Sunday, March 10, 2019

नामवर सिंह की याद


                
                                   
नामवर सिंह की उपस्थिति हिंदी साहित्य के किसी भी विद्यार्थी के जीवन में बनी रही है मुलाकात, भाषण, विवाद, चर्चा या किताब के जरिए उसे नामवर जी से हमेशा दो चार होना पड़ता था उनकी लोकप्रियता अध्यापकों के मुकाबले विद्यार्थियों में अधिक रही थी इस अक्षम्य गलती के लिए हिंदी के अध्यापक समुदाय ने उन्हें माफ़ भी नहीं किया हिंदी साहित्य के अध्ययन की इसी विद्रोही परम्परा में खुद नामवर जी भी दीक्षित थे याद करिए कि जब वे इंटर में पढ़ रहे थे तब उनसे त्रिलोचन शास्त्री की मुलाकात हुई थी यही वजह थी कि मेरी उनसे पहली मुलाकात 79-80 में किसी प्रतिष्ठित संस्थान की जगह भदैनी स्थित तुलसी पुस्तकालय में एक संगोष्ठी में हुई थी वे दिल्ली से बनारस आए हुए थे छोटे भाई काशीनाथ सिंह के साथ गोष्ठी में आए संगोष्ठी में बहुतेरे नए कवियों का काव्य पाठ हुआ जिनमें कई नक्सल धारा के कवि थे अपने वक्तव्य में नामवर सिंह ने तालस्ताय की एक कहानी के बहाने अपरिचयीकरण की धारणा के बारे में बात की थी
दूसरी बार उनकी षष्टि पूर्ति के अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एकाधिक दिनों का कार्यक्रम आयोजित हुआ था । तब मैं स्नातकोत्तर का विद्यार्थी था । तभी त्रिलोचन, नागार्जुन, मैनेजर पांडे, विश्वनाथ त्रिपाठी, निर्मला जैन, पुरुषोत्तम आदि को नजदीक से देखा । साथ विद्रोही साहित्य प्रेमियों का था । उन्हीं में से किसी ने इसे पाखंड मानकर कोई चुभती हुई कविता लिखकर पोस्टर के बतौर चिपका दिया था । केवल विश्वनाथ त्रिपाठी ने उसे सहानुभूति के साथ पढ़ा । शेष लोग शर्मिंदा भाव से उधर देखने से भी बचते थे । तब महाभारत के कारण रविवार के दिन गोष्ठी देर से शुरू हुई थी । इस विशाल समागम की दो बातें याद हैं । पहली कि काफी बहस इस बात पर हुई कि लेखक को अपने लिखे के अनुरूप आचरण करना चाहिए या नहीं । इस मुद्दे पर बहस तब फालतू लगी थी और जब निर्मला जैन ने कहा कि अनुरूप करे या नहीं, विरोध में नहीं करना चाहिए तो लगा कि इतना समझौता ! दूसरी कि त्रिलोचन ने निमंत्रण पत्र पर छपे षष्ठिको गलत कहा और इसका अर्थ छठी बताया । नागार्जुन बोले कि नामवर जी की छठी ही है और हम बूढ़ी औरतें गीत गा रही हैं । नागार्जुन ने बोलने के मुकाबले लिखने की सलाह देने वालों की बात पर कहा कि भोगेंद्र झा का कंठ कुछ दिनों के लिए बंद हो गया था जबकि वे प्रखर वक्ता थे इसलिए नामवर जी को लगातार बोलते रहना चाहिए । पलटकर देखने पर अब लगता है कि नामवर जी बोलने के जरिए शिक्षा संस्थानों में वह माहौल निर्मित करते थे जिसमें वे और उनके विचार पनप सकें ।                
तीसरी बार तब देखा जब भारत कला भवन में स्वभाव की धारणा पर उनका व्याख्यान था । इसमें संस्कृत साहित्य की क्लासिक परम्परा के आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी के साथ उस परम्परा में नएपन के उद्गाता कमलेश दत्त त्रिपाठी भी मौजूद थे । स्वभाव की बात स्वभावोक्ति से होती हुई लोकायत तक जा पहुंची । आनंदवर्धन से लेकर महाभारत तक सब कुछ का अजस्र प्रवाह नामवर जी के मुख से हो रहा था । यह प्रसंग इसलिए कि नामवर जी ने न केवल हिन्दी की जनपक्षधर छाप को बुलंद रखा बल्कि संस्कृत के आचार्यों के सामने भी उसकी जनपक्षधर परम्परा के शोध का दबाव पैदा किया । दोनों ही भाषाओं के मामले