Thursday, January 21, 2021

पूंजीवाद के उदय और विकास की कहानी हदास थिएर की जुबानी

 

          

                                                               

सबसे पहले वे इस झूठ का भंडाफोड़ करती हैं कि पूंजीवाद कोई स्वाभाविक या शाश्वत चीज है । जो भी लोग ऐसा मानते हैं उनका कहना है कि मनुष्य बुनियादी रूप से स्वार्थी और ऊंच नीच में विश्वास रखने वाला प्राणी होता है । वे मानव मस्तिष्क के लिए व्यापार को सबसे अनुकूल काम बताते हैं । सच यह है कि माल उत्पादन और विनिमय की यह शोषक प्रक्रिया मानव इतिहास में कुछ ही समय पहले उदित हुई है । अगर मानव इतिहास को पूरा दिन माना जाये तो पूंजीवाद की उम्र कुल तीन मिनट की है । हमारा अधिकांश इतिहास शिकारी-संग्राहक अवस्था का है जिसमें भोजन, पानी और आवास की बुनियादी समस्याओं को हल करना ही प्रमुख काम रहा । खेती अभी दूर की बात थी और रोज रोज के भरण पोषण के बाद बचता ही कुछ नहीं था । स्वामित्व साझा था और निर्णय लेने की सुविधा के लिए सदस्यों का कोई ढीला ढाला सम्पर्क तंत्र था ।  उस समाज में निजी पहल और निर्णय का भारी महत्व था इसलिए आज की धारणाओं से निर्णय के तत्कालीन तंत्र को समझना सम्भव नहीं है । जिस तरह हमारे आज के समाज में बड़ों के समक्ष समर्पण और स्वार्थ को प्रोत्साहित किया जाता है उससे अलग तब स्वायत्तता को बेहतर गुण समझा जाता रहा होगा । ऐसे समाज से चलकर हम वर्तमान स्थिति में कैसे आये इसका मोटा खाका लेखिका ने खींचने की कोशिश की है ।

उनका मानना है कि इसकी शुरुआत खेती से हुई होगी जब भोज्य सामग्री के अधिशेष के संग्रह के हालात बने होंगे । मनुष्यों के स्थायी वासस्थान बने होंगे और कुछ लोग खेती के बाहर के कामों से जुड़े होंगे । इसके बाद ही जाकर दुनिया के विभिन्न इलाकों में नगरों का निर्माण हुआ होगा । हजारों साल में इस अधिशेष के निरीक्षण और नियंत्रण की जरूरत के चलते समाज में विभिन्न स्तर बने होंगे । शुरू में तो इस इंतजाम से पूरे समूह को ही फायदा हुआ होगा, मौसम में हेरफेर के बावजूद बचे हुए संरक्षित संसाधन तक सबकी पहुंच बनती रही होगी लेकिन इसी प्रक्रिया में धीरे धीरे निरीक्षकों और संरक्षकों का अलग वर्ग बन गया होगा । स्पष्ट है कि संपदा और वस्तुओं के उत्पादन, स्वामित्व और वितरण के मामले में परस्पर विरोधी हित समूह बनने में बहुत समय लगा । यह प्रक्रिया कोई बहुत आसान नहीं रही होगी और इसका प्रतिरोध भी हुआ रहा होगा ।

पूंजीवाद इसी तरह का एक वर्ग विभाजित समाज है जो विश्वव्यापी हो गया । मध्ययुग के यूरोप में इसका जन्म हुआ जहां सामंती समाजों का प्रभुत्व था । सामंतवाद से पूंजीवाद में संक्रमण कैसे और क्यों हुआ इन सवालों पर इतिहास में काफी विवाद है । उस पर बात करना सम्भव नहीं लेकिन पूंजीवाद की विशेषता को समझने के लिए सामंतवाद से इसके अंतर को जानना जरूरी है । सामंतवाद में बादशाही जमीन को स्थानीय मालिकों में बांटा गया था । ये मालिक अपने इलाके के निवासियों पर शासन करते थे । इलाके के भूदास इन जमीनों पर खेती करते थे । मालिक को वे या तो धन या फसल का एक हिस्सा देते या फिर सप्ताह में कुछेक दिन मालिक के खेत में मुफ़्त काम करते थे । आम तौर पर इन किसानों के पास खुद और परिवार के भरण पोषण के लिए पर्याप्त जमीन और खेतीबारी के औजार हुआ करते थे । इससे उनके जीवन यापन के लिए चाहे जितना भी कम उपार्जित होता हो उन्हें कुछ आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल थी । मालिक के खेत में खटने की कोई आर्थिक मजबूरी नहीं थी इसलिए उनके मालिक को उनकी मेहनत की पैदावार पर कब्जा जमाने के लिए बल का प्रयोग करना पड़ता था । इस मालिक की समृद्धि हिंसा पर टिकी हुई थी इसलिए मालिक भी हथियारों और युद्ध में अधिक ध्यान लगाता था ।

जब पूंजीवाद आया तो उसने पूरी तरह नयी समाज व्यवस्था विकसित की । इसमें कामगारों को जमीन, औजार तथा संसाधनों से अलगाना जरूरी हो गया । सामंतवाद में खेती की उपज को हथियाने के लिए मालिक को बल प्रयोग करना पड़ता था लेकिन पूंजीवाद ने पगारजीवी कामगारों के नये वर्ग को जन्म दिया । इन लोगों को जिसके पास वे चाहें उसके पास काम करने की सैद्धांतिक आजादी तो थी लेकिन व्यवहार में उन्हें किसी न किसी के लिए अधिशेष का उत्पादन करना जरूरी था । तीन सौ सालों में यह संक्रमण पूरा हुआ जिसके उपरांत स्वतंत्र मजदूर के शोषण पर आधारित इस उत्पादन व्यवस्था की स्थापना हुई । यह प्रक्रिया और व्यवस्था स्वाभाविक या स्वचालित नहीं थी । एक ओर समूची संपत्ति के मालिकों और दूसरी ओर केवल अपनी मेहनत के मालिकों के बीच समाज का बंटवारा अनेक ऐतिहासिक चरणों से गुजरकर पूरा हुआ । स्मिथ जैसे पारम्परिक अर्थशास्त्री पूंजीवाद के उत्थान को श्रम विभाजन का नतीजा बताते हैं जिसमें कुछ लोग व्यापारी हुए और मेहनत तथा धन बचाने की आदत के चलते बाद में कारखानों के मालिक बन गये । मार्क्स ने इस किस्म की धारणा का मजाक उड़ाया है । उनके अनुसार पूंजीवाद के उत्थान का संबंध बचत की आदत या मुट्ठी भर लोगों की बुद्धिमानी से नहीं है । इसके लिए बेहद हिंसक उथल पुथल हुई जिसमें लोगों को उनकी जमीन और आजीविका के साधनों से जुदा कर दिया गया । इससे बने नये कामगारों को अनुशासित करने के लिए तमाम कानून बनाये गये और दमन के तरीके अपनाने पड़े । इसके बाद हुई राजनीतिक क्रांतियों ने पूंजीवाद को शासन में ला बिठाया । उसने विस्थापित लोगों के संघर्षों को कुचला, बाजार को स्थापित किया और विदेशों में लूट मचायी । इस नयी व्यवस्था के उदय के लिए जिस कदर हिंसा, दमन, कानून और उथल पुथल की जरूरत पड़ी उसी से सिद्ध है कि यह स्वाभाविक नहीं थी ।

इंग्लैंड में पूंजीवाद ने सबसे पहले पैर जमाये । इसके लिए लाखों एकड़ साझा जमीन को हिंसक तरीके से दखल करके निजी संपत्ति में बदला गया, साझा जमीन पर खेती करने या जानवर चराने के पारम्परिक अधिकारों को बदला गया और जमीन के निजी टुकड़ों की बाड़ेबंदी की गयी । यह सारा काम भुगतान, चोरी या कानून बनाकर किया गया । इसी प्रक्रिया में जमीन का संकेंद्रण मुट्ठी भर लोगों के हाथों में हुआ और बहुसंख्यक जनता से आर्थिक स्वनिर्भरता के सामस्त साधन छीन लिये गये । ग्रामीण जनता जबरन बेदखली के चलते भूमिहीन हो गयी । लोग इधर उधर भीख मांगकर गुजारा करने को मजबूर हो गये । जमीनों के नये मालिकों ने छोटे छोटे टुकड़ों को एक साथ जोड़कर अकूत लाभ कमाया । इन्हीं जमीनों पर बेदखल हुए किसानों को कामगार की हैसियत से काम करने को मिला । इनकी बढ़ती समूची आबादी को खेती के काम में ही खपाना सम्भव नहीं था । ये ही उदीयमान नगरों के कारखानों में सर्वहारा के बतौर पगारजीवी श्रमिक बने ।

इन नगरों में सोलहवीं से अठारहवीं सदी तक कारखानों की नयी व्यवस्था विकसित हुई । इनमें मजदूर एकत्र होकर मशीन और कच्चे माल से उपभोग्य वस्तु का निर्माण करते थे जिसके बदले उन्हें पगार मिलती थी । जिन लोगों ने इनमें धन का निवेश किया और इस व्यवस्था से लाभ बटोरा वे उदीयमान पूंजीपति थे । पूंजीपति वर्ग में वे लोग थे जो जमीन, कारखाने, औजर और सामग्री के मालिक होते थे और उत्पादन के काम में मजदूरों को लगाते थे । ये शुरुआती पूंजीपति व्यापारी थे, भूमिधर पूंजीपति बने जमींदार थे और धनी फ़ार्मर थे । इसी तरह अठारहवीं सदी में उत्तरी फ़्रांस के कई नगरों में ऊन के रेशे बनाने के लिए हजारों मजदूरों को इकट्ठा किया गया । जिस जगह पर भी यह प्रक्रिया अपनायी गयी वहां उसने उत्पादन के क्षेत्र में क्रांति कर दी । दुनिया भर में इस तरह के नये नगर उग आये ।

इस स्तर के उत्पादन से आगे बढ़ने के लिए उदीयमान पूंजिपति वर्ग को ऐसे कामगारों की जरूरत थी जिन्हें जरूरत के मुताबिक कहीं भी और कभी भी काम पर लगाया जा सके । इसके लिए इन कामगारों को दो मामलों में स्वतंत्र होना आवश्यक था । उन्हें भूदासता से आजाद होना था ताकि उनसे कहीं भी काम कराया जा सके लेकिन साथ ही उन्हें अपनी आजीविका के उत्पादन के साधनों से भी स्वतंत्र होना जरूरी था ताकि जीवन चलाने के लिए वे पगार पर ही निर्भर रह जायें । मार्क्स के अनुसार मुद्रा के पूंजी में रूपांतरण के लिए जरूरी है कि मुद्रा के मालिक को उपभोक्ता बाजार में स्वतंत्र मजदूर मिले । उसे अपनी श्रम शक्ति को बेचने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए और बेचने के लिए अन्य किसी भी वस्तु से भी उसे स्वतंत्र होना चाहिए । इस तरह स्वतंत्रता और लोकतंत्र के परदे में इस नये भूमिहीन पगारजीवी श्रमिक को अपनी श्रम शक्ति बेचने या भूखों मरने की आजादी मिली । इस नयी व्यवस्था को ही मार्क्स ने वेतन की गुलामी कहा । पुराने गुलामों को जंजीर से बांधकर रखा जाता था, यह नया गुलाम अपने स्वामी से अदृश्य बंधनों में बंधा हुआ था । उस जमाने में तमाम चिंतक, दार्शनिक और अर्थशास्त्री पूंजीवादी आदर्शों के बखान में डूबे थे और इस नयी संपदा का यह वीभत्स पहलू अनदेखा किया जा रहा था ।

अपनी जमीन से बेदखल होकर किसान से मजदूर बना यह श्रमिक उदीयमान पूंजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य घटक था । इस वर्ग का निर्माण विध्वंसक प्रक्रिया से हुआ था । भूखों मरने का खतरा होने पर भी ये लोग आलस्य और निकम्मेपन से बाज नहीं आते थे । उन्हें कारखानों की अंधेरी और दमघोंटू दुनिया में कैदी की तरह काम करने के मुकाबले आजाद घूमना रास आता था । इन लोगों ने बाड़बंदियों पर हल्ला बोला, सामूहिक से निजी बनायी गयी जमीनों की हिफ़ाजत के लिए खड़ी की गयी दीवारों को ढहा दिया, बड़ी जोतों को तहस नहस कर दिया और बड़े पैमाने पर फ़साद किये । इन लोगों को काबू करने के लिए कानून बनाने पड़े जिसके तहत कोड़े मारना, कैद रखना, नाक-कान काटना, दागना और बांधकर घसीटना जायज दंड बताये गये थे । इस तरह उनसे इन नये हालात को स्वाभाविक मनवाया गया । धीरे धीरे पूंजीवादी आर्थिक संबंध कामगारों को स्वत:स्पष्ट प्राकृतिक नियम की तरह लगने लगे । राज्य की सहायता और हिंसा के सहारे यह जीत हासिल हुई । जब हमसे अपने और अपने परिवार की गुजर बशर के लिए जरूरी जमीन, औजार और तकनीक को छीन लिया जायेगा तो दूसरों के लिए खटने के अलावे हमारे पास कोई अन्य रास्ता नहीं रह जायेगा और इसे हम स्वाभाविक मानने लगेंगे ।

मार्क्स के मुताबिक पूंजीवादी समाज की आर्थिक संरचना का निर्माण सामंती समाज में हुआ था । इन दोनों समाजों के बीच का विरोध पुरानी व्यवस्था और नये कुलीनों के बीच साफ साफ टकराव के रूप में फलित नहीं हुआ । पुराने बादशाहों ने बाड़ेबंदियों में मजदूरों को काबू करने वाले कानून बनाने में मदद की । उन्होंने व्यापार को बढ़ावा दिया और शहरों में कारखाने बनाने के लिए धन मुहैया कराया । लेकिन उदीयमान पूंजीपति वर्ग की राह में इन सामंती संबंधों में बेड़ियां भी डालीं । सामंतों की रुचि ऐश्वर्य के सामान जुटाने, हथियार इकट्ठा करने और अपनी सेना बढ़ाने में थी तथा आर्थिक प्रगति की रफ़्तार को वे सुस्त बनाये रखना चाहते थे । इस तरह सामंती संबंधों का लाभ लूटने वालों और आर्थिक प्रगति के हिमायतियों में समाज बंटता गया । इसी अंतर्विरोध के कारण यूरोप में बुर्जुआ क्रांतियों का सैलाब फूट पड़ा । सोलहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी तक चली इन क्रांतियों के सहारे राजसत्ता पर पूंजीपति वर्ग का कब्जा हुआ । इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति और फ़्रांस की राजक्रांति ने पूंजीपति वर्ग की बरतरी स्थापित कर दी । इसके साथ ही ऐसी नयी राजनीतिक विचारधारा की जरूरत पड़ी जिसके आधार पर नयी व्यवस्था के पक्ष में निम्न वर्गों को भी खड़ा किया जा सके । इसके लिए उन्होंने निजी संपत्ति के अधिकार का समर्थन किया, दासता से मुक्ति की चेष्टा की और वंशगत शासन के खात्मे का प्रयास किया ।

