Monday, December 21, 2015

इक्कीसवीं सदी के समाजवाद का गायक

            
                                            
वीरेन डंगवाल की कविता को इसी तरह से देखना संभव है । उन्हें तो असल में महज कवि के रूप में देखना भी मुश्किल है । उनकी कविता गहरे स्तर पर उनकी वैचारिक समझ को अभिव्यक्त करती है । वे लेखन को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से अलगाते नहीं थे । इसलिए उनकी कविता, उनके विचार और उनकी सामाजिकता आपस में घनिष्ठ तौर पर जुड़े हुए हैं । थे लिखने की हिम्मत नहीं हो रही । किसी की भी अनुपस्थिति बहुत देर तक बोलती रहती है खासकर जब लगातार का मिलना न होते हुए भी साथ चलने का अहसास होता रहा हो । वैसे भी वे मुश्किल में काम आने वाले इन्सान थे, रोज के मददगार नहीं ।
उनसे पहली बार मिलने की जो याद है उससे पहले भी मिलना हुआ था ऐसा लगता है तब मेरी उम्र सोलह के आसपास रही होगी । आई पी एफ़ का पहला राज्य सम्मेलन बरेली में होना था । स्थान था बरेली कालेज । दिल्ली में हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में आनंद गया था । हसरत भरे दिल से बनारस रेलवे स्टेशन पर काशी विश्वनाथ में बिठाकर विदा किया था । राज्य सम्मेलन में गाजीपुर के कार्यकर्ताओं की टोली के साथ जाना था । तब पैसे कहां होते थे! बनारस बरेली पैसेन्जर में बिना टिकट मैं, रामविलास, हरिबंशी मास्टर साहब और एकाध अन्य लोग चले । संख्या पांच की थी क्योंकि टी टी को पचीस रुपए घूस दिया गया था । बहरहाल बरेली रात को ट्रेन से उतरकर बाहर लगे बैनर तले सभी लेट गए । अन्य जगहों से आए प्रतिभागी भी वहीं थे । सुबह सबको जुलूस बनाकर सम्मेलन स्थल पहुंचना था । रात में तीसेक साल का एक नौजवान कुछ और वालंटियरों के साथ मिलने आया । हमने समझा शायद यह देखने के लिए कि कहां कहां से लोग आ गए हैं संगठन के साथियों ने भेजा होगा । वे लोग उत्सुकता के साथ काम-धाम के बारे में जानकारी ले रहे थे । कभी जिक्र करके साफ नहीं किया लेकिन संदेह होता है कि वह नौजवान वीरेन थे ।
जबकी याद है वहां से शुरू करना सही होगा । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध के लिए ठहरने की सारी संभावनाओं को खत्म करके शोध जमा करने के बाद छात्रावास खाली करना था । विवाह हो चुका था इसलिए विवाहितों के छात्रावास में ठाट से रहता था । दिल्ली में रुकने की संभावना आम तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के कालेजों में अध्यापन के अवसर से पैदा होती है लेकिन वह रास्ता हम जे एन यू वालों के लिए बंद माना जाता था और अनुभव से भी इसी की पुष्टि होती थी । हमसे पहले पुरुषोत्तम अग्रवाल और वीरभारत तलवार ने वहां प्रवेश पाया था लेकिन उनकी प्रतिभा विशेष थी इसलिए वापस जे एन यू आने में सफल हुए । एक नियुक्ति जे एन यू में भी होनी थी लेकिन उसमें हमारे एक अन्य सहपाठी की प्रतिभा काम आई । राजस्थान के कालेजों के लिए अजमेर में घातक साक्षात्कार हो चुका था । इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सिफारिश के मुकाबले अन्य चीजों का जोर रहा । इस महाकाव्यात्मक संग्राम का निचोड़ यह था कि स्थापित प्रोफ़ेसरान अपनी बिरादरी में घुसने नहीं देंगे । तो पत्रकारिता में हाथ आजमाते हैं! आनंद दिल्ली आ चुके थे । आज तक वाले एस पी सिंह से जनमत में मुलाकात हो चुकी थी । आनंद के साथ नौकरी मांगने गया । उन्होंने पत्रकारिता के लिहाजन कुछ अधिक ही शिक्षित होने की बात कहकर सम्मानजनक तरीके से वापस किया । लेकिन राजेश रपरिया से बात करके अमर उजाला भेजा । उनके दिल्ली ब्यूरो के एकाध चक्कर काटने के बाद उन्होंने बरेली भेजा । वीरेन जी से फोन पर बात की और बस से रात भर सफर करके सुबह बरेली पहुंचा । बस भोर में पहुंच गई थी ।
बस स्टेशन पर ही कपड़े बदले और वीरेन के घर पहुंचा दिल्ली से चलते वक्त श्याम बिहारी राय से आगामी जीवन में बोरियत का अनुमान करके हिन्दी अनुवाद के लिए रवीद्रनाथ ठाकुर के शिक्षा चिंतन के बारे में एल्महर्स्ट की किताबपायनियर इन एजुकेशनले लिया था वीरेन से बातें होती रहीं शाम को अखबार के दफ़्तर उन्हीं के साथ गया उसी दिन नीचे संपादकीय विभाग में काम शुरू कर दिया रात हो जाने पर पैदल घर आता एकाध दिन बाद वीरेन नीचे देखने आए तो अंग्रेजी हिन्दी शब्दकोश लेकर किसी खबर का अनुवाद कर रहा था घर पहुंचने पर वीरेन जागते हुए मिले पहुंचते ही हड़काने लगे बोले इलाहाबाद जाओ मेरी नियुक्ति कालेज में अध्यापन हेतु हो चुकी थी दूसरे दिन स्कूटी से रेलवे स्टेशन छोड़ने आए साथ में एक कुर्ता, एक टी शर्ट, विनोद कुमार शुक्ल का एक कहानी संग्रहमहाविद्यालयदिया मजाक में पूछा कि दस दिन का वेतन लोगे मना कर दिया दस दिन मजेदार बीते थे उन्होंने कुछ कविताएं सुनाई थीं मैंने राय देने का बचपना किया था उसी समय उन्होंने बताया कि कविताएं वे कहीं भेजते नहीं, दोस्त मित्र ले जाते हैं मंगलेश वाली कविता जमी भी थी । जन संस्कृति मंच और जे एन यू में हिंदी का शोधार्थी होने के बावजूद साहित्य के मुकाबले राजनीति में अधिक रुचि थी इसलिए शुरू में तालमेल बिठाने में मेरी ओर से दिक्कत आई । लेकिन फिर साहित्य के समकालीन वातावरण से परिचिति का आरंभ भी वहीं से हुआ जिसके बिना दोस्तों के बीच उजबक जैसा बैठा रहना पड़ता था । कविता में गोरख पांडे से आगे बढ़ने को मन तैयार नहीं होता था । उन्हीं दस दिनों के संग की करामात थी कि कविता सराहने के लिए पढ़ने की कोशिश करते करते कान कुछ अभ्यस्त हो चले ।