में यह काम उन्होंने रामविलास शर्मा के साथ मिलकर किया । हिन्दी के लगभग सभी विद्यार्थी जानते हैं कि उसकी परम्परा का निर्माण कुछ हद तक उर्दू के समानांतर किया गया है । इस नाते स्वाभाविक था कि हिन्दी बौद्धिकता में दक्षिणपंथ का प्रभाव गहरा रहे । बहुत सारे लोग उसकी शुद्धता को संस्कृतनिष्ठता से जोड़कर देखते हैं । रामविलास शर्मा और नामवर सिंह ने जिस तरह की हिन्दी बौद्धिकता को स्थापित किया उसमें दक्षिणपंथ को पांव भी रखने की जगह नहीं मिल सकी । इसके चलते संस्कृत की लोकधर्मी परम्परा के उद्घाटन संबंधी राधावल्लभ त्रिपाठी की कोशिशों को जमीन मिल सकी 
इसके बाद तो जे एन यू में प्रवेश मिला । दूसरे सेमेस्टर में साहित्य का समाजशास्त्र उनसे पढ़ने का मौका मिला । अध्यापक के रूप में एक विशेषता का पता चला । हिन्दी में उनसे अधिक व्यस्त मनुष्य शायद ही कोई और रहा होगा लेकिन अगर वे दिल्ली में होते तो क्लास जरूर लेते । एकाध एम ए की क्लासों में भी बैठा । न केवल क्लास में होते बल्कि अगर कोई उद्धरण देना होता तो उसे लिखकर लाते । किसी भी विद्यार्थी ने परीक्षा में जो भी लिखकर दिया उसे अवश्य देखते और वर्तनी की गलतियों पर जरूर निशान लगाते । साहित्य की वैचारिकी को मोर्चा बना लेने के बाद व्यावहारिक राजनीति के प्रति कुछ उदासीन हो चले थे । एक बार बाहर निकलते जुलूस को देखकर बोले इसमें कांख भी ढकी रहे और मुट्ठी भी तनी रहे का तत्व है । अच्छा नहीं लगा था । बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद छात्रावासों की कई सभाओं में बोले । साहित्य और राजनीति को मिलाकर समय को समझने की भाषा उन्होंने हमेशा बरती । आडवाणी की रथयात्रा पर बोले रावण रथी, विरथ रघुबीरा। सांप्रदायिकता के साथ राज्य के मेल को समझाने के लिए खूंटी ही हार या मेड़ ही खेतखाने के मुहावरे का इस्तेमाल करते । इसके साथ ही सामाजिक विज्ञानों के जानकारों के पांडित्यपूर्ण भाषणों पर तीखा तंज भी करते ।    
अवकाश प्राप्ति के समय की सभा में भारतीय भाषा केंद्र के तहत संस्कृत के अध्यापन की अपनी अधूरी आकांक्षा का जिक्र किया था । साथ ही भविष्य के अपशकुन की चेतावनी भी दी कि अध्यापन शुरू होगा तो अवश्य लेकिन अगर इस समय शुरू हुआ तो उसकी प्रगतिशील परम्परा से संवाद स्थापित किया जा सकता है । उनके लेखन और भाषा में इस परम्परा के साथ सार्थक संवाद के सूत्र खोजे जा सकते हैं ।
लौ की आखिरी भभक दिल्ली विश्वविद्यालय के अरविंदो कालेज की एक संगोष्ठी में दिखाई पड़ी जब वे फिर तुलसी के सहारे साहित्यकार के स्वाभिमान के पक्ष में बोले । समय वर्तमान सरकार की साहित्य विरोधी हरकतों का था । तुलसी अब का होहुंगे नर के मनसबदारबोलते हुए साहित्य की प्रतिरोधी धारा के वारिस महसूस हो रहे थे ।
प्रगतिशील आंदोलन को हिन्दी की मुख्य धारा के रूप में स्थापित करने के लिए उन्होंने अनथक संघर्ष चलाया । वामपंथ के किसी वास्तविक सामाजिक राजनीतिक शक्ति के बतौर हिन्दी भाषी क्षेत्र में न होने के बावजूद बहुत दिनों तक इसी संघर्ष के चलते साहित्य और बौद्धिकता के क्षेत्र में वामपंथ का दबदबा बना रहा । लेकिन ठोस आधार के अभाव में वे इसके लिए मौजूदा संस्थाओं पर ही आश्रित होते गए । छायावादी साहित्य के प्रसंग में इस दुबिधा को उन्होंने सूरज को छू लेने वाले के पंख जल जाने के जरिए व्यक्त किया है । शायद यही दुर्घटना उनके साथ भी घटित हुई ।                   

