Friday, September 4, 2020

धूमिल की ‘नक्सलबाड़ी’

 

             

                                   

धूमिल की यह कविता उनके पहले काव्य संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ में कुल चार पृष्ठों में प्रकाशित है । संग्रह से पहले 1967 में बनारस से निकलने वाली पत्रिका ‘आमुख’ में छपी थी । यही साल नक्सलबाड़ी विद्रोह का साल था । उस समय किसी स्थापित पत्रिका में इस कविता का प्रकाशित होना लगभग असम्भव था भारत की राजनीति में नक्सलबाड़ी की विस्फोटक हैसियत तब भी थी खुद इस कविता में आई शब्दावली में कहें तो उसे वक़्त के फालतू हिस्से में धकेल देने की चेष्टा तब से लेकर आज तक मुतवातिर जारी है ऐसा क्यों हो! उसने तो बेहद मेहनत से बुने गाढ़ और गूढ़ जाल को उजागर कर दिया था धूमिल की कविताओं के आकार के लिहाज से यह थोड़ी लम्बी कविता है । आम तौर पर वे लम्बी कविता कम ही लिखते थे । इसका अपवाद ‘पटकथा’ और ‘भाषा की रात’ जैसी कुछेक कविताएं ही हैं । आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में धूमिल साठोत्तरी अराजक विद्रोह से आगे बढ़कर सुसंगत विपक्ष की ओर संक्रमण का प्रतिनिधित्व सबसे बेहतर तरीके से करते हैं । नक्सलबाड़ी बंगाल का रेल स्टेशन है वह छोटा सा रेल स्टेशन अचानक देश में विक्षोभ को एक व्यवस्थित दिशा देने वाले केंद्र का नाम बन गया इसीलिए कविता का शीर्षक बताता है कि कवि इस छोटी सी जगह के राजनीतिक निहितार्थ को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता है

नक्सलबाड़ी की पूरी परिघटना राजनीतिक है और धूमिल के काव्य संग्रह का शीर्षक भी हमसे उनकी कविता को राजनीतिक निगाह से देखने की मांग करता है । हमारी हिंदी में आजकल राजनीति से परहेज बरतने की सलाह दी जा रही है । साहित्य में तो ऐसा खास जोर शोर से किया जाता है लेकिन ध्यान दें तो राजनीति से परहेज बरतने की सलाह जीवन के तमाम प्रसंगों में दी जाती है । अन्य प्रसंगों में जिस तरह यह बात कही जाती है उसकी समानधर्मिता साहित्य संबंधी रुख से है । इसके मूल संपन्न तबकों के लोकतंत्र विरोध में हैं । अंग्रेजी शासन काल में इसी तरह के उपदेश के विरोध में भगत सिंह को युवक और राजनीति विषयक लेख लिखना पड़ा था । राजनीति न करने की सलाह देना शासन में जनता की भागीदारी पर अंकुश लगाने का गम्भीर प्रयास है । इसका अर्थ यह भी है कि राजनीति कुछ खास लोगों को ही करनी चाहिए, शेष लोगों को उससे दूर रहना चाहिए । जिस तरह राजकाज कुछ खास लोगों का विशेषाधिकार समझा जाता है जिसमें सबके राजनीति करने से खलल पैदा हो सकता है उसी तरह कविता भी खास लोगों की ही गतिविधि मानी जाती है । शायद यही बात दिमाग में रही होगी कि धूमिल ने इस कविता में दूसरे प्रजातंत्र की मांग की है । जब वे कविता को सबसे पहले एक सार्थक वक्तव्य बता और बना रहे थे तो कविता की अलोकतांत्रिक हदबंदी का ही विरोध कर रहे थे । विडम्बना कि उनके वारिस उनके संघर्षों को खारिज करते हुए कविता को फिर से अभिजन के लिए रुचिकर साबित करने का शास्त्र गढ़ रहे हैं । धूमिल की यह पूरी कविता लोकतंत्र के हक में न केवल खुद खड़ी है बल्कि तमाम कामगार तबकों को भी इसके लिए कमर कसे हुए चित्रित करती है । इस चित्रण के सहारे वह उनसे लोकतंत्र के लिए लड़ने का आवाहन भी करती है ।    

