Thursday, February 23, 2017

मार्क्सवाद के कुछ नए क्षेत्र

                    
                                         
पिछली सदी में मार्क्सवाद के खात्मे के शोर की समाप्ति के बाद नई सदी के आरम्भ में ही कुछ नए लेखकों ने मार्क्सवाद संबंधी सोच विचार के नए क्षेत्र खोल दिए इनमें एक क्षेत्र मार्क्स के लेखन को नए संदर्भों में समझने की दिशा में कोशिशों का था इस नए उभार के सिलसिले में ध्यान देने की बात यह है कि सोवियत संघ के बिखराव से इन चिंतकों ने ऊर्जा ग्रहण की उनका कहना था कि नई पीढ़ी पर पुरानी समस्याओं का बोझ नहीं है वे नए हालात को नई समझ के साथ व्याख्यायित करेंगे और नए दौर के सवालों को हल करने के लिए अपने समय की ताकतों पर भरोसा करेंगे स्वाभाविक है कि इसके लिए उन्हें राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में आने वाले बदलावों का केवल संज्ञान लेना पड़ रहा है बल्कि नए आंदोलनों के मुद्दों की पहचान भी करनी पड़ रही है
नये दौर में मार्क्सवाद के अध्ययन के सिलसिले में जो नयी बातें हुई हैं उनमें एंडी और राब लुकास ने अप्रैल 2005 में एक पहल की है जिसमेंमार्क्स: मिथ्स ऐंड लीजेंड्स’  नाम से लेखमाला शुरू हुई है । उनका कहना है कि मार्क्स के लेखन को पिछले डेढ़ सौ सालों में जितने मिथकों का शिकार होना पड़ा है उतना किसी भी अन्य विचारक के साथ नहीं हुआ है इसलिए उनके आलोचनात्मक अध्ययन के लिए इनकी सफाई जरूरी है । वैसे तो इसमें ज्यादा मुश्किल नहीं है क्योंकि उनका समस्त लेखन उपलब्ध है लेकिन इसकी इच्छा बहुतेरे लोगों को नहीं होती । असल में इन मिथकों के निर्माण का कारण उनकी अपार सफलता है । उनका नाम बीसवीं सदी को न केवल बदलने बल्कि परिभाषित करने वाले युगांतरकारी आंदोलन का पर्याय बन गया । कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को उनके प्रति निष्ठा सिद्ध करनी पड़ती जबकि उनके विरोधी सभी तरह की नफरत भरी चीजों के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराते । उनके लेखन की व्याख्या अनिवार्य रूप से राजनीतिक होती, निस्संग अध्ययन संभव नहीं रह गया । कहने का मतलब यह नहीं कि आंदोलनों ने उनकी तथाकथित शुद्धता को दूषित कर दिया, न ही किसी सहीमार्क्स को उनकी विरासत का दावा करने वाले बीसवीं सदी के संघर्षों के बरक्स खड़ा कर दिया जाय । विकृतियों की सफाई के नाम पर किसी एकाश्मी मार्क्स को इतिहास की धूल धक्कड़ से बचाकर मार्क्सवादसे पूरी तरह से अलगाना ठीक नहीं होगा । फिर भी उनके लेखन और इतिहास पर ध्यान देने से ढेर सारी चीजों पर भ्रम दूर हो सकते हैं । मार्क्स के बारे में जिन मिथकों का निर्माण हुआ है वे दो तरह के हैं । एक तो वे जिनका प्रचार समाजवाद के विरोधियों ने दुर्भावनापूर्वक किया । दूसरे वे जिनका निर्माण उनके अनुयायियों ने किया । इनका निर्माण अनेक ऐतिहासिक कारकों के चलते हुआ और इसकी जिम्मेदारी तय करना जटिल काम है । कुछ मिथ इन दोनों में साझा भी हैं । इससे जुड़ा हुआ खंड उन मिथकों का है जो मार्क्स को राजकीय समाजवादका निर्माता ठहराते हैं । विरोधियों द्वारा प्रचारित मिथकों का बड़ा हिस्सा उनके चरित्र हनन के मकसद से जुड़ा हुआ है इसलिए इनका दूसरा खंड मार्क्स के चरित्रसे जुड़े मिथकों का है । इसके तहत उन्हें महत्वोन्मादी, मरखाहा, यहूदी-विरोधी और नस्लवादी, घमंडी, स्त्रीलोभी, उबाऊ लेखक और दूसरों के लिखे की नकल मारनेवाला साबित किया गया । उनके बारे में बने मिथकों के खंडन के लिए ध्यान से तथ्यों को देखना होगा । असल में मार्क्स के विचारों का निर्माण जिन संदर्भों में हुआ उनसे पूरी तरह भिन्न संदर्भों में उनका अभिग्रहण हुआ । मिथक निर्माण की एक बड़ी वजह शायद यह भी है । असल में मार्क्स के सोचने का तरीका उनके समय के भी प्रचलित बौद्धिक तरीकों से काफी अलग था । उनके मूल पाठकों में से अधिकतर लोग उस आलोचनात्मक चिंतन धारा से अपरिचित थे जिसमें युवा हेगेलपंथियों का बौद्धिक विकास हुआ था । इसलिए जो कुछ उन्होंने लिखा उसे तत्क्षण ही उन्नीसवीं सदी में प्रचलित समाजवाद के संदर्भ में समझा गया और उसके हेगेलपंथी पहलुओं की उपेक्षा हुई । इसके कारण मार्क्स को उन्नीसवीं सदी के समाजवाद और प्रत्यक्षवाद से जोड़कर देखने की गलतफहमियों का जन्म हुआ । इसी से आर्थिक निर्धारणवादी व्याख्याओं का भी जन्म हुआ । इन मिथकों को चिन्हित करने के बाद इस परियोजना के संचालकों ने उम्मीद जताई है कि भविष्य में अन्य विषयों पर भी साफ सफाई होगी ।
