Friday, June 16, 2017

सदी के मोड़ पर एक रूसी अंतर्दृष्टि

        
                                     
रूस के प्रसिद्ध विद्वान बोरिस कागरलित्सकी ने एक पुस्तक श्रृंखला की शुरुआत की- ‘रीकास्टिंग मार्क्सिज्मजिसके तहत तीन किताबों का प्रकाशन हुआ । तीनों किताबें चूंकि एक ही कड़ी में लिखी गईं इसलिए इनमें आपसी संगति अंतर्निहित है । तीनों किताबों का रूसी से अंग्रेजी में अनुवाद रेनफ़्री क्लार्क ने किया है । तीनों का प्रकाशन प्लूटो प्रेस से हुआ है । पहली किताब न्यू रियलिज्म, न्यू बार्बरिज्मका प्रकाशन 1999 में हुआ । किताब का उपशीर्षक सोशलिस्ट थियरी इन द एरा आफ़ ग्लोबलाइजेशनहै । भूमिका में लेखक ने पूंजीवादी व्यवस्था और वाम के संकट से बात शुरू की है । पूंजीवाद का संकट 1998 में एशियाई शेरों और रूस के पतन से प्रकट हुआ तो वाम का संकट इसके एक दशक पहले सोवियत संघ में पेरेस्त्रोइका के रूप में सामने आया था । इसे समाजवाद के नवीकरण के लिए शुरू किया गया था लेकिन इससे पूंजीवाद की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ । वादा तो लोकतांत्रिक रूपांतरण का था लेकिन सामाजिक जीवन की समाप्ति हुई और अर्थतंत्र माफ़िया के कब्जे में चला गया । निजी संपत्ति की विजय हुई लेकिन कानून की ऐसी तैसी हो गई । सोवियत संघ के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट आंदोलन भी बिखर गया । इससे खाली हुई राजनीतिक जगह में सामाजिक जनवाद के आ जाने की उम्मीद थी लेकिन वह दक्षिणपंथ के करीब चला गया । वाम का संकट सामाजिक कम, नैतिक और वैचारिक अधिक था । वोटों में गिरावट तो आई थी लेकिन नेताओं और बौद्धिकों की पस्ती के मुकाबले यह गिरावट कम थी । इसीलिए वोट बढ़ने के बावजूद परिस्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं आया ।
लेखक का कहना है कि 1968 के क्रांतिकारी आंदोलनों के विचारों और अनुभवों से प्रेरित कार्यकर्ताओं की पीढ़ी 1989 तक समाप्त हो गई । उस आंदोलन के कुछ मूल्यों मसलन नियंत्रण से आजादी को नवउदारवाद ने पचा लिया । साठ के आंदोलन इसी स्वच्छंदतावादी संस्कृति के साथ मार्क्सवाद को जोड़ने की कोशिश से पैदा हुए थे । इस संस्कृति और शैली को तो पूंजीवाद ने अपना लिया और मार्क्सवाद को मृत घोषित कर दिया । आंदोलन के बौद्धिकों ने समर्पण कर दिया और वास्तविक राजनीतिक संघर्षों से अलग होकर सांस्कृतिक विद्रोही मात्र रह गए । उन्होंने अपने सांस्कृतिक संघर्ष को वर्ग संघर्ष से काट लिया और इसके चलते सांस्कृतिक राजनीति अप्रासंगिक या प्रतिक्रांतिकारी हो गई ।
इसी क्रम में लेखक कहते हैं कि कम्यूनिस्ट घोषणापत्र को इस समय पढ़ने से लगता है जैसे वह कुछ हफ़्ते पहले ही लिखा गया हो लेकिन वैचारिक प्ररणा के लिए वाम बुद्धिजीवी उन विचारों के पीछे भाग रहे हैं जिनकी उम्र साल दो साल से अधिक नहीं होती । मार्क्सवाद की प्रासंगिकता पूंजीवाद के संकट से सिद्ध हो रही है । इसे विडंबना ही कहेंगे कि नवउदारवादी पूंजीवाद की सफलता ही मार्क्स-एंगेल्स की पारंपरिक समाजवादी परिकल्पना को आवश्यक और कारगर बना रही है । मुक्त बाजार पूंजीवाद और वैश्वीकरण के दौर में मार्क्सवाद नहीं बल्कि उसके संशोधित संस्करण गायब हो रहे हैं । लेखक ने कुछ बातों को याद दिलाया है । पूंजीवादी व्यवस्था गरीबी और संकट पैदा करती है । विषमता पैदा करने वाली यही व्यवस्था वर्ग संघर्ष और क्रांतिकारी समाजवादी आंदोलनों को भी जन्म देती है । अगर पुराना आंदोलन चुक गया है तो नया जन्म लेगा ।    
इसी पुस्तक श्रृंखला की दूसरी किताब 2000 में द ट्विलाइट आफ़ ग्लोबलाइजेशनशीर्षक से छपी । इसका उपशीर्षक प्रापर्टी, स्टेट ऐंड कैपिटलिज्मथा । इसमें लेखक ने बताया है कि युद्धोत्तर यूरोप में सोवियत संघ को ऐसी शासन प्रणाली के बतौर प्रचारित किया गया जिसमें निजी पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कोई गुंजाइश नहीं थी । एक निर्वैयक्तिक नौकरशाही के जरिए शासन चलाया जाता था जिसके समक्ष आम लोग खुद को कुंठित और शक्तिहीन महसूस करते थे । यह हालत केवल रूस में नहीं थी, बल्कि सक्षम शासन उस दौर में सबकी इच्छा थी । उसके बाद से स्थिति में बदलाव आया है । नवउदारवाद के साथ राज्य कमजोर पड़ा है और नौकरशाही से उसकी शक्तियां छीनी जा रही हैं लेकिन आम लोग अब भी खुद को आजाद और सुरक्षित नहीं समझते तथा कुंठा और भय की भावना मौजूद है । राज्य के कमजोर होने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की ताकत बढ़ी है । ये कंपनियां विकास के कामों की देखरेख का दावा करती हैं लेकिन उनकी जवाबदेही किसी के प्रति नहीं है । चूंकि राज्य ने व्यापार और व्यवसाय को नियंत्रित करना छोड़ दिया है इसलिए जनता के जीवन और सरकारों पर इन कंपनियों का अबाध नियंत्रण हो गया है ।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक संस्थाओं की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय बाजार को नियंत्रित करने की थी लेकिन नवउदारवाद ने इन्हें विनियमितीकरण के हथियार में बदल दिया है । अब तो ये संस्थाएं अपना एजेन्डा खुद तय करती हैं तथा उसे जनता और सरकारों पर थोप देती हैं । सार्वजनिक योजना निर्माण के काम का निजीकरण हो गया है । ये संस्थान इस तरह काम करते हैं जैसे समूची दुनिया पर इनका कब्जा हो । इनके विशेषज्ञ तय करते हैं कि रूस के कोयला उद्योग का क्या किया जाए, कोरिया में कंपनियों को कैसे संगठित करें या मेक्सिको की वित्त व्यवस्था कैसे दुरुस्त होगी । समस्या जितनी विकट होगी उतना ही आसान और आदिम उसका समाधान प्रस्तुत किया जाएगा । ये संस्थाएं अफ़्रीका से लेकर रूस तक प्रत्येक समस्या के हल का एक ही नुस्खा सुझाती हैं । अपनी ही विचारधारा का शिकार ये संथाएं अपनी विराट नौकरशाहाना मशीन से संचालित होती हैं । मुक्त बाजार के नाम पर समूची दुनिया में अभूतपूर्व केंद्रीकरण थोप दिया गया है । पश्चिमी देशों की सरकारें भी इस समानांतर प्राधिकार से परेशान हैं । यह पूरा ढांचा मूल रूप से अलोकतांत्रिक है । पुराने जमाने की निरंकुश बादशाहतों की तरह वैश्विक प्रशासन का यह नया निजाम भी शासितों की सहमति पर आधारित नहीं है । इसीलिए साधारण जनता को लाभ पहुंचाने का आधुनिक सरकारों का काम करना इनके स्वभाव में नहीं है ।
संपदा और संसाधनों का अभूतपूर्व संकेंद्रण हो गया है । अतीत के किसी भी तानाशाह के हाथों में उतनी नहीं रही होगी जितनी ताकत इस समय अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के निदेशक या माइक्रोसाफ़्ट जैसी किसी बड़ी कंपनी के मालिक के हाथ में है । इस अति-केंद्रित व्यवस्था के कारण ढेर सारी समस्याएं भी पैदा हो रही हैं । यह नहीं कि नवउदारवादी पूंजीवाद अधिकांश मानवता को दरिद्रता में धकेले हुए है या परिधि पर स्थित देशों में बर्बरता का बोलबाला है । ऐसे नैतिक सवालों से गंभीर लोग परेशान नहीं होते । संकट यह है कि इस व्यवस्था में गलतियों के नुकसान बहुत अधिक हैं । असल में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास इतने ज्यादा संसाधन हैं कि अपने गलत साबित हो चुके फैसलों के नतीजों के नुकसानदेह अंजाम देखते हुए भी वे उन्हीं नीतियों को लम्बे समय तक जारी रख सकते हैं । 
