Saturday, April 22, 2017

छायावाद: एक प्रवेशिका

                
                                                             
हिंदी में छायावाद शायद भक्ति साहित्य के बाद सृजनात्मकता की दृष्टि से सर्वाधिक उर्वर साहित्यिक काल रहा है । नामवर सिंह ने अपनी किताबआधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियांकेछायावादशीर्षक अध्याय में इस काल की सीमा तय करते हुए सुमित्रानंदन पंत के दो काव्य-संग्रहों के प्रकाशन वर्ष का उल्लेख किया है । उनके अनुसारछायावाद विशेष रूप से हिन्दी साहित्य केरोमांटिकउत्थान की वह काव्यधारा है जो लगभग ईसवी सन 1918 से ’36 (‘उच्छ्वाससेयुगान्त’) तक की प्रमुख युगवाणी रही---उन्होंने इस साहित्यिक आंदोलन के प्रमुख कवियों के रूप मेंप्रसाद, निराला, पंत, महादेवी प्रभृति मुख्य कविका नाम गिनाया है । लेकिन उस कालखंड में केवल कवि ही नहीं थे । कहा जा सकता है कि न केवल उपर्युक्त प्रसिद्ध कवियों की मौजूदगी के चलते, बल्कि उनके साथ प्रेमचंद जैसे उपन्यासकार और रामचंद्र शुक्ल जैसे आलोचक और साहित्येतिहासकार ने इस समय को रचनात्मक गहमागहमी से भर दिया था । आधुनिक हिंदी के साहित्यांदोलनों में छायावाद सतही तौर पर अपने समय की राजनीतिक-सामाजिक हलचलों से सबसे दूर महसूस होता है लेकिन इसने तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक हलचलों को सबसे तीक्ष्ण और गहन अभिव्यक्ति दी । यहां तक कि छायावाद के विरोधी के रूप में विख्यात आलोचक रामचंद्र शुक्ल ने भी इसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि की विशिष्टता व्याख्या करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि तृतीय उत्थान में आकर परिस्थिति बहुत बदल गई, आंदोलनों ने सक्रिय रूप धारण किया और गांव-गांव राजनीतिक और आर्थिक परतंत्रता के विरोध की भावना जगाई गई ।उनका यह भी कहना था किअब जो आंदोलन चले वे सामान्य जन समुदायों को भी साथ लेकर चले । सबसे बड़ी बात यह हुई कि आंदोलन संसार के और भागों में चलने वाले आंदोलनों के मेल में लाए गए, जिससे ये क्षोभ की एक सार्वभौम धारा की शाखाओं से प्रतीत हुए ।परोक्ष रूप से वे उपनिवेशवाद विरोधी (साम्राज्यवाद विरोधी) अंतर्राष्ट्रीय गोलबंदी का प्रतिनिधित्व और उसकी अभिव्यक्ति छायावाद में देख रहे थे । अगर ठीक ठीक कहना हो तो असहयोग आंदोलन के आरंभ से लेकर प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना तक का कालखंड छायावाद का समय माना जा सकता है ।
असहयोग आंदोलन अपनी लाख कमजोरियों के बावजूद जनता की स्वाधीनता आंदोलन में भागीदारी के लिहाज से तब तक की सबसे बड़ी जन गोलबंदी थी । साथ में ही चले खिलाफ़त आंदोलन ने इसकी व्यापकता को नये आयाम दिए । खिलाफ़त आंदोलन तुर्की की खलीफ़ा की गद्दी को अंग्रेजों द्वारा खत्म करने के विरोध में शुरू किया गया था और इसमें भारत के मुसलमान बड़े पैमाने पर शरीक हुए थे । 1857 के विद्रोह के बाद पहली बार हिंदू और मुसलमान एक साथ इस दौरान अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध लड़े । इस व्यापक जन भागीदारी ने साहित्य लिखने वालों पर गहरा रचनात्मक प्रभाव डाला । छायावादी कविता में देशभक्ति की अभिव्यक्ति पर ठीक से विचार नहीं हुआ है लेकिन अनायास नहीं कि जयशंकर प्रसाद नेहिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती/ स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती/ अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो/ प्रशस्त पुण्य पंथ है बढ़े चलो बढ़े चलो ।जैसा प्रयाण गीत लिखा । निराला ने भी थोड़ा आध्यात्मिक रंग लिए हुएजागो फिर एक बारजैसी कविताओं यावर दे वीणावादिनि वर देजैसे गीतों में प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव/ भारत में भर देकहकर देश की बात की । महादेवी केपंथ रहने दो अपरिचित, प्राण रहने दो अकेलाजैसे गीत में ओज और उत्साह का स्रोत स्वाधीनता आंदोलन ही है । इन सभी लेखकों में गद्य की मात्रा और गुण काव्य से हीनतर नहीं रहा है और कुछ अपवादों को छोड़कर इन लेखकों का गद्य अपने समय की व्यापक सामाजिक राजनीतिक हलचलों से प्रभावित रहा है । इन घोषित कवियों के अलावा प्रेमचंद के लेखन में सामाजिक और राजनीतिक मुक्ति का समर्थन अर्थात सामंतवाद और साम्राज्यवाद के समेकित विरोध का तथ्य हिंदी के सामान्य पाठक के लिए भी अनजाना नहीं है । आचार्य शुक्ल के सिलसिले में भी इस बात के पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं कि उनका लेखन और चिंतन अपने समय के सामाजिक राजनीतिक वातावरण से प्रभावित रहा था । हिंदी साहित्य का इतिहासमें आधुनिक काल के साहित्य का विवेचन करते हुए उसकी पृष्ठभूमि के रूप में उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन का जिक्र तो किया ही है, निबंधों में भी यथावसर देशप्रेम का महत्व उजागर किया है ।असहयोग आंदोलन और अव्यापारिक श्रेणियांशीर्षक से लिखा उनका एक लेख भी उनकी सचेतनता का सबूत है । वस्तुत: ऊपर वर्णित चार कवियों को ही छायावाद के भीतर शामिल करने से इनकी कविताओं की भी अनेक विशेषताओं को समझना मुश्किल हो जाता है । 
इस साहित्यिक आंदोलन का नामकरण भी विचारणीय है । ध्यातव्य है कि किसी भी छायावादी साहित्यकार ने अपने आपको छायावादी नहीं कहा । यह नाम, बल्कि बदनाम, उसके विरोधियों का दिया हुआ है । कहा गया कि हिंदी में यह बांग्ला कविता का प्रभाव है यानी बांग्ला की हिंदी में छाया इस काव्यांदोलन के जरिए प्रकट हो रही है । उसका दूसरा अर्थ यह कहकर निकाला गया कि जिस तरह छाया में कुछ भी ठोस नहीं होता उसी तरह इनकी कविताओं में भी कोई ठोस अर्थ नहीं है । जिस तरह छाया पकड़ में नहीं आती उसी तरह इनका अर्थ भी उड़ता फिरता है । जयशंकर प्रसाद ने इन नकारात्मक अर्थों को उलटकर छाया का एक और ही अर्थ करते हुए इस शब्द को इन कविताओं की खूबी का द्योतक बना दिया । उन्होंने कहा कि मोती की तरलता को उसकी छाया कहा जाता है । इसी तरह जब कविता में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ में एक तरल कांति उत्पन्न हो जाती है यानी जब कविता में प्रयुक्त शब्दों में उनके सामान्य अर्थ के अतिरिक्त अर्थ पैदा होने लगते हैं तो ऐसी कविता को छायावादी कविता कहना चाहिए ।
आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियांमें नामवर सिंह ने बताया है किछायावादसंज्ञा का प्रचलन 1920 ईसवी तक हो चुका था । इसका प्रमाण जबलपुर की पत्रिकाश्री शारदामें मुकुटधर पांडेय की लेखमालाहिंदी में छायावादके प्रकाशन से मिलता है । इस लेखमाला के एक लेख ‘काव्य स्वातंत्र्य’ में उन्होंने लिखा “यह बीसवीं शताब्दी स्वतंत्रता और नवीनता का युग है । नए-नए विचारों ने आज पृथ्वी पर एक बड़ा भारी परिवर्तन खड़ा कर दिया है ।-----विज्ञान के इस नए युग में लोग देश-जाति के प्राण स्वरूप साहित्य से उदासीन रहें- भला यह कैसे संभव है ।” इसी बदलाव के भीतर छायावाद को भी अवस्थित करते हुए उन्होंने लिखा “साहित्य में इस समय जो-जो क्रांतियां हो रही हैं उनमें छायावाद भी एक है ।”
यह बदलाव सबको नहीं भा रहा था । ज्योति प्रसाद मिश्र निर्मल ने जून 9124 कीमनोरमामेंहिंदी कविता की गतिशीर्षक लेख में लिखाजिन दिशाओं से यह नूतन लालिमा दृष्टिगोचर हो रही है, वह बंगला और अंग्रेजी है, और यदि हम इतना कहने का साहस करने के लिए क्षमा किए जाएं तो यह स्पष्ट निवेदन करेंगे कि हमारे अधिकांश परिवर्तनवादी कवि बंगला के उत्कृष्ट कवियों की प्रतिभा से प्रतिभायुक्त, तपस्या से तपस्वी और साधना से साधक बन रहे हैं ।निर्मल जी ने निराला की कविता का उदाहरण दिया था इसलिए यह बहस बहुत तीखे ढंग से चली कि निराला ने रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता की नकल की है । निराला की कविता के ही प्रसंग में छंद संबंधी बहस भी चली ।मतवालामें 1924 में ही नवजादिक लाल श्रीवास्तव ने इस प्रसंग में निराला की ओर से लिखाजब कविता धाराप्रवाह निकलने लगती है उस समय कवि का ध्यान तुक की ओर नहीं रहता, वह भावों का ही अनुसरण करता है । तुकबंदी कविता की नक्काशी है, वह मुक्त काव्य नहीं । मुक्त काव्य ही कविता का सच्चा स्वरूप है ।खुद निराला ने 1925 केकविमें प्रकाशितकवि और कविताशीर्षक लेख में इस सिलसिले में लिखाजिस तरह मुक्त पुरुष संसार के किसी नियम के वशीभूत नहीं रहते, किंतु उन नियमों की सीमा पार कर सदा मुक्ति के आनंद में विहार करते रहते हैं, उसी तरह मुक्त कवि भी अपनी कविता को पिंगल के बंधन में नहीं रखना चाहते ।छंद की इस बहस ने आज की मुक्त छंद की हिंदी कविता के लिए राह बनाई क्योंकि निराला तथा अन्य छायावाद समर्थकों ने मुक्त छंद की धारणा को इस बहस के सहारे हिंदी में स्थापित कर दिया ।  
यह तो छायावाद का आरंभ था । 1926 में सुमित्रानंदन पंत के काव्य संग्रहपल्लवके प्रकाशन के बाद उसकी कविताओं तथा उसकी भूमिका के चलते छायावाद हिंदी में स्थापित हो गया । इसकी भूमिका में पंत जी ने कविता के लिए ब्रजभाषा बनाम खड़ीबोली के सवाल पर जो बात रखी उसमें यह सवाल मात्र भाषा का नहीं, बल्कि समूचे भावबोध का हो जाता है । ब्रजभाषा में लिखी रीतिकालीन कविता की समस्या थी किइस तीन फुट के नखशिख के संसार से बाहर ये कवि पुंगव नहीं जा सके । हास्य, अद्भुत, भयानक आदि रसों के तो लेखनी को- नायिका के अंगों को चाटते-चाटते, रूप की मिठास से बंध रहे मुंह को खोलने, खखारने के लिए कभी-कभी कुल्ले मात्र करा दिए गए हैं । और वीर तथा रौद्र रस की कविता लिखने के समय तो ब्रजभाषा की लेखनी भय के मारे जैसे हकलाने लगती है ।जबकि समय की मांग ऐसी काव्यभाषा हैजिसके शब्दों में बात-उत्पात, वह्नि-बाढ़, उल्का-भूकंप सब कुछ समा सके, बांधा जा सके, जिसके पृष्ठों पर मानव जाति की सभ्यता का उत्थान-पतन, वृद्धि-विनाश, आवर्तन-विवर्तन, नूतन-पुरातन सब कुछ चित्रित हो सके, जिसकी अलमारियों में दर्शन, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, राजनीति, समाजनीति, कला-कौशल, कथा-कहानी, काव्य-नाटक सब कुछ सजाया जा सके ।पंत जी का कहना था कि ऐसी भाषा खड़ी बोली ही हो सकती है । हिंदी साहित्य में कविता और गद्य की भाषा में अंतर आधुनिक काल की शुरुआत से ही महसूस किया जा रहा था । भारतेंदु जी ने गद्य के लिए तो खड़ी बोली का इस्तेमाल किया लेकिन कविताओं के लिए ज्यादातर ब्रजभाषा का ही प्रयोग किया । द्विवेदी युग से थोड़ा खड़ी बोली में कविता लिखने की कोशिश शुरू हुई लेकिन मैथिलीशरण गुप्त और अयोध्या सिंह उपाध्यायहरिऔधके लेखन में स्वाभाविक काव्य प्रवाह खड़ी बोली में नहीं आ सका था । छायावाद की कविता ने व्यावहारिक धरातल पर भी खड़ी बोली में प्रवाहयुक्त रसमय कविता का मानक स्थापित कर दिया । 
श्री शारदामें प्रकाशित उपर्युक्त लेखमाला के एक और लेखछायावाद क्या हैमें मुकुटधर पांडेय ने छायावाद के लिए प्रयुक्त धारणा रहस्यवाद की भी नींव रख दी थी । उन्होंने लिखा थाअंग्रेजी या किसी पाश्चात्य साहित्य अथवा बंग साहित्य की वर्तमान स्थिति की कुछ भी जानकारी रखने वाले तो सुनते ही समझ जाएंगे कि यह शब्द मिस्टिसिज्म के लिए आया है ।नामवर सिंह नेआधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियांमें शामिलछायावादशीर्षक उक्त लेख में कहा है किपंत केपल्लवऔर प्रसाद केझरनाआदि संग्रहों की कविताओं को 1927 ईसवी तक अंग्रेजी मेंमिस्टिसिज्मऔर हिंदी में कभीछायावादऔर कभीरहस्यवादकहा जाता था ।छायावाद और रहस्यवाद को समानार्थी समझने के कारण ही महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1927 कीसरस्वतीमेंसुकवि किंकरके छद्म नाम से लिखे लेखआजकल के हिंदी कवि और कवितामें लिखाआजकल जो लोग रहस्यमयी या छायामूलक कविता लिखते हैं उनकी कविता से तो उन लोगों की पद्य रचना अच्छी होती है जो देशप्रेम पर अपनी लेखनी चलाते---हैं ।द्विवेदी जी ने छायावाद के समर्थकों को अपने इस लेख से उत्तेजित कर दिया था । जिन लोगों ने छायावाद के समर्थन में लिखा उनमें कृष्णदेव प्रसाद गौड़ और अवध उपाध्याय ने छायावादी कविता को रहस्यवादी मानकर उसका पक्ष लिया । इसी कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1929 में एक गंभीर लेख लिखाकाव्य में रहस्यवाद।  
नामवर सिंह का कहना है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा किए गए विवेचन मेंतात्विक दृष्टि से उन रचनाओं कोरहस्यवादकहा जाता था और रूप-विधान की दृष्टि सेछायावाद’ ” । कहने का मतलब कि शुक्ल जी इन कविताओं की अंतर्वस्तु को रहस्यवाद कहते थे और रूप को छायावाद । शुक्ल जी के इस लेख के बाद छायावाद के दो ऐसे समर्थक सामने आए जिन्होंने सहानुभूति के साथ छायावाद का विवेचन-विश्लेषण किया । ये थे नंद दुलारे वाजपेयी और शांतिप्रिय द्विवेदी । नंद दुलारे वाजपेयी ने भी छायावाद और रहस्यवाद को अलग अलग नहीं माना, बल्कि रहस्यवाद के भीतर ही स्वच्छदतावादी कवियों की भी गिनती कर ली ।
