Sunday, March 29, 2020

फ़्रांस में फ़ासीवाद


2020 में ब्लूम्सबरी एकेडमिक से क्रिस मिलिंगटन की किताब ‘ए हिस्ट्री आफ़ फ़ासिज्म इन फ़्रान्स: फ़्राम द फ़र्स्ट वर्ल्ड वार टु द नेशनल फ़्रंट’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि बहुत पहले 2003 में ही उन्हें फ़्रांस में फ़ासीवाद के इतिहास में रुचि पैदा हो गई थी । प्रथम विश्वयुद्ध के बाद से वर्तमान सदी के शुरू तक फ़्रांसिसी चरम दक्षिणपंथी प्रमुख आंदोलनों, पार्टियों और लड़ाकू संगठनों की परीक्षा इस किताब में की गई है । उनके सिद्धांत और व्यवहार, नेता और सदस्य, विरोधियों और शत्रुओं के साथ उनकी होड़ तथा उस समय की राजनीति पर उनके प्रभाव का विश्लेषण भी इसमें किया गया है । जिन पर विचार किया गया है उनमें से कुछ संगठन अपने को खुलेआम फ़ासीवादी घोषित करते हैं । दक्षिणपंथी हलकों में लोकप्रिय होने के बावजूद आम तौर पर फ़ासीवाद को विदेशी विचारधारा माना जाता है और फ़्रांस के लिए उसे अनुचित ठहराया जाता है । फिर भी तमाम संगठनों ने फ़ासीवादी रूप और अंतर्वस्तु को अपने मकसद के लिहाज से अनुकूलित किया है । इसी अर्थ में फ़ासीवाद का एक फ़्रांसिसी संस्करण भी तैयार हुआ है जिसकी थोड़ी झलक इस किताब में मौजूद है ।
इस परिघटना के अध्ययन में बाधा यह थी कि दसियों साल तक इसकी ताकत को लेकर विवाद और असहमति बनी रही थी । फ़्रांसिसी लोकतंत्र के लिए फ़ासिस्ट खतरे के स्तर और महत्व के बारे में मतभेद थे । रेने रेमों नामक विद्वान फ़ासीवाद से दक्षिणपंथी राजनीति को अलगाकर उसे मुख्य धारा की प्रवृत्ति बता रहे थे । वे यह तो मानते थे कि संसद विरोधी चरम दक्षिणपंथी संगठन और पार्टियां मौजूद हैं और उनके सदस्यों में जर्मनी के हिटलरी गिरोहों की तरह वर्दी पहनने और जुलूस निकालने का चलन भी है लेकिन उनका फ़ासीवाद सतही है, अंदर से वे महज समाजार्थिक अनुदारता के विश्वासी हैं । समूची आबादी में इनकी कम संख्या को भी इनके अप्रभावी होने का तर्क बनाया गया । उन्होंने कहा कि फ़्रांस में फ़ासीवाद नहीं है, केवल उसके बेवकूफ नकलची हैं । अपने देश की समाजार्थिक स्थिति को स्थानीय फ़ासीवादी आंदोलन के विकास के लिए प्रतिकूल बताया गया । यह माना गया कि फ़्रांसिसी जनता के विवेक और उसकी राजनीतिक परिपक्वता के चलते इस विदेशी विचारधारा को पनपने का मौका नहीं मिलने वाला है ।
इसके तीस साल बाद ज़ीव स्टर्नहेल ने कहा कि 1930 के दशक में कोई नगण्य राजनीतिक प्रवृत्ति होने की जगह फ़ासीवाद ने फ़्रांसिसी समाज में गहरी पैठ बना ली थी । उन्होंने तत्कालीन बौद्धिक वातावरण में लोकतंत्र के लिए खतरा चिन्हित किया जिसमें फ़्रांस के लिए संसदीय शासन को खारिज किया जाता था । फ़्रांस के लिए तीसरे रास्ते की खोज में फ़ासीवादी विचारों के प्रसार की सहूलियत पैदा हुई । असल में तो फ़्रांस में फ़ासीवाद सत्ता में नहीं आया इसी के चलते सत्ता के लिए समझौतों से वह मुक्त रहा । इस तरह फ़्रांसिसी फ़ासीवाद उनके मुताबिक शुद्ध फ़ासीवाद था । आधुनिक फ़्रांस के इतिहास लेखन में फ़ासीवाद की जगह के सिलसिले में रेमों और स्टर्नहेल दो विरोधी ध्रुवों के प्रतिनिधि हैं । इन दोनों के समर्थकों के बीच बेहद तीखी बहस चलती रही है । दसियों साल के शोध से भी इसके तीखेपन में कोई कमी नहीं आई । अब तो यह बहस ही अध्ययन का विषय हो गई है । बहस के तीखेपन की वजह फ़्रांस के अतीत के प्रति रुख है । पश्चिमी यूरोप में लोकतंत्र की जननी होने का उसका सर्वमान्य दावा खतरे में पड़ जाना था । फ़्रांस की इस छवि को गढ़ने के लिए उसकी सरकार के प्रत्येक कुकृत्य को हिटलरी संसद, मुट्ठी भर जर्मनीप्रेमी, गद्दार चरमपंथी और राजनीतिक अवसरवादियों का दबाव का नतीजा बताया जाता है ।
फ़्रांस के अतीत की ऐसी तस्वीर 1970 दशक के शुरू में बिखर गई । एक डाक्यूमेंटरी फ़िल्म में दिखाया गया कि सरकार ने प्रतिरोध का साथ देने की जगह इंतजार करने की नीति अपनाई थी । उसके अगले साल एक अमेरिकी इतिहासकार ने प्रमाणों के साथ बताया कि तत्कालीन शासक विची ने हिटलरी जर्मनी के साथ कितना करीबी रिश्ता बनाकर रखा था । उसका राजनीतिक कार्यक्रम भी गणतांत्रिक लोकतंत्र की विरासत को मिटाने के लम्बे मसकद से संचालित था । अगर वह शासन फ़ासीवादी नहीं था तो भी उसके बहुत करीब था । फ़्रांसिसी जनता उस शासन का पूरी तरह तो समर्थन नहीं करती थी लेकिन काफी लोग उसका अंत तक साथ देते रहे । देश के साथ विदेश के भी विद्वानों ने माना कि तत्कालीन दक्षिणपंथी तानाशाही के फ़्रांस की लोकतांत्रिक परम्परा से विचलन को कुछ ज्यादा ही लोगों ने समर्थन दिया था । उसके बाद 1980 और 90 के दशक में कुछ इतिहासकारों ने इस धारणा को चुनौती दिया कि इस लोकतांत्रिक देश में फ़ासीवादी हित कुछ खास न थे । फिर भी रेमों की मान्यता की पकड़ इतनी मजबूत है कि हाल में फ़ासीवाद से फ़्रांस की एलर्जी साबित करने के लिए बाकायदे ‘प्रतिरोधक सिद्धांत’ गढ़ा गया जिसके मुताबिक फ़्रांस में फ़ासीवाद का मुकाबला करने की आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता बहुत जबर्दस्त है ।
इतिहासकारों के दो खेमे मान लेने से उनके बीच का अंतर छुप जाता है । इस बहुरंगी बहस का विवेचन परिशिष्ट में विस्तार से किया गया है । इस बहस में प्रमुख मुद्दा फ़ासीवाद की परिभाषा थी । इसके तहत फ़ासीवाद की परिभाषा बनाना था और उसे वास्तविकता पर लागू करके यह तय करना था कि कौन लीग, आंदोलन, पार्टी या व्यक्ति फ़ासीवादी थे या नहीं थे । विद्वानों ने फ़ासीवाद की एकाधिक परिभाषाएं प्रस्तुत की हैं । फ़्रांसिसी विद्वान इस मामले में अकेले नहीं हैं । पूरी दुनिया में फ़ासीवाद संबंधी शोध में फ़ासीवाद के बुनियादी लक्षणों को खोजने की कोशिश होती है ताकि विभिन्न देशों और कालों में फ़ासीवाद को पहचाना जा सके । इस मामले में असहमति से विवाद पैदा होते हैं । असल में बहुत सारे इतिहासकार किसी युग के लोगों की मान्यता को दरकिनार करते हुए अपनी परिभाषा के अनुसार तय करते हैं कि कौन फ़ासीवादी था और कौन नहीं था । इसके चलते नरमपंथ और फ़ासीवाद के बीच व्यर्थ का वैपरीत्य देखा गया है । लेखक को लगता है कि फ़ासीवादी न होते हुए भी कुछ समूह लोकतंत्र के लिए घातक हो सकते हैं ।
यूरोप के इतिहास में फ़ासीवाद एक नई ताकत था और तत्कालीन लोगों ने उसे समझने की कोशिश की । i इटली की युद्धोत्तर राजनीति के हिसाब से इसे समझने की कोशिश फ़्रांस ने की । फ़्रांसिसी कूटनीतिज्ञ इसे प्रतिक्रांतिकारी परिघटना मानते थे । राजदूत ने इसे व्यवस्था, देशभक्ति और सुरक्षा का आंदोलन बताया । वाम ताकतों के विरुद्ध फ़ासीवादी कार्यवाहियों को उसने शुद्धीकरण कहा । उसे हिंसा की आशंका तो थी लेकिन मुसोलिनी को नरमपंथी समझकर हिंसा पर काबू कर लेने की उम्मीद जाहिर की । उसके प्रति दूतावास का रुख सकारात्मक रहा । फ़्रांस के अखबारों में 1921 से इटली की हिंसा के समाचार आने शुरू हुए । दक्षिणपंथी अखबारों ने फ़ासीवादी हिंसा का जश्न मनाया । जब 1922 में मुसोलिनी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया तो फ़्रांस के कट्टरपंथी अखबारों ने उम्मीद जाहिर की कि इससे दोनों देशों के संबंध सुधरेंगे । बौद्धिकों ने इटली की इस नई राजनीतिक शक्ति का विश्लेषण शुरू किया । 1922 में लियोनार्द नामक एक इतिहासकार ने इसे इटली में आसन्न कम्युनिस्ट क्रांति की प्रतिक्रिया कहा । इसकी कार्यवाहियों को उन्होंने वामपंथियों की हत्या बताया । इसके बावजूद उन्होंने इसके भीतर राजशाही से लेकर क्रांतिकारिता तक एकाधिक प्रवृत्तियों का होना भी स्वीकार किया ।