इस परियोजना के तहत विभिन्न मिथों की सफाई में जिन लोगों के लेख संकलित हैं वे हैं- 1) राजकीय समाजवाद के साथ मार्क्स को जोड़ने के मिथ, जिसके सिलसिले में परेश चट्टोपाध्याय और हाल ड्रेपर के लेख हैं । 2) मार्क्स के चरित्र के बारे में मिथ, जिनके सिलसिले में फ़्रांसिस ह्वीन, टेरेल कारवेर, हाल ड्रेपर और हम्फ्री मैकक्वीन के लेख हैं । 3) उन्नीसवीं सदी के समाजवाद और प्रत्यक्षवाद के साथ मार्क्स को जोड़नेवाले मिथों के सिलसिले में जान हैलोवे और सीरिल स्मिथ के लेख हैं । 4) द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मिथों के सिलसिले में ज़ेड ए जोर्डन और मैक्समिलियन रूबेल के लेख हैं । 5) मार्क्सवाद के अन्य मिथों के सिलसिले में हैरी क्लीवर, पीटर स्टिलमैन, सीरिल स्मिथ और क्रिस्टोफर जे आर्थर के लेख हैं । 6) सबसे अंत में हालिया मिथों के सिलसिले में क्रिस्टोफर जे आर्थर, जोसेफ मैककार्नी और लारेंस विल्डे के लेख प्रस्तुत किए गए हैं । हालांकि कुछ लेख निश्चित ही भ्रम दूर करते हैं लेकिन इन लेखों पर सोवियत परंपरा के मुकाबले पश्चिमी दुनिया के विद्वानों के बीच प्रचलित बहसों की छाया है ।  
परियोजना के तहत उपलब्ध लेखों में से एक मैक्समिलियन रूबेल द्वारा ‘द लीजेंड आफ़ मार्क्स, आर “एंगेल्स द फ़ाउंडर”’ शीर्षक से लिखित है । इन्होंने मार्क्स की एक जीवनी भी ‘मार्क्स विदाउट मिथ्स’ नाम से लिखी है । उक्त लेख में रूबेल ने मार्क्स के विचारों के प्रसंग में एंगेल्स की भूमिका की जांच-पड़ताल की है । उन्होंने मार्क्स के अधूरे काम को संपादित करने में एंगेल्स की क्षमता पर सवाल उठाया है । असल में उनका एतराज ‘मार्क्सवाद’ की प्रस्तुति पर है । साथ में उन्होंने इस मान्यता को भी परखने की कोशिश की है जिसके मुताबिक मार्क्स के मुकाबले एंगेल्स द्वंद्ववादी पद्धति में कम कुशल थे । लेखक मार्क्सवाद की कोटि को ही बनावटी मानते हैं । उनके अनुसार कार्ल कोर्श ने ‘टेन थीसिस आन मार्क्सिज्म टुडे’ में इसी भ्रम में बार बार ‘मार्क्स-एंगेल्स की शिक्षा’, ‘मार्क्स के सिद्धांत’,’मार्क्सवादी सिद्धांत’, ‘मार्क्सवाद’ आदि का व्यवहार किया है । पांचवीं थीसिस में तो उन्होंने संस्थापकों में एंगेल्स का नाम भी नहीं लिया । लेखक का प्रस्ताव है कि ‘मार्क्सवाद’ पद को छोड़ देना ही उचित होगा । आश्चर्यजनक नहीं कि इन्होंने हीमार्क्सोलोजीपदबंध का आविष्कार किया जिसे आजकलमार्क्सवादकी जगह इस्तेमाल किया जाता है । इसी तरह के नजरिए से आजकल मार्क्स के लेखन-चिंतन पर सोच-विचार हो भी रहा है ।
पूंजीवाद ने जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंध लूट मचाई उसके कारण पर्यावरण एक महत्वपूर्ण सरोकार के रूप में उभरा है । इस मोर्चे पर पहले तो पर्यावरण के आंदोलनकारियों और मार्क्सवादियों के बीच आपसी संदेह का वातावरण रहा लेकिन फिर संवाद शुरू हुआ इस संवाद की दिशा में सबसे पहले जिस किताब का जिक्र जरूरी है वह है 1999 में मंथली रिव्यू प्रेस से जान बेलामी फ़ास्टर की किताबद वल्नरेबल प्लैनेट: ए शार्ट इकोनामिक हिस्ट्री आफ़ द एनवायरनमेंटके नए संस्करण का प्रकाशन । भूमिका में फ़ास्टर ने उस प्रक्रिया का वर्णन किया है जिसके जरिए वे पर्यावरण की चिंता के करीब आए । 1950 और 1960 के दशक में वे ऐसे इलाके में रहे जो अपने पर्यावरण की गुणवत्ता के लिए मशहूर था । जब अप्रैल 1970 में पहली बार पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा था तो वे इसमें शामिल तो हुए लेकिन बहुत मन से नहीं । उस समय उनकी चिंता के केंद्र में वियतनाम युद्ध था । लगता था कि जहां नापाम बम बरसाए जा रहे हैं वहां पर्यावरण की बात अय्याशी है । 