1929 के आते आते दिखाई पड़ने लगा कि छायावाद में आगे विकास नहीं हो पा रहा है । ‘विशाल भारत’ के दिसंबर 1929 में श्री ठाकुर प्रसाद शर्मा का लेख ‘छायावाद’ छपा । इसमें उन्होंने छायावाद के भीतर पैदा हो रहे रीतिवाद की चर्चा की और कहा “जैसे ब्रजभाषा की कविता को लट, नीवी, श्रमविंदु इत्यादि से उद्धार करने की आवश्यकता है, वैसे ही मैं समझता हूं कि छायावादी कविता को विपंची, हृत्ततंत्री, झंझावात आदि से छुटकारा दिलाने की जरूरत है ।” इसी लेख में उन्होंने एक और आरोप लगाया जो छायावादी कविता के सामाजिक आधार पर अत्यंत विचारणीय टिप्पणी थी । उनके मुताबिक “वर्तमान कविता का जीवन इस्तमरारी बंदोबस्त में मौज करने वाले पढ़े-लिखे जमींदार का जीवन है ।” छायावादी कविता की सीमाओं के बारे में उस समय के आलोचक तो सतर्क थे ही, खुद छायावादी लेखकों ने भी इन सीमाओं को समझकर अपने लेखन में नवीन मार्ग अपनाना शुरू किया । निराला ने कविता में ‘नए पत्ते’ संग्रह में नई जमीन तोड़ी । उन्होंने गद्य में भी इस बदलाव को स्वर दिया और ‘कुल्ली भाट’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ जैसे यथार्थवादी उपन्यास लिखे जयशंकर प्रसाद का उपन्यास ‘कंकाल’ भी इसी नए चेतना का परिचायक था । महादेवी ने कविताओं/गीतों की जगह गद्य लिखने में ताकत लगाई । सुमित्रानंदन पंत कविता लिखते तो रहे लेकिन कोई नवीनता नहीं प्रकट हो पा रही थी । सामाजिक राजनीतिक हालात में बदलाव तथा वैचारिक वातावरण में परिवर्तन के चलते छायावाद का अतिक्रमण करके हिंदी साहित्य में कुछ नई साहित्यिक प्रवृत्तियों का आगमन हुआ जिनकी चरम परिणति प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना और प्रगतिवाद की स्थापना में हुई ।
अलबत्ता शांतिप्रिय द्विवेदी ने 1934 में प्रकाशित अपनी पुस्तकहमारे साहित्य निर्मातामें छायावाद कोलौकिक अभिव्यक्तिमाना और रहस्यवाद कोअलौकिक। इस तरह उन्होंने इन दोनों के बीच अंतर माना और कहाजिस प्रकारमैटर आफ़ फ़ैक्टके आगे की चीज छायावाद है, उसी प्रकार छायावाद के आगे की चीज रहस्यवाद है । छायावाद में यदि एक जीवन के साथ दूसरे जीवन की अभिव्यक्ति है अथवा आत्मा के साथ आत्मा का सन्निवेश है, तो रहस्यवाद में आत्मा का परमात्मा के साथ ।शांतिप्रिय द्विवेदी ने रहस्यवाद को न केवल छायावाद से भिन्न माना बल्कि रहस्यवाद का समर्थन भी नहीं किया ।    
वैसे तो आम तौर पर लेखकों में तुलना और किसी को ऊंचा या नीचा कहना ठीक नहीं होता लेकिन यह समय वास्तव में ऐसा था जब एकाधिक लेखक समान ढंग से महत्वपूर्ण थे और उन सबका स्वतंत्र व्यक्तित्व था । जितने प्रमाण हैं उससे लगता है कि इनमें आपसी ईर्ष्या द्वेष भी अपेक्षाकृत कम था ।
इनमें सबसे अधिक गहराई जयशंकर प्रसाद में थी । काव्य लेखन की शुरुआत ब्रजभाषा से करने के बावजूदकामायनीके रूप में उन्होंने सबसे लंबी काव्य-यात्रा तय की । बीच में उनका खंड-काव्य आंसूहै जिसकी प्रसिद्धि गेयता के चलते उस दौर में बहुत थी । इसमें प्रेम की असफलता से पैदा उदासी ऐसी चित्रात्मक भाषा में व्यक्त की गई थी कि युवकों को बेहद आकर्षित करती थी । ऐसे बांध लेने वाले टुकड़े कामायनीमें भी हैं लेकिन उसका सौंदर्य आधुनिक जीवन की विडंबना-‘ज्ञान-क्रिया-इच्छाके बीच के संबंध-विच्छेद- को उठाने में निहित है । अकेले इसी महाकाव्य का विश्लेषण अनेक आलोचनात्मक और व्याख्यात्मक पुस्तकों में किया गया है । इस महाकाव्य के अलग-अलग सर्ग स्वतंत्र रूप से सम्मोहित करने में सक्षम हैं । श्रद्धा का उद्बोधन शक्ति के विद्युतकण जो व्यस्त/विकल बिखरे हैं हो निरुपाय/ समन्वय उनका करे समस्त/विजयिनी मानवता हो जायनवजागरण का घोष प्रतीत होता है । किसी मनोभाव को पात्र बनाकर उसकी मूर्ति खड़ी कर देने के मामले मेंकामायनीका लज्जा सर्ग अप्रतिम है । काव्य-व्याख्या के लिए जयशंकर प्रसादन केवल चुनौतीपूर्ण हैं, बल्कि मन लगाने वाले भी । उनकी बिंबात्मक भाषा ठहरकर अर्थ खोलने की मांग करती है । नाटक के क्षेत्र में उन्होंने नाटक तो लिखे ही उन पर सैद्धांतिक विचार भी किया । इनके नाटक ऊपर से प्राचीन भारत के शासकों की प्रशंसा प्रतीत होते हैं लेकिन उनके भीतर प्रवेश करते ही हमें दरबारों की गलाजत का चित्रण मिलने लगता है । अंतिम नाटक ध्रुवस्वामिनीमें तो तलाक लेने का अधिकार स्त्री को दिया गया है । उनके नाटकों और कहानियों में मनुष्य के भाग्य के उत्थान पतन को इतने ज्यादा समाजैतिहासिक तत्वों के साथ गूंथ दिया गया है कि प्रसाद जी दार्शनिक के रूप में नजर आने लगते हैं । उन्होंने हेगेल को उद्धृत किया है जिससे लगता है कि उन्होंने इतिहास संबंधी हेगेल की मान्यताओं को अच्छी तरह समझा था । इतिहास की यह परिष्कृत समझ उनकी अनेक कहानियों में भी दिखाई पड़ती है । आचार्य शुक्ल ने साम्यवाद से उनके परिचय की ओर भी इशारा किया है । प्रसाद जी की कहानियों की विशेषता के कारण ही बहुत कम कहानियों के बावजूद हिंदी कहानी केप्रसाद स्कूलकी बात की जाती है । उनकी कहानियों में नाटकीयता का तत्व पाठक का ध्यान खींचता है । इस नाटकीयता के सृजन के लिए वे मनोभावों के टकराव का चित्रण करते हैं । खासकर आकाशदीपमें प्रेम और स्वाधीनता के टकराव को जितनी तीक्ष्णता से उन्होंने उठाया है वह उनकी आधुनिक दृष्टि का परिचायक है । ममतामें वे इस्लाम के सवाल पर अपने समय से बहुत आगे नजर आते हैं । पात्रों के मामले में धर्म की जगह उनकी राष्ट्रीयता को उद्धृत करना उन्हें बेहद विशिष्ट बना देता है । व्यवस्थित आलोचक न होने के बावजूद उनमें आलोचकीय सूझ बहुत थी । प्रगतिवाद को लघुता की ओर दृष्टिपातकहकर उन्होंने इसकी संक्षिप्ततम परिभाषा की । नाटक और रंगमंच के रिश्ते को उन्होंने यह कहकर सूत्रबद्ध किया कि रंगमंच नाटक के लिए होता है। रसाभास के प्रसंग में उन्होंने शुक्लजी से टक्कर ली । भारतीय काव्यशास्त्र के बारे में भी उन्होंने मौलिक स्थापनाएं प्रस्तुत कीं और रसतथा अलंकारको ही मूल धारा मानते हुए अन्य संप्रदायों को इन्हीं के मिश्रण से उत्पन्न बताया । कविता को आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूतिकहना अब भी व्याख्या की दरकार रखता है । संकल्पात्मक में संकल्प की जगह कल्पना का अर्थ लेने से इस सूक्ति का अर्थ खुलता है ।          
जयशंकर प्रसाद के बारे में यह धारणा सही है कि वे दार्शनिक कवि थे । मुक्तिबोध ने यह बात कही है । खासकरकामायनीमें वे आधुनिक सभ्यता की मौलिक समस्या को उठाते हैं । अनेक स्थानों पर उनकी कविता सतही पाठ करने पर तुलसीदास की कविता की तरह धोखा दे देती है । उदाहरण के लिएआंसू से भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा/ तुमको अपनी स्मिति रेखा से यह संधि पत्र लिखना होगामें लग सकता है कि वे इसकी ताईद कर रहे हैं लेकिन थोड़ा ध्यान देते ही आंख में आंसू और चेहरे पर मुस्कान की मजबूरी की विडंबना सामने आ जाती है । रामस्वरूप चतुर्वेदी ने काम के प्रेम और रति के लज्जा में रूपांतरण को मनुष्य की सांस्कृतिक परिष्कृति के रूप में परिभाषित किया है । देव संस्कृति के नाश को सामंती अतीत के विनाश के रूप में देखना भी गलत नहीं है । आचार्य शुक्ल ने संकेत किया है कि प्रसाद जी साम्यवादी विचारों से प्रभावित थे ।  
स्वाभाविक रूप से प्रसाद के बाद निराला पर ध्यान जाता है । रामविलास शर्मा की लिखी तीन खंडों में प्रकाशितनिराला की साहित्य साधनाइनके जीवन और साहित्य की समझ के लिए सर्वोत्तम पुस्तक है । निराला के प्रत्येक काव्य संग्रह में काव्य-बोध के बदलाव तथा काव्य-कला की नई ऊंचाई पर अनेक आलोचकों ने टिप्पणी की है । नागार्जुन के पहले निराला ही थे जिन्होंने कविता के सीमांत छुए और वहां भी कविता को संभव किया । कविताओं के मामले में उनकी कीर्ति का आधार उनकी लंबी कविताएं हैं ।राम की शक्तिपूजाशीर्षक कविता में उन्होंने माइकेल मधुसूदन दत्त कीमेघनाथ वधकी तरह संस्कृतनिष्ठ पदावली की झड़ी लगा दी ।सरोज स्मृतिशीर्षक कविता उन्होंने अपनी पुत्री के देहांत पर शोकगीत के ढांचे में लिखी । इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कवि पिता ने अपनी पुत्री का सौंदर्य वर्णन किया है । यह वर्णन कविता की दुनिया में दुर्लभ है । निजी व्यथा को निराला ने सामाजिक और साहित्यिक संघर्ष के साथ गूंथ दिया है । तुलसीदासशीर्षक कविता भक्तिकाल के इस महान कवि के सांस्कृतिक उन्मेष की रचनात्मक व्याख्या है ।कुकुरमुत्ताशीर्षक कविता अभिजात सौंदर्याभिरुचि पर प्रहार है । गीतों की रचना में भी उन्हें बहुत सफलता मिली । इनकी विषयवस्तु भक्ति से लेकर करुणा तक विस्तृत है । उन्होंने कविता से पहले गद्य लिखना शुरू किया था । बाद के उपन्यासों में यथार्थवाद की मौजूदगी को अनेक लोगों ने पहचाना है लेकिन शुरुआती उपन्यासों में भी गहराई है जिसका विश्लेषण अभी नहीं किया गया है । पात्रों के मामले में नौजवानों और स्त्रियों की उपस्थिति उन्हें इस पहलू से भी प्रेमचंद से जोड़ती है । आलोचना भी उन्हें काफी लिखनी पड़ी थी । उनकी कहानियां नये किस्म के कहानी लेखन की संभावना का संकेत करती हैं । निबंधों में गद्य की सृजनात्मकता को पहचानने की जरूरत रामविलास जी ने लक्षित की ही है । आचार्य शुक्ल ने ठीक ही उनकी प्रतिभा कोबहुवस्तुस्पर्शिनीकहा था । नागार्जुन ने स्त्री समुदाय के प्रति उनकी सहानुभूति को ठीक ही लक्षित किया है जो कविताओं के अतिरिक्तदेवीजैसी कहानी में बहुत स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है ।      
महादेवी वर्मा ने कवयित्री के रूप में जो प्रसिद्धि अर्जित की उसके कारण उनका क्रांतिकारी रूप छिप जाता है । महादेवी ने गीतों के लेखन में अपनी काव्य प्रतिभा लगाई । उनके गीतों में दुख की अभिव्यक्ति के बराबर ही उद्बोधन के भाव भी हैं । गद्य लेखन में उनके रेखाचित्रों और संस्मरणों में स्त्रियों-ग्रामीणों और साथी साहित्यकारों के बहुत ही जीवंत चित्र अंकित हुए हैं । इनके अतिरिक्त उनका वैचारिक लेखन भावावेग और सूझबूझ से भरा हुआ है । उनकी किताबश्रृंखला की कड़ियांभारतीय स्त्री पर आरोपित  व्यवस्थित सामाजिक बंधनों का विश्लेषण है । उस समय हिन्दी के पौरुषेय वातावरण में किसी भी स्त्री के लिए अपनी जगह बनाना लगभग असंभव काम था जो महादेवी ने कर दिखाया ।
सुमित्रानंदन पंत की कविताओं ने प्रकृति चित्रण के नाते हिंदी साहित्य में खास जगह बनाई । हिमालय की छवियों के सहारे उन्होंने चित्ताकर्षक प्राकृतिक बिंब उकेरे । इसी कारण उन्हें लोकप्रिय भाषा मेंप्रकृति का सुकुमार कविकहा जाता है । प्रकृति चित्रण के अतिरिक्त उन्होंने वैचारिक कविता भी लिखने की कोशिश की । उनकी इन कविताओं में वैचारिकता की गहराई नहीं है और गांधीवाद, मार्क्सवाद से लेकर अरविंद दर्शन तक को उन्होंने काव्य का विषय बनाया । हिंदी में उत्तर छायावादी दौर में प्रचलित हालावाद का भी उन्होंने अनुकरण करने की कोशिश की ।
इन कवियों के बाहर छायावाद का प्रसार प्रेमचंद के लेखन में भी है । उनके स्त्री पात्रों के गढ़ने में छायावादी संस्कार प्रत्यक्ष हैं । हिंदी कहानी की दुनिया में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद को विरोधी प्रवृत्तियों का लेखक माना जाता है और इसी आधार पर इन दोनों के नाम पर दो स्कूलों की कल्पना की जाती है । लेकिन खुद प्रेमचंद इस विरोध को तात्विक नहीं मानते थे । उनका मानना था कि वे दोनों आदर्श समाज की इच्छा से यथार्थ का चित्रण करते हैं । स्वाधीनता आंदोलन की दोनों धाराओं- समाज सुधार और राजनीतिक आजादी- का सामंजस्य प्रेमचंद के लेखन में मिलता है ।
रामचंद्र शुक्ल के बारे में यह अपवाद ही है कि वे छायावाद के विरोधी थे । छंद को ध्वनि आवर्तों का पैटर्न मानने में छायावादी काव्य संस्कारों की गूंज है । इसके अतिरिक्तहिंदी साहित्य का इतिहासमें रीतिकालीन कवियों में बिहारी के मुकाबले देव की कविता का पक्ष लेने तथा रीतिमुक्त काव्यधारा में घनानंद की प्रतिष्ठा के पीछे छायावादी काव्य संस्कारों का प्रभाव महसूस किया जा सकता है । कविता की भाषा में लाक्षणिकता का उल्लेख शुक्ल जी ने घनानंद और छायावादी कवियों के ही प्रसंग में किया है । छायावादी कविता की शक्तियों और सीमाओं की सबसे सटीक पहचान आचार्य शुक्ल को थी ।
छायावाद की कोई ऐसी मान्यता निर्मित करना मुश्किल है जिसके भीतर इन सभी रचनाकारों के लेखन की विशेषताएं समा जाएं । फिर भी स्वाधीनता की आकांक्षा, प्रकृति वर्णन, वैयक्तिकता का उभार, मुक्त छंद की स्थापना, मनोभावों का सूक्ष्म चित्रण, स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व की प्रस्तुति, समाज के वंचितों के प्रति सहानुभूति, कल्पना की उड़ान और कविता की भाषा के बतौर खड़ी बोली हिंदी की स्थापना आदि छायावाद की प्रमुख विशेषताएं और योगदान कहे जा सकते हैं । वह समय भारत की आजादी की लड़ाई में व्यापक जनता की भागीदारी का समय था । साथ ही हिंदी क्षेत्र में शहरी मध्यवर्ग का विकास हो रहा था । इस नवोदित मध्यवर्ग का रिश्ता अभी देहाती जड़ों से टूटा नहीं था । अधिकांश लेखक इस मध्यवर्ग का अंग थे । सामाजिक बदलाव की इस मध्यवर्ग की आकांक्षा और हिंदी भाषी समाज के सामंती यथार्थ के बीच की टकराहट छायावाद की शक्ति और सीमा दोनों को रूपायित करती है । इसी के कारण मुक्ति की प्रस्तुति एक तरह के सामाजिक संकोच के साथ साहित्य में आती है । 
सहायक किताबें
रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी
नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
शांतिप्रिय द्विवेदी, हमारे साहित्य निर्माता, बांकीपुर
नंददुलारे वाजपेयी, हिंदी साहित्य: बीसवीं शताब्दी, लोकभारती, इलाहाबाद
रामविलास शर्मा, परपंरा का मूल्यांकन, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
रामविलास शर्मा, निराला की साहित्य साधना, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
गोपाल प्रधान, छायावाद युगीन साहित्यिक वाद विवाद, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली
मुकुटधर पांडेय, हिंदी में छायावाद, तिरुपति प्रकाशन, हापुड़

