुछ प्रतिनिधि थे । इनमें से सबने इंटरनेशनल की ओर से खासकर सांगठनिक स्तर पर उठाए गए प्रारम्भिक कदमों के बारे में सूचना दी । इस सम्मेलन ने अगली साल पहली आम कांग्रेस बुलाने का फैसला किया और वहां बहस के लिए प्रस्तावित मुद्दों की सूची बनाई ।
इन दोनों जुटानों के बीच इंटरनेशनल का विस्तार यूरोप में जारी रहा तथा बेल्जियम और फ़्रांसिसी भाषी स्विट्ज़रलैंड में इसका पहला महत्वपूर्ण केंद्रक स्थापित हुआ । संबद्धता संबंधी प्रशियाई कानून दूसरे देशों के संगठनों के साथ जर्मन राजनीतिक संघों के नियमित संपर्क पर प्रतिबंध लगाते थे इसलिए इसका मतलब था कि इंटरनेशनल तत्कालीन जर्मन संघ में कोई संभाग नहीं खोल सकता था । वहां इतिहास की पहली मजदूर पार्टी जेनरल एसोसिएशन आफ़ जर्मन वर्कर्स की स्थापना 1863 में हुई थी और उसके 5000 सदस्य थे । इसके नेता लासाल के शिष्य योहान्न बैप्टिस्ट फ़ान श्वाइट्ज़र (1833-75) ओट्टो फ़ान बिस्मार्क (1815-98) के साथ दुबिधापूर्ण संवाद बनाए हुए थे और उन्होंने इंटरनेशनल के जीवन के शुरुआती सालों में इसमें कोई खास रुचि नहीं ली । ऐसी ही उदासीनता मार्क्स से राजनीतिक निकटता के बावजूद विलहेल्म लीबक्नेख्त (1826-90) ने भी दिखाई । स्विट्ज़रलैंड में इंटरनेशनल के प्रमुख नेताओं में से एक योहान्न फिलिप बेकर (1809-86) ने जेनेवा आधारित ‘ग्रुप आफ़ जर्मन स्पीकिंग सेक्शंस’ के जरिए इन कठिनाइयों के बीच रास्ता निकालने की कोशिश की और लंबे दिनों तक जर्मन संघ में वे ही शुरुआती इंटरनेशनल केंद्रक के संगठक रहे ।
इस अग्रगति को इंटरनेशनल के विचारों के साथ सहानुभूति रखने वाले अखबारों या आम परिषद के सच्चे मुखपत्रों के प्रसार से बहुत समर्थन मिला । इन दोनों से वर्गीय चेतना के विकास में योगदान मिला और इंटरनेशनल की गतिविधि के समाचार तेजी से प्रचारित हुए । इसके जीवन के पहले कुछ सालों में जो अखबार निकले उनमें साप्ताहिक बीहाइव और द माइनर ऐंड वर्कमैन’स एडवोकेट (बाद में द वर्कमैन’स एडवोकेट और फिर द कामनवेल्थ), दोनों लंदन से प्रकाशित; फ़्रांसिसी साप्ताहिक ल कूरिए इंतरनेशनल, लंदन से ही प्रकाशित; अगस्त 1865 से बेल्जियम में इंटरनेशनल का आधिकारिक पत्र ल त्रिब्यून द्यू पीपुल, स्विट्ज़रलैंड के फ़्रांसिसी भाषी संभाग का मुखपत्र जर्नल द लासोशिएं इंतरनेशनल; पेरिस से प्रकाशित प्रूधोंपंथी साप्ताहिक ल कूरिएं फ़्रांसुआं और जेनेवा में बेकर का डेर फ़ोरबोटे खास थे ।
इंटरनेशनल के और अधिक सुदृढ़ीकरण के लिए लंदन में आम परिषद की गतिविधि निर्णायक थी । 1866 के वसंत में लंदन अमेल्गमेटेड टेलर्स की हड़ताल का समर्थन करके इसने पहली बार मजदूरों के किसी संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई जिसमें मिली सफलता के चलते दर्जियों की पांच सोसाइटियों ने इंटरनेशनल से जुड़ने का फैसला किया जिनमें प्रत्येक की सदस्य संख्या लगभग 500 थी । कुछ अन्य विवादों के सकारात्मक निपटारे के कारण ढेर सारी छोटी यूनियनें आकर्षित हुईं । नतीजा यह निकला कि इसकी पहली कांग्रेस के समय तक सत्रह यूनियनें इससे संबद्ध हो चुकी थीं जिससे 25000 से अधिक नए सदस्य भर्ती हुए । इंटरनेशनल पहला ऐसा एसोसिएशन बना जो अपनी कतारों में ट्रेड यूनियन संगठनों को शरीक करने का कठिन काम पूरा कर सका ।