1923 के शुरू में एक फ़्रांसिसी शब्दकोश में पहली बार इसे शामिल करते हुए इसका अर्थ सामाजिक विभाजन की ताकतों, खासकर बोल्शेविकों के विरोध में लड़ने के लिए कटिबद्ध राजनीति पार्टी या वैचारिक आंदोलन की ओर से सभी इतालवी लोगों को एकताबद्ध करने का प्रयास बताया गया । इटली की खास परिघटना होने के बावजूद उसको समझने के लिए फ़्रांस के समानधर्मा आंदोलनों से सूत्र हासिल होते हैं । 1925 में एक अखबार ने कुछ नेताओं के फ़्रांसिसी मुसोलिनी कहे जाने का मजाक उड़ाया था । अतीत के ऐसे आंदोलनों और व्यक्तियों का उल्लेख होने लगा जो संसदीय लोकतंत्र के विरोधी, उग्र राष्ट्रवादी और सड़क की हिंसा के पक्षधर थे । फ़्रांस में बहुत सारे इतालवी रहते थे । उन तक मुसोलिनी के समर्थकों और उसके विरोधी आंदोलनों ने अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की ।
1923 में मुसोलिनी ने विदेशों में रहने वाले इतालवी लोगों के हितों की देखभाल के लिए एक संगठन बनाया । फ़्रांस के शहरों में इतालवी आबादी के भीतर फ़ासीवादी समूह प्रकट हुए । सरकार के गुप्तचरों ने इतालवी सरकार के ढेर सारे समर्थकों को चिन्हित किया । फ़ासीवादी प्रचार चलाने वाले संगठन भी सक्रिय थे । इस बीच कम्युनिस्ट पार्टी ने फ़्रांस के इतालवी मजदूरों के बीच फ़ासीवाद विरोधी अभियान चलाने की कोशिश की ताकि फ़्रांसिसी मजदूरों के साथ मिलकर फ़्रांस के भीतर इतालवी और फ़्रांसिसी फ़ासीवाद को परास्त किया जा सके । पुलिस ने सूचना दी कि फ़ासीवाद विरोधी इतालवी लोगों ने गैरिबाल्डी के नाम पर एक लड़ाकू दस्ता गठित किया है । फ़ासीवाद के कुछ प्रचंड विरोधी भी फ़्रांस में शरण लिए हुए थे । 1923 से 1933 के बीच फ़्रांस में 28 इतालवी फ़ासिस्ट खेत रहे थे ।
1922 से 1932 के बीच फ़्रांस में मुसोलिनी और इतालवी फ़ासीवाद के बारे में चालीस किताबें छ्पीं । मुसोलिनी की राजनीति के बारे में शोधग्रंथ भी प्रस्तुत किए गए । फिर भी आम मान्यता यही रही कि युद्ध में फ़्रांस और इटली के बीच संश्रय के बावजूद इटली की फ़ासीवादी विचारधारा का फ़्रांस में कभी पूरी तरह अनुमोदन नहीं हुआ । माना जाता था कि इतालवी लोगों के लिए मुफ़ीद होने के बावजूद फ़्रांस के लिए यह विचार हानिकर है । मुसोलिनी ने भी कहा कि फ़ासीवादी विचारधारा को इटली के बाहर ले जाना नामुमकिन है । ठीक है कि इस विचारधारा का निर्यात नहीं हो सकता था लेकिन उसे फ़्रांस के लिहाज से अनुकूलित तो किया ही जा सकता था । इसलिए अधिकतर वही किया गया ।
उदाहरण के लिए नवम्बर 1922 के रोम मार्च की तरह नवम्बर 1925 में पेरिस की सड़कों पर नीली शर्ट पहने लोगों के मार्च से लगा कि फ़्रांसिसी फ़ासीवाद का जन्म हो गया है । मार्च में शामिल लोग मुसोलिनी की पार्टी के सम्पर्की थे और कम्युनिज्म तथा लोकतंत्र से नफ़रत करते थे । उनके नेता ने संसदवाद पर उल्टी करने की घोषणा की । इन लोगों ने फ़्रांसिसी व्यवसायी हितों के साथ भी मेलजोल कायम करने की कोशिश की । संसदीय शासन को उखाड़कर ये लोग फ़ासिस्ट तानाशाही लाने के पक्ष में थे । एक और संगठन पैदा हुआ जो खुद को फ़ासिस्ट तो नहीं कहता था लेकिन फ़ासीवाद के साथ सहानुभूति रखता था । उसके नेता ने कठोर शासन की स्थापना के लिए हिंसा की जरूरत महसूस की थी । उसके वर्दीधारी गुंडे विरोधियों और पुलिस से शहर की गलियों में लड़ते थे । इन लड़ाइयों में कुछ गुंडे मारे भी गए थे । इस तरह के गैर संसदीय समूह चुनावी राजनीति के मुकाबले प्रत्यक्ष टकराव में यकीन करते थे । कभी कभी ये समूह इतालवी फ़ासिस्टों की सीधी नकल भी किया करते थे । उनके अंधसमर्थक उनकी हिंसक गतिविधियों को वामपंथी उकसावे की रक्षात्मक प्रतिक्रिया बताते थे । मुसोलिनी भी सावधानी के साथ ऐसे हमलों की योजना बनाता था जिनमें कानूनी उलझन न पेश आए क्योंकि समाज में आक्रामक हिंसा को गलत माना जाता था । फ़्रांस के ये फ़ासीवादी अपनी हिंसा को रक्षात्मक बताते थे । इस प्रचार के धोखे में कई बार कुछ वाम समर्थक भी आ जाते थे । राजनीतिक दबाव में अनेक पारम्परिक दक्षिणपंथी नेता भी कई बार उनके साथ खड़े हो जाते थे ।
इस परिस्थिति ने फ़्रांस में फ़ासीवाद विरोध को भी जन्म दिया । शुरू में इसे इटली में मुसोलिनी विरोधी ताकतों तक ही सीमित समझा जाता था । 1920 दशक के मध्य तक नजर आया कि इटली में वामपंथ को हिंसक ढंग से पूरी तरह कुचल दिया गया है तो फ़्रांस में वामपंथ ने स्वतंत्र फ़ासीवाद विरोधी गोलबंदी शुरू की । इस गोलबंदी में कम्युनिस्ट पार्टी ने अगुवाई की । 1926 में उन्होंने इसके लिए अर्ध सैनिक दस्तों का गठन किया । दक्षिणपंथियों की सभाओं के विरोध में प्रदर्शन आयोजित किए जाने लगे । सभाओं में घुसकर बहस की जाती जिसके चलते कई बार फ़ासीवाद समर्थकों से झगड़े भी होते । बाद में जब फ़ासीवादियों की ताकत कम हो गई तो फिर उनके विरोध का जिम्मा इतालवी वाम का मान लिया गया ।
फ़्रांसिसी फ़ासीवादियों ने मुसोलिनी का अनुकरण तो किया लेकिन खुद को किसी विदेशी विचारधारा के गुलाम की जगह स्वतंत्र भी साबित करना चाहते थे । राष्ट्रवादियों के साथ यह दुविधा हमेशा रहती है । वे अपने आंदोलन को स्थानीय परिस्थितियों की उपज साबित करना चाहते हैं । हिटलर के साथ भी यह दिक्कत थी इसलिए मुसोलिनी के साथ संबंध जाहिर करने में वह बेहद सावधानी बरतता था । फ़्रांस में भी फ़ासीवादी नेता संसद पर हमला करने में फ़्रांसिसी तरीका अपनाना पसंद करते थे । वे फ़ासीवादी विचारधारा की सार्वभौमिकता का जिक्र खुलेआम नहीं करते थे ।
इटली और जर्मनी के बीच 1930 दशक में रिश्तों के बदलाव के चलते फ़ासीवाद के प्रति फ़्रांस का रुख और भी जटिल हो गया । यूरोप में जर्मनी की ताकत के प्रतितोल के रूप में मुसोलिनी इटली की ताकत बढ़ाना चाहता था । अब उसने फ़ासीवाद का इटली के बाहर भी प्रसार करने का फैसला किया । 1932 में उसने दस साल के भीतर समूचे यूरोप को फ़ासीवादी बनाने का आवाहन किया । इसके लिए उसने एक संगठन बनाया जिसे फ़्रांस के अधिकारियों ने यूरोप भर में लोकतंत्र को कुचलने की योजना समझा । 1935 में अंतर्राष्ट्रीय फ़ासीवादी कांग्रेस हुई जिसमें फ़्रांस की ओर से एक इतालवी फ़ासीवादी संगठक ने भाग लिया । इटली से धन और हथियार फ़्रांस आने लगे । इससे फ़ासीवादी संगठनों को खूब मदद मिली । 1939 तक फ़्रांस के अधिकारियों को संदेह हुआ कि इटली फ़्रांस पर हमले की योजना बना रहा है । फिर भी मुसोलिनी के साथ भले रिश्तों की पैरोकारी फ़ासीवाद समर्थक करते रहे । कुछ लोग इटली जाकर मुसोलिनी से मिल भी आए । पूर्व सैनिकों में उसके समर्थकों की तादाद अच्छी खासी थी । हिटलर के साथ फ़्रांस के उतने बेहतर रिश्ते नहीं बन सके । खुद हिटलर फ़्रांसीसियों को जर्मनी का दुश्मन मानता था । उसके प्रति फ़्रांस में कोई सहानुभूति पैदा न हो सकी । उसे अधिकांश फ़्रांसिसी लोग नस्लवादी मानते थे ।

Sunday, March 22, 2020

फ़ासीवाद से लड़ाई की एक दास्तान


