Friday, September 4, 2020

धूमिल की ‘नक्सलबाड़ी’

 

             

                                   

धूमिल की यह कविता उनके पहले काव्य संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ में कुल चार पृष्ठों में प्रकाशित है । संग्रह से पहले 1967 में बनारस से निकलने वाली पत्रिका ‘आमुख’ में छपी थी । यही साल नक्सलबाड़ी विद्रोह का साल था । उस समय किसी स्थापित पत्रिका में इस कविता का प्रकाशित होना लगभग असम्भव था भारत की राजनीति में नक्सलबाड़ी की विस्फोटक हैसियत तब भी थी खुद इस कविता में आई शब्दावली में कहें तो उसे वक़्त के फालतू हिस्से में धकेल देने की चेष्टा तब से लेकर आज तक मुतवातिर जारी है ऐसा क्यों हो! उसने तो बेहद मेहनत से बुने गाढ़ और गूढ़ जाल को उजागर कर दिया था धूमिल की कविताओं के आकार के लिहाज से यह थोड़ी लम्बी कविता है । आम तौर पर वे लम्बी कविता कम ही लिखते थे । इसका अपवाद ‘पटकथा’ और ‘भाषा की रात’ जैसी कुछेक कविताएं ही हैं । आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में धूमिल साठोत्तरी अराजक विद्रोह से आगे बढ़कर सुसंगत विपक्ष की ओर संक्रमण का प्रतिनिधित्व सबसे बेहतर तरीके से करते हैं । नक्सलबाड़ी बंगाल का रेल स्टेशन है वह छोटा सा रेल स्टेशन अचानक देश में विक्षोभ को एक व्यवस्थित दिशा देने वाले केंद्र का नाम बन गया इसीलिए कविता का शीर्षक बताता है कि कवि इस छोटी सी जगह के राजनीतिक निहितार्थ को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता है

नक्सलबाड़ी की पूरी परिघटना राजनीतिक है और धूमिल के काव्य संग्रह का शीर्षक भी हमसे उनकी कविता को राजनीतिक निगाह से देखने की मांग करता है । हमारी हिंदी में आजकल राजनीति से परहेज बरतने की सलाह दी जा रही है । साहित्य में तो ऐसा खास जोर शोर से किया जाता है लेकिन ध्यान दें तो राजनीति से परहेज बरतने की सलाह जीवन के तमाम प्रसंगों में दी जाती है । अन्य प्रसंगों में जिस तरह यह बात कही जाती है उसकी समानधर्मिता साहित्य संबंधी रुख से है । इसके मूल संपन्न तबकों के लोकतंत्र विरोध में हैं । अंग्रेजी शासन काल में इसी तरह के उपदेश के विरोध में भगत सिंह को युवक और राजनीति विषयक लेख लिखना पड़ा था । राजनीति न करने की सलाह देना शासन में जनता की भागीदारी पर अंकुश लगाने का गम्भीर प्रयास है । इसका अर्थ यह भी है कि राजनीति कुछ खास लोगों को ही करनी चाहिए, शेष लोगों को उससे दूर रहना चाहिए । जिस तरह राजकाज कुछ खास लोगों का विशेषाधिकार समझा जाता है जिसमें सबके राजनीति करने से खलल पैदा हो सकता है उसी तरह कविता भी खास लोगों की ही गतिविधि मानी जाती है । शायद यही बात दिमाग में रही होगी कि धूमिल ने इस कविता में दूसरे प्रजातंत्र की मांग की है । जब वे कविता को सबसे पहले एक सार्थक वक्तव्य बता और बना रहे थे तो कविता की अलोकतांत्रिक हदबंदी का ही विरोध कर रहे थे । विडम्बना कि उनके वारिस उनके संघर्षों को खारिज करते हुए कविता को फिर से अभिजन के लिए रुचिकर साबित करने का शास्त्र गढ़ रहे हैं । धूमिल की यह पूरी कविता लोकतंत्र के हक में न केवल खुद खड़ी है बल्कि तमाम कामगार तबकों को भी इसके लिए कमर कसे हुए चित्रित करती है । इस चित्रण के सहारे वह उनसे लोकतंत्र के लिए लड़ने का आवाहन भी करती है ।    

कविता की शुरुआत ही जबर्दस्त तरीके से होती है जब कवि सहमति के माहौल की मुखालफ़त करता है । वर्तमान संदर्भ में इस धारणा की प्रासंगिकता को देखना हो तो अमेरिकी राजनीति के भीतर अपनाये जा रहे इस तरीके को समझने के लिए नोम चोम्सकी द्वारा कन्सेन्ससकी धारणा का इस्तेमाल देख सकते हैं । समाजविज्ञान की दुनिया में जब इस पद का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था तभी दूर बनारस में बैठे कवि ने नक्सलबाड़ी से पैदा होने वाले इस वैचारिक असर को समझ लिया था । उनके लिए नक्सलबाड़ी की घटना वैचारिक स्तर पर कनसेन्सस यानी सहमति की मुखालफ़त है । असल में उस घटना ने तत्कालीन लोकतंत्र की सीमा उजागर कर दी थी । तब तक उस लोकतंत्र की क्षमता के बारे में सहमति कायम थी । नक्सलबाड़ी ने आजादी के बाद कायम सत्तातंत्र की वैचारिक बुनियाद को सवालों के घेरे में ले लिया था । सत्तातंत्र के बारे में धूमिल की पारदर्शी सोच को आकार देने में नक्सलबाड़ी का इतना गहरा योगदान है कि वे उस समय से आज तक जारी शासन के इस तरीके को पूरी तरह खोलकर उजागर कर देते हैं । कवि को उनके साथी समझाते हैं किभूख का इलाज नींद के पास है। कवि को समझाने वाले उसके ये साथी समझदार लगते हैं । समझदार में निहित व्यंग्य को सही तरीके से धूमिल के साथ के लोगों में सबसे युवा गोरख पांडे की कवितासमझदारों का गीतमें महसूस किया जा सकता है । आज तो पूरी तरह से साफ होता जा रहा है कि भूख से पैदा विक्षोभ को काबू करने के लिए लोगों को कितने तरह के कारगर नशों की नींद में सुलाया जाता है । धर्म के नशे के साथ यौनानंद का नशा भी इस विक्षोभ को तात्कालिक रूप से शांत रखने के काम आता है । तभी तो विरोध के लिए शब्द की तलाश मेंसहुवाइन की जाँघउसे भटकाना चाहती है । इस भटकाव से मुक्त होकर कविदूसरे प्रजातंत्र की तलाशमें जुट जाता है । इस तंत्र के धोखे की समझ के चलते कवि का क्रोध इतना प्रचंड हो जाता है कि वहप्रजातंत्र से बाहरआ जाता है । उसका यह गुस्सा वाजिब है क्योंकि पेट की भूख नामक इस सर्वकालिक समस्या का समाधान उसे नजर नहीं आता । इस समस्या को तुलसीदास ने समुद्र की आग से भी अधिक ज्वलंत बताया था । सहमति की गहरी नींद में सुला देने की साजिश को समझ लेने के बाद कवि को आत्मघाती क्रोध भी स्वीकार है ।

नक्सलबाड़ी की घटना को उस समय और आज भी आतंकी कार्यवाही की तरह पेश किया जाता है । उस समय के अखबार, खासकर हिंदी के, इस समय जैसा ही सत्ता समर्थक आचरण करते थे । हिंदी की तो बात ही छोड़िए, पश्चिम बंगाल तक में अखबार नक्सल कार्यकर्ताओं को डाकू की तरह ही पेश करते थे । असल में अखबार यह काम मध्यवर्ग के भीतर तत्कालीन शासन को वैधता प्रदान करने के लिए करते रहे हैं । मीडिया आम तौर पर विपक्ष में होने का भ्रम देता है लेकिन अक्सर सर्वसम्मति का उत्पादन करता है । जाहिर है उस समय अखबारों के ज्यादातर पाठक मध्यवर्गीय हुआ करते थे । उनका ऐसा भयादोहन अखबार के अपने व्यवसाय और शासन की स्थिरता के लिए जरूरी होता था ।

