Wednesday, September 15, 2021

स्थापत्य में फ़ासीवाद

 

               

                                        

सुरेश प्रताप की किताब ‘उड़ता बनारस’ हमसे वर्तमान शासन के कुछ कारनामों को गहरी निगाह से देखने की मांग करती है । पिछले लोकसभा चुनाव में बनारस की संसदीय सीट को जीतना प्रधानमंत्री के लिए बहुत आसान नहीं रह गया था । इसके लिए एक प्रत्याशी का पर्चा खारिज करवाना पड़ा और प्रचारकों की भारी फौज का प्रबंध समूचे मंत्रिमंडल को लगाकर और गृहप्रांत से कार्यकर्ता मंगाकर करना पड़ा था । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर शारीरिक हमले करवाने पड़े । इन सबके बावजूद हालत खस्ता होने की वजह बनारस के पारम्परिक स्थापत्य के साथ छेड़छाड़ थी । इस छेड़छाड़ का विरोध स्थानीय आबादी के एक हिस्से ने किया था । शायद इसी के चलते कोई आधार न होते हुए भी केजरीवाल को दो लाख से अधिक वोट मिले थे ।

हो सकता है कुछ लोगों को स्मरण हो कि इसी तरह अयोध्या में ढेर सारे मंदिर तोड़े गये थे । इस बार जमीन की खरीद बिक्री का घपला सुर्खियों में रहा । हाल में सूरत में भी एक मन्दिर तोड़ने की खबर आयी है । अचरज कि मन्दिरों को निर्लज्ज भाव से तोड़ने वाली भारतीय जनता पार्टी अपने आपको हिन्दू हितैषी पार्टी कहती है । कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा और उसकी मातृसंस्था का हिंदू धर्म की किसी परम्परा से कोई लेना देना नहीं है । उनकी समूची सोच और आचरण में धार्मिकता का रंच मात्र स्पर्श भी नहीं । उनके हाथ हिन्दू धर्म की दशा देखकर तो कबीरदास की कविता ‘ठाढ़ा सिंह चरावे गाई’ चरितार्थ होती नजर आती है । धर्म के साथ उनका यह आचरण अकारण नहीं है । इसके मूल में आर्थिक न्यस्त स्वार्थ देखे जा सकते हैं । इसे लोकप्रिय भाषा में धर्म का धंधा भी कहा जा सकता है जिसमें धर्म के मुकाबले धंधे की प्रमुखता होती है । वर्तमान शासक समुदाय इसे छिपाता भी नहीं है । खुलकर वे बताते हैं कि टूरिस्टों को आकर्षित करने के लिए वे ऐसा कर रहे हैं । इस तरह विकास नये चरण में पहुंच गया है जहां देश के निवासियों की सुविधा से अधिक ध्यान विदेशी टूरिस्टों का रखा जाना है ।

बनारस में इस किस्म के विकास के लिए पक्कामहाल के जिन भी घरों को तोड़ने के लिए खरीदा गया या बिना खरीदे धमकाकर कब्जा कर लिया गया या घर के बगल में गहरा गड्ढा खोदकर गिरा दिया गया उनके लिए व्यावसायिक और व्यापारिक हितों का हवाला दिया गया । बनारस का ऐसा बुनियादी रूपांतरण करने के उपरांत जिस ढांचे को खड़ा किया जाना है उसका नक्शा जिस संस्था ने तैयार किया वह वही संस्था है जिसने गुजरात दंगों में मटियामेट कर दी गयी मस्जिदों, मकबरों और अन्य इस्लामी इमारतों की जगह पर बनने वाले स्थापत्य का नक्शा तैयार किया था । अचरज नहीं कि यही संस्था सेंट्रल विस्ता का भी नक्शा तैयार करने के लिए जिम्मेदार है । सबसे बड़ी बात कि इस परियोजना के लिए एक स्वतंत्र निकाय का गठन किया गया जो नगर की अन्य संस्थाओं के प्रति जवाबदेह ही नहीं है । इसीलिए कोई बताने को न तो तैयार है, न ही जानता है कि इस परियोजना का असली स्वरूप क्या है । मकान ढहाये जा रहे हैं और स्थानीय लोगों को पता भी नहीं कि अगला नम्बर किसका है ।   

इस सरकार के प्रत्येक कदम के साथ गोपनीयता अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है । नोटबंदी का फैसला किसने लिया इसके बारे में कोई नहीं जानता । बनारस में एक फ़्लाइ ओवर गिरने से बहुतेरे लोगों की जान चली गयी थी । उस निर्माण का ठेका किसको दिया गया था, यह भी रहस्य ही रह गया । प्रधानमंत्री रास्ते में अचानक उतरकर पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ से मिलने किसलिए गये, पता ही नहीं लगा । प्रधानमंत्री राहत कोष के रहते हुए भी पी एम केयर फ़ंड बनाने की जरूरत आखिर पड़ी क्यों इसके बारे में हवा को भी कुछ न मालूम होगा! चुनावी चंदे की व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए जो एलेक्टोरल बांड लाया गया उसके बारे में सरकार को तो सब कुछ पता है यानी उसे पता है कि विपक्षी दलों को कौन चंदा दे रहा है लेकिन सरकार पर काबिज पार्टी ने कितना धन लुटेरों से हासिल किया इसकी जानकारी आम जनता को नहीं हो सकती । सबसे हालिया प्रकरण व्यापक जासूसी के लिए प्रयुक्त पेगासस नामक उपकरण के इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है जिसके बारे में सरकार सर्वोच्च न्यायालय तक को सही बात बताने के लिए राजी नहीं है । लगता है जैसे धोखेबाजों का कोई गिरोह सत्ता पर काबिज हो और अपने पापों का भंडाफोड़ होने से डरा हो या घमंड में इतना चूर हो कि पूछने वालों को गुस्ताख समझता हो ।         

इस पहलू के साथ ही एक और बात जुड़ी हुई है । सरकार का नये संसद भवन के प्रति सनक भरा अनुराग बहुतों की समझ से परे है । इसे स्थापत्य के साथ विचारधारा के संबंध के आधार पर समझा जा सकता है । आम तौर पर सत्ता अपनी विचारधारात्मक मौजूदगी को स्थायित्व प्रदान करने के लिए स्थापत्य का सहारा लिया करती है । मंदिर, किले, मकबरे या मीनारें केवल कंकड़ पत्थर के ढांचे नहीं हुआ करते, वे अपनी समूची बनावट और बरताव के रूप में किसी न किसी विचार का व्यापक सामाजिक संप्रेषण करते हैं । तभी प्रत्येक शासक इनके बनाने और रखरखाव के मामले में इतनी रुचि लेता है । किस्सा कोताह कि बनारस या नये संसद भवन के रूप में और उनके बनाने की समूची प्रक्रिया में जो भी नजर आ रहा है उसे ध्यान से देखना चाहिए क्योंकि उससे फ़ासीवादी विचार की झलक मिलती है । इस विचार में केवल हिंदू धर्म को खोजना नासमझी होगी । इसके साथ गहराई से पूंजी जुड़ी है । इसलिए भी इसे हिंदुत्व का नाम दिया गया जो हिंदू धर्म से भिन्न किस्म की चीज है । जिस तरह इस्लाम से नये कट्टर तत्वों को अलगाने के लिए उसे राजनीतिक इस्लाम कहा जाता है उसी तरह हिंदू से हिंदुत्व अलग है । कुछ पहले तक हिंदू धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल की बात की जाती थी लेकिन इस समय तो शुद्ध रूप से देशी-विदेशी पूंजी की ताबेदारी का रिश्ता धर्म की आड़ में छिपाया जा रहा है ।

लेखक खुद स्थानीय पत्रकार रहे हैं इसलिए उनकी प्रस्तुति में रपट जैसी निष्पक्षता है । उन्होंने सभाओं, गोष्ठियों, जलसों, जुलूसों और विज्ञपतियों के हवाले से अपनी बात कही है । अपनी राय उन्होंने कहीं व्यक्त नहीं की है । पत्रकार होने से ही तथ्यों की सहज संवेदनशील प्रस्तुति पर भी उनको महारत हासिल है । बनारस की गलियों और घाटों, उसकी मस्ती और उसके आकर्षण को अपनी भौगोलिक जानकारी के साथ लेखक ने प्रस्तुत किया है । सदियों पुरानी बनारस की इस संस्कृति के साथ तुलसी, कबीर और रैदास का अभिन्न रिश्ता रहा है । इन सबकी रूढ़िभंजकता का प्रमाण देने की जरूरत नहीं । भक्ति के आवरण में उपजे उस विद्रोह की छाप बनारस की विशेषता है । इसी जीवन के आकर्षण में तमाम विदेशी बनारस आते हैं और उनमें से अनेक यहीं बस जाते हैं । बनारस की संकरी गलियों में समूचा जीवन धड़कता है । लेखक ने बताया है कि इनकी खास संरचना के कारण गलियों में तापमान सहनीय बना रहता है । फ़ासीवादी दिमाग को यह टेढ़ी बात समझ नहीं आती । उसे लगता है कि विदेशी टूरिस्ट तभी आयेंगे जब उन्हें यहां अमेरिका नजर आये । वे आयेंगे तो विदेशी मुद्रा आयेगी । विदेशी मुद्रा के बिना देश की औकात कुछ नहीं । इसी सोच के साथ प्रशस्त विश्वनाथ कारीडोर और गंगा पाथवे के निर्माण का नक्शा तैयार किया गया । समझ नहीं आता कि अगर कोई बनारस आयेगा तो वहां बनारस खोजेगा या अमेरिका ही चाहेगा । विश्वनाथ कारीडोर और गंगा पाथवे तो फिर भी समझ आता है लेकिन गंगा को भी गहरा करने का उद्यम इतना खब्ती है कि उसकी धारा के पेटे से बालू निकालकर पानी के ही भीतर किनारे एकत्र किया गया ताकि बड़ी जहाजों के चलने लायक गहराई तात्कालिक रूप से पैदा हो । बहते पानी में ऐसा करने की सोच शुद्ध नौकरशाहाना दिमाग से ही पैदा हो सकती है जिसके लिए प्रदर्शन का ही अर्थ हो, उपयोग की दीर्घकालीन योजना की रत्ती भर भी चिंता न हो ।  

तथाकथित विकास का यह हमला इतना जोरदार है कि हिंदू धर्म के पारम्परिक मंचों की ओर से भी विरोध शुरू हुआ है । असल में धर्म का यह कारपोरेटी स्वरूप धार्मिकों के लिए भी अबूझ है । लेखक ने इस तरह के विरोध को किताब में स्वर दिया है । इस विरोध की अगुआई स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने की । स्थानीय लोगों ने इस प्रचंड तोड़फोड़ की काट के लिए बनारस के पारम्परिक स्वरूप को धरोहर का दर्जा देने की मांग उठायी ताकि धरोहर के संरक्षण के तर्क से लोगों के रिहायशी मकान बच सकें । शायद वे सत्ता की वर्तमान नरभक्षी भूख को आंकने में नाकामयाब रहे जिसमें मकान तो क्या, हवाई अड्डे, सड़क और लाल किला जैसे लाभ देने वाली धरोहर भी बिक रही है । इस रथ के क्रूर संचालन के उत्साह में आम लोगों और उनकी जीवन पद्धति की बलि होनी तय है । सत्ताधीशों को किसी भी व्यक्ति की चीख सुनायी नहीं देगी ।      

जिन मार्मिक कहानियों को लेखक ने दर्ज किया है उनमें 87 वर्षीय केदारनाथ व्यास की व्यथा कथा सबसे गहरी है । इस बुजुर्ग का मकान गिराने के लिए नींव के साथ गहरा गड्ढा खोद दिया गया और उसमें पानी भर दिया गया । दीवारों में दरारें पड़ी और पूरा मकान भहराकर गिर पड़ा । मजबूरन उन्हें किराये के मकान में जाना पड़ा । जब वे प्रधानमंत्री के जन्मदिन के अवसर पर उनके वाराणसी आगमन के समय धरने पर बैठने को उतारू हुए तो प्रशासन ने 48 घंटे का समय मांगा । इससे भी साबित हुआ कि कोई निश्चित योजना बनाये बिना ही मकानात तोड़ने की शुरुआत कर दी गयी । इस विध्वंस का शिकार न केवल सामान्य जन बल्कि उनकी ही पार्टी के सबसे लम्बे समय तक विधायक रहे श्यामदेव रायचौधरी भी हुए और उन्हें भी प्रधानमंत्री ने कोई आश्वासन दिया । सभी पुराने नेताओं की तरह वे भी इसआश्वासन के शिकार बने रहे । किताब हमारे सामने वर्तमान सत्ता के कारनामों का एक खास पहलू को पुरजोर तरीके से उजागर करती है ।                          

 

Tuesday, September 14, 2021

ज्ञानरंजन और ‘पहल’

 

              

                                      

ईमानदारी से कहूं तो ज्ञान जी से पहले ‘पहल’ से परिचय हुआ । उच्च शिक्षा के लिए बनारस आया तो उम्र बहुत नहीं थी लेकिन संगत अच्छी होने से तमाम चीजों से परिचिति कुछ जल्दी ही हो गयी । बड़े भाई अवधेश प्रधान की मार्फ़त तीसरी धारा के वाम से जुड़ाव हुआ । उनका क्षेत्र सांस्कृतिक था और ढेर सारे संयोगों के चलते मैं भी हिन्दी साहित्य का विद्यार्थी हुआ सो वही अपना भी दायरा हुआ । हमारे बीच प्रलेस से जुड़े लोगों के बारे में बहुत बेहतर राय नहीं थी । बताने की जरूरत नहीं कि इंदिरा गांधी के जमाने में आपातकाल का समर्थन करने और कुछ मामलों में मुखबिरी करने की बातें भी उनके साथ जुड़ी बतायी जाती थीं । काशीनाथ सिंह का मशहूर संस्मरण पढ़कर इस पत्रिका के साथ जुड़े भावों की जानकारी मिली । मेरे कुछ मित्रों के वे शोध निर्देशक रहे । मेरे भी अध्यापक थे । बाद को दिल्ली की एक मुलाकात में उन्होंने खुद के प्रलेस के मुकाबले तीसरी धारा के साथ नजदीकी की बात बतायी थी ।

तब कविता लिखने का शौक हुआ करता था सो स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष में कविता भेजी । लिफ़ाफ़े में वापस लौट आयीं । इसका कोई गिला कभी नहीं रहा । मुलाकातें जब शुरू हुईं तो कभी जिक्र भी नहीं हुआ । स्थापित मानकों से उनके विद्रोह का अंदाजा तब हुआ जब देखा कि उनकी पत्रिका का पंजीकरण भी नहीं था । इसके बावजूद उस समय की रचनात्मकता का जैसा प्रतिनिधित्व इस पत्रिका में था वैसा ‘आलोचना’ में भी नहीं था । उसके परम्पराभंजक होने के चलते नामवर सिंह भी सहज नहीं रहे जबकि उनकी षष्टिपूर्ति के अवसर पर विशेषांक छापा गया था । बहरहाल जब दूधनाथ सिंह ने उनके व्यक्तित्व में मठाधीशी का उल्लेख किया तब तक ज्ञानरंजन से परिचय हो चुका था । स्वतंत्र सत्ता केंद्र बनाने की इस कार्यवाही को स्थापित मठों के समक्ष समर्पण से बेहतर मैंने माना ।

दिल्ली आने के बाद ज्ञान जी से मुलाकातें कुछ अधिक होने लगीं । आग्नेय जी की पुत्री छात्रावास में मेरे कमरे के ठीक नीचे रहती थी । पत्नी से उसकी मित्रता भी हो गयी थी । बाद में कैंसर से उसके देहावसान की दुखद सूचना भी मिली । उसके नाते से आग्नेय जी के साथ मेल मिलाप शुरू हुआ । वे पहल के संपादक मंडल में थे । उनके कहने से पचासवें अंक की समीक्षा भी लिखी थी । बनारस से ही कविता में गोरख पांडे के प्रति दीवानगी लेकर आये थे । पत्रिका के किसी काव्य विशेषांक में उनका जिक्र तक नहीं था । इस बात का उल्लेख हिंदी कविता की अभिजात परम्परा के साथ उनकी सहमति के बतौर किया । उसके बाद किसी अंक के संपादकीय में गोरख की कविता को मुखपृष्ठ पर छापने का जिक्र ज्ञान जी ने किया । धारणा यह बनी कि वे पहल को सचेत रूप से विपथगामी बनाये रखना चाहते हैं और इस मामले में किसी कमी की आलोचना का बुरा नहीं मानते ।

भटकने की थोड़ी आजादी लेते हुए आग्नेय जी के प्रसंग से कुछ बातों का जिक्र जरूरी है । इसे दर्ज कहीं और होना चाहिए था लेकिन भूल जाने से यहीं लिख डालना बहुत बुरा न होगा । कमरे पर हाल ही में गुजरे साथी बृज बिहारी पांडे आया करते थे । उनसे बातचीत के दौरान आग्नेय जी ने सभी लेखक संगठनों की एकता की भोली इच्छा जाहिर की । पांडे जी ने कहा कि राजनीतिक पार्टी तो फिर भी अपनी पुरानी अवस्थिति को आसानी से सुधार ले सकती है लेकिन लेखकों के लिए खुद के लिखे को मिटाकर नयी बात कहना लगभग असम्भव होता है । इसलिए राजनीतिक पर्टियों के लिए एकता जितनी आसान है उसके मुकाबले संस्कृति और लेखन के क्षेत्र में अधिक मुश्किल है । संस्कृति के मामले में उसकी इस विशेषता की संवदनशील और वस्तुगत परख पर तब भी गर्व हुआ था और आज भी कायम है ।