1970 दशक के मध्य से 1980 दशक के मध्य तक आर्थिक संकट और तीसरी दुनिया के अल्पविकास के बारे में वे सोचते बोलते रहे । रीगन युग में आर्थिक गतिरोध का बोझ मजदूरों, बेरोजगारों, महिलाओं, अश्वेतों और तीसरी दुनिया की जनता की पीठ पर लादने का विरोध करना अधिक जरूरी लगता था । पूंजीवाद का विरोध मानवता की रक्षा का निर्णायक रूप प्रतीत होता था । लेकिन धरती के भविष्य के साथ जोड़कर इसको देखने में मुश्किल पेश आती थी । एक दशक तक बाहर रहने के बाद 1985 में जब वे फिर अपने बचपन के रहने की जगहों पर गए तो उनके सम्मुख पर्यावरणिक संकट के वैश्विक आयाम स्पष्ट हुए । वहां ऐसे बदलाव आ चुके थे जिन्हें पलटना संभव नहीं रह गया था । जिस जंगल में दुनिया के सबसे पुराने और लंबे पेड़ थे उसे भयानक रफ़्तार से काटा जा रहा था । जो नदी थी उसकी धारा सूखने की कगार पर थी । उल्लुओं से लेकर मछलियां तक विलुप्त होने की स्थिति में थे । परमाणविक संशाधन के लिए जो परिक्षेत्र निर्मित किया गया था वह रेडियोधर्मी प्रदूषण का दुनिया का सबसे खतरनाक स्रोत साबित हुआ । आर्थिक विस्तार की ताकतों और पर्यावरणवादियों के बीच हर जगह युद्ध छिड़ा हुआ था । 1980 दशक के उत्तरार्ध में ही तापवृद्धि, ओज़ोन परत के छीजने, उष्णकटिबंधीय जंगलों के खात्मे से पैदा होने वाले खतरों और विभिन्न प्रजातियों के लोप के प्रति सचेतनता तेजी से बढ़ी । इन सबका प्रभाव यह हुआ कि उन्हें धरती के लिए बढ़ते खतरों के बारे में सोचने के लिए बाध्य होना पड़ा । उनका कहना है कि लेकिन इस पर्यावरणिक सचेतनता से युवावस्था के मेरे सामाजिक सरोकारों में कोई कमी नहीं आई । जो लोग सामाजिक विषमता को दूर करने में अपनी पूरी ताकत लगाए हुए थे वे पर्यावरणिक न्याय की लड़ाई में भी शामिल हुए । 1970 और 1980 के दशक में युद्ध, आर्थिक विषमता और तीसरी दुनिया का अल्प विकास जैसी परिघटनाओं ने उनका ज्यादातर ध्यान खींचे रखा था । अब उन्हें महसूस हुआ कि ये परिघटनाएं पृथ्वी और दुनिया की बहुसंख्यक जनता की जीवन स्थितियों के व्यवस्थित विनाश के व्यापक सवाल से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं । मुख्य धारा के पर्यावरणवाद की प्रमुख समस्या इस संबंध को न समझ पाना है । उनका मत है कि अगर हमें पर्यावरणीय संकट को समझना है तो क्रांतिकारी सामाजिक सरोकारों को छोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें इतना व्यापक और गंभीर बनाना होगा ताकि पृथ्वी के विनाश की चिंता भी उसमें समा जाए । बदलाव का कोई भी सक्षम आंदोलन सामाजिक और पर्यावरणिक समस्याओं की आपसी संबद्धता की बुनियाद पर ही खड़ा किया जा सकता है ।
इस सवाल पर एक और किताब की बात करना अप्रासंगिक न होगा । अगले साल 2000 में पालग्रेव मैकमिलन से रोनाल्डो मुन्क लिखित ‘मार्क्स@2000: लेट मार्क्सिस्ट पर्सपेक्टिव्स’ का प्रकाशन हुआ । किताब न केवल अपने शीर्षक के नाते ध्यानाकर्षक है, बल्कि प्रकृति, विकास, मजदूर वर्ग, स्त्री प्रश्न, संस्कृति, राष्ट्रवाद और उत्तरआधुनिकता जैसे नये समय के सवालों के संदर्भ में मार्क्सवाद को देखने का गंभीर प्रयास भी करती है । भूमिका में लेखक ने बताया है कि किताब के शीर्षक से मार्क्स कंप्यूटर पर एशियाई शेरों के आर्थिक ढांचे के पतन या इंडोनेशिया के सामाजिक विस्फोट या डेनमार्क की आम हड़ताल के बारे में ताजा खबर देखते प्रतीत होते हैं । उन्हें यह सब आशा के अनुरूप ही लगता और उनका विश्लेषण भी वैसा ही तीक्ष्ण होता । कुछ बरस पहले मार्क्स की सदी के अंत की घोषणा करने में कोई समस्या नहीं थी । लगता था कुछ पुरातत्ववेत्ता पुरानी किताबों की दूकान से उनके विचारों को समझने की कोशिश कर रहे हैं । लेकिन अब तो मार्क्स के बिना भविष्य की कल्पना भी मुश्किल हो गई है । किताब का उद्देश्य इस समय के सवालों के संदर्भ में मार्क्स को जिन्दा करना है । इसके लिए लेखक का मानना है कि मार्क्सवाद को महज पूंजीवाद के संकटों और समस्याओं पर सोचने की जगह खुद की समस्याओं की भी छानबीन करनी चाहिए । किताब वर्तमान सवालों के परिप्रेक्ष्य को कभी निगाह से ओझल नहीं होने देती । इसी लिहाज से लेखक ने सबसे पहले मार्क्स की मृत्यु के दावों की परीक्षा की है और पाया कि अगर सही तरीके से देखा-समझा जाए तो मार्क्स अब भी जीवित और कारगर हैं ।
