Tuesday, July 14, 2026

क्रांतियों की दुनिया

 


2026 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस से आर्तुरो चांग की किताब ‘ए न्यू वर्ल्ड आफ़ रेवोल्यूशंस: पापुलर इमैजिनेशंस ऐंड मूवमेंट्स एक्रास द अमेरिकाज’ का प्रकाशन हुआ । लेखक बचपन में आप्रवासी के बतौर अमेरिका आये थे । शिकागो में मेक्सिको के प्रवासी के रूप में बड़े हुए । उनका कहना है कि अमेरिका में पहचान स्थिर नहीं है । इसके बनने में गति, यातायात, अनुवाद और बदलावों की भूमिका रहती है । अमेरिकी शब्द ही विवादग्रस्त है तथा उसके अर्थों के बीच साझा तत्व प्रवास, बसावट, विस्थापन, लगाव और राजनीतिक दुविधा हैं । यह विशेषता उन सभी स्थानों की होती है जहां आबादियों का मुखामुखम होता है । इस किताब में इसी नजरिए से विचार करते हुए अमेरिकी पहचानों, इतिहासों और संस्कृतियों के बारे में अलग और वैकल्पिक रुख पेश किया गया है । इसमें उन लोगों, स्थानों, आचरण, राजनीति और आकांक्षा को समझने का प्रयास है जिन्हें कभी अमेरिकी गोलार्ध की परम्परा से जुड़ा समझा जाता रहा है । संस्थागत अन्याय, दबदबा, विषमता और हाशियाकरण के अनुभव पर अमेरिकी चिंतन के विभिन्न आयामों का लेखा जोखा भी इसमें प्रस्तुत किया गया है । अमेरिकी राजनीति में जो सवाल आज भी छाये रहते हैं उनको देखने के लिए घुमंतू समुदाय और स्वप्नदर्शियों का चिंतन अब भी कारगर है । राजनीतिक जीवन के टकरावों के चलते जो बदलाव आये हैं उनका भी लेखा जोखा किताब में लिया गया है । जिन क्रांतिकारी आंदोलनों का अध्ययन इस किताब के विभिन्न अध्यायों में किया गया है उनके विचार, सपने और प्रस्ताव हम तक अनुवाद और संवाद की तरह आते हैं । उनके मूल में औपनिवेशिक शासन से उपजे नाना प्रकार के अनुभव हैं ।

लेखक ने 1770 से 1850 तक के समय को क्रांतियों का युग कहा है । लोकप्रिय विद्रोह का वह समय आज भी राजनीतिक महत्व के मामले में अतुलनीय है । लगभग अस्सी साल की अवधि में समूचे अमेरिकी महाद्वीप में तीस से अधिक प्रतिरोध आंदोलन सामने आये । कनाडा से लेकर अर्जेन्टिना तक औपनिवेशिक अधीनता और उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति की परीक्षा उन्होंने साझा अनुभवों के साथ की । हैती की क्रांति के एक नेता ने मुक्ति या मृत्यु का नारा देकर औपनिवेशिक प्रभुत्व की तकलीफ को स्वर दिया तथा उत्तर औपनिवेशिक प्रतिरोध को उसकी निरंतरता में देखा । इन्हीं अनुभवों के भीतर से वह गोलार्धीय पहचान पैदा हुई जिसे अमेरिका या अमेरिकी कहा जा सकता है । यह पहचान तमाम विजय, दखल, दोहन, गुलामी, कराधान, लैंगिक अधीनता, आर्थिक असुरक्षा और जबरिया श्रम के बावजूद इस इलाके के लोगों को आपस में जोड़ती है । क्रांति के युग की समाप्ति के समय इन तमाम आंदोलनों और उत्तर औपनिवेशिक अमेरिका के सपनों के बावजूद दर्जन भर राष्ट्र राज्य पैदा हो चुके थे । इस किताब में अमेरिकी गोलार्धीय पहचानों के उदय, प्रभाव और पराभव का विश्लेषण है । इसके साथ ही उत्तर औपनिवेशिक सपनों और आंदोलनों की भी जांच परख इसमें की गयी है । इनसे मिलकर क्रांति के युग की तस्वीर बनती है ।     

