Wednesday, October 11, 2023

गाँधी की मीरा

 

                 

                            

सुप्रिया पाठक की लिखी किताबमीराबेन: गाँधी की सहयात्रीका प्रकाशन अहिंसा-शांति ग्रंथमाला के तहत प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर से 2022 में हुआ यह किताब एकाधिक कारणों से चर्चा के लायक है सबसे बड़ा कारण तो वर्तमान माहौल ही है जिसमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद की इतनी एकरंगी तस्वीर बनायी गयी है जिसमें अपने देश को छोड़कर शेष सभी देश शत्रु नजर आते हैं उपनिवेशवाद के विरोध को भी अतिशय सरल बना दिया गया है हमारे देश के स्वाधीनता आंदोलन की ऐसी छवि निर्मित की जा रही है जिससे साम्राज्यवाद विरोध का सार समाप्त हो जाये और विदेशियों से नफ़रत ही उसका एकमात्र रूप नजर आये । आजादी के आंदोलन की ऐसी छवि बनाने का मकसद शायद यह है कि साम्राज्यवाद का संदर्भ मिटाकर आजादी को इस्लाम विरोध में बदल दिया जाये । वर्तमान शासक विचार के लिए सबसे दुखद यही है कि कुल प्रयास के बावजूद इसमें सफलता नहीं मिल रही है । देश के सामने आने वाली नयी चुनौतियों के संदर्भ में देश की आजादी के आंदोलन और उसके नायकों के बहुतेरे अनदेखे पहलू लगातार उजागर हो रहे हैं ।

मीराबेन की इस कहानी के जरिये देश की आजादी के साथ ऐसे अंग्रेजों का जुड़ाव प्रकट होता है जो औपनिवेशिक नीतियों के समर्थन में नहीं थे । साथ ही उस आंदोलन में शामिल इस स्त्री के सहारे एक और पहलू उभरता है । गांधी के साथ उनके जुड़ाव ने स्वाधीनता आंदोलन की राजनीति के उन पक्षों को प्रकट किया है जिन्होंने विदेशियों और खासकर अंग्रेजों को तो आकर्षित किया ही, स्त्रियों को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जीवन में उतार दिया । लेखिका ने आजादी के आंदोलन के इन दोनों पहलुओं को बहुत ही प्रवाहपूर्ण भाषा में अच्छी तरह प्रस्तुत किया है । भारत की आजादी के लक्ष्य के साथ अंग्रेजों के जुड़ाव को रामचंद्र गुह ने अपनी किताब ‘रेबेल्स अगेंस्ट द  राज: वेस्टर्न फ़ाइटर्स फ़ार इंडियन फ़्रीडम’ में रेखांकित किया है । लेखिका ने इस किताब का आभार अपनी भूमिका में स्वीकार भी किया है । इंग्लैंड के इन ‘देशद्रोहियों’ में वहां के कम्युनिस्ट नेता भी शामिल रहे थे और उन पर भारत की अदालतों में राजद्रोह का मुकदमा भी चला था । विदेशियों से नफ़रत के इस दौर में इस तथ्य पर जोर देना जरूरी है । लेखिका का मकसद मीराबेन की जीवनी लिखने का है क्योंकि उनके अनुसार ‘इतिहास के पन्नों से अदृश्य स्त्री पात्रों को तलाशना और नए सिरे से उन्हें समझने का प्रयास करना, स्त्रीवादी सैद्धांतिकी का प्रस्थान बिंदु रहा है ।’

मीराबेन की इस जीवनी में गाँधी स्वाभाविक रूप से केंद्रीय भूमिका में हैं लेकिन मीराबेन का स्वतंत्र व्यक्तित्व भी बेहद भास्कर होकर उभरता है इसके लिए लेखिका ने गाँधी के पहले और गाँधी के बाद के भी उनके जीवन पर पर्याप्त ध्यान दिया है मीराबेन का मूल नाम मेडलिन स्लेड था । उनके व्यक्तित्व को उजागर करने के लिए लेखिका ने एक बहुत ही खास बात की ओर ध्यान दिलाया है । उन्होंने बताया है कि माता के परिवार में परदेशियों से घुलने मिलने की खुली परम्परा थी जिसके चलते परनानी जिप्सी आयीं और उनका शारीरिक गठन मीराबेन को मिला था । रुचि के इसी खुलेपन की वजह से बीथोवेन के संगीत से लगाव हुआ और उसके कारण जर्मनों से दूरी बरतने के माहौल का प्रतिरोध किया । न केवल जर्मनी गयीं बल्कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान व्याप्त जर्मन विरोध का प्रतिकार करने के लिए जर्मन कलाकारों को संगीत समारोहों में आमंत्रित करने लगीं । बीथोवेन पर लिखी पुस्तक को पढ़ने के चक्कर में रोम्यां रोलां से आकर्षण पैदा हुआ । उनसे बात करने के लिए फ़्रांसिसी सीखी । उनके जरिये गाँधी की जनकारी मिली । इसके बाद मीरा का अपने आपको भारत में रहने लायक बनाने का विकट प्रयास शुरू होता है इस प्रयास की परिणति गाँधी की सेवा में उनके जाने में होती है

भारत आने के बाद स्वाभाविक रूप से स्वाधीनता आंदोलन के वात्याचक्र का हिस्सा वे भी हो जाती हैं । जैसा ऊपर लेखिका ने बताया है गाँधी उन्हें लगातार राजनीतिक भागीदारी से दूर रखना चाहते रहे फिर भी एक अमेरिकी पत्रकार की गवाही के मुताबिक ‘उन्होंने अपना पूरा जीवन गाँधी, चरखा, सूत कताई, वन्य जीवों और पर्यावरण को समर्पित कर दिया था ।’ प्रसंगवश इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कोई भी गहरी राजनीति एकहरी नहीं होती इसलिए गाँधी की राजनीति में ये अवांतर तत्व अभिन्न रूप से शामिल थे । भारत के स्वाधीनता संग्राम के कुछ बेहद अहम अवसरों पर मीराबेन की उपस्थिति प्रभावकारी हस्तक्षेप के बतौर नजर आती है । इंग्लैंड में रहते हुए ही मीराबेन की सचेत राजनीतिक समझ का सबूत रानी विक्टोरिया के निधन की खबर के उल्लेख से मिलता है । कहने की जरूरत नहीं कि विक्टोरिया के शासन के साथ स्त्री के शासक होने का प्रसंग तो जुड़ा ही है भारत और हिंदी साहित्य में भी उनको पर्याप्त प्रशंसा मिली । याद करिए कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने उन्हें ‘अमी की कटोरी’ कहा था । लेखिका ने भी इसे युग परिवर्तन के रूप में दर्ज किया है ।