मुक्त बाजार के समाजवादी आलोचक कहते थे कि इस व्यवस्था में बरबादी बहुत होती है । योजनाबद्ध अर्थतंत्र के नवउदारवादी आलोचक भी कहते थे कि केंद्रीकृत प्रणालियों में बहुत बरबादी होती है । 1990 दशक के बाद विकसित पूंजीवाद मुक्त बाजार आधारित होने के साथ ही अति केंद्रीकृत भी है इसलिए इसमें पैदा होने वाले संकटों में अभूतपूर्व बरबादी हो रही है । बरबादी के उदाहरण के बतौर लेखक ने उस विश्व संकट का जिक्र किया है जिसकी शुरुआत 1997 में एशियाई मुल्कों से हुई थी । वैश्विक पूंजीवाद अतिसंचय और अतिक्षमता से रोगग्रस्त है । अति उत्पादन के साथ ही मजदूरों के वेतन में कमी आ रही है, गरीब देशों में भुखमरी है तो अमीर देशों में जीवन स्तर में गिरावट आ रही है । मानव और भौतिक संसाधनों के साथ ही वित्तीय संसाधनों की भी बरबादी हो रही है ।
वैश्वीकरण के साथ ही सूचना युग का भी प्रसार हुआ था । सभी बीमारियों के लिए अचूक नुस्खे के रूप में तकनीकी बदलाव पर जोर दिया गया । इस बदलाव ने व्यवस्था के अंतर्विरोधों को और मजबूत बना दिया । बहुत सारे विद्वान इस नई स्थिति को विकेंद्रित उत्पादन के साथ नियंत्रण का केंद्रीकरण कह रहे हैं । तकनीक आधारित संजाल बन तो रहे हैं लेकिन प्रभुतासंपन्न संरचनाएं और स्वार्थ इनका इस्तेमाल अपने मकसद के लिए करना चाहते हैं । इससे नए तरह के अंतर्विरोध पैदा हो रहे हैं । संजाल के लिए ऊंच-नीच की व्यवस्था का समाप्त होना जरूरी नहीं होता, उसके लिए दूसरे तरह के पदानुक्रम की जरूरत होती है और इससे नए स्वार्थों का जन्म होता है । संजाल की मौजूदगी पर बहुत अधिक जोर देने वाले लोगों का कहना है कि इस समय पूंजीपति मानव तो हैं लेकिन समकालीन पूंजीवाद का कोई ठोस चेहरा नहीं है । वित्त प्रवाह इलेक्ट्रानिक संजालों के जरिए हो रहा है । लेखक को चेहरा विहीन इस पूंजीवादी संजाल का वर्णन बहुत कुछ नौकरशाही के वर्णन जैसा महसूस हो रहा है । उनका कहना है कि आज की दुनिया में कोई लोग तो हैं जो फैसले करते हैं और ये फैसले खास हितों तथा विचारों से साफ साफ प्रभावित दिखाई पड़ते हैं । कुछ वास्तविक संस्थाएं और संरचनाएं हैं जहां ये हित सुदृढ़ होते हैं और तब फैसले लिए जाते हैं ।
लेखक का कहना है कि विश्व पूंजीपति वर्ग आज जितना सुदृढ़ है उतना कभी पहले नहीं था लेकिन चूंकि यह सुदृढ़ीकरण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है इसीलिए जिस समाज में वह वैश्विक कुलीन वर्ग रहता है उसमें हर कहीं वह हाशिए पर गया है । इसके कारण उसे लगातार एक तरह के तनाव में रहना पड़ता है । निचले वर्ग का दमन करने के लिए शासक वर्ग को उस समाज और देश का होना उचित होता है । जब कुलीन वैश्विक हो जाते हैं और समाज स्थानीय या राष्ट्रीय ही रहता है तो देश के बाशिन्दों पर अपना एजेन्डा थोपना इस कुलीन वर्ग के लिए  अधिकाधिक कठिन होता जाता है । वैश्वीकरण का प्रतिरोध प्रत्येक देश में बढ़ रहा है । ऐसी स्थिति में नवउदारवादी शासक वर्ग के लिए राज्य फिर से जरूरी महसूस होता है लेकिन केवल उत्पीड़न के औजार के रूप में । राज्य का जबसे जन्म हुआ है तबसे ही वह दमन उत्पीड़न का औजार रहा है लेकिन इसे वह राष्ट्रीय हित के नाम पर वैध ठहराता रहा है । अब इसमें कठिनाई आ रही है । अब राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध राज्य को दमन करना पड़ रहा है । दमन के साथ ही प्रतिरोध भी नए स्तर पर जा पहुंचा है ।
ऐसी स्थिति में नवउदारवादी एजेन्डा का विरोध करने वाले वाम को देशभक्त होना पड़ेगा । उसे वैश्विक कुलीन वर्ग का विरोध करने के लिए उसकी सेवा में लगे हुए राज्य का विरोध करना होगा । इससे नए अवसर तो पैदा हो रहे हैं लेकिन नई वैचारिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है । किन्हीं देशों में राष्ट्रवाद की प्रगतिशील धारा रही है लेकिन ढेर सारी जगहों पर इस पर दक्षिणपंथी वैचारिकी का कब्जा रहा है । वामपंथ को नागरिकता, मानवाधिकार तथा लोकतांत्रिक और विकेंद्रित राज्य के स्वप्न पर आधारित राष्ट्रवाद को अपनाना होगा । वैश्विक पूंजीवाद का संकट नई समाजवादी परियोजना की शुरुआत भी हो सकता है । हमें विश्व पूंजीवाद के सर्वसत्तावाद के विरोध में अपने को लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में पेश करना होगा । 
श्रृंखला की तीसरी और आखिरी किताब द रिटर्न आफ़ रैडिकलिज्मका प्रकाशन भी 2000 में ही हुआ । इसका उपशीर्षक रीशेपिंग द लेफ़्ट इंस्टीच्यूशंसहै । लेखक ने बताया है कि तीन किताबों की पुस्तक श्रृंखला की इस आखिरी किताब में सैद्धांतिक बातें सबसे कम हैं । सबसे पहले वे दावा करते हैं कि बीसवीं सदी बिना शक पूंजीवाद और साम्यवादी व्यवस्था के बीच संघर्ष की सदी थी । पूंजीवाद इस संघर्ष में विजयी तो हुआ लेकिन अंतिम सालों के आते आते यह विजय संदिग्ध हो चली है । उलटे सोवियत संघ की हार और उसके हाशिया स्थित अर्ध-औपनिवेशिक देश में बदलने तथा मजदूरों के साथ पूंजी द्वारा बदले की कार्यवाही ने पूंजीवादी व्यवस्था के सारे अंतर्विरोधों को उजागर कर दिया । नई सदी में पूंजीवाद का प्रवेश अच्छी हालत में नहीं हो रहा है । पूंजीवाद के इस गहरे संकट से भी अधिक गहरा संकट वाम आंदोलन का है । इस संकट के लक्षण पस्तहिम्मती, गद्दारी, राजनीतिक नेताओं और मजदूर वर्ग के बीच दूरी, नए विचारों का अभाव और पुराने संगठनों की नौकरशाही हैं । सोवियत संघ के पतन से सामाजिक जनवादी पार्टियों के उत्थान की आशा थी लेकिन 1990 के दशक में वे भी लम्बे दिनों तक संकट में रहीं । दशक का अंत आते आते कुछ चुनावी लाभ तो हुए लेकिन राजनीतिक स्वास्थ्य दुरुस्त नहीं हुआ । जिन देशों में चुनावी लाभ हुए वहां भी समाजार्थिक नीतियों के मामले में कोई अंतर नहीं आया । फलत: जनता ने जल्दी ही इन पार्टियों से सत्ता छीन ली ।
पूंजीवादी व्यवस्था के गहराते संकट की पृष्ठभूमि में वामपंथ की नपुंसकता और गैर जिम्मेदारी और भी प्रत्यक्ष हो जाती है । नब्बे दशक के अंत में यूरोप के लगभग सभी प्रमुख देशों में वाम या मध्यवाम की पार्टियों का शासन था । ब्रिटेन और इटली में इन सरकारों ने तत्काल दक्षिणपंथी नीतियों को खुलेआम लागू करना शुरू किया । फ़्रांस और रूस में दक्षिणपंथ के साथ समझौते का रास्ता अपनाया गया । असल समस्या इन मध्यवाम ताकतों की नहीं थी । समस्या क्रांतिकारी ताकतों की थी जो इन मध्यवामियों पर  दबाव बनाने में अक्षम रहे । प्रत्येक वाम शासन को देशी पूंजीपति वर्ग, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और भ्रष्ट नौकरशाहों के दक्षिणपंथी संश्रय का भारी दबाव झेलना पड़ रहा है । इन पर वाम दबाव कभी नहीं पड़ता । अगर जन आंदोलन का थोड़ा दबाव बनता भी है तो वाम पार्टियां इन आंदोलनों को रणनीतिक परिप्रेक्ष्य नहीं दे पातीं या उन आंदोलनों की राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं बन पाती हैं ।
नब्बे दशक के पूर्वार्ध में ढेर सारे लोगों को पुराने वाम के मुकाबले ग्रीन पार्टियों के उभार में आशा की किरण नजर आई थी । कई जगहों पर वाम पार्टियों ने इसमें लाल रंगत पैदा करने के लिए पर्यावरण से जुड़े सवाल उठाए । कुछ को इनमें वाम आंदोलन के लिए जरूरी रूपांतरण भी नजर आया । इन पार्टियों के कार्यक्रम में पूंजीवाद का सुसंगत विरोध न होने के बावजूद वैकल्पिक राह नजर आई । व्यावहारिक स्तर पर बदलाव बहुत सीमित रहा और इनके नेता राजनीतिक भ्रष्टाचार से नहीं बच सके । फलत: धीरे धीरे इन पार्टियों की क्रांतिकारी पहचान समाप्त हो गई । इसके साथ ही बुद्धिजीवी लोग भी हालात की आलोचना करने की जगह उसके साथ सामंजस्य बिठाने लगे । इन्होंने फिर नवउदारवादी प्रचारतंत्र द्वारा प्रसारित तथाकथित नए जमाने के बुनियादी तकनीकी और सामाजिक रूपांतरणों का नगाड़ा पीटना शुरू किया । लेखक का कहना है कि वाम आंदोलन के संकट के आम तौर पर तीन कारण गिनाए जाते हैं- साम्यवादी खेमे का बिखरना, वैश्वीकरण और तकनीकी क्रांति । सही है कि इन बदलावों ने वाम का पुरानी शक्ल में बने रहना मुश्किल कर दिया है लेकिन नए हालात ने पूंजीवाद विरोधी विकल्प की जरूरत कम नहीं की, बढ़ा दी है ।