नयी दुनिया के ये लोकप्रिय उभार कोई अलग थलग घटनाक्रम नहीं थे । इनका गहरा रिश्ता साम्राज्यी सत्ता, राजनीतिक अर्थशास्त्र, सांस्कृतिक उत्पादन और प्राकृतिक विज्ञान की खोजों के सामाजिक असरात से था । साम्राज्यों, शासक वर्ग और औपनिवेशिक संस्थाओं के बीच और उनके विरोध में चल रही लड़ाई की वैश्विक परिघटना का भी अंग ये आंदोलन थे । उनमें फ़्रांसिसी क्रांति, ब्रिटेन की शाही सत्ता के विरुद्ध आयरलैंड का विद्रोह, ओटोमन साम्राज्य के विरुद्ध सर्बिया की क्रांति, स्पेन की बादशाहत का अंत, ग्रीस की आजादी का आंदोलन और 1830 दशक के दौरान बेल्जियम, पोलैंड, इटली, पुर्तगाल और स्विट्ज़रलैंड के विद्रोह तथा आखिरकार 1848 की यूरोप व्यापी क्रांतियों का नाम लेखक ने लिया है । वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो इन क्रांतियों पर औद्योगिक क्रांति, अमेरिका में गुलामी की आर्थिकी, एशिया का औपनिवेशिक दोहन तथा भारत, आस्ट्रेलिया और अफ़्रीका में औपनिवेशिक शासन के विरोध की हलचलों का भी असर था । किताब के केंद्र में अमेरिकी गोलार्ध में औपनिवेशिक सत्ता से छुटकारा पाकर बनने वाली पहचानें हैं लेकिन घटनाओं के और भी व्यापक संदर्भ में इन्हें विश्लेषित किया गया है ।

समूचे अमेरिकी गोलार्ध और व्यापक दुनिया की इन लोकप्रिय क्रांतियों की साझी पहचानों, समस्याओं और अनुभवों को इसलिए भी किनारे लगा दिया गया ताकि राष्ट्र राज्य की व्यवस्था के पक्ष में समूचे इतिहास की गति दिखायी जाए । आज की तारीख में आंदोलनों या लोगों की बातचीत के मुकाबले राष्ट्र राज्यों की बात करना अधिक सहज है । क्रांतियों के जिक्र में भी देश शामिल रहता है । हैती की क्रांति, मेक्सिको का स्वाधीनता संग्राम या संयुक्त राज्य होते हुए भी अमेरिकी क्रांति का ही जिक्र होता है । इस रुख में यह मान्यता निहित रहती है कि लोकप्रिय आंदोलनों का समाहार राष्ट्र राज्य के उदय और उसके प्रभाव की मजबूती में होता है । वे सभी समुदाय जो क्रांतिकारी आंदोलन में शरीक रहते हैं, उनके दावे और टकराव भी अगर उन्हें पूरी तरह मिटा देना सम्भव न हो तो किसी न किसी राष्ट्रीय इतिहास का अंग बना दिये जाते हैं । वैसे इसमें अचरज की कोई बात नहीं । राजनीति के सिद्धांतकार इतिहासों और वृत्तांतों को राष्ट्रीय प्राधिकार, संस्थान अथवा सत्ता को वैध ठहराने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं । किसी भी क्रांति का निर्णायक काम किसी बुनियाद की ऐतिहासिक स्मृति में सुरक्षित रख लिया जाता है । इससे राज्य की उम्र बढ़ जाती है और उसमें निहित क्रांतिकारी भावना भी दीर्घजीवी हो जाती है । क्रांतियों को बुनियाद और स्मारक में ढालने की इस प्रक्रिया में क्रांतिकारी भावना संविधान की प्रस्तावना तक सीमित रह जाती है । यह प्रस्तावना राष्ट्र राज्य की आगामी विश्व व्यवस्था और उसकी नियामक क्षमता का संकेतक हो जाती है ।