आग्नेय जी और ज्ञानरंजन में काफी अंतर था । आग्नेय जी संस्थानों के कपटतंत्र से न केवल वाकिफ़ थे बल्कि उसका गाहे ब गाहे इस्तेमाल भी करते थे । इलाहाबाद में अध्यापन हेतु साक्षात्कार था , उन्होंने गोविंदचंद्र पांडे से अपनी नजदीकी की बात मुझे बतायी । मेरा मुख पर्याप्त खुला हुआ था इसलिए लाभ न उठा सका । उनके मुकाबले ज्ञानरंजन मानो इस दुनिया से अपरिचित लगते थे । वैसे कुछ लोग उन पर भी निष्णात होने का संदेह व्यक्त करते हैं लेकिन जितना अनुभव मेरा है उसके आधार पर कह सकता हूं कि संस्थानों के समानांतर की सत्ता निर्मित करना उन्हें पसंद था । अब तो पत्रिका बंद हो गयी है अन्यथा ए पी आई और केयर लिस्ट की क्षुद्रता का मुकाबला कैसे कर पाते! जिस पत्रिका का पंजीकरण भी नहीं था उसमें प्रकाशित होना गौरव की बात मानी जाती थी । आज जिस निर्लज्ज घमंड का प्रदर्शन खुलेआम हो रहा है उस समय इसकी कल्पना कठिन है कि कभी पहल में प्रकाशित होने के लिए तमाम लेखक लालायित रहते थे । स्थापित लोगों को दरकिनार करके साहस के साथ ज्ञान जी यह अवसर नितांत नये और अनजान लोगों को देते थे । इस किस्म की तमाम किस्से मेरे जाने हुए हैं । यह गौरव ज्ञानरंजन ने मुझे भी प्रदान किया इसके लिए हमेशा उनका शुक्रगुजार रहूंगा । कविता तो लौट आयी थी लेकिन बाद में लेख और एक पुस्तिका भी उन्होंने छापी । जो लेख पहली बार छापा उसका संबंध वर्धा से है ।

दिल्ली में पढ़ते हुए आइसा में सक्रिय था । समय सोवियत संघ के पतन के बाद का था । रणधीर सिंह को छोड़कर कोई भी अपनी प्रतिबद्धता घोषित करने में लज्जा का अनुभव करता था । उत्तर आधुनिकता ने मार्क्सवाद के साथ खड़े होने की असुविधा उठाये बिना क्रांतिकारी मुद्रा प्रदर्शित करने की छूट दे रखी थी । हिंदी में नामवर सिंह वैसे भी प्रतिबद्धता के मुकाबले पश्चिमी साहित्य सिद्धांतो के प्रचलन का अनुगमन करने के लिए जाने जाते थे । एक जमाने में वे शिक्षण संस्थानों में स्थापित विद्वानों के समानांतर तीक्ष्ण विश्लेषण के लिए विद्यार्थियों में लोकप्रिय थे । दुर्भाग्य से बाद में वे खुद ही संस्थान बन गये । ऐसे में उनके या हमारे किसी अध्यापक के पास न जाने वाले ज्ञानरंजन हमें पसंद आते और उनकी यह प्रतिसत्ता हमें आकर्षित करती । जो माहौल था उसमें आग्नेय जी मार्क्सवाद के बारे में संशयालु हो चले थे । ज्ञानरंजन ने पहल की ओर से एजाज़ अहमद का सार्वजनिक व्याख्यान मार्क्सवाद की प्रासंगिकता पर आयोजित किया तो उनके साहस से लगाव हो आया । व्याख्यान को पुस्तिका की तरह छपाकर उन्होंने मुफ़्त वितरित किया था । उस कार्यक्रम में जो हो सकता था समस्त सहयोग किया । पुरखा नहीं सहधर्मी की तरह महसूस हुए । इसी तरह उस समय हम प्रसन्न कुमार चौधरी की लम्बी कविता ‘सृष्टि चक्र’ के नशे में थे । आग्नेय जी को कविता जमी नहीं थी । ज्ञानरंजन ने सम्पर्क तलाशना चाहा ताकि उनकी कोई अन्य कविता मंगा सकें ।       

दिल्ली छोड़कर अध्यापन के काम में पहले शाहजहांपुर के एक कस्बे में पांच साल रहा । उस समय इस पत्रिका की खास खबर नहीं रही । हालांकि वहां रहते जो डायरी लिखी उसे बाद में उन्होंने छापा । अपूर्वानंद को एक अनजान आदमी की डायरी छापना विचित्र लगा था । इसके बाद वर्धा गया तो उनसे पत्र व्यवहार शुरू हुआ । परेशान तो रहा लेकिन विश्वविद्यालय को देखता परखता भी रहा । उनसे बात की तो उन्हें यह अनुभव मजेदार लगा और लिखने को कहा । मैंने संस्था छूट जाने के बाद लिखने का वादा किया । संयोग से ऐसा जल्दी ही हो गया । दिल्ली आकर बेकारी करते हुए उसे मजे ले लेकर लिखा । आनंद में लम्बा हो गया था । काट छांटकर उन्होंने कस दिया और छापा । इससे पुरुषोत्तम भी नाराज हो गये । संस्थान के विरुद्ध ज्ञानरंजन की प्रतिबद्धता स्पृहणीय है । पहल को उन्होंने इस दुर्धर्ष दायित्व के लिए बहुत अच्छी तरह इस्तेमाल किया । कोई भी संस्थान अपनी प्रकृति से ही वितृष्णा को जन्म देता है । इस भाव को सार्वजनिक जगह देना सबके बूते की बात नहीं होती । पहल ने इस प्रसंग में ऐतिहासिक भूमिका निभायी है । हिंदी में पुरस्कारों की निर्लज्ज व्यापकता को तोड़ पाना तो सम्भव न हुआ लेकिन पहल सम्मान के जरिये उन्होंने एक दूसरे किस्म के आयोजन की बुनियाद डालनी चाही । शाहजहांपुर में पता चला कि स्थानीय कथाकार हृदयेश को भी यह सम्मान मिला था ।           

दूधनाथ सिंह ने उनको नकारात्मक भाव से सांवला ग्रह कहा था । सचमुच उनमें विद्रोह जनित प्रचंड आकर्षण है । दूधनाथ जी ने उसी संस्मरण में पंत की कविता और ज्ञानरंजन की कहानियों में समानता दिखाते हुए कहा था कि चमकदार शब्दों का सीमित भंडार दोनों की सीमा है । इसे महज शैली के प्रति आकर्षण से सावधान करने के लिए चेतावनी माना जाये तो उचित है । पहल निकालने के बाद उनकी कहानियों के बंद हो जाने का सम्भावित कारण तलाशते हुए दूधनाथ जी ने यह बात लिखी थी । मुझे लगता है कि उनकी कहानियों में ठहराव की वजह शिल्प के क्षेत्र में कोई नयापन न होना नहीं था, बल्कि उनकी कहानियों के कथ्य में परम्परा के प्रति जो विकट विद्रोह है उसी की अभिव्यक्ति के नये माध्यम की सफलता में इसे निहित होना चाहिए । पहल के जरिये जो कुछ उन्होंने इतने लम्बे समय तक किया उसे उनकी कहानियों का विस्तार समझने से उनके सकर्मक जीवन की वैचारिक एकसूत्रता स्पष्ट होगी ।

सिलचर रहते डायरीनुमा कुछ संक्षिप्त लिखा था । भेजा तो उन्होंने छापा । विस्तृत को शायद उन्हीं के सुझाव पर प्रियंवद ने मंगाया और अकार में छापा । एक काव्य संग्रह से चुनिंदा कविताओं के हिंदी अनुवाद भेजे । उसे पुस्तिका के रूप में छापा । वहां रहते लगातार पहल के अंक डाक से मिलते रहे । इनमें बलराज साहनी के किसी लम्बे लेख या व्याख्यान की पुस्तिका की याद है जिसमें अंग्रेजी राज की भाषा नीति के बारे में बेहद महत्व की बातें खुद की भाषाई यात्रा के बहाने कही गयी थीं । ध्यान दिया कि विचित्र और नये के प्रति उनमें दुर्निवार आकर्षण है । पत्रिका में कार्टूनों को प्रमुखता से प्रकाशित करने का साहस वे ही जुटा सकते थे । इन कार्टूनों के जरिये उन्होंने हिंदी साहित्य की बनती नयी दुनिया की बेतरह खिल्ली निडरता के साथ उड़ायी ।

वापस दिल्ली आने के बाद भी पहल के अंक डाक से आते रहे । इतने सालों तक बाहर रहने से बहुत कुछ छूट जाने का क्षोभ मन में था । ताजा मामलात की जानकारी लेने के लिए सोवियत संघ के पतन के बाद की वैचारिकी के साथ जान पहचान बढ़ाना शुरू किया तो फिर ज्ञानरंजन और पहल की याद आयी । एक पुस्तकसूचीनुमा बनाकर भेजा । उसे भी उन्होंने छापा । आगे के समस्त काम के बीज उसी में थे । बाद के अंकों में लिखने की इच्छा रही लेकिन लिख न सका । जब 125वें  अंक के अंतिम अंक होने की घोषणा हुई तो उसे कहकर मंगाया । इतना लम्बा सफर जिसमें न केवल ढेर सारे अंक बल्कि पुस्तिका और सम्मान । इस थाती को बाकायदे सबके लिए सुलभ बनाने की कोशिश होनी चाहिए । सूचना के मुताबिक प्रियंवद चिट्ठियों के संग्रह का संपादन कर रहे हैं । कर्मेंदु शिशिर शोधागार में भी शायद बहुत कुछ सुरक्षित है । समूचे हिंदी समाज को भविष्य के लिए इस खजाने को इस्तेमाल करने लायक हाल में सहेजकर रखना होगा ।

पहल का नाम पहला से निकला है । इस अर्थ में इस पर पश्चिमी अवांगार्द की धारणा का असर है । तमाम रचनाकारों ने सोचा था कि समाज में बदलाव लाने के लिए उसका अग्रदूत बनना होगा । लगभग सभी कला आंदोलनों पर इस सोच की छाप मिलेगी । भारत में कला में तो नहीं लेकिन साहित्य पर इसका असर काफी था । रवींद्रनाथ ठाकुर के जदि तोमार डाक से लेकर अज्ञेय की उड़ चल हारिल तक उसी धारणा का अनुवाद प्रतीत होता है । यह सोच साहित्य और कला की दुनिया के भीतर रचनाकार की संवेदनशीलता का सबूत थी । पहल पत्रिका का तो सब कुछ रचनात्मक था । मुखपृष्ठ के रेखांकन से लेकर लेखक परिचय तक । पत्रों को भी छापने में वे मौलिक सूझ का परिचय देते थे । मेरे सहपाठी देवेंद्र चौबे की रचना के बतौर उनका पत्र छापा जिसमें जे एन यू के हालात का जिक्र था । इस तरह पाठकों को उस विश्वविद्यालय पर हुए हमले का आंखों देखा जैसा हाल पढ़ने को मिल गया । सोशल मीडिया के इस जमाने में संपादक की तानाशाही के अंत की खुलकर तारीफ होती है लेकिन यह अंत वैसा ही शोकाकुल करने वाला अंत है जैसे मशीनी उत्पादन ने मौलिकता का अंत कर दिया । केवल संपादन किसी भी रचनात्मक और कलात्मक सृजन से कमतर दायित्व नहीं होता इसे पहल के जरिये ज्ञान जी ने साबित कर दिया । आशा है वे खुद भी उसे सर्वसुलभ बनाये जाने की किसी योजना पर चुपचाप काम कर रहे होंगे । जैसे कभी उन्होंने पहल निकालने की सूचना देकर अपने मित्रों को चौंकाया था उसी तरह इस दायित्व का भी निर्वहन करके वे हिंदी समाज को उपकृत करेंगे । आखिर यह पत्रिका उनके साथ आंगिक रूप से जुड़ी रही है ।                                               

Saturday, September 4, 2021

भविष्य के समाज की ताबीज

 

          

                               

नहीं जानता कि महान व्यक्ति किस तरह के होते हैं लेकिन कामरेड बृजबिहारी पांडे बिना शक महान थे । उनका अहैतुक स्नेह मुझे समय समय पर मिलता रहा है । इसलिए भी उनका निधन निजी क्षति की तरह महसूस हो रहा है । उनके असमय निधन से बहुतेरे लोगों के जीवन में भारी शून्य पैदा हो गया है । उनकी दैहिक उपस्थिति मात्र के चलते क्षुद्र विषयों की चिंता भी करने में लज्जा का अनुभव होता था । किसी भी किस्म के दिमागी खलल की हालत में उन्हें फोन करके परेशान किया जा सकता था । सब समय उनका साथ सोच विचार की ऊँचाई की गारंटी होता था । ऐसे लोगों की अनुपस्थिति देश और समाज के सार्वजनिक जीवन की समृद्धि की अपूरणीय क्षति होती है ।

उनसे पहली मुलाकात कानपुर में अध्ययनरत कामरेड राजीव डिमरी के छात्रावासी कमरे पर हुई थी । सुदर्शन मुख, चाल में फुर्ती और बेहतरीन शर्ट ने पहली ही बार ध्यान खींचा था । बाद में कभी कभी कुर्ता भी पहने देखा । उनके कसे बदन पर सब कुछ शोभायमान होता था लेकिन अपने वस्त्र विन्यास के प्रति सचेत शायद ही कभी रहे हों । तब वे कानपुर में काल प्रवाह प्रकाशन की स्थापना के लिए आये थे । पढ़ने लिखने में अपनी भी रुचि होने से अच्छा लगा था । तब पार्टी भूमिगत ही थी और उनका नाम सुनील बताया गया । असली नाम जानने में कोई रुचि भी नहीं थी । मेरे पास कोई न कोई किताब हमेशा रहती थी । पढ़ाई का शौक विजय जी को भी था जिनके पते से उस प्रकाशन का काम धाम चलना था । मजदूरों के विशाल महासागर में मार्क्सवादी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लम्बा इतिहास कानपुर के साथ जुड़ा हुआ था । करेंट बुक डिपो पर मार्क्सवादी साहित्य की सहज उपलब्धता और रामआसरे द्वारा माओ की संकलित रचनाओं के हिंदी अनुवाद की कहानी सुनायी देती थी । अचरज होता था कि सीपीएम से जुड़े मजदूर नेता ने माओ की रचनाओं का अनुवाद क्यों और कैसे किया! कारखानों में खटने वाले मजदूरों को मार्क्सवादी साहित्य से सिर टकराते प्रत्यक्ष देखा है । फिर भी उम्र कम होने से उस प्रयास से बहुत न सीख सका ।

बाद के दिनों में कानपुर के एक मजदूर आंदोलन की खबर सुनी जिसमें कारखाने में आठ घंटे की पाली निपटाकर मजदूर रेल को जाम करने के लिए ट्रैक पर बैठे रहते थे तो वह समय याद आया जब समूचे कानपुर की हवा में मजदूर वर्ग के सवाल और उनके संघर्ष का माद्दा छाये रहते थे । उसी शुरुआती माहौल ने शायद पांडे जी को मजदूर वर्ग के इस समृद्ध जीवन में मौजूद समानांतर संस्कृति के बारे में सहज बनाये रखा । आज की नवउदारवादी संस्कृति में दीक्षित लोग उस गर्मजोशी से भरे माहौल की कल्पना नहीं कर सकते जब मजदूरों का जीवन शहरों की धड़कन हुआ करता था । उनके बारे में बाद में जाना कि मजदूरों के बीच राजनीतिक काम उनका पसंदीदा क्षेत्र था । दुर्गापुर, बोकारो, दिल्ली- जहां भी रहे मजदूर बस्तियों के साथ एकजुट रहे । कदाचित कानपुर के शुरुआती जीवन से ही यह चीज अनजाने संस्कार के बतौर मिली हो ।  

बाद के दिनों में उनकी बाबत सुनता तो रहा, सम्भव है मुलाकातें भी हुई हों लेकिन उनकी याद गहरी नहीं है । एक बार की बात याद है जब उन्होंने कलकत्ते से किसी प्रकाशन का जिक्र किया जिसमें छापे की भयानक भूल थी । Marxist के लिए Marksist छप गया था । जिनकी जिम्मेदारी थी उन्होंने आपत्ति करने पर लोग समझ जायेंगे ऐसा कहा । इसे वे गलत उदाहरण के बतौर पेश कर रहे थे । शायद एक लेख के गलत अनुवाद का मामला था । डेड लेटर्स का अनुवाद गलत पते पर डाली गयी चिट्ठी हुआ था । प्रकाशन के मामले में सावधानी और पूर्णता के वे हिमायती थे । अनुवाद के बारे में सुन रखा था कि मूल अंग्रेजी को सामने रखकर वे धाराप्रवाह हिंदी अनुवाद बोलते जाते थे । इसका पता तब चला जब पार्टी के केंद्रीय स्कूल के पर्चों को प्रणय के साथ मिलकर लगातार दस दिन साथ रहकर अनूदित किया । तब उस प्रयास को अय्यूब भाई ने फ़ोर्ट विलियम कालेज का नाम दिया था । काम के उबाऊ होने के चलते बीच बीच में कभी कुछ किस्सा कहानी भी चलते रहते थे । पहली बार त्रात्सकी, ग्राम्शी और उत्तर आधुनिकता के बारे में पढ़ रहा था और लिखने वाले की प्रकांड विद्वत्ता से अचम्भित था । आज तक इन मामलों में उतना ही जानता हूं, अलबत्ता ग्राम्शी के बारे में राय कुछ बदलने की जरूरत लगती है । दूसरा पर्चा शिवरमन का था और उसमें अर्थतंत्र तथा नव सामाजिक आंदोलनों के बारे में जो था उससे अधिक आज भी नहीं पता । जब अपना अचम्भा जाहिर किया तो उन्होंने एक विज्ञान कथा सुनायी । उसमें किसी अन्य ग्रह के जीव बादल के रूप में धरती के ऊपर छा गये थे । उनका मानसिक विकास इतना हो चुका था कि वे मष्तिष्क मात्र रह गये थे । धरती से भेजे गये संदेशों के सहारे उन्होंने मनुष्यों की भाषा सीख ली थी । तब अरिंदम सेन से परिचय नहीं हुआ था तो यह मनोरंजक किस्सा बन गया । बाद में अरिंदम जी के साथ काम करते हुए सहजता महसूस होने में इस किस्से का भी हाथ रहा होगा । इन सबसे पार्टी नेताओं की मनुष्यता का पता चला और पांडे जी के दोस्ती कायम कर लेने की क्षमता का भी अंदाजा मिला ।

