Sunday, August 13, 2017

साहित्य की पारिस्थितिकी पर खतरा

              
                                           
साहित्य की पारिस्थितिकी आखिर है क्या? इसका सबसे पहला उत्तर किसी के भी दिमाग में यह आता है कि समाज ही साहित्य की पारिस्थितिकी है । लेकिन समाज तो एक अमूर्त धारणा है । वह हमारे सामने विभिन्न संस्थाओं के रूप में आता है । इन संस्थाओं में सत्ता भी शामिल है । स्वाभाविक है कि सत्ता के साथ उसकी आर्थिकी संयुक्त होती है । यह आर्थिकी भी हवा में नहीं बनती वरन किसी विचारधारा के अनुरूप निर्मित होती है । इसके अतिरिक्त आधुनिक काल में छपाई की मुख्यता के चलते तमाम तरह के प्रकाशन संस्थान भी इसका अभिन्न अंग होते हैं । इसके साथ ही साहित्य की रचना का काम करने वाले रचनाकार उसके सबसे जरूरी घटक होते हैं । साहित्य के पाठक तो उसके अनिवार्य अंग हैं ही, साहित्य के साथ जुड़े तमाम संस्थान भी सत्ता द्वारा निर्मित किए गए हैं । इसके साथ ही साहित्य के रचनात्मक स्वरूप के चलते उसके साथ अन्य कला रूप भी जुड़े रहते हैं । शिक्षण संस्थाओं की उपस्थिति भी आज के दौर में कोई कम महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाती । संक्षेप में इन सबसे मिलकर वह वातावरण बनता है जिसके भीतर साहित्य सांस लेता है । इसीलिए साहित्य पर विचार करते हुए इन सबके बारे में बात होना अनावश्यक विषयांतर नहीं माना जाना चाहिए ।          
नब्बे के दशक में जब हमारे देश ने नव उदारवादी आर्थिकी को अपनाने का फैसला किया तो किसी ने नहीं सोचा था कि उसका असर अभिव्यक्ति की आजादी के लिए प्राणलेवा होगा दुनिया के लगभग सभी देशों में इन आर्थिक नीतियों को लागू करने के लिए राजनीतिक तानाशाही का रास्ता अख्तियार किया गया था लेकिन भारत के लिए उसके एक नए रूप को गढ़ने का वादा उस जमाने में किया गया शासन की ओर से कहा गया कि इसे मानवीय चेहरे के साथ लागू किया जाएगा मनरेगा जैसी कथित गरीब समर्थक योजनाओं के चलते ऐसा भ्रम पनपा भी फिर थोड़े ही दिनों बाद परदा खुल गया और हत्यारी सचाई सामने गई
इस लेख के आरम्भ में ही राजनीतिक माहौल की चर्चा थोड़ी अटपटी लग सकती है लेकिन इस पद्धति के लिए मजबूत समर्थन परम्परा के भीतर से ही प्राप्त हो रहा है । अपनेहिंदी साहित्य का इतिहासमें आचार्य शुक्ल ने प्रत्येक काल के शुरू में साहित्यिक पृष्ठभूमि के बतौर तत्कालीन आम माहौल की चर्चा की है और आधुनिक काल में तो खुलकर राजनीतिक वातावरण से साहित्यिक रचनाओं का गहरा संबंध जोड़ा है । दूसरे साहित्य कोई ऐसी परिघटना नहीं है जिसका रिश्ता समाज से न हो । साहित्य की समूची पारिस्थितिकी होती है जिसमें भाषा, अभिव्यक्ति तथा ग्रहणशील समाज और उसकी संस्थाएं शामिल होती हैं । आधुनिक काल में समाज ने राजनीति को प्रमुखता प्रदान कर दी है । साहित्य के साथ राजनीति के रिश्ते के प्रसंग में केवल एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जाएगी । हम सभी जानते हैं कि पिछले कुछ दशकों के दौरान साहित्य की सबसे उत्तेजक परिघटना दलित साहित्य का उभार रही है । इस उभार के साथ राजनीतिक दुनिया की कुछ प्रवृत्तियों के संबंध से शायद ही कोई इनकार कर सकता है । यहां तक कि इस समय जो हिंदुत्ववादी उभार हुआ उसे भी इसी दलित उभार की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है । अब तो सांस्कृतिक कहलाने वाले संगठन भी राजनीतिक काम कर रहे हैं और शुद्ध सांस्कृतिक तत्व प्रबल राजनीतिक अन्तर्य से भर गए हैं । ऐसे में आम राजनीतिक माहौल की चर्चा से बचना ही अनुचित होगा । यह बात भी साफ कर देना जरूरी है कि साहित्य के सभी आयाम समग्र सामाजिक वातावरण का अभिन्न अंग होते हैं ।  
हमारा वर्तमान बिना किसी इतिहास के नहीं होता इसलिए वर्तमान की जड़ तलाशते हुए नब्बे के दशक से बात शुरू करना जायज है । हिंदी साहित्य का समूचा आधुनिक काल उपनिवेशवाद और उससे मुक्ति के लिए चलने वाली लड़ाई की छाया में लिखा गया है । नव उदारवाद भी औपनिवेशिक अर्थतंत्र का हालिया उभार है । जिस तरह अंग्रेजी शासन का देशी आधार जमींदारी थी उसी तरह इस नए दौर में भी स्थानीय सत्ता की तानाशाही इस नई आर्थिकी का आधार बनी हुई है । यह बात सहज बोध का अंग है कि शोषक अंग्रेजों के भारत से चले जाने के बाद भी साम्राज्यवादी शोषण से मुक्ति नहीं मिली । देश की खेती को उपनिवेशवादी नीतियों के मुताबिक ढालने के अभियान पर थोड़े दिनों के लिए रोक लगी थी । वही नृशंस अभियान फिर से पूरी ताकत के साथ शुरू हो गया है । इस अभियान की शुरुआत के साथ ही सत्ता का भी वही स्वरूप प्रकट हो रहा है । यहां तक कि सत्ता के आतंक से प्रतिबन्ध भी जिस तरह लग रहे हैं उनसे एक हद तक औपनिवेशिक शासन की याद आ रही है ।
इसके लिए सबसे ताजा प्रकरण से बात शुरू करना ठीक होगा । मुम्बई से समीक्षा ट्रस्ट नामक संस्था की ओर से बौद्धिकों में सर्वाधिक लोकप्रिय पाक्षिक इकोनामिक ऐंड पोलिटिकल वीकली का प्रकाशन होता है । इस पत्रिका का संपादक कुछ समय पहले ही परंजय गुहा ठाकुरता नामक वरिष्ठ पत्रकार को बनाया गया था । परंजय की ख्याति का कारण हमारे देश में नव उदारवादी आर्थिकी के प्रसार के बाद उभरी क्रोनी कैपिटलिज्म (याराना पूंजीवाद) नामक परिघटना के उत्पाद अंबानी और अडाणी बंधुओं के विरुद्ध खोजपरक लेखन है । उन्होंने वर्तमान प्रधानमंत्री के निकट माने जाने वाले अडाणी के लिए शासन की ओर से दी गई भारी आर्थिक छूटों के बारे में दो लेख लिखे । नतीजतन अडाणी ने ट्रस्ट को कानूनी कार्यवाही की धमकी दी । ट्रस्ट ने एक बैठक बुलाकर संपादक से वे लेख वापस लेने के लिए कहा । संपादक ने अपना लिखा वापस लेने के मुकाबले संपादक के पद से इस्तीफा दे दिया । इस घटना से समझा जा सकता है कि देश में आलोचना बरदाश्त करने के मामले में कितनी कमी आई है । शायद दुहराने की जरूरत नहीं कि अगर आलोचना के प्रति सहज भाव नहीं होगा तो साहित्य के प्रति न्याय नहीं हो सकेगा क्योंकि प्रेमचंद के अनुसार साहित्य मूल रूप से जीवन की आलोचना है ।
हमने पहले ही कहा कि साहित्य का रिश्ता अन्य कला माध्यमों से भी होता है और कला इतिहास के विद्वान आर्नल्ड हाउजर आधुनिक काल का सबसे मुकम्मल कला रूप फ़िल्म को मानते थे । फ़िल्म और साहित्य की आपसदारी के बारे में बहुतेरा बातें हुई हैं । दुनिया की सबसे अधिक फ़िल्में भारत में बनती हैं । भारत के अनेक फ़िल्म निर्माता विश्व स्तर पर चर्चित रहे हैं । फ़िल्म के शिक्षण प्रशिक्षण के लिए पुणे में एक फ़िल्म संस्थान है । नई सरकार ने उस संस्थान का निदेशक एक ऐसे व्यक्ति को बनाया जिसकी नियुक्ति का आधार उसकी गुणवत्ता की जगह शासक दल के साथ उसका जुड़ाव था । विरोध में संस्थान के विद्यार्थियों ने हड़ताल कर दी । बहुत लंबी हड़ताल के बावजूद जब सरकार नहीं झुकी तो मजबूरन विद्यार्थियों को हड़ताल वापस लेनी पड़ी । इस घटना से सरकार की अनमनीयता और संवेदनहीनता तथा सब कुछ पर कब्जा करने की प्रवृत्ति का पहला गंभीर संकेत मिला । फ़िल्म की विशेष स्थिति के चलते ही उसके सेंसर के लिए बाकायदे एक सरकारी संस्थान बनाया गया है । पहले भी इस संस्थान के नैतिक आग्रहों और रचनात्मक सिनेमा की साहसिकता के बीच टकराव होता रहा है । इस संस्था का भी राजनीतिक उपयोग शुरू हुआ । एक और अवांतर प्रसंग के बिना बहुत सारी बातें स्पष्ट नहीं होंगी । चुनाव पहले भी राजनीतिक सत्ता के लिए प्रतियोगिता का मंच रहे हैं लेकिन हाल के वर्षों में वे लगभग शासक दल के नेताओं का एकमात्र सरोकार बनकर रह गए हैं । तमाम किस्म के काम किसी चुनाव का ध्यान रखकर किए जा रहे हैं । सेंसर बोर्ड का इस्तेमाल पंजाब के चुनाव के लिए होने लगा । एक फ़िल्म पर आपत्तियां उठाई गईं क्योंकि उसमें पंजाब में नशे के व्यापार से राजनीति का रिश्ता उजागर किया गया था । इससे आगामी घटनाओं के पूर्व संकेत मिले । 
साहित्य के लिहाज से सबसे खतरनाक घटनाओं में महाराष्ट्र और कर्नाटक में तीन साहित्यकारों की हत्या थी । इनमें से एक कलबुर्गी को तो कन्नड़ साहित्य में उनके काम के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त था । नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे महाराष्ट्र के बौद्धिक सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हुए थे । इनकी हत्याओं ने एक नए समय की घोषणा की जिसमें बौद्धिकता के प्रति सम्मान की जगह हिकारत का वातावरण बनने वाला था । इस बुद्धि विरोध की आहट खुद प्रधानमंत्री द्वारा गणेश का सिर जोड़ने को प्लास्टिक सर्जरी की पहली घटना बताने या हाल में हार्वर्ड बनाम हार्ड वर्क में विश्वविद्यालयी शिक्षा को दोयम साबित करने में सुनाई पड़ी । बौद्धिकों की इन हत्याओं से देश सन्न था तभी हिंदी के एक साहित्यकार ने प्रतिरोध का नायाब तरीका खोज निकाला । हिंदी के प्रतिष्ठित कवि और कथाकार उदय प्रकाश ने कलबुर्गी की हत्या की साहित्य अकादमी की ओर से निंदा की मांग करते हुए अकादमी द्वारा प्रदत्त पुरस्कार लौटाने की न केवल सार्वजनिक घोषणा की बल्कि बाकायदे पुरस्कार राशि समेत उसे वापस भी भेजा । धीरे धीरे तमाम लेखकों ने पुरस्कार लौटाने शुरू किए । इसके बदले में साहित्य अकादमी ने प्रचंड निर्लज्जता का प्रदर्शन किया । उसने कोई निंदा या शोक प्रस्ताव तो नहीं ही पारित किया, आरोप लगाया कि लेखकों को इस पुरस्कार के कारण जो लाभ मिले उनकी वापसी नहीं हो रही है ।
प्रतिरोध का यह तरीका कितना कारगर था इसका अंदाजा इस बात से चलता है कि शासक सत्ता को आजादी के बाद पहली बार साहित्यकारों के बारे में बोलना पड़ा । सत्ता की प्रतिक्रिया अश्लील थी । उन्होंने पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों को गिरोह के बतौर पेश किया और कहा कि अतीत में हुई घटनाओं पर ऐसा कदम क्यों नहीं उठाया गया । धीरे धीरे विरोध का यह तरीका साहित्यकारों से फैलकर अन्य सांस्कृतिक कर्मियों और बौद्धिकों तक जा पहुंचा । फ़िल्म से लेकर विज्ञान तक के तमाम नामचीन लोगों ने चुप्पी तोड़ी और इस विरोध प्रदर्शन में शरीक हुए । स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास में यह अभूतपूर्व गौरवशाली क्षण था जब सत्ता को साहित्य के बारे में बोलना पड़ा । इस घटना ने साहित्यकारों को एक विशेष ताकत के बतौर स्थापित किया । जिन्होंने पुरस्कार लौटाए उनके सार्वजनिक वक्तव्य ऐतिहासिक घोषणाओं की तरह सुनाई पड़े और इसी तरह प्रचारित हुए । साहित्यकार पहली बार अपने संगी साथियों समेत नजर आए । बहुत समय के बाद ऐसा हुआ कि रचनाशीलता की विभिन्न विधाओं के श्रेष्ठ व्यक्तियों के साथ वैज्ञानिक भी खड़े हुए ।      
बुद्धि विरोध के इस अभियान का अगला चरण भारत भर के विश्वविद्यालयों में पड़ा । पुणे स्थित फ़िल्म और टेलीविजन संस्थान की चर्चा हो चुकी है । हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या से दमन का नया अध्याय शुरू हुआ । नवउदारवाद के बाद से ही शिक्षा को निजी क्षेत्र में ले जाने के लिए तमाम किस्म के तर्क दिए जाते रहे हैं । इसमें भी उच्च शिक्षा को धन की बरबादी का स्रोत बताया जा रहा था । ऐसे में विश्वविद्यालयों के बारे में जान बूझकर ऐसी बातें फैलाई जाने लगीं जिससे उन्हें बदनाम करने का अभियान चलाने में आसानी हो । हैदराबाद के बाद सुनियोजित तरीके से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को निशाना बनाया गया । इस मामले में विचार की स्वतंत्रता और बहुलता की जगह के रूप में शिक्षा संस्थानों को समाप्त करने का अभूतपूर्व सपना देखा गया । शिक्षा पर सरकारी धन की बेवजह बरबादी का नव उदारवादी तर्क भी इसी बहाने प्रचारित किया गया । शिक्षण संस्थानों से आलोचना का माहौल समाप्त कर देने के लिए अध्यापकों के लिए सरकारी कर्मचारियों पर लागू होने वाले नियमों को लागू करने की कोशिश हो रही है । इसके तहत सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना की मनाही होती है । इस मामले में भी शिक्षण संस्थानों ने प्रतिरोध का नायाब तरीका खोज निकाला । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्रवाद के प्रश्न पर खुले आसमान के नीचे वैकल्पिक कक्षाएं आयोजित हुईं । इन कक्षाओं के व्याख्यान संकलित होकर ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में प्रकाशित प्रसारित हो रहे हैं । पूरी दुनिया ने फटी आंखों से इस हमले और उसके रचनात्मक प्रतिरोध को देखा । भविष्य में तानाशाहों के दंभ भरे बयानों को कोई याद नहीं रखेगा । अगर शोध होंगे तो उस अद्भुत अपार मानव क्षमता की अभिव्यक्तियों की बात होगी जो इस कठिन समय में पैदा हुईं ।
इसके अतिरिक्त वर्तमान के बारे में विचार करते हुए एक और परिघटना की जांच की जानी चाहिए । आधुनिक काल के शुरू में साहित्य की छपाई ने उसका रूप बदला था । उस दौर के बाद इस समय की तकनीक भी उस पर बुनियादी प्रभाव डाल रही है । स्वाभाविक है कि प्रतिक्रिया की ताकतें और उसी तरह प्रगति की समर्थक ताकतें भी इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं । पाबंदी और गोलबंदी के नए इलाके के बतौर इसका विकास हुआ है । इसे सोशल मीडिया कहा जाता है । इसकी ताकत भी सामाजिक शक्ति संरचना के अनुरूप ही निर्मित हो रही है । जब बदलाव के पक्षधर इस मामले में मजबूत दिखाई पड़ते हैं तो शासन की ओर से निगरानी और पाबंदी की कानूनी और गैर कानूनी कोशिश तेज हो जाती है । दूसरी ओर सत्ता भी इसका लाभ उठाने की चेष्टा कर रही है । गंभीर बातचीत का माहौल समाप्त करके अफवाह को जानकारी के रूप में फैलाने के लिए इसका उपयोग, तकनीक के चिंताजनक इस्तेमाल का सवाल पेश करता है । दूसरी ओर यह भी सच है कि इसके चलते अभिव्यक्ति के समानांतर और वैकल्पिक मंच खुल गए हैं । एक हद तक इसने आबादी के उन हिस्सों को शरीक होने का मौका दिया है जो अब तक बोलने में हिचकते थे ।  
जो भी हो एक बात निश्चित है । हम एक उत्तेजक समय में रह रहे हैं । जिन लड़ाइयों को खत्म मान लिया गया था वे फिर से शुरू हो गई हैं । हमारी पीढ़ी पर पुरानी ढेर सारी आधी अधूरी छोड़ दी गई लड़ाइयों को उनके अंजाम तक पहुंचाने की तकलीफदेह जिम्मेदारी आ पड़ी है । इतिहास गवाह है कि समाज के वंचितों और दलितों ने शिक्षा और साहित्य की दुनिया में कदम रखने का जब भी मौका पाया उसी समय उनकी भयंकर मुखालफ़त भी हुई है । पिछला समय अगर समाज के दो उत्पीड़ित तबकों (स्त्री और दलित) की आमद का समय था तो यह समय उस जागरण को कुचल देने की संगठित चेष्टा के व्यवस्थित प्रतिरोध का समय है । नए प्रतीक बन रहे हैं । शिक्षण संस्थानों में सेना के टैंक रखने की कवायद के विरोध में सीमा पर पुस्तकालय खोलने की मांग हो रही है । सृजनात्मक अभिव्यक्तियों का सबसे मजबूत विस्फोट सनक भरी नोटबंदी के समय की कविताएं और गीत हैं जिनके सहारे जनता ने इस आपदा का गरिमा के साथ मुकाबला किया ।

