Tuesday, May 13, 2025

मेरे लिखे को आलोचना कहेंगे?

 

                    

                                       

इस पुस्तक के प्रकाशन के अवसर पर मेरे सामने यह सबसे बड़ा सवाल है अगर आलोचकों की मेधा देखी होती तो आलोचक होने और आलोचना लिखने का दावा करना आसान था । बहुत करके इसे साहित्य के साथ संवाद की आत्मकथा कहा जा सकता है । इस आत्मकथा की शुरुआत में एक दृश्य की याद सबसे चटक है । बंगाल से उखड़कर बिहार से सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिले गाजीपुर में हजार की आबादी के छोटे से गांव के बड़े आंगन वाले घर के एक कमरे की खिड़की में बैठे बालक के हाथ मेंनिर्मलाउपन्यास है । यह खिड़की गली में खुलती थी । उस छोटे से गांव के घरों के भीतर की ऊमस भरी दुनिया से बाहर की दुनिया इस गली के जरिए ही खुलती थी । इस गली से साड़ी, चूड़ी और बर्फ के फ़ेरीवालों की आवाजें आतीं तो रात में कभी गाली बकने वाले एक सज्जन की रंगीन भदेस भाषा भी कानों में पड़ती । अक्षर ज्ञान उस बालक को बंगाल में हो चुका था । सात साल की उम्र में जब वह घर आया तो इसी अक्षर ज्ञान के बूते उसका नाम कुछ ऊपर के दर्जे में लिखा गया । बंगाल में रहते हुए बाहर की दुनिया में बोलने की भाषा तो स्थानीय थी लेकिन माता-पिता के भोजपुरिहा होने से घर में बातचीत की भाषा भोजपुरी और पढ़ने की भाषा हिंदी रही । लौटकर आने के बाद भाषा तो अपनी जैसी मिल गई लेकिन संस्कृति की भिन्नता ने अकेले रहने की आदत डाल दी । अकेलेपन का साथ किताब से भरने लगा । बड़े भाई काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विद्यार्थी थे । उनके पास जाने कहां से पत्रिकाओं का जखीरा एकत्र हो गया था । उनमें विमल मित्र के किसी उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन हुआ था । उनमें छपी देश विदेश की रोचक जानकारियों को सुनता गुनता रहता । साथ के बच्चे इसके लिए मजाक भी उड़ाते लेकिन अपनी तो वही दुनिया थी । उनसे कुछ ऊपर की चीज इस उपन्यास की शक्ल में हाथ लगी थी । यह जो उपन्यास था उसे बड़े भाई ने बहन को उपहार में दिया था क्योंकि उसका नाम ही उपन्यास का शीर्षक था । न केवल पूरे पूरे वाक्य पढ़ लेता बल्कि उनका अर्थ भी समझ आता था । अब याद आता है उसका कुल अर्थ आंसू थे । निगाह धुंधली पड़ती तो हथेलियों से पोंछता और डूबकर पढ़ता जाता । शायद तबसे ही देख, सुन या पढ़कर आंसू आते हैं, अन्यथा नहीं । बहन उम्र में सात साल बड़ी रही होगी । थोड़ा पढ़ी लिखी भाभियों और सहेलियों की उसकी दुनिया में गुलशन नंदा, रानू और प्रेम वाजपेयी के सामाजिक उपन्यास बेहद लोकप्रिय थे । सब कुछ भकोस जाने की आदत के चलते उन्हें भी चाट जाता । अड़ोस पड़ोस के कालेज जाने वालों के हाथ में जासूसी उपन्यास भी होते । उनका भी पारायण करता । उम्र बढ़ी और मेरी दुनिया में चचेरे भाई दाखिल हुए । उनके साथ कार्टून की किताबें, रूसी कथाकार और समाचार विचार की पत्रिकाओं का आगमन हुआ ।

अब तक के बयान से आपको भ्रम हो सकता है कि यह बालक बेहद सभ्य और शालीन था । असलियत इससे पूरी तरह उलटी है । शरीर से कमजोर और कम उम्र में बड़े लोगों की संगत की चाहत से काफी कड़वे अनुभव भी हुए जिनके चलते स्वभाव में विद्रोह घनीभूत होकर बैठ गया । बहुत बाद में जाना कि नागार्जुन जब मैथिली शरण गुप्त से मिलने गए तो छोटे भाई सियाराम शरण ने सूचना देते हुए बोलाजहर को पोटलो आयो हैतो संगत की गुणवत्ता से आत्मा तृप्त हो गई । शुक्र है कि विद्रोह ने नशे की राह नहीं पकड़ी । इस इलाके में सिगरेट, पान और खैनी तक ही कदम पहुंचे । उम्र बढ़ने पर थोड़ा आगे गए लेकिन थोड़ा ही । स्कूली जीवन में गांव के उन्हीं सहपाठियों का साथ रहा जिनसे कभी बनी नहीं । उन लोगों की दुनिया दलितों और कमजोरों पर आक्रामक दबंगई से बनी दुनिया थी । विद्रोह ने बाद में गांव में दलितों और पिछड़ों के साथ मिलकर नुक्कड़ नाटक की टीम गठित करने की राह अपनाई । उसने भी साहित्य में प्रवेश करने का झरोखा मुहैया कराया । स्कूल पूरा करने के बाद कालेज गया तो दुनिया बड़ी हुई । छात्र संघ की मांग के लिए हुई हड़ताल में शामिल रहा और बाद में उसमें सांस्कृतिक सचिव चुना गया । हड़ताल के दौरान गांव के एक विद्रोही साथी के लिखे पर्चे की हस्तलिखित प्रतियों का कालेज में वितरण हुआ । अब वे इस दुनिया में नहीं हैं । वे भी बंगाल से गांव आए थे और शायद इसके चलते ही मन मिजाज मिलता रहा होगा । उनके साथ गांव में लाइब्रेरी खोलने के लिए चंदा एकत्र किया था । लाइब्रेरी के लिए दिल्ली के प्रकाशकों से किताबें मंगाई गई थीं । हो सकता है उनमें से कुछ को पढ़ा भी हो । क्रांतिकारी साहित्य तो पढ़ने ही लगा था । शायद उसी समय राहुल सांकृत्यायन की लिखी मार्क्स की जीवनी पढ़ी । देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय संपादित ‘जानने योग्य बातें’ के सारे खंड भी पढ़ गया । उसी समय थोड़ा बहुत आचार्य रजनीश को भी देखा । इन सबका बहुत गहरा असर पड़ा ।                  