इसके बाद तो अक्सर यह भी देखा कि मुश्किल से मुश्किल मोर्चे पर वे धीरज और समर्पण के साथ जुट जाते थे । सम्भव है उनकी इस क्षमता के कारण ही भूमिगत पार्टी का प्रवक्ता उन्हें बनाया गया हो । इस मामले में संसद में रामेश्वर जी और पत्रकारों का सामना करते पांडे जी का प्रदर्शन अद्भुत रहा । एकदम ही अनजानी राह पर पूरे आत्मविश्वास के साथ चलते थे । जनमत की टीम के साथ काम करना आसान नहीं था । सबके सब विद्वान, लेकिन पाडे जी दत्तचित्त होकर मोर्चा संभाले रहे । उसी दौरान अभय कुमार दुबे के संस्कृति संबंधी किसी लेख का जवाब भी उन्होंने लिखा था जिसमें गम्भीर तर्कों के साथ चुटीली हाजिरजवाबी भी थी । बांगला तो उनके लिए मातृभाषा जैसी थी ही, हिंदी और अंग्रेजी का भी उनका ज्ञान अगाध था । हिंदी में वे पर्याप्त साहित्यिक हिंदी लिखते थे । सम्भव है बांगला का अभ्यास होने से ऐसा हुआ हो या उच्च संस्कृति पर भी जनता का अधिकार होने की मान्यता से ऐसा हुआ हो । बांगला के सिलसिले में उन्होंने बताया था कि पूरावक्ती कार्यकर्ता होने के बाद ऐसा रमे कि सपने भी बांगला में देखते थे । अनुवाद का काम मैं भी पार्टी के लिए बहुत पहले से करता रहा था इसलिए उस मामले में उनका मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहा ।

इस सिलसिले में एक सूचना साझा करना उचित होगा । ग्रंथशिल्पी के लिए उन्होंने मार्क ब्लाख की किताब ‘हिस्टारियन’स क्राफ़्ट’ का हिंदी अनुवाद ‘इतिहासकार का शिल्प’ शीर्षक से किया । मार्क ब्लाख ने सामंती समाज का अध्ययन किया था । उनकी किताब में स्वाभाविक तौर पर मध्यकालीन यूरोपीय संदर्भ आये थे । पांडे जी ने सही अनुवाद के लिए ढेर सारा शोध किया । इसी तरह ग्रंथशिल्पी से ही ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ पर जब मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के संपादन में किताब छपी थी तो उसमें पांडे जी का भी लेख था । पूछने पर विनम्रता के साथ उन्होंने कहा कि दीपंकर के लेख से ज्यादातर सामग्री लेकर उन्होंने पार्टी का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए वह लेख लिखा । ज्ञान की दुनिया पर अपना दावा ठोंकने वालों की क्षुद्रता के मुकाबले यह सहज विनम्र भाव कितना उदात्त है!            

दिल्ली छोड़ने के बाद भी उनके साथ संवाद हमेशा रहा । शाहजहांपुर के कालेज की लाइब्रेरी के लिए किताब खरीदने आया तो उनसे मिला । वर्धा से दिल्ली आया तो उनसे मिला । मित्र मंडली भी पांडे जी की दीवानी थी । आपस में बातें उनके बारे में अक्सर होतीं । रेलवे के बारे में उनकी जानकारी प्रचंड थी । उसके संचालन की समूची व्यवस्था को वे जानते थे । शाहजहांपुर में रहते हुए मुझे पोस्ट व्यवस्था में पिनकोड के महत्व का पता चला था । रुचि इसीलिए हुई क्योंकि पांडे जी ने अपने चारों ओर की दुनिया को समझने की उत्सुकता पैदा कर दी थी । आज इसके बारे में दो तरीकों से सोचता हूं । एक कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने हम भारतीयों को बौद्धिक रूप से आलसी कहा है । इसका उदाहरण यही कि हमें दुनिया की व्यापक व्यवस्था को समझने में कोई रुचि नहीं होती । दूसरे कि इन चीजों का आविष्कार वर्तमान व्यवस्था की मजबूती के लिए नहीं हुआ है । इन सभी का आविष्कार मनुष्य ने सार्वजनिक सुविधा के लिए किया है । पूंजी के वर्तमान शासन ने उनको अपने लिए अधिग्रहित तो कर लिया है लेकिन अंतत: उनका सही इस्तेमाल ऐसी ही व्यवस्था में सम्भव है जिसमें कुछ लोगों का ही उन पर कब्जा न रहे । इस अर्थ में वे भविष्य के समतामूलक समाज हेतु योग्य मनुष्यों का निर्माण अनवरत करते रहे थे ।

बौद्धिक काम में सहकारिता के उनके उदाहरण की बदौलत ही अवधेश, मृत्युंजय और मैंने गोरख पांडे के शोध का मिलकर हिंदी अनुवाद किया था । जैसा जेएनयू के उस कमरे में रहा था वैसा ही माहौल पैदा करने के चक्कर में रात बिरात पांडे जी को फोन लगाकर दार्शनिक शब्दावली का मतलब पूछते रहे थे । उससे पहले चंद्रशेखर के बिदेसिया पर लिखे शोध का अनुवाद उनसे जंचवाया गया था । जो संशोधन उन्होंने किये उनके चलते वह अनुवाद खिल गया । गोरख पांडे के शोध के अनुवाद में उनकी प्रत्यक्ष मौजूदगी न होने के चलते ही थोड़ी कमी रह गयी ।

सिल्चर में नौकरी करते हुए वहां के सामाजिक जीवन में संस्कृति की जबर्दस्त उपस्थिति समझ नहीं आती थी । कोई भी राजनीतिक सभा हो, सार्वजनिक कार्यक्रम हो, नाच गाना उसका अनिवार्य हिस्सा होता था । हम हिंदी प्रदेश वालों को उसका ऐसा महत्व स्पष्ट नहीं होता । इंडियन आइडल में अपने प्रांत के गायक को जिताने के लिए राजनेता से लेकर व्यवसायी तक लग जाते थे । एक बार दुगापूजा की छुट्टी में पुत्र समेत पटना गया तो लोकयुद्ध के कार्यालय में ठहरा । वापसी के एकाध दिन पहले उनसे जिज्ञासा प्रकट की तो उन्होंने अफ़सोस जाहिर किया कि जाते समय यह सवाल पूछ रहा था । बहरहाल, डी पी बख्शी पर लिखे उनके संस्मरण को पढ़ते हुए देखा कि असम में काम करने के लिए वहां की सांस्कृतिक विशेषताओं का उन्होंने बाकायदा अध्ययन किया । पांडे जी ने भी जयंत रोंगपी के साथ कार्बी संस्कृति के बारे में अपनी लम्बी बातचीत का जिक्र किया था ।

यह बात हमारी पार्टी को पारम्परिक वामपंथी पार्टियों से अलगाती है । किसी भी जगह या समुदाय को समझने के क्रम में वहां की संस्कृति को भी समझना जरूरी है । कारण कि उसका निर्माण मानव समुदाय ने जीवनक्रम में सामूहिक रूप से किया है इसलिए उस पर उसका हक है । जिसे हम उच्च संस्कृति कहते हैं उस पर भी जनता का अधिकार है । यदि आज जनता उसका आनंद नहीं ले पा रही तो उसे इसमें सक्षम बनाना किसी भी गम्भीर वामपंथी आंदोलन का दायित्व है । किसी भी संस्कृति के उत्पादक समुदाय से उसको छीन लेने की क्षमता शक्तिशाली समूह का लक्षण हो सकता है लेकिन उस पर उनका हक स्वाभाविक नहीं होता । सामान्य जनता के जीवन स्तर को इतना उन्नत करना होगा कि वह इसका आनंद ग्रहण करने की रुचि और योग्यता हासिल करे । आखिर यही तो हमारे आंदोलन का लक्ष्य है ।

अपने आंदोलन को पुराने आंदोलनों की धारावाहिकता में देखने की उनकी आदत का प्रमाण झारखंड के सिलसिले में लिखा उनका एक लेख है जिसमें उन्होंने स्वामी सहजानंद सरस्वती की मार्फत यह बताया था कि झारखंड की मूल समस्या किसान समस्या है । झारखंड को आंतरिक उपनिवेश आदि बताने वालों या उसे आदिवासी समस्या समझने वालों के मुकाबले यह नजरिया वर्गीय था । जब इस बात का जिक्र अखिलेंद्र भाई से किया था तो उन्होंने पांडे जी के बहुपठित होने की तस्दीक की थी ।          

सिल्चर के बाद दिल्ली आया तो प्रसन्न होकर बताया कि विश्वविद्यालय से लैपटाप मिला है । उन्होंने इसे चिंताजनक बताया और कहा कि अब आप चौबीसों घन्टे कार्यालय में ही रहेंगे । आज जिस ‘वर्क फ़्राम होम’ को नये समय का सुविधाजनक तरीका बताया जा रहा है और तमाम गुणगान किया जा रहा है उसकी शोषक असलियत को इतनी आसानी से उन्होंने समझा दिया कि मैं निरुत्तर हो गया । समाज में होनेवाले तमाम सतही बदलावों के नीचे कार्यरत बुनियादी प्रक्रियाओं और ताकतों को उनकी मर्मभेदी निगाह तुरंत पहचान जाती थी ।   

वे जितना लिख सकते थे उसके मुकाबले बहुत कम लिखा । जितना लिखना चाहते थे उतना भी नहीं लिख सके । निजी तौर पर जानता हूं कि उनकी इच्छा नक्सलबाड़ी गांव पर एक किताब लिखने की थी । इसके कारण महसूस होता है कि उनका लिखा सहेजा जाना चाहिए । हमेशा ही वे पार्टी घेरे के बाहर के लोगों से भी संवाद बनाये रखते थे । जनमत के कार्यालय में एक बार यूरोपीय देशों के लेखकों के किसी प्रतिनिधि मंडल के साथ अपने साथ जुड़े लेखकों की एक मुलाकात में मैंने पंकज सिंह, पंकज बिष्ट, आनंद स्वरूप वर्मा और मंगलेश डबराल को देखा था । नवउदारवाद के जमाने में जब विदेशी कंपनियों के उपभोक्ताओं के लिए भारतीय युवक काल सेंटर में काम करते थे तो उनके बारे में भी पांडे जी को उत्सुकता के साथ बातचीत करते और इसके अर्थतंत्र पर विचार करते देखा था । एक समय जब डान ब्राउन का द विंची कोड मशहूर हुआ था तो दो घंटे में उन्होंने इस उपन्यास का कथासार सुनाया था । इसी तरह हैरी पाटर की लेखिका के घरेलू स्त्री होने और उस उपन्यास में भूतों प्रेतों के लिए प्रयुक्त प्राचीन शब्दों के उल्लेख की बात उन्होंने बतायी थी । पटना में रिया टैबलेट पर अंग्रेजी शब्द बनाने का खेल खेल रही थी । पांडे जी बोले कि अक्षर समूह देखते ही उनके दिमाग में बीसियों शब्द एक साथ आ जाते हैं ।

दुर्भाग्य से जिस समाज में हम रहते हैं उसमें मनुष्य का मूल्य उसके धन कमाने की क्षमता से आंका जाता है । ऐसे उलटे समाज में स्वाभाविक तौर पर उनके लिए पारम्परिक तरीके की कोई सम्मानित जगह न थी । तमाम ऐसे मौके आये जब उन्हें अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा लेकिन इससे उनकी आत्मा पर कोई खरोंच नहीं पड़ी । निजी मानापमान से मुक्त होकर उन्होंने बेहतर समाज के निर्माण के लिए सदा खुद को समर्पित रखा ।   

जबसे उनका निधन हुआ है तबसे शायद ही कोई दिन गुजरा होगा जब उन्हें फोन करके कोई बात पूछने की इच्छा न हुई हो । आखिरी बातचीत में उन्होंने मेरे लिखे का जिक्र किया था और मनस्तत्व के बारे में मार्क्सवादी नजरिये को समझने के लिए किताबों की बाबत जानना चाहा था । ऐसा कौन होगा जो इस तरह के विषयों के बारे में जानने और बात करने के लिए खुला हो! कोरोना तालाबंदी खुलने के बाद कार से गिलहरियों के कुचलने की बात बतायी तो उन्होंने तालाबंदी की खामोशी में उनके जन्म लेने और इसके चलते कार की आवाज से परिचित न होने की सम्भावना जतायी थी ।                                         

Sunday, August 22, 2021

राज्य का अघोषित युद्ध

 2021 में भारत पुस्तक भंडार से प्रकाशित ‘बाइज़्ज़त बरी?: साज़िश के शिकार बेक़ुसूरों की दास्ताँ---‘ के लेखक मनीषा भल्ला और डाक्टर अलीमुल्लाह ख़ान हैं । किताब के शुरू में चार लोगों की टीपें भी शामिल की गयी हैं जिनमें मौलाना सैय्यद अरशद मदनी, मनोज झा और सैय्यद सादतुल्लाह हुसैनी के अतिरिक्त प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद भी शामिल हैं । ये टीपें न होतीं तो भी इस किताब का महत्व कम न होता । इसे किसी भी हिन्दुस्तानी को अवश्य पढ़ना चाहिए ।

किताब में उन नौजवानों की लोमहर्षक कहानियों को दर्ज किया गया है जिन्हें आतंकवादी होने के आरोप में गिरफ़्तार किया जाता है और सबूतों के अभाव में छोड़ दिया जाता है । दस या इससे अधिक सालों तक पुलिस इन्हें जेल में कैद रखने में कामयाब रहती है । रिहाई के बाद भी इनकी जिंदगी कभी पटरी पर वापस नहीं लौटने पाती । उनके जीवन को बरबाद करने की सजा किसी को नहीं मिलती । इनमें अधिकतर नौजवान कश्मीरी हैं । इन सच्ची कहानियों को पढ़ते हुए हमारे शासन तंत्र की पोल परत दर परत खुलती जाती है । इन बेगुनाह नौजवानों का शिकार करने में पुलिस के साथ अदालतें और जेल प्रशासन भी बराबर शरीक रहते हैं । लोक मानस में पुलिस और अदालत की जो तस्वीर दर्ज है उसकी शिनाख्त के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र की नये जमाने की मुकरी से पुलिस संबंधी मुकरी को देखना पर्याप्त होगा । थाना-कचहरी न जाने की आकांक्षा जनता के मन में अकारण नहीं बैठी हुई है । इन दोनों को एक करके समझना भी सच से बहुत दूर नहीं होता । जमानत देने के प्रसंग में लगभग सभी अदालतें पुलिस की बात मान लेती हैं । जेल भेजने की जगह पुलिस की हिरासत में रहने देने के अनुरोध को खारिज करते भी कम ही सुना जाता है । असल सजा से पहले ही कैदी को सजा इसी तरह दे दी जाती है । अकारण नहीं कि पुलिस व्यवस्था पर बार बार सवाल उठते रहे हैं । पुलिस के जवान भी हमारे समाज से ही आते हैं इसलिए उन पर सामाजिक मान्यताओं का असर होना कतई अस्वाभाविक नहीं है । कोढ़ में खाज कि उनको मिले विशेषाधिकार उन्हें इन मान्यताओं के अनुरूप आचरण के लिए सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं । तभी हमारे देश में पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए और हाल में अमेरिका में इसके खात्मे की मांग उठी । स्थानीय सहयोग से शासन की यह व्यवस्था कभी जनसमुदाय में सुरक्षा का भरोसा नहीं जगा सकी । उलटे थाने के पास घर बनाने से परहेज किया जाता है । पुलिस के साथ लड़की भी मजबूरी में ही ब्याही जाती है । उनके कार्यस्थल के हालात और नौकरशाही ने उनके आचरण में क्रूरता को स्थायी बना दिया है ।

सभी जानते हैं कि पुलिस व्यवस्था प्रदेश सरकार के मातहत है इसलिए उम्मीद की जाती है कि जिस प्रदेश की जैसी सरकार होगी वहां की पुलिस के आचरण पर उसका असर होगा लेकिन पिछले एकाध दशक से भारत भर की पुलिस एक जैसा ही आचरण करने लगी है । इसका कारण पुलिस के बड़े अधिकारियों की चयन प्रक्रिया की केंद्रीय व्यवस्था में ही खोजना उचित नहीं होगा । समाज में पल रहे ढेर सारी ऐसी मान्यताओं में इसके स्रोत निहित हैं जिनको कुछ हद तक अफ़वाह ही समझना होगा । जिस तरह अमेरिका में नस्ली भेदभाव की राजकीय व्यवस्था का बड़ा स्रोत वहां की पुलिस का आचरण है उसी तरह हमारे देश में भी अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के साथ व्यवस्था द्वारा हिंसक भेदभाव की संगठित अभिव्यक्ति उनके साथ पुलिसिया व्यवहार से झलकती है । इस मामले में समूचे भारत की पुलिस का आचरण बेहद समान है । समता का दर्शन अब इस किस्म के अत्याचार में ही सम्भव रह गया है!

