Tuesday, December 20, 2022

शीतयुद्ध की वापसी

 

                

                           

हाल में ही खबर आयी कि इंडोनेशिया में मार्क्सवाद को गैरकानूनी बना दिया गया है । सरकार के इस कदम के विरोध में वाम प्रकाशकों ने मुहिम चलायी । इसके बावजूद आशंका बनी कि ऐसे ही कदम अन्य तमाम मुल्कों में भी उठाये जा सकते हैं । इस खबर से दोनों विश्वयुद्धों के बीच के माहौल की याद हो आयी जब समाजवाद के विरुद्ध असली हथियारबंद लड़ाई की जगह पर वैचारिक लड़ाई दुनिया भर में लड़ी गयी थी । अमेरिका के नेतृत्व में संचालित इस अभियान में लगभग सभी पूंजीवादी शासन वाले देशों में वामपंथी बौद्धिकों को हाशिये पर डाला गया । असली युद्ध न होने के बावजूद अमेरिका और रूस, दोनों देशों में युद्ध की तैयारी हमेशा जारी रहती थी । संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का कामकाज इनकी तनातनी के चलते गतिरोध का शिकार हो जाता था । माना जाता था कि इस वैश्विक खेमेबंदी के चलते बहुत नुकसान हो रहा है । जब नब्बे के दशक में सोवियत संघ का पराभव हुआ तो इसे शीतयुद्ध की समाप्ति मानकर खुशी जाहिर की गयी । ऐसी उम्मीद थी कि हथियारों का जखीरा एकत्र करने में जो संसाधन लगाये जा रहे हैं उनका निवेश अब जनकल्याण के लिए होगा । जिस आशा के साथ यह खुशी जाहिर की गयी थी वह कपूर की तरह जल्दी ही बिला गयी । अचरज की तरह शीतयुद्ध की जगह गर्मयुद्ध ने ले ली और एकाधिक शक्ति केंद्रों के रहने से कायम शक्ति संतुलन तिनके के महल की तरह बिखर गया । एक ही शक्ति केंद्र के बतौर अमेरिका रह गया जिसकी साम्राज्यी महत्वाकांक्षा खुलकर प्रत्यक्ष होने लगी । एकाधिक देशों के साथ धौंस धमकी का निर्लज्ज अमेरिकी बरताव रोज रोज की बात हो गया ।     

लैटिन अमेरिका के देश तो हमेशा ही अमेरिकी हस्तक्षेप का शिकार होते रहे थे । अब हस्तक्षेप का विस्तार मध्य पूर्व तक हुआ । इस प्रसंग में इराक की लड़ाई तो पूरी तरह से अमेरिकी साम्राज्यवाद का मुजाहिरा थी जब किसी देश के भीतर घुसकर उसके शासक को फांसी दे दी गयी । उस अपराध में अमेरिका ने इंग्लैंड समेत तमाम देशों को भागीदार बनाया । युद्ध की बात हो तो सबसे हालिया युद्ध के जिक्र से बचना मुश्किल है । विगत कुछ महीनों से यूक्रेन में युद्ध जारी है । रूस का तर्क है कि यूक्रेन को नाटो में शामिल करके पश्चिमी देश उसके दरवाजे तक पहुंच जाना चाहते हैं और इससे उसकी सीमा की रक्षा को खतरा पैदा हो गया है । रूस के विरोधियों का तर्क है कि पुतिन ने ज़ारशाही के जमाने के रूसी साम्राज्य की स्थापना की खातिर यह युद्ध छेड़ा है । इन परस्पर विरोधी तर्कों से अलग किस्म की एक परिघटना देखने में आयी है जिसके बारे में अभी कम ध्यान दिया गया है । हाल में रटलेज से कास्पर रेकावेक की किताब ‘फ़ारेन फ़ाइटर्स इन यूक्रेन: द ब्राउन-रेड काकटेल’ का प्रकाशन हुआ । किताब ऐसे योद्धाओं से साक्षात्कार पर आधारित है जो विदेशों से यूक्रेन में रूस से लड़ने के लिए गये हैं । ये विदेशी योद्धा किसी दक्षिणपंथी अंतर्राष्ट्रीय संजाल के अंग हैं । इस प्रवृत्ति से पश्चिमी देशों के राजनेताओं को भी चिंता हो रही है । इस तरह के तमाम दक्षिणपंथी आतंकी समूह तमाम देशों में राजनीतिक अस्थिरता के स्रोत बनते जा रहे हैं । इस सिलसिले में याद दिलाने की जरूरत नहीं कि अफ़गानिस्तान में रूसी दखल से लड़ने के लिए जिस पुनरुत्थानवादी प्रवृत्ति को हवा दी गयी उसने बाद में भस्मासुर की भूमिका निभायी ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हिटलर की पराजय में सोवियत संघ की निर्णायक भूमिका के कारण उसकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ी लेकिन क्रांति के समय से ही उसके विरोध में जो वैचारिक और व्यावहारिक अभियान पश्चिमी देशों ने चलाया हुआ था उसे उन्होंने तनिक भी मद्धिम नहीं पड़ने दिया । एक हद तक इस अभियान ने भी सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के शासन के बिखरने में मदद की । सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर अमेरिका ने युद्धोत्तर दुनिया में अपनी बरतरी का दावा पेश किया था । इसी तरह ब्रेटन वुड्स की संस्थाओं की मार्फत उसने विश्व अर्थतंत्र को भी अपने लाभ के हिसाब से नियंत्रित करने की योजना बनायी । सोवियत संघ का पतन उसके लिए इतनी भारी सफलता थी कि फ़ुकुयामा ने इतिहास के ही अंत की घोषणा कर डाली थी । इतिहास का अंत तो क्या होता नये जमाने की लड़ाइयों को जायज ठहराने के लिए सभ्यताओं के बीच टकराव का बहाना बनाया गया ।