धूमिल की इस कविता के कुछ निहितार्थों को समझना इस समय सम्भव हुआ है । जिस तरह उलटबांसी एक उलझी अनुभूति की अभिव्यक्ति का साहित्यिक तरीका थी उसी तरह कविताओं के अर्थ भी बहुत बाद तक खुलते रहते हैं । दायें हाथ की नैतिकता संबंधी धूमिल की शब्दावली उनके साठोत्तरी संस्कार से जोड़कर देखी जाती थी लेकिन आज दक्षिणपंथ के उभार के साथ दाहिने हाथ की साजिश का थोड़ा भिन्न अर्थ भी खोला जा सकता है । इस हाथ की साजिशखाली पेटकी आग को भुलाने के काम आती है । खाली पेट का सवाल ही वह सुरक्षित जगह है जहां से खड़ा होकर इस साजिश से कारगर तरीके से लड़ा जा सकता है । इस समझ को हासिल करने के बाद कविता तत्कालीन जनतंत्र द्वारा सृजित धोखों को पहचानने लगती है । इन धोखों के तहत आदमी को अकाल की तस्वीर बनाकर इश्तिहार में चिपका दिया जाता है । इस प्रचार के जरिये जो हवा बनाई जाती है वह बुझ चुकी है और प्रचार के काम आने वाले उन इश्तिहारों की चमक उतर चुकी है । धोखे से बनाया और टिकाया भरम केवल इतना ही नहीं टूटा है । स्वाधीनता संग्राम की भूली बिसरी जिन कथाओं को पालतू बनाकर इस सहमति के लिए पचा लिया गया था उनमें पिरोये देशप्रेम के कथानक भी बेअसर हो चुके हैं । एक ओर तो यह हुआ है दूसरी ओर कल तक जो लोग इस सहमति से लड़ने के लिए आमादा होकर संसद को उसकी सीमा से बाहर लाना चाह रहे थे वे भी अब समझौते के राही हो गये हैं । विरोध में आवाज उठाने के लिए कोई नहीं बचा है । स्वार्थ के वशीभूत होकर व्यवस्था के पक्ष में वे भी चले गये जो कल तक संसद की सीमा पार कर सड़क पर उतरना चाहते थे । इतनी भारी घेरेबंदी से निश्चिंत होकर शासक ही लेखपाल बना हुआ सब कुछ तय कर रहा है । खेतों यानी कामगारों के हाथ में हथकड़ी पड़ी है और दुख की बात कि शासक के साथ ही वह विपक्ष भी चला गया है जिसे खेतों की हथकड़ी खोलने का उपाय करना था ।

जब भाषा के चाकचिक्य और वैचारिक आम सहमति के असर में सब एक साथ दायें पक्ष की साजिश के शिकार हो गये हैं तो इस भयावह अकेलेपन में कवि का साथ केवल कविता देती है । संसार के लगभग सभी कवि शोषण दमन की ताकतवर मशीन के सामने अपनी उसी नाजुक ताकत के साथ खड़े होते रहे हैं जिस पर उनका अधिकार है । इसी रस्म को निभाते हुए धूमिल भी दूसरे जनतंत्र के लिए अपनी कविता को वर्तमान के प्रतिपक्ष में खड़ा कर देते हैं । यह कमजोर तो है लेकिन हज्जाम के उस्तुरे जैसी चमक वाली है । इस हज्जाम ने धोखे के समक्ष हथियार नहीं डाले हैं इसलिए उसकी किस्मत अभी खुली हुई है । अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ कि इस जंग में कौन जीतेगा । जब लोकतंत्र पर संकट है तो जाहिर है नागरिकता भी संकट में होगी । नागरिकता केवल कागज का कोई टुकड़ा नहीं होती । वह समूचे देश के संसाधनों में हक का दावा होती है । इस दावे को हलाल करने का विरोध मेहतर का हिलता हुआ झाड़ू करता है । विपक्ष में कविता के साथ हज्जाम के उस्तुरे और भंगी के हिलते झाड़ू का साथ दिखाना अप्रतिम काव्य युक्ति है । इनके साथ ही पाठक को भी कवि अपने साथ ले लेता है । धूमिल का यह पाठक सामान्य नौजवान है जो बेकारी और नींद से परेशान है । इस परेशान युवा को मतदान के बाद अंधकार ही मिला है । इस लोकतंत्र में जो धोखा हुआ है उसे जनता के मतदान से पैदा शासन द्वारा भाईचारे के चालाक प्रदर्शन के सहारे व्यक्त किया गया है । शासक की ओर से खुद को जनता का साथी बताने की शातिराना हरकत से सावधान करते हुए कवि कहते हैं कि यह क्रूर धोखा किसी भी समय आप मतदाताओं के चेहरे की हरियाली अर्थात खुशगवार रह पाने की क्षमता को समाप्त कर सकता है । इन चित्रों में हम धूमिल के समय से अधिक अपने समय की छाप महसूस कर सकते हैं ।

बदहाली और धोखे के इसी इतिहास ने विद्रोह पर हिंसा थोप दी है । सत्ता ने धोखे और हिंसा का जो माहौल बनाया है उसने हिंसा को सर्वव्यापी बना दिया है । वह विपक्ष भी सत्ता के साथ साझेदारी कर रहा है जिसे जनता के पक्ष में खड़ा होकर सहमति पर आपत्ति दर्ज करनी चाहिए थी । ऐसे में पेट की आग, बेकारी और जंगलराज ने समूची व्यवस्था के प्रति युवा के मन में सपरिवार नफ़रत पैदा कर दी है । कवि नफ़रत के इस प्रसार के साथ नहीं दिखाई पड़ता । उसे इस बात पर दुख है कि आखिरकार शासक इस बात में सफल हो गये कि बच्चा स्लेट से पढ़ने की जगह पड़ोसी का गला काटने के लिए तैयार कर दिया गया है । हिंसा के प्रसार और बदहाली ने लोगों को आपस में ही लड़ा दिया है । कहने की जरूरत नहीं कि धूमिल आगामी की पदचाप सुन रहे थे । कवि और कविता ने राजनीतिक व्याख्या की मांग रखी इसलिए उस पर जोर दिया गया । धूमिल ने मुक्त छंद की कविता को उसकी तुर्शी प्रदान की जिसका प्रभाव आज तक की राजनीतिक कविता पर देखा जा सकता है । खरे खरे अप्रिय वक्तव्य की लय को साधना बहुत मुश्किल होता है । धूमिल ने कविता के रूपबंध को मजबूर किया कि वह समय की राजनीतिक समझ को स्वर दे । इसके लिए वे कविता के बारे में कायम सहमति से जूझे और इस युद्ध में उन्हें नक्सलबाड़ी का साथ मिला । उन्होंने नक्सलबाड़ी को इस लायक बनाया भी कि वह कविता के लिए दूसरे लोकतंत्र की खोज की प्रेरणा दे ।     

      

                             

Thursday, August 27, 2020

रोजा की एक जीवनी

 

                           

                                           