ग्यारहवीं से पहले बस इतना ही रहा होगा । ग्यारहवीं में बनारस गया तो नुक्कड़ नाटक की ‘अभियान’ नामक टीम में शामिल हुआ और श्रेष्ठ रूसी साहित्य के साथ घनिष्ठ परिचय हुआ । नाटक से पहले गाने के लिए गोरख पांडे, शैलेंद्र, मकदूम और अन्य तमाम गीतकारों के लेखन को याद किया । अपनी उम्र के सब युवाओं की तरह कविता लिखने से शुरुआत की लेकिन कविता कभी काबू में नहीं आई । एक समय छपने के लिए पहल में भेजी थी लेकिन लौट आई तो किसी से जिक्र किए बिना इस मामले में खुद को असमर्थ मान लिया । हाल तक भी इस विधा की पेचीदगी खुलती नहीं, इसलिए जिनको उसका सौंदर्य खुल जाता है उनसे प्रचंड ईर्ष्या होती है । विचारों की दुनिया सबसे अधिक आकर्षित करती रही है । साहित्य के भीतर विचारों के सबसे बड़े प्रयोक्ता रामचंद्र शुक्ल थे इसलिए वे चुनौती की तरह अपनी ओर खींचते रहते थे बनारस बहुत समृद्ध जगह है वहां रहते हुए त्रिलोचन, नामवर सिंह, गोरख पांडे, शम्सुल इस्लाम और रामविलास शर्मा से भेंट मुलाकात हुई अंग्रेजी सीखने के लिए इंडियन एक्सप्रेस में भागलपुर आंखफोड़वा कांड की रिपोर्टों का हिंदी अनुवाद करता था कुल मिलाकर यह कि सीमांत पर रहते हुए दोनों ओर का नजारा लेना प्रिय काम रहा है । सीमा की कैद कभी मंजूर नहीं रही । क्लास में कम, उसके बाहर अधिक सीखा समझा प्रेमचंद की जन्म शताब्दी के मौके पर तेलुगु कवि ज्वालामुखी और स्वामी अग्निवेश को पहली बार देखा बनारस का वह जीवन अनुभवों की विविधता के लिहाज से बेहद प्रेरणास्पद रहा गोरख पांडे ने जब दिल्ली में आत्मघात किया था तो जो लिखा वही पहला प्रकाशित लेख था जिसे आलोचना कहेंगे उसकी यही शुरुआत थी

थोड़े विचलन भी आए जिनका कोई अफसोस कभी नहीं रहा । उनके चलते जीवन को कुछ अधिक ही विस्तार से देख सका । बहरहाल सफर का अगला पड़ाव दिल्ली था । वहां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रवेश हुआ । ताल्सताय कायुद्ध और शांतिकक्षाओं की शुरुआत से पहले पढ़ गया । किसी समय मार्खेज को पढ़ना शुरू किया तो उपन्यास लेखन की एक नई दुनिया ही खुल गई । साहित्य को उसके व्यापक संदर्भों में देखने समझने के प्रति विश्वास पैदा हुआ । इस व्यापकता से साहित्य की समाज में जगह का पता चलता है । सामाजिक हलचलों से उसके रिश्ते भी स्पष्ट होते हैं । अध्ययन की औपचारिक समाप्ति के बाद अध्यापन का समय आया तो ये सारे अनुभव काम आए । उसके लिए जो लिखा उसे भी अपने काम का हिस्सा मानना उचित लगता है । शुद्ध आलोचना जैसी कोई चीज नहीं होती । उसके साथ समीक्षा आदि का साझा हमेशा रहता है । जिनके बारे में लिखा उनको भी किसी सीमा में बांधना मुश्किल है ।