साहित्य के लिहाज से चिंता की बात समाज के साथ साथ भाषा और संवेदना में हिंसा की बढ़ोत्तरी है । क्रिकेट की भाषा से इसकी शुरुआत हुई थी । जब भी खेल में भारत और पाकिस्तान की टीमें आमने सामने होती थीं तो समूची फौज की जिम्मेदारी ग्यारह खिलाड़ियों के कंधों पर डाल दी जाती थी । खेल का मैदान युद्ध का रूपक बन जाता था । इसके बाद नक्सलियों और आतंकवादियों के साथ काश्मीर के लड़ाकुओं के मामले में संवेदनहीनता का वातावरण बनाया गया । इन सभी मामलों में अखबार की भाषा ने देश की जनता को ही शत्रु के तौर पर पेश किया और राज्य की ओर से इनकी हत्या को उत्सव की भाषा में प्रस्तुत किया । निर्दयता को यदि समाज में सकारात्मक मूल्य के रूप में मान्यता मिलेगी तो साहित्यकार किस तरह पाठकों में कोमल भावनाओं को जगा सकेगा । आगामी समय में साहित्य के समक्ष एक मुश्किल चुनौती के रूप में यह समस्या आएगी ।                                              

Saturday, August 12, 2017

खोजी पत्रकारिता की हार जीत

               
                                       
2005 में विंटेज से जान पिल्जर के संपादन में ‘टेल मी नो लाइज: इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म ऐंड इट्स ट्राइम्फ्स’ का प्रकाशन हुआ । किताब में ऐसे पत्रकार की प्रशंसा से बात शुरू की गई है जो द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में जापान के आत्मसमर्पण समारोह के बीच से हिरोशिमा के हालात देखने निकल गए थे । परमाणु बम गिराए जाने के बाद उस नगर में घुसने वाले वे पहले पश्चिमी पत्रकार थे । उन्होंने दुनिया को चेतावनी देते हुए अपनी रिपोर्ट लिखी । उनकी चेतावनी जहरीले विकीरण के बारे में थी जिससे तमाम पश्चिमी देशों के नेता इनकार कर रहे थे । सबने एक सुर से उनकी लानत मलामत की लेकिन इतिहास ने उनकी चेतावनी को सही साबित किया ।
उनके जैसे पत्रकारों के लेखन को ही इस किताब में इकट्ठा किया गया है । संपादक के अनुसार यह लेखन ऐतिहासिक स्मृति पर सत्ता की जकड़बंदी के विरुद्ध गरिमापूर्ण मानव संघर्ष का अंग होता है । अन्याय के सिलसिले में सत्ता की जिम्मेदारी साबित करना पत्रकारिता की सबसे बड़ी भूमिका है । खोजी पत्रकारिता के उसूल के रूप में संपादक का कहना है कि किसी बात पर तब तक यकीन नहीं करना चाहिए जब तक सरकार उस बात से इनकार न कर दे । पत्रकारिता के अध्यापक बताते नहीं लेकिन सच यही है कि सरकारें आम तौर पर झूठ बोलती हैं । ऐसी सत्ता ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों से नफ़रत करती है । लेखक का कहना है कि मोटा मुनाफा बटोरने के लिए उत्सुक इस कारपोरेट मीडिया युग में ढेर सारे पत्रकार अनजाने ही सत्ता के प्रचार तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं । इस प्रक्रिया के अपवादों को ही किताब में जगह दी गई है ।
मुख्य धारा के पत्रकारों के आचरण में सत्ता के साथ पत्रकारिता का महीन गंठजोड़ नजर आता है । उनकी खबरों और विश्लेषण से सत्ता और राजनीति के गोपनीय आयाम आदतन गायब रहते हैं । इस आयाम की मौजूदगी को स्वीकार किए बिना असलियत को समझना अक्सर असंभव हो जाता है । सत्ता के बलशाली ज्ञान के विरुद्ध दमित ज्ञान के विद्रोह का उत्सव ही ईमानदार पत्रकारिता है । संपादक के मुताबिक किताब का प्रत्येक लेख मुख्य धारा से बाहर का है और खेल के नियमों पर पत्रकार की आपत्ति का सबूत है । इस किस्म की पत्रकारिता का महत्व क्या है? संपादक का कहना है कि बिना इसके अन्याय के बोध की हमारी शब्दावली पंगु हो जाएगी और इससे लड़ने के इच्छुक लोगों के पास पर्याप्त सूचना नहीं होगी ।
इसका ठोस उदाहरण देते हुए संपादक ने बताया है कि इराक पर हुए हमले में पश्चिमी देशों के साथ तुर्की के खड़ा होने पर संसद में जो व्यापक विरोध हुआ उसका एक बड़ा कारण तुर्क पत्रकारों द्वारा कुर्द आबादी के साथ तुर्की के रवैये के बारे में और इराक में हमलावर मुल्कों के अत्याचार की खबरों को सामने ले आना भी था । पत्रकारों के इसी प्रभाव से भयभीत होने के चलते दुनिया भर के शासक उन्हें या तो खरीदने की या प्रताड़ित करने की चेष्टा करते रहते हैं । ऐसे पत्रकार ही प्रताड़ित होने के बावजूद स्वतंत्र पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत होते हैं ।
पश्चिमी देशों में पत्रकारों को जान तो नहीं गंवानी पड़ती लेकिन वहां के हालात के लिए संपादक ने एक कहानी बताई है । रूस के पत्रकारों के एक दल को अमेरिका में स्वतंत्रता के बावजूद सभी माध्यमों से एक ही तरह के समाचार प्रसारित होते हुए देखकर अचरज हुआ था । जार्ज आर्वेल ने अपनी किताब एनिमल फ़ार्म के लिए एक भूमिका लिखी थी जो प्रकाशित नहीं हुई । उसमें उन्होंने बिना किसी आधिकारिक प्रतिबन्ध के भी स्वतंत्र समाजों में असुविधाजनक तथ्यों को दबा देने और अलोकप्रिय विचारों को खामोश कर देने की क्षमता का जिक्र किया था । इस भूमिका के लिखे जाने के पचास साल बाद भी हालात बदले नहीं हैं । इसके पीछे कोई षड़यंत्र नहीं है क्योंकि उसकी जरूरत नहीं पड़ती । स्थापित सत्ता की प्राथमिकता और चलन को अपना लेने के मामले में पत्रकार भी इतिहासकारों और अध्यापकों से बहुत अलग नहीं होते । सांस्थानिक जिम्मेदारी निभाने वाले अन्य लोगों की तरह ही इन्हें भी संदेह को दूर रखने का प्रशिक्षण मिलता है । कहा जाता है कि संदेह को व्यवस्था की जगह उसके प्रबंधकों की अक्षमता पर केंद्रित रखना होगा ।
आधुनिक मीडिया के तमाम अघोषित नियम लगभग सभी संस्थानों के लिए एक समान होते हैं । समाचार की प्रचलित धारणा के जरिए ही झूठी मान्यताओं को सहज बोध बना दिया जाता है और झूठ भरे सरकारी दावों को भोंपू लगाकर बजाया जाता है । अपने लाभ का ध्यान रखकर विभिन्न समाजों के बारे में खबरें सुनाई जाती हैं । अपने समाज के मूल्यों और नैतिक बोध के लिहाज से किसी भी समाज को अच्छा या बुरा बताया जाता है । मीडिया की तकनीक के अकल्पनीय गति से विकसित होने के साथ ही पत्रकारिता के पारंपरिक साधनों और सम्मान्य परंपराओं को तिलांजलि दी जा रही है ।
संपादक का संबंध आस्ट्रेलिया के पत्रकारिता जगत से है । वहां के एक पत्रकार स्मिथ हाल ने लड़कर प्रेस की स्वाधीनता, प्रतिनिधिमूलक सरकार और न्यायाधीश के सामने मुकदमे के अधिकार हासिल किए थे । कभी एक पाठक ने चिट्ठी लिखकर उन्हें कहा था कि पत्रकार को सरकार से खाद पानी लेने के मुकाबले उसके मजबूत विरोधी की भूमिका निभानी चाहिए । इससे प्रेरित होकर उन्होंने स्वतंत्र अखबार निकालना शुरू किया । उन्होंने अपने साहस की कीमत भी चुकाई । उन पर मुकदमे लादे और चलाए गए । जेल से उन्होंने अपने अखबार का साल भर तक संपादन किया था । उनकी कोशिशों के चलते ही उनके निधन के समय आस्ट्रेलिया के केवल एक प्रांत में पचास स्वतंत्र अखबार निकल रहे थे । बीस साल में इनकी संख्या बढ़कर 143 हो गई । इनमें से अधिकतर के संपादक अपने अखबारों को अधिकारियों के व्यापार की जगह जनता की आवाज समझते थे ।

उस समय से आज की तुलना करते हुए संपादक बताते हैं कि तब अखबारों में विविधतापरक होड़ होती थी । आज तो उनमें एक दूसरे की प्रतिध्वनि सुनाई देती है । पंद्रह प्रमुख अखबारों में से सात पर मर्डोक का कब्जा है, दस रविवासरीय अखबारों में से सात उनके मालिकाने में हैं । आज आस्ट्रेलिया में मीडिया में स्वामित्व के मामले में इजारेदारी सर्वाधिक है । अगर चेते नहीं तो ज्यादातर देशों में मीडिया की यही तस्वीर बनने वाली है । किताब में ज्यादा लेख अखबारों के बारे में हैं क्योंकि जन सूचना के क्षेत्र में साधन के बतौर टेलीविजन का आगमन कुल तीस साल पहले ही हुआ है । इसके आने के साथ प्रतिबंध और भी सूक्ष्म हुआ है । अब यह प्रतिबंध निष्पक्षता, संतुलन और वस्तुनिष्ठता के नाम पर लगता है ।

