Saturday, May 9, 2026

सदी की पहली चौथाई

 

                  

                                

हमारे देश में वर्तमान सदी के आगमन से पहले ही इक्कीसवीं सदी का सपना बेचा जाने लगा था । उस सपने को नारे का ठोस स्वरूप देने का काम पूर्व प्रधानमंत्री ने मानवीय चेहरा का पूंजीवाद कहकर किया था । उनका यह कथन पूंजीवाद की अमानवीयता पर परदा डालने की नीयत से सुनाया गया । सोवियत संघ के पतन के ही साथ जिस पूंजीवाद की घिनौनी सचाई को छिपाने की बौद्धिक कसरत उस समय के तमाम माध्यमों से की गयी अब उसकी हकीकत दुनिया के सामने प्रकट हो रही है । अपनी इस सचाई को वैध बताने के लिए पूंजीवाद ने सापेक्ष नैतिकता का सिद्धांत गढ़ा था ताकि उस पर सवाल ही न उठ सकें । इसके बावजूद नैतिकता का जो भी सार्वभौमिक पैमाना हो सकता है उसकी मौजूदगी और अपील को लाख बौद्धिक कसरत के बावजूद मिटाया नहीं जा सका । उसी पैमाने के आधार पर वर्तमान पूंजीवाद के वैश्विक केंद्रक राष्ट्र में दुनिया की राजनीति, अर्थनीति, संस्कृति और यौनलिप्सा का जैसा घिनौना संगम एप्सटीन फ़ाइल्स में प्रकट हुआ है उसे दबाने की कोशिश को नाजायज कहना होगा ।

फिलहाल सपनों के व्यापारी अगली चौथाई के लिए हमारे देश को विकसित बनाने का नया नारा लेकर बाजार में आये हैं । दुनिया भर में इस नये समय को गढ़ने में मीडिया की सक्रिय भूमिका को देखा और पहचाना गया है । विकसित देश में उसकी इस भूमिका को समझने के क्रम में नत्थी पत्रकारिता की धारणा बनायी गयी । हम हमेशा से नकल करने के मामले में भी बहुत सफल नहीं रहे इसलिए इस मामले में भी इस परिघटना की भद्दी पुन:प्रस्तुति ही दे पा रहे हैं । यहां तक कि अमेरिका की नकल में ही अमीर राष्ट्राक्ष्यक्ष बनाने की अवैध चेष्टा किये जा रहे हैं । जिस तरह इक्कीसवीं सदी की यह चौथाई बीसवीं सदी के अंतिम दशक की प्रवृत्तियों का विस्तार बनी थी उसी तरह आगामी चौथाई के भी इस चौथाई में शुरू हुई गतिविधियों का ही विस्तार होने की आशा है । इसलिए सपनों के शोर के बीच सतह के नीचे दबाई हकीकत के निशान देखना सही होगा ।

इस क्रम में एक ऐसे विद्वान की राय को सुनना उचित होगा जो मार्क्सवादी होने की जगह अमेरिका में मुख्य धारा के अर्थशास्त्रियों में गिने जाते हैं । उनका नाम मार्टिन वोल्फ़ है और 2023 में पेंग्विन प्रेस से उनकी किताब ‘द क्राइसिस आफ़ डेमोक्रेटिक कैपिटलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि जैसे जैसे दुनिया उनके सामने उजागर होती गयी, वैसे वैसे उनके विचार बदलते गये । जड़ विचार रहना अच्छी बात नहीं होती । इसके बावजूद उनके मूल्य नहीं बदले । माता-पिता हिटलर के कारण निर्वासित शरणार्थी थे । उनके कारण ही लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा अचल रही । साथ ही नागरिकता, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, तार्किकता और सत्य की प्राथमिकता में भी उनका यकीन कायम रहा । चौथे खम्भे की भूमिका इन मूल्यों की सेवा करना है । इन मूल्यों के साथ ही वे इस सदी की तीसरी दहाई में पहुंचे हैं । पचासी साल की उम्र में उन्हें एक चक्र पूरा हुआ महसूस हो रहा है जिसमें उनके माता पिता भी शामिल हैं । लेखक के पिता के जन्म के साथ इसकी शुरुआत हुई । तब तक उद्योगीकरण, शहरीकरण, वर्ग संघर्ष, राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, नस्लभेद और महाशक्तियों के आपसी टकराव को काफी समय गुजर चुका था । चार साल बाद प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया । यूरोप की स्थिरता समाप्त हो गयी । माता का जन्म विश्वयुद्ध के खात्मे के दो महीने पहले हुआ था । तब रूसी क्रांति को संपन्न हुए नौ महीने ही बीते थे । बादशाहों को गद्दी छोड़नी पड़ी और यूरोपीय साम्राज्य ढह गये । नयी दुनिया की बेहतरी का भरोसा भी बहुत दिन कायम न रह सका । मुद्रा स्फीति और कुछ सुधार के उपरांत महामंदी आयी, स्वर्णमान खत्म हो गया, जर्मनी में हिटलर का उदय हुआ, स्पेनी गृहयुद्ध और फिर दूसरा विश्वयुद्ध । पिता ने जर्मनी छोड़ दिया । माता भी नाना-नानी के साथ भाग निकलीं । दोनों की मुलाकात 1942 में लंदन में हुई । एक साल बाद शादी हुई और तीन साल बाद जाकर लेखक का जन्म हुआ । उनका पालन पोषण ब्रिटेन में ही हुआ । पूरा परिवार लाखों परिवारों की तरह आफत के दौर का उत्पाद बना । बहुत मुश्किल से ये सभी लोग उस आफत से बाहर निकलने या बचने में कामयाब रहे । शेष रिश्तेदार इतने भाग्यशाली नहीं रहे ।

इस पूरे माहौल ने लेखक में निराशा को जन्म दिया । इसके कारण उनको जीवन के मुश्किल दौर में भी खुशी खोजने की धुन सवार हुई । दूसरे कि उनको आशावाद से बहुत धोखे मिले । सबसे ताजा धोखा वित्त के प्रबंधकों की बुद्धिमत्ता और निर्वाचकों की समझदारी के मामले में मिला । उनके माता पिता भी निराशावादी रहे थे । पिता को वियेना में नाटक लिखने से जो मानदेय मिला उसके सहारे वे अमेरिका की राह में लंदन चले आये । दादा मछली मारने के व्यवसाय में थे और जर्मन आक्रमण के समय समुद्र के रास्ते परिवार समेत निकल आये । चाहते तो थे कि रिश्तेदार भी आयें लेकिन रिश्तेदारों को सुधार की आशा थी । इस तरह दादा की निराशा ने उन्हें बचा लिया । इस पारिवारिक इतिहास के कारण उन्हें सभ्यता की भंगुरता का आभास रहा है । कोई भी जानकार यहूदी इस सच से इनकार नहीं कर सकता । मनुष्य बेवकूफी, क्रूरता और विध्वंस की राह पर फिसल जाते रहे हैं । वे कबीलाई ढंग से अपने और बाहरी के बीच भेद बरतने की आदत के शिकार हो जाते हैं । इसके बाद वे जिसे बाहरी मानते हैं उनका बिना किसी संकोच के संहार भी कर देते हैं । इसी वजह से लेखक ने शांति, स्थिरता और आजादी को कभी स्थायी नहीं समझा और जो लोग इस धोखे में रहते हैं उनकी समझ पर तरस खाते रहे । लंदन का जीवन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा । माता पिता का निधन 1993 और 1997 में हो गया । उनके बचपन और जवानी के दिनों के मुकाबले बाद की दुनिया बेहतर रही । लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण दुनिया में उनके भरोसे की विजय हुई । यूरोप पर से तानाशाही का खतरा टल गया लगता था । लोकतंत्र विजयी हुआ था । मध्य और पूर्वी यूरोप के समाजवादी शासन लौह दीवार से बाहर निकल रहे थे । यूरोप का फिर से एकीकरण हो रहा था । रूस के भी लोकतंत्र और व्यक्ति की आजादी की राह में आने की उम्मीद नजर आ रही थी । फ़्रांसिसी क्रांति से लेकर बीसवीं सदी तक के वैचारिक, राजनीतिक और आर्थिक विभाजन समाप्त होते नजर आ रहे थे ।