Wednesday, January 30, 2019

हिंदी का दलित साहित्य: वर्तमान चुनौती और भविष्यगत सम्भावना


      
                       
अन्य भाषाओं के बारे में नहीं मालूम लेकिन हिंदी में दलित साहित्य को अपनी जगह बनाने के लिए शायद किसी भी साहित्यिक प्रवृत्ति से अधिक जूझना पड़ा है । उसकी प्रतिष्ठा के विरोध में लगभग उसी किस्म की गोलबंदी हुई जिस तरह की गोलबंदी देहाती इलाकों में दलित समुदाय की उपस्थिति को अदृश्य बनाने के लिए की जाती रही है । इन सबके बावजूद उसने उसी संघर्ष क्षमता का परिचय दिया जो खेती के मामले में उस समुदाय के जुझारूपन की विशेषता रही है ।
इस समय दलित साहित्य के सामने दोहरी चुनौती है । एक तो यह कि संस्थाओं के भीतर स्वीकृति के साथ उसे अपने मूल आंदोलनात्मक स्वरूप को बचाए रखने के लिए सचेत रहना होगा । वैसे दक्षिणपंथ के नए उभार के साथ उसके बहिष्करण की नई कोशिशों का भी जन्म स्वाभाविक है । स्थापित जातिवादी व्यवस्था हमेशा से विद्रोही धाराओं को या तो बहिष्कार या सुपाच्य बनाकर निगलने की नीति अपनाती रही है । यदि सम्भव हो पूरी तरह से ओझल करने की भी कोशिश होती है लेकिन अगर सामर्थ्य दिखाई पड़े या बार बार प्रकट हो तो उपरोक्त प्रयास होते हैं । असल में पचाने की राह की सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवाद है । जातिगत ऊंच नीच की विचारधारा हमारी सामाजिक व्यवस्था में इतनी मजबूती से जड़ जमाकर बैठी है कि विवेकानंद से लेकर गांधी तक तमाम सुधारकों की कोशिशों के बावजूद सामंती मानसिकता से हिंदू सवर्ण समुदाय मुक्त नहीं हो सका है । लगता है कि जातिवाद की समाप्ति देश के बुनियादी रूपांतरण के बिना सम्भव नहीं है । आरक्षण जैसे अल्प सुधार के उपायों तक का जितना हिंसक विरोध देखने में आता है उससे यही सिद्ध होता है कि इस दिशा में छोटी सी कोशिश भी बिना प्रतिरोध के मंजूर नहीं की जाएगी । यहां तक कि दलित मुक्ति के विभिन्न प्रयासों तक पर भी यह ब्राह्मणी सोच असर डालने में सक्षम साबित हुई है । यह असर कई बार अंबेडकर की सोच के क्रांतिकारी तत्व को ग्रहण करने में बाधा डालती है । पूंजीवाद और जातिवाद के विरोध में एक साथ लड़ने की जगह दोनों को अलग कर दिया जाता है । जिस अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाया था उन्हें आधुनिक मनुकहने वालों के साथी भी प्रकट हुए हैं । इस असर से मुकाबले के साथ ही पितृसत्ता की विचारधारा से भी लड़ना जरूरी है क्योंकि वह हमारे समाज का एक और बड़ा कोढ़ है । इसीलिए उसे अपने भीतर के मर्दवाद से भी जूझना होगा । भारतीय परिवारिक ढांचे में मौजूद विषमता स्त्री को हीन साबित करने पर टिकी रही है । कुछ दलित लेखकों में इस मर्दाना अहंकार की अनुगूंजें सुनाई पड़ती रही हैं । इसके विरोध में दलित साहित्य के भीतर नारीवादी स्वर भी उठे हैं ।
नए समय ने दलित साहित्य के सामने जहां नई चुनौतियां पैदा की हैं वहीं नई सम्भावनाओं के दरवाजे भी खोले हैं । विचारकों और लेखकों को वर्तमान व्यवस्था के भीतर ही स्वाभिमान और मुक्ति की राह दिखाई पड़ती थी । शासकों ने इस राह को बंद करने का निश्चय कर लिया है । देश के शिक्षा संस्थान और संसद ऐसी जगहें थीं जहां दलित समुदाय का न केवल प्रवेश होता था बल्कि उनकी आवाज उठाने का मजबूत माध्यम भी ये संस्थान थे । इन संस्थाओं में दलित बौद्धिक और नेता पैदा तो होते ही थे अपने समुदाय के आगे बढ़ने और समाज में प्रतिष्ठा के प्रतीक भी