Monday, February 24, 2020

अछरिया हमरा के भावेले


पुस्तकालय के बारे में हम उस समय बात कर रहे हैं जब दिल्ली के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में घुसकर विद्यार्थियों की पुलिस द्वारा निर्मम पिटाई के दृश्य प्रकट हुए हैं पुस्तकालय के भीतर घेरकर होने वाले इस उत्पीड़न को शताब्दी वर्ष में जलियांवाला बाग की तर्ज पर विद्यार्थियों ने जामियावाला बाग कहा इस घटना से शिक्षा, किताब और समाज तथा सरकार के आपसी रिश्तों के बारे में बहुत सी बातें करने की गुंजाइश पैदा होती है   
हम सभी जानते हैं कि जहां सबसे कम आजादी होती है यानी जेल, वहां भी पुस्तकालय होता है इस अकेले तथ्य से मनुष्य के जीवन में किताब का महत्व समझा जा सकता है इसके साथ यह भी तथ्य है कि जब तानाशाही की आहट आती है तो उसके पहले शिकार किताब और पुस्तकालय होते हैं । जरूरी नहीं कि तानाशाही खुलेआम और हिंसक रूप में ही सामने आए बहुधा वह एक व्यवस्थित विभेदकारी तंत्र के रूप में मौजूद रहती है इस तंत्र में बहिष्करण और नियंत्रण के हथियार के रूप में ज्ञान का सुविधासम्पन्न वर्गों ने इस्तेमाल किया है लेकिन फिर उसी ज्ञान को जब लोगों ने अपने लिए इस्तेमाल करना शुरू किया तो वह ज्ञान खतरनाक समझा जाने लगता है ज्ञान की यह यात्रा बहुत ही रोमांचक रही है । इस प्रक्रिया को गोरख पांडे के मशहूर गीतअजदिया हमरा के भावेलेके इस बंद से सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है- दिनवा खदनिया सोना निकललीं, रतिया लगवलीं अंगूठा । सगरी जिनिगिया करजे में डूबल, कईल हिसबवा झूठा । हिसबवा अइसन हम नाहिं मनबो, अछरिया हमरा के भावेले ।इस बंद में जिक्र ग्रामीण इलाके का नहीं खनिज के क्षेत्र का है । दुख है कि वहां भी कर्ज के लिए अंगूठा लगाना पड़ता है । प्रेमचंद के लेखन पर ध्यान दें तो कर्ज के चलते किसान को मजदूर होना पड़ता है और वहां भी कर्ज साथ चला आता है । सारी जिंदगी कर्ज में डूबने का तथ्य ही किसान और मजदूर के बीच साझा है । इस नियति से मुकाबले के लिए अक्षर को हथियार बनाना जरूरी लगता है । तभी एक अन्य गीत में गोरख लिखते हैं- अक्षर अक्षर पंक्ति पंक्ति को छापामार करो ।      
भाषा से किताब बनती है इस भाषा के निर्माण के सिलसिले में प्रसन्न कुमार चौधरी ने अपनी किताबअतिक्रमण की अंतर्यात्रामें बताया है कि जब मनुष्य के हाथ स्वतंत्र हो गए और वह दोनों पैरों के सहारे खड़ा होकर चलने लगा तो उसने उपकरण बनाने शुरू कर दिए उपकरण बनाना प्रकृति के साथ मनुष्य की ऐसी अंत:क्रिया थी जिसके जरिए उसने संसार में अपने रहने लायक वातावरण निर्मित करने की शुरुआत की यह काम वस्तुओं को बदले बिना सम्भव नहीं था और जाने बिना बदलाव नहीं हो सकता स्पष्ट है कि इस कठिन काम के साथ ही उसे वस्तुओं के स्वभाव का ज्ञान होने लगा तो फिर इसके आधार पर नामकरण होने से मनुष्य का शब्द भंडार भी बढ़ने लगा इस विवरण से हम समझ सकते हैं कि खुद भाषा, संसार को बोधगम्य बनाने और बदलने की प्रक्रिया में पैदा हुई चारों ओर फैली हुई जो दुनिया मनुष्य को पूरी तरह अराजक और बेकाबू महसूस होती थी उसमें तर्क नजर आने लगा और भाषा में उस तर्क का प्रतिबिम्ब प्रकट होने लगा । आश्चर्य नहीं कि भाषा समस्त ज्ञान के संग्रह का साधन बन गई । इसी तर्ज पर कहा जाता है कि किताबों में जानकारी का खजाना संचित रहता है । इस खजाने को रखने के अतिरिक्त आगामी पीढ़ियों तक उसे ले जाने का काम किताब और उसके संग्रहालय के जरिए आसान हो जाता है ।  