बाद की घटनाओं ने साबित किया कि ये उम्मीदें बेबुनियाद थीं । उदार वित्तीय व्यवस्था अस्थिर साबित हुई । एशियाई वित्तीय संकट के दौरान लेखक को इसका भान हुआ । हालिया वित्तीय संकट और महामंदी के बाद तो यह पूरी तरह सिद्ध हो गया । विश्व अर्थतंत्र अस्थिरता को जन्म देने वाले असंतुलन का स्रोत हो गया । वित्तीय अस्थिरता का कारण था कि विभिन्न देशों के बीच पूंजी प्रवाह को काबू में रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी निभाने में अक्षम हो गयी । यह वित्तीय अस्थिरता पश्चिमी अर्थतंत्र की एकमात्र विफलता नहीं थी । इसके साथ विषमता में बढ़ोत्तरी भी लगी हुई थी । निजी जीवन में असुरक्षा बोध घर कर गया था और आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार सुस्त पड़ गयी थी । व्यापारिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, राजनीतिक और प्रशासनिक शासक कुलीनों की इस विफलता ने जनता की निगाह में उन्हें अविश्वसनीय बना दिया ।

राजनीति की दुनिया में भी इसी तरह के बड़े बदलाव आये । 2001 में 11 सितम्बर को अमेरिका में हुए हमलों ने सबको सकते में डाल दिया । इसके बाद अफ़गानिस्तान और इराक में युद्ध हुए । दूसरी ओर वैश्वीकरण की आर्थिक सफलता के साथ ही चीन और कुछ हद तक भारत का उभार हुआ । इसके कारण राजनीतिक और आर्थिक शक्ति संतुलन में बदलाव आया । अब उसकी धुरी अमेरिका और पश्चिम से खिसककर पूरब की ओर जाने लगी । विश्व राजनीति में इसके साथ ही एक अन्य बदलाव भी आ रहा था । इक्कीसवीं सदी के आगे बढ़ने के साथ उदार लोकतंत्र की जगह अनुदार लोकतंत्र या गालबजाऊ तानाशाही का विस्तार होने लगा । ये तानाशाह पुराने तानाशाहों से अलग थे । इनमें लोकलुभावनवाद था । इनका उभार न केवल नये लोकतांत्रिक देशों में हुआ बल्कि संसार के बड़े और पुराने लोकतांत्रिक देश भी इसकी चपेट में आ गये । इन्होंने अपने देशों की अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता को भारी नुकसान पहुंचाया और पश्चिम की श्रेष्ठता को मटियामेट कर दिया । राजनीति के प्रति उनके गालबजाऊ रुख ने कानून के शासन को धूलधूसरित कर दिया, सत्य के प्रति निष्ठा को कमजोर किया और सारे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों की ऐसी तैसी कर दी । इन्हीं बातों को उदार लोकतंत्र का लक्षण माना जाता था । पूर्ण मनमानी ही शायद इनका लक्ष्य था ।

लेखक को आज की चुनौतियों की तुलना बीसवीं सदी के पूर्वार्ध की चुनौतियों से करना उचित लगता है । उस समय भी विश्व का शक्ति संतुलन इंग्लैंड और फ़्रांस से खिसककर जर्मनी और अमेरिका की ओर जा रहा था जैसे आज वह अमेरिका से चीन की ओर खिसक रहा है । उस समय भी विश्वयुद्ध, स्पेनी एनफ़्लुएंजा, भारी मुद्रास्फीति और महामंदी की शक्ल में बड़े संकट आये थे । इस समय उसी तरह कोरोना और यूक्रेन युद्ध जैसे संकट आये । उस समय जर्मनी, इटली और स्पेन में लोकतंत्र का खात्मा और तानाशाही का उभार हुआ था । इस समय भी विकासशील देशों और पहले के समाजवादी देशों में यह प्रवृत्ति नजर आ रही है । इस बार लोकतंत्र का खात्मा उन भी देशों में हो रहा है (अमेरिका में ट्रम्प और इंग्लैंड में ब्रेक्सिट) जो बीसवीं सदी में लोकतंत्र का झंडा उठाये हुए थे । इस समय तो परमाणु युद्ध और जलवायु संकट की ऐसी हालत है जिसके बारे में 1980 दशक से पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । लेखक को अपनी पीढ़ी के बारे में लगता है कि उन्हें बीसवीं सदी के इन हालात का अंदाजा नहीं होगा लेकिन उनके माता पिता को अतीत की प्रतिध्वनि अवश्य सुनायी पड़ी होगी । रूसी साम्राज्य की फिर से स्थापना की चाह में उन्हें हिटलर द्वारा सभी जर्मन भाषी यूरोपीयों को एक ही शासन के मातहत लाने की इच्छा की अनुगूंज महसूस हुई होगी । इसी नये समय को समझने के क्रम में इस किताब का लेखन हुआ है ।

इस समय को समझने के क्रम में इसी तरह 2022 में लिटिल, ब्राउन ऐंड कंपनी से एक और अर्थशास्त्री नूरिएल रूबिनी की किताब ‘मेगाथ्रेट्स: टेन डेंजरस ट्रेंड्स दैट इम्पेरिल आवर फ़्यूचर, ऐंड हाउ टु सर्वाइव देम’ का प्रकाशन हुआ था । लेखक के मुताबिक खतरे तो हमेशा लगे ही रहते हैं । उनमें कुछ इतने कमजोर होते हैं कि नुकसान उठाकर भी हम आगे चल देते हैं । लेकिन कुछ खतरे गम्भीर होते हैं और उनका असर काफी लम्बा रहता है । अगर किसी के निजी फैसलों के कारण ऐसा हो तो उनमें सुधार किया जा सकता है । इसके मुकाबले नीति निर्माताओं के फैसलों से सामूहिक या सामाजिक खतरे पैदा होते हैं । उनके नीतिगत फैसलों में व्यक्तियों का दखल तो बहुत कम होता है लेकिन उनके नुकसान सबको ही झेलने होते हैं । इसके उदाहरण के लिए लेखक ने 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट और कोरोना का जिक्र किया है । इस दौरान गलत नीतियों के कारण लोगों के बैंक खाते खाली हो गये या फिर लाखों लोगों के जीवन और आजीविका का संकट पैदा हो गया । इन फैसलों के नुकसान बहुत होते हैं और इन्हें बदलना खासा मुश्किल होता है । अर्थशास्त्री होने के नाते लेखक की निगाह खतरों और उनके नतीजों पर रहती है ।