फिलहाल शीतयुद्ध की वापसी के जो संकेत सुने जा रहे हैं उनका विश्वव्यापी वैचारिक पहलू तो है ही, ठोस रूप से चीन के साथ जारी टकराव की निरंतरता भी है । इस संघर्ष में युद्ध के नये नये रूप अपनाये जा रहे हैं । क्यूबा के साथ लड़ाई के लिए व्यापार प्रतिबंध का जो तरीका आजमाया जाता रहा है उसकी अमानवीयता को इराक में पूरी दुनिया ने देखा जब दवाओं के अभाव में बच्चों तक को जान से हाथ धोना पड़ा था । चीन के साथ टकराव में भी इसी तरह के तमाम उपाय किये जा रहे हैं जिससे उसे आर्थिक रूप से अशक्त बनाकर झुकाया जा सके । लगातार जारी इस टकराव की बानगी हाल में छपी कुछ किताबों से मिल सकती है । बताते चलें कि नवउदारवाद के साथ आये वैश्वीकरण को अब पश्चिमी देश ही धता बता रहे हैं और उन देशों में संकीर्ण तथा नफ़रती राष्ट्रवाद का बड़े पैमाने पर उभार हुआ है । इसके मुकाबले चीन ने आर्थिक मोर्चे पर वैश्वीकरण का खूब लाभ लिया हालांकि इसके कारण उसके अर्थतंत्र और समाज में समस्याओं की बाढ़ आ गयी । फिलहाल यह होड़ अत्यंत नाजुक दौर में पहुंच गयी है । हाल में सिमोन & शूस्टर से प्रकाशित क्रिस्टोफर मिलर की किताब ‘चिप वार: द फ़ाइट फ़ार द वर्ल्ड’स मोस्ट क्रिटिकल टेकनोलाजी’ से इस संघर्ष के नये मोर्चों की एक झलक मिल सकती है ।