किताब से यह भी स्पष्ट होता है कि इस अत्याचार का एक साम्प्रदायिक पक्ष है । फिर से अमेरिका का ही उदाहरण लें तो जब भी उसने बाहरी मुल्कों में हस्तक्षेप किया तो उसके साथ ही घरेलू आबादी के साथ भी नस्ली भेदभाव बढ़ा । अपने देश के मामले में भी यही नजर आता है । पाकिस्तान के विरोध का साम्प्रदायिक पहलू किसी भी व्यक्ति को दिखायी देता है । इस विरोध को घरेलू मोर्चे पर बड़ी आसानी से उग्र मुस्लिम विरोध में बदल दिया जाता है । याद दिलाने की जरूरत न होगी कि पाकिस्तान विरोध का यह संयोजक अलग अलग पार्टियों के शासन को एक साथ खड़ा कर देता है । इस शासकीय मुहिम का शिकार क्रिकेट जैसा अवैध धन पैदा करने वाला खेल भी अक्सर हो जाता है । अल्पसंख्यक विरोध के इस खास पहलू से कश्मीर का मजबूत रिश्ता है । कश्मीर के साथ केंद्रीय सत्ता के व्यवहार में शासक पार्टियों के आपसी मतभेद के बावजूद बहुत लम्बे समय से गहरी समानता रही है । अचरज की बात नहीं कि जिन नौजवानों की दर्दनाक कहानियों को इस किताब में दर्ज किया गया है उनमें बहुतायत कश्मीरी नौजवानों की ही है । बहुत सारे संकटों से निजात पाने का पसंदीदा बहाना कश्मीर अरसे से बना हुआ है और इस मामले में भी मुख्य धारा की राजनीति में लगभग सर्वसहमति है । 

यदि आप इस भ्रम में हों कि शेष भारत की तरह कश्मीर का मध्यवर्ग इस मारक भेदभाव से बच जाता होगा तो इस बात की कोई गुंजाइश इन कहानियों को पढ़ने के बाद नहीं रह जाती । कश्मीरी होने के साथ अगर आप मुसलमान हैं तो पक्की गारंटी है कि बिना किसी गलती के भी बम विस्फोट की किसी घटना में आपका हाथ खोज लिया जायेगा ।

फिलहाल देश में कश्मीर का विस्तार हुआ है । पहले केवल कश्मीर के लोगों को नेटबंदी की व्यथा झेलनी पड़ती थी और इस चक्कर में विभिन्न परीक्षाओं और रिक्तियों की खबर वहां के लोगों को नहीं मिल पाती थी । नेटबंदी के अलावे भी अफ़जल गुरू की फांसी के प्रसंग में सारी दुनिया ने जाना कि कश्मीर में पोस्ट आफ़िस से सूचना भेजी जाती है जो कभी पहुंचती नहीं । हाल के दिनों में देश के अलग अलग हिस्सों को नेटबंदी का अनुभव हुआ । एकाध बार तो देश की राजधानी में भी इसे आजमाया गया । राजधानी की सीमा को घेरे किसानों के लिए भी शासकों ने यह तरीका एकाध बार आजमाया । प्रदेश के अधिकारों के साथ छेड़चाड़ भी कश्मीर तक ही सीमित नहीं रही । केंद्र सरकार ने दिल्ली प्रांत के मामले में भी इसी तरह का काम किया । इन सभी घटनाओं की तरह ही आतंकवाद के साथ रिश्ता जोड़ने के मामले में कश्मीरी के अतिरिक्त देश के अन्य हिस्सों के भी मुसलमान आसान चारा बनाये गये । पूरी दुनिया में जारी इस्लाम विरोध के वातावरण से भी इस मुहिम को लाभ मिला । अकारण नहीं कि इजरायल से लेकर अमेरिका तक के इस्लाम विरोध की खाद पर पनपे नेतागण हमारे देश के शासकों पर मेहरबान रहे । इन मामले में अपने नागरिकों की जासूसी भी ऐसी साझा चीज है जो अमेरिका और इजरायल के साथ हमारे देश को जोड़ देती है ।   

किताब में वर्णित अधिकतर मामलों का वर्तमान सरकार से बहुत कम संबंध है । लगभग सभी मामले संप्रग सरकार के समय के हैं । मनमोहन सिंह की सरकार ने देश में दक्षिणपंथ के उभार का अनुमान करके जिस तरह अफ़जल गुरू की फांसी से लेकर बाटला हाउस तक की गलतियों का तांता लगाया उसी विषवृक्ष के फल वर्तमान सरकार को पुष्ट कर रहे हैं । इस सिलसिले में यह भी याद दिलाने की जरूरत न होगी कि हाल फिलहाल ही नहीं आधुनिक भारत के इतिहास के प्रत्येक नाजुक मोड़ पर शासक समुदाय में जो सर्वानुमति बनती रही है उसका अनिवार्य घटक दमनकारी कानून, पुलिस राज, दक्षिणपंथी आर्थिकी के साथ बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता भी रही है । किताब की कहानियों से इस सच की पुष्टि मजबूत तरीके से हो जाती है । इस अंधेरे समय में दमन के पैटर्न को सोदाहरण खोल देने के लिए लेखक निश्चय ही बधाई के पात्र हैं ।

दिल हिला देने वाली इन दास्तानों से सबित होता है कि सर्वानुमति केवल पुलिस बल तक सीमित नहीं रह गयी है, बल्कि उसका निर्लज्ज प्रसार न्यायपालिका तक भी हुआ है । बिना किसी ठोस सबूत के जेल की सलाखों के पीछे जिंदगी के दशाधिक साल गुजार देने वाले बेगुनाहों के नुकसान की भरपाई की बात तक नहीं होती । उनको गलत तरीके से फंसाने वाले तंत्र पर काबिज लोगों को अपने अपराधों की सजा का कोई खौफ़ नहीं रह गया है । इसीलिए शारीरिक से लेकर मानसिक और यौन यंत्रणा तक देना वे अपना विशेषाधिकार समझते हैं । इस मामले में अबू गरीब में दी गयी यंत्रणाओं को बहुतेरे प्रसंगों में दुहराया गया है । दुनिया के सबसे विकसित देश का अनुकरण हम कैसे न करें! दुर्भाग्य की सबसे बड़ी कहानियां जेलों से दर्ज की गयी हैं । जेल में बंद होने के बाद भी इन कैदियों को इस विषैले साम्प्रदायिक भेदभाव से मुक्ति नहीं मिलती, बल्कि कैदियों के हाथों भी इन्हें उत्पीड़न बर्दाश्त करना पड़ता है । इस तरह किताब जेल और जेल से बाहर के वातावरण की आपसदारी को खोलकर हमारी चेतना को झकझोरने का प्रयास करती है ।                               

कानून, अदालत और समूचे तंत्र की इस सम्मिलित कोशिश के बावजूद अगर कुछ आरोपी बरी हो जाते हैं तो इसे शुद्ध भाग्य ही कहना होगा । सामुदायिक यातना का यह जहर केवल मुसलमानों को या कश्मीर के लोगों को ही नहीं पीना पड़ता बल्कि देश की आधी आबादी और दलित समुदाय तथा पूर्वोत्तर तक भी इस व्यवस्था का शिकंजा पहुंचता है । सही है कि इनकी यातना समान नहीं लेकिन पैटर्न लगभग समान है । मृत्युदंड के मामलों की सामाजिक विशेषता का अध्ययन करने से पता चलता है कि इनमें बहुलता आर्थिक रूप से वंचितों की ही नहीं बल्कि धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों  और सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों की है ।    

Monday, August 16, 2021

नये समय की आहट

 

                 

                                        

कोरोना के चलते दुनिया दो साल से ठहरी हुई है । कोई नहीं जानता कि इसके बाद की तस्वीर कैसी होगी । जो लोग भी इस महामारी से बचे रहे उनमें से लगभग सबको एक तरह की दुश्चिंता ने ग्रसित कर रखा है । तत्काल की समस्या रोजगार से जुड़ी हुई है । कहने की जरूरत नहीं कि इतनी लम्बी बंदी ने बड़े पैमाने पर रोजगार छीन लिये । नोटबंदी से तबाह हुए अर्थतंत्र ने थोड़ा संभलना शुरू ही किया था कि महज चार घंटे की सूचना पर की गयी क्रूर देशबंदी ने कामगारों  को सड़क पर ला दिया । पूरी दुनिया ने आंख फाड़कर पैदल या साइकिल पर हजारों किलोमीटर का सफर करके घर लौटते मजदूरों का काफ़िला देखा । विभाजन के बाद दूसरी बार लोगों को किसी और की सनक का नतीजा भुगतना पड़ा । इतिहास में दर्ज होने लायक इस महायात्रा की गवाह वे खून सनी रोटियां भी बनीं जो रेल की पटरी के किनारे कटी लाशों के साथ बिखरी पड़ी थीं । इस भयावह मानव त्रासदी को अभी कलाओं की दुनिया में दर्ज होना बाकी है । सरकारों और फैसला करने में सक्षम अधिकारियों ने जैसी बेरुखी दिखायी वैसी बेरुखी तो गुलामों के भी प्रति भी नहीं दिखायी जाती रही होगी! बुजुर्गों की मौत पर पेंशन की जिम्मेदारी कम होने का जश्न भी मनाया गया । टीकों से कमाई के मामले में निजी अस्पतालों ने खूब अंधेरगर्दी मचायी । सैनिटाइजर और मास्क के मामले में भी मुनाफ़ा लूटने में कोई पीछे नहीं रहा । अस्पताओं में बिस्तर और चिकित्सा की सुविधा तो नहीं ही मिली, उसकी शर्मिंदगी भी रत्ती भर नहीं नजर आयी । तभी तो दहाड़कर संसद में झूठ बोला गया कि आक्सीजन की कमी से किसी मरीज की मौत नहीं हुई । निजी अस्पतालों में सुविधा और दवाओं की उपल्बधता मुहैया कराने में भेदभाव बरता गया । शायद ही कोई होगा जिसका निकट संबंधी या परिवारी इस महामारी में स्वास्थ्य की सरकारी व्यवस्था की भेंट न चढ़ा हो! लोगों ने पुराने जमाने के हैजा और स्पैनिश फ़्लू से होनेवाली मौतों को टूटकर याद किया मानो सौ सालों से चिकित्सा विज्ञान में कोई प्रगति न हुई हो!

इस सिलसिले में सभी लोग कयास ही लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि आगे का समय कैसा और क्या होगा । अगर हम कोरोना के बाद के भविष्य की चिंता करना चाहते हैं तो एक नजर उसके ठीक पहले के बदलावों पर डालनी होगी । असल में तो कोरोना के दौरान भी वही हुआ जो इसके पहले से चल रहा था । बस उसकी रफ़्तार काफी तेज हो गयी । हाल के दिनों में हम अपने देश का जिक्र अमेरिका के साथ करने लगे हैं । पिछली लहर में उसके राष्ट्रपति ट्रम्प ने जिस तरह का गैर जिम्मेदार आचरण किया था उसकी नकल हमने इस लहर में की । कोरोना से ठीक पहले दुनिया की बड़ी चिंता के रूप में विषमता की चर्चा चल रही थी । मशहूर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस जारी थी कि इस समस्या का समाधान किस तरह निकाला जाये । उनकी चिंता का कारण यह था कि अगर सामान्य लोगों के पास धन होगा ही नहीं तो उत्पादित वस्तुओं की खरीदारी कौन करेगा । कोरोना के दौरान इसमें कोई कमी आने की जगह बढ़ोत्तरी ही हुई है । अचरज की तरह दिखायी पड़ा कि कारखानों और व्यापार ठप होने के बावजूद अमीरों की संपत्ति में इजाफ़ा होता जा रहा है । इसको समझने की कोशिश में पता चला कि इसकी वजह बैंकों की लूट है । बैंकों का कर्जा लेकर विदेश भागने वालों की खबरों से लगा मानो नया भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा हो! देश से भागकर विदेश जा बसने वाले सभी पूंजीपति बैंकों का कर्जा डकार गये । इस मामले में सर्वोच्च पद पर बैठे लोग भी सहयोगी के बतौर लिप्त पाये गये । जो भाग गये उनके बारे में खबरें आयीं कि सत्तासीन पार्टियों को चुनावी चंदा देकर भागने का प्रबंध किया है । भाग जाने वालों से बड़ी तादाद उनकी है जो देश में मौजूद हैं लेकिन बैंकों का कर्ज नहीं लौटा रहे हैं । लोग इस बात को समझ नहीं रहे कि बैंक जो कर्ज देता है वह हमारा ही धन है और अगर कोई पूंजीपति कर्ज की रकम डकार जाता है तो यह खुली डकैती ही है । हाल के हिंदुस्तानी अरबपतियों में से अधिकतर इसी तरह की डकैती और लूट से अमीर बन रहे हैं । इसे केवल अर्थतंत्र की बात समझना उचित नहीं होगा । इसका सबसे अधिक असर देश की चुनावी राजनीति और लोकतंत्र पर पड़ रहा है ।

कोरोना का गहरा प्रभाव देश की शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ने जा रहा है । हम सबने देखा कि शिक्षा पाने की इच्छा के साथ जिन वंचित तबकों ने शिक्षा संस्थानों में प्रवेश किया था उन पर अचानक आफत टूट पड़ी है । मंहगे फोन और इंटरनेट का बाजार खूब फल फूल रहा है । उम्मीद थी कि महामारी के बाद देश के शिक्षा संस्थान खुलेंगे लेकिन शिक्षा मंत्रालय  ने आपदा को अवसर में बदलते हुए इस व्यवस्था को स्थायी बनाने का संकल्प कर लिया है । निश्चित है कि इससे शिक्षकों की तादाद में कमी आयेगी । विद्यार्थी न तो अपने साथ पढ़ने वालों से और न ही शिक्षकों से मिल सकेंगे और जिस संस्थान से  भी उन्हें उपाधि मिलेगी उसका प्रत्यक्ष दर्शन किये बिना ही वे सभी कक्षाओं में उत्तीर्ण होते चले जायेंगे ।  शिक्षण  संस्थानों की जमीनों पर बहुत दिनों से भू माफ़िया की नजर थी । अब उसका व्यावसायिक उपयोग का तर्क आसानी से दिया जा सकेगा । संस्थान में जाकर कोई भी विद्यार्थी आम तौर पर थोड़ा खुलापन महसूस करता है । उसे  अपनी उम्र के सहपाठियों का साथ मिलता है तो सामाजिक और जिम्मेदार नागरिकता का विकास होता है । इस महामारी के दौरान ही हमें सावधानी के साथ बदलते माहौल को देखना होगा । कहने की जरूरत नहीं कि किताब की पूरी मौजूदगी का रिश्ता अध्ययन अध्यापन के इस भौतिक वातावरण पर निर्भर है ।  

समूची दुनिया में विषमता के बढ़ने की प्रवृत्ति पहले से थी, कोरोना से उसकी गति तेज हो गयी । इन नये अमीरों ने सरकार को लगभग अपनी जागीर बना रखा है और सरकार देश की परिसंपत्तियों को औने पौने दाम पर इन अमीरों को बेच रही है । बदले में केवल उनसे चुनाव लड़ने का चंदा ले रही है । चंदे के लिए पहले नियम था कि बीस हजार के ऊपर का चंदा नकद नहीं लिया जा सकता इसलिए सभी पार्टियों को उन्नीस हजार नौ सौ निन्यानबे रुपये का चंदा ज्यादा मिलता था । इस पर रोक लगाने के नाम पर सरकार ने व्यवस्था की कि बैंक में पार्टियों के नाम से चुनावी बांड खरीदे जा सकते हैं । इनकी कोई सीमा नहीं होगी और इसे गोपनीय रखा जायेगा । नतीजा यह हुआ कि किस पार्टी को कौन कितना चंदा दे रहा है इसकी सूचना जनता को नहीं होती लेकिन सरकार को होती है । इस सूचना के बल पर सरकार ने अपनी पार्टी के अलावा विपक्षी पार्टियों को चंदा देने वालों को दंडित करना शुरू किया । फिलहाल केवल सत्ताधारी पार्टी को ही सारा चंदा जा रहा है । इसका बड़ा हिस्सा उन पूंजीपतियों ने दिया है जो बैंकों से कर्ज लेकर उसे लौटा नहीं रहे हैं । इस तरह लोकतंत्र मुट्ठी भर थैलीशाहों की जेब में चला गया है । सबने अचरज के साथ देखा कि आस्ट्रेलिया में खनन के लिए एक ठेका जिस पूंजीपति को मिला उसे कर्ज देने के लिए भारतीय स्टेट बैंक की महाप्रबंधक भी साथ ही गयी थीं । प्रधानमंत्री, संबंधित पूंजीपति और महाप्रबंधक की एक साथ की वह तस्वीर ही हमारे समय का सबसे बड़ा मुहावरा बनी । कोरोना को अवसर समझकर उस पूंजीपति के हाथ हवाई अड्डों से लेकर रेल स्टेशन तक सब कुछ बेशर्मी के साथ बेचा जा रहा है । इसके लिए तमाम तरह के कानून आनन फानन में पारित कराये जा रहे हैं । जब अध्यादेशों से काम नहीं चल रहा है तो संसद तक को कैद कर लिया जा रहा है ।

इससे होनेवाली बदहाली से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए झूठी देशभक्ति का उन्माद पैदा किया जा रहा है । पहले देशभक्ति का मतलब देश के बाशिंदों की खुशहाली के लिए चिंतित होना समझा जाता था । फिलहाल इसका मतलब देश के ही कुछ लोगों को उत्पीड़ित करना हो गया है । सांप्रदायिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव बहुत ही व्यवस्थित शक्ल लेता जा रहा है । सरकार का काम नागरिकों की सेवा करना होता है लेकिन सरकार ने इसे उलटकर नागरिक तय करने का मनमाना कायदा बना लिया है । नागरिकों पर संदेह की इस सरकारी प्रवृत्ति ने निगरानी के इतने बड़े और खर्चीले साधन पर जनता का धन पानी की तरह बहाने का कारण खोज लिया है कि सोचकर भी झुरझुरी होती है । आखिर इतने भयभीत लोग देश और जनता की सेवा कैसे करेंगे! हिंदी कवि जयशंकर ‘प्रसाद’ की कविता याद आ रही है- भयभीत सभी को भय देता, भय की उपासना में विलीन । यह पूरी परिस्थिति सिक्के का केवल एक पहलू है । अमेरिका में इसी कोरोना के दौरान अश्वेतों ने ऐतिहासिक आंदोलन खड़ा किया और ट्रम्प को चुनावी शिकस्त खानी पड़ी । हमारे देश में भी किसानों की भारी तादाद ने पिछले आठेक महीनों से राजधानी के चारों ओर डेरा डाल रखा है ।