2006 में उन्हें घरों की कीमतों में भारी उछाल नजर आया । इसके साथ ही उन्होंने बंधक रखकर कर्जखोरी और आवास निर्माण में भी तेजी दिखायी पड़ी । नये बने मकानों के लिए बाजार में खरीदार खोजे जा रहे थे । तभी उन्होंने इस बुलबुले के फूटने और वैश्विक मंदी तथा वित्तीय संकट की चेतावनी दी । इसके कारण उनकी सार्वजनिक रूप से हंसी उड़ाई गयी । सावधानी बरतने की उनकी बात को खारिज कर दिया गया । जब संकट आया तो मकानों की कीमत धड़ाम से गिरी और इसकी धमक दुनिया भर में सुनाई पड़ी । इस तरह के  खतरों के साथ मुश्किल यह है कि उनकी रफ़्तार सुस्त होती है इसलिए उनका असर तुरंत नहीं महसूस होता इसलिए उनके बारे में सामूहिक कदम उठाने में भी अक्सर देरी हो जाती है ।

इन सबमें वे युद्ध को सबसे खतरनाक नहीं मानते क्योंकि उसका इतिहास बहुत पुराना है । इसकी जगह वे आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक, भूराजनीतिक, व्यापारिक, तकनीकी, स्वास्थ्य से जुड़े और जलवायु आधारित खतरों को अधिक प्रभावी मानते हैं । इनमें भूराजनीतिक खतरों से शीत या गर्म युद्धों का जन्म हो सकता है । उन्होंने मुख्य रूप से दस खतरों की बात की है जिन पर उन्हें तत्काल ध्यान देना जरूरी लगता है । उनका कहना है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया में संपत्ति और समृद्धि की बढ़ोत्तरी हुई, अपेक्षाकृत शांति का वातावरण रहा और उत्पादकता भी बढ़ी । विगत पचहत्तर साल अपेक्षाकृत स्थिरता के रहे और आर्थिक मंदी भी कम समय के लिए ही आयी । नयी नयी खोजों से जीवन की गुणवत्ता में बहुत सुधार हुआ । महाशक्तियों के बीच कोई सीधा युद्ध भी नहीं छिड़ा । अधिकांश देशों में प्रत्येक पीढ़ी का जीवन स्तर उनके बाप दादा की पीढ़ी के मुकाबले बेहतर हुआ । उनके अनुसार दुर्भाग्य से यह समय अब बीत चला है ।

अब अस्थिरता, टकराव और अराजकता के दौर में हम सबका प्रवेश हुआ है । अब ऐसे खतरों का सामना करना पड़ रहा है जो पहले कभी नहीं थे । ये सभी खतरे आपस में जुड़े हैं । असल में हमारे पैरों के नीचे की धरती अस्थिर हो चुकी है । इसके बावजूद बहुतेरों को लग रहा है कि भविष्य भी अतीत जैसा ही होगा । यह उम्मीद सही नहीं है । ऊपर जिन खतरों का जिक्र हुआ है वे सभी मिलकर जानी पहचानी दुनिया को पूरी तरह बदलने जा रहे हैं । आगामी समय हमें लगातार सतर्क रहना होगा । आर्थिक और भूभौगोलिक निश्चिति का समय समाप्त हो चुका है । रोजगार की सुरक्षा, जीने लायक धरती, संक्रामक बीमारियों का खात्मा और महाशक्तियों के बीच शांति भी अतीत की बात होने जा रही है । महामंदी के स्तर की आर्थिक उथल पुथल की सम्भावना मजबूत होती जा रही है । इसके साथ ही जलवायु बदलाव, जनांकिकीय अस्थिरता, व्यापार और प्रवास को रोकने वाली राष्ट्रवादी नीतियों, चीन और अमेरिका के बीच वैश्विक होड़ तथा नौकरियों से मनुष्यों को बेदखल करने वाली तकनीक का प्रसार भी इनके साथ मिल गये हैं ।

किताब में हमारे सामने के तीन मुख्य खतरों का वर्णन किया गया है जो न केवल आपस में जुड़े हैं बल्कि एक दूसरे को बल भी प्रदान करते हैं । कर्ज की फांस, लोभ और वित्तीय संकट, कृत्रिम बुद्धि और स्वचालन, वैश्वीकरण के अंत, महाशक्तियों के बीच भूभौगोलिक टकराव, मुद्रास्फीति और ठहराव, मुद्रा की कीमत में अस्थिरता, आमदनी में विषमता और पापुलिज्म, महामारी और जलवायु बदलाव के बीच आपसी संबंध सबको पता हैं । इनमें से प्रत्येक के कारण अन्य को झेलने की हमारी क्षमता कमजोर होती है । इनमें से कोई एक भी मुश्किल पैदा कर सकता है । इन सबके एक साथ आ पड़ने से जो होने जा रहा है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ।                 

किताब के अलग अलग अध्यायों में एक एक खतरे की बात करने के बाद लेखक ने इनमें बचे रहने की सामूहिक सम्भावना खोजने की कोशिश की है । उनका अनुमान है कि प्रचंड सौभाग्य, अप्रत्याशित आर्थिक वृद्धि और अभूतपूर्व वैश्विक सहकार के बिना इस मुश्किल से पार पाना असम्भव नजर आ रहा है । मनुष्य अपने ही हाथों अपना भाग्य लिख रहा है । किताब में वर्णित बहुतेरे खतरे तो किसी खास समस्या का समाधान महसूस हुए थे । लेखक ने इस तरह के ढेर सारे कदमों में वित्तीय क्षेत्र के नियमों की समाप्ति और नयी आर्थिक नीतियों, कार्बन उत्सर्जन वाला उद्योगीकरण, मैनुफ़ैक्चर की गतिविधियों को समुद्र पार के देशों में स्थानांतरित करना, कृत्रिम बुद्धि का विकास तथा चीन को प्रबलता प्रदान करने आदि का नाम लिया है । उनका कहना है कि इन खतरों पर काबू पाने के लिए हमें अपनी चाहत को बदलना होगा । यह मानना सही समझा जाता था कि कुछ कामों के स्वचालन से अन्य क्षेत्रों में बेहतर और नये काम पैदा होंगे लेकिन इस मान्यता को बदलना होगा । यह मानना भी ठीक नहीं होगा कि टैक्स घटाने, व्यापार के उदारीकरण और नियमों में ढील देने से सबके लिए लाभप्रद आर्थिक ऊर्जा पैदा होगी । हो सकता है हमारा जीवन निजी आकांक्षाओं को साझा कल्याण के तहत रखने से सम्भव हो । सतत और समावेशी विकास हासिल न कर पाने की हालत में अंधकार के कबीलाई युग में हमारी मनुष्यता की वापसी हो सकती है क्योंकि संकीर्ण हितों की होड़ समग्र बरबादी पैदा करने वाले राष्ट्रीय और वैश्विक टकरावों को जन्म देगी ।                       