सुमित्रानंदन पंत, पंत ग्रंथावली, राजकमल प्रकाशन

Sunday, April 16, 2017

मार्क्सवाद और सामाजिक आंदोलन

                
                                            
2014 में प्लूटो प्रेस से लारेंस काक्स और एल्फ़ गुनवाल्ड नीलसेन की किताब ‘वी मेक आवर ओन हिस्ट्री: मार्क्सिज्म ऐंड सोशल मूवमेंट्स इन द ट्विलाइट आफ़ नियोलिबरलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों का मानना है कि सामाजिक आंदोलन तमाम तरह की मुसीबतों से जूझते हुए अलग किस्म की दुनिया बनाने के लिए होते हैं । इसे वर्तमान में पहचानना मुश्किल होता है इसलिए आंदोलनकारी अक्सर आंदोलन का इतिहास और पिछली पीढ़ियों के संगठनकर्ताओं की जीवनियां पढ़ते हैं । जिस दुनिया में हम रह रहे हैं उसे बनाने में आंदोलनों के योगदान को समझना आसान होता है । बादशाहत और साम्राज्य का अंत, संगठित होने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वेतन वृद्धि और छुट्टियां, कल्याणकारी राज्य का विकास, फ़ासीवाद और रंगभेद का खात्मा, समान अधिकार के कानून, समलैंगिकता को वैधता, तानाशाहियों का उन्मूलन, पर्यावरण के लिए नुकसानदेह परियोजनाओं की वापसी- यह सब कुछ सामाजिक आंदोलनों का हासिल है । शक्ति, शोषण और सामाजिक सांस्कृतिक ऊंच-नीच को बनाए रखने के तमाम उपायों से टकराते हुए उन्होंने यह सब अर्जित किया है । पूंजी संचय के तमाम रूपों, राज्य और वर्चस्व के नए प्रकारों, नस्ली गोलबंदियों और पितृसत्ताक हरकतों, सहज बोध और नग्न राज्य दमन से उनकी हमेशा ठनी रही है । आज इसी तरह की एक गोलबंदी नवउदारवाद के नाम पर जारी है । यह ऊपर से संचालित ऐसा सामाजिक आंदोलन है जो बाजारोन्मुखी आर्थिक सुधारों के जरिए पूंजी का मुनाफ़ा बढ़ाना चाहता है । इसके लिए समर्थन घटने, इसके प्रसार में बाधा आने और वादे के मुताबिक आर्थिक लाभ न मिलने से सारी दुनिया में नीचे से इस नवउदारवादी परियोजना के विरोध में आंदोलनों की लहर उठ खड़ी हुई है ।
किताब का मकसद सिक्के के दोनों पहलुओं की समझ बढ़ाना है । किताब दोनों लेखकों के दस सालों की मेहनत का परिणाम है । सामाजिक आंदोलनों के बारे में 2002 में आयोजित एक सम्मेलन में दोनों को पता लगा कि वे अलग अलग कोणों से समान समस्या के बारे में सोच विचार रहे हैं । एल्फ़ ने ग्रामीण आंदोलनों पर विशेष ध्यान दिया था जबकि लारेंस का ध्यान मजदूर वर्ग समुदाय की पूंजीवाद विरोधी सक्रियता पर अधिक रहा था । दोनों का मार्क्सवादी दृष्टिकोण के महत्व और क्षमता में भरोसा था लेकिन वे जनता को कर्ता मानने में मौजूदा मार्क्सवादी सिद्धांत की हिचक भी महसूस करते थे । एल्फ़ भारत के बारे में लिखते थे और लारेंस आयरलैंड के बारे में । दोनों ही जगहों पर ऐसे मार्क्सवादियों का बोलबाला था जो इतिहास बनाने वाले के रूप में जनता की क्षमता में विश्वास नहीं करते थे । दो तीन साल बाद उन्होंने कार्यकर्ताओं की बैठकों और आंदोलनकारियों के सम्मेलनों में इस किताब के विभिन्न अध्यायों का खाका पेश करना शुरू किया । किताब लिखने के बाद चार साल तक संभावित प्रकाशक की तलाश चली । उन्नीस प्रकाशकों से संपर्क किया गया जिनमें से कोई भी इसे छापने को राजी नहीं हुआ कि तभी मंदी आई, यूरोप में सार्वजनिक सेवाओं में कटौती के विरोध में आंदोलन उठ खड़े हुए, लैटिन अमेरिका के विभिन्न देशों में वामपंथी सरकारें बनीं, अरब मुल्कों में विद्रोह शुरू हुए और अंग्रेजी भाषी दुनिया में ‘अकुपाई’ आंदोलनों की बहार आ गई । आंदोलनों और मार्क्सवाद के बारे में धड़ाधड़ किताबें छपना शुरू हुईं लेकिन इन दोनों को जोड़कर समझने वाली किताबें कम ही देखने में आईं ।
लेखक सामाजिक आंदोलनों के कार्यकर्ता के रूप में सामाजिक विषमता के संरचनात्मक कारणों को समझना चाहते थे इसलिए मार्क्सवाद के करीब आए । उन्हें इसमें नीचे से सामाजिक बदलाव प्रेरित करने की संभावना मिली । आंदोलनों के दौरान लगे धक्कों और अप्रत्याशित विजय की व्याख्या के लिए उन्हें सतह के नीचे कार्यरत संरचनागत कारकों को समझने की जरूरत महसूस हुई । इसमें पत्रकारीय लेखन से तो मदद नहीं ही मिली, शिक्षा जगत के राजनीति विज्ञानियों और समाजशास्त्रियों के विश्लेषण भी अपर्याप्त लगते थे । हालांकि मार्क्सवाद का विकास सामाजिक आलोड़न से जुड़ा हुआ है लेकिन मौजूदा मार्क्सवाद के पास सामाजिक आंदोलनों को देने के लिए कुछ खास नहीं महसूस हुआ । उन्हें यह भी लगा कि मार्क्सवाद के साथ राजनीति इतना अधिक जुड़ गई है किकम्यूनिस्ट घोषणापत्रमें वर्णित पार्टी, लेनिन की पार्टी की धारणा और आज की पार्टी को समान समझ लिया जाता है । इससे बाहर के जनसमुदाय को व्यावसायिक तौर पर उत्पादित मास संस्कृति का उपभोक्ता मात्र मान लिया जाता है । शिक्षित लोगों के मार्क्सवाद में संरचना के विश्लेषण पर इतना जोर रहता है कि व्यावहारिक राजनीति के ठोस मौके नजर ही नहीं आते । दूसरी ओर जो लोग सामाजिक आंदोलनों से जुड़े होते हैं उनमें ऐसी संकीर्णता होती है कि विभिन्न आंदोलनों का आपस में तो संवाद नहीं ही होता, आंदोलन आधारित पार्टियों और संचार माध्यमों का निर्माण असम्भव हो जाता है, कार्यस्थल पर बदलाव या समुदाय के भीतर के शक्ति संबंधों में बदलाव के लिए सीधी कार्यवाही का सवाल ही नहीं उठता और व्यापक सामाजिक बदलाव के साथ जुड़ाव को खारिज कर दिया जाता है । ये आंदोलन सच्चे अर्थों में आंदोलन नहीं होते बल्कि दूसरों द्वारा बनाए नियमों के संदर्भ में अपने आपको अवस्थित करने की कोशिश मात्र करते हैं । इसके बावजूद सच यह है कि हमारे आंदोलन के संगठन आते जाते रहते हैं । आंदोलनों में कभी ढेर सारे लोग होते हैं कभी एकदम नहीं होते, संघर्ष में कभी हम आगे बढ़ते हैं कभी पीछे धकेले जाते हैं । इन्हीं आंदोलनों ने बार बार हमारी दुनिया को आकार दिया है ।
इस किताब में मार्क्सवाद और सामाजिक आंदोलन दोनों पर पुनर्विचार करने की कोशिश की गई है और यह समझने की कोशिश की गई है कि लोग किस तरह अपने इतिहास का स्वयं निर्माण करते हैं । ऐसा वे केवल नीचे से नहीं, ऊपर से भी करते हैं । अनजाने भी करते हैं और जान बूझकर भी करते हैं । लेखकों का दावा है कि किताब में इस प्रक्रिया को बदलाव के लिए नीचे से संचालित सामाजिक आंदोलनों के भागीदारों हेतु लाभप्रद तरीके से समझने की कोशिश की गई है । सामाजिक बदलाव की व्याख्या के केंद्र में सामाजिक आंदोलनों को रखा गया है । क्रांतियों, क्रांतिकारी पार्टियों, श्रमिक टकरावों, सामुदायिक संगठनों और मुख्य धारा विरोधी तथा वैकल्पिक संस्कृतियों को एक दूसरे से काटकर नहीं बल्कि जनसमुदाय की रचनात्मक सक्रियता के अंतर्संबंधित रूपों की तरह देखने की कोशिश की गई है । इन चीजों के आपसी संबंधों को समझकर ही कार्यकर्ता एक दूसरे से सीख सकते हैं । इसी तरह से वे आपस में व्यापक और दूरगामी मोर्चा बना सकते हैं और जीत हासिल कर सकते हैं ।
लेखकों का कहना है कि किताब में नवउदारवाद की संरचना का ऐसा विश्लेषण नहीं है जिसमें बीच बीच में मनचाहे आंदोलनों का पत्रकारीय विवेचन हो । इसमें नवउदारवाद को ऊपर से संचालित थोपे गए सामूहिक उपकरण के रूप में देखा गया है जिसे टिकाने में भारी मुश्किल आ रही है । साथ ही उसे उखाड़ फेंकने के लिए नीचे से भी आंदोलन चल रहा है और दोनों में अंत:क्रिया जारी है । इसमें समय समय पर फूट पड़ने वाले संघर्षों का अतिशयोक्तिपूर्ण गुणगान भी नहीं है । हमें पसंद आने के बावजूद इन आंदोलनों की सामाजिक बदलाव की कोई टिकाऊ धारावाहिकता नहीं बन सकी है । सामाजिक आंदोलनों के उत्थान और नवउदारवाद के संकट के इस दौर में एक सकारात्मक बात यह देखने में आई है कि आंदोलनों के भागीदार नए तरह का लेखन कर रहे हैं । इससे मुश्किल यह आई है कि समस्त लेखन को देख पाना लगभग असंभव हो गया है । इसमें सार्वभौमिकता नहीं भी हो सकती है लेकिन सबमें कोई न कोई नया कोण होता है ।

समय बेहतरीन है तो बदतरीन भी है । यूरोप में अपूर्व आंदोलनों ने असंभव प्रतीत होने वाले काम किए हैं । लैटिन अमेरिका में लड़ाई का एक दौर पूरा हुआ है । अमेरिका में आंदोलन व्यापक बदलाव लाने में सक्षम साबित नहीं हुए । भारत और चीन में भी राज्य की ताकत के सामने आंदोलनों को घुटने टेकने पड़े । अरब मुल्कों में आंदोलनों की दूसरी नई लहर का इंतजार है । धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और परदे के पीछे व्यापारिक समझौतों के लिए बातचीत जारी है । रेमंड विलियम्स ने कहा था कि हमारे अनुकूल माहौल समस्या के पुनर्कथन से नहीं बल्कि आंदोलनों और संघर्षों से ही बनेगा ।

Friday, April 14, 2017

पूंजी की गति उससे पैदा विक्षोभ

            
                                     
