Saturday, December 2, 2017

धनवान और निर्धन

                 
                                 
2011 में बेसिक बुक्स से ब्रांको मिलानोविक की किताबद हैव्स ऐंड द हैव-नाट्स: ए ब्रीफ़ ऐंड इडियोसिंक्रेटिक हिस्ट्री आफ़ ग्लोबल इनइक्वलिटीका प्रकाशन हुआ । लेखक के अनुसार किताब में इतिहास और वर्तमान में आय और संपत्ति संबंधी विषमता का विवेचन किया गया है ।
उनका कहना है कि सत्ता और संपत्ति का भेद सभी मानव समाजों में पाया जाता है । विषमता सामाजिक परिघटना है और यह सापेक्षिक होती है । इसका अस्तित्व मनुष्यों के ऐसे समूह में होता है जिनके बीच सरकार, भाषा, धर्म या स्मृतियों की साझेदारी हो । किताब में मनोरंजक तरीके से बताया गया है कि हमारे दैनंदिन जीवन के कई क्षेत्रों में आय और संपत्ति संबंधी विषमता मौजूद है । अपने सुपरिचित प्रसंगों को भी दूसरे कोण से देखने पर विषमता नजर आ सकती है । मकसद यह दिखाना है कि अमीरी और गरीबी हमारे जीवन में मौजूद रहे हैं ।
किताब में तीन तरह की विषमताओं को उजागर किया गया है । एक तो वह जो किसी एक ही समुदाय के विभिन्न व्यक्तियों के बीच होती है । इसे हम बहुत आसानी से पहचान सकते हैं क्योंकि यह शब्द सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में इसी किस्म की विषमता का ध्यान आता है । दूसरी वह जो  विभिन्न देशों के बीच मौजूद होती है । जब भी हम किसी अन्य देश की यात्रा पर जाते हैं या अंतर्राष्ट्रीय समाचार देखते हैं तो इस प्रकार की विषमता नजर आती है । कुछ देशों में अधिकांश लोग गरीब नजर आते हैं जबकि कुछ अन्य देशों में अधिकतर लोग अमीर नजर आते हैं । देशों के बीच की यह विषमता प्रवास में भी झलकती है जिसके तहत गरीब देशों के कामगार संपन्न देशों में बेशी कमाई के लिए जाते हैं । तीसरा प्रकार वैश्विक विषमता का है जो ऊपर बताई गई दोनों प्रकार की विषमता का जमाजोड़ है । यह चीज वैश्वीकरण के बाद उभरी है क्योंकि उसके बाद ही हम अपनी हालत की तुलना दूसरे देश के लोगों के साथ करने के आदी हुए हैं । जैसे जैसे वैश्वीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी इस तरह की विषमता का प्रसार होगा ।     
इन विषमताओं को स्पष्ट करने के लिए किस्सों का सहारा लिया गया है । तीनों खंडों के शुरू में संबंधित विषमता के बारे में अर्थशास्त्रियों के लेख दिए गए हैं । किस्सों के मुकाबले लेख थोड़ा अधिक ध्यान की मांग करते हैं । किताब के अंत में आगे के अध्ययन के लिए एक पुस्तक सूची भी दी गई है । लेखक पिछले पचीस सालों से विषमता का अध्ययन कर रहे थे जिसके चलते उनके पास आंकड़ों, सूचनाओं और किस्सों का भंडार जमा हो गया था इसलिए लिखते समय विशेष असुविधा नहीं हुई । साफ है कि किताब के लेखन में लेखक को संख्याओं और इतिहास से अपने लगाव से भारी मदद मिली । इसके जरिए जो लक्ष्य वे पाना चाहते थे वे थे- रोचक तरीके से किस्से पढ़ते हुए पाठक का कुछ नए तथ्यों से परिचय कराना, संपत्ति और आमदनी के मामले में विषमता के दबा दिए गए मुद्दे को चर्चा में ले आना और पुराने किस्म की सामाजिक सक्रियता को प्रेरित करने के लिए खासकर संकट के समय अमीरी गरीबी के सवाल को बहस के केंद्र में स्थापित करना । वे चाहते हैं कि लोग अश्लील किस्म की अमीरी के औचित्य पर सवाल खड़ा करें । वे यह भी चाहते हैं कि देशों के भीतर और देशों के बीच मौजूद भारी विषमता को भी स्वीकार न कर लिया जाए ।

ये ऐसे सवाल हैं जिनकी उपेक्षा आसानी से जनमत के तमाम निर्माता कर बैठते हैं । उनका तर्क होता है कि सभी विषमताओं का जन्म बाजार से होता है और इस पर बहस करने से कोई लाभ नहीं है । लेकिन लेखक का कहना है इनका जन्म बाजार से न होकर राजनीतिक शक्ति की सापेक्षिकता से होता है और बाजार का नाम लेकर इन पर बात करने से बचना मुश्किल है । बाजार आधारित अर्थतंत्र भी समाज की रचना है और इसका निर्माण जनता की सुविधा के लिए हुआ है । इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक समाज में जनता के पास इसके संचालन के बारे में सवाल करने का अधिकार होगा । अंत में लेखक ने कहा है कि उनके तमाम निष्कर्ष विश्व बैंक के सर्वेक्षणों पर आधारित गणना से हासिल है ।

Thursday, November 23, 2017

उत्तर औद्योगिक समाज: एक साहित्य सर्वेक्षण

          
                                                            
बहुत सरल शब्दों में कहें तो उत्तर औद्योगिक समाज ऐसा समाज होता है जहां के सकल अर्थतंत्र में औद्योगिक गतिविधियों के मुकाबले सेवा क्षेत्र में अधिक लाभ होने लगे । इस पद को जन्म देने का श्रेय अलैं तूरें को जाता है । इस परिघटना को समझने के लिए सूचना समाज, ज्ञान अर्थतंत्र और नेटवर्क समाज जैसे पदों का भी प्रयोग किया जाता है । इसे समाज में उत्पादक गतिविधियों के मुकाबले सेवाओं के प्रावधान की ओर अर्थतंत्र के रूपांतरण से भी पहचाना जाता है । साफ है कि ज्ञान भी जब पूंजी का मूल्य महत्व प्राप्त करने लगे तो मूल्य का स्रोत शारीरिक श्रम से अधिक मानसिक श्रम समझा जाने लगता है । स्वाभाविक है कि यदि किसी समाज में उत्पादन की प्रमुखता नहीं होगी तो उस समाज में उपभोक्ताओं का ही बोलबाला होगा । इसलिए इसे उपभोक्तावाद के उभार के रूप में भी देखा जाना चाहिए । सवाल यह भी है कि उपभोग करने के लिए उत्पादन होना तो होगा ही, भले यह उत्पादन उस देश में न हो जहां मजदूरी ज्यादा देनी हो और उद्योगों को वहां स्थानांतरित कर दिया जाए जहां सस्ता श्रम और संसाधन मुफ़्त हासिल हों । इसी के चलते इस परिघटना को साम्राज्यवाद की ही निरंतरता मानकर गरीब मुल्कों के नवउपनिवेशीकरण की जटिल प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए ।   
तूरें के बाद इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन के रूप में डैनिएल बेल की किताब ‘द कमिंग आफ़ पोस्ट-इंडस्ट्रियल सोसाइटी: ए वेन्चर इन सोशल फ़ोरकास्टिंग’ का नाम लिया जाता है । ढेर सारे लोग बेल को ही इस धारणा और पदावली का उद्भावक मानते हैं । इस किताब का प्रकाशन पहली बार 1973 में बेसिक बुक्स से हुआ था । उसके बाद 1976 और 1999 में भी उसके संस्करण निकले जिनके लिए लेखक ने अलग से प्रस्तावनाएं लिखीं । किताब के संस्करणों की इस निरंतरता से ही इस धारणा की लोकप्रियता और इस धारणा को स्थापित करने में उल्लिखित किताब का महत्व समझा जा सकता है । साठ के विद्रोही दशक के बाद का सत्तर का दशक पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका में कुछेक बुनियादी बदलावों का दशक माना जाता है । खास बात यह है कि साठ के दशक से बदलाव की जो ताकतें पैदा हुईं उन पर भी सत्तर के बदलावों का गहरा असर पड़ा और उन्होंने नए रूप धारण किए । इस अर्थ में उत्तर औद्योगिक समाज कोई इकहरी परिघटना नहीं है बल्कि वह एकाधिक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों का समुच्चय है । हमेशा की तरह ही बदलाव के शुरू के दिनों में उसकी नवीनता का पता नहीं चला लेकिन हाल के दिनों में आकर उस समय शुरू हुए बदलावों का अनुभव अत्यंत मारक और आत्मघाती हो चला है । इस संक्षिप्त आलेख में उन सभी बदलावों का विवेचन संभव नहीं है इसलिए उनमें से कुछेक की ही चर्चा की जाएगी । वैसे भी सामाजिक बदलाव बेहद जटिल प्रक्रिया होती है जिसके सभी रेशों को अलगाना कई बार संभव नहीं होता ।
उत्तर औद्योगिक समाज पर विचार करने वाली किताबों में मासाचुसेट्स इंस्टीच्यूट आफ़ टेक्नोलाजी प्रेस से प्रकाशित डैनिएल कोहेन की फ़्रांसिसी में प्रकाशित किताब का अंग्रेजी अनुवादथ्री लेक्चर्स आन पोस्ट-इंडस्ट्रियल सोसाइटी’ 2009 में छपा । किताब में लेखक ने बताया कि मार्क्स के मुताबिक इतिहास कुछेक चरणों से होकर गुजरता है और पूंजीवाद भी एक चरण है । पूंजीवाद का भी इतिहास है । बीसवीं सदी का पूंजीवाद उन्नीसवीं सदी के पूंजीवाद से अलग किस्म का था और आज का पूंजीवाद बीसवीं सदी के पूंजीवाद से अलग किस्म का है । बीसवीं सदी के पूंजीवाद के केंद्र में औद्योगिक कारखाना था । इसके इर्द गिर्द काम करने वालों के बीच आंगिक जुड़ाव होता था । इंजीनियरों का काम अकुशल मजदूरों को दीक्षित करना होता था । प्रबंधक लोग अन्य सभी लोगों की तरह ही वेतनभोगी हुआ करते थे और उनका काम आर्थिक उलटफेर से संस्थान की रक्षा करना होता था । इसके लिए सभी कारखाने सुरक्षा के उपाय करते थे ताकि कामगारों को काम मिलना बंद न हो । सामंती समाज की तरह ही बीसवीं सदी का औद्योगिक समाज उत्पादन के साथ ही रक्षा की व्यवस्था भी निर्मित करता था । इक्कीसवीं सदी का पूंजीवाद व्यवस्थित रूप से औद्योगिक समाज को ध्वस्त करने में मुब्तिला है । आपस में जुड़ी हुई औद्योगिक इकाइयों को एक दूसरे से अलगाया जा रहा है । जिन कामों को गैर जरूरी माना जा रहा है उन्हें ठेके पर दिया जा रहा है । इंजीनियरों को प्रयोगशालाओं में ऐसे काम दिए जा रहे हैं जिनके चलते मजदूरों से उनका सम्पर्क नहीं रह जाता है । इसके चलते सभी कामगार और परोक्ष रूप से समूचा समाज सुरक्षाविहीन हो गया है । उत्तर औद्योगिक समाज क्या है इसके लिए यह जानना होगा कि वह क्या नहीं है । अर्थ कि औद्योगिक गतिविधियों की अनुपस्थिति से उत्तर औद्योगिकता परिभाषित होती है । रोजगार भी उद्योग के मुकाबले सेवा क्षेत्र में अधिक मिल रहा है इसलिए सकारात्मक तरीके से कहें तो यह सेवा समाज कहा जाएगा । ऐसे ही एक सदी पहले कृषि के मुकाबले उद्योग की ओर रूपांतरण हुआ था । इस बदलाव के बावजूद वस्तुओं की मांग में कमी नहीं आई है । इससे ही सवाल पैदा होता है कि ये वस्तुएं आती कहां से हैं । विकसित देशों से निर्माण का काम अधिकाधिक विकासशील देशों की ओर भेजा जा रहा है । अर्थात उत्तर औद्योगिक समाज एक तरह के नव साम्राज्यवादी संबंध पर भी टिका हुआ है । विकसित देशों के लोगों की जीवन पद्धति को बनाए रखने के लिए लगातार विकासशील देशों के सस्ते श्रम और प्राकृतिक संसाधनों की लूट होती रहती है ।        