किताब में जिन खतरों का जिक्र किया गया है उन्हें लेखक दूरगामी मानता है लेकिन साथ ही उनकी शुरुआत अभी हुई नजर भी आ रही है । विकसित अर्थतंत्रों में मुद्रास्फीति में तीव्र बढ़ोत्तरी और गिरावट का खतरा एक साथ दिखाई पड़ रहा है । मुद्रास्फीति से जूझने के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दर बढ़ा रहे हैं और इसके कारण कर्ज में डूबे हुए देशों और व्यक्तियों द्वारा कर्ज वापस न करने का खतरा है जिससे वित्तीय भंगुरता की आशंका बलवती होती जा रही है । दुनिया के सट्टा बाजारों में मंदड़िया सक्रिय हैं जिससे बंधक संपदा के अवमूल्यन का संकट पैदा हो गया है । इसके साथ ही आसानी से धन मिल जाने के समय का अवसान तेजी से होता नजर आ रहा है । वैश्वीकरण से पीछे हटने और विश्व अर्थतंत्र में बिखराव की बातें हो रही हैं । यूक्रेन युद्ध के भौगोलिक प्रसार की आशंका है । इसके साथ ही अमेरिका और चीन के बीच नये शीतयुद्ध और तनाव की खबरें गर्म हैं । दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार तेज होने से भारत-पाकिस्तान, सहाराई अफ़्रीका और अमेरिका के पश्चिमी भाग में सूखा पड़ रहा है और जानलेवा लू चल रही है । चीन की वृद्धि धीमी पड़ गयी है तथा कोरोना का नये नये रूपों में आगमन सम्भावित है । ऊर्जा की असुरक्षा, भूख और अकाल ने भोजन, ऊर्जा और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में आग लगा दी है । ये सब बदतरीन और खतरनाक भविष्य के अपशकुनी संकेत हैं । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश के कर्ताधर्ता भी विश्व अर्थतंत्र के सामने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के सबसे गम्भीर संकट की आशंका व्यक्त कर रहे हैं । उनका कहना है कि ढेर सारी आपदाओं का पिटारा खुलने की आशंका है ।

इन आपदाओं में राजनीति में फ़ासीवाद का उभार भी है । यह उभार सबसे पुराने लोकतंत्र का दावा करने वाले देश अमेरिका में ट्रम्प के जरिये आता नजर आ रहा है । इस परिघटना के बारे में  2025 में ब्लूम्सबरी कंटीन्यूम से जैकब सिल्वरमैन की किताब ‘गिल्डेड रेज: इलान मस्क ऐंड द रैडिकलाइजेशन आफ़ सिलिकान वैली’ का प्रकाशन हुआ । 2023 में लेखक को लगा कि अमेरिका के तकनीक क्षेत्र के तमाम मुखिया दक्षिणपंथ की ओर बढ़ रहे हैं तब उन्होंने इस किताब का लेखन शुरू किया । ये लोग मुखर, अमीर, गुस्सैल और भावना से भरे हुए तथा 2024 के चुनाव में जोरदार भूमिका निभाने के लिए भी व्यग्र थे । किताब का मकसद इस राजनीतिक लहर के स्रोत, दिशा और जिम्मेदार लोगों की कहानी कहना था । तकनीक की राजनीति के बारे में लेखक दस साल से लिख रहे थे और कुछ समय डिजिटल धोखाधड़ी, अवैध वित्तीय लेनदेन और इस मामले में राजनीतिक प्रभाव की छानबीन में लगाया था इसलिए सोचा कि इस नाटकीय बदलाव को वे समझ सकते हैं । तकनीक के मालिकों के इस राजनीतिक बदलाव के बारे में उन्होंने जो रपटें लिखी थीं उन्हें इस किताब की सामग्री होना था लेकिन उनको इसके विस्तार का अंदाजा नहीं था । उनको अनुमान नहीं था कि सिलिकान घाटी के दक्षिणपंथीकरण की यह कहानी ट्रम्प के दूसरी बार चुने जाने और इलान मस्क के उनके घनिष्ठ सहयोगी होने तक जाएगी । उन्होंने यह भी नहीं सोचा था कि ट्रम्प के शपथ ग्रहण समारोह में तकनीकी की दुनिया वे ही धन्नासेठ शामिल होंगे जिनके बारे में वे लिखते आये थे । इन लोगों ने चुनाव अभियान में और परिवारजनों पर धन की बारिश की थी । यह भी नहीं सोचा था कि दुनिया के सबसे अमीर आदमी का शपथ ग्रहण फ़ासीवादी अभिवादन के साथ समाप्त होगा । वैसे भी अमेरिकी राजनीति में अब तक किसी को इतना विराट राजनीतिक प्राधिकार नहीं मिला था । यह सोचना ही सम्भव नहीं था कि देश का सबसे अमीर उद्योगपति और रक्षा सौदों का ठेकेदार प्रशासन के विरुद्ध इस तरह तख्तापलट की साजिश करेगा । ट्रम्प क्रिप्टो मुद्रा में रुचि तो लेता था लेकिन उसके देश के अगुआ क्रिप्टो उद्यमी होने की कोई उम्मीद नहीं थी जिसने ढेर सारी नयी कंपनियां खोल ली थीं और उनके माध्यम से करोड़ो डालर विदेश तक से अर्जित कर रहा था ।           

स्वास्थ्य के क्षेत्र में होने वाले गम्भीर बदलाव के मामले में 2025 में क्राउन से मारिया ब्लेक की किताब ‘दे प्वाइजंड द वर्ल्ड: लाइफ़ ऐंड डेथ इन द एज आफ़ फ़ारएवर केमिकल्स’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका 2009 में जब गर्भवती हुईं तो उन्हें आगामी संतान की रक्षा की चिंता हुई । निजी फ़िक्र से बचने के लिए उन्होंने अपने आपको शोधकार्य में व्यस्त कर लिया । पता चला कि संतान के जन्म से कुछ महीने पहले नाल के जरिए ढेर सारा खून गर्भ में जाता है ताकि भ्रूण को पोषण और आक्सीजन मिल सके । गर्भ के आरम्भिक दिनों में जब भ्रूण का दिमाग, शरीर के अंग, उंगली और होंठ बनते हैं तो उसी समय मनुष्य निर्मित कुछ रसायन नाल से बहते रहते हैं तथा भ्रूण के खून और ऊतक में समा जाते हैं । इसीलए भी प्रत्येक अमेरिकी नवजात अपने शरीर में कुछ कृत्रिम रसायन लिए रहता है । ये रसायन नुकसानदेह होते हैं । इनमें से कुछ रसायनों से कैंसर हो सकता है या भ्रूण के विकास में विकार आता है । कुछ अन्य हैं जिनसे गर्भ के हारमोन में बदलाव आता है जिससे शिशु के दिमाग और अन्य अंग प्रभावित होते हैं । जन्म के समय ये विकार भले न दिखाई पड़ें बाद में कैंसर, दिल की बीमारी, बांझपन, अल्पवयसी मासिक धर्म, अनवधानता आदि को जन्म देते हैं । इसके सबूत इतने पुख्ता हैं कि हारमोन में उलटफेर करने वाली वस्तुओं से सम्पर्क को शुक्राणुओं की कमी से लेकर मोटापे और रक्त शर्करा की अधिकता तक का कारण माना जा रहा है ।