नए चिंतकों में डेविड हार्वे का नाम सबसे महत्वपूर्ण माना जा सकता है । 2000 में एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी प्रेस से डेविड हार्वे की किताबस्पेसेज आफ़ होपका प्रकाशन हुआ । लेखक चूंकि काफी वर्षों से मार्क्स को पढ़ाते रहे हैं इसलिए किताब का पहला अध्याय पीढ़ी दर पीढ़ी मार्क्स की समझ में बदलाव पर केंद्रित है । उनका कहना है कि 70 दशक के पूर्वार्ध में काफी राजनीतिक उत्साह रहा करता था । उस जमाने की उथल पुथल में बौद्धिक-राजनीतिक दिशा की बेचैन तलाश थी । चूंकि अमेरिका में लंबे दिनों तक मार्क्स का नाम प्रतिबंधित जैसा रहा था इसीलिए उनके प्रति आकर्षण भी था । कक्षाओं में युवा अध्यापक और विद्यार्थी शरीक होते थे । जिन लोगों ने बाद में पाला बदल लिया वे भी उन दिनों के रचनात्मक योगदान के लिए कृतज्ञ महसूस करते हैं । विद्यार्थी विभिन्न अनुशासनों और राजनीतिक रुचियों के होते थे । इसके बाद कार्यकर्ताओं और ट्रेड यूनियन नेताओं को भी पढ़ाना पड़ा । उस समय की क्रांतिकारिता का एक तत्व बुद्धिजीवियों द्वारा विरोध का प्रदर्शन भी था । उन्हें शिक्षा संस्थान दमन का केंद्र महसूस होते । किसी भी किस्म की किताबी पढ़ाई को दीक्षा और प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश समझा जाता । उसके मुकाबले वर्तमान परिस्थिति बहुत अलग है । अब अध्यापक नहीं पढ़ने आते, जो विद्यार्थी पढ़ने आते हैं वे भी स्नातक-स्तरीय नहीं होते । बर्लिन की दीवार गिरने से पहले ही 80 दशक के पूर्वार्ध में मार्क्स शैक्षिक और राजनीतिक चलन से बाहर चले गए थे । अस्मिता विमर्श और उत्तर-आधुनिकता के जमाने में मार्क्सवादी परंपरा की भूमिका नकारात्मक समझी जाती थी । इस विचारधारा के विरुद्ध लड़ना जरूरी समझा जाता था क्योंकि भ्रामक रूप से इसे प्रभुत्वशाली माना जाता था । कहा जाता था कि मार्क्स और ‘पारंपरिक मार्क्सवाद’ लिंग, नस्ल, सेक्स, इच्छा, धर्म, नृजाति, औपनिवेशिकता, पर्यावरण आदि अधिक जरूरी सवालों पर कम ध्यान देते हैं । सांस्कृतिक ताकतों और आंदोलनों को भी वर्गीय गोलबंदियों के जितना ही जरूरी माना जाने लगा था । इनमें अनेक आलोचनाएं जायज थीं लेकिन यह कहना नाजायज था कि मार्क्सवादी चिंतन प्रक्रिया इन सवालों पर होने वाले आंदोलनों से दुश्मनी ही रख सकती है । कुल मिलाकर सांस्कृतिक विश्लेषण को राजनीतिक अर्थशास्त्र का स्थानापन्न बना दिया गया था । इसके बाद बर्लिन की दीवार गिरी । 1989 के बाद तो यह कहना कि मार्क्सवाद रुचिकर हो सकता है लुप्तप्राय प्रजाति डायनासोर के जीवित होने पर यकीन करने जैसा महसूस होता था । 90 दशक के पूर्वार्ध में मार्क्सवादी सिद्धांतों में बौद्धिक रुचि भी समाप्त होने लगी थी । लेकिन हार्वे को अब हालात बदले महसूस हो रहे हैं ।
इस समय की एक और विशेषता यह भी है कि न केवल मार्क्स बल्कि पूरी मार्क्सवादी परंपरा का ही पुनरुत्थान हुआ है । इसी क्रम में राबर्ट सर्विस ने लेनिन और रूस की क्रांति से जुड़ी चीजों पर काम किया है । 2000 में मैकमिलन से उनकी किताब ‘लेनिन: ए बायोग्राफी’ का प्रकाशन हुआ । फिर 2002 में पैन बुक्स से उसका प्रकाशन हुआ और 2008 में पैन बुक्स ने ही उसका इलेक्ट्रानिक संस्करण जारी किया । लेखक का कहना है कि सोवियत संघ में कम्यूनिस्ट पार्टी के संग्रहालय को शोध हेतु खोल देने से उन्हें लेनिन की बाकी जीवनियों के मुकाबले ज्यादा सामग्री देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । लेनिन के व्यक्तित्व की उपलब्धियों को गिनाते हुए लेखक ने बोल्शेविक नामक एक गुट को ऐसी पार्टी में बदल देने का उल्लेख किया है जिसने 1917 की क्रांति को संपन्न किया । यह वर्ष उसी क्रांति का शताब्दी वर्ष है । क्रांति के परिणामस्वरूप दुनिया के इतिहास की पहली समाजवादी सत्ता की स्थापना हुई और तमाम विपरीत स्थितियों में भी कायम रही । प्रथम विश्व युद्ध और गृह युद्ध से सफलतापूर्वक देश को निकाला गया । कम्यूनिस्ट इंटरनेशनल की स्थापना करके पूरे महाद्वीप की राजनीति को इस सत्ता ने प्रभावित किया । इन सबका कारण यह था कि लेनिन का शुरुआती जीवन रूसी समाज के इतिहास के एक विचित्र समय में गुजरा । उन्नीसवीं सदी के उत्तारार्ध में रूसी साम्राज्य बुनियादी बदलाव से गुजर रहा था और उसी के साथ लेनिन की पीढ़ी ऐतिहासिक बदलावों के भंवर में उलझी हुई थी । भौगोलिक रूप से दुनिया का सबसे बड़ा देश अपनी संभावनाओं को खोल और परख रहा था । पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन ढीले पड़ रहे थे । अंतर्राष्ट्रीय संपर्क बढ़ रहा था और रूस की सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों को सारा संसार अचम्भे से देख रहा था ।    