2019 में वर्सो से जे पी नेट्ल की किताब ‘रोजा लक्जेमबर्ग: द बायोग्राफी’ का प्रकाशन हुआ । दो खंडों में लिखी इस जीवनी की प्रस्तावना पीटर हुदिस ने लिखी है । उनका कहना है कि किसी लेखक का नाम तो बहुत लिया जाये लेकिन उसे पढ़ा न जाये तो यह उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा । उसी तरह किसी क्रांतिकारी का जाप बहुत हो लेकिन उसका अनुसरण न हो तो उसका भारी दुर्भाग्य है । रोजा के साथ यही हुआ है । क्रांतिकारी परम्परा की सबसे गम्भीर सिद्धांतकारों में उनका नाम शुमार होता है लेकिन उनके योगदान को अलग अलग क्षेत्रों में खंडित करने से उनकी पूरी तस्वीर नहीं बन पाती । इसका एक कारण उनके लेखन की अनुपलब्धता है । आज भी उनका बहुतेरा लेखन अंग्रेजी में उपलब्ध नहीं है । मार्क्सवादी परम्परा में वे सर्वाधिक स्वतंत्र चेता क्रांतिकारी थीं । पूंजीवाद के विरोध में सैद्धांतिक, राजनीतिक और निजी लड़ाई लड़ते हुए वे व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिश लगाने की नीतियों को अपनाने वाले सुधारवादी या क्रांतिकारी साथियों की तीखी आलोचना करने में हिचकी नहीं । उनके उदाहरण से प्रेरणा तो बहुतों को मिली लेकिन लेनिन, त्रात्सकी या चे ग्वेरा की तरह उनके नाम के साथ किसी आंदोलन या पार्टी का जुड़ाव कभी नहीं रहा । उनके आदर्श से श्रद्धा जताते हुए भी व्यावहारिक राजनीति के लिए उसे अनुपयोगी ही समझा जाता रहा है । अब हालात में बदलाव आ रहा है । उनके समग्र लेखन को प्रकाशित करने की कोशिशों में तेजी आयी है । साथ ही उनके लेखन का विश्लेषण करते हुए बहुतेरा लेखन हो रहा है । उनके बारे में सभा और सम्मेलन भी आयोजित हो रहे हैं । कह सकते हैं कि उनका इतना गम्भीर अध्ययन इससे पहले शायद कभी नहीं हुआ था । असल में 2008 के वित्तीय संकट के बाद मार्क्सवाद और समाजवाद में लोगों की रुचि काफी बढ़ी है । अमेरिका, यूरोप और समूचे विकसित पश्चिमी जगत में राष्ट्रवाद, नस्लवाद, स्त्रीद्वेष और पर्यावरणिक विनाश में भी बढ़ोत्तरी आयी है । पूंजी जनित तबाही को रोकने में उदारवाद की विफलता ने क्रांतिकारी विकल्प की जरूरत पैदा कर दी है लेकिन अपूर्ण और असफल क्रांतियों की याद के चलते विकल्प की तलाश सीमाबद्ध हो जा रही है ।

ऐसे में रोजा के बारे में लगातार आकर्षण बढ़ रहा है क्योंकि उन्होंने दूसरे इंटरनेशनल के सुधारवादियों की आलोचना तो की ही थी, साथ में रूसी क्रांति के बाद सत्ता में आये बोल्शेविकों की भी आलोचना की थी । इस समय पूंजीवाद का ऐसा कारगर विकल्प निर्मित किया जाना जरूरी है जो समाजवादी समाज बनाने की विगत कोशिशों में निहित विफलताओं और दुर्घटनाओं से खुद को बचा सके । इस मामले में रोजा का लेखन रोशनी दिखाने वाला महसूस हो रहा है । इन कारणों के चलते 1966 में पहली बार प्रकाशित इस जीवनी को फिर से छापने का महत्व जाहिर है । अंग्रेजी में अब तक प्रकाशित रोजा की यह सबसे विस्तृत जीवनी है । लेखक को रोजा के जीवन और लेखन की गहरी जानकारी तो थी ही, वे इस लेखन के ऐतिहासिक संदर्भ से भी अच्छी तरह परिचित थे । यह संदर्भ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि जर्मन सामाजिक जनवादी पार्टी और दूसरे इंटरनेशनल के व्यक्तियों को जाने बिना रोजा के लेखन को समझने में मुश्किल पेश आती है । उनके लेखन को समझने के लिए साथियों और विरोधियों के राजनीतिक जीवन के उतार चढ़ाव को भी देखना समझना जरूरी है । इनमें से लेनिन के साथ उनका रिश्ता खासा जटिल महसूस होता है । एकाधिक मामलों में रोजा ने उनकी आलोचना की है लेकिन उनके साथ घनिष्ठ निजी और राजनीतिक सम्पर्क भी कायम रखा । उन्होंने बहुधा उनकी प्रशंसा भी की है । बाद के दिनों में उनके बीच सम्पूर्ण विरोध या पूर्ण सहमति साबित करने की झूठी कोशिशें हुईं । उनके लेखन को इन संदर्भों से काटकर देखने से भ्रम पैदा होने की सम्भावना बनती है । इन ऐतिहासिक संदर्भों की लेखक की जानकारी के अतिरिक्त जीवनी में उन सभी भाषाओं की मूल सामग्री का इस्तेमाल किया गया है जिनमें रोजा ने लेखन किया । पोलिश, जर्मन और रूसी भाषा में रोजा के लेखन के साथ यह बात भी जुड़ी है कि इन इलाकों के आंदोलनों के साथ उनका सम्पर्क रहा था । रोजा के बारे में अधिकतर अंग्रेजी लेखन में इस तथ्य की अनदेखी हुई है । पोलिश में लिखे उनके अधिकांश लेखन का तो अंग्रेजी अनुवाद ही नहीं उपलब्ध है । धीरे धीरे इसका अनुवाद जर्मन में होना शुरू हुआ है । दुर्भाग्य से रोजा के जर्मन लेखन पर उनके पोलिश लेखन से अधिक ध्यान दिया गया है जबकि वे खुद पोलिश लेखन में अधिक सहज महसूस करती थीं । इसके चलते संगठन और स्वत:स्फूर्तता, केंद्रीयतावाद और सांस्कृतिक स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर उनके वास्तविक विचारों को ग्रहण करने में कठिनाई होती है । हुदिस के मुताबिक रोजा के विचारों के पोलिश संदर्भ को स्पष्ट करना इस जीवनी का सबसे बड़ा योगदान है ।

1969 में इस जीवनी का जब संक्षिप्त संस्करण छपा था तो हाना आरेन्ट ने उसकी भूमिका में इस नुक्ते को अच्छी तरह खोलकर प्रस्तुत किया था । उनका कहना था कि अन्य जीवनियों के विपरीत इस जीवनी में इतिहास केवल पृष्ठभूमि के रूप में नहीं आया है बल्कि खुद ऐतिहासिक समय भी व्यक्ति के जीवन के प्रिज्म से होकर गुजरा है जिसके चलते जीवन और संसार की आवयविक एकता नजर आती है । यह जीवनी न केवल रोजा के जीवन और समय का, बल्कि भविष्य का भी संकेत करती है । इसमें रोजा के जीवन को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है उसके कारण हमारी वर्तमान चिंताओं से उनका संबंध बहुविध जुड़ता है । रोजा ने इस बात पर बार बार जोर दिया था कि पूंजी का तर्क प्राकृतिक और मानवीय सीमाओं को तोड़ देने के लिए उसे प्रेरित करता रहता है । इससे न केवल पूंजीवाद से पहले के ढांचों को तबाह होना होता है बल्कि खुद पूंजीवाद को टिकाये रखने के आधारों का भी विनाश हो जाता है । साम्राज्यवाद के उनके सिद्धांत का आधार उनकी यही मान्यता थी । ‘समाजवाद या बर्बरता’ का उनका मशहूर सूत्र भी इसी से उपजा था । आज के पर्यावरण के विनाश को देखते हुए उनकी मान्यता बेहद उपयोगी प्रतीत होती है । इसी तरह क्रांति संबंधी उनकी मान्यता को देखा जा सकता है । उनके समय में निर्धारणवाद का काफी बोलबाला था । इसके विपरीत उनके लिए क्रांति बहुतेरी सम्भावनाओं से भरा हुआ मानव प्रयास था । स्वत:स्फूर्तता पर उनके जोर को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए । उनके मुताबिक क्रांति किसी पार्टी या कार्यकर्ता समूह की ओर से संपन्न नहीं की जाती बल्कि किसी खास अननुमेय क्रांतिकारी मोड़ पर अपने आप हो जाती है । इसी समझ से उन्होंने अक्टूबर क्रांति के नेताओं की आलोचना की थी । हुदिस के मुताबिक 1956 की हंगारी क्रांति, उपनिवेशवाद विरोधी अफ़्रीकी क्रांतियों, 68 के विद्रोहों, 89 की पूर्वी यूरोप की क्रांतियों और अरब वसंत जैसी तमाम क्रांतियों में रोजा की समझ पुष्ट हुई है । इससे यह भी साबित होता है कि सभी क्रांतियों से नये समाज का जन्म अनिवार्य नहीं है । इन बातों के साथ ही मार्क्सवादी परम्परा में प्रमुख स्त्री सिद्धांतकार होने के नाते उनके लेखन में स्त्री संघर्षों की गूंज सुनी जा सकती है ।