थे । दलित साहित्य के लेखक और पाठकों का निर्माण शिक्षा के जरिए होता था । इन लेखकों के जीवन पर नजर डालने से बहुत कुछ वैसी ही तस्वीर उभरती है जैसी तस्वीर अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन के सिलसिले में स्त्रियों की थी । उच्च शिक्षा संस्थाओं में उनका प्रवेश नहीं होता था तो वे साहित्यकारों के नाम पर गठित मंडलियों के जरिए अंग्रेजी साहित्य की दुनिया में अपने आपको बनाए रखने में कामयाब हुईं । दलित साहित्य के लेखक केवल हिंदी साहित्य के अध्यापक नहीं हैं बल्कि दलित समुदाय के लगभग सभी शिक्षित जन इसके साथ जुड़े हुए हैं । नए हालात में शिक्षा संस्थान में दलित समुदाय के प्रवेश को रोकने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है ।           
इसका प्रत्यक्ष तरीका शिक्षा हेतु आवश्यक संसाधनों तक पहुंच सीमित करना और आरक्षण के साथ तमाम बहानों से छेड़छाड़ है तो परोक्ष तरीकों में शिक्षा को कमजोर तबकों के लिए अप्राप्य बनाने के लिए निजी शिक्षा संस्थानों को बढ़ावा देना और उच्च शिक्षा को महंगा बनाना है । हम जानते हैं कि उच्च शिक्षा के निजी संस्थान सार्वजनिक संस्थानों से अधिक हो गए हैं । अब तो इन संस्थानों को सरकारी सहायता देने के उपाय खोजे जा रहे हैं और उन्हें नीति निर्माण के सरकारी निकायों में भी जगह दी जा रही है । सर्वविदित है कि इनमें आरक्षण नहीं लागू किया जाता । ऊपर से साहित्य के साथ इसका संबंध स्पष्ट नहीं होता लेकिन साहित्य को लिखने और पढ़ने अर्थात लेखक और पाठक बनाने के लिए बहुत हद तक शिक्षा संस्थान जिम्मेदार होते हैं । इसी तरह साहित्य के साथ जुड़े दो क्षेत्र ऐसे हैं जो पूरी तरह से निजी क्षेत्र में हैं इसलिए इनमें दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व न के बराबर है । मीडिया के सभी रूप और प्रकाशन का समूचा तंत्र दलित समुदाय से लगभग खाली है । इसके चलते दलित लेखन के महत्व की यथोचित स्थापना नहीं हो पाती ।  
बहिष्करण के इन नए तरीकों और आवाज उठाने के उपलब्ध लोकतांत्रिक मंचों के निस्सार होते जाने से दलित आंदोलन और फलस्वरूप दलित साहित्य नए प्रसंगों से जुड़ रहा है । उदाहरण के लिए खेती और आवास के लिए जमीन का सवाल बुनियादी होने के बावजूद उपेक्षा का शिकार रहा था । जमीन पर मुट्ठी भर कुलीन लोगों का कब्जा तोड़ने के लिए अंबेडकर ने भूमि के राष्ट्रीकरण का प्रस्ताव किया था । भूमि पर मालिकाना केवल संसाधन नहीं है बल्कि सामाजिक हैसियत से इसका सीधा संबंध होता है । हाल के गुजरात और पंजाब के दलित आंदोलनों में यह सवाल तीखे ढंग से उठा है । कहने की जरूरत नहीं कि दलित साहित्य को दलित आंदोलन से अलगाना मुश्किल है ।
इसी तरह शासक समूह की ओर से लोकतंत्र को धता बताने के साथ दलित युवाओं में आंदोलन के प्रति आस्था बढ़ी है । इस माहौल में सांस लेने वाला नौजवान स्वाभाविक तौर पर किसी स्थापित पार्टी की छत्रछाया के मुकाबले स्वतंत्र दावेदारी पर अधिक भरोसा करेगा । हिंदी में दलित साहित्य ने विधाओं की सीमा में बंधना कभी मंजूर नहीं किया । आत्मकथा, कविता, कहानी और आलोचना में उसकी मजबूत उपस्थिति रही है । आशा है आगामी दिनों में साहित्येतर लेखन में भी उसकी धमक सुनाई देगी । खास तौर पर दर्शन और अर्थशास्त्र समेत सामाजिक विज्ञान श्रम की छाप के बिना व्यर्थ महसूस होते हैं और विचार के साथ साहित्य के संबंध से इनकार करना अनुचित होगा ।     
               