बदलाव की रफ़्तार फिर भी शिक्षित लोगों को बेहद सुस्त महसूस हो रही थी । उन्हें लगता था कि रूस इतना विराट, इतना विविध और इतना परंपराबद्ध है कि बदल नहीं सकता । रूसी समाज बदलाव का आदी नहीं था । 1861 में अलेक्सान्द्र द्वितीय ने कुछ बदलाव लाने की कोशिश की थी लेकिन मुश्किलें बहुत थीं । अमीर-गरीब के बीच चौड़ी खाई थी । देहात की किसान आबादी अपनी दुनिया से बाहर कुछ नहीं सोचती थी । सरकारी अधिकारियों और संपत्तिशाली लोगों के विरुद्ध विक्षोभ फैला हुआ था । दूसरी ओर कोयला, लोहा, हीरा, सोना और तेल का विशाल भंडार था । विशाल भूक्षेत्रों में प्रचुर अन्न पैदा होता था । सुसंस्कृत कुलीन तबका था । महान उपन्यासकार, वैज्ञानिक, संगीतज्ञ और चित्रकार थे । पेशेवर मध्यवर्ग की तादाद में बढ़ोत्तरी हो रही थी । स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं विकसित हो रही थीं । नौकरशाही में कुलीनों के मुकाबले पेशेवर लोग अधिक दाखिल हो रहे थे । इस संक्रमण से उथल पुथल पैदा हो रहा था । यथास्थिति के विरोधी सदियों से समाज का दमन करनेवाली बादशाहत के विरोध में हिंसक उपाय अपना रहे थे । किसानी समाजवाद के पक्षधर अपनी विचारधारा का प्रचार करते थे । उदारपंथी भी थे लेकिन सदी का अंत आते आते जार की तानाशाही के विरुद्ध सबसे प्रभावी विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद स्थापित हो गया । जार और पूंजीवाद के अनेक पहलुओं के विरुद्ध बौद्धिक और मेहनतकश हलकों में व्याप्त माहौल से लेनिन को बहुत लाभ मिला । प्रथम विश्व युद्ध में रूस की हालत ने शासन विरोधी माहौल बनाने में मदद की ।
लेनिन अपने समय के प्रभाव में तो थे ही, समय पर उनका प्रभाव भी कुछ कम गहरा नहीं था । पैतृक घर में शिक्षा को उन्नति की राह समझा जाता था । शिक्षा के चलते उन्हें विदेशी भाषाओं को सीखने का मौका मिला, विज्ञान के प्रति लगाव पैदा हुआ और समाज को समझने में सहायक विचारधाराओं से प्रेम हुआ । उन्हें अपनी भावनाओं को काबू में रखना आता था और अपने क्रोध को जुझारू आक्रामकता का रूप देकर लंबे समय तक राजनीतिक लड़ाई वे लड़ सकते थे । अपनी बुनियादी मान्यताओं को उन्होंने दृढ़ता के साथ पकड़े रखा । मार्क्सवाद के अलावा रूसी साहित्य का भी उन पर अमिट असर पड़ा था । छपे हुए शब्दों से उनका नाता अधिक गहरा था । घनघोर पढ़ाकू और प्रचंड लिक्खाड़ थे, वक्ता उतने प्रभावी न थे । अध्ययन और राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण ही 1917 में उन्होंने सत्ता दखल की अप्रैल थीसिस लिखी और अक्टूबर में सत्ता दखल को अंजाम दिया । मार्च 1918 में ब्रेस्त-लितोव्स्क की संधि के जरिए रूस पर जर्मनी के हमले को रोका । 1921 में नई आर्थिक नीति लागू करके सोवियत संघ को जन विक्षोभ से उबारा । इन सभी मौकों पर लेनिन द्वारा संचालित अभियानों ने घटनाओं की दिशा तय की । 


आधुनिक भारत की मेधा के जाग्रत प्रतीक रामविलास शर्मा

       
                                                       
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते हुए सबसे पहले रामविलास शर्मा के बारे में जानना शुरू किया तब वे बनारस में विश्वविद्यालय परिसर में ही रह रहे थे उनके यहां अक्सर जाने वालों में आनंद नारायण पांडे से मुलाकात होती रहती थी एक बार उनके साथ ही गया भी दिल्ली आने के बाद एम फिल में शोध प्रबंध के लिए विषय चुनने की प्रक्रिया में उनसे फोन पर बात हुई थी आनंद नारायण पांडे के साथ जनकपुरी गया भी एक बार अवधेश प्रधान के साथ भी मिलने जाना हुआ इन सब मुलाकातों से जो छाप मन पर पड़ी वह छल छंद से भरी हिंदी की दुनिया में एक नायाब संत की थी बाद के दिनों में कुछ और दोस्तों से उनके संस्मरण सुनकर इस छाप की पुष्टि हुई । दिल्ली विश्विद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यापक संजय कुमार का कहना था कि जब वे पहली बार मिले और उनकी एक किताब लेकर दस्तखत लेने के लिए बढ़ाया तो उन्होंनेपढ़ो, पढ़ो भारत