पिता फौजी थे इसलिए उनके तबादले की वजह से, गाँधी के पास आने से पहले भी एक बार मीराबेन भारत आयी थीं । मन नहीं लगा तो फिर वापस इंग्लैंड चली गयी थीं । रोम्यां रोलां की प्रेरणा से जब गाँधी के पास आने का फैसला किया तो उसकी जोरदार तैयारी की । यंग इंडिया को नियमित रूप से पढ़ना शुरू किया । इसी क्रम में ‘उन्हें जानकारी मिली कि गाँधी इन दिनों हिंदू-मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक सद्भाव एवं भाईचारा कायम करने के लिए उपवास कर रहे थे, जिसकी वजह से उनका स्वास्थ्य गिर रहा था ।’ उनके उपवास के प्रभाव से सद्भाव कायम हुआ । खबर मिलने पर मीराबेन ने ‘अपना हीरों का ब्रोच बेचकर बीस पाउंड की राशि का चेक और एक पत्र’ भेजा और आने की इजाजत मांगी । गाँधी ने उत्तर दिया और एक साल बाद भी उत्साह बने रहने पर ही आने का अनुरोध किया । जब वे भारत आ गयीं तो इंग्लैंड के अखबारों में इसकी आलोचना का अभियान चला जिसमें गाँधी पर आक्रमण किये गये । जवाब में मीराबेन ने भारत आने के अपने स्वतंत्र फैसले का उल्लेख किया । किताब में एकाधिक जगहों पर देश के भीतर की सांप्रदायिक समस्या और उससे जूझने के प्रयासों का जिक्र है । इस सिलसिले में उल्लेखनीय है कि मीराबेन जब हिंदी सीखने दिल्ली में कन्या गुरुकुल आयीं तो स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के बाद गुरुकुल का माहौल सांप्रदायिक हो गया । गुरुकुल की लड़कियों की भाषा में मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति बहुत कटुता झलकने लगी । इसकी शिकायत करते हुए मीराबेन ने गाँधी को पत्र लिखा । उत्तर में गाँधी ने लिखा कि ‘मुसलमानों के विरुद्ध यह नफरत समाप्त होनी चाहिए ।’ सांप्रदायिक उन्माद के प्रति गाँधी के इस सुसंगत रुख को जानने के लिए भी इस किताब को देखना चाहिए ।

गाँधी की आंदोलनात्मक रणनीति से जुड़े तनावों को भी किताब में जगह दी गयी है क्योंकि मीराबेन उन क्षणों की साक्षी थीं । इनमें से एक तो नमक कानून को तोड़ने के लिए दांडी यात्रा के फैसले के तनाव का बयान है । इस आंदोलन के साथ स्त्रियों के जुड़ाव के पहलू को भी लेखिका ने अच्छी तरह उभारा है । इसके बाद लंदन के गोलमेज सम्मेलन में वे गाँधी के साथ न केवल गयीं बल्कि लगातार उनकी छाया की तरह हर कहीं रहीं । लेखिका ने इसे दर्ज करते समय लिखा है कि ‘नस्ल, वर्ग, धर्म और राष्ट्रीयता की सारी सीमाएं गाँधी-मीरा संबंधों में टूट गई थीं ।’ इसी तरह भारत छोड़ों आंदोलन के फैसले से जुड़े तमाम किस्म के परामर्शों का जिक्र है जिनमें मीराबेन भी सहयोगी की भूमिका में थीं । भारत छोड़ो आंदोलन के लिए कांग्रेस की कार्यसमिति को राजी करने में खुद मीराबेन का बड़ा भारी योगदान था । वे ही बापू की चिट्ठी लेकर आनंद भवन गयी थीं । उनकी राजनीतिक सक्रियता को अंग्रज सरकार बर्दाश्त न कर सकी और उन्हें भी कारावास का दंड भुगतना पड़ा ।

आजादी मिलने का समय जैसे जैसे करीब आता है वैसे वैसे गाँधी अकेले पड़ते जाते हैं । उनकी हत्या के पहले और बाद के माहौल को मीराबेन की निगाह से लेखिका ने बहुत ही संवदनशील तरीके से प्रस्तुत किया है । गाँधी की हत्या के बाद मीराबेन की स्थिति विडम्बनापूर्ण हो जाती है । सरकारी तंत्र के साथ उनकी रसाई नहीं हो पाती । एक के बाद एक कोशिशों के बावजूद वे लगातार सिमटती जाती है । इस प्रसंग को लेखिका ने जिस तरह प्रस्तुत किया है उससे एक और बावनदास की हत्या जैसी कारुणिक अनूभूति पैदा होती है । मीराबेन और पृथ्वी सिंह के आपसी प्रेम के वर्णन को भी लेखिका ने बेहद सधी भाषा में संतुलित और यथोचित गरिमा के साथ निभाया है ।                                        

गाँधी के साथ मीराबेन के रिश्तों की जटिलता को भी लेखिका ने उभारा है । वे कहती हैंगाँधी और मीरा के बीच संभावित प्रेम-संबंधों के आयाम की तलाशभी बहुतों की रुचि का विषय रहा है । सबूत के बतौरमीरा के विरह की वेदना, गाँधी का मीरा को उनसे दूर रखने के लिए विभिन्न आश्रमों में उन्हें भेजने की आदत और दोनों के मध्य निरंत्र हुए पत्र व्यवहार का संदर्भ कई लेखकों की रचनाओं में दर्ज है ।इस जटिलता को लेखिका ने बहुत ही नाजुक तरीके से निभाया है ।         

अत्यंत सुरुचिसंपन्न और सादा प्रस्तुति वाली इस किताब की भाषा भी रोचक और सादा है इतनी बेहतर किताब में एक छोटी सी गलती कंकड़ की तरह किरकिराती है लेखिका ने मीराबेन से रोम्यां रोलां की मुलाकात के समय उनके पचासवें दशक की बात दो बार लिखी है इसे असावधानी या चूक ही कहेंगे क्योंकि जीवन के अंतिम दिनों में मीराबेन को सातवें दशक में बताया गया है जो सही है आशा है इस भूल को आगामी संस्करण में दुरुस्त कर लिया जायेगा । इसी तरह एक ऐसा प्रकरण है जिसकी व्याख्या स्पष्ट नहीं है । प्रसंग द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापानियों के उड़ीसा प्रांत के तटीय इलाकों से भारत प्रवेश की आशंका से जुड़ा हुआ है । इसे रोकने के लिए मीराबेन ने निगरानी की व्यवस्था की । लेखिका ने दर्ज किया हैउड़ीसा की सरकार को मीरा की उपस्थिति और उनकी गतिविधियों से आपत्ति थी । इस बारे में उन्होंने दिल्ली में गृह सचिव को पत्र लिखकर मीरा को वापस भेजने की कार्रवाई करने का अनुरोध किया, परंतु दिल्ली सरकार उस समय गाँधी को जनता की सहानुभूति हासिल करने देने के पक्ष में नहीं थी । वह गाँधी को हराना चाहती थी जिसके लिए उस समय आल इंडिया स्टूडेंट फ़ेडरेशन के युवक सबसे उपयुक्त विकल्प थे ।यह प्रसंग पूरी तरह अस्पष्ट रह जाता है । आशा है यह समस्या भी आगे दुरुस्त होगी ।                                        