लेकिन यह भी कोई रहस्य नहीं है कि जनता के सामूहिक प्रयास से अर्जित समस्त ज्ञान को वर्गों में बंटे समाज में शासकों ने अपने लिए इस्तेमाल किया । इस तरह जिस ज्ञान का उत्पादन समाज के सामूहिक सहकार से हुआ था उसे ही कब्जे और बहिष्करण का साधन बना लिया गया । श्रम के अलावे संपदा के उत्पादन के सबसे बड़े संसाधन जमीन पर कब्जे के सिलसिले में कागज की भूमिका को हम सभी जानते हैं । ज्ञान से बहिष्करण के साथ संसाधनों से बेदखली में भी अक्षर की बड़ी भूमिका रही है । स्थिति यहां तक पहुंच गई कि जिस कानून की किताब और उसको लागू करने वालों के बारे में न्याय की पक्षधरता की धारणा बननी चाहिए थी उसके मुकाबले उन्हें दमन उत्पीड़न के साथ जोड़कर देखा जाने लगा । हमारे देश में तो भौतिक और आध्यात्मिक संसाधनों पर स्वामित्व के इर्द गिर्द ऊंच नीच की एक अत्यंत कठिन व्यवस्था के रूप में जातिगत भेदभाव भी कायम हुआ । जब किताब इस व्यवस्था के पक्ष में नजर आने लगी तो शिक्षित समुदाय के प्रति अविश्वास पैदा हुआ ।
इस अविश्वास की अभिव्यक्ति लोक में तो हुई ही कभी कभी शिष्ट साहित्य में भीचत्वारि मूर्ख पंडिता:’ जैसा व्यंग्य प्रकट हुआ । किताब के प्रति इस संशय के चलते अनुभव की प्रामाणिकता को अधिक महत्व दिया गया । अनुभव की प्रामाणिकता पर यह जोर वैधता के वैकल्पिक स्रोत की खोज तो था ही, उसके सहारे ज्ञान पर विशेषाधिकार प्राप्त समूहों की इजारेदारी का प्रतिरोध भी खड़ा किया जा रहा था । विरोध करने वालों को भी अनुभव जन्य ज्ञान की सीमा का अंदाजा रहा होगा तभी किताब की दुनिया को दूसरे के हाथ में पूरी तरह छोड़ देने की जगह उस क्षेत्र में भी दखल देने का प्रयास होता रहा । इसी प्रयास की अभिव्यक्ति पुस्तकों की दुनिया से संघर्षरत जनता के लगाव में होती है । लगभग प्रत्येक बदलाव के आंदोलन के साथ किताब का संबंध रहा है । रूसी बोल्शेविक क्रांति के बारे में लिखते हुए जान रीड ने बताया है कि युद्ध के मोर्चे पर रेल से भरकर किताबें भेजी जाती थीं और गरम तवे पर पानी की बूंद की तरह छन्न से समाप्त हो जाती थीं । राजनीतिक चेतना बढ़ने के साथ पढ़ने की भूख का रिश्ता राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा के पहले भाग में है जिसमें उनका कहना है कि रौलट कानून का विरोध देश में शुरू हुआ तो खाना खाने वाले लोग उन होटलों में जाते जहां अखबार भी पढ़ने के लिए उपलब्ध होते । उन्होंने यह भी बताया है कि जब पंजाब के अखबारों से सही खबरें नहीं मिलतीं तो बाहर से आने वाले अखबारों का सही सूचनाओं के लिए इंतजार होता था । इससे लगता है कि प्रतिबंध से कभी जानकारी की भूख को दबाया नहीं जा सकता, इससे वह वैकल्पिक रास्ते बना लेती है । बहुत सम्भव है इसी तरह के माहौल ने सार्वजनिक पुस्तकालयों को जन्म दिया हो !  