ऐसे हालात में ढेर सारे लोगों ने बताया है कि कोरोना के बाद की दुनिया वही होगी जिसे हम इस समय बनायेंगे । एक ओर इस महामारी का बहाना लेकर लोकतांत्रिक हकूक का गला घोंटा जा रहा है तो दूसरी ओर सामान्य लोग अपने साथ होनेवाले भेदभाव की मुखालफ़त के जरिये अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर दावा ठोंक रहे हैं । यह लड़ाई कोरोना के पहले से जारी थी, कोरोना के दौरान जारी है और कोरोना के बाद भी जारी रहेगी । आखिरकार भविष्य की दुनिया वही होती है जिसका हम निर्माण करते हैं । प्रत्येक पीढ़ी अपने पहले की सामाजिक समस्याओं को ही हल करने के क्रम मे नये समाज का ताना बाना बुनती है । इस महामारी के दौरान हम सबने न केवल दुनिया भर में झूठ, नफ़रत  और तानाशाही का उभार देखा बल्कि उससे लगातार जूझते हुए अपनी आजादी को बरकरार रखने के अटूट संकल्प के गवाह भी हम सभी रहे हैं । इस महामारी के दौरान अमेरिका का पराभव और चीन का उभार ऐसी चीज है जो आगे की दुनिया में ढेर सारे उलटफेर का कारण बनेगी ।                 

Friday, August 13, 2021

प्रवास हमारे समय की भारी समस्या

 

                  

                                              

बीसवीं सदी के आखिरी दशक में एक शब्द सबसे अधिक चर्चित हुआ । अंग्रेजी में उसे ‘ग्लोबलाइजेशन’ और हिंदी में कभी वैश्वीकरण तो कभी भूमंडलीकरण कहा गया । उसके अधिकतर आलोचकों ने कहा कि इसके तहत केवल पूंजी का वैश्वीकरण हो रहा है । रणधीर सिंह ने तो कहा कि उपनिवेशवाद भी हमारे देश का वैश्वीकरण ही था । आलोचकों ने कहा कि मानव श्रम को पूंजी की तरह सीमाओं के आर पार आने जाने की छूट नहीं मिली है । उस समय भी अमीर मुल्कों में संरक्षण के तमाम उपायों में राष्ट्रवाद का उभार देखा जा रहा था । इसके बावजूद पूंजी के साथ ही श्रमिकों का भी सीमाओं के आर पार आना जाना शुरू हुआ । धीरे धीरे इस प्रवास के राजनीतिक पक्ष सामने आने लगे । श्रमिक जिन देशों में गये उन देशों में उनको घुसने से रोकने के नाम पर नयी उग्र राष्ट्रवादी राजनीति का उभार देखा गया । इस लेख में हमने प्रवास के उन रूपों को नहीं लिया है जो देशों के भीतर हो रहा था । तमाम देशों खासकर चीन में नगरीकरण की तेज रफ़्तार के चलते देहात से उखड़कर लोग शहरों की ओर आये । हमने केवल सीमाओं के पार प्रवास पर ही ध्यान दिया है ।      

दूसरी बात कि मनुष्यों का सरहदों के आर पार आना जाना कोई नयी परिघटना नहीं है । हमेशा ही उन्हें आजीविका के इंतजाम के लिए दूर दूर की यात्रा करनी पड़ती रही है । इसके चलते अलग अलग लोगों के बीच संवाद के साथ संघर्ष भी होता रहा है लेकिन सदा से जारी इस प्रवास के मुकाबले हालिया प्रवास की प्रकृति भिन्न रही है । इसकी वजहों में अन्य चीजों के अतिरिक्त गरीब मुल्कों में जारी युद्धों के साथ पर्यावरणिक बदलाव भी हैं । समुद्र की सतह के ऊपर उठने के चलते ढेर सारी जगहों से लोगों का रोजी के चक्कर में बड़े पैमाने पर अमीर मुल्कों में आने की प्रक्रिया तेज हो गयी है । एक मोटे अनुमान के मुताबिक अपना देश छोड़कर दूसरे देश में अवैध तरीके से घुसकर नागरिकता पाने के इंतजार में या यात्रा में दुनिया की इतनी विशाल आबादी है कि उसे पांचवां सबसे बड़ा देश कहा जा सकता है । जिन देशों में इनका प्रवेश होता है वहां की राजनीति और समाज के साथ उनका रिश्ता पेचीदा होता जा रहा है । आशा है कि इस पुस्तक सूची से इस वर्तमान वैश्विक समस्या की जटिलता को समझने में मदद मिलेगी ।   

2021 में स्प्रिंगेर से करीमा कुर्तित, ब्रूस न्यूबोल्ड, पीटर निजकाम्प और मार्क पार्ट्रिज के संपादन में ‘द इकोनामिक जियोग्राफी आफ़ क्रास-बार्डर माइग्रेशन’ का प्रकाशन हुआ । किताब के पांच हिस्सों में पचीस लेख संकलित हैं । पहले हिस्से में प्रवास के धारणात्मक और ऐतिहासिक प्रसंगों का विवेचन करनेवाले लेख हैं । दूसरे हिस्से के लेखों में अंतर्राष्ट्रीय प्रवास का विश्लेषण किया गया है । तीसरे हिस्से में ऐसे लेख शामिल हैं जिनमें नयी जगह पर प्रवास के असर का विवेचन है । चौथे हिस्से के लेखों में उन जगहों पर ध्यान दिया गया है जिन्हें छोड़कर ये प्रवासी आते हैं । आखिरी पांचवें भाग में प्रवास से जुड़े नीति संबंधी सवालों की छानबीन है । संपादकों का कहना है कि यह समय प्रवास का समय है देशों के भीतर स्थानीय और क्षेत्रीय प्रवास तो हो ही रहा है सीमाओं के आर पार भी बड़े पैमाने पर आवाजाही हो रही है साथ ही इस प्रवास के समाजार्थिक पहलुओं पर काफी बात भी हो रही है प्रवास की परिघटना के आर्थिक पक्ष पर थोड़ा अधिक ध्यान दिया गया है फिर भी मानना होगा कि प्रवास केवल आर्थिक और जनांकिकीय परिघटना नहीं है लोग जिस जगह को छोड़कर जाते हैं और जिस जगह पहुंचते हैं उन दोनों के भूगोल में कुछ समाजार्थिक चालक होते हैं और इस प्रवास के प्रभाव भी इन दोनों ही इलाकों पर पड़ते हैं इसलिए इन पर भी ध्यान देना जरूरी हो गया है         

2020 में जीरो बुक्स से क्रिस मैकमिलन की किताब ‘द लंदन ड्रीम: माइग्रेशन ऐंड द माइथोलाजी आफ़ द सिटी’ का प्रकाशन हुआ । इस किताब का लेखन लंदन में काम के हालात की आलोचना के रूप में शुरू हुआ था । लंदन में रहनेवालों से साक्षात्कार के आधार पर किताब तैयार की गयी है लेखक का मानना है कि विषमता और अन्याय के मामले में पूंजीवाद के तर्क और लंदन के अर्थतंत्र में विक्टोरियाई समय के मुकबले कोई खास बदलाव नहीं आया है । फिर भी यहां आये हुए लोग तमाम असंतुष्टि के बावजूद इसे छोड़कर जाना नहीं चाहते । उनकी बातचीत में उम्मीद और सपने सुनायी पड़ते हैं इसी उम्मीद और आकांक्षा के बल पर लंदन और पूंजीवाद कायम हैं लंदन का यह सपना आकर्षक होने के साथ ही शोषणकारी भी है पश्चिमी देशों की ओर प्रवास की विडम्बना को इस प्रतीक के सहारे अच्छी तरह से व्यक्त किया गया है   

2020 में मेट्रोपोलिटन बुक्स से काओ कालिया यांग की किताब ‘समह्वेयर इन द अननोन वर्ल्ड: ए कलेक्टिव रिफ़्यूजी मेमायर’ का प्रकाशन हुआ । किताब सभी जगहों के प्रवासियों को समर्पित है जिनका भाग्य विभिन्न देशों के संकीर्ण हितों से प्रभावित होता है, जिनके अधिकार छीन लिये जाते हैं तथा जिनकी भूख प्यास अनजानी और अनसुनी रह जाती है । एक प्रवासी की ओर से लिखी होने के बावजूद किताब शरणार्थियों के हालात को प्रस्तुत करने की कोशिश करती है । लेखिका दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की उथल पुथल का शिकार होने के चलते थाइलैंड के एक शरणार्थी शिविर में लम्बे समय तक रहीं फिर भी लोग इसे घर नहीं मानते थे । घर तो पीछे छूट गया था और अब समुद्र के दूसरे किनारे नये सिरे से बनना था । जिस युद्ध के चलते उनकी यह हालत हुई थी उसका प्रत्यक्ष अनुभव न होने के बावजूद उसके नतीजे चारों ओर बिखरे हुए थे । बुजुर्ग लोग लाओस की घटनाओं के बारे में बताते थे । उनकी नींदें बुरे सपनों से भरी रहती थीं । लेखिका को बचपन में ही अपने नागरिकहीन होने का पता था । अमेरिका में पहुंचने पर उनका दाखिला उनके इलाके के शरणार्थियों के स्कूल में हुआ । वहां उनके अलावे कम्बोडिया और वियतनाम से आये परिवारों के बच्चे भी थे । वे पीछे छूट गयी चीजों की तस्वीरें बनाते ।                 

2020 में ज़ाइना स्लीमै-लांग की किताबसैंक्चुअरी रीजन्स ऐंड स्ट्रगल फ़ार बिलांगिंग: अनडाकुमेन्टेड इमिग्रैन्ट्स इन यूनाइटेड स्टेट्सका प्रकाशन हुआ । इसमें अमेरिका आये कागजहीन लोगों के चलते उत्पन्न तनावों की छानबीन की गयी है । जो लोग आये हैं उनके दैनन्दिन में तमाम किस्म की दिक्कतें देखने में आ रही हैं । साथ ही यह भी समझने की कोशिश है कि किस तरह की राजनीतिक संरचना के चलते उन्हें अपने देशों का त्याग करना पड़ा । लेखिका ने अमेरिका में इन प्रवासियों को स्थायी कानूनी हैसियत प्राप्त होने में मौजूद बाधाओं का भी अध्ययन किया है । इन प्रवासियों में शरणार्थियों के साथ राज्यविहीन और कागजविहीन लोग भी शामिल हैं । हमारे देश से अमेरिका जाने वालों में कागजविहीन लोगों की परिघटना बहुत आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए । कुछ ही समय पहले भारतीय दूतावास में कार्यरत महिला अधिकारी के साथ घरेलू सहायक के रूप में गयी संगीता रिचार्ड्स का प्रकरण सामने आया था जिसे वादे के अनुरूप वेतन न देने के चलते अमेरिका में अधिकारी पर मुकदमा दर्ज हुआ था । उस समय वह सहायिका अधिकारी के घर से भागकर अमेरिका के कागजविहीन श्रमिकों के समुद्र में गुम हो गयी थी । इन प्रवासियों की मौजूदगी के चलते न्याय, मान्यता और संबद्धता की धारणा को फिर से परिभाषित करने की जरूरत पड़ती है । उनकी हैसियत के कारण नागरिकता और सत्ता की धारणा पर भी पुनर्विचार करने की बौद्धिक जरूरत पैदा हुई है । इनके चलते किसी भी राजनीतिक समुदाय में समेकन के नये रूप भी पैदा हो रहे हैं । पहले यह काम केवल सरकारी संस्थाओं के जरिये होता था । इन कागजविहीन प्रवासियों के अधिकारों हेतु संचालित आंदोलनों ने देश की सीमाओं पर ऐसे सुरक्षित ठिकानों को जन्म दिया है जहां राज्य के अधिकार सीमित हैं । इन ठिकानों के निर्माण ने अमेरिका में आंदोलन की शक्ल ले ली । इनमें रहने वाले प्रवासी निर्भय होकर सामुदायिक मामलों में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं । इस आंदोलन को चर्च जैसे पवित्र स्थानों को कागजविहीन प्रवासियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनाने से गति मिली । इसके बाद स्थानीय शासन, संस्था या संगठन जैसे अन्य जगहों तक इन ठिकानों को विस्तारित किया गया । इस आंदोलन से देश की सीमा, संप्रभुता और सरकारी नागरिकता जैसे मुद्दों के बारे में नये तरीके से सोचने की प्रेरणा मिली है ।              

2020 में पालग्रेव मैकमिलन से अन्ना मैककीवर की किताब ‘इमिग्रेशन पालिसी ऐंड राइट-विंग पापुलिज्म इन वेस्टर्न यूरोप’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का सवाल है कि आखिर यूरोपीय देशों में आप्रवासियों की आमद पर तमाम प्रतिबंधों की वजह क्या है । तमाम देशों में सरकारों और अनुदार पार्टियों को आप्रवास के मामले पर इतना कठोर रवैया अपनाने को किसलिए मजबूर होना पड़ रहा है । इस सवाल का जवाब पाने के लिए लेखक ने ब्रिटेन, स्विट्ज़रलैंड और फ़्रांस की सरकारी नीतियों के बनने की प्रक्रिया का ठोस अध्ययन किया है । कहने की जरूरत नहीं कि बहुतेरे यूरोपीय देशों में दक्षिणपंथी राजनीति के वर्तमान उभार में आप्रवास महत्वपूर्ण सवाल के बतौर उभरा है ।    

2020 में वन वर्ल्ड से काथी पार्क हांग की किताब ‘माइनर फ़ीलिंग्स: ऐन एशियन अमेरिकन रेकनिंग’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका ने अपनी बात चेहरे से शुरू की है । हम सभी जानते हैं कि गोरे अमेरिका में एशियाई लोगों की पहचान उनकी चमड़ी के रंग और चेहरे की बनावट से आसानी से हो जाती है । इसके आधार पर लेखिका बताती हैं कि चेहरा हमारे बदन का सबसे नग्न हिस्सा होता है और उसके प्रति बहुत अधिक संवेदनशीलता एशियाइयों में पायी जाती है । सूरत को लेकर इस मनोग्रस्ति के चलते बहुधा इस अमेरिकी समाज के साथ अलगाव पैदा होता है । कभी कभी यह तनाव इतना तेज हो जाता है कि कोई व्यक्ति भाषा भी ठीक से बरत नहीं पाता । ऐसे हालात में व्यक्ति कभी निश्चिंत नहीं हो पाता । खुशी के मौकों पर भी दुर्घटना की आशंका बनी रहती है । अपनी मानसिक व्यथा की चिकित्सा के लिए उन्हें अपने ही समुदाय के चिकित्सक को तलाशना पड़ता है ।    

2020 में वन वर्ल्ड से कार्ला कोर्नेजो विलाविचेन्सियो की किताब ‘द अनडाकुमेन्टेड अमेरिकन्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका ने मजेदार किस्म से किताब की शुरुआत की है । उन्हें अंदाजा था कि 2016 के चुनावों में ट्रम्प जीतने जा रहे हैं । नतीजे घोषित होने की रात उन्होंने सबसे अच्छे वस्त्र पहने । ऐसा करने की वजह टाइटैनिक फ़िल्म का दृश्य था जिसमें डूबती महिलाओं ने सर्वोत्तम परिधान धारण किये थे । वे कागजविहीन अमेरिकी थीं । नतीजे के बाद पिता ने फोन करके सब कुछ खत्म होने की सूचना दी । सुबह उठकर उन्होंने लिबर्टी की मूर्ति के सामने अपनी तस्वीर उतरवायी । वहां जाकर थोड़ा चैन मिला । प्रकाशक से इस किताब को लिखने का वादा किया । बहुत पहले उन्होंने एक अखबार में अपने कागजविहीन होने का रहस्य लिखकर भेजा था । तब कुछ लोगों ने संस्मरण लिखने की गुजारिश की थी । इक्कीस साल की उम्र में वैसा कुछ लिखने की प्रेरणा पैदा न हो सकी । ट्रम्प के जीतने के बाद बहुतेरे लोगों ने लेखिका को अपने घर में पनाह देने की पेशकश की । प्रवासियों के बारे में लेखिका ने काफी कुछ पढ़ रखा था और उससे बहुत मुतास्सिर नहीं थीं । उनमें लेखिका का अनुभव संसार प्रतिबिम्बित नहीं होता था । इस किताब के लिए लेखिका ने अपने जैसे कागजविहीन लोगों के साक्षात्कार लिये, हाथ से उन्हें लिखा और फिर उन्हें किसी मुसीबत से बचाने के लिए नष्ट कर दिया । अंग्रेजी बोल सकने वाले इन आप्रवासियों के बच्चे छुटपन से ही अनुवाद करना सीख जाते हैं जिन लोगों के साक्षात्कार लेखिका ने लिये उनके इसी तरह के तत्काल अनुवाद भी किये कागजविहीन परिवार का कागजविहीन आप्रवासी होकर उनके बारे में लिखते समय पत्रकारीय निष्पक्षता निभाना असम्भव होता है उन्हें रोज रोज भय और तकलीफ से गुजरना पड़ता है किताब की लेखन प्रक्रिया ही उस यातना को बताने के लिए पर्याप्त है जिससे होकर इन आप्रवासियों को गुजरना पड़ता है इसीलिए वे इस किताब को बहुत खुशनुमा बना पाने की माफ़ी मांगती हैं इसमें ऐसे लोगों की कहानी सुनायी गयी है जो मजदूर के बतौर, सफाईकर्मी के रूप में, कुत्ते टहलाते हुए या सामान ढोने वालों के रूप में अपना जीवन बिताते हैं इनके काम के बदले में कोई सम्मान पत्र नहीं तैयार कराया जाता यह सितारों की नहीं, बल्कि भूमिगत लोगों की दुनिया है युवा आप्रवासियों और उनकी संतानों के लिए यह किताब लिखी गयी है लेखिका को यकीन है कि इससे उन्हें आत्मविश्वास के साथ हालात का मुकाबला करने में मदद मिलेगी            