इसी तरह से व्यापार युद्ध भी लड़ाई का एक नया मोर्चा है । इस मसले पर राहुल नाथ चौधरी के संपादन में ‘द चाइना-यू एस ट्रेड वार ऐंड साउथ एशियन इकोनामीज’ का प्रकाशन हुआ । संपादक की प्रस्तावना और उपसंहार के अतिरिक्त किताब के बारह लेख चार हिस्सों में संयोजित हैं । पहले हिस्से के लेखों में चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध के वैश्विक आर्थिक असर, दूसरे में क्षेत्रीय अर्थतंत्र की सम्भावना, तीसरे में हिस्से में वरीयता प्राप्त सहभागियों के लाभ और आखिरी चौथे हिस्से में तकनीकी श्रेष्ठता से जुड़े लेख शामिल किये गये हैं । इसी प्रसंग में  ट्राइकान्टिनेन्टल से विजय प्रसाद की प्रस्तावना के साथ ‘द यूनाइटेड स्टेट्स इज वेजिंग ए न्यू कोल्ड वार: ए सोशलिस्ट पर्सपेक्टिव’ का प्रकाशन हुआ । इसमें जान बेलामी फ़ास्टर, जान रास और डेबोरा वेनेज़ियाले के लेख शामिल हैं । विजय प्रसाद का कहना है कि विश्व आर्थिक मंच की हालिया बैठक में हेनरी किसिंजर ने कहा कि यूक्रेन में रूस के लिए संतोषजनक संधि का प्रयास करना होगा । उनके अनुसार अब लड़ाई यूक्रेन की आजादी की नहीं बल्कि रूस के विरुद्ध हो गयी है । अधिकतर राजनयिकों के विरोध के बावजूद किसिंजर ने नये शीतयुद्ध की सम्भावना पर आपत्ति प्रकट की । विजय प्रसाद का मत है कि अमेरिका में दूरगामी लाभ के लिए तात्कालिक नुकसान का बुरा नहीं माना जाता । शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद से ही अमेरिकी शासनतंत्र अपने मुल्क की बरतरी की वकालत करता रहा है और इसके लिए तमाम खतरों को उठाने में परहेज नहीं बरतता । साफ है कि लाभ मुट्ठी भर लोगों को होता है और नुकसान साधारण लोगों को उठाना पड़ता है । इराक के तेल पर धन्नासेठों के एकाधिकार के लिए निम्न वर्ग से भरती सैनिकों के बलिदान को ही उनकी देशसेवा माना जाता है । इसी सोच के चलते मनुष्यता के सम्मान और प्रकृति के दीर्घजीवन की परवाह नहीं की जाती । फिलहाल रूस और चीन के विरुद्ध युद्धोन्माद के पीछे यही सोच काम कर रही है ।

माइकेल हडसन की किताब ‘द डेस्टिनी आफ़ सिविलाइजेशन: फ़ाइनैन्स कैपिटलिज्म, इंडस्ट्रियल कैपिटलिज्म आर सोशलिज्म’ इस मामले में और भी नये पहलुओं को उभारती है । उनका कहना है कि विश्व अर्थतंत्र के सबसे बड़े तनाव का कारण फिलहाल का अमेरिकी वर्चस्व है । दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सभी वैश्विक आर्थिक निकायों की नीतियों को अमेरिकी राजनय ही आकार देता रहा है । शीतयुद्ध में सोवियत संघ की पराजय के बाद तो उसकी ताकत आसमान चूमने लगी है । सोवियत संघ के खात्मे के बाद के बीस सालों में आक्रामक सैन्य पहलों द्वारा उसने अपनी ताकत को सुदृढ़ किया है । 2008 के बाद इसकी आक्रामकता आत्मघाती होती जा रही है । तमाम देश उसके घेरे से बाहर निकलने लगे हैं । इसके कारण अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद दूसरे देशों की आय और संपत्ति हथियाकर अपनी ताकत को बुलंद रखने की उसकी क्षमता घटती जा रही है । दुनिया के स्तर पर उसका टकराव अब चीन के साथ हो रहा है । लेखक ने इस टकराव को अर्थव्यस्था के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय रूपांतरण की प्रक्रिया के रूप में चित्रित किया है । इस टकराव को केवल दो आर्थिक महाशतियों की होड़ के बतौर समझना वे सही नहीं मानते । यह दो राजनीतिक आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच का टकराव है । ये दोनों समाजवादी और पूंजीवादी नहीं हैं बल्कि यह टकराव औद्योगिक अर्थतंत्र और किरायाजीवी वित्तीय तंत्र के बीच का टकराव बन गया है । हडसन के अनुसार अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशी सहायता और अपने अर्थतंत्र के हित में दूसरे देशों के शोषण पर निर्भर रह गयी है ।