2019 में रैंडम हाउस से कैरोलीन मूरहेड की किताब ‘ए हाउस इन द माउनटेन्स: द वीमेन हू लिबरेटेड इटली फ़्राम फ़ासिज्म’ का प्रकाशन हुआ । कहने की जरूरत नहीं कि यूरोप में मुसोलिनी के नेतृत्व में जर्मनी से पहले ही इटली में फ़ासीवाद का शासन स्थापित हो चुका था । किताब की शुरुआत तूरिन में मजदूरों में लोकप्रिय एक समाजवादी नेता के घर फ़ासीवादियों के हमले से होती है । वे घर में घुसकर बंदूक के बल पर समाजवादी मजदूर नेता और उनकी तीन बच्चियों तथा तीन लड़ाकुओं को कार से ले जाते हैं । ले जाना तो वे सबको चाहते थे लेकिन नेता के अनुरोध पर पत्नी और छोटे बच्चों को छोड़ दिया । पुरुषों को फ़ासिस्ट पार्टी के मुख्यालय ले जाया गया । पत्नी शहर भर में परिवार की खोज खबर के लिए दौड़ती धूपती रहीं लेकिन सभी पुरुषों को नगर के विभिन्न हिस्सों में ठिकाने लगा दिया गया । लड़कियों को एक नहर के किनारे ले जाकर गर्दन के पीछे से गोली मार दी गई । दो तो वहीं मर गईं लेकिन तीसरी घायल नहर के पानी में बह चली । हत्यारों ने पानी में गोली चलाकर उसकी जान लेनी चाही । मरा जानकर हत्यारे पार्टी नेता को सफलता की खबर देने गए । लेकिन वह घायल ही पानी से बाहर निकल आई और रेंगकर पड़ोस के घर चली गई । गर्भ में पल रहा शिशु मर गया था । मां भी जीवित न रह सकी । इन हत्याओं की खबर शहर भर में फैल गई । पता नहीं चल रहा था कि उनको दफ़नाया कब और कहां जाएगा । शहर के शवगृह के कर्मचारियों से पता चला कि दो बहनों को तीन दिन बाद शनिवार को दफ़नाया जाएगा । एक घर से दूसरे घर, एक औरत से दूसरी औरत होते हुए खबर फैली कि हड़ताल होकर रहेगी और एकत्र होकर शवयात्रा में लाल प्रतीक के साथ चलना है ।
सुबह साढ़े आठ बजते बजते कब्रगाह के दरवाजे पर दो हजार से अधिक औरतें लाल प्रतीक लिए हाजिर हो गईं । तूरिन के इतिहास में औरतों का यह सबसे बड़ा जुलूस था । पिछले उन्नीस महीनों में बहुतेरी हत्याएं हुई थीं लेकिन इस हत्या ने उनको जगा दिया था । उनमें गुस्सा भरा हुआ था । सवा नौ बजे एक कार से फ़ासिस्ट उतरे, हवा में गोली चलाई और शोक के चिन्ह रौंद डाले । इसके बाद गाड़ियों में और पुलिस बल आया । औरतें बिखरकर छुप गईं, कुछ को पकड़ लिया गया और उनको एक कतार में हाथ ऊपर उठवाकर खड़ा किया गया । एक औरत चिल्ला चिल्ला कर गाली देने लगी । उसे पकड़ने के चक्कर में धक्कामुक्की हुई तो उसकी सखियों ने उसे छुपा लिया । इसी समय दो ताबूत आए । औरतों ने प्रतिरोध के गीत गाते हुए घुटनों के बल बैठकर ताबूतों को जाने का रास्ता दिया । सैकड़ों औरतों को पकड़कर फ़ासिस्ट बंदीगृह लाया गया । डेढ़ महीने बाद जब तूरिन आजाद हुआ तो उनमें से कुछ तब भी बंदीगृह में ही थीं ।
उस शनिवार को तूरिन के कारखानों में पंद्रह मिनट की हड़ताल रही । शहर में ट्राम रोक दी गई थी । कालीन बनाने के कारखाने में एक औरत ने छत पर चढ़कर लाल बैनर लटका दिया था । बाद में कब्रगाह जाकर औरतों ने बचे फूलों को ताजा कब्र पर चढ़ाया । जबसे जर्मनी ने इटली के इस नगर पर कब्जा किया था तबसे ढेरों जुलूस प्रदर्शन इटली के उद्योग क्षेत्र में हुए लेकिन इस तरह का औरतों का औरतों के लिए निडर प्रदर्शन पहले नहीं देखा गया था । इनमें उन चार औरतों का विशेष योगदान था जो विगत उन्नीस महीनों से प्रतिरोध के अग्रिम मोर्चे पर डटी रही थीं । इन चार में से दो ने शवयात्रा में भाग लिया था ।
चारों में जो सबसे बड़ी थीं वे इटली के सबसे जुझारू फ़ासीवाद विरोधी योद्धा की विधवा थीं । उनकी उम्र इकतालीस साल थी । अध्यापक और अनुवादक थीं । दोस्ती को देश और विचारधारा से ऊपर मानती थीं । लड़ाकुओं की एक टोली की राजनीतिक सलाहकार थीं । उनका जीवन इतना मूल्यवान माना गया कि पार्टी ने उन्हें शवयात्रा में भाग लेने से मना कर दिया था । दूसरी अनुपस्थित स्त्री पचीस साल की युवती पार्टी सदस्य थीं । वे कारखानों में फ़ासीवाद विरोधी कार्यवाहियों का संयोजन करती थीं और गुप्त स्त्री पत्रिका का संपादन करती थीं । एक रात पहले तक घर घर घूमकर उन्होंने प्रचार किया था । उनकी जगह उनकी छोटी बहन शवयात्रा में शामिल हुई थीं और गिरफ़्तार भी हुईं । दूसरे दिन पूछताछ में उन्होंने पुलिस को चकमा दिया कि वे पिता की कब्र पर आई थीं, उन्हें रिहा कर दिया गया । जो शामिल थीं उनमें से एक तूरिन के उत्तर के लड़ाकुओं के परिवार की अकेली लड़की थीं । उनकी उम्र छब्बीस साल थी । उनका स्वभाव विद्रोही था और वे जर्मनों के विरोध में जागरण की उम्मीदबर थीं । कब्रगाह पर जब फ़ासिस्ट आए तो उन्होंने एक बच्ची का हाथ थाम लिया और उसे अपनी पुत्री बताया । इस तरह वे गिरफ़्तारी से बच सकीं । उनकी हमउम्र दोस्त डाक्टर थीं और लड़ाकू दस्ते की चिकित्सा उनकी जिम्मेदारी थी ।
चारों औरतें दोस्त थीं और जर्मन आधिपत्य से लड़ते हुए उन्हें लगभग दो साल बीते थे । फ़ासीवादियों की क्रूरता को उनमें से दो ने कैद में उन्नीस महीनों तक लगातार झेला । इन कैदों में टार्चर और हत्या सामान्य बातें थीं । इटली पर 1943 से 1945 के बीच जर्मनी के कब्जे के दौरान हजारों औरतों ने प्रतिरोध में भाग लिया और देश की मुक्ति के लिए लड़ीं । मुख्य बात यह है कि इसके पहले के बीस सालों में मुसोलिनी के फ़ासीवादी शासन के दौरान उनके अधिकार और आवाज छीन लिए गए थे, अपने जीवन और देश को चलाने में उनकी कोई भागीदारी नहीं रह गई थी । इसके बावजूद उन्होंने गिरफ़्तारी, टार्चर, बलात्कार और हत्या को झेलते हुए लड़ने और जूझने की हिम्मत जुटाई । इटली के बाहर उनकी कहानी को शायद ही कोई जानता है । इसीलिए लेखिका ने उसे उजागर करने का संकल्प किया । वैसे तो इटली के प्रतिरोध की कहानी ही अनसुनी है ।
सितम्बर 1943 में इटली ने आत्मसमर्पण किया । अप्रैल 1945 में जर्मनी के कब्जे से देश आजाद हुआ । इस दौरान इटली लगभग गृहयुद्ध में मुब्तिला रहा । लोग केवल जर्मन आक्रांताओं से नहीं लड़ रहे थे, उनमें आपस में भी फ़ासीवाद के पक्ष और विपक्ष की लड़ाई जारी थी । इस निर्मम लड़ाई में हजारों लोग मारे गए लेकिन इस त्रासदी की याद शायद ही मनाई जाती है । ये चारों औरतें उस इलाके की थीं जो फ़ासीवाद के विरोध की लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर रहा था । इस गृहयुद्ध के चलते मुसोलिनी की भ्रष्ट सत्ता को उन्नीस महीने का जीवन और मिला लेकिन साथ ही लोगों की बहादुरी और गर्मजोशी भी उभरकर सामने आई । इन्हीं परस्पर विरोधी चीजों के चलते वह दौर बहुत ही रोचक माना जाता है ।  
इस इतिहास के विस्मरण की वजह बताना मुश्किल है । एक कारण शायद उस युद्ध की जटिलता ही है जिसमें आपस में लड़ने वाली ताकतें तरह तरह की थीं । अमेरिकी और ब्रिटिश साथ तो थे लेकिन उनमें पर्याप्त मतभेद थे । जर्मन फौज इनकी बढ़त रोकने के लिए इटली के संसाधनों का इस्तेमाल कर रही थी और साथ ही अपने साथी फ़ासिस्टों को भी काबू में रखना चाहती थी । इटली के फ़ासीवादियों को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा था ।  प्रतिरोध की ताकतों के आदर्श बड़े थे और साहस दुस्साहस की हद तक था । लेकिन इस उपेक्षा का प्रमुख कारण पश्चिमी चिंतकों की आशंका थी । उन्हें लगता था कि प्रतिरोध की ताकतें इटली को कम्युनिस्ट देश बना देंगी । इसलिए मित्र राष्ट्र उन्हें अयोग्य सहयोगी मानते रहे । लड़ाई में उनकी जरूरत तो थी लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था । युद्ध के खात्मे के बाद तो उनको याद करने का कोई फायदा नहीं था ।
किताब में जिन औरतों की कहानी बताई गई है उनके लिए गृहयुद्ध का मतलब केवल फ़ासिस्टों और जर्मनों से आजादी ही नहीं था बल्कि उसके आगे ऐसा नया और लोकतांत्रिक समाज बनाने का कार्यभार था जिसमें औरतें काम और परिवार में कानूनन और व्यवहार में बराबर होनी थीं । इटली ऐसा हो तो सकता था लेकिन हुआ नहीं यही उस लड़ाई की त्रासदी कही जा सकती है ।