हमारे समय की सबसे बड़ी होड़ अमेरिका और चीन के बीच है । इस मसले पर सामान्य से थोड़ा अलग रुख अपनाते हुए  2025 में डब्ल्यू डब्ल्यू नार्टन & कंपनी से डैनिएल वांग की किताब ‘ब्रेकनेक: चाइना’ज क्वेस्ट टु इंजीनियर द फ़्यूचर’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि चीन और अमेरिका के आपसी टकराव हास्यास्पद हैं क्योंकि उनकी समानता बहुत अधिक है । दोनों ही देशों में भौतिकता के प्रति प्रचंड अनुराग है । सफल उद्यमियों के प्रति पूजाभाव व्याप्त है । दोनों ही देशों में परिणामवाद की तूती बोलती है । तकनीक के चमत्कार से भारी संरचना खड़ी करने में दोनों ही लगे हैं । दोनों देशों में कुलीनों के भीतर जनता के राजनीतिक रुझान के प्रति चिढ़ का भाव भरा है इसके बावजूद वे अपने अपने देश को ताकतवर मानने के मामले में एक सुर में बोलते हैं और अन्य देशों की कोई आवाज नहीं सुनना चाहते । लेखक कनाडा से हैं और अमेरिका तथा चीन में रहते हुए लगभग बराबर समय बिताया है इसलिए जो कुछ वे कह रहे हैं वह अनुभवसिद्ध है । उन्हें कनाडा की सुस्ती के मुकाबले ये दोनों देश भागमभाग वाले महसूस होते हैं । इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि ये दोनों ही दुनिया को बदलने में मशगूल हैं । इनके मुकाबले यूरोपीय लोग अपने अतीत को ही सुखमय समझते हैं और अमेरिकी या चीनी व्यवहार को अपना नहीं सकते । शेष दुनिया इन दोनों महाशक्तियों के असर के लिहाज से या तो आगे है या पीछे है । विचार और वस्तुओं के मामले में शेष दुनिया को इनमें से ही किसी एक का अनुकरण करना है । अगर इन दोनों की कार्यपद्धति और अंत:क्रिया को समझा नहीं जाएगा तो दुनिया के ढेर सारे बदलावों को समझने में हम सक्षम नहीं होंगे । दोनों देश एक दूसरे को बदल रहे हैं और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को भी ढाल रहे हैं । चीन की मजबूती और कमजोरी को हम जितनी अच्छी तरह देखेंगे उतनी ही अच्छी तरह अमेरिका को भी देख सकेंगे ।

दुनिया भर में राजनीति की दुनिया में जिस खतरे को महसूस किया जा रहा है उसके केंद्र भारत और तुर्की भी हैं । तुर्की के अनुभव के आधार पर 2024 में कैननगेट से एस तेमेलकुरान की किताब ‘हाउ टु लूज ए कंट्री: द 7 स्टेप्स फ़्राम डेमोक्रेसी टु फ़ासिज्म’ के नये संस्करण का प्रकाशन हुआ । इसे सबसे पहले 1919 में 4थ एस्टेट से छापा गया था । लेखिका ने पाठकों के नाम पत्र के रूप में इस संस्करण की नयी प्रस्तावना लिखी है । शीर्षक में लोकतंत्र और फ़ासीवाद होने से किताब बहुत अच्छी होने की उम्मीद नहीं रह जाती । लेखिका ने बताया है कि इस किताब में जिस रास्ते का उन्होंने वर्णन किया है उस पर चलकर पाठक का देश भी गुम हो जा सकता है । ऐसा होने से बचाने की जिम्मेदारी पाठक की ही है । उनका कहना है कि इतिहास के शुरू से ही मनुष्य तीन तरह की अक्षमता से ग्रस्त रहा है । जब कभी राजनीतिक आपदा से देश को बचाना होता है तो हम सभी देर से जागते हैं । यह आदत बेहद मारक साबित हुई है । खतरे की आहट सुनने का समय आने पर हम बहरे हो जाते हैं । दिमाग की किसी गड़बड़ी के कारण बुरी खबर को हम अनसुना कर देते हैं और खबरची का गला दबाकर दिमागी सुकून हासिल करते हैं । समस्या पैदा होने पर हमें यकीन रहता है कि कोई न कोई कुछ करेगा । बाद में लगता है कि वह कोई तो हमें होना था । इसलिए हमें दस्तावेजी इतिहास पसंग आता है । इन सब बातों के जानने के बावजूद हममें से ही कुछ लोग भविष्य की बात करना बंद नहीं करते । इसकी भी तीन वजहें हैं । खतरे का संकेत मिलने पर चुप रहना मुश्किल होता है क्योंकि अन्यथा हम पागल हो सकते हैं । सच को उजागर होना चाहिए । हम मानकर चलते हैं कि शब्दों की ताकत से मूर्खता का इलाज सम्भव है । हालांकि अक्सर इसका नतीजा खूनखराबे में निकलता है । इसके पीछे कहीं न कहीं यकीन रहता है कि एक न एक दिन मनुष्य अपनी गलतियों से सीखेगा तथा अपने राजनीतिक और नैतिक पतन का विरोध करने में देर नहीं करेगा ।  

2016 में ही लेखिका को तुर्की छोड़कर यूरोप जाना पड़ा था । तब उन्होंने लोगों को बताया कि जो कुछ दुनिया में होना शुरू हुआ है वह सब तुर्की में हो चुका है । तब ट्रम्प को मजाक की चीज समझा जाता था और ब्रेक्सिट को भी हल्के में लिया जा रहा था । उस समय विश्व राजनीति में जो पागलपन चालू हुआ था वह ऐसा विश्वव्यापी प्रयोग लगता था जिसके करने वाले किसी अन्य ग्रह के प्राणी लगते थे जो मानो सर्वाधिक हास्यास्पद राजनेताओं को झेलने की मनुष्य की क्षमता की परीक्षा कर रहे हों । उस समय लेखिका ने सात ऐसे वैश्विक रास्ते महसूस किये जिनसे होकर बहुतेरे देश फ़ासीवाद की गिरफ़्त में आ रहे हैं और यह मजाक की बात नहीं लगी । इन रास्तों का एक आंतरिक तर्क था और इस परिघटना की कार्यपद्धति को पहचाना जा सकता था । उन्हें लगा कि अगर ज्यादातर लोग इसके तरीके को जान लें और तदनुसार कार्यवाही करें तो इस खतरे को रोका जा सकता है ।

समस्या यह थी कि तब इस खतरे को बहुत कम ही लोग लेखिका की तरह फ़ासीवाद कहने को तैयार थे । जब भी वे इस शब्द का खुला प्रयोग करती थीं तो बौद्धिक समुदाय उनसे इतना जल्दी न करने का आग्रह करता था । उनका कहना है कि कोई भी स्थापित व्यवस्था इसी तरह अपनी रक्षा का उपाय करती है । 2019 में किताब के छपने के समय बौद्धिक समूह को खतरा महसूस तो होने लगा था फिर भी व्यवस्था में सुधार का आधारहीन आत्मविश्वास बरकरार था । यह वैचारिक भ्रम अब भी कायम है कि पश्चिमी लोकतंत्र बहुत हद तक परिपक्व हैं । उदार लोकतंत्र की बचकानी बीमारियों से उनकी सेहत में बहुत अंतर नहीं पड़ेगा । ऐसा होना केवल तुर्की या भारत जैसे परिधि के देशों में सम्भव है । उसके बाद जो हुआ उसे बताने की जरूरत नहीं । जिसे दक्षिणपंथी पापुलिज्म कहा जा रहा था वह नासूर की शक्ल ले चुका है । ट्रम्प अब प्रमुख राजनेता है और यूरोप अंधकार के मुहाने पर खड़ा है । बीमारी अर्जेन्टिना में भी पहुंच गयी है । इन सबके ऊपर गाज़ा का जनसंहार पूरी दुनिया के सामने जारी है ।