इसके साथ ही आज की दुनिया में हम मोटे तौर पर दो परिघटनाओं को पहचान सकते हैं जो उत्तर औद्योगिक समाज के उत्पाद कहे जा सकते हैं । इनमें से पहली परिघटना है- विकसित पश्चिमी देशों में लगातार बढ़ती विषमता । इसको लेकर 1995 में ही जोएल आइ नेल्सन ने एक जोरदार किताब लिखी थीपोस्ट-इंडस्ट्रियल कैपिटलिज्म: एक्सप्लोरिंग इकोनामिक इनइक्वलिटी इन अमेरिकाजिसका प्रकाशन सेज पब्लिकेशंस से हुआ था । हाल के दिनों में सामाजिक विषमता संबंधी बहस बेहद उत्तेजक तरीके से प्रकट हुई है । इसके पीछे एक फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री का अध्ययन है । पिकेटी नामक इस फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री की 2014 में प्रकाशित किताब कैपिटल इन द ट्वेंटी फ़र्स्ट सेंचुरीकी चर्चा इस समय सबसे अधिक हो रही है । मजेदार बात है कि पिकेटी मार्क्सवादी नहीं हैं । किताब के एक समीक्षक जेम्स के गालब्रेथ के मुताबिक वे नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्र की मान्यताओं से प्रभावित हैं । मार्क्स का वे विरोध नहीं करते बल्कि सिर्फ़ यह कहते हैं कि मार्क्स को पर्याप्त आँकड़े सुलभ नहीं थे । अपनी किताब की भूमिका में पिकेटी ने कहा है कि मार्क्स ने औद्योगिक क्रांति के दौरान उन्नीसवीं सदी में ही संपदा के संकेंद्रण की जिस प्रवृत्ति को पहचाना था वह सरोकार, और खासकर असीम संचय की प्रवृत्ति का मार्क्स द्वारा उद्घाटन, इक्कीसवीं सदी में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है । पिकेटी के मुताबिक फ़्रांस में अर्थशास्त्री को बहुत भाव नहीं दिया जाता इसलिए उसे अन्य अनुशासनों से संवाद करना ही पड़ता है । वे खुद अर्थशास्त्रियों के गणित से लगाव को बचकाना मानते हैं और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर जोर देते हैं । उनका कहना है कि गणित से केवल वैज्ञानिकता का आभास मिलता है । इसके बावजूद वे पद्धति के बतौर आंकड़ों पर भरोसा करते हैं ।  पिकेटी का आँकड़ों से लगाव इस बात से जाहिर होता है कि विषमता के इस अध्ययन में बीस से अधिक देशों के पिछले दो सौ सालों से ज्यादा समय के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया है । इस आधार पर उन्हें विषमता में भारी बढ़ोत्तरी दिखाई पड़ती है । कुछ हद तक इसके चलते भी यह किताब इसी विषय पर लिखी अन्य पूर्ववर्ती किताबों से अलग है । अपनी किताब को पिकेटी अर्थशास्त्र और इतिहास के संयुक्त अनुशासन के भीतर रखना पसंद करते हैं । इतिहास के भीतर की नवीनता को इसका आधार बताते हुए वे कहते हैं कि अब इतिहास में छोटी अवधि में आनेवाले बदलावों की जगह लंबी अवधि में आनेवाले परिवर्तनों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है । राजनीतिक उलटफेर के विवरण के मुकाबले ‘रोक और संतुलन’ की अधिक स्थिर प्रणालियों का उपयोग किया जा रहा है । इसमें आर्थिक विकास के माडल, बाजार की गति के मात्रात्मक विश्लेषण, जनांकिकीय प्रसार और संकोच, मौसम के दीर्घकालीन असरात, सामाजिक स्थिरता तथा तकनीकी खोजों के चलते होने वाले बदलाव और निरंतरता जैसी चीजों पर ध्यान देने से समाज के विभिन्न गहनतर स्तरों का पता चल रहा है । इस मामले में भी इस किताब की नवीनता जाहिर है । मुख्य रूप से वे विकसित देशों को अपने अध्ययन का विषय बनाते हैं । आंकड़ों के सहारे पिकेटी ने साबित किया है कि विकसित देशों में पिछले ढाई सौ सालों में विषमता अबाध गति से बढ़ती रही है, केवल दोनों विश्व युद्धों के बीच का समय ऐसा रहा जब इसमें गिरावट देखी गई । दोनों महायुद्धों में संसाधनों की जिस पैमाने पर बर्बादी हुई उसने सब पर असर डाला इसीलिए विषमता में यह गिरावट नजर आती है । विकसित देशों में संपदा के मामले में बढ़ती विषमता का उनका अध्ययन एक खास सूत्र पर टिका हुआ है । वे कहते हैं कि पूँजी पर मुनाफे की दर अर्थतंत्र में वृद्धि की दर से अधिक बनी हुई है इसलिए इस विषमता के कम होने के कोई आसार नहीं हैं । वे यह भी कहते हैं कि इसके चलते किरायाभोगी (रेंटियर) पूँजी की बाढ़ आई हुई है जो मुख्य रूप से सट्टा बाजार में लगी हुई है और उसी के मुनाफ़े पर टिकी हुई है । इसी परिघटना को वित्तीकरण भी कहा जाता है और हाल के भारी आर्थिक संकट के पीछे वित्तीकरण की इसी प्रवृत्ति को प्रधान कारण माना जा रहा है ।
पिकेटी का यह भी कहना है कि इसके चलते लोकतांत्रिक व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया है । इस समस्या के समाधान के बतौर वे प्रगतिशील आय-कर, विरासत कर आदि से अलग वैश्विक संपदा कर लादने का भी प्रस्ताव कर रहे हैं । फ़्रांस के रहनेवाले पिकेटी के लिए संपदा कर कोई नई बात नहीं है क्योंकि राजनीतिक क्रांतियों के इस देश में विषमता को बढ़ने से रोकने के लिए इसका प्रावधान लंबे दिनों से बना हुआ है । विकसित देशों में लोकतंत्र के क्षरण की परिघटना को समझने की कोशिश लगातार की जा रही है । इस प्रसंग में 2013 में नेशन बुक्स से जान निकोल्स और राबर्ट डब्ल्यू मैकचेस्नी की किताब ‘डालरोक्रेसी: हाउ द मनी-ऐंड-मीडिया एलेक्शन कांप्लेक्स इज डेस्ट्राइंग अमेरिका’ का प्रकाशन हुआ । इस किताब में ध्यान देने की बात यह शब्दावली है जिससे लेखकों ने समस्या को व्यक्त किया है । लोकतंत्र को हम सभी डेमोक्रेसी शब्द से अभिहित करते हैं लेकिन लेखकों का जोर इस बात पर है कि अब डेमोक्रेसी डालरोक्रेसी में बदल गई है । डेमोस यानी जनता की जगह अब डालर का राज चलता है । जिस देश में सबसे पहले न केवल लोकतंत्र की स्थापना हुई बल्कि गुलामी के आर्थिक तौर पर लाभकर होने के बावजूद गृहयुद्ध झेलकर जिसने गुलाम प्रथा को खत्म किया उसी देश में धनपशुओं द्वारा राजनीतिक सत्ता पर कब्जा जमा लेना एक दुर्घटना की तरह है जिसको लेकर अनेक विद्वान चिंतित दिख रहे हैं ।      
विषमता के ही प्रकरण में हिंदू’ अखबार में निकोलस डी क्रिस्ताफ़ लिखितऐन इडियट्स गाइड टु इन-इक्वलिटीशीर्षक लेख में बताया गया है कि अमेजन की बिक्री के आँकड़ों के अनुसार पिकेटी की किताब हाल में सबसे अधिक बिकने वाली किताब रही है । उनका कहना है कि अमेरिकी लोग विषमता की इस परिघटना को समझना चाहते हैं क्योंकि यह उनका प्रतिदिन का अनुभव हो चुका है । सबसे धनी 1% लोगों के पास सबसे गरीब 90% लोगों से अधिक संपत्ति जमा हो गई है । दुनिया के सबसे धनी 85 लोगों के पास शेष समस्त संपत्ति का आधा हिस्सा है । 2010 में अमेरिका में होने वाली कुल आमदनी का 93% सबसे अमीर 1% लोगों के हिस्से आया । यह भारी विषमता आर्थिक वृद्धि के लिए बाधा बन गई है । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक शोध पत्र में भी माना गया है कि समतापरक समाजों में तीव्र आर्थिक वृद्धि देखी जाती है । समाजार्थिक विषमता के चलते सामाजिक अस्थिरता पैदा होती है । समाज में दरारें पैदा होती हैं और नीचे पड़े लोग अपने आपको अधिकारविहीन समझने लगते हैं । बाजार पर से लोगों का भरोसा उठने लगता है और लगता है कि लोगों की संपत्ति उठाकर धनियों को सौंप दी जा रही है । संपत्ति का स्रोत परिश्रम की जगह राजनीतिक जोड़ तोड़ नजर आने लगता है ।
उत्तर औद्योगिक समाज में राजनीतिक व्यवहार को समझने के लिए पारंपरिक औजारों की अपर्याप्तता को देखते हुए नए तरह के वर्ग के उदय को परखा जा रहा है । इसी बात को समझाने के लिए जान मैकएडम्स ने 2015 में एक किताब लिखी ‘द न्यू क्लास इन पोस्ट-इंडस्ट्रियल सोसाइटी’ जिसका प्रकाशन पालग्रेव मैकमिलन से हुआ है । लेखक का कहना है कि पूंजीवादी लोकतंत्र में राजनीति को लोकतांत्रिक वर्ग संघर्ष समझा जाता था । अस्सी दशक के आरम्भ में सेमूर मार्टिन लिपसेट ने माना था कि विकसित देशों में राजनीतिक दलों ने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को अवश्य तिलांजलि दे दी थी लेकिन उनकी नीतियों और उनको मिले समर्थन से जाहिर होता था कि वे अलग अलग वर्गों से जुड़े हुए हैं । लोकतंत्र में संख्या बल के चलते अधिकांश राजनीतिक दल निचले या मध्य वर्ग से जुड़े होते थे । इस प्रवृत्ति में निश्चित बदलाव दिखाई पड़ रहे हैं ।   
हमने पहले ही जिक्र किया है कि उत्तर औद्योगिक समाज को ज्ञान के अर्थतंत्र से भी जोड़कर देखा जाता है । इसी धारणा की वस्तुगत चीरफाड़ करते हुए पीटर मर्फी ने किताब लिखी ‘यूनिवर्सिटीज ऐंड इनोवेशन इकोनामीज: द क्रिएटिव वेस्टलैन्ड आफ़ पोस्ट-इंडस्ट्रियल सोसाइटी’ जिसका प्रकाशन भी इसी साल ऐशगेट से हुआ है । ज्ञान को भी समूची आर्थिकी से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी आई है । ज्ञान के उत्पादन के केंद्र होने के नाते विश्वविद्यालय ठोस रूप से पूंजीवादी आर्थिकी के अंग बनाए जा रहे हैं । जिसे हम उत्तर औद्योगिक समाज कह रहे हैं वह और कुछ नहीं नए दौर का पूंजीवाद है । इसने समाज के सभी अंगों को प्रभावित किया है और मुनाफ़े के तर्क का अभूतपूर्व विस्तार किया है । इस समाज में लोकतंत्र से जुड़े हुए जो बदलाव आए हैं उन्हें भी लोगों ने सदी के मोड़ पर ही पहचानना शुरू कर दिया था । प्रचलित मुहावरे के मुताबिक मीडिया लोकतंत्र का स्तम्भ माना जाता है लेकिन हम सभी जानते हैं कि जन संचार का कोई भी माध्यम भारी पूंजी निवेश के बिना नहीं चल सकता । ऐसे में अत्यंत स्वाभाविक है कि पूंजी के स्वरूप में आने वाले बदलाव उससे जुड़ी सभी चीजों को प्रभावित करेंगे । अपने देश में मीडिया का जो हाल है वह विश्वव्यापी बदलाव का अंग है । उसके भीतर हाल में आए बदलाव को 2014 में मंथली रिव्यू प्रेस से प्रकशित राबर्ट डब्ल्यू मैकचिस्नी की किताबब्लोइंग द रूफ़ आफ़ द ट्वेन्टी-फ़र्स्ट सेन्चुरी: मीडिया, पोलिटिक्स, ऐंड द स्ट्रगल फ़ार पोस्ट-कैपिटलिस्ट डेमोक्रेसीमें विश्लेषित किया गया है ।
विकसित देशों की बढ़ती विषमता के साथ ही जिस दूसरी परिघटना को इसके साथ जोड़ा जाता है वह है- तीसरी दुनिया के देशों में बड़े पैमाने पर उपनिवेशीकरण की वापसी । ये दोनों ही बदलाव सत्तर के दशक से शुरू हुए हैं । इन बड़े बदलावों के साथ लिपटी हुई विचारधारा भी प्रकट हुई है जिसे लोकप्रिय भाषा में नवउदारवाद कहा जाता है । इस नवउदारवाद को विकसित देशों के वित्तीकरण, विकासशील देशों के नव उपनिवेशीकरण और समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण से जोड़कर समझा जाना चाहिए । विकसित देशों के बौद्धिक समुदाय ने बर्बरता के इस उत्थान को खूबसूरत नाम दिया था जिसकी ठोस सच्चाई साम्राज्यवाद की नए रूप में वापसी है । खुद विकसित देशों में इस उत्तर औद्योगिक समाज के प्रभाव नवसामंती मूल्यों के पुनरागमन के रूप में प्रकट हो रहे हैं । शिक्षा के निजीकरण ने नए तरह की वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया है जिसमें धनी व्यक्ति की संतान को ही अच्छी शिक्षा सुलभ होगी । इसके साथ ही सामंती समाज से जुड़े सभी पदानुक्रम भी प्रकट हो रहे हैं । नस्ल और लिंग आधारित व्यवस्थाजन्य भेदभाव कम होने की जगह रूढ़ होते जा रहे हैं ।               

Friday, November 17, 2017

गोरख: राई भर का साथ पहाड़ भर का काम

          
                                            