2011 में पी एम प्रेस से साशा लिली की किताबकैपिटल ऐंड इट्स डिसकांटेन्ट्स: कनवर्सेशंस विथ रैडिकल थिंकर्स इन ए टाइम आफ़ ट्यूमल्टका प्रकाशन हुआ । इसमें लेखिका ने विभिन्न विद्वानों के किसी कार्यक्रम हेतु लिए गए साक्षात्कारों को किताब की शक्ल दी है लेकिन किताब के लिए इन विद्वानों ने अपने साक्षात्कारों को सुधारा भी है । भूमिका के अतिरिक्त किताब में संकलित पंद्रह साक्षात्कारों को तीन भागों में बांटा गया है । पहला भाग साम्राज्य, नवउदारवाद और संकट पर केंद्रित है जिसके तहत एलेन वुड, डेविड हार्वे, लियो पानिच और डूग हेनवुड, डेविड मैकनेली तथा सैम गिनडिन और ग्रेग अल्बो के साक्षात्कार हैं । दूसरा भाग उपभोक्तावाद, घेरेबंदी और पूंजीवाद के अंतर्विरोधों के बारे में है । इसमें जान बेलामी फ़ास्टर, जेसन मूर, गिलियन हार्ट और उर्सुला हुव्स के साक्षात्कार संकलित हैं । तीसरा भाग विकल्पों के बारे में है जिसमें विवेक छिब्बर, माइक डेविस, तारिक़ अली, जान सानबोनमात्सु, नोम चोम्सकी और अंद्रेज ग्रुबेसिक से बातचीत संकलित है । यह सूची ही बताती है कि नवउदारवाद के आगमन के बाद उसके विरोधी विचारकों में से लगभग सभी से लिए गए साक्षात्कार इस किताब में शामिल हैं ।
भूमिका में साशा का कहना है कि पिछले सालों में पूंजीवादी दुनिया में बहुत उथल पुथल रही । कई बैंक डूबे, कारखानों में स्थायी रूप से ताला लटक गया और धनी देश भी दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए । खुले बाजार की विचारधारा के अंजर पंजर बिखर गए । पूंजीवाद की मौत तो नहीं होने वाली लेकिन संकट बेहद गंभीर है । आम तौर पर संकट के समय यथास्थिति को धता बता दिया जाता है और सामूहिक शक्ति की ऊर्जा से भरकर लोग इसका मुकाबला करने के लिए उठ खड़े होते हैं । लेकिन संकट की स्थिति में हमेशा क्रांतिकारी ताकतों को ही बल नहीं मिलता अक्सर चरम दक्षिणपंथी ताकतें भी संकटग्रस्त जनता के असुरक्षा बोध का लाभ उठाकर उसे विदेशियों के प्रति नफ़रत और कटौती के लिए सहमति में बदल देती हैं । विरोधाभासी सचाई है कि पूंजीवाद के संकट पूंजी के विस्तार के लिए नए अवसर हो जाते हैं । तबाही के बाद अबाध विस्तार का मौका मिल जाता है । विनाश और विस्तार की इस प्रक्रिया में पूंजी को हथियारों की मदद हमेशा हासिल रहती है । युद्ध, पूंजी के नवीकरण के अपरिहार्य साथी रहे हैं । प्रकृति का संकट भी पूंजी के ही काम आ रहा है । पूंजीवाद संकटों को जन्म देता है और संकट मुनाफ़े का मौका मुहैया कराते हैं ।
जहां तक वाम की बात है तो उसके बारे में मशहूर मजाक है कि वामपंथियों ने दस संकटों की भविष्यवाणी की लेकिन उनमें से दो ही आए । रोजमर्रा की झंझटों ने सपने देखने का हमारा हौसला छीन लिया है । क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव की संभावना लंबे समय के लिए सो गई लगती है, उम्मीद बची नहीं और पराजय बोध ने हमें जकड़ लिया है । कहा जा रहा है कि पूंजीवाद के खात्मे के मुकाबले दुनिया के खात्मे की बात ज्यादा समझ आने लायक है । सपने और संगठन के मामले में यह संकट अधिक दुखदायी है । केवल विचारों से वामपंथ की समस्या का समाधान नहीं निकलेगा और क्रांति सदिच्छा से नहीं होती । लेकिन वामपंथ के त्रासद इतिहास से साबित होता है कि विचारों का महत्व होता है । वे व्यवहार से पैदा होते हैं और भविष्य के आचरण को रूपाकार प्रदान करते हैं । जिस दुनिया को हमने बनाया है उसे समझने में हमारी मदद करते हैं, वर्तमान व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करते हैं और उनमें दरार पैदा करके विद्रोह संगठित करने के अवसर सुझाते हैं । सही है कि मुक्तिकामी राजनीति पिछले तीस सालों से कमजोर पड़ी है लेकिन इसी दौरान महत्वपूर्ण विचार पनपे हैं । उन्होंने पूंजीवाद की दीर्घजीविता, नवउदारवाद की टेढ़ी मेढ़ी यात्रा और वाम राजनीति के उतार के बहुमुखी कारणों को समझने की कोशिश की है ।
संकलनकर्ता को लगता है कि पूंजीवादी संकट के इस दौर में इन क्रांतिकारी विचारों के सहारे बदलाव की परियोजना को नई ऊर्जा से भरा जा सकता है । किताब में शामिल चिंतकों में आपसी सहमति नहीं है फिर भी सीखने के लिए काफी कुछ है । इसमें कुछ हद तक राजनीतिक अर्थशास्त्र है हालांकि इतिहास के लौह नियमों की धारणा को खारिज किया गया है । इन विचारों का काफी कुछ मार्क्सवाद की आलोचनात्मक परम्परा में अवस्थित है हालांकि जिन विद्वानों के साक्षात्कार संकलित हैं उनमें से बहुतों को क्रांतिकारी कार्यकर्ता नहीं जानते । असल में नवउदारवाद, वैश्वीकरण और पूंजीवाद के विरोधी समकालीन विचारों पर राजनीतिक उदारवाद की छाया है जो पूंजीवाद का मानवीय चेहरा तलाशता है, छोटे कारीगरों और वैसे ही दुकानदारों की आदर्श दुनिया कायम करना चाहता है या कभी कभी उद्योगों से पहले के जमाने में लौट जाना चाहता है । किताब में कोई नुस्खा नहीं मिलेगा बल्कि पूंजीवाद और हमारे आसपास की दुनिया को समझने के विभिन्न परिप्रेक्ष्य मिल सकते हैं । पूंजीवाद और उसके विरोधियों का आकलन निराशाजनक होने के बावजूद किताब का निष्कर्ष निराशा नहीं है ।
साशा का कहना है कि हमें व्यापक मुक्तिकामी मूलगामी बदलाव के लिए महात्वाकांक्षी सोच पैदा करनी होगी । किताब में व्यक्त विचार बहुवर्णी हैं लेकिन उनमें एकसूत्रता भी है । उपभोक्तावाद की चिंता इन्हें आपस में जोड़ती है । पूंजीवादी मुनाफ़े के लिए प्रकृति और मानव श्रम के संयोग से उत्पादित विभिन्न उपभोग्य मालों का निर्माण आवश्यक है । वर्तमान दौर में उपभोक्तावाद नए नए क्षेत्रों में पहुंच गया है । हमारे आनुवंशिक गुणसूत्र भी इसकी पकड़ में आ गए हैं । समूची दुनिया में लोगों को उनकी जमीन और आजीविका से बेदखल करके जिंदा रहने के लिए बाजार पर निर्भर बना दिया गया है । शहर और देहात में नई नई चीजों को विक्रेय बनाने के लिए सामुदायिक संपदा और प्रकृति के संसाधनों की घेरेबंदी करके उन्हें जनता से छीनकर थैलीशाहों को सुपुर्द किया जा रहा है । पूंजी और प्रकृति के संकट का एकमात्र उत्तर निजी समृद्धि की जगह पर सार्वजनिक प्राचुर्य है ।
2008 में जब अमेरिका में वित्तीय झटका लगा था तो ढेर सारे वाम चिंतकों को लगा कि नवउदारवाद के इस कारनामे से पार पाने के लिए राजकीय हस्तक्षेप की वापसी हो सकती है । एक हद तक बाजार को पीछे हटना पड़ा था और अर्थतंत्र को पटरी पर लाने के लिए राज्य आगे आया था । लेकिन इस तात्कालिक मुद्रा के भ्रम में पड़कर वे शायद भूल गए कि नवउदारवादी परियोजना ही वित्तीय हितों की रक्षा के लिए राजकीय हस्तक्षेप का परिणाम थी । सही बात है कि नव उदारवाद की प्रशस्ति का सुर धीमा पड़ा है लेकिन बाजार के अबाध शासन के बदले में मानवीय चेहरे वाले पूंजीवाद के आगमन का भ्रम भी टूट चुका है । शासक कुलीनों द्वारा समाज और प्रकृति के संरक्षण की आशा को कटौती के राज ने चौपट कर दिया है । फिर भी एक गुट पूंजीवाद को काबू में रखने के लिए युद्धोत्तर कल्याणकारी राज्य की वापसी की उम्मीदों को जिलाए हुए है । उनका कहना है कि बैंकों और विनिर्माण क्षेत्र पर नियमों की बंदिश लगाकर 40, 50 और 60 के दशक में राज्य ने कारपोरेट घरानों को रोके रखा था, 70 दशक के उत्तरार्ध में आकर राज्य ने अपने कदम वापस खींचे और बाजार को छुट्टा छोड़ दिया इसलिए इन्हें आशा है कि पुराने समय में लौटा जा सकता है । सवाल है कि क्या ऐसा सम्भव रह गया है । साशा का मानना है कि नवउदारवाद की जड़ें 1970 दशक के पूंजीवादी संकट में ही हैं । जिस समय में वाम के कुछ लोग लौटना चाहते हैं उसमें पश्चिमी दुनिया में पूर्ण रोजगार के साथ कल्याणकारी राज्य और गरीब देशों में योजनाबद्ध विकास का बोलबाला था । ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के चलते वित्तीय स्थिरता थी जिसे डालर की केंद्रीयता ने मजबूत बनाए रखा था । इस दौर में पश्चिमी देशों में आर्थिक वृद्धि और गरीब देशों में कुछ विकास हुआ भी । फिर भी 60 दशक के उत्तरार्ध तक कल्याणकारी राज्य प्रणाली में रुकावट आने लगी । वियतनाम युद्ध और घरेलू मोर्चे पर बढ़ते खर्चों से डालर डगमगाने लगा । उसके डगमगाने से ब्रेटन वुड्स संस्थाओं में भी अस्थिरता आई । बेरोजगारी बढ़ी तो उसके चलते मजदूरों में जुझारूपन आया । पारम्परिक ट्रेड यूनियनों की नौकरशाही को तोड़कर नए संगठन बनने लगे । अकेले 1970 में तीस लाख मजदूरों ने अमेरिका में हड़तालें कीं । हड़तालें मजदूरी बढ़ाने के साथ साथ उत्पादन पर नियंत्रण और काम के हालात में बेहतरी के लिए भी हुईं । दूसरी ओर जर्मनी और जापान के उद्योगों से अमेरिकी उद्योगों को कड़ी टक्कर मिल रही थी । इन सब बातों के चलते पूंजी का मुनाफ़ा कम होता जा रहा था । दूसरी ओर गरीब देशों में उद्योगीकरण के लिए राज्य ने आयात विकल्पीकरण की जो नीति अपनाई थी उसके तहत देशी पूंजीपतियों को नए उद्योग लगाने के लिए राज्य की ओर से आर्थिक सहायता प्रदान की जाती थी । पूंजीपति सार्वजनिक संसाधन ले तो लेते थे लेकिन जिस मकसद से उसे दिया गया था उसके लिए इस्तेमाल नहीं करते थे । इसके कारण भारी व्यापार असंतुलन पैदा हुआ । एकांगी व्यापार से वित्तीय संकट पैदा हुआ और इसके साथ कुलीनों के अंधाधुंध खर्च के कारण नवउदारवादी विचारों को थोपने में आसानी हुई । इसके बाद तो दुनिया ही बदल गई । वर्ग शक्तियों की संरचना बदलने के लिए शासक वर्ग ने हमला बोल दिया ताकि मुनाफ़े की गारंटी की जा सके । चिली में पिनोशे के शासन में निवेशकर्ता बैंकों ने वित्तीय संकट से उबारने के एवज में तय करना शुरू किया कि किस मद में कितना खर्च होगा । रीगन ने हवाई सेवा के हड़ताली मजदूरों को एकमुश्त बर्खास्त किया ताकि अधिक वेतन पाने वाले मजदूर भी अपने आपको सुरक्षित न समझें । थैचर ने खदान मजदूरों की शक्तिशाली यूनियन पर हमला किया और सरकारी उद्योगों का निजीकरण करना शुरू किया । आर्थिक रूप से कमजोर देशों ने भी यही राह अपनाई । वहां यह धारणा बनाई गई कि होड़ न होने के कारण सरकारी उद्योग ठीक से काम नहीं कर रहे हैं । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश और विश्व बैंक से कर्ज देते समय यह वादा लिया गया कि सरकारी उद्यमों का निजीकरण होगा, सरकारी सेवाओं को खत्म किया जाएगा और अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के लिए बाजार खोल दिया जाएगा । ट्रेड यूनियनों की ताकत इतनी कमजोर हो चुकी थी कि वे कोई ठोस प्रतिरोध नहीं खड़ा कर सके । निजीकरण की प्रक्रिया के साथ ही संगठित होने के मजदूरों के अधिकार पर भी हमला हुआ तथा इसके लिए उत्पादन और श्रम प्रक्रिया की संरचना में बदलाव किए गए । काम की गति में तेजी, ठेके पर काम, अस्थायीकरण, मजदूरी में घटोत्तरी, छंटनी और नई तकनीकों के इस्तेमाल के चलते उत्पादन की प्रक्रिया पर मजदूरों की पकड़ में गिरावट आई । विनिर्माण का काम ऐसे देशों और इलाकों में स्थानांतरित किया गया जहां यूनियनों की ताकत कमजोर थी । पूंजी के इस चौतरफा हमले के चलते मजदूरों का शोषण बहुत बढ़ गया । इसी दौर में कामगारों की फौज में भारी पैमाने पर नए मजदूर शामिल हुए । मजदूर वर्ग के खात्मे की भविष्यवाणी के बावजूद पिछले दशकों में सर्वहारा की संख्या में अपार बढ़ोत्तरी हुई है । अकेले पूर्वी एशिया में इनकी तादाद 1990 के बाद नौ गुना बढ़ी है । इस बढ़ोत्तरी के कारण मजदूर वर्ग की मोलतोल की क्षमता में गिरावट आई । नए मजदूरों में स्त्रियों की तादाद बहुत अधिक है । एक आदमी की आमदनी से घर का खर्च चलने में मुश्किल आने के चलते स्त्रियों को भी श्रमिक समुदाय में शामिल होना पड़ रहा है । मजदूरों की इस नई फौज में देशों के भीतर या बाहर प्रवास करने वाले ऐसे कामगार भी शामिल हैं जिनकी आजीविका के साधन छीन लिए गए हैं ।