जेनेवा शहर में 3 से 8 सितंबर तक इंटरनेशनल की पहली कांग्रेस संपन्न हुई । इसमें ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड से 60 प्रतिनिधि शरीक हुए थे । इंटरनेशनल के पास स्थापना के बाद दो सालों में गर्व करने लायक उपलब्धियों की फ़ेहरिस्त थी । इसने अपने झंडे तले 100 से अधिक ट्रेड यूनियनों और संगठनों को एकत्र कर लिया था । कांग्रेस में भाग ले रहे लोग मूल तौर पर दो खेमों में बांटे जा सकते थे । पहले खेमे में ब्रिटेन के प्रतिनिधि, कुछ जर्मन और ज्यादातर स्विस थे जो मार्क्स (जो जेनेवा में नहीं थे) द्वारा लिखित आम परिषद के निर्देशों पर अमल करते थे । दूसरा खेमा साझेदारीवादियों का था जिनमें फ़्रांसिसी प्रतिनिधि और कुछ फ़्रांसिसी भाषी स्विस थे । असल में उस समय इंटरनेशनल में रुख बहुत प्रचलित था और पेरिस निवासी हेनरी तोलें (1828-97) के नेतृत्व में साझेदारीवादियों ने ऐसे समाज की कल्पना प्रस्तुत की जिसमें कामगार एक ही साथ उत्पादक, पूंजीपति और उपभोक्ता होगा । सामाजिक रूपांतरण का निर्णायक उपाय वे ब्याज रहित ॠण प्रदान करना मानते थे; स्त्री श्रम को नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से आपत्तिजनक समझते थे और काम के रिश्तों में किसी भी सरकारी हस्तक्षेप (काम के 8 घंटे तय करने सहित) का विरोध करते थे । इसका कारण वे यह बताते थे कि ऐसा होने से मजदूरों और मालिकों के बीच के निजी रिश्तों पर खतरा पैदा होगा तथा वर्तमान व्यवस्था मजबूत होगी ।
मार्क्स द्वारा तैयार प्रस्तावों के आधार पर आम परिषद के नेताओं ने कांग्रेस में संख्या के मामले में मजबूत साझेदारीवादियों के खेमे को शिकस्त देने में सफलता हासिल की और राजकीय हस्त्क्षेप के पक्ष में बहुमत हासिल कर लिया । इस मुद्दे पर अस्थायी आम परिषद के प्रतिनिधियों के लिए निर्देश में ‘किशोर और बाल श्रमिक (स्त्री पुरुष दोनों)’ से जुड़े हुए अंश में मार्क्स ने साफ साफ लिखा था:
“इसे तभी लागू किया जा सकता है जब सामाजिक विवेक को सामाजिक शक्ति में बदला जाए और वर्तमान स्थितियों में ऐसे आम कानून के सहारे इसे करने के सिवा अन्य कोई तरीका नहीं है जिस कानून को राज्य की शक्ति से मनवाया जाएगा । ऐसे कानूनों को लागू करवाने में मजदूर वर्ग सरकार की ताकत बढ़ा नहीं रहा होगा । इसके विपरीत जो ताकत इस समय उसके विरुद्ध इस्तेमाल होती है, उसे ही अपने अभिकरण के बतौर रूपांतरित करेगा । जिस चीज को वे ढेर सारे बिखरे हुए निजी प्रयासों के जरिए हासिल करने की व्यर्थ चेष्टा करते हैं उसे ही आम कानून के जरिए हासिल कर लेंगे ।”
इस प्रकार बुर्जुआ समाज को मजबूत करने की बजाय (जैसा गलती से प्रूधों और उनके अनुयायी यकीन करते थे) ये सुधारात्मक मांगें मजदूर वर्ग की मुक्ति का अपरिहार्य आरम्भिक कदम थीं ।