हाल के दिनों में राष्ट्र राज्य की इस बुनियादी व्यवस्था के विरोधाभासों पर बहुतेरे अध्ययन हुए हैं । लोगों का कहना है कि राष्ट्र राज्य की यह बुनियाद हमेशा अधूरी रहती है और उसके प्राधिकार की वैधता में लचीलेपन की वजह से उसको हमेशा चुनौती मिलती रहती है । उसकी बुनियाद की यह समस्या बाद में लोकप्रिय सम्प्रभुता के विरोधाभासों को जन्म देती है । इसके कारण बार बार सामूहिक सहमति की आभासी धारणा का निर्माण किया जाता है और लगातार यह क्रिया दोहरानी पड़ती है । इससे राज्य निर्माण में निहित विरोधाभासों पर सवाल उठते हैं  तथा लोकप्रिय सम्प्रभुता, प्रतिनिधित्व और सहमति की धारणाओं को प्रश्नांकित भी किया जाता है ।

असल में लोकप्रिय राजनीति और संस्थाओं को राज्य के उदय के साथ जोड़ दिया जाता रहा है । लेखक का सवाल है कि अगर हम संकट के समय किये जाने वाले अनेक प्रस्तावों में राज्य को भी तात्कालिक समाधान का एक रूप मानें तो ऊपर बतायी गयी धारणाओं और निष्कर्षों में क्या बदलाव आएगा । अगर संगठन की जमीन राष्ट्र की जगह गोलार्ध हो गयी तो लोकप्रिय सम्प्रभुता, प्रतिनिधित्व और सहमति के विरोधाभास किस तरह के नजर आएंगे । प्राधिकार और संप्रभुता रहेंगे लेकिन सम्भव है औपनिवेशिक अधीनता और उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति की दिशा में अपूर्ण और अस्थायी समाधान की तरह दिखायी देंगे । लेखक का दावा है कि अगर हमें राष्ट्रों के बनने के बहुत पहले लोगों, उनके आचरण, संस्कृति और राजनीतिक टकरावों को गोलार्धीय स्तर पर देखना है तो क्रांतियों के युग के प्राथमिक परिणाम के बतौर राष्ट्र राज्य के उदय की मान्यता से मुक्त होना होगा । इसके लिए लेखक ने अलग अलग इलाकों के विभिन्न आंदोलनों के बीच संपर्क का उद्घाटन किया है । उनका कहना है कि क्रांतियों के इस युग में गोलार्धीय राजनीति का उदय हुआ था । यह बात विरोध के सांस्कृतिक रूपों से साबित होती है जिन्होंने बाद में औपचारिक प्रस्तावों पर भी असर डाला । इसका केंद्र औपनिवेशिक अधीनता के विरुद्ध अमेरिकी मोर्चा बना । कविता, नाटक, प्रयाण गीत, पत्र व्यवहार, अखबार और दृश्य कलारूपों में इनको व्यक्त किया गया । उसके बाद संविधान, घोषणा, आदेश और परिपत्र जैसे राष्ट्र निर्माण के दस्तावेजों में इनका असर दिखा । इस परिघटना के ही कारण लेखक ने जब भी अमेरिकी चिंतन, राजनीति और इतिहास का जिक्र किया है तो उसका अर्थ अमेरिका में जन्म लेने वाले या अमेरिका की मुक्ति के साथ जुड़े प्रत्येक व्यक्ति से लिया गया है ।