गोरख पांडे से कुछेक बार की ही मुलाकातें रहीं लेकिन इतने से ही जो रिश्ता बना उसने बड़ी भारी जिम्मेदारी दे दी तीन बार बनारस और एक बार इलाहाबाद बनारस में पहली बार वे लगभग एक सप्ताह अवधेश प्रधान के पास रुके थे तब मैं ग्यारहवीं कक्षा का छात्र था वहीं रहकर उन्होंनेलोकचेतनाके लिएकविता की वापसीवाला लेख लिखा था एक हाथ से टेक लगाकर अधलेटे जांघ के सहारे दफ़्ती पर कागज रखकर लिखने की विचित्र मुद्रा पहली बार देखने को मिली थी प्रूफ़ पढ़ते हुए उनके तर्क पर मुग्ध होकर बोला कि मुझे यह बात नहीं सूझी थी बोले इसीलिए तो हम लोगों की जरूरत पड़ती है अपनी उपयोगिता की यह समझ उनमें आखिरी दिनों तक रही जब बीमारी के बाद लौटकर जे एन यू आए तो डाक्टरों ने अकेला छोड़ने से मना किया था जिन सज्जन को रात में उनके पास रहना होता उन्होंने शिकायती लहजे में कहा कि मेरे भी तो काम हैं गोरख ने सहानुभूति जताने की जगह राजनीतिक कार्यकर्ता के भाव से समझाया कि लोग कम हैं और जिम्मेदारी ज्यादा तो सभी को निबटाने के लिए समय सही तरीके से बांटिए अपनी देखरेख को वे बाकायदे एक गंभीर दायित्व मानकर यह बात बोल रहे थे
जन संस्कृति मंच के गठन के सिलसिले में एक बैठक काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित थी । उसे गोरख जी संचालित कर रहे थे । ढेर सारे लोग थे । याद है धन संग्रह की बात हो रही थी । कोई बोला कि दिल्ली में तो घनीभूत स्रोत हैं । तपाक से गोरख बोले इसीलिए तो पीड़ा हैं । कहने की जरूरत नहीं कि ये कथन जयशंकर प्रसाद के ‘आंसू’ के एक छंद से निकले थे । हिंदी साहित्य के उनके अध्ययन का पार नहीं था । लखनउ के शकुंतला मिश्र विश्वविद्यालय के अध्यापक देवेंद्र ने बताया कि यू जी सी में उनसे पूछा गया था मत्स्येंद्रनाथ के गुरु कौन थे । देवेंद्र ने क्षोभ के साथ यह बात गोरख को बताई । गोरख बोले आपको नहीं मालूम ? देवेंद्र शर्मिंदा होकर रह गए । बहरहाल सांगठनिक बैठक को धैर्य के साथ चलाने की कला उनमें देखी थी इसलिए उन्हें अराजक कहने वालों पर यकीन नहीं होता ।
दूसरी बार फिर अवधेश प्रधान के घर पर ही । उम्र ऐसी हो चली थी कि कुछ समझदारी आने लगी थी । कविता भी लिखता था । इस बार साथ घूमे और बातें भी कीं । एक छोटी काव्य गोष्ठी भी हुई थी । उस गोष्ठी में गोरख ने जो कविताएं सुनाईं उन्हें अजय कुमार ने टेप में रेकार्ड कर लिया था । उसी से ‘आशा का गीत’ और ‘बीसवीं सदी’ शीर्षक कविताएं मिलीं । गोरख की आवाज उसी टेप में सुरक्षित है । ‘आशा का गीत’ पर हल्का सा मजाक भी हुआ क्योंकि अजय जी की पत्नी का नाम आशा है । गोरख जी का कुर्ता भाभी जी ने मरम्मत करके धुल दिया था । गोरख जी पहचान ही नहीं पा रहे थे । बताने पर निष्कर्ष निकालते हुए बोले कि कभी कभी चीजों का रूप बदल जाने से भी वे बदल जा सकती हैं । जाना कि दर्शन की समस्याओं से हर समय वे मुब्तिला रहते थे । गोष्ठी में मैंने एक कविता सुनाई जो कविता के बारे में थी । मजाक करते हुए गोरख बोले कविता किसी का नाम तो नहीं । तब राम जी भाई के प्रभाव में मुक्तिबोध का नशा चढ़ा हुआ था । उनकीइस चौड़े ऊंचे टीले परसुनाई । गोरख ने धीरज के साथ सुना । फिर बातचीत शुरू की । बोले किसी का अनुकरण ठीक नहीं होता । सीखना बड़े लोगों से चाहिए ।
खुद जिन लोगों से सीखने की बात कही उनमें कालिदास, गालिब और ब्रेख्त का नाम था । वे साहित्याचार्य थे । पहले इस पढ़ाई की गम्भीरता के बारे में नहीं जानता था । बाद में डिग्री कालेज में एक सहकर्मी मिले जो सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य रहे थे । उन्होंने आचार्य का जो स्तर बताया उससे पता चला कि संस्कृत में वार्तालाप करने की योग्यता उन लोगों में होती है । ऐसे में स्वाभाविक है कि गोरख जी को समूचा संस्कृत साहित्य हस्तामलकवत रहा होगा । बताया था कि पहले ही साल उन्हें इतने अंक मिले थे कि लोग देखने आते थे । क्रांतिकारी धारा के साथ संस्कृत पढ़े लोगों में केवल गोरख ही नहीं जुड़े थे । उनके एक अन्य सहपाठी मोदनाथ प्रश्रित भी नेपाल में क्रांतिकारी वामपंथी धारा से जुड़े ही नहीं, सांसद और बाद में मदन भंडारी की सरकार में शिक्षा मंत्री भी बने । गोरख के साथ पढ़ते हुए ही उन्होंनेनेपाली बहादुरनामक एक मशहूर हिंदी कविता भी लिखी थी । बाद में पता चला कि नेपाली वामपंथी आंदोलन में संस्कृत के अध्यापकों का महत्वपूर्ण योगदान है । वे नेपाली समाज के पारम्परिक बौद्धिक माने जाते हैं । इस पूरी परिघटना से जाना कि क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ने में किसी भी बात से बाधा नहीं आती है ।
इस नाते गोरख की कविता पर संस्कृत के क्लासिक साहित्य के प्रभाव के पहलू पर सोचने का रास्ता खुलता है । संस्कृत साहित्य के विद्वान अपनी भाषा को व्याकरण की उपज नहीं मानते बल्कि उसके मूल जनजीवन में खोजते हैं । गोरख की कविताओं और गीतों में जन जीवन की घनघोर उपस्थिति के पीछे संस्कृत की इस क्लासिक परंपरा का प्रभाव सम्भव है । उनका गीतझुर झुर बहे बयार गमक गेंदा की आवेहै तो हिंदी में लेकिन इसकी भाषा, भाव, छंद और निर्वाह पर नजर डाली जाए तो क्लासिक और लोक की मिली जुली जमीन दिखाई पड़ेगी । उनकी कविताओं में स्त्री की निर्णायक उपस्थिति के पीछे भी कहीं न कहीं कालिदास मौजूद हो सकते हैं । न केवल गोरख पर इस प्रभाव का सही विवेचन अब तक नहीं हो सका है बल्कि उनके पहले के प्रगतिशील कवि नागार्जुन पर भी संस्कृत साहित्य के असर का कारण सही गंभीरता के साथ नहीं देखा गया है । इसके लिए संस्कृत साहित्य के प्रति भी नकारवादी की बजाए आलोचनात्मक नजरिया अपनाना होगा । लम्बे समय तक इसमें सब कुछ की अभिव्यक्ति हुई है । सौंदर्य, आभिजात्य और शिष्टता के साथ ही गर्हित, विद्रोह और विचार की भी अभिव्यक्ति संस्कृत भाषा में होती रही है । इसलिए उससे यथास्थितिवादियों को ही नहीं विद्रोहियों को भी सामग्री मिलती रही है ।
उर्दू साहित्य के प्रभाव को केवल गजलों में खोजना उचित नहीं होगा । विरोधाभास को गोरख जी ने कविता में जितनी आसानी से साधा उसकी मिसाल दुर्लभ है और यह बात गालिब तथा ब्रेख्त से जुड़ती है । इस तत्व को उनके पहले कविता संग्रह के संयोजन में देख सकते हैं । उसमें मुक्त छंद की खड़ी बोली की कविताओं वाला खंड तो बुआ को समर्पित है लेकिन भोजपुरी गीतों वाला खंड ज्योति जी के लिए है । साफ है कि वे ग्रामीण बुआ को आधुनिक स्तर पर उठाना चाहते हैं और आधुनिका ज्योति जी को लोक संवेदना के पास ले जाना चाहते हैं ।चादर लम्बी होती गई है, पाँव सिमटता जाए हैमें एक मशहूर कहावत के साथ छेड़छाड़ के अतिरिक्त विरोधाभास भी पहचान सकते हैं । इसी तरहसरजमीं सब्ज मुफ़लिसी से है, बस्ती आबाद बेपनाहों सेमें विरोधाभास के सहारे विडम्बना को तीखा किया गया है ।
शब्दों की कंजूसी भी उन्होंने बड़े कवियों से सीखी ।पैसे का गीतमें लगातार लगता है कि तुक के लिए भी कुछेक शब्द आ सकते हैं लेकिन प्रत्येक पंक्ति समूची और स्वतंत्र कहानी लेकर आती है । प्रत्येक पंक्ति में अंतिम शब्द समान हैंअजी पैसे कीलेकिन उसके पहले के शब्दों से मिलकर उनका अर्थ बदल जाता है ।लपटों से बुनी ससुराल’, ‘सबसे मीठी झनकारऔरखाए जा पंचों मारके साथ मिलकर ये शब्द एक समूचा संसार खड़ा कर देते हैं । परिवार, कानून और अभिजात साहित्य संस्कृति की दुनिया असल में पैसे से मिलकर उत्पीड़क बन जाती है और गुलामी को मजबूत बनाती है । इन संस्थाओं के बीच समानता भी गोरख ने महसूस की । बाद में उनके शोध प्रबंध का अनुवाद करते हुए महसूस किया कि अलगाव की दार्शनिक धारणा को वे किस तरह वर्तमान व्यवस्था की तमाम चीजों को व्याख्यायित करने के लिए इस्तेमाल करते थे ।
गंगा की घाटों पर घूमते हुए उनके कुछ पुराने साथियों से संवाद सुने । उनमें से ढेर सारे लोग चुनाव बहिष्कार के दिनों में फंसे हुए थे । गहराई के साथ राजनीतिक परिस्थिति के बदलाव को स्पष्ट करते हुए तदनुरूप लड़ाई के तौर तरीकों में बदलाव का तर्क देकर वे चुनाव संबंधी कार्यनीति पर बात कर रहे थे । तभी जयप्रकाश नारायण का सुनाया संस्मरण समझ पाया कि वे जब सोनारपुरा में कुछेक दिन साथ रहे थे तो गोरख ने विदा करते हुए कहा कि बीमार होने के कारण बातचीत नहीं हो पाई । मतलब कि उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में थोड़ा बहुत भी वाम समझ जिस किसी कार्यकर्ता में थी उसके साथ गोरख की जीवंत बातचीत होती रहती थी । इस मामले में एक और बात पर ध्यान गया । वैचारिक राजनीतिक बातचीत में उम्र का अंतर उनके लिए कोई बाधा नहीं था । राम जी राय उनसे दस साल छोटे थे । हम लोग तो बच्चे ही कहलाएंगे लेकिन कभी इस अंतराल का अनुभव नहीं हुआ । संवाद में महत्व सवाल और समस्या का होता है और बातचीत भी उसे सुलझाने की ओर सिर्फ ले जाती है तो इस यात्रा में ‘सिर बोझ भारी क्या’ !
बहरहाल आखिरी मुलाकात इलाहाबाद में हुई । कर्नलगंज में संगठन के दफ़्तर में चौकी पर लेटे हुए थे । गंभीर मुख । उसके एक दिन पहले एक गोष्ठी में जो बोले वही सब ‘समकालीन कविता में रूप की समस्याएं’ में लिखा देखा । बाद में पता चला यहीं संपन्न बैठक में तीखा विवाद हुआ था । दिल्ली लौटते ही संगठन के पदों से इस्तीफ़ा भेजा । उसके बाद अकेले पड़ते गए । खबर आती रहती कि सिज़ोफ़्रेनिया की चपेट में हैं । कल्पना की दुनिया के नागरिक होकर रह गए थे । फिर अस्पताल में दाखिल कराए जाने की सूचना । अचानक आत्मघात की खबर मिली । उसके बाद से उनकी अनुपस्थिति की लम्बी यात्रा शुरू हुई जो अब तक जारी है ।
उनकी तरह ही कुछ दिन मैं भी माले का पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहा । उस दौरान बैठकों और सभाओं में गोरख के गीत गाता । एक बार हरिबंशी मास्टर साहब ने एक सभा मेंतू हउअ श्रम के सुरुजवा हो हम किरिनिया तोहारगाया था और इसकी व्याख्या की थी । पता चला वे सच में जमीनी कार्यकर्ताओं की आकांक्षाओं और भावनाओं को सटीक तरीके से पकड़ते और उन्हें माकूल भाषा में व्यक्त करने में सक्षम थे ।
जब उन्होंने आत्मघात किया था तब काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर के अंतिम साल में था । हिंदी साहित्य की दुनिया के मुकाबले वैचारिक बहसों की दुनिया अधिक आकर्षक लगती थी । उसी लिहाज से इधर उधर कुछ लिखने की कोशिश शुरू की थी । दैनिकआजमें एक छोटी सी टिप्पणी लिखी । शीर्षक उनकी एक गजल से दियावक्त गुजरे है कत्लगाहों से। इससे पहले का टुकड़ा तो शब्द संक्षिप्ति की मिसाल थाटूटे घुटनों से बंद राहों से। यह गजल उनके ही मुख से बनारस में सुनी थी । इसके एक शेरखुदकुशी करती हैं उम्मीदें/ छत की चूलों पर लटक बांहों सेमें कानपुर में तीन बहनों की सामूहिक आत्महत्या की छाया है । बहरहाल उनके देहांत के छह महीने बाद दिल्ली में उसी जेएनयू में दाखिला लिया जहां वे रहे थे । मुनिरका में रह रहे प्रमोद सिंह के पास अक्सर जाता । दोस्त बहुत जल्दी बन जाते हैं । सबके साथ आदतन खूब बहसें करता । प्रमोद बोले गोरख के रहते तुम लोग आ गए होते तो शायद वे अभी न मरते । उनके देहांत के एक साल पूरा होने परप्रतिपक्षनामक पत्रिका में फिर एक निहायत छोटी टिप्पणी लिखी । उनके देहांत के बाद जिन लोगों ने संस्मरण लिखे थे उनमें ज्यादातर ने गोरख पर अपने अहसान गिनाए थे । लोगों के इस रुख पर क्रोध उस टिप्पणी में आ गया था ।
उनका महत्व बहुत धीरे धीरे खुल रहा था । दोस्त राधेश्याम राय ने गोरख की कविता पर जब एम फिल का लघु शोध प्रबंध लिखने का निश्चय किया तो जितना समझ आया मदद की । गोरख की कविता में आजादी बहुत बड़ा मूल्य है । बनारस में ही उन्होंने बताया था कि जो गीत आजकलसपनों की मंजिल हो सुख का आधार होकी शक्ल में मिलता है उसे उन्होंने जब लिखा था तोसुख का संसार होथा । दस साल बाद यह छोटा सा बदलाव किया था । आजादी सुख का आधार होती है यह बातसुख के बारे मेंशीर्षक लेख में भी मिलती है । यह बदलाव उनके दार्शनिक चिंतन से आया था । अंदाजा उनके शोध प्रबंध के अनुवाद के समय चला । आजादी तमाम रूपों में उनके समस्त लेखन में मौजूद है । संस्कृति से भी स्वतंत्रता का गहरा रिश्ता जन संस्कृति मंच के घोषणापत्र में रेखांकित किया था । इसे सही तरीके से समझने के लिए यूरोपीय दर्शन कीअनिवार्यता बनाम स्वतंत्रताकी लम्बी बहस को देखना होगा । इसी बहस में हस्तक्षेप करते हुए एंगेल्स नेड्यूहरिंग मत खंडनमें लिखा किअनिवार्यता तभी तक अंधी होती है जब तक उसे समझ नहीं लिया जाता। इस कोण को राधेश्याम राय ने गोरख पर लिखे पहले शोध में उजागर किया है । ‘मेहनत के हाथों से आजादी की सड़कें ढलें’ जैसी दार्शनिक सूक्ति को कविता में ढालने के लिए श्रम की महत्ता के स्वीकार के साथ ही उसकी सृजनात्मक सम्भावना की समझ भी होनी चाहिए । उनके गीतों के सहज प्रवाह के चक्कर में कई बार अर्थ की गहराई छूट जाने की आशंका होती है । विचार को कविता में ढालने के मामले में वे कबीर और मुक्तिबोध से तुलनीय लगते हैं ।   
इसके बाद उनके लिखे का भंडार मिलना शुरू हुआ तो उसे प्रकाश में लाने की कोशिश शुरू की । सबसे पहले उनका एम ए का लघु शोध प्रबंध मिला बनारस में । काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर करते हुए उन्होंने यह प्रबंध हर्षनारायण के निर्देशन में लिखा था ।धर्म की मार्क्सवादी धारणाशीर्षक यह किताब अपने तरह की अकेली किताब है । बिना किसी हिचक के कहा जा सकता है कि धर्म के सवाल पर तत्कालीन नकारवाद की छाया होते हुए भी इसमें मार्क्सवादी समझ की परिष्कृति मौजूद है । उसे किताब की शक्ल देने के लिए अध्यायीकरण किया लेकिन मूल शोध प्रबंध को बहुत नहीं छेड़ा । पीएच डी का शोध जे एन यू से लिखा था । वह मिला उनके मित्र तिलक के पास । शोध प्रबंध अंग्रेजी में था । अनुवाद का काम मृत्युंजय और अवधेश के साथ मिलकर पूरा किया । शोधअस्तित्ववाद में अलगाव की धारणापर लिखा गया था । आश्चर्यजनक रूप से उसमें सबसे हाल के चिंतक इस्तवान मेज़ारोस का भी उल्लेख था । मेज़ारोस ने सार्त्र पर काम किया था । गोरख की यह किताब अस्तित्ववाद पर बहुत ही विवेचनापरक है । जे एन यू में दर्शन का यह पहला शोध प्रबंध था ।
इन शोध ग्रंथों के अतिरिक्त कागजों का एक बंडल अवधेश प्रधान जे एन यू के उनके कमरे से उठा लाए थे और मुझे सौंप दिया । उसमें एक लेख ऐसा महसूस हुआ जो उनके लेख ‘सरलता के पक्ष में’ का ही दूसरा रूप था । अंग्रेजी में टंकित प्रपत्र था ‘साइंटिफ़िक मेथड’ जिसका हिंदी अनुवाद मृत्युंजय ने किया । एक और टंकित प्रपत्र मिला ‘बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद’ जो उन्होंने सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की किसी संगोष्ठी में प्रस्तुत किया था । उनके सम्पूर्ण गद्य को छापने की योजना बनी तो बनारस में लोकचेतना में प्रकाशित ‘कविता की वापसी’ वाला लेख मिल गया । कभी दिल्ली से एक अंग्रेजी पत्रिका डी प्रेमपति के संपादन में निकली थी- मार्क्सिज्म टुडे । उसके पहले अंक में गोरख जी ने माओ के विरोध में एम बासवपुन्नैया के लेखन का विरोध करते हुए लम्बा लेख लिखा था । वह अंक प्रसन्न कुमार चौधरी के खजाने में मिला तो उसका हिंदी अनुवाद किया । इसी खोजबीन के दौरान इतिहासकार सलिल मिश्र ने उनकी एक डायरी होने का संकेत दिया । पता नहीं किस तरह वह उनके पास पड़ी हुई थी । बनारस में जब उन्हें सिजोफ़्रेनिया का पहला दौरा पड़ा था उसके कुछ दिन पहले से शुरू होकर उनके पहली बार दिल्ली आने तक की वह डायरी विभिन्न अनुभवों, साथियों के जिक्र और कविताओं के प्रारूपों से भरी थी ।
हिंदी में उनके जिक्र से लोग बचते हैं । कविता के क्षेत्र में उनकी याद को मिटा देने की कोशिश के पीछे कुछ स्वनामधन्य कवियों और आलोचकों की हीनता ग्रंथि है । बिना किसी संकोच के कहा जा सकता है कि यदि हिंदी कविता पर नक्सलबाड़ी का असर देखना हो तो गोरख के बिना वह अराजक विद्रोह भावना से आगे की चीज नहीं प्रतीत होगा । नक्सलबाड़ी का प्रभाव हिंदी में जिस उन्नत समझदारी की ओर ले गया उसकी मिसाल गोरख की कविता है । इस मामले में वे निराला और मुक्तिबोध की परम्परा में आते हैं । तोड़ फोड़ को कविता में साध लेना आसान नहीं होता । उनके समकालीन बड़े कवि लोकप्रियता के मामले में उनसे ईर्ष्या करते थे । कवि का नाम जाने बिना उनके भोजपुरी गीत बिहार और उत्तर प्रदेश के आंदोलनकारी किसान कार्यकर्ता गाते थे । जन संस्कृति मंच के नेता के बतौर वैचारिक और रचनात्मक दोनों स्तरों पर उन्होंने ऐसे लेखकों की जमात खड़ी की जिनमें क्रांतिकारी समझ और लोक चेतना का अद्भुत समन्वय मिलता है । उनके गद्य की तरह सहज प्रवाही और विचार सघन गद्य हिंदी में बहुत कम दिखाई देता है ।                
                 