इससे भी आगे, जेनेवा कांग्रेस के लिए लिखे मार्क्स के ‘निर्देश’ ट्रेड यूनियनों की बुनियादी भूमिका पर जोर दे रहे थे जिन ट्रेड यूनियनों का विरोध न केवल साझेदारीवादी बल्कि ब्रिटेन में राबर्ट ओवेन (1771-1885) के और जर्मनी में लासाल के कुछ अनुयायी करते थे:
“ट्रेड यूनियनों की यह गतिविधि न केवल उचित है, बल्कि जरूरी है । जब तक वर्तमान उत्पादन प्रणाली मौजूद है तब तक इसे छोड़ा नहीं जा सकता । इसके बरक्स सभी देशों में ट्रेड यूनियनों के निर्माण और संश्रय के जरिए इसे आम प्रवृत्ति बना देना होगा । दूसरी ओर अनजाने ही ट्रेड यूनियनें मजदूर वर्ग के लिए संगठन केंद्र उसी तरह स्थापित कर रही थीं जिस तरह मध्ययुगीन म्युनिसपलिटियों तथा कम्यूनों ने पूंजीपति वर्ग के लिए संगठन केंद्र स्थापित किए थे । यदि ट्रेड यूनियनों की पूंजी तथा श्रम के बीच छापामार लड़ाई के लिए जरूरत पड़ती है तो वे संगठित शक्ति के रूप में मजूरी श्रम और पूंजी के शासन की व्यवस्था को समाप्त करने के लिए और भी महत्वपूर्ण हैं ।”
इसी दस्तावेज में मार्क्स वर्तमान यूनियनों की आलोचना करने से भी नहीं चूके । क्योंकि वे
“पूंजी के विरुद्ध स्थानीय तथा तात्कालिक संघर्षों में ही खास तौर पर व्यस्त रहती हैं और इसलिए मजूरी गुलामी की व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने की अपनी ताकत को खुद ही अब तक पहचान नहीं सकी हैं । इसलिए उन्होंने अपने को आम सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से बहुत दूर रखा है ।”
ठीक एक साल पहले भी उन्होंने 20 और 27 जून को आम परिषद के समक्ष अपने भाषण में यही बातें कही थीं जो मरणोपरांत मजदूरी, दाम और मुनाफ़ा शीर्षक से छपा:

“मजदूर वर्ग को इन रोजमर्रा के संघर्षों के अंतिम नतीजों को बढ़ा चढ़ाकर नहीं आंकना चाहिए । उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे परिणामों से लड़ रहे हैं, न कि उन परिणामों के कारणों से; कि वे पतन की गति को सिर्फ़ रोक रहे हैं, उसकी दिशा नहीं बदल रहे हैं; कि वे दर्द निवारक का इस्तेमाल कर रहे हैं, रोग का नाश नहीं कर रहे हैं । इसलिए उन्हें पूंजी के निरंतर आक्रमणों या बाजार के परिवर्तनों के कारण लगातार पैदा होने वाले अपरिहार्य गुरिल्ला संघर्षों में फंसकर नहीं रह जाना चाहिए । उन्हें समझना चाहिए कि मौजूदा व्यवस्था मजदूरों पर ढाई जाने वाली तमाम मुसीबतों को पैदा करने के साथ ही समाज के आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक रूपों को भी उत्पन्न करती है । इसलिए मजदूरों को अपने झंडे पर ‘वाजिब काम की वाजिब मजदूरी’ जैसे रूढ़ नारे की जगह यह क्रांतिकारी नारा लिख लेना चाहिए ‘मजूरी व्यवस्था का नाश हो’ ।”

Monday, December 12, 2016

इंटरनेशनल की सदस्यता और संरचना

              