हिंदी आलोचना की लम्बी परम्परा के बावजूद उसे स्थिर नहीं मान सकते । उसकी अस्थिरता ही उसमें नए नए लोगों के दाखिले की जगह बनाती है । जीवन लगातार बदलता रहता है इसलिए उसका चित्रण भी लगातार बदलना निश्चित है । इस चित्रण की समझ भी इसीलिए स्थिर नहीं रह सकती । स्थिरता से कोई भी वस्तु मरने लगती है । उसकी जीवंतता और नवीकरण के लिए अस्थिरता बहुत आवश्यक होती है । साहित्य के भीतर लक्षण निरूपण की चाहत बहुत ही गहरी होती है । बहुधा इसका शिकार आलोचना की धारणा भी हो जाती है । जब भी ऐसा होने लगता है तो प्रचलन से ऊर्जा लेकर उसे विस्तारित करना पड़ता है । सौभाग्य से हिंदी साहित्य अब भी अध्यापन तक ही सीमित नहीं है । समाज में उसकी भूमिका लगातार नए नए रूप पकड़ती है । जड़ रुचि पर लगातार बदलाव हेतु प्रहार होते रहते हैं । हदों के बाहर की इन आवाजों को सुनते रहने से समझ का परिष्कार तो होता ही है, सृजन के नए रूपों की व्याख्या के लिए लगातार नए उपकरणों की तलाश भी बनी रहती है । इन सब कारणों से लिखे को आलोचना कहना या खुद को आलोचक समझना आसान नहीं रहा । बीच बीच में ऐसा करने का लोभ होता है लेकिन तत्काल त्रिलोचन जैसे किसी मनुष्य की याद हो आती है जिन्होंने लिखा बहुत कम लेकिन पूरा विश्वविद्यालय अपने भीतर समाए रहते थे । किसी भी अध्येता के लिए ऐसे पुरखों की दिमागी मौजूदगी जरूरी होती है जो उसे विनम्र होना सिखा सकें । जिस सीमा के भीतर वह बंधा रहता है उसके बाहर की विराट दुनिया सचमुच इतने प्रतिभाशाली और अध्यवसायी लोगों से भरी है कि उनसे अपरिचय ही प्रचंड दरिद्रता लगती है ।

किस मुख से आलोचना लिखने का दावा करें? भाषा में एक शब्द तक नहीं जोड़ सके, अक्षर जोड़ने की तो कल्पना भी नहीं की । पढ़ा वही जो दूसरों ने लिखा । समझ बनने में भी तमाम लोगों से बातचीत का भारी योगदान है । इन लोगों में पत्रकार और राजनेता सबसे अधिक रहे हैं और उन सबकी पढ़ाई से हमेशा चकित हुआ हूं । कुछ मित्र तो साधुओं की संगत को भी काफी लाभकर बताते हैं । बचपन में की थी और लाभ हुआ भी लेकिन बाद में ऐसा मौका नहीं मिला लेकिन उनकी सामाजिक उपयोगिता का कायल हूं । अपनी जिंदगी के तयशुदा ढर्रे पर चलने में मगन हम जानते भी नहीं कि साहित्य और उसकी व्यावहारिक समझ का दायरा कितना दूर तक फैला हुआ है ।

जीवन की आलोचना प्रेमचंद को साहित्य की सर्वोत्तम परिभाषा प्रतीत होती है । आलोचना के लिए एक पूरा माहौल जरूरी होता है । बहुत पहले से शायरों और अदीबों के लिए कुछ अलग कायदों की वकालत होती रही है । आलोचना के जरिए ही सुधार और बदलाव की प्रेरणा प्राप्त होती है । अगर समाज को बेहतरी की ओर जाना है तो उसे आलोचना का स्वागत करना होगा । कभी कभी यथास्थिति या प्रतिक्रिया का दौर आता है तो उस समय आलोचनात्मक विवेक का क्षरण होता है । समूचे माहौल में आलोचना की अनुपस्थिति में साहित्यिक आलोचना का जीवित रहना भी मुश्किल हो जाता है । बिना शक यह समय वैसा ही समय है । इस समय आलोचना को जिंदा रखना किसी भी संवदनशील व्यक्ति का सामाजिक दायित्व है ।

ऊपर जो भी लिखा उससे साफ है कि समूची समझ और लेखन की तैयारी विद्यार्थी जीवन में हुई । असल में नौजवानों की प्रत्येक नई पीढ़ी अपने समय के सारे सवालों से टकराती है । इसी किस्म के टकराव के चलते ही उस पीढ़ी का निर्माण होता है जिसमें एक सामूहिक चेतना और समझ बनते हैं । यह समझ केवल साहित्य की नहीं होती वरन समूचे परिवेश से उपजे सवालों की होती है । साहित्य उसका एक हिस्सा होता है । इसी समझ के अंग के रूप में हम आलोचना की भाषा भी सीखते हैं । हमारी पहले की पीढ़ी में भी यह प्रक्रिया चली, हमारी पीढ़ी में भी चली और वर्तमान पीढ़ी के भीतर भी चल रही है । इसके चलते कभी कभी आज के विद्यार्थियों की बेचैनी से ईर्ष्या होती है । उनके समक्ष जिस भाषा में जीवन की चुनौतियां उभर रही हैं उनका जवाब खोजने में उनकी मदद करने की इच्छा से भी इन लेखों को लिखा गया । इसीलिए ठीक ठीक अकादमिक मानकों पर इनका खरा उतरना मुश्किल है ।

जिस तरह के दबाव अध्यापकीय जीवन में पैदा हुए हैं उनके असर से अछूता रहने का दावा नहीं कर सकता लेकिन कोशिश रहती है कि उससे भाषा या भाव के मामले में कम से कम प्रभावित हों । इनमें से किसी लेख को अंतिम न माना जाय । ये सभी एक असमाप्त यात्रा की निशानियां हैं । इस मामले मेंकविता क्या हैनिबंध आदर्श रहा जिसके दसेक रूप मिलते हैं । जैसे समाज में उसी तरह साहित्य में लगातार सुधार चलते रहना चाहिए । दिमाग में जो बात है उसे पूरी तरह व्यक्त करना बहुत कठिन होता है ।गिरा अनयन, नयन बिनु बानी। यही मानकर इन्हें देखा और परखा जाए ।                  

                       

         

                                       

                       

 