Thursday, March 12, 2020

सचमुच का बरगद


10 मार्च को हिंदी प्रकाशन की दुनिया में सामाजिक विज्ञान के अनन्य प्रकाशन ग्रंथशिल्पी के संचालक श्याम बिहारी राय की सक्रियता पर विराम लग गया हिंदी प्रकाशन में साहित्य के अतिरिक्त कुछ भी स्तरीय देखना जब असम्भव था उस समय ग्रंथशिल्पी ने समाज विज्ञान की स्तरीय किताबों का अनुवाद छापना शुरू किया किताबों की छपाई अंग्रेजी प्रकाशकों से होड़ लेती हुई थी उन्होंने किताब के लेखक के अतिरिक्त मुखपृष्ठ पर अनुवादक का नाम छापकर अनुवादक को और उसके श्रम को प्रतिष्ठा देने का चलन शुरू किया अपना प्रकाशन खोलने से पहले उन्होंने मैकमिलन के हिंदी प्रभाग में लम्बे समय तक काम किया था इसके चलते उनके पास स्तरीय किताबों की सूची तो थी ही, पुस्तक के प्रकाशन और वितरण के तंत्र की भी गहरी जानकारी थी इसका उपयोग उन्होंने बहुत कुशलता के साथ किया
उनका समूचा जीवन सादगी और संकल्प का साक्षात उदाहरण था सोवियत संघ के पतन के बाद हिंदी में मार्क्सी चिंतन की सैद्धांतिक किताबों के अनुवाद छापने का जोखिम भरा काम उन्होंने आजीवन किया । तब तक हिंदी के प्रकाशक यह शोर फैला चुके थे कि हिंदी में पाठक नहीं हैं ताकि लेखकों से पैसे लेकर किताब छापें । हिंदी बोलने वाले इलाके में वाम आंदोलन की कमजोरी लगभग सर्वमान्य तथ्य है । ऐसे में गम्भीर चिंतनपरक लेखन लगातार छापना साहस से आगे दुस्साहस कहलाएगा । फिर भी राय साहब ने इस काम को न केवल हाथ में लिया बल्कि बेहद समर्पित भाव के साथ ताउम्र निभाया । सही बात है कि उनकी किताबें महंगी होती थीं । फिर भी अगर कोई उनके प्रकाशन तक खरीदने चला जाता था तो अधिकतम छूट देते थे खासकर विद्यार्थियों को । हिंदी में गम्भीर बौद्धिक साहित्य पढ़ने वाले पाठकों की मौजूदगी का उन्हें भरोसा था । वे इन पाठकों को पहचानते थे और उनके साथ उनका जीवंत संवाद रहता था । तमाम छोटे छोटे कस्बों तक उनकी किताबें फोटो स्टैट के सहारे पहुंचती रहीं । मैकमिलन में रहते हुए आनंद स्वरूप वर्मा और गोरख पांडे से उन्होंने अनुवाद कराए । जिन किताबों के अनुवाद कराए वे अपने विषय की सर्वोत्तम पुस्तकें थीं । नीहार रंजन रे कीभारतीय कलाका अनुवाद गोरख पांडे ने किया था । इसके अतिरिक्त जार्ज थामसन कीमानवीय सारतत्वका भी अनुवाद करवाकर कहीं और से प्रकाशित कराया । जरूरतमंद लोगों की आर्थिक सहायता का उनका यह अपना तरीका था । अंतिम समय तक वे इस पर कायम रहे । इसीलिए पारिश्रमिक कम होने के बावजूद बहुतेरे प्रतिभाशाली लोगों ने उनके साथ काम करना पसंद किया ।
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के बीरपुर गांव के वे रहने वाले थे । उस जिले में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जमींदारी विरोधी आंदोलन आजादी के समय चल रहा था । उस आंदोलन के जुझारू नेता सरजू पांडे का उनके गांव आना जाना होता था । तब भूमिधरों के बीच उन्हें बदनाम करने के लिए एक नारा चलता था- गली गली में चाकू है, सरजू पांडे डाकू है । भूमिधर जो भी मानें लेकिन नौजवानों में उनके प्रति जबर्दस्त आकर्षण था । राय साहब पर भी उनका असर था । उसी असर में पाखंड से समझौता न करने का संकल्प किया और उम्र भर उसे निभाया । पुत्री के विवाह तक में कोई कर्मकांड नहीं किया । गाजीपुर जिले में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव को समझने के लिए यह तथ्य जानना दिलचस्प होगा कि पहले आम चुनाव में उस जिले की संसद की और चारों विधानसभा की सीटों पर उसके प्रत्याशी विजयी हुए थे ।
उनकी आरम्भिक शिक्षा दीक्षा बगल के कस्बे मुहम्मदाबाद से हुई थी । तबके उनके सहपाठी बताते हैं कि कक्षा में लगभग सब समय वे प्रथम स्थान पर ही रहे । शिक्षा ग्रहण करने और उसके बाद रोजगार की तलाश में वे विभिन्न जगहों पर रहे और भांति भांति के लोगों के सम्पर्क में आए । मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय से नंद दुलारे वाजपेयी के साथ उन्होंने शोध किया । बातचीत में अकसर बताते थे कि वाजपेयी जी की किताबों की रायल्टी से गरीब विद्यार्थियों की आर्थिक सहायता की जाती थी, घर का खर्च वेतन से चलता था । उनका शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना पर किया शोध बाद में प्रकाशित और एक हद तक प्रशंसित भी हुआ । इस दिशा में आगे काम तो नहीं किया लेकिन हिंदी साहित्य की दुनिया से हमेशा जुड़े रहे । हिंदी के साथ अंग्रेजी से भी उन्होंने स्नातकोत्तर किया था इसलिए वह दुनिया भी उनके लिए अनजानी नहीं थी । रोजगार की तलाश में उन्होंने कानपुर में भाकपा (माले) के दिवंगत महासचिव विनोद मिश्र और पार्टी के हिंदी मुखपत्र के सम्पादक बृज बिहारी पांडे को मिडिल स्कूल में पढ़ाया भी था । इन दोनों से उनका रिश्ता बाद तक बना रहा । बृज बिहारी पांडे से उन्होंने मार्क ब्लाख की किताबइतिहासकार का शिल्पका अनुवाद भी कराया था । पूरी गरिमा के साथ वे इस रिश्ते को निभाते रहे और इनके बीच अध्यापक शिष्य के मुकाबले साथीपन की गर्माहट का साक्षी होने के नाते कह सकता हूं कि वे विरल मनुष्य थे ।
प्रतिभाशाली लोगों की अनेकानेक पीढ़ियों को उन्होंने लम्बे समय तक साथ रखा और विद्वानों की पुरानी पीढ़ी के साथ उनको जोड़ने में पुल का काम किया । खुद की बेरोजगारी के दिनों में रेलवे स्टेशनों पर वजन की मशीन से निकलने वाले टिकट की पीठ पर लिखे सूक्ति वाक्य भी तैयार किए । इसके लिए वे तुलसीदास की चौपाइयों का सहारा लेते थे । इसी वजह से बेरोजगार लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे । यह मदद उनके स्वाभिमान को बरकरार रखते हुए करने के लिए उनसे अनुवाद या संपादन का काम करवाते और बदले में धन देते । बहुत सारे लोगों के लिए वे निजी अभिभावक की तरह थे । उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इतने महत्वपूर्ण कामों से जुड़े होने के बावजूद दिखावा धेले भर का भी नहीं था । लोगों के बारे में उनका मूल्यांकन बेहद अचूक था । लक्ष्य के लिए समर्पित लोगों के प्रति उनकी श्रद्धा हद से बढ़कर थी । उनके लिए काम करने में बौद्धिक संतोष होता था । उसका प्रतिदान भी मौद्रिक से अधिक मान्यता के रूप में था । हिंदी जगत में अनेक लोगों को बौद्धिक मान्यता दिलाने में उनके प्रकाशन से अनूदित और प्रकाशित ग्रंथों का योगदान रहा है । इस विकट समय में उनकी जिद अपार प्रेरणा देगी ।
प्रकाशन का काम व्यवसाय है । इसमें वे व्यावसायिक रूप से भी सफल रहे लेकिन इसके लिए मूल्यों से समझौता नहीं किया । शिक्षा, इतिहास, समाजशास्त्र और अनेकानेक अन्य अनुशासनों की शायद ही कोई ऐसी महत्व की किताब हो जिसकी जानकारी उनको नहीं हो और उसके अनुवाद की योजना न बना रखी हो । रामविलास शर्मा ने भरोसे के चलते ही उन्हें रजनी पाम दत्त की किताब का हिंदी अनुवाद छापने के लिए उन्हें सौंपा था । कला के इतिहास दर्शन के लिए आर्नल्ड हाउजर के लेखन की सूचना उनको ही थी । जे एन यू में इतिहास दर्शन पर पढ़ाई के दौरान अपने अध्यापकों के मुख से कभी उनका नाम भी नहीं सुना था । उनके संदर्भ की निजी बातें किसी और मौके पर करना उचित होगा । फिलहाल इतना ही । पत्नी सुजाता राय भी दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी माध्यम कार्यान्यवन निदेशालय से जुड़ी रही थीं । उस प्रकाशन ने भी अपनी सीमाओं के भीतर अनेक स्तरीय किताबों का प्रकाशन किया ।                  