Friday, January 25, 2019

गणतंत्र का अपहरण


               
                                
हमारे देश की तरह ही समूची दुनिया में लोकतांत्रिक शासन और उससे जुड़ी संस्थाओं को शासक समूहों की ओर से मटियामेट किया जा रहा है । असल में इस प्रक्रिया को लोकतंत्र के साथ पूंजी के शासन की असहजता के सहारे समझा जा सकता है । सामंती शासन की समाप्ति के साथ लोकतंत्र का विचार आया लेकिन पूंजी की प्रभुता के पैरोकार लोकतंत्र को कभी हजम नहीं कर सके । एरिक हाब्सबाम ने उन्नीसवीं सदी के इतिहास में बताया है कि मताधिकार में विस्तार का पूंजीपतियों ने हमेशा विरोध किया और जब कभी उसकी ताकत में इजाफा हुआ उसने लोकतंत्र का गला घोंटने की चेष्टा की । इसी आधार पर उनका दावा है कि फ़ासीवाद को विजय उन्हीं देशों में मिली जिनमें लोकतंत्र था । इतिहास से सिद्ध है कि जब तक पूंजीपतियों का अबाध शासन चलने में बाधा नहीं आई तब तक उन्होंने लोकतंत्र को बर्दाश्त किया लेकिन ताकत बढ़ते ही उन्होंने लोकतंत्र को उखाड़ फेंका और मुनाफ़े के लिए फ़ासीवादी निजाम की शरण ली । अमेरिका और हमारे देश में फिलहाल यह प्रक्रिया सबसे स्पष्ट दिखाई दे रही है लेकिन अन्य देश भी गणतंत्र के अपहरण की इस प्रक्रिया से अछूते नहीं हैं ।

इस विशेष परिघटना को ‘ऊपर से क्रांति’ भी कहा जाता है । आम तौर पर क्रांति का मतलब नीचे से जनता के सवालों को लेकर की जाने वाली गोलबंदी और सामाजिक बदलाव होता है लेकिन जब समाज के ऊपरी मलाईदार तबके अपने हित में तमाम तरह के बदलाव जनता पर थोप दें तो उसे समझना मुश्किल होता है । नवउदारवाद को इसी तरह की क्रांति समझा जाना चाहिए जिसमें नियम-कानून और सरकारी नियंत्रण के विरोध में शासक समूह ही खड़ा हो गया । 