हमारा यह समय इतिहास की नजर से नयी सहस्राब्दी में प्रवेश का समय है । इसमें न केवल राजनीतिक बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी पुराने टकराव नयी शक्ल में सामने आ रहे हैं । फ़्रांसिसी क्रांति ने दुनिया के पैमाने पर बादशाहत के खात्मे के जिस युग का आगाज किया था उस पर अब तक का सबसे बड़ा संकट आया है । पूरी दुनिया में तानाशाहों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है और लोकतंत्र को बचाने तथा नये सिरे से गढ़ने की लड़ाई नये दौर में पहुंच गयी है । वैश्विक पूंजी ने सत्ता के साथ मिलकर जनता के जीवन और अधिकारों पर हमला बोल दिया है । हालिया महामारी इसका केवल एक रूप थी । प्रकृति और पर्यावरण के दोहन से मानव प्रजाति के जीने लायक हालात मुश्किल होते जा रहे हैं । शोषण और दमन के नवीन हथियारों को आजमाने का यह समय वैचारिक मोर्चे पर भी गहन युद्ध के संकेत लेकर आ रहा है । शिक्षा की प्रबल भूख के समय ही सामान्य लोगों को उससे वंचित किया जा रहा है । इस अंधेरे दौर में खुशी की बात यह है कि लोगों ने पूरी तरह समर्पण नहीं किया है । इस दौर में मुक्ति की आकांक्षा नये रूपों में प्रकट हो रही है और पूंजी की विराट ताकत को समझने और उससे जूझने की तैयारी ही इस समय के टकराव की प्रमुख वजह है ।     

Sunday, December 4, 2022

आलोचना की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष

 

          

                                     

हिंदी की दुनिया में मैनेजर पांडे के योगदान को आलोचना की हैसियत बढ़ाने के लिए बहुत समय तक याद किया जायेगा । इस बात का मतलब साहित्य के भीतर आलोचना की विधा से ही नहीं है । यदि यह विधा मात्र का सवाल होता तो प्रेमचंद को साहित्य की सबसे बेहतरीन परिभाषा जीवन की आलोचना नहीं प्रतीत होती । जिस तरह लोकतंत्र केवल ऊपर की संस्थाओं में जीवित नहीं रह सकता यदि उसे नीचे से जनता की सक्रियता का रस न मिले उसी तरह विधा के बतौर भी आलोचना को फलने फूलने के लिए खास माहौल के खादपानी की जरूरत होती है । आलोचना के जीवन के लिए समाज में बदलाव की आकांक्षा के साथ ही उसके लिए सक्रिय ताकतों की मौजूदगी आवश्यक है । आश्चर्य नहीं कि हिंदी में आलोचना के सर्वोत्तम क्षण स्वाधीनता आंदोलन के समय के छायावाद और प्रगतिशील साहित्यांदोलनों का दौर रहा है । इस सामान्य तथ्य की स्वीकृति भी इतनी आसान नहीं रही । इसकी मान्यता के लिए कठिन और जटिल वैचारिक संघर्ष करना पड़ता रहा है । मैनेजर पांडे इस संघर्ष के सहभागी और अगुआ रहे । उनके समूचे लेखन को समझने के लिए इसके बिना अन्य कोई राह सही न होगी ।

इसी प्रसंग में ध्यान देना होगा कि नब्बे दशक में मजदूर और किसान ही नहीं, सामान्य आंदोलनों में भी उतार आना शुरू हुआ । निजीकरण की नैतिकता ने धीरे धीरे सांस्थानिक ढांचों में भी जगह बनानी शुरू की । निजी संस्थानों के कर्मचारी अपने संस्थान के विरोध में सार्वजनिक मंचों पर नहीं बोलते, ऐसा करने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही हो सकती है । इसीलिए सरकारी नीतियों की आलोचना का स्रोत सार्वजनिक संस्थान हुआ करते थे । वहां आलोचना का अधिकार कर्मचारियों ने लड़कर हासिल किया था । उनमें भी निजी संस्थानों के नियम लागू करने शुरू किये गये और इनके लिए सरकारी सेवा के नियमों का सहारा लिया गया । इस व्यापक माहौल का असर शिक्षण संस्थानों पर भी पड़ा और अध्ययन हेतु आवश्यक आलोचनात्मक विवेक को नुकसानदेह बताया जाने लगा । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि इन संस्थानों में आलोचनात्मक माहौल और विवेक की गारंटी विद्यार्थियों और अध्यापकों की यूनियनें करती थीं । इन्हें बदनाम किया जाने लगा और छात्र संघों के नियंत्रण की परियोजना के तहत लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का नाम लिया जाने लगा । विद्यार्थियों के संगठनों की अप्रासंगिकता के साथ अध्यापक संगठनों की धार भी मंद पड़ती गयी । आदर्श विद्यार्थी उसे बताया जाने लगा जो देश और समाज की चिंता करने की जगह मोटी तनख्वाह के पीछे जान लगा दे । यह भी कहा गया कि युवा को सपनों और आदर्श के मुकाबले व्यवस्था की सेवा को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए । इस माहौल ने पूरे समाज में आलोचनात्मकता को बुरी बात समझाना शुरू किया । स्वाभाविक है कि इस वातावरण ने आलोचना को नुकसान पहुंचाया । मैनेजर पांडे ने अपने एक लेख में आलोचना के वैश्विक क्षरण पर चिंता भी जाहिर की ।

