Friday, April 23, 2021

क्रांतिकारी दुनिया

 

                              

2021 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से डेविड मोटाडेल के संपादन में ‘रेवोल्यूशनरी वर्ल्ड: ग्लोबल अपहीवेल इन द माडर्न एज’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना के अतिरिक्त किताब में दस लेख संकलित हैं जिनमें क्रमश: अटलान्टिक की क्रांतियों, 1848 की क्रांतियों, पेरिस कम्यून, प्रथम विश्वयुद्ध से पहले की संवैधानिक क्रांतियों, रूस की कम्युनिस्ट क्रांति, 1919 के विल्सनी उभारों, तीसरी दुनिया की क्रांतियों, इस्लामी क्रांति, 1989 की क्रांतियों और अरब देशों की हालिया क्रांतियों का विश्लेषण किया गया है । संपादक का कहना है कि क्रांतियों ने इतिहासकारों का ध्यान हमेशा खींचा है । शायद इसीलिए हेगेल ने फ़्रांसिसी क्रांति के वैश्विक महत्व के बारे में कहा कि इससे केवल एक देश नहीं पूरी दुनिया का इतिहास बदल जायेगा । उस समय के फ़्रांसिसी क्रांतिकारी भी इस बात को मानते थे । इसी तरह 1848 की क्रांतियों के समय मार्क्स और एंगेल्स ने सारी दुनिया के मजदूरों का क्रांति के लिए आह्वान किया था । लेनिन ने भी 1917 की क्रांति के बाद सारी दुनिया के उत्पीड़ित जनगण से एक होकर विश्वक्रांति करने का आवाहन किया था । 1989 की हलचलों के बाद फ़ुकुयामा को भी दुनिया का इतिहास बदलता हुआ प्रतीत हुआ था । आधुनिक युग की सभी क्रांतियों ने खुद को वैश्विक महत्व का माना और उन्हें मानव इतिहास का नया युग कहा । असल में इन क्रांतियों में सार्वभौमिक विचार तो मुखर हुए ही थे, उनकी भौगोलिक पहुंच भी एक देश तक सीमित नहीं रही । अधिकांश क्रांतियां देश की सीमा लांघकर पूरे इलाके या दुनिया में फैलीं ।

इस तरह की सबसे पहली क्रांतिकारी लहर का जन्म 1776 में अमेरिका में हुआ जो 1789 में फ़्रांस तक पहुंच गयी । आजादी के आदर्श से प्रेरित इन क्रांतिकारियों ने पुराने शासक कुलीनों और औपनिवेशिक प्रभुओं का तख्ता पलट दिया । फिर 1791 की हैती की क्रांति, 1798 की आयरलैंड की क्रांति और लैटिन अमेरिकी देशों में क्रांतिकारी युद्धों का सिलसिला शुरू हुआ । इसी दौरान हालैंड, बेल्जियम, पोलैंड और तुर्क साम्राज्य में भी ऐसी ही क्रांतिकारी लहर दौड़ पड़ी । 1848 की क्रांतियों की लहर तो इनसे भी अधिक घनिष्ठ रूप से आपस में जुड़ी हुई थी । समूचे यूरोप में उदारवाद और राष्ट्रवाद के विचारों से अनुप्राणित होकर क्रांतिकारियों ने तत्कालीन बादशाहत का मुकाबला करने के लिए बैरीकेड खड़े कर लिये । जनवरी में इटली से विद्रोह की शुरुआत हुई, फ़रवरी में फ़्रांस में उसका आगमन हुआ । फिर तो जर्मनी, हालैंड, डेनमार्क और आयरलैंड तक उसकी चपेट में आ गये । सैनिक शासन लगाकर हजारों को कत्ल करके अधिकांश देशों में इनको दबा दिया गया । आखिरकार यह क्रांतिकारी उथल पुथल यूरोप के समुद्र पार के उपनिवेशों तक जा पहुंची ।

एशिया में इसका परिणाम बीसवीं सदी के पूर्वार्ध की संवैधानिक क्रांतियों के रूप में प्रकट हुआ । जापान के हाथों रूस की पराजय ने 1905 की रूसी क्रांति को गति दी, फ़ारस में संवैधानिक क्रांति हुई और 1908 के आते आते तुर्की में युवा तुर्क क्रांति संपन्न हो गयी । इसी कड़ी में 1911 में चीन की क्रांति को भी देखना उचित होगा । रूस और जापान की लड़ाई में संविधान वाली एक एशियाई ताकत संविधानविहीन यूरोपीय ताकत को परास्त करने में सफल हुई । इसी वजह से एशिया के जो भी क्रांतिकारी कार्यकर्ता और सुधारक पुराने समाज और तानाशाही शासन प्रणाली का विरोध कर रहे थे उनके आदर्श के बतौर जापान की व्यवस्था नजर आयी । संवैधानिक क्रांति की लहर धुर पूरब से मध्य पूर्व होते हुए यूरोप पहुंची जहां ग्रीस और पुर्तगाल में संवैधानिक शासन कायम हुआ ।

रूसी क्रांति के असरात भी वैश्विक रहे । इसके प्रभाव में दुनिया भर के क्रांतिकारी व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में जुट गये । यूरोप के बाहर भी असंख्य आंदोलनों को इससे प्रेरणा मिली । इसी समय उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों की बाढ़ आ गयी । थोड़े समय बाद यह लहर शांत हो गयी और आजादी की उम्मीद पूरी नहीं हुई । फिर कुछ ही समय बाद उपनिवेशवाद विरोधी क्रांतिकारियों की सक्रियता शुरू हुई । शीतयुद्ध के दौरान तीसरी दुनिया की क्रांतियों ने एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका को हिलाकर रख दिया । विश्व क्रांति के मार्क्सवादी आवाहन ने अमेरिकी सत्ता की नींद हराम कर दी थी । विडम्बना यह रही कि शीतयुद्ध का खात्मा कम्युनिस्ट शासनों के विरुद्ध वैश्विक क्रांति से हुआ । पोलैंड से इसकी शुरुआत हुई, हंगरी, पूर्वी जर्मनी, बुल्गारिया और चेकोस्लोवाकिया होते हुए आखिर रोमानिया में चाउसेस्कू शासन के उन्मूलन से इसका अंत हुआ । इनके बाद की हालिया लहर अरब मुल्कों की क्रांति के साथ आयी थी । किताब का मकसद यही बताना है कि क्रांतियां आम तौर पर वैश्विक होती हैं ।