Saturday, August 5, 2017

विश्वविद्यालयों की बात

                      
                                          
2017 में वर्सो से स्टेफान कोलिनी की किताबस्पीकिंग आफ़ यूनिवर्सिटीजका प्रकाशन हुआ । आजकल विश्वविद्यालयों और उनके विद्यार्थियों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी आई है । इसमें विकसित और विकासशील दोनों ही देश शामिल हैं लेकिन अकेले चीन में केवल पिछले बीस सालों में 1200 नए विश्वविद्यालय और कालेज स्थापित हुए हैं । बदलाव मात्रात्मक ही नहीं हुए हैं बल्कि कुल मिलाकर उच्च शिक्षा की समूची पारिस्थितिकी बदल गई है । अध्यापकों को अब अनुदान, मूल्यांकन, गुणवत्ता और इम्पैक्ट की चिंता अधिक सताती है । प्रशासन का भी तरीका बदल गया है । अब सरकारी फैसलों को लागू करने के लिए वरिष्ठ प्रबंधकों का दल होता है । पढ़ाए जाने वाले विषयों की संख्या भी बहुत हो चली है । पढ़ाई की प्रक्रिया में पारंपरिक बुनियादी तरीकों के बदले नई तकनीकों का इस्तेमाल खूब होने लगा है । विद्यार्थियों में विदेश से आने वालों का अनुपात भी अधिक हो गया है । विभिन्न देशों में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के परिसर खुल रहे हैं । इनके अतिरिक्त पढ़ाई का खर्च विद्यार्थी से अधिकाधिक वसूला जा रहा है । इस तीव्र बदलाव के चलते दिशाहीनता पैदा हो रही है, समाज को विश्वविद्यालयों की नई भूमिका और प्रकृति आसानी से समझ नहीं आ रही । राजनीति और मीडिया में इन बदलावों के बारे में जिस शब्दावली में बात हो रही है उससे भ्रम और फैल रहा है । बातचीत की भाषा में व्यवसाय की शब्दावली आ गई है । कुछ लोग कहते हैं कि भाषा के मुकाबले यथार्थ का महत्व ज्यादा होता है लेकिन भाषा इतनी छिछली चीज नहीं होती कि उससे यथार्थ पर कोई असर न पड़े । वह ऐसा छिलका नहीं होती जिसमें यथार्थ लिपटा रहता है और जरूरत पड़ने पर उसे उतारकर यथार्थ को देख लिया जाए । जिस भाषा में इन शिक्षण संस्थानों के बारे में बातें हो रही हैं उसका इस्तेमाल एक पीढ़ी पहले भी नहीं होता था । इसलिए सोचने के तरीके से सोचने की शब्दावली गहरे जुड़ी होती है ।
अगर विश्वविद्यालयों के बारे में कुछ करना है तो उनके मकसद की नई समझदारी बनानी होगी । इसका मतलब यह नहीं कि बदलाव का प्रतिरोध किया जाए या पहले के जमाने में वापस लौट चला जाए । न ही इसका अर्थ दुनिया की उन बुनियादी ताकतों की मौजूदगी से इनकार करना है जो विश्वविद्यालयों की प्रकृति और उनके कामकाज को प्रभावित कर रही हैं । लेखक का कहना है कि यह किताब 2012 में प्रकाशित उनकी किताब ‘ह्वाट आर यूनिवर्सिटीज फ़ार?’ की निरंतरता में लिखी गई है । दोनों किताबों का बुनियादी तर्क समान होने के बावजूद इस किताब में समय के बदलाव को अधिक गहराई से समझने की कोशिश की गई है । लेखक को लगता है कि पहले वाली किताब के बारे में जो चर्चा हुई उससे इस किताब के तर्कों को विकसित करने में मदद मिली है । जिन लोगों की प्रतिक्रिया पहली किताब पर मिली थी उनमें सबसे पहले विद्यार्थी थे । चूंकि वे अध्यापकों के मुकाबले कम समय के लिए विश्वविद्यालय में रहते हैं इसलिए विश्वविद्यालय से उनकी मांगें भी अलग तरह की होती हैं । उनके बाद ऐसे पाठकों और श्रोताओं की प्रतिक्रियाएं मिलीं जिनका संबंध विश्वविद्यालयों से नहीं था लेकिन जो उनकी सेहत को लेकर चिंतित रहते हैं । वे विश्वविद्यालयों की गलत नीतियों के अनौचित्य के बारे में आश्चर्यजनक रूप से परिचित हुआ करते थे । तीसरा समूह समूचे यूरोप के पाठक और पत्रकार थे । इनमें से अधिकतर ऐसे थे जो विश्वविद्यालयों की पुरानी व्यवस्था की गुणवत्ता के प्रशंसक थे और महसूस करते थे कि इन्हें अब बाजार के हितों के लिए प्रयोगशालाओं में बदला जा रहा है । ज्यादातर यूरोपीय देशों में उच्च शिक्षा अब भी सरकारी खर्चे पर चल रही है और इन देशों को चिंता है कि उनके यहां भी आगामी दिनों में इसी तरह के बदलाव हो सकते हैं ।
इन समूहों से जिस तरह की प्रतिक्रिया सुनने को मिली वह बाजारोन्मुखी तर्कों से अलग थी । एक तो यह कि उनमें अध्यापकीय दुनिया में प्रचलित पदानुक्रम का आभास नहीं था । दूसरे यह कि स्वप्नजीवीआदर्शवादकी निंदा औरव्यावहारिकहोने में उन्हें गर्व नहीं महसूस होता था । इस प्रजाति के लोग बौद्धिकों में प्रचुर संख्या में पाए जाते हैं और निर्णायक सवालों कोव्यावहारिकऔर अनुभवी लोगों के लिए छोड़ देने की वकालत करते हैं । ऊपर गिनाई गई समीक्षाओं के अतिरिक्त किसी भी लेखक को ढेर सारे अनौपचारिक संवादों से भी दो चार होना पड़ता है । इस तरह के संवादों में सुनने को मिला कि जो बात कही जा रही है वह सही तो है लेकिन इससे कोई खास अंतर नहीं पड़ेगा । कहा गया कि यह सब अरण्य रोदन बनकर रह जाएगा । ऐसे लोग न तोव्यावहारिकथे न ही उन्हें इससे खुशी मिल रही थी । वे लोग बस हताश हो चुके लगते थे । ऐसे लोग संख्या में कम भले हों लेकिन थे जरूर जो मानते थे कि बदलाव की कोशिश के लिहाज से काफी देर हो चुकी है । असल में इस दौरान जो बदलाव थोपे गए हैं उनके पीछे ऐसी विजयी शक्तिशाली राजनीतिक विचारधारा है जो वापसी को असंभव मनवा ले गई है । लेखक ने इस हताशा के समक्ष हथियार तो नहीं डाले हैं लेकिन उन्हें भी भविष्य की ओर ले जाने वाली कोई रोशनी दिखाई नहीं देती ।
कुछ अन्य लोग कहते थे कि बात सही होने के बावजूद वे अपने खुद के विश्वविद्यालय में ये बातें नहीं बोल सकते । यकीन नहीं कि उनकी संस्थाओं में ऐसा माहौल बन चुका है । इससे लेखक को अपनी मान्यता को बार बार दुहराने की प्रेरणा मिली । कुछ प्रतिक्रियाएं कानोकान लेखक के पास पहुंचीं । कुछ लोग लेखक को लेकर शर्मिंदा थे कि परेशानी पैदा करने वाला यह आदमी हमारा सहकर्मी है । लेखक को संतोष है कि उनकी किताब ने शांति में खलल तो डाली । कुछ लोगों को लेखक की व्यंग्यात्मक शैली से आपत्ति थी । उन्हें लगा कि इससे मामला बिगड़ सकता है । लेकिन लेखक का कहना है कि बुनियादी आलोचना से मामला बनता नहीं, बिगड़ता ही है । दूसरी बात कि उद्देश्यपरक लेखन अपने पाठक की रुचि बनाए रखना चाहता है और इसमें हास्य व्यंग्य से मदद मिलती है । गंभीर मंतव्य को प्रकट करने के लिए निर्वैयक्तिक शैली का महत्व हो सकता है लेकिन लाभ क्या जब उसे कोई पढ़े ही नहीं ! व्यापक पाठक समुदाय तक अपनी राय पहुंचाने के लिए लेखक को यही चुटीली शैली उचित लगी ।
लेखक का कहना है कि सार्वजनिक बहस मुबाहिसे में प्रदत्त समझ और अभिव्यक्ति की प्रचलित शैली से बहुत फायदा होता है । इस तरह कही गई बातें सांस्कृतिक माहौल का अंग होकर स्वाभाविक हो जाती हैं और उन्हें चुनौती देना मुश्किल हो जाता है । इस किताब के जरिए लेखक ने ऐसी ही सहमति की भाषा पर सवाल उठाना चाहा है ताकि कुछ बेहतर करने के लिए स्पष्ट तरीके से सोचा जा सके ।

Thursday, August 3, 2017

रामचंद्र शुक्ल और छायावाद- एक जटिल रिश्ता

                
                                                       