अमेरिका में इस प्रक्रिया को पहचानने के सिलसिले में 2017 में वाइकिंग से नैन्सी मैकलीयन की किताबडेमोक्रेसी इन चेन्स: द डीप हिस्ट्री आफ़ द रैडिकल राइटस स्टील्थ प्लान फ़ार अमेरिकाका प्रकाशन हुआ । जार्ज मोनबियाट ने एक लेख में इस किताब के लिखे जाने का रहस्य बताया है । लेखिका इतिहास की अध्येता हैं और संयोग से 2013 में उन्हें जेम्स मैकगिल बुकानन के कागजात देखने को मिले । बुकानन नवउदारवाद की विचारधारा से प्रभावित थे और संपत्ति के मनचाहे तरीके से अबाध उपयोग के अधिकार को ही स्वाधीनता समझते थे । इस अधिकार पर रोक लगानेवाली संस्थाओं को वे उत्पीड़न का ऐसा औजार मानते थे जो अयोग्य जनसाधारण के हित में संपत्ति का शोषण करती हैं । उनका मानना था कि समाज को तब तक स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता जब तक उसके प्रत्येक नागरिक को उसके फैसलों पर रोक लगाने का निर्णायक अधिकार न हासिल हो । उनका यह भी मानना था कि बिना मंजूरी के किसी पर टैक्स नहीं लगाना चाहिए । लोकतंत्र में मतदान का इस्तेमाल करके सामान्य लोग दूसरे के कमाए हुए धन में सामाजिक कल्याण और सार्वजनिक व्यय के नाम पर बेवजह हिस्सा मांगते हैं । लोकतंत्र और धनिकों की आजादी में टकराव होने पर आजादी के पक्ष में निर्णय होना चाहिए । उनका कहना था कि इस आजादी को साकार करने के लिए लोकतंत्र पर बंदिश लगानी होगी । इसके लिए वे सरकार की ओर से समान शिक्षा को खत्म करके शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने का रास्ता सही मानते थे । इन शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों से उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च उगाहने की उन्होंने वकालत की । सरकार की तमाम जिम्मेदारियों को भी निजी हाथों में सौंपने की वकालत उन्होंने की । वे जनता और सरकार के बीच सम्पर्क तोड़ देने के पक्ष में थे । कुल मिलाकर वे लोकतंत्र से पूंजीवाद की रक्षा करना चाहते थे ।      

इसके अगले साल 2018 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से यास्चा मुन्क की किताबद पीपुल वर्सस डेमोक्रेसी: ह्वाई आवर फ़्रीडम इज इन डैंजर ऐंड हाउ टु सेव इटका प्रकाशन हुआ । वर्तमान समय को समझने के लिए लेखक कहते हैं कि आम तौर पर इतिहास की गति धीमी होती है लेकिन कभी कभी उसकी गति तेज हो जाती है । राजनीतिक रंगमंच पर अभी अभी आए हुए लोग उलट पुलट मचा देते हैं । जनता अचिंत्य नीतियों के पीछे पागल हो जाती है । नीचे नीचे खदबदाते हुए सामाजिक तनाव भयानक विस्फोट के रूप में प्रकट होने लगते हैं । शासन का स्थायी प्रतीत होने वाले ढांचे भहराकर बिखरने लगते हैं । उनके मुताबिक हमारा समय ऐसा ही समय है । हाल तक उदारवादी लोकतांत्रिक शासन ही एकमात्र सही तरीका महसूस होता था । इसकी कमियों के बावजूद नागरिकगण इससे प्रतिबद्ध थे । अर्थतंत्र विकासमान था । अतिवादी राजनीतिक पार्टियां हाशिए पर थीं । लगता था कि भविष्य का चेहरा अतीत से बहुत अलग नहीं रहेगा । लेकिन जब भविष्य आया है तो उसे पहचानना मुश्किल हो रहा है । पार्टी व्यवस्था अनंत प्रतीत होती थी । अब जनभावनाओं पर सवार होकर दुनिया के तमाम देशों में तानाशाह सत्ता पर काबिज हो रहे हैं । उन पर पार्टियों का कोई अंकुश नहीं रह गया है । लोकतंत्र के इसी संकट की सबसे नाटकीय अभिव्यक्ति ट्रम्प जैसे शासकों के चुने जाने में हुई है ।