इनमें अंतर भी रहे हैं । अब तक इनके अध्ययन में अंतरों पर ही जोर दिया जाता रहा है । इसके बावजूद संपादक ने जोर दिया है कि इनकी सहकालिकता आपसी सम्पर्क को देखने के लिए मजबूर करती है । इन सम्पर्कों को उस समय के क्रांतिकारियों ने भी चिन्हित किया था । कुछ ऐसे भी सम्पर्क रहे हैं जो उस समय नहीं दिखायी देते थे लेकिन अब उन्हें इतिहासकार देख सकते हैं । असल में ये सम्पर्क कभी कभी परोक्ष भी होते हैं । बड़े युद्ध, वैश्विक आर्थिक संकट या साम्राज्यों के अंत जैसे कुछ संरचनागत बदलाव इन सबको एक साथ प्रभावित करते हैं । इनके कारण विभिन्न देशों में सत्ता के लिए संघर्ष लगभग एक ही समय शुरू हो जाता है । इसका एक ज्वलंत उदाहरण प्रथम विश्वयुद्ध है जिसके चलते 1917 से क्रांतिकारी विस्फोटों की झड़ी लग गयी थी । इसके अतिरिक्त देशों की सरहदों के आर पार क्रांतिकारी आंदोलनों का प्रत्यक्ष सम्पर्क भी हो सकता है । साम्राज्यवाद, व्यापार और वाणिज्य तथा संचार और परिवहन के आधुनिक साधनों से दुनिया भर के देशों में सम्पर्क घनिष्ठ हुआ है । जैसे जैसे यह एकीकरण बढ़ता गया वैसे ही वैसे क्रांतियों का वैश्विक होना भी तेज होता गया है ।

लगभग सभी क्रांतिकारी नेता घुमक्कड़ रहे हैं । उन्होंने तमाम देशों की यात्रा की । उन्होंने सहयोग और क्रांतिकारी सामाजिकता के नये सूत्र समूचे साम्राज्य में या पारदेशीय स्तर पर स्थापित किये । कभी कभी वे ऐसी सरकारों के साथ भी सम्पर्क बनाते थे जो क्रांति में मदद करने की इच्छा रखती थीं । जिन देशों में क्रांतिकारी सरकारें होती थीं वे अक्सर विदेश के क्रांतिकारी आंदोलनों को सैनिक या असैन्य सहायता देती थीं । इससे भी ज्यादा महत्व की बात क्रांतिकारी विचारों का प्रवाह थी । इनकी अनुगूंज अक्सर सीमाओं के आर पार सुनायी पड़ती थी । आधुनिक काल के अधिकांश क्रांतिकारियों ने गणतंत्र, संविधान, साम्यवाद या उदारवाद जैसे सार्वभौमिक दावे किये । उन्होंने पुराने शासकों को हटाकर लोकप्रिय किस्म की सरकारों का गठन करना चाहा । विदेश से क्रांतिकारी विचारों के आयात का व्यावहारिक पहलू उनका किसी अन्य देश में सफल होने का सबूत बन जाता था । इससे क्रांतिकारी समूह को किसी वैश्विक आंदोलन का अंग होने का गौरव बोध भी हासिल होता था । ये विचार जब एक से दूसरे देश में फैलते थे तो स्थानीय संदर्भों के मुताबिक राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों में अंतर के चलते उनमें अर्थ परिवर्तन भी हो जाता था । इन क्रांतिकारी विचारों के प्रसार के लिए विविध माध्यमों का उपयोग किया जाता था । चिट्ठी, परचा, अखबार और किताबों के अतिरिक्त रेडियो, टेलीविजन, कंप्यूटर और मोबाइल फोन का भी इनके लिए इस्तेमाल होता रहा है । लेख, फोटो, गीत, कविता और तमाम कला रूप इनके प्रसार के माध्यम रहे हैं । विगत सदियों के दौरान इन विचारों को फैलाने के माध्यमों में भरपूर बदलाव आता रहा है । अटलांटिक क्रांतियों के जमाने में पानी के जहाजों पर वे समुद्र पार कर जाते थे । संचार के आधुनिक साधनों के आगमन के साथ उनके प्रसार की गति तेज हुई । संवैधानिक क्रांतियों के समय बेतार के तार के अलावे रेल और स्टीमर ने उन्हें घंटों में फैला दिया था । जैसे जैसे बीसवीं सदी आगे बढ़ी और तकनीकी विकास होता गया वैसे ही वैसे वैश्विक जन गोलबंदी में तकनीक की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती गयी ।

संपादक का मानना है कि विद्रोहों के प्रसार का अध्ययन करते हुए केंद्र से हाशिये की ओर प्रसार की धारणा को मान लेना भ्रामक होगा । अनेक मामलों में वैश्विक क्रांतिकारी आंदोलनों का गुरुत्व केंद्र यूरोप ही नहीं रहा है । हालांकि आधुनिक काल की अनेक क्रांतिकारी लहरों का जन्म यूरोप के भीतर हुआ लेकिन यूरोपीय क्रांतियों पर भी वैश्विक बदलावों का प्रभाव रहा है । उदाहरण के लिए अमेरिका की उपनिवेशवाद विरोधी क्रांति का यूरोप के सभी साम्राज्यी केंद्रों पर उल्लेखनीय असर पड़ा और उनके साम्राज्य के भीतर के जाल के सहारे स्वाधीनता के विचारों का प्रसार हुआ । असल में कोई एक केंद्र कभी रहा ही नहीं और अंतरण भी एकाधिक दिशाओं में होता रहा है क्योंकि सभी क्रांतिकारी आंदोलनों ने एक दूसरे को प्रभावित किया है । क्रांतिकारी आवेग भी लहरों की तरह चलता रहा है । उसकी उठान आती है, उसके बाद बिखराव आता है तब उनका उतार हो जाता है । सहकालिक क्रांतियों में नेताओं या विचारों की यात्रा को छोड़कर भी सम्पर्क का एक और रास्ता होता है । एक जगह पर होनेवाली क्रांति दूसरे देश में समाजार्थिक या राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकती है । उदाहरण के लिए अमेरिकी क्रांति में फ़्रांस का बहुत धन लगा जिससे फ़्रांस में आर्थिक संकट आने से फ़्रांसिसी क्रांति के हालात पैदा हुए ।

क्रांति की धारणा में भी काल और देश के अनुसार बदलाव आता रहा है । अलग अलग देशों में न केवल इसके लिए अलग शब्द होते हैं बल्कि उनके मतलब भी अक्सर एक समान नहीं होते । पश्चिमी दुनिया में जिस अर्थ में इसका प्रयोग किया जाता है उसमें दुनिया भर की हलचलों के बारे में जितना स्पष्ट होता है उतना अस्पष्ट रह जाता है । फ़्रांसिसी क्रांति से पहले इसका मतलब पुरानी राजनीतिक व्यवस्था में वापस पहुंचना हुआ करता था । पहले ग्रहों की गति से जुड़ी परिघटना के लिए प्रयुक्त इस शब्द को राजनीतिक शब्दावली में बाद में प्रवेश मिला । राजनीति में भी इसे चक्रीय गति की तरह ही समझा जाता था । इसके पीछे मान्यता थी कि पूरी नयी व्यवस्था का निर्माण सम्भव नहीं और प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था की पूर्वनिर्धारित क्रमावधि है । तब मानव इतिहास को भी बहुत कुछ प्राकृतिक परिघटना समझा जाता था जिसमें मनुष्य के हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं होती । हाब्स ने भी शासनों के एक चक्र के लिए ही इस शब्द का इस्तेमाल किया है । आज जिसे क्रांति कहा जाता है उसे उस समय विद्रोह या फ़साद कहा जाता था । इसके कारण ही हान्ना आरेन्ट का मानना था कि क्रांति का अस्तित्व आधुनिक युग से पहले नहीं था ।