हुदिस के मुताबिक नेट्ल की इन सभी खूबियों के बावजूद पचास साल पहले लिखी यह जीवनी अनेक मामलों में पुरानी प्रतीत होती है । जब किताब लिखी गयी थी तो शीतयुद्ध का दौर था । उस समय यूरोप में सामाजिक जनवादी पार्टियों का दबदबा था और एक तिहाई दुनिया पर कम्युनिस्टों का शासन था । दोनों को ही वे रोजा की मान्यताओं से दूर पाते हैं । सामाजिक जनवादियों ने तो क्रांतिकारी रूपांतरण की आशा बहुत पहले छोड़ दी थी । जो कम्युनिस्ट शासन थे उनमें लोकतंत्र की कोई जरूरत ही महसूस नहीं की जाती थी । ऐसे में रोजा के विचारों को वे चीन और रूस के संशोधनवाद से जोड़कर देखते हैं । हुदिस रोजा के समय के संशोधनवाद और रूसी तथा चीनी पार्टियों में चिन्हित संशोधनवाद में समानता नहीं महसूस करते । इसके मुकाबले उनका जोर मार्क्सवाद की किसी आधिकारिक व्याख्या के मुकाबले रोजा द्वारा उसे निरंतर विकासमान समझने पर अधिक है । नेट्ल ने जिस समय किताब लिखी उस समय उदार पूंजीवाद और तत्कालीन रूसी शासन के बीच का ही विकल्प उपलब्ध था । रोजा का परिप्रेक्ष्य इन दोनों के ही मेल में नहीं था । इस संकट के चलते ही नेट्ल को अपने समय के साथ रोजा को जोड़ने में दिक्कत आयी थी । वैसे तो उनके समय में भी ऐसे कम्युनिस्ट थे जो उदार पूंजीवाद और रूसी सत्ता का विरोध करते थे और नेट्ल ने भी इशारे से रोजा के विचारों से प्रेरणा लेने की सलाह उन्हें दी है लेकिन उनके समय में ऐसे लोगों की आवाज नव वाम के शुरुआती उभार के बावजूद सुनाई नहीं पड़ती थी । आज के दौर के कार्यकर्ताओं की फौज बाजार पूंजीवाद और रूसी मार्के के समाजवाद के विकल्पों के बाहर की सम्भावना तलाश रही है । उनके समय के चलते इस जीवनी में एक और पहलू नहीं उभर सका है । रोजा के निजी और राजनीतिक जीवन के बारे में बात करते हुए नेट्ल ने तत्कालीन स्त्री मुक्ति के नारीवादी आंदोलनों के साथ रोजा के रिश्तों के बारे में कुछ खास बात नहीं की है । सबूत है कि 1906 से 1909 के उनके जीवन को उन्होंने लुप्त वर्षका नाम दिया है जबकि इन्हीं दिनों रोजा ने हड़ताल और ट्रेड यूनियन के बारे में किताब लिखी, पार्टी स्कूल की शिक्षिका रहीं और राजनीतिक अर्थशास्त्र परिचय के अपने ग्रंथ का काम शुरू किया । इसी दौरान उन्होंने अपने पंद्रह साल पुराने प्रेम से नाता तोड़ा । आश्चर्य कि उनके इस पुरुष जीवनी लेखक ने प्रेमी से अलग होने की इस अवधि कोलुप्त वर्षमाना ! नारीवाद के उभार के साथ रोजा के बारे में नये परिप्रेक्ष्य का उभार हुआ है । अनेक वर्षों तक आम तौर पर माना जाता रहा कि रोजा का अपने समय के नारीवादी आंदोलनों से कोई लेना देना नहीं था । जो लोग मार्क्सवाद को वर्ग संघर्ष तक महदूद रखते हैं उन्होंने इसकी तारीफ़ की और नारीवादियों ने इसे उनकी अप्रासंगिकता का सबूत माना । आरेन्ट ने भी स्त्री मुक्ति आंदोलन के प्रति उनकी अरुचि की बात की थी । अब नारीवाद के साथ रोजा के रिश्तों पर संतुलित राय बनाने का समय आया है । अपने समय के समाजवादी स्त्री आंदोलन के साथ रोजा का बहुत नजदीकी रिश्ता रहा था । उन्होंने बुर्जुआ नारी आंदोलन के प्रति अरुचि जाहिर करने के साथ अपने ऐसे पुरुष साथियों का विरोध किया जो उन्हें स्त्री प्रश्न तक सीमित रखकर सिद्धांत का क्षेत्र अपने लिए संरक्षित करना चाहते थे । राया दुनायेव्सकाया ने सबसे पहले समाजवादी नारीवादी के रूप में उनकी वकालत की थी । अब इस बात को मंजूर किया जाता है । जिस समय यह किताब छपी थी उस समय रोजा को यूरोपीय चिंतक ही माना जाता था । कम्युनिस्टों के बीच उनकी छवि अच्छी नहीं थी । उपनिवेशवाद विरोधी क्रांतियों के समय भी इसमें कोई अंतर नहीं आया था । शायद इसकी वजह आत्मनिर्णय के अधिकार की मुखालफ़त थी । आखिर इस चीज के प्रति राष्ट्रीय मुक्ति योद्धाओं को अनुराग कैसे पैदा हो सकता था ! राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए चलने वाले आंदोलनों को खारिज करने के बावजूद रोजा ने उपनिवेशवाद द्वारा अश्वेत लोगों पर ढाये जुल्म और उनकी तकलीफ से उदासीनता नहीं बरती । उपनिवेशित समुदायों के जीवन में पूंजीवादी साम्राज्यवादी घुसपैठ का विरोध उनके सैद्धांतिक लेखन के केंद्र में रहा । विकासशील दुनिया में पूंजीवाद से पहले के देसी सामाजिक संबंधों की मुक्ति की सम्भावना को भी उन्होंने खारिज नहीं किया था । अर्थशास्त्र की उनकी दोनों किताबों में एशियाई, अफ़्रीकी और लातिन अमेरिकी समाजों के स्थानीय सामुदायिक सामाजिक संबंधों की जैसी छानबीन दर्ज हुई है वह मार्क्सवादी परम्परा में सर्वाधिक सुसंगत विवेचन है । उनका कहना था कि भारत, दक्षिण अफ़्रीका और एंडीज के लातिन अमेरिका में खेती का सामुदायिक संचालन और स्वामित्व पिछड़ेपन की निशानी नहीं है बल्कि उनमें लचीलापन और स्थायित्व है तथा अनेक मामलों में वे पूंजीवादी सामाजिक संबंधों से आगे हैं । पश्चिमेतर समाजों को उन्हीं की शर्त पर समझने के लिए रोजा ने गहन अध्ययन किया था । दक्षिणी गोलार्ध में उनके लेखन में जागृत रुचि से साबित होता है कि नेट्ल के मुकाबले रोजा को इस समय भिन्न तरीके से देखा समझा जा रहा है ।