जीवनकाल और बाद के दशकों में भी इंटरनेशनल का चित्रण विशाल और आर्थिक तौर पर मजबूत संगठन के रूप में किया जाता रहा । चाहे अपूर्ण जानकारी के चलते हो या इसके कुछ नेताओं के असलियत को बढ़ा चढ़ाकर बताने के कारण या विरोधियों द्वारा निर्मम दमन का बहाना खोजने की वजह से हो इंटरनेशनल की सदस्यता का हमेशा विस्फारित अनुमान किया गया । जून 1870 में इसके कुछ फ़्रांसिसी नेताओं पर अभियोग लगाने वाले सरकारी वकील ने कहा कि यूरोप में इस संगठन के 8 लाख से अधिक सदस्य हैं; एक साल बाद पेरिस कम्यून की पराजय के बाद टाइम्स ने इसे कुल 25 लाख बताया और अनुदारपंथियों में इसका अध्ययन करने वाला मुख्य मनुष्य आस्कर तेस्तुत (1840-अज्ञात) इसके 50 लाख से अधिक होने का अनुमान लगाता है ।
असल में सदस्य संख्या इससे काफी कम थी । सही अनुमान लगाना हमेशा कठिन रहा और यह बात इसके नेताओं तथा इसका निकट से अध्ययन करने वालों के लिए भी उतना ही सच है । लेकिन शोध की मौजूदा स्थिति में अंदाजा लगाया जाता है कि 1871-72 में इसके उठान के दिनों में यह संख्या डेढ़ लाख से कुछ अधिक थी: ब्रिटेन में पचास हजार, फ़्रांस और बेल्जियम में मिलाकर तीस हजार से ऊपर, स्विट्ज़रलैंड में छह हजार, स्पेन में लगभग तीस हजार, इटली में लगभग पचीस हजार, जर्मनी में दस हजार से ऊपर (लेकिन ज्यादातर सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी के सदस्य), इसके अलावा अन्य यूरोपीय देशों में कुछेक हजार तथा अमेरिका में चार हजार ।     
उन दिनों इंग्लैंड की ट्रेड यूनियनों और जेनरल एसोसिएशन आफ़ जर्मन वर्कर्स को छोड़कर प्रभावी मजदूर वर्ग संगठनों का अभाव था, ऐसी स्थिति में यह संख्या निश्चित रूप से काफी थी । इस बात को भी दिमाग में रखना होगा कि अपने समूचे जीवनकाल में इंटरनेशनल को कानूनी संगठन की मान्यता केवल ब्रिटेन, स्विट्ज़रलैंड, बेल्जियम और अमेरिका में मिली थी । अन्य देशों जहां इसकी मौजूदगी ठोस थी (फ़्रांस, स्पेन, इटली) वहां अनेक सालों तक यह कानूनी हाशिए पर रही और इसके सदस्यों को उत्पीड़न झेलना पड़ता था । जर्मन संघ के 39 राज्यों में इंटरनेशनल में शिरकत का मतलब कानून तोड़ना होता था और आस्ट्रो-हंगरी साम्राज्य में कुछ सदस्यों को गोपनीय तरीके से काम करने को मजबूर होना पड़ा । बहरहाल इंटरनेशनल में अपने घटकों को अखंड संपूर्ण में एक कर लेने की उल्लेखनीय क्षमता थी । अपने जन्म के एकाध साल बाद ही सैकड़ों मजदूर सभाओं को संघबद्ध करने में सफलता पाई; 1868 के खात्मे के बाद मिखाइल बाकुनिन (1814-76) के अनुयायियों के प्रचार के चलते स्पेन में अन्य सभाएं जोड़ी गईं और पेरिस कम्यून के बाद इटली, हालैंड, डेनमार्क और पुर्तगाल में इसके प्रभाग पैदा हो गए । बेशक इंटरनेशनल का विकास असमान रहा: कुछ देशों में इसमें वृद्धि हुई जबकि कुछ अन्य देशों में स्थिर या दमन के चलते पीछे हटा । फिर भी जो अल्पकाल के लिए भी इंटरनेशनल में शामिल हुए उनमें जुड़ाव का मजबूत अहसास बना रहा । जिन संघर्षों में उन्होंने भाग लिया था जब वे समाप्त हो गए और विपत्ति तथा निजी मुश्किलात के चलते उन्हें दूरी बनानी पड़ी तो भी वर्गीय एकजुटता के बंधन उन्होंने बनाए रखे और जिस संगठन ने जरूरत के वक्त उनका साथ दिया था उसके नाम पर रैली के लिए आवाहन होने, पोस्टर पर लिखे शब्दों या संघर्षों का लाल झंडा फहराने के समय जो कर सकते थे करते रहे ।