सवाल यह है कि यह दौर बीत जाएगा या लोकतंत्र को स्थायी रूप से नष्ट कर देगा । सोवियत संघ के पतन के बाद उदार लोकतांत्रिक शासन को दुनिया भर में विजयी माना जा रहा था । उसकी जीत का कारण किसी सुसंगत विकल्प की गैरमौजूदगी थी । लगता था कि भविष्य इसका ही है । फ़ुकुयामा ने इस बात को जोरदार तरीके से प्रस्तुत किया था । उनके दावे पर आशंका जाहिर करते हुए बहुतेरे लोगों ने कहा कि पश्चिम के इस निर्यात को कई देश नामंजूर भी कर सकते हैं । कुछ लोगों को उम्मीद थी कि उदार लोकतंत्र से भी अधिक न्यायपूर्ण और प्रबुद्ध शासन की खोज मानवता कर सकती है । जो लोग उसके विश्वव्यापी प्रसार के बारे में आशंकित थे वे भी पश्चिम में उसकी निरंतरता के बारे में निश्चिंत थे । गरीब मुल्कों में तो इसकी अस्थिरता नजर आती थी लेकिन धनी देशों के लिए इसकी मौजूदगी शाश्वत समझी जाती थी । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के समूचे इतिहास को लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया के रूप में समझे जाने की वकालत शुरू हो गई थी । लोकतंत्र को टिकाऊ बनाने के लिए शिक्षा और समृद्धि को जरूरी समझा जाने लगा । इसके लिए जागरूक नागरिक समाज और अदालत जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता की रक्षा महसूस हुई । लगभग सभी राजनीतिक ताकतों ने मान लिया था कि उनके बाहुबल या धनबल के मुकाबले मतदाताओं की राय से राजनीतिक नतीजे तय होंगे । अब ये सभी लक्ष्य छलावा सिद्ध हो रहे हैं । लोकतंत्र में बौद्धिकों के दीर्घकालीन भोले यकीन पर सवाल उठ रहे हैं । अब तो चुनाव के जरिए सत्ता परिवर्तन की संभावना में भी संदेह पैदा हो रहा है ।

बात यह है कि लोकतंत्र और उदारवाद को समान माना जाता रहा है । इन दोनों की मार्फ़त जनता अपने अधिकारों को तय करती थी और उन्हें सुरक्षित बनाए रखती थी । इस तरह की व्यवस्था में निचले तबकों के अधिकारों को संपन्न लोगों द्वारा कुचलने के विरुद्ध एक हद तक रुकावट आती थी । उसी तरह अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा और प्रेस को सरकार की आलोचना करने की आजादी भी इसके अभिन्न अंग थे । इन सबसे मिलकर उदार लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का ताना बाना बनता था । इसके सुचारु संचालन के लिए उदारवाद और लोकतंत्र का साहचर्य जरूरी माना जाता था । उदारवाद का क्षरण होते ही लोकतंत्र बहुसंख्या की तानाशाही में बदल जाता है । इसी तरह धनकुबेरों को खुली छूट मिलने से निर्णय की प्रक्रिया में से जनता बहिष्कृत होने लगती है । इस समय लगभग समूची दुनिया में ये दोनों ही प्रक्रियाएं बड़े पैमाने पर चल रही हैं ।  
2018 में ही क्राउन से स्टीवेन लेवित्सकी और डैनिएल ज़िबलात की चर्चित किताबहाउ डेमोक्रेसीज डाइका प्रकाशन हुआ । दोनों लेखक बहुत दिनों से संसार के अलग अलग हिस्सों में लोकतंत्र के समक्ष उपस्थित खतरों के बारे में लिखते रहे थे । उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अमेरिका में लोकतंत्र की अवस्था के बारे में भी उन्हें लिखना होगा । अन्य देशों के बारे में अध्ययन से उन्हें लोकतंत्र के अवसान के बारे में जो संकेत मिले थे उन्हें वे अमेरिका में पिछले दो सालों से घटित होते देख सुन रहे हैं । उन्हें लोकतंत्र के भंगुर होने का अंदाजा तो था लेकिन यकीन था कि अमेरिका में इसकी बुनियाद पक्की है । संविधान, स्वतंत्रता और समता पर बल, मजबूत मध्य वर्ग, उच्च स्तर की शिक्षा और संपत्ति तथा व्यापक और विविधतापूर्ण निजी क्षेत्र- इन सबके चलते उनको लोकतंत्र के बिखरने की संभावना न के बराबर नजर आती थी । उनकी हालिया चिंता का कारण है कि राजनेता विपक्ष को दुश्मन समझने लगे हैं । प्रेस की आजादी पर पहरे डालने का समर्थन कर रहे हैं । यहां तक कि चुनाव नतीजों को खारिज करने की धमकी भी देने लगे हैं । अदालतों, जासूसी संस्थाओं और लोकपाल जैसे अधिकारियों के प्राधिकार को बहुत व्यवस्थित रूप से कमजोर किया जा रहा है ।