इस लेख का मकसद छायावाद संबंधी आचार्य शुक्ल की मान्यताओं का समर्थन करना नहीं है । इसमें उन तर्कों को दोहराया भी नहीं गया है जो छायावाद के संबंध में शुक्ल जी की राय को पुष्ट करते हैं । हिंदी के अकादमिक जगत में आचार्य शुक्ल की आम छवि छायावाद विरोधी की है । उसे फिर फिर बताने का कोई औचित्य नहीं है । हमारी कोशिश इस प्रसंग में ऐसे पहलुओं को उभारने की है जो बनी बनाई समझ में कुछ अन्य तत्वों को जोड़ने की जरूरत पैदा करते हैं ।
छायावाद और शुक्ल जी में सहकालिकता है । आम तौर पर शुक्ल जी को छायावाद का विरोधी समझा जाता है । दूसरी ओर रामविलास शर्मा का कहना है कि शुक्ल जी के विरोधी छायावाद के भी विरोधी हैं । इन दोनों तरह की मान्यताओं के बीच में कहीं शुक्ल जी और छायावाद के रिश्ते को अवस्थित करना उचित होगा । साथ ही इस रिश्ते को सरल और एकायामी भी नहीं कहा जा सकता । इस जटिल रिश्ते की छानबीन करते हुए हम शुक्ल जी के छायावादी कवियों के बारे में मूल्यांकन पर ध्यान देते हुए भी अन्य लोगों के बारे में उनके मूल्यांकन में समाई काव्य रुचि से भी छायावाद का संबंध समझने की कोशिश करेंगे । इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि शुक्ल जी की दार्शनिक समझ छायावाद के बारे में उनकी राय को किस तरह प्रभावित करती है । 
समकालीनों में विरोध अत्यंत स्वाभाविक होता है लेकिन अगर ध्यान से देखा जाए तो छायावाद की पृष्ठभूमि, छायावादी कवियों की विशेषता की पहचान और उसकी सीमाओं के संकेत के मामले में शुक्ल जी छायावाद के समर्थकों से बीस बैठते हैं ।हिंदी साहित्य का इतिहासके भीतर छायावाद को जिस तरह उन्होंने प्रतिष्ठित किया है उसमें सबसे पहली बात तो यही है कि छायावाद भारतेंदु युग से शुरू होने वाले नए उत्थान की निरंतरता में था । भारतेंदु ने जिस परिवर्तन की नींव रखी उसका परिपक्व रूप छायावाद में प्रकट हुआ । भारतेंदु नेहमारे जीवन और साहित्य के बीच जो विच्छेद पड़ रहा था उसेदूर किया । विच्छेद था किभाव और विचार तो बहुत आगे बढ़ गए थे, पर साहित्य पीछे ही पड़ा थाऔरदेश काल के अनुकूल साहित्यनिर्माण का कोई विस्तृत प्रयत्ननहीं हो रहा था । संकेत से भी स्पष्ट है कि स्वाधीनता की आकांक्षा इस बदलाव की प्रेरक थी । न केवल वस्तु के स्तर पर बल्कि रूप के स्तर पर भी भारतेंदु युग में शुक्ल जी द्वारा लक्षित दो ऐसी विशेषताएं हैं जिनका प्रचुर विकास छायावाद के दौरान हुआ । एक है- नाटक जिसका विकास भारतेंदु युग के बाद छायावाद में ही दिखाई देता है । दूसरी विशेषता साहित्यिक पत्रकारिता है जो छायावाद में और भी उन्नत स्तर पर फलित हुई ।
इस युग से जो धारा शुरू होकर छायावाद तक पहुंचती है उसका संकेत करते हुए शुक्ल जी बताते हैं ‘इस नए रंग में सबसे ऊँचा स्वर देशभक्ति की वाणी का था । उसी से लगे हुए विषय लोकहित, समाजसुधार, मातृभाषा का उद्धार आदि थे ।’ स्वाभाविक था कि ‘विषयों की अनेकरूपता के साथ उनके विधान का ढंग भी बदल चला ।’ विषयवस्तु के साथ ही ढंग की नवीनता की पहचान हमें इतिहास में छायावाद संबंधी प्रकरण में भी दिखाई देती है ।हिंदी साहित्य का इतिहासके छायावाद संबंधी प्रकरण पर नजर डालने से पहले छायावाद के सिलसिले में कुछ अन्य चीजों पर भी बात करना जरूरी है । इसका बड़ा कारण यह है कि इस काव्य प्रवृत्ति का अर्थ बहुत निश्चित नहीं था । शुक्ल जी का अंध विरोध इतना गहरा था कि जब उन्होंने इसे रहस्यवाद मानकर इसके विरोध में लिखा तो छायावाद के ढेर सारे समर्थक रहस्यवाद के भी समर्थन में उतर आए ।
शुक्ल जी और छायावाद के बीच के रिश्तों की बात करते हुए हमें देखना होगा कि छायावाद को किस अर्थ में ग्रहण किया जाता रहा है । मुकुटधर पांडे ने इसे रोमांटिसिज्म यानी स्वच्छंदतावाद के अर्थ में समझने पर जोर दिया लेकिन आम तौर पर उसका अर्थ मिस्टिसिज्म यानी रहस्यवाद ही समझा जाता था । तमाम संदर्भों से साबित होता है कि शुक्ल जी स्वच्छंदतावाद को सकारात्मक काव्य प्रवृत्ति मानते थे । भारतेंदुकालीन कवि ठाकुर जगमोहन सिंह पर बात करते हुए प्राकृतिक वर्णन की विभिन्न प्रणालियों पर शुक्ल जी ने विस्तार से विचार किया है । इस प्रसंग में वे कहते हैंअँगरेजी साहित्य में वर्ड्सवर्थ, शेली, मेरेडिथ आदि में उसी ढंग का सूक्ष्म प्रकृतिनिरीक्षण और मनोरम रूप विधान पाया जाता है जैसा प्राचीन संस्कृत साहित्य में ।इसके बाद द्विवेदी युग से वे एक स्पष्ट स्वच्छंदतावादी काव्यधारा की निरंतरता स्थापित करने की कोशिश करते हैं । स्वच्छंदता की इस काव्यधारा के साथ वे साहित्येतिहास के एक बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं । यह सिद्धांत शुक्ल जी की रूढ़ छवि के पूरी तरह से विरोध में प्रतीत होता है । उनके बारे में प्रचलित धारणा यह है कि वे शिक्षित जनता के पक्ष में कुछ अधिक ही रहा करते थे । लोक के मुकाबले शास्त्र के पक्षधर होने की उनकी तस्वीर जोरदार तरीके से उभारी गई ।
शुक्ल जी का मानना है किपंडितों की बँधी प्रणाली पर चलनेवाली काव्यधारा के साथ साथ सामान्य अपढ़ जनता के बीच एक स्वच्छंद और प्राकृतिक भावधारा भी गीतों के रूप में चलती रहती है- ठीक उसी प्रकार जैसे बहुत काल से स्थिर चली आती हुई पंडितों की साहित्यभाषा के साथ साथ लोकभाषा की स्वाभाविक धारा भी बराबर चलती रहती है । जब पंडितों की काव्यभाषा स्थिर होकर उत्तरोत्तर आगे बढ़ती हुई लोकभाषा से दूर पड़ जाती है और जनता के हृदय पर प्रभाव डालने की उसकी शक्ति क्षीण होने लगती है तब शिष्ट समुदाय लोकभाषा का सहारा लेकर अपनी काव्यपरंपरा में नया जीवन डालता है ।---यही प्राकृतिक नियम काव्य के स्वरूप के संबंध में भी अटल समझना चाहिए । जब जब शिष्टों का काव्य पंडितों द्वारा बँधकर निश्चेष्ट और संकुचित होगा तब तब उसे सजीव और चेतन प्रसार देश की सामान्य जनता के बीच स्वच्छंद बहती हुई प्राकृतिक भावधारा से जीवनतत्व ग्रहण करने से ही प्राप्त होगा ।खास बात यह है कि इससे देशप्रेम का प्रश्न भी जुड़ा हुआ हैयह भावधारादेश के स्वरूप के साथसंबद्ध चलती है ।इसी तरह की घटना अंग्रेजी साहित्य में भी घटी थी । वहाँ पर लैटिन की जकड़बंदी थी । लिखा है ‘---इंगलैंड की काव्यरचना भी लैटिन की प्राचीन रूढ़ियों से जकड़ी जाने लगी ।---इस प्रकार अंगरेजी काव्य, विदेशी काव्य और साहित्य की रूढ़ियों से इतना आच्छन्न हो गया कि वह देश की परंपरागत स्वाभाविक भावधारा से विच्छिन्न सा हो गया । काउपर, क्रैव और बर्न्स ने काव्यधारा को साधारण जनता की नादरुचि के अनुकूल नाना मधुर लयों में तथा लोकहृदय के ढलाव की नाना मार्मिक अंतर्भूमियों में ढाला ।ऐसा लगता है जैसे हम किसी अन्य देश के बारे में नहीं, हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में रीतिकाल से मुक्त होने की प्रक्रिया का वर्णन सुन रहे हैं । 
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में यह प्रक्रिया किस तरह घटी उसकी निरंतरता बताते हुए उन्होंने लिखाहरिश्चंद्र के सहयोगियों में काव्यधारा को नए नए विषयों की ओर मोड़ने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ी, पर भाषा ब्रज ही रहने दी गई और पद्य के ढाँचों, अभिव्यंजना के ढंग, तथा प्रकृति के स्वरूपनिरीक्षण आदि में स्वच्छंदता के दर्शन न हुए । इस प्रकार की स्वच्छंदता का आभास पहले पहल पंडित श्रीधर पाठक ने ही दिया । उन्होंने प्रकृति के रूढ़िबद्ध रूपों तक ही न रह कर अपनी आँखों से भी उसके रूपों को देखा ।फिर भी उनके प्रकृति वर्णन की सीमा बताते हुए लिखते हैंउनकी यह उपासना प्रकृति के उन्हीं रूपों तक परिमित थी जो मनुष्य को सुखदायक और आनंदप्रद होते हैं, या जो भव्य और सुंदर होते हैं ।प्रकृति के सहज चित्रों के वर्णन के पक्ष में खड़ा होकर उन्होंने यह आलोचना की थी । इनकी परंपरा को आगे ले जाने वाले द्विवेदी युग के दूसरे कवि रामनरेश त्रिपाठी हुए । प्रकृति वर्णन और देशभक्ति को एक साथ गूँथने की त्रिपाठी जी की कला की विशेषता है किदेशभक्ति को रसात्मक रूप त्रिपाठी जी द्वारा प्राप्त हुआ, इसमें संदेह नहीं ।इसी चीज का अभाव उन्हें श्रीधर पाठक में दिखाई पड़ा था ।