                        

Friday, November 10, 2017

एक अप्रतिम मानव प्रयास की शती

                   
                                                 
1917 के अक्टूबर/नवम्बर महीने में रूस में एक ऐतिहासिक अश्रुतपूर्व प्रयास हुआ वह प्रयास उन्नीसवीं सदी की क्रांतियों को पूर्णता प्रदान करने वाला था और बीसवीं सदी का चेहरा इससे निर्मित हुआ सारी दुनिया का शायद ही कोई मुल्क होगा जिसकी चेतना में इस क्रांति की मौजूदगी हो । हमारे देश में भी रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘रशियार चिठी’ और प्रेमचंद के तमाम लेखन में इसका समर्थन मिलता है । यह साल उस कोशिश का शताब्दी वर्ष है । स्वाभाविक है तमाम लेखन इस सिलसिले में हो रहा है । जिस देश में नया समाजवादी मनुष्य गढ़ने की कोशिश हुई उसमें यह समूची कोशिश पिछली सदी के आखिरी सालों में भहरा पड़ी । पूंजीवाद के विरोध में जो समाजवादी मुल्कों का खेमा खड़ा था उसके तमाम स्तम्भ धीरे धीरे गिरने लगे । चीन और क्यूबा जैसे देश पहले से ही समाजवाद के रूसी संस्करण से थोड़ी दूरी बनाए रखते थे । चीन को तो पूंजीवाद को नवजीवन देने वाला साबित कर दिया गया । क्यूबा न केवल टिका हुआ है बल्कि लैटिन अमेरिका के कभी इस देश, कभी उस देश में जल जाने वाली मशाल की मजबूत प्रेरक शक्ति बना हुआ है । शताब्दी वर्ष में सभी पुरानी बहसें फिर से उभर आई हैं । वर्तमान सदी भी उसकी छायाओं से मुक्त नहीं है । मानव मुक्ति के नए प्रयासों के लिए उससे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की सीख ली जा सकती है । हमारी कोशिश इस क्रांति से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के बारे में वर्तमान सदी में हो रहे लेखन का जायजा लेते हुए उस युगांतरकारी घटना की समझ को समृद्ध करना है । पिछले बीस सालों में इस क्रांति, उसके नेताओं और उसके नताइज के बारे में हुए विचार विमर्श का यह सर्वेक्षण आज के हालात से प्रभावित होकर अतीत को देखने की सार्वभौमिक प्रवृत्ति का उदाहरण पेश करता है । 
अभी 22 अक्टूबर को काउंटरपंच में प्रकाशित माइकेल हडसन के लेख ‘सोशलिज्म, लैंड ऐंड बैंकिंग: 2017 कम्पेयर्ड टु 1917’ में अक्टूबर क्रांति के बारे में थोड़ा नया दृष्टिकोण अपनाया गया है । इसमें लेखक का कहना है कि समाजवाद की विभिन्न धाराओं के भीतर सामान्य लक्ष्य होता है- जमींदारों, आदमखोर बैंकों और इजारेदार घरानों से समाज को छुटकारा दिलाने के लिए इन्हें सरकारी कब्जे में ले लेना । समाज की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए यह आवश्यक होता है । इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में रूसी क्रांति सबसे आगे बढ़ा हुआ प्रयास थी । उनका कहना है कि सोवियत संघ के पतन के बाद विजयी पूंजीवाद ने जिस तरह का रूप ग्रहण किया उसके चलते पुराने समाजवादी सपने की लोकप्रियता बढ़ी है ।
रूसी क्रांति के बारे में इस साल एक किताब प्लूटो प्रेस से नील फ़ाल्कनर कीए पीपुलस हिस्ट्री आफ़ द रशियन रेवोल्यूशनका प्रकाशन हुआ है । लेखक ब्रिटेन की सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी के सक्रिय सदस्य रहे हैं और किताब लिखने के लिए आवश्यक समझदारी का सारा श्रेय उन्होंने अपनी पार्टी को दिया है । लेखक का कहना है कि दुनिया के इतिहास में शायद सबसे अधिक नासमझी रूसी क्रांति के बारे में है । इसकी शताब्दी के अवसर पर लेखक ने भूल सुधार के बतौर यह किताब लिखी है । उनका कहना है कि लाखों साधारण रूसी स्त्री पुरुष 1917 से 1921 के बीच क्रांति की ऐतिहासिक प्रक्रिया को गति देते रहे । इस तरह वह नीचे से लोकतंत्र और सक्रियता का विस्फोट थी । जिन्होंने इसमें भाग लिया वे बदल गए और जिन्होंने इसे देखा वे इससे प्रेरित हुए । इसने पूंजीवादी व्यवस्था की बुनियाद हिला दी और लोकतंत्र, समता तथा शांति पर आधारित दुनिया की झलक पेश की । किताब का मकसद लेनिन को लोकतांत्रिक नेता और बोल्शेविक पार्टी को व्यापक जनवादी आंदोलन के बतौर स्थापित करना, रूसी क्रांति को तख्तापलट की बनिस्बत जनता की भागीदारी पर आधारित लोकतांत्रिक आंदोलन साबित करना और स्तालिन को इस क्रांति की उपलब्धियों को तहस नहस करने वाला सिद्ध करना है । लेखक इसे मौलिक तो नहीं लेकिन पढ़ने लायक मानते हैं । उनका कहना है कि यह किताब अतीत के बारे में तो है लेकिन वर्तमान के लिए लिखी गई है । विद्वानों के मुकाबले कार्यकर्ताओं के लिए लिखी इस किताब में जनसंहारक पूंजीवाद को खत्म कर देने का संकल्प दिखाई पड़ता है ।
इसी साल एक और मजेदार किताब वर्सो से चाइना मेविल की ‘अक्टूबर: द स्टोरी आफ़ द रशियन रेवोल्यूशन’ का प्रकाशन हुआ है । किताब इतिहास लेखन की दृष्टि से भी बहुत रुचिकर है । सबसे पहले अक्टूबर क्रांति का प्राक-इतिहास लिखा गया है जिसमें सेंट पीटर्सबर्ग की स्थापना से कहानी शुरू हुई है । फिर इस शहर के नाम में रूसी तत्व की प्रमुखता झलकाने के लिए उसे पेत्रोग्राद किया गया । हम जानते हैं कि यही शहर रूसी क्रांति का मुख्य रंगमंच बना । जैसे जैसे घटनाक्रम क्रांति के करीब पहुंचता है समय की रफ़्तार सुस्त पड़ने लगती है । पहले महीनों के हिसाब से, फिर दिनों के हिसाब से और आखिरकार घंटों के हिसाब से । घटनाओं के इस तरह के वर्णन से उनकी उत्तेजना पाठक तक पहुंचने लगती है । लेखक का वादा भी कहानी सुनाने का ही था । फ़रवरी क्रांति के फलस्वरूप स्थापित केरेन्सकी की सरकार के समय की द्वैध सत्ता और उसी दौरान अप्रैल में फ़िनलैंड में लेनिन की वापसी के साथ राजनीतिक परिस्थिति के तीव्र बदलाव  का बेहद जीवंत ब्यौरा क्रांति के समय की त्वरा से पाठक को भली भांति परिचित करा देता है । किताब पढ़ते हुए आपको क्रांति निकट आती हुई महसूस होती है । सैनिकों और मजदूरों के सशस्त्र दल रोज राजधानी आकर दस्तक देते रहते हैं और पिछले दिन की उपलब्धियों को सहेजते चलते हैं । आपकी मन की आंखों के सामने केरेन्सकी का जादू टूटता जाता है । दिमाग में तनाव बढ़ता जाता है क्योंकि थकान से भरे लेनिन फ़िनलैंड में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं और इधर क्रांतिकारी हालात परिपक्व होते जा रहे हैं । महसूस होने लगता है कि अगर क्रांति न हुई होती तो रूस में तबाही ही आई होती । जब जुलाई में लेनिन पेत्रोग्राद आते हैं तो अस्थायी सरकार ने उनके जर्मन जासूस होने की अफवाह उड़ा दी । पेत्रोग्राद में रहना खतरनाक हो गया । वेश बदलकर पहले एक देहाती इलाके में फिर फ़िनलैंड चले गए । इधर केरेन्सकी के हाथों से सत्ता खिसककर कोर्निलोव नामक फौजी अफसर के हाथों में चली जा रही है । बदनाम करने की लाख कोशिशों के बावजूद मजदूरों और सैनिकों में बोल्शेविकों की लोकप्रियता बढ़ती जाती है । इंच दर इंच क्रांति मंजिल की ओर जाती हुई महसूस होती है । क्रांति के पास पहुंचकर बहुत कुछ रोमांचक उपन्यास का रस किताब में आने लगता है । जर्मनी की सेनाओं ने रूस की जमीन पर कब्जा शुरू कर दिया था । पेत्रोग्राद क्रांति का दुर्ग बन चला था । अक्टूबर आते आते सरकार ने पेत्रोग्राद को खाली करने की योजना बना ली । योजना की खबर फैलने लगी । रूसी सेनाओं को उसी के अनुसार पुनर्संयोजित किया जाने लगा । लेनिन फिर से क्रांति का नेतृत्व करने के लिए पेत्रोग्राद पहुंचे । नीचे से पैदा होने वाला दबाव हिचकने वाले बोल्शेविकों पर भारी पड़ रहा था । सोवियतों की बैठक दर बैठक बोल्शेविकों की ओर झुक रही थी । केंद्रीय कमेटी में विद्रोह की तारीख निश्चित किए बिना पूरी पार्टी से उसके लिए तैयारी करने का प्रस्ताव पारित हुआ । गोपनीय तरीके से बैठकें आयोजित होतीं । एक एक घटना सारे विवरणों के साथ इस तरह दर्ज की गई है कि पाठक को पहले क्रांति की धड़कन फिर क्रांति के दौरान की घटनाएं मन की आंखों के सामने दिखाई देने लगती हैं ।  
शताब्दी वर्ष के सिलसिले में लेफ़्टवर्ड ने एक पुस्तक श्रृंखला के प्रकाशन का फैसला किया है । इसी के तहत एक मजेदार किताब सेसिलीया बोब्रोव्सकाया की ‘रैंक ऐंड फ़ाइल बोल्शेविक: ए मेमायर’ का प्रकाशन विजय प्रसाद की प्रस्तावना के साथ हुआ है । इसमें लेखिका की दो किताबों को एक साथ छापा गया है । बोल्शेविक पार्टी में कार्यकर्ता के बतौर लिखे संस्मरण अक्टूबर क्रांति से पहले के समय पर केंद्रित हैं । दूसरी किताब क्रांति के शिल्पी लेनिन की जीवनी है । यह भी क्रांति से ठीक पहले समाप्त हो गई है । प्रस्तावना में विजय प्रसाद ने रूसी क्रांतिकारी आंदोलन में बोल्शेविकों से पहले मौजूद अराजकता की धारा और बीच में पैदा हुई अवसरवाद की धारा से बोल्शेविकों के वैचारिक संघर्ष की प्रतिध्वनि को निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में सुनने और जानने के लिहाज से इस किताब को महत्वपूर्ण माना है । इस किताब से रूसी क्रांति में स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिका का अनुमान होता है और यह भी महसूस होता है कि इसके कारण ही क्रांति के बाद बने समाज में ग्रामीण इलाकों तक में महिलाओं को पूरी आजादी हासिल थी ।