शिक्षा संस्थानों के साथ तो पुस्तकालय की मौजूदगी समझ आती है लेकिन हम जिस तरह के पुस्तकालय की शताब्दी मना रहे हैं वह एक सार्वजनिक पुस्तकालय है । इस तरह का कोई पुस्तकालय इस मान्यता के बिना चल नहीं सकता कि ज्ञान पर उनका भी अधिकार है जो किसी शिक्षा संस्थान तक नहीं पहुंच सकते । यह ज्ञान पर उत्पादकों के दावे की अघोषित अभिव्यक्ति है । शिक्षा संस्थानों के बाहर के ये पुस्तकालय साथ ही सार्वजनिक वाचनालय भी होते हैं । निजी से बाहर सार्वजनिक संसार के निर्माण में इन जगहों का योगदान अभूतपूर्व रहा है । आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना और संचालन के लिए जिस तरह के जानकार मतदाता की जरूरत पड़ती है  उसके लिए भी इन जगहों ने ऐसी भूमिका निभाई जिसके चलते भागीदारीपरक लोकतंत्र को सामाजिक आधार मिला । अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए पुस्तकालयों ने अपने रूप भी बदले हैं । जिस जमाने में उनकी महिमा के साथ धार्मिक पवित्रता जुड़ी होती थी उस समय किताब भी देवालयों में सुरक्षित रखी जाती थी । उसके बाद आधुनिक शिक्षा के साथ नए किस्म के पुस्तकालय आए । पहले शिक्षा तक पहुंच को सीमित करने के लिए विभिन्न समुदाय उससे जुड़े संस्थानों से बाहर रखे जाते थे । शिक्षा को धार्मिक संस्थानों की जकड़ से बाहर लाकर उसके धर्मनिरपेक्षीकरण के साथ ही पुस्तकालयों का निर्माण शुरू हुआ । इसके बावजूद पुरानी आदतें कुछ समय तक जारी रहीं । वर्जीनिया वुल्फ़ ने बताया है कि एक समय शिक्षा संस्थानों के साथ ही पुस्तकालयों तक भी स्त्रियों की रसाई नहीं थी । ऐसी स्थिति में खासकर स्त्रियों ने शेक्सपियर आदि अंग्रेजी लेखकों के नाम पर क्लब स्थापित करके ज्ञान की अपनी प्यास बुझाई और उच्च शिक्षा से बाहर रह जाने की क्षतिपूर्ति की । मार्क्स की पुत्री एलीनोर के बारे में सभी जानते हैं कि इसी प्रक्रिया में उन्होंने तमाम साहित्यिक हलकों तक अपनी जानकारी विस्तारित की । सरकारी कर्मचारियों के लिए एक समय दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी जैसे पुस्तकालय खोले गए । शहरी इलाकों में बच्चों ने बाल पुस्तक क्लब बनाए । जिला पुस्तकालय भी कई जिलों में मौजूद हैं । इन सबके साथ पुस्तक संस्कृति ने जाति आधारित छुआछूत को रेल की तरह ही कुछ हद तक दूर किया । स्कूल कालेज जाने वाले विद्यार्थियों को जब पाठ्यक्रम से बाहर की किताबें पढ़नी होतीं तो वे खासकर उपन्यास आदि इनके साथ छिपाकर ले जाते । कवि सम्मेलन और मुशायरों ने भी किताब और उससे जुड़ी सांस्कृतिक चेतना को लोकप्रिय बनाने में बहुत मदद की ।
स्पष्ट है कि पुस्तकालय केवल कोई इमारत नहीं होता बल्कि सम्पूर्ण सामाजिक ढांचा होता है । किताब में जो जानकारी कूटबद्ध होती है उसे हासिल करने के जरिए हम अपनी सीमित दुनिया से बाहर निकलते हैं । भूगोल की किताब में बने नक्शे को खोलने की उत्तेजना से ही दुनिया अपनी सम्पूर्णता में हमारे लिए बोधगम्य हो पाती है । इसके अतिरिक्त भी किताब ने मनुष्य की बेहद नाजुक मसलों में मदद की है । बोरिस पोलेवोई की असली इनसानपढ़कर अवसाद से बाहर निकलते लोगों की मौजूदगी हमारे समाज में मुश्किल नहीं है । कोरोलेंको के उपन्यास अंधा संगीतज्ञके सहारे हमें संसार को समझने के सर्वथा भिन्न तरीके का पता चलता है । इन उदाहरणों से साफ है कि किताब हमें खुद के साथ बाहर को समझने बूझने में मदद करती है ।   
