Thursday, June 23, 2011

रामकथा के बारे में पुरानी बकबक

'हरि अनंत हरि कथा अनंता' जब तुलसीदास ने लिखा था तो उनके सामने रामकथा के ही अनंत संस्करण और रूप रहे होंगे । रामकथा के रूप केवल लिखित परंपरा में ही भिन्न भिन्न नहीं हैं मौखिक परंपरा में भी अनंत हैं । इनमें से एक तो वह प्रसिद्ध सोहर ही है जिसमें रामचंद्र जी की छठी पर होने वाले भोज के लिए मारे गए हिरन की हिरनी कौशल्या जी से हिरन की खाल भर माँगने जाती है और उसे वह भी नहीं मिलती । मारे गए हिरन की खाल से राम जी के खेलने के लिए खँजड़ी मढ़वा ली जाती है ।

जनता के अनेक प्रकार के हर्ष विषाद, सुख दुख इस कथा के भिन्न भिन्न रूपों के जरिए अभिव्यक्त हुए हैं । राम का नाम भी जनजीवन में अनेक प्रकार से प्रयोग में आता है । इन्हीं में से एक है एक कहावत जो भोजपुरी इलाकों में बोली जाती है- परलें राम कुकुर के पाले । इस कहावत का स्रोत मुझे किसी रामकथा में नहीं मिला । शायद ही किसी रामकथा में रामचंद्र जी की कुत्तों से किसी भिड़ंत का जिक्र हो । संभव है अयोध्या से निकल जाने के बाद जंगल पैड़े में ऐसी कोई घटना हुई हो लेकिन अब इस कहावत का उपयोग ऐसी परिस्थिति को बतलाने के लिए होता है जिसमें कोई सीधा आदमी किसी दुष्ट के हाथों पड़ गया हो ।

लोक चेतना से उत्पन्न दोनों उदाहरणों से स्पष्ट है कि राम नाम का मिथक जनता के क्रोध और सहानुभूति दोनों का पात्र रहा है । इस विरोध का स्रोत स्वयं वह मिथक ही है । एक तरफ़ रघुवंशी प्रतापी क्षत्रिय राजा और दूसरी तरफ़ राज्य से निकला हुआ, जंगल जंगल घूमता, पत्नी के वियोग में दुखी मनुष्य । इन दो छोरों को छूता हुआ एक ही व्यक्तित्व भाँति भाँति की कथाओं, काव्यों, कहावतों और कपोल कल्पनाओं का आलंबन बना । लेकिन दूरदर्शन पर रामानंद सागर ने जब से रामनामी दुपट्टा ओढ़कर रामायण का नया संस्करण उपस्थित किया तब से भाजपाइयों को रामलला को किसी भी अन्य रूप में देखना बरदाश्त नहीं होता । वैसे इसका एक कारण उस मध्यम वर्ग का विकास और विस्तार भी है जिसके नौजवान ही नहीं अधेड़ भी दुनिया और उसी तरह भारतीय साहित्य और संस्कृति के बारे में उतना ही जानते और समझते हैं जितना उन्होंने टी वी में देखा और सुना है । भाजपाइयों ने इसके लिए एक अजीब किस्म का तर्क ढूँढ़ निकाला है । उनका कहना है कि रामकथा का जो संस्करण वे उचित समझते हैं उसके अतिरिक्त किसी भी चीज का लेखन और प्रचार हिंदू भावनाओं को चोट पहुँचाता है । जैसे हिंदू भावनाएँ न हुईं कोई आवारा आशिक हो गया जिसे माशूका की हर उस हरकत से चोट पहुँच जाती है जो उसके मन माफ़िक न हो ।

यह सिलसिला कुछ ही दिनों से शुरू हुआ है । जब से भाजपाइयों ने राममंदिर बनाने की ठानी तब से उनके लिए यह आवश्यक हो गया कि इसके लिए जरूरी सब कुछ वे हस्तगत कर लें । उन्होंने यह जिद ठान ली कि इस प्रसंग में वे जो कुछ भी कहेंगे वही सही होगा और किसी भी विरोधी बात को झूठ और उन्माद के जरिए वे दबा देंगे । अब तक भाजपाइयों ने जिस भी विरोध को दबाया है केवल झूठ, कुतर्क और उन्माद के जरिए । सहमत के प्रसंग में भी उन्होंने ऐसा ही किया । उनका ताजा हमला हुआ है लोहिया और उनके अनुयायियों द्वारा स्थापित रामायण मेला के अवसर पर प्रकाशित जनमोर्चा के संपादक शीतला सिंह द्वारा संपादित स्मारिका तुलसी दल और उत्तर प्रदेश की सपा बसपा सरकार के एक विधायक की सीता के बारे में की गई एक टिप्पणी पर । इन वक्तव्यों और लेखों के समर्थन और बचाव में रामकथा की अनेक परंपराओं और कथाओं में से तर्क खोजे जा सकते हैं और शीतला सिंह ने तो कहा भी है कि उन्होंने वही कुछ छापा है जो कल्याण के रामांक में छपा है । लेकिन इन सबसे महत्वपूर्ण है उस उन्मादी मानसिकता से लड़ना जो अपने विरोध में कुछ भी नहीं सुनना चाहती । भाजपाइयों ने तो कहा भी है कि तुलसी दल पर उसी तरह प्रतिबंध लगा देना चाहिए जिस तरह सलमान रश्दी की शैतानी आयतों पर लगा दिया गया । इस तरह हिंदुओं के अपने खोमैनी भी तैयार हो रहे हैं जो किताबों पर प्रतिबंध लगाएँगे धार्मिक भावनाओं के आधार पर और लेखकों की मौत के फ़तवे जारी करेंगे । सूरत, बंबई में जो कुछ हुआ वह तो दबी हुई हिंदू भावनाओं का विस्फोट था और सहमत तथा तुलसी दल की उपस्थिति से हिंदू भावनाओं को चोट पहुँचती है ! इसी तरह के तर्कों के जरिए फ़ासीवादी ताकतें भीड़ के किसी भी अमानवीय उन्माद को जायज़ ठहराती हैं ।