रूसी क्रांति के सभी विवरणों से प्रतीत होता है कि उसमें शहरों की मुख्य भूमिका थी । वर्तमान सदी के भी विक्षोभ प्रदर्शनों में शहर एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में सामने आए हैं । ऐसे में इस मजेदार आयाम के बारे में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से एन्डी विलिमोट की किताबलिविंग द रेवोल्यूशन: अर्बन कम्यून्स & सोवियत सोशलिज्म, 1917-1932’ का प्रकाशन हुआ । कहने की जरूरत नहीं कि रूसी क्रांति के शहरी होने के कारण मजदूरों, सैनिकों के साथ ही शहरी समुदाय के अनुभव भी उस क्रांति के रूप को समझने में मदद करते हैं । लेखक ने भूमिका में शुरुआत ही उस रोमांच से किया है जो किसी क्रांति में शिरकत से पैदा होता है । इसमें बदलाव की तरंगों से नई दुनिया की संभावना खुलती है, एक नई शुरुआत के वादे और ऊर्जा का अनुभव होता है । अक्टूबर क्रांति के बाद युवा कार्यकर्ताओं ने पहलकदमी लेकर साथ रहने का नया आदर्श स्थापित करने के मकसद से शहरी कम्यूनों का निर्माण किया था ।
इसी साल आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से एस ए स्मिथ की किताब ‘रशिया इन रेवोल्यूशन: ऐन एम्पायर इन क्राइसिस, 1890 टु 1928’ का प्रकाशन हुआ है । लेखक का कहना है कि यह किताब उन पाठकों के लिए लिखी गई है जो इस विषय से अब तक अछूते रहे हैं । इसमें हाल के शोधों से तो सहायता ली ही गई है कुछ प्रचलित मान्यताओं पर सवाल भी उठाया गया है । इसमें उन्नीसवीं सदी के अंत से लेकर पहली पंच वर्षीय योजना के आरम्भ तक के समय का जायजा लिया गया है । जिन सवालों का जवाब देने की कोशिश की गई है उनकी सूची भी लेखक ने पेश की है । वे हैं- जारशाही का अंत क्यों हुआ? 1917 की फ़रवरी क्रांति के बाद संसदीय लोकतंत्र स्थापित करने की कोशिश भी क्यों सफल नहीं हुई? एक छोटी सी चरमपंथी समाजवादी पार्टी सत्ता पर कब्जा करने और गलाकाटू गृहयुद्ध में जीत हासिल करने में कामयाब कैसे हुई? स्तालिन के हाथ में शासन कैसे आया? उन्होंने जबरिया समूहीकरण और उद्योगीकरण का तरीका क्यों अपनाया? लेखक को लगता है कि येन केन प्रकारेण सत्ता में बने रहने की जिद के चलते समूची सामाजिक व्यवस्था भहरा गई थी या जो लोग बेहतर समाज बनाना चाहते थे वे शासन पर पकड़ बनाए रखने के चक्कर में भ्रष्ट हो गए । सोवियत संघ के खात्मे के बाद प्राप्त नई सामग्री ने हाल के दशकों में रूसी क्रांति के बारे में समझदारी बदली है । फिर भी इसकी व्याख्या में मतभेद बना हुआ है ।  
इस शताब्दी वर्ष में ही वर्सो से स्लोवाज ज़ाइज़ैक के संपादन में उनकी भूमिका के साथ ‘लेनिन 2017: रेमेम्बरिंग, रिपीटिंग, ऐंड वर्किंग थ्रू’ का प्रकाशन हुआ । किताब का उपशीर्षक फ़्रायड के एक लेख से लिया गया है जिसे सौ साल बाद अक्टूबर क्रांति को याद करने के सिलसिले में लेखक सर्वोत्तम रुख समझते हैं । इस रुख में पहला काम याद करने का है । इस क्रिया में ध्यान अतीतबद्ध रहता है इसलिए दूसरा चरण वर्तमान में उसे दोहराने का होना चाहिए । दोहराने की इस कोशिश में बाधाओं का पता चलता है तो उन्हें दूर करने का प्रयास तीसरा चरण होता है । ज़ाइज़ैक का कहना है कि इस तरह से अतीत के इस क्रांतिकारी प्रयास को समकालीन बनाया जा सकेगा ।
2017 में ही वेलरेड बुक्स से एलन वुड की किताब ‘बोल्शेविज्म: द रोड टु रेवोल्यूशन’ का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ । पहली बार यह किताब 1999 में छपी थी । लेखक का कहना है कि रूसी क्रांति का ऐतिहासिक महत्व संदेह से परे है । पचहत्तर साल का इसका जीवन तो रहा ही समूची बीसवीं सदी पर इसकी छाया पड़ी । ऊपर से इसके साथ महान बुर्जुआ क्रांतियों की समानता महसूस होती है लेकिन इस क्रांति का स्वरूप समाजवादी था और समाजवादी क्रांति के लिए मजदूर वर्ग के स्वत:स्फूर्त नहीं, बल्कि सचेत आंदोलन की जरूरत होती है ।
इस साल छपने वाली इन किताबों के इस संक्षिप्त सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि फिलहाल बोल्शेविक क्रांति के मूल्यांकन और विश्लेषण में उसके जन भागीदारी परक चरित्र को उभारा जा रहा है । इससे ठीक एक साल पहले छपी किताबों में भी कुछ गंभीर बातें की गई हैं ।  2016 में ज़ीरो बुक्स से पीट डोलाक की किताबइटस नाट ओवर: लर्निंग फ़्राम द सोशलिस्ट एक्सपेरिमेन्टका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि किताब भविष्य के बारे में है लेकिन इसके शुरुआती अध्याय अतीत के बारे में हैं । अतीत का यह अध्ययन वर्तमान की समझदारी के लिए तो जरूरी है ही, आगामी दुनिया को बेहतर बनाने का रास्ता खोजने के लिए भी जरूरी है । लेखक को लगता है कि अतीत को भूल जाना भविष्य को भी भूल जाना है । किताब में जिन कोशिशों का अध्ययन किया गया है वे पूंजीवाद से भिन्न आधार पर समाज को संगठित करने के प्रयास थे । ऐसे प्रयासों में सबसे महत्वपूर्ण सोवियत संघ की स्थापना था जो समूची बीसवीं सदी में पूंजीवाद के लिए चुनौती बना रहा । लेखक को लगता है कि हालांकि भविष्य में उसकी नकल नहीं की जा सकती लेकिन उससे सीखा तो जा ही सकता है । सोवियत संघ के टूटने के बीस साल बाद उस प्रयास का वस्तुगत अध्ययन आसान हो गया है । जब तक सोवियत संघ मौजूद रहा उसके विरुद्ध घोर वैचारिक अभियान चलाया जाता रहा । अब इस अभियान में थोड़ी नरमी आई है । जो लोग उसे बुराई का गढ़ मानते हैं उनके लिए वैसे भी ढेर सारी सामग्री उपलब्ध है । इसके लिए तर्क मुहैया कराना लेखक का काम नहीं है । उनका मकसद सोवियत प्रणाली की उस कमजोरी का पता लगाना है जिसके कारण वह समाप्त हो गया । इसे समझने के लिए लेखक ने चेकोस्लोवाकिया और निकारागुआ की कार्यपद्धति का भी अध्ययन किया है । इसके साथ ही लेखक का यह भी मत है कि पूंजीवादी दुनिया और समाजवादी दुनिया का आपसी रिश्ता समझना जरूरी है । समाजवादी प्रयोग चलाने वाले देशों पर बड़े पूंजीवादी देशों का गहरा असर पड़ा । कुछ समाजवादी देशों का गला भी पूंजीवादी देशों ने घोंटा । अनेक क्रांतियों की विकृति का कारण बहुत कुछ उनके विध्वंस के पूंजीवादी प्रयास थे । रूस और निकारागुआ अतीत से प्राप्त अपनी ढेर सारी कमजोरियों के चलते ही शायद बाहरी दखलंदाजी से पार नहीं पा सके ।
लेखक का कहना है कि दरअसल पूंजीवाद की समस्याओं का सीधा उत्तर समाजवाद है । इसीलिए समाजवादी प्रयोगों का संबंध निरंतर पूंजीवादी राज्यों, पूंजीवाद विरोधी आंदोलनों और उत्तर पूंजीवादी राज्यों से बना रहा । पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं की भिन्न परिणति की व्याख्या के सिलसिले में मनोवैज्ञानिक वजहें भी प्रस्तुत की गई हैं । मनुष्य के भीतर लोभ की प्रवृत्ति को इसके मूल में बताया गया है । पूंजीवादी विचारधारा का दावा है कि मनुष्य को प्रेरित करने वाली एकमात्र चीज धन और मुनाफा है । थोड़ा सा सोचने से ही इस दावे की कलई खुल जाती है । बच्चे पैदा करने से मुनाफा न होने के बावजूद लोग बाग बच्चों को जन्म देते हैं । बिना मजूरी लिए तमाम तरह के काम लोग करते हैं जिनके बगैर कोई भी समाज नहीं चल सकता । सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता आम तौर पर बिना धन लिए बहुत सारा काम करते हैं । एकजुटता और आपसी सहयोग भी होड़ या प्रतियोगिता जितनी ही स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं ।                     
रूसी क्रांति से गहरे जुड़ा प्रसंग त्रात्सकी और स्तालिन का विवाद है । इस सिलसिले में सबसे प्रामाणिक स्रोत के रूप में वेलरेड बुक्स से लिओन त्रात्सकी की किताबस्तालिन: ऐन अप्राइजल आफ़ द मैन ऐंड हिज इनफ़्लुएन्सका प्रकाशन हुआ । यह किताब त्रात्सकी का आखिरी लेखन था । इसे अमेरिकी प्रकाशन हार्पर & ब्रदर्स के अनुरोध पर लिखा गया था । उनके देहांत के बाद प्रकाशक ने जिससे इसका अनुवाद और संपादन कराया उन्होंने इसे अपनी मौलिक सूझ से भर डाला था । लेकिन त्रात्सकी के समर्थक मार्क्सवादियों की एक टोली, खासकर एलन वुड्स ने मूल किताब का उद्धार करके उसे प्रकाशित किया है ।
इसी प्रसंग में एक और आधिकारिक स्रोत के बतौर 2008 में हेमार्केट बुक्स से लियोन त्रात्सकी की किताब के अंग्रेजी अनुवाद ‘हिस्ट्री आफ़ द रशियन रेवोल्यूशन’ को एक जिल्द में छापा गया । पहले तीन जिल्दों में इसका प्रकाशन 1932 में यूनिवर्सिटी आफ़ मिशिगन प्रेस से हुआ था । 1961 में दूसरी बार इसको छापा गया था । अनुवाद मैक्स ईस्टमैन ने किया है । किताब का महत्व यह है कि इसे क्रांति के ही एक नेता ने लिखा है । ज्ञातव्य है कि त्रात्सकी 1905 की क्रांति के दौरान पीटर्सबर्ग सोवियत के अध्यक्ष रहे थे और अक्टूबर क्रांति के भी अग्रणी नेताओं में थे ।
2015 में वर्सो से आइजक ड्यूशर की किताबद प्राफ़ेट: द लाइफ़ आफ़ लियोन त्रात्सकीका प्रकाशन हुआ । ड्यूशर ने तीन खंडों में त्रात्सकी की जीवनी लिखी जिसे एक ही खंड में इस किताब में एकत्र कर दिया गया है । जीवनी का पहला खंड 1879 से 1921 तक के जीवन पर है । दूसरा खंड 1921 से 1929 तक के जीवन की कथा है । आखिरी तीसरा खंड 1929 से 1940 तक के जीवन को समेटता है । ये केवल तिथियां नहीं हैं, बल्कि त्रात्सकी के जीवन के तीन दौर हैं । पहला दौर बचपन से शुरू होकर बोल्शेविक क्रांति के बाद स्थापित सत्ता में निभाई गई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का विवेचन है । दूसरा दौर लेनिन के देहान्त से शुरू सत्ता संघर्ष में पराजय के कारण देश छोड़ने तक की कथा है । उनके जीवन का अंतिम दौर रूस के बाहर से स्तालिन के विरुद्ध संघर्ष और विदेशों में बिताए गए जीवन का है । इन्हीं तीनों खंडों को एक साथ करके इस किताब को छापा गया है । किताब में न केवल त्रात्सकी का जीवन है बल्कि उनके जीवन के साथ रूस की सामाजिक संरचना खासकर यहूदियों की उपस्थिति, उनके प्रति जारशाही का रवैया और इसके बारे में रूसी क्रांतिकारियों का रुख, रूस की क्रांति के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप को तय करने में प्रवासी समुदाय की भूमिका, प्रवासी गुटों के आपसी संघर्ष, क्रांति की उठान आदि भी पाठक के लिए प्रत्यक्ष होते जाते हैं । त्रात्सकी की जीवनी होने के बावजूद लेखक ने सभी मौकों पर उनको बचाया नहीं है, बल्कि एक हद तक क्रांतिकारी पक्षधरता के साथ तटस्थ विश्लेषण भी किया है । विशेषकर लेनिन के साथ उनके टकराव को बेहद संतुलित होकर लेखक ने प्रस्तुत किया है ।