इस अर्थ में उन्होंने हिंदी आलोचना की क्लासिक परम्परा को फिर से जागृत करने की भरपूर कोशिश की । इस काम में उन्हें साहित्य के बाहर के विद्वानों का भी सजग साथ मिला । साहित्येतर अनुशासनों के इन विद्वानों में विशेषकर रणधीर सिंह और एजाज़ अहमद का नाम लिया जाना चाहिए । इन सबकी संगत नब्बे के दशक में जमी जब सोवियत संघ का पतन हो चुका था । यही समय है जब मैनेजर पांडे से निजी मुलाकात हुई । जनेवि में प्रवेश के लिए अभ्यर्थी था । पेरियार छात्रावास में रामतीर्थ पटेल के पास रुका था । वे भी मैनेजर पांडे के ही निर्देशन में शोधरत थे । काहिविवि के अध्यापकों के मुकाबले जनेवि के अध्यापकों में विद्यार्थियों से औपचारिक संबंध रखने का चलन कुछ अधिक महसूस हुआ । इसके चलते नजदीकी अधिक कभी नहीं बनी लेकिन दूर से ही उनके लिखे को पढ़ने और उस पर आपस में बहस करने और सराहने का स्वभाव बना लिया ।

उनकी किताब ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ का प्रकाशन हरियाणा ग्रंथ अकादमी से हुआ था । समीक्षा के लिए उसे जिन पत्रिकाओं को भेजा जाना था उनकी सूची बनाने में मदद की । साथ में प्रदीप तिवारी भी थे । मेरे लिए विद्यार्थी राजनीति की सक्रियता अधिक प्राथमिक होती जा रही थी । बाद में कभी विभाग संबंधी एक मामले में उन्होंने परामर्श किया तो मैंने परस्पर अहस्तक्षेप का तरीका सुझाया । याद करता हूं कि उन्होंने सच में कभी मेरी राजनीतिक सक्रियता की बाबत कुछ नहीं कहा । अन्य लोगों के संस्मरणों से भी अंदाजा मिला कि नामवर जी के मुकाबले पांडे जी कुछ अधिक उदार हैं । उनकी इस उदारता का लाभ बहुतों ने उठाया और खुद उन्होंने भी किन्हीं वजहों से यह लाभ उठाने दिया ।

इस किताब के प्रकाशन से पहले वे ‘शब्द और कर्म’ के अतिरिक्त ‘साहित्य और इतिहास दृष्टि’ का प्रकाशन करवा चुके थे । इन किताबों से उनकी छवि साहित्य के मामले में खास नजरिये के पक्ष में गम्भीर बहस संचालित करने की बनी थी । इस बहस में उन्हें हिंदी के सामान्य पाठकों तक सैद्धांतिक सवालों को ले जाने की चुनौती का सामना करना पड़ता था । भाषा के मामले में उनका यह संघर्ष जीवन भर चला और आखिरकार ‘मुगल बादशाहों की कविता’ तक आते आते उन्होंने संप्रेषणीय भाषा अर्जित कर ली । कक्षाओं में भी उन्हें जटिल धारणाओं को बोधगम्य बनाने के लिए जूझते देखा जाता था । अध्यापन उनके लिए लेखन से पहले का अभ्यास बन जाता था । इस क्रम में हम जैसे विद्यार्थी उन सिद्धांतकारों की बातों से मोटे तौर पर परिचित हो जाते थे जो बौद्धिक दुनिया में बहस के केंद्र में होते थे ।

इससे हिंदी साहित्य के ऐसे विद्यार्थियों का समूह बन गया जो साहित्य के साथ ही समाज विज्ञान की धारणाओं पर भी अधिकार के साथ बातचीत कर सकते थे । जनेवि के हिंदी विद्यार्थियों की इस योग्यता को हिंदी साहित्य के पारम्परिक विद्यार्थी की छवि से अलग होने का नुकसान भी उठाना पड़ता था । इस स्थिति के चलते विद्यार्थी और अध्यापक में ऐसा रिश्ता बन जाता था जो अनौपचारिक न होने पर भी वैचारिक एकता का भाव लिये होता था । वहां छात्र संघ के चुनावों में प्रत्याशियों को बहुमुखी जानकारी से लैस रहना पड़ता था । उनकी इस तैयारी ने ही उन्हें भारतीय राजनीति में प्रासंगिक बनाये रखा । बहरहाल जब मैं प्रत्याशी था तो एक सवाल के उत्तर में हास्य व्यंग्य का सहारा लेना पड़ा था । पांडे जी भी व्याख्यान और लेखन में इस औजार का अक्सर इस्तेमाल करते थे इसलिए उनको यह युक्ति भा गयी । बाद में उन्होंने निजी बातचीत में इसका जिक्र किया ।