संतानलिखकर दस्तखत किए । उनकी यही चिंता सभी पुरस्कारों को रख लेने और राशि को हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु लौटा देने में व्यक्त होती है । पैसे के पीछे पागल हमारी दुनिया में उनका यह नैतिक बड़प्पन बहुत बल प्रदान करता था । असम विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापक कृष्णमोहन झा ने जब उन्हें अपनी कविता सुनाई तो उन्होंने कविता में चित्रण का महत्व समझाया । हाल के दिनों में उनके लेखन पर कुछ काम करने के लिए उनके पुत्र विजय जी से मिलना हुआ इस क्रम में भी उनके साथ बीते समय की यादें ताजा करने का मौका मिला
वर्तमान माहौल को देखते हुए अचरज की बात है कि रामविलास शर्मा हिंदी साहित्य के अध्यापक नहीं थे या किसी विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर नहीं थे फिर भी हिंदी जगत से उन्हें बहिष्कृत करना संभव नहीं हुआ । हालांकि इसके कारण ही जीवन भर कुपढ़ लोग भी उनकी आलोचना निर्भय होकर करते रहे । उनकी इस स्थिति के कारण उनके जीवित रहते उनसे प्रतिस्पर्धा करने वाले लोगों के कुछ उत्साही शिष्यों ने पदोन्नति हेतु गुरु कृपा पाने के मकसद से रामविलास शर्मा को गाली देना अपना पेशा बना लिया था । अलग बात है कि उनके देहांत के बाद उन्हीं की धारणाओं को उधार लेकर बिना आत्मालोचना किए यही लोग किताब पर किताब लिखे छपाए जा रहे हैं । अब तो दो कौड़ी की किताब लिखकर प्रकाशकों की थोक खरीद के आश्वासन पर छपवाने और इसके सहारे अकादमिक योग्यता का दिखावा करने का उद्योग ही खुल गया है । रामविलास जी के जीवित रहते ऐसा करने वाले छाती फुलाकर नहीं चलते थे । हालांकि वे किसी सभा संगोष्ठी में नहीं जाते थे लेकिन उनकी मौजूदगी मात्र से हिंदी के वातावरण में गरिमा बनी हुई थी ।
शताब्दी वर्ष के दौरान उनके लिखे को विभिन्न प्रसंगों में उलटते पलटते उनके महत्व की पहचान गहरी होती गई वे भारत के स्वाधीनता आंदोलन के सभी महान साकारात्मक मूल्यों की साकार प्रतिमा थे अंग्रेजी के  अध्यापक होने के बावजूद उन्होंने प्रतिरोध के हथियार की तरह हिंदी में लिखना चुना और स्वाधीनता के इस खास पहलू को पैना किया तीसरी दुनिया के बुद्धिजीवी के लिए प्रतिरोध के इस रास्ते की उनकी मान्यता को न्गुगी वा थ्योंगो के लेखों के संग्रह पर लिखी उनकी प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है । थ्योंगो के लेखन की यात्रा अंग्रेजी से उनकी अपनी भाषा गिकियू की ओर हुई थी और वे इसे उपनिवेशित देशों के बौद्धिकों के लिए सही मानते थे । हिंदी में लेखन को रामविलास शर्मा ने उपनिवेशवाद विरोध की तरह अपनाया और जीवन भर निभाया । हिंदी में लेखन का निर्णय लेते हुए भी वे उग्र हिंदी भक्तों से हमेशा दूर रहे और हिंदी को संस्कृत की पुत्री बनाकर उसका लाभ लेने वालों का मुकाबला करते हुए हिंदी को जनजीवन से जोड़े रखा । उनके भाषा चिंतन में निहित साम्राज्यवाद विरोध भारत की भाषा समस्या की उनकी समझ की कुंजी है । भारत के बारे में औपनिवेशिक भाषा चिंतन की प्रमुख विशेषता भाषा परिवारों की नस्ली धारणा है । रामविलास जी ने समूचे भारत की भाषाई एकता को पहचानने के सूत्र उपलब्ध कराए । भारत देश को एक भाषाई परिक्षेत्र मानकर ही भारतीय भाषाओं की वाक्य संरचना की समानता को समझा जा सकता है ।पानी वानीजैसे शब्द युग्म भी भारतीय भाषाओं की साझी विशेषता है । हिंदी में साहित्य के विवेचन से शुरू करके वे उसे ज्ञान की अभिव्यक्ति में सक्षम बनाने की हद तक ले गए । इस भाषा में उन्होंने भाषा विज्ञान, इतिहास और दर्शन की गूढ़ बातों का लेखन और प्रचार किया । इस लेखन के पीछे हिंदी जाति की सांस्कृतिक उन्नति की उनकी चिंता थी । सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोध को उन्होंने हिंदी की मूल संवेदना साबित करके इस भाषा और इसके साहित्य पर सांप्रदायिक तत्वों का कब्जा कभी नहीं होने दिया और इसकी समूची ऐतिहासिक परंपरा पर सामंतवाद का विरोध करने वाली प्रगतिशील चिंताधारा का दावा ठोंका । न केवल स्वाधीनता आंदोलन के समय के साहित्य को बल्कि हिंदी जाति के समूचे साहित्य को उन्होंने अबाध रूप से प्रवहमान जन पक्षधर विशाल परंपरा का अंग बनाया । साहित्य को उन्होंने लड़ाई का बड़ा मोर्चा माना और तमाम विचारकों के चिंतन के भीतर साहित्य की उपस्थिति को रेखांकित किया । खुद मार्क्स पर विचार करते हुए उन्होंने साहित्य को उनके समग्र चिंतन का महत्वपूर्ण घटक माना ।