Monday, March 2, 2020

मार्क्स लिखित ‘पूंजी’ की सीख


2020 में पालग्रेव मैकमिलन से मार्क सिल्वर के संपादन में ‘कनफ़्रंटिंग कैपिटलिज्म इन द 21स्ट सेन्चुरी: लेसन्स फ़्राम मार्क्स’ कैपिटल’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब के पांच भागों में कुल पंद्रह लेख संकलित हैं । पहले भाग में ‘पूंजी’ के आरम्भिक अध्यायों से संबंधित लेख, दूसरे भाग में मूल्य की धारणा से संबंधित लेख, तीसरे भाग में वित्तीकरण, कर्ज और संकट से जुड़े लेख, चौथे भाग में वर्तमान सदी के संकट के बारे में तो आखिरी पांचवें भाग में अतीत और वर्तमान की रोशनी में भविष्य से जुड़े लेख शामिल हैं । संपादक ने एक सवाल से बात शुरू की हैं । उनका कहना है कि वर्तमान सदी के आरम्भिक दशकों में हमें जिन राजनीतिक और समाजार्थिक स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है उनमें मर्क्सवादी सिद्धांत मददगार हो सकता है या नहीं क्योंकि मार्क्स जब लिख रहे थे तो औद्योगिक पूंजीवाद उभर रहा था और समूचे यूरोप में कुलीनता और सामंतवाद के मजबूत निशान मौजूद थे, अमेरिका भी खेतिहर समाज ही था । उसके बाद के डेढ़ सौ सालों में परिवहन, संचार और निर्माण संबंधी वैज्ञानिक तकनीकी क्रांतियों ने सामाजिक और भौतिक दुनिया का चेहरा बहुत बदल दिया है । वर्तमान सदी को उत्तर-औद्योगिकता, वैश्वीकरण, डिजिटल सूचना युग और इतिहास के अंत के जरिए व्याख्यायित किया जाता है । सहज बोध तो यही कहता है कि इन बदलावों के चलते उन्नीसवीं सदी का मार्क्स जैसे सिद्धांतकार का चिंतन भी पुराना पड़ जाना चाहिए । अपने समय के लिए उनकी बौद्धिक उपलब्धियां आश्चर्यजनक थीं लेकिन अब उनकी प्रासंगिकता नहीं रह गई है । हाल के वैश्विक अर्थतंत्र में एकाधिकारी प्रवृत्तियों के प्रसंग में भी मार्क्स का नाम सुनना पसंद नहीं किया जाता । उन्नीसवीं सदी के यथार्थ से जूझने वाला व्यक्ति उससे नितांत भिन्न इस सदी को समझने में आखिर क्या मदद कर सकता है ।
अपने इस सवाल के उत्तर में वे कहते हैं कि उनसे इस मामले में बहुत कुछ सीखा समझा जा सकता है । जो लोग यथार्थ का सामना नहीं करना चाहते उनके लिए ही मार्क्सवादी सिद्धांत अप्रासंगिक हुआ है । चूंकि बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्र उनके विश्लेषण का जवाब नहीं दे सकता इसलिए उनको खारिज करता है और उनकी परम्परा में काम करने वाले समाज विज्ञानियों की उपेक्षा करता है । मार्क्सवाद आज के हालात से निपटने के लिहाज से न केवल प्रासंगिक बल्कि केंद्रीय महत्व की चीज है, इसे समझने के लिए समाज व्यवस्था की सतह के नीचे उतरकर देखने की जरूरत है । हालात को जस का तस मंजूर कर लेने की जगह गहरे डूबकर उसको समझने से ही समस्त विज्ञान का विकास हुआ है । मार्क्स ने खुद कहा है कि मौजूदा की खुद की व्याख्या या किसी समाज की खुद के बारे में उसकी धारणा को स्वीकार कर लेने से सवालों के जवाब नहीं मिलते । सामाजिक स्थितियों की तह में मौजूद यथार्थ की साफ समझ के लिए उनसे अलग जगह देखना पड़ता है । यथार्थ की संरचना के बुनियादी संबंधों को भी उजागर करने वाली पद्धति को अपनाना होगा । पूंजीवादी व्यवस्था की छानबीन के लिए मार्क्स ने इसी पद्धति का इस्तेमाल किया था । इस पद्धति के तीन पहलुओं का उल्लेख संपादक को जरूरी लगता है । सबसे पहली चीज है- इसका अमूर्तन, इसके बाद स्थिति के विश्लेषण में द्वंद्वात्मकता और साथ ही इसका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य ।
पूंजीवादी व्यवस्था के मूलभूत संबंधों के विश्लेषण मेंपूंजीके पहले खंड में अमूर्तन का उनका इस्तेमाल सर्वाधिक प्रत्यक्ष है । इसका मकसद इन संबंधों की अंतर्वस्तु को उद्घाटित करना था । किसी भी परिघटना में मौजूद सभी जटिल कारकों को ध्यान में रखने से उसके सबसे महत्व के तत्वों का विश्लेषण करने में सहूलियत होती है । इस नजरिए से किसी व्यवस्था की खास प्रवृत्तियों और कार्यपद्धति का खुलासा तो होता है लेकिन मात्र इतने से ही वास्तविक जीवन में उस व्यवस्था के काम करने की पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं होती । इससे केवल बुनियादी संबंधों का खुलासा होता है । खुद मार्क्स ने अपने ग्रंथ का चरम उद्देश्यआधुनिक समाज की गति के आर्थिक नियमों का उद्घाटनबताया था । इस काम के लिए उन्होंने उदीयमान पूंजीवादी व्यवस्था की सतह के नीचे की कार्यपद्धति को उजागर करना चाहा और द्वंद्वात्मक पद्धति का विनियोग किया । तत्कालीन आर्थिक सिद्धांतों की आलोचना करते हुए प्रतियोगी पूंजीवाद के मूल में अवस्थित सामाजिक संबंधों पर जोर दिया । इन सामाजिक संबंधों के आधार पर ऐसी संरचना स्थापित होती है जो व्यवस्था की आर्थिक गतिकी को बहुत हद तक नियंत्रित करती है । माल-मुनाफ़ा, कीमत-मूल्य, श्रम, बाजार और पूंजी के बारे में प्रचलित राजनीतिक अर्थशास्त्रीय समझ को मंजूर करने की जगह मार्क्स ने इन सबको परिभाषित करने वाले सामाजिक संबंधों को खोल दिया । उनका कहना था कि पूंजी कोई वस्तु नहीं होती, बल्कि मनुष्यों के बीच का ऐसा सामाजिक संबंध है जो वस्तुओं की मध्यस्थता के जरिए बनता है । इन संबंधों को स्पष्ट करने की प्रक्रिया में उन्होंने व्याख्यायित किया कि इन बुनियादी संबंधों के आपसी अंतर्जाल से एक स्वनिर्भर संरचना का जन्म होता है जो उसके भागीदारों की गतिविधियों की सीमा तय करती है । लेकिन इसके साथ ही कुछ ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं जिनसे इस व्यवस्था की स्थिरता खतरे में आ जाती है । दूसरे शब्दों में कहें तो मार्क्स की द्वंद्वात्मक पद्धति ने पूंजीवादी व्यवस्था के आंतरिक तनावों पर नजर डाली । इसी को उसका अंतर्विरोध भी कहा जा सकता है । 
इन अंतर्विरोधों या तनावों के चलते एक तो संरचना में लगातार बदलाव जरूरी हो जाता है । दूसरे इस बदलाव की समूची प्रक्रिया में मनुष्य और उसके समाजार्थिक और राजनीतिक संदर्भों की अंतर्निहित पारस्परिकता का खुलासा भी होता है । इस प्रकार अमूर्तन के सहारे अगर मार्क्स पूंजीवादी संबंधों की बुनियादी संरचना और उसके केंद्रीय तत्वों को स्पष्ट कर पाए तो द्वंद्वात्मक विश्लेषण पद्धति को उसके साथ जोड़ देने से पूंजीवाद की गति उजागर हुई । उन्होंने पूंजीवादी संबंधों की गति को विशिष्ट माना लेकिन इसे उसके विगत और आगामी समाजार्थिक निर्मितियों से जोड़ा । सामंती समाज के अंतर्विरोधों से पूंजीवाद का उदय हुआ । इसके अंतर्विरोध इसे ऐसी दिशा में ले जा रहे हैं जहां इस सामाजिक व्यवस्था के अतिक्रमण में ही समाधान निहित है । यह अंतर्विरोध वर्गों के टकराव में अभिव्यक्त होता है । सामंती समाज में उदीयमान पूंजीपति वर्ग का टकराव जब सामंती कुलीनों से हुआ तो उसने नई सामाजिक व्यवस्था के समर्थन में अन्य वर्गों का साथ लेना चाहा । लेकिन नई सामाजिक व्यवस्था में नये प्रभुत्वशाली वर्ग का उद्भव हुआ जो पुरानी सामंती व्यवस्था में भी आजादी के लिए लड़ते रहने वालों के विरोध में खड़ा हो गया । वर्गीय टकराव के समाधान की जगह पूंजीवाद की स्थापना से बस यह टकराव और साफ हो गया । व्यक्ति की स्वतंत्रता और अवसर की समानता का नारा जल्दी ही मजदूरों की मेहनत से अतिरिक्त मूल्य चूसने वाली उत्पादन पद्धति के सहारे मुनाफ़ा कमाने की स्वतंत्रता में बदल गया । बीच के वगों को ऊपर या नीचे के वर्ग में शामिल होने की होड़ में धकेल दिया गया ।