प्रबोधन के समय इस शब्द का अर्थ बदलना शुरू हुआ । अब इसे मानव जनित क्रिया समझा जाने लगा । इसके साथ ही जनता की धारणा भी लोकप्रिय होना शुरू हुई क्योंकि क्रांतियों को सामूहिक प्रयास माना जाने लगा । यह भी माना जाने लगा कि क्रांतियों से पूरी तरह नयी सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था का जन्म होता है । समय की भी चक्रीय समझ की जगह पर रेखीय समझ विकसित हुई । धीरे धीरे क्रांति के साथ मुक्ति और प्रगति की उम्मीद भी जुड़ती गयी । जब मार्क्स ने क्रांतियों को इतिहास का इंजन कहा तो प्रगति की इसी धारणा के तहत ऐसा माना । समझ में इस बदलाव के साथ शब्द में भी बदलाव आया और इसके लिए इंकलाब नामक अरबी शब्द लोकप्रिय हो गया । अटलांटिक क्रांतियों के बाद यही अर्थ दुनिया भर में मान्य हो गया । किताब में भी इसी अर्थ में क्रांति को समझा गया है ।

अतीत और वर्तमान के समाजों को समझने के लिए विद्वानों ने क्रांति की अलग अलग तरीके से व्याख्या की है । किसी भूभागीय राजनीतिक इकाई में शासक समूह में अचानक परिवर्तन से लेकर सामाजिक क्रांति की ऐसी धारणा तक जिसमें समाज, राजनीति और वर्गीय संरचना में तीव्र रूपांतरण हो जाता है, तमाम तरह की धारणाओं के सहारे इसे समझने की कोशिश होती है । कुछ लोग इसे शासन पर कब्जे के लिए दो समूहों की जन समर्थित होड़ के रूप में भी पेश किया है । इस किताब में किसी देश में सत्ता पर शासक की दावेदारी के विरोध में बहुसंख्यक लोगों के उठ खड़े होने से पैदा त्वरित और अक्सर हिंसक बदलाव को क्रांति के रूप में समझा गया है । साथ ही क्रांति के जन समर्थित गम्भीर प्रयासों को भी इसमें शामिल किया गया है । तख्तापलट या बाहरी हस्तक्षेप से शासक बदलने को ऐसी परिघटना नहीं माना गया है । क्रांति की परिभाषा के राजनीतिक होने के बावजूद उनका सांस्कृतिक आयाम भी प्रकट होता रहा है । राजनीतिक संस्कृति, सामाजिक वातावरण, भाषा और विश्वदृष्टि को आकार देने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है । भय या उम्मीद जगाने में भी इन्होंने योग दिया है ।

क्रांतियों के दीर्घकालीन और तात्कालिक कारणों का दसियों साल तक अध्ययन किया जाता है । उनके कारक, लक्ष्य, साधन और गतिपथ के लिहाज से निजी सिविल नाफ़रमानी के सामूहिक अवज्ञा में बदलने तक और सरकारी ढांचे के नियंत्रण में बदलाव से लेकर पुराने शासकों की विश्वदृष्टि की जकड़बंदी टूटने तक इतिहास में तमाम रूप प्रकट होते रहे हैं । उनकी प्रकृति में मौजूद इस विविधता के चलते क्रांतियों का विश्व इतिहास लिखना मुश्किल है लेकिन इससे उनकी प्रकृति को समझने में मदद मिलती है ।

Tuesday, April 20, 2021

इतिहास की सीख

 

                

1992 में रटलेज से रोजर एस गाटलिएब की किताबमार्क्सिज्म 1844-1990: ओरिजीन्स, बिट्रेयल, रीबर्थका प्रकाशन हुआ । किताब के नौ अध्याय चार हिस्सों में हैं । पहले हिस्से में शुरुआत, दूसरे में विश्वासघात, तीसरे में पुनर्जन्म और चौथे में वर्तमान तथा भविष्य के प्रसंगों का विश्लेषण है । खास बात कि विश्वासघात के मामले में यूरोप की सामाजिक जनवाद की धारा के साथ ही सोवियत संघ के मार्क्सवाद को भी शामिल किया गया है । इसी तरह पुनर्जन्म के प्रकरण में पश्चिमी मार्क्सवाद और समाजवादी नारीवाद को विवेचित किया गया है । वर्तमान और भविष्य के प्रसंग में समकालीन पूंजीवाद, हालिया उत्तर मार्क्सवादियों और आध्यात्मिकता को विश्लेषित किया गया है । किताब समकालीन समाज और सभ्यता के समक्ष चुनौती पेश करती है । इस चुनौती के मूल में मनुष्य के कष्टों की गहन अनुभूति और इस जानकारी से उपजा प्रचंड विक्षोभ है कि इन कष्टों से बचा जा सकता है । बेघर और भूखे होने, स्त्रियों और बच्चों का बलात्कार और यौन उत्पीड़न, मेहनत और जमीन की चोरी तथा उम्मीद और स्वाभिमान के हनन को क्रांतिकारी लोग ईश्वर की करतूत नहीं मानते । उनको यकीन है कि इनका कारण अन्याय, शोषण, हिंसा और संगठित क्रूरता हैं जिन्हें दूर किया जा सकता है । अगर हम समता, न्याय और मनुष्य की खुशी को सामाजिक ढांचे का लक्ष्य बनायें तो वर्तमान की क्रूरता के स्थान पर भौतिक सुरक्षा, सामाजिक समरसता और आकांक्षा के साकार होने की राह खुलेगी । सुधारवादी और परोपकारी लोग भी इन चिंताओं में शरीक होते हैं लेकिन उनके मुकाबले क्रांतिकारी लोग अन्याय की समूची व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं । इस व्यवस्था के तहत खास लोगों को अपमानित किया जाता है, उनके अधिकार छीन लिये जाते हैं और उन पर अनुचित नियंत्रण रखा जाता है । इस अन्यायी तंत्र में मुट्ठी भर लोग अमीर होते जाते हैं और ज्यादातर लोग गरीबी या आर्थिक असुरक्षा का सामना करते हैं । भाग्यशाली लोग विशेषाधिकारों का उपभोग करते हैं जबकि अधिकतर लोग अपमानित होते हैं । अनंत उपभोग की हमारी आदत के चलते प्रकृति में जहर घुलता जाता है । सत्ताधारी लोगों को इससे मुनाफ़ा मिलता है जबकि इनका दोष इनके शिकार लोगों पर ही मढ़ दिये जाते हैं । इन सबके चलते लोगों की तकलीफ का कोई दीर्घकालीन समाधान व्यवस्थागत होना लाजिमी है । दमन और बहिष्करण की इस व्यवस्था ने सरकारों और अर्थतंत्र, परिवार और संस्कृति तथा विज्ञान और मनोविज्ञान को आकार दिया है । इसके कारण क्रांतिकारी लोग आंशिक सुधार पर आधारित सपनों की जगह रोज ब रोज के संघर्ष में सत्ता के समुचित वितरण, मानव गरिमा और मनुष्य के जीने लायक पर्यावरण पर जोर देते हैं । उनका मानना है कि आधुनिक अर्थतंत्र को लोकतांत्रिक नियंत्रण में लाकर उसे मुनाफ़े की जगह मनुष्य की जरूरत पूरा करने में लगाया जा सकता है, संपत्ति और सत्ता में भारी अंतर मिटाया जा सकता है और धरती को बरबाद करने की जगह उसे संरक्षित किया जा सकता है । उनका दावा है कि असली लोकतंत्र में सामान्य लोग केवल मतदान केंद्र जाने की जगह राजनीतिक और आर्थिक नीतियों को बनाने में सक्रिय भागीदारी करते हैं । इन बुनियादी बदलावों को अमल में लाने के लिए क्रांतिकारियों ने राजनीतिक पार्टी बनाने से लेकर विद्रोह संगठित करने तक तमाम तरीके अपनाये । इसके लिए व्यापक जन समूह की भागीदारी जरूरी है । नौकरशाही की ओर से क्रांति के साथ विश्वासघात रोकने का एकमात्र रास्ता शुरू से खुली बहस, आपसी सम्मान और सामूहिक सबलीकरण की आदत डालना है । कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास से यही सीख मिलती है ।                      