आचार्य शुक्ल द्वारा आधुनिक काल की हिंदी कविता के उपरोक्त पर्यवेक्षण से दो आपस में जुड़ी हुई बातों पर उनका बल प्रत्यक्ष है । देशभक्ति और प्रकृति वर्णन । देशभक्ति के प्रसंग में छायावाद के समय की ऐसी विशेषता का वे उल्लेख करते हैं जिसका संदर्भ लेकर आज भी छायावाद के बारे में बात नहीं होती । उनके ही शब्दों मेंतृतीय उत्थान में आकर परिस्थिति बहुत बदल गई; आंदोलनों ने सक्रिय रूप धारण किया और गाँव गाँव राजनीतिक और आर्थिक परतंत्रता के विरोध की भावना जगाई गई ।इसका परिणाम हुआ किसरकार से कुछ माँगने के स्थान पर अब कवियों की वाणी देशवासियों को हीस्वतंत्रता देवी की वेदी पर बलिदानहोने को प्रोत्साहित करने लगी ।दूसरी बात किअब जो आंदोलन चले वे सामान्य जनसमुदायों को भी साथ लेकर चले ।यह आगे की बात थी क्योंकि इसके पहले ‘---राजनीति की लंबी चौड़ी चर्चा साल भर में एक बार धूमधाम के साथ थोड़े से शिक्षित बड़े आदमियों के बीच हो जाया करती थी जिसका कोई स्थायी और क्रियोत्पादक प्रभाव नहीं देखने में आता था ।ध्यान देने की बात है कि अन्य प्रकरणों के विपरीत इस मामले में शिक्षित का प्रयोग नकारात्मक अर्थ में हुआ है । बहरहालसबसे बड़ी बात यह हुई कि आंदोलन संसार के और भागों में चलनेवाले आंदोलनों के मेल में लाए गए, जिससे ये क्षोभ की एक सार्वभौम धारा की शाखाओं से प्रतीत हुए ।इसे देखने से लगता है कि शुक्ल जी छायावाद की भूमिका को भी स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर की नवीनता के परिप्रेक्ष्य में समझना चाहते हैं । इसे हम कवियों की विशेषताओं के वर्णन में और अधिक खुलता देख सकते हैं ।
छायावादी कवियों के बारे में आचार्य शुक्ल के विश्लेषण से पहले एक और बात का जिक्र जरूरी है । यह बात केवल छायावाद के सिलसिले में नहीं आई है, बल्कि शुक्ल जी के चिंतन का अभिन्न अंग है । आम तौर पर इस बात की ओर ध्यान नहीं जाता कि शुक्ल जी ने विविधता पर बहुत अधिक जोर दिया है । उनके मुताबिक यह संसार अनेकरूपात्मक है । हमारा हृदय अनेकभावात्मक है ।साहित्य का इतिहासमें प्रत्येक युग में अनेक साहित्यिक प्रवृत्तियों की मौजूदगी है और इनके बाहर भी कुछ फुटकल कवि मिल जाते हैं । छायावाद के समय के सिलसिले में आचार्य शुक्ल बताते हैं कि इस दौर मेंब्रजभाषा काव्यपरंपरा के अतिरिक्त---खड़ी बोली की तीन मुख्य धाराएँदिखाई पड़ती हैं । इनमें से एक है- द्विवेदी काल की क्रमश: विस्तृत और परिष्कृत होती हुई धारा । दूसरी- छायावाद कही जानेवाली धारा । तीसरी है- स्वाभाविक स्वच्छदतावाद को लेकर चलनेवाली धारा जिसके अंतर्गत राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की लालसा व्यक्त करनेवाली शाखा भी हम ले सकते हैं । ये अलग अलग तो हैंपर काव्य की भिन्न भिन्न धाराओं के भेद इतने निर्दिष्ट नहीं हो सकते कि एक की कोई विशेषता दूसरी में कहीं दिखाई ही न पड़े। छायावादी लेखकों के लेखन में वस्तु और शैली दोनों के लिहाज से शायद इसीलिए इतनी विविधता और विस्तार मिलता है ।
इसके बाद ब्रजभाषा की धारा का संक्षिप्त परिचय देते हुए द्विवेदी काल की विस्तारित काव्यधारा के कुछेक कवियों का परिचय देने के बाद वे छायावाद का स्वरूप स्पष्ट करते हैं । इस सिलसिले में वे छायावाद के दो पहलुओं को उभारते हैं ।एक तो रहस्यवादजिसे वेकाव्यवस्तुका अंग मानते हैं और दूसराकाव्यशैली या पद्धतिविशेष। इस प्रकारछायावाद का सामान्यत: अर्थ हुआ प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करनेवाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन। लेकिन खास बात कि इस धारणा के अनुसार काव्यवस्तु केवल महादेवी वर्मा में मिलती है शेष सभी कविप्रतीकपद्धति या चित्रभाषा शैलीके नाते ही छायावादी कहे जा सकते हैं । इस शैली में प्रतीक या अप्रस्तुत की अभिव्यक्ति के लिएसाम्यग्रहणपर बल दिखाई पड़ता है । शुक्ल जी जोर देकर कहते हैं कि छायावाद के भीतरसादृश्य और साधर्म्यके आधार पर उत्पन्न होने वालेप्रभावसाम्यका अनुगमन किया गया है । उदाहरण के लिएसुख, आनंद, प्रफुल्लता, यौवनकाल इत्यादि के स्थान पर उनके द्योतक उषा, प्रभात, मधुकाल; प्रिया के स्थान पर मुकुल; प्रेमी के स्थान पर मधुप; श्वेत या शुभ्र के स्थान पर कुंद, रजत; माधुर्य के स्थान पर मधु; दीप्तिमान या कांतिमान के स्थान पर स्वर्ण; विषाद या अवसाद के स्थान पर अंधकार, अंधेरी रात, संध्या की छाया, पतझड़; मानसिक आकुलता या क्षोभ के स्थान पर झंझा, तूफान; भावतरंग के लिए झंकार; भावप्रवाह के लिए संगीत या मुरली का स्वरइत्यादि । यह सूची छायावादी कविता का मर्म समझने के लिए अत्यंत उपयोगी प्रतीत होती है । वे इस प्रतीकपद्धति कोहमारे हृदय का प्रसार करनेवाली, शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के गूढ़ संबंध की धारणा बँधानेवालीमानने के बावजूद इसकी अति की आलोचना से परहेज नहीं करते ।
इसके बाद वे अपनी खास शैली में प्रत्येक कवि का परिचय देते हैं । इस मामले में यह भी ध्यान में रखने की बात है कि इस काव्यधारा के चार प्रमुख कवि (जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठीनिरालाऔर महादेवी वर्मा) उनके ही पहचाने हुए हैं । प्रसाद जी में आज भी रहस्यवाद अधिक देखा जाता है । उसके मुकाबले शुक्ल जी ने उनके लेखन मेंजीवन के प्रेमविलासमय मधुर पक्ष की ओर स्वाभाविक प्रवृत्तिपाई । यही नहीं उनके ग्रंथकामायनीके एक प्रसंग पर शुक्ल जी की टिप्पणी बेहद मारक है । लिखते हैंश्रद्धा जब कुमार को लेकर प्रजाविद्रोह के उपरांत सारस्वत नगर में पहुँचती है तबइड़ासे कहती हैसिर चढ़ी रही पाया न हृदय। क्या श्रद्धा के संबंध में नहीं कहा जा सकता था किरस पगी रही पाई न बुद्धि’ ?’ शुक्ल जी के सिलसिले में बुद्धि की ऐसी पक्षधरता उनकी प्रचलित तस्वीर से कुछ ज्यादा ही भिन्न है । उन्होंने तोकामायनीमेंवर्गहीन समाज की साम्यवादी पुकार की भी दबी सी गूँजसुनी थी । कहना न होगा कि जो साम्यवाद के बारे में खुद न जानता हो वह उसकी प्रतिध्वनि भी नहीं पहचान सकता ।
प्रसाद जी के तत्काल बाद छायावादियों में शुक्ल जी को सबसे प्रिय सुमित्रानंदन पंत का परिचय दिया गया है । इसी संबंध में ध्यातव्य है कि पंत जी को शुक्ल जी ने इतिहास में लगभग उतनी ही जगह दी है जितनी अपने सबसे प्रिय कवि तुलसीदास को । उनकी पहली विशेषता कि उनकीरहस्यभावना प्राय: स्वाभाविक ही रही। असल मेंउन्हें प्रकृति की ओर सीधे आकर्षित होनेवाला, उसके खुले और चिरंतन रूपों के बीच खुलनेवाला हृदय प्राप्त था। उनका छायावादचित्रभाषा के अर्थ में हीहै । सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति चित्रण उनके लिए आकर्षक तो था ही, पंत जी की कविताओं की विषयवस्तु भी उल्लेखनीय है । आचार्य शुक्ल ने इस विषयवस्तु का वर्णन जिस तरह किया है उससे पंत जी अत्यंत आधुनिक चेतना के कवि प्रकट होते हैं । ‘—कवि यदि लोककर्म में प्रवृत्त नहीं तो कम से कम कर्मक्षेत्र में उतरे हुए लोगों के साथ चलता दिखाई पड़ रहा है । स्वतंत्र द्रष्टा का रूप उसका नहीं रह गया है । उसका तोसामूहिकता ही निजत्व धनहै । सामूहिक धारा जिधर जिधर चल रही है उधर उधर उसका स्वर भी मिला सुनाई पड़ रहा है । कहीं वहगत संस्कृति के गरलधनपतियों के अंतिम क्षण बता रहा है, कहीं मध्य वर्ग कोसंस्कृति का दास और उच्च वर्ग की सुविधा का शास्त्रोक्त प्रचारकतथा श्रमजीवियों कोलोकक्रांति का अग्रदूत और नव्य सभ्यता का उन्नायककह रहा है और कहीं पुरुषों के अत्याचार से पीड़ित स्त्री जाति कीदशा सूचित कर रहा है ।इस किंचित विस्तृत उद्धरण से पंत जी की कविता के बारे में जो भी पता चले, कविता में शुक्ल जी के पसंदीदा वर्ण्य विषयों की सूचना जरूर मिलती है ।
निराला के प्रसंग में उनका एक पद ही बहुत है । लिखा हैबहुवस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा निरालाजी में है। इसके अतिरिक्तजिस प्रकार निरालाजी को छंद के बंधन अरुचिकर हैं उसी प्रकार सामाजिक बंधन भी। उदाहरण है सम्राट अष्टम एडवर्ड की प्रशस्तिजिसने प्रेम के निमित्त साहसपूर्वक पदमर्यादा के सामाजिक बंधन को दूर फेंका है। इसे निराला के साथ प्रेम के प्रति आचार्य शुक्ल के मनोभाव के बतौर भी पढ़ा जाना चाहिए । उनकी कवितातोड़ती पत्थरके बारे में लिखा किश्रमजीवियों के कष्टों की सहानुभूति लिए हुए जो लोकहितवाद का आंदोलन चला है उस पर भी निरालाजी की दृष्टि गई है। इस तरह थोड़े में ही निराला की विविधता को स्पष्ट कर दिया गया है ।
महादेवी के प्रति उनके रहस्यवादी होने की मान्यता होने तथापीड़ा का चस्काजैसा आरोप लगाने के बावजूद लक्षित किया कि गीत लिखने में जैसी सफलता महादेवीजी को हुई वैसी और किसी को नहीं । न तो भाषा का ऐसा स्निग्ध और प्रांजलप्रवाह और कहीं मिलता है, न हृदय की ऐसी भावभंगी । जगह जगह ऐसी ढली हुई और अनूठी व्यंजना से भरी हुई पदावली मिलती है कि हृदय खिल उठता है ।ध्यान दीजिए कि शुक्ल जी बहुत ही कम मौकों पर ऐसी भावाभिव्यंजक भाषा का प्रयोग करते हैं ।
छायावाद के संबंध मेंहिंदी साहित्य का इतिहासके भीतर व्यक्त विचारों के इस संक्षिप्त सर्वेक्षण से साफ है कि शुक्ल जी से इसका संबंध इकहरा नहीं था । शुक्ल जी की प्रकृति चित्रण संबंधी मान्यताओं पर छायावादी काव्यरुचि का प्रभाव है । मुक्त छंद के प्रति प्रशंसा भाव न होने के बावजूद छंद कोध्वनि आवर्तों का पैटर्नमानने के पीछे निराला की छंद संबंधी राय की प्रतिध्वनि महसूस की जा सकती है । छायावाद के भीतर भाषा के लाक्षणिक प्रयोग को देखकर उन्होंने घनानंद में भी इस विशेषता का जिक्र किया । अगर वे छायावाद के विरोधी थे तो ऐसे विरोधी थे जो उससे प्रभावित भी रहे । उनकी आलोचना से छायावाद का भला ही हुआ ।