Monday, October 9, 2023

पूंजीवाद की दुनिया और उसकी कार्यपद्धति

 

                 

                                                                     

2022 में वर्सो से विवेक छिब्बर की किताबकनफ़्रंटिंग कैपिटलिज्म: हाउ द वर्ल्ड वर्क्स ऐंड हाउ टु चेंज इटका प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि पिछले पांच सालों में विकसित पूंजीवादी दुनिया में पूंजीवाद के नवउदारवादी स्वरूप की वैचारिक वैधता समाप्त हो गयी है । चालीस साल के प्रभुत्व के बाद मुक्त बाजार की सोच पर हमले हो रहे हैं । हमलावर वामपंथी ही नहीं, मुख्य धारा के बौद्धिक भी हैं । तमाम तरह के कामगार विकल्पहीनता के दावे के विपरीत पूंजी के शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प जाहिर कर रहे हैं । इस ऊब की अभिव्यक्ति अभी संगठित वर्ग संघर्ष की जगह अन्य तरीकों से हो रही है । इसके बावजूद इसकी व्यापकता के चलते नये समय के आगमन की अनुभूति हो रही है । विचित्र बात कि इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई । 2011 के अकुपाइ आंदोलनों में इसकी थोड़ी सुगबुगाहट नजर आयी लेकिन 2016 और 2020 के राष्ट्रपति चुनावों में बर्नी सांडर्स के प्रत्याशी बनाने के अभियान से इसे ठोस शक्ल मिली । पूंजीवाद विरोधी वामपंथी बातें जिस तरह हो रही हैं वैसा विगत दो पीढ़ियों के दौरान कभी नहीं सुनी गयी थीं । उनके प्रत्याशी न होने के बावजूद यह उभार बना रहा । वामपंथी संगठनों की सदस्यता में भारी इजाफ़ा हुआ है । इनमें अमूर्त दार्शनिक विवादों की जगह रणनीति और कार्यनीति संबंधी बहसें हो रही हैं । इसके साथ ही मजदूरों के संगठन भी मजबूत हो रहे हैं ।

ऐसे समय पूंजीवाद की बुनियादी गतिकी के बारे में सरल किताबों की कमी को देखते हुए यह किताब तैयार की गयी है । पहले आम शिक्षण को ध्यान में रखते हुए ऐसी पुस्तिकाओं के प्रकाशन का चलन था लेकिन 1980 के बाद से यह परम्परा खत्म हो गयी । इसकी वजह एक ओर संगठित वाम की पराजय था तो दूसरी ओर क्रांतिकारी विमर्श की दुनिया में गैर सरकारी संगठन और विद्वानों का भर जाना था । क्रांतिकारी सोच के भीतर राजनीतिक बदलाव की सम्भावना की आशा भी नहीं रह गयी थी । विद्वानों का प्रवेश कोई बुरी बात नहीं थी और उन्होंने सैद्धांतिक मोर्चे पर कुछ अग्रगति भी हासिल की लेकिन मजदूर वर्ग के साथ रिश्ते टूट जाने के चलते ये तमाम अध्ययन पुस्तकों और पत्रिकाओं में दबे रहे । अब चुनौती सिद्धांत को संगठन के साथ जोड़ने की है । उसे अद्यतन तो होना ही होगा ऐसी भाषा भी अपनानी होगी जो सत्तर के दशक के मुकाबले आज की लगे । नवउदारवाद के चालीस सालों के बाद होश आने में वक्त लगेगा । उसका आ जाना तय नहीं है । मुक्त बाजार की विचारधारा कमजोर पड़ी है लेकिन अब भी मजबूत राजनीतिक ताकत बनी हुई है । हालात बदलने के लिए वामपंथ को पचास के दशक जैसी ताकत जुटानी होगी । वैचारिक रूप से आगे बढ़ने के बावजूद समाजवादी वाम राजनीतिक रूप से बिखरा हुआ है । लेखक को उम्मीद है कि उनकी इस किताब से उसके पुनरुत्थान में कुछ तो मदद मिलेगी ।

लेखक का कहना है कि कोरोना की महामारी के आगमन से पहले ही दैनन्दिन जीवन बाधादौड़ बन गया था । 2015 में जब अमेरिकी लोगों से उनकी वित्तीय सुरक्षा के बारे में पूछा गया तो आधे लोगों ने वित्तीय सुरक्षा के बारे में अनिश्चितता जतायी । 71 फ़ीसद लोग बिल नहीं चुका सके थे और 70 फ़ीसद लोग अवकाश के बाद के लिए बचत नहीं कर सके थे । भविष्य की असुरक्षा इतनी अधिक थी कि 92 फ़ीसद लोग आर्थिक सुरक्षा के लिए प्रोन्नति भी कुर्बान करने को तैयार थे । ऐसा नहीं कि उन्हें प्रोन्नति की चाह नहीं थी लेकिन तत्काल स्थिरता के लिए वे भविष्य के आर्थिक लाभ छोड़ देने को भी तैयार थे । सबकी अवस्था ऐसी नहीं थी । अमेरिकी समाज के ऊपरी तबकों के लिए जीवन कभी इतना आरामदेह नहीं रहा था । अमेरिका के सबसे अमीर परिवार पिछले चालीस सालों से मौज उड़ा रहे हैं । जहां अधिकतर लोगों की आमदनी में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हो रही वहीं सबसे धनी दस फ़ीसद लोग अमीरी की बाढ़ से मुटाये जा रहे हैं । 1983 से 2019 के बीच की निजी संपत्ति में इजाफ़े का 86 फ़ीसद इनके ही नसीब में गया और नीचे के 80 फ़ीसद लोगों के हिस्से महज पांच फ़ीसद संपत्ति का इजाफ़ा आया । ऊपरी दस फ़ीसद में भी अधिकांश लाभ एक फ़ीसद को हुआ और उसके बाद के पांच फ़ीसद लोगों को समस्त लाभ का एक तिहाई ही हासिल हुआ । आमदनी का भी यही किस्सा रहा । एक फ़ीसद लोग नयी आय का एक तिहाई हड़प गये और ऊपरी दस फ़ीसद ने नयी आय का लगभग 70 फ़ीसद पाया ।