Sunday, May 11, 2025

जनमत कम्यून

 

                

                       

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में पटना से छपने वाले जनमत का खास स्थान है । इसका प्रकाशन साप्ताहिक होता था । हिंदी में इससे पहले भी दिनमान और रविवार जैसे साप्ताहिक छपे थे लेकिन उनके पीछे पूंजी के कोई न कोई घराने थे । जनमत के साथ ऐसा कुछ भी नहीं था ।

इसका प्रकाशन अस्सी के दशक में शुरू हुआ । पटना के बाद नब्बे के दशक में इसे दिल्ली लाया गया । इसके बाद इलाहाबाद से इसका प्रकाशन जारी है । इसे किसी क्षेत्र या विषय विशेष के साथ जोड़ना बहुत ही मुश्किल है । राजनीतिक और वैचारिक टिप्पणियों के साथ ही साहित्य भी इसमें प्रचुरता के साथ मौजूद रहा है । इसी कारण इसके पाठक भी मिले जुले रहे । शुरू में संपादन महेश्वर के हाथ रहा और रामजी राय उनके साथ रहे । दिल्ली आने पर रामजी राय और कुछ समय बृजबिहारी पांडे ने संपादन संभाला तथा इलाहाबाद जाने के बाद भी रामजी राय के साथ अन्य लोग संपादन में रहे ।

किसी भी पत्रिका के बारे में प्रतियों की संख्या, प्रकाशित सामग्री और उसके वितरण की व्यवस्था आदि की बातें अधिक होती हैं । जनमत के इस पहलू की खूबियों के अतिरिक्त उसकी अंदरूनी व्यवस्था का जिक्र जरूरी है ताकि बाहर प्रकट होने वाली ऊर्जा के नाभिक और उसमें कार्यरत तत्वों का भी कुछ अनुमान लगाया जा सके । इसके प्रकाशन की शुरुआत में ही इलाहाबाद से चंद्रभूषण, इरफ़ान और प्रमोद सिंह पटना जाकर इसमें अपनी जिम्मेदारी निभाने लगे थे । प्रमोद सिंह मुख्य रूप से कला पक्ष देखते थे । उसमें इरफ़ान का भी दखल हुआ करता था और कुछ बेहद अछूते सांस्कृतिक विषयों पर उनके लेख भी बेहद दृष्टिसंपन्न होते थे । चंद्रभूषण ने जमीनी रिपोर्टिंग में महारत हासिल की । कुछ समय उन्होंने दिल्ली से भी लिखने लिखवाने का काम किया । भाकपा माले के प्रसन्न कुमार चौधरी ने भी इसमें नियमित लिखा ।

बिहार में भाकपामाले के नेतृत्व में संचालित किसान आंदोलन में लगे जन समुदाय और कार्यकर्ताओं की चेतना का विस्तार करने में इस पत्रिका ने अभूतपूर्व भूमिका निभायी । पार्टी के नेताओं की यह कल्पना जबर्दस्त थी । किसान आंदोलन के आधार पर व्यापक लोकतांत्रिक तबके से जुड़ने की इस योजना के तहत इंडियन पीपुल्स फ़्रंट का निर्माण हो चुका था । उस समय राजीव गांधी के नेतृत्व में देश नये तरह के माहौल में दाखिल हुआ । कंप्यूटर और रंगीन टेलीविजन ने बड़े पैमाने पर प्रवेश शुरू किया था । विरोध की ताकतों की उपस्थिति बेहद कम थी । याद दिलाने की जरूरत नहीं कि पंजाब के हालात के कारण प्रेस की आजादी का गला घोंटने वाला जो अध्यादेश आया उसकी मुखालफ़त बिहार में सबसे अधिक हुई और उसके विरोध में किसान आंदोलन से जुड़े लोग भी शामिल रहते थे । खुद किसान आंदोलन ने भी अपनी छवि को देश पर कामगारों के दावे के रूप में पेश किया । तब जनमत के लेख अमेरिका के सट्टा बाजार में भारी गिरावट से लेकर हिंदी सिनेमा में प्यार के उत्थान तक पर होते थे । साथ ही टेलीविजन पर धार्मिक सीरियलों के प्रसारण से लेकर जमीनी संघर्ष तक की खबरें हुआ करती थीं । राजीव गांधी के शासन में श्री लंका में भारत की सैनिक दखलंदाजी का विश्लेषण भी इसमें छपा था । आखिरकार वही दुस्साहस राजीव गांधी के लिए जानलेवा साबित हुआ । वहां की सलामी गारद का निरीक्षण करते हुए भी एक सैनिक ने उन पर लाठी की तरह राइफ़ल चलायी थी । इन सभी के लेखन की कोशिश के साथ उपर्युक्त समूची टीम लगी रहती थी ।

इन सबके बीच रात दिन लगातार जारी बातचीत से लिखे का परिमार्जन होता था । एक समुदाय ऐसा था जो बीच बीच में घूम फिर कर वापस आ जाया करता था । कुछ और थे जो प्रूफ़ संशोधन से लेकर पैकिंग और डाक से भेजने के काम से जुड़े थे । ये लोग निर्धारित तिथियों को अपनी सेवा देते थे । इनके अलावे एक समूह ऐसा था जो लगातार एक ही किराये के अथवा विधायक निवास स्थित डेरे पर रहता था । तब माले के कुछ विधायक पहली बार बिहार विधानसभा में निर्वाचित हुए थे । उनको मिले सरकारी आवास अधिकतर संगठन के कार्यालय हुआ करते थे ।