                                      

Wednesday, July 19, 2017

अक्टूबर क्रांति की सैद्धांतिकी

              
                                         
यह साल सोवियत संघ की बोल्शेविक क्रांति का शताब्दी वर्ष तो है ही, उस क्रांति के सैद्धांतिक सवालों को सटीक तरीके से उठाने और सुलझाने वाली लेनिन की मशहूर किताब ‘राज्य और क्रांति’ के लेखन का भी शताब्दी वर्ष है । अक्टूबर क्रांति के युगांतरकारी स्वरूप के बारे में ढेर सारे विद्वानों ने लिखा है । रूस की उस क्रांति का प्रभाव इतना गहरा था कि आज भी तमाम विकसित और विकासशील दुनिया में उसकी प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है । वह क्रांति वाम आंदोलन के भीतर के अवसरवाद और अराजकतावाद से निर्मम वैचारिक लड़ाई लड़ते हुए संपन्न हुई थी । इस तीखी लड़ाई का अक्स इस किताब में मौजूद है ।
रूसी क्रांति का गहरा रिश्ता प्रथम विश्व युद्ध से है । इसी विश्व युद्ध ने अन्य सामाजिक जनवादियों से लेनिन को अलग कर दिया था । दूसरे इंटरनेशनल से जुड़े अन्य नेताओं ने जहां इस युद्ध में अपने अपने देशों के शासकों का साथ दिया था वहीं लेनिन ने इस युद्ध के जनविरोधी साम्राज्यवादी चरित्र को पहचानकर इससे पैदा संकट का क्रांति की जीत के लिए इस्तेमाल किया । रूस की अक्टूबर क्रांति पूरी व्यावहारिक के साथ साथ सैद्धांतिक तैयारी के साथ संपन्न हुई थी । 1917 की फ़रवरी में जो क्रांति हुई उससे जारशाही का खात्मा हो गया और एक अस्थायी सरकार का गठन हुआ । तबसे लेकर अक्टूबर तक का समय दोहरी सत्ता का समय था । अस्थायी सरकार के साथ ही जनता के बीच से स्वत:स्फूर्त रूप से उपजी सोवियतें भी मौजूद थीं । मुख्य रूप से सैनिकों और मजदूरों की इन सोवियतों में आम तौर पर वामपंथियों का प्रभुत्व था । असल जीवन में इन सोवियतों के आदेश ही लागू होते थे । इसी माहौल में जनता के भीतर बढ़ते विक्षोभ ने अस्थायी सरकार और सोवियतों को एक दूसरे के आमने सामने खड़ा कर दिया था । बुर्जुआ राज्य और जनता के प्रतिनिधियों की सत्ता का यह विरोध एक हद तक इस किताब के सैद्धांतिक स्वरूप की आत्मा है ।
सैनिक युद्ध से ऊबे हुए थे । उनके बीच बोल्शेविकों की शांति संबंधी अपील तेजी से असर कर रही थी । अस्थायी सरकार लगातार अलोकप्रिय होती जा रही थी । क्रांति आसन्न थी । सरकार में शामिल लोग बोल्शेविकों के विरुद्ध वैचारिक हमला जारी रखे हुए थे । क्रांति में बोल्शेविकों को नेतृत्व देने के लिए लेनिन जुलाई में पेत्रोग्राद लौटे ही थे कि उनके जर्मनी के मुखबिर होने की अफवाह उड़ा दी गई । अचानक बोल्शेविकों के लिए पेत्रोग्राद सुरक्षित नहीं रह गया । जगह जगह उन पर हमले होने लगे । सोवियतों की सत्ता ने बोल्शेविकों को दमन न होने का भरोसा दिया लेकिन अस्थायी सरकार ने नेताओं की गिरफ़्तारी का हुक्म जारी कर दिया । शुरू में लेनिन ने गिरफ़्तारी देकर मुकदमे का सामना करने का फैसला किया लेकिन माहौल इतना खराब था कि साथियों की सलाह पर जुलाई के शुरू में उन्हें गुप्त तरीके से शहर छोड़ना पड़ा । सुदूर देहात में गुप्त जीवन बिताते हुए लकड़ी के एक कुन्दे को कुर्सी और दूसरे को मेज बनाकर दो महीने में उन्होंने यह किताब लिखी । उन्हें बचने की उम्मीद नहीं थी इसलिए निर्देश लिखा कि कुछ हो जाने पर नीली नोटबुक कोराज्य और क्रांतिके रूप में छाप दिया जाए ।
इस तरह की सैद्धांतिक किताब की जरूरत उन्हें एकाध साल पहले से ही महसूस हो रही थी । उन्होंने बुखारिन के चिंतन में राज्य के सिलसिले में मार्क्सवादी समझ से भटकाव देखा और इस किताब की योजना बनाई । 1917 के शुरू में प्रवास के दौरान किताब के लिए सामग्री उन्होंने तैयार कर ली थी । स्विट्ज़रलैंड से रूस के लिए आते हुए यह सामग्री वे पीछे छोड़ आए थे । जुलाई विद्रोह की असफलता के बाद इसी सामग्री के आधार पर यह किताब लिखी गई थी । उन्हें इसकी जरूरत महसूस हुई क्योंकि न केवल प्लेखानोव बल्कि काउत्सकी भी इस सवाल पर भ्रमित दिखाई पड़े । सात अध्यायों में किताब लिखने की योजना थी लेकिन 1905 और 1917 की क्रांतियों के अनुभव संबंधी सातवां अध्याय लिखा नहीं जा सका । उसका खाका बना लिया था । लगा कि उस पर विस्तार से लिखना होगा इसलिए जो सामग्री थी उसे ही प्रकाशित करवा लिया ।
पांडुलिपि में लेखक के बतौर एफ़ एफ़ इवानोव्सकी का नाम दर्ज था । लेनिन को लगा था कि उनके नाम से छपने पर किताब जब्त हो जाएगी । आखिरकार इसका प्रकाशन 1918 में हो सका । उस समय तक किसी छद्म नाम की जरूरत ही नहीं रह गई थी । 1919 में दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ जिसमें किताब के दूसरे अध्याय में ‘मार्क्स ने 1852 में प्रश्न को किस तरह पेश किया था’ शीर्षक नया अनुभाग जोड़ा गया ।
इस किताब में लेनिन का केंद्रीय तर्क यह है कि राज्य का उदय ही वर्ग विभाजित समाज में शासक वर्ग की सत्ता को दमन के सहारे बनाए रखने के लिए हुआ था । यही नहीं राज्य की मौजूदगी का मतलब है कि समाज में न केवल परस्पर विरोधी वर्ग और उनके स्वार्थ बने हुए हैं बल्कि उनके बीच का अंतर्विरोध असमाधेय है । असल में अक्टूबर क्रांति से पहले जब फ़रवरी क्रांति में जारशाही का अंत हो गया और अस्थायी सरकार का गठन हुआ तो इस अस्थायी सरकार में शामिल विभिन्न वामपंथी गुटों में परिस्थिति के दबाव के चलते राज्य के बारे में तमाम किस्म के भ्रम फैल रहे थे । कुछ लोगों को लग रहा था कि चूंकि राज्य वर्गोपरि हो जाता है इसलिए उसका उपयोग किया जा सकता है । दूसरे सिरे पर अन्य लोग तत्काल राज्य के खात्मे के पक्ष में थे ।
इस स्थिति में लेनिन को राज्य के बारे में मार्क्सवादी धारणा को स्पष्ट करना सैद्धांतिक से अधिक व्यावहारिक सवाल महसूस हुआ । उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य की भूमिका वर्ग संघर्ष को खत्म करने की नहीं होती । उसकी मौजूदगी ही वर्ग संघर्ष के तीखेपन का प्रमाण है । इसी सिलसिले में पेरिस कम्यून से ली गई मार्क्स की सीख को भी बार बार किताब में दोहराया गया है । मार्क्स ने कहा था कि सर्वहारा का काम पहले से मौजूद राज्य की बनी बनाई मशीनरी से नहीं चल सकता । उसे राज्य की अपनी मशीनरी का निर्माण करना होता है । इसे मार्क्स की तरह ही लेनिन ने भीसर्वहारा की तानाशाहीके जरिए लागू होता दिखाया है । लेनिन इस बात पर जोर देते हैं कि बुर्जुआ राज्य का ध्वंस सर्वहारा का कर्तव्य है । इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए लेनिन नियमित सेना की जगह पर सशस्त्र जन मिलीशिया की स्थापना, राज्य के कामों की जटिलता को समाप्त करके नौकरशाही को अप्रासंगिक बना देने और अल्पतंत्र की तानाशाही के बरक्स बहुमत की तानाशाही कायम करने का उपाय सुझाते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि अक्टूबर क्रांति के बाद बनने वाली व्यवस्था के लिए ये बेहद ठोस सवाल थे । अचरज नहीं कि नई सत्ता के मंत्रियों ने अपने आपको संबंधित विभागों का जन कमीसार कहना पसंद किया ।
बुर्जुआ राज्य और क्रांति के बाद स्थापित होने वाली सत्ता के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण अंतर की ओर लेनिन ने पेरिस कम्यून संबंधी मार्क्स के लेखन के सहारे इशारा किया । मार्क्स ने कहा था कि पेरिस कम्यून ने विधायिका और कार्यपालिका को मिला दिया था । असल में अगर कार्यपालिका अलग रहती है तो विधायिका केवल बहसबाजी का अड्डा बनकर रह जाती है । लोकतंत्र वहीं तक सीमित रह जाता है और राज्य के असली काम नौकरशाही के जरिए कार्यपालिका निपटाती है । संसार के लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों में विधायिका की इस कमजोरी को महसूस किया जाता रहा है । बुर्जुआ लोकतांत्रिक राज्य की जान विधायिका नहीं, सैन्यतंत्र और नौकरशाही का ढांचा होता है । क्रांति के बाद स्थापित होने वाली सत्ता का काम इस मुखौटे को वास्तविक ताकत में बदलना है । राज्य के काम को संचालित करने वाली वास्तविक संस्थाओं को जनता के नियंत्रण में लाकर ही उन्हें कारगर बनाया जा सकता है । विधायिका और कार्यपालिका के इस एकीकरण को सिद्धांत और व्यवहार की एकता की व्यापक सोच के मुताबिक समझा गया । इसका संबंध समाज के संचालन को अधिकाधिक आसान बनाने से भी है ।
आज भी इस किताब की प्रासंगिकता को समझा जा सकता है । अनेक वामपंथी नेता वर्तमान राज्य कोकल्याणकारी राज्यमें तब्दील करने की बात करते देखे जा सकते हैं और इसमें तत्कालीन भ्रमों की अनुगूंज सुनना मुश्किल नहीं है । बुर्जुआ शासन को अल्पतंत्र की तानाशाही मानने की प्रतिध्वनि 1% के शासन की धारणा में महसूस किया जा सकता है । उसके मुकाबले 99% की वंचना की समझ मार्क्स से उपजी थी किंतु लेनिन के जरिए हम तक पहुंची है । सबसे पुराने लोकतंत्र का दावा करने वाले देश अमेरिका में भी तमाम राजनेता इस बात को मानने लगे हैं कि देश की असली ताकत कांग्रेस के चुने हुए प्रतिनिधियों के मुकाबले थैलीशाहों, जासूसी और निगरानी की संस्थाओं तथा सेना के हाथों में केंद्रित होती गई है ।   