इससे पहले के सामाजिक ढांचों में सामाजिक वर्गों की अंतर्निहित विषमता को मान लिया गया था इसलिए बुनियादी आर्थिक संबंध छिपे रहते थे । प्राकृतिक विषमता की विचारधारा व्यवस्थागत विषमता को वैध ठहराने के काम आती थी । सबकी सामाजिक हैसियत से उनकी भौतिक स्थिति और व्यवस्था में उनकी जगह तय होती थी । ऐसा माना जाता था कि भौतिक विषमता एक वर्ग को दूसरे वर्ग के सदस्यों से अलगाने वाली किसी दैवी या प्राकृतिक विषमता से व्युत्पन्न है । इसके विपरीत पूंजीवादी व्यवस्था ने इस विचारधारा को तो खारिज किया लेकिन भौतिक विषमता बनी रही । अगर सभी सदस्य स्वतंत्र और समान हैं तो पूंजीवादजन्य यह विषमता कहां से पैदा हो रही है? आराम, ऐश और संतुष्टि तो पूंजीपतियों को सुलभ है जबकि कामगार के हिस्से में कमरतोड़ परिश्रम, न्यूनतम जीवन-स्तर और अलगाव आता है । मार्क्स के मुताबिक वर्ग के आधार पर भौतिक स्थितियों में इस भारी फ़र्क का मतलब कि सभी भागीदारों को इसकी असलियत का पता चल सकता है । उनके ग्रंथ का मुख्य काम यही था- पूंजीवादी संबंधों के गुप्त यथार्थ की व्याख्या और उस नियम की खोज जिससे पूंजीवाद अपने से पहले और बाद की समाज व्यवस्था से जुड़ा हुआ है ।
पहले ही खंड के आरम्भ में पूंजीवाद को उसके अतीत और भविष्य से जोड़ने वाली चीज के रूप में वे मानव श्रम की पहचान करते हैं । वस्तुओं के मूल्य के साथ यह मानव श्रम अभिन्न रूप से जुड़ा रहता है । पूंजीवादी संबंधों के तहत मूल्य का रूप खास तरह का हो जाता है । उसमें उपयोग मूल्य के मुकाबले विनिमय मूल्य को प्रमुखता प्राप्त हो जाती है । इसीलिए पूंजीवादी आर्थिक संबंधों में सामाजिक प्राथमिकता उलट जाती है । मनुष्य की जरूरतों को पूरा करना दोयम दर्जे की प्राथमिकता बन जाता है । उसकी जगह मुनाफ़ा बुनियादी जरूरत के बतौर सामने आता है । उत्पादन की प्रक्रिया और बाजार का सबसे प्रधान कार्यभार इस जरूरत को पूरा करना हो जाता है । नतीजा कि वस्तुओं की स्वतंत्र सत्ता कायम हो जाती है । उनका आपसी रिश्ता बनता है और मनुष्य की जरूरत को पूरा करने का उनका बुनियादी दायित्व गायब हो जाता है । पहले खंड में इसी को वस्तुओं की जड़ पूजा कहा गया है । जिनमें उपयोग मूल्य होता है उन्हें भी बाद में ऊंची कीमत पर बेचने के लिए खरीदा जाता है । आज के सट्टा बाजार में अधिकतर इसी प्रक्रिया का पालन होता है जिसके चलते कभी कभी कुछ कंपनियों के शेयरों की कीमतों में नकली उछाल आ जाता है । इससे भी अधिक अस्थिर वित्तीय तंत्र है जो क्रेडिट कार्ड के सहारे टिका रहता है । इसने ही 2007 के वित्तीय संकट को जन्म दिया था । पिछली महामंदी जैसी घटना को रोकने के लिए जो नियम कानून बनाए गए थे उनको खत्म करने का सिलसिला जारी है तथा बाजार में और अधिक अस्थिर तत्वों का प्रवेश हो रहा है । विनिमय मूल्य पर जोर देने से जो विकृति पैदा हुई उसके साथ ही मानव जनित जलवायु परिवर्तन का तूफानी असर भी झेलने का समय आ गया है ।
अगर उपयोग मूल्य आधारित उत्पादन पर जोर होता तो पर्यावरण को उतना नुकसान न होता और ऐसी नीतियां बनतीं जिनमें जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता न होती, ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों को प्रोत्साहित किया जाता । इसकी जगह हम सब अल्पकालिक विनिमय मूल्य के फंदे में फंसे हुए हैं । यही हाल मनुष्य की एक बुनियादी जरूरत घर का भी है । घरों का अभाव पैदा होता है टिकाऊ और सस्ते आवास की आम जरूरत और पूंजीवादी बाजार द्वारा इस जरूरत को पूरा करने की अक्षमता से । यह समस्या विकसित पूंजीवादी देशों में भी मौजूद है । इसी परिस्थिति का लाभ उठाने के लिए वित्त बाजार ने जो खेल खेला उससे हालिया संकट पैदा हुआ ।
पूंजीवाद के तहत मूल्य व्यवस्था में जो विकृति आती है उसके चलते उपयोग मूल्य को विनिमय मूल्य की सेवा में लगा दिया जाता है । मनुष्य की जरूरतों के लिहाज से इसका उलटा होना चाहिए । कहने का मतलब कि पूंजीवाद जिन वस्तुओं का उत्पादन करता है उनकी खपत के लिए सामाजिक जरूरत पैदा करता है, न कि मौजूदा सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन करता है । इसे हम महज एक बार इस्तेमाल होने वाली चीजों के उत्पादन में देख सकते हैं । अधिकाधिक ऐसी वस्तुओं का उत्पादन किया जा रहा है जिनकी बार बार मरम्मत करानी पड़े । फोन, कम्प्यूटर, टी वी जैसी उपभोक्ता वस्तुओं में सबसे नया संस्करण खरीदने की जरूरत पैदा की जाती है ।
सबसे आगे बढ़कर मूल्य से श्रम के जुड़ाव से ऐतिहासिक घटनाओं के घटने में मानव कर्ता की केंद्रीय भूमिका उभरकर सामने आती है । आम तौर परपूंजीपर विचार करने वाले लोग मार्क्स के विश्लेषण के इस पहलू की उपेक्षा करते हैं । इस ग्रंथ में पूंजीवादी सामाजिक संबंधों की कार्यपद्धति का विश्लेषण किया गया है । इसमें इस व्यवस्था की संरचनागत प्रवृत्तियों और गतिविज्ञान पर ध्यान दिया गया है । इस संदर्भ में व्यवस्था के भीतर मौजूद वर्ग संबंधों को प्रस्तुत किया गया है । वर्ग हितों के टकराव को उस तरह प्रस्तुत किया गया है जिस तरह वे व्यवस्था के भीतर नजर आते हैं । इसमें संघर्ष और टकराव का आवाहन नहीं है । यह ग्रंथकम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्रसे अलग है । फिर भी मूल्य के साथ श्रम को जोड़कर मार्क्स ने इस सवाल को उठा दिया कि मानव श्रम के उपयोग और दिशा को कौन निर्धारित और नियंत्रित करेगा । जब उन्होंने कहा कि अब तक का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है तो वे समाज के बने रहने के साधनों का उत्पादन करने वाले मानव श्रम पर नियंत्रण की लड़ाई का ही जिक्र कर रहे थे । जब उत्पादकों का अपने ही श्रम पर नियंत्रण नहीं होगा तो वे उत्पीड़क वर्ग की इच्छा के अधीन होंगे । तब उनके श्रम के उत्पाद पर उनको नियंत्रित करने वालों का अधिकार होगा ।
मार्क्स ने मानव श्रम के सार को सचेतनता, क्षमता, सामाजिकता और सृजनात्मकता जैसे तत्वों के साथ जोड़कर देखा था, उन्होंने श्रम को मानवीय रूप में समझने की कोशिश की थी । जब उस पर श्रमिक का नियंत्रण नहीं होगा तो वह इस सार से अलगाव का शिकार हो जाएगा । किसी भी शोषक उत्पादन प्रणाली के लिए श्रमिकों की स्वतंत्रता पर और काम के दौरान उसकी मानवता पर रोक जरूरी होती है । सिद्ध है कि वर्ग संघर्ष के केंद्र में मानव अभिकर्ता का सवाल होता है । मनुष्य की गतिविधि के सहारे ही उत्पादक मानव श्रम जिंदा रहता है । समूचे इतिहास में वर्ग आधारित शासन के जरिए इसी कर्ता को शोषक लक्ष्य के लिए नियंत्रित और निर्देशित करने की कोशिश होती रही है । मार्क्स नेपूंजीमें इन व्यवस्थाओं में सबसे विकसित तंत्र की कार्यपद्धति को उजागर किया । दूसरी ओर शोषण और उत्पीड़न के बंधन से आजाद होने का उत्पीड़ितों का संघर्ष इतिहास को आकार देता रहा है । ये उत्पीड़ित लोग वर्ग-सचेत सृजनात्मक सक्रियता के सहारे अपनी सम्भावना को साकार करते हैं और समाजार्थिक उत्पीड़न के हालात से मुक्ति हासिल करते हैं ।पूंजीमें इसका प्रत्यक्ष विश्लेषण तो नहीं है लेकिन उसके आगे पीछे के लेखन से मिलाकर देखने से बात साफ हो जाती है । उनकीपूंजीको उनके समग्र लेखन से अलगाकर नहीं देखना चाहिए । 