पूंजीवाद के इस नवउदारवादी दौर में अस्थिरता समाई हुई थी । नवउदारवाद के इस प्रभुत्व के लिए विश्व अर्थतंत्र के भारी पैमाने पर वित्तीकरण की जरूरत पड़ी । मुद्राओं का मूल्य स्थिर था नहीं इसलिए अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन में तमाम तरह की गारंटियों की जरूरत बढ़ गई । जब उथल पुथल शुरू हुई तो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश के जरिए अमेरिका ने कर्ज लौटाने में अक्षम साबित हो रहे देशों को कर्ज लौटाने के लिए कर्ज मुहैया कराने की नीति अपनाई । इसके चलते जो पुनर्संयोजन हुआ उससे मुनाफ़ा तो बढ़ा लेकिन 1990 दशक के उत्तरार्ध के बाद वित्तीय संकटों का सिलसिला ही शुरू हो गया । पिछले दशक में वृद्धि की रफ़्तार के धीमा पड़ने और मजदूरी में बढ़ोत्तरी न होने के कारण देशों और व्यक्तियों को कर्ज लेने पड़े । व्यवस्था को बचाने और अपने वित्तीय हितों की रक्षा के लिए अमेरिका को प्रत्येक संकट के समय हस्तक्षेप करना पड़ा । देखा गया कि नवउदारवाद की विचारधारा के मुकाबले व्यावहारिक स्तर पर नवउदारवाद काफी भिन्न चीज है । बाजार से राज्य का निष्कासन भ्रामक प्रचार है । वामपंथी लोग भी इस प्रचार के प्रभाव में बाजार और राज्य को आपस में विरोधी के बतौर पेश करने लगते हैं जबकि अनेकानेक तरीकों से राज्य ने बाजार की मदद की है । कल्याणकारी राज्य भी शासक वर्गों के लिए न तो नुकसानदेह था, न ही इसनें पूंजी के प्रसार में कोई बाधा खड़ी की । पर्याप्त रोजगार की उपलब्धता के कारण मजदूरों को कुछ अधिकार हासिल थे जिन्हें सहन करके भी पूंजी ने घाटा नहीं उठाया था । जब हालात बदले तो बदलाव आना ही था । इसलिए पीछे लौटने की कोई गुंजाइश नहीं बची है ।
किताब में संकलित साक्षात्कार में पानिच का मानना है कि यह संकट पूंजीवाद का चौथा वैश्विक संकट हो सकता है । 1870 और 1930 दशक के संकटों का नतीजा पूंजीवाद के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार में बाधक संरक्षणवादी उपायों के रूप में सामने आया । इसके विपरीत 1970 दशक का तीसरा संकट पूंजी के अंतराष्ट्रीय प्रसार में परिणत हुआ । कहना मुश्किल है कि वर्तमान संकट का नतीजा क्या निकलेगा । संकट के बाद नवीकरण की पूंजीवाद की क्षमता सस्ते श्रम और सस्ते भोजन पर निर्भर रही है । इसके साथ ही सस्ती ऊर्जा और विक्रेय माल में बदलने लायक सस्ते कच्चे माल की भी जरूरत पड़ती है । इसमें नई तकनीक और नई चीजों को हड़पने से मदद मिलती है । ऐसा घटित होने की संभावना के मामले में विद्वानों में मतभेद है । असल में पूंजीवाद को जिंदा रहने के लिए नई नई चीजों को लगातार माल के बतौर बाजार में लाना पड़ता है । पूंजीवाद की गतिकी ही नए मालों और इच्छाओं को पैदा करने की उसकी क्षमता पर आधारित है । बीसवीं सदी में पूंजीवाद को ऊर्जा ऐसे उत्पादों से मिली जिनकी जड़ें घरेलू स्त्री श्रम में थीं । नई नई चीजों को बाजार व्यवस्था के भीतर लाने की इस प्रक्रिया में मुद्रा अर्थतंत्र से बाहर के उपयोग मूल्यों को आकर्षक विक्रेय माल में बदलने से पहले उन्हें व्यापक सेवा तंत्र में शामिल किया जाता है । उदाहरण के लिए घर में भोजन बनाने का काम बाजार में सेवा के बतौर लाया गया और फिर डब्बाबंद भोजन के रूप में उसे माल बना दिया गया । उपयोग मूल्य को विनिमय मूल्य में बदलने की यह प्रक्रिया अंतहीन है । इसी प्रक्रिया में शिक्षा और बच्चों तथा बुजुर्गों की देखभाल का काम भी विनिमय मूल्य में बदल दिया गया है । सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण और सेना जैसे शुद्ध सरकारी काम में निजी क्षेत्र के आगमन से संकट के समय पूंजीवाद को जबर्दस्त मदद मिली है । ये प्रक्रियाएं नस्ल और लिंग संबंधी विभाजनों का पुनरुत्पादन करती हैं ।
कुल मिलाकर दिखाई दे रहा है कि संकट के समय पूंजी कीन्सीय अर्थशास्त्र की ओर नहीं झुक रही बल्कि उसने सेवाओं और सुविधाओं में कटौती का रास्ता अपनाया है । शासकों को चूंकि वंचितों के किसी आंदोलन की आशंका नहीं नजर आ रही इसलिए वे बाजार से वापस जाने के बारे में सोच भी नहीं रहे हैं । कटौती के भी अपने खतरे हैं लेकिन यह बात सर्वविदित है कि पूंजी जिस तरह संकटों को हल करती है उससे नए संकटों की राह खुल जाती है । संकट को हल करने का एक रास्ता युद्ध भी है क्योंकि उससे पूंजीवाद में नई जान आ जाती है लेकिन दुनिया भर में अमेरिका जितने युद्ध लड़ रहा है उनसे थोड़ा बहुत लाभ होने के बावजूद कोई गंभीर उत्साह नहीं पैदा हो रहा है । इसके मुकाबले मजदूर वर्ग और गरीबों के विरुद्ध युद्ध से ज्यादा लाभ हो रहा है ।
संकट से पार पाने के लिए कटौती का रास्ता अपनाने के चलते कुछ जगहों पर संघर्ष फूटे हैं लेकिन इनका स्वरूप स्थानीय और प्रतिक्रियामूलक रहा है । नई मुक्तिकामी राजनीति का खाका तैयार करने में ढेर सारी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है । लड़ाकू यूनियनों पर हमलों, रोजगार की पुनर्संरचना, काम की गति में तेजी, मजदूरी की घटोत्तरी और थोपी हुई बेरोजगारी ने मजदूर वर्ग में संगठन के हौसले को धक्का पहुंचाया है । सारी दुनिया में ट्रेड यूनियनों की सदस्यता में गिरावट आ रही है । रोजगार की अस्थिरता ने मजदूर वर्ग के जुझारूपन को नुकसान पहुंचाया है । मजदूरी में गिरावट के चलते अधिकाधिक लोग वित्तीय चक्र के भीतर खिंच आए हैं । व्यवस्था के भीतर ही निजी बेहतरी की उम्मीद ने सामूहिक सामाजिक बदलाव के सपने को पीछे धकेल दिया है । निजीकरण और उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत ने अधिकतर लोगों को कर्जदार बना दिया है । कर्ज पर घर ले लेने के राजनीतिक प्रभाव का कोई अध्ययन तो नहीं हुआ है लेकिन बैंक का कर्ज चुकाने के लिए नियमित आमदनी की चिंता ने लड़ाकूपन पर असर डाला जरूर है । यह सोच नई नहीं है कि अपना घर होने से मजदूर वर्ग के लड़ाकूपन में कमी आएगी और वे यथास्थिति के पक्ष में चले आएंगे । 1892 में कार्नेगी स्टील ने हड़ताल के समाधान के बतौर मजदूरी बढ़ाने के बदले घर खरीदने के लिए कर्ज दिया । देखादेखी अन्य उद्योगों ने भी यही तरीका अपनाया । वर्तमान दौर में घर खरीदने के लिए वित्तीय लेन देन में मजदूर वर्ग की घेरेबंदी बहुत अधिक हो चुकी है । ऐसा ब्रिटेन और अमेरिका दोनों जगहों पर बड़े पैमाने पर हुआ है । जमीन की कीमतों में अनाप शनाप बढ़ोत्तरी की एक वजह यह भी है । कर्मचारियों के रहने के लिए सरकारी आवास की जिम्मेदारी से सरकार मुकर गई और उनको गिराकर उन जगहों पर निजी आवास खड़े हो गए । दुनिया भर के शहर धन्नासेठों के लिए खेल के मैदान हो गए और सामूहिक गतिविधियों के केंद्रों का कायाकल्प हो गया । बेरोजगारी भत्ते से संगठक कार्यकर्ताओं को आंदोलन चलाने के दौरान भी खाने पीने की दिक्कत नहीं आती थी । कटौती के राज में ऐसे सभी स्रोत सूख गए हैं । निजीकरण के साथ ही स्वयं सहायता और निजी जिम्मेदारी की विचारधारा भी प्रचारित की गई । इन सबका प्रभाव अश्वेत मजदूरों पर सबसे अधिक पड़ा है । कार्यस्थल और रिहाइश के बीच दूरी तथा काम के घंटे बढ़ने के चलते मजदूरों के पास भी मनोनुकूल कामों के लिए फ़ुर्सत नहीं बची है ।
इन सबका यह मतलब नहीं कि इस दौर में प्रतिरोध समाप्त हो गया है । इसी दौर में इराक युद्ध के विरोध में सबसे बड़े प्रदर्शन हुए हैं । लेकिन समय समय पर फूट पड़ने वाले इन प्रदर्शनों से आगे बढ़कर इन्हें टिकाने वाले दीर्घकालीन और सुसंगत आंदोलन नजर नहीं आ रहे हैं । इस दौर के प्रतिरोध नानारूपी हैं । इस दौर के आंदोलनकारियों ने सामाजिक न्याय के साथ पर्यावरणिक न्याय को भी जोड़ा है और राज्य, नौकरशाही तथा सामाजिक बंधनों से व्यक्ति की मुक्ति का भी साथ दिया है । असल में तो व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता के नारे को नवउदारवाद ने उपभोक्ता द्वारा चुनाव की निजी स्वतंत्रता में बदल दिया है । इसी अर्थ में कुछ लोग बाजार को मुक्ति का साधन बताते हैं कि समाज द्वारा समरूपीकरण के दबाव का मुकाबला करने के लिए वह ग्राहक को वस्तुओं का वैविध्य उपलब्ध कराता है । नवउदारवाद और साठ के दशक के नव वामपंथी विद्रोह के बीच कुछ मेलजोल भी बन गया है । नैन्सी फ़्रेजर का कहना है कि साठ के दशक के नारीवादी आंदोलन ने स्त्रियों के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया लेकिन 1970 दशक में इसने नव उदारवाद को मदद भी दी । मजदूरी में गिरावट के चलते एक व्यक्ति के वेतन से घर चलना जब मुश्किल हो गया तो स्त्रियों का काम करना मजबूरी हो गई । उन्हें ज्यादातर कम मजदूरी वाले सेवा क्षेत्र में काम मिले । नारीवाद ने रोजगार के बाजार में स्त्री के आगमन का पक्ष लिया और इस तरह बाजार में प्रवेश के सहारे मुक्ति के भ्रम को सींचा । सही है कि स्त्री को इससे एक नए तरह की ताकत मिली । घर पर किए जाने वाले काम की कोई पगार नहीं होती थी । साथ ही उस काम में सामूहिकता नहीं थी । लेकिन उसकी इस नई ताकत को पूंजीवाद विरोधी मुहावरे में सूत्रबद्ध नहीं किया जा सका और इस प्रक्रिया में बाजार से बाहर के श्रम को शोषण के चक्र में लाकर पूंजीवाद को ताकत मिली ।
1970 दशक में जब राजनीति में दक्षिणपंथ का दबदबा बढ़ा तो उसी समय बौद्धिक वाम हलकों में उत्तर आधुनिकता का चलन हुआ । इसने वर्ग राजनीति और मजदूर वर्ग के प्रति अरुचि को बढ़ावा दिया । बाद के दशकों में इसका बौद्धिक प्रभाव सर्वव्यापी रहा । इसके उभार का बड़ा कारण पश्चिमी विश्वविद्यालयों का नवउदारवादी तर्क प्रक्रिया का शिकार हो जाना है । इसके जरिए क्रांतिकारी वाम की पराजय की अभिव्यक्ति हुई और इसके साथ ही उपभोक्तावादी स्वाधीनता भी जाहिर हुई । भारी सदस्यता वाले संगठनों के खात्मे के समय उत्तर आधुनिकता चरम पर थी । पुराने संगठनों की जगह पर गैर सरकारी नए संगठन बने जिनकी आय का स्रोत सदस्यों का चंदा नहीं बल्कि कुछ धनी मानी लोगों और संस्थाओं की खैरात था । इन संगठनों का असर वामपंथी कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा । वर्ल्ड सोशल फ़ोरम भी आंदोलनों का नहीं, इन्हीं संगठनों का जमावड़ा था । इसका प्रभाव विरोध जाहिर करने के तरीकों पर भी पड़ा । इस समय वामपंथ या तो केवल वर्तमान में रहता है या केवल अतीत में । पिछले तीन दशकों के नवउदारवादी माहौल ने बाजार की कीमियागिरी के सहारे आत्मविकास की जो विचारधारा पैदा की उसने पूंजीवाद के विनाश की कल्पना को नुकसान पहुंचाया है । दूसरी ओर वर्तमान का विकल्प तलाशते हुए कल्याणकारी राज्य के सुखद अतीत की शरण ले ली जाती है । वामपंथ की पराजय से उत्पन्न वर्तमान निराशा और अतीतमोह से मुक्त होकर आगे की ओर देखना आसान नहीं है ।
हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब पूंजीवाद तो संकट में है ही प्रकृति की हालत भी बेहद बुरी है । उम्मीद की जा सकती है कि टुकड़ों में सुधार की बजाए यह संकट महात्वाकांक्षी कल्पना के लिए प्रेरणा दे ।  मानवीय चेहरे वाले पूंजीवाद या अतीत के स्वर्ण युग की चाह के मुकाबले कोई बड़ा सपना बुना जा सके । चतुर्दिक व्याप्त हताशा के वातावरण में क्षीण आशा का जागरण अप्रत्याशित नहीं है फिर भी इसका विरोध करना होगा । टुकड़ों में बदलाव की लड़ाई हताशा का उत्तर नहीं बल्कि इसका महिमामंडन है । व्यक्तिगत स्तर पर लोग यदि नैतिक आधार पर वैकल्पिक जीवन शैली चुनते हैं तो इसकी प्रशंसा ही करनी होगी । पूंजीवाद के प्रतिरोध की संस्कृति का निर्माण अच्छी बात है लेकिन ऐसी परियोजनाओं को साध्य नहीं बनाना चाहिए । सामाजिक रूपांतरण का बड़ा सपना जितना ही कमजोर होगा उतना ही छोटे बदलावों का नैतिक आग्रह बढ़ेगा । जब दुनिया के मजदूरों ने पुरानी दुनिया के खोल में नई दुनिया बनाने का आवाहन किया था तो इसे वे व्यापक क्रांतिकारी रूपांतरण समझते थे उपभोक्ता का व्यक्तिगत चुनाव नहीं मानते थे । छोटे स्तर के बदलाव पूंजी और श्रम के बीच के सामाजिक संबंधों के लिए चुनौती नहीं पेश करते हैं । लघु और स्थानीय के प्रति यह अनुराग मध्यवर्गीय रूमान है ।