दयनीय तो है इन दानवों से लड़नेवालों का साहस । एक हैं अर्जुन सिंह । भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय के मुखिया । कांग्रेस के भीतर नरसिंह राव से होड़ करते हुए 6 दिसंबर के बाद से सांप्रदायिकता विरोधी शक्तियों का अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए लगातार इस्तेमाल करते आ रहे हैं । सहमत और शीतला सिंह जी इनको अपने अभियान का नायक बनाने की सोच भी रहे थे लेकिन अर्जुन सिंह को इनसे क्या लेना देना ! सहमत को पैसा भी दे दिया और भाजपाइयों ने जब हल्ला मचाया तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने बिना मामले की तहकीकात किए इसकी निंदा भर्त्सना भी कर दी । अयोध्या और फ़ैजाबाद की पुलिस ने भी सहमत और शीतला सिंह पर शांति भंग और न जाने किस किस चीज के मुकदमे दायर कर दिए । मेंड़ ने ही खेत चरना शुरू कर दिया और कुछ हैं कि देखकर भी देखना नहीं चाहते ।

दूसरे हैं परंपरागत वामपंथी पार्टियाँ । सांप्रदायिक फ़ासीवादी प्रवृत्तियों से लड़ने का जो तरीका इन्होंने ईजाद किया है वह है एक स्वर से यह अरण्यरोदन कि कम्युनिस्टों ने धर्म को समझने में अब तक भारी भूल की है । भूल सुधार के इस सुनहरे मौके के इस्तेमाल का तरीका भाकपा को अभी तक समझ में नहीं आया है लेकिन माकपा ने उदार हिंदू परंपरा के पुनर्सृजन का बीड़ा उठाकर इस काम को अंजाम दिया है । ई एम एस ने बहुत पहले केरल के लिए आदि शंकराचार्य को खोज लिया था, पश्चिम बंगाल के लिए विवेकानंद और हिंदी प्रदेश के लिए महात्मा गांधी हाल के आविष्कार हैं । इसके एक अक्षर आगे पीछे हटने बढ़ने को वे तैयार नहीं हैं । इसीलिए सहमत पैनल पर जब बजरंगियों और संघियों ने हमला बोला तो भाई लोग भी चुप्पी तो साध ही गए समय और स्थान का ध्यान रखने की दोस्ताना सलाह भी पेश कर दी !

कुत्तों का जब जिक्र चला तो याद आया । हिंदी में एक और जगह राम और कुत्ते का साथ साथ जिक्र है- कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाँव । इन्हीं कबीर ने कहा था कि राम को सारी दुनिया दशरथ सुत के रूप में जानती है लेकिन राम नाम का मरमु है आना । अब तक तमाम तरह के वामपंथी लोकतांत्रिक प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष लोग अधिकतम यह कहने का साहस जुटा सके हैं कि रामकथा के अनेक संस्करण हैं, उसकी अनेक परंपराएँ हैं और किसी एक ही कथा और परंपरा को अधिकृत बनाकर पेश नहीं किया जा सकता । लेकिन अब यह कहने का साहस जुटाने की जरूरत है कि भाजपाई अंधश्रद्धा, अज्ञान और कुतर्क के जरिए जिस राम को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं राम का मर्म तो उससे एकदम भिन्न है । भाजपाइयों को छेड़िए मत, क्या जरूरत है यह सब बोलने की ये तर्क अब तक उनके ही काम आये हैं । संकट के समय तो सर्वाधिक स्पष्ट रूप से सच के पक्ष में खड़ा होना पड़ता है और जब हमारी आवाज दबाई जा रही हो तभी सबसे ऊँचा भी बोलने की जरूरत पड़ती है । लेकिन महौल तो यह है कि समय और स्थान का ध्यान रखने का ऐसा कायर तर्क दिया जा रहा है जो कुछ लोगों के मुताबिक लेखक का अपने ऊपर लागू किया गया सबसे कठिन और खतरनाक सेंसर है ।जब जैसी हवा चले उसी के मुताबिक पीठ दे देने से और कुछ भले ही हो जाय माहौल नहीं बदला जा सकता ।

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