बुर्जुआ क्रांतियों ने पूंजीवादी राजसत्ता की स्थापना की । राजसत्ता ने इस वर्ग के हितों का पक्षपोषण किया तथा उनकी ताकत को देश और विदेश में फैलाने में मदद की । इसमें अफ़्रीकी जनता के बड़े हिस्से को गुलाम बनाने और नयी गुलामी ने निर्णायक भूमिका निभायी । इस गुलाम व्यापार की अमानवीय क्रूरता पर पर्याप्त चर्चा हुई है । उनकी जानवरों की तरह खरीद बिक्री, उनकी संख्या बढ़ाने की कोशिश और माता-पिता से संतान को तथा पति से पत्नी को अलग कए देना इस व्यापार में आम बात थी । इस प्रथा में मनुष्य को अधिकतम निम्न स्तर पर रखा जाता और उनके साथ हरेक किस्म की बर्बरता जायज समझी जाती थी । अफ़्रीका से अमेरिका लाये जाने की उस यात्रा में अधिकतर गुलाम या तो मर जाते या आत्मघात कर लेते थे । उनको लाने वाली जहाजों को कसाईबाड़ा भी कहा जा सकता है । इस तमाम क्रूरता की बदौलत मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत दौलत जमा होती थी । उनकी मेहनत से पैदा होने वाले कपास ने अमेरिका की आर्थिक हैसियत को मजबूत किया । कताई और बुनाई के मामले में तकनीकी प्रगति ने व्यापार और उद्योग की दुनिया को प्रतिष्ठित कर दिया । पूंजीवादी अर्थतंत्र के विस्तार के लिए इन गुलामों के सस्ते श्रम का भारी महत्व था । यूरोप की औद्योगिक क्रांति में इस व्यापार और दास प्रथा का योगदान असंदिग्ध है । गुलाम व्यापार से हासिल नकदी तथा उनकी मेहनत से उपजे कपास और चीनी से ब्रिटेन के बैंकों को ठोस आधार मिला । जेम्स वाट के भाप के इंजन को गुलाम व्यापार से अर्जित धन की सहायता मिली । गन्ने के दूर दूर तक फैले खेतों के मालिकों ने इन इंजनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया । गुलाम व्यापार ने लोहा उद्योग को भी लाभ पहुंचाया । जंजीरों, तालों और बेड़ियों का भारी उत्पादन हुआ और गुलामों को नियंत्रित करने में इनकी खपत हुई । बंदूकों की बिक्री में इजाफ़ा हुआ और समुद्री जहाजों में लोहे का उपयोग किया गया । रुई से बनने वाली वस्तुओं के व्यापार ने सूती वस्त्र उद्योग में जान डाल दी और चीनी बनाने के कारखाने इंग्लैंड भर में खुल गये । इंग्लैंड का लगभग प्रत्येक नगर गुलाम व्यापार और गुलामों के श्रम से पैदा होने वाली चीजों का कर्जदार है । इन गुलामों को जिन जमीनों पर काम करना था वे भी चुरायी गयी थीं । अमेरिका के मूलवासियों को हिंसक तरीकों से बेदखल करके उनकी जमीनों को हथियाया गया था । उनकी बेदखली के इस क्रूर काम को केवल जनसंहार कहा जा सकता है । इन तथ्यों को न जानने से हमें पूंजीवाद के विकास की उसी कहानी पर आंख मूंदकर भरोसा करना होगा जिसे उनके समर्थक दुहराते रहते हैं ।  

Friday, January 15, 2021

पूंजीवाद क्या है

                    

                                        

2020 में हेमार्केट बुक्स से हदास थिएर की किताब ‘ए पीपुल’स गाइड टु कैपिटलिज्म: ऐन इंट्रोडक्शन टु मार्क्सिस्ट इकोनामिक्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने अपनी बात वर्तमान हालात से शुरू की है । उनका कहना है कि इस समय लोगों की मौतों का कारण केवल एक विषाणु ही नहीं है । हम सब ऐसी सामाजिक व्यवस्था के भी शिकार हैं जो बमवर्षकों को खरीदने पर धन खर्चने में कोई संकोच नहीं करती लेकिन मास्क और वेंटीलेटर जैसे जीवनरक्षक उपायों के लिए उसके पास धन की कमी हो जाती है । दशकों की बजट कटौती के चलते अस्पताल ध्वस्त हो गये हैं और विभिन्न देशों की सरकारें वेंटीलेटरों के उत्पादन और वितरण की कोई केंद्रीय योजना बनाने की जगह खुले बाजार से उन्हें हासिल करने की होड़ में झोंक दी गयी हैं । दुनिया भर में सरकारों का रवैया अलग अलग रहा है । जिन देशों ने व्यापक पैमाने पर परीक्षण पर जोर दिया वहां महामारी का प्रसार धीमा रहा । संक्रमित लोगों की पहचान करके संक्रमण का प्रसार रोक दिया गया । इसके विपरीत विश्व पूंजीवाद का केंद्र अमेरिका इस महामारी का भी केंद्र बन गया । सट्टा बाजार में महामारी से पैदा गड़बड़ी के संकेत मिलते ही दुनिया की सबसे धनी सरकार ने वित्तव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए तो अरबों डालर झोंके लेकिन महामारी के प्रसार को रोकने की कोई व्यवस्था नहीं की । ऐसे हालात में मशहूर लोगों की जांच की खबर तो सुनायी देती है लेकिन अधिकांश स्वास्थ्य कर्मियों को बिना किसी सुविधा के महामारी से जूझने के लिए छोड़ दिया गया ।

यह विध्वंस नजर हाल में आया लेकिन चल बहुत दिनों से रहा था । सभी जानते हैं कि खेती के उद्योगीकरण, वन जीवन में शहरी दखल और जीव जंतुओं के औद्योगिक किस्म के उत्पादन का व्यापक चलन शुरू होने से अनेकानेक नये वायरस पैदा हो रहे हैं । दूसरी ओर दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं में बजट की व्यवस्थित कटौती ने तमाम देशों को ऐसे हालात से निपटने में अक्षम बना डाला । जब कोरोना का हमला हुआ तो उसने वर्गीय विषमता को जाहिर कर दिया । आर्थिक संकट की बात तो हो ही नहीं रही है । सेहत संबंधी इस संकट के प्रकट होते ही अर्थतंत्र गोते लगाने लगा । इसकी कीमत कामगारों को चुकानी पड़ी । रोजगार छूमंतर हो गये और तालाबंदी के चलते पूंजीवाद का इंजन ठहर गया । उत्पादन ठप होने से आपूर्ति में भी रुकावट आ गयी । बड़े पैमाने पर छंटनी से मांग में गिरावट आने लगी । लेखिका को इस स्थिति में पूंजीवाद की कार्यपद्धति की समझ बेहद जरूरी लगती है ।

असल में इस महामारी ने 2007 से जारी मंदी जनित समाजार्थिक प्रक्रियाओं को त्वरित कर दिया है । इस मंदी ने सामाजिक ध्रुवीकरण को गहरा दिया था । पिछले तीस सालों से संपदा के वितरण में भारी विषमता बरती जा रही है । इसके चलते दुनिया भर में विरोध प्रदर्शनों की बाढ़ आ गयी । इनमें से अरब वसंत, अमेरिकी अकुपाई आंदोलन, स्पेन के विद्रोह, चीन में हड़तालों की लहर तथा हांग कांग और इरान में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन केवल कुछेक हैं । इनमें लोगों की भागीदारी वियतनाम युद्ध विरोधी आंदोलन या नागरिक अधिकार आंदोलन से अधिक रही है । इस महामारी ने इन पर अस्थायी रोक लगा दी है लेकिन उनके फूट पड़ने की वजहों की मौजूदगी के चलते उनमें कभी भी उभार हो सकता है । सड़क पर जारी विरोध के अनुपात में ही वैचारिक बदलाव भी देखने को मिला । पूंजीवाद को खारिज करने वालों की तादाद बढ़ रही है और उनमें से बहुतेरे लोग समाजवाद के पक्ष में खड़े हो रहे हैं । बर्नी सांडर्स के उभार में इस रुझान को ठोस अभिव्यक्ति मिली जिसने स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से लेकर नस्ली न्याय और वर्गीय विषमता तक प्रत्येक महत्व के सवाल पर राष्ट्रीय बहस को बुनियादी रूप से बदल दिया । इसके साथ ही एक और बात नजर आयी ।  

वर्तमान सड़ी गली व्यवस्था के प्रति विक्षोभ का लाभ दक्षिणपंथी विचारों और आंदोलनों को भी मिला । इससे पूरी दुनिया में तानाशाह शासकों का उभार हुआ और उनमें नव फ़ासीवादी प्रवृत्तियों के भी संकेत मिले । इसके साथ ही अमेरिकी पूंजीवाद के चलते धरती पर भी संकट आ खड़ा हुआ । ऐसे तूफानी समय से कोई पीढ़ी शायद ही हाल के दिनों में गुजरी होगी । हमारे इस समय के गहरे सवाल क्रांतिकारी सिद्धांत की मांग कर रहे हैं । इन सभी बुनियादी सवालों को अगर कभी उठाया भी गया तो लोगों ने असंबद्ध समझकर उन्हें परे हटा दिया । असल में युद्ध, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और उत्पीड़न से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गहराई से जुड़ी हुई है । इसके चलते ही बहुतेरे युवा इस समय पूंजीवाद का विकल्प तलाश रहे हैं । इस मामले में लेखिका ने याद दिलाया है कि पूंजीवाद का सबसे गहन विश्लेषण कार्ल मार्क्स नामक क्रांतिकारी ने प्रस्तुत किया था । 150 साल पहले के उनके लेखन में हमें पूंजीवाद के समूचे गतिपथ की भविष्यवाणी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए इसके बावजूद उनके विश्लेषण की मूल बातों में बहुत अंतर नहीं आया है । संकट उसके साथ लगे रहते हैं, दमन और शोषण पर उसका निर्माण होता है तथा सामाजिक और पर्यावरणिक विध्वंस में उसकी अतार्किकता जाहिर होती है । मार्क्स का चिंतन आज के कार्यकर्ताओं के लिए मूल्यवान औजार है । इसके सहारे मुट्ठी भर अमीरों की इस दुनिया को समझने और बदलने में आसानी होगी । इस दुनिया में कुछ लोगों के लाभ के लिए अधिकांश लोगों का शोषण होता है, उन्हें मताधिकार से भी वंचित कर दिया जाता है, उनका सब कुछ छीन लिया जाता है । इस व्यवस्था के भरोसे शायद यह धरती और मानवता इस सदी को सुरक्षित पार न कर सकेंगे ।

लेखिका ने इस दुनिया को समझने के लिए अर्थशास्त्र पढ़ने की कोशिश की लेकिन उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा । उनका कहना है कि पूंजीवाद और अर्थशास्त्र को जान बूझकर रहस्यमय बनाया गया है ताकि उनके बारे में आम लोगों से अधिक बात विशेषज्ञ कर सकें । वंचितों के लिए इसमें संदेश निहित होता है कि व्यवस्था और विचारों की जटिल दुनिया को समझना आपके बस की बात नहीं, उन्हें प्रभावित करना तो बहुत दूर की बात है । इस रहस्य का भेदन करने वाले मार्क्सवादी अर्थशास्त्र पर भी अधिकतर पुरुषों का कब्जा है । ऐसी स्थिति में उन्होंने मार्क्स के ग्रंथपूंजीको पढ़ना शुरू किया और उससे तब तक जूझती रहीं जब तक अर्थतंत्र की दुनिया उनके लिए बोधगम्य न हो गयी । इस वजह से उन्हें उम्मीद है कि उनकी यह किताब अर्थतंत्र की दुनिया उनके जैसे पाठकों के लिए खोलेगी ।

किताब में मार्क्स कीपूंजीका अनुसरण किया गया है । मार्क्स नेपूंजीके तीन खंड इस पूंजीवादी व्यवस्था के क्रांतिकारी रूपांतरण हेतु मजदूर आंदोलन को सैद्धांतिक हथियार उपलब्ध कराने के लिए लिखे थे । मार्क्स मानते थे कि समूची मानवता के भविष्य के लिए मजदूर वर्ग का यह काम अत्यावश्यक है इसलिए वे इसके पक्ष में भावुकता की जगह ठोस वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत करना चाहते थे । पूंजीवादी व्यवस्था की अंदरूनी कार्यपद्धति और अंतर्विरोधों की खोज के लिए मार्क्स ने वैज्ञानिक छानबीन की पद्धति अपनायी । वे जानते थे कि आर्थिक रूपों के विश्लेषण के लिए सूक्ष्मदर्शी यंत्र या रसायन मदद नहीं कर सकते इसलिए उन्होंने इस काम के लिए अमूर्तन का सहारा लिया । अमूर्तन के बल पर उन्होंने इस व्यवस्था के प्रमुख तत्वों को अलगाया और उनके शुद्ध रूप में उनका विवेचन किया । इस तरह पक्की बुनियाद डाल लेने के बाद उन्होंने जटिलतर तत्वों को स्पष्ट किया ताकि पाठक गहन धारणाओं को ठोस यथार्थ पर लागू कर सके । पूंजीवादी व्यवस्था की सतह पर चल रही हलचल को भेदकर गहराई में कार्य्ररत नियमों और प्रवृत्तियों को उद्घाटित करना उनकी पद्धति की सबसे बड़ी खूबी है ।