2020 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस से थामस बोर्स्तेलमान की किताब ‘जस्ट लाइक अस: द अमेरिकन स्ट्रगल टु अंडरस्टैंड फ़ारेनर्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने आठ साल की उम्र में पानी के जहाज से न्यू यार्क से आयरलैंड जाने की याद से किताब की शुरुआत की है । उनके पिता को डबलिन विश्वविद्यालय में अध्यापन का काम मिला था । इससे पहले वे अमेरिका से बाहर कभी नहीं गये थे । बंदरगाह पर ढेर सारे आयरिश लोग अपने अमेरिका से घूमकर लौटे रिश्तेदारों को लेने आये हुए थे । तब प्रवास के लिए अमेरिका उनकी मनचाही जगह थी । डबलिन में रहते हुए विदेशियों को जानने का मौका उन्हें पहली बार मिला था । यहां वे विदेशी थे । लोग उनके जैसे ही थे बस तौर तरीके अलग थे । उनके अंग्रेजी बोलने का लहजा, खेल, यातायात, भोजन सामग्री और पेय पदार्थ भिन्न थे । वहां रहते हुए अमेरिकी चीजों की याद नहीं आयी लेकिन वापसी में जहाज पर जब अमेरिका में प्रचलित पेय मिला तो लगा कि लौट आये हैं । उसके मुकाबले वर्तमान समय उतनी भिन्नता का नहीं रह गया है । अब तो अमेरिकी लोग देश के भीतर और बाहर विदेशियों के सम्पर्क में बहुत रहते हैं । इसके चलते उन्हें विदेशियों को समझने की चुनौती का सामना पहले के मुकाबले अधिक करना पड़ता है । अमेरिकी लोग खुद को खास समझते हैं । जब भी कोई उन्हें अपने समान या अलग दिखायी देता है तो अचरज में पड़ जाते हैं । इसी प्रवृत्ति की छानबीन इस किताब में की गयी है ।       

2020 में रटलेज से जेन अन्ना गोर्डन की किताब ‘स्टेटलेसनेस ऐंड माडर्न एनस्लेवमेन्ट’ का प्रकाशन हुआ । आज की दुनिया में जिस विशाल पैमाने पर विस्थापन हो रहा है उसमें राज्यविहीन आबादी लगातार बढ़ती जा रही है । लेखिका का कहना है कि राज्यहीनता और समकालीन गुलामी के बारे में बात होती है तो इन दोनों को ही ऐसी आपवादिक स्थिति माना जाता है जिनका जन्म चरम राजनीतिक विफलता से हुआ है । इन सवालों पर सक्रिय कार्यकर्ता भी इनके शिकारों की संख्या को वास्तविकता से घटाकर बताते हैं । इस दुनिया में बेहतरी की बहुतायत समझने वाले लोग इन दोनों हालात को बुराई और भद्दगी मानते हैं । इन दोनों को किसी भी नैतिक या कानूनी समर्थन से रहित माना जाता है । इन दोनों को ही ऐसी समस्या माना जाता है जिन्हें मौजूदा व्यवस्था के भीतर हल किया जा सकता है । इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून और पुलिस की चुस्ती पर जोर दिया जाता है । सच यह है कि ये दोनों हालात अपवाद नहीं हैं । नागरिकता की नस्ली प्रक्रिया के ये स्वाभाविक परिणाम हैं । जिनके साथ गुलामी की सबसे अधिक सम्भावना है वे तमाम किस्म के अधिकारों से वैसे ही रहित हैं । इस तरह की बहुआयामी अधिकारहीनता से किसी भी व्यक्ति की नागरिकता व्यावहारिक तौर पर निष्प्रभावी हो जाती है । जिन समुदायों को लम्बे समय से राज्यविहीन स्थिति में रहना पड़ रहा है उनकी गुलामी के हालात पैदा होते जा रहे हैं । आधुनिक यूरोपीय देशों में जो समुदाय लम्बे समय से गुलामी की अवस्था में हैं उनके सदस्यों को उन देशों की सरकार अपना नहीं मानती । अन्य किसी राजनीतिक इकाई को वे अपना कह भी नहीं सकते । 

2020 में पालग्रेव मैकमिलन से एरिकुर बेर्गमैन की किताब ‘नियो-नेशनलिज्म: द राइज आफ़ नेटिविस्ट पापुलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । लेखक 2018 में स्पेन से मोरक्को जा रहे थे तो उन्हें समुद्री रक्षकों द्वारा गिरफ़्तार अफ़्रीकी शरणार्थियों का एक समूह नजर आया था । तीन दिन बाद लौटने पर भी वह समूह उसी तरह एक समुद्री नाव पर मौजूद मिला । उन्हें वापस भेजा जा रहा था । इस समूह के विपरीत लेखक को खूब आराम से स्पेन में घुसने दिया गया । लेखक तो पासपोर्ट की प्रभुता जानते थे लेकिन उनकी बारह साल की पुत्री को यह अंतर समझ नहीं आया । असल में पिछली पचास साल की राजनीति इन हालात के लिए जिम्मेदार है ।   

2020 में वर्सो से डैनिएल डेनविर की किताब ‘आल-अमेरिकन नेटिविज्म: हाउ द बाइपार्टीजन वार आन इमिग्रैन्ट्स एक्सप्लेन्स पोलिटिक्स ऐज वी नो इट’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने बताया है कि राष्ट्रपति पद पर एक हफ़्ता बीतते न बीतते ट्रम्प ने 27 जनवरी 2017 को अमेरिका में मुस्लिम देशों से आनेवाले प्रवासियों के प्रवेश पर नब्बे दिनों के लिए प्रतिबंध घोषित किया । इसके साथ ही उन्होंने सभी देशों के शरणार्थियों के प्रवेश पर एक सौ बीस दिनों के लिए प्रतिबंध घोषित किया । चुनाव से पहले की सभाओं में इसका जिक्र तो हुआ था फिर भी आदेश होते ही लोग सन्न रह गये । अनेक लोग जो कानूनी रूप से अमेरिका में स्थायी रूप से बस गये थे उन्हें भी पहले तो आने से और आ जाने के बाद भीतर घुसने से रोका जाने लगा । आदेश के विरोधियों ने हवाई अड्डों पर आप्रवासियों के स्वागत में फूल बिछा दिये और वकीलों ने अदालतों से इस पर रोक लगवायी । यह ट्रम्प की पहली हार थी । लेखक को लगता है कि इसके बावजूद ट्रम्प ने बेशर्मी के साथ वही किया जो उसके पहले के मुखिया भी करना चाहते थे लेकिन कर नहीं पाते थे । एक आम धारणा बन गयी है कि पहले के नेता देश के रोजगार दूर देश ले गये और अमेरिका के भीतर बाहरी लोगों को लाकर रोजगार मुहैया कराया ।         

2019 में प्लूटो प्रेस से अंतोनिस व्रादिस, एवी पपादा, जो पेंटर और अन्ना पपौत्सी की किताब ‘न्यू बार्डर्स: हाटस्पाट्स ऐंड द यूरोपीयन माइग्रेशन रिजीम’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों का मानना है कि वर्तमान प्रवास संकट की समस्या बहुआयामी है इसलिए उस पर विचार भी एक ही अनुशासन तक सीमित रहकर सम्भव नहीं है । इसमें मानव भूगोल, नगर अध्ययन, मानवशास्त्र, समाजनीति और समाजशास्त्र के जानकारों को आपसी सहयोग करना होगा । इसके अतिरिक्त इस समस्या पर किसी भी अध्ययन को सामान्य लोगों तक भी पहुंचना चाहिए । किताब को इसीलिए इस समस्या से जुड़े सामान्य पाठकों के लिहाज से तैयार किया गया है । जिस समूह का निर्माण यूरोपीय संघ के विरोध में हुआ था उनके ही कामकाज के विस्तार के रूप में इस किताब को ग्रहण किया गया है । आप्रवास के संघर्ष और सीमाओं में निहित हिंसा तथा अन्याय की राजनीतिक समझ को जाहिर करना इसका घोषित मकसद है ।   

2019 में पालग्रेव मैकमिलन से ओस्कर गार्शिया आगस्तीन और मार्तिन बाक जोर्गेनसेन की किताब “सोलिडेरिटी ऐंड द ‘रिफ़्यूजी क्राइसिस’ इन यूरोप” का प्रकाशन हुआ । 2016 में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने अमेरिका में एक सम्मेलन में लाखों लोगों के विस्थापन की समस्या पर बोलते हुए कहा कि हमारे समय का सबसे विकराल शरणार्थी और विस्थापन का संकट आया हुआ है और संख्या का संकट होने के साथ ही एकजुटता का संकट भी इसके साथ लगा हुआ है । वाजिब और गैर वाजिब तरीकों से यूरोप में प्रवेश करनेवाले शरणार्थी, प्रवासी और विस्थापितों को ही ‘शरणार्थी संकट’ कहा जा रहा है । इसकी बड़ी वजह उनके देशों की राजनीतिक अस्थिरता तथा सुरक्षा और संरक्षा का अभाव तथा वैश्विक विषमता है । इस संकट में मात्र उतना ही नहीं है जितना ऊपर से दिखाई दे रहा है । इस किताब में संकट की जगह एकजुटता पर जोर दिया गया है जिसके चलते नये राजनीतिक रिश्ते कायम हो रहे हैं । इस एकजुटता से संकीर्ण राष्ट्रवाद को भी चुनौती पेश की जा रही है तथा अधिक समेकित समाज बनाने के वैकल्पिक तरीके खोजने का मौका पैदा हुआ है । विभिन्न यूरोपीय देशों में शरणार्थी स्वागत आंदोलन उठ खड़े हुए हैं । 2016 में प्लूटो प्रेस से इनके ही संपादन में ‘सोलिडेरिटी विदाउट बार्डर्स: ग्राम्शीयन पर्सपेक्टिव्स आन माइग्रेशन ऐंड सिविल सोसाइटी एलायन्सेज’ का प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना और उपसंहार के अतिरिक्त किताब के चार भागों में ग्यारह लेख संकलित हैं । पहले भाग में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की विविधता के बारे में बताया गया है । दूसरे भाग में एकजुटता और संश्रय का विवेचन है । तीसरे भाग में गलत संश्रयों से परहेज करने के बारे में लेख हैं । चौथे भाग में प्रतिरोध के स्थलों का विश्लेषण है ।         

2019 में न्यू यार्क यूनिवर्सिटी प्रेस से शोभा शिवप्रसाद वाधिया की किताबबैन्ड: इमिग्रेशन एनफ़ोर्समेन्ट इन टाइम आफ़ ट्रम्पका प्रकाशन हुआ । लेखक ने बताया है कि आंतरिक सुरक्षा विभाग का गठन 11 सितम्बर के हमले के बाद हुआ था और फिलहाल आप्रवास के नियमों को उसे लागू करना होता है । इस विभाग के अलग अलग निकायों को अमेरिका से आप्रवासियों को पकड़ने, कैद रखने और उनके देश वापस भेजने का काम करना होता है । 2016 के वित्तीय वर्ष में इन निकायों ने सवा पांच लाख लोगों की निशानदेही करके उन्हें गिरफ़्तार किया । आप्रवास के नियमों को लागू करने के मामले में संदिग्ध आप्रवासियों को केवल वापस भेजने से ही काम नहीं चलता, इसके लिए सड़क पर गिरफ़्तारी, कार्यस्थल पर पूछताछ और किसी सुधार गृह में लम्बी कैद जैसे कदम भी उठाने पड़ते हैं । 2016 में ही साढ़े तीन लाख लोगों को सुधार गृह भेजा गया और लगभग इतने ही लोगों को वापस भेजा गया । यह पूरी प्रक्रिया काफी जटिल होती है और इसमें बहुत कुछ विवेकाधीन भी होता है ।      

2019 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ज़चरी क्रेमर की किताब ‘आउटसाइडर्स: ह्वाइ डिफ़रेन्स इज द फ़्यूचर आफ़ सिविल राइट्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने बेहद निजी प्रसंग से किताब की शुरुआत की है । उनके पुत्र को पालतू जानवरों के मामले में भेदभाव पर आपत्ति हुआ करती थी । बड़े होने पर उसके इस भाव में व्यापकता आयी । रंगभेद के मामले पर उसमें अन्याय के विरोध की चेतना पैदा हुई । सभी मनुष्यों की आंतरिक समानता के आधार पर सबके साथ समान आचरण की मांग उसकी मूलवृत्ति बनती गयी । नस्ल, सेक्स, सक्षमता और आयु के आधार पर कानूनी भेदभाव को वह व्यर्थ समझता था । सभी लोग ही असल में एक दूसरे से भिन्न होते हैं । समलैंगिक की भिन्नता भी इसी तरह की एक भिन्नता है । यदि सख्ती से खोजबीन की जाये तो लगभग सभी लोग सामान्य से अलग और बाहरी साबित हो सकते हैं । भिन्नता सार्वभौमिक है और अगर भीतरी को समानता के आधार पर तय किया जायेगा तो सभी बाहरी सिद्ध होंगे । नागरिक अधिकारों का तात्पर्य ही तमाम रुकावटों को तोड़कर हाशिये के समूहों को नागरिक जीवन में शरीक करना है । नागरिक अधिकारों के मामले में सबसे बड़ी चुनौती इस समय भिन्नता को समाहित करना हो गयी है । भिन्नता संबंधी वर्तमान भेदभावपरक सोच के चलते पहचान और बराबरी को नये सिरे से व्याख्यायित करना जरूरी हो गया है । नागरिक अधिकार का प्रावधान सबके लिए उनकी भिन्नता के बावजूद आवश्यक हो चला है ।        

2019 में मेलविल हाउस से जे जे मुलिगन सेपुलवेदा की किताबनो ह्यूमन इज इल्लीगल: ऐन अटार्नी आन फ़्रंट लाइन्स आफ़ इमिग्रेशन वारका प्रकाशन हुआ । किताब अमेरिका में उन्नीस साल से रहनेवाले एक व्यक्ति की विडम्बना से शुरू होती है जिसे चार साल से अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, डिटेंशन सेंटर के भीतर बाहर लगा हुआ है, जमानत पर छूटता है और फिर कैद कर लिया जाता है । गलती बेहद छोटी है और गलतफ़हमी भारी है । आप्रवासियों की वकालत के चलते लेखक को ऐसी दुखद कहानियों से रोज दो चार होना पड़ता है । ट्रम्प के शासन में प्रत्येक आप्रवासी हमेशा इसी आशंका में रहता है कि उसे कैद करके कभी भी वापस भेजा जा सकता है । आप्रवासियों की रिहाइश के इलाकों में सिर्फ़ शक की बिना पर छापा डाला जाता है और कागजविहीन आप्रवासियों को जेल जैसे डिटेंशन सेंटर में भेज दिया जाता है । उनका भाग्य दुराग्रही जजों और पूछताछ करनेवाले अफ़सरों के हाथ में होता है । उनके बच्चों को माता पिता से अलगाकर अनाथ की तरह भटकने को छोड़ दिया जाता है । बुश और ओबामा से लेकर ट्रम्प तक आप्रवासी विरोधी नीतियों की निरंतरता बनी हुई है । ट्रम्प के बाद इन नीतियों को जारी न रखने के मकसद से यह किताब लिखी गयी है । लेखक खुद भी चिली के आप्रवासी दंपति की संतान हैं जिन्होंने पिनोशे शासन से बचने के लिए देश छोड़ा था । इसके चलते उनको अन्य आप्रवासियों के साथ सहानुभूति रहती है ।            

2019 में वर्सो से माया गुडफ़ेलो की किताब ‘होस्टाइल इनवायरनमेन्ट: हाउ इमिग्रैन्ट्स बीकेम इस्केपगोट्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका के मुताबिक ब्रिटेन में 2010 के चुनावों में आप्रवासियों का सवाल सबसे प्रमुख बन गया था और सभी नेता उनके विरोध में जहर उगलने में एक दूसरे से होड़ कर रहे थे । नतीजा कि अनजाने लोग भी उन पर सड़क चलते हमला कर रहे थे । उन्हें अकुशल, बेवकूफ, बोझ और तिलचट्टा या समस्या कहा जा रहा था । यह जरूरी था कि उन्हें मनुष्य समझा जाए । कहने की जरूरत नहीं कि यही शब्दावली हमारे देश में बांगलादेश से आये लोगों के लिए भी इस्तेमाल की जाती है    

2019 में पोलिटी से नीरा युवल-डेविस, जोर्जी वेमिस और कैथरीन कसीदी की किताब ‘बार्डरिंग’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों का मानना है कि सीमा और उसकी पहरेदारी का सवाल इस समय राजनीतिक और सामाजिक जीवन के केंद्र में आ गया है । इसने नागरिकता, पहचान और लगाव को पुनर्परिभाषित किया है और सामाजिक जीवन में बहुसंख्या का दबदबा कायम करते हुए अल्पसंख्यकों के लिए मुसीबत को जन्म दिया है । इस प्रक्रिया में स्थानीय और वैश्विक स्तर पर इनके लिए ढेर सारे अस्पष्ट बहिष्कारी क्षेत्र उभरे हैं ।  

2019 में हेमार्केट बुक्स से स्टीवेन मायेर्स और जोनाथन फ़्रीडमैन के संपादन में सोलितो, सोलिता: क्रासिंग बार्डर्स विथ यूथ रिफ़्यूजीज फ़्राम सेंट्रल अमेरिकाका प्रकाशन हुआ । किताब की प्रस्तावना जेवियर ज़मोरा ने लिखी है । उनके मन में संकोच है कि जो आवाजें किताब में मौजूद हैं वे बेहद शक्तिशाली और जरूरी हैं इन बयानों से जो तस्वीर बनती है वह बहुतेरे लोगों का अनुभव है आज भले ट्रम्प अमेरिका के इतिहास से गोरों से भिन्न लोगों को बेदखल करने की कोशिश करें लेकिन सच यही है कि इस भूखंड पर गोरों के आने से पहले के स्थानीय लोगों और काले लोगों का अधिक अधिकार बनता है   

2019 में फ़रार, स्त्रास ऐंड गीरू से सुकेतु मेहता की किताब दिस लैंड इज आवर लैंड: ऐन इमिग्रैन्टस मेनिफ़ेस्टोका प्रकाशन हुआ । दुनिया भर में दक्षिणपंथी संकीर्ण राष्ट्रवाद के उभार के चलते आप्रवासी समुदाय को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है । विस्थापन की समस्या इतनी गम्भीर हो गई है कि बेवतन लोगों की आबादी बहुत सारे देशों से अधिक हो गई है । पूरी किताब निजी अनुभवों का बयान करते हुए लिखी गई है पहला ही प्रसंग उनके नाना से शुरू होता है जिनसे लंदन में कुछ गोरे ब्रिटेन छोड़ देने की धमकी देते हैं और उनके लंदन में रहने की वजह पूछते हैं नाना बताते हैं कि औपनिवेशिक समय में गोरे भारत रहे थे इसलिए वे लंदन रहने आए हैं और असल में भारत ने ब्रिटेन को कर्ज दिया है सुकेतु का कहना है कि पश्चिमी देशों में आजकल ढेर सारे लोग गरीब मुल्कों से उनके देश में आने वालों की शिकायत करते पाए जाते हैं दूसरी ओर आप्रवासियों को लगता है कि इन मुल्कों ने उपनिवेश कायम करके संपदा का दोहन किया और उन्हें उद्योग लगाने में बाधा पैदा की फिर सदियों की लूट्पाट के बाद देश छोड़ते हुए नक्शे इस तरह से खींचे कि विभिन्न समुदाय आपसी झगड़ों में मुब्तिला रहें अपने देशों में कामगार के बतौर ले गए और अब परिवार लाने में अड़ंगे डाल रहे हैं