किताब के पहली बार छपने के बाद से लेखिका को अनेक भाषाओं में सोशल मीडिया में एक ही तरह की बातें देखने में आती रही हैं । सभी कहते हैं कि उनके देश में भी यही सब हो रहा है इसलिए किताब देखें । दुर्भाग्य से ऐसा कहने वालों का बहुमत नहीं बन सका है । लोकतंत्र को बचाने के लिए जितना कम प्रयास हो रहा है वह समस्या की गम्भीरता को देखते हुए बेहद नाकाफी है । उन्होंने देखा कि विगत पांच सालों में मुख्य धारा के बुद्धिजीवियों और मध्यमार्गी राजनेताओं में लोकतंत्र को बचाने के लिए बहुत ऊंचे स्तर की बहसें आयोजित हुईं लेकिन ये लेखिका को अधिकतर अपनी झेंप मिटाने की कोशिश ही महसूस हुईं । वे भी इनमें से बहुत सारी बहसों में शरीक थीं इसलिए उनको मालूम है कि उनमें व्यवस्था की उस समस्या को स्वीकार ही नहीं किया जाता जिसने इस राक्षस को पैदा किया है । अगर मान भी लिया तो वे खुद को इतना ज्ञानी और गम्भीर समझते हैं कि जनता के राजनीतिक फैसलों में उनकी राय न लिये जाने की शिकायत रहती है । आज की दुनिया में तमाम वैज्ञानिक भी कोरोना के दौरान जनता को टीका लगवाने और मास्क पहनने के लिए नहीं समझा सके थे जबकि तमाम झक्की लोग भांति भांति के दैवी षड़यंत्र की कहानियों पर लाखों अंधभक्तों का विश्वास अर्जित कर सके थे । जो लोग राजनीतिक केंद्र को बचाना चाहते थे या लोगों को उनके सहजबोध की ओर लौटाना चाहते थे उनकी हालत चंद मुट्ठी भर समर्थकों को उपदेश देने वालों जैसी रह गयी । दूसरी ओर जनमत संग्रह से पता चल रहा था कि दक्षिणपंथी पापुलिज्म का कुछ देर मजा लेने के बाद लोग खुशी खुशी फ़ासीवाद के गड्ढे में गिर रहे हैं । उसके बाद से सर्वत्र जनता लोकतंत्र से मुख मोड़ रही है । दुखद रूप से उनके सामने कोई चारा भी तो नहीं है ।    

लेखिका को लगता है कि लोकतंत्र की वर्तमान हालत दिखावे से अधिक नहीं रह गयी है । मानवता के सबसे गम्भीर वादे, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को भद्दे मजाक में बदल दिया गया था । जीवन की हकीकत आर्थिक प्रणाली में व्यक्त होती है और उसने इन तीनों को निगल लिया था । सच्ची समानता की बात करना गुनाह था, स्वतंत्रता मांगने लायक भी बची नहीं रह गयी थी । बंधुत्व से सबके मनोरंजन में बाधा पड़ने की आशंका थी । मतदान अलबत्ता कर सकते थे । कुछ कहना हो तो उसके लिए गैर सरकारी संगठनों का रास्ता खुला था । लोकतंत्र तो वैसे भी हकीकत नहीं बन सका था, अब नवउदारवादी अर्थव्यवस्था से जुड़कर वह अपने आदर्शों से और भी दूर हो गया । उसकी इस हालत को हम सबके सामने मानवता की असली अवस्था के रूप में परोसा जा रहा था । इस व्यवस्था में दसियों साल बिता लेने के बाद जनता को उस व्यवस्था में भरोसा ही नहीं रह गया था जो उनकी असुरक्षा को दूर करने का हक भी नहीं दे रही थी । लोग जब इस मजाक से ऊब गये तो उनका गुस्सा जायज था । समस्या यह है कि दक्षिणपंथी झूठे प्रचार के असर में लोग असली दुश्मन की जगह लोकतंत्र, स्त्री, आजादी और प्रवासियों के विरुद्ध खड़े हो गये हैं । नफ़रत में वे अपनी असुरक्षा का इलाज खोज रहे हैं । नफ़रत ने उस खाली जगह को भरा है जो राजनीति की दुनिया से गायब हो चुके लोकतांत्रिक आदर्शों के कारण खाली हुई है । नवउदारवाद के प्रभुत्व की वजह से दुनिया भर के लोग सच सुन ही नहीं सके थे । लोकतंत्र ने नहीं, उसके अभाव ने उन्हें धोखा दिया है । समानता, न्याय और सम्मान के अभाव ने व्यवस्था के दुश्मन को जन्म दिया है । इस दुश्चक्र से जूझने के लिए लेखिका तीन कामों की सलाह देती हैं । सच को उजागर किया जाए, जनता में भरोसा रखा जाए और विफल होने पर बेहतर समझ दिखाई जाए ।                         

राजनीति की इस नयी प्रवृत्ति के साथ संस्कृति का गहरा रिश्ता है । 2026 में रटलेज से मार्क-आंद्रे अर्जेन्तिनो और अमरनाथ अमरसिंहम के संपादन में ‘कनटेम्पोरेरी फ़ार-राइट कल्चर: द आर्ट, म्यूजिक, ऐंड एवरीडे प्रैक्टिसेज आफ़ वायलेन्ट एक्सट्रीमिज्म’ का प्रकाशन हुआ । थामस हेगहैमर ने इसकी प्रस्तावना लिखी है । संपादकों की भूमिका के अतिरिक्त किताब में कुल सोलह लेख संकलित हुए हैं । हेगहैमर का कहना है कि चरमपंथ संबंधी शोध के लिए समानुभूति की सबसे अधिक जरूरत पड़ती है । जिनका अध्ययन किया जा रहा है उनकी जगह खड़ा होकर अपने पूर्वाग्रहों और उनसे पैदा गलत निष्कर्ष से लड़ना होता है । जब किसी आंदोलन को सामान्य जनता नापसंद करे तो अपने निर्णय को स्थगित रखते हुए खुद से पूछना चाहिए कि अगर हम इस आंदोलन का अंग होते तो दुनिया को किस तरह देखते । इस सवाल का जवाब वैचारिक वक्तव्य पर ध्यान देने से ही नहीं मिलेगा । उनसे मोटी रूपरेखा ही समझी जा सकती है । इसकी जगह उसमें शरीक लोगों के वास्तविक परिप्रेक्ष्य और उनकी अनुभूति पर नजर रखना उचित होगा । उनकी संस्कृति का विश्लेषण करने से ऐसे लक्षण पकड़ में आएंगे जिन पर अन्यथा निगाह नहीं जाती । चरमपंथी आंदोलन अधिकतर संस्कृति की बात करते हैं इसलिए भी इस पहलू पर ध्यान दिया जाना चाहिए । इसकी बात तो इन लोगों ने 1990 दशक से ही शुरू कर दी थी । पहले वे लोग किसी खास देश में किसी खास विधा की ही बात करते थे । इंटरनेट के आने के बाद दक्षिणपंथ में संस्कृति के बारे में विचार विमर्श पूरी तरह नये धरातल पर पहुंच चुका है । इस क्षेत्र में चरम दक्षिणपंथ का असर समझने के लिए उसके प्रभाव से बाहर आ चुके लोगों से बातचीत करनी होगी ।

हेगहैमर ने धार्मिक रुदन, सामुदायिक गायन तथा स्वर्ग नरक की चित्रात्मक कल्पना आदि के महत्व को इसी तरह के एक दक्षिणपंथी कार्यकर्ता की मार्फत समझा । उनका कहना है कि इस किताब में चरम दक्षिणपंथ की वैचारिक दुनिया का आंख खोल देने वाला चित्रण है । इसमें उनके लड़ाकुओं के रतजगे, आनलाइन चर्चा से लेकर हिटलरी शस्त्र प्रशिक्षण तक की गतिविधियों का वर्णन हुआ है । इसमें ऐसे ऐसे चरित्रों और विचारों से मुलाकात होगी जिनके अस्तित्व से आम तौर पर लोग बेखबर बने हुए हैं । इसे पढ़ते हुए पाठक को कभी सहमति महसूस होगी तो कभी डर लगेगा लेकिन चरम दक्षिणपंथ की बेहतर अंदरूनी समझ बनेगी ।