अंध-राष्ट्रवाद की तत्कालीन बीमारी भी अक्सर वाम राजनीतिज्ञों के एक हिस्से को आज भी बुर्जुआ शासकों के साथ खड़ा कर देती है । जिस तरह उस समय के रूस में जर्मनी के विरुद्ध उन्माद से लेनिन ने लोहा लिया था उसी तरह कई बार हमें भी पड़ोसी मुल्कों के विरुद्ध उन्माद से जूझना पड़ता है । बुर्जुआ वर्ग के पास सर्वहारा को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल देने का सबसे आजमाया हुआ हथियार युद्धोन्माद है । युद्ध और कुछ नहीं संकटग्रस्त पूंजी के पुनर्गठन का माध्यम होता है । इसके सहारे वह अपने बर्बर शोषक शासन के लिए वैधता तो हासिल करता ही है देश की सीमा के भीतर भी विभिन्न समुदायों के कत्लेआम के लिए उकसावा प्रदान करता है । ऐसी स्थितियों में लेनिन की यह किताब हमें हमेशा भ्रम और निराशा से बाहर निकालने में मदद करती रहेगी ।                                 

Sunday, July 2, 2017

इक्कीसवीं सदी में अक्टूबर क्रांति

                
                                            
अक्टूबर क्रांति को महज सौ साल बीते हैं लेकिन उसकी बात प्रागैतिहासिक काल जैसी महसूस होती है । क्रांति का अर्थ सूचना-संचार की तकनीकों के लिए सीमित हो चला है और राजनीतिक क्रांति की कल्पना कठिन हो गई है । इसकी प्रासंगिकता ही संदेह के घेरे में है और हालात में बदलाव को वर्तमान व्यवस्था के भीतर ही खोजा जा रहा है । फिर भी रह रह कर दबी हुई आग की तरह रूसी बोल्शेविक क्रांति की भावना धधक उठती है । रूसी बोल्शेविक क्रांति के बारे में पूरी बीसवीं सदी में और इक्कीसवीं सदी के इन वर्षों में जो भी बातें हुईं या हो रही हैं उन सबके साथ राजनीति जुड़ी हुई है । इसका कारण है कि अतीत का कोई भी मूल्यांकन शुद्ध रूप से वस्तुगत नहीं होता । हमारी वैचारिक मान्यताओं से इतिहास के बारे में हमारी राय प्रभावित होती है । रूसी क्रांति के मामले में ये मान्यताएं और भी दृढ़ रही हैं ।
अंतर्राष्ट्रीय वाम आंदोलन में मार्क्स की विरासत के स्वाभाविक दावेदार जर्मनी के सामाजिक जनवादी थे  लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के समय लेनिन को छोड़कर लगभग सभी सामाजिक जनवादियों ने अपनी अपनी सरकारों का साथ दिया था । ये लोग दूसरे इंटरनेशनल से जुड़े हुए थे । अकेले लेनिन ने इसे साम्राज्यवादी युद्ध माना और इससे उपजे हालात का लाभ क्रांति के लिए उठाया । रूस एशिया और यूरोप दोनों में बंटा हुआ था । लेनिन को उम्मीद थी कि रूसी क्रांति के प्रभाव से यूरोप में क्रांतियों की लहर पैदा होगी । खासकर उन्हें जर्मनी से बहुत आशा थी । इतिहास की वास्तविक गति में ऐसा कुछ हुआ नहीं और रूस को अपने बल पर ही क्रांति को टिकाए रखना पड़ा ।
इसके चलते पश्चिमी मार्क्सवाद की धारा और रूसी क्रांति से प्रभावित कम्यूनिस्टों की तीसरे इंटरनेशनल की धाराएं अलग अलग विकसित हुईं । पश्चिमी मार्क्सवाद से जुड़े लोग रूसी क्रांति और उसके नेताओं को मान्यता देने में हिचकते हैं । कुछ लोग इसके लिए ग्राम्शी, रोज़ा लक्जेमबर्ग, क्लारा जेटकिन और लूकाच को लेनिन के विरोध में खड़ा करके उनका साथ देने लगते हैं । कुछ अन्य लोग लेनिन को तो मान्यता दे देते हैं लेकिन स्तालिन के सवाल पर अड़ जाते हैं । उदाहरण के लिए प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार एरिक हाब्सबाम ने जब बीसवीं सदी में मार्क्सवाद के उत्थान पतन का जायजा लिया तो उन्होंने विभिन्न दौरों में मार्क्सवाद की उठती गिरती किस्मत पर प्रकाश डाला । इन दौरों में जहाँ पहला दौर 1880 से 1914 का है वहीं दूसरा दौर सीधे 1929 से 1945 का है । बीच का 1914 से 1929 तक का दौर, हो सकता है, बिना किसी कारण के छोड़ दिया गया हो लेकिन लेनिन के बाद सोवियत संघ और अन्य मुल्कों में हो रहे विकास के प्रति लेखक की अरुचि की झलक भी इससे मिलती है ।
आम धारणा ही स्तालिन को तानाशाह मानती है लेकिन जो मार्क्सवादी हैं उनमें से भी एक हिस्सा स्तालिन के मुकाबले त्रात्सकी के समर्थन में खड़ा हो जाता है । यह सवाल रूसी क्रांति की अवधि के मामले में दुबिधा का रूप ले लेता है । इसके अतिरिक्त स्तालिन के शासन काल में हिटलर की सेनाओं के साथ युद्ध में सोवियत सेना की जीत के चलते थोड़ी दुबिधा यहां भी बनी रहती है । आगे जिन किताबों और लेखकों का जिक्र किया जा रहा है उनके प्रसंग में ये सारे सवाल प्रकट होंगे ।   
1996 में पिमलिको से ओरलैन्डो फ़िगेस की किताब ‘ए पीपुल’स ट्रेजेडी: द रशियन रेवोल्यूशन, 1891-1924’ का प्रकाशन हुआ । भूमिका में वे बताते हैं कि आजकल इतने छोटे बदलावों को भी क्रांति कहने का रिवाज चल पड़ा है कि इस किताब में जिसको क्रांति कहा गया है उसकी व्यापकता को समझने में पाठक को दिक्कत महसूस होगी । रूसी क्रांति प्रभाव के मामले में दुनिया के इतिहास की कुछेक बड़ी घटनाओं में से एक थी । इसके घटित होने के एक पीढ़ी बाद ही दुनिया की एक तिहाई आबादी इसके विचारधारात्मक असर वाले शासन में आ गई । इसने समकालीन दुनिया की शक्ल परिभाषित की और इसकी छाया से बाहर आना बस अभी सम्भव हुआ है । इन्हीं की एक किताब रेवोल्यूशनरी रशिया, 1891-1991: ए पेलिकन इंट्रोडक्शनका प्रकाशन 2014 में पेलिकन से हुआ है । किताब का मकसद रूसी क्रांति को दीर्घकालीन इतिहास के नजरिए से देखना है । लेखक ने सौ सालों को एक ही क्रांतिकारी चक्र के बतौर व्याख्यायित किया है । इसकी शुरुआत 1891 में अकाल के समय ज़ार की तानाशाही के साथ जनता के टकराव से होती है और खात्मा 1991 में सोवियत सत्ता के अंत से होता है । रूसी क्रांति के अधिकतर वर्णन 1917 से थोड़ा पहले से शुरू होकर 1917 के थोड़ा बाद जाकर खत्म हो जाते हैं । लेकिन लेखक का मानना है कि रूसी क्रांति के समूचे चरित्र को समझने के लिए रूस के दीर्घकालीन इतिहास को देखने से हम उसके बीज, उसकी हिंसा, स्वतंत्रता के बाद तानाशाही की परिघटनाओं को रूस के ज़ारशाही अतीत के सहारे समझ सकते हैं । क्रांति के प्रभाव की दीर्घकालिकता भी लम्बे समय के इतिहास से ही स्पष्ट होती है । रूसी क्रांति को बहुत सारे लोग 1921 में गृहयुद्ध के खात्मे के साथ खत्म मान लेते हैं, कुछ लोग 1924 में लेनिन के देहान्त तक उसकी व्याप्ति मानते हैं । कुछ लोग 1927 में त्रात्सकी की पराजय से उसे जोड़ते हैं, कुछ अन्य 1929 में जबरिया खेती के समूहीकरण और उद्योगीकरण तथा पंच वर्षीय योजनाओं तक उसकी निरंतरता स्वीकार करते हैं । लेखक ने इन सबसे अलग रुख अपनाया है ।  
सभी मानते हैं कि रूस के पतन के शुरुआती झटके के तुरंत बाद इक्कीसवीं सदी से थोड़ा पहले ही मार्क्सवाद में व्यापक रुचि पैदा हुई । इस रुचि का दायरा केवल मार्क्सवाद नहीं बल्कि उसके रूसी व्यवहार तक भी फैला हुआ था । उदाहरण के लिए 1999 में यू सी एल प्रेस से मर्क सैंडल की किताब ‘ए शार्ट हिस्ट्री आफ़ सोवियत सोशलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । इसमें भी लेखक ने रूसी इतिहास के 1917 से 1991 तक के समय को समाजवादी प्रयोग का समय माना है ।  
2000 में मैकमिलन से राबर्ट सर्विस की किताब ‘लेनिन: ए बायोग्राफी’ का प्रकाशन हुआ । फिर 2002 में पैन बुक्स से उसका प्रकाशन हुआ और 2008 में पैन बुक्स ने ही उसका ईलेक्ट्रानिक संस्करण जारी किया । लेखक का कहना है कि सोवियत संघ में कम्यूनिस्ट पार्टी के संग्रहालय को शोध हेतु खोल देने से उन्हें बाकी जीवनियों के मुकाबले ज्यादा सामग्री देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।
लेनिन के व्यक्तित्व की उपलब्धियों को गिनाते हुए लेखक ने बोल्शेविक नामक एक गुट को ऐसी पार्टी में बदल देने का उल्लेख किया है जिसने 1917 की क्रांति को संपन्न किया । इस क्रांति के फलस्वरूप दुनिया के इतिहास की पहली समाजवादी सत्ता की स्थापना हुई और तमाम विपरीत स्थितियों में भी कायम रही । प्रथम विश्व युद्ध और गृह युद्ध से सफलतापूर्वक देश को बाहर निकाला गया । कम्यूनिस्ट इंटरनेशनल की स्थापना करके पूरे महाद्वीप की राजनीति को इस सत्ता ने प्रभावित किया । इन सबका कारण यह था कि लेनिन का शुरुआती जीवन रूसी समाज के इतिहास के एक विचित्र समय में गुजरा । उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में रूसी साम्राज्य बुनियादी परिवर्तन से गुजर रहा था और उसी के साथ लेनिन की पीढ़ी ऐतिहासिक बदलावों के भंवर में उलझी हुई थी । दुनिया का सबसे बड़ा देश अपनी संभावनाओं को खोल और परख रहा था । पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन ढीले पड़ रहे थे । अंतर्राष्ट्रीय संपर्क बढ़ रहा था और रूस की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों को सारा संसार अचम्भे से देख रहा था ।    
लेखक का कहना है कि फिर भी शिक्षित लोगों को बदलाव की रफ़्तार बेहद सुस्त महसूस हो रही थी । उन्हें लगता था कि रूस इतना विराट, इतना विविध और इतना परंपराबद्ध है कि बदल नहीं सकता । रूसी समाज बदलाव का आदी नहीं था । 1861 में अलेक्सान्द्र द्वितीय ने कुछ बदलाव लाने की कोशिश की थी लेकिन बदलाव के समक्ष मुश्किलें बहुत थीं । अमीर-गरीब के बीच चौड़ी खाई थी । देहात की किसान आबादी अपनी दुनिया से बाहर कुछ नहीं सोचती थी । सरकारी अधिकारियों और संपत्तिशाली लोगों के विरुद्ध विक्षोभ फैला हुआ था । दूसरी ओर कोयला, लोहा, हीरा, सोना और तेल का विशाल भंडार था । विशाल भूक्षेत्रों में प्रचुर अन्न पैदा होता था । सुसंस्कृत कुलीन तबका था । महान उपन्यासकार, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ और चित्रकार थे । पेशेवर मध्यवर्ग की तादाद में बढ़ोत्तरी हो रही थी । स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं विकसित हो रही थीं । नौकरशाही में कुलीनों के मुकाबले पेशेवर लोग अधिक दाखिल हो रहे थे । इस संक्रमण से उथल पुथल पैदा हो रही थी । यथास्थिति के विरोधी, सदियों से समाज का दमन करनेवाली बादशाहत के विरोध में हिंसक उपाय अपना रहे थे । किसानी समाजवाद के पक्षधर अपनी विचारधारा का प्रचार करते थे । उदारपंथी भी थे लेकिन सदी का अंत आते आते जार की तानाशाही के विरुद्ध सबसे प्रभावी विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद स्थापित हो गया । जार और पूंजीवाद के अनेक पहलुओं के विरुद्ध बौद्धिक और मेहनतकश हलकों में व्याप्त माहौल से लेनिन को बहुत लाभ मिला । प्रथम विश्व युद्ध में रूस की हालत ने शासन विरोधी माहौल बनाने में मदद की ।
लेनिन पर अपने समय का प्रभाव तो था ही, समय पर उनका प्रभाव भी कुछ कम गहरा नहीं था । पैतृक घर में शिक्षा को उन्नति की राह समझा जाता था । शिक्षा के चलते उन्हें विदेशी भाषाओं को सीखने का मौका मिला, विज्ञान के प्रति लगाव पैदा हुआ और समाज को समझने में सहायक विचारधाराओं से प्रेम हुआ । उन्हें अपनी भावनाओं को काबू में रखना आता था और अपने क्रोध को जुझारू आक्रामकता का रूप देकर वे लंबे समय तक राजनीतिक लड़ाई लड़ सकते थे । अपनी बुनियादी मान्यताओं को उन्होंने दृढ़ता के साथ पकड़े रखा । मार्क्सवाद के अलावा रूसी साहित्य का भी उन पर अमिट असर पड़ा था । छपे हुए शब्दों से उनका नाता अधिक गहरा था । लेनिन घनघोर पढ़ाकू और प्रचंड लिक्खाड़ थे, वक्ता उतने प्रभावी न थे । अध्ययन और राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण 1917 में उन्होंने सत्ता दखल की पटकथा लिखी । नतीजतन अक्टूबर में सत्ता दखल को अंजाम दिया । मार्च 1918 में ब्रेस्त-लितोव्स्क की संधि के जरिए रूस पर जर्मनी के हमले को रोका । 1921 में नई आर्थिक नीति लागू करके उन्होंने नवजात सोवियत संघ को जन विक्षोभ से उबारा । इन सभी मौकों पर लेनिन द्वारा संचालित अभियानों ने घटनाओं की दिशा तय की । 
इसी कड़ी में 2002 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ए वेरी शार्ट इंट्रोडक्शन नामक पुस्तक श्रृंखला के तहत स्टीव स्मिथ की किताब ‘द रशियन रेवोल्यूशन: ए वेरी शार्ट इंट्रोडक्शन’ का प्रकाशन हुआ । लेखक ने फ़रवरी और अक्टूबर की क्रांतियों को निरंतरता में देखा है क्योंकि फ़रवरी में ज़ारशाही को उखाड़ फेंका गया और अक्टूबर में बोल्शेविकों ने सत्ता पर कब्जा किया । इसी साल पालग्रेव से जान गुडिंग की किताबसोशलिज्म इन रशिया: लेनिन ऐंड हिज लीगेसी, 1890-1991’ का प्रकाशन हुआ । किताब में लेखक ने बीसवीं सदी में रूस में किए गए समाजवादी प्रयोग के सिलसिले में कुछ बुनियादी सवालों का जवाब देने की कोशिश की है । पहला तो यह कि रूस जैसे पिछड़े अर्ध-एशियाई देश में मार्क्सवाद से प्रभावित समाजवादी विचारों ने कैसे जड़ पकड़ी । इसका जवाब देते हुए वे कहते हैं कि मजबूत भौतिक आधार न होने के बावजूद रूसी समाज को समाजवाद की सबसे अधिक जरूरत थी । लेखक ने रूसी क्रांति की मौजूदगी 1917 के बाद आगामी चौहत्तर सालों तक मानी है ।
2003 में रटलेज से स्टीफेन जे ली की किताब ‘लेनिन ऐंड रेवोल्यूशनरी रशिया’ का प्रकाशन हुआ । किताब इस बात का सबूत है कि मार्क्स के नवोत्थान के साथ उस क्रांतिकारी मार्क्सवादी परंपरा का भी उत्थान हो रहा है जिसे कम्यूनिस्ट आंदोलन की बहसों की गरमी में त्याग सा दिया गया था ।
इसके अगले साल ही 2004 में पालग्रेव मैकमिलन से आर डब्ल्यू डेविस की नई भूमिका के साथ ई एच कार की किताब ‘द रशियन रेवोल्यूशन: फ़्राम लेनिन टु स्तालिन (1917-1929)’ को फिर से छापा गया । मूल रूप से 1979 में इसका प्रकाशन हुआ था । ई एच कार ने तीस साल लगाकर चौदह खंडों में सोवियत संघ का इतिहास लिखा था । उसी सामग्री के आधार पर उन्होंने यह किताब विद्यार्थियों के लिए लिखी थी । सोवियत संघ की समाजवादी व्यवस्था की समस्याओं को गहराई से समझने की इस ऐतिहासिक कोशिश को पलटकर इस समय देखने पर पता चलता है कि क्रांति के बाद नवस्थापित सोवियत सत्ता को इतिहास में पहली बार ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था जिसका न तो मानवता ने कभी सामना किया था, न ही क्रांति के नेतागण को इनके समाधान का कोई अनुभव रहा था । फिर भी विपरीत स्थितियों से जूझते हुए रचनात्मक तरीके से जीवित मनुष्यों के उस समाज में जमीन से उठकर आए सेना और मजदूर समुदाय के नेताओं ने इसे कर दिखाया ।  
2005 में द यूनिवर्सिटी आफ़ मिशिगन प्रेस से मोशे लेविन की किताब ‘लेनिन’स लास्ट स्ट्रगल’ का प्रकाशन हुआ । किताब मूल रूप से लेनिन द्वारा संकट के समय अपनाई गई नई आर्थिक नीति से जुड़े संघर्षों का विश्लेषण करती है । नई आर्थिक नीति का महत्व यह है कि उसके जरिए लेनिन ने योजना और बाजार के समन्वय की दिशा में एक गंभीर प्रयोग किया था । इसी के साथ लेनिन इस समस्या से भी जूझ रहे थे कि जो क्रांति जनता की मुक्ति के लिए हुई थी उससे उत्पन्न राज्य अपने आपमें ऐसा ढांचा बन गया जो मुक्ति के लिए बाधक साबित हो रहा था । ये दोनों समस्याएं आपस में जुड़ी हुई थीं । अर्थतंत्र और प्रशासन के क्षेत्र में जनता की पहलकदमी और पार्टी ढांचे के बीच तालमेल की कोशिश ही लेनिन के जीवन के अंतिम साल का सबसे घनघोर संघर्ष था ।
2006 में अजंता बुक्स इंटरनेशनल से रणधीर सिंह की किताब क्राइसिस आफ़ सोशलिज्म का प्रकाशन हुआ । किताब में समाजवाद के संकट की बात करते हुए रूस में घटित घटनाओं को समझने की कोशिश की गई थी । रणधीर सिंह ने रूस के पतन को किसी घटना या तारीख में देखने की जगह एक प्रक्रिया के रूप में देखा । उन्होंने इस घटना से कुछ सैद्धांतिक सवाल भी उठाए । उनका कहना था कि सत्ता पर बोल्शेविकों के काबिज होने के बाद से ही नौकरशाही का विकास शुरू हो गया । शुरू में लेनिन और बाद में स्तालिन ने इससे लड़ाई जारी रखी लेकिन स्तालिन की मृत्यु के बाद इस तबके ने शासन और पार्टी दोनों पर कब्जा कर लिया । इस प्रक्रिया का विस्तार से विश्लेषण करने के बाद रणधीर सिंह ने दो जरूरी सवाल उठाए । एक तो यह कि तीसरे इंटरनेशनल द्वारा सूत्रबद्ध वर्तमान दौर की कम्यूनिस्ट पार्टियों के सांगठनिक ढांचे में इस नौकरशाही से बचने या पैदा होने के बाद उससे लड़ने की कोई संस्थाबद्ध आंतरिक प्रक्रिया नहीं है । दूसरे यह कि क्रांति के बाद सत्ता मिलने पर वर्गों के निर्माण और फिर उसके कारण वर्ग विभेद की स्थिति पैदा हुई थी । इस वर्ग निर्माण के कारणों और इससे पैदा समस्याओं को हल करने का कोई रास्ता मार्क्सवाद के भीतर नहीं है । स्वाभाविक है कि इन हालात की पूर्व कल्पना मार्क्स-एंगेल्स के लिए कठिन थी ।       
2014 में पालग्रेव मैकमिलन से अगस्त एच निम्ज़ की किताब ‘लेनिन’स एलेक्टोरल स्ट्रेटेजी फ़्राम 1907 टु द अक्टूबर रेवोल्यूशन आफ़ 1917: द बैलट, द स्ट्रीट्स- आर बोथ’ का प्रकाशन हुआ । यह किताब रूसी क्रांति के बारे में लिखी गई अन्य किताबों से इस मामले में अलग है कि जब हम रूसी क्रांति की बात करते हैं तो भूल जाते हैं कि लेनिन ने चुनाव भी लड़े थे । लेखक का दावा है कि बोल्शेविकों की चुनावी रणनीति से अक्टूबर क्रांति का बहुत गहरा रिश्ता है । इस मामले में रूसी क्रांति अब तक की सभी क्रांतियों से अलग है कि उसमें चुनाव अभियानों से हासिल अनुभवों का भरपूर रचनात्मक इस्तेमाल किया गया था ।