तकनीकी क्रांति ने पुरानी समाजार्थिक व्यवस्था को नष्ट नहीं किया है । पुरानी समाजार्थिक व्यवस्था के ऊपर से नए समाजार्थिक ढांचों को थोप दिया गया है । किसानों के लोप की तमाम अटकलों के बावजूद किसान मौजूद हैं । जनसंख्या विस्फोट के साथ उनकी तादाद भी बढ़ रही है । वर्ग के बतौर औद्योगिक मजदूरों के भी लुप्त होने की बात थी लेकिन वैश्विक स्तर पर कुल मिलाकर उनकी संख्या में इजाफा हो रहा है । गैर जरूरी लोग हाशियों पर तमाम आदिम और अकुशल कामों के सहारे जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे हैं । करोड़ो की संख्या में ये लोग कंप्यूटर और कारखानों की दुनिया से पूरी तरह असंबद्ध माहौल में रह रहे हैं और अब अपनी पुरानी दुनिया में लौटने के काबिल नहीं रह गए हैं । ये अनौपचारिक कामगारों की फौज के सदस्य हैं और इनका श्रम लगभग मुफ़्त है । तमाम मोटर चालित वाहन सड़क पर से रिक्शे को बेदखल नहीं कर सके हैं । कंप्यूटर की दुनिया वाले लोगों को लगता है कि थोड़े ही समय में तकनीक सभी सामाजिक समस्याओं को समाप्त कर देगी । संसदों में बैठे हुए और सभाओं में भाषण देने वाले वामपंथी नेतागण इन दोनों किस्म के लोगों से दूर हो गए हैं । आम नेता इस दुनिया को उसी तरह देख और समझ नहीं पाते जिस तरह पहले शहरी लोग बर्बर आबादी को देख समझ नहीं पाते थे ।
वर्तमान दौर की तुलना औद्योगिक क्रांति से करते हुए लेखक ने बताया है कि उस समय का विकास पिरामिड की शक्ल में हुआ था । उसकी शुरुआत चौड़े आधार से हुई थी जिसमें लगभग समूची आबादी शरीक थी । इसमें शामिल होने के लिए किसी को अपनी जीवन शैली में आमूचूल बदलाव नहीं करना पड़ा था । प्रत्येक ऊपरी सतह निचली के मुकाबले संकीर्ण थी लेकिन उसी पर आधारित थी । ऊपरी सतह पर चलने वाली प्रक्रिया का प्रभाव निचली सतह पर पड़ता था । कभी कभी इस प्रभाव के चलते उन्हें अनचाहे भी अपने आपको ऊपर उठाना पड़ता था । तकनीकी आधुनिकीकरण को पचाने में एकाधिक पीढ़ी का समय लगता था । किसान को मजदूर बनना पड़ा । उसके वंशजों ने शिक्षा हासिल की और मध्य वर्ग में शामिल हो गए । सामाजिक प्रगति की पूर्वशर्त आर्थिक प्रगति थी और अनुभव से इसकी पुष्टि भी होती थी । इसी ऐतिहासिक अनुभव पर सामाजिक जनवाद का विकासपरक आशावाद टिका हुआ था । बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक औद्योगिक क्रांति का असर खत्म हो गया ।
इसके बाद के तकनीकी क्रांति के वर्तमान दौर की खूबी यह है कि विकास की गति में त्वरण आ गया है । मनुष्यों को कंप्यूटरों की तरह लगातार नवीकृत होना पड़ रहा है । लेकिन इसका प्रभाव बहुत कम लोगों तक सीमित है । इसमें प्रसार के मुकाबले उठान अधिक है । तकनीक के विकास की रफ़्तार से प्रभावित होकर दावा किया जा रहा है कि थोड़े ही दिनों बाद जन्नत जैसी जिंदगी सबको मिल जाएगी । असल में किसी भी नई तकनीक के आरम्भिक दिनों में उसके विकास की रफ़्तार तेज होती है । बाद में उस रफ़्तार को बरकरार रखने में मुश्किल पेश आती है । समाज पर थोपी गई बदलाव की रफ़्तार से उसे थकान होने लगती है । विकास सहायता नहीं प्रतीत होता बल्कि आक्रामक दबाव महसूस होने लगता है । लगातार कुछ तोड़ फोड़ चलते रहने का नयापन सुखद ही नहीं होता । इतनी तेज रफ़्तार के कारण भारी बेरोजगारी फैल रही है । सफलता, गतिशीलता और क्षमता केवल ऊंचे तबके के लोगों को सुलभ रह गए हैं । ये तबके निचले तबकों के बारे में आपराधिक रूप से उदासीन हैं लेकिन यह रुख आत्मघाती है क्योंकि आधार की चौड़ाई के बिना ऊंचाई को बनाए रखना असम्भव है । राजनीतिक क्रांति की तरह ही तकनीकी क्रांति को भी सांस लेने के लिए रुकना पड़ता है । सरपट दौड़ते हुए आसमान की ओर निगाह लगाए रखने में खतरा है ।
वैश्वीकरण और तकनीकि क्रांति के दौर में पूंजीवाद विध्वंसक ताकत हो चला है । उन स्वाभाविक सामाजिक बंधनों और रिश्तों को तोड़ा जा रहा है जो पूंजीवाद की भी स्थिरता के लिए परमावश्यक रहे हैं । इसके विपरीत वाम को एकताकारी ताकत बनना होगा, बिखराव के तर्क के विरोध में सामूहिकता और एकजुटता का तर्क पेश करना होगा । जहां तक तकनीकी उपलब्धियों की बात है तो जिन पूंजीवादी संरचनाओं के भीतर तकनीक का विकास हो रहा है उन संरचनाओं के समक्ष नई चुनौती वामपंथ को पेश करनी होगी । पुनर्वितरण का सवाल इस समय समाज के लिए जीवन मरण का सवाल बन गया है । तकनीक, संसाधन, संपत्ति और ज्ञान- सब कुछ का पुनर्वितरण आवश्यक है । विकास के प्रसार और व्याप्ति लानी होगी । कुशल कामगारों की फौज तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर शिक्षकों की जरूरत है । साठ के दशक मे शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का सबसे बेहतर साधन था । राजनीति की वरीयता सूची में अर्थतंत्र के ऊपर शिक्षा को होना चाहिए । शिक्षा में निवेश के लिए संपदा के भारी पुनर्वितरण की जरूरत पड़ेगी ।
मौजूदा कायदे कानून को चुनौती देने की वामपंथ की तैयारी में ही उसके पुनरुत्थान की गुंजाइश निहित है । ये नियम इसीलिए अभेद्य प्रतीत हो रहे हैं क्योंकि उन पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है । पूंजीवाद के तर्क पर सवाल न उठाने से ही वह स्वाभाविक महसूस होता है । पूंजीवाद का संकट तीखा होता जा रहा है । वित्त का प्रवाह अराजक स्थिति में पहुंच गया है । सट्टा बाजार के खिलाड़ी खुद ही भ्रमित हैं और खेल के जटिल नियमों को समझ नहीं पा रहे हैं । आभासी अर्थतंत्र वास्तविक अर्थतंत्र को खा गया है लेकिन उसके बिना जिन्दा भी नहीं रह पा रहा है । अर्थतंत्र और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में आपात उपाय करने की अपेक्षा राज्य से है लेकिन उसकी संपदा, प्राधिकार और प्रभुसत्ता को खोखला भी किया जा रहा है । लोग अगर अपनी पसंद जाहिर करना छोड़ दें तो उन्हें लोकतंत्र प्रदान किया जा सकता है । ऐसी स्थिति में अगर वामपंथ व्यवस्था के तर्क को मंजूर कर लेता है तो उसके होने का कोई औचित्य नहीं बचेगा ।
सारी समस्याओं की जड़ पूंजीवाद की ऐतिहासिक सीमाओं में है । समाज के मूलगामी रूपांतरण के बिना इन समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता । उन्नीसवीं सदी में लोग अबाध सामाजिक प्रगति में यकीन करते थे । बीसवीं सदी की आफतों ने इस यकीन को हिला दिया । लेकिन तकनीकी प्रगति तो आर्थिक संकटों, युद्धों या क्रांतियों के बावजूद बेरोकटोक जारी है । संचित ज्ञान ने संभव बना दिया है कि लुप्त चीजों को पनर्स्थापित करके जीवन चलता रहे । शायद हम भूल गए हैं कि सामाजिक प्रगति ने सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोधों की राशि जुटा दी है ।
वामपंथी नेता अपना कर्तव्य भूल चुके हैं । लेकिन इस व्यवस्था के नरक को रात दिन भोगने वाले लाखों लोग उसकी ओर खिंचे चले आ रहे हैं । उन्हें विकल्प की जरूरत है । वे लड़ने और जीतने के लिए तैयार हैं । मौजूदा वाम से कोई उम्मीद नहीं है । लेकिन कुछ नई चीजें घटित हो रही हैं । जो पार्टियां दक्षिण की ओर झुक गई थीं उनके भीतर मजबूत वाम विपक्ष निर्मित हो रहा है । इस वाम विपक्ष की सफलता निश्चित नहीं है लेकिन जनता के दबाव के समक्ष नेतागण नंगे हो रहे हैं । इससे वाम के क्रांतिकारीकरण का राजनीतिक माहौल पैदा हो रहा है । ढेर सारी समाजवादी पार्टियों ने समाजवाद को त्याग दिया है लेकिन कुछ में वैचारिक ऊष्मा बची हुई है । अब वाम की सफलता सिद्धांतों के अनुरूप काम करने और व्यवस्था जनित लोभों को खारिज करने पर निर्भर है ।