मार्क्स बताते हैं कि पूंजीवाद उत्पादन का एक सामाजिक संबंध है । कहने का मतलब कि मुनाफ़े का स्रोत बेहतर गणना या मौलिक सोच नहीं बल्कि दो वर्गों के बीच का शोषणकारी संबंध है । हमारे सामाजिक जीवन में मालिक और कामगार जब एक दूसरे से मिलते हैं तो एक के पास मूल्य उत्पादन के साधनों का मालिकाना होता है और दूसरे के पास जिंदा रहने के लिए अपना श्रम बेचने के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं होता । कामगार को चाहे जितना भी जरूरी समझा जाये लेकिन कार्यस्थल पर जीवन मरण के सभी फैसले मालिक ही लेते हैं और मुनाफ़ा भी उनकी ही जेब में जाता है । इस तरह पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन और विनिमय कुल मिलाकर ऐसे शोषणकारी संबंध से निर्धारित होता है । यह संबंध न तो प्राकृतिक है और न ही अजर अमर होता है । पूंजीवाद के आरम्भिक विकास के समय जन समुदाय को उनकी जमीन से जबरिया बेदखल किया गया था ताकि पूंजीवाद को फलने फूलने का माकूल माहौल मिल सके । पूंजीवाद को समझने के लिए वर्ग और शोषण बेहद बुनियादी धारणाएं हैं और उनको ऐतिहासिक संदर्भ में ही समझा जा सकता है इसलिए लेखिका ने किताब की शुरुआत पूंजी के जन्म की कहानी से की है । इससे पुस्तक में आगे जो बातें बतायी गयी हैं उनका संदर्भ बनेगा । समझ आयेगा कि पूंजीवादी व्यवस्था मनुष्य और धरती को पराधीन बनाकर पैदा हुई है ।

इसके आगे के दो अध्यायों में माल, मूल्य और मुद्रा जैसी अमूर्त धारणाओं का विवेचन किया गया है । मार्क्स ने पहले खंड के शुरुआती तीन अध्यायों में इन्हें स्पष्ट किया है । इन अध्यायों की थोड़ी जटिलता को लेकर मार्क्स ने पाठकों को चेतावनी दी थी क्योंकि अर्थशास्त्र के अध्ययन में इस पद्धति का पहले कभी उपयोग नहीं किया गया था । इसीलिए लेखिका ने ठोस उदाहरण देकर आसान भाषा में बात को समझाने की कोशिश की है । इसके बाद के दो अध्यायों में मुनाफ़े के स्रोत और पूंजीवादी शोषण के खास रूप को समझाया गया है । इसके लिए पूंजी, श्रम और वर्ग समाज जैसी धारणाओं की समझ जरूरी है । इसके बाद ही होड़ और संचय जैसी संचालक शक्तियों को देखना सम्भव होता है । किताब के आखिरी अध्यायों में पूंजीवाद में निहित अंतर्विरोधों की पहचान की गयी है जिनके ही चलते आखिरकार वैकल्पिक समाज का आधार तैयार होता है । सबसे अंत में वर्तमान समय की विशेषता के रूप में कर्ज और वित्त बाजार का विश्लेषण किया गया है । इसी अध्याय में हालिया महामंदी का भी विश्लेषण है । ऐसा इसलिए नहीं कि यह संकट प्रधान तौर पर वित्तीय संकट है । होना तो इसे संकट वाले पूर्व अध्याय में चाहिए था लेकिन कर्ज की भूमिका को अच्छी तरह समझे बिना इसकी सही व्याख्या सम्भव नहीं थी । पश्चलेख में आगामी गिरावट के बारे में कुछ विचार व्यक्त किये गये हैं ताकि मनुष्य और धरती पर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के घातक नतीजों की तस्वीर साफ हो सके ।

इसमें मार्क्स कीपूंजीसे ढेर सारे उद्धरण दिये गये हैं । कहीं कहीं प्रसंगानुसार उनकी अन्य किताबों की भी बात की गयी है । वजह मार्क्स के लेखन में पाठकों की रुचि पैदा करना है । इसमें अर्थतंत्र की कार्यपद्धति का विवेचन है । यह कार्यपद्धति दमन और साम्राज्यवाद से तथा पर्यावरण के विनाश से नाभिनालबद्ध है । आम लोग अर्थशास्त्र को संख्याओं से जोड़कर देखते हैं । मार्क्सवादियों के लिए अर्थतंत्र का संबंध बुनियादी रूप से मनुष्य और उसके जीवन से है । मार्क्सवाद सही गलत का कोई खाका नहीं, निरंतर गतिमान सामाजिक संबंधों पर लागू होने वाला जीवंत सिद्धांत है । इसके चलते मार्क्सवादियों में आपस में विवाद मौजूद हैं । लेखिका ने अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए भी पूंजीवाद की उत्पत्ति, संकट सिद्धांत और वित्तीय पूंजी की भूमिका के बारे में विवादों का परिचय दिया है ।

इस दुनिया में केवल पूंजीवादी विनाश ही नहीं है, बल्कि मानव चेतना, रचनात्मकता और संघर्ष से उपजी उम्मीद भी है । मार्क्स ने इसी तरह की उम्मीद के आधार पर बनने वाली एक वैकल्पिक दुनिया का सपना रचा है । इस वैकल्पिक दुनिया को हमें ही लड़कर हासिल करना होगा ।

Friday, January 8, 2021

गुलामी के प्रतिरोध में स्त्री

 

                       

                                            

2020 में वर्सो से स्टेला दाज़्दी की किताबए किक इन द बेली: वीमेन, स्लेवरी ऐंड रेजिस्टेन्सका प्रकाशन हुआ । लेखिका ने नौ साल की उम्र में इतिहास की परीक्षा से बात शुरू की है । उस उम्र के बच्चों से उम्मीद की जाती थी कि किताब में लिखे को जस का तस उतार दें । पूरी कक्षा में वे एकमात्र अश्वेत विद्यार्थी थीं । इतिहास में उनकी रुचि थी और उसी वय में उनकी रुचियों को लिंग और नस्ल ने प्रभावित करना शुरू कर दिया था ।

इतिहास की पुरानी घटनाओं का पुस्तकों में जिस तरह जिक्र हुआ था उसमें औद्योगिक क्रांति सबसे कम हिंसक बदलाव नजर आता था । कताई करने वाली नयी तकली की खोज का जिक्र तो था लेकिन यह नहीं बताया जाता था कि उसकी सफलता रुई की अबाध आपूर्ति पर निर्भर थी । इसे बनाये रखने में कामयाबी लाखों गुलाम अफ़्रीकियों के जबरिया श्रम की बदौलत मिलती थी । अध्यापक इस पहेली के बारे में खामोशी बरतते थे । वे इतिहास को ब्रिटेन के गोरों का साम्राज्य विस्तार ही समझते थे । ऐसा केवल इतिहास की कक्षा में ही नहीं होता था । आम तौर पर अश्वेत लोग या तो अदृश्य थे या बर्बर, बेवकूफ या अप्रासंगिक थे । गणित, विज्ञान या साहित्य की हमारी समझ में उनका कोई योगदान कल्पना से परे था ।

लेखिका ने हाल के दिनों में ही महसूस करना शुरू किया कि उद्योगीकरण और गुलामी के बीच इतना गहरा रिश्ता है । इसे छिपाने के लिए उद्योगीकरण को परस्पर असंबद्ध ऐसी घटनाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिनमें किसी स्त्री या अश्वेत की कोई भूमिका नहीं दिखायी देती । अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन और उसके जुझारू प्रतिरूप ब्लैक पावर के उभार के बाद नया इतिहास बोध पैदा होना शुरू हुआ । फिर तो इस इतिहास के बारे में लेखिका ने सब कुछ खंगाल डाला ।

इस तमाम अध्ययन से साबित हुआ कि काले लोगों की भूमिका को जान बूझकर दबाया गया है । इसी दौरान इतिहास से स्त्रियों को गुम करने की कोशिशें भी उजागर होने लगीं । बहुत पहले ही मार्क्स और एंगेल्स ने ऐसे ही मजदूर वर्ग को बाहर कर देने के प्रयासों की पोल खोली थी । असल में इतिहास में जिन लोगों के नाम आते हैं उनके नियंत्रण में शक्ति का तंत्र होता है । इस तंत्र के बल पर ही इतिहास में लोगों के नाम दर्ज होते हैं । गोरे मजदूरों की जगह भी राजाओं और रानियों के नाम के सामने कुछ नहीं होती ।

अश्वेत स्त्री के मामले तो तिहरे बोझ से दबे होते हैं । लिंग, वर्ग और नस्ल की वंचना के चलते उनका नाम शायद ही कभी सुना गया होगा । लेखिका ने उनमें से कुछ नामों को खोज निकालने और दर्ज कराने का संकल्प किया । वे कामगार माता थीं । तमाम अश्वेत बौद्धिकों के चिंतन से परिचित होना जरूरी लगा । उत्तर आधुनिकता के सिद्धांतों से भी मदद ले सकती थीं लेकिन उन्होंने व्यावहारिक अनुभव की बुनियाद पर खड़ा होना चुना । इसके लिए उन्होंने पूर्वजों की अफ़्रीकी जमीन की यात्रा की और अपने लोगों की प्रतिभा से चकित रह गयीं ।

धीरे धीरे उनको समझ आता गया कि गोरे मालिकों और काले गुलामों यानी उत्पीड़कों और उत्पीड़ितों के बीच संघर्ष के चलते ही 1807 में गुलाम व्यापार का खात्मा हुआ जिससे पचीस साल बाद गुलामों की मुक्ति का रास्ता हमवार हुआ । इसका श्रेय किसी सेनपति को देना उसी तरह है जैसे अमेरिका की खोज का श्रेय कोलम्बस को देना ।

लेखिका को अपने शोध के दौरान अनुभव हुआ कि गुलाम या मुक्तिदाता जैसे पदों का सरलीकरण उचित नहीं । यथार्थ इसके मुकाबले जटिल था । उनमें आपस में भेद थे । वे सभी एक ही सुर में नहीं बोलते थे । नस्ल, वर्ग और लिंग की स्थापित मान्यताओं से भी अंतर्विरोध धुंधले पड़ जाते हैं । उन्हें समझ आया कि अश्वेत गुलामों की अपनी कोशिशों और उनकी मुक्ति के समर्थकों के प्रयास तत्कालीन आर्थिक जरूरतों के साथ मिल गये जिनके चलते अफ़्रीका से चलने वाला यह व्यापार बंद हो गया । लगा कि इतिहास का अध्ययन सुरागरसी है । साक्ष्य की जांच और व्याख्या करनी पड़ती है । उस समय झूठ बोलना और लिखना चलन में था । काली और अश्वेत स्त्रियों के प्रसंग में खासकर इसके अपवाद बहुत कम हैं । दस्तावेज गोरे पुरुषों ने तैयार किये हैं जिनमें उनकी राय शामिल रही है ।

इस स्थिति के चलते प्रचंड परिश्रम के बावजूद लेखिका को अफ़्रीकी मूल की स्त्री का कुछ खास पता नहीं चला । तभी ऐसे अफ़्रीका केंद्रित इतिहासकारों के समूह की खबर मिली जो इसी तरह के सवालों से जूझ रहे थे । उन सबके शोध से प्रमाणित हुआ कि अफ़्रीका के गुलामों की मुक्ति प्रधान रूप से उनके ही प्रयासों से हुई थी । इन प्रयासों में स्त्रियों की भूमिका को भी दर्ज किया जाना शुरू हुआ हालांकि अब भी पूरी तरह से उनका योगदान प्रकाश में नहीं आ सका है । दुखद है कि गुलामी के खात्मे के इतने दिनों बाद भी मुख्य धारा की मीडिया में उन कुछेक गोरों का तो बहुत गुणगान होता है जिन्होंने गुलामी की आलोचना की थी लेकिन इसके शिकार और इसकी समाप्ति के लिए बलिदान करने वाले जुझारू योद्धाओं की चर्चा भी नहीं होती । अगर सिनेमा की दुनिया पर यकीन करें तो गुलामों की मुक्ति की लड़ाई लड़ते गोरे ही नजर आयेंगे । गोरे इतिहासकारों के लेखन में भी यही नजर आयेगा । काली स्त्री तो कहीं दिखायी ही नहीं देगी । अगर कहीं उनका उल्लेख होगा भी तो विवरण अकादमिक स्त्रीद्वेष से रंगा होगा । उनकी मौजूदगी संगीत, फ़ैशन या लोकप्रिय मीडिया की बनायी छवियों तक सीमित रहेगी ।

कुछ लोग मानते रहे कि उन्हें गुलामी से कोई खास परेशानी नहीं रही । इसके साथ ही उसकी सब कुछ को सहन करने वाली मातृ छवि भी बनायी गयी । इस आदर्शीकरण के परदे में गुलाम स्त्री की जटिल हालत छिप जाया करती है । इस छवि के चक्कर में असुविधाजनक कहानियों को दबा दिया जाता है । इन भूमिकाओं तक उसे सीमित कर देने के चलते उनके साथ होने वाली हिंसा नजर नहीं आती । वह अत्याचार का खामोश तमाशबीन मात्र बनकर रह जाती है । लड़ाई तो पुरुषों ने लड़ी । उंगली पर गिने जाने लायक जितनी स्त्रियों की विद्रोही भूमिका का पता चलता भी है वे पुरुषों की पिछलग्गू बना दी जाती हैं ।

इस पुरुष केंद्रित वृत्तांत से अलग हटकर देखना शुरू करते ही तस्वीर बदलने लगती है । उसमें गुलाम स्त्री नजर आने लगती है । वे हाड़तोड़ परिश्रम करती दिखायी देती हैं । बलात्कार या रतिज बीमारियों की शिकार होकर होने वाली उनकी मौतें महसूस होना शुरू होती हैं । उनकी बाहों, गले और पैरों में पड़ी लोहे की जंजीरों के निशान उभरना शुरू हो जाते हैं । उनके कपड़ों पर पसीनों के गंदे दाग झलकने लगते हैं । इस भयावहता के समक्ष उनमें से कुछ पागल होती तो कुछ आसन्न मृत्यु की बाट जोहती दिखती हैं । लेकिन उनमें कुछ ऐसी भी दीख सकती हैं जो सही मौके का इंतजार कर रही होती हैं । भाग निकलने की योजना बनाती या बदला लेने का सपना देखती औरत भी मिलना बहुत कठिन नहीं रह जाता । उनके हाथ में कभी कभी धारदार हथियार या छिपायी हुई जहर की शीशी उनके दिमाग में चलने वाली खुराफ़ात का सबूत पेश करते हैं ।