इसी क्रम में एक अन्य बोल्शेविक की कहानी के माध्यम में उस दौर की हकीकत प्रस्तुत करने की चेष्टा के तहत 2015 में ब्रिल से बारबरा सी एलेन की किताब ‘अलेक्जेंडर श्ल्यापनिकोव, 1885-1935: लाइफ़ आफ़ ऐन ओल्ड बोल्शेविक’ का प्रकाशन हुआ । किताब में एक व्यक्ति के माध्यम से पुराने सामाजिक मूल्यों से रूसी क्रांति के वातावरण में संक्रमण, फिर नई सोवियत सत्ता की रक्षा, मजदूरों में ट्रेड यूनियन की चाहत, नई आर्थिक नीति के दौर में राजनीतिक बदलाव, उद्योगीकरण और पार्टी में शुद्धीकरण, गिरफ़्तारी और निर्वासन की कथा कही गई है ।
इस क्रांति के नेता लेनिन के बारे में 2015 में मंथली रिव्यू प्रेस से तमास क्राउज़ की हंगारियाई भाषा में लिखित किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘रीकंस्ट्रक्टिंग लेनिन: ऐन इंटेलेक्चुअल बायोग्राफी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ । अनुवाद बालिन्त बेथलेनफ़ाल्वी ने मारियो फ़ेन्यो के साथ मिलकर किया है । लेनिन के जीवन के बारे में अधिकतर लेखन रूसी में हुआ लेकिन रूस के बाहर के इस लेखन से भिन्न नजरिया प्रकट होता है । लेखक का कहना है कि मार्क्स का जो भी सपना था उसे अमल में लाने की गंभीर और सचेत कोशिश लेनिन ने की । उन्होंने राज्य को समाप्त करना चाहा था लेकिन विडम्बना थी कि सोवियत राज्य के सत्तर साल का इतिहास उनके साथ जुड़ गया ।
स्तालिन और त्रात्सकी की बहस को एक नई रोशनी में देखते हुए 2014 में ब्रिल से थामस एम ट्विस की किताब ‘त्रात्सकी ऐंड द प्राब्लेम आफ़ सोवियत ब्यूरोक्रेसी’ का प्रकाशन हुआ । किताब इस मामले में महत्वपूर्ण है कि नौकरशाही की समस्या पर विचार करते हुए लेखक ने ऐसा कोई रास्ता नहीं अपनाया है जिसमें लेनिन या स्तालिन को दोष देकर छुट्टी पा ली जाती है बल्कि लेखक ने पूरी सैद्धांतिक गंभीरता के साथ इस समस्या पर विचार किया है ।
2014 में हेमार्केट बुक्स से लेनिन की मशहूर किताब ‘स्टेट ऐंड रेवोल्यूशन’ का टाड क्रेटियन की प्रस्तावना और टिप्पणियों के साथ पुन:प्रकाशन हुआ है । अक्टूबर क्रांति के सभी अध्येता जानते हैं कि यह किताब 1917 के जुलाई विद्रोह के दमन के बाद गुप्त जीवन बिताते हुए लेनिन ने लिखी और इसे क्रांति के बाद बनने वाले राज्य के सिलसिले में सैद्धांतिक तैयारी का दस्तावेज माना जाता है । रूसी भाषा में 1918 और 1919 में पहले और दूसरे संस्करण के प्रकाशन के बाद 1921 में ही इसका अंग्रेजी अनुवाद अमेरिका की कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्यों की शिक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा था । उपलब्ध अंग्रेजी अनुवाद को अमेरिकी अंग्रेजी के हिसाब से थोड़ा दुरुस्त किया गया है ।
लेखक का मानना है कि आर्थिक संकट, पारिस्थितिकी के विनाश, हिंसक सैन्यवाद और सामाजिक उत्पीड़न के वर्तमान दौर में राजसत्ता पर कब्जे का सवाल प्रासंगिक हो चला है । लेनिन ने यह किताब अपने समय के सवालों के जवाब के रूप में लिखी थी । वे रूसी क्रांति के संदर्भ में मार्क्स-एंगेल्स के राज्य संबंधी चिन्तन के प्रयोग का विश्लेषण करते हुए इसका दूसरा भाग लिखना चाहते थे लेकिन उसे कभी पूरा नहीं कर सके । आज की रोशनी में ही इसमें निहित अंतर्दृष्टियों का उपयोग संभव है ।
प्रथम विश्व युद्ध के पहले तक लेनिन को पूंजीवादी और सर्वहारा राज्य में अंतर संबंधी मार्क्स-एंगेल्स के लेखन की गलत समझ से जूझने की जरूरत महसूस नहीं हुई थी । लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के समय कुछ मार्क्सवाद के समर्थकों के रुख में उन्हें गलती नजर आई खासकर काउत्सकी उन्हें इस गलत समझ के प्रतिनिधि प्रतीत हुए । इस सिलसिले में लेनिन को यह तो लगा था कि रूसी ज़ार और तानाशाहीपूर्ण राज्य को क्रांतिकारी बल प्रयोग के जरिए उखाड़ फेंका जाएगा लेकिन उन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि जिन देशों में लोकतांत्रिक या अर्ध लोकतांत्रिक शासन पद्धति स्थापित है वहां राज्य का क्या होगा । कुछ उदारपंथी समाजवादी चिंतकों का मानना था कि चुनावों के जरिए मजदूर वर्ग शांतिपूर्ण तरीके से मौजूदा पूंजीवादी राज्यों पर कब्जा कर लेगा और कानून बनाकर समाजवादी सुधार किए जाएंगे । लेनिन बहुत पहले से मानते आए थे कि वर्ग संघर्ष और पूंजीवाद से समाजवाद में संक्रमण आसानी से नहीं होगा । वे मानते थे कि पूंजीपति वर्ग लोकतांत्रिक चुनाव परिणाम को मंजूर करके शांतिपूर्वक अपने आपको बेदखल नहीं होने देगा । लोकतांत्रिक पूंजीवादी राज्य में भी आत्म-रक्षा के बहुस्तरीय उपाय अंतर्निहित होते हैं जिनका संबंध सत्तासीन व्यक्तियों या राजनीतिक पार्टियों से ही नहीं होता । इस प्रारंभिक मान्यता की पुष्टि 1917 में हुई । तत्कालीन उदारपंथी समाजवादी चिंतन का विरोध लेनिन के साथ ही बुखारिन ने भी किया था । बुखारिन का मानना था कि पूंजीवादी राज्य को मजदूर वर्गीय क्रांति के मकसद के लिए रूपांतरित नहीं किया जा सकता । पूंजीवाद के विरुद्ध मजदूर वर्ग की तानाशाही या मजदूर वर्ग के राज्य के निर्माण के लिए पहले पूंजीवादी राज्य को नष्ट करना होगा । इसके बाद समाजवादी मानवता के मुक्त विकास के लिए मजदूर वर्ग की राजसत्ता का यह अस्थायी रूप भी समाप्त हो जाएगा । राज्य के संबंध में मार्क्सवादी समझ में काउत्सकी के जरिए जो विकृति पैदा हुई उसके चलते दूसरे इंटरनेशनल की अधिकतर पार्टियों ने प्रथम विश्व युद्ध में अपनी सरकारों का विरोध करने के बदले उनका साथ दिया ।
काउत्सकी जर्मन कम्यूनिस्ट आंदोलन के नेता थे इसलिए क्रेटियन ने थोड़ा ठहरकर आंदोलन के बारे में जानकारी दी है । 1848 की असफल क्रांति के नेता होने के चलते मार्क्स-एंगेल्स को जर्मनी की सरकार ने कभी जर्मनी आकर राजनीति करने की इजाजत नहीं दी इसलिए वे जर्मनी के अपने समर्थकों के लिए प्रवासी सलाहकार की भूमिका निभाने को मजबूर थे । लंबे दिनों तक अर्ध कानूनी हालात में धीरज के साथ काम करने के बाद उनके ये समर्थक उदारपंथी समाजवादी लासाल के अनुयायियों के साथ मिल गए । मार्क्स-एंगेल्स ने भी मजबूत संगठन के हक में इस एकता को ठीक माना लेकिन उन्हें लगा कि अपने नए सहयोगियों को साथ रखने के लिए उनके समर्थक दक्षिण की ओर कुछ ज्यादा ही झुक गए हैं । ऊपर से सेंसर के नियमों के चलते नई पार्टी को सार्वजनिक रूप से गोलमोल भाषा बोलनी पड़ती थी । इसके साथ ही हुआ यह कि 1870 के बाद जर्मनी के अर्थतंत्र में उछाल आया जिसके चलते शहरी कामगारों की संख्या में बढ़ोत्तरी आई । साथ ही ट्रेड यूनियनों और नई पार्टी की सदस्यता भी बढ़ी । इसके बावजूद हड़तालें नहीं हुईं क्योंकि औद्योगिक शांति और लगातार मुनाफ़े के चक्कर में कारखानों के मालिक वेतन बढ़ा देते और ट्रेड यूनियनों की गतिविधियों को भी सहन करते । सरकार ने भी 1890 में समाजवाद विरोधी कानून हटा लिए । समाजवादियों की ताकत में इजाफ़ा हुआ और जर्मनी की संसद में प्रथम विश्व युद्ध से पहले के वर्षों में लगभग तिहाई सीटें समाजवादी जीतते थे । इन सबके चलते कुछ लोग खुलकर कहने लगे कि जर्मनी में क्रांति की जरूरत के मामले में मार्क्स-एंगेल्स की राय शायद सही नहीं थी । मार्क्स-एंगेल्स इस प्रवृत्ति पर हमला करते रहे और पार्टी के भीतर पैदा हो रहे अवसरवाद से सावधान करते रहे । एंगेल्स के देहान्त के बाद जर्मनी के समाजवादी नेता बर्नस्टाइन ने कहा कि समाजवाद और क्रांति के बारे में मार्क्स-एंगेल्स के विचार पुराने पड़ चुके हैं । उनका यह भी मानना था कि जर्मनी की तत्कालीन परिस्थिति में पार्टी का कर्तव्य बनता है कि वह पूंजीवाद में धीरे धीरे सुधार लाने की कोशिश करे । रोजा लक्जेमबर्ग और कार्ल काउत्सकी ने इस धारणा का विरोध किया । क्रांति का समर्थक होने के बावजूद दोनों में कुछ अंतर भी था । रोजा ने चुनाव में भाग लेने का तो समर्थन किया लेकिन वे मानती थीं कि मजदूर वर्ग की मुक्ति जन संघर्षों के जरिए ही होगी । दूसरी ओर काउत्सकी भी गैर संसदीय संघर्षों का समर्थन करते थे लेकिन क्रांति के बारे में उन्होंने कहा कि जरूरी होने के बावजूद खतरनाक होने के कारण इससे परहेज करना चाहिए । उनके अनुसार उस समय मजदूर वर्ग का कर्तव्य जर्मनी की संसद में प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराना था ताकि समाज में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत की जा सकें । काउत्सकी की इसी धारणा को लेनिन ने राज्य के बारे में भ्रामक माना था और इसके विरोध में मार्क्स-एंगेल्स की राज्य संबंधी विचारों को प्रस्तुत किया था ।    
2010 में डब्ल्यू डब्ल्यू नार्टन & कंपनी से फिलिप पोम्पर की किताबलेनिनस ब्रदर: द ओरिजिन्स आफ़ द अक्टूबर रेवोल्यूशनका प्रकाशन हुआ । लेखक इतिहासकार हैं और लेनिन के बड़े भाई अलेक्जेन्डर उल्यानोव की यह शोधपूर्ण जीवनी लिखते हुए रूसी क्रांति में उनकी भूमिका से पाठक को परिचित कराना ही किताब का मकसद है । उल्लेख्य है कि अलेक्जेन्डर अराजकतावादी क्रांतिकारी धारा के थे और ज़ार की हत्या के आरोप में इक्कीस साल की उम्र में उन्हें फांसी दी गई थी ।