पूरी दुनिया में आमूल क्रांतिकारी सपना अवकाश, समता, बंधुत्व और शांति पर ही आधारित रहा है और उसका सबसे बड़ा लक्ष्य निजी संपत्ति का उन्मूलन और संपदा का पुनर्वितरण माना गया है । जिन सपनों का दुखद अंत हुआ उनकी समीक्षा होनी चाहिए लेकिन यह मानना मुश्किल है कि व्यापक रूपांतरण वाली क्रांति ही काम की नहीं रही । मुक्तिकारी समाजवाद का स्वप्न आज भी प्रासंगिक है । सामाजिक व्यवस्था के रूप में पूंजीवाद की समझदारी के लिए मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र कारगर हथियार है । प्रथम इंटरनेशनल के बिखराव से पहले का समाजवादी विचार इक्कीसवीं सदी के पूंजीवाद विरोधी वामपंथ के लिए प्रेरणास्रोत है । किसी भी विश्वसनीय पूंजीवाद विरोधी परियोजना के केंद्र में निजी संपदा की जगह पर सार्वजनिक प्राचुर्य का विचार रहेगा । इस पर अमल करने से जो शहर पर्यावरणिक प्रदूषण के स्रोत बने हुए हैं वे ही टिकाऊ पारिस्थितिकी का केंद्र हो जाएंगे । भौतिक और मानसिक श्रम के बीच विभाजन को खत्म करना भी इस सपने का अंग रहेगा । शहर और देहात के बीच तथा प्रकृति और मनुष्य के बीच संबंधों का पुनर्संयोजन भी आवश्यक होगा । इसी तरक काम और अवकाश के बीच भी नया रिश्ता कल्पित करना होगा । पूंजीवाद तो अपने तईं और भी कठिन तथा अस्थिर दिनों में प्रवेश करेगा । उसके विक्षुब्धों को अपने सामूहिक भविष्य का फैसला खुद करने की क्षमता अर्जित करनी होगी ।                          