लेखक का कहना है कि अमेरिकी की उत्तर औपनिवेशिक लोकप्रिय राजनीति के विकास में गोलार्धीय विमर्श और सांस्कृतिक उत्पादन का भारी योगदान रहा है । जब क्रांतिकारी आंदोलन खड़े हुए और उन्होंने औपनिवेशिक प्राधिकार को चुनौती देते हुए मांगे कीं तो अमेरिकी हालात, पहचान, इतिहास और राजनीति की विशेषता का उल्लेख करने में गोलार्धीय वृत्तांत का हवाला दिया और बाद की मुक्ति का विमर्श खड़ा करने में इससे मदद मिली । उन्होंने अपना राजनीतिक सपना भी स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिहाज से बुना । इस सिलसिले में लेखक के विश्लेषण से पता चलता है कि समूचे अमेरिका में गोलार्धीय विमर्श से उत्तर औपनिवेशिक मुक्ति का अर्थ समझने और समूचे इलाके के विभिन्न समूहों को संगठित करने में मदद की । इन परियोजनाओं से उभरने वाले राजनीतिक प्रस्ताव राष्ट्र राज्य के पारम्परिक मानदंड पर नहीं समझे जा सकते ।

उनका यह भी कहना है कि अमेरिका के हाशिये के समुदायों के लिए गोलार्धीय राजनीति खासकर महत्व की रही है । कारण कि वे अन्य किसी तरह के आनुवंशिक या राजनीतिक प्राधिकार से परिचित नहीं रहे । मूलवासी, मिश्रित और अश्वेत समुदाय के लोगों ने अमेरिकी मुक्ति, एकता और प्रतिरोध की वह भाषा निर्मित की जो उपनिवेशित समाजों में साझा मोर्चा बनाने की राह हमवार करे । इसी क्रम में इन समूहों ने गोलार्धीय पहचान और सामुदायिकता की धारणा तैयार की जो उनके मुताबिक नयी दुनिया की आगामी राजनीति को आकार देगी । इन विमर्शों ने क्रांतिकारी सुधारों का रास्ता खोला । जाति के आधार पर कराधान की व्यवस्था खारिज की गयी, दासप्रथा का उन्मूलन हुआ, जमीन पर मूलवासियों के अधिकार को मान्यता मिली, चढ़ावा प्रथा का खात्मा हुआ, संपत्ति का पुनर्वितरण हुआ और जनता की संप्रभुता का विस्तार हुआ । इस गोलार्धीय राजनीति ने ऐसे समन्वय की गुंजाइश भी पैदा की जिसमें गोलबंदी, प्रतिरोध और दावेदारी के संयुक्त अभियान चलाये जा सके । राजनीतिक कल्पना के धरातल पर सामासिक गोलार्धीय सपने का जन्म हुआ जिसके साथ मूलवासी इतिहास, दासता का ज्ञानकांड, पर्यावरणिक दोहन की आलोचना और गणतांत्रिक राजनीति की परम्परा फलते फूलते रहे ।