इन औरतों को चार सौ साल की गुलामी और उसके प्रतिरोध के इतिहास में वाजिब जगह मिलनी चाहिए । उच्च शिक्षा केंद्रों में गुलामी की बात करने से जी छुड़ाने की प्रवृत्ति आम है लेकिन ठीक इसी वजह से उस पर चर्चा प्रासंगिक बनी हुई है । गुलामी और गुलाम व्यापार की घटनाएं किसी अन्य ग्रह पर नहीं घटित हुईं, न ही इस व्यापार से लाभ अर्जित करने वाले अमेरिका तक ही सीमित थे । ब्रिटिश साम्राज्य का भी अतीत गुलामों के योगदान की कहानी सुनाता है । ब्रिटेन के कस्बों और शहरों में सैकड़ों साल तक गुलामों का खून पसीना बहा है तब जाकर उस मुल्क की प्रगति हुई और उसके नागरिकों की जेब सोने के खनकते सिक्कों से भरी । गुलामों और उपनिवेशों ने ही ब्रिटेन के आगे ग्रेट जोड़ा लेकिन ब्रिटेन के इतिहास में इस कृत्य का जिक्र भी नहीं होता । कुछेक अन्य वजहों से भी इस अतीत की बात होनी चाहिए ।

जो समाज अपना इतिहास नहीं जानता वह ऐसे पेड़ की तरह होता है जिसको अपनी जड़ों की जानकारी नहीं होती । पश्चिम के विविधता से भरे समाजों के लिए इस यादगदार इतिहास को जानना खास तौर पर जरूरी है । अफ़्रीकी मूल से आयी हुई इतनी बड़ी आबादी गुलामी के अमानुषिक अत्याचार झेलकर भी कैसे बची रही, इसे जानना उनके वंशजों को गर्व से भर देता है । हिटलरी संहार से बचे यहूदियों और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान फ़ासीवाद का प्रतिरोध करने वाले सम्माननीय बहादुरों की तरह ही इन्हें भी सम्मानित किया जाना चाहिए । अश्वेतों को गुलामी की चर्चा शुरू होने पर शर्मिंदा होने या झेंपने की आदत से आजाद होना होगा । यूरोपीय लोगों ने जिस तरह अफ़्रीकी लोगों को गुलाम बनाया वह मानवता के प्रति किया गया सबसे बड़ा अपराध है ।

2007 में जब संसद द्वारा गुलाम व्यापार की कानूनी समाप्ति की दो सौवीं सालगिरह मनायी जा रही थी तो उसी समय गुलाम प्रथा के खात्मे में गुलामों के संघर्ष के योगदान को भी उजागर किया जाना चाहिए था । उसमें स्त्रियों का जिक्र न होना तो और भी भारी भूल थी । गुलामी से आजादी तक की यात्रा बहुत लम्बी और तकलीफदेह रही है । इस यात्रा में हरेक कदम पर औरतें मौजूद रही हैं । इतिहास में उनकी मौजूदगी को ओझल करके उनके साथ अन्याय किया गया है ।


Tuesday, December 29, 2020

ट्रम्पशाही के चार साल

 

                

                                   

अमेरिका के 2016 के राष्ट्रपति पद के चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन को जनता के वोट तो अधिक मिले लेकिन अमेरिकी चुनाव प्रणाली की विशेषता के चलते जीत रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रम्प की हुई । सत्ता में रहते हुए ट्रम्प ने जो कुछ किया उसके चलते इस बार के चुनावों में उनकी हार हुई । खास बात यह रही कि इन चुनावों के लिए इतने बड़े पैमाने पर गोलबंदी हुई कि दोनों ही प्रत्याशियों को पिछले सौ साल के सबसे अधिक वोट मिले । ट्रम्प की चुनावी पराजय के बावजूद उनको मिले समर्थन के चलते माना जा रहा है कि उनकी छाया अमेरिकी समाज और राजनीति पर बनी रहेगी । बहरहाल हमारे देश में भाजपा के समर्थकों ने पिछले चुनावों में उनकी जीत के लिए जंतर मंतर पर केक काटा था तो इस बार यज्ञ आयोजित किया था । ट्रम्प की इस लोकप्रियता को हम वर्तमान राजनीति का लक्षण मान सकते हैं । अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में उनके रहते हुए ढेर सारी किताबें लिखी गयीं । इन किताबों की बिक्री भी खूब हुई । अधिकतर किताबें उनके विरोध में ही लिखी गयीं । इनके लेखक पत्रकारों के साथ कुछ गम्भीर विचारक भी थे । ट्रम्प की राजनीति में फ़ासीवाद की प्रतिध्वनि भी सुनी गयी ।            

2015 में थामस डन बुक्स से माइकेल डिअन्तोनियो की किताब नेवर एनफ: डोनाल्ड ट्रम्प ऐंड द पर्सूट आफ़ सक्सेसका प्रकाशन हुआ । ट्रम्प शेष राष्ट्रपतियों से इस मामले में अलग थे कि वे बेहद धनी प्रत्याशी थे । उनका व्यावसायिक अतीत उनके राष्ट्रपति पद पर रहते हुए छाया की तरह निरंतर मौजूद रहा । उनकी पुत्री इवांका भी फ़ैशन उद्योग से जुड़ी थीं । दामाद कुशनेर भी अथाह संपत्ति के स्वामी थे । इसके अतिरिक्त भी टेलीविजन की दुनिया में उनका नाम पहचाना था । टेलीविजन में ध्यानाकर्षण के लिए ही उन्होंने लाल बालों का टोपा लगाना शुरू किया । उनका मानना है कि इससे स्त्रियों पर डोरे डालना आसान होता है और बुरी नजर से बचे रहते हैं । खुद के बारे में चर्चा उन्हें इतना पसंद है कि अपनी निंदा भी उन्हें उचित लगती है । अपनी इसी आदत के चलते पिछले चालीस साल से वे चर्चा के केंद्र में बने रहे हैं । भू संपदा के विकास यानी भवन निर्माण के धंधे से उनका शुरू में जुड़ाव रहा । इसके बाद तो संपत्ति और अय्याशी का दूसरा नाम ही ट्रम्प हो गया । गगनचुम्बी इमारतों, जुआघरों, हवाई जहाजों और सभी कीमती विक्रेय वस्तुओं पर यह नाम सुनहरे अक्षरों में नजर आने लगा । नव धनिक वर्ग उनका उपभोक्ता था । अनुमानों के मुताबिक लगभग पूरा अमेरिका इस नाम को पहचानता है ।      

2016 में मेलविल हाउस से डेविड के जान्सटन की किताब द मेकिंग आफ़ डोनाल्ड ट्रम्पका प्रकाशन हुआ । इस किताब के लेखक अठारह साल की उम्र से ही खोजी पत्रकार रहे हैं । इस हैसियत से उन्होंने बहुतेरे भंडाफोड़ किये । तीस साल से वे ट्रम्प की खबर गहरायी से देखते सुनते रहे हैं और ढेरों साक्षात्कार किये हैं । इसीलिए जब ट्रम्प ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के इरादे की घोषणा की तो अन्य पत्रकार इसे शिगूफ़ा मानते रहे लेकिन लेखक ने इसे सच समझा । उन्हें पता था कि 1985 से ही ट्रम्प इस बारे में सोच रहे थे । 1988 में उन्होंने जार्ज बुश के साथ उप राष्ट्रपति के बतौर चुनाव लड़ने की चाहत जाहिर की थी । 2000 में रिफ़ार्म पार्टी की ओर से वे चुनाव लड़े भी । चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने एक कंपनी के प्रचार का भी अभियान चलाया जो उनके हवाई जहाज का खर्च उठा रही थी । 2016 के चुनाव प्रचार में भी उन्होंने समूचे अभियान का खर्च अपने व्यावसायिक तंत्र को ही अदा किया । उनके चुनाव अभियान से उन्हें ही लाभ हुआ । राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी की ओर से प्रचार के लिए इस्तेमाल की जाने वाली चीजों का बाजार भाव पर भुगतान का कानून जब बना था तो उसका मकसद लाभ लेने के लिए कम कीमत पर सेवा प्रदान करने वालों को रोकना था इसी कानून का सहारा लेकर चुनाव प्रचार से भी ट्रम्प ने लाभ कमाया इससे पहले 2012 में भी उन्होंने प्रत्याशी बनने की कोशिश की थी और तब उन्होंने इस चर्चा का लाभ एक टेलीविजन कंपनी के साथ अपने एक कार्यक्रम का लाभदायक अनुबंध के लिए उठाया था इसी वजह से 2016 की उनकी घोषणा को लोगों ने मजाक समझा था लेखक को उनकी इस घोषणा पर पूरा यकीन था इसलिए पहले दिन से ही उनके प्रचार अभियान को बारीकी से देखने लगे अपने खोजबीन के आधार पर उन्होंने ट्रम्प के घपलों के बारे में इक्कीस सवालों की एक सूची बनायी, उसे छपाया ताकि अन्य प्रत्याशी और पत्रकार उनसे ये सभी सवाल पूछें दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ इसलिए लेखक ने ट्रम्प के कारनामों को जनता के सामने लाने के लिए यह किताब लिखी है ट्रम्प ने अपने आपराधिक इतिहास को छिपाने और मिटाने की पूरी कोशिश की है और झूठ का कारोबार चला रखा है इसलिए यह काम लेखक को जरूरी लगा असल में ट्रम्प पर हजारों बार तमाम घपलों और धोखाधड़ी के चलते मुकदमे दर्ज हुए हैं अपने मजबूत प्रचार तंत्र, धौंस धमकी और चालबाजी के बल पर वे कानून की गिरफ़्त में आने से बचे रह सके हैं झूठ बोलना उनकी आदत में शुमार है              

2016 में सेन्स पब्लिशर्स से डगलस केलनर की किताब अमेरिकन नाइटमेयर: डोनाल्ड ट्रम्प, मीडिया स्पेकटेकल, ऐंड अथारिटेरियन पापुलिज्मका प्रकाशन हुआ । लेखक का मानना है कि डोनाल्ड ट्रम्प परिघटना की व्याख्या आगामी अनेक वर्षों तक अमेरिकी राजनीति के जानकारों के बीच जारी रहेगी । मीडिया में तमाशे के रूप में बने रहने की कला का इस्तेमाल ट्रम्प ने पहले अपने व्यवसाय के लिए किया, फिर टी वी सुपरस्टार बनने के लिए और फिर राजनीतिक अभियान में इस कौशल का उपयोग किया । असल में ट्रम्प परिघटना के जरिए अमेरिकी राजनीति में आए बदलावों को समझा जा सकता है । लेखक के अनुसार 1990 दशक के मध्य से ही अमेरिकी राजनीति और मीडिया में तमाशे की भूमिका बढ़ती गयी है । उस समय सिम्पसन की हत्या का मुकदमा चला, क्लिंटन पर सेक्स के आरोप लगे और समाचारों की दुनिया में चौबीस घंटे के खबरिया चैनलों की आमद हुई । उस समय ही इंटरनेट आया और सोशल मीडिया के प्रभाव के चलते इस तमाशे में तमाम लोग शामिल होते चले गये ।   

2017 में स्पीगेल & ग्राउ से मैट ताइबी की किताबइनसेन क्लाउन प्रेसिडेन्ट: डिसपैचेज फ़्राम द 2016 सर्कसका प्रकाशन हुआ । बताने की जरूरत नहीं कि यह किताब अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में लिखी हुई है । लेखक मशहूर पत्रकार हैं । लेखक का कहना है कि 2016 का अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव का प्रचार अभियान अत्यंत उत्तेजक और घृणास्पद घटना था । इससे दस साल पहले लिखी लेखक की किताब के निष्कर्षों की पुष्टि हुई । वर्तमान राष्ट्रपति को रोकने की हरेक कोशिश नाकाम साबित हुई । इससे साबित हुआ कि हमारी राजनीति की कमजोरियों को जो भी समझता है वह गद्दीनशीन हो सकता है । आश्चर्य की बात थी कि जनता से प्रत्याशियों और उनसे जुड़े संचार माध्यमों का कोई सम्पर्क नहीं था । 2004 से ही प्रत्याशी और उनके साथ के मीडियाकर्मी एक तरह की चलायमान जेल में घूमते रहते हैं । बस से निकलकर हवाई जहाज में, फिर हवाई जहाज से निकलकर बस में । निकलकर सभास्थल पर रस्सी से बनाए घेरे के बाहर या भीतर । रात किसी होटल में छह घंटे की नींद । सुबह से फिर वही सिलसिला । रोज रोज, हर हफ़्ते । जेल इतनी चुस्त रहती है कि सिगरेट के लिए भी चुनावी कार्यकर्ताओं की मदद लेनी पड़ती है । इसके जरिए जनता से शासक वर्ग की बढ़ती दूरी को हम समझ सकते हैं । राष्ट्रपति पद का चुनाव अभियान बुलबुले की तरह होता है और उस बुलबुले के भीतर रहनेवाले प्रत्याशी और उनके सहयोगी आपस में एक दूसरे को ही देखते सुनते रहते हैं । इन अभियानों में आम लोग केवल सजावटी उपस्थिति होते हैं । अगर किसी प्रत्याशी को अश्वेत लोगों का पक्षधर दिखना है तो वह अश्वेत बच्चों के किसी स्कूल में जायेगा और फोटो खिंचवायेगा । अगर मजदूर समर्थक दिखना है तो किसी कारखाने में जाकर हैट और चश्मा लगाकर फोटो खिंचवायेगा । लेकिन नेता या पत्रकार लोगों की बात सुनने के लिए कहीं देर तक रुकेगा नहीं । लोगों से सीधे बातचीत करने की जगह नेता लोग जनमत सर्वेक्षणों पर अधिक भरोसा करने लगे हैं ।

2017 में हेमार्केट बुक्स से नाओमी क्लीन की किताबनो इज नाट एनफ: रेजिस्टिंग ट्रम्पस शाक पोलिटिक्स ऐंड विनिंग द वर्ल्ड वी नीडका प्रकाशन हुआ । लेखिका का कहाना है कि जब से ट्रम्प की सरकार आई है तबसे ही लगातार चोट पहुंचाने वाली घटनाओं का तांता लगा हुआ है । उन्हें लगता है कि यह सोची समझी कार्यनीति होती है जिससे भ्रमित लोगों को भेड़ की तरह खास दिशा में ले जाने में आसानी होती है । इससे लाभ तब होता है जब संकट के बोध से एकताबद्ध जनसमुदाय दुनिया की बेहतरी की दिशा में बदलाव की समझ अर्जित करते हैं । अब तक इस लेखिका ने वस्तुओं में ब्रांडों के उदय के बारे में, राजनीतिक व्यवस्था पर निजी संपदा की जकड़बंदी के बारे में, नवउदारवाद के वैश्विक विस्फोट के बारे में, नस्ली उन्माद या अन्य के विरुद्ध नफ़रत के रणनीतिक इस्तेमाल के बारे में, कारपोरेट व्यापार के विनाशकारी प्रभाव के बारे में और दक्षिणपंथ की ओर से जलवायु परिवर्तन को नकारने के बारे में लिखा था । उन्हें लगता है कि ट्रम्प के निर्माण में इन सब तरह की चीजों का योगदान है ।