हेगहैमर का मानना है कि इन समूहों और आंदोलनों का अध्ययन उनकी ही नजर से किया जाना चाहिए इसलिए पांडुलिपि को पढ़ते हुए उन्होंने संगीत की केंद्रीयता, बहादुरी की पूजा, लोकप्रिय पुस्तक प्रकाशन, अतीतमोह, षड़यंत्रों की कथा में रुचि और पुलिस की खुफ़िया घुसपैठ संबंधी प्रसंगों पर अधिक ध्यान दिया । इसके अतिरिक्त समाजीकरण और प्रचार सामग्री के वितरण के लिए इंटरनेट की उपयोगिता भी देखने लायक प्रसंग है । पवित्र ज्ञान की खोज और कुछ नेताओं को संत जैसा दर्जा देना भी इनकी कार्यपद्धति में शामिल महत्वपूर्ण तत्व है । हिटलर को भी इन समूहों में ऐसा ही दर्जा दिया जाता है । इस छवि को गढ़ने में दक्षिणपंथी साहित्य के लेखकों से लेकर चिंतन को प्रभावित करने वाले पेशेवर वक्ता भी आपस में होड़ करते हैं । दार्शनिक परम्परा को वे धर्मशास्त्रों तक ले जाते हैं । इस तरह राजनीति की वर्तमान रणनीति को वे खासा ऊंचा दर्जा प्रदान करते हैं । दक्षिणपंथ के भीतर जेंडर संबंधी सोच पर शोध भी जरूरी है । इस मामले में वे आम तौर पर पितृसत्ता के पक्षधर होते हैं । फिर भी इस मामले में हेगहैमर उनकी विशेषता भी बताते हैं । आंदोलन में पुरुष की हैसियत केवल बहादुरी और प्रभुत्व से नहीं तय होगी बल्कि इसके लिए तो धार्मिक और कलात्मक संवेदना की जरूरत होगी । इसके प्रमाण के बतौर पुरुषों में रोना और कविता लिखने का प्रदर्शन किया जाता है । इन आंदोलनों में धर्म की भूमिका उन्हें वैचारिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करने में मदद करती है । इसके बावजूद ये आंदोलन धार्मिक होने की जगह राजनीतिक ही होते हैं ।

उनका मानना है कि इस संस्कृति में दृश्य-श्रव्य रचनाओं की बहुलता पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि इसकी प्रचार सामग्री में पढ़ने से अधिक देखने और सुनने वाली चीजें होती हैं । उनके जमीनी कार्यकर्ता भी पढ़ने से अधिक देखने के आदी होते हैं । किताब हालांकि चरम दक्षिण के बारे में है लेकिन इससे मुख्य धारा की हालिया अमेरिकी राजनीति को समझने के लिहाज से भी बहुतेरी बातें मौजूद हैं । बहुतेरे लोग इस किताब में विश्लेषित संस्थाओं और मागा आंदोलन में अंतर पर जोर देते हैं लेकिन उनके गुणसूत्र में समानता है । ट्रम्प परिघटना और मागा के बीच संबंध देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की जरूरत नहीं है । प्रत्यक्ष है कि इस संस्कृति में राजनीति और मनोरंजन आपस में खूब घुल मिल गये हैं ।

इस बात को भी लक्षित किया जा रहा है कि इस दौर के दक्षिणपंथी उभार में सामाजिक प्रतिक्रिया का तत्व बहुत मजबूत है । सामाजिक प्रतिक्रिया की ये ताकतें अमेरिका और यूरोप में नस्ली श्रेष्ठता के उसूल को बढ़ावा दे रही हैं । इसके साथ ही राजनीति में मेरिट के गुणगान की प्रवृत्ति उभार पर है । इसकी मौजूदगी और खतरे को पहचानते हुए 2025 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से ब्रायन कोगेलमान की किताब ‘पोलिटिकल मेरिटोक्रेसी इन द 21स्ट सेन्चुरी’ का प्रकाशन हुआ । थामस जेफ़रसन द्वारा जान एडम्स को लिखे पत्र से किताब की शुरुआत हुई है जिसमें पुरुषों के भीतर चरित्र और प्रतिभा की बदौलत प्राकृतिक कुलीनता का जिक्र किया गया है । इसे संपत्ति और जन्म पर आधारित प्रतिभाविहीन नकली कुलीनता से अलगाया गया है । जेफ़रसन ने इस प्राकृतिक कुलीनता को सुशासन के लिए आवश्यक बताया है । उनके मुताबिक राजनीतिक नेताओं में बौद्धिकता जरूरी है । प्रशासन में इन कुलीनों के चुनाव की व्यवस्था को वे समाज के लिए हितकर समझते थे । राजनीतिक संस्थाओं को इस हिसाब से ढालना उन्हें सही लगता था जिसमें ये लोग सत्ता तक आसानी से चले जायें । आज की भाषा में इन कुलीनों को राजनीतिक श्रेष्ठता से समझा जा सकता है । तर्क दिया जाता है कि राजनीतिक सत्ता को क्षमता और गुण के हिसाब से वितरित होना चाहिए । कुलीनों को समझदार और गुणवान कहने का भी चलन है । सार्विक मताधिकार के बावजूद चुनाव लड़ने की योग्यता के आधार पर भी इस तरह की सत्ता का गठन होता है । खतरा यह है कि ऐसी व्यवस्था में चुनाव न कराने की भी प्रवृत्ति का जन्म होता है ।         