अमेरिका में गोलार्धीय चिंतन का लोकप्रिय आयाम समारोही या प्रतीकात्मक ही नहीं है । गणतांत्रिक राजनीति को अपनाने और अपने मुताबिक ढालने में गोलार्धीय विमर्श की बुनियादी भूमिका रही है । इस इलाके की राजनीति में लोकप्रियता के तत्व ने गणतांत्रिकता की कुलीन और यूरोपीय परम्परा को खारिज करते हुए उसका लोकप्रिय अमेरिकी संस्करण तैयार किया । क्रांतिकारी आंदोलनों ने एक दूसरे से अपनी कोशिशों हेतु जिस तरह वैधता पानी चाही उसी तरह उन्होंने गणतांत्रिक शासन के अनुभव भी आपस में बांटे । इसके तहत नागरिक समानता, जनता की संप्रभुता, नागरिकता और भौतिक विषमता के क्षेत्र में नये प्रयोग किये गये । इन सभी मामलों में औपनिवेशिक अधीनता की सीमाओं को पार किया गया । लेखक का कहना है कि क्रांतियों के युग में हाशिए के समुदायों ने गणतांत्रिक राजनीतिक चिंतन को आकार देने और उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । उनके इस योगदान की अक्सर उपेक्षा की जाती रही है । इस सिलसिले में लेखक ने सिमोन बोलिवार, खोसे मार्ती और ड्यु बोइस जैसे लोगों का नाम लिया है जिन्होंने साम्राज्य, नस्ल , नागरिकता और अंतर्राष्ट्रीय विकास के सवाल पर मौलिक योगदान किया । इन नामों को पढ़ते हुए हमें राहुल सांकृत्यायन, धर्मानंद कोसाम्बी और आम्बेडकर की याद आती रही जिनके अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मौलिक योगदान को रेखांकित करना बचा है । लेखक ने गोलार्धीय अमेरिकी चिंतन के लोकप्रिय और देसी आयामों को अपने विश्लेषण के केंद्र में रखा है । जिन चिंतकों का नाम उन्होंने लिया वे गणतांत्रिकता और उत्तर औपनिवेशिक राजनीति को नये तरह के राजनीतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, कलात्मक और साहित्यिक रचनात्मकता के साथ आपस में जोड़ते हैं । इन सबने गणतांत्रिक राजनीतिक चिंतन को देसी राजनीति, कैथोलिक पहचान और नस्लभेद के उन्मूलन की परम्पराओं के साथ जोड़ा । उन्होंने यूरोपीय चिंतकों, परम्पराओं और आधुनिकता के साथ संवाद बनाते हुए भी यूरोपीय वर्चस्व को सिरे से खारिज किया । शेष औपनिवेशिक दुनिया की तरह ही गोलार्धीय अमेरिकी राजनीतिक चिंतन तमाम तरह के विरोधाभासी लेनदेन से भरा हुआ है । इसके ही कारण मुक्ति के उसके प्रस्ताव बेहद आकर्षक प्रतीत होते हैं ।

लेखक के मन में सवाल है कि अमेरिकी गोलार्ध में तमाम तरह के समूहों, व्यवहारों, संस्थानों और संस्कृतियों के होते हुए गोलार्धीय विश्लेषण कैसे सम्भव है । असल में क्रांतिकारी दौर में रहने वाले लोग भारी समाजार्थिक और राजनीतिक बदलावों का अनुभव करते हैं । इनके कारण साझा अमेरिकी अनुभव और देश से लगाव का विकास हुआ । आपस में घुले मिले इन कारकों ने अमेरिका के आर्थिक और राजनीतिक आजादी की चाहत का अवसर प्रदान किया । इससे ही अमेरिकावासियों के लोकप्रिय शासन की वैधता पैदा हुई । लगे लिपटे यूरोपीय देशों के अर्थतंत्र को कायम रखने के लिए अमेरिकी उत्पादों पर निर्भरता की आलोचना का भी जन्म हुआ । अमेरिकी गोलार्ध पर यूरोप की पकड़ को किसी एक घटना से समाप्त मानने की जगह लेखक ने इसे इन सभी कारकों का संचयी प्रभाव माना है ।