2017 में क्लेयर व्यू से टी जे कोल्स की किताबप्रेसिडेन्ट ट्रम्प, इंक: हाउ बिग बिजनेस ऐंड नियोलिबरलिज्म एम्पावर पापुलिज्म ऐंड फ़ार-राइटका प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक किताब दो चीजों के बारे में है । पहला हिस्सा हमारे समय की प्रभावी आर्थिक नीति के बारे में है जिसे नवउदारवाद कहा जाता है । इसमें उत्पादन से धन पैदा करने की जगह धन से धन पैदा करना यानी वित्तीकरण, तमाम तरह के लेनदेन से कारपोरेट घरानों को मुनाफ़ा मुहैया कराने के लिए नियमों को ढीला करना, बजट में संतुलन के लिए सामाजिक खर्चों में कटौती तथा टैक्स में छूट देकर कारपोरेट घरानों को डूबने से बचाना जैसे काम शामिल हैं । किताब के दूसरे हिस्से में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के बारे में तरह तरह के झूठ का पर्दाफाश किया गया है । इनमें पहला झूठ है कि वे विद्रोही हैं, दूसरा कि वे कोई आम कामगार अमेरिकी हैं, तीसरा कि वे संरक्षणवादी हैं, चौथा कि वे वैश्वीकरण के विरोधी हैं और पांचवां कि वे अपने मन से काम करते हैं । किताब में प्रस्तुत सबूत बताते हैं कि ट्रम्प अरबपतियों के हितों की सेवा करते हैं । शुरू में लेखक ने नवउदारवाद को स्पष्ट करने का प्रयास किया है तथा यूरोप और अमेरिका की मुख्य धारा की राजनीति पर इसके असर को भी परखने की कोशिश की है । लेखक का मानना है कि मतदाताओं की हालिया राजनीतिक उदासीनता भी नवउदारवाद का अंग है । इसके उपरांत निक्सन और रीगन के दौर की निजीकरण और तमाम किस्म के नियंत्रण समाप्त करने की पूंजीवाद समर्थक नीतियों का विवेचन किया गया है । क्लिंटन के समय भी इन्हीं नीतियों को जारी रखा गया जिनके फलस्वरूप ट्रेड यूनियनों और राजनीति में भागीदारी घटती गई । बढ़ती बेरोजगारी और मध्यवर्ग की हैसियत में गिरावट इन नीतियों के सामाजिक परिणाम थे । इसके बाद यूरोप और अमेरिका में उत्पन्न अति दक्षिणपंथी समूहों के उभार से नवउदारवाद के संबंध की छानबीन की गई है । अमेरिका में मोटी कमाई करने वाला मध्यवर्ग इस राजनीति का सबसे प्रबल समर्थक है । वहां टी पार्टी नामक गुट के हाशिये की ताकतों ने जब रिपब्लिकन पार्टी के नेतृत्व पर कब्जा क लिया तो दक्षिणपंथ की मजबूत राजनीतिक धारा पैदा हुई । 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद इस धारा का उभार अधिक स्पष्ट हुआ है । असल में यह संकट खुद नियमहीनता और वित्तीय सट्टेबाजी से पैदा हुआ था । अमेरिका की अति दक्षिणपंथी राजनीति का वर्णन इसके बाद हुआ है । इस व्यापक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ट्रम्प शासन की नीतियों का विश्लेषण किया गया है । कुल मिलाकर किताब में ट्रम्प के शासन को नवउदारवाद से प्रभावित नीतियों की निरंतरता में देखा गया है ।

2017 में वर्सो से डेविड नेइवेर्ट की किताब अल्ट-अमेरिका: द राइज आफ़ द रैडिकल राइट इन द एज आफ़ ट्रम्पका प्रकाशन हुआ । ट्रम्प ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव लिए अपने अभियान की जिस दिन घोषणा की उसके अगले ही दिन एक व्यक्ति ने चर्च में घुसकर नौ अश्वेतों की गोली चलाकर हत्या कर दी । दोनों घटनाओं का सीधा आपसी रिश्ता न होने के बावजूद अमेरिका के सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में आने वाले गहरे बदलावों की सूचना इन दोनों से मिली । अमेरिका से नस्ली हिंसक सोच कभी गायब नहीं हुई थी लेकिन राष्ट्रपति पद पर उसकी दावेदारी एकदम ही नयी बात थी ।  

2017 में ज़िरो बुक्स से एन्जेला नाग्ले की किताब किल आल नार्मीज: द आनलाइन कल्चर वार्स फ़्राम टम्बलर ऐंड 4चान टु द अल्ट-राइट ऐंड ट्रम्पका प्रकाशन हुआ । इसमें इंटरनेट की दुनिया में चलने वाले संस्कृति युद्धों से प्रभावित पीढ़ी की राजनीतिक संवेदनशीलता का विश्लेषण किया गया है । लेखक का कहना है कि 2008 में ओबामा के चुनाव जीतने से पहले उम्मीद के उनके संदेश को ढेर सारे उदार लोगों ने प्रसारित किया था और पहले अश्वेत राष्ट्रपति के चुने जाने के उत्साह को साझा किया था । इराक और अफ़गानिस्तान पर हमला करनेवाले बदतमीज राष्ट्रपति के बाद ओबामा का आगमन राहत की बात थी । हिलेरी ने भी इसी उम्मीद के संदेश पर भरोसा किया । इस बार पुराना जादू नहीं चला और उनकी खिल्ली उड़ायी गयी । सवाल है कि इंटरनेट की दुनिया में उम्मीद के प्रसारण से गिरकर वर्तमान ट्रोलिंग तक कैसे पहुंचा गया । किताब में इसी प्रक्रिया को परखा गया है जिसके तहत मुख्य धारा की मीडिया की मौजूदगी में उससे इतर नारीवाद, यौनिकता, जेंडर अस्मिता, अभिव्यक्ति की आजादी और सही होने के सवालों पर इंटरनेट की दुनिया में सांस्कृतिक लड़ाइयां लड़ी गयीं । इससे पहले साठ और नब्बे के दशक में नौजवानों में उदारवादी और इहलौकिक संस्कृति के प्रसार के विरोध में पुरातनपंथी लोगों ने जो सांस्कृतिक लड़ायी लड़ी उससे वर्तमान लड़ाई अलग किस्म की थी । इसमें तमाम किशोर जुआ खिलाड़ी, अनाम फ़ासीवाद प्रेमी, गुलामी समर्थक फ़ैशनपरस्त, नारीवाद विरोधी और पेशेवर ट्रोलिंग करनेवाले शरीक थे । यह समूह ऐसा था कि इनके आनलाइन बयानों में किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता को तलाशना मुश्किल था । इस झुंड के भीतर उदारवादी बौद्धिक सहमति की खिल्ली उड़ाना ही साझी बात थी । इस नयी संस्कृति में बची खुची सांस्कृतिक संवेदनशीलता की मौत हो गयी । इस तरह ट्रम्प समर्थकों की विजय में संस्कृति और समाज की आम धारणा का विनाश निहित था । सूचना की प्रामाणिकता को मीडिया की ताकत समझा जाता है । इस संस्कृति ने मूल्य के बतौर सत्य पर सवाल खड़ा किया और सूचना तथा अफवाह का अंतर मिटा दिया ।            

2017 में ओ/आर बुक्स से जान के विलसन की किताब प्रेसिडेन्ट ट्रम्प अनवील्ड: एक्सपोजिंग द बिगाटेड बिलिनेयरका प्रकाशन हुआ । लेखक का मानना है कि ट्रम्प उसी तरीके से अमेरिका के पैंतालीसवें राष्ट्रपति बने जिस तरीके से वे अरबपति सेलेब्रिटी बने थे । झूठ बोलना, धोखाधड़ी और चोरी के रास्ते पर चलकर ही हमेशा वे ऊंचाई पर पहुंचने के आदी रहे हैं । राजनेता झूठ तो बोलते हैं लेकिन इससे पहले सत्य की अवहेलना करते हुए किसी प्रत्याशी ने इतने सारे मसलों पर इतने ज्यादा झूठ शायद ही बोले होंगे । लेखक ने इन सबके बावजूद ट्रम्प की जीत के एकाधिक कारण गिनाये हैं । पहला कारण निर्वाचक मंडल की व्यवस्था है । इसके चलते पचीस लाख वोट कम मिलने के बावजूद ट्रम्प को जीत मिली । खुद ट्रम्प ने ही ओबामा की जीत के समय इस व्यवस्था को लोकतंत्र के लिए घातक माना था । अमेरिका में मतदान की व्यवस्था के साथ कुछ गड़बड़ियों का पुराना इतिहास है । ट्रम्प के समर्थक प्रांतीय शासकों ने मतदाता पहचान पत्र के ऐसे नियम बनाये जिनके चलते डेमोक्रेटिक पार्टी के सम्भावित मतदाताओं को पहचान पत्र बनवाना मुश्किल होता गया है । मतदाताओं को वोट देने से रोकने का एक और तरीका मतदान केंद्र पर लम्बी कतारें लगा देना है । सर्वेक्षण में पाया गया कि गोरों के मुकाबले अश्वेतों और लैटिन अमेरिकी मूल के मतदाताओं को मतदान के लिए अधिक समय तक इंतजार करना पड़ता है । दूसरा कारण हिलेरी का व्यक्तित्व था । उन्हें राजनेता के मुकाबले कुशल प्रशासक समझा गया । ट्रम्प की रैलियों में भीड़ तो होती थी लेकिन उनके अंधभक्तों को छोड़कर आम लोग उनके समर्थक नहीं थे । असल में उन्हें हिलेरी विरोधी वोट मिले थे । हिलेरी के चुनाव अभियान में ट्रम्प की नीतियों के मुकाबले उनके व्यक्तित्व को निशाना बनाया गया । उनकी नीतियों से विषमता में बढ़ोत्तरी की बात नहीं की गयी । यह भी साफ नहीं हो सका कि उनकी नीतियों से रोजगार पैदा होने की जगह समाप्त होंगे । ट्रम्प के व्यक्तित्व से खफ़ा मतदाता को उनकी नीतियों का विरोधी नहीं बनाया जा सका । लोगों को लगा कि ट्रम्प युद्ध समाप्त करेगा तथा अमीरीपरस्त राजनीतिक तंत्र की जकड़बंदी को कमजोर करेगा । उनकी नीतियों के पक्ष में बहुमत नहीं था । परदेशी कामगारों को निर्वासित करने या मेक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ा करने का समर्थन बहुत कम मतदाताओं ने किया था । तीसरा कारण ट्रम्प का मीडिया पर बेइमानी का आरोप था । असल में तो मीडिया ने उनकी मदद की । ट्रम्प की तमाम नफ़रती टिप्पणियों, बेवकूफ़ाना नीतियों और विचित्र विचारों की जितनी निंदा की जानी चाहिए थी उतनी नहीं हुई इसकी बजाय मीडिया संतुलन बिठाने के चक्कर में उन पर गम्भीर चर्चा करता रहा मीडिया के बड़े हिस्से पर ट्रम्प के समर्थक थैलीशाहों का कब्जा था, विरोधी मीडिया की पहुंच सीमित थी मीडिया में काम करनेवालों में ट्रम्प विरोधियों की बहुतायत थी लेकिन उनके मालिकान का दुलारा ट्रम्प ही था उसे अपनी रैलियों का प्रचार नहीं करना पड़ा, मीडिया ने यह काम उसके लिए किया जलवायु परिवर्तन और शिक्षा संबंधी ट्रम्प की विनाशकारी नीतियों के बारे में कोई गम्भीर बहस मीडिया में नहीं सुनायी पड़ी ट्रम्प समर्थक दक्षिणपंथी मीडिया ने मतदाताओं को गहराई से प्रभावित किया इसने तथ्य के प्रति अपने श्रोताओं और दर्शकों में संदेह और दुराग्रह को जन्म दिया आखिरी चौथा कारण ट्रम्प की ओर से धोधाधड़ी को कला में बदल देना था उसने अपने फ़ाउंडेशन को तमाम किस्म के लाभ पहुंचाये, अपनी कंपनियों को दीवालिया घोषित करके देनदारियों से पीछा छुड़ाया और करोड़ो डालर के आयकर का भुगतान नहीं किया वह ऐसा अरबपति था जो मजदूरों की भाषा बोलने की नौटंकी साध ले गया था इसके ही सहारे वह खुद को बदलाव और उम्मीद के प्रतीक के रूप में पेश करने में कामयाब रहा उसने वादों की झड़ी लगा दी रोजगार, सफलता, खुशहाली, युद्ध की समाप्ति और अमेरिकी जनता के प्रत्येक सपने को पूरा करने का उसने वादा किया उसने गोरे राष्ट्रवाद को पीड़ित होने का बोध कराया असल में पेशेवर नौटंकीबाज को बेवकूफ़ श्रोताओं की जरूरत होती है जो उसकी बातों को बिना सोचे समझे मान लें ट्रम्प के पसंदीदा श्रोता अर्धशिक्षित गोरे थे                      

2017 में हाट बुक्स से ब्रायन क्लास की किताबद डेस्पाटस अप्रेन्टिस: डोनाल्ड ट्रम्पस अटैक आन डेमोक्रेसीका प्रकाशन हुआ । ट्रम्प के बारे में लिखी अन्य किताबों से अलग इस किताब में लेखक ने उम्मीद से बात शुरू की है । उनका कहना है कि आज पूरी दुनिया में सपने देखने, स्वशासन करने और मूर्खों से दुनिया वापस छीन लेनेवाली जनशक्ति का उभार हुआ है । शायद इसीलिए मनुष्य और धरती के शोषण से मुनाफ़ा पैदा करनेवाली ताकतों और संरचनाओं के बारे में अधिकाधिक जानकारी हासिल करना हमारी जरूरत है । दो साल पहले लेखक की मुलाकात बेलारूस के राष्ट्रपति पद के एक प्रत्याशी से हुई थी । वे लोकतंत्र के पक्षधर थे और उन्होंने अपने देश के तानाशाह के विरोध में शांतिपूर्ण विरोध संगठित किया था । इस अपराध के लिए पिटायी के बाद उनका अपहरण हुआ और उन्हें जेल में कैद कर दिया गया । परिवार से साल में केवल एक घंटे बात करने की अनुमति दी गयी । पांच साल उस कैद में बिताने के बाद वे रिहा किये गये थे । लेखक से उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र को वे मामूली चीज न समझें । उन्हें आशा थी कि जल्दी ही लेखक उसका महत्व समझेंगे । लेखक तानाशाहों के बारे में अध्ययन करते हैं । उन्हें लगता है कि ट्रम्प तानाशाही की राह पर कदम बढ़ा चुके हैं । उन्होंने अमेरिकी लोकतंत्र को पर्याप्त क्षति पहुंचायी है ।        