हास्य और व्यंग्य के सहारे वे विरोधी विचारों और उनके प्रवक्ताओं को अक्सर निरस्त्र कर देते थे । जनेवि के विद्यार्थियों की तरह उसके अध्यापकों को भी छिछलेपन के साथ युद्धरत रहना पड़ता था । इस लड़ाई में वे सब लगातार बहस और जानकारी का इतना ऊंचा मानक रखते थे कि प्रतिपक्षी के लिए हल्की बात करना मुश्किल हो जाता था । जनेवि के हिंदी अध्यापकों में पांडे जी के अतिरिक्त नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के पूर्वी या उससे लगे बिहार से थे उस समूचे इलाके में इन अध्यापकों के कारण हिंदी के विद्यार्थियों के बीच साहित्य का जनपक्षी स्वरूप सहज बोध का अंग बन गया था उस अत्यंत गरीब किसानी इलाके के उत्सुक विद्यार्थी जनेवि की ओर बौद्धिक उच्चता की प्रेरणा के लिए देखते थे ये तीनों ही पारम्परिक अध्यापकों के मुकाबले विद्रोही विद्यार्थियों में अधिक लोकप्रिय थे हिंदी साहित्य की प्रगतिशील समझ को स्थापित करने के लिए इनके संघर्ष को याद करना आज बहुत जरूरी है इसका महत्व इस कारण भी अधिक है कि हिंदी भाषी क्षेत्र में वाम आंदोलन की अनुपस्थिति के बावजूद बौद्धिक हलकों में उसे मान्यता दिलाने में इस अथक संघर्ष का योगदान अविस्मरणीय है  

ये अध्यापक हम आकांक्षी विद्यार्थियों की अनेक ऐसी आकांक्षाओं का साकार रूप थे जो आदर्शवादी युवकों के मन में आसपास के वातावरण से पैदा हो जाती थीं उस आदर्शवाद के चलते हमारे मन में चारों ओर फैले सामंती यथार्थ के प्रति गुस्सा जन्म लेता था इस यथार्थ से दूर भागने के क्रम में युवा विद्यार्थियों का समूह दूर पास की तमाम शिक्षण संस्थाओं की ओर भागता था इसी तरह ये अध्यापक भी जनेवि में एकत्र हो गये थे अकारण नहीं कि काहिविवि या इलाहाबाद विश्विविद्यालय से ढेर सारे विद्यार्थी जनेवि में दाखिला लेते थे इस आकर्षण की बड़ी वजह अध्यापकों का यह समूह भी था  

नब्बे के बाद मैनेजर पांडे की सक्रियता का पहलू तत्कालीन वातावरण से अधिकाधिक निर्धारित होता गया मार्क्सवाद की समाप्ति के शोर का मुकाबला करते हुए उन्होंने मार्क्स के और उन पर लिखे लेखों का अनुवाद करके संकट के बावजूद शीर्षक संग्रह तैयार किया एक नितांत निजी हादसे से उबरने का कारण भी यह पुस्तक बनी बाद में भारत के स्वाधीनता आंदोलन के दौरान प्रकाशित दुर्लभ किताबों के नये संस्करण उनकी भूमिका के साथ प्रकाशित हुए इनमें देउस्कर और देव नारायण द्विवेदी कीदेश की बातविशेष रूप से महत्व की साबित हुईं वैश्वीकरण के साथ पुन:उपनिवेशीकरण का जो दौर चला उसके लिहाज से ये किताबें बेहद महत्वपूर्ण थीं