इन डेरों पर रहने वालों का खर्च एक ही मद से चलता था । इस मद का एक हिस्सा पत्रिका की बिक्री से आता था तो एक हिस्सा भाकपामाले की ओर से आर्थिक सहायता के रूप में भी मिलता था । इससे नियमित तौर पर इस्तेमाल होने वाली चीजें खरीदकर इकट्ठा रख दी जातीं । जरूरत के अनुसार विभिन्न साथी इनका इस्तेमाल करते । भोजन सामूहिक ही बनता था जिसे या तो इन्हीं लोगों में से कोई एक दो या कोई अन्य समर्थक बनाते । सब लोग साथ ही खाते और सभी अपना बर्तन धो देते । इसी तरह सिगरेट बीड़ी आदि भी सुलभ होती थी ।

साहित्य, कला, राजनीति और विचार की घनघोर उत्तेजक बहसों में मुब्तिला युवकों की इस टीम से भला कौन प्रभावित न होता इसलिए जहां कहीं यह समूह रहा वहां के बौद्धिकों के साथ इनका घनिष्ठ सम्पर्क संबंध कायम रहा । इन सम्पर्कों के चलते इस टीम का सामाजिक जीवन भी बन गया था । आंदोलन और पार्टी के समर्थक बहुतेरे अन्य मध्यवित्त परिवारों के साथ भी इनका आना जाना होता था । इस माहौल ने इस टीम को संबंधित नगर के सांस्कृतिक माहौल का अनिवार्य हिस्सा बना दिया था ।

आरा से एक सांसद की जीत के बाद इस प्रयास को राष्ट्रीय स्वरूप देने की गरज से इंडियन पीपुल्स फ़्रंट ने एक रैली दिल्ली में ‘दाम बांधो, काम दो’ नारे के साथ की । उसमें पहली बार भाकपामाले के प्रवक्ता के रूप में रामनरेश राम ने भाषण दिया । शुरू में कुछ लोगों से लिखवाने के सिलसिले के बाद जनमत ही दिल्ली लाया गया । दिल्ली में भी लोकतांत्रिक बौद्धिक समुदाय और हिंदी साहित्य के मूर्धन्य लोगों के साथ इस टीम का जुड़ाव रहा । इनमें अन्य लोगों के अतिरिक्त सुरेंद्र प्रताप सिंह भी शामिल रहे । बृजबिहारी पांडे के संपादन के समय पंकज सिंह और पंकज बिष्ट की भी आवाजाही बनी रहती थी । रामजी राय के समय त्रिलोचन भी खूब बैठकी लगाते रहे । अंग्रेजी की पत्रकारिता से जुड़े अरविंद नारायण दास का भी प्रत्यक्ष या परोक्ष साथ मिलता रहा था ।      

जिस मकसद से इस प्रयास में भाकपामाले ने अपना बौद्धिक और भौतिक निवेश किया था उसके पूरा होने के आसार मिलने के बाद इससे जुड़े लोग अन्य जरूरी कामों में अन्य जगहों पर भेजे जाने लगे । रामजी राय भाकपामाले के हिंदी मुखपत्र लोकयुद्ध को संभालने पटना गये । इधर चंद्रभूषण और इरफ़ान के विवाह हो चुके थे । विवाह के बाद भी लम्बे समय तक ये लोग सबके साथ रहे लेकिन व्यवस्था की दरारें नजर आने लगीं । नतीजे में इन युवकों ने रोजी रोजगार के रास्ते तलाशे । चंद्रभूषण ने शुरू में ग्रंथशिल्पी के लिए बहुत सारे अनुवाद किये । फिर पत्रकारिता की मुख्य धारा के साथ उनका रिश्ता बना । फिलहाल नवभारत टाइम्स से सेवानिवृत्त होकर वे स्वतंत्र लेखन में जुटे हैं । इरफ़ान ने कुछ समय तक एफ़ एम में रेडियो जाकी का काम करने के बाद राज्य सभा टेलीविजन में गुफ़्तगू नामक बहुत लोकप्रिय कार्यक्रम चलाया । साक्षात्कार आधारित इस तरह के कुछ प्रयासों और पाठ आधारित प्रसारण के कुछ प्रयोगों के बाद फिलहाल वे बी बी सी के लिए कहानी जिंदगी की नामक एक कार्यक्रम करते हैं । महेश्वर का निधन बावन साल की उम्र में किडनी खराब होने से हो गया और रामजी राय भाकपामाले के पोलित ब्यूरो के सदस्य के रूप में उत्तर प्रदेश में सक्रिय हैं । पत्रिका आज भी उनके प्रधान संपादकत्व में नियमित मासिक प्रकाशित होती है । उसका ही साथ जनमत नामक पोर्टल भी देता है । इतने लम्बे और उतार चढ़ाव वाली यह पत्रिका हमेशा से समानांतर पत्रकारिता में रुचि रखने वालों के लिए उत्सुकता, आकर्षण और रुचि का विषय रही है ।                                      


Saturday, April 19, 2025

कविता की स्वायत्त समृद्धि

 

           

                             

डाक्टर राधावल्लभ त्रिपाठी की 2023 में कौटिल्य बुक्स से छपी किताब ‘साहित्य का लोकतंत्र: संस्कृत ग्रंथों में गाली, धिक्कार और फटकार’ न केवल अपने वर्ण्य विषय बल्कि कविता मात्र की समझ के लिए जरूरी है । इसके मुखपृष्ठ पर ही इन गालियों को छापकर किसी भी उत्सुक पाठक के लिए इसे आकर्षक बना दिया गया है । राधावल्लभ जी संस्कृत के उन विरल विद्वानों में शामिल हैं जो संस्कृत को पुरोहिताई और कर्मकांड से मुक्त करके उसे जन सामान्य से जोड़ने का प्रयास करते रहे हैं । उनकी इसी कोशिश का परिणाम यह अनूठी पुस्तक है ।