Saturday, April 8, 2017

हिंदी आलोचना की चिंता

             
                                  
अवधेश कुमार सिंह लिखितसमकालीन आलोचना विमर्शका प्रकाशन वाणी प्रकाशन से 2016 में हुआ है तमाम तरह की छपाई की गलतियों और वाक्य विन्यास की उलझनों के बावजूद किताब की सबसे बड़ी खूबी खास तरह का सरोकार है । इस सरोकार को किताब के लिए लिखी भूमिका में पहचानते हुए नामवर सिंह ने लिखा है ‘---इसमें हिन्दी आलोचना को संस्कृत तथा अंग्रेजी परम्पराओं के परिप्रेक्ष्य में देखने के साथ समकालीन आलोचना के मुख्य सरोकारों की साफगोई से चर्चा की गई है तथा तुलनात्मक अध्ययन के प्रारूपों को भी सुझाया गया है । सच यह भी है कि किसी भी आलोचना-परम्परा को केवल उसके अन्दर सिमटकर समझना उस परम्परा तथा आलोचक दोनों के लिए घातक होता है ।नामवर सिंह को समर्पित इस किताब के मर्म को उन्होंने बेहद कम शब्दों में अच्छी तरह से व्यक्त कर दिया है ।
चूंकि यह किताब अलग अलग समय पर लिखे लेखों का संकलन है इसलिए सभी लेखों में विषय की एकता समान ढंग से व्यक्त नहीं हुई है । इसके अतिरिक्त कुछ लेख हिंदी में तो लिखे गए हैं लेकिन कुछ अंग्रेजी में लिखे गए थे जिनका लेखक ने ही हिंदी अनुवाद किया है । दोनों भाषाओं की वाक्य रचना में भेद होने के कारण भी पाठक को कई बार पूरी पुस्तक में एकसूत्रता नहीं महसूस होती । विषय की प्रस्तुति संबंधी इन समस्याओं के बावजूद लेखक का सरोकार इतना गहरा है कि किताब अपनी चिंता संप्रेषित कर ले जाती है । इस सरोकार को संक्षेप में लेखक ने किंचित अतिरिक्त आत्मविश्वास के साथ किताब के आवरण पर एक तरह के आरोप की शैली में व्यक्त किया है । उनके अनुसार ‘---भारत---न केवल पश्चिमी आलोचना-सिद्धांतों या वादों का मात्र-उपभोक्ता बन गया है बल्कि आलोचनात्मक प्रस्तावों को सिद्धांत की तरह आँख मूँदकर स्वीकार कर लेता है ।इस आरोप में अतिरेक अकेले इस तथ्य से भी साबित होता है कि भारत की भाषिक समृद्धि थोड़ी अधिक है और सभी भारतीय भाषाओं की बात छोड़िए हिन्दी का भी चिन्तन बहुत कम अनूदित है । आचार्य शुक्ल की आलोचना से लेकर रामविलास शर्मा तक के लेखन का अवगाहन लेखक को आश्वस्त कर सकता है कि उनकी चिन्ता असल में इसी परम्परा से उद्भूत है ।   
लेखक की मूल चिंता वस्तुत: आधुनिक हिंदी आलोचना द्वारा परंपरा के साथ संवाद की प्रक्रिया की जटिलता को समझना है । इसके लिए लेखक ने परंपरा का प्रवाह समझने के लिए एक प्रारूप बनाया है जिसके अनुसार यह आविर्भाव, प्रवाह, अन्तर्भाव, लोप और प्रादुर्भाव की स्थितियों से गुजरती है (पृ.19) । इसी प्रारूप के अनुसार उन्होंने आधुनिक हिंदी आलोचना में संस्कृत काव्यशास्त्र की प्राचीन धारा के प्रादुर्भाव को देखा है । यह प्रारूप केवल भारतीय स्थिति के लिए नहीं बल्कि दुनिया की किसी भी आधुनिक भाषा पर लागू हो सकता है तो सवाल यह है कि भारत की विशिष्टता को कैसे व्याख्यायित किया जाए । लेखक ने शायद इस जटिलता को महसूस करते हुए ही थोड़ा उलझे हुए इस वाक्य में कुछ कहने की कोशिश की हैभारतीय आलोचना का इतिहास सभी भारतीय भाषाओं की आलोचना क्रमिक या चक्रीय या मिश्रित है, पर किसी भी आलोचना परम्परा पर अन्य भाषाओं में लिखे विमर्श को व्यवस्थित ढंग से ध्यान में लिए बगैर उसकी सही छवि या समझ नहीं उभरेगी ।’ (पृ 45) निवेदन है कि इस किस्म के सूत्रीकरण लेखक की चिन्ता को सही तरीके से व्यक्त नहीं होने देते । 
हिन्दी या भारत की विशेषता को पहचानने की कोई कुंजी मुहैया कराने की बजाए लेखक पहले संस्कृत और उसके बाद हिन्दी आलोचना के इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं । इस रूपरेखा में ठीक ही उन्होंने हिन्दी आलोचना की दो प्रवृत्तियों को अलगाया है । लिखते हैंबीसवीं सदी की शुरुआत के आसपास दो प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं: एक का झुकाव संस्कृत आलोचना की शास्त्रपद्धति के अनुसरण की ओर था तो दूसरे का उस शास्त्रपद्धति से मुक्ति पर ।’ (पृ 37) आचार्य शुक्ल के आगमन के साथ आलोचना न केवल परिपक्व हुई वरन उसने इस परम्परा के साथ रचनात्मक संवाद बनाया । इसके बाद द्विवेदी जी तथा नन्द दुलारे वाजपेयी से होते हुए नगेन्द्र तक की आलोचना की यात्रा का विवरण देने के बाद नामवर सिंह का जिक्र अभीभूत भाव के साथ शुरू होता हैवह हिन्दी के एकमात्र आलोचक हैं जिन्होंने भारतीय सांस्कृतिक अनुभव तथा साहित्यिक अभिव्यक्ति को सामाजिक सन्दर्भ में देखा तथा पश्चिमी सिद्धांतों का भारतीय सन्दर्भ में विवेचन किया ।आशा ही की जा सकती है कि नामवर सिंह भी इस मूल्यांकन से सहमत न होंगे । न भूतो न भविष्यति की इस भाषा का विकास हिंदी जगत की ताजा परिघटना है और इतिहास में झटपट शामिल हो जाने की वैश्विक बेचैनी का विकृत प्रतिबिम्ब है । हिंदी का अपना स्वभाव रामविलास शर्मा की वह विनम्रता है जिसमें वे भाषा संबंधी अपनी गवेषणा का श्रेय किशोरीदास बाजपेयी को देते हैं ।
किताब हिन्दी आलोचना के समक्ष यह कार्यभार प्रस्तुत करती है कि वह आलोचना की अत्याधुनिक पश्चिमी सरणियों से आतंकित होने की जगह उसका उत्तर परम्परा का रचनात्मक नवीकरण करके दे और इस क्रम में इन सरणियों से हासिल अंतर्दृष्टि का निवेश करे ताकि उसकी प्रामाणिकता बनी रहे ।
           

  

Monday, April 3, 2017

माध्यम से संदेश की ओर

                                
                                      