बगल में शाहजहांपुर में नौकरी शुरू की थी कभी किसी बहाने वे जाते, कभी किसी बहाने मैं चला जाता बहुत नहीं तो भी इस तरह का मिलना जुलना दसेक बार हुआ होगा । इन मुलाकातों में साझा परिचितों के बारे में ढेर सारी बातें इसलिए होतीं क्योंकि मुझे लोगों के बारे में रुख तय करने में हमेशा से समस्या होती रही है । मैं अपनी राय बताता और उनसे मुहर लगवाता । क्षुद्रता से उन्हें बहुत चिढ़ थी । दिखावा बेहद नापसंद । टुच्चई को वे सीधे पहचान जाते । उन्हें निकट के लोगों पर भी राय कायम करने में कृपा करते हुए नहीं पाया । व्यक्तियों के बारे में धारणा जाहिर करने के लिए इतने सटीक शब्दों का इस्तेमाल और किसी को करते नहीं सुना । उदाहरण देना उचित नहीं जान पड़ता । जैसे सामाजिक किस्म के वे आदमी थे उसमें एक बड़ी मंडली उनके परिचितों की थी । उनमें से कुछ सीढ़ियां भी चढ़े । अपने ऐसे परिचितों का छोटी मोटी सुविधाओं के लिए लाभ तो वे ले लेते, खुद से अधिक दूसरों के काम करवाने के लिए, लेकिन इन लोगों को लेकर उन्हें कोई मुगालता नहीं रहता । बगल का जिला होने से कुछ लोग साझा परिचित थे । वे उन्हें पहले से जानते थे मैं हाल में पहुंचा था इसलिए जानकारी जरूरी थी । भाषा प्रयोग के मामले में सधी अचूकता उनमें थी और आश्चर्यजनक रूप से वाचिक स्तर पर भी । इसका एक निजी उदाहरण । सिल्चर के साथी कृष्णमोहन झा कवि विनोद कुमार शुक्ल पर कोई निबंध लिखना चाहते थे । छोटी छोटी चीजों का वैभव उजागर करने की उनकी खूबी व्यक्त करने के लिए सटीक शब्द नहीं मिल रहा था तब वीरेन केनगण्यशब्द ने राह दिखाई । पता नहीं वह निबंध लिखा गया या नहीं ! वीरेन के यहां कथ्य की अभिव्यक्ति के लिए इतनी बहुस्तरीय भाषा का बरताव हुआ है कि इसे सृजनात्मक भाषिक साधना ही कहा जा सकता है ।
कभी उन्होंने कहा नहीं लेकिन हिंदी कविता की हजार साल की समूची परंपरा के साथ उनका बेहद जीवंत संवाद था । एक बार उनके साथ कालेज जाना हुआ था । मुझे विभाग के कार्यालय में बिठाकर वे क्लास लेने चले गए । हिंदी के विभाग आम तौर पर ऊब भरे होते हैं, सो मैं बाहर निकल आया । क्लास में बीसलदेव रासो पढ़ा रहे थे । आवाज बाहर तक आ रही थी । इस आवाज पर उन्हें अभिमान था । नजरुल के विद्रोही की आवृत्ति से मैं बहुत प्रभावित था । प्रस्तावित किया कि हिंदी कविताओं के वैसे पाठ के कैसेट बाजार में होने चाहिए । केदार नाथ सिंह की कविता के अपने एक पाठ का उनसे जिक्र किया और थोड़ा इतराकर कहा कि उन्होंने मेरे पाठ की तारीफ़ की थी । वीरेन ने खुद के पाठ के लिए कहा कि मैं भी अच्छा पाठ करता हूं । प्रमाण बहुत बाद में दिल्ली में शमशेर पर हुई एक गोष्ठी में उनके पाठ को सुनकर मिला ।   
बीसलदेव रासो से लेकर शमशेर तक की कविता से उनके संवाद के साथ ही उत्तराखंड की बोलियों और संस्कृति के साथ उनके रिश्ते को समझे बिना भाषा के साथ तोड़ फोड़ की उनकी क्षमता को भी समझना मुश्किल है । उनका साहित्यिक संवाद नाजिम हिकमत और पाब्लो नेरुदा जैसे विश्व कवियों से भी था । मैं एक समय नेरुदा की आत्मकथा के नशे में था और मूल रूप से जिसे जादुई यथार्थवाद कहा जाता है वह किस तरह लैटिन अमेरिका का यथार्थ है इसे समझने के लिए उसका संदर्भ दे रहा था । वीरेन ने कहा कि उसमें ऐंद्रिकता बहुत है । तब मैंने इस बात की ओर ध्यान दिया कि खुद वीरेन की कविता की भी यह बड़ी विशेषता है । मनुष्य की खुशी को व्यक्त करने के उनकी सारी आकांक्षाएं अत्यंत ऐंद्रिक हैं । यह चीज भी उन्होंने चार चनों को अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष मानने वाले और तृप्ति को छप्पन भोग से तुलनीय समझने की काव्य परंपरा से ली है । घुटनों-घुटनों भात हो मालिक/ और कमर कमर तक दाल’- सुख की ऐसी कल्पना का स्रोत लोक के साथ परंपरा भी है । वाम धारा की कविता के अतिरिक्त वे कलावाद के कारीगरों से भी टक्कर लेते थे । इस व्यापक स्रोत से उन्होंने इस तरह शक्ति खींची कि व्यर्थ से भी अर्थ पैदा कर लेते थे । कभी-कभी तो ध्वनि मात्र को भी वे सार्थक अभिव्यक्ति में ढाल लेते थे । लिखा उन्होंने कम लेकिन जो भी लिखा उसे अन्य कोई शायद ही लिख सकता था ।
उदारीकरण के बाद की दुनिया में पोंगापंथ और अत्याधुनिकता के घातक मेल को उनकी भाषा ही बता सकी है और इस मामले में वे हिन्दी कविता में अनुपम हैं । विचार की काव्यात्मक अभिव्यक्ति उनकी अनूठी विशेषता है । इस मामले में उन्होंने ऐसे कवियों से टक्कर ली है जो मार्क्सवाद को पचा गए हैं । विचार तेल की तरह सतह पर तैरता हुआ नहीं पोर पोर समाया हुआ । भूमंडलीकरण के विरोध के नाम पर वे स्वदेशी के अंध समर्थन में नहीं उतरते । उनकी तीखी आलोचनात्मक निगाह की ज़द से कोई नहीं छूटता । लांछन, अपमान और वंचना के जीवन प्रसंग लाकर वे कविता की दुनिया को समृद्ध तो करते ही हैं, लांछित समुदाय के भीतर खुद को शामिल भी कर लेते हैं । जिनसे वे प्रेम करते हैं, भरपूर करते हैं, बल्कि अलग रहकर प्रेम करने की बजाए उनमें से ही एक हो जाते हैं । मसलन वे ऐसे बच्चे हैं जिसे नेकर में टट्टी हो गई थी । वे उस बच्चे के दादा हैं जो अपने नन्हे अंगों को खींचता रहता है । मामूली प्रसंगों से दार्शनिक ऊंचाई तक कविता को एक ही पंक्ति में सहजता के साथ उठा लेते हैं । इसके लिए शब्दों को वे उनकी पूरी अनगढ़ता के साथ ले आते हैं और वाक्य की लय में इस तरह से बिठाते हैं कि लय टूटती भी नहीं लेकिन अर्थ को आंकने के लिए ठहरना लाजिमी हो जाता है ।
अगर नागार्जुन का स्थायी भाव प्रतिहिंसा है तो वीरेन डंगवाल का स्थायी भाव नफरत है । वे चूंकि मनुष्य से टूटकर प्यार करते हैं इसलिए मानव विरोधी ताकतों से नफरत उनके भीतर भरी हुई है । मनुष्य के प्रति उनका प्रेम उसके हंसी-खुशी भरे जीवन की आकांक्षा को स्वर देने में व्यक्त हुआ है तो मानव विरोधी ताकतों के प्रति उनकी नफरत प्रकृति वर्णन पर भी हावी हो जाती है । हवा और नदी की पारंपरिक छवियों के मोह को तोड़कर उनके विपरीत छवियों के निर्माण की ताकत उन्हें अपनी इसी चिंता की गहराई से मिलती है ।        