कहने का मतलब कि 1980 के बाद आर्थिक हालात में बेहतरी तो आयी लेकिन उसके प्रत्यक्ष लाभ उन्हें ही मिले जो पहले से ही अमीर थे । कोई भी मानेगा कि इसमें बुनियादी रूप से कुछ गड़बड़ है । इतने अधिक संसाधनों और संपत्ति वाले समाज में ऐसा कैसे हो रहा है कि आबादी का बहुत ही छोटा ऊपरी तबका सब कुछ हड़पे जा रहा है जबकि करोड़ो लोगों के लिए जीवन भरण पोषण का संग्राम बन गया है । मुख्य धारा की मीडिया के वाचाल प्रवक्ताओं के पास इस स्थिति की व्याख्या दो तरह की है । एक तो वे इसके लिए व्यक्तियों की काहिली को जिम्मेदार ठहराते हैं । उनको लगता है कि खुशहाल जिंदगी और व्यक्ति के बीच बाधा कड़ी मेहनत करने की अनिच्छा है । इस बेरोजगारी के लिए किसी और को दोष देने का कोई तुक नहीं है । दूसरे वे इसके लिए सरकार को दोषी ठहराते हैं । उनका यह कहना है कि सामाजिक समस्याओं के पैदा होने की वजह सरकार द्वारा बाजार में बेवजह हस्तक्षेप है । इसके ही कारण बाजार अपना काम ठीक से नहीं कर पाता । अगर कोई काम करना चाहे तो बाजार में रोजगार की कमी नहीं है । अगर किसी के अंदर खास कौशल है तो बाजार उसे पहचान कर उसे सम्मानित करेगा । धन कमाने का अगर कोई तरीका उनके दिमाग में है तो बैंक उन्हें व्यवसाय हेतु कर्ज देकर धनी होने का अवसर उपलब्ध करायेगा । बाजार अपने आप पूर्ण रोजगार पैदा करता है और लोगों की प्रतिभा को मान देता है । सरकार उसे अपनी तरह चलने की आजादी नहीं देती । राजनेता और निहित स्वार्थी तत्व किसी भी उद्यमशील पहल को तमाम किस्म के नियमों के जाल में जकड़ लेते हैं । ऐसी कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जाता है जो लोगों को परजीवी बनाती हैं । सरहदों के आर पार सामानों की अबाध आवाजाही पर रोक लगायी जाती है । समाधान यह है कि बाजार से सरकार दूर हटे और उसे अपना जादू दिखाने दे ।

इन दोनों तर्कों में साझा बात यह है कि गरीबी, बेरोजगारी, असुरक्षा और हताशा के लिए पूंजीवाद को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता । लोगों को असुरक्षा और शक्तिहीनता में डालने की बजाय बाजार को आजादी और मौके की जगह घोषित किया जाता है । दावे के मुताबिक इसी के भीतर लोग अपने जीवन और प्रतिभा के बारे में फैसला लेते हैं और यथोचित काम खोजते हैं । यहां सभी फैसले आजाद होकर किये जाते हैं । अगर जिंदगी में खुशहाली नहीं है तो उसके लिए व्यवस्था जिम्मेदार नहीं क्योंकि उसका निर्माण लोगों के फैसलों से होता है । लोग अगर काम करते हैं तो उनकी पहल और प्रतिभा का मान मिलता है और अगर काम नहीं करते तो उसका नतीजा भुगतना पड़ता है । इसलिए उनकी गरीबी के लिए या तो वे खुद जिम्मेदार हैं या कोई बाहरी हस्तक्षेप । खूब आसानी से समझा जा सकता है कि ये तर्क विजेताओं के हैं । आखिर उनके हित में ही तो यह व्यवस्था काम करती है । इस तर्क के मुताबिक कोई अगर अमीर है तो अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत न कि अपनी वर्गीय सुविधा के कारण । उनकी संपत्ति उनकी प्रतिभा और कौशल का परिचायक है । उत्पीड़न और शोषण का कोई अस्तित्व नहीं । जो है वह चुनाव और अवसर का खेल है । पिछले कुछ दशकों से लोगों की परेशानी की इस व्याख्या को कोई चुनौती नहीं देता रहा है । टेलीविजन और पाठ्य पुस्तकों में समाज की कार्यपद्धति के बारे में जो कुछ्बताया जाता था उसे मंजूर कर लेने के अलावे कोई रास्ता ही नहीं बचा था । बाजार की मूतिपूजा के कोलाहल में सभी आवाजें ही दब गयी थीं ।       

लेकिन विगत कुछ सालों से लोग इन तर्कों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं । मार्गरेट थैचर ने जब विकल्पहीनता की बात कही थी उसके बाद अब वह विश्वास पहली बार डांवाडोल हो रहा है । राजनेता अब पहले की तरह मुक्त बाजार और मुक्त व्यापार की तारीफ़ों के पुल नहीं बांध पा रहे हैं । बाजार को काबू करने की जगह अब बहस उसकी मौजूदगी की हद के बारे में हो रही है । समाजवाद को सार्वजनिक बातचीत में वर्जित कर दिया गया था लेकिन अब राजनीतिक वातावरण में उसके चर्चे हैं । एक अनुमान के मुताबिक आधे अमेरिकी युवा इस समय समाजवाद के पक्ष में हैं । थैचर को जवाब के बतौर समाजवाद की बात अब हवाओं में है । लोगों को महसूस हो रहा है कि उनकी समस्याओं की जड़ कोई अकेला दुकेला राजनेता नहीं बल्कि यह व्यवस्था और उसकी कार्यपद्धति है ।