भारत के स्वाधीनता आंदोलन के साथ मार्क्सवाद के सजीव संबंध का वे साकार रूप थे । इसके लिए भारत के प्रसंग में मार्क्स का पुनराविष्कार जीवन भर चलने वाली उनकी परियोजना बना रहा । उनके इस अवदान को समझने के लिए मार्क्स के लेखन पर विचार करने वाले गंभीर लोगों की सूची में उन्हें शामिल किया जाना चाहिए । रूसी मार्क्सवादियों ने मार्क्स-एंगेल्स के जीवन के परवर्ती दिनों के लेखन और सरोकारों के भीतर रूस की बढ़ती हिस्सेदारी को देखा था और इससे अपने देश में क्रांतिकारी आंदोलन के लिए कुछ गंभीर सबक भी उन्होंने हासिल किए । मार्क्स के भारत और उपनिवेशवाद संबंधी लेखन के साथ रामविलास शर्मा के संवाद पर हम थोड़ी देर बाद बात करेंगे । फिलहाल रूसी क्रांति के नेता लेनिन के बारे में बात करना जरूरी है । मार्क्सवादी परंपरा में लेनिन का मौलिक योगदान बहुत हद तक उनके उपनिवेशवाद संबंधी चिंतन के कारण माना गया है । ज्ञातव्य है कि मार्क्स नेदुनिया के मजदूरों, एक हो!’ का मशहूर नारा दिया था । लेनिन ने उसेदुनिया के मजदूरों और उत्पीड़ित राष्ट्रों के जनगण, एक हो!’ कर दिया था । साम्राज्यवाद के खात्मे के लिए उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों का महत्व पहचानने के चलते ही भारत के स्वाधीनता आंदोलन के भीतर वाम पक्ष निर्मित हुआ और उसको व्यापक सामाजिक स्वीकृति मिली । कहने की जरूरत नहीं किआज की दुनिया और लेनिननामक किताब रामविलास जी ने यूं ही नहीं संपादित की थी ।      
यह बात तो रामचंद्र शुक्ल ने छायावाद की पृष्ठभूमि में ही लिख दी कि भारत का स्वाधीनता आंदोलन पूरी दुनिया में चलने वाले उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों की व्यापक धारा का अंग था । मार्क्स इंग्लैंड की राजधानी लंदन में बैठकर भारत के स्वाधीनता आंदोलन को देख रहे थे । 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बारे में लिखे उनके लेखों का महत्व बताने की जरूरत नहीं । लेकिन स्वाभाविक रूप से उन तक पहुंचने वाली सूचनाओं की सीमा थी, फिर भी पूंजीवाद के जन्म और प्रसार के सिलसिले में उन्होंने जो कुछ लिखा उस पर छानबीन के हालिया प्रयासों में यह तथ्य उभरकर सामने आता जा रहा है कि उपनिवेशित देश और गैर यूरोपीय दुनिया उनके विवेचन में आद्यंत मौजूद रही है । इस प्रसंग में एक पुस्तक का उल्लेख आवश्यक है । 2010 में द यूनिवर्सिटी आफ़ शिकागो प्रेस से प्रकाशित केविन बी एंडरसन की किताबमार्क्स ऐट द मार्जिन्सकी विशेषता यह है कि इसमें गैर यूरोपीय समाजों के बारे में मार्क्स के नजरिए के विश्लेषण को प्रमुखता दी गई है । इसमें लेखक ने बताया है कि यूरोप में 1848 के क्रांतिकारी दौर की विफलता के बाद मार्क्स के दीर्घकालीन लंदन प्रवास में एक तो इस नगर के विश्व के औद्योगिक केंद्र होने से पूंजीवाद संबंधी उनके अध्ययन को गति मिली, दूसरी ओर इंग्लैंड दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य का अधिपति था और उसकी राजधानी में रहते हुए उन्हें पश्चिमेतर समाजों और उपनिवेशवाद का अध्ययन करने की भी प्रेरणा मिली । मार्क्स संबंधी नए अध्ययनों से यह बात सामने आ रही है कि पश्चिमेतर समाजों के बारे में जानकारी बढ़ने के बाद उन्होंने अपनी अनेक मान्यताओं में बदलाव किए थे । इस दृष्टि से मार्क्स संबंधी रामविलास जी के लेखन को देखने से निश्चय ही कुछ नए रास्ते खुल सकते हैं ।