एक किताब थोड़ा हटकर छपी है । 2006 में येल यूनिवर्सिटी प्रेस से अलेक्जेन्डर वातलिन और लारिसा मालाशेंको के संपादन में छपी रूसी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘पिगी फ़ाक्सी ऐंड द स्वर्ड आफ़ रेवोल्यूशन: बोल्शेविक सेल्फ़-पोर्ट्रेट्स’ का प्रकाशन हुआ । अनुवाद सिमोन सेबाग मोन्टफ़ायर ने किया है । अनुवादक का कहना है कि अक्टूबर क्रांति से लेकर द्वितीय विश्व युद्ध तक बोल्शेविक लगातार उथल पुथल से गुजरते रहे । इस त्रासदी से पार पाने के लिए उन्होंने हास्य-व्यंग्य का भी सहारा लिया । इस किताब में इसी तरह की तस्वीरों और कार्टूनों का संग्रह और उनका विश्लेषण किया गया है । इन कार्टूनों के विषय चित्रकार और राजनेता बनाए गए थे । इनमें से कई कार्टूनों के चित्रकार सत्ता के कोप भाजन भी बने । इन चित्रों से नेताओं का मानवीय चेहरा प्रकट होता है जिनमें आपसी ईर्ष्या-द्वेष के साथ साथ महात्वाकांक्षा की भी प्रचुर उपस्थिति थी ।
इक्कीसवीं सदी के समाजवाद के बारे में गंभीरता के साथ विचार करने वाले माइकेल लेबोविट्ज़ की किताब ‘द कंट्राडिक्शंस आफ़ “रीयल सोशलिज्म”: द कंडक्टर ऐंड द कंडक्टेड’ का प्रकाशन 2012 में मंथली रिव्यू प्रेस से हुआ । समाजवादी मुल्कों में क्रांति के संपन्न होने के बाद समय बीतने के साथ जो कुछ घटित हुआ था उसे वस्तुपरक तरीके से देखने का मौका बढ़ रहा है । इसी तरह के विश्लेषण का फल लेबोविट्ज़ की यह किताब है ।
इसी तरह की एक किताब 2011 में कार्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस से डेविड एल हाफ़मैन की ‘कल्टिवेटिंग द मासेज: माडर्न स्टेट प्रैक्टिसेज ऐंड सोवियत सोशलिज्म, 1914-1939’ का प्रकाशन हुआ । ध्यान देने की बात है कि मार्क्सवादी मान्यता के मुताबिक राज्य का खात्मा होना था लेकिन क्रांति के बाद एक नया राज्य स्थापित हुआ । इस विडम्बना को समझने की कोशिश इस किताब में की गई है ।
2011 में प्रेजर से एन्थनी दागोस्तिनो की किताबद रशियन रेवोल्यूशन, 1917-1945’ का प्रकाशन हुआ । रूसी क्रांति कि अवधि के बारे में इसमें नया नजरिया तो अपनाया ही गया है स्तालिन की मौजूदगी के बारे में स्थिति भी स्पष्ट की गई है । लेखक का मानना है कि प्रथम विश्व युद्ध, महामंदी और फ़ासीवाद के उदय से परिभाषित होने वाली अंतर्राष्ट्रीय स्थिति शीतयुद्ध के दौरान पूरी तरह से बदल गई । इस अर्थ में रूस की क्रांतिकारी विचारधारा ने नाज़ीवाद के कहर से पाश्चात्य लोकतंत्र को बचाया । शीतयुद्ध के खात्मे के बाद तो न रूस रहा न रूसी क्रांतिकारी सत्ता । ऐसे में लेखक ने मुख्य रूप से इस सवाल पर विचार किया है कि रूसी क्रांति कोई ऐतिहासिक विकार/अपवाद थी या हमारी वर्तमान दुनिया के निर्माण में उसका कोई योगदान है । लोकतंत्र के निर्माण के लिहाज से वे इसे इंग्लैंड की सत्रहवीं सदी की क्रांति, फ़्रांस की अठारहवीं सदी की क्रांति तथा अमेरिका के स्वाधीनता संघर्ष जैसी निर्णायक घटनाओं में से एक मानने पर जोर देते हैं ।
2009 में पालग्रेव मैकमिलन से राबर्ट सर्विस की किताबद रशियन रेवोल्यूशन, 1900-1927’ का चौथा संस्करण प्रकाशित हुआ । 1986 में पहली बार छपने के बाद 1991 और 1999 में इसके विभिन्न संस्करण छपे थे । राबर्ट सर्विस ने लगातार रूसी क्रांति के बारे में शोधपूर्ण लेखन किया है ।
2008 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से शीला फ़िट्ज़पैट्रिक की किताबद रशियन रेवोल्यूशनका तीसरा संस्करण प्रकाशित हुआ । किताब के पहले संस्करण का लेखन 1979 में हुआ था । दूसरे संस्करण की पांडुलिपि 1993 में तैयार हुई थी । दूसरे संस्करण के प्रकाशन के समय जो लोग विद्यार्थी थे उन्होंने रूस संबंधी शोध किया और उसका उपयोग इस तीसरे संस्करण के लिए हुआ है । दूसरे संस्करण का प्रकाशन सोवियत संघ के पतन की नाटकीय घटनाओं के बाद हुआ था । इसके चलते संग्रहालय तक शोधकर्ताओं की पहुंच हो गई थी ।
2007 में इंडियाना यूनिवर्सिटी प्रेस से अलेक्सांद्र राबिनोविच की किताब ‘द बोल्शेविक्स इन पावर: द फ़र्स्ट ईयर आफ़ सोवियत रूल इन पेत्रोग्राद’ का प्रकाशन हुआ ।
2007 में पालग्रेव मैकमिलन से केटी टर्टन की किताबफ़ारगाटेन लाइव्स: द रोल आफ़ लेनिनस सिस्टर्स इन द रशियन रेवोल्यूशन, 1864-1937’ का प्रकाशन हुआ । यह तो सर्वविदित है कि लेनिन के बड़े भाई को फांसी दी गई थी लेकिन उनकी बहनों के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिलती । उनकी दो बहनें पार्टी की महत्वपूर्ण कार्यकर्ता थीं । रूसी क्रांति के सिलसिले में स्त्रियों की भूमिका बहुत कुछ अनदेखी रह जाती है जबकि बोल्शेविक पार्टी की ढेर सारी स्त्रियों ने क्रांति में जबर्दस्त भूमिका निभाई थी । लेनिन के व्यक्तित्व की आड़ में उनकी बहनों का योगदान छिप जाता है । लेखिका का कहना है कि यह दिक्कत केवल लेनिन की बहनों के बारे में नहीं है । जब भी किसी प्रसिद्ध पुरुष के साथ जुड़ी स्त्रियों के बारे में बात होती है तो उनका स्वतंत्र व्यक्तित्व पीछे रह जाता है । लेनिन के साथ उनकी पत्नी क्रुप्सकाया, बहनें अन्ना और मारिया उलियानोवा तथा कोलंताई और इनेसा आर्मंड जैसी स्त्रियां जुड़ी रहीं । एक बहन ओल्गा 1890 में ही गुजर गई थीं । लेनिन की जीवनियों में इन स्त्रियों का उल्लेख भर होता है । बहनें तो संयोग से जुड़ गईं इसलिए उनके बारे में विशेष क्या सोचना ! उनका जिक्र लेनिन के बचपन के प्रसंग में आता है या फिर उनकी बीमारी के प्रसंग में । लेनिन की जीवित बची दोनों बहनों के बारे में यह बेहद जरूरी किताब है ।
रोनाल्ड कोवाल्सकी की किताब ‘द रशियन रेवोल्यूशन 1917-1921’ का प्रकाशन रटलेज से पहली बार 1997 में हुआ था । इसके बाद 2005 में टेलर & फ़्रांसिस ई-लाइब्रेरी से उसका इलेक्ट्रानिक प्रकाशन हुआ । शीर्षक से ही स्पष्ट है कि लेखक ने क्रांति की निरंतरता को केवल आरम्भिक पांच वर्षों तक स्वीकार किया है । रूसी क्रांति के आरम्भ और समाप्ति के समय से लेखकों का पक्ष स्पष्ट हो जाता है । जो लोग स्तालिन को बदनाम करना चाहते हैं उनके लिए रूसी क्रांति लेनिन के देहांत के साथ समाप्त हो जाती है । ज्ञातव्य है कि रूसी क्रांति के ही महत्व को खारिज करने वाले लोगों ने भी अपने राजनीतिक तर्कों के साथ कोई समझौता नहीं किया है और उसी तरह हिटलर के हमले को नाकाम करने का श्रेय देने के बदले गाली देने के लिए स्तालिन का बहाना लेने वाले भी पूर्ववत अपनी बात पर कायम हैं । अंत की तरह ही आरम्भ चुनने वालों की भी राजनीतिक राय निश्चित होती है । अगर आप 1917 की क्रांति को सामाजिक हलचल का नतीजा मानते हैं तो स्वाभाविक रूप से उसकी प्रक्रिया पीछे से शुरू होती है लेकिन अगर आप उसे तख्तापलट या षड़यंत्र समझते हैं तो उसकी कहानी कुछ महीनों तक की होगी और मुट्ठी भर नेताओं के इर्दगिर्द घूमती रहेगी ।  
एलन वुड की किताब ‘द ओरिजिन्स आफ़ रशियन रेवोल्यूशन 1861-1917’ का प्रकाशन पहली बार 1987 में हुआ था । 1993 में उसका दूसरा संस्करण रटलेज से छपा । फिर 2003 में इसका तीसरा संस्करण रटलेज से ही छपा । 2005 में टेलर & फ़्रांसिस ई-लाइब्रेरी से उसका इलेक्ट्रानिक प्रकाशन हुआ । किताब इस मामले में रूसी क्रांति से जुड़े लेखन से अलग है कि वह उसके मूल को 1861 में रूस के भूदासों की मुक्ति में देखती है ।
2005 में द यूनिवर्सिटी आफ़ मिशिगन प्रेस से मोशे लेविन की किताब ‘लेनिन’स लास्ट स्ट्रगल’ का प्रकाशन हुआ । किताब मूल रूप से लेनिन द्वारा संकट के समय अपनाई गई नई आर्थिक नीति से जुड़े संघर्षों का विश्लेषण करती है । नई आर्थिक नीति का महत्व यह है कि उसके जरिए लेनिन ने योजना और बाजार के समन्वय की दिशा में एक गंभीर प्रयोग किया था । इसी के साथ लेनिन इस समस्या से भी जूझ रहे थे कि जो क्रांति जनता की मुक्ति के लिए हुई थी उससे उत्पन्न राज्य अपने आपमें ऐसा ढांचा बन गया जो मुक्ति के लिए बाधक साबित हो रहा था । ये दोनों समस्याएं आपस में जुड़ी हुई थीं । अर्थतंत्र और प्रशासन के क्षेत्र में जनता की पहलकदमी और पार्टी ढांचे के बीच तालमेल की कोशिश ही लेनिन के जीवन के अंतिम साल का सबसे घनघोर संघर्ष था ।
2005 में वर्सो से ग्रेगोरी इलियट के संपादन में मोशे लेविन की किताबद सोवियत सेंचुरीका प्रकाशन हुआ । इतिहास में प्रथम विश्व युद्ध के बीच रूसी क्रांति की बदौलत सोवियत सत्ता की स्थापना से लेकर बीसवीं सदी के आखिरी दशकों में उसके ध्वंस तक को सोवियत शताब्दी मानने पर जोर दिया जा रहा है । उसी समझ को इस किताब में व्यक्त किया गया है ।  
रूसी क्रांति से उपजी सत्ता के बारे में ऐसी छवि बनाई जाती है मानो वह नागरिकों के बोलने पर पाबंदी के भरोसे ही कायम रही । इस आम छवि को तोड़ती हुई किताब 2005 में रटलेजकर्ज़न से ब्रूस एडम्स कीटाइनी रेवोल्यूशंस इन रशिया: ट्वेन्टीएथ-सेन्चुरी सोवियत ऐंड रशियन हिस्ट्री इन एनेक्डोट्सका प्रकाशन हुआ । किताब में लेनिन से लेकर पुतिन तक विभिन्न शासकों के बारे में प्रचलित मजाकों का विश्लेषण किया गया है । लेखक सोवियत इतिहास और संस्कृति के अध्यापक रहे हैं और अपनी कक्षाओं में इन मजाकों का अक्सर इस्तेमाल करते रहे हैं । उनको लगता है कि मजाक आम तौर पर आलोचना की जगह इस्तेमाल होते हैं इसलिए यह इतिहास भी प्रशंसात्मक न होकर आलोचनात्मक है । लेखक द्वारा प्रयुक्त मजाक रूसी भाषा में छपे संग्रहों से ही लिए गए हैं । किताब इस तथ्य का प्रमाण है कि रूसी जनता ने अपार कष्ट सहे लेकिन उनके बीच भी अपना हास्य बोध कायम रखा । 