शाहजहांपुर के बाद वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय गया जो उनकी एक कविता की नई कसमों में आता है । असल में वह प्रेमी की झूठी कसमों में से एक कसम है । जाने और एक साल बाद निकाले जाने पर उसकी कव्यात्मक सत्ता का पता चला । उस एक साल पर आधारित संस्मरण उन्होंने पढ़ा था । फिर काफी घूम-घामकर दिल्ली आया । वीरेन भी सेवानिवृत्त होकर दिल्ली रह रहे थे लेकिन खबरें चिकित्सा की अधिक सुनाई पड़तीं । जाकर मिलने की हिम्मत नहीं होती थी । कविताएं पढ़ता रहता था । मेट्रो पर लिखी कविताओं में भी उनकी सौंदर्य पिपासा प्रत्यक्ष है । मौत को मुंह बिराते हुए जीवन का अकुंठ उत्सव ! अस्पताल की खिड़की से मेट्रो तीर की तरह गुजरती दिखाई देती । कुल एक बार प्रेमशंकर के साथ नोएडा गया । चेहरे की ओर देखने से बच रहा था । वीरेन ने पूछा- यह दृश्य तो तुम्हारे लिए नया होगा ? क्या बोलता ! बात बदल दी ।   

Sunday, December 20, 2015

अलका सरावगी के शिल्प की नवीनता का कारण क्या हो सकता है ?