सबसे पहले उन्होंने स्पेन द्वारा अपने उपनिवेशों में उत्पादन को नियमित करने की मंशा से किये आर्थिक सुधारों का जिक्र किया है जिसने स्पेनी साम्राज्य को एक ही प्रशासनिक व्यवस्था के तहत ला दिया । इसने वाणिज्य, नस्ल, धर्म, जमीन और बौद्धिक उत्पादन को नियमित करना शुरू किया । इससे स्पेन को मजबूती के साथ कमजोरी भी मिली । स्पेन दूर था और उपनिवेशों का प्रशासन एक हद तक स्वायत्त तरीके से काम करता था इसलिए इन सुधारों ने गोलार्धीय एकता को जन्म दिया । अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज भरे पड़े हैं जिनमें केंद्र तथा उपनिवेश के बीच रिश्तों का बदलाव देखा जा सकता है । इनमें जनता के संगठित होने की गोलार्धीय प्रक्रिया के भी सबूत बिखरे पड़े हैं । इन सुधारों ने जनता पर भी असर डाला था क्योंकि केंद्र और उपनिवेश के बीच दोहन का नया रिश्ता बना था । इन सुधारों ने स्थानीय कुलीनों की ताकत कम कर दी क्योंकि केंद्र ने उपनिवेशों के शासन में सीधे दखल देना शुरू किया । पहले स्थानीय कुलीनों के पास राजनीतिक नियुक्ति, जमीन की खरीद बिक्री और कानूनों की व्याख्या के मामले में बहुत ताकत थी । सुधारों ने यह ताकत बादशाह के प्रतिनिधि को दे दी । दूसरी ओर इससे चर्च, मूलवासी मुखिया और आर्थिक संघों की भी ताकत घटी । ऐसी हालत में इन स्थानीय कुलीनों ने अपने हितों की रक्षा और औपनिवेशिक शासकों के अधिकारों पर बंदिश के लिए आम लोगों के साथ संवाद शुरू किया । इन सुधारों ने राजकीय निगरानी में भी इजाफ़ा किया और उसके जरिए अमेरिकी उत्पादन का नियमन और उसका केंद्रीय स्तर पर औपनिवेशिक दोहन आरम्भ हुआ । इससे पहले स्थानीय कुलीनों के पास उपनिवेशों में श्रमिकों के वितरण का अधिकार हुआ करता था । अब यह काम बादशाह के प्रतिनिधियों के हाथ आ गया । इससे उपनिवेशों के शहरी केंद्रों की आर्थिक ताकत कम हुई । दूसरी ओर कर संग्रह की प्रक्रिया संगठित हुई और कर देने वालों की संख्या तेजी से बढ़ायी गयी । इन सुधारों का क्षेत्र मुख्य रूप से आर्थिक था लेकिन कुछ सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव भी किये गये ताकि आबादी में बादशाह के प्रति श्रद्धा बढ़े । इसके लिए शिक्षा की व्यवस्था को बादशाह के प्रति निष्ठा का माध्यम बनाया गया । स्कूल की नयी व्यवस्था में मूलवासी समुदायों को प्रजा के बतौर फिर से ढाला गया और उनमे राजभक्ति को मजबूत किया गया । धार्मिक भावना को बादशाह के प्राधिकार का समर्थक बनाया गया । शिक्षा संबंधी ये नीतियां बहुत सफल तो नहीं हुईं लेकिन औपनिवेशिक शासन की वैधता के लिए पुनर्जागरण की भाषा का उपयोग विद्वानों द्वारा चिन्हित किया गया है । शासन ने जनता के निजी जीवन में दखल देना शुरू किया और उसके लिए लोक कल्याण की शब्दावली का प्रयोग किया गया । उपनिवेशों की प्रजा के लिए पहले इस तरह की धारणा नहीं इस्तेमाल की गयी थी । तब तो बादशाह का दैवी प्राधिकार ही स्पेनी शासन का औचित्य साबित करने के लिए काफी था । जनता संबंधी सोच और उसके कल्याण की बात धारणा के स्तर पर बदलाव का संकेतक है । केंद्र और उपनिवेश के बीच दोहन और ऊंचनीच के रिश्ते में बदलाव का तो कोई सवाल ही नहीं था लेकिन जनता के कल्याण की धारणा औपनिवेशिक शासन के कई कदमों के लिए बाधक बनने लगी । स्पेनी उपनिवेशों के ये बदलाव ब्रिटिश और फ़्रांसिसी उपनिवेशों के मेल में थे ।