बहरहाल सारे कामगारों का बहुत छोटा हिस्सा ही इंटरनेशनल का सदस्य था । पेरिस में उनकी तादाद कभी दस हजार से अधिक नहीं हुई और रोम, वियेना या बर्लिन जैसी अन्य राजधानियों में तो वे उंगली पर गिने जा सकते थे । एक और पहलू इंटरनेशनल में शामिल मजदूरों की प्रकृति से जुड़ा हुआ है: इसे मजूरी श्रमिकों का संगठन होना था लेकिन असल में ऐसे बहुत कम श्रमिक इसमें शामिल हुए; मुख्य आमद इंग्लैंड के निर्माण मजदूरों, बेल्जियम के टेक्सटाइल मजदूरों और फ़्रांस तथा स्विट्ज़रलैंड में भांति भांति के कारीगरों की हुई थी ।
ब्रिटेन में इस्पात मजदूरों को छोड़कर औद्योगिक सर्वहारा के बीच इंटरनेशन की मौजूदगी हमेशा ही छिटपुट रही । किसी भी देश में औद्योगिक सर्वहारा बहुसंख्यक नहीं हो सका, खासकर दक्षिणी यूरोप में संगठन के विस्तार के बाद तो कम से कम ऐसा ही था । दूसरी बड़ी सीमा यह थी कि पहली कांग्रेस की तैयारी के समय इस दिशा में कोशिश करने के बावजूद अकुशल मजदूरों को आकर्षित करने में संगठन नाकामयाब रहा था । अस्थायी आम परिषद के प्रतिनिधियों के लिए जारी निर्देशों में विभिन्न प्रश्न के तहत कहा गया:
“अपने मूल उद्देश्यों के अलावे ट्रेड यूनियनों को अब मजदूर वर्ग की संपूर्ण मुक्ति के व्यापक हित में संगठक केंद्र के बतौर सचेत रूप से काम करना सीखना होगा । इस दिशा में प्रवृत्त प्रत्येक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन की उन्हें मदद करनी होगी । अपने आपको समूचे मजदूर वर्ग का प्रतिनिधि और हिमायती मानकर उसी तरह से काम करते हुए उन्हें अपनी कतारों में समाज-बाह्य मनुष्यों को शामिल करने से नहीं चूकना चाहिए । असाधारण परिस्थितियों ने जिन्हें शक्तिहीन बना दिया है, मसलन खेतिहर मजदूर सबसे कम पगार वाले ऐसे कामगारों के हितों का उन्हें ध्यान रखना होगा । उन्हें व्यापक जगत को समझाना होगा कि उनकी कोशिशें संकीर्ण और स्वार्थ से चालित होने के बदले लाखों पददलित जनगण की मुक्ति की दिशा में लक्षित हैं ।”
बहरहाल ब्रिटेन में भी इंटरनेशनल में अकुशल मजदूर नहीं शामिल हुए, इसका अपवाद खनिक थे । सदस्यों की भारी बहुसंख्या दर्जी, बुनकर, जूता गांठने वाले और बढ़ई थे यानी मजदूर वर्ग के वे हिस्से जो उस समय सर्वाधिक संगठित और सबसे अधिक वर्ग सचेत थे । अंतिम बात कि इंटरनेशनल रोजगारशुदा मजदूरों का संगठन रहा; बेरोजगार इसमें कभी शामिल न हो सके । इसके नेताओं की उत्पत्ति में यह बात दिखाई पड़ती है क्योंकि लगभग वे सभी या तो कारीगर थे या बुद्धिजीवी ।