2016 में मंथली रिव्यू प्रेस से समीर अमीन की किताब ‘रशिया ऐंड द लांग ट्रान्जीशन फ़्राम कैपिटलिज्म टु सोशलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । किताब में रूस के दानवीकरण की कोशिशों का विरोध किया गया है । उनका कहना है कि पश्चिमी संचार माध्यमों द्वारा रात दिन यह प्रचारित किया जा रहा है कि रूस में ज़ारशाही की विरासत को सोवियत संघ के नाम पर जारी रखा गया था । रूस की ऐसी छवि बनाई जा रही है कि जैसे ज़ारशाही के समय उससे बचकर रहना पड़ता था उसी तरह आज भी बचने की जरूरत है और बचाने की जिम्मेदारी अमेरिका और नाटो की संहारक सैन्य शक्ति को दे दी गई है । समीर अमीन की इस किताब में शामिल लेख 1990 से लेकर 2015 के बीच के लिखे हुए हैं । उन्हें उम्मीद है कि इनके जरिए पश्चिमी दुनिया में प्रचारित छवि के विपरीत रूस की वैकल्पिक छवि देखने का मौका पाठकों को मिलेगा ।
2017 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से मार्क डी स्टाइनबर्ग की किताबद रशियन रेवोल्यूशन, 1905-1921’ का प्रकाशन हुआ है । लेखक का जोर रूसी क्रांति की कहानी को लोगों के अनुभव के रूप में बताने पर है । इस क्रांति की कहानी भांति भांति से सुनाई गई है । इस क्रांति के तमाम कारण बताए जाते हैं । ऐसा करते हुए संस्थाओं, नेताओं और विचारधाराओं की भूमिका को खासा महत्व दिया जाता है । सामाजिक इतिहास में रूसी समाज के ऊपरी और निचले तबकों की बढ़ती हुई सामाजिक गोलबंदी को घटनाक्रम का प्रधान कारण बताया जाता है । इसी के तहत मनोवृत्तियों और दृष्टिकोणों की जटिल दुनिया में झांकने की कोशिश की जाती है । अनुभव आधारित इतिहास लेखन में जीवंत भागीदारी का सहारा लिया गया है । बाहरी दुनिया के साथ हमारे आंतरिक संवाद को अनुभव कहा जा सकता है । अपने आप से बाहर के अस्तित्व के साथ यह ऐसा टकराव होता है जो हमें अप्रत्याशित तरीके से बदल देता है । दुनिया के बारे में हमारे परिपक्व और विकसित ज्ञान को भी अनुभव कहा जाता है । कुछ हद तक यह व्याख्या भी होता है । अतीत के बारे में हमारे ज्ञान और व्याख्या पर अतीत की अपनी व्याख्या और ज्ञान का प्रभाव पड़ता है । इतिहासकार कोशिश करते हैं कि अतीत के प्रामाणिक अनुभव तक पहुंचें लेकिन ऐसा संभव नहीं होता । अलग बात है कि इस क्रम में तमाम चीजें हाथ लगती हैं । इस यात्रा में संग्रहालय बड़े काम की चीज होते हैं । इसीलिए प्राथमिक स्रोत का महत्व सबसे अधिक होता है । किताब में अखबारों पर स्रोत के रूप में काफी भरोसा किया गया है । अनुभव के इतिहासकार के लिए अखबार अतीत का वर्तमान होते हैं । हालांकि अखबार का संवाददाता भी अखबार की बिक्री से लेकर राजनीतिक लक्ष्य की सेवा तक विभिन्न तत्वों से प्रभावित होकर कोई भी कहानी सुनाता है । रूस में तो सरकारी सेंसर का भी दबाव रहता था । लोग कहते हैं कि अखबार दर्पण होता है लेकिन साथ ही यह भी जानते हैं कि वे दर्पण के अतिरिक्त भी ढेर सारे काम करते हैं । रूस के पत्रकार हमेशा टिप्पणी और राय की जिम्मेदारी उठाना आवश्यक समझते रहे हैं । इसमें तथ्य और उसकी व्याख्या के बीच संतुलन बनाना मुश्किल होता है । अगर वर्ग या किसी कोटि के बजाए ठोस मनुष्य के रूप में लोगों के अनुभवों तक पहुंचना हो तो इन बातों का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है । किताब में जिन मूल्यों के लिए लोग लड़े उनकी भी चर्चा है । सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक और नृजातीय विषमताओं का भी ध्यान रखा गया है । हिंसा के भी जरिए अभिव्यक्त सत्ता और प्रतिरोध की परिघटना को समेटने की कोशिश की गई है । समझने का प्रयास किया गया है कि लोगों ने स्वतंत्रता को किस तरह समझा, बरता और हासिल किया ।   
2017 में वर्सो से तारिक अली की किताब ‘द डिलेमाज आफ़ लेनिन: टेररिज्म, वार, एम्पायर, लव, रेवोल्यूशन’ का प्रकाशन हुआ है । लेखक के अनुसार किताब का मकसद लेनिन को सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना है । वे ऐसी क्रांति के जनक थे जिसने विश्व राजनीति को बदल दिया, पूंजीवाद और उसके साम्राज्य पर सीधे हमला किया तथा विउपनिवेशीकरण की प्रक्रिया तेज कर दी । इसके लेखन का दूसरा कारण यह है कि वर्तमान शासक विचारधारा और शक्ति संरचना बीसवीं सदी के सामाजिक मुक्ति संघर्षों के प्रति इतनी हिकारत से भरी हुई है कि ऐतिहासिक और राजनीतिक स्मृति का उत्खनन अपने आपमें प्रतिरोध महसूस हो रहा है । अब तो पूंजीवाद का विरोध भी बहुत सीमित हो चला है । सही है कि वर्तमान संघर्ष का लक्ष्य अतीत को दुहराना नहीं होना चाहिए बल्कि उससे सकारात्मक के साथ ही नकारात्मक शिक्षा भी लेनी चाहिए ।
श्री अली का कहना है कि बीसवीं सदी में लेनिन का अतिरिक्त सम्मान करनेवाले उन्हें शायद ही पढ़ते थे । दुनिया भर में तात्कालिक उद्देश्यों के लिए उनकी गलत व्याख्या की गई और उनके विचारों का दुरुपयोग किया गया । उनके विचारों के निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपेक्षा की गई । लेनिन रूसी इतिहास के साथ ही यूरोपीय मजदूर आंदोलन की भी पैदाइश थे । इन्हीं दोनों के भीतर से वर्ग और पार्टी के संबंध का सवाल आया था । इस सवाल पर अराजकतावाद और मार्क्सवाद की धाराओं के बीच होड़ रही थी । इस होड़ में मार्क्सवाद की विजय में लेनिन की निर्णायक भूमिका रही । इसीलिए लेनिन के समक्ष उपस्थित दुबिधा की समझ के लिए लेखक को दोनों धाराओं के इतिहास की छानबीन जरूरी लगती है ।
तारिक अली बताते हैं कि लेनिन के बिना अक्टूबर क्रांति सम्भव नहीं थी । जिस गुट और पार्टी का उन्होंने 1903 से ही तमाम कष्ट उठाकर निर्माण किया था वह फ़रवरी 1917 से अक्टूबर 1917 के बीच के निर्णायक महीनों में क्रांति करने के लिए तैयार नहीं थे । लेनिन की विदेश से वापसी से पहले इसके ढेर सारे नेता महत्वपूर्ण मुद्दों पर समझौता करने को तैयार हो गए थे । इसका मतलब कि क्रांति के लिए ही बनाई गई राजनीतिक पार्टी भी नाजुक मौकों पर विचलित हो जा सकती है । लेनिन ने समझ लिया कि अगर इस मौके पर चूक हो गई तो फिर से प्रतिक्रिया की जीत हो जाएगी । उन्होंने जमीनी समर्थकों के बल पर अनिच्छुक बोल्शेविक नेताओं को क्रांति की पहल करके अपने पीछे चलने को मजबूर कर दिया । इसमें उनको युद्ध से उकताए सैनिकों का सबसे अधिक साथ मिला क्योंकि वे भी कई बरसों से खाइयों-खंदकों में आपस में वही बातें कर रहे थे जो बोल्शेविकों के नारों में व्यक्त हुईं । विश्व युद्ध की थकान ने लेनिन को मौका दिया और उन्होंने उसे लपक लिया । क्रांतियों से इतिहास आगे बढ़ता है । उदारपंथी उसके पीछे पीछे घिसटते हैं ।
प्रथम विश्वयुद्ध में लेनिन को पहली दुबिधा का सामना करना पड़ा था जब बहुतेरे लोग अपने अपने देशों के शासकों के समर्थन में खड़े हो गए उनमें जर्मन समाजवादी कार्ल काउत्सकी भी थे जिनका लेनिन बहुत सम्मान करते थे । साम्राज्यवादी युद्धोन्माद के समक्ष बौद्धिक विचलन से बचाव के लिए लेनिन को मार्क्स के विचारों की समझ पर्याप्त लगती थी । जब कार्ल काउत्सकी ने युद्धोन्माद के सामने समर्पण कर दिया तो उन्होंने जर्मन समाजवादियों से सार्वजनिक तौर पर नाता तोड़ लिया । उनकी दूसरी दुबिधा क्रांति के रास्ते के सिलसिले में उपजी । फ़रवरी 1917 के बाद यह सवाल कोई अमूर्त सवाल नहीं रह गया था । लेनिन ने समाजवादी क्रांति की राह चुनी । उनकी पार्टी के अन्य नेता बाद में समझ सके कि मजदूर वर्ग राजनीतिक रूप से वास्तव में आगे था ।
प्रथम विश्व युद्ध और अक्टूबर से पहले फ़रवरी क्रांति न हुए होते तो लेनिन भी ढेर सारे अन्य प्रवासी क्रांतिकारियों की तरह ही जारशाही के पतन की प्रतीक्षा करते हुए मर गए होते । त्रात्सकी भी एक और उपन्यासकार होकर रह गए होते । लेकिन अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद उसका लाभ उठाने के लिए माकूल संगठन भी जरूरी होता है । इसके न होने के चलते ही दुनिया का इतिहास असफल क्रांतियों की गाथा से भरा हुआ है । हालांकि ढेर सारे लोग मानते हैं कि इतिहास की गति को मनमाने तरीके से तेज नहीं किया जा सकता लेकिन लेनिन का मानना था कि कभी कभी दशकों का काम कुछेक दिनों में निपटाया जा सकता है । अलग बात है कि यूरोप के मामले में उनकी उम्मीद के मुताबिक घटनाक्रम की गति नहीं रही ।
रूसी क्रांति को सही ऐतिहासिक संदर्भ में देखने के लिए तारिक अली ने रूस में पहले से चली आ रही क्रांति की परम्पराओं को याद दिलाया है । इन परम्पराओं में से एक तो क्रांतिकारी आतंक की धारा थी जिससे रूसी बौद्धिक समुदाय का भी एक हिस्सा जुड़ा हुआ था । इस धारा के लोगों ने ज़ार की हत्या की जिसके बाद चले भयानक दमन में इनके छोटे छोटे समूह खत्म हो गए । फिर भी बीसवीं सदी में बनने वाली अधिकतर राजनीतिक पार्टियों पर इस धारा का मजबूत प्रभाव था । ढेर सारे उदारवादी इतिहासकार समझते हैं कि अगर बोल्शेविक न आए होते तो रूस का पश्चिमी किस्म के लोकतंत्र में रूपांतरण हो गया होता । तारिक अली का अनुमान है कि यदि बोल्शेविकों का जन्म न हुआ होता तो पश्चिमी ताकतों के समर्थन से रूस में बड़े पैमाने पर खून खराबे के साथ सैनिक शासन स्थापित हुआ होता । फ़रवरी क्रांति से गठित सरकार रूस में व्याप्त संकट को हल करने में अक्षम थी । ऐसे हालात में या तो बोल्शेविकों के हाथ सत्ता आई होती या सेना के उन अधिकारियों के हाथ जिन्होंने बोल्शेविक क्रांति के बाद समूचे देश को गृहयुद्ध में झोंक दिया । क्रांति के संपन्न न होने पर सुधार का नहीं, प्रतिक्रिया का दौर आता है ।
अक्टूबर क्रांति के चरित्र पर विचार करते हुए वे बताते हैं कि कुछ अन्य लोग अक्टूबर क्रांति को केवल तख्तापलट समझते हैं । सही है कि शहरों में केंद्रित मजदूर वर्ग अल्पसंख्या में था लेकिन अगर देहात में फैले हुए खेतिहरों का समर्थन क्रांति को न मिला होता तो गृहयुद्ध में बोल्शेविकों को हारना पड़ता । क्रांतिकारी दौर में जनता का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत तेजी से होता है । जो किसान पहले बोल्शेविकों के मुकाबले दूसरों का समर्थन करते थे वे तेजी से बोल्शेविकों की तरफ चले आए । कोई भी अगुआ क्रांतिकारी पार्टी अपने दम पर ही जीत नहीं सकती । जो लोग इसे तख्तापलट मानते हैं वे इसमें अंतर्निहित क्रांति को नहीं समझ सकते । बीच में जुलाई में परिस्थिति के अपरिपक्व रहते क्रांति की कोशिश में लगे धक्के के बाद बोल्शेविकों के छापेखाने पर प्रतिबंध लग गया था, अनेक नेता जेल में ठूंस दिए गए और खुद लेनिन को फ़िनलैंड भागना पड़ा था । उन्होंने लगातार कहा कि यह धक्का अस्थायी है, जनता फिर से क्रांति करेगी और उसके लिए पार्टी को तैयार करना चाहिए । केंद्रीय समिति के कुछ महत्वपूर्ण नेतागण यकीन नहीं कर रहे थे और उन्होंने विद्रोह की योजना का विरोध किया । फिर भी विद्रोह हुआ ।
पूंजीवादी राज्य या साम्राज्यवादी सेनाओं के विरुद्ध हथियारबंद विद्रोह की विस्तृत और सटीक तैयारी करनी पड़ती है । विजय हेतु मजदूर और सैनिक योद्धाओं को सुनियोजित नेतृत्व देना जरूरी होता है । प्रत्येक क्रांति की विशेषता होती है लेकिन क्रांतियों में कुछ समरूपता भी होती है । इतिहास की एकाधिक क्रांतियां दो चरणों में पूरी हुईं । इसके उदाहरण के बतौर तारिक अली इंग्लैंड की 1648 की क्रांति, फ़्रांस की 1789 की क्रांति और रूस की बोल्शेविक क्रांति का जिक्र करते हैं । इनमें अंतर यह था कि जहां क्रामवेल और राबेस्पीयर को आगे की ओर घटनाओं ने धकेला वहीं रूस में लेनिन ने घटनाओं का क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया । लेनिन ने अपने इन पूर्ववर्तियों से सीखा कि प्राप्य को हासिल करने के लिए अप्राप्य को पाने का लक्ष्य सामने रखना पड़ता है । इन सभी क्रांतियों को गृहयुद्ध में क्रांतिकारी राज्य की रक्षा के लिए पूरी तरह से नई सैन्य शक्ति का गठन करना पड़ा । इन सेनाओं में उन्नति योग्यता की जगह वर्ग के आधार पर होती थी । लेनिन और अन्य नेताओं में अंतर यह था कि क्रामवेल और राबेस्पीयर ने तब क्रांति में भाग लिया जब उसका होना निश्चित हो गया जबकि लेनिन ने क्रांति के लिए पचीस साल परिश्रम किया था । इसके लिए वे भूमिगत रहे, जेल गए और विदेश भी भागे । तय नहीं था कि उनके जीवनकाल में यह घटित होगी । उन्होंने कहा भी कि उनकी पीढ़ी सफल नहीं भी हो सकती है । वे भविष्य के लिए लड़ रहे हैं । अपनी आकांक्षा को वे कभी यथार्थ नहीं मानते थे । उनका मानना था कि जीत, हार और संक्रमण के समय कठोर क्रांतिकारी यथार्थवाद बेहद जरूरी होता है । केंद्रीय समिति के बहुमत के विरुद्ध जाकर भी क्रांति की सफलता सुनिश्चित करने में लेनिन की भूमिका निर्णायक थी ही, नवोदित राज्य की रक्षा के लिए भी उन्हें बहुधा ऐसा करना पड़ा । ब्रेस्त-लितोव्स्क संधि के समय भी वे अल्पमत में थे । 1917 से 1922 तक पांच साल लेनिन ने सरकार का नेतृत्व किया । गृहयुद्ध में विजय हासिल करना कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी । इस विजय के बाद क्रांतिकारी उत्साह में उतार दिखाई पड़ा । नए हालात में अर्थतंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए छोटे पैमाने पर पूंजीवाद की इजाजत देते हुए नई आर्थिक नीति को लागू किया । इसी बीच प्राकृतिक आपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा । अकाल, सूखा और टिड्डियों का हमला हुआ । मजदूर वर्ग तबाह हो गया । सरकार और पार्टी में मुट्ठी भर बोल्शेविक बचे थे । इस हालत में नौकरशाही का पनपना लाजिमी था । आखिरी दिनों में उनके सामने सबसे कठिन दुबिधा प्रकट हुई । वे पार्टी को नौकरशाह बनने से बचाना चाहते थे । इस संघर्ष का सबूत जो लेखन था उसे सोवियत जनता की जानकारी से बहुत दिनों तक दूर रखा गया था ।
2017 में वर्सो से चाइना मेविल की किताब ‘अक्टूबर: द स्टोरी आफ़ द रशियन रेवोल्यूशन’ का प्रकाशन हुआ । मेविल ने किताब के शुरू में बताया है कि प्रथम विश्व युद्ध के ऐन बीच में जब एक रूसी विद्वान की रूस के आधुनिक इतिहास पर लिखी किताब का अंग्रेजी अनुवाद 1917 में अमेरिका में छपा तो उसके अनुवादक की भूमिका का अंतिम वाक्य हालात में क्रांतिकारी बदलाव की भविष्यवाणी कर रहा था । इस किताब के छपते ही एक क्या दो क्रांतिकारी बदलाव रूस में हुए । एक फ़रवरी में तो दूसरा अक्टूबर में । फ़रवरी से अक्टूबर तक क्रांति की यह प्रक्रिया जारी रही । इस क्रांति की निगाह से स्वतंत्रता की राजनीति को देखा जाता रहा है । लेखक ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी तरह निष्पक्ष नहीं रह सकते । लेखक ने उस क्रांति की कहानी कहने की कोशिश की है । इस कहानी में रूसी विशेषताओं की मौजूदगी से लेखक ने इनकार नहीं किया है । इसके बावजूद उनका ध्यान क्रांति के वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर भी बना रहा है । इस क्रांति पर रूस के साथ पूरी दुनिया का अधिकार है ।