रोजा की सारी किताबों में गहन अर्थशास्त्रीय विवेचन है । लेकिन उनका राजनीतिक लेखन ही लोकप्रिय हुआ जो पुस्तिकाओं की शक्ल में है । वे खुद भी अपने अर्थशास्त्रीय लेखन को अधिक गम्भीर सैद्धांतिक लेखन मानती थीं । नेट्ल की इस जीवनी में भी यह समस्या है क्योंकि लेखक की विशेषता का क्षेत्र राजनीति विज्ञान है । इन सीमाओं के बावजूद इस जीवनी में रोजा के जीवन और लेखन को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है । इसमें वे ऐसी समर्पित मार्क्सवादी के रूप में सामने आती हैं जिसने उन मार्क्सवादियों को चुनौती देने में कभी हिचक नहीं दिखाई जिनका विचार सार्वभौमिक मानव मुक्ति से तनिक भी डगमगाया हो । जीवन भर उन्होंने जो कुछ भी किया उसका एकमात्र मकसद सर्वहारा क्रांति था । लक्ष्य की इस एकाग्रता के चलते ही वे अन्य मामलों का महत्व बहुधा नहीं समझ पाती थीं । शायद इसी वजह से वे राष्ट्रीयताओं की मुक्ति का उत्साही समर्थन न कर सकीं । समाजवाद के लिए संघर्ष को नैतिक दायित्व मानने की जगह पूंजीवाद के अंतर्निहित अंतर्विरोधों की उपज मानती थीं । मार्क्स और एंगेल्स के इस योगदान को उन्होंने बारम्बार रेखांकित किया कि इन्होंने समाजवाद को मौजूदा समाज व्यवस्था का नैतिक प्रतिकार मानने की जगह उसे वर्तमान आर्थिक संबंधों की उपज बताया था । नैतिक सवाल मानने वाले लोग तो तमाम किस्म के आकर्षक नुस्खे तैयार करते थे जिनमें किसी न किसी रास्ते से सामाजिक विषमता घुसी रहती थी । पूंजीवाद के भीतर ही उसके विनाश के बीज मौजूद रहते हैं, इस बुनियादी मार्क्सवादी मान्यता से रोजा जीवन भर प्रतिबद्ध रहीं । अपनी राजनीतिक, सैद्धांतिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के चलते रोजा ने मार्क्सवादी परम्परा के भीतर और बाहर के अनेकानेक विचारकों और कार्यकर्ताओं को प्रेरणा प्रदान की । जहां कहीं उन्हें मार्क्स या एंगेल्स के चिंतन में समस्या नजर आयी उसकी आलोचना भी उन्होंने बेहिचक की । इस आलोचना को वे मार्क्स की सोच का विकास समझती थीं । उनका मानना था कि मार्क्सवादी निष्कर्षों का आंख मूंदकर समर्थन करना खुद मार्क्स के आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य से विचलन है ।

हुदिस ने हाना आरेन्ट द्वारा रोजा को तत्कालीन मार्क्सवादियों की पांत से बाहर समझने की बात का खंडन किया है । आरेन्ट के मुताबिक इसका कारण यह था कि रोजा ने जर्मनी और रूस की पार्टियों से एक गणतांत्रिक कार्यक्रम की मांग की थी लेकिन हुदिस के मुताबिक सभी गम्भीर मार्क्सवादियों ने पूंजीवाद से सफल वर्ग संघर्ष छेड़ने के लिए लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की बात उठाई थी । लेनिन ने भी प्रथम विश्वयुद्ध तक यही राय बनाये रखी थी । प्रथम विश्वयुद्ध में युद्धोन्माद का असर मजदूर वर्ग के भीतर देखकर उन्होंने अपनी राय बदली थी । उनकी बात परिस्थितिजन्य थी इसलिए हुदिस के अनुसार लोकतांत्रिक गणराज्य की मांग के चलते रोजा को मार्क्सवादियों की पांत से बाहर समझना आरेन्ट की भूल है । लोकतंत्र पर रोजा के जोर को बहुतेरे लोग उनका आदर्शवाद समझते हैं । इसका उत्तर देते हुए हुदिस ने कहा है कि जिन्होंने क्रांति के बाद लोकतंत्र को खारिज किया उनको इस रुख का नुकसान भी उठाना पड़ा है । सत्ता पर काबिज रहने के लिए उन्हें क्रांति के लक्ष्य से समझौते करने पड़े । इस मामले में भी रोजा की चिंता को दरकिनार नहीं किया जा सकता । वे ऐसी क्रांति की कल्पना करती हैं जिसके नतीजे में पहले जैसी नौकरशाही या शासक वर्ग का ही उदय न हो जाये ।

अपने क्रांतिकारी मानववाद की ताकत के चलते वे मार्क्सवादियों की सीमा के बाहर के वाम लोकतांत्रिक हलकों में भी लोकप्रिय रही हैं । महान कलाकृतियों की तरह मुक्ति के विचार भी कई बार रचयिता से अजाद हो जाते हैं फिर भी उन्हें मार्क्सवाद की परम्परा के भीतर ही गिनना उचित होगा ।

Sunday, August 2, 2020

मार्क्सवाद और अम्बेडकर में वैचारिक सम्बन्ध

 

(साहूजी महाराज की जयंती के दिन सत्यशोधक विद्यार्थी संघटना के फ़ेसबुक लाइव में व्याख्यान का संपादित रूप । इसका लिप्यंतरण प्रवीण वर्मा ने किया ।)

मार्क्सवाद एक वैश्विक विचारधारा रही है और अम्बेडकर का उस विचारधारा से एक तरह का संवाद जीवन भर बना रहा है | यह संवाद उनके जीवन में तो चला ही, तबसे अब तक इस संवाद की यात्रा जारी है । इसे समझने के लिए हमें वर्तमान स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा । आमतौर पर कहा जा सकता है कि अतीत हमारे वर्तमान को प्रभावित करता है लेकिन सत्य केवल इतना ही नहीं होता | सत्य यह भी होता है कि कई बार हमारा वर्तमान भी हमारे अतीत को प्रभावित करता है | कहने का तात्पर्य यह है कि जिस विशेष स्थिति में हम होते हैं, उस स्थिति के कारण भी अतीत को देखने की हमारी निगाह बनती है |

यह जो हमारा विशेष समय है इस समय के कारण भी हम इस समय मार्क्सवाद और अम्बेडकर के सम्बन्धों को थोड़ा अलग तरीके से देख सकते हैं | आज की परिस्थिति भिन्न तरह की परिस्थिति है और इतिहास में हमेशा ही होता है कि दो विचारकों के सम्बंध हमेशा के लिए स्थिर नहीं होते, बल्कि वे समय के प्रवाह में निरंतर बदलते रहते हैं । जैसे हमारा जीवन है, अगर दो मनुष्य एक साथ रह रहे हैं तो पूरे जीवन में दो मनुष्यों के सम्बंध एक ही तरह कायम नहीं रहेंगे बल्कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के हिसाब से, हमारी आयु के हिसाब से, दोनों के हालात बदलने के चलते हमारे आपसी सम्बन्ध भी प्रभावित होते हैं | उसी तरह से दो विचारकों के भी सम्बन्ध, उनके जीवित रहने के बाद जो इतिहास का प्रवाह होता है उससे गहराई से प्रभावित होते हैं |  इसलिए अम्बेडकर जब जीवित थे उस समय जो मार्क्सवादी लोग थे और अभी की जो परिस्थिति है, उन दोनों ही समयों में इनके आपसी रिश्ते अलग रहे । इसके साथ अभी की जो परिस्थिति है, इन तीनों ही चीजों पर ध्यान दें तो यह सम्बन्ध स्थिर नहीं रहा है |