उनका अंदाजा सही है । समस्या तो व्यवस्था है । अगर हालात की बेहतरी के लिए कुछ करना है तो इस व्यवस्था की कार्यपद्धति को समझना होगा । इस सिलसिले में उन्होंने कुछ बातों को सूत्रवत व्यक्त किया है । पहली बात कि पूंजीवाद व्यक्तियों का समूह नहीं है बल्कि इसके तहत व्यक्तियों को सामाजिक वर्गों में बांटा जाता है । अलग अलग वर्गों के लोग अलग अलग आर्थिक हालात का सामना करते हैं । वर्गों में लोगों की मौजूदगी इससे तय होती है कि उनके पास जमीन, कारखाना, बैंक, होटल आदि उत्पादन के साधन हैं या नहीं । जिनके पास ये साधन नहीं होते वे अपनी आजीविका के लिए इन साधनों के मालिकों यानी पूंजीपतियों के पास काम करते हैं । इस तरह पूंजीवाद में अधिकांश लोग कामगारों में बदल जाते हैं और उनके पास पूंजीपतियों के हाथों अपनी मेहनत बेचने के अलावे कोई मार्ग नहीं रह जाता जिससे तैयार माल और सेवाओं को पूंजीपति बेचता है । दोनों को बाजार में बेचना पड़ता है लेकिन उनकी बिक्री में भारी अंतर होता है । इसका मतलब कि उनके हित अलग अलग होते हैं । पूंजीपति अधिकतम मुनाफ़ा हासिल करना चाहता है जिसके लिए उसे हमेशा कामगारों से युद्धरत रहना होता है । प्रत्येक मालिक की यह कोशिश रहती है कि सस्ती से सस्ती लागत पर उसका माल तैयार हो । इसके लिए वह कामगारों की पगार बहुत कम रखना और बदले में अधिक से अधिक काम कराना चाहता है । उसकी यह कोशिश कामगारों की इच्छा के विरुद्ध होती है । वह तो पगार कम रखना चाहता है जबकि कामगार अधिक से अधिक पगार पाना  चाहते हैं । मालिक काम तेजी से पूरा कराना चाहता है जबकि कामगार उसकी रफ़्तार कम रखना चाहते हैं । मालिक के शक्तिशाली होने के कारण कामगारों को उनकी शर्त मजबूरन माननी पड़ती है । पूंजीपतियों द्वारा शोषण की वजह यह नहीं होती कि वे बुरे या लालची होते हैं बल्कि बाजार में जिस होड़ का उन्हें सामना करना पड़ता है उसके दबाव में वे ऐसा करते हैं । अगर कोई कम लागत में वस्तु नहीं बनाता तो उसके ग्राहक टूट जायेंगे । इससे बचने के लिए वह कीमत बहुत घटा देता है । अब अगर उसकी लागत भी कम नहीं होगी तो उसे घाटा उठाना पड़ेगा । इसलिए वह पगार में घटोत्तरी करता है । किसी भी व्यवसाय के बाजार में टिके रहने के लिए यह जरूरी होता है । इसका लालच से कोई लेना देना नहीं होता । इसी वजह से पूंजीवाद अकूत संपत्ति और अपार दरिद्रता को एक साथ जन्म देता है । उसकी संपत्ति से एकांगी समृद्धि का जन्म होता है । उत्पादकता बढ़ने के साथ अगर पगार भी बढ़े और काम का समय घट जाये तो कामगार की हालत बेहतर होगी लेकिन मुक्त बाजार में यह सम्भव नहीं है । उत्पादकता बढ़ने से हासिल लाभ कामगारों के पास नहीं पहुंचते । मालिक या तो उसका फिर से निवेश करता है या अपने हिस्सेदारों को बांट देता है या अपनी जेब के हवाले करता है । संपदा बढ़ने के बावजूद कामगार की पगार में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होती, उसका रोजगार असुरक्षित रहता है, उसे अधिक समय तक काम करना पड़ता है और सेहत गंवानी पड़ती है । इसी वजह से विषमता भी बढ़ती चली जाती है । मालिक और कामगार को एक दूसरे की जरूरत पड़ती है लेकिन वे समान नहीं होते । मालिक के मुकाबले कामगार हमेशा मजबूर रहता है । उनके पास इतनी बचत ही नहीं होती कि वे काम करने से इनकार कर सकें । उन्हें काम से हटाये जाने की आशंका हमेशा बनी रहती है । इससे पार पाने का एकमात्र उपाय उनकी आपसी एकता है । अलग अलग कामगारों के हित तभी सुरक्षित होंगे जब वे सामूहिक संगठनों का निर्माण करें । यह सीख आज भी उतना ही कारगर है जितना दो सौ साल पहले थी । इन बातों को स्पष्ट करने के बाद लेखक ने पूंजीवाद को परिभाषित करने की कोशिश की है । यह एक खास तरह की आर्थिक व्यवस्था है जिसमें निश्चित आबादी के लिए वस्तुओं और सेवाओं को खास तरह से उत्पादित किया जाता है लेकिन यही एकमात्र व्यवस्था नहीं रही है । इसके अतिरिक्त दासता और सामंतवाद भी आर्थिक व्यवस्था के अन्य रूप रहे हैं । इन अन्य व्यवस्थाओं से पूंजीवाद का अंतर बाजार पर निर्भरता से पैदा होता है । पूंजीवादी समाज में अधिकांश लोग अपनी आजीविका के लिए बाजार की शरण में जाते हैं । रोटी, कपड़ा या मकान जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी खरीद बिक्री का सहारा लेना पड़ता है । इन्हें बनाने का विकल्प उनसे छिन चुका है । बाजार आधारित इस व्यवस्था की कुछ मूलभूत विशेषता होती है । सबसे पहली बात कि उत्पादन अपने उपभोग के लिए नहीं बल्कि बाजार में खरीद बिक्री के लिए किया जाता है । स्वाभाविक रूप से बिक्री किसी और को ही होगी । इसके कारण उत्पादन के सभी पक्षों पर गहरा असर पड़ता है । आर्थिक फैसले लेने वालों को सामान के खरीदार खोजने पर सारा ध्यान लगाना पड़ता है । वस्तु या सेवा की गुणवत्ता या अपने लिए उपयोगिता से उनको कोई मतलब नहीं रह जाता । खरीदार की चाहत का ही मूल्य महत्व रह जाता है ।

इसी बात को एक और तरीके से भी कहा जा सकता है कि पूंजीवाद में रोजगार का रूप पगारजीवी श्रम का हो जाता है । मानव इतिहास के लिए यह बात नयी है क्योंकि अधिकांश समय तक अधिकतर मनुष्य स्वरोजगारी रहे हैं । किसान या दस्तकार के रूप में वे अपने खेत या कार्यशाला में काम करते रहे । पूंजीवाद में यह आत्मनिर्भरता अपवाद है दूसरों के लिए ही काम नियम है । मालिक के निर्देश पर साझा सहमति से तय समय तक और तय भरपाई की दर पर काम करना होता है । घंटे की दर से मिलने वाली रकम को पगार या मजदूरी कहते हैं । इसका मतलब है कि जहां काम करना है उस जगह पर मालिक का ही अधिकार रहता है । वे ही तय करते हैं कि कितने लोगों को काम पर रखना है और किस वस्तु का कितना उत्पादन करना है । इन्हें पूंजीपति और उनकी संपदा को ही पूंजी कहा जाता है । पूंजीवादी व्यवस्था के लिए ये तीनों ही तत्व जरूरी हैं । इन सबके जरूरी होने के बावजूद निजी स्वामित्व ही इसकी जान है । पगारजीवी श्रम इससे पहले की व्यवस्थाओं में भी मौजूद रहा था तथा व्यापार और विनिमय भी होता रहा था लेकिन इनकी मौजूदगी समूचे समाज के मुकाबले बहुत कम थी । आम तौर पर खेती से होने वाली पैदावार में कुछ जोड़ने के लिए लोग श्रम करके पगार पा जाते थे । पगार पर ही पूरी तरह निर्भर लोगों की तादाद बेहद कम थी । इसी तरह व्यापार भी सदियों से मौजूद था लेकिन जीवित रहने के लिए विनिमय पर ही पूरी तरह निर्भरता बहुत कम लोगों की थी । बाजार में वही सामान पहुंचता था जो बुनियादी उपभोग से बचा रह जाता था । उत्पादन का लक्ष्य बाजार में विक्रेय सामग्री का निर्माण नहीं था । जो कुछ बनता वह निजी उपभोग के लिए होता था । मतलब कि पगारजीवी श्रम, व्यापार या विनिमय की मौजूदगी से ही पूंजीवाद का अस्तित्व साबित नहीं होता । ये सब तो पूंजीवाद से पहले से मौजूद रहा है । पूंजीवाद में ये आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में आ गये । उत्पादन और वितरण का संगठन इनके ही लिहाज से होने लगा ।