एक ओर जहां इजरायल की नस्लभेदी सरकार गाज़ा में जनसंहार चला रही है तो दूसरी ओर अमेरिका में यहूदी वामपंथ की ऐसी धारा पैदा हो रही है जो अमेरिकी फ़ासीवाद से जूझ रही ताकतों के साथ कदम मिलाकर खड़ी हो रही है । इस प्रवृत्ति को जाहिर करते हुए 2024 में मेलविल हाउस से शेन बर्ली और बेन लोर्बेर की किताब ‘सेफ़टी थ्रू सोलिडरिटी: ए रैडिकल गाइड टु फ़ाइटिंग एन्टीसेमेटिज्म’ का प्रकाशन हुआ । किताब की शुरुआत अमेरिका के वर्जीनिया में आयोजित एक समारोह से होती है जो उत्पीड़न के बावजूद अपनी परम्परा को कायम रखने के यहूदी समुदाय के अधिकार के लिए हुआ था । यह कार्यक्रम यहूदियों के सामुदायिक केंद्र के सभाकक्ष में हो रहा था । सालोंसाल इसके लिए अभियान चलाया गया था और चंदा उगाही की गयी थी । लोगों में उत्तेजना थी और सभाकक्ष में लोग खचाखच भरे थे । ऐसे केंद्र यहूदी समुदाय के सामाजिक जीवन का हृदय होते हैं । इनके सहारे तरह तरह के यहूदी एक जगह एकत्र भी होते रहते हैं । जब यहूदियों को सरकारी धार्मिक सेवाओं से बाहर निकाला गया तो उनकी सहायता के लिए ऐसे केंद्र जगह जगह खड़े हो गये । उसी समय बम की सूचना मिलने से कार्यक्रम रद्द कर दिये जाने की घोषणा हुई । इमारत को जल्दी जल्दी खाली कराया गया । जबसे यह केंद्र खुला था तबसे रोज ही बम रखे होने की सूचना मिलती थी । इस समय यहूदी समुदाय के बहुतेरे लोग वहां मौजूद थे इसलिए किसी बड़ी दुर्घटना की आशंका में समारोह को रद्द करना पड़ा । उस इलाके के स्कूलों में यहूदी विद्यार्थियों की संख्या कम थी इसलिए उन्हें अपने सामाजिक जीवन की सार्वजनिक मान्यता के लिए संघर्ष करना पड़ता था । उन्हें अपने समारोहों के दौरान परीक्षा रखे जाने पर आपत्ति होती थी । इसलिए ऐसे विद्यार्थियों ने बम की सूचना के बावजूद समारोह रद्द करने पर बुरा लगा । उन्हें अपने समुदाय के सम्मानित बुजुर्गों के इस हद तक अधिकारविहीन और भयग्रस्त होने से दुख हुआ । बात इतने पर ही नहीं रुकी । इमारत के पास जल्दी ही स्वास्तिक के निशान भी मिलने लगे । इस तरह की घटनाओं ने अमेरिका के यहूदी समुदाय में प्रगतिशील धारा को जन्म दिया है । उनमें से छोटे छोटे प्रगतिशील संगठन और उनके कार्यकर्ता उभर रहे हैं । ये लोग समानता और न्याय की आकांक्षा के इर्दगिर्द समुदाय को संगठित कर रहे हैं । उन्हें अपने पुरखों से उस लम्बी लड़ाई की विरासत मिली जो उन्होंने समाज की बेहतरी के लिए छेड़ी थी । इस लड़ाई के दौरान धार्मिक भेदभाव का विरोध समाज की समग्र बेहतरी के सपने के साथ मिल गया था ।

इस सदी की सबसे गम्भीर समस्या पर्यावरण के साथ आत्मघाती छेड़छाड़ है इस मामले में जितने बड़े पैमाने पर बदलाव रहे हैं उनका अंदाजा बहुधा नहीं हो पाता उसकी व्यापकता का अनुमान कराते हुए 2025 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से अलीसा बतिस्तोनी की किताब ‘फ़्री गिफ़्ट्स: कैपिटलिज्म ऐंड द पोलिटिक्स आफ़ नेचर’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका का कहना है कि लगातार फैल रहे ब्रह्मांड में प्रत्येक जीवित वस्तु केवल कुछ मीटर के घेरे में मौजूद इस धरती पर पायी जाती है धरती पर उसकी जगह उतनी ही है जितनी सेब के छिलके की होती है ब्रह्मांड के विस्तार को देखते हुए इतनी छोटी भी जगह बहुत ही विविध प्रकार के जीव जंतुओं को धारण किये रहती है जहां सूरज की भी रोशनी नहीं पहुंचती उस अतल से शुरू होकर हिमालय की चोटी तक इन जीवों का निवास है अकेले अमेज़न के वर्षावनों में चीटियों की हजार प्रजातियां हैं इनमें से बहुतेरे जीवों की हालत अच्छी नहीं है दस लाख प्रजातियों के लोप का खतरा मौजूद है अकेले पिछले चालीस साल में रीढ़धारी जंगली जीवों में से लगभग आधे समाप्त हो चुके हैं इस समय धरती पर मौजूद अधिकांश रीढ़धारी जानवर पालतू हैं जिन्हें मनुष्य के उपयोग के लिए कारखानों की तरह फ़ार्मों में पाला पोसा जाता है इन जीवों में 60 प्रतिशत स्तनधारी और 70 प्रतिशत पक्षी हैं पेड़ पौधों के साथ भी कृत्रिमता का पैमाना बढ़ गया है जंगलों को इमारती या सजावटी लकड़ी के लिए बुरी तरह काट डाला गया है मैदानी इलाकों या दलदली क्षेत्रों को एकफसली बगानों या चारागाहों में बदला जा रहा है या फिर उन्हें सड़क और रिहायशी इलाकों में तब्दील किया जा रहा है तापमान बढ़ने से लाखों सालों पुराने पाइन के वृक्ष अनजान कीड़ों के शिकार हो रहे हैं या फिर दावानल के ग्रास बन रहे हैं आर्कटिक की बर्फ मौसम से पहले ही पिघलनी शुरू हो जाती है दूसरी ओर साइबेरियाई टुंड्रा प्रदेश में अंडा देने वाले पक्षी अपने अंडों को अधिक समय तक से रहे हैं क्योंकि जिन कीड़ों को खाकर वे जीवित रहते हैं उनकी आमद देर से हो रही है इस वजह से उनकी तादाद तेजी से कम हो रही है कृत्रिम रोशनी से कीड़े और कछुए राह भटक जा रहे हैं मशीनी शोर से पक्षियों और ह्वेलों के ध्वनि संचार में बाधा रही है

उनका कहना है कि जलवायु के ये भयावह बदलाव हमारे सामने सबसे जरूरी और प्रत्यक्ष पारिस्थितिकीय चुनौतियां हैं लेकिन ये ही एकमात्र चुनौती नहीं हैं । संकट भी केवल मानवेतर प्राणियों पर नहीं है न केवल प्रकृति के पुजारियों या पर्यावरणवादियों के सरोकार की हद तक रहने लायक है । धरती पर रहने वाले प्रत्येक प्राणी पर यह संकट है अलग बात है कि कुछ लोगों पर इसका असर तत्काल और गम्भीर है जबकि जिनको सुविधा है वे कुछ समय तक सुरक्षित होने का भ्रम पाल सकते हैं दुनिया के लाखों लोग अपने जीवन के लिए जंगली वनस्पति और जानवरों पर सीधे आश्रित हैं अन्य करोड़ो इन पर परोक्ष रूप से निर्भर हैं जंगली कीड़े परागण करते हैं, दलदल पानी छानते हैं और जड़ें धरती का क्षरण रोकती हैं धरती के रहने लायक बनने हेतु हम सभी अन्य जीवों का सहयोग मांगते हैं मिट्टी, समुद्र और जंगल के बिना पृथ्वी का वातावरण पेड़ पौधों और जीव जंतुओं को नहीं टिका सकता दिक्कत यह है कि इस संकट के बारे में भी राजनेता हल्के तरीके से बात करते हैं इसे मानव अस्तित्व का खतरा भी वे मुहावरे की तरह बताते हैं

सही बात है कि एक समय राजनीति करने वाले लोग तात्कालिक लाभ की जगह दूरगामी चिंताओं के प्रति देश और जनता को संवेदनशील बनाते थे राजनीति की जिस समस्या का जिक्र तेमेलकुरान ने किया है उसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि आजकल  राजनेता केवल बेशर्मी के साथ सफेद झूठ बोलते हैं बल्कि उनके भीतर निकटदृष्टि दोष अत्यंत भयानक रूप से व्याप्त हो गया है यदि इस धरती पर मनुष्यता को जीवित रहना है तो उसे लाभ लोभ की उपभोग आधारित पूंजीवादी जीवन पद्धति को जितना जल्दी हो सके तिलांजलि देकर सबके लिए कल्याणकारी समाज व्यवस्था के निर्माण की पहल करनी होगी इस तरह की समाज व्यवस्था को ही बहुत पहले समाजवाद का नाम दिया गया था