इसी तरह इंटरनेशनल के संसाधन भी जटिल थे । कहा जाता था कि इसके पास अकूत संपदा है लेकिन सच्चाई थी कि इसकी आय हमेशा अनिश्चित रही । व्यक्तियों की सदस्यता की फ़ीस एक शिलिंग थी जबकि ट्रेड यूनियनों से अपेक्षा थी कि वे अपने प्रत्येक सदस्य की ओर से तीन पेन्स का चंदा देंगी । बहरहाल अनेक देशों में व्यक्ति सदस्य बिरले ही थे और ब्रिटेन में ट्रेड यूनियनों का योगदान इतना डांवाडोल स्थिति में और बार बार घटाना पड़ता था कि साधारण परिषद को इस तथ्य को स्वीकार करके कहना पड़ा कि उनके लिए जितना संभव हो उतना चुका दें । जो चंदा एकत्र होता वह कभी बीसेक पाउंड सालाना से अधिक न हो सका और उससे महासचिव का चार शिलिंग साप्ताहिक मेहनताना तथा कार्यालय का किराया ही निकलना मुश्किल होता था । कार्यालय का किराया बाकी रह जाने के चलते खाली करने की धमकी बार बार संगठन को झेलनी होती थी ।
इंटरनेशनल के एक प्रमुख राजनीतिक-सांगठनिक दस्तावेज में मार्क्स ने इसका कार्यभार कुछ इस तरह बताया: “इंटरनेशनल वर्किंग मेन’स एसोसिएशन का काम मजदूर वर्ग के स्वत:स्फूर्त आंदोलनों का संयोजन और सामान्यीकरण है, निर्देश देना या किसी भी सिद्धांत को थोपना नही ।”

अलग अलग संघों और स्थानीय संभागों को प्रदत्त भरपूर स्वायत्तता के बावजूद इंटरनेशनल ने हमेशा ही राजनीतिक नेतृत्व का अधिकार बरकरार रखा । इसकी आम परिषद विभिन्न प्रवृत्तियों के एकताकारी संश्लेषक निकाय के रूप में काम करती थी और समूचे संगठन के लिए निर्देश जारी करती थी । अक्टूबर 1864 से अगस्त 1872 तक इसकी बैठकें काफी नियमित रहीं, 385 बार उसकी बैठक हुई । पाइप और सिगार के धुएं से भरे कमरे में आम परिषद के सदस्य मंगलवार की शाम को तमाम किस्म के मुद्दों पर बहस करते । मसलन काम के हालात, नई मशीनरी के असर, हड़तालों का समर्थन, ट्रेड यूनियनों की भूमिका और उनका महत्व, आयरलैंड का सवाल, विदेश नीति के तमाम मुद्दे, और भविष्य का समाज बनाने का तरीका । आम परिषद ही इंटरनेशनल के दस्तावेज तैयार करने के लिए जिम्मेदार थी:  ये थे-तात्कालिक उद्देश्य से जारी परिपत्र, चिट्ठी और प्रस्ताव; विशेष परिस्थिति के लिए खास घोषणापत्र, वक्तव्य और अपीलें ।

Saturday, December 10, 2016

सही जगह पर सही आदमी


जिन मजदूर संगठनों ने इंटरनेशनल की स्थापना की वे कुछ कुछ बहुरंगी थे । इसकी केंद्रीय चालक शक्ति ब्रिटेन के ट्रेड यूनियन थे जिनके लगभग सभी नेताओं की विश्वदृष्टि सुधारवादी थी और उनकी दिलचस्पी मुख्य रूप से आर्थिक सवालों में थी । वे मजदूरों के हालात में सुधार के लिए लड़ते थे लेकिन पूंजीवाद पर सवाल नही उठाते थे । इसलिए वे इंटरनेशनल को ऐसा हथियार समझते थे जो हड़ताल होने पर विदेशों से कामगार लाने पर रोक लगाकर उनके लक्ष्य का समर्थन कर सकता था ।
संगठन में दूसरी महत्वपूर्ण ताकत साझेदारीवादी थे जिनका फ़्रांस में लंबे दिनों से दबदबा था लेकिन बेल्जियम और फ़्रांसिसी भाषी स्विट्ज़रलैंड में भी वे मजबूत थे । पियरे जोसेफ प्रूधों (1809-65) के सिद्धांतों के अनुरूप वे राजनीति में मजदूर वर्ग की किसी भी हिस्सेदारी और संघर्ष के हथियार के बतौर हड़ताल के विरोधी थे तथा स्त्री मुक्ति के सवाल पर संकीर्ण विचार रखते थे । संघीय तरीके से गठित सहकारी व्यवस्था की वकालत करने वाले ये लोग मानते थे कि कर्ज पर समान अधिकार के जरिए पूंजीवाद को बदलना संभव है । इसलिए कहा जा सकता है कि वे लोग इंटरनेशनल का दक्षिणपंथ थे ।