आज पूंजीवाद मजबूत है लेकिन इतिहास में कई बार कमजोर ने मजबूत को शिकस्त दी है । माना कि हमारी हार हुई है और हमसे गलती हुई है । हो सकता है आगे भी हार और गलती हो । राजनीति में कोई भी निर्भूल नहीं होता लेकिन आंदोलन का क्रांतिकारीकरण ऐसी गति को जन्म देता है कि हम अपनी सीमाओं को पार कर जाते हैं । कभी कभी बौद्धिक और राजनीतिक साहस जरूरी हो जाता है । वामपंथी लोग इतने दिनों से हार रहे हैं कि उनको इसकी आदत पड़ गई है लेकिन लेखक का आग्रह है कि बुरी आदतों को जितनी जल्दी हो सके छोड़ देना ठीक होता है ।

Wednesday, June 7, 2017

एंगेल्स की शाहकार किताब

            
                                
2010 में त्रिस्तम हन्ट की नई भूमिका के साथ एंगेल्स की महान किताब द ओरिजिन आफ़ द फ़ेमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एंड द स्टेटका प्रकाशन फिर से पेंग्विन बुक्स से हुआ । भूमिका इतनी महत्व की है कि उसका स्वतंत्र परिचय भी मूल पुस्तक के परिचय से कम जरूरी नहीं है । किताब के लिखे जाने की कहानी यह है कि 1883 में मार्क्स के देहांत के बाद उनके कागजों को एंगेल्स ने जब उलटना शुरू किया तो उनमें एक ऐसा दस्तावेज मिला जिसने एंगेल्स का ध्यान तुरंत खींचा । 1877 में प्रकाशित अमेरिकी मानवशास्त्री हेनरी मार्गन की किताबएनशिएन्ट सोसाइटी: रिसर्चेज इन द लाइन्स आफ़ ह्यूमन प्रोग्रेस फ़्राम सेवेजरी थ्रू बार्बरिज्म टु सिविलाइजेशनसे ढेर सारे उद्धरण और उन पर टिप्पणियां दर्ज थीं । इन्हें पढ़कर एंगेल्स ने उत्तेजना में काउत्सकी को पत्र लिखा कि जैसे डार्विन का क्रांतिकारी महत्व जीव विज्ञान के लिए है उसी तरह मार्गन की इस किताब का महत्व आदिम समाज के सिलसिले में होगा । मार्क्स की इन्हीं टिप्पणियों से प्रेरित होकर एंगेल्स ने अपनी किताब लिखी ।
इस किताब में एंगेल्स की खूबियों के दर्शन होते हैं । बीसवीं सदी में जिन देशों में मार्क्सवादियों के शासन स्थापित हुए उनमें स्त्रियों के संबंध में बने कानूनों पर इस किताब का प्रत्यक्ष प्रभाव सर्वविदित है । यहां तक कि पश्चिमी देशों के समाजवादी नारीवाद के पीछे भी इस किताब का स्पष्ट प्रभाव है । इसमें लैंगिक विषमता पर जोरदार हमला किया गया है, परिवार संस्था की ऐतिहासिक आलोचना की गई है और उत्तर-समाजवादी देशों में इस किताब की मान्यताओं की विरासत बनी हुई है । इन सबके चलते यह किताब आधुनिक सामाजिक संबंधों को समझने के लिए बुनियादी दृष्टि प्रदान करती है ।
मार्गन अमेरिकावासी विकासवादी मानवशास्त्री थे और वे मानव समाज के प्रगतिशील विकास की धारणा में यकीन करते थे । मार्गन के अनुसार बर्बरता से सभ्यता की ओर सामाजिक विकास का प्रत्येक चरण भरण पोषण के बढ़ते हुए स्रोतों का परिणाम था जो परिवार के बदलते हुए रूपों में प्रतिबिम्बित होता है । मार्गन भी डार्विन की जैव विकासवादी सैद्धांतिकी से प्रभावित हैं और मानते हैं कि बर्बरता से पहले के मनुष्य वानराभ प्राणी जैसे ही थे और आग, तीर-धनुष तथा पत्थर की कुल्हाड़ी के सहारे लम्बे समय में विकसित होते रहे । सभ्यता में प्रवेश से पहले मनुष्य खेती-बारी, पशुचारण और लौह अयस्क गलाने का काम सीख चुका था ।
मार्गन का कहना था कि इनमें से प्रत्येक युग की अलग पारिवारिक संरचना थी । परिवार का ढांचा स्थिर नहीं समाज के विकास के साथ ही विकासमान रहा है । उनका मानना था कि शुरू में अर्थात बर्बर अवस्था में सामूहिक विवाह व्यवस्था का चलन था और यौन स्वतंत्रता अबाध थी । इसी अवस्था में युग्म विवाह की शुरुआत हुई और उसी के साथ गोत्र आधारित समाज का विकास हुआ । विवाहित युग्म सामुदायिक वंशगत आवासों में रहते थे । इसी के बाद पितृसत्तात्मक परिवार का विकास हुआ जिसमें मुखिया पुरुष होता था और उस परिवार में एकाधिक पीढ़ियों का एक साथ रहना होता था । मुखिया का पत्नियों, बच्चों, गुलामों और नौकरों पर अधिकार होता था । बर्बरता के अंतिम चरण में एक-पत्नी-व्रती परिवार का उदय हुआ । इसमें पुरुष का परिवार पर पूरा स्वामित्व स्थापित हुआ । विभिन्न समाज इसी रास्ते पर भिन्न भिन्न गति से आगे बढ़े ।
इस समूचे शोध के दौरान मार्गन को अचम्भा इस बात पर हुआ कि कई बार भाषा परिवार के मौजूदा रूप के मेल में नहीं होती थी । उनके अपने समय में एक-पत्नी-व्रती परिवार की बहुलता के बावजूद भाषा में विचित्र यौन संबंधों के अवशेष मौजूद थे । लगता था जैसे भाषा में अतीत के पारिवारिक रूपों के कंकाल बचे रह गए । मार्गन को जो चीज भाषा में मिली उसी के सहारे एंगेल्स ने पुराने पारिवारिक स्वरूपों को तलाशने की कोशिश शुरू की । परिवार के इस पुराने रूप को बदली समार्थिक ताकतों के चलते बदलना पड़ा था । मार्गन की खोज ने उत्पादन के साधनों के स्वामित्व में बदलाव के साथ परिवार के रूप में बदलाव की बात साबित कर दी । मनुष्य के प्राकृतिक अस्तित्व की प्रथम अवस्था में कबीला, जमीन पर उसका सामुदायिक स्वामित्व और इसी तरह की पारिवारिक संरचना थी । मार्गन की किताब मार्क्स और एंगेल्स के लिए कच्चा माल बन गई क्योंकि आदिम इतिहास में उनकी घनघोर रुचि थी ।
एंगेल्स की विशेष रुचि का एक कारण स्त्री समस्या के बारे में प्रकाशित अगस्त बेबेल की किताब थी जिसमें बेबेल ने कहा था कि इतिहास के आरम्भ से ही स्त्रियों और मजदूरों का दमन उत्पीड़न आम बात रहा है । बेबेल के अनुसार परिवार के विकास से पहले से ही स्त्री कबीले की संपत्ति मानी जाती थी और उसे इनकार करने का अधिकार नहीं होता था । यही बात कार्ल काउत्सकी ने भी आदिम यौन संबंधों पर लिखी एक लेखमाला में दोहराई । इससे एंगेल्स को भू-स्वामित्व के आरम्भिक तरीकों और विवाह पद्धतियों के बीच संबंध महसूस हुआ । अगस्त बेबेल और काउत्सकी के विपरीत एंगेल्स का कहना था कि आदिम मानव समाज में पितृसत्ता नहीं थी बल्कि सामुदायिक यौन संबंधों की व्यवस्था रही होगी । आदिम समाज में स्त्री का उत्पीड़न उन्हें आधुनिक विकार का प्रक्षेपण महसूस हुआ । आधुनिक समाज में आकर यौन स्वच्छंदता पुरुष का विशेषाधिकार बना, अतीत में यह सुविधा पुरुष के साथ स्त्री को भी प्राप्त थी । मार्गन की किताब के बारे में मार्क्स की टिप्पणियों से एंगेल्स को अपनी मान्यता की पुष्टि मिलती लगी और इसके आधार पर उन्होंने अगस्त बेबेल और काउत्सकी की अनैतिहासिक मान्यता के विरोध में लिखने का निश्चय किया क्योंकि मार्गन की किताब पढ़ने का मौका सबको नहीं भी मिल सकता था ।
एंगेल्स ने काउत्सकी को पत्र लिखकर सूचित किया था कि मार्गन की खोज से इतिहास के भौतिकवादी नजरिए की पुष्टि होती है । अतीत को समझने का यह नजरिया मार्क्स और एंगेल्स ने शुरू में ही विकसित कर लिया था जिसमें धर्म, वर्ग, राजनीतिक प्रणाली आदि सामाजिक संरचनाओं को आर्थिक और तकनीकी ताकतों का उत्पाद माना गया था । इसमें सबसे महत्वपूर्ण तत्व संपत्ति संबंध थे । इसके आधार पर सबसे अधिक रूपायित होने वाला तत्व राज्य था । संपत्ति संबंधों के अनुरूप राजनीतिक व्यवस्था का रूपांतरण होता चलता है । इस रूपांतरण का संचालक वर्ग संघर्ष होता है । यह तो मार्क्स एंगेल्स की सामान्य ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि थी । मार्गन की खोज से परिवार भी अधिरचना के विभिन्न पहलुओं में शामिल हो गया जो उत्पादन में होने वाले बदलावों के अनुरूप बदलता दिखाई पड़ने लगा । एंगेल्स ने अपनी किताब के पहले संस्करण की भूमिका में इस बात पर खासा जोर दिया ।
मार्गन की यही बात एंगेल्स ने ग्रहण की कि परिवार भी धर्म, राजनीति और संस्कृति की तरह उत्पादन पद्धतियों से उपजा है । अत्यंत आदिम अवस्था के बाद जैसे जैसे श्रम की उत्पादकता बढ़ती गई उसी तरह विनिमय, निजी संपत्ति, तकनीक और विषमता में भी बढ़ोत्तरी हुई । इसके साथ ही पहले से मौजूद सामाजिक संरचनाओं पर दबाव तेज होने लगा । उत्पादन पद्धतियों में बदलाव के साथ ही बदलते परिवार का स्वरूप आज निजी संपत्ति की प्रभुता के अनुरूप एक-पत्नी-व्रती आधुनिक परिवार में प्रकट हुआ है । इसका विकास आदिम, प्राकृतिक सामुदायिक संपत्ति पर निजी संपत्ति की विजय के समानांतर हुआ है । एंगेल्स ने मार्गन की खोज के साथ मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद को जोड़ने के अतिरिक्त एक बुनियादी बात कही । उनके अनुसार किसी भी समय और देश के सामाजिक संगठन के निर्धारण में एक ओर मजदूर के विकास की अवस्था तो दूसरी ओर परिवार के विकास की अवस्था निर्णायक होते हैं । इस मान्यता के साथ ही मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में स्त्री का सवाल बहुत ऊपर उठ गया । उत्पादन संबंधों के साथ ही मनुष्य के पुनरुत्पादन और परिवार के संचालन में स्त्रियों की भूमिका को भी महत्व दिया गया ।