दलित और स्त्री साहित्य के आगमन के बाद हिंदी के प्रगतिशील आलोचकों में पांडे जी ने सबसे पहले उनका स्वागत किया इस लिहाज से पुराने साहित्य को फिर से प्रासंगिक बनाते हुए उन्होंने महादेवी वर्मा की किताबश्रृंखला की कड़ियांपर लिखा और अश्वघोष की वज्रसूची पर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया दलित और स्त्री लेखन का यदि कोई संवाद प्रगतिशील आलोचना से बनता है तो उसका एक कारण पांडे जी की सक्रियता का यह पहलू भी है उन्हें जीवन भर ढेर सारी विपरीत परिस्थितियों से जूझना पड़ा लेकिन इस संघर्ष में उन्होंने कभी हथियार नहीं डाले इसी क्रम में उन्होंने वर्तमान और अतीत के साहित्यिक लेखन का नया पाठ किया और हिंदी के व्यापक पाठक समुदाय को भी उससे परिचित कराया इस काम के लिए लेखन, भाषण और अध्यापन का कुशल उपयोग उन्होंने किया                                                 

Wednesday, November 30, 2022

वर्मा जी की छोटी सी याद

 

          

                              

लाल बहादुर वर्मा के साथ घनिष्ठता न बन पाने का दुख बहुत होता है । इस दुख का कारण उनके प्रभूत ज्ञान से लाभ न ले पाना है । उनके साथ देखादेखी चौदह साल की उम्र में हुई थी । वह समय ऐसा होता भी नहीं कि आसपास बिखरे का मूल्य समझ आये । उम्र बढ़ने के साथ धीरे धीरे उनका महत्व स्पष्ट हुआ लेकिन जब तक संकोच टूटता तब तक उन्होंने संसार से विदा लेने की तैयारी कर ली । हमारे बीच साझा दोस्तों का जखीरा था लेकिन उनमें से भी किसी ने पहल नहीं की । यह भी सम्भव है कि उनकी प्राथमिकता और मेरे सरोकारों में  कोई संवाद ही न खुलने की जगह हो । उनके निधन के बाद ही इस क्षति पर सोचने का अवसर मिल सका ।

वह एकमात्र छोटी मुलाकात लमही में हुई थी जब बनारस आया ही था और प्रेमचंद की जन्म शताब्दी उनके ही गांव में मनायी गयी थी । उसी आयोजन में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मंच का गठन हुआ था और उसके महासचिव की जिम्मेदारी वर्मा जी को मिली थी । उसमें ही पहली बार स्वामी अग्निवेश, शम्सुल इस्लाम, रामकुमार कृषक आदि को देखा था । आंध्र प्रदेश से ज्वालामुखी भी आये थे । उनकी प्रेमचंद के बारे में एक बात नहीं भूलती कि उन्होंने पहली बार घर के भीतर की समस्याओं की वजह के रूप में घर के बाहर कार्यरत शक्तियों को पहचाना था । अध्यक्ष रामनारायण शुक्ल को चुना गया था । वे बनारसी मिजाज के आदमी थे । उनके मुकाबले वर्मा जी अधिक आधुनिक प्रतीत हुए । बाद में उनकी आत्मकथा में परिधान के प्रति उनकी सजगता को जाना । उनकी राय से सहमत न हुआ । बहरहाल उनके नेतृत्व में कार्यरत गोरखपुर की टीम का जलवा था । होरी नामक नाटक हुआ जिसमें होरी की भूमिका में लेनिन नामक अभिनेता थे । शशि प्रकाश का तेजी से और लगातार बोलते रहना भाया था । बाद में भगत सिंह संबंधी एक सभा में मुहम्मदाबाद में उनका भाषण भी सुना । थोड़ा राजनीतिक रूप से सचेत हो रहा था और ऐसे में इतना सब पचाना सम्भव न हुआ लेकिन जाना कि उस पूरी टीम के प्राण वर्मा जी हैं । इससे युवकों को जोड़ लेने की उनकी खूबी का भी अंदाजा हुआ । वामपंथ की तीसरी धारा में छोटे छोटे अनेक गुट थे । जिस गुट से वे जुड़े थे उससे अलग गुट भाई अवधेश प्रधान का था । मैं भी भाई के साथ ही था लेकिन उस गुट के मंगल सिंह जैसे कुछ लोग आकर्षित करते थे । शशि प्रकाश से नजदीकी न बन सकी थी । आपसी बहसों में उनका तीखा तेवर खींचने की जगह दूर ले जाता था फिर भी उनके लिखे गीत हम सभी गाते थे ।