गणतंत्र पर शासक समुदाय के इस हमले का प्रत्यक्ष रूप विभिन्न लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समाप्त करना या उन्हें फालतू बना देना है । स्वाभाविक रूप से जब शासक ही लोकतंत्र का अपहरण करने पर आमादा हो जाएं तो जनता को उसकी रक्षा करने के लिए कमर कसनी पड़ती है ।           

Thursday, January 24, 2019

साहित्यिक शोध: कुछ विचार


        
1 साहित्य से जुड़े शोध और अन्य अनुशासनों के शोध में अंतर को भीष्म साहनी के उपन्यासतमसऔर उनकी आत्मकथा के एक विशेष प्रसंग से समझा जा सकता है विभाजन के बाद भारत आए लोगों को मुआवजा देने के लिए किसी को नुकसान दर्ज करना है पीड़ित लोग अपनी कहानियों को सुनाने पर आमादा हैं लेकिन दर्ज करने वाले को आंकड़ों की दरकार है साहित्य कहानी के जरिए यथार्थ को प्रस्तुत करता है इस वजह से उसे क्वालिटेटिव डाटा की श्रेणी में रखा जा सकता है इसके सहारे यथार्थ को समझना बहुत कुछ पुरातात्विक अध्ययन की तरह होता है जिसमें किसी नगण्य से सूत्र के सहारे इतिहास को रचने की कोशिश की जाती है
2 साहित्य की अपनी प्रकृति ऐसी है कि उसमें शब्द और अर्थ का महत्व बराबर होता है दोनों को एक दूसरे से अलगाया नहीं जा सकता इसकी परिभाषा करते हुए काव्य शास्त्र मेंशब्दार्थौ सहितौ काव्यमकहा गया है इस सूत्र में जिसे काव्य कहा गया है उसे ही आजकल हम साहित्य कहते हैं आधुनिक काल की विशेषता गद्य है हिंदी साहित्य का इतिहासमें इसीलिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आधुनिक काल को  गद्य काल कहा है इससे पहले की साहित्यिक अभिव्यक्ति में काव्य की प्रधानता थी इसी के चलते साहित्य पर विचार करने वाले शास्त्र को काव्य शास्त्र कहा जाता था
3 शब्द और अर्थ की इस पारस्परिकता को तुलसीदास नेगिरा अरथ जल वीचि समतो कालिदास नेवागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तयेकहकर व्यक्त किया है उनकी पारस्परिकता में भिन्नता भी निहित है
4 शब्द और अर्थ की इस भिन्नता के चलते साहित्य के शब्दगत सौंदर्य पर भी शोध हो सकता है और उसके अर्थ के जरिए व्यक्त यथार्थ पर भी शोध हो सकता है समय और समाज के यथार्थ को समझने के लिए साहित्य का सहारा लेने की कोशिश समाजशास्त्र और इतिहास के लिए विशेष उपयोगी है किसी भी साहित्यिक रचना का विश्लेषण हम अपने समय के सवालों के संदर्भ में करते हैं इस तरह यह शोध हमारे समय, हमारी सामाजिक स्थिति और नजरिए तथा उस रचना के बीच एक संवाद का रूप ले लेता है
5 इसके अतिरिक्त यदि साहित्य के शब्दगत सौंदर्य पर शोध करना हो तो साहित्य को विशेष किस्म की भाषिक संरचना मानना होगा इस संरचना को खोलने के उपकरण अलग अलग विधाओं के लिए अलग अलग होते हैं उदाहरण के लिए कविता का सौंदर्य छंद, तुक और अलंकारों के सहारे समझा जाता है तो कथा या उपन्यास का सौंदर्य घटना विन्यास, पात्र योजना, शैली आदि के आधार पर खोला जाता है ये तत्व भी शाश्वत नहीं होते बल्कि समयानुसार बदलते रहते हैं
6 साहित्य संबंधी शोध के नए क्षेत्रों में अस्मिता विमर्श, पत्रकारिता और अनुवाद हैं इनके साथ ही साहित्य के भीतर लेखन के गैर पारम्परिक रूपों को शामिल करते हुए शोध का दायरा बढ़ाया जा रहा है सिनेमा के लिए लेखन को पहले गम्भीर लेखन नहीं समझा जाता था लेकिन अब उसे भी शोध का विषय बनाया जा रहा है