इस तरह उपनिवेशों के कच्चे माल और मेहनत की लूट से अपने अर्थतंत्र का निर्माण करने के बाद वे प्रवासियों से वापस जाने को कह रहे हैं उन्होंने खनिजों की चोरी की और संसाधनों की चोरी जारी रखने के लिए सरकारों को भ्रष्ट बनाया हवा और पानी को प्रदूषित किया, खेत बंजर बना डाले और समुद्र सोख डाले अब जब उन मुल्कों से गरीब लोग चोरी नहीं, काम करने उनकी सीमा पर पहुंचे हैं तो वे रुकावट डाल रहे हैं फिर भी उन्हें कंप्यूटरों की मरम्मत के लिए, बीमारों के इलाज के लिए और बच्चों की शिक्षा के लिए इन प्रवासियों की जरूरत पड़ी तो सर्वोत्तम शिक्षित लोगों को बुलाया इतने स्तरों पर दोहन करने के बाद अब इन प्रवासियों के विरुद्ध नफ़रत पैदा की जा रही है लेखक को अमेरिका आने के बाद जिस स्कूल में प्रवेश दिलाया गया उसमें नस्ली भेदभाव इतना गहरा था कि उन्हें चौदह साल की उम्र में एक गोरे विद्यार्थी से उत्पीड़न झेलना पड़ा

इसी प्रसंग में वे ट्रम्प की प्रवासियों के प्रति नफ़रत का जिक्र करते हैं उनके लिए हैती के लोग एड्स फैलाते हैं, नाइजीरिया के लोग अमेरिका आने के बाद अपने झोपड़ों में नहीं लौटते, मेक्सिको के लोग नशाखोरी, अपराध और बलात्कार लेकर आते हैं बहुतेरे लोगों को ये बयान अटपटे लगते हैं लेकिन लेखक ने इन्हें स्कूली दिनों में ही सुन रखा था इसलिए उन्हें अचरज नहीं होता तीस साल से अमेरिकी नागरिक होने के कारण लेखक केवल अमेरिका में  सहज अनुभव कर पाते हैं लेकिन ट्रम्प की जीत के साथ वह विश्वास हवा हो चला है तमाम गोरे नस्लवादी अपने बिलों से बाहर निकल आए हैं और प्रवासियों का जीना दूभर किए हुए हैं ट्रम्प की हरकतों के लिए लगभग एक तिहाई अमेरिकी लोगों का समर्थन है लेखक अपने को शेष दो तिहाई का हिस्सा मानते हैं

2019 में पालिसी प्रेस से स्यू क्लेटन, अन्ना गुप्ता और केटी विलिस के संपादन में अनएकम्पनीड यंग माइग्रैन्ट्स: आइडेन्टिटी, केयर ऐंड जस्टिसका प्रकाशन हुआ । किताब की प्रस्तावना अल्फ़ डब्स ने तथा भूमिका और उपसंहार संपादकों ने लिखा है । इसके अतिरिक्त तीन भागों में दस लेख संग्रहित हैं । सभी लेखक और संपादक कानून, समाज विज्ञान, भूगोल, मीडिया और मनोचिकित्सा से जुड़े प्रमुख जानकार हैं । डब्स ने बताया है कि 1938 और 1940 से ही ब्रिटेन में जर्मनी, आस्ट्रिया, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया के लगभग दस हजार बच्चों को दाखिला दिया जाता है । इस परियोजना के चलते बहुतेरे लोग हिटलरी जर्मनी से बच सके । इससे पहले भी ब्रिटेन ने स्पेनी गृहयुद्ध का शिकार होने से चार हजार बच्चों को पनाह देकर बचाया था जो गुएर्निका की बमबारी से अनाथ हो गये थे । इस तरह के बच्चों और युवाओं को पनाह देना ब्रिटेन की मानवतावादी परम्परा का अभिन्न अंग रहा है । इसी भावना के तहत ब्रिटेन की आप्रवास नीति में लेखक ने संशोधन प्रस्तावित किया ताकि आप्रवासियों के बच्चों को शरण दी जा सके । शुरुआती सरकारी हिचक के बावजूद संशोधन पारित हुआ । इसके बावजूद सरकार ने 480 बच्चों को ही प्रवेश देने की मनमानी सीमा तय कर दी । सवाल है कि आखिर ऐसा बदलाव क्योंकर हुआ । दरअसल वर्तमान सरकार शरणार्थियों के प्रति शत्रुता का भाव रखती है । इसके चलते ही नेता और मीडिया उन्हें अपराधी और बाहरी कहकर उनकी नकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं । उनका कहना है कि यह शत्रुता एक नयी बात है । दिक्कत है कि यह ढेर सारे अमीर मुल्कों में एक साथ प्रकट हुई है । जब दक्षिणी गोलार्ध में युद्ध और तबाही का मंजर है उसी समय अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोप में दीवारें खड़ी की जा रही हैं और सरहदों पर सख्ती बरती जा रही है ।             

2018 में वर्सो से डैनिएल ट्रिलिंग की किताब लाइट्स इन द डिस्टैन्स: एक्जाइल ऐंड रिफ़्यूज ऐट द बार्डर्स आफ़ यूरोपका प्रकाशन हुआ । लेखक ने साफ साफ कहा है कि आप्रवास का इतिहास अमीर कुलीनों के अतिरिक्त शेष सबके आवागमन पर रोक लगाने का इतिहास है । पुराने जमाने में गुलामी या भूदासता के जरिये जनता को देश की सीमाओं के भीतर भी आने जाने पर रोक थी । फिलहाल देश के भीतर की आवाजाही पर 1948 की मानवाधिकार घोषणा के चलते कोई रोक नहीं है । इसकी जगह अब प्रतिबंध अंतर्राष्ट्रीय आवागमन पर लग गया है जबकि दुनिया की आबादी के औसतन कुल तीन फ़ीसद लोग ही अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी हैं । यह अनुपात 1960 से लगभग स्थिर बना हुआ है । असल में वैश्वीकरण बेहद असमान प्रक्रिया है । प्रवासियों का अनुपात तो नहीं बढ़ा लेकिन जिन देशों से लोगों का पलायन हो रहा है उनकी संख्या बढ़ती जा रही है जबकि जिन देशों में वे जा रहे हैं उनकी तादाद कम होती जा रही है । लोग उन्हीं देशों की ओर जा रहे हैं जहां सत्ता और संपत्ति का संकेंद्रण है । खासकर उत्तर पश्चिमी यूरोप में आनेवालों का तांता लगा हुआ है । इन आप्रवासियों का महज दसवां हिस्सा ही अवैध तरीकों को अपनाता है । लेकिन अमीर देश इन शरणार्थियों को रोकने की हरचंद कोशिश करते हैं जिनकी बहुसंख्या युद्ध या अत्याचार के चलते भाग रही है । 1990 में कुल बीस देशों में सीमा पर दीवार या बाड़ लगी थी, 2016 के आते आते उनकी तादाद लगभग सत्तर हो गयी ।     

2018 में वर्सो से मिमि शेलर की किताब मोबिलिटी जस्टिस: द पोलिटिक्स आफ़ मूवमेन्ट इन ऐन एज आफ़ एक्सट्रीम्सका प्रकाशन हुआ । किताब में एक देश से दूसरे देश में आवागमन को मनुष्य का बुनियादी अधिकार माना गया है और इस पर प्रतिबंध लगाने के विरोध में आवाज उठायीयी है ।

2018 में बीकन प्रेस से अवीवा चोम्सकी की किताब ‘“दे टेक आवर जाब्स!” ऐंड 20 अदर मिथ्स एबाउट इमिग्रेशनका विस्तारित संस्करण प्रकाशित हुआ । पहली बार यह किताब 2007 में छपी थी । इसमें पहले संस्करण की भूमिका के साथ नई भूमिका भी शामिल है । किताब के पहली बार छपने के बाद कुछ चीजें बदतर या बेहतर हुई हैं जबकि कुछ चीजें पूर्ववत बनी हुई हैं । आप्रवास से जुड़े झूठ जस के तस बने हुए हैं । कहा जाता है कि हमारे रोजगार पर आप्रवासी काबिज हो जाते हैं, टैक्स नहीं चुकाते हैं और अवैध आप्रवासियों से देश भर गया है । उनको वापस भेजे जाने की मांग उठती रहती है । सच यह है कि 2007 में कागजविहीन आप्रवासियों की तादाद सबसे अधिक थी । उसके बाद से इसमें गिरावट आती गयी है । मेक्सिको से आप्रवास तो वस्तुत: न केवल घटता गया बल्कि अमेरिका से वापस जानेवाले बढ़ते गये हैं । किताब में इसी तरह ठोस तथ्यों के सहारे बहुत सारी भ्रामक मान्यताओं को बेनकाब किया गया है । इससे पहले 2014 में बीकन प्रेस से इनकी ही एक किताबअनडाकुमेन्टेड: हाउ इमिग्रेशन बीकेम इललीगलका प्रकाशन हुआ था । 2007 में छपी किताब पर बातचीत के समय लेखिका को लगा कि आप्रवासियों के अधिकारों को मानवाधिकार घोषित करने का साहस जरूरी है । अमेरिका के शेष वासियों के मुकाबले आप्रवासियों को भिन्न कानूनी दर्जा देना ही गलत है । उनको अलग कहकर उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करना ही गैरकानूनी है । इसी गैरकानूनी काम को स्वाभाविक समझा जाने लगा है और उसका विरोध किताब का घोषित मकसद है ।    

2018 में वर्सो से आइलीन ट्राक्स की किताब का अंग्रेजी अनुवाद वी बिल्ट द वाल: हाउ द यू एस कीप्स आउट एसाइलम सीकर्स फ़्राम मेक्सिको, सेंट्रल अमेरिका ऐंड बीयान्डप्रकाशित हुआ । यह अनुवाद डायने स्टाकवेल ने किया है । लेखिका पत्रकार हैं और इस किताब को उन्होंने पेशेवर दक्षता के साथ लिखा है । किताब की शुरुआत उस महिला न्यायाधीश के जिक्र से होती है जिन्होंने मुस्लिम देशों (लीबिया, सीरिया, इराक, इरान, सूडान, यमन और सोमालिया) से अमेरिका आने वालों को रोकने के ट्रम्प के आदेश को खारिज किया था । ट्रम्प के शुरुआती आदेशों में से इस आदेश का सबसे अधिक विरोध तत्काल हुआ था । उसके बाद से अमेरिका आने वालों को प्रवेश देने या इनकार करने की नीति पर सार्वजनिक बहस जारी है । दशकों से अमेरिका पूरी दुनिया में विविधता को प्रोत्साहित करने वाले एक लोकतांत्रिक देश के रूप में खुद को प्रचारित करता रहा है । असल में दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले अमेरिका में सबसे अधिक आप्रवासी आते रहे हैं । फिर भी कुल आबादी में उनका अनुपात कुल 14 फ़ीसद ही है । कनाडा और आस्ट्रेलिया में यही अनुपात क्रमश: 22 और 28 फ़ीसद है । कतर में 75 फ़ीसद तो सऊदी अरब में 88 फ़ीसद आप्रवासी श्रमिक हैं ।      

2018 में वर्सो से निशा कपूर की किताब डिपोर्ट डिप्राइव एक्स्ट्राडाइट: 21स्ट सेन्चुरी स्टेट एक्स्ट्रीमिज्मका प्रकाशन हुआ । इसमें 11 सितम्बर के हमलों के सिलसिले में गिरफ़्तार किये जानेवाले एक व्यक्ति से कहानी की शुरुआत की गयी है । उसकी बीबी और भाई को भी कैद कर लिया गया था । कोई सबूत न मिलने से हफ़्ते भर बाद रिहा करना पड़ा लेकिन फिर से उसे कैद कर लिया गया । साढ़े चार महीने उसे जेल में बिना किसी अपराध के बिताना पड़ा । वह अल्जीरिया का निवासी था, लंदन में बस गया था और उसे अमेरिका में गिरफ़्तार किया गया कि जिन आतंकवादियों ने 11 सितम्बर के हमलों में हिस्सा लिया था उनमें से चार लोगों का वह शिक्षक रहा था । गिरफ़्तारी के बाद अखबारों में उसे ‘आतंक का शिक्षक’ बताया गया । आतंकवादियों के साथ उसके रिश्ते भी खोज लिये गये । पुलिस अधिकारियों ने उसे सबसे महत्वपूर्ण गिरफ़्तारी कहा और उसके बैंक से भारी लेनदेन के सबूत भी सामने आ गये । इस गिरफ़्तारी से एक दिन पहले ही पत्रकारों ने उसे पुलिस के संदेह की खबर दी थी । गिरफ़्तारी के बाद खबर बनी कि लंदन में अमेरिका के 11 सितम्बर की तरह के हवाई हमले की योजना को पुलिस ने नाकाम कर दिया है । फिर तो यह भी कहा जाने लगा कि ब्रिटेन के आतंकवादियों में घबराहट फैल गयी है । लंदन में भी पुलिस ने काल्पनिक कहानियां सुनायीं । पूरी किताब ब्रिटेन और अमेरिका में जारी इन हालात के इर्द गिर्द बढ़ते सरकारी शिकंजे और इसमें निहित नस्ली नफ़रत का जायजा लेती है ।

2017 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस से निकोलस डि जेनोवा के संपादन में ‘द बार्डर्स आफ़ “यूरोप”: आटोनामी आफ़ माइग्रेशन, टैक्टिक्स आफ़ बार्डरिंग’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की भूमिका के अतिरिक्त किताब में ग्यारह लेख शामिल हैं । किताब प्रवास संबंधी यूरोपीय संकट को लेकर चली बहसों से उपजी है । इस संकट को नजदीक से तब देखा गया जब 19 अप्रैल 2015 को 850 शरणार्थियों को ढो रही नाव समुद्र में पलट गई । उस दुर्घटना में केवल 28 लोग बच सके । शेष मृतकों के शव भूमध्य सागर के किनारे बहकर आ लगे । लगा कि यह साल यूरोप की सीमाओं में घुसकर शरणार्थी का दर्जा चाहने वालों के लिए सबसे अधिक मृतकों का साल साबित होगा । ढेर सारी शरणार्थी नौकाओं के डूबने से यह आशंका सच साबित होने लगी । इसके चलते यूरोप की समुद्री सीमा कत्लगाह में बदल गई ।

2017 में वर्सो और वायस आफ़ विटनेस से गैब्रिएल थाम्पसन के संपादन में चेजिंग द हार्वेस्ट: माइग्रैन्ट वर्कर्स इन कैलिफ़ोर्निया एग्रीकल्चरका प्रकाशन हुआ । कहानी युवा उपन्यासकार जान स्टाइनबेक से शुरू की गई है जिन्होंने कैलिफ़ोर्निया के प्रवासी कामगारों की अवस्था का आंखों देखा वर्णन करने के लिए वहां की यात्रा की थी । किताब मौखिक इतिहास की परियोजना के तहत तैयार की गई है ।  

2015 में स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से थामस नेल की किताब द फ़िगर आफ़ द माइग्रैन्टका प्रकाशन हुआ । इस किताब के लेखक का कहना है कि यह सदी प्रवासी की सदी है । क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस समय जितना प्रवास हो रहा है उतना ज्ञात इतिहास में कभी नहीं हुआ था । दशक दर दशक देशों की आबादी में प्रवास का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है । इसका बड़ा कारण पर्यावरणिक, आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता में बढ़ोत्तरी है । जलवायु परिवर्तन के साथ ही 2008 के वित्तीय संकट, सामाजिक कल्याणकारी मद में भारी कटौती तथा तेजी से बढ़ती बेरोजगारी के कारण धनी देशों में मध्यवर्ग के दरिद्रीकरण के चलते भी ऐसा हो रहा है । कर्ज संकट ने करोड़ों लोगों को उनके घरों से निकालकर सड़क पर खड़ा कर दिया । गरीब देशों में किसानों की बेदखली ने भी जनता को भटकने के लिए मजबूर कर दिया है । इस विराट प्रवास के चलते लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व के समक्ष गम्भीर चुनौती खड़ी हो गई है । ये सभी प्रवासी एक ही तरह के नहीं हैं । कुछ को अस्थायी बहिष्करण के बाद अवसर और लाभ हासिल हुआ लेकिन अधिकतर लोगों के लिए प्रवास खतरनाक साबित हुआ और उनका बहिष्करण लम्बा चला ।     

2014 में स्टेट यूनिवर्सिटी आफ़ न्यू यार्क प्रेस से कतारज़ाइना मार्सिनियाक और इमोजेन टाइलर के संपादन में इमिग्रैंट प्रोटेस्ट: पोलिटिक्स, ऐस्थेटिक्स, ऐंड एवरीडे डिसेन्ट का प्रकाशन हुआ । किताब में संपादकों की प्रस्तावना और पश्चलेख के बाद संकलित तेरह लेख दो हिस्सों में हैं । पहले हिस्से के लेखों में प्रवासियों के प्रतिरोध के सौंदर्यपरक प्रदर्शनों का विश्लेषण है । दूसरे हिस्से के लेख सड़क पर इस प्रतिरोध की कार्यवाहियों का विवेचन करते हैं ।