         
                                                                
अलका सरावगी के पहले उपन्यास से ही यह दिखाई देने लगा था कि वे उपन्यास के शिल्प के साथ खिलवाड़ करके पाठक को बांध लेना चाहती हैं । इस नए शिल्प को मेटा-नैरेटिव कहा जा सकता है जिसमें वे कथा के साथ ही कथा की कथा भी बताती चलती हैं । लेकिन सवाल तो यह है कि शिल्प का यह बदलाव यथार्थ के बदलाव को अधिक प्रभावी तरीके से व्यक्त कर पाता है या नहीं ।जानकीदास तेजपाल मैनशनउनका नवीनतम उपन्यास है । इसमें भी उन्होंने शिल्प के स्तर पर प्रयोग की अपनी ही बनाई परम्परा को कायम रखा है । उपन्यास एक आत्मकथा है जो जयगोविन्द नामक पात्र ने अपने को जयदीप के रूप में कल्पित करके लिखी है ।
इस संक्षिप्त धोखे के खुलासे के बाद उपन्यास के वर्ण्य विषय की जानकारी जरूरी है ताकि शिल्प की चर्चा में वह चिंता आंखों से ओझल न हो जाए जिससे यह पूरा उपन्यास आप्लावित है । निर्माण कार्य खासकर शहरों में भवन निर्माण का पागलपन पहले बंबई को लगा था जिसकी हिंसक छवियां पिछले एकाध दशक की माफ़िया केंद्रित बालीवुड फ़िल्मों में थोड़े थोड़े अंतराल पर दिखाई पड़ती रही थीं । उन बरसों में माफ़िया पर बनी ज्यादातर फ़िल्मों में अपराध की दुनिया पुरानी इमारतों से उनके मालिकों को बेदखल करने के लिए बने गिरोहों के इर्द गिर्द घूमती थी । देश की राजधानी दिल्ली को भी यह रोग लगे कुछ दिन बीत गए हैं । यह तथ्य भौतिक और रूपक दोनों ही अर्थों में प्रकट है । स्मार्ट सिटी के नाम से अब तो इसे बाकायदे एक कलात्मक विक्रेय वस्तु में भी बदला जा चुका है । भू-माफ़िया अब अपराधी नहीं, देशभक्त है क्योंकि वह विकास का दूत है । सट्टा बाजार की तरह भविष्य की बढ़त के सहारे वर्तमान को दांव पर लगा देने के लिए जनता को प्रेरित करने का सबसे नया इंद्रजाल है ।
सबसे हाल में यह रोग कलकत्ते को लगा है । सैकड़ों साल पुरानी इमारतों को धराशायी करके अंधाधुंध निर्माण चल रहा है । इस घातक विकास से भारत में आधुनिकता के इस सबसे प्राचीन जीवित स्मारक की सांस घुट रही है । इसी माहौल को अलका सरावगी ने अपने उपन्यास का विषय बनाया है । मानव विरोधी इस नव-उदारवादी समय का प्रतिवाद अलका अपने पहले उपन्यास से ही रचती आ रही हैं । शेष लोगों से इस मामले में उनका फ़र्क यह है कि जहां बाकी लोग इस प्रतिवाद के लिए गरीब और मेहनतकश लोगों का पक्ष चुनते हैं वहीं अलका सरावगी इसके लिए धनाढ्य समुदाय के भीतर से ही बदलाव से परेशान अतीतप्रेमी समुदाय की तरफ से इस हमले का प्रतिकार करती हैं । इस चुनाव से ही उनकी शक्ति और सीमा दोनों निर्धारित होते हैं और उनकी विशेषता भी प्रकट होती है । यही अतीतप्रेम असल में उनके अन्य उपन्यासों की तरह इस उपन्यास के भी शिल्प को प्रभावित करता है । जयगोविन्द को जयदीप का लिखा जो आत्मकथात्मक उपन्यास मिलता है उसमें अधिकतर अतीत की याद है । बीच बीच में वर्तमान दिखाई पड़ता है । पहले उपन्यास में अतीत थोड़ा कम था, इसमें कुछ अधिक ही है ।
कलकत्ता शहर के भीतर का मारवाड़ी समुदाय उनका जाना हुआ है । इस समुदाय के जीवन की परिस्थितियों में आने वाले बदलावों के चलते जीवन मूल्यों में भी बदलाव आते हैं और इनकी कशमकश का जीवंत दस्तावेज उनके उपन्यास हैं । आश्चर्य की बात नहीं कि जब प्रेमचंद को आधुनिकता की चीरफाड़ करनी थी तो ‘गबन’ में इलाहाबाद और कलकत्ता उनकी कथा की रंगभूमि बने । शहर और आधुनिकता के इस रिश्ते को हम अलका सरावगी के इस उपन्यास में कलकत्ता और बंबई तथा अमेरिका तक विस्तारित होते देखते हैं । प्रेमचंद के समय के मुकाबले भारत के मध्य वर्ग के भौतिक क्षितिज में विस्तार भले न हुआ हो, उसके मानसिक क्षितिज में अमेरिका का सपना आ गया है । अलका सरावगी के उपन्यासों में भी क्रमश: यह विकास परिलक्षित हुआ है । अमेरिका नामक यह जगह इतनी वायवीय है कि पूरा