गाली का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले वे गालियां आती हैं जो समाज की सामंती वृत्ति का नमूना पेश करती हैं । इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण उनमें स्त्रियों से जुड़े तमाम पूर्वाग्रह हैं जो उनके शरीर के प्रति उपभोगवादी रवैये की अभिव्यक्ति होते हैं । इनमें बलात्कारी संस्कृति की झलक भी मिलती है । इनमें स्त्रीद्वेष के साथ जातियों के सामाजिक अनुक्रम में निचले पायदान पर मौजूद जातियों के प्रति हिकारत भी नजर आती है । बहुधा उनके जातिनाम ही गाली की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं । पशु जगत के प्रति मनुष्य की सोच का भी इनसे पता चलता है । कुछ पशु गाली के लिए इस्तेमाल होते हैं तो कुछ अन्य सकारात्मक भी नजर आते हैं । कुत्ते के पालतू होने के बावजूद उसकी इज्जत में बढ़ोत्तरी नहीं हुई । रिश्तों नातों का भी कई बार गालियों की तरह प्रयोग होता है । इनके बारे में प्रसन्न कुमार चौधरी मानते हैं कि ये परिवार और विवाह के पुराने रूपों के भाषिक अवशेष हैं । राधावल्लभ जी ने गालियों के इस पक्ष के विश्लेषण की जगह उनका एक दूसरा ही पक्ष उजागर किया है ।         

तेरह अध्यायों की इस किताब की भूमिका में ही वे इसे भाषा का एक रचनात्मक व्यवहार बताते हुए कहते हैं ‘भाषा का दायरा मनुष्य की सारी अभीप्साओं, आकांक्षाओं को ही नहीं, वह उसकी आशंकाओं, चिन्ताओं, विरोध के स्वरों को भी समाहित करता है’ तब स्वाभाविक है कि ‘संसार की सारी भाषाओं में धिक्कार, गर्हणा या गालियों के लिए शब्दावली’ होती है । इन शब्दों की व्याप्ति बताते हुए वे कहते हैं कि ‘इसमें तिरस्कार, धिक्कार, निन्दा तथा लांछित करने’ के भाव होते हैं । इस तरह की कविता की सामाजिक भूमिका की पहचान करते हुए वे दर्ज करते हैं ‘अन्याय का विरोध करने, मनुष्य के स्वाभिमान को जगाने में ऐसी कविताओं की सकारात्मक भूमिका रहती है’ । साथ ही ‘धिक्कार की कविता गहरे आक्रोश और मनोवेदना से उपजती है, इसकी संरचना में तीखा व्यंग्य और विरूपीकरण हो सकता है’। ऐसी ही कविता का विवेचन इस किताब में किया गया है । उनका कहना है कि ‘संस्कृत साहित्य में अन्याय का विरोध करने की, पापियों तथा आततायियों को धिक्कारने की तेजस्वी परम्परा रही है’ । साथ ही ‘इसको पहचाने बिना भारत की सांस्कृतिक विरासत को सही-सही नहीं समझा जा सकता’ ।        

इसके लिए उन्हें सबसे पहले संस्कृत के बारे में फैली धारणा का प्रतिवाद जरूरी लगा इसलिए वे इसे ‘औपनिवेशिक अधिरचना’ मानते हैं कि ‘भारत मात्र एक आध्यात्मिक देश है, यहाँ वैज्ञानिक विकास की कोई परम्परा नहीं रही है, और संस्कृत एक वर्ग विशेष की, कर्मकांड की तथा पुरोहिताई की भाषा रही है’ । राधावल्लभ जी की संस्कृत में धिक्कार की दीर्घ परम्परा की जो मान्यता है उसके विरोधी सनातनी हो सकते हैं जिनका तर्क होगा कि ‘संस्कृत तो देववाणी है, वह वेदों और पुराणों की पवित्र भाषा है, उसमें गालियाँ हो ही कैसे सकती हैं’ । संस्कृत के बारे में ऐसा मानने वालों की ही प्रभुता है । इसलिए उनकी चिंता को समझा जा सकता है । इन सनातनियों के अलावे जो आधुनिकतावादी होंगे वे कहेंगे कि ‘गालियाँ लोकव्यवहार में प्रचलित भाषाओं में होती हैं, बोलचाल की भाषाओं में होती हैं, संस्कृत बोलचाल की भाषा है नहीं, कई शताब्दियों से वह जीवित भाषा नहीं रही है, इसलिए उसमें गालियाँ नहीं हो सकतीं’ । इस तरह राधावल्लभ जी ने इन दोनों मान्यताओं का विरोध करते हुए संस्कृत कविता की इस विशेषता का उद्घाटन करने के साथ ही संस्कृत को पुरोहिताई से मुक्त करते हुए उसकी लोकबद्ध और कालबद्ध जीवंतता को भी स्थापित करना चाहते हैं ।

इस किताब का मूल कोरोना काल में दिया गया उनका एक आभासी व्याख्यान है जिसके बाद उन्हें अनेक पत्र प्राप्त हुए और उनसे प्रेरित होकर उन्होंने इसे लिपिबद्ध किया इस तरह हिंदी के सामान्य पाठकों के लिए उन्होंने समृद्ध संस्कृत साहित्य की एक अनजानी दुनिया खोलने का उपकार किया     