बहुत निजी स्तर पर कहें तो किताब हमारी आत्मा का आईना होती है । अंग्रेजी कहावत है कि मनुष्य की पहचान उसके संगियों से होती है और उसी तर्ज पर कह सकते हैं कि हमारी रुचि का पता उन किताबों से चलता है जो हमें पसंद होती हैं । इसके चलते भी हम कई बार उन किताबों का नाम नहीं लेते जिन्हें पढ़ना पसंद होने के बावजूद अच्छी नहीं मानी जातीं । अगर कोई जान ले कि हम कौन सी किताब पढ़ते हैं तो एक तरह से हम उस व्यक्ति के सामने नंगे हो जाते हैं । व्यक्ति की तरह ही देश, सभ्यता और संस्कृति भी अपना परिष्कार और स्तर साबित करने के लिए अक्सर किताबों के नाम गिनाते हैं । सभी संस्कृतियों के पास कोई न कोई ऐसी किताब होती है जो उसकी चरित्रगत विशेषता का लक्षण बन जाती है । सही बात है कि जरूरत के मुताबिक इनका आविष्कार होता है फिर भी नाम किताब का ही गिनाया जाता है । इस नश्वर संसार में एक हद तक वे अमरता प्राप्त करने का साधन भी होती हैं । लेखक का नाम किताब के रूप में उसके देहावसान के बाद भी बचा रहता है ।    
हमने शुरू में कहा कि जेल में पुस्तकालय होते हैं लेकिन कारखानों में पुस्तकालय नहीं होते । कार्यालयों में होते हैं लेकिन कारखानों में नहीं होते । मार्क्स ने अपने सबसे प्रसिद्ध ग्रंथपूंजीके पहले खंड में कहा कि पूंजी के निर्माण की असलियत को देखना हो तो बाहरी दिखावे से हटकर उत्पादन की उस असली जगह पर जाना होगा जिसके प्रवेशद्वार पर ही बिना काम के अंदर घुसने से रोकने का संदेश लिखा रहता है । इस जगह पर हम सभी जानते हैं कि पूंजी का निर्माण जिस चीज के जरिए होता है वह समय है । पूंजी के उत्पादन के लिए पढ़ने में समय लगाना उसका दुरुपयोग है । इसलिए पुस्तकालय खोलना और चलाना परोक्ष रूप से समय पर मनुष्य के खाली समय पर उसके अधिकार का समर्थन करना है ।
हमारे अपने समय की सबसे बड़ी समस्या के रूप में अंतोनियो नेग्री ने 2018 में पोलिटी से प्रकाशित किताब ‘फ़्राम द फ़ैक्ट्री टु द मेट्रोपोलिस’ में समूचे समाज का एक विराट कारखाने में बदलते जाना बताया है । जो लोग मनुष्य को अपना सम्पूर्ण व्यक्तित्व हासिल नहीं करने देना चाहते वे उसे केवल धन पैदा करने की मशीन बनाना चाहते हैं मुनाफ़े की उनकी भूख खाली समय को लाभप्रद बना देना चाहती है हम सभी देख रहे हैं कि लगातार मनुष्य के समूचे समय का दोहन करने की कोशिश हो रही है सभी सामाजिक गतिविधियों को बाजार के दायरे में लाया जा रहा है नींद पर भी विजय पाने के लिए प्रयोग चल रहे हैं ताकि निरंतर जागरण के बावजूद मनुष्य की कर्यक्षमता को बरकरार रखा जा सके इसका प्रयोग सैनिकों पर किया जा चुका है जो दूसरे देशों में जाकर चुने हुए लोगों का एक ही गोली से कत्ल कर लेते हैं इसके साथ ही काम के निश्चित आठ घंटे बीते युग की बात होते जा रहे हैं
जाहिर है कि यह भी लड़ाई का एक नया मोर्चा है । शासक वर्ग हमेशा ही लोगों के समय से लाभ अर्जित करने और मुनाफ़े के लोभ में नए नए कामों को लाभदायक बनाने के लिए मनुष्य को धन पैदा करने की मशीन मात्र में बदलने की कोशिश करता है । इसकी टक्कर में लगभग सभी संघर्षों ने ज्ञान पर जनता के अधिकार को साबित करने के लिए किताब को हथियार के बतौर इस्तेमाल किया है । यह संघर्ष केवल किताब के लिए संघर्ष कभी नहीं रहा इसमें समय पर अपना हक जताने से लेकर स्वाभिमान के दावे तक बहुत सी चीजें शामिल होती हैं संस्कृति के उच्च समझे जाने वाले कर्म कभी सामान्य लोगों को नहीं करने दिए जाते पढ़ना और लिखना ऐसे ही ऊंचे समझे जाने वाले कर्म हैं उनके करने के लिए दलित समुदाय को बहुत लम्बा सफर तय करना पड़ता है