ये दोनों घटक संख्या में बहुमत में थे । इन्हीं के साथ भिन्न किस्म के कुछ और भी थे । तीसरे महत्वपूर्ण लोग कम्यूनिस्ट थे जो कार्ल मार्क्स (1818-43) के व्यक्तित्व के इर्द गिर्द समूहबद्ध थे । ये लोग अनेक जर्मन और स्विस शहरों में तथा लंदन में बहुत सीमित प्रभाव वाले छोटे छोटे समूहों में सक्रिय थे । वे पूंजीवाद के विरोधी थे यानी मौजूदा उत्पादन प्रणाली का विरोध करते थे और इसे उखाड़ फेंकने के लिए राजनीतिक कार्यवाही को जरूरी समझते थे ।
इंटरनेशनल की स्थापना के समय उसमें ऐसे तत्व भी शामिल थे जिनका समाजवादी परंपरा से कोई लेना देना नहीं था । उदाहरण के लिए पूर्वी यूरोप के प्रवासियों के कुछ समूह जो अमूर्त लोकतांत्रिक आदर्शों से प्रेरित थे । इनमें जिसेप मैज़िनी (1805-72) के अनुयायी थे जिनकी अंतर्वर्गीय धारणा का केंद्र राष्ट्रीय मांगें थीं और उन्हें उत्पीड़ित जनता की मुक्ति के लिए आम अपील जारी करने के लिए इंटरनेशनल उपयोगी लगता था ।
तस्वीर इस तथ्य से और उलझ जाती है कि इंटरनेशनल में शरीक फ़्रांसिसी, बेल्जियन और स्विस मजदूरों के कुछ समूह अपने साथ तमाम किस्म के भ्रामक विचार लेकर आए, कुछ किसी काल्पनिक आदर्श से प्रेरित थे; जबकि फ़र्दिनांद लासाल (1825-64) के अनुयायियों वाली पार्टी- जेनरल एसोसिएशन आफ़ जर्मन वर्कर्स- इंटरनेशनल से कभी जुड़ी नहीं लेकिन उसके इर्द गिर्द घूमती रही और वह ट्रेड यूनियनवाद की विरोधी थी तथा राजनीतिक कार्यवाही केवल राष्ट्रीय स्तर पर करने के पक्ष में थी ।
नवजात इंटरनेशनल पर इन सभी समूहों ने अपने सांस्कृतिक/ट्रेड यूनियन अनुभवों के जटिल जाल के निशान छोड़े । ऐसे व्यापक संगठन को संघीय आधार पर भी साथ रखना और सामान्य ढांचा बनाना सचमुच कठिन काम था । इसके अलावा अगर साझा कार्यक्रम पर सहमति बन भी जाती तो प्रत्येक प्रवृत्ति जहां कहीं बहुमत में होती उन स्थानीय प्रभागों पर (कभी कभी केंद्रापसारी) असर डालती ।
एक ही संगठन में इन सभी धाराओं को शांतिपूर्वक साथ साथ बनाए रखना और वह भी ऐसे कार्यक्रम के इर्द गिर्द जो उन सबके शुरुआती रुख से बहुत दूर था, मार्क्स की महान उपलब्धि थी । अपनी राजनीतिक प्रतिभा से उन्होंने ऊपरी तौर पर परस्पर विरोधी चीजों में संगति पैदा की और सुनिश्चित किया कि इंटरनेशनल अपने पहले के अनेक मजदूर संगठनों की तरह तेजी से गुम न हो जाए । मार्क्स ने इंटरनेशनल को स्पष्ट मकसद मुहैया कराया और मार्क्स ने ही ऐसा ठोस वर्ग आधारित किंतु अबहिष्कारक राजनीतिक कार्यक्रम बनाया जिसके कारण इसे तमाम संकीर्णताओं से परे जन चरित्र हासिल हुआ । इसकी आम परिषद की राजनीतिक आत्मा हमेशा मार्क्स रहे: उन्होंने इसके सभी प्रमुख प्रस्ताव लिखे और सभी कांग्रेसों की रपटें तैयार कीं (केवल 1867 की लूसान कांग्रेस को छोड़कर जब वे कैपिटल का प्रूफ़ पढ़ने में डूबे हुए थे) । वे सही जगह पर सही आदमी थे जैसा कि कभी जर्मन मजदूर नेता जोहान्न गेआर्ग इकारियस ने कहा था ।