इसी आधार पर एंगेल्स ने मानव इतिहास में स्त्री की संप्रभुता में कमी की बात उठाई । पहले ही एंगेल्स इस बात को मानते थे कि आदिम समाज में संतान की माता ही निश्चित की जा सकती थी । इसके चलते स्त्री का सम्मान तो होता ही था उसका सामाजिक प्राधिकार भी मजबूत था । मार्गन ने जिस कबीले का अध्ययन किया था वहां स्त्रियों को बुर्जुआ समाज के मुकाबले अधिक स्वतंत्रता हासिल थी । लेकिन एकल परिवार में संक्रमण के साथ स्त्री की स्वतंत्रता का क्षरण क्यों हुआ ? इसके जवाब में एंगेल्स कहते हैं कि श्रम विभाजन और निजी संपत्ति पर आधारित पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के आगमन के साथ ही आए एकल परिवार में विरासत का हस्तांतरण पिता से पुत्र को होना शुरू हुआ । इसके लिए पुत्र के जैविक पिता का निश्चय और स्त्री स्वच्छंदता पर बंधन जरूरी था । स्त्री की ऐतिहासिक हार हुई । घर में भी पुरुष का स्वामित्व कायम हुआ और स्त्री गुलाम बनी । उसे पुरुष की वासना को संतुष्ट करना था और संतान पैदा करनी थी । संतान के पितृत्व को निश्चित करने के लिए स्त्री पर पुरुष का स्वामित्व थोपा गया । अगर वह अपनी पत्नी की हत्या भी कर दे तो अपने अधिकार का इस्तेमाल कर रहा होगा । स्त्री को पातिव्रत्य निभाना था, पुरुष ने अपने लिए स्वच्छंदता का अधिकार सुरक्षित रखा ।
एंगेल्स के इस विश्लेषण के चलते लैंगिकता ऐतिहासिक और सामाजिक निर्मिति की तरह नजर आने लगी । जहां अगस्त बेबेल ने पुरुष प्रभुत्व को अनादि काल से मौजूद माना था वहीं एंगेल्स ने उसे हाल की परिघटना साबित किया जिसका उभार निजी संपत्ति के विकास के साथ हुआ । उन्होंने देखा कि पुराने समाजों में स्त्री न केवल स्वाधीन बल्कि सम्मानित भी रही थी । आदिम साम्यवाद के खात्मे के साथ स्त्री की बदहाली शुरू होती है । इससे तय हुआ कि पुरुष प्रभुत्व अस्थायी है और लैंगिक विषमता का संबंध शरीर से नहीं, बल्कि खास आर्थिक व्यवस्था से है । इतिहास की गति में जैसे पूंजीवाद को खत्म होना है उसी तरह पुरुष प्रभुत्व भी समाप्त होगा । अपनी इस घोषणा के कारण एंगेल्स की यह किताब स्त्री समुदाय के लिए आशा का संदेश लेकर आई थी ।
मार्क्स और एंगेल्स ने जर्मन विचारधारा में ही आधुनिक श्रम विभाजन को घर के भीतर तक विस्तारित होते हुए देखा था । उनके मुताबिक निजी संपत्ति और विषमता का नाभिक परिवार के भीतर होता है जहां पत्नी और बच्चों की स्थिति दासों के समान होती है । एंगेल्स इससे आगे बढ़कर कहते हैं कि सामाजिक वर्गों के बीच शत्रुता के बीज आधुनिक एकल परिवार में पुरुष द्वारा स्त्री के उत्पीड़न में हैं । सामाजिक उत्पादन से विरहित और घरेलू कामकाज की निजी दुनिया में धकेल दी गई स्त्री अपने पति की नौकरानी बनकर रह जाती है । परिवार के भीतर संपत्ति का मालिक होने के चलते पुरुष बुर्जुआ होता है और पत्नी सर्वहारा होती है । एंगेल्स के क्रोध का विषय आधुनिक बुर्जुआ परिवार है जिसके भीतर व्यापक विषमता संस्थाबद्ध होती है । इसको वे पूंजीवादी वर्गीय संबंधों का लघु विश्व समझते थे । परिवार के भीतर की नैतिकता का ही पूरक बाहर का पाखंड भरा आचरण होता है । एकल परिवार का द्वंद्वात्मक विपरीत वेश्यावृत्ति है । मजदूर से पत्नी का अंतर यह होता है कि मजदूर अपने शरीर को टुकड़ा टुकड़ा रोज बेचते हैं जबकि पत्नी उसे एक ही बार जिंदगी भर के लिए सौंप देती है । 
एंगेल्स के अनुसार वेश्यावृत्ति और विवाहेतर संबंध एकल विवाह संस्था की अप्राकृतिक मांगों और परिवार के भीतर असमान शक्ति संबंधों का परिणाम होते हैं । परिवार की आधुनिक संस्था का निर्माण ही स्त्री की गुलामी के आधार पर हुआ है इसलिए इसमें पूंजीवादी व्यवस्था की तरह ही तनाव और अंतर्विरोध हमेशा बने रहेंगे । वंश परंपरा को बनाए रखने के लिए विवाहेतर संबंधों को क्रूरता के साथ दंडित किया जाएगा लेकिन उनकी मौजूदगी बनी रहेगी । पाखंड यह है कि पुरुष ने अपने लिए इन संबंधों का अधिकार सुरक्षित रखा और स्त्री से इसे छीन लिया । परिवार के इस रूप नें मजदूर वर्ग पर भी प्रभाव डाला । एंगेल्स को आशा है कि पूंजीवाद ने जिस तरह स्त्री को भी कारखाने के कामगार बना डाला है उससे मजदूरों के परिवार के भीतर उसके उत्पीड़न का कोई भौतिक आधार नहीं रह गया । एकल परिवार के आगमन के साथ जुड़े स्त्री के साथ क्रूर व्यवहार के अवशेष मात्र इन परिवारों में दिखाई देते हैं । फिर भी स्त्री की पराधीनता पूंजीवाद के जरिए नहीं खत्म होगी बल्कि साम्यवाद में ही इसकी समाप्ति संभव है । विरासत में मिलने वाली संपत्ति को साझा सामाजिक संपदा में बदलकर ही परिवार के वर्तमान रूप को बदला जा सकता है । काउत्सकी को लिखी एक चिट्ठी में एंगेल्स ने लिखा कि पुरुष और स्त्री के बीच सच्ची समानता तभी स्थापित हो सकती है जब पूंजी का शोषण खत्म हो और घरेलू काम को सार्वजनिक उद्योग में बदल दिया जाए । शायद चार्ल्स फ़ूरिए के चलते एंगेल्स को साम्यवाद के दौरान यौन और पारिवारिक संबंधों में मार्क्स से अधिक रुचि थी । एंगेल्स को लगता था कि विवाह का आधार आपसी पसंद के अतिरिक्त कुछ और नहीं होना चाहिए और ऐसा प्रेमवश ही हो सकता है । साम्यवाद में परिवार का एक नया रूप स्थापित होगा जो आदिम स्वतंत्रता के माहौल में मौजूद रिश्तों का उन्नत स्वरूप होगा ।
हन्ट का कहना है कि परिवार के इतिहास के सिलसिले में जितनी मौलिक बातें एंगेल्स ने कहीं उतनी मौलिक बातें राज्य की उत्पत्ति के सिलसिले में नहीं कहीं लेकिन उसमें भी मार्क्स-एंगेल्स की विकसित सोच दिखाई देती है । घोषणापत्र में उन्होंने लिखा था कि आधुनिक राज्य समूचे पूंजीपति वर्ग के मामलों की देखरेख करने वाला प्रबंधक निकाय भर होता है । इस किताब में उनका कहना है कि आदिम सामुदायिकता की समाप्ति और विरोधी कबीलों तथा वर्गों की उत्पत्ति के साथ राज्य एक अनिवार्य बुराई की तरह सामने आया । इन विरोधी वर्गों के टकरावों से ऊपर उठकर वह समाज को निर्देशित करने लगा । इसके साथ ही इन विरोधी वर्ग हितों के बीच राज्य के विभिन्न निकायों पर कब्जे की लड़ाई शुरू हो गई । आर्थिक रूप से दबंग वर्ग का मजबूत राज्य उत्पीड़ित वर्ग को दबाने और उसका शोषण करने लगा । बहरहाल पूंजीवादी उत्पादन संबंध और एकल परिवार की तरह ही एंगेल्स राज्य प्राधिकार के वर्तमान रूप को ऐतिहासिक माना । साम्यवादी क्रांति वर्तमान सामाजिक वर्गों को खत्म कर देगी और इसके साथ ही उन वर्गों को उनकी जगह पर बनाए रखने वाले राज्य का भी समापन होगा । वह पुरातात्विक वस्तुओं के संग्रहालय में मिला करेगा ।
आजकल इस किताब की अधिकांश मान्यताओं पर सवाल उठाया जाता है । खुद एंगेल्स के अनेक राजनीतिक फैसलों की आलोचना की जाती है । सही है कि मताधिकार संबंधी आंदोलन को एंगेल्स मध्यवर्गीय आंदोलन मानते थे लेकिन इसके कारण महिलाओं को वोट देने से उन्होंने कभी परहेज नहीं किया । इससे एंगेल्स के व्यक्तिगत और दार्शनिक जीवन के बीच तनाव देखने का भी मौका मिला है । बहुत कम चिंतक ऐसे रहे हैं जिनका जीवन उनके आदर्शों के अनुरूप बीता हो और एंगेल्स के साथ तो और बड़ी समस्या थी । कपड़ा मिल मालिक के बतौर उनके अस्तित्व और उनकी राजनीतिक सोच में बहुत विराट खाई थी । स्त्रियों के साथ उनके संबंधों की भी पर्याप्त चर्चा हुई है । बाद में उनके प्रगाढ़ रिश्ते आयरलैंड की मिल मजदूर मेरी बर्न्स से बने । बीस सालों तक यह रिश्ता चला । मेरी के जरिए ही उनका साबका मानचेस्टर में मौजूद लघु आयरलैंड से हुआ जो ज्यादातर मजदूरों की बस्ती था । इसके चलते ही उनकी समाजवादी सोच को ठोस आधार मिला । हालांकि इस रिश्ते में भी बहुतों को मालिक गुलाम का शक्ति संबंध महसूस होता है । सही है कि मेरी से एंगेल्स ने कभी विवाह नहीं किया लेकिन लगाव बहुत जबर्दस्त था । उनकी मृत्यु पर वे बेहद दुखी हुए ।  फिर जल्दी ही मेरी की बहन लिज़ी के साथ एंगेल्स के रिश्ते बन गए । लिज़ी पढ़ी लिखी नहीं थीं लेकिन एंगेल्स उनकी समाजवादी भावना का बहुत सम्मान करते थे । लिज़ी के साथ ही वे मानचेस्टर से लंदन रहने आए और उनके साथ ही लिज़ी के देहांत तक रहे । लिज़ी के देहांत से कुछ क्षण ही पहले एंगेल्स ने खोजकर एक पादरी बुलाया और लिज़ी की इच्छा का सम्मान करते हुए चर्च के नियमों के अनुसार विवाह किया ।
हन्ट ने उस जमाने की अधिकांश मध्यवर्गीय स्त्रियों के विचारों की एंगेल्स की आलोचना को उनका स्त्रीद्वेष माना है । फिर भी उन्होंने माना है कि इस घेरे के बाहर की जुझारू स्त्रियों की वे हमेशा इज्जत करते रहे थे । लेखक की निजी संकीर्ण्ताओं से अलग यह किताब तत्कालीन समाज की बुनियादी नारीवादी आलोचना है तथा समतापरक साम्यवादी समाज का स्वप्न है । इसी वैचारिक ऊर्जा के चलते बीसवीं सदी में एंगेल्स की यह किताब महत्वपूर्ण साबित हुई । यूरोपीय महाद्वीप में नवजात मार्क्सवादी और समाजवादी आंदोलन के घेरे से बाहर निकलकर स्त्री मुक्ति की राजनीति का व्यापक महत्व प्रतिष्ठित हुआ । स्त्री मताधिकार के आंदोलन में समाजवादी आगे रहे और द्वितीय इंटरनेशनल ने अपने सभी घटक दलों से स्त्री-पुरुष के बीच कानूनी और राजनीतिक समानता के लिए आंदोलन चलाने की अपील की ।                 