गालियों के प्रसंग में हमेशा नकारात्मकता का बोध होता है इसलिए सबसे पहले ही अध्याय में उन्होंने इसकी सकारात्मक मौजूदगी को चिन्हित किया है । सभी जानते हैं कि शादी-ब्याह जैसे मांगलिक संस्कार और होली जैसे उत्सवों का अभिन्न अंग गाली होती है । इसकी पुरातनता को सिद्ध करने के लिए आज भी राम के विवाह के अवसर पर मैथिल स्त्रियों की गालियों का जिक्र किया जाता है । इसी तरह वैदिक यज्ञों के आरम्भ में भी ब्रह्मचारी और पुंश्चली के बीच संवाद का अभिनय होता था । इस तरह के संवादों में एक दूसरे पर ताना कसा जाता था । यह कार्य यज्ञवेदी के निकट खड़ा होकर किया जाता था । उनका अनुमान है कि यह कार्य उर्वरकता बढ़ाने के लिए किया जाने वाला अनुष्ठान है । सभी जानते हैं कि धर्म की गति स्थूल नहीं, सूक्ष्म होती है । तात्पर्य कि जिन कामों को ऊपरी तौर पर बुरा समझा जाता है उनसे भी मांगलिक काम शुरू होते रहे हैं । इसका ही अनुकरण नाटकों में पूर्वरंग में किया जाता था जब विदूषक इसी तरह के संवाद बोलता है । इसका ही विस्तार महाकाव्य में खलनिंदा के रूप में हुआ । तुलसी ने खलों की ब्याजस्तुति से निंदा ही की है । धर्म की इसी सूक्ष्मता के कारण अधर्म का नाश हो का नारा लगाने वालों से बहुतेरे जानकार लोग कहते हैं कि अधर्म तो ईश्वर की पीठ है । इस समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य धर्म की समझ में स्थूल नजर का बढ़ता प्रभुत्व है । आशा है कि राधावल्लभ जी जैसे विद्वानों की अधीत सम्मति सुनी जायेगी ।

गालियों का ऐसा ही सकारात्मक प्रयोग राधावल्लभ जी ने आत्मभर्त्सना में भी पहचाना है जिससे आत्मशुद्धि होती है । इसका एक उपयोग मन के उबाल का शांत हो जाना भी है । इसको उन्होंने बीभत्स की मौजूदगी से जोड़ा है । इस संदर्भ में प्रेमचंद के लेख ‘साहित्य में घृणा की उपयोगिता’ की याद आना स्वाभाविक है । हमारे देश में इतना पाखंड व्याप्त है कि साहित्य या पवित्रता को बहुत ही अधिक एकांगी बना दिया गया है । मिलान कुंदेरा ने गलत नहीं कहा था कि मनुष्य मातृभाषा में ही अश्लील हो सकता है । शुद्धता और पवित्रता के उन्मादी आग्रह में लोग भूल जाते हैं कि साहित्यकार ही खलनायक का भी सृजन करता है ।

गालियों के संदर्भ में याद रखने की जरूरत है कि एक ओर तो उनमें हमारी समाज व्यवस्था के पदानुक्रम का प्रतिबिम्ब मिलता है तो दूसरी ओर उनकी एक भूमिका दमित समुदायों के लिए मुक्तिकारी भी होती है विवाह के ही अवसर पर एक रस्म डोमकच की होती है जिसमें स्त्री समुदाय तमाम वर्जित शब्दों के अकुंठ और मुक्त उच्चारण के साथ अवक्तव्य कामों का अभिनय भी करता है इस तरह यदि दमित समूह के पास अन्याय का प्रतिकार करने के भौतिक संसाधन या उपाय नहीं होते तो बहुधा वह गाली को भी अस्त्र की तरह इस्तेमाल करता है कमजोर का हथियार बहुधा गाली होती है इसलिए उस पर प्रतिबंध का भी एक समाजशास्त्र होता है

व्यंग्य के रूप में भी इसके प्रयोग के बहुतेरे उदाहरण राधावल्लभ जी ने इस किताब में दिये हैं मनोरंजन हेतु भी इस तरह की भाषा का उपयोग किया जाता है साहित्य में इस तरह की एक कलात्मक युक्ति का चलन ही रहा है जिसमें द्विअर्थी संवादों की भाषा का प्रयोग होता था इसमें किसी शब्द का एक अर्थ यदि वर्जित और अश्लील होता था तो दूसरा अर्थ शिष्ट और ग्राह्य   इसके अतिरिक्त इस तरह की भाषा से पात्रों का फक्कड़पन भी जाहिर किया जाता रहा है । प्रगाढ़ प्रेम की अवस्था में वर्जित शब्दों के प्रयोग का अनुभव सामान्य है । जैक लंडन ने अपने उपन्यासकाल आफ़ द वाइल्ड (जंगल की पुकार)में कुत्ते के प्रति उसके स्वामी के प्रेमाधिक्य को कुत्ते के कान में गाली बकने के जरिये प्रकट किया है । राधावल्लभ जी ने प्रेम की तरह ही युद्ध में भी गालियों के इस्तेमाल पर रोशनी डाली है । युद्ध में प्रतिपक्षी का मनोबल गिराने के लिए इनका प्रयोग जीवन में और उसी तरह साहित्य में भी किया जाता रहा है । इस सिलसिले में अश्वेत मुक्केबाज मुहम्मद अली ने भी अपनी रणनीति बताते हुए इसका जिक्र किया है जिसमें वह गाली देकर प्रतिपक्षी को उत्तेजित कर देता था । भारत के प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत में इस प्रविधि का प्रयोग करते हुए व्यास मुनि ने अनेक पात्रों को दिखाया है जो अस्त्र-शस्त्र के साथ शाब्दिक आरोप प्रत्यारोप भी करते रहते हैं । महाभारत के तो अनेक शिष्ट पात्र भी आपद्धर्म के रूप में गालियों का प्रयोग करते हैं ।