2017 में नेशन बुक्स से जान निकोल्स की किताब हार्समेन आफ़ द ट्रम्पोकालिप्से: ए फ़ील्ड गाइड टु द मोस्ट डेंजरस पीपुल इन अमेरिकाका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि अमेरिका में राष्ट्रपति का पद एक संस्था है और उस संस्था का प्रभाव देश के समूचे माहौल पर पड़ता है । इसलिए उस पद पर बैठे व्यक्तियों की महानता या क्षुद्रता से बड़ी यह संस्था है । उदाहरण के रूप में उन्होंने बताया कि लिंकन ने अमेरिका को संस्थापकों की कल्पना से भी आगे बढ़कर आजादी दी, रूजवेल्ट ने न्यायसंगत बनाया और केनेडी ने परिपक्व अमेरिका को युवा आवेग से संयुक्त किया । ट्रम्प की अगर चली तो अमेरिका अपना सब हासिल गंवा देगा और अगर उनके विरोधियों की चली तो अधिक मानवीय बनकर उभरेगा ।

2018 में हेनरी होल्ट ऐंड कंपनी से माइकेल वोल्फ़ की किताबफ़ायर ऐंड फ़्यूरी: इनसाइड द ट्रम्प ह्वाइट हाउसका प्रकाशन हुआ । छपते ही यह किताब चर्चित हो गई क्योंकि ट्रम्प का अमेरिका में राष्ट्रपति चुना जाना आश्चर्यजनक घटना है । इस चुनाव के बाद लगातार उन्हें एक परिघटना की तरह समझने की कोशिश की जा रही है । इसका कारण यह भी है कि पूरी दुनिया में ऐसे नेताओं की बाढ़ आई है जो न केवल दक्षिणपंथी हैं बल्कि एक हद तक लोकप्रिय भी हैं । किताब में ट्रम्प के चुनाव के बाद राष्ट्रपति निवास की अंदरूनी राजनीति की खोजी पत्रकार की नजर से तमाम तरह की गतिविधियों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया गया है । इसमें ट्रम्प की स्वभावगत अस्थिरता का खुलासा किया गया है ।

2018 में रटलेज से हेनरी ए गीरू की किताबद पब्लिक इन पेरिल: ट्रम्प ऐंड द मीनेस आफ़ अमेरिकन आथरिटेरियनिज्मका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि अमेरिका में लोकतंत्र पर हमला लम्बे समय से जारी है और हालात ऐसे मोड़ पर पहुंच गए हैं जहां लोगों को लोकतंत्र के समर्थकों और विरोधियों के बीच चुनाव करना होगा । उन्हें लगता है कि ट्रम्प के फ़ासीवादी या हिलेरी के वाल स्ट्रीट का दलाल होने पर बहस असली सवालों को दरकिनार करने की कोशिश है । असली सवाल यह है कि अमेरिका में तानाशाही कायम होने से रोकने के लिए क्या करना होगा तथा लोकतांत्रिक शासन को सक्षम बनाने के लिए जरूरी नागरिक साहस और जुझारू उम्मीद कैसे पैदा की जाये । इसी साल सिटी लाइट्स बुक्स से उनकी ही किताब अमेरिकन नाइटमेयर: फ़ेसिंग द चैलेन्ज आफ़ फ़ासिज्मका प्रकाशन जार्ज यान्सी की प्रस्तावना के साथ हुआ । इसमें यान्सी का कहना है कि गीरू की यह किताब ऐसे समय प्रकाशित हुई है जब अमेरिका का नाजुक लोकतांत्रिक प्रयोग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के चरित्र, विचारधारा, निर्णय, बोलचाल, बड़बोलेपन और व्यक्तित्व में साकार नव फ़ासीवाद के उभार से खतरे में पड़ गया है । उनका सत्ता में बने रहना सचमुच दु:स्वप्न हो गया है लेकिन यह कोई सपना नहीं ठोस सचाई है । गीरू ने इस किताब में सार्वजनिक बौद्धिक की भूमिका निभाई है । दुखद रूप से अमेरिका के गोरे लोगों के एक हिस्से में निराशा इतनी गहरी है तथा नस्ली रूप से भिन्न और परदेशी के प्रति नफ़रत इतनी मजबूत है कि उसने अपनी आत्मा गिरवी रख दी है । ट्रम्प का नारा तो अमेरिका को फिर से महान बनाने का है लेकिन उसकी आड़ में उन्हें इसे फिर से कुछ ही गोरे लोगों की जागीर बनाना है । वे ऐसे देश और समाज का सपना बेच रहे हैं जिसमें नस्ली तौर पर विशुद्ध गोरे लोगों को विशेषाधिकार हासिल हों और शेष लोग कष्ट उठाएं । उनका राष्ट्रवाद गोरेपन की विशुद्धता की विचारधारा पर टिका हुआ है जिसके मुताबिक गोरों के इस देश में से अवांछित लोगों को बाहर निकालकर इसे फिर से शुद्ध करना होगा । देश की सीमा केवल नार्वे से आने वाले गोरों के लिए खुली होगी । गीरू की नजर में सामाजिक अन्याय के अतीत से मौजूद होने के कारण उसका दीर्घकालीन समाधान तो जरूरी है ही उसका विरोध तात्कालिक आवश्यकता भी है । इसके लिए प्रतिबद्धता चाहिए और जब प्रभुत्वशाली ताकतें आलोचनात्मक विवेक को मिटा देने पर आमादा हों तो प्रतिबद्धता खतरनाक भी हो जाती है । फिर भी गीरू खतरा उठाते हैं क्योंकि उन्हें समय नैतिक आपत्ति का महसूस होता है । जिस दु:स्वप्न की कल्पना की जाती थी वह आन पड़ा है । यदि हम राजनीतिक और समाजार्थिक रूप से हाशिए पर खड़े और उत्पीड़ित लोगों की ओर से लड़ने के लिए व्यापक एकजुटता निर्मित करने की जगह खामोश और लकवाग्रस्त रहे तो जो भी सकारात्मक है वह सब समाप्त हो जाएगा । विवेक से दुश्मनी राजनीतिक जीवन में ट्रम्प की विशेषता के रूप में प्रकट हुआ है ।

2018 में पब्लिकअफ़ेयर्स से मार्क लासवेल के संपादन में फ़ाइट फ़ार लिबर्टी: डिफ़ेन्डिंग डेमोक्रेसी इन द एज आफ़ ट्रम्पका प्रकाशन हुआ । किताब रिन्यू डेमोक्रेसी इनीशिएटिव के तहत छपी है इस पहल की शुरुआत 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुई तीन दोस्तों ने इस पर सोचा कि राजनीतिक संवाद के पतन, बुनियादी संस्थाओं में विश्वास की कमी और विशेषज्ञों को कुलीन कहकर खारिज करने तथा राजनीतिक तानाशाही और चरमपंथ के उभार को देखते हुए कुछ किया जाए ये प्रवृत्तियां तो चुनाव के बाद पैदा हुईं और ही अमेरिका तक सीमित थीं जल्दी ही उनकी चिन्ताओं में अन्य लोग भी शरीक होते गए इन लोगों ने लेखकों, कूटनीतिज्ञों, राजनेताओं, कलाकारों, अभिनेताओं, व्यवसायियों, शिक्षकों, वकीलों, नोबेल सम्मनितों और शतरंज विजेताओं को लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की रक्षा के लिए एकत्र किया इनकी सहमति के चलते व्यावहारिक कदम उठाने का सवाल उठा इस कदम के रूप में यह पहलकदमी शुरू की गई  

2019 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से कुर्ट वीलैंड और राउल एल माद्रिद के संपादन में ह्वेन डेमोक्रेसी ट्रम्प्स पापुलिज्म: यूरोपीयन ऐंड लैटिन अमेरिकन लेसन्स फ़ार द यूनाइटेड स्टेट्सका प्रकाशन हुआ । संपादकों की भूमिका और उपसंहार के अतिरिक्त किताब में पांच लेख संकलित हैं । प्रस्तावना अन्ना ग्रिमाला-बुसे ने लिखी है । उनका कहना है कि ट्रम्प की जीत के बाद वाइमर जर्मनी और फ़ासीवाद से हालात की तुलना होने लगी है । ढेर सारी किताबों में लोकतंत्र के खात्मे की बात कही गई है । इसके लिए हिंसक नस्ली और लैंगिक भाषा के इस्तेमाल का हवाला दिया गया । वर्तमान राष्ट्रपति की ओर से मीडिया, विपक्ष और समाज के हाशिए के समुदायों पर हमले को भी इसका ही लक्षण माना गया । बीसवीं सदी में दुनिया के कई इलाकों में फ़ासीवाद के साथ इस तरह की प्रक्रिया चली है इसलिए तुलना करने में आसानी हुई । इसके बरक्स अमेरिकी राजनीति के अध्येताओं का मानना है कि ट्रम्प को वही मत मिले हैं जो रिपब्लिकन पार्टी को आम तौर पर मिलते रहे हैं । दूसरी ओर वे अमेरिकी शासन की संघीयता पर भी भरोसा करते हैं । इसमें राष्ट्रपति के अधिकारों पर तमाम किस्म की कारगर रोकथाम लगी हुई है । इन दोनों मतों के बीच के अंतर को समझना इस किताब का घोषित उद्देश्य है । इसमें उदारपंथी लोकतंत्र के भविष्य के बारे में चिंता तो है लेकिन साथ ही शक्तियों के पृथक्करण, राजनीतिक पार्टियों और औपचारिक संस्थाओं की स्थिरता और मतदाताओं के बहुमत में ट्रम्प विरोध पर भरोसा भी जताया गया है । साथ ही किसी आर्थिक या अंतर्राष्ट्रीय संकट के न होने से भी लोकतंत्र पर खतरे से इनकार किया गया है ।         

2019 में हार्परवन से पीटर वेहनेर की किताब द डेथ आफ़ पोलिटिक्स: हाउ टु हील आवर फ़्रेड रिपब्लिक आफ़्टर ट्रम्पका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि राजनीति के बारे में बहुत खराब धारणा बना ली गई है । इस धारणा के विपरीत लेखक ने उसमें भरोसा पैदा करने के मकसद से यह किताब लिखी है । तमाम उम्र राजनीति में बिताने के बावजूद यह बात उन्हें अपने आपको भी याद दिलानी पड़ी है । प्रशासन के साथ लम्बे जुड़ाव के चलते उन्हें ट्रम्प का शासन अमेरिका के लिए आफत प्रतीत हो रहा है । ऐसे माहौल में भय, चिंता, गहन निराशा और गुस्से से बाहर आना मुश्किल लग रहा है । दोनों ही पार्टियों में राजनीतिक नेतृत्व का अकाल नजर आ रहा है । सर्वोच्च पद पर ऐसा आदमी बैठा हुआ है जिसमें किसी छोटे से शहर का मेयर बनने की भी बौद्धिक और नैतिक क्षमता नहीं है । लोग वर्तमान स्थिति को लगभग स्थायी मान चुके हैं लेकिन लेखक का आग्रह है कि अमेरिकी राजनीति का उसके सबसे बुरे समय के आधार पर मूल्यांकन नहीं करना चाहिए । इस बुरे समय में ही राजनीति में निहित सम्भावना का भी ख्याल रखना उचित होगा ।   

2019 में आल प्वाइंट्स बुक्स से एलेन साल्किन और आरों शार्ट की किताब द मेथड टु द मैडनेस: डोनाल्ड ट्रम्पस एसेन्ट ऐज टोल्ड बाइ दोज हू वेयर हायर्ड, फ़ायर्ड, इन्सपायर्ड- ऐंड इनागुरेटेडका प्रकाशन हुआ । किताब को में ढेर सारे लोगों की सहायता ली गई है । लेखक के अनुसार ट्रम्प ने पंद्रह साल तक राजनीतिक दुनिया में प्रवेश पाने की कोशिश की । राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी होने से पहले उसने विस्तार से योजना बनाई । अक्सर लोगों को इस बात पर विश्वास नहीं होता । वे उसे राजनीतिक रूप से अज्ञानी समझते हैं । लेकिन ट्रम्प ने काफी सीखा । लोगों का ध्यान आकर्षित करना, अराजकता के भीतर भी अपने लक्ष्य को न भूलना, मीडिया के इस्तेमाल और जीत की रणनीति अपना लेने के मामले में उसका कोई जोड़ नहीं । उसकी योजनाबद्धता का सबूत ढेर सारी कार्यवाहियां हैं । आप्रवासियों के विरोध में माहौल बनाकर मेक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ी करने तक बात गई । लेखकों ने इस पहलू की छानबीन के लिए उसके राजनीतिक प्रयासों को शुरू से देखा है । सबसे पहले 2000 में रिफ़ार्म पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ना चाहा और 2014 में न्यू यार्क का गवर्नर बनना चाहा । ये मौके थे जिनका लाभ भविष्य की लड़ाई के लिए उठाया गया ।        