बाद में वर्मा जी के बारे में पता चला कि वे गोरखपुर विश्वविद्यालय छोड़कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय आ गये हैं । वहां कभी जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित एक गोष्ठी में वे भी वक्ता के बतौर बुलाये गये थे । सफारी सूट डाटे हुए थे । अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और फ़ासीवाद की गम्भीर आहट सुनी जा रही थी । इसी विषय पर गोष्ठी थी । याद है वर्मा जी ने जोर देकर कहा कि फ़ासीवाद के साथ समाजवाद का नारा भी जुड़ा रहता है । इस बात को कहते हुए वे बार बार पढ़े लिखे लोगों को संकेत समझना चाहिए जैसा कुछ दुहरा रहे थे । तब रामजी भाई से कहा कि कामू ने प्लेग के बारे में चिकित्सकों की नासमझी का संकेत किया है क्योंकि प्रत्येक बार वह अपने लक्षण बदल देता है । उन्होंने इस बात को मंच से बोला भी । मन में धारणा बनी कि वर्मा जी व्यवहार के मुकाबले किताब से अधिक शासित होते हैं और पढ़े लिखे होने की विशेषता के भी शिकार हैं । जाहिर है यह कोई बहुत अच्छी धारणा नहीं थी । शायद इन सब बातों ने उनके निकट नहीं जाने दिया ।

पूर्वोत्तर भारत में जाने के बाद उनसे जुड़ा एक और प्रसंग खुला । सुना कि पूर्वोत्तर भारत पर केंद्रित उनका उपन्यास ‘उत्तरपूर्व’ उनके मणिपुर प्रवास के अनुभवों पर आधारित है । सिलचर स्थित असम विश्वविद्यालय में शोध हेतु जब केंद्रीय विद्यालय में अध्यापनरत राकेश कुमार धर दुबे ने सम्पर्क किया तो पूर्वोत्तर भारत पर लिखे उपन्यास ही विषय के बतौर समझ आये । वर्मा जी के इस उपन्यास की जानकारी सजल नाग ने दी थी । यह उपन्यास उस इलाके पर लिखे अन्य उपन्यासों से अलग लगा । इसमें हिंदी क्षेत्र की श्रेष्ठता का भाव एकदम नहीं है । साथ ही पूर्वोत्तर की पूजा भी नहीं है । मणिपुरी समाज में व्याप्त धार्मिक भेदभाव सामाजिक अलगाव में बदल गया है इसे वर्मा जी ने निर्मम तरीके से बयान किया है । घाटी के मैतेई और पहाड़ के ईसाई युवाओं में मैत्री को सहज भाव से नहीं लिया जाता । बाद में कुछ और भी विभाजनों का पता लगा लेकिन अगर उस समाज की धोखा देने वाली ऊपरी एकता को आलोचनात्मक निगाह न मिली होती तो वे नजर नहीं आते । इसी में वर्मा जी ने मणिपुरी मुसलमानों का भी जिक्र किया है जिनकी बाबत विद्वानों के साथ ही सामान्य लोगों की बातचीत में शायद ही कुछ सुनायी पड़ता होगा । उनके इसी उपन्यास से पूर्वोत्तर में अध्यापकों के प्रति घनघोर सम्मान का भी पता चला जिसका अपवाद पूरे पांच साल में एकाध बार ही दिखा । इतिहास के साथी अध्यापक सजल नाग के एक लेख का हिंदी अनुवाद जब छपा तो वर्मा जी ने उन्हें पत्र लिखकर प्रशंसा भेजी । ज़ी टी वी में फ़िल्मी गीतों की एक संगीत प्रतियोगिता में सिलचर के एक गायक देबजीत ने पहला स्थान हासिल किया तो उस पूरी घटना पर लिखा लेख उन्होंने इतिहासबोध में खुशी से छापा था । उत्तर पूर्व में रहते हुए हिंदी क्षेत्र की पत्रिकाओं में प्रकाशन सौभाग्य की बात होती है ।

हम दोनों के बीच के एक सम्पर्क सूत्र संवाद प्रकाशन के संचालक आलोक श्रीवास्तव भी रहे । उनके सौजन्य से वर्मा जी की आत्मकथा पढ़ने को मिली तो उनके संघर्षों और रुचियों का विस्तार से पता चला । पहली ही मुलाकात में सांस्कृतिक मोर्चे पर उनकी सक्रियता का रहस्य सांस्कृतिक नवाचार पर उनके कुछ अतिरिक्त विश्वास में महसूस हुआ । उनका इस अखंड विश्वास और तज्जनित सक्रियता की आज बहुत आवश्यकता है ।