पगारजीवी श्रम और व्यापार पूंजीवाद के अभिलक्षण तभी बने जब वे समूचे अर्थतंत्र के नाभिक बन गये । ऐसा तभी हो पाया जब उत्पादन के साधनों तक अधिकांश लोगों की पहुंच को समाप्त कर दिया गया । इतिहास में अब तक अधिकतर लोगों का जीवन अपनी जमीन पर बीतता रहा था और जमीन के टुकड़ों पर अलग अलग परिवारों के अधिकार को सामाजिक मान्यता प्राप्त थी । जमीन पर जब तक उनका अधिकार था वे अपने उपभोग के लिए फसल उगाते थे । उन्हें बाजार में बेचने या पगार पर काम करने की जरूरत ही नहीं थी । बाजार में लेन देन भी होता था और कभी कभी वे पगार पर काम भी कर लिया करते थे । इससे उनको अतिरिक्त आमदनी और उपभोग्य वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती थी । उत्पादन के साधनों पर अधिकार होने से वे बाजार की ताकतों को काबू में रखे हुए थे ।

ज्यों ही मनुष्य को उत्पादन से उसके साधनों से अलगा दिया जाता है, जमीन और पूंजी तक उनकी पहुंच नहीं रह जाती उनके आर्थिक पुनरुत्पादन के हालात बदल जाते हैं । अब वे जीने के लिए अपनी फसलों या दस्तकारी पर भरोसा नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें भी अब अपने उपभोग की वस्तुओं को बाजार से खरीदना पड़ता है । इस खरीदारी के लिए उन्हें धन उपार्जित करने का तरीका खोजना पड़ता है । धन की प्राप्ति के लिए उन्हें उत्पादन के साधनों के मालिकान यानी पूंजीपतियों के पास काम करना पड़ता है । कहने का तात्पर्य यह भी है कि पूंजीवाद के साथ ही खास तरह की वर्ग संरचना का भी आगमन होता है । इसमें उत्पादन के बुनियादी साधनों पर कब्जा जमाये लोगों का छोटा समूह एक ओर होता है जिन्हें पूंजीपति कहा जाता है । दूसरी ओर विशाल बहुसंख्या होती है जिनके पास इन पूंजीपतियों से रोजगार मांगने के अलावे कोई चारा नहीं होता । इसी समूह को मजदूर वर्ग कहा जाता है । इसी वर्ग व्यवस्था के चलते सभी लोग बाजार पर पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं । इन दोनों वर्गों के निर्माण से बाजार समूचे समाज में व्याप्त हो जाता है ।

व्यापक आबादी से उत्पादन के साधन छीनकर दो मामलों में बाजार का निर्माण होता है । रोजगार की खोज के कारण श्रम बाजार पैदा होता है । पूंजी के मालिकान किसी वस्तु के उत्पादन के लिए इस बाजार श्रमिक ला सकते हैं । दूसरी ओर ये श्रमिक अपने उपभोग के लिए वस्तुओं की खरीदारी करते हैं तो उनके द्वारा उत्पादित वस्तुओं का बाजार भी बन जाता है । इससे पहले यह बाजार नहीं था क्योंकि लोग निजी उपभोग के लिए अपने ही उत्पादन के साधनों पर निर्भर थे । इन दोनों मामलों में बाजार का अस्तित्व पहले या तो था ही नहीं या बहुत ही कम था । इस बाजार के हाशिये पर होने का कारण निजी संपत्ति का अभाव था और अधिकांश आबादी को जमीन से खदेड़कर मुट्ठी भर लोग उत्पादन और उपभोग के फैसले लेने का अधिकार हथियाकर अर्थतंत्र के नियंता बन जाते हैं ।

स्पष्ट है कि पूंजीवादी व्यवस्था में अधिकांश लोगों को दो वर्गों में बांट दिया जाता है । उत्पादन पर पूंजीपतियों का नियंत्रण हो जाता है जो वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लिए मजदूरों को नियुक्त करते हैं और उन्हें बाजार में माल के बतौर बेचते हैं । इस बिक्री से दोनों को आमदनी होती है । इस आमदनी की प्रक्रिया को समझाने के लिए लेखक ने मार्क्स के अर्थशास्त्र का सहारा लिया है ।                                                                                                                                                                            

Sunday, October 8, 2023

पूंजीवाद की वर्तमान स्थिति

 

                      

                                                        

2023 में वर्सो से कोस्तास लापाविस्तास और एरेन्सेप राइटिंग कलेक्टिव की किताब ‘द स्टेट आफ़ कैपिटलिज्म: इकोनामी, सोसाइटी, ऐंड हेजेमनी’ का प्रकाशन हुआ । इस किताब की शुरुआत वर्तमान खतरनाक हालात यानी कोरोना से हुई है जिससे समूची दुनिया में भारी समाजार्थिक और राजनीतिक उथल पुथल हुई । अर्थतंत्र और समाज के लिए सेहत संबंधी आपातकाल का माहौल पैदा हो गया और सरकारों की भूमिका अप्रत्याशित रूप से प्रमुख हो गयी । उसके बाद रूस और यूक्रेन का युद्ध तथा चीन और अमेरिका के बीच भूराजनीतिक तनाव का समय आया । इस तरह वर्तमान सदी के दूसरे दशक के आरम्भ को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर कोरोना के चलते सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के साथ जोड़कर देखा जा सकता है । सोवियत खेमे के पतन के तीन दशक बाद दुनिया भर में प्रभावी पूंजीवादी संबंधों ने भयानक सामाजिक तनावों और प्रभुत्व की नयी तनातनी को जन्म दिया है । इस दौरान वित्तीय संकट के अतिरिक्त अमेरिका द्वारा छेड़े गये तमाम युद्धों से भी दुनिया त्रस्त रही । कोरोना और यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक अस्थिरता को तेज कर दिया है ।