संपादक का कहना है कि इस ग्रंथ के प्रकाशन के बाद के डेढ़ सौ सालों में पूंजीवादी संबंधों में बहुत बदलाव आए हैं । उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, इजारेदारी और दो विश्वयुद्धों के चलते समूची दुनिया में पूंजीवादी संबंधों का प्रसार हुआ । स्वचालन, रोबोटीकरण और तीव्र संचार प्रणाली के जो असर पड़े हैं उनका अनुमान 1867 में असम्भव था । फिर भी पूंजीवादी व्यवस्था की बुनियादी कार्यप्रणाली के बारे में मार्क्स ने जो कहा वह डेढ़ सौ सालों के बाद भी प्रासंगिक बना हुआ है । श्रम से अतिरिक्त मूल्य को हड़पकर मुनाफ़ा कमाने की अनंत खोज, अधिकाधिक मनुष्यता को अपनी गिरफ़्त में जकड़ने वाली लगातार फैलती हुई आर्थिक प्रणाली, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की असमाप्य बुभुक्षा से उत्पन्न आस्तित्विक संकट आदि की जड़ें उसी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था में हैं जिसकी चीरफाड़ मार्क्स ने की थी । उनकी आलोचना का सब कुछ आज भी सही होना जरूरी नहीं । पहले संस्करण की भूमिका में ही मार्क्स ने लिखा था कि वर्तमान समाज कोई स्थिर परिघटना नहीं है । बदलते हुए प्रत्यक्ष यथार्थ के अनुरूप उनके विश्लेषण का भी नवीकरण करना होगा ।                                          

Monday, February 24, 2020

अछरिया हमरा के भावेले


पुस्तकालय के बारे में हम उस समय बात कर रहे हैं जब दिल्ली के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में घुसकर विद्यार्थियों की पुलिस द्वारा निर्मम पिटाई के दृश्य प्रकट हुए हैं पुस्तकालय के भीतर घेरकर होने वाले इस उत्पीड़न को शताब्दी वर्ष में जलियांवाला बाग की तर्ज पर विद्यार्थियों ने जामियावाला बाग कहा इस घटना से शिक्षा, किताब और समाज तथा सरकार के आपसी रिश्तों के बारे में बहुत सी बातें करने की गुंजाइश पैदा होती है   
हम सभी जानते हैं कि जहां सबसे कम आजादी होती है यानी जेल, वहां भी पुस्तकालय होता है इस अकेले तथ्य से मनुष्य के जीवन में किताब का महत्व समझा जा सकता है इसके साथ यह भी तथ्य है कि जब तानाशाही की आहट आती है तो उसके पहले शिकार किताब और पुस्तकालय होते हैं । जरूरी नहीं कि तानाशाही खुलेआम और हिंसक रूप में ही सामने आए बहुधा वह एक व्यवस्थित विभेदकारी तंत्र के रूप में मौजूद रहती है इस तंत्र में बहिष्करण और नियंत्रण के हथियार के रूप में ज्ञान का सुविधासम्पन्न वर्गों ने इस्तेमाल किया है लेकिन फिर उसी ज्ञान को जब लोगों ने अपने लिए इस्तेमाल करना शुरू किया तो वह ज्ञान खतरनाक समझा जाने लगता है ज्ञान की यह यात्रा बहुत ही रोमांचक रही है । इस प्रक्रिया को गोरख पांडे के मशहूर गीतअजदिया हमरा के भावेलेके इस बंद से सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है- दिनवा खदनिया सोना निकललीं, रतिया लगवलीं अंगूठा । सगरी जिनिगिया करजे में डूबल, कईल हिसबवा झूठा । हिसबवा अइसन हम नाहिं मनबो, अछरिया हमरा के भावेले ।इस बंद में जिक्र ग्रामीण इलाके का नहीं खनिज के क्षेत्र का है । दुख है कि वहां भी कर्ज के लिए अंगूठा लगाना पड़ता है । प्रेमचंद के लेखन पर ध्यान दें तो कर्ज के चलते किसान को मजदूर होना पड़ता है और वहां भी कर्ज साथ चला आता है । सारी जिंदगी कर्ज में डूबने का तथ्य ही किसान और मजदूर के बीच साझा है । इस नियति से मुकाबले के लिए अक्षर को हथियार बनाना जरूरी लगता है । तभी एक अन्य गीत में गोरख लिखते हैं- अक्षर अक्षर पंक्ति पंक्ति को छापामार करो ।      
भाषा से किताब बनती है इस भाषा के निर्माण के सिलसिले में प्रसन्न कुमार चौधरी ने अपनी किताबअतिक्रमण की अंतर्यात्रामें बताया है कि जब मनुष्य के हाथ स्वतंत्र हो गए और वह दोनों पैरों के सहारे खड़ा होकर चलने लगा तो उसने उपकरण बनाने शुरू कर दिए उपकरण बनाना प्रकृति के साथ मनुष्य की ऐसी अंत:क्रिया थी जिसके जरिए उसने संसार में अपने रहने लायक वातावरण निर्मित करने की शुरुआत की यह काम वस्तुओं को बदले बिना सम्भव नहीं था और जाने बिना बदलाव नहीं हो सकता स्पष्ट है कि इस कठिन काम के साथ ही उसे वस्तुओं के स्वभाव का ज्ञान होने लगा तो फिर इसके आधार पर नामकरण होने से मनुष्य का शब्द भंडार भी बढ़ने लगा इस विवरण से हम समझ सकते हैं कि खुद भाषा, संसार को बोधगम्य बनाने और बदलने की प्रक्रिया में पैदा हुई चारों ओर फैली हुई जो दुनिया मनुष्य को पूरी तरह अराजक और बेकाबू महसूस होती थी उसमें तर्क नजर आने लगा और भाषा में उस तर्क का प्रतिबिम्ब प्रकट होने लगा । आश्चर्य नहीं कि भाषा समस्त ज्ञान के संग्रह का साधन बन गई । इसी तर्ज पर कहा जाता है कि किताबों में जानकारी का खजाना संचित रहता है । इस खजाने को रखने के अतिरिक्त आगामी पीढ़ियों तक उसे ले जाने का काम किताब और उसके संग्रहालय के जरिए आसान हो जाता है ।  
लेकिन यह भी कोई रहस्य नहीं है कि जनता के सामूहिक प्रयास से अर्जित समस्त ज्ञान को वर्गों में बंटे समाज में शासकों ने अपने लिए इस्तेमाल किया । इस तरह जिस ज्ञान का उत्पादन समाज के सामूहिक सहकार से हुआ था उसे ही कब्जे और बहिष्करण का साधन बना लिया गया । श्रम के अलावे संपदा के उत्पादन के सबसे बड़े संसाधन जमीन पर कब्जे के सिलसिले में कागज की भूमिका को हम सभी जानते हैं । ज्ञान से बहिष्करण के साथ संसाधनों से बेदखली में भी अक्षर की बड़ी भूमिका रही है । स्थिति यहां तक पहुंच गई कि जिस कानून की किताब और उसको लागू करने वालों के बारे में न्याय की पक्षधरता की धारणा बननी चाहिए थी उसके मुकाबले उन्हें दमन उत्पीड़न के साथ जोड़कर देखा जाने लगा । हमारे देश में तो भौतिक और आध्यात्मिक संसाधनों पर स्वामित्व के इर्द गिर्द ऊंच नीच की एक अत्यंत कठिन व्यवस्था के रूप में जातिगत भेदभाव भी कायम हुआ । जब किताब इस व्यवस्था के पक्ष में नजर आने लगी तो शिक्षित समुदाय के प्रति अविश्वास पैदा हुआ ।
इस अविश्वास की अभिव्यक्ति लोक में तो हुई ही कभी कभी शिष्ट साहित्य में भीचत्वारि मूर्ख पंडिता:’ जैसा व्यंग्य प्रकट हुआ । किताब के प्रति इस संशय के चलते अनुभव की प्रामाणिकता को अधिक महत्व दिया गया । अनुभव की प्रामाणिकता पर यह जोर वैधता के वैकल्पिक स्रोत की खोज तो था ही, उसके सहारे ज्ञान पर विशेषाधिकार प्राप्त समूहों की इजारेदारी का प्रतिरोध भी खड़ा किया जा रहा था । विरोध करने वालों को भी अनुभव जन्य ज्ञान की सीमा का अंदाजा रहा होगा तभी किताब की दुनिया को दूसरे के हाथ में पूरी तरह छोड़ देने की जगह उस क्षेत्र में भी दखल देने का प्रयास होता रहा । इसी प्रयास की अभिव्यक्ति पुस्तकों की दुनिया से संघर्षरत जनता के लगाव में होती है । लगभग प्रत्येक बदलाव के आंदोलन के साथ किताब का संबंध रहा है । रूसी बोल्शेविक क्रांति के बारे में लिखते हुए जान रीड ने बताया है कि युद्ध के मोर्चे पर रेल से भरकर किताबें भेजी जाती थीं और गरम तवे पर पानी की बूंद की तरह छन्न से समाप्त हो जाती थीं । राजनीतिक चेतना बढ़ने के साथ पढ़ने की भूख का रिश्ता राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा के पहले भाग में है जिसमें उनका कहना है कि रौलट कानून का विरोध देश में शुरू हुआ तो खाना खाने वाले लोग उन होटलों में जाते जहां अखबार भी पढ़ने के लिए उपलब्ध होते । उन्होंने यह भी बताया है कि जब पंजाब के अखबारों से सही खबरें नहीं मिलतीं तो बाहर से आने वाले अखबारों का सही सूचनाओं के लिए इंतजार होता था । इससे लगता है कि प्रतिबंध से कभी जानकारी की भूख को दबाया नहीं जा सकता, इससे वह वैकल्पिक रास्ते बना लेती है । बहुत सम्भव है इसी तरह के माहौल ने सार्वजनिक पुस्तकालयों को जन्म दिया हो !  