कविता की शुरुआत ही जबर्दस्त तरीके से होती है जब कवि सहमति के माहौल की मुखालफ़त करता है । वर्तमान संदर्भ में इस धारणा की प्रासंगिकता को देखना हो तो अमेरिकी राजनीति के भीतर अपनाये जा रहे इस तरीके को समझने के लिए नोम चोम्सकी द्वारा कन्सेन्ससकी धारणा का इस्तेमाल देख सकते हैं । समाजविज्ञान की दुनिया में जब इस पद का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था तभी दूर बनारस में बैठे कवि ने नक्सलबाड़ी से पैदा होने वाले इस वैचारिक असर को समझ लिया था । उनके लिए नक्सलबाड़ी की घटना वैचारिक स्तर पर कनसेन्सस यानी सहमति की मुखालफ़त है । असल में उस घटना ने तत्कालीन लोकतंत्र की सीमा उजागर कर दी थी । तब तक उस लोकतंत्र की क्षमता के बारे में सहमति कायम थी । नक्सलबाड़ी ने आजादी के बाद कायम सत्तातंत्र की वैचारिक बुनियाद को सवालों के घेरे में ले लिया था । सत्तातंत्र के बारे में धूमिल की पारदर्शी सोच को आकार देने में नक्सलबाड़ी का इतना गहरा योगदान है कि वे उस समय से आज तक जारी शासन के इस तरीके को पूरी तरह खोलकर उजागर कर देते हैं । कवि को उनके साथी समझाते हैं किभूख का इलाज नींद के पास है। कवि को समझाने वाले उसके ये साथी समझदार लगते हैं । समझदार में निहित व्यंग्य को सही तरीके से धूमिल के साथ के लोगों में सबसे युवा गोरख पांडे की कवितासमझदारों का गीतमें महसूस किया जा सकता है । आज तो पूरी तरह से साफ होता जा रहा है कि भूख से पैदा विक्षोभ को काबू करने के लिए लोगों को कितने तरह के कारगर नशों की नींद में सुलाया जाता है । धर्म के नशे के साथ यौनानंद का नशा भी इस विक्षोभ को तात्कालिक रूप से शांत रखने के काम आता है । तभी तो विरोध के लिए शब्द की तलाश मेंसहुवाइन की जाँघउसे भटकाना चाहती है । इस भटकाव से मुक्त होकर कविदूसरे प्रजातंत्र की तलाशमें जुट जाता है । इस तंत्र के धोखे की समझ के चलते कवि का क्रोध इतना प्रचंड हो जाता है कि वहप्रजातंत्र से बाहरआ जाता है । उसका यह गुस्सा वाजिब है क्योंकि पेट की भूख नामक इस सर्वकालिक समस्या का समाधान उसे नजर नहीं आता । इस समस्या को तुलसीदास ने समुद्र की आग से भी अधिक ज्वलंत बताया था । सहमति की गहरी नींद में सुला देने की साजिश को समझ लेने के बाद कवि को आत्मघाती क्रोध भी स्वीकार है ।

नक्सलबाड़ी की घटना को उस समय और आज भी आतंकी कार्यवाही की तरह पेश किया जाता है । उस समय के अखबार, खासकर हिंदी के, इस समय जैसा ही सत्ता समर्थक आचरण करते थे । हिंदी की तो बात ही छोड़िए, पश्चिम बंगाल तक में अखबार नक्सल कार्यकर्ताओं को डाकू की तरह ही पेश करते थे । असल में अखबार यह काम मध्यवर्ग के भीतर तत्कालीन शासन को वैधता प्रदान करने के लिए करते रहे हैं । मीडिया आम तौर पर विपक्ष में होने का भ्रम देता है लेकिन अक्सर सर्वसम्मति का उत्पादन करता है । जाहिर है उस समय अखबारों के ज्यादातर पाठक मध्यवर्गीय हुआ करते थे । उनका ऐसा भयादोहन अखबार के अपने व्यवसाय और शासन की स्थिरता के लिए जरूरी होता था ।

धूमिल की इस कविता के कुछ निहितार्थों को समझना इस समय सम्भव हुआ है । जिस तरह उलटबांसी एक उलझी अनुभूति की अभिव्यक्ति का साहित्यिक तरीका थी उसी तरह कविताओं के अर्थ भी बहुत बाद तक खुलते रहते हैं । दायें हाथ की नैतिकता संबंधी धूमिल की शब्दावली उनके साठोत्तरी संस्कार से जोड़कर देखी जाती थी लेकिन आज दक्षिणपंथ के उभार के साथ दाहिने हाथ की साजिश का थोड़ा भिन्न अर्थ भी खोला जा सकता है । इस हाथ की साजिशखाली पेटकी आग को भुलाने के काम आती है । खाली पेट का सवाल ही वह सुरक्षित जगह है जहां से खड़ा होकर इस साजिश से कारगर तरीके से लड़ा जा सकता है । इस समझ को हासिल करने के बाद कविता तत्कालीन जनतंत्र द्वारा सृजित धोखों को पहचानने लगती है । इन धोखों के तहत आदमी को अकाल की तस्वीर बनाकर इश्तिहार में चिपका दिया जाता है । इस प्रचार के जरिये जो हवा बनाई जाती है वह बुझ चुकी है और प्रचार के काम आने वाले उन इश्तिहारों की चमक उतर चुकी है । धोखे से बनाया और टिकाया भरम केवल इतना ही नहीं टूटा है । स्वाधीनता संग्राम की भूली बिसरी जिन कथाओं को पालतू बनाकर इस सहमति के लिए पचा लिया गया था उनमें पिरोये देशप्रेम के कथानक भी बेअसर हो चुके हैं । एक ओर तो यह हुआ है दूसरी ओर कल तक जो लोग इस सहमति से लड़ने के लिए आमादा होकर संसद को उसकी सीमा से बाहर लाना चाह रहे थे वे भी अब समझौते के राही हो गये हैं । विरोध में आवाज उठाने के लिए कोई नहीं बचा है । स्वार्थ के वशीभूत होकर व्यवस्था के पक्ष में वे भी चले गये जो कल तक संसद की सीमा पार कर सड़क पर उतरना चाहते थे । इतनी भारी घेरेबंदी से निश्चिंत होकर शासक ही लेखपाल बना हुआ सब कुछ तय कर रहा है । खेतों यानी कामगारों के हाथ में हथकड़ी पड़ी है और दुख की बात कि शासक के साथ ही वह विपक्ष भी चला गया है जिसे खेतों की हथकड़ी खोलने का उपाय करना था ।