इंटरनेशनल के संस्थापक के रूप में मार्क्स की तस्वीर बाद में गढ़ी गई । इसके विपरीत वे तो सेंट मार्टिन हाल की सभा के आयोजकों में भी नहीं थे । मित्र एंगेल्स को एक चिट्ठी में उन्होंने बताया कि वे ‘मंच पर न बोलने वाले की हैसियत’ में बैठे थे । फिर भी तत्काल उन्होंने इस घटना में निहित संभावना को भांप लिया और नया संगठन अपना लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल करे इसकी गारंटी के लिए कड़ी मेहनत की । कम से कम कुछ लोगों के बीच उनके नाम की इज्जत थी जिसके चलते उन्हें 34 सदस्यी स्थायी समिति में नियुक्त किया गया और वहां उन्होंने जल्दी ही इतना भरोसा जीत लिया कि इंटरनेशनल का उद्घाटन भाषण और अस्थायी नियमावली लिखने की जिम्मेदारी उन्हें मिली । इन बुनियादी दस्तावेजों में और इसके बाद के अन्य दस्तावेजों में भी मार्क्स ने इंटरनेशनल के विभिन्न घटकों से उनके सर्वोत्तम विचार ग्रहण किए लेकिन इसके साथ ही संघाधिपत्यवादी रुझानों और संकीर्णतावादी स्वरों की सफाई भी कर दी । मजबूती से उन्होंने आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष को एक दूसरे से जोड़ा तथा अंतर्राष्ट्रीय सोच और कार्यवाही को न पलट सकने वाली चीज बना दिया ।

मार्क्स की क्षमता की बदौलत ही इंटरनेशनल राजनीतिक संश्लेषण कर सका । उसने विभिन्न राष्ट्रीय संदर्भों को ऐसे साझा संघर्ष के प्रोजेक्ट में गूंथ दिया जिसमें निर्देशक केंद्र से वे काफी स्वायत्त थे लेकिन पूरी तरह स्वतंत्र नहीं थे । कभी कभी एकता को बरकरार रखना मुश्किल हो जाता था खासकर इसलिए कि मार्क्स का पूंजीवाद विरोध संगठन में कभी प्रमुख राजनीतिक मत नहीं था । बहरहाल समय बीतने के साथ कुछ उनकी नमनीयता के चलते और कुछ विभाजनों के चलते मार्क्स की सोच प्रधान सिद्धांत बन गई । काम बेहद कठिन था लेकिन उन दिनों के संघर्षों से राजनीतिक व्याख्या की कोशिशों को बहुत फायदा मिला । मजदूरों की गोलबंदी की प्रकृति, पेरिस कम्यून की व्यवस्था विरोधी चुनौती, ऐसे व्यापक और जटिल संगठन को इकट्ठा रखने का अभूतपूर्व काम, विभिन्न सैद्धांतिक और राजनितिक मुद्दों पर मजदूर आंदोलन की अन्य प्रवृत्तियों के साथ लगातार बहस: इन सबने मार्क्स को राजनीतिक अर्थशास्त्र की सीमाओं के पार जाने को मजबूर किया जिसमें 1848 की क्रांति की पराजय तथा अधिकांश प्रगतिशील ताकतों के उतार के बाद से ही उनका सारा ध्यान लगा हुआ था । उन्हें भी अपने विचार विकसित और संशोधित करने, पुरानी तयशुदा बातों को बहस के लिए खोलने तथा अपने आपसे नए सवाल पूछने और कम्यूनिस्ट समाज की मोटी रूपरेखा खींचकर खासकर पूंजीवाद की अपनी आलोचना को तीखा बनाने की प्रेरणा मिली । इंटरनेशनल में मार्क्स की भूमिका के बारे में पारंपरिक सोवियत नजरिया यह है कि अपने अध्ययन के जरिए मार्क्स ने जिस राजनीतिक सिद्धांत को पहले ही ढाल लिया था उसे इतिहास के उस दौर पर यांत्रिक तरीके से उन्होंने लागू कर दिया लेकिन यह नजरिया सच्चाई से पूरी तरह से अलग है ।