बहुत सारे लोग मानते हैं कि क्रांतिकारी विचार अव्यवहार्य सपना है । लेकिन अगर इस सपने को छोड़ दिया जाये तो मानवता को वर्तमान तकलीफ में ही रहने देना होगा । केवल प्रतीकात्मक सुधार होते रहेंगे । क्रांतिकारियों का यकीन है कि बुनियादी तौर पर अलग और मुक्तिकारी जीवन पद्धति के निर्माण की क्षमता मनुष्यों में है । बेहतर दुनिया का सपना तो हमेशा ही लोगों ने देखा था लेकिन अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध से कुछेक संगठित समूहों ने सामाजिक जीवन की व्यवस्थित सैद्धांतिक आलोचना शुरू की । इस आलोचना को उन्होंने ऐसे राजनीतिक आंदोलनों में साकार किया जिनका मकसद तत्कालीन आर्थिक मालिकाने और राजनीतिक नियंत्रण की व्यवस्था को उखाड़ फेंकना था । अमेरिकी क्रांतिकारियों ने सबके अनुल्लंघनीय अधिकारों को मान्यता दी और फ़्रांसिसी क्रांतिकारियों ने समता, स्वतंत्रता और भाईचारे की बात की । उसके बाद मार्क्सवादी, समाजवादी, नारीवादी, राष्ट्र मुक्ति, नागरिक अधिकार, स्त्री पुरुष समलिंगी मुक्ति और पारिस्थितिकी आंदोलनों का जन्म हो चुका है । सबने पहले के आंदोलनों की उपलब्धियों का लाभ उठाया, उनकी सीमाओं की आलोचना की और नयी जमीन तोड़ी । कभी कभी इन सभी आंदोलनों से भारी गलतियां हुईं और उन्हें विफलता भी मिली । आज वे अधिक प्रत्यक्ष हैं । समाजवादी खेमे का अंत हुआ और शीतयुद्ध में अमेरिका की जीत हुई । पूंजीवाद और मुक्त बाजार का बोलबाला कायम हुआ । जो लोग कभी कम्युनिस्ट या समाजवादी कहलाते थे वे विदेशी पूंजी निवेश और आर्थिक सलाह के लिए होड़ लगाये हुए हैं ।

इसके बावजूद इन आंदोलनों को कुछ सफलता भी हासिल हुई । क्रांतिकारियों ने बेहतरी की दिशा में सामाजिक जीवन को बदला । मूलभूत आजादियों, अधिकारों और आधुनिक जीवन की भौतिक सुविधाओं के लिए ये क्रांतिकारी ही लड़े । आठ घंटे काम और यूनियन बनाने का अधिकार, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और नस्ली भेदभाव का विरोध, युद्ध विरोध और बेरोजगारी भत्ता जैसी चीजों को हासिल करने में क्रांतिकारी आगे बढ़कर लड़ते रहे । उनकी समझ के चलते जिन समस्याओं के कारण अलग अलग नजर आते थे उनमें आपसी रिश्ता नजर आने लगा । उन्होंने यह बताया कि स्त्री के प्रति यौन व्यवहार और पारिस्थितिकी विध्वंस का मूल समान है । उन्होंने निजी संपदा और विस्तारवादी विदेश नीति का आपसी सम्पर्क स्पष्ट किया । उन्होंने परिवार, कारखाने, सेना और सरकार में नियंत्रण की एक ही व्यवस्था का प्रसार सिद्ध किया ।

उनकी विफलता का कारण यह भी था कि कई बार वे उतने क्रांतिकारी नहीं रहे जितना उन्हें होना चाहिए था । वे यथोचित रूप से समावेशी और ईमानदार नहीं रहे और यह देखने को तैयार नहीं हुए कि कैसे क्रांतिकारी राजनीतिक कार्यक्रम और उनका सामूहिक आचरण दमनकारी और अन्यायी समाज का पुनरुत्पादन कर रहा है । इनकी भारी विफलताओं से पता चलता है कि क्रांतिकारी विचार को व्यापक समाज की आलोचना तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, उसे आत्मालोचन की आदत भी डालनी चाहिए । यह प्रक्रिया क्षुद्र संकीर्ण छिद्रान्वेषण में पतित न हो जाये इसके लिए इसे अतीत से सीखकर भविष्य को संवारने की कोशिश बनाना होगा । उदाहरण के लिए उत्पीड़ितों के बीच एकजुटता कायम करने की कोशिश के दौरान इस विरोधाभास का पता चला कि कोई व्यक्ति दमन की किसी एक व्यवस्था का शिकार रहते हुए भी दूसरे मामले में दमनकारी की भूमिका निभा सकता है । लेखक को आशा है कि क्रांतिकारी बदलाव और निरंतर आत्म परीक्षण में उनकी किताब मदद करेगी । इस समय इसकी जरूरत बहुत अधिक है ।

Wednesday, March 24, 2021

धर्म के आवरण में विद्रोह की अनूठी अभिव्यक्ति

 

             

                                                   

कनक तिवारी की 2021 में सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर से प्रकाशित किताबविद्रोही वेदान्ती का भारत बोध (विवेकानन्द को समझने की कोशिश)’ को इस दौर की महत्वपूर्ण पुस्तक के बतौर देखा जाना चाहिए बताने की जरूरत नहीं कि आधुनिक काल में सांस्कृतिक अनुपनिवेशन के प्रयासों का भरपूर गहरा रंग आध्यात्मिक भी था उस समय धर्म के आवरण में जिन लोगों ने भारत को जगाने की कोशिश की उन सबमें स्वामी सहजानन्द सरस्वती, स्वामी दयानन्द सरस्वती और महर्षि अरविन्द के साथ ही विवेकानन्द का नाम अग्रणी रूप से शामिल किया जाता है वह समय जिस विराट आलोड़न का था उसमें ढेर सारे धार्मिक लोग राजनेता की तरह दिखाई देते हैं तो अनेक राजनेता धार्मिक भाषा में बातचीत करते सुनाई पड़ते हैं रोमांचक यह तथ्य है कि इन सबसे किसी किसी तरह हिन्दी के साहित्यकारों का भी रिश्ता रहा है इस रिश्ते की सबसे जीवंत कड़ी राहुल सांकृत्यायन हैं जिन्होंने तमाम धर्मों के भीतर की आवाजाही तो की ही, धर्म की सीमा लांघकर समाज के क्षेत्र में भी उतरे यह आलोड़न केवल हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं था इस्लाम के भीतर भी अल्लामा इकबाल से लेकर मौलाना अबुल कलाम आजाद तक तमाम ऐसे लोग रहे जिन्हें इस ढांचे के सहारे देखा जा सकता है उस समय के इन प्रयासों की निरंतरता आज तक कायम है इसी वजह से इनके नाम का उपयोग या दुरुपयोग चलता रहता है