संसार में निरन्तर बदलाव आता रहता है | बल्कि ऐतिहासिक परिस्थियाँ जब बदलती हैं उनके बदलने से सम्पूर्ण इतिहास भी प्रभावित होता है | अतीत को देखने की हमारी दृष्टि भी प्रभावित होती है । इसी चीज को ध्यान में रखते हुए वाल्टर बेंजामिन  ने कहा था कि फासिस्टों से जीवित लोगों  को जितना अधिक खतरा होता है कई बार उससे ज्यादा खतरा मृतकों को होता है | जो मरे हुए लोग हैं, उनका सत्व निकालकर, उनका सार निकालकर और उनके क्रांतिकारी अन्तर्य को समाप्त करके उन्हें सिर्फ पूजा की वस्तु में बदल दिया जाता है | असल में हमारे समाज में जब बकरे की बलि चढ़ानी होती है उसकी बड़ी पूजा की जाती है | उसी तरह से ये जो नए तानाशाह हैं, उन्हें अतीत के विचारकों से शिक्षा ग्रहण नहीं करनी है, बल्कि सिर्फ अपनी तानाशाही के लिए उनका समर्थन प्राप्त करना है और उसके लिए इन विचारकों को नखदन्तविहीन कर दिया जाता है, उनके विचारों की अंतर्वस्तु को समाप्त कर  दिया जाता है । वाल्टर बेंजामिन का कहा गया कथन उचित ही प्रतीत होता है कि जो लोग मर चुके हैं उनकी विरासत का इस्तेमाल करने के लिए उनकी मनमानी व्याख्या होती हैजाहिर है कि अम्बेडकर और मार्क्सवाद के बारे में सोचते हुए नई तरह की परिस्थितियों का ध्यान रखना होगा |

इस सन्दर्भ में देखें तो बाबा साहब अम्बेडकर के जन्मदिन के दिन उनके जिन नवासे को देश की सरकार ने गिरफ्तार करने का हुक्म सुनाया और गिरफ्तार भी किया, उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर की रचनाओं का एक संचयन किया है  ‘इंडिया ऐंड कम्युनिज्म’ जो 2017 में लेफ़्टवर्ड से प्रकाशित हुआ है | उन्हीं आनंद तेलतुम्बड़े ने इस पुस्तक में लम्बी भूमिका लिखी हैउसमें वे कहते हैं कि अम्बेडकर और मार्क्सवादियों के बीच का जो तनावपूर्ण सम्बन्ध दिखाई पड़ता है उसके मूल में यह बात नहीं कि अम्बेडकर मार्क्स के सिद्धान्तों का विरोध कर रहे हैं । असल में मार्क्स के विचारों का उतना अधिक विरोध वे नहीं करते थे जितना भारत के कम्युनिस्टों द्वारा किये जाने वाले कार्यों का विरोध करते थे | इस सवाल पर गम्भीरता से विचार करना होगा ।

वर्तमान परिस्थितियों में हमें अम्बेडकर और मार्क्स के संदर्भ में नए तरह की समझदारी दिखानी होगी | हम सब जानते हैं कि मार्क्स को भी पूरी दुनिया में एक ही तरह से नहीं समझा गया । मसलन जहाँ पर कृषि प्रधान देश थे वहाँ पर मार्क्स को समझने के लिए अन्य तरीकों का इस्तेमाल किया गया | मार्क्स और अंबेडकर में जो सम्वाद हुआ है वह वास्तविक संवाद नहीं बल्कि वैचारिक सम्वाद है, उसको समझकर आज की चुनौतियों और परिस्थितियों का मुकाबला करना होगा | इसके लिए दोनों के संबंध को देखना जरूरी है | उन दोनों के बीच विरोध की बात को बहुत ज्यादा फैलाया गया है आनंद तेलतुम्बड़े ने उस भूमिका में कहा है कि उनके बीच में जितना ज्यादा विरोध है, उससे अधिक उस विरोध को प्रस्तुत किया गया है उस विरोध को इस तरह बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करने पीछे भी राजनीति रही है |  बाबा साहब ने अपनी  पुस्तक जाति प्रथा का विनाश (annihilation of caste) के दूसरे अध्याय में कहा है कि समाजवादी लोग, जब वे समाजवादी कहते हैं तो उनका मानना है मार्क्स के विचारों से प्रभावित लोग, मनुष्य को मूलतः आर्थिक जीव समझते हैं | बाबा साहब अम्बेडकर की मार्क्स के बारे में यह एक धारणा है | सही है कि मार्क्स के चिंतन की समझ में एक खास समय राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करना, अर्थतंत्र के ही इर्द-गिर्द सारी चीजों को समझने की कोशिश करने का दौर रहा है | लेकिन मार्क्स को देखने की कुछ नयी दृष्टियाँ भी पैदा हुई हैं | इनका कहना है कि मार्क्स के चिंतन में सामाजिक कोटि बहुत महत्वपूर्ण हैउदाहरण के लिए मार्क्स, पूंजी को एक सामाजिक सम्बन्ध मानते हैं । उनका पूंजी नामक एक ग्रंथ है जिसमें वे कहते हैं कि जब किसी कारखाने का मालिक और उस कारखाने में काम करने वाला मजदूर, दोनों लेबर मार्किट में मिलते हैं तो दोनों के बीच में एक तरह की समानता होती है | बल्कि मजदूर के पास ज्यादा अधिकार होता है क्योंकि मेहनत करने का एकमात्र साधन उसका शरीर होता है और अपने शरीर पर उसका अधिकार है | उस नाते ही वह अपनी मजदूरी का मोल-तोल करता है | मान लिया, उनका सौदा तय हो जाता है कि इतनी मजदूरी में आदमी इतनी देर काम (आठ घण्टे) करेगा | इस संदर्भ में मार्क्स कहते हैं कि ज्यों ही यह सौदा तय होता है, दोनों की चाल-ढाल में बदलाव जाता है | इस अर्थ में कि पूंजीपति आगे-आगे सीना फुलाए हुए चलता है और पीछे-पीछे मजदूर सिर झुकाए हुए चलता है | इस तरह से देखें तो यह जो पूंजी है सिर्फ आर्थिक रूप में ही नहीं मौजूद होती, बल्कि सामाजिक रूप में भी बदल जाती है | हमारे समाज में आर्थिक तत्व सिर्फ आर्थिक नहीं होता, बल्कि सामाजिक परिघटना में बदल जाता है | उदाहरण के लिए जिसके पास पैसा होता है उसकी सामाजिक हैसियत भी बढ़ जाती है, यह आर्थिक पहलू केवल आर्थिक नहीं होता है | इसी अर्थ में मार्क्स का जो चिंतन है उसको लोगों ने नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की है | एक जमाने में लेनिन की जिस पार्टी ने क्रान्ति की थी उसका नाम सामाजिक जनवादी लेबर पार्टी था |