2019 में सिमोन & शूस्टर से जूली हिर्शफ़ेल्ड डेविस और माइकेल डी शीयर की किताब ‘बार्डर वार्स: इनसाइड ट्रम्प’स एसाल्ट आन इमिग्रेशन’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने किताब की शुरुआत 2018 की चार दिसम्बर से की है जब ट्रम्प ने आंतरिक सुरक्षा मंत्री से सीमा पर दीवार की बात शुरू की । इसमें अचरज की कोई बात न थी क्योंकि किसी भी बैठक में ट्रम्प दीवार खड़ा करने का मुद्दा जरूर उठाते रहे थे । उनके दिमाग में सीमा पर दीवार खड़ी करना उनके राष्ट्रपति होने की सफलता से जुड़ा हुआ था । वे उसका भौतिक अस्तित्व देखने के लिए बच्चों की तरह बेचैन थे । उसे वे चुनाव अभियान के दौरान सीमेंट की बनवाने का खयाल करते थे । जीतने के बाद स्टील के पत्तर से उसे बनाने की बात करने लगे क्योंकि सीमेंट की दीवार के दूसरी ओर कुछ नजर नहीं आयेगा और उसमें सूराख करना आसान होगा । किसी ने उनसे कहा कि इन पत्तरों को आपस में जोड़ने के लिए ऊपर कुछ मजबूत रखना होगा तो ट्रम्प को लगा कि लोग रस्सी फंसाकर चले आयेंगे । ट्रम्प को दीवार की विस्तार से चर्चा करने की आदत पड़ चुकी थी । मंत्री ने उन्हें दीवार की जमीन के मालिकों की अनुमति हासिल करने की दिक्कत से अवगत कराना चाहा । इसे दरकिनार करते हुए ट्रम्प ने काम चालू करने की हिदायत दी । वे इसके साथ गहरी खाई भी खुदवाना चाहते थे । वे किसी भी प्रवासी के लिए अमेरिका में प्रवेश करना असम्भव बना देना चाहते थे । अगर वे दीवार फांदने की कोशिश करें तो उनके बदन जख्मी कर देने के इंतजाम करना उन्हें आकर्षित करता था । ऐसे लोगों को ट्रम्प अपराधी समझते थे इसलिए उनके साथ किसी भी क्रूर आचरण से उन्हें परहेज नहीं था । उनकी कल्पना से उनके सहयोगी भी डर जाते थे । उनकी इस मनोग्रस्ति के पीछे अमेरिकी और अन्य के बीच गहरे विभाजन की सोच काम करती थी । इसी सोच के साथ उन्होंने ओबामा के जन्मस्थान का सवाल उठाया था । इसे खास किस्म का नस्लवाद कहा जा सकता है जिसमें देशी की प्राथमिकता के भरोसे के साथ परदेशी के प्रति नफ़रत पैदा करने की भावनात्मक सामर्थ्य थी ।           

2019 में आल प्वाइंट्स बुक्स से राबी सोआवे की किताब ‘पैनिक अटैक: यंग रैडिकल्स इन द एज आफ़ ट्रम्प’ का प्रकाशन हुआ । लेखक मिशिगन विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के अखबार की सहायक संपादक हैं । ओबामा की जीत के समय का माहौल अधिकतर विद्यार्थियों को जीवन का सबसे महत्व का लगा था । आठ साल बाद ट्रम्प की जीत पर विद्यार्थियों ने आंसू बहाये । वे दुखी थे और अगले दिन की कक्षाओं में नहीं गये । दूसरे दिन से विरोध प्रदर्शनों की शुरुआत हुई तो तमाम परिसरों में विरोध का तांता लगा रहा । ट्रम्प की इस जीत को अधिकांश शिक्षा संस्थानों ने एक किस्म का हमला समझा । 11 सितम्बर की घटना के बाद सचेत हुए युवकों के लिए ट्रम्प की जीत उनकी चेतना को आकार देनेवाला मौका साबित हुई । इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि इस धक्के से वे खामोश होकर बैठ गये । इसके मुकाबले शिक्षा संस्थानों और अन्य जगहों पर वाम सक्रियता में आशातीत उभार आया । इस सक्रियता की जड़ अकुपाई आंदोलन में खोजना होगा जिसमें आर्थिक विषमता का सुसंगत विरोध हुआ था । इन कार्यकर्ताओं का प्रभाव शिक्षा परिसरों में केंद्रित तो है लेकिन वहीं तक सीमित नहीं है । ये कार्यकर्ता ही डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर सांडर्स के उभार की प्रमुख वजह हैं । इन्हें पता है कि ट्रम्प की हार उनकी लड़ाई का महज पहला कदम होने जा रही है । इन कार्यकर्ताओं में पहले की पीढ़ियों के जुझारू लोगों और उनके संघर्ष की कहानियों के साथ उन लड़ाइयों की प्रेरणा भी मौजूद है ।      

2019 में सिटी लाइट्स बुक्स से नोलान हिगडन और मिकी हफ़ की किताब ‘यूनाइटेड स्टेट्स आफ़ डिसट्रैक्शन: मीडिया मैनिपुलेशन इन पोस्ट-ट्रुथ अमेरिका (ऐंड ह्वाट कैन वी डू एबाउट इट)’ का प्रकाशन हुआ । राल्फ नादेर ने इसकी प्रस्तावना लिखी है । उनका कहना है कि बहुमत पर अल्पमत के नियंत्रण की शुरुआत से ही भ्रामक सूचना, झूठ और ध्यान भटकाने का उपयोग सहमति, समर्पण और प्रभुत्व कायम करने के लिए किया जाता रहा है । इस तरह के किसी भी नियंत्रण के चलते नुकसान सामन्य लोगों के यथार्थ, जरूरत, मांग और शिकायत को स्वर देने की उनकी क्षमता का हुआ है । अपने अंतर्निहित परिणामवाद के चलते उत्पीड़ित लोगों ने अक्सर सोचने की बजाय यकीन कर लिया, विरोध करने की जगह मंजूर कर लिया । अमीरों के पक्ष में झुके राजनीतिक अर्थशास्त्र ने फिर से आज वही राह पकड़ी है ताकि जन संचार, शिक्षा और ज्ञान तथा स्मृति के उत्पादन पर कारपोरेट घरानों का प्रभुत्व कायम हो सके । इसके बावजूद मानव इतिहास में स्वप्नदर्शी, विद्रोही बौद्धिक, कवि, कलाकार, चिंतक और दार्शनिक भी पैदा होते रहे हैं । फिर भी ऊपर से नियंत्रण कायम करने में सबसे बड़ी सफलता तब मिलती है जब लोग खुद ही अपने आपको काबू करने लगते हैं । यही बात व्यापक निगरानी के बारे में कही जा सकती है । तमाम किस्म के व्यावसायिक जनसंचार साधनों का उपयोग करते हुए उपभोक्ता अपने बारे में निजी सूचना साझा करते हैं और इस तरह तानाशाही और निगरानी की व्यवस्था में सहमति के साथ शामिल हो जाते हैं । नतीजा यह कि समूची आबादी तथ्य विमुख और अतिमनोरंजित हो जाती है । उनकी अपेक्षा और ध्यान देने की अवधि घटती जाती है । तकनीक आधारित बदलावों ने नागरिक के रूप में उनके अधिकारों से जनता का ध्यान भटका दिया है । लेखकों का मानना है कि ट्रम्प इसी व्यापक कारपोरेट व्यावसायिकता की पैदाइश हैं । समाचारों के कार्यक्रम भी दर्शक संख्या से तय होने लगे हैं । स्वाभाविक है कि गम्भीर रपटों की जगह मनोरंजन, सनसनी, अपराध, तमाशे और दिखावट ने ले ली है । मीडिया का यह मारक पतन चौतरफा है । किशोरों के स्वाद पर आक्रमण करके इसने बच्चों में मोटापे और तज्जनित बीमारियों को जन्म दिया है । बड़े कारपोरेट घरानों के विज्ञापन इस मीडिया को संचालित करते हैं और इस काम को देखने के लिए कोई सरकारी संस्था प्रभावी नहीं रह गयी है । इन कारपोरेट घरानों ने सैकड़ों अखबारों, टेलीविजन और रेडियो स्टेशनों को खरीद लिया है । वे गम्भीर रिपोर्ट, खोजी पत्रकारिता, शिक्षा से जुड़ी सामग्री और स्थानीय कार्यक्रमों में कटौती कर रहे हैं । पत्रिकाओं की जगह समाप्त होती जा रही है । सोशल मीडिया में ऐसी सामग्री की कोई जगह नहीं होती । इसके चलते युवा समुदाय अशिक्षित होता जा रहा है । वे देखते अधिक, पढ़ते कम हैं । प्रचार की सुविधा विस्तारित होने के बावजूद सभाओं, जुलूसों, रैलियों और विरोध प्रदर्शनों में लोगों की आमद घटती जा रही है । यही वातावरण ट्रम्पशाही को बनाये रखने में मदद करता है ।

2019 में रटलेज से माइक कोल की किताब ‘ट्रम्प, द अल्ट-राइट ऐंड पब्लिक पेडागागीज आफ़ हेट ऐंड फ़ार फ़ासिज्म: ह्वाट इज टु बी डन?’ का प्रकाशन हुआ । किताब की शुरुआत ही ट्रम्प की अविश्वसनीय जीत से होती है उनके पहले अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति रहे थे उन्होंने अपने कार्यकाल में नवउदारवादी पूंजीवाद की क्रूरता पर अंकुश लगाने के मामले में कुछ भी नहीं किया था अमेरिकी साम्राज्यवादी विस्तार का काम भी उनके समय पूर्ववत जारी रहा था फिर भी ट्रम्प के आते ही नरक की यात्रा बेधड़क शुरू हुई और उसका वेग प्रचंड हो गया । यहां तक कि फ़ासीवाद की दिशा में भी यह देश जाता महसूस हुआ । जैसे जैसे उनके समर्थक आधार की जानकारी स्पष्ट हुई पता चला कि शासक वर्ग के कुछ हिस्सों का उन्हें साथ मिला है जिनका नाता चरम दक्षिणपंथी ताकतों से है । उनमें कुछ शिक्षा जगत से भी जुड़े हैं । इसलिए किताब में देखने की चेष्टा है कि शिक्षा के सहारे नफ़रत और चरम दक्षिणपंथ की विचारधारा का प्रसार किस तरह होता है । असल में लेखक हमेशा से सांस्थानिक शिक्षा के सहारे समता को प्रोत्साहित करने के हिमायती रहे हैं और यह भी मानते रहे हैं कि शिक्षा की भूमिका संस्थानों के बाहर भी होती है । इसे वे जन शिक्षण समझते थे लेकिन ट्रम्प के चुनाव अभियान को देखकर उन्हें लगा कि यह भी एक किस्म का जन शिक्षण ही है जिसमें पर्याप्त जोरदारी, नियमितता, क्रोध, उत्साह और भयंकर उन्माद के साथ ट्रम्प अपने विचारों को सम्प्रेषित कर रहे हैं । इसमें नस्लवाद, स्त्रीद्वेष, जलवायु परिवर्तन के बारे में झूठ तथा विकलांगता की खिल्ली उड़ाने की कला में व्यापक जनता को शिक्षित किया जा रहा था । न केवल इतना बल्कि फ़ासिस्ट धारणा वाले व्यक्तियों और समूहों के विचारों को वैधता भी प्रदान की जा रही थी । इनमें से कुछ समूह तो बाकायदे औपचारिक शिक्षा संस्थानों के बाहर जन शिक्षण का काम करते हैं । शिक्षा के क्षेत्र में जो धारणा सामाजिक न्याय के प्रोत्साहन के लिए इस्तेमाल की जाती थी और जिसे नवउदार पूंजीवाद के विरोध में प्रति प्रभुत्व बनाने का औजार होना था उसी धारणा के सहारे हम ट्रम्प के गहन प्रतिक्रियावादी जन शिक्षण को भी समझ सकते हैं जो विषमता बढ़ाने और सामाजिक न्याय को समाप्त करने की दिशा में संचालित परियोजना है ।        

2019 में कार्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस से जास्मीन केरेसी, ईव वेइनबाम, क्लेयर हैमंड्स, टाम जुराविच और डान क्लासन के संपादन मेंलेबर इन टाइम आफ़ ट्रम्पका प्रकाशन हुआ । संपादकों की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब के चार भागों में बारह लेख संकलित हैं । पहले भाग में मजदूरों पर हमले के बारे में तीन सिद्धांतों का जिक्र है । दूसरे भाग में अपना एजेन्डा आगे बढ़ाने के दक्षिणपंथी तरीकों के बारे में विचार किया गया है । तीसरे भाग में चुनौतियों और सम्भावित संश्रयों की जांच परख की गयी है । आखिरी चौथे भाग के लेख मजदूरों की रणनीतियों और उनकी प्रतिक्रिया की छानबीन करते हैं । संपादकों का कहना है कि दस साल से श्रमिक आंदोलन को अप्रासंगिक कहा जा रहा था लेकिन किताब के प्रकाशन के समय फिर से उस पर चर्चा होने लगी है । एक ओर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक उद्योगों में यूनियनों की भूमिका के लिए खतरनाक रुख अपनाया, निजी क्षेत्र में यूनियनें लगभग खत्म हो गयीं, राजनीतिक अभियान में कारपोरेट की आर्थिक सहायता को मान्यता मिलने से यूनियनों का राजनीतिक असर घटा वहीं दूसरी ओर अध्यापकों ने पूरे अमेरिका में हड़ताल की और जीत हासिल की, 15 डालर प्रति घंटे मजदूरी के लिए लड़कर वेतन में मजदूरों ने पर्याप्त बढ़ोत्तरी करायी । युवा मजदूरों में यूनियनों के सदस्य बहुत बने । मजदूरों को संगठित करने के नये तरीकों को ईजाद किया गया । इसका परिणाम 2018 के चुनावों में नजर आया जब बहुतेरे यूनियन विरोधी रिपब्लिकन नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा । मजदूरों की मांगों को आम जनता का समर्थन भी पहले से अधिक मिल रहा है । असल में ट्रम्प की चुनावी जीत ने सोये मजदूरों को जगा दिया और उनकी मजदूर विरोधी नीतियों ने नयी हलचल पैदा कर दी । इस प्रसंग में संपादकों ने बताना जरूरी समझा कि ट्रम्प ने वैश्वीकरण का विरोध किया, कहा कि नुकसानदेह व्यापार समझौतों से अमेरिका को बाहर करेगा और निर्माण तथा खनन श्रमिकों की रक्षा करेगा । उसने संरचना में भारी निवेश से रोजगार पैदा करने का झांसा दिया । उसने सामाजिक सुरक्षा को बरकरार रखने, सेहत का खर्च उठाने और टैक्स सुधार से कामगार परिवारों को राहत देने की बातें कीं । इससे मजदूरों में उसके प्रति आकर्षण पैदा हुआ था । उसके वादों का कुछ यूनियनों ने समर्थन भी किया था । शपथ ग्रहण के बाद कुछ यूनियनों के नेता उससे मिले और साथ काम करने का भरोसा दिलाया । लेकिन थोड़े दिनों बाद ही ट्रम्प की आर्थिक नीतियों का कारपोरेट परस्त चेहरा उजागर होने लगा ।              