इन सबके बावजूद धिक्कार का असली प्रयोग अन्याय के प्रतिकार में ही होता है । अन्याय के केंद्र धन और राजसत्ता है । इनके प्रति वितृष्णा का भाव कविता में हमेशा व्यक्त हुआ है । इन दोनों से मद पैदा होता है और मनुष्य अपनी मानवीयता से च्युत हो जाता है । इन दोनों का ही समेकन राजसभा में होता है इसलिए अपवादों को छोड़ दें तो कहीं भी राजसभा को प्रशंसा नहीं मिली है । आश्चर्य नहीं कि कर्जन के अंग्रेजी राजदरबार का वर्णन करने के लिए बाल मुकुंद गुप्त को रावण का दरबार ही समतुल्य लगा था । संस्कृत में सबसे अधिक धिक्कार भी इसके लिए ही आया है । राधावल्लभ जी ने सीता द्वारा परित्याग के प्रतिवाद के प्रसंग में बताया है कि वे लक्ष्मण से संदेश देते हुए राम के लिए आर्यपुत्र की जगह राजा का संबोधन करती हैं । राधावल्लभ जी कहते हैं कि पति को केवल राजा कहना उसकी गर्हणा ही है । इसी मामले में कालिदास ने वाल्मीकि के मुख से भी गर्हणा ही निकलवाई है । वे उनका नाम लेने की जगह उन्हें भरत का बड़ा भाई कहते हैं और उनके प्रति अपने मन्यु (कोध) की घोषणा करते हैं ।    

गालियों के प्रयोग के संदर्भ में राधावल्लभ जी ने अथर्ववेद से एक प्रसंग उद्धृत किया है जो आज के लिए भी बहुत ही प्रासंगिक प्रतीत होता है । ॠषि कहते हैंजिस राष्ट्र में ब्रह्मज्ञानी पर अत्याचार होता है, वह राष्ट्र अध:पतित हो जाता है, उस नाव की तरह डूब जाता है जिसमें छेद हो जाने से पानी घुस रहा हो, दुर्भाग्य उस राष्ट्र को मटियामेट कर देता है। इस शाप की प्रासंगिकता के लिए केवल ब्रह्मज्ञानी की जगह बौद्धिक और उनके शिक्षण केंद्र रख लीजिए और दूर देश अमेरिका से लेकर अपने देश तक की अवस्था समझ लीजिए । इस संदर्भ में राधावल्लभ जी ने राम को अयोध्या से निकालने के जन प्रतिकार का वाल्मीकि द्वारा किये गये उल्लेख का जिक्र किया है । इसी तरह से युधिष्ठिर को हरा देने पर हस्तिनापुर के लोगों के सामूहिक विरोध का भी महाभारतीय उल्लेख को याद किया गया है ।

इन दोनों ही महाकाव्यों से राधावल्लभ जी ने अत्यंत शीलवान पात्रों के भी क्रोधयुक्त वचनों का उद्धरण दिया है । इस प्रसंग में उन्होंने शकुंतला की कथा का भी वर्णन किया है जिनके महाभारत के स्वरूप और कालिदास द्वारा उसके नाट्य रूपांतर में भेद को लेकर रोमिला थापर ने गम्भीर विवेचन किया है । शकुंतला और उसके साथ कण्व के आश्रम से दुष्यंत के दरबार गये ॠषिकुमारों की वाणी में जो गहन तेज है वह राजा और उसके दरबार के धिक्कार में ही प्रचुरता से मुखरित होता है । यह तत्त्व यदि महाभारत में बहुत भास्वर है तो उसे कालिदास ने भी थोड़ा बहुत निभाया है ।

इस तरह की कविता का सामाजिक उपयोग राधावल्लभ जी ने खल पात्रों में सुधार की सम्भावना बताया है । यही उनके मुताबिक इस कविता का सौंदर्यशास्त्र है । इस मामले में उनका कहना है किश्रृंगार की कविता जितनी आवश्यक है, समाज को व्यवस्थित करने, मनुष्य को विचारशील बनाने तथा विवेक को जाग्रत रखने के लिए धिक्कार की कविता की भी उतनी ही आवश्यकता है। कहने की जरूरत नहीं कि आज संस्कृत के बारे में भी इस तरह की समझ पैदा करने की उतनी ही प्रबल आवश्यकता है । उसे जिस तरह मिथकीय स्वरूप देकर उसकी जान निकाल लेने का प्रयास हो रहा है उस हालत में तो यह संस्कृत के प्रत्येक सच्चे विद्वान के लिए परम कर्तव्य हो गया है । उसकी प्राणवत्ता को बचाने के लिए उसे कर्मकांड की सीमा से निकालकर जन समाज के भीतर प्रतिष्ठित करना जरूरी है तभी उसके संपन्न दाय का उत्पादक लाभ उठाया जा सकता है । राधावल्लभ जी की यह किताब इस दिशा में बहुत ही मददगार साबित होगी ।