2013 में वेस्टबोर्न प्रेस से सियाओ-हुंग पई की किताब इनविजिबुल: ब्रिटेनस माइग्रैन्ट सेक्स वर्कर्सका प्रकाशन हुआ । लेखिका पेशे से पत्रकार हैं । इस किताब में जिनका वर्णन है उनके नाम बदल दिए गए हैं लेकिन कहानियों की सचाई संदेह से परे है । इस विषय पर लिखने से सबको अचम्भा होता था । शुरू में चीनी आप्रवासी कामगारों पर लिखते हुए इस विषय पर उनका ध्यान भी नहीं गया था । देखती थीं कि इन कामगारों में पुरुषों की जगह स्त्री कामगार अधिक हैं । कभी सुनाई भी पड़ता था कि ये स्त्री कामगार वेश्यावृत्ति करती हैं । 

2012 में वर्सो से जेरेमी हार्डिंग की किताब बार्डर विजिल्स: कीपिंग माइग्रैंट्स आउट आफ़ द रिच वर्ल्डका प्रकाशन हुआ । लेखक ने बताया है कि किताब की शुरुआत नब्बे दशक के अंत में पश्चिमी यूरोप में दाखिल होनेवाले शरणार्थियों के बारे में एक रपट के बतौर हुई थी । उनकी तादाद साठ साल में कभी इतनी न रही थी । शीतयुद्ध की समाप्ति के तत्काल बाद लाखों लोग धनी लोकतांत्रिक मुल्कों के दरवाजे पर प्रवेश पाने के लिए आ पहुंचे । इनमें युगोस्लाविया, रेगिस्तानी अफ़्रीका, एशिया और मध्य पूर्व के इलाकों से आनेवालों की बहुतायत थी । इन अभागों को इतिहास का अंत नजर नहीं आया था । उन्हें शरण देने का फैसला सरकारों को करना था । सरकारें इस जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा रही थीं, शरणार्थियों पर अवैध तरीके से सीमा पार करने का आरोप लगा रही थीं । किताब में उनकी साहसिक यात्राओं और यूरोप में घुसने के रास्तों के बारे में बताया गया है ।

2012 में प्लूटो प्रेस से फ़्रांसेस वेबर की किताब बार्डरलाइन जस्टिस: द फ़ाइट फ़ार रिफ़्यूजी ऐंड माइग्रैन्ट राइट्सका प्रकाशन गारेथ पीयर्स की प्रस्तावना के साथ हुआ । उनका कहना है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बहुत जरूरी समझकर ढेर सारे अंतर्राष्ट्रीय समझौते किये गये । इनका लाभ लेने वालों की पहली पीढ़ी को अपने जीवनकाल में ही समझ आ गया कि जिन नियमों को वे शाश्वत समझे थे वे अत्यंत भंगुर साबित हुए । धीरे धीरे अहसास हुआ कि प्रत्येक पीढ़ी को इन समझौतों को कायम रखने के लिए लड़ना होगा । मानवाधिकारों, कैदियों और शरणार्थियों से जुड़े तमाम समझौते इसी किस्म के हैं जिनके अनुपालन के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ता है । उन्होंने याद दिलाया है कि केवल सात साल पहले सरकार और सरकारी वकील टार्चर के जरिये हासिल सूचना को अदालत में सबूत की मान्यता दिलाने के लिए आसमान के कुलाबे मिला रहे थे । यह तर्क चंद शरणार्थियों के मामले में पेश किया गया जिन्हें बिना मुकदमा चलाये अनंत काल के लिए कैद किया गया था । राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद को परास्त करने और परिणाम से उपाय के औचित्य को साबित करने का सहारा लेकर तमाम अंतर्राष्ट्रीय करारों को बेखटके तोड़ा जा रहा है और इसका सबसे आसान शिकार शरणार्थी हो रहे हैं ।     

2011 में अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टीच्यूट प्रेस से बैरी आर चिसविक के संपादन मेंहाइ-स्किल्ड इमिग्रेशन इन ए ग्लोबल लेबर मार्केटका प्रकाशन हुआ । किताब में संपादक की प्रस्तावना के अतिरिक्त चार भाग हैं जिनमें नौ लेख संकलित हैं । पहले भाग में ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, दूसरे में अस्थायीकरण, तीसरे भाग में अति कुशल आप्रवासियों के समेकन और चौथे में ऐसे आप्रवासियों के प्रभाव और उनसे जुड़ी नीतियों की चर्चा की गयी है । संपादक का कहना है कि पिछले दशकों में शिक्षा, शोध, नीतियों के निर्माण और मीडिया में अमेरिका आनेवाले अकुशल आप्रवासियों पर बहुत ध्यान दिया गया । इस सिलसिले में कभी कागजविहीन आबादी की बढ़ोत्तरी तो कभी कल्याणकारी योजनाओं के बोझ की बात की गयी । इसके चलते अति कुशल आप्रवासियों की परिघटना पर यथोचित ध्यान नहीं दिया गया । इस बात को हम सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अति कुशल कामगारों के अमेरिका पलायन के संदर्भ से समझ सकते हैं ।     

2008 में यूनिवर्सिटी आफ़ मिनेसोटा प्रेस से लिन फ़ुजिवारा की किताब मदर्स विदाउट सिटिज़ेनशिप: एशियन इमिग्रैन्ट फ़ेमिलीज ऐंड द कांसीक्वेन्सेज आफ़ वेलफ़ेयर रिफ़ार्म का प्रकाशन हुआ । लेखिका का कहना है कि आप्रवास संबंधी लड़ाई के मूल में अमेरिका की नस्लवादी और सांस्कृतिक संरचना से उपजे तनाव हैं । बहुधा इसे संसाधनों की कमी, रोजगार के मोर्चे पर होड़ और सांस्कृतिक समेकन की समस्या की तरह पेश किया जाता है । सभी जानते हैं कि वैश्वीकरण के बाद से ही आप्रवास संबंधी नीति के साथ नागरिकता की राजनीति भी जुड़ गयी है और इसमें अधिकारों के मामले में भेदभाव बरता जाता है । इस समय अमेरिका में आप्रवासियों के बारे में जिस तरह बातें हो रही हैं उसके चलते आप्रवासियों को बाहरी और दुश्मन की तरह पेश किया जाता है । असल में राष्ट्र-राज्य के इतिहास के साथ ही आप्रवास पर रोक और नस्ली शुद्धता का तत्व जुड़ा रहा है । इसकी राजनीति से प्रभावित नीतियों में तय किया जाता है कि कौन आयेगा, रहेगा, काम करेगा और नागरिकता पायेगा । पिछले दशक में आप्रवासियों के अधिकारों को सीमित करने वाली ढेर सारी नीतियों का निर्माण किया गया ।     

2008 में बीकन प्रेस से डेविड बेकन की किताब इललीगल पीपुल: हाउ ग्लोबलाइजेशन क्रिएट्स माइग्रेशन ऐंड क्रिमिनलाइजेज इमिग्रेन्ट्सका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि अमेरिकी राजनीति में अवैध शब्द का इस्तेमाल मंत्र की तरह हो रहा है । आप्रवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग बरसों से कागजविहीन शब्द के इस्तेमाल पर जोर देते रहे हैं जिससे अमेरिकावासी आप्रवासियों की सही स्थिति का बोध होता है । अवैध को संज्ञा की तरह बरतने से उनको एतराज है क्योंकि अवैध तो कर्म होते हैं । इसी वजह से आप्रवासियों के जुलूसों में नारा होता है कि कोई भी मनुष्य अवैध नहीं होता । उनका आंदोलन अन्याय के विरुद्ध समता और अधिकारों का आंदोलन है । असल में अवैध शब्द के व्यापक इस्तेमाल का स्रोत मुखर दक्षिणपंथी राजनीति में जिसकी तासीर नस्लवादी है । कागजविहीन लोगों को शैतान साबित करने उनके राजनीतिक हित सधते हैं । इससे मोटा मुनाफ़ा पैदा होता है । मीडिया में भी बेहिचक इस शब्द का इस्तेमाल हो रहा है । इससे महज विषमता की सामाजिक सचाई का पता चलता है । सदियों से अमेरिका की सीमा में लोग बिना किसी कागज के प्रवेश करते रहे हैं । अब भी यह बहुत छोटा कानूनी अपराध बनता है । वास्तव में इस प्रचार से महज सामाजिक और राजनीतिक विभाजन पैदा किया जाता है । आखिर अमेरिका के अर्थतंत्र में उनकी अनिवार्य मौजूदगी से किसी को भी दिक्कत नहीं ही होती ।          

2006 में हेमार्केट बुक्स से जस्टिन एकर्स चाकों और माइक डेविस की किताबनो वन इज इललीगल: फ़ाइटिंग वायलेन्स ऐंड स्टेट रिप्रेशन आन द यू एस-मेक्सिको बार्डरका प्रकाशन हुआ । किताब में शामिल चित्र जूलियान कारडोना के हैं । लेखकों ने अमेरिका और मेक्सिको की सीमा पर होनेवाले प्रदर्शन के जिक्र से किताब की शुरुआत की है । आप्रवासियों के अधिकारों के लिए वह विराट प्रदर्शन जैसे सोये शेर का जागरण था । यह आंदोलन अश्वेतों के नागरिक अधिकारों के लिए चले आंदोलन से तुलनीय है । अब तक आप्रवासियों के सवाल पर होनेवाली राजनीति बड़े पूंजी संस्थानों और चरम दक्षिणपंथ तक ही सीमित रही थी सहसा उसमें सामान्य नागरिकों का बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप हुआ । जनता की दैनन्दिन बातचीत में यह मुद्दा शामिल हो गया । स्वतंस्फूर्त तरीके से लोग संगठित और गोलबंद होने लगे । इन समुदायों के लिए काम करनेवाले पारम्परिक संगठन पीछे छूट गये और इस नये आंदोलन में नेताओं से आगे आकर सामान्य लोगों ने हिस्सेदारी शुरू कर दी । इस आंदोलन का नेतृत्व आप्रवासी और लैटीनो विद्यार्थी कर रहे हैं और उनकी बराबरी की मांग की धमक कांग्रेस तक सुनायी पड़ रही है । इन लोगों ने जिस तरह अपराधी न होने का एलान किया उससे पता चलता है कि उनके साथ कितना अपमानजनक आचरण होता है । वे अब अदृश्य नहीं रहना चाहते । इस व्यापक आंदोलन की ज़द में युवा, बुजुर्ग और किशोर सभी आ चुके हैं । भागीदारों का कहना है कि वे लोकतंत्र को व्यवहार में लागू कर रहे हैं । अब आंदोलन रक्षात्मक नहीं रह गया है और अमेरिका के आगामी इतिहास का लेखन इन आप्रवासी श्रमिकों के हाथों होना निश्चित है । आंदोलन की प्रतिक्रिया में ऐसे कानून बन रहे हैं जिससे इन आप्रवासियों की मदद करनेवाले भी अपराधी माने जायेंगे । इन नये कानूनों के हिमायती लोगों को अब रक्षात्मक रवैया अपनाना पड़ रहा है । यह आंदोलन अब कामगारों का आंदोलन बन चुका है और उनके सभी आंदोलनों की तरह ही इसे तमाम बाधाओं और चुनौतियों का सामना करना होगा । उतार चढ़ाव भी आयेंगे, धक्के भी लगेंगे लेकिन इसमें वैकल्पिक दुनिया बनाने की सम्भावना निहित है जिसमें कामगार लोग न केवल अपनी किस्मत के मालिक होंगे बल्कि लोकतंत्र की नयी परिभाषा गढ़ेंगे ।                

2005 में प्लूटो प्रेस से गार्गी भट्टाचार्य की किताबट्रैफ़िक: द इल्लिसिट मूवमेन्ट आफ़ पीपुल ऐंड थिंग्सका प्रकाशन हुआ । लेखिका के अनुसार इस किताब का काम उन्होंने 2001 में शुरू कर दिया था । तब बहुतेरे लोग वैश्वीकरण से आये बदलावों के इस पहलू से सहमत नहीं थे । वे मानती हैं कि जबसे मनुष्य ने व्यापार शुरू किया तभी से हथियारों, मादक द्रव्य और मनुष्य का भी व्यापार जारी है । लेकिन 2001 के बाद सहसा लोगों ने वैश्विक गतिशीलता को नियमित करने की बात शुरू कर दी । विश्व स्तर पर जारी धन की गोपनीय आवाजाही के खतरों का जिक्र होने लगा और वैश्वीकरण पर रोक लगाने का उपाय खोजा जाने लगा । उसके बाद से लगातार आपस में जुड़ी इस दुनिया में आवागमन को नियमित करने की चिंता कभी समाप्त नहीं हुई । इसके समाधान के तरीके पर कोई सहमति तो नहीं बन सकी है लेकिन इसकी जरूरत अवश्य महसूस की जा रही है । असल में उन्नीसवीं सदी में यूरोप में जो सामाजिक बदलाव आये उनसे ही हमारी आज की दुनिया की तस्वीर बनी है । नगरीकरण, उद्योगीकरण, साक्षरता, शासन, अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्क और राष्ट्रीय पहचान जैसी चीजों के हम इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि इनसे आजाद दुनिया की कल्पना भी मुश्किल है । इन्हें सहज स्वीकार कर लेने से हम बदलाव की प्रक्रिया की कल्पना नहीं कर पाते या चीजों के वर्तमान स्वरूप से भिन्न होने की सम्भावना को खारिज कर देते हैं । उनका कहना है कि हमारा समय भी ऐसा समय है जो बड़े बदलावों के अन्य दौरों की तरह ही अचरज और आशंका से भरा हुआ है ।       

2004 में प्लूटो प्रेस से टेरेसा हेटर की किताब ओपेन बार्डर्स: द केस अगेंस्ट इमिग्रेशन कंट्रोल्सके दूसरे संस्करण का प्रकाशन हुआ । पहली बार 2000 में यह किताब छपी थी । इससे ही इस सवाल और रुख की लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है । पहले संस्करण की भूमिका में लेखिका ने सूचित किया है कि आप्रवासियों के एक डिटेंशन सेंटर के विरोध में उसे बंद कराने के लिए छह साल से जारी अभियान पर यह किताब आधारित है । जिन्हें वहां कैद रखा गया था उनके अनुभवों के आधार पर शरणार्थियों के साथ दुर्व्यवहार के उदाहरण दिये गये हैं । उनका कहना है कि शरणार्थियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार कोई अपवाद नहीं, आम बात है । 1993 में जबसे वह सेंटर खुला तबसे प्रत्येक माह होने वाले विरोध प्रदर्शन में लेखिका जाती रही हैं । जिन शरणार्थियों से उनकी मुलाकात होती रही उनके साथ बातचीत ही इस किताब की स्रोत सामग्री है । उन्होंने अदालतों में इनकी रिहाई के मुकदमे दायर किये और वकीलों की व्यवस्था की । घर में भी बहुतेरे लोगों को सालों साल रखा । राजनीतिक शरणार्थियों और रोजगार की तलाश में सीमा पारकर आने वालों में वे नैतिक अंतर नहीं करतीं । जो लोग रोजगार की तलाश में आते हैं उनके बाहर निकलने के हालात पैदा करने में उन देशों का हाथ होता है जहां वे जाते हैं । वे मानती हैं कि आवागमन और निवास की आजादी दुनिया भर में होनी चाहिए ।      

2003 में पालग्रेव मैकमिलन से दाइवा के स्तास्यूलिस और अबिगेल बी बकान के संपादन मेंनेगोशिएटिंग सिटिज़ेनशिप: माइग्रेन्ट वीमेन इन कनाडा ऐंड द ग्लोबल सिस्टमका प्रकाशन हुआ । संपादकों का कहना है कि 2000 में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में तेरह करोड़ लोग मान्य प्रवासी थे, 1965 में यह संख्या साढ़े सात करोड़ थी । अगर इस संख्या में कागजविहीन लोगों की संख्या जोड़ लें तो प्रवासी लोगों की तादाद पंद्रह करोड़ होने का अनुमान है । अधिकांश प्रवासी दुनिया के गरीब क्षेत्रों के रहने वाले हैं और इनमें स्त्रियों का हिस्सा बढ़ता जा रहा है । इन प्रवासियों में स्त्रियों की बढ़ती संख्या के चलते नागरिकता की हमारी स्थापित धारणा को चुनौती मिल रही है ।      

2002 में रटलेज से जोसेफ नेविन्स की किताब आपरेशन गेटकीपर: द राइज आफ़ द इललीगल एलिएनऐंड द मेकिंग आफ़ द यू एस-मेक्सिको बाउंडरीका प्रकाशन हुआ । इसकी प्रस्तावना माइक डेविस ने लिखी है । लेखक ने इस किताब को सहकारी उद्यम बताया है । इसकी शुरुआत लेखक के शोध से हुई । माइक डेविस ने मेक्सिको के आप्रवासियों के साथ हत्यारी बर्बरता की याद से अपनी प्रस्तावना को शुरू किया है । असल में लैटिन अमेरिका के साथ अमेरिका की सीमा मेक्सिकों में है । जो लोग भी लैटिन अमेरिका से अमेरिका में घुसना चाहते हैं वे इसी सीमा से प्रवेश करते हैं । इस कोशिश में प्रत्येक वर्ष सैकड़ों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ता है । ज्ञातव्य है कि इसी सीमा पर बाड़ लगाने की योजना ट्रम्प अक्सर बनाते रहे थे । डेविस को ऐसे मृतकों की तस्वीर देखने में आयी जिन्हें सीमा के प्रहरियों ने गोलियों से भून डाला था । वह तस्वीर उनके दिमाग में ताउम्र बनी रही । उनका कहना है कि सीमा राज्य प्रायोजित भौतिक, पर्यावरणिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हिंसा का सुनियोजित तंत्र होती है । इसकी भूमिका तीसरी दुनिया की दरिद्रता को अमेरिका के भीतर प्रवेश करने से रोकने के मामले में बहुत महत्व की है । कुछ भलेमानुस इसे आर्थिक अराजकता को नियंत्रित करने वाली चीज समझते हैं क्योंकि इससे घुसने वाले कामगारों की तादाद को नियंत्रण में रखा जा सकता है । लेकिन सच यह है कि श्रम सस्ती दर पर तभी मिल सकता है जब उसे लगातार संदिग्ध बनाये रखा जाये ।