2020 में पालग्रेव मैकमिलन से मार्को मोरिनी की किताब ‘लेसंस फ़्राम ट्रम्प’स पोलिटिकल कम्युनिकेशन: हाउ टु डामिनेट द मीडिया एनवाइरनमेन्ट’ का प्रकाशन हुआ । किताब में ट्रम्प के चुनावी प्रत्याशी और जीतने के बाद दो साल के कार्यकाल में उनके राजनीतिक संप्रेषण का अध्ययन किया गया है । माना गया है कि पांच उपायों के सहारे वे मीडिया पर प्रभुत्व बनाए हुए हैं । लेखक का कहना है कि पहले प्रत्याशी के रूप में और बाद में राष्ट्रपति के रूप में ट्रम्प ने सीधे जनता से सम्प्रेषण का महत्व समझा । सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति होने के बावजूद ट्रम्प ने सोशल मीडिया का दुलारा होने में सफलता प्राप्त की । सभी माध्यमों को धता बताते हुए उन्होंने ट्वीट के जरिये जनता से संवाद का रास्ता अपनाया । ट्वीट के 140 वर्ण अमेरिका में राजनीति के ढंग ढर्रे को बदल रहे हैं । जून 2015 में प्रत्याशी होने की घोषणा के बाद से उनके सम्प्रेषण में कोई बदलाव नहीं आया । पार्टी के भीतर अन्य प्रत्याशियों को पराजित करने के बाद हिलेरी के विरोध में चुनाव प्रचार और फिर 2018 के मध्यावधि चुनाव तक वे लगातार प्रचार अभियान में मुब्तिला रहे । राजनीतिक विरोधियों, नागरिक समाज और मीडिया तथा पत्रकारों पर उनका हमला जारी रहा । पद ग्रहण करने के दूसरे दिन से ही उन्होंने आगामी चुनाव के लिए चंदा उगाही शुरू कर दी । राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने दूसरी बार प्रत्याशी बनने का दावा पेश कर दिया था । नौटंकीबाजी को उन्होंने अपनी प्रचार शैली का अंग बना लिया और इसके जरिये निरंतर चर्चा में बने रहने में कामयाब हुए । तर्क पर भावना को और चिंतन पर नारों को तरजीह देने की शैली उन्होंने विकसित कर ली । भावना ने नेता और श्रोता के बीच एक मजबूत रिश्ता बना लिया । उनके चुटकुलों और फुलझड़ियों ने उनकी कुलीन विरोधी छवि बनायी । टेलीविजन से जुड़े ट्रम्प के अनुभवों ने उनके सम्प्रेषण को इतना प्रदर्शनकारी बना दिया कि उसने उनके भांति भांति के समर्थकों को आपस में जोड़ने का काम किया । युद्ध, लड़ाई, शुद्धता और राक्षसीकरण के मुहावरे की व्याप्ति ने पाशविक भाषा और क्रूरता की संस्कृति को आम चलन में ला दिया । भय, हिंसा और तनाव रोज ब रोज की बातचीत का हिस्सा बनते गये । शासन ने अपने कामों को ऐतिहासिक, सर्वोत्तम और अतुलनीय बताना शुरू किया । जनप्रिय लफ़्फ़ाजी उनके सम्प्रेषण का अविभाज्य अंग थी । अमेरिकी पत्रकारिता की वर्तमान कमजोरियों के चलते ट्रम्प की इन चालों ने जबर्दस्त कामयाबी हासिल कर ली । पारम्परिक मीडिया के समक्ष तकनीक की चुनौती तो है ही, सोशल मीडिया के आगमन ने और भी मुश्किल पैदा कर दी है । पत्रकारों में रोजगार को लेकर असुरक्षा बढ़ी है और खबर का स्रोत समाचार एजेंसियां रह गयी हैं । 24 घंटे के खबरिया चैनलों की आपसी होड़ ने सब कुछ को समाचार मानने की मजबूरी पैदा की है । ट्रम्प इन हालात को अच्छी तरह जानते हैं इसलिए आक्रामक और विचित्र बरताव के सहारे वे लगातार चर्चा में बने रहते हैं ।        

2020 में रिवरहेड बुक्स से माशा गेस्सेन की किताब ‘सर्वाइविंग आटोक्रेसी’ का प्रकाशन हुआ । इसमें बात यहां से शुरू की गई है कि जब ट्रम्प ने कोरोना के बारे में देश को संबोधित किया उससे पहले ही इस राष्ट्रपति के बारे में जनता को बहुत कुछ पता था । प्रशासन के नाम पर उसके पास भंगिमा, गोपन और झूठ, आत्मरति, भयादोहन और धौंस धमकी के सिवा कुछ नहीं है । बार बार उसने कोरोना को मामूली बुखार या फिर हौवा करार दिया । दो महीना पहले ही चीन ने उसकी आनुवंशिकी सार्वजनिक तौर पर मुहैया करा दिया था । अमेरिका ने कोई तैयारी नहीं की थी । मरीजों की आमद से निपटने को अस्पताल तैयार नहीं किये गये । सुरक्षा उपकरणों की कमी हो गयी । जरूरी सूचना छिपायी गयी । जब संक्रमण तेजी से फैलने लगा तो ट्रम्प को हारकर टेलीविजन से जनता को बताना पड़ा । इस मामले में भी उसने नाटक किया । यूरोप से हवाई यात्रा पर रोक लगाकर हल्ला मचाया कि तेजी से कार्यवाही की गयी है । दावा किया कि यूरोपीय देशों के मुकाबले इस महामारी से अमेरिका बेहतर तरीके से निपट रहा है इसमें से कुछ भी सच नहीं था आखिरकार उसने इसे विदेशी विषाणु कहा और पहले यूरोप, फिर चीन के ऊपर उसके प्रसार का आरोप लगाया इससे अमेरिका में रहनेवाले एशियाइयों के विरोध में नफ़रती माहौल बना उस दिन वे लिखित वक्तव्य सुना रहे थे इसलिए उसमें बेवकूफ़ी कम थी कुछ ही समय बाद वे अपनी असली गति में लौट आये तैयारी के हालात खराब होने की जिम्मेदारी लेने से उन्होंने इनकार कर दिया अलग अलग प्रांतों के शासकों पर सब कुछ छोड़ दिया खुद फर्ज़ी दावे करने तक सीमित रहे संचार माध्यमों में उनकी जैजै कार होती रही लोग अस्पतालों में मर रहे थे लेकिन ट्रम्प के भक्त उनकी नीतियों की खूबी बखान रहे थे उनके रुख में मानव जीवन के प्रति घनघोर उपेक्षा नजर आयी लेकिन उनके समर्थक अपने नेता के स्फीत अह को तुष्ट करने में मशगूल रहे         

2020 में वाइकिंग से डेविड प्लूफ़ की किताब सिटिज़ेन गाइड टु बीटिंग डोनाल्ड ट्रम्पका प्रकाशन हुआ लेखक ने ट्रम्प के चुने जाने के क्षण को याद दिलाया है जब अमेरिका के लोगों को पता चला कि नस्ली, स्त्रीद्वेषी, यौन हमलों का सिद्ध अपराधी, धोखेबाज व्यवसायी और न्याय में बाधा डालने वाला व्यक्ति देश और दुनिया में उनका प्रतिनिधित्व करने वाला है । उन्हें उम्मीद है कि नागरिकों की वह शर्म आज तो और भी गहरा गई होगी । उसे आगामी चार साल न झेलने के इरादे से लेखक ने यह किताब लिखी है । उनका कहना है कि ओबामा की जीत से अधिक उत्तेजना का अनुभव उन्हें ट्रम्प की जीत से हुआ था । ओबामा की उस जीत की उत्तेजना इतनी गहरी न थी कि बाद में उसे टेलीविजन पर फिर से देखने की इच्छा हो लेकिन ट्रम्प की जीत का धक्का इतना गहरा था कि उस पर यकीन करने में उन्हें बहुत समय लगा ।    

2020 में स्क्रिबनेर से ग्लेन केसलर, सल्वाडोर रिज़ो और मेग केली की किताब ‘डोनाल्ड ट्रम्प ऐंड हिज एसाल्ट आन ट्रुथ: द प्रेसिडेन्ट’स फ़ाल्सहुड्स, मिसलीडिंग क्लेम्स, ऐंड फ़्लैट-आउट लाइज’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों का कहना है कि राजनीति और कूटनीति से जुड़े होने के चलते प्रत्येक राष्ट्रपति झूठ बोलता है । कभी कभी उन्हें ऐसा करना देश के हित में महसूस होता है । संवेदनशील कामों से जुड़ी सूचना से जनता को होनेवाले नुकसान से बचाने के लिए भी झूठ बोला जाता है । कभी ऐसा शुभेच्छा के कारण भी होता है ।    

2020 में वर्सो से पैट्रिक काकबर्न की किताब ‘वार इन द एज आफ़ ट्रम्प: द डिफ़ीट आफ़ आइ एस आइ एस, द फ़ाल आफ़ द कुर्द्स, द कनफ़्लिक्ट विथ ईरान’ का प्रकाशन हुआ । इसी साल अमेरिका में इसका प्रकाशन आर बुक्स से हुआ किताब में ट्रम्प की जीत के बाद के तीन सालों का विवेचन है इसमें ईरान के साथ टकराव, आइसिस की पराजय और कुर्दों की वादाखिलाफ़ी की दास्तान सुनाई गयी है ट्रम्प की जीत जब हुई तो इराक के मोसुल शहर की घेरेबंदी को नौ महीने पूरे हुए थे इसी लड़ाई ने आइसिस को हराया वहां से शुरू होकर इराक में कासिम सुलेमानी की ड्रोन से हत्या तक की घटनाओं की जांच परख इस किताब में है    

2020 में क्राउन से नार्मन आइजेन की किताब ‘ए केस फ़ार द अमेरिकन पीपुल: द यूनाइटेड स्टेट्स वर्सस डोनाल्ड जे ट्रम्प’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का संबंध कानून और अदालत से है इसलिए उसी लहजे में उन्होंने ट्रम्प के अपराधों को अमेरिकी जनता के समक्ष पेश किया है ताकि वे फैसला सुना सकें । जनता को ही वे गवाह, पीड़ित और जज तथा वकील कहते हैं । जनता ही इस अपराधी को रोक सकती है या उसके अपराधों को जारी रहने दे सकती है । संविधान में मौजूद सारे उपाय पिछले चार सालों में आजमाये गये । कुछ रोक लगी लेकिन अधिकांश विफल रहे । इस साल आखिरी फैसला जनता को ही सुनाना पड़ा । खुद ट्रम्प, उनके प्रशासन और उनके सहयोगियों के विरोध में लगभग तीन सौ मामले अदालतों में दायर हुए । फिर महाभियोग की कार्यवाही चली । इन सबके साथ लेखक का जुड़ाव रहा । जो कुछ इस व्यक्ति ने किया वह उसकी आदत का हिस्सा रहा है । देश की सत्ता का घनघोर दुरुपयोग और फिर अपने कारनामों पर परदा डालना इस व्यक्ति का इतिहास रहा है । पद पर रहते हुए इस व्यक्ति ने अपने व्यवसाय के लिए सब कुछ किया । लेखक को अपने लम्बे अनुभव के आधार पर यकीन है कि भविष्य में मौका मिलने पर यह व्यक्ति अपने आचरण में कोई बदलाव नहीं करेगा ।      

2020 में ह्यूटन मिफ़लिन हरकोर्ट से पीटर स्ट्रज़ोक की किताबकम्प्रोमाइज्ड: काउंटरइंटेलिजेन्स ऐंड थ्रेट आफ़ डोनाल्ड जे ट्रम्पका प्रकाशन हुआ किताब में अमेरिकी जासूसी संस्था से हासिल गोपनीय जानकारियों का उपयोग किया गया है इसलिए घटनाओं के वास्तविक होने पर भी व्यक्तियों के नाम बदल दिये गये हैं । लेखक ने ट्रम्प के चुनाव के कुछ ही समय बाद होने वाली एक बैठक से किताब की शुरुआत की है । इस बैठक में ट्रम्प प्रशासन के सभी प्रमुख लोग शामिल थे । सबसे बड़ा सवाल था कि खुद राष्ट्रपति की जांच करना जरूरी लग रहा था । इसके बारे में फैसला लेने के लिए ही बैठक बुलायी गयी थी ।  

2020 में पीटर लैंग से मिम कमाल ओके और हनफ़ी यज़ीची के संपादन मेंअल्ट्रा-नेशनलिस्ट पालिसीज आफ़ ट्रम्प ऐंड रिफ़लेक्शंस इन वर्ल्डका प्रकाशन हुआ किताब में कुल बारह लेख शामिल किये गये हैं संपादकों के अनुसार अमेरिका के जीवन में 11 सितंबर एक नये युग का आरम्भ माना जा सकता है उसके बाद गृह और वैदेशिक मामलों में सुरक्षा सबसे महत्व की बात हो गयी इसकी तार्किक परिणति ट्रम्प का आगमन है यह भी कि जिस बात का असर अमेरिका पर पड़ता है उससे दुनिया का हरेक मुल्क प्रभावित होता है

कुल मिलाकर समझना होगा कि ट्रम्प कोई व्यक्ति नहीं एक पूरी परिघटना हैं । पूंजी के वर्तमान संकट ने जिस तरह की राजनीतिक तानाशाही को जन्म दिया है वह केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है । ऐसे शासक तमाम देशों में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की जगह लेते जा रहे हैं । इन सबमें आपसी घनिष्ठता भी खूब है और सभी एक दूसरे को पसंद करते और सीखते हैं । इन सबके व्यक्तित्व में प्रचंड अहंकार, झूठ बोलना और आपराधिक कारनामों की समानता है । इन सबकी आपसदारी के प्रमाण सबने देखे हैं । इनके समर्थक भी आपस में घुले मिले हैं । उन सबके कारण दुनिया के सामने पूंजीवाद का गर्हित रूप एक बार फिर उजागर हुआ है । साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि इस किस्म के तानाशाह शासकों के उभार को रोकने में विफल रहने के चलते लोकतंत्र को गहराने और विस्तारित करने की आकांक्षा और आंदोलनों का भी पूरी दुनिया में प्रसार हुआ है । असल में नव उदारवाद के बाद मध्यमार्गी राजनीति बहुत कुछ दक्षिणमुखी हो चली थी । इस समय उसका एक हिस्सा दक्षिण के साथ चला गया है तो दूसरी ओर जन पक्षधर वाम आकांक्षाओं का दबाव भी उस पर बहुत अधिक है । इसी खींचतान को सबने ब्रिटेन और अमेरिका में कोरबीन और सांडर्स के उभार के रूप में देखा । इन नेताओं की लोकप्रियता व्यक्तिगत नहीं थी, उसके पीछे वैचारिक झुकाव थे । इन झुकावों का प्रतिफलन मांगों और गोलबंदियों के रूप में प्रकट होना निश्चित है । इस पूरे विवेचन से हम अपने देश की राजनीति के बारे में भी कुछ सीख समझ सकते हैं ।