सामाजिक जनवाद क्या है ? सामाजिक जनवाद है लोकतंत्र | जनवाद केवल पॉलिटिकल नहीं होना चाहिए | पॉलिटिकल जनवाद एक औपचारिक डेमोक्रेसी है | इस बात को देखने के लिए एक संदर्भ जरूरी है । जब सामंतवाद से पूंजीवाद लड़ रहा था तब पूंजीवाद यह कहता था कि संसद में हमारे ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधि चुनकर जाएं | यह उसके लिए एक तरह का राजनीतिक लोकतंत्र था | तो वह राजनीतिक लोकतंत्र की मांग कर रहा था | उसके बदले में इस धारणा से बहस करते हुए मार्क्स ने कहा कि असल में लोकतंत्र सामाजिक होना चाहिए क्योंकि सामाजिक लोकतंत्र महत्वपूर्ण है, केवल राजनीतिक संस्थानों में औपचारिक लोकतंत्र उतना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है | यह जो लड़ाई है लोकतंत्र की उसमें मार्क्सवादियों ने बहुत योगदान दिया है | हम सब जानते हैं कि मजदूर वर्ग का जैसे-जैसे मताधिकार बढ़ता गया वैसे-वैसे लोकतंत्र और ज्यादा मजबूत होता गया | इस लड़ाई में सवाल यही था कि वोट देने के अधिकार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और सबको वोट देने का अधिकार हासिल हो जाए | जो नागरिक शब्द है वह खुद ही एक तरह के अधिकार से जुड़ा शब्द है, लोकतंत्र में रहने का मतलब है कि हम सत्ता से सवाल पूछ सकते है, नागरिक के रूप में हमें यह अधिकार है | इस तरह से सामाजिक लोकतंत्र की धारणा को लेकर मार्क्स आए | इस तरह मार्क्स का चिंतन केवल आर्थिक ही नहीं है बल्कि उसमें सामाजिक पहलू भी बहुत महत्वपूर्ण है | क्रांति के बारे में वे कहते भी हैं कि अब सामाजिक क्रांति का युग शुरू होता है | क्रांति को उन्होंने कभी भी केवल राजनीतिक क्रांति नहीं कहा, बल्कि सामाजिक क्रांति कहा है | उनके लिए क्रांति तभी महत्वपूर्ण होती है जब समूचे समाज में उसके कारण परिवर्तन आए | यहाँ तक कि मनुष्य की जो धारणा है, उसको भी जब वे परिभाषित करते हैं, तब यही कहते हैं कि अपने सामाजिक अस्तित्व के पुनरुत्पादन के क्रम में हम कुछ ऐसे संबंधों में प्रवेश करते हैं जो हमारी इच्छा से स्वतंत्र और अपरिहार्य होते हैं | कहने का मतलब कि मनुष्य अपने सामाजिक अस्तित्व का पुनरुत्पादन करता है और इस क्रम में वह खास तरह के सामाजिक बंधन में बंधता जाता है | हमारा ज़ोर यहाँ इस बात पर है कि आज जब हम मार्क्स को देखने की कोशिश करें तो उनके बारे में बाबा साहब अंबेडकर ने जो बात लिखी और जो इस जमाने में भी मानी जाती कि  मार्क्स केवल आर्थिक पहलू पर ज़ोर देते थे, वह एक हद तक सही नहीं है, बल्कि अब मार्क्स को जिस तरह से लोग देख रहे हैं, उनको महसूस हो रहा है कि मार्क्स के चिंतन में भी सामाजिक पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण है | वे सामाजिक क्रांति पर ज़ोर देते हैं, पूंजी को एक सामाजिक संबंध मानते हैं, सामाजिक सम्बन्धों में उलट-फेर को क्रांति मानते हैं | मार्क्स के चिंतन में यह जो सामाजिक परिघटना है वह बेहद महत्वपूर्ण परिघटना है | लोकतंत्र को भी वे केवल राजनीतिक लोकतंत्र तक ही सीमित नहीं मानते हैं, बल्कि उसे सामाजिक लोकतंत्र में तब्दील कर देना चाहते हैं | उसमें भी उनका जोर समाज के सबसे वंचित तबके के लोगों पर है | उन्होंने लिखा है कि सर्वहारा वह होता है जिसके पास उत्पादन का कोई साधन रह जाए | इससे पहले किसान तक के पास, यहाँ तक कि जो दस्तकार होते थे, उसके पास भी कोई कोई अपना उपकरण हुआ करता था, लेकिन सर्वहारा या मजदूर की विशेषता ही यही है कि उसके पास से सब कुछ छीना जा चुका है | उसके पास  अपने शरीर के अलावा और कुछ नहीं रह गया है और इसलिए उन्होंने कहा है कि जो पूंजी पैदा होती है उसके पोर पोर से खून टपकता रहता है | मनुष्य को चूस करके वह आकार ग्रहण करती है | इस तरह कह लीजिए, वह सर्वहारा समाज का सबसे अधिकारविहीन तबका होता है | उसकी तरफ खड़ा होकर उन्होंने पूंजी के साम्राज्य की परीक्षा की और उसकी आलोचना की | इसके लिए उन्होंने कहा कि हमें ऐसी आलोचना में विश्वास करना होगा जिसे किसी भी चीज से नहीं डरना चाहिए, किसी भी सत्ता की तानाशाही से नहीं डरना चाहिए, सत्य को पहचानने की कोशिश करनी चाहिए कि आखिर यह पूंजी पैदा कहाँ से होती है | आज जब हम मार्क्स को देखें तो केवल आर्थिक पहलू पर देखकर यह देखें कि आर्थिक को वे जिस तरह देखते थे वह भी एक तरह का सामाजिक संबंध होता था | इसमें वे बदलाव करना चाहते थे | वे चाहते थे कि अर्थतंत्र, समाज के मातहत आये | समाज पर शासन अर्थतंत्र करे, बल्कि समाज अर्थतंत्र पर शासन करे | पूंजी को वे समाज की सेवा में लगाना चाहते थे, कि समाज पूंजी की सेवा करे | इस तरह से वे सामाजिक परिवर्तन घटित करना चाहते थे |

मार्क्स को नए ढंग से समझने की कोशिश करनी चाहिए कि कैसे वे आम जनता को, वंचित समुदायों को अधिकारसम्पन्न बनाने के आंदोलन में संसाधनों तक उसकी पंहुच को शामिल कर रहे हैं | ध्यान दें कि अर्थतंत्र कोई ऐसी चीज नहीं है जो केवल पैसे की शक्ल में चलती है, उसमें संसाधन बहुत महत्वपूर्ण तत्व होता है | हम सब जानते हैं कि जिस तरह के भी संसाधन हैं उनमें मनुष्य की क्षमता के अलावा, मेहनत के अलावा, सबसे बड़ा संसाधन है- जमीन । जमीन का जो मालिकाना होता है उसमें एक तरह का जातीय पैटर्न होता हैएक खास तरह के जातिगत ढांचे के अनुरूप जमीन के मालिकाना का ढांचा बना हुआ है | तो यह एक सामाजिक प्रक्रिया है | जमीन के साथ जुड़ा हुआ है- जंगल, लकड़ी, फल तथा जो कुछ पैदा होता है | उसके अतिरिक्त एक बड़ा संसाधन पानी के स्रोत हैं और हम सब जानते हैं कि नदियां बेची जा रही हैं | नदियों को पानी की बोतल में ढाला जा रहा है | मनुष्य के स्वास्थ्य का सबसे बड़ा ढांचा है पेयजल | पानी के लिए बाबा साहब ने कितनी भयंकर लड़ाई की थी कि पानी तक सबकी पंहुच होनी चाहिए | प्राकृतिक संसाधन भी पूंजी का एक रूप है इसलिए अर्थतंत्र केवल पैसे में सीमित नहीं रहता है, बल्कि वह संसाधनों के रूप में भी मौजूद होता है | इस तरह जो आर्थिक पहलू है जिसका आरोप मार्क्स पर लगता रहा है, उस आर्थिक पहलू के भी सामाजिक आयाम होते हैं | जब हम मार्क्सवाद और अंबेडकर के संबंधों की बात कर रहे हैं, तो दूसरी बात जातिभेद की है । जो बाबा साहब अंबेडकर का भाषण था, उसमें आप देखेंगे कि वे समाजवादियों के साथ बहस करते हैंइस बात पर तो लोग ध्यान देते हैं कि उन्होंने अपने आपको समाजवादियों से कितना अलग दिखाया है, लेकिन वे यह देखने से चूक जाते हैं कि बाबा साहब समाजवादियों से किस स्तर तक सहमत हैं | वे जब इस बात का विरोध करते हैं कि केवल आर्थिक पहलू महत्वपूर्ण नहीं होता है व्यक्ति में, वे दो और पहलुओं की चर्चा करते हैं लेकिन आर्थिक पहलू को खत्म नहीं करते हैं | कारकों के बतौर जब वे कहते हैं धर्म और दूसरा कहते हैं सामाजिक स्थिति तो इसके साथ ही तीसरा कारक कहते हैं संपत्ति | तो संपत्ति का तत्व समाप्त नहीं कर दिया है |  उनका यह कहना है कि तीन पहलुओं में से एक पहलू संपत्ति भी है |