बहरहाल इस उथल पुथल की जड़ पूंजीवादी संचय में है । असल में हालिया वित्तीय संकट के बाद का समय अनिश्चय का समय रहा है जब ग्राम्शी की शब्दावली में पुराने की मौत हो रही है लेकिन नये का जन्म नहीं हो पा रहा है । दुनिया भर के अर्थतंत्रों में उत्पादन की गिरावट और सर्वभक्षी वित्तीय प्रभुत्व नजर आ रहा है । वित्तीकरण की मजबूती की वजह से सरकारी नीतियों का सबसे अधिक लाभ यही क्षेत्र उठा रहा है । इसके कारण मुट्ठी भर अमीरों के हाथ में अकूत संपदा का संकेंद्रण हो रहा है । विकसित पूंजीवादी देशों में वृद्धि सुस्त पड़ गयी है, रोजगार के अवसर क्षीण हो रहे हैं, गरीबी खत्म होने का नाम नहीं ले रही जबकि आमदनी की खाई चौड़ी होती जा रही है जिससे सामाजिक दरारें बड़ी हो रही हैं । इस तरह नवउदारवादी वित्तीय पूंजीवाद चार दशक की यात्रा के बाद थकान से भरा हुआ प्रतीत हो रहा है ।

कोरोना के चलते पगारजीवी श्रम और भुगतान रहित हाड़तोड़ पुनरुत्पादक श्रम के बीच का अंतर भी उभर आया है । साफ हो गया है कि विकसित पूंजीवादी समाजों को जिंदा रहने के लिए किस तरह के काम जरूरी हैं और इन्हें किस हद तक औरतों तथा अल्पसंख्यक कामगारों द्वारा संपन्न किया जाता है । इस दौरान कार्यस्थल पर स्त्रियों के लिए खड़े अवरोधों के विरुद्ध नारीवादियों के दशकों लम्बे संघर्ष बेकार सिद्ध हुए क्योंकि उन पर घरों के भीतर पुनरुत्पादक काम थोप दिये गये और घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी हुई । विश्व अर्थतंत्र के हाशिये पर पूंजीवादी संचय के नये केंद्र उभर आये । इससे आर्थिक गतिविधियों में वैश्विक स्तर पर फिर से नया संतुलन बनाना पड़ा । हाशिये के देशों का जब विश्व अर्थतंत्र में एकीकरण किया गया तो उत्पादन, व्यापार और वित्त के मामलों में नये संजाल भी स्थापित हुए । इसी समय पूंजीवाद के वैश्विक प्रसार ने पर्यावरण पर कहर बरपा दिया । मुनाफ़े की दौड़ में संचालित अर्थतंत्र के हाथों मनुष्यता और प्रकृति के बीच बने विध्वंसक रिश्ते की ओर भी नये सबूतों के कारण लोगों की नजर गयी ।

हालिया वित्तीय संकट के बाद से ही केंद्र और हाशियों के पूंजीवादी अर्थतंत्र राज्य पर अधिकाधिक निर्भर होते गये थे । कोरोना संकट का यह भी विशेष पहलू था कि राज्य आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करता हुआ दिखा और अर्थतंत्र राजकीय सहायता के मुखापेक्षी हुए । नीति और विचारों के मामले में दशकों तक नवउदारवाद का ढिंढोरा पीटने वाले भी मान गये की शासकीय बैसाखी के बिना टिकाऊ पूंजीवादी संचय सम्भव नहीं है । अर्थतंत्र के साथ राज्य की संलग्नता जितना ही मजबूत होती गयी उतना ही अधिक मुट्ठी भर पूंजीपतियों ने राजसत्ता पर अपनी जकड़बंदी बढ़ायी । लोकतंत्र की संस्थाओं को लकवा मारता गया और कामगारों तथा स्थानीय समुदायों को राजनीतिक जीवन में खींच लाने वाले मध्यवर्ती तंतु टूटते गये । मुख्य धारा की राजनीति विफलता के कारण अप्रासंगिक हो चली और जनता की संप्रभुता को अर्थहीन बना दिया गया है ।

इन सबके बावजूद पूंजीवादी संचय के किसी नये और गतिमान दौर में प्रवेश का कोई सबूत नहीं मिलता । नवउदारवादी वित्तीय पूंजीवाद में किसी गहरे बदलाव की आशा बेकार है । सत्ता की कुंजी खरबपति कुबेरों के हाथ में सुरक्षित है । इस ठहराव के परिणाम पूरी दुनिया में प्रत्यक्ष हैं । सोवियत खेमे के पतन के बाद वैश्विक स्तर पर अमेरिकी प्रभुत्व कायम हो गया और अब यह अब तक का सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य बन गया है । बहरहाल यह अमेरिकी प्रभुत्व ढलान पर है और यूक्रेन युद्ध के साथ टकराव का नया दौर शुरू हुआ है । नवउदारवादी उभार के समय प्रभुत्व और साम्राज्यवाद की चालक ताकतें बहुराष्ट्रीय निगम थे जो वैश्विक उत्पादन का जाल बुन रहे थे और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान थे जो विभिन्न देशों के अर्थतंत्रों में जबरिया प्रवेश कर रहे थे । उस समय अमेरिका ने सबसे आगे बढ़कर ऐसा सांस्थानिक ढांचा खड़ा किया था जो निजी पूंजी के मुनाफ़े के लिए सर्वाधिक आक्रामक भूमिका निभा रहा था । इसके बल पर उसने सारी दुनिया के अर्थतंत्र पर प्रभुत्व कायम किया और विकसित देशों से समर्पण कराया तथा हाशिये पर कब्जा जमाया । इसमें सबसे बड़ी भूमिका उसकी मुद्रा डालर की केंद्रीयता ने निभायी ।

अंतहीन युद्धों ने उसकी इस आर्थिक प्रभुता के लिए समस्या पैदा कर दी । पूंजीवादी संचय के जो नये केंद्र खासकर एशिया में उभरे थे वहां राज्य पर निर्भरता बहुत अधिक थी । इस स्थिति का लाभ उठाकर चीन ने अमेरिकी नेतृत्व में कायम ढांचे को अपने राष्ट्रीय हितों में प्रभावित करना शुरू किया । बहरहाल मानवता के लिए इसके खतरे बहुत अधिक थे क्योंकि प्रभुत्व सैन्य शक्ति के साथ ही आर्थिक और वैचारिक शक्ति पर भी निर्भर था । यूक्रेन पर 2022 के हमले के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने रूस को विश्व अर्थतंत्र के सांस्थानिक ढांचे से बाहर निकालने के लिए अप्रत्याशित कदम उठाये । इसमें विश्व मुद्रा के रूप में कार्यरत डालर की भी मदद ली गयी । इसके ही चलते चीन और अन्य शक्तियों ने वैकल्पिक राह खोजनी शुरू की ।