Saturday, June 3, 2017

राजनीति में अतिवादी मध्य मार्ग

                    
                                                   
2015 में वर्सो से तारिक अली की पतली सी किताबद एक्सट्रीम सेन्टर: ए वार्निंगका प्रकाशन हुआ । पतली होने के बावजूद किताब वर्तमान राजनीति की एक बेहद निर्णायक परिघटना का खुलासा करती है । वर्तमान राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना है वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच जिसे मध्य मार्ग की राजनीति कहा जाता है उसका दक्षिणपंथ के पास चला जाना । ब्रिटेन में लेबर पार्टी के उदाहरण के जरिए तारिक अली ने इस हालत का विश्लेषण किया है । उनका कहना है कि अमेरिकी लोग तो अपने देश की टूटी फूटी चुनाव आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ जीना सीख चुके हैं और निष्क्रिय प्रतिरोध के बतौर अधिकतर मतदान ही नहीं करते, अमेरिका की तरह ही कनाडा और आस्ट्रेलिया भी लोकतंत्र के विनाश के रास्ते पर हैं लेकिन यूरोप में भी लोकतंत्र गंभीर खतरे में आ गया है । उनका कहना है कि पचीस साल पहले बर्लिन की दीवार के गिरने के साथ रूसी समाजवाद का जो भी हुआ हो यूरोपीय सामाजिक जनवाद तो  गर्त में चला गया । पूंजीवाद की जीत हुई थी और अपने ही पुराने सामाजिक कार्यक्रमों को जारी रखने का उसका कोई इरादा नहीं था । इसी से अतिवादी मध्य मार्ग का जन्म हुआ ।
2000 में स्पेन को छोड़कर अधिकांश पश्चिमी यूरोप में सामाजिक जनवादी पार्टियों या उनके नेतृत्व वाले गठबंधनों का शासन था । इन पार्टियों ने ऐसी कोई नीति नहीं लागू की जिससे उनके मतदाताओं की जिंदगी में बेहतरी आती । पूंजीवाद पर जीत का नशा छाया हुआ था, कहीं से उसे कोई चुनौती नहीं मिलनी थी इसलिए किसी सुधार के जरिए अपने वाम हिस्से को बचाने की उसे कोई जरूरत नहीं महसूस हुई । विषमता घटाने के लिए संपत्ति के प्रतीकात्मक बंटवारे की भी बात करना जुर्म था । ऐसे हालात में सामाजिक जनवाद व्यर्थ की चीज हो गया । अपने पारंपरिक समर्थकों को वह या तो भय या खोखले नारे परोस रहा था । नतीजतन उसके समर्थक या तो दक्षिणपंथ की ओर चले गए या राजनीति और समूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर होते गए । यूरोपीय राजनीति भी अमेरिकी रास्ते पर चल पड़ी । उसमें समान नीतियों को मानने वाले दो प्रत्याशियों के बीच चुनने की मजबूरी का प्रवेश हुआ । लोकप्रिय संस्कृति के व्यापक अमेरिकीकरण के बाद राजनीति कितने दिनों तक इस प्रभाव से बची रह सकती थी लेकिन अमेरिका के समक्ष सामाजिक जनवाद के घुटने टेकने के मामले में ब्रिटेन की ब्राउन और ब्लेयर की लेबर पार्टी जैसी तत्परता अन्य किसी यूरोपीय देश ने नहीं दिखाई ।
रीगन और थैचर के बाद अमेरिका और ब्रिटेन में सत्ता जिसकी भी रही हो हित नागरिकों की जगह पूंजी के ही सधे । निर्वाचित संसद कारपोरेट हितों पर मुहर लगाती रही । आज यूरोप और अमेरिका के नेता पारंपरिक राजनीति के सभी रूपों से पूरी तरह अलग हो चुके हैं । नई तकनीकों ने गुटीय शासन चलाने में आसानी पैदा कर दी है । हालत यह है कि ये नेतागण ऐसी गुफा में बैठे रहते हैं जहां तक केवल धन्नासेठ और व्यवसायी, पालतू मीडियाजन, उनके सलाहकार और किस्म किस्म के चाटुकार ही जा पाते हैं । वे धन संपत्ति, आंकड़ों और प्रचारकों की छद्म दुनिया में रहते हैं । चुनाव अभियान के अतिरिक्त जीवित मनुष्यों से उनका संपर्क न्यूनतम होता है । जनता के सामने उनका चेहरा टेलीविजन या फोटो के जरिए प्रकट होता है । वे जिनकी जिंदगी का सुख चैन छीन लेते हैं अपने सिंसाहन से नीचे उतरकर उनसे बात करने को राजी नहीं होते । सत्ता में रहते हुए वे आलोचना को गद्दारी की तरह देखते हैं और उन पर निर्भर होते जाते हैं जो अपने को लोगों की किस्मत संवारने में सक्षम मानते हैं ।
चूंकि राजनीतिक मतभेद न्यूनतम होता है इसलिए सत्ता पर कब्जा जमाना साध्य हो जाता है ताकि गद्दी पर रहते हुए संपत्ति इकट्ठा किया जाए और पद छोड़ने के बाद भारी फ़ीस लेकर सलाह देने का काम मिलता रहे । इस समय सत्ता और संपत्ति की पारस्परिकता सर्वत्र अति पर है । व्यवस्था के गुलाम ऐसे ही पालतू नेताओं के पुनरुत्पादन को तारिक अली ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका की राजनीतिक मुख्य धारा का अतिवादी मध्य मार्ग कहा है । किताब में ब्रिटेन को उदाहरण के बतौर इस्तेमाल करने पर सफाई देते हुए तारिक अली कहते हैं कि उनका जाना हुआ देश होने के अतिरिक्त इसी देश में नई सहमतिपरक राजनीति की शुरुआत हुई जो धीरे धीरे यूरोप भर में फैलती गई ।
थैचर को मजदूर वर्ग का समर्थन मिला था और इसी समर्थन के बल पर उन्होंने सामाजिकता को सवाल के घेरे में लेते हुए व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया । इसी वैचारिक आक्रामकता को पुख्ता करने के लिए सार्वजनिक आवास व्यवस्था का निजीकरण किया गया और नौकरी को बंधक रखकर कर्ज पर निजी आवास खरीदने का चलन शुरू हुआ । उनके बाद के लेबर शासक कुछ भी न बदलने और पिछली सरकार के कामों को जारी रखने का आश्वासन देकर सत्ता में आए । अस्सी के दशक की प्रतिक्रांति की यह विचारधारात्मक सफलता थी कि थैचर की असली वारिस उनकी सरकार के समय विपक्ष में मौजूद पार्टी बनी । टोनी ब्लेयर की लेबर पार्टी वैचारिक पराजय का जीता जागता नमूना थी । राजनीतिक मतभेद बेहतर विज्ञापन और सट्टा बाजार के प्रबंधन तक सीमित रह गया । शेष यूरोप इस बीमारी से कुछ दिनों तक बचा रहा लेकिन कुछ ही दिनों तक । विदेशों में फौज की तैनाती और घरेलू मोर्चे पर समाज के गरीबों की आमदनी को ऊपरी तबकों तक पहुंचाने का अमेरिकी चलन कमोबेश यूरोप में भी आम हुआ । रीगन के पहली बार राष्ट्रपति रहते हुए निम्न वर्ग की आमदनी में कमी आई और उच्च वर्ग की आमदनी में भारी इजाफ़ा हुआ । इसकी नकल में ब्रिटेन में आय कर घटा दिया गया और राजकीय संपत्ति की बिक्री हुई । नतीजतन ऐसे नव धनाढ्य उद्यमी पैदा हुए जो नियम कायदों की रत्ती भर परवाह नहीं करते थे । सरकारी नीतियों की भोंपू बनी मीडिया की सहायता से उत्पन्न खोखले उन्माद ने सर्वसम्मति स्थापित की । टेलीविजन की दुनिया में जिन्होंने साथ देने से इनकार किया उनकी छुट्टी कर दी गई । राज्य प्रायोजित समरूपता की संस्कृति ने आकार लेना शुरू कर दिया ।
इसी बीच 2008 का वित्तीय संकट आया । इसके असर से एक दूसरा संघर्षरत यूरोप उभरकर सामने आया । ग्रीस, स्पेन और फ़्रांस तथा इटली में इसके अंकुर फूट रहे हैं । इसके बावजूद दुखद है कि राजनीतिक कुलीन वर्ग और वित्तीय संस्थान अब भी कटौती के राज के गुण गाए जा रहे हैं । यह कटौती अपने देश की साधारण जनता के विरुद्ध अमीरों के पक्ष में सरकार द्वारा छेड़ी गई जंग है । राजनीति के स्वरूप के बारे में विचारकों का कहना है कि पार्टी आधारित राजनीति शायद खत्म हो जाएगी । तारिक अली को उम्मीद है कि आगामी दशकों में राजनीति का कोई वैकल्पिक रूप उभरेगा । यह तो ठीक है कि कल्पना के सहारे यथार्थ को बदलना बेहद मुश्किल होता है लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था के समर्थक भी इस समाज को आर्थिक स्थिरता, पूर्ण रोजगार, सतत विकास, सामाजिक समता या व्यक्तिगत स्वाधीनता के अच्छे उदाहरण के बतौर पेश करने की स्थिति में नहीं हैं । वैचारिक और आर्थिक रूप से अपने पुराने दुश्मन को पराजित करने के बाद पश्चिम के विजयी देश लोकतंत्र के धुंधलके में रह रहे हैं ।
अमेरिका और यूरोप के जिन शासक तबकों ने पूर्वी यूरोप की जनता पर जीत हासिल करने के लिए जिस राजनीतिक व्यस्था को सोत्साह और बेशर्मी के साथ प्रोत्साहित किया था खामोशी के साथ अब उसी व्यस्था की कब्र खोद रहे हैं । फिलहाल पूंजीवाद को कंपनियों के बीच के विवादों या संपत्ति अधिकारों का निपटारा करने के लिए समुचित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनी ढांचे की जरूरत तो है लेकिन किसी लोकतांत्रिक ढांचे का दिखावा भी जरूरी नहीं रह गया है । कहना मुश्किल है कि शासक वर्ग लोकतंत्र की जान लेने के बाद उसके कंकाल को कितने दिन ढोएंगे । पश्चिम के लोगों को बेरोजगारी या अर्ध बेरोजगारी, आवास ॠण, बेघरबारी तथा स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात, सूचना प्रसारण और सुलभ सेवाओं खराब की गुणवत्ता का सामूहिक अनुभव हो रहा है । पुराने सोवियत खेमे के देशों की खस्ता होती हालत के साथ ही अमेरिका में मुनाफ़े की गिरावट को रोकने की नई योजना बन रही है । इस मकसद को हासिल करने के लिए जो भी बाधक होगा उसे नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा- चाहे वे देश हों, संस्थाएं हों या नागरिक हों । नई आर्थिक विश्व व्यस्था का नक्शा विश्व बैंक ने बना दिया है । उसमें सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च में भीषण कटौती होगी, अमीरों पर टैक्स घटाकर उसे गरीबों पर लादा जाएगा, बैंक ही ब्याज की दर तय करेंगे, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अबाध होगा, सभी राजकीय उद्यमों का व्यवस्थित निजीकरण होगा और नियम कायदों की कोई जरूरत नहीं रहेगी । पूंजी की तानाशाही के मजबूत खम्भे ये ही होंगे । आगामी दिनों में पूंजीवादी केंद्रों में राजनीति केवल संकेंद्रित अर्थनीति ही नहीं रहेगी । इन सभी बदलावों को सुभीता देने वाला राज्य वित्तीय पूंजीवाद की कार्यकारी समिति की तरह काम करेगा और संकट में उसे डूबने से बचाएगा । इस व्यवस्था को रीगन और थैचर की तरह के राजनेताओं की जरूरत है । रीगन के शासन काल में मुट्ठी भर कट्टर दक्षिणपंथी ही सरकार का कामकाज देखते थे । ब्रिटेन में भी थैचर इसी तरह कुछेक दक्षिणपंथियों की सलाह से काम करती थीं । पूंजी के पक्ष में ये तानाशाह न तो वाम से आए न दक्षिण से बल्कि राजनीतिक मध्य मार्ग ही बाकायदे संसदीय तरीके से चुनाव जीतकर पूंजी की सत्ता के समक्ष घुटने टेक बैठा ।