किताब में नन्दकिशोर आचार्य और डाक्टर नरेन्द्र देव वर्मा की लिखी भूमिकाओं को भी शामिल किया गया है । इस तरह की किताबों में भूमिका की उपयोगिता पर विचार किया जाना चाहिए । लेखक की राय उसके विश्लेषण में अनुस्यूत होती है, भूमिका उसके सीधे अभिग्रहण में मध्यस्थ की अनावश्यक चेष्टा बनकर रह जाती है । आचार्य जी की भूमिका तो फिर भी पुस्तक के लिए पाठक को तैयार करती है लेकिन नरेन्द्र जी की भूमिका पाठक को अपनी संस्कृतनिष्ठ भाषा और समझ से डरा देती है । किताब में जिस व्यक्ति की चर्चा है वह फ़ुटबाल प्रेमी भी था । अज्ञेय ने असम के सत्राधिकारों की चर्चा करते हुए धार्मिकों के मानवीय पक्ष को उभारने पर जोर दिया था । नरेन्द्र जी ने अपनी भूमिका से मनुष्य विवेकानन्द को दैवी स्वरूप प्रदान कर दिया है । सबसे बेहतर तो बिना किसी भूमिका के किताब का प्रकाशन होता लेकिन भूमिका को कम से कम कथ्य पर अर्थ थोपने का दायित्व नहीं निभाना चाहिए ।    

इन भूमिकाओं के बिना भी पुस्तक का कथ्य अत्यंत संप्रेषणीय बन पड़ा है । कनक तिवारी ने स्पृहणीय स्पष्टता और बल के साथ विवेकानन्द के सहारे ऐसे योद्धा वेदान्ती की छवि प्रस्तुत की है जिसने न केवल दुनिया में हिंदू धर्म और तत्व दर्शन का डंका बजाया बल्कि उसे इतना समावेशी बताया कि इस समय उसमें कट्टरता प्रविष्ट कराने के लिए उसके इस समावेशी स्वरूप को समाप्त करना खास विचार के अंध पथिकों का एकमात्र लक्ष्य बन गया है । अमेरिका में आयोजित धर्म संसद में विवेकानन्द की मौजूदगी के रोमांचक वर्णन से किताब की शुरुआत होती है । इस अनोखी धर्म संसद में, जो फिर कभी न हो सकी, विवेकानन्द का संबोधन ही अद्भुत थामेरे अमेरिकी बहनों और भाइयों। इस संबोधन की विशेषता को खोलते हुए लेखक ने कहा कि किसी भारतीय की ओर से गोरे अमेरिकी लोगों को बंधु कहना भारत देश को ऊपर उठाकर संसार में नस्ली बराबरी की आकांक्षा को व्यक्त करना है । दूसरी विशेषता इस संबोधन में भाइयों से पहले बहनों को रखना है । यह तो सचमुच बेहद क्रांतिकारी बात थी और इसे केवल भाषाई चमत्कार या खेल नहीं समझा जाना चाहिए । अवश्य इसमें स्त्री की श्रेष्ठता स्वीकार करने का आग्रह है । इस प्रसंग को पढ़ते हुए पाठक तथ्यों से आगे जाकर भावावेश का अनुभव करने लगता है । असल में उनकी किताब वर्तमान वातावरण का ध्यान रखकर तैयार की गयी है । इस समय हम सब देख रहे हैं कि विषमता और गरीबी पैदा करने वाली नीतियों के वास्तविक प्रभाव को छिपाने के लिए झूठा गौरव बोध पैदा किया जा रहा है और इसके लिए अतीत की मनमानी व्याख्या की जा रही है ।

लेखक ने विभिन्न शीर्षकों के तहत विवेकानन्द के बारे में विचार किया है । ये लेख संवादधर्मी शैली में लिखे गये हैं । उनमें गहरे लगाव और प्रचंड क्षोभ से उपजी भावावेशी रचनात्मकता भरी पड़ी है । इनके प्रांजल प्रवाह को देखकर बहुधा प्रतीत होता है कि ये लिखित न होकर व्याख्यानों के मुद्रित रूप हैं । वैसे किताब के अंत में शामिल तीन परिशिष्टों में से एक व्याख्यान है भी । ये तीनों परिशिष्ट छतीसगढ़ के साथ विवेकानन्द के जीवंत जुड़ाव का संदर्भ लिये हुए हैं । रायपुर के रामकृष्ण मिशन के एक स्वामी आत्मानंद इनके केंद्र में हैं । व्याख्यान में सूत्ररूप में किताब में कही गयी बातों को लिख दिया गया है । शेष अध्याय वैसे तो अलग अलग शीर्षकों से विभाजित हैं लेकिन कुछ बातों का दुहराव एकाधिक अध्यायों में हुआ है ।

भारत में विवेकानन्द की बौद्धिक उपस्थिति लगातार बनी रही है । तमाम अन्य लोगों की तरह ही उनके प्रति पूजाभाव के चलते व्यवहार में उनके विचारों की सक्रिय उपयोगिता बहुत सीमित कर दी गयी है । उनकी लोकप्रियता के कारण उनको भुनाने की कोशिश भी निरंतर चलती रही है । इस समय तो खासकर उन पर खास तरह के हिंदुत्व के निर्माण के लिए कब्जा जमाने की ललक विशेष बढ़ी हुई नजर आ रही है । लेखक को इस माहौल का खयाल बना हुआ है । वे लिखते हैं ‘उनके शिकागो सम्बोधन के सौ वर्ष पूरे होने पर बहुत सावधानी और चतुराई के साथ एक बार फिर विश्व हिन्दू परिषद और संघ परिवार ने विवेकानन्द को अपने विचारों का पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपनी भविष्यमूलक सियासी सम्भावनाओं को ध्यान में रखकर प्रचार कर दिया’ (पृष्ठ 280) । लेकिन लेखक का निष्कर्ष है किविवेकानन्द का राष्ट्रवाद पूरी तौर पर संघ के सैद्धांतिक सोच और रणनीतिक क्रियात्मकताओं के खांचे में फिट नहीं बैठता । इसलिए राष्ट्रीय स्वयं संघ को विवेकानन्द से मूल नहीं, अतिरिक्त लगाव है’ (पृष्ठ 283)