इस कशमकश में अमेरिका बिना लड़े अपना प्रभुत्व नहीं छोड़ेगा । नवउदारवादी वित्तीकरण की सांस कमजोर पड़ने के बावजूद इसका मुखिया अमेरिका अपार आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक संसाधनों पर कब्जा किए बैठा है । नतीजतन इसका प्रतिपक्षी गंठजोड़ भी आगामी वर्षों में सैनिक शक्ति हासिल करने की कोशिश करेगा । उसका प्रयास पारम्परिक हथियारों के साथ ही आणविक हथियारों के मामले में भी मजबूती हासिल करने पर होगा । इस वजह से ही मनुष्यता के लिए आगामी समय खतरों से भरा नजर आ रहा है ।

कोरोना के दौरान पूंजीवादी संबंधों की विफलता और राज्य की प्रमुखता के कारण सामाजिक प्रतिक्रिया भी देखने में आयी । शासकीय अधिकारियों ने विकसित देशों में शत्रुता और भय की भावना को जन्म दिया । यहां तक कि आम लोगों की स्वतंत्रता और अधिकारों पर बंदिश भी लगायी गयी । हाशिये के देशों में नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा करने में राज्य की अक्षमता ने दूसरी तरह की प्रतिक्रिया को जन्म दिया । मीडिया पर कारपोरेट घरानों के कब्जे और एक ही किस्म की दमघोंटू बहसों की तीखी आलोचना भी विकसित देशों में हुई । इस तरह कोरोना जनित सामाजिक वातावरण बौद्धिक सरोकारों के केंद्र में रहा ।

दुर्भाग्य से संकट के इस वातावरण में पूंजीवाद की प्रखर विरोधी और ताकतवर आवाज होने के बावजूद वामपंथ कहीं नजर नहीं आया । पूंजीवाद की आलोचना प्रस्तुत करने से आगे जाकर वह कामगार लोगों के अनुभव पर आधारित क्रांतिकारी बदलाव का सपना खड़ा करने से चूक गया । कामगार लोगों की उम्मीदों, जरूरतों और आशंकाओं को सीधी सादी भाषा में व्यक्त करना भी उससे नहीं हुआ । विकसित देशों में मजदूरों और गरीबों के बीच वामपंथ की जड़ भी कमजोर हुई जिसके कारण राजनीतिक तूफान में वह अडिग न रह सका । नवउदारवादी वित्तीय पूंजीवाद की थकान और प्रभुत्व के लिए बढ़ते टकराव के माहौल में वामपंथ को नये प्रस्ताव करने होंगे । ऐसी आर्थिक रणनीतियों की जरूरत है जिसमें सरकारी निवेश की बदौलत रोजगार में बढ़ोत्तरी हो, तमाम कामगारों को सम्मानजनक आजीविका सुलभ हो और कर्ज तथा विषमता से राहत मिले । धन कुबेरों की संपत्ति पर उनके अधिकार को चुनौती दी जाए, निजी पर सामाजिक और व्यक्ति पर समूह की बरतरी के पक्ष में माहौल बनाया जाए । इनके लिए लोकतंत्र और जनता की संप्रभुता की फिर से स्थापना अत्यंत आवश्यक है । साथ ही शांति और समता के लिए सुसंगत संघर्ष भी चलाना होगा ।

इसी परिप्रेक्ष्य में वर्तमान किताब में वित्तीय संकट के बाद से ठहराव में कार्यरत शक्तियों की छानबीन विभिन्न अनुशासनों की नजर से की गयी है । इसमें मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र का नजरिया अपनाया गया है लेकिन समकालीन पूंजीवाद को समझने की अन्य दृष्टियों से कोई परहेज नहीं बरता गया है । वामपंथ की राजनीतिक धारा को मजबूत करके उसका मुकाबला करना प्रमुख सरोकार है । पूंजीवाद के विरोध और उसको उखाड़ फेंकने के मकसद से राज्य, उसके निकायों, विभिन्न संस्थाओं समेत तमाम राजनीतिक पार्टियों की समीक्षा की गयी है । इसमें पिछले अनेक दशकों में पूंजीवाद के रूपांतरण पर उपलब्ध सामग्री से प्रचुर सहायता मिली है और सार्वजनिक स्तर पर मौजूद राजनीतिक कर्ताओं के बयानों की भी मदद ली गयी है । यह कार्यभार बहुमुखी और विस्तृत होने की वजह से संयुक्त ही हो सकता था । किताब सामूहिक लेखन का नतीजा है जिसमें बहुतेरे किस्म के ज्ञान और अनुभव को समवेत स्वर में बदला गया है । इसलिए समूची किताब की जवाबदेही भी सामूहिक रूप से स्वीकार की गयी है ।

किताब के तीन हिस्से हैं । पहले हिस्से में कोरोना के समाजार्थिक और राजनीतिक आयामों का विश्लेषण किया गया है । दूसरे हिस्से में समकालीन पूंजीवाद में कोरोना के दौरान देखी गयी राज्य की असाधारण भूमिका को परखा गया है । इसके तहत विकसित पूंजीवादी देशों में पूंजी संचय की प्रक्रिया का विवेचन करते हुए वित्तीय संकट के बाद उत्पादन की गिरावट और वित्तीकरण के बदलाव पर खास ध्यान दिया गया है । राज्य की भूमिका को राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों के संदर्भ में तथा अर्थतंत्र पर राजकीय नियंत्रण के असर के लिहाज से देखा गया है । 2020 दशक की उथल पुथल केवल विकसित देशों तक ही सीमित नहीं रही और विश्व अर्थतंत्र में भी फैल गयी इसलिए तीसरे हिस्से में पूंजी संचय के अंतर्राष्ट्रीय आयामों पर ध्यान दिया गया है । इसके तहत विश्व अर्थतंत्र में कार्यरत वित्तेतर व्यवसाय, वित्तीय संस्थानों और राज्य की अंत:क्रिया का विश्लेषण हुआ है । लेखकों का मानना है कि वर्तमान आर्थिक गतिविधियों में प्रभुत्व और साम्राज्यवाद समाये हुए हैं तथा दुनिया भर में केंद्र और हाशिये के बीच विभाजन को लगातार परिभाषित कर रहे हैं । समकालीन पूंजीवादी प्रभुत्व और साम्राज्यवाद को अंतर्राष्ट्रीय उत्पादन और वैश्विक वित्त के आक्रामक गंठजोड़ से सहारा मिल रहा है । इसी हिस्से में चीन और यूरोपीय संघ की ओर से प्रभुत्व के मामले में खींचातानी का भी वर्णन किया गया है । उपसंहार में वैकल्पिक समाजार्थिक और राजनीतिक तरीकों का जिक्र किया गया है जिससे वर्तमान ठहराव से बाहर निकलते हुए वाम की ओर गति हो ।  दुनिया को बदलने की ताकत कामगारों में है लेकिन उसके लिए सड़े गले पूंजीवादी संबंधों का खात्मा जरूरी है । इसके लिए इन संबंधों की सही समझ पूर्वशर्त है ।