Friday, June 2, 2017

नव उदारवाद का इतिहास समझने की कोशिश

             
2005 में डेविड हार्वे की किताबए ब्रीफ़ हिस्ट्री आफ़ नियोलिबरलिज्मका प्रकाशन आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से हुआ । फिर 2007 में इसका पेपरबैक संस्करण छपा । किताब में मार्गरेट थैचर और रोनाल्ड रीगन से शुरू करके चीन तक इसके प्रसार की कथा कही गई है । वे बताते हैं कि 1978-80 के साल भविष्य के इतिहासकारों की नजर में दुनिया के समाजार्थिक हालात में क्रांतिकारी बदलाव के साल दिखेंगे । दुनिया की आबादी के पांचवें हिस्से कम्युनिस्ट शासन वाले देश में 1978 में देंग शियाओ पिंग ने उदारवाद की राह पकड़ी । आगामी दो दशकों तक चीन रूपांतरण के इसी रास्ते पर अभूतपूर्व विकास दर के साथ चलता रहा । 1979 में अमेरिका के रिजर्व बैंक के नए गवर्नर ने कार्यभार ग्रहण किया और कुछ ही महीनों में देश की मौद्रिक नीति को बदल डाला । मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए बेरोजगारी को भी बर्दाश्त किया गया । इसी साल ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर प्रधानमंत्री बनीं । उन्हें ट्रेड यूनियनों की ताकत को ध्वस्त करने और मुद्रास्फीतिजनक ठहराव पर काबू पाने का मतादेश मिला था । अगले साल अमेरिका में रोनाल्ड रीगन का चुनाव राष्ट्रपति पद पर हुआ और उन्होंने रिजर्व बैंक की नीतियों को खुला समर्थन देना शुरू किया । इसके साथ ही मजदूरों की ताकत को कम करने, उद्योगों, खेती और संसाधनों के दोहन पर नियम कायदे कमजोर करने तथा देश और दुनिया के स्तर पर वित्त की सत्ता को आजाद करने वाली नीतियों को आक्रामक तरीके से लागू किया जाने लगा । इन्हीं केंद्रों से इस क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत हुई जिसने चारों ओर फैलकर दुनिया की पूरी तरह से नई तस्वीर बना दी । हार्वे का कहना है कि इतने बुनियादी बदलाव संयोग से नहीं होते । इसलिए उस प्रक्रिया को समझना जरूरी है जिसके सहारे पुरानी दुनिया में से वैश्वीकरण की यह नई दुनिया पैदा हुई । देंग शियाओ पिंग, थैचर और रीगन ने उन विचारों को लोकप्रिय बना दिया जिनकी मान्यता मुट्ठी भर लोगों के बीच सीमित थी हालांकि यह काम बिना किसी बाधा के नहीं संपन्न हुआ ।
इसके बाद वे नवउदारीकरण को समझने की कोशिश करते हैं । इसे वे खास तरह का राजनीतिक अर्थतांत्रिक व्यवहार बताते हैं जिसमें माना जाता है कि निजी संपत्ति, मुक्त बाजार और मुक्त व्यापार के मजबूत सांस्थानिक ढांचे में लोगों की स्वतंत्र उद्यमशीलता को खोल देने से ही मानव जीवन में खुशहाली लाई जा सकती है । सरकारों का काम इसी ढांचे को बनाना और टिकाए रखना है । राज्य को मुद्रा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखनी होगी । उसे निजी संपत्ति के अधिकारों और बाजार के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक सेना, सुरक्षा, पुलिस और कानून-अदालत का इंतजाम भी करना होगा । जमीन, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा या पर्यावरण प्रदूषण जैसे जिन क्षेत्रों में बाजार नहीं है वहां भी जरूरी कदम उठाकर खरीद बिक्री का बाजार स्थापित करना भी राज्य की जिम्मेदारी होगी । इन कामों के अलावे अन्य किसी काम में राज्य को हाथ नहीं डालना चाहिए । बाजार के संचालन में तो राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए क्योंकि उसके पास बाजार संबंधी सूचनाओं का अभाव होता है और लोकतांत्रिक शासन पद्धति में तो मजबूत स्वार्थी समूहों द्वारा राज्य पर पूर्वाग्रही हस्तक्षेप का दबाव डालने की आशंका बनी रहेगी ।
1970 दशक के बाद से राजनीतिक आर्थिक आचरण में सर्वत्र स्पष्ट नवउदारवादी झुकाव लक्षित किया जाने लगा । विनियमन, निजीकरण और तमाम सामाजिक क्षेत्रों से राज्य की वापसी रोजमर्रा की बात हो गई । सभी देशों ने स्वेच्छा से या दबाव के चलते इस नवउदारवादी मंत्र के किसी न किसी रूप को अपनाया और तदनुसार अपनी नीतियां बनाईं । नव स्वाधीन दक्षिण अफ़्रीका और चीन ने भी इसी रास्ते पर कदम बढ़ाए । नवउदारवाद के पैरोकारों ने शिक्षा में, मीडिया में, राजकीय संस्थानों में और वैश्विक वित्त तथा व्यापार को नियंत्रित करने वाले अंतर्राष्ट्रीय निकायों में महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा जमाया । कुल मिलाकर नव उदारवाद वर्चस्वशील विमर्श बन गया । हम सबके सोचने के तरीके में इसका प्रसार इस कदर हो गया है कि दुनिया में रहने और उसे समझने के हमारे सहज बोध का लगभग अंग बन गया है ।
बहरहाल नव उदारीकरण की प्रक्रिया में पुराने सांस्थानिक ढांचों और शक्तियों का निर्माणोन्मुख ध्वंस तो होना ही है, इसके साथ ही श्रम विभाजन, सामाजिक संबंधों, कल्याणकारी प्रावधानों, तकनीकी मिलावटों, जीने और सोचने के तरीकों, पुनरुत्पादक गतिविधियों, जमीन से लगाव और दिल की आदतों के मामले में भी काफी टूट फूट होनी है । नवउदारवाद बाजार विनिमय को सबसे बड़ी नैतिक शक्ति मानता है और इसीलिए वह बाजार में कायम संविदापरक संबंधों के महत्व पर जोर देता है । इसका कहना है कि बाजार आधारित लेन देन के बढ़ने के साथ ही सामाजिक कल्याण का भी विस्तार होगा । इसलिए वह समस्त मानवीय गतिविधि को बाजार में ले आना चाहता है । इसके लिए सूचना निर्माण और भारी आंकड़ों के संग्रह, भंडारण, स्थानांतरण, विश्लेषण और उपयोग में सक्षम तकनीक की जरूरत पड़ेगी ताकि विश्व बाजार में होने वाले फैसलों को सही दिशा दी जा सके । इसीलिए नवउदारवाद में सूचना तकनीक पर इतना जोर दिया जाता है । इन तकनीकों ने बाजार आधारित भारी लेन देन में समय और दूरी को काफी घटा दिया है ।

वैश्विक बदलावों और उनके प्रभावों के बारे में काफी कुछ लिखा गया है लेकिन नवउदारवाद के उदय और विस्तार की राजनीतिक आर्थिक कहानी आम तौर पर कम मिलती है । किताब में इसी कहानी को साफ करने की कोशिश की गई है । हार्वे को लगता है कि इस कहानी को समझने से शायद वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था के बारे में सोचना सम्भव हो सकेगा ।

Thursday, June 1, 2017

मुक्तिबोध के सौ साल

                
                                   
यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि इस साल रूसी बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी के साथ ही मुक्तिबोध के जन्म के भी सौ साल पूरे हो रहे हैं मुक्तिबोध उन विद्रोही साहित्यकारों की महान परम्परा में आते हैं जिन्हें जीवन में सम्मान नहीं मिलता लेकिन देहान्त के बाद क्रमश: महत्वपूर्ण होते जाते हैं संस्कृत भाषा के ऐसे ही कवि भवभूति को अपना समानधर्मा पैदा होने की आशा सुदूर भविष्य में थी क्योंकिकालोह्यं निरवधिर्विपुला पृथ्वी’ (काल अनन्त है और धरती बहुत बड़ी है) ऐसे लेखकों को जीवन में सफलता और सम्मान मिलना ही उनके लिए गर्व की बात होती है । मुक्तिबोध ने जीवन भर अस्थिरता झेली । वे अपनी एक कवितामैं तुम लोगों से दूर हूँमें लिखते हैं-
मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ
तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है
कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है ।

इस कविता में वे अपने और दूसरों के बीच अंतर बताते हैं । यह अंतर दो वर्गों के बीच का अंतर है क्योंकि उनके और दूसरे के साथियों में अंतर है । वे कहते हैं-
मेरी असंग स्थिति में चलता-फिरता साथ है,
अकेले में साहचर्य का हाथ है,
उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैं
किन्तु वे मेरी व्याकुल आत्मा में बिम्बित हैं, पुरस्कृत हैं
इसीलिए, तुम्हारा मुझ पर सतत आघात है !!’