लेखक ने लम्बे समय तक विवेकानन्द की रचनाओं का सावधान पाठ किया है इसलिए निश्चिंत है कि ऐसी कोई चेष्टा विवेकानन्द को किसी एक विचार के भीतर सीमित न कर सकेगी । असल में विवेकानन्द की पारम्परिक रूप से गढ़ी मूर्ति के विरोध में इतने तथ्य पड़ते हैं कि ऐसा करना आसान न होगा । उन अप्रचारित तथ्यों पर लेखक ने इसीलिए कई बार जोर दिया है । उनके अपने भाई भूपेंद्रनाथ दत्त पर समाजवादी विचारों का प्रभाव तो था ही, वे उन कुछ गिने चुने भारतीयों में थे जिन्होंने रूस की यात्रा करके लेनिन से मुलाकात की थी । खुद विवेकानन्द भी इतने विद्रोही तो थे ही कि कुछ विचारकों ने उन्हें ‘वेदान्ती समाजवाद’ का प्रवर्तक बताने की गुंजाइश उनके भीतर पायी है । इसी सिलसिले में लेखक ने बहुधा इस तथ्य का उल्लेख किया है कि उस समय के क्रांतिकारियों की गिरफ़्तारी पर उनके पास विवेकानन्द का साहित्य बरामद होता था । विवेकानन्द के इस पहलू को और भी अधिक उभारते हुए लेखक बताते हैं किदुनिया के इतिहास में आज तक किसी भी विचारक ने यह बात नहीं कही जो स्वामी जी ने सौ बरस से पहले कह दी थी कि हम सर्वहारा की संस्कृति लाएं’ (पृष्ठ 298) । इसे जरूर उन्होंने परम्परिक शब्दावली में पेश करते हुए ‘शूद्र राज’ के आगमन की घोषणा के रूप में व्यक्त किया । इसके आगमन की सम्भावना का उन्होंने स्वागत किया था ।  

इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान देना होगा कि उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस में भी धार्मिक संकीर्णता न थी । प्रसिद्ध है कि वे विभिन्न धर्मों का आचरण कुछ दिनों के लिए करते थे । इसी विरासत के चलते उनके इस प्रतिभाशाली शिष्य ने गर्व से घोषित किया कि सभी धर्म सत्य हैं । न केवल इतना बल्कि जाति से अब्राह्मण होने के चलते उन्हें गेरुआ वस्त्र धारण करने के बावजूद यदा कदा अपमानित भी होना पड़ा था । अपने गुरु को वेलूर मठ तक सीमित रखने की जगह उन्होंने ऐसा संस्थान बना दिया कि देश-विदेश में उनकी कीर्ति का स्थायी स्तम्भ खड़ा रहेगा । रामकृष्ण मठ केवल भवन और परिसर नहीं होते, बल्कि वहां के साधुओं को किसी भी आपदा में सामाजिक सेवा करते देखा जा सकता है । इसी वजह से लेखक ने विवेकानन्द को ‘केवल भगवा साधु के रूप में स्वीकार करने से इंकार’ किया है और कहा है कि ‘विवेकानन्द इस देश के पहले साधु विचारक हैं जिन्होंने आध्यात्मिक उन्नति के साथ गरीब आदमी की भौतिक समृद्धि की बात की थी’ (पृष्ठ 294) ।

1863 1902 तक कुल 39 साल की उम्र पाने वाले इस बेचैन संन्यासी की वैचारिक यात्रा बेहद रोमांचकारी रही । इस यात्रा का विवेचन करते हुए लेखक ने तपन रायचौधुरी के मत का उल्लेख किया है जिनके मुताबिकउनके व्यक्तित्व के कम से कम तीन आयाम हैं। इन तीन आयामों को इस तरह गिनाया हैउनकी प्रतिक्रिया या समझ स्वयं के आत्मिक विकास और उसे परिपूर्णता तक पहुँचाने की कशिश रही है। दूसरे आयाम को वे उनकी अमेरिका और यूरोप यात्रा से जोड़ते हैं और इसकी विशेषता के रूप मेंभारत की समस्याओं को देखकरव्यथापूर्ण कोलाहल के चलते कोई रास्ता या हल तलाशने की कोशिश के कारण उनमें अस्तव्यस्त लेकिन धार्मिक अवधारणाओं और वेदान्त की शिक्षाओं के प्रभाव से एक तरह की समझ का यौगिकबताते हैं । इसके बादतृतीयत: उन्होंने एक बेहतर विकल्प ढूंढा । संसार के सभी धर्मों में अन्तर्निहित एक शाश्वत सत्य है’ (पृष्ठ 281)

विवेकानन्द की धार्मिक उदारता का उत्थान लेखक ने महात्मा गांधी के रूप में देखा है । इस सिलसिले में एक तथ्य का उन्होंने एकाधिक बार जिक्र किया है कि महात्मा गांधी विवेकानन्द से मिलने वेलूर मठ गये थे लेकिन विवेकानन्द के अस्वास्थ्य के चलते वह विराट सम्भावना आकार न ले सकी । गांधी के छुआछूत विरोधी आंदोलन के स्रोत को विवेकानन्द में देखते हुए वे कहते हैंहम बहुत श्रेय देते हैं कि छुआछूत के खिलाफ, दरिद्र नारायण को लेकर, साध्य और साधन के रिश्ते का सारा आंदोलन महात्मा गांधी ने कियालेकिन सच यह है किवह सब का सब एक दशक या उससे अधिक पहले सबसे पहले स्वामी विवेकानन्द ने इस धरती पर रोपा था’ (पृष्ठ 296) । इस सन्दर्भ में तिवारी जी ने इस बात पर भी क्षोभ प्रकट किया है कि स्वामी जी के सरोकारों को संविधान में यथोचित जगह न मिल सकी, उन्हें राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के खाते में डाल दिया गया ।

स्वामी जी की शिष्या सिस्टर निवेदिता की मार्फत लेखक ने बहुत ही महत्व के पहलू को उजागर किया है । उनके मुताबिकराजनीतिक नस्ल का औपचारिक राष्ट्रवाद यूरोप में अवतरित और विकसित हो चुका था । उससे अलग हटकर विवेकानन्द ने भारत को एक औपचारिक राजनीतिक इकाई के राष्ट्रवाद के रूप में परिणित करने का विकल्प ढूंढने से पहले राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत कर दिया था’ (पृष्ठ 280) । इसीलिए लेखक श्री तिवारी विवेकानन्द को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक मानने के मुकाबले भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीयताका प्रतीक कहना बेहतर समझते हैं ।                       