सामाजिक विकास की एकरेखीय धारणा पर सवाल उठाने के चलते रामविलास जी को भारत में आधुनिकता की शुरुआत वहां महसूस हुई जिसे आम तौर पर मध्य युग कहा जाता है । इसे व्यापक सामाजिक प्रक्रिया से जोड़ने के लिए उन्होंने सामंती समाज के भीतर ही व्यापारिक पूंजीवाद के उद्भव की बात बताई और जाति निर्माण की प्रक्रिया में इसका उत्स देखा । अंग्रेजी के शब्द नेशन का हिंदी प्रतिशब्द उन्होंनेजातिकहा और हिंदी जाति की धारणा प्रस्तुत की । ध्यातव्य है कि बांग्ला में राष्ट्र को जाति ही कहते हैं । भारत के प्रसंग में मध्य युग की धारणा के अनौचित्य को इतिहासकारों ने भी महसूस किया है । कहने की जरूरत नहीं कि इतिहास के अनुशासन में भी आजकल ‘अर्ली-माडर्ननामक अवधारणा का इस्तेमाल उस युग के लिए किया जाने लगा है । हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के भीतर मौजूद विद्रोह के सामाजिक आधार की पहचान रामविलास जी की इस धारणा के बिना नहीं हो सकती थी । भक्ति साहित्य को भक्ति आंदोलन की उपज मानना और भक्ति आंदोलन को सामंतवाद विरोधी सामाजिक आलोड़न मानना उस साहित्य की ऐसी व्याख्या पेश करता है जो सचमुच विद्रोही साहित्य लेखन की थाती प्रतीत होने लगता है । साथ ही साहित्य के साथ वृहत्तर सामाजिक आंदोलन का संबंध स्थापित करके उन्होंने साहित्य के भीतर सामाजिक मूल्य तलाश करने की क्रांतिकारी दृष्टि प्रस्तुत की । भक्ति काल की भक्ति को प्रेममूला कहकर उन्होंने उसे पूरी तरह प्रेम की आधुनिक संवेदना के साथ जोड़ दिया और इसी धारणा के सहारे भक्तों और संतों के कृत्रिम विभाजन पर विराम लगा दिया । भक्ति आंदोलन के साथ उन्होंने हिंदी जाति के जनजागरण की धारणा प्रस्तुत की, इसे लोकजागरण का नाम दिया और आधुनिक हिंदी साहित्य को उसी लोकजागरण का नवजागरण बताया ।
समूचे आधुनिक हिंदी साहित्य की जनपक्षधर साम्राज्यवाद विरोधी धारणा के निर्माण का श्रेय बिना किसी हिचक के रामविलास जी को दिया जा सकता है । भारतेंदु को उन्होंने हिंदी नवजागरण के उन्नायक के रूप में प्रस्तुत किया । महावीर प्रसाद द्विवेदी उनके कारण ही केवल साहित्यकार की जगह व्यापक सामाजिक सरोकार वाले चिंतक की तरह स्थापित हुए । छायावाद को उन्होंने न केवल इस विकास की अगली कड़ी साबित किया बल्कि छायावादियों के भीतर निराला साहित्य का उनका विवेचन इस बात के लिए भी याद रखा जाना चाहिए कि उन्होंने निराला की भाषा को गांधीवादी विचारधारा के अतिक्रमण का परिणाम बताया । निराला के ही प्रसंग में उन्होंने साहित्य के लिहाज से यथार्थवाद की धारणा को विस्तार दिया और बताया कि सिर्फ बाहरी यानी सामाजिक स्तर पर ही यथार्थ नहीं होता बल्कि मन के भीतर की दुनिया का चित्रण भी यथार्थवाद है । हिंदी के मशहूर व्यंग्यकार बालमुकुंद गुप्त के बारे में लिखते हुए उन्होंने यह तथ्य उजागर करना जरूरी समझा कि उनके लेखों के चलते लोगों में अंग्रेजी राज के विरुद्ध बोलने का साहस पैदा हुआ । साहित्य के महत्व के इसी बोध का परिणाम था कि उन्होंने लगातार इस मोर्चे पर काम करना जरूरी समझा । प्रेमचंद और रामचंद्र शुक्ल की प्रासंगिकता स्थापित करने में रामविलास जी के विवेचन का भी योगदान है । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि निराला को मृत घोषित करने के अतिरिक्त भी इन साहित्यकारों को आधुनिकता के नाम पर अप्रासंगिक बताने वालों की धारा कुछ कमजोर नहीं थी । आधुनिक हिंदी साहित्य के उनके विवेचन का ही नतीजा है कि प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन हिंदी नवजागरण का स्वाभाविक विकास और समस्त हिंदी साहित्य का वारिस प्रतीत होता है । प्रगतिशील साहित्यकारों में उन्होंने विशेष रूप से केदारनाथ अग्रवाल पर तो लिखा ही, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, शमशेर के साथ पढ़ीस पर भी लिखा । साहित्य पर विचार करने के मामले में उनकी नजर रचना की सामाजिकता के साथ उसकी कलात्मक गुणवत्ता पर भी रहती थी । यह मानक उन्होंने प्रगतिशील साहित्यकारों पर भी विचार करते हुए बरकरार रखा है । कविता के अतिरिक्त गद्य के सौंदर्य की परख कराने के मामले में वे हिंदी आलोचकों में अकेले हैं ।
यकीन नहीं होता कि बिना विदेश गए रामविलास जी की हैसियत गंभीर अध्येता की थी । इस मामले में उनके समकक्ष रणधीर सिंह ही नजर आते हैं । ये दोनों ही शोध छात्र पालने, संगोष्ठी कराने, अवकाश प्राप्ति के बाद समितियों की सदस्यता हासिल करने, नियुक्ति करने और जुगाड़ बिठाने के धंधे से पूरी तरह बाहर रहकर भी महत्वपूर्ण माने जाते थे । वह वैचारिक माहौल आत्ममुग्धता से रहित था और साहित्यकार की मान्यता के लिए पुरस्कार मिलना महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता था । रामविलास जी को याद करना हिंदी की लोकधर्मी, प्रगतिशील और मार्क्सवादी साहित्यिक परंपरा को याद करना है ।