इन सांस्थानिक सुधारों के जरिए औपनिवेशिक सत्ता का केंद्रीकरण हुआ जिसने अमेरिका के विकास को एकीकृत किया । इसी प्रक्रिया में लेखक ने अमेरिकी पहचानों के समूहीकरण का उदय भी देखा है । गोलार्धीय विमर्श को समझने में अगर इस औपनिवेशिक अतीत को गायब कर दिया जाए तो इस विमर्श का उदय पूरी तरह संयोग के अधीन नजर आने लगेगा । गोलार्धीय चिंतन का उदय उस समय हुआ जब औपनिवेशिक नियमन के सहारे यूरोपीय ताकतें अमेरिका को फिर से जीतना चाहती थीं और अमेरिकावासी इस प्रयास की प्रतिक्रिया में सामूहिक वृत्तांत की ताकत को खड़ा कर रहे थे । इसी दौरान इन औपनिवेशिक ताकतों में युद्ध के कारण फूट पड़ी । जल्दी ही निष्ठा बादशाह की जगह जनता के प्रति पैदा होने लगी । अमेरिका में नयी दुनिया के स्वायत्त अर्थतंत्र के लाभकर होने का तर्क जोर पकड़ने लगा । औपनिवेशिक सत्ता की वैधता में कमी, अमेरिकी शहरों के उदीयमान अर्थतंत्र के महत्व और युद्ध के कारण लोगों की निष्ठा को काबू में रखने में केंद्रीय शासन की अक्षमता ने औपनिवेशिक विमर्श को जमीन दी ।     

यूरोपीय उपनिवेशक देशों की अमेरिका पर जकड़बंदी में जो ढील आयी उसे संयुक्त राज्य और हैती की क्रांतियों ने काफी तेज कर दिया था । संयुक्त राज्य के नागरिकों ने अपनी क्रांतिकारी विरासत को गणतांत्रिक अमेरिका के रूप में देखा और इसलिए लैटिन अमेरिका की आजादी के उत्साही समर्थक हो गये । यह गोलार्धीय प्रतिबद्धता अनेक स्थानों और मौकों पर जाहिर हुई । इस चेतना की मुखर अभिव्यक्ति परिपत्रों, अखबारों और नाटकों में तो हुई ही मेक्सिको की आजादी की वजह से ढेर सारी गुप्त संस्थाओं का भी निर्माण हुआ । उनकी गणतांत्रिक भाषा को लेखक ने लोकप्रिय स्तर पर विकासमान परिघटना माना है । इसकी ताकत स्पेनी भाषी अमेरिका में प्रेस की आजादी के साथ बढ़ती चली गयी ।

लेखक का यह भी कहना है कि संयुक्त राज्य में ये गोलार्धीय विमर्श भावुक देशभक्ति और राष्ट्रवाद तक ही सीमित नहीं रहे । समूचे अमेरिका में इन्होंने मेलजोल और राजनीतिक संभावना का दरवाजा खोला । उदाहरण के लिए हैती की क्रांति ने गणतांत्रिकता के साथ नस्ली मुक्ति की राजनीति को मिला दिया । लगा कि अगर अश्वेत दास समुदाय फ़्रांसिसी औपनिवेशिक शासन को मिटा सकता है तो समूचे अमेरिका में दासता को समाप्त किया जा सकता है । इसी तरह संयुक्त राज्य और मेक्सिको की सीमा पर मूलवासी पहचानों की दावेदारी के कारण मूलवासियों के इलाकों पर औपनिवेशिक कब्जे के विरोध की आवाजें भी सुनायी देने लगीं । इंका संप्रभुता की नयी धारणा को भी गोलार्धीय विमर्श में लैटिन अमेरिका के विशेष योगदान की तरह लेखक ने पेश किया है । समूचे अमेरिका में उत्तर औपनिवेशिक गणतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के साथ गोलार्धीय विमर्श ने नयी राजनीतिक कल्पना और संभावना का भी दरवाजा खोला है ।                                                    

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