विवेकानन्द को धर्म तक सीमित करने के आग्रह का खंडन करते हुए लेखक ने जोर देकर कहा हैउन्होंने वेदान्त का प्रचार करने से ज्यादा युवकों को फ़ुटबाल खेलने की प्रतीकात्मक सलाह भी दी थी’ (पृष्ठ 252 ) । विवेकानन्द के लेखन के इसी पहलू ने इस समीक्षक को भी सबसे पहले इस संन्यासी की ओर खींचा था । उनके सक्रिय वेदान्त का एक रूप प्रस्तुत करते हुए तिवारी जी कहते हैंविवेकानन्द हजारों युवजनों की एक तरह की सेना संगठित कर उनके जरिए शिक्षा को प्रत्येक द्वार तक ले जाना चाहते थे’ (पृष्ठ 230) । विवेकानन्द के इसी किस्म के विचारों के चलते धर्म के सक्रिय सामाजिक इस्तेमाल के एक अन्य हिमायती तलस्तोय को उनकी ओर आकर्षित किया था । तिवारी जी ने तलस्तोय के विवेकानन्द के लेखन से परिचय के पुष्ट प्रमाण प्रस्तुत किये हैं । लेखक ने देश की सेवा में अमीरों से विवेकानन्द की निराशा का भी उल्लेख किया है । धर्म को भोजन तक सीमित कर देने की मूढ़ता का मजाक उड़ाते हुए ही उन्होंने इसेरसोई धर्मकहा और इसकी संकीर्णता को द्योतित करने के लिए व्यंग्य का शब्द दिया-‘मतछुओवादऔर लिखामतछुओवाद एक मानसिक व्याधि है। छुआछूत का उनका विरोध इतना भीषण था किविवेकानन्द ने विदेशों में जाकर भी हिन्दू धर्म की इस कुप्रथा का उपहास किया’ (पृष्ठ 211) । आज इस तरह का साहस करने वाले को देशद्रोही साबित कर दिया जायेगा । अस्पृश्यता के उनके विरोध को सामने लाते हुए लेखक ने इस बात पर परदा नहीं डाला है किवे वर्णव्यवस्था और जाति प्रथा में भेद करते हैं। विवेकानन्द की इस किस्म की भाषा के बारे में लेखक का ठीक ही निष्कर्ष हैक्रोध भरी उनकी आक्रामक लगती भाषा उनके सन्तप्त अनुभवों के अनुपात में रही है’ (पृष्ठ 219)

लीक से हटकर चलने के कारणउन पर आरोप लगा कि विवेकानन्द अपने गुरु श्रीरामकृष्णदेव की शिक्षाओं से भटक गए प्रतीत होते हैं । रामकृष्ण मिशन की स्थापना को लेकर उन्हें कुछ गुरु भाइयों का विरोध भी सहना पड़ा’ (पृष्ठ 203) । आश्चर्य नहीं कि विवेकानन्द का मानना था कि जो दूसरों के लिए जीवित रहते हैं वे ही जीवित माने जा सकते हैं । अपने इस उत्तर जीवन के कारण भी वे जीवंत और प्रासंगिक बने हुए हैं ।       

लेखक ने विवेकानन्द के विचारों के एक ऐसे पहलू को उभारा है कि दंग रह जाना पड़ता है । शुरू में उन्हें अवश्य अमेरिका पसन्द आया था लेकिन कुछ ही समय बाद क्रांति की सम्भावना उन्हें रूस और चीन में नजर आने लगी थी । इस मामले में विवेकानन्द सचमुच एक भविष्यदर्शी सन्त नजर आते हैं ।     

                     पृष्ठ- 310, मूल्य- 450             

Monday, March 22, 2021

सरहद और शासन


2021 में हेमार्केट बुक्स से हर्षा वालिया की किताब ‘बार्डर & रूल: ग्लोबल माइग्रेशन, कैपिटलिज्म, ऐंड द राइज आफ़ रेशियल नेशनलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । इसकी प्रस्तावना राबिन डी जी केल्ली ने और पश्चलेख निक एस्टेस ने लिखा है । राबिन केल्ली का कहना है कि वर्तमान महामारी के समय खबरों में लोगों की तकलीफ और मृत्यु की छवियों की बाढ़ आयी हुई थी । इसके साथ ही स्वास्थ्यकर्मी महामारी से जूझने की कहानी या विशेषज्ञ अभिमत बता रहे थे । अक्सर ये स्वास्थ्यकर्मी प्रवासी या उनकी संतानें थे । ये सभी युद्ध में टूटे हुए सेनानी थे । उनका मुकाबला केवल कोरोना से नहीं था, वे निजीकरण की शिकार चिकित्सा व्यवस्था और जनता की जगह मुनाफ़े की चिंता करनेवाली सरकारी नीतियों से भी लड़ रहे थे । परदेशियों से नफ़रत फैलाने वाली और नस्लवादी राजनीतिक संस्कृति को झेलते हुए अपना जीवन दांव पर लगाना था । कोरोना संकट के चलते यह जो नया युद्धस्थल पैदा हुआ मीडिया ने आम तौर पर उसकी उपेक्षा ही की । अमेरिकी सरकार ने सीमाओं को बंद करना शुरू किया, शरणार्थियों पर बंदिशें बढ़ा दीं और आप्रवासियों को नजरबंद कर लिया । जिन मजदूरों के काम की वजह से उन्हें संक्रमण की आशंका अधिक थी उनकी रक्षा संबंधी कानूनों को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया गया । सरकारी उपेक्षा की वजह से मूलवासियों के इलाके कोरोना संक्रमण के केंद्र बन गये । कैदियों और जेल कर्मियों में संक्रमण तेजी से फैला । एशियाई बाशिंदों को नस्ली हमलों का शिकार बनाया गया । इस दौरान स्त्रियों को काम पर जाने की मनाही के चलते घर पर बैठना पड़ा और घरेलू हिंसा में काफी बढ़ोत्तरी देखने में आयी । दूसरी ओर दक्षिणपंथी ताकतों ने तमाम नियमों की धज्जी उड़ाते हुए रैलियां निकालीं ।

इस किताब में हर्षा ने बताया है कि ये लड़ाई कोई नयी बात नहीं है । इस बार की महामारी में उसी हमले का ताजा रूप देखने को मिला जो विगत पांच सौ साल से पूंजीवाद धरती पर किये जा रहा है । इसके तहत उसने जमीनों को घेरा, उनके मालिकों को बेदखल किया, उन पर कब्जा जमाया, उनका दोहन किया, शोषण किया, उसे विक्रेय माल में बदला, उपभोग किया, बरबाद किया, प्रदूषण फैलाया, गरीबी पैदा की और उत्पीड़नकारी शासनतंत्र पैदा किया । जनता के विरुद्ध यह लड़ाई सैन्य हिंसा के जरिये सुरक्षा के नाम पर चलायी गयी । इन सब कदमों के फलस्वरूप धरती के अधिकांश बाशिंदों को विस्थापन, कैद, कर्ज, अस्थिरता, गरीबी और अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ रहा है । पिछले दशक में इस हमले के विरोध में अकुपाई, अरब वसंत, कटौती विरोधी आंदोलन, लैटिन अमेरिकी क्रांतियों और नस्ली राजकीय हिंसा के प्रतिरोध की शक्ल में तमाम विद्रोह उठ खड़े हुए थे । इसके साथ ही नस्ली राष्ट्रवाद, स्त्रीद्वेष, नारीहत्या और तानाशाहों की चुनावी जीतों में बढ़ोत्तरी भी नजर आयी । अगर इस समय को समझना है तो किताब इसमें मददगार हो सकती है । इसमें आसान समाधान या उदारवादी नुस्खों से परहेज किया गया है । लेखिका ने विश्वव्यापी समस्याओं की जड़ तलाशने का प्रयास किया है । वे जितनी गम्भीर विचारक हैं उससे उम्मीद भी उनसे ऐसे ही धारदार विश्लेषण की थी । विचार के साथ ही उन्होंने हमारे समाज में व्याप्त नस्ली पूंजीवाद, उपनिवेशवाद, पितृसत्ता, सैन्यवाद का विरोध करने तथा प्रवासियों, मूलवासियों, स्त्रियों और बेघरों के अधिकारों की रक्षा में जीवन खपाया है ।