जब भाषा के चाकचिक्य और वैचारिक आम सहमति के असर में सब एक साथ दायें पक्ष की साजिश के शिकार हो गये हैं तो इस भयावह अकेलेपन में कवि का साथ केवल कविता देती है । संसार के लगभग सभी कवि शोषण दमन की ताकतवर मशीन के सामने अपनी उसी नाजुक ताकत के साथ खड़े होते रहे हैं जिस पर उनका अधिकार है । इसी रस्म को निभाते हुए धूमिल भी दूसरे जनतंत्र के लिए अपनी कविता को वर्तमान के प्रतिपक्ष में खड़ा कर देते हैं । यह कमजोर तो है लेकिन हज्जाम के उस्तुरे जैसी चमक वाली है । इस हज्जाम ने धोखे के समक्ष हथियार नहीं डाले हैं इसलिए उसकी किस्मत अभी खुली हुई है । अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ कि इस जंग में कौन जीतेगा । जब लोकतंत्र पर संकट है तो जाहिर है नागरिकता भी संकट में होगी । नागरिकता केवल कागज का कोई टुकड़ा नहीं होती । वह समूचे देश के संसाधनों में हक का दावा होती है । इस दावे को हलाल करने का विरोध मेहतर का हिलता हुआ झाड़ू करता है । विपक्ष में कविता के साथ हज्जाम के उस्तुरे और भंगी के हिलते झाड़ू का साथ दिखाना अप्रतिम काव्य युक्ति है । इनके साथ ही पाठक को भी कवि अपने साथ ले लेता है । धूमिल का यह पाठक सामान्य नौजवान है जो बेकारी और नींद से परेशान है । इस परेशान युवा को मतदान के बाद अंधकार ही मिला है । इस लोकतंत्र में जो धोखा हुआ है उसे जनता के मतदान से पैदा शासन द्वारा भाईचारे के चालाक प्रदर्शन के सहारे व्यक्त किया गया है । शासक की ओर से खुद को जनता का साथी बताने की शातिराना हरकत से सावधान करते हुए कवि कहते हैं कि यह क्रूर धोखा किसी भी समय आप मतदाताओं के चेहरे की हरियाली अर्थात खुशगवार रह पाने की क्षमता को समाप्त कर सकता है । इन चित्रों में हम धूमिल के समय से अधिक अपने समय की छाप महसूस कर सकते हैं ।

बदहाली और धोखे के इसी इतिहास ने विद्रोह पर हिंसा थोप दी है । सत्ता ने धोखे और हिंसा का जो माहौल बनाया है उसने हिंसा को सर्वव्यापी बना दिया है । वह विपक्ष भी सत्ता के साथ साझेदारी कर रहा है जिसे जनता के पक्ष में खड़ा होकर सहमति पर आपत्ति दर्ज करनी चाहिए थी । ऐसे में पेट की आग, बेकारी और जंगलराज ने समूची व्यवस्था के प्रति युवा के मन में सपरिवार नफ़रत पैदा कर दी है । कवि नफ़रत के इस प्रसार के साथ नहीं दिखाई पड़ता । उसे इस बात पर दुख है कि आखिरकार शासक इस बात में सफल हो गये कि बच्चा स्लेट से पढ़ने की जगह पड़ोसी का गला काटने के लिए तैयार कर दिया गया है । हिंसा के प्रसार और बदहाली ने लोगों को आपस में ही लड़ा दिया है । कहने की जरूरत नहीं कि धूमिल आगामी की पदचाप सुन रहे थे । कवि और कविता ने राजनीतिक व्याख्या की मांग रखी इसलिए उस पर जोर दिया गया । धूमिल ने मुक्त छंद की कविता को उसकी तुर्शी प्रदान की जिसका प्रभाव आज तक की राजनीतिक कविता पर देखा जा सकता है । खरे खरे अप्रिय वक्तव्य की लय को साधना बहुत मुश्किल होता है । धूमिल ने कविता के रूपबंध को मजबूर किया कि वह समय की राजनीतिक समझ को स्वर दे । इसके लिए वे कविता के बारे में कायम सहमति से जूझे और इस युद्ध में उन्हें नक्सलबाड़ी का साथ मिला । उन्होंने नक्सलबाड़ी को इस लायक बनाया भी कि वह कविता के लिए दूसरे लोकतंत्र की खोज की प्रेरणा दे ।     

      

                             

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