जब हम बाबा साहब को पढ़ते हैं इस दृष्टि से कि उन्होंने मार्क्सवाद का कितना विरोध किया है तो उसमें बहुत कुछ मनचाहा मिल सकता है | लेकिन साथ ही साथ हमें इस पर भी ध्यान देना होगा कि उन्होंने कहाँ तक सहमति दिखाई | एक सहमति की अभी मैंने चर्चा की, वह है पानी । पानी एक संसाधन है और पानी के स्रोत तक आपकी पंहुच होती है आपकी हैसियत के हिसाब से । इस प्रसंग में आज लॉकडाउन में हम देख सकते हैं कि मनुष्य कितनी तरह की चीजों से जुड़ा हुआ है और किस तरह उसका जीवन चलता है | उदाहरण के लिए नदी | बंगाल के अद्वैत मल्लबर्मन महत्वपूर्ण दलित उपन्यासकार थे | अद्वैत मल्लबर्मन की एक किताब है तितास एक नदी का नाम | उसकी विशेषता यह है कि नदी एक सम्पूर्ण अर्थतंत्र के बतौर चित्रित है | हम सब जानते है मल्लाहों की बिरादरी ऐसी है जो नदी के भरोसे अपना जीवन चलाती है, समुद्र के आस-पास मछुआरे रहते हैंसंसाधन के रूप में  पानी है, तो केवल पानी नहीं है बल्कि साफ पानी हो और उस तक सबकी पहुंच हो | प्राकृतिक संसाधनों तक मनुष्य की पहुंच जातिगत भेद-भाव के आधार पर निर्धारित होती है | इस बात को बाबा साहब ने पहचाना और इसके विरोध में आंदोलन चलाया | यह बात स्वाभाविक तौर पर उन्हें मार्क्सवादी सिद्धांतों से जोड़ती है | वे कहते हैं कि मनुष्य की हैसियत को निर्धारित करने में संपत्ति भी एक फैक्टर है, धर्म और सामाजिक हैसियत तो है ही ।  

बाबा साहब के लिए शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण तत्व रहा था क्योंकि शिक्षा भी एक संसाधन है | शिक्षा तक पहुंचना, और हम जानते हैं आज की स्थिति में, शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण है | इस संदर्भ में लगातार संघर्ष चलते रहे हैं | यहाँ तक किसकी पहुँच रहेगी, कौन लोग उसमें दाखिल होंगे, इसी को निरंतर नियंत्रित करने की कोशिश की जाती रही है | कोशिश होती है कि जो आरक्षण भारी संघर्षों के बाद हासिल हुआ है, उसे किस तरह से समाप्त किया जाए | कभी-कभी न्यायालयों के कुछ फैसलों के जरिए या अनेक तरह के नए-नए उपायों के जरिए कोशिश की जाती है कि शिक्षा तक लोगों की पहुंच कम की जाये वर्तमान पूंजीवाद जब संकट में आया तो उसने दो चीजों को अपने मुनाफे का सबसे बड़ा स्रोत बनाया | उनमें से एक है शिक्षा और इसके लिए गली-गली में पुराने स्कूलों को समाप्त करके कान्वेंट स्कूल खुले, जो पूँजीपतियों के माध्यम से चलते हैं और बहुत सारे नेताओं का दो नंबर का पैसा भी उनमें लगा होता है | जो पुराने सरकारी स्कूल थे और ये जो नये स्कूल हैं उनमें क्या फर्क है ? फर्क यह है कि जो पुराने स्कूल थे उनके प्रबंधन पर निगाह रखने के लिए सामाजिक प्रतिनिधियों का भी दखल  हुआ करता था | लेकिन ये जो निजी किस्म के स्कूल हैं, शिक्षा की जो दुकानें हैं, इन पर समाज का कोई नियंत्रण नहीं है और ये सामाजिक नियंत्रण के विरोध में खोले जाते हैं | यह एक तरह से शिक्षा तक सभी लोगों की पहुंच पर सुनियोजित हमला है | यहाँ शिक्षा को माध्यम बनाया गया और इसमें प्राथमिक शिक्षा से उन्होंने शुरुआत की प्राथमिक शिक्षा को लगभग बर्बाद कर डाला है और अब उच्च शिक्षा तक पहुंचे हैं |

असल में जैसे जैसे अधिकाधिक लोग शिक्षा के भीतर आते गये हैं, आरक्षण के जरिए भीतर आते गये हैं ।  स्त्रियों और वंचित समुदायों के विद्यार्थियों के आने से उच्च शिक्षा संस्थानों में आने वाले विद्यार्थियों की स्थिति में सामाजिक बदलाव आया है | इस बदलाव के आस-पास सरकार ने सरकारी स्तर की सहायता से चलने वाले लगभग सभी विश्वविद्यालयों को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू की और उच्च शिक्षा में भी निजी विश्वविद्यालयों की शुरुआत हुई | हम जानते हैं कि बाल श्रम कानून को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए एक कानून लाया गया है | अब पारिवारिक व्यवसाय में बच्चों को लगाया जा सकता है | ये जो निजी विश्वविद्यालय शुरु हुए तो वहां पर आरक्षण लागू करने की कोई गारंटी नहीं थी | वे लोग आरक्षण को गुणवत्ता एवं प्रतिभा के नाम पर ध्वस्त करने में लगे रहे |

प्राकृतिक संसाधनों के अलावा  मानव सृजित संसाधन है श्रम | रोजगार के अवसरों की समानता तो खत्म की ही जा रही है, पारिवारिक व्यवसाय में बच्चों को लगाने की इजाजत देकर नये किस्म का वर्णाश्रम भी कायम किया जा रहा है । पेशे की आजादी सीमित करने के लिए पूरी कोशिश की जा रही है | यह एक नई परिस्थिति है, इस परिस्थिति  में जब हम अंबेडकर को देखते हैं तो इस बात को समझने की कोशिश करते हैं कि अंबेडकर केवल उतना ही नहीं है जितना आमतौर पर समझा जाता रहा है, बल्कि मार्क्सवाद के साथ उनका एक तरह का संवाद रहा है, जीवन भर का संवाद | यह संवाद समस्या को देखने की दृष्टि को भी प्रभावित करता है | वे कहते हैं कि जो दलित समुदाय है, उस समुदाय को किस तरह से पराधीन बनाया गया, किस तरह से उनको गुलाम बनाया गया ? तो उसके लिए वे कहते हैं कि उनको ज्ञान से वंचित कर दिया गया और आज भी शिक्षा संस्थानों से उन्हें बाहर करने के प्रयास में यही उपाय नजर आता है । आज के दौर में पूंजीवाद की एक बड़ी विशेषता पैदा हुई है, क्योंकि बीच में पूंजीवाद उस तरह का नहीं रह गया था | रूस के खत्म होने के बाद पूंजीवाद ने अपना स्वरूप बदला है और इस बात पर बहुत सारे लोग विचार कर रहे हैं कि एक