इसमें प्रस्तुत सबूतों से व्यवस्था को धक्का पहुंचेगा । शरणार्थी संकट की आसान व्याख्या खोजनेवालों को भी धक्का लगेगा । इस प्रचलित मान्यता को भी धक्का लगेगा कि अमेरिका और कनाडा आप्रवासियों के देश हैं । ट्रम्प शासन की आप्रवास नीतियों के विरोधी भी बहुधा यह मंत्र दुहराते हैं और कहते हैं कि आप्रवासियों के वंशज होने के नाते रोजगार की तलाश में अमेरिका आनेवालों को रोकने के लिए दीवार खड़ी करना अनैतिक है । सचाई यह है कि इस जगह के मूलवासियों को मिटाकर और काले लोगों को चूसकर यूरोप के इन आप्रवासियों ने अपना मुल्क बनाया है । सभी आधुनिक लोकतंत्र बहिष्करण और परदेशी से नफ़रत के आधार पर खड़े किये गये हैं । यूरोप से यहां आकर आजादी का स्वप्नलोक निर्मित करने की कथा में कोई सच नहीं है । अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया मेहनती लोगों की लोकतांत्रिक चाहत का नतीजा नहीं हैं बल्कि वे पूंजीवादी प्रसार और नस्ली विचारधारा के हिंसक उत्पाद हैं । इन्हें बनानेवाले हथियारबंद उपनिवेशकों के साथ शेयरधारक कंपनियों की आमद हुई । उन्हें सहारा देने के लिए औपनिवेशिक राजकीय मशीनरी मिली और अपहृत श्रमिकों की शक्ल में पूंजी की ताकत हासिल थी ।

इसमें उपनिवेशवाद के इतिहास और उसके नस्ली, पितृसत्ताक और राष्ट्रवादी आधारों की चीरफाड़ तो की ही गयी है, साथ ही वर्तमान का संदर्भ भी स्पष्ट है । ट्रम्प, बोलनसारो, मोदी, ओर्बान या दुतेर्ते के मातहत दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के उभार में इतिहास खुद को दुहरा नहीं रहा । न तो यह 1930 दशक के फ़ासीवाद की आवृत्ति है और न ही नवउदारवाद की समाप्ति है । इसमें नवउदारवादी तर्क की निरंतरता तो है ही, चरम दक्षिणपंथी कट्टरता और कारपोरेट हितों का मेल भी है । इनके साथ विक्षुब्ध कामगारों का एक हिस्सा भी आ जुड़ा है । इन सबको मिलाकर भय पर आधारित एक नवफ़ासीवादी, सर्वसत्तावादी आंदोलन खड़ा हुआ है जो अब भी नवउदारवादी तर्क से ही संचालित है । कल्याणकारी राज्य के अवशेष हटाकर ऐसा विस्तृत सैनिक-पुलिस राज्य खड़ा किया जा रहा है जो सीमाओं को सुरक्षित रखने के नाम पर पूंजी के लिए अनुकूल हालात पैदा कर रहा है । राष्ट्र-राज्य कारपोरेट घराना हो गया है और वर्तमान अस्थिर दुनिया में उसे सुरक्षित रखने के बहाने चंद धन्नासेठ उस पर कब्जा कर बैठे हैं । इसकी जगह वालिया ने राष्ट्रवाद, पूंजीवाद और निजीकरण को तथा आप्रवासी अल्पसंख्यक के राक्षसीकरण को सुरक्षा के लिए असली खतरा बताया है । सबको उदार अधिकार प्रदान करने की मौजूदा व्यवस्था को क्रांति के जरिए उलट देने की जरूरत उन्हें महसूस होती है । असल में वैश्विक मजदूर वर्ग की एकजुट ताकत आ/प्रवासी की धारणा के चलते कमजोर हुई है ।

आप्रवासी की पहचान तो राज्य की थोपी हुई पहचान है । इसी पहचान के आधार पर नागरिकता से जुड़े अधिकार तय होते हैं, मजदूरों को आपस में बांटा जाता है, ठेका मजदूरों की भारी फौज तैयार की जाती है और विद्रोही तथा खतरनाक मजदूरों को निर्वासन के जरिए हटा देने की ताकत राज्य को मिलती है । राष्ट्र-राज्य के निर्माण, सरहद खड़ी करने तथा उनकी रक्षा और स्पष्टता के लिए सरंजाम बनाने और समेकन, बहिष्करण तथा अपराधीकरण की विचारधारा के पुनरुत्पादन के लिए यह पहचान जरूरी है ।

नस्ली राष्ट्रवाद ने पर्यावरणिक खतरे के लिए आप्रवासियों के साथ ही देश के गरीब बाशिंदों को जिम्मेदार ठहराया है । जलवायु संकट के बहाने इनको खदेड़ा जा रहा है और तापवृद्धि, दावानल तथा विकराल विषमता की जिम्मेदारी से पूंजीवाद मुक्त हो गया है । इस आधुनिक नस्लभेद को बनाने में उदारवादी भी मौन सहायक हो जा रहे हैं । वे भी पर्यावरण की समस्या को हल करने के लिए कारपोरेट घरानों के सुझाये नुस्खों की वकालत करते हैं तथा शरणार्थी समस्या को राहत आदि से ही हल करना चाहते हैं । जब तक आप्रवासी के बारे में यह नजरिया रहेगा तब तक उनकी असलियत नजर नहीं आयेगी । वे तो वैश्विक श्रम शक्ति की जान हैं और उनकी भटकन का स्रोत युद्ध, पूंजी प्रवाह, सरकारों और वित्तीय/आर्थिक संस्थानों की नीतियों, नस्ली और पितृसत्ताक सुरक्षा तंत्र तथा सरहदों के आर पार के कामगारों के संघर्षों में निहित हैं । जो लोग उनके सही समेकन को इस समस्या का समाधान समझते हैं वे आप्रवासी को पैदा करने वाली ऐतिहासिक ताकतों पर परदा डालना चाहते हैं । वे मानव आपदा को समाप्त करने और धरती को बचाने की अपनी ताकत को भी जाहिर नहीं होने देना चाहते ।

मतलब कि जिसे आम तौर पर आप्रवासियों का संघर्ष कहा जाता है वह असल में वर्ग संघर्ष है । संयोग नहीं कि आप्रवासी विरोधी कानूनों के साथ ही देशद्रोह संबंधी कानून भी बनाये जा रहे हैं । बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में अमेरिका से अक्सर समाजवादियों, कम्युनिस्टों और ट्रेड यूनियन नेताओं को निकाल बाहर किया जाता था । इसीलिए मजदूर नेताओं ने जोर देकर देश निकाले की इस व्यवस्था की मुखालफ़त की थी क्योंकि किसी एक पर भी हमला सब पर हमला मानना होगा । इसके चलते ही वालिया इसे आप्रवासी समस्या या आप्रवासी अधिकार की लड़ाई मानने की जगह पूंजी और साम्राज्य की नस्लभेदी और पितृसत्ताक व्यवस्था के विरुद्ध वैश्विक संघर्ष मानती हैं ।