2016 में विकासशील समाज अध्ययन पीठ और वाणी प्रकाशन की ओर से प्रकाशित रविकान्त की किताबमीडिया की भाषा-लीलाअनेक कारणों से महत्वपूर्ण किताब है साहित्य की आत्ममुग्ध दुनिया के बाहर बहुतेरे लोग बेहद ईमानदारी के साथ साहित्येतर सवालों पर लगातार गंभीर लेखन कर रहे हैं दुर्भाग्य से पुरस्कार प्रेमी हिन्दी की साहित्यिक दुनिया में छाए दूर (या निकट) दृष्टि दोष के चलते उनके प्रकाशन पर ध्यान भी नहीं जाता अगर निगाह पड़ भी गई तो आलोचना की जगह निन्दा या प्रशंसा रसिक समाज में उसके विश्लेषण की भाषा और क्षमता मिलना मुश्किल हो गया है अगर कूपमंडूकता से बाहर निकलकर देखा जाए तो विकासशील समाज अध्ययन पीठ एक महत्वपूर्ण बौद्धिक केंद्र के बतौर विचार की जगह है और उसे बौद्धिक दुनिया में पारम्परिक समाज वैज्ञानिक अध्ययन पद्धति से भिन्न रास्ता प्रस्तावित करने का श्रेय दिया जाना चाहिए उसने यथार्थ को देखने के लिए आभासी को माध्यम बनाने और उसके विश्लेषण के जरिए जमीनी सचाई को परखने के उपकरण विकसित करने की कोशिश की है लेखक का उस संस्था से जुड़ाव केवल प्रकाशन में सहयोग के नाते ही नहीं है बल्कि उन्होंने फ़िल्म जैसे लोकप्रिय माध्यम पर लम्बे दिनों से जारी शोध के जरिए भारत के समाज और इतिहास के कुछ संवेदनशील आयामों को उजागर किया है किताब में शामिल लेख विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं लेकिन उनके एक जगह कुछ बदलावों के साथ इकट्ठा हो जाने से ये लेख एक मुकम्मल तर्क के विभिन्न कोण प्रतीत होते हैं
खुद लेखक का कहना है कि अलग अलग मौकों पर लिखे इन लेखों को आपस में जोड़ने का कामभाषा के तारने किया है । इस मोर्चे पर यह किताब हाल फिलहाल हिन्दी में छपी ढेर सारी किताबों से पूरी तरह से अलग है । बहुत दिनों के बाद हिन्दी में कोई किताब ऐसी दिखाई पड़ी जिसमें बिना किसी संकोच के गाढ़ी उर्दू का प्रयोग किया गया है और ऐसे शब्दों का अर्थ बताने के लिए पाद टिप्पणी भी नहीं लिखी गई है । इसका एक कारण तो यह है कि लेखक के शोध और अध्ययन का क्षेत्र फ़िल्म जगत रहा है जिसमें लगभग सारा काम मुश्तरका जबान में होता है । शैली के स्तर पर भी इस किताब का एक नयापन यह है कि विश्लेषण से निजी अनुभव संसार को अलगाया नहीं गया है । भूमिका में उल्लिखित संस्मरण की झांकी में किताब में प्रयुक्त इस भाषा की एक और वजह बताई गई है । लेखक का बचपन बिहार के ऐसे गांव में गुजरा है जहां उत्सव और त्यौहार हिन्दू और मुस्लमान नहीं हुआ करते थे । इस वजह से हमारे सामने भारतीय उप महाद्वीप की सामासिक संस्कृति की वह दुनिया उद्घाटित होती है जिसे मटियामेट करने की भरपूर कोशिश जारी है । इस भाषा के स्रोत के रूप में लेखक नेस्मृतियों के उस संस्कारका जिक्र किया हैजिसमें मौखिक संस्कृति के खाँटी लोकगीतों से लेकर सांस्कृतिक उपादानों के आधुनिक पुनरुत्पादन के माध्यमों का बराबर का दखल है। इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि इतने विराट सांस्कृतिक भंडार से रस ग्रहण करके रविकान्त ने जो भाषा अर्जित की है उसे निभाना बहुत आसान नहीं है । विवेच्य विषय की नवीनता और विश्लेषण की रोचकता को छोड़ दें तो केवल भाषाई समृद्धि के लिए भी इस किताब को पढ़ना सुखद अनुभव है ।
माध्यमों की रोचक मौजूदगी किताब की छपाई में भी प्रतिबिम्बित है । कवर से लेकर प्रत्येक अध्याय और लगभग प्रत्येक पृष्ठ पर चाक्षुष माध्यम की सभी संभावनाओं को चूसकर किताब को केवल शब्द के जरिए अर्थ संप्रेषण से आगे जाकर चित्रों को भी पाठ में बदल दिया गया है । शैली, भाषा, विषय और प्रस्तुति की नवीनता इस किताब को विशेष बनाती है । पुराने फ़िल्मी पोस्टरों, विज्ञापनों और कार्टूनों से लबरेज इस किताब का दस्तावेजी महत्व भी है । लेखक के इतिहासकार होने से उसमें प्रामाणिक सामग्री के संग्रह और प्रस्तुति का एक अतिरिक्त आयाम जुड़ गया है । यह सामग्री केवल अभिलेखागारों से नहीं बल्कि दैनन्दिन से भी जुटाई गई है । उदाहरण के लिए लेखक के गाँव में मुहर्रम का ताजिया ज्यादातर हिदू उठाते हैं और कभी कभी दुर्गापूजा और मुहर्रम एक साथ पड़ने की स्थिति में ताजिया और दुर्गा की मूर्ति एक साथ दिखाई पड़ती है । ऐसे मौके की तस्वीर को किताब में जगह देकर लेखक ने दैनन्दिन से फ़िल्म तक फैली हुई साझा जीवन की तस्वीरों का पुख्ता प्रमाण दे दिया है ।
मीडिया के बारे में रविकान्त की समझ में उसकी समग्र जटिलता की झाँकी मिलती है । वे लिखते हैं ‘—छापाखाना, सिने-तकनीक, रेडियो, टीवी जैसे पुराने माध्यमों से लेकर इंटरनेट और मोबाइल सहित नवसंचार के डिजिटल औजारों के उत्पादन और इस्तेमाल की प्रकृति में भारी अंतर है । यह अंतर हमारी इंद्रियों पर उनसे पड़ने वाले असरात से तो तय होता ही है, माध्यमों पर क़ब्ज़े या नियंत्रण से भी---इन माध्यमों की खास बात उनका अलग अलग होना ही नहीं है, उनमें जबर्दस्त आपसदारी भी होती है । एक दूसरे को ये बदलते और प्रभावित करते रहते हैं । कलाओं के मामले में आर्नल्ड हाउजर ने फ़िल्म की विशेषता पर ध्यान दिया था । हमने पहले ही जिक्र किया है कि लेखक फ़िल्म की दुनिया पर विशेष ध्यान देते हैं क्योंकि अंतरमाध्यमता के अतिरिक्त फ़िल्म आधुनिक जीवन की सबसे लोकप्रिय विधा रही है । इसके चलते लेखक को अनेकानेक परिघटनाओं पर विचार करने का मौका मिलता है । उदाहरण के लिए वी शांताराम की फ़िल्म ‘तीन बत्ती चार रास्ता’ में भाषा के सवाल पर चलने वाली बहस को संवाद उद्धृत करके रोचक तरीके से पेश किया गया है । इसमें रेलवे स्टेशन के लिए ‘वाष्परथ विश्रामस्थान’ जैसी बनावटी हिन्दी का प्रतिकार करते हुए नयिका कहती है ‘जब रेलवे ही को अपना लिया तो उसका शब्द अपना लेने में क्या पाप है ?’ इससे जनजीवन को भाषा के मूल के रूप में समझने की खिड़की भी खुलती है । लेखक का कहना है कि ‘फ़िल्मी भाषा पर किसी एक नाम की दावेदारी करना उसके संप्रेषण-धर्म की मौलिकता और प्राथमिकता को समझने से इंकार करना है ।’
भाषा के ही सवाल पर उनका पहला ही लेख दो दावों से शुरू होता हैएक तो ये कि हम सब कमोबेश बहुभाषी हैं ।---दूसरी, और भी सामान्य बात, भाषाओं से हमारा रिश्ता एक साथ परम वैयक्तिक होता है तो चरम सामाजिक भी ।इस रिश्ते की जटिलता को दूसरे लेख में व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखाऐतिहासिक तौर पर फ़िल्म उद्योग के लिएहिंदीविशेषण पर सर्वसम्मति न होने की वजह से भीबंबई फ़िल्म उद्योगचल पड़ा, और अबबालीवुडचल निकला है, और अगर तमाम तरह के सबूत और गवाहों के बयानात के बावजूद फ़िल्म एनसाइक्लोपीडिया में अगर सिर्फ़ पाँच फ़िल्मेंउर्दूकी औपचारिक कोटि में आ पायीं, यदि मुग़ल--आज़म के निर्माता-निर्देशक ने सेंसर बोर्ड से हिंदी नाम का सर्टिफ़िकेट हासिल करना उचित समझा, तो यह आज़ादी/बँटवारे के बाद के माहौल के एक त्रासद सामाजिक तथ्य के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें भाषा-विशेष को उसका अपना नाम देना न तो मुमकिन समझा गया, न मुफ़ीद ।लेखक ने भारत विभाजन की त्रासदी को इस भाषाई वर्चस्व का परिणाम माना है । उनका यह पाठ कुछ हद तक अतिवादी लग सकता है लेकिन हिंदी-उर्दू की आपसी लड़ाई की निर्मम तस्वीर जरूर खींचता है । माध्यमों और संकेतों से सामाजिक यथार्थ की पैदाइश मानने की अध्ययन पद्धति के खतरे भी ये ही हैं कि वह परिघटनाओं की जटिलता की व्याख्या के बहाने शेष कारकों को अनदेखा करती है । इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि समाजार्थिक व्याख्या में कुछ अनदेखे कारकों को तो यह जोड़ती है लेकिन अगर इस पर जरूरत से अधिक भरोसा किया जाएगा तो एक दूसरी अति के पैदा होने की संभावना होती है ।
इस पद्धति का सकारात्मक इस्तेमाल लेखक ने ओम प्रकाश निर्देशित हास्य फ़िल्म चाचा ज़िंदाबाद की कास्टिंग के संदर्भ में किया है । इसे पढ़ने का तरीका वास्तव में फ़िल्म की भाषा पर उनके अधिकार का प्रमाण है । लिखते हैंतो कास्टिंग के पसेमंज़र में पर्दे पर इन (भारत के) राज्यों के टुकड़े तैरते हुए आते हैं, और अपनी जगह पर बैठ जाते हैं । नक़्शा जब पूरा हो जाता है तो हमें अविभाजित भारत दीखता है, लेकिन दो सीमाएँ साफ़ हैं: राज्यों को एक दूसरे से अलग करती पतली सरहदें जो जल्द ही एक-दूसरे में घुलमिल जाती हैं, लेकिन दूसरी मोटी सीमा-रेखाएँ जो भारत को पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान से अलग करती हैं, वे ख़ास तौर पर नुमायाँ हो जाती हैं । कास्टिंग चल ही रही है, निर्देशक का नाम भी उसी तरह उड़कर आता है, और तीन हिस्सों में बँट जाता है: “ओमहिंदुस्तान में रह जाता है, “पर” (जिसे आप रोमन मेंपारपढ़ने से ख़ुद को रोक नहीं पाते) पश्चिमी पाकिस्तान चला जाता है, “काशपूर्वी पाकिस्तान में जा चिपकता है ।इस पूरे दृश्य की व्याख्या भी सुनने लायक हैकितनी सारगर्भित बातें हैं, क्या कलात्मक अभिव्यक्ति है: एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा ! ज़ाहिर है कि विभाजन की याद ताज़ा है, लेकिन उसको लेकर हँसा भी जा सकता है और हँसकर सीखा भी जा सकता है ।
ऊपर हमने हिंदी-उर्दू के बारे में बात की थी । फ़िल्मों के सहारे उसी सवाल को आगे ले जाते हुए रविकान्त ने तीन देवियाँ  फ़िल्म का जिक्र किया है । फ़िल्म में एक कवि सम्मेलन होता है जिसमें गाढ़ी उर्दू और संस्कृत निष्ठ हिंदी के कवियों के अबूझ काव्यपाठ के बाद नायक कविता पढ़ने आता है । कविता सुनाने से पहले का उसका वक्तव्य मानो भाषा के इन ध्रुवांतों के बीच का आदर्श रास्ता हैदोस्तो, मैं न कोई उर्दूदाँ हूँ, न संस्कृत का कोई विद्वान, मौजूदा ज़माने की सीधी-सादी बोली जो लाखों-करोड़ों की समझ में आ जाए वही मेरी ज़ुबान है, जो लाखों-करोड़ों लोगों को भा जाए वही मेरी कविता है ।बात केवल लोकप्रियता की नहीं है वरना इसके ठीक बाद यह कहने की क्या जरूरतमेरा दिल न हिंदू है न मुसलमान है, न सिख न ईसाई, मेरा दिल इंसान है, मेरा दिल हिंदुस्तान है ।स्पष्ट है कि हिंदी को हिंदू और उर्दू को मुसलमान के साथ जोड़ा जा रहा था जो धीरे धीरे सहज बोध का अंग बनता चला गया है ।
इस सिलसिले में किताब में पाँचवें लेख के बतौर संकलित लेख की चर्चा जरूरी है जिसमें सिनेमा, भाषा और रेडियो के आपसी रिश्तों की बात की गई है । किताब में अनेक बार इस तथ्य का उल्लेख हुआ है कि रेडियो ने शुरू में फ़िल्मी गीतों से परहेज किया था । रेडियो और सिनेमा के बारे में यह कि सिनेमा की ही तरह रेडियो सिर्फ़ राष्ट्र के भूगोल में नहीं गूँजता । ज़ाहिर है कि राष्ट्र को लेकर जो लड़ाइयाँ हो रही हैं, वह इसकी राजनीति को सूचित कर रही हैं, प्रभावित कर रही हैं, लेकिन उसकी आवाज़ें मीडियम और शार्ट वेव के ज़रिए उन लोगों तक भी जा रही हैं, जो शायद उसके वांछितया अधिकृतश्रोता नहीं हैं, या जिन्हें राष्ट्र अपनी लाइनें खींचकर अलग काटना चाहता है ।रेडियो की इस व्यापकता के कारण ही उस पर क़ब्ज़े की लड़ाई---पिछली सदी के तीसरे-चौथे दशक में शुरू हो गई थी ।इस क्रम में जहां ‘अविभाजित उत्तर भारत में रेडियो प्रसारण की सर्वप्रमुख भाषा हिंदुस्तानी ही कही जाती थी, जिसमें समाचार, वार्ताएँ व दूसरी प्रस्तुतियाँ होती थीं । जब पाँचवें दशक में झगड़ा बढ़ा तो हिंदी और उर्दू बुलेटिनें अलग कर दी गईं । और आज़ादी के बाद तो हिंदुस्तानी नाम से ही सदा के लिए छुट्टी पा ली गई ।’ लड़ाई केवल रेडियो के लिए नहीं हो रही थी इसका सबूत यह है कि साहिर लुधियानवी जब कहते हैं कि ‘हिंदी फ़िल्मों की भाषा 97% उर्दू है---तो इस पर माधुरी नामक फ़िल्म पत्रिका उनके पीछे ही पड़ जाती है ।’ रेडियो पर कब्जा हो जाने के बावजूद फ़िल्मों में यह भाषा फलती फूलती रही ।
विडम्बना के रूप में ही इसे देखना होगा कि युसुफ़ खान को दिलीप कुमार तो बनना पड़ा लेकिन देविका रानी ने उनसे जानना चाहा कि उन्हें उर्दू आती तो है ! इसी तरह लता मंगेशकर को जब फ़िल्मों में जाना हुआ तो उन्होंने ‘बाक़ायदा एक उस्ताद रखकर उर्दू सीखी थी’ । लेखक ने इसे केवल भाषा का मामला मानकर देखने के मुकाबले हिंदी के शुद्धतावाद को परखने की कोशिश की है । लिखा है ‘सिर्फ़ भाषा की दिक़्क़तें नहीं हैं, रोज़गार की तो हैं ही, एक वृहत्तर, संस्कार की भी दिक़्क़त है, जो उस राजनीति में शुमार हैं, जो राष्ट्र की परिकल्पना में शुमार हैं, जिसके तहत हम अपने समाज को बनाना चाहते थे, और जिसका एक मौक़ा आज़ादी के बाद “अपनी सरकार” के आने पर मिलता है ।’ यह द्वंद्व केवल उर्दू तक ही सीमित नहीं था । इसमें ‘लोकप्रिय’ की भी समाई नहीं थी । उदाहरण यह है कि रेडियो में हारमोनियम की आमद भी बहुत बाद में हुई क्योंकि वह विदेशी बाजा था । फ़िल्मी गाने चलाने की मनाही के चलते राजस्व का नुकसान होता रहा । उसकी लोकप्रियता का लाभ रेडियो सीलोन ने उठाया ।  
किताब के इस मूलभूत ढाँचे के आसपास कुछेक ऐसे लेख भी हैं जो अन्य पहलुओं की प्रधानता के बावजूद मुख्य विषय से चिपके हुए हैं । ऐसे लेखों में हम मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास कसप पर लिखे लेख और माधुरी नामक पत्रिका पर लिखे लेख को गिन सकते हैं । ये लेख भी माधुरी के फ़िल्म से जुड़े होने के चलते और जोशी जी के भी मीडिया से जुड़ाव के चलते किताब को समृद्ध ही करते हैं । यह बात जरूर खलती है कि बेहद पठनीय यह किताब लगभग नौ सौ रुपए की है । लोकप्रिय की वकालत करने वाली किताब का पुस्तकालय में कैद रह जाना हमारे समय की विडम्बना का एक और रूप है । हिंदी की प्रतिष्ठा की प्रक्रिया की निर्ममता को उजागर करने के बावजूद इस तथ्य का भी विश्लेषण आवश्यक है कि हिंदी के पक्ष में कामिल बुल्के जैसे लोग कैसे खड़े हुए । हिंदी भाषी समाज की जिम्मेदारी के अतिरिक्त औपनिवेशिक प्रभुओं की भूमिका की परीक्षा भी अपेक्षित थी । किताब की भाषा अपने आपमें स्वतंत्र चर्चा की माँग करती है । इसका खिलंदड़ापन जोशी जी की ही कोटि का है लेकिन उपन्यास और विश्लेषणात्मक गद्य में अंतर होता है । आर्नल्ड हाउजर के रूपक का सहारा लें तो खिड़की की उपयोगिता बाहर का दृश्य दिखाने में होती है । कहीं कहीं भाषा इतनी मोहक हो गई है कि बात के मुकाबले बात का ढंग अधिक रमा लेता है ।