मुक्तिबोध हिन्दी के उन कुछ लेखकों में से एक हैं जिनकी सभी रचनाओं में आपसी संवाद और संगति है । इनमें किसी एक को मुख्य कहना सम्भव नहीं । कवि के रूप में तो वे प्रसिद्ध ही हैं, कहानीकार के रूप में प्रतिष्ठा लायक कहानियों की रचना भी उन्होंने की है । आलोचक के रूप में भी उनका स्मरण किया जाता है और इतिहासकार के बतौर लिखी किताब तो प्रतिबन्धित ही हुई थी । डायरी और निबंध भी उनके लेखन के खास पहलू हैं । पत्रकार के बतौर भी उन्होंने ढेर सारा राजनीतिक लेखन किया । आम तौर पर हिन्दी साहित्य की दुनिया में साहित्यकार के राजनीतिक लेखन पर ध्यान नहीं दिया जाता लेकिन मुक्तिबोध के प्रसंग में यह लेखन उनके शेष लेखन को समझने की कुंजी साबित होता है । इसमें
न केवल अपने समय की विश्व राजनीति पर उनकी पैनी टिप्पणियों के दर्शन होते हैं बल्कि नव स्वाधीन भारत की समस्याओं की भी निर्मम पहचान नजर आती है । वैसे तो कोई भी मार्क्सवादी होकर जन्म नहीं लेता बल्कि इस संसार की गति में पड़कर अपनी जीवन स्थिति के अनुसार आस पास चलने वाले घटनाक्रम से प्रतिक्रिया करते हुए अपने लिए किसी विचारधारा को चुनता है । मुक्तिबोध के मामले में यह वैचारिक संघर्ष अधिक गहरा और तीखा था । उन्होंने मार्क्सवादी विचार को अपने संस्कारों से जूझते हुए अपना बनाया था । इस आत्मसंघर्ष के निशान उनकी सारी रचनाओं में मौजूद हैं । इसी आत्मसंघर्ष के जरिए वे अपने समय के प्रमुख संघर्ष को भी व्यक्त करते हैं । उनके समस्त लेखन के केंद्र में मध्य वर्ग है । ऐसा केवल इसलिए नहीं है कि वे मध्य वर्ग को  जानते थे बल्कि इसलिए कि आजादी के बाद मध्य वर्ग की प्रतिष्ठा में बढ़ोत्तरी हुई थी । इसको ही आजाद देश के लोकतांत्रिक प्रणाली का मूलाधार समझा जा रहा था । स्वाभाविक था कि इस मध्य वर्ग के जीवन की कमजोरियों का प्रभाव हमारे लोकतांत्रिक आचरण पर भी पड़ता । इस मध्य वर्ग को मुक्तिबोध एक अखंड इकाई नहीं मानते । इसके भीतर भी वे वर्ग विभाजन की पहचान करते हैं और निम्न मध्य वर्ग के साथ अपनी पक्षधरता घोषित करते हैं । इसकी कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह उच्च मध्य वर्ग में शामिल होना चाहता है जबकि जीवन के हालात उसे निम्न वर्ग के पास ले आते हैं । उच्च वर्ग में पहुंचने की इस चाहत को पूरा करने के लिए वह अपनी आत्मा को मार डालता है । मध्य वर्गीय व्यक्ति अपनी आत्मा की इस हत्या के क्रम में सभी कोमल भावनाओं को कुचल डालता है । इसके लिए एक उदाहरण के बतौर परिवार के प्रति उनके रुख को देखा जा सकता है । मुक्तिबोध कहते हैं कि हमारे जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना यह है कि राजनीति के एजेन्डे से समाज सुधार का सवाल गायब हो गया है । समाज सुधार के बारे में अगर हम सोचते भी हैं तो समझते हैं कि परिवार समाज से बाहर की कोई चीज है । परिवार के भीतर भी वे वर्ग विभाजन देखते हैं । इसमें बेरोजगार और चूल्हे चौके में लगी हुई स्त्री की स्थिति उन्हें सबसे विपन्न दिखाई देती है । स्त्री के बारे में बात करते हुए ही प्रेम के बारे में मुक्तिबोध की धारणा को स्पष्ट करना जरूरी है । मुक्तिबोध प्रगतिशील साहित्य के रचनाकार थे । सभी प्रगतिशील रचनाकारों के साहित्य में प्रेम का चित्रण ठीक पहले के छायावादी रचनाकारों के चित्रण से भिन्न है । इनके साहित्य में आम तौर पर कर्म सौन्दर्य के दर्शन होते हैं । प्रेम के भीतर भी व्यक्ति अपनी सीमा से ऊपर उठता हुआ चित्रित किया गया है । यहां तक कि उनकी कविता ‘पता नहीं’ में प्रेम के कारण  
‘तुम दौड़ोगे प्रत्येक के
                      चरण-तले जनपथ बनकर ॥
वे आस्थाएँ तुमको दरिद्र करवायेंगी
कि दैन्य ही भोगोगे
पर, तुम अनन्य होगे,     
                        प्रसन्न होगे ॥’
इन कुछेक छोटी कविताओं से मुक्तिबोध के विवेच्य विषय की बस एक झलक मिलती है । उनकी काव्य प्रसिद्धि का कारण तो असल में उनकी लम्बी कविताएं हैं । इनमें ‘अंधेरे में’ शीर्षक कविता आधुनिक हिंदी साहित्य की लगभग सबसे अधिक चर्चित रचना है । इस कविता के बारे में जितना लिखा गया है उतना शायद ही किसी एक रचना के बारे में लिखा गया होगा ।    
हिंदी आलोचना की दुनिया में मुक्तिबोध ‘कामायनी- एक पुनर्विचार’ के कारण अमर रहेंगे । छायावादी कवियों में सुमित्रा नंदन पंत सबसे अधिक राजनीतिक दिखाई देते हैं । निराला के साहित्य में भी निम्न वर्ग के प्रति सहानुभूति प्रत्यक्ष है । महादेवी वर्मा न केवल सुभद्रा कुमारी चौहान की दोस्त थीं बल्कि पर्याप्त सामाजिक चेतना संपन्न भी थीं । उनमें जयशंकर प्रसाद की छवि रहस्यवादी लेखक की थी । उनका यह महाकाव्य भी सतही तौर पर अपने युग की चेतना से जुड़ा हुआ नहीं लगता । मुक्तिबोध ने इसी महाकाव्य की ऐसी व्याख्या की है कि जयशंकर प्रसाद अपने समय के सबसे गंभीर लेखक प्रतीत होने लगते हैं । ‘कामायनी’ की पौराणिक कहानी को उन्होंने फैंटेसी की तरह ग्रहण करके बताया कि इसकी पौराणिकता के भीतर से वर्तमान पूंजीवादी सभ्यता के बुनियादी सवाल झांकते हैं । कामायनी की एक पंक्ति ‘ज्ञान दूर, कुछ क्रिया भिन्न है/ इच्छा क्यों पूरी हो मन की ।/ एक दूसरे से न मिल सके/ यह विडम्बना है जीवन की ॥’ को उन्होंने आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा सवाल बताया । आज का मनुष्य इस मामले में विभाजित है कि उसका ज्ञान कुछ कहता है और करता वह कुछ और है । साथ ही वे यह भी बताते हैं कि जयशंकर प्रसाद ने जितनी बड़ी समस्या उठाई उसके मुकाबले समाधान बेहद कमजोर प्रस्तुत किया । महाकाव्य के अंत में ज्ञान, क्रिया और इच्छा के जो चक्र अलग अलग चल रहे थे उन्हें श्रद्धा की मुस्कान सामंजस्य में ले आती है । इसी समाधान पर मुक्तिबोध ने सवाल उठाया है । प्रसाद जी की कामायनी के पूरे पौराणिक माहौल को समकालीन बनाकर उन्होंने इसके प्रमुख पात्र मनु की अस्थिरता को मध्यवर्गीय चरित्र की विशेषता के रूप में पहचाना । इस व्याख्या के अतिरिक्त हिंदी भक्ति साहित्य के मूल्यांकन के प्रसंग में उनका लेख ‘मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन का एक पहलू’ भी अक्सर उद्धृत किया जाता है । इसमें उन्होंने भक्ति साहित्य को एक प्रक्रिया की तरह देखने की कोशिश की है । उनका कहना है कि भक्ति साहित्य अपने समय के सामाजिक बंधनों से विद्रोह के रूप में प्रकट हुआ था । इस विद्रोह की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति निर्गुण संतों के साहित्य में होती है । ये संत अधिकतर निचली जातियों के थे । बाद में उस आंदोलन में सामज के ऊपरी तबके भी शामिल हुए । ये तबके अपने संस्कारों के साथ इस आंदोलन में शामिल हुए । इस प्रक्रिया में सूरदास की कविता में उसकी क्रांतिकारिता कमजोर पड़ने लगी । तुलसीदास के आते आते इस साहित्य की सारी क्रांतिकारिता समाप्त हो गई । इसी तरह नई कविता नामक साहित्यांदोलन के बारे में भी पूरी तरह से खारिज करने या इसकी अति प्रशस्ति के बदले उन्होंने इसका स्वागत तो किया लेकिन कमजोरियों के विरुद्ध लड़ना भी जारी रखा । इसे वे नई कविता का ‘आत्मसंघर्ष’ कहते हैं । मुक्तिबोध ने काफ़्का की तरह ही रूपकात्मक कहानियां भी लिखीं । उनकी कहानी पक्षी और दीमकसुविधाओं के लिए स्वतंत्रता कुर्बान कर देने की करुण कहानी है । इसी तरह समझौताशीर्षक कहानी नौकरशाही में बास और मातहत के बीच बाघ और रीछ की खाल ओढ़े झूठे और भय पर आधारित संबंधों की विडंबना को उजागर करती है । हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराने वाले क्लाड ईथरली के अपराध बोध कोक्लाड ईथरलीमें दर्ज किया गया है जिसने असल जिंदगी में उस घटना की पचासवीं सालगिरह पर आत्महत्या कर ली थी और जीवित रहते हरेक साल उस घटना की बरसी पर हिरोशिमा जाया करता था ।
मुक्तिबोध को समय बहुत कम मिला । जीवन की अस्थिरता और जीवन संघर्ष ने उम्र के ज्यादातर वर्ष छीन लिए । जीवित रहते उनका लिखा बहुत कम छपा था । भारत के इतिहास पर लिखी उनकी किताब पर प्रतिबंध लग गया था । आज के माहौल में उस किताब को फिर से देखा जा सकता है कि आखिर भारत के इतिहास में उन्होंने क्या ऐसा देख लिया था जो उस समय की ताकतों के लिए असुविधाजनक हो गया था । पहला कविता संग्रह ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ भी उनके देहांत के समय प्रकाशित हुआ । इसके बावजूद पूंजीवाद की उनकी आलोचना, मध्य वर्ग की अवसरवादिता की उनकी परख, आधुनिक सभ्यता की बुनियादी समस्याओं का उनका विश्लेषण इतना प्रभावी था कि जैसे जैसे समय बीतने के साथ लोकतांत्रिक माहौल का क्षरण होता गया और सत्ता की निरंकुश प्रवृत्तियों से जनता का संघर्ष तीखा होता गया वैसे ही वैसे मुक्तिबोध की प्रासंगिकता बढ़ती गई । उनकी कविताओं के टुकड़े क्रांतिकारी विद्यार्थी संगठनों के पोस्टरों पर दिखाई पड़ने लगे । उनमें निम्नांकित अंश तो बेहद प्रेरणादायी था-
‘अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे
उठाने ही होंगे ।
तोड़ने होंगे ही मठ और  गढ़ सब ।
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार’
उनकी कविता ‘अंधेरे में’ में एक जुलूस का वर्णन है जिसमें पत्रकार, विद्वान आदि के साथ हत्यारा डोमा जी उस्ताद भी चल रहा है । लगता है जैसे वे आज के वातावरण की सम्भावना उसी समय देख रहे थे । असल में उस समय के मध्य वर्ग की जिस मानसिकता की पहचान उन्होंने की उसमें उन्हें लोकतंत्र विरोधी फ़ासीवादी तत्वों के उभार की आशंका महसूस हुई थी । आश्चर्य की बात नहीं है कि वही प्रवृत्तियां मुखर होकर आज हत्या और संहार का उल्लास नृत्य कर रही हैं । आजादी के तुरंत बाद की सत्ता के भीतर जिस तरफ जाने के लक्षण मुक्तिबोध को दिखाई पड़े थे उस दिशा में हमारा देश चल पड़ा है । साथ ही सत्ता की तारीफ के कसीदे पढ़ने वाले जिन बौद्धिक क्रीतदासों को उन्होंने जन्म लेते हुए देखा था वे अब पूरी बेशर्मी के साथ जातिवादी और पितृसत्तात्मक सामाजिक वर्चस्व का लाभ ही नहीं उठा रहे हैं बल्कि उसके वाहक भी बने हुए हैं । इनको पहचानने और इनके प्रतिरोध की रणनीति तैयार करने में मुक्तिबोध का साहित्य और भी प्रासंगिक तथा उपयोगी होता जाएगा ।
उनकी कविता ‘पूंजीवादी समाज के प्रति’ की निम्नलिखित पंक्तियों से इस व्यवस्था के प्रति उनके भीतर समाई नफरत का पता चलता है । वे कहते हैं-   
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ
       
जिस कवि ने पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था के प्रति अपनी तीव्र घृणा को इस तरह खुल्लम खुल्ला जाहिर किया हो उसे यह व्यवस्था आखिर क्षमा कैसे कर सकती है । इसकी जिम्मेदारी तो स्वाभाविक रूप से इस व्यवस्था को खत्म करने के इरादे से लड़ने वाले योद्धा ही उठा सकते हैं । इतनी घनघोर अरुचि को साहित्य में अभिव्यक्त करने लायक भाषा उन्हें नहीं मिली इसीलिए उन्हें ढेर सारे नए पदबंध गढ़ने पड़े । भारतीय संस्कृति में प्रचलित सच्चिदानन्द को तोड़कर उन्होंने ‘सत चित वेदना’ जैसा नया पद तैयार किया । जो बात उन्हें कहनी थी उसके लिए नई धारणाओं के साथ नई भाषा के चलते बहुधा उन्हें कठिन और अबूझ मान लिया जाता है । उनके बारे में इस तरह की राय बनाने में आज के बुद्धिजीवियों का थोड़ा स्वार्थ भी छिपा रहता है ।