शिक्षा संस्थानों के साथ तो पुस्तकालय की मौजूदगी समझ आती है लेकिन हम जिस तरह के पुस्तकालय की शताब्दी मना रहे हैं वह एक सार्वजनिक पुस्तकालय है । इस तरह का कोई पुस्तकालय इस मान्यता के बिना चल नहीं सकता कि ज्ञान पर उनका भी अधिकार है जो किसी शिक्षा संस्थान तक नहीं पहुंच सकते । यह ज्ञान पर उत्पादकों के दावे की अघोषित अभिव्यक्ति है । शिक्षा संस्थानों के बाहर के ये पुस्तकालय साथ ही सार्वजनिक वाचनालय भी होते हैं । निजी से बाहर सार्वजनिक संसार के निर्माण में इन जगहों का योगदान अभूतपूर्व रहा है । आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना और संचालन के लिए जिस तरह के जानकार मतदाता की जरूरत पड़ती है  उसके लिए भी इन जगहों ने ऐसी भूमिका निभाई जिसके चलते भागीदारीपरक लोकतंत्र को सामाजिक आधार मिला । अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए पुस्तकालयों ने अपने रूप भी बदले हैं । जिस जमाने में उनकी महिमा के साथ धार्मिक पवित्रता जुड़ी होती थी उस समय किताब भी देवालयों में सुरक्षित रखी जाती थी । उसके बाद आधुनिक शिक्षा के साथ नए किस्म के पुस्तकालय आए । पहले शिक्षा तक पहुंच को सीमित करने के लिए विभिन्न समुदाय उससे जुड़े संस्थानों से बाहर रखे जाते थे । शिक्षा को धार्मिक संस्थानों की जकड़ से बाहर लाकर उसके धर्मनिरपेक्षीकरण के साथ ही पुस्तकालयों का निर्माण शुरू हुआ । इसके बावजूद पुरानी आदतें कुछ समय तक जारी रहीं । वर्जीनिया वुल्फ़ ने बताया है कि एक समय शिक्षा संस्थानों के साथ ही पुस्तकालयों तक भी स्त्रियों की रसाई नहीं थी । ऐसी स्थिति में खासकर स्त्रियों ने शेक्सपियर आदि अंग्रेजी लेखकों के नाम पर क्लब स्थापित करके ज्ञान की अपनी प्यास बुझाई और उच्च शिक्षा से बाहर रह जाने की क्षतिपूर्ति की । मार्क्स की पुत्री एलीनोर के बारे में सभी जानते हैं कि इसी प्रक्रिया में उन्होंने तमाम साहित्यिक हलकों तक अपनी जानकारी विस्तारित की । सरकारी कर्मचारियों के लिए एक समय दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी जैसे पुस्तकालय खोले गए । शहरी इलाकों में बच्चों ने बाल पुस्तक क्लब बनाए । जिला पुस्तकालय भी कई जिलों में मौजूद हैं । इन सबके साथ पुस्तक संस्कृति ने जाति आधारित छुआछूत को रेल की तरह ही कुछ हद तक दूर किया । स्कूल कालेज जाने वाले विद्यार्थियों को जब पाठ्यक्रम से बाहर की किताबें पढ़नी होतीं तो वे खासकर उपन्यास आदि इनके साथ छिपाकर ले जाते । कवि सम्मेलन और मुशायरों ने भी किताब और उससे जुड़ी सांस्कृतिक चेतना को लोकप्रिय बनाने में बहुत मदद की ।
स्पष्ट है कि पुस्तकालय केवल कोई इमारत नहीं होता बल्कि सम्पूर्ण सामाजिक ढांचा होता है । किताब में जो जानकारी कूटबद्ध होती है उसे हासिल करने के जरिए हम अपनी सीमित दुनिया से बाहर निकलते हैं । भूगोल की किताब में बने नक्शे को खोलने की उत्तेजना से ही दुनिया अपनी सम्पूर्णता में हमारे लिए बोधगम्य हो पाती है । इसके अतिरिक्त भी किताब ने मनुष्य की बेहद नाजुक मसलों में मदद की है । बोरिस पोलेवोई की असली इनसानपढ़कर अवसाद से बाहर निकलते लोगों की मौजूदगी हमारे समाज में मुश्किल नहीं है । कोरोलेंको के उपन्यास अंधा संगीतज्ञके सहारे हमें संसार को समझने के सर्वथा भिन्न तरीके का पता चलता है । इन उदाहरणों से साफ है कि किताब हमें खुद के साथ बाहर को समझने बूझने में मदद करती है ।   
बहुत निजी स्तर पर कहें तो किताब हमारी आत्मा का आईना होती है । अंग्रेजी कहावत है कि मनुष्य की पहचान उसके संगियों से होती है और उसी तर्ज पर कह सकते हैं कि हमारी रुचि का पता उन किताबों से चलता है जो हमें पसंद होती हैं । इसके चलते भी हम कई बार उन किताबों का नाम नहीं लेते जिन्हें पढ़ना पसंद होने के बावजूद अच्छी नहीं मानी जातीं । अगर कोई जान ले कि हम कौन सी किताब पढ़ते हैं तो एक तरह से हम उस व्यक्ति के सामने नंगे हो जाते हैं । व्यक्ति की तरह ही देश, सभ्यता और संस्कृति भी अपना परिष्कार और स्तर साबित करने के लिए अक्सर किताबों के नाम गिनाते हैं । सभी संस्कृतियों के पास कोई न कोई ऐसी किताब होती है जो उसकी चरित्रगत विशेषता का लक्षण बन जाती है । सही बात है कि जरूरत के मुताबिक इनका आविष्कार होता है फिर भी नाम किताब का ही गिनाया जाता है । इस नश्वर संसार में एक हद तक वे अमरता प्राप्त करने का साधन भी होती हैं । लेखक का नाम किताब के रूप में उसके देहावसान के बाद भी बचा रहता है ।    
हमने शुरू में कहा कि जेल में पुस्तकालय होते हैं लेकिन कारखानों में पुस्तकालय नहीं होते । कार्यालयों में होते हैं लेकिन कारखानों में नहीं होते । मार्क्स ने अपने सबसे प्रसिद्ध ग्रंथपूंजीके पहले खंड में कहा कि पूंजी के निर्माण की असलियत को देखना हो तो बाहरी दिखावे से हटकर उत्पादन की उस असली जगह पर जाना होगा जिसके प्रवेशद्वार पर ही बिना काम के अंदर घुसने से रोकने का संदेश लिखा रहता है । इस जगह पर हम सभी जानते हैं कि पूंजी का निर्माण जिस चीज के जरिए होता है वह समय है । पूंजी के उत्पादन के लिए पढ़ने में समय लगाना उसका दुरुपयोग है । इसलिए पुस्तकालय खोलना और चलाना परोक्ष रूप से समय पर मनुष्य के खाली समय पर उसके अधिकार का समर्थन करना है ।
हमारे अपने समय की सबसे बड़ी समस्या के रूप में अंतोनियो नेग्री ने 2018 में पोलिटी से प्रकाशित किताब ‘फ़्राम द फ़ैक्ट्री टु द मेट्रोपोलिस’ में समूचे समाज का एक विराट कारखाने में बदलते जाना बताया है । जो लोग मनुष्य को अपना सम्पूर्ण व्यक्तित्व हासिल नहीं करने देना चाहते वे उसे केवल धन पैदा करने की मशीन बनाना चाहते हैं मुनाफ़े की उनकी भूख खाली समय को लाभप्रद बना देना चाहती है हम सभी देख रहे हैं कि लगातार मनुष्य के समूचे समय का दोहन करने की कोशिश हो रही है सभी सामाजिक गतिविधियों को बाजार के दायरे में लाया जा रहा है नींद पर भी विजय पाने के लिए प्रयोग चल रहे हैं ताकि निरंतर जागरण के बावजूद मनुष्य की कर्यक्षमता को बरकरार रखा जा सके इसका प्रयोग सैनिकों पर किया जा चुका है जो दूसरे देशों में जाकर चुने हुए लोगों का एक ही गोली से कत्ल कर लेते हैं इसके साथ ही काम के निश्चित आठ घंटे बीते युग की बात होते जा रहे हैं
जाहिर है कि यह भी लड़ाई का एक नया मोर्चा है । शासक वर्ग हमेशा ही लोगों के समय से लाभ अर्जित करने और मुनाफ़े के लोभ में नए नए कामों को लाभदायक बनाने के लिए मनुष्य को धन पैदा करने की मशीन मात्र में बदलने की कोशिश करता है । इसकी टक्कर में लगभग सभी संघर्षों ने ज्ञान पर जनता के अधिकार को साबित करने के लिए किताब को हथियार के बतौर इस्तेमाल किया है । यह संघर्ष केवल किताब के लिए संघर्ष कभी नहीं रहा इसमें समय पर अपना हक जताने से लेकर स्वाभिमान के दावे तक बहुत सी चीजें शामिल होती हैं संस्कृति के उच्च समझे जाने वाले कर्म कभी सामान्य लोगों को नहीं करने दिए जाते पढ़ना और लिखना ऐसे ही ऊंचे समझे जाने वाले कर्म हैं उनके करने के लिए दलित समुदाय को बहुत लम्बा सफर तय करना पड़ता है