2004 में रटलेज से नील एडमंड्स के संपादन में ‘सोवियत म्यूजिक ऐंड सोसाइटी अंडर लेनिन ऐंड स्तालिन: द बेटन ऐंड सिकल’ का प्रकाशन हुआ । भूमिका में संपादक का कहना है कि संगीत पर विचारधारा के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह के प्रभावों का मूल्यांकन इस किताब में किया गया है । विभिन्न लेखों के लेखकों की पृष्ठभूमि में पर्याप्त विविधता है । इन सबके चलते किताब में पूर्व स्वीकृत मान्यताओं पर सवाल भी खड़ा किया गया है । कुछेक प्रमुख संगीतकारों पर ही ध्यान केंद्रित करने की जगह उनके साथ के गौण संगीतकारों पर भी किताब में लेख शामिल किए गए हैं । इनके महत्व के बावजूद इन पर ध्यान न देने का कारण बताते हुए संपादक कहते हैं कि शीत युद्ध के समय पश्चिमी दुनिया में उन्हीं संगीतकारों पर बात की गई जिनके साथ सोवियत सत्ता का टकराव रहा । जिन्होंने सत्ता के साथ सहयोग किया उनकी उपेक्षा या निंदा की गई । लेकिन ऐसे संगीतकारों ने शौकिया सांगीतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और जनता में संगीत की चेतना प्रसारित करने में बहुत जरूरी भूमिका निभाई । सोवियत शासन का आदर्शवाद और क्रांतिकारी उत्साह उनकी संगीत रचनाओं में मुखर हुआ । उनका यह भी कहना है कि आज के कम्यूनिस्ट विरोधी माहौल में यह अटपटा लग सकता है कि अक्टूबर क्रांति और बोल्शेविक शासन से कलाकारों और संगीतकारों को प्रेरणा और उत्साह प्राप्त हो लेकिन सचाई यही है । इन संगीतकारों के साथ न्याय करने के लिए संगीत की व्यापक धारणा में लोकप्रिय संगीत को भी शामिल किया गया है । कुछ लेखों में संगीत के साथ उनकी प्रस्तुति के लिए बने सभागारों का भी विवेचन किया गया है क्योंकि इनके साथ आधुनिकता के विकास का संबंध रहा है । उनके भीतर बने मंच भी कलाकारों की कल्पना के विश्लेषण का माध्यम बने हैं । इनमें से कुछ संगीत रचनाओं ने वाम हलकों से आगे बढ़कर हालीवुड की फ़िल्मी दुनिया में भी जगह बनाई क्योंकि उस समय द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत संघ और अमेरिका हिटलर के विरोध में सहयोगी थे ।        
2004 में रटलेज से रेक्स ए वाडे के संपादन मेंरेवोल्यूशनरी रशिया: न्यू अप्रोचेजका प्रकाशन हुआ । संपादक की भूमिका के अतिरिक्त किताब में चार खंड हैं । पहले खंड के तीन लेख सामाजिक इतिहास लेखन के ढांचे में लिखे हुए हैं । इनमें क्रांति के समय के पेत्रोग्राद को जनता की निगाह से देखा गया है, क्रांति के समय की हड़तालों का विवेचन किया गया है तथा उस समय पेत्रोग्राद में अपराध, पुलिस और भीड़ के न्याय की परिघटना का विश्लेषण है । दूसरे खंड का विवेच्य विषय भाषा और पहचान संबंधी दावे हैं । इसके तहत फ़रवरी क्रांति के दौरान राजनीतिक चेतना में लोकतंत्र की धारणा का स्वरूप, रूसी क्रांति का देहाती इलाके की भाषा पर प्रभाव और विभिन्न जातीय क्रांतियों का लेखा जोखा लिया गया है । तीसरे खंड में अस्थायी सरकार में शामिल उदारपंथी नेताओं की राजनीतिक विफलता से जुड़े लेख संकलित हैं । इस खंड में अस्थायी सरकार के साथ ग्रामीण इलाकों में मजबूत प्रभाव वाले समाजवादी क्रांतिकारियों के संबंध के अतिरिक्त उस समय के हालात के मद्दे नजर उदारपंथी समाजवादियों की राजनीतिक धारा के उदय और उनकी भाषा में वर्गीय राजनीति के असर पर केंद्रित लेख शामिल हैं । आखिरी चौथे खंड के तीन लेखों में सत्ता पर बोल्शेविकों के कब्जे पर पुनर्विचार किया गया है । इसके तहत विद्रोह की कला, सोवियत नामक संस्था के साथ बोल्शेविक नेताओं के रिश्तों और संविधान सभा की संभावना पर सुचिंतित लेखन किया गया है । स्पष्ट है कि यह किताब रूसी क्रांति के बारे में लिखी किसी भी पुस्तक की तरह नहीं है बल्कि इस किताब में अक्टूबर क्रांति को लेकर रूस के भीतर जारी गंभीर मंथन का प्रतिनिधित्व हुआ है ।   
2003 में रटलेज से स्टीफेन जे ली की किताब ‘लेनिन ऐंड रेवोल्यूशनरी रशिया’ का प्रकाशन हुआ । किताब इस बात का सबूत है कि मार्क्स के नवोत्थान के साथ उस क्रांतिकारी मार्क्सवादी परंपरा का भी उत्थान हो रहा है जिसे कम्यूनिस्ट आंदोलन की आंतरिक बहसों की गरमी में त्याग सा दिया गया था ।
1999 में यू सी एल प्रेस से जेन मैकडर्मिड और अन्ना हिलयार की किताबमिडवाइव्स आफ़ द रेवोल्यूशन: फ़ीमेल बोल्शेविक्स ऐंड वीमेन वर्कर्स इन 1917’ का प्रकाशन हुआ । रूसी क्रांति का यह पहलू निश्चय ही अहम है । इससे सभी क्रांतियों के बारे में एक सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है । हम सभी जानते हैं कि फ़्रांसिसी स्त्री समुदाय के जुझारू व्यक्तित्व के निर्माण में फ़्रांसिसी क्रांति की निर्णायक भूमिका है । लगता है कि क्रांतियां आबादी के सताए गए हिस्सों को खास तरह की स्वतंत्र सामाजिक भूमिका सौंपते हैं । रूसी क्रांति ने जिस तरह बीसवीं सदी के आरम्भ में प्रमुख रूप से उस एशियाई मुल्क में स्त्री समुदाय को स्वतंत्र और सशक्त बनाया बहुत कुछ उसके कारण ही विनाशकारी गृहयुद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध में व्यापक जन हानि सहने के बावजूद रूसी समाज अपने आपको कायम रख सका । स्त्रियों की इस सामाजिक भूमिका का प्रभाव केवल शहरी इलाकों तक सीमित नहीं था बल्कि रूसी देहात को बदलने में भी स्त्री समुदाय के भीतर के इस बदलाव का भारी योगदान था ।  
1999 में यू सी एल प्रेस से मर्क सैंडल की किताब ‘ए शार्ट हिस्ट्री आफ़ सोवियत सोशलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । इसमें उन्होंने 1917 से 1991 तक के इतिहास को सोवियत समाजवाद का इतिहास माना है । लेखक का कहना है सोवियत संघ के पतन का धूल धक्कड़ बैठ जाने के बाद रूसी बुद्धिजीवियों के साथ सार्थक संवाद संभव हो सका है । इसके साथ ही पुरानी बहसें और पुराने सवाल भी उभर आए हैं ।   
1998 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से आदम बी उलम की किताब द बोल्शेविक्स: द इंटेलेक्चुअल ऐंड पोलिटिकल हिस्ट्री आफ़ द ट्रायम्फ आफ़ कम्यूनिज्म इन रशियाका दूसरा संस्करण नई भूमिका के साथ प्रकाशित हुआ । पहली बार 1965 में यह किताब छपी थी ।
1997 में कार्नेल यूनिवर्सिटी प्रेस से माइकेल डेविड-फ़ाक्स की किताब ‘रेवोल्यूशन आफ़ द माइंड: हायर लर्निंग एमांग द बोल्शेविक्स, 1918-1929’ का प्रकाशन हुआ । किताब का महत्व इस बात में है कि इससे आम तौर पर पश्चिमी दुनिया में प्रचारित रूसी क्रांति के नायकों की साजिशकर्ता की छवि खंडित होती है । बोल्शेविक क्रांतिकारी रूसी समाज के नेता थे । लेनिन की सरकार के लगभग सभी मंत्री अपने यूरोपीय समकक्षों पर भारी पड़ते थे । इसकी बदौलत ही क्रांति के बाद की संकटपूर्ण हालत में भी विशाल और विविधता से भरे हुए देश में समाज के बदलाव और संगठन का लगभग असंभव कार्यभार पूरा करना मुमकिन हो सका ।
रूस के अंदरूनी हालात के लिहाज से महत्वपूर्ण 1997 में प्लूटो प्रेस से एरिक हाब्सबाम की भूमिका के साथ तानिया रोज के संपादन में मोर्गन फिलिप्स प्राइस की किताबडिस्पैचेज फ़्राम द रेवोल्यूशन: रशिया 1916-18’ का प्रकाशन हुआ । किताब में प्राइस द्वारा मान्चेस्टर गार्जियन के लिए भेजी गई रूसी क्रांति की खबरों, क्रांति संबंधी उनके संस्मरणों और प्रत्यक्षदर्शी के रूप में दी गई गवाहियों का संकलन किया गया है । भूमिका में हाब्सबाम ने बताया है कि रूसी क्रांति को देखने वालों में प्राइस सर्वाधिक योग्य थे । वे रूस से भली प्रकार परिचित थे, रूसी धड़ल्ले से बोलते थे और 1910 से रूस के देहाती क्षेत्रों में घूम रहे थे । आए तो थे व्यापारिक मकसद से लेकिन निजी रुचि विज्ञान और वानिकी में थी । तीन पीढ़ियों से परिवार के लोग ब्रिटेन में सांसद चुने जा रहे थे । प्राइस ने लिबरल पार्टी छोड़कर लेबर पार्टी का पल्ला पकड़ा और 1922 से 1924 तक कम्यूनिस्ट पार्टी में रहे । 1914 से 1918 तक मान्चेस्टर गार्जियन के विशेष संवाददाता का काम रूस में किया । रूस में रहते हुए रूसी क्रांति के पक्षधर हो गए थे और इसीलिए रूस के आंतरिक मामलों में मित्र शक्तियों द्वारा हस्तक्षेप का घनघोर विरोध किया । हाब्सबाम के मुताबिक रूसी क्रांति को देखने के मामले में प्राइस की नजर पर ब्रिटेन का असर नहीं है । फ़रवरी क्रांति के समय वे जार्जिया में थे और उसके तुरंत बाद मास्को होते हुए पेत्रोग्राद के लिए निकल पड़े । अक्टूबर से पहले विभिन्न इलाकों में घूमकर खबरें भेजते रहे और ऐन क्रांति से पहले पेत्रोग्राद लौट आए थे । इस अवधि में भेजी गई उनकी खबरों से बोल्शेविकों के पक्ष में तेजी से माहौल पलटने का अनुभव होता है ।    
पिछले बीस सालों में प्रकाशित इस सामग्री से पता चलता है कि रूसी क्रांति के बारे में पुरानी मान्यताओं में नई सदी में भी कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है । जिन्हें रूसी क्रांति को हिंसा, अराजकता और तबाही के उदाहरण के बतौर प्रस्तुत करना था, उन्होंने बीसवीं सदी में जो रुख अपनाया था उसी रुख से अब भी रूसी क्रांति को देख रहे हैं । जिन्हें क्रांति में लेनिन की भूमिका की प्रशंसा करते हुए स्तालिन की निंदा करनी थी, उन्होंने भी अपनी राय नहीं बदली है । जो लोग इस क्रांति को पूंजीवाद की मार्क्सवादी आलोचना का विस्तार मानते हैं वे भी अपने रुख पर कायम हैं । इससे साबित होता है कि वाम बौद्धिक दुनिया में नई सदी पुरानी सदी से बाहर नहीं आ सकी है । इसे हठ के बतौर समझना ठीक नहीं होगा । इसकी जड़ें व्यापक वास्तविकता में हैं । कभी मार्क्स के सिलसिले में कहा गया कि तुम्हारे दुश्मन नहीं बदले, दोस्त भले बदल गए हों । उसी तरह कहा जा सकता है कि जिन सवालों ने 1917 की बोल्शेविक क्रांति को जन्म दिया था उनमें कोई बुनियादी बदलाव न आने से रुख में भी बदलाव न आना स्वाभाविक है । याद करिए कि बोल्शेविक क्रांति का नारारोटी, जमीन और शांतिथा । इन तीनों ही मामलों में क्या कुछ खास बदलाव आया है ? इस सदी में नवउदारवाद के परदे में निजी पूंजीवाद के पुनरागमन और वैश्वीकरण के नाम पर साम्राज्यवाद की वापसी ने पुराने मुद्दों में अलबत्ता नई जान फूंक दी है ।