देश मानो कोई एक ही स्थान हो । पूरे उपन्यास को पढ़ जाने पर भी पता नहीं चलता कि जयदीप उर्फ़ जयगोविंद उर्फ़ जैग अमेरिका के किस विश्वविद्यालय से दीक्षित है । सिर्फ़ अमेरिका से पढ़कर आए होने का वैभव और दर्द वर्णित हैं । वर्णन तो दर्द का ही है लेकिन इस तरह कि अमेरिका से उसके पढ़े होने का वैभव छलकता रहे । किसी ठोस स्थान के रूप में उभरने की जगह उपन्यास में अमेरिका कल्पना प्रसूत स्वप्नलोक की तरह सामने आता है । उपन्यास के पात्र के मन में उसकी देवलोक सरीखी छवि हो तो कोई बात नहीं लेकिन लगता है कि उपन्यासकार के लिए भी वह जगह संज्ञा न होकर विशेषण है । इसी विशेषण से जयदीप की संबद्धता उपन्यास के पहले पन्ने से लेकर आखिरी पन्ने तक छाई हुई है । उसकी त्रासदी से लेकर सफलता तक सब कुछ जयदीप के अमेरिका से शिक्षित होने की वजह से उसके खाते में दर्ज हुए हैं ।
उपन्यास में जयगोविंद को जीवन के अंतिम दिनों में बेटे के पास बम्बई जाने के लिए सामान बांधते समय एक लिफ़ाफ़ा मिलता है जिसमें युवावस्था में लिखे एक आत्मकथात्मक उपन्यास के पन्ने मिलते हैं । इन पन्नों में लिखे उस उपन्यास के अलग अलग अध्याय और जयगोविंद का वर्तमान लगातार एक के बाद पाठक के सामने खुलते हैं इसलिए कहानी के गुम हो जाने की आशंका भी बनी रहती है । सुविधा के लिए उपन्यास की छपाई में ऐसी व्यवस्था की गई है कि वर्तमान का अध्याय लगभग आधे पन्ने पर है तो उसके लिखे उपन्यास वाले अध्याय पूरे पन्ने पर हैं । इस तरह शिल्प के क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों में यह भी एक अभिनव प्रयोग है । इससे पहले यह अंतर बताने के लिए कुछेक अंग्रेजी उपन्यासों में अतीत तिरछे अक्षरों में तो वर्तमान सामान्य अक्षरों में छपा होता था । बहुत संभव है यह प्रयोग चल निकले । इससे शिल्प अपने नाम को सार्थक करेगा । अब तक इसका इस्तेमाल कला के अर्थ में किया जाता था ।
जयगोविंद के लिखे उस उपन्यास में जयदीप गुप्ता नामक पात्र मुख्य पात्र है । जयगोविंद ने उस पात्र का नाम जयदीप इसलिए रखा क्योंकि उसकी पत्नी का नाम दीपा था । आधा अपना और आधा पत्नी का-इस तरह उसका कथात्मक नाम हुआ । वह एडवोकेट बाबू का बेटा है । एडवोकेट बाबू का असली नाम किसी को याद नहीं, उनकी पत्नी को भी नहीं । उनका असली नाम सिर्फ़ उनकी खुद की जन्मपत्री में बन्द था, जिससे निकालकर अमेरिका जाते वक्त जयदीप के पासपोर्ट में लिखा गया था ।’  इन एडवोकेट बाबू को बीस साल की उम्र से ही कलकत्ते के विभिन्न इलाकों में राजस्थान के धनी व्यापारियों के लिए प्लाट की खरीदारी में मदद करने का तजुर्बा था । इस अनुभव के चलते सेठ जानकीदास ने अपनी बनवाई इमारत में उनके रहने के लिए दूसरे तल्ले पर तीन कमरे दे दिए थे । चारों ओर तीन-चार मंजिल तक बने कमरों से घिरे आंगन को चौक कहते थे । जिस इमारत में एडवोकेट बाबू को रहने के लिए कमरे मिले उसे तेजपाल मैनशन कहते थे और उसमें दो चौक थे । इन्हीं कमरों में जयदीप का बचपन बीता था । ऊपर नीचे रहने वाले परिवारों के जीवन के रहस्यों के बीच जयदीप जवान हुआ था ।
एडवोकेट बाबू बहुत कम बोलते थे इसलिए उन्होंने सीधे अपना फैसला सुनाया था कि जादवपुर के बाद आगे की पढ़ाई के लिए जयदीप अमेरिका जाएगा तो उनके फैसले पर सवाल उठाने की किसी को हिम्मत नहीं हुई । अमेरिका में जयदीप पढ़ाई के दौरान एक लड़की से मुहब्बत कर बैठा । इसकी भनक घर के लोगों को लग गई तो एडवोकेट बाबू के बीमार होने का बहाना बनाकर उसे कलकत्ते वापस बुला लिया गया । घर में उसकी हिम्मत नहीं पड़ी कि अमेरिका में रिसर्च के अधूरे काम को पूरा करने के लिए किसी से कह सके । मां उसके पास बैठते ही अपनी बीमारियों की बात शुरू कर देतीं । बहनें पिता से बात करने को तैयार नहीं थीं । जब उसने तय किया कि खुद बात करेगा तो पिता के सामने पड़ते ही पिता ने उससे बिड़ला की कार बनाने की कंपनी में नौकरी के लिए इंटरव्यू देने का आदेश दिया । दूसरे दिन उसे नौकरी मिल गई ।
जयदीप की नौकरी के बहाने पुरानी नौकरशाही और काम करने के अमेरिकी तरीके के बीच की कशमकश दर्ज हुई है । इस संघर्ष में लेखिका की सहानुभूति जयदीप के साथ है । इसी बहाने हमारे सामने समकालीन भारत में सतह के नीचे चल रही वह खामोश प्रक्रिया उजागर होती है जिसके जरिए सरकारी सेवाओं को अक्षम साबित करके निजीकरण के पक्ष में मध्यवर्ग का बौद्धिक समर्थन हासिल किया गया । जयदीप को काम से हटाने के लिए पुराने ढर्रे के बाबू लोग अनेक षड़यंत्र करते हैं लेकिन वह न केवल अमेरिका से शिक्षित है बल्कि अमेरिकी पूंजीवाद की जिद और चालाकी भी उसके भीतर समाई हुई है इसलिए न केवल टिका रहता है, बल्कि एक हद तक अपने काम में सफलता भी हासिल करता है लेकिन फिर इस्तीफ़ा दे देता है । इस्तीफ़ा मंजूर नहीं होता और उसे कार बनाने वाली एक नई कंपनी के खुलने की अफ़वाह की सचाई जानने के लिए उस संभावित कंपनी में डालने के लिए आवेदन भरवाया जाता है । पता लगता है कि यह कंपनी नहीं खुलेगी । आखिरकार वह निजी कंसल्टेंसी एजेंसी खोलने का बहाना बनाकर मालिकों से इस्तीफ़ा मंजूर कराने में सक्षम हो जाता है । इस बीच उसका विवाह दीपा से हो जाता है । बिड़ला की कारखाने की नौकरी छोड़कर उसने जूट मिलों में कम्प्यूटर लगाने का काम शुरू किया । काम चल निकला लेकिन बोरे बनाने के लिए प्लास्टिक का उपयोग शुरू होने से जूट मिलें बंद होने लगीं । तरह तरह के काम करने के क्रम में उसने लोहे की खरीद का धंधा शुरू किया तो पुलिस थाने का चक्कर लगाना पड़ा । दीपा के साथ दांपत्य, पिता की मृत्यु, मेट्रो की खुदाई के कारण तेजपाल मैनशन का तिरछा होकर लटक जाना, मेट्रो पीड़ित बंधु एसोसिएशन की ओर से मुआवजे की लंबी लड़ाई के क्रम में कलकत्ते का राजनीतिक अंडरवर्ल्ड, इसी क्रम में युवावस्था के दिनों के नक्सल प्रभाव के कारण पुलिस के हत्थे चढ़े और फिर अनेक उतार चढ़ावों से गुजरकर समाज और राजनीति में समायोजित होने की जद्दो जहद में लगे साथी, बंद होने वाली मिलों की खरीदारी के लिए दलाली और इसके क्रम में राजनीति और व्यापार का आपसी खेल- कुल मिलाकर उपन्यास आकार में छोटा होने के बावजूद व्यापक आयाम समेटे हुए है । सबसे आखीर में तेजपाल मैनशन के किराएदारों को बिल्डिंग माफ़िया की ओर से हिंसक तरीके से एक एक करके भगाया जाता है । मेट्रो के कारण उसका झुक जाना एक संयोग है जिससे पुरानी इमारतों को तोड़कर आलीशान इमारतें बनाकर करोड़ों में उन्हें बेचने का धंधा करने वाले उत्साहित होकर गुंडों के जरिए डरा धमका कर रहनेवालों से खाली कराते हैं । उनसे अकेले मोर्चा लेने वाले जयदीप की यह लड़ाई महाकाव्यात्मक स्वरूप लिए हुए है । वह भी अंत में हार जाता है ।
नक्सल आंदोलन से लेकर नव-उदारवादी आर्थिकी के हमले तक के समय की कथा को खूबसूरती के साथ आकार में छोटे और सुपाठ्य उपन्यास में अलका सरावगी ने बांधा है । इसके लिए उन्होंने अतीत और वर्तमान में निरंतर आवाजाही का नया शिल्प अपनाया है । इस नए शिल्प की प्रस्तुति के लिए उन्होंने छपाई इस तरह कराई है कि पाठक समय के इस अंतराल को महसूस कर सकता है । प्रयोग व्याकुल हिंदी जगत में कथ्य और प्रस्तुति के लिहाह से लोकप्रिय होने की पर्याप्त संभावना इस उपन्यास में है । लेकिन कुल के बावजूद यह सवाल तो रह ही जाता है कि नव-उदारवादी हिंसक आर्थिकी के विरोध में लेखिका ने प्रतिरोध की भूमि मध्यवर्ग के भीतर ही क्यों खोजने की कोशिश की है ?
भाषा के स्तर पर कथा साहित्य की हिंदी ने हमारे मध्यवर्गीय जीवन की पटुता अपना ली है और यह भाषा अलका सरावगी के लेखन में सबसे अधिक प्रत्यक्ष है । एक मुलायम सी सुबोध-सुपाच्य हिंदी हमारी ताकत है या सुविधा से पैदा नमनीयता है इसे सर्व सम्मति के चलते बहस और विवाद का विषय भी नहीं माना जाता ।

     

   


Friday, December 18, 2015

सामंतवाद, वर्ण, जाति और राष्ट्रीयता @ रामविलास शर्मा

          
                                       
(राम विलास शर्मा का यह लेखमार्क्सिस्ट मिससेलेनीके पृष्ठ 111-119 पर प्रकाशित है ।)
   
सामंतवाद शब्द से स्वाभाविक तौर पर दिमाग में ऐसे सामंती भूस्वामी का अस्तित्व उभरता है जो जमीन के बड़े टुकड़े का मालिक हो और उस जमीन पर उसके भूदास उसके लाभ के लिए बगैर पर्याप्त मुआवजे के मेहनत करें बिना सामंती भूस्वामी के सामंती समाज हो सकता है ?
जो लोग यकीन करते हैं कि बिना सामंती भूस्वामी के सामंतवाद नहीं हो सकता वे भी मानते हैं कि सामंती समाज में केवल दो शत्रुतापूर्ण वर्ग- सामंती भूस्वामी और भूदास- नहीं थे बल्कि व्यापारी, हस्तशिल्पी और छोटी जोत के किसान जैसे अन्य सामाजिक समूह भी थे इन सामाजिक समूहों के अस्तित्व की व्याख्या इस मान्यता के आधार पर नहीं हो सकती कि सामंती व्यवस्था के तहत जो उत्पादन संबंध था उसमें सामंती भूस्वामी उत्पादन के साधनों का स्वामी था और उत्पादन में लगे हुए कामगार- भूदास- पर उसका पूरा मालिकाना नहीं था
जिन समाजों में रैयतवाड़ी व्यवस्था प्रचलित थी, जहां बड़े सामंती भूस्वामी मौजूद नहीं थे वे समाज किस सामाजिक व्यवस्था में आएंगे ? उन ग्रामीण समुदायों का चरित्र निरूपण कैसे होगा जहां जमीन साझा थी ?
इन सवालों का सही जवाब सामंती उत्पादन पद्धति की प्रकृति की सही समझदारी के आधार पर ही दिया जा सकता है । एंगेल्स ने कहा हैपूंजीवादी उत्पादन से पहले यानी मध्ययुग में छोटे पैमाने पर उत्पादन आम था । इसका आधार कामगारों का उत्पादन के अपने साधनों पर निजी मालिकाना था । इसका उदाहरण छोटे किसान, स्वतंत्र या भूदास, का कृषि उद्योग और नगर का हस्तशिल्प उद्योग है’ (एंटी-ड्यूरिंग) । सामंती उत्पादन मूल तौर पर छोटे पैमाने का उत्पादन है । ऐसा उत्पादन नगर और देहात दोनों जगह मिलता है । यही विशेषता नगर और देहात को एकल उत्पादन प्रणाली में बांधती है । स्तालिन ने कहा कि सामंतवाद के तहत उत्पादन के साधनों का मालिक सामंती भूस्वामी होता है; एंगेल्स ने कहा कि उत्पादन के साधनों पर कामगारों के निजी मालिकाने के आधार पर छोटे पैमाने का उत्पादन होता था । कौन सही है ?
सामंती उत्पादन पद्धति पुरानी कबीलाई व्यवस्था के गर्भ में विकसित और परिपक्व होती है । इस पद्धति की जरूरत पुराने कबीलाई समाज के आंतरिक और बाहरी दोनों अंतर्विरोधों से पैदा होती है । कोई भी कबीला प्रकृति की मनमर्जी पर हमेशा निर्भर रहकर जीवित नहीं रह सकता; अपने बचाव के लिए इसे उत्पादन की अपनी तकनीक को विकसित करना पड़ता है । प्रकृति और मनूष्य के बीच का यही आंतरिक अंतर्विरोध होता है जो किसी भी कबीले को महज मनुष्यों की जीवन रक्षा के लिए भी सामुदायिक श्रम के स्वर्ग और सतयुग को छोड़ने के लिए बाध्य कर देता है । चूंकि उत्पादन पिछड़ा हुआ था इसलिए जरूरी था कि अलग अलग कबीले केवल आपस में लड़ें नहीं, साझे फायदे के लिए सहयोग भी करें ।
जैसे जैसे उनमें लेनदेन का विकास हुआ, वैसे ही वैसे कबीले के भीतर श्रम विभाजन अनिवार्य होता गया । जिस समाज में श्रम विशिष्टीकरण नहीं हुआ हो उसमें माना जाएगा कि प्रत्येक व्यक्ति हरेक काम समान दक्षता से करेगा । यह स्थिति न तो युद्ध में अच्छी होगी, न ही कबीलों के बीच लेनदेन के लिए । एक कबीले से दूसरे के बीच यही वह बाहरी अंतर्विरोध है जिसने मनुष्य को नई उत्पादन पद्धति की ओर बढ़ने के लिए बाध्य किया । रक्त संबंधों की नातेदारी पर आधारित कबीला उत्पादन के साधनों पर सामुदायिक स्वामित्व के सहारे वस्तुओं का उत्पादन और वितरण सामुदायिक तौर पर करता था लेकिन ऊपर वर्णित अंतर्विरोधों के चलते उसके भीतर ही उत्पादन और वितरण की एक विपरीत व्यवस्था फलने-फूलने लगी । सभी स्त्रियों-पुरुषों द्वारा सभी काम समान दक्षता से करने की बजाय कुछ पुरुषों-स्त्रियों से मांग होने लगी कि वे खास वस्तुओं के उत्पादन में विशेषज्ञता हासिल करें और उन्हें अन्य कबीलों से बेहतर उत्पादित करें ।
उत्पादन की इकाई के बतौर कबीले की जगह परिवार ने ले ली । श्रम विशिष्टीकरण की प्रक्रिया परिवार के भीतर पूरी की जाती और परिवार के सभी सदस्य इस श्रम प्रक्रिया में सहयोग करते । हो सकता है कि परिवार के भीतर और भी श्रम विभाजन होता रहा हो, स्त्रियों और बच्चों को इस प्रक्रिया में खास काम दिए जाते रहे हों लेकिन इस तथ्य में कोई संदेह नहीं कि उत्पादन की नई इकाई परिवार बन गया । श्रम विशिष्टीकरण जितना अधिक होगा बच्चों के लिए उतना ही जरूरी होगा कि वे अपने पिता का व्यवसाय बचपन में ही सीखें । सामंती उत्पादन पद्धति में यही आर्थिक जरूरत थी जिसने जाति व्यवस्था को जन्म दिया । जाति व्यवस्था की खास विशेषता यह है कि बच्चे को पिता के व्यवसाय का अनुसरण करना पड़ता है; और इसीलिए समाज में जितने व्यवसाय होंगे उतनी जातियां बनेंगी ।
श्रम विभाजन से समाज में अवकाशभोगी वर्ग का जन्म होता है । यह वर्ग उत्पादन में सक्रिय भागीदारी नहीं करता है लेकिन इस श्रम की उपज का आंशिक या पूर्ण अधिग्रहण कर लेता है । यह वर्ग या तो मानसिक कर्म करता है, या युद्ध करता है या लेनदेन के काम में लगा रहता है । संस्कृति के अभिरक्षक ब्राह्मण वर्ण बने; युद्धकर्ता क्षत्रिय वर्ण हुए और जो लोग वितरण तथा लेनदेन के काम में लगे हुए थे वे वैश्य वर्ण हुए । शेष जनता, उत्पादक, शारीरिक काम करनेवाले सभी शूद्र वर्ण में शरीक हुए ।
क्षत्रिय वर्ण में बड़े भूस्वामी हो सकते हैं या यह वर्ण ऐसे भी समाज में मौजूद रह सकता है जिसमें बड़े भूस्वामी न हों । नए श्रम विभाजन की मांग थी कि प्रशिक्षित रक्षाकर्मियों का एक खास वर्ग हो जो समाज की रक्षा करे क्योंकि जो लेनदेन के काम में या शारीरिक काम में लगे हुए थे उनके लिए उसी समय युद्ध के काम में लगना आसान नहीं होता । इसी जरूरत के चलते छोटे पैमाने पर उत्पादन वाले समाज में भी क्षत्रिय वर्ण होता था चाहे सामंती भूस्वामी हों या न हों । स्वाभाविक रूप से जहां सामंती भूस्वामी वर्ग होता था वहां इस क्षत्रिय वर्ण की सशस्त्र शक्ति का प्रयोग सामाजिक दमन के लिए और सामंती भूस्वामी वर्ग के वर्ग हितों की रक्षा के लिए भी होता था ।
प्रत्येक सामंती समाज में वर्ण व्यवस्था अपरिहार्य है । चार वर्णों में विभाजन किस हद तक होगा यह उस समाज के विकास के स्तर पर निर्भर है ।
कोई भी पुरानी सामाजिक व्यवस्था नई सामाजिक व्यवस्था के उदय के साथ पूरी तरह गायब नहीं हो जाती । अगर नई सामाजिक व्यवस्था की सहायता के लिए संगठित राजनीतिक पार्टी और उन्नत प्रौद्योगिकी होने के बावजूद समाजवादी समाज में पूंजीवादी अवशेष अब भी बने हुए हैं तो हम समझ सकते हैं कि सामंती समाज में कबीलाई सामाजिक व्यवस्था के अवशेष किस हद तक बचे रहे होंगे ।
कबीला रक्त संबंध की नातेदारी से एकताबद्ध रहता था । ये बंधन जाति के भीतर बने रहे । किसी जाति के सदस्य वही नहीं होते जो किसी खास व्यवसाय में लगे हों बल्कि वे भी होते हैं जो रक्त-संबंध आधारित नातेदारी के बंधन में एक ही भाईबंदी में भी बंधे हों । किसी कबीले का संपर्क जब किसी विकसित सामंती समाज से हुआ होगा तो पूरा का पूरा कबीला अखंड रूप से उसमें समा गया होगा । इसी वजह से भारत में जितने व्यवसाय हैं उससे अधिक जातियां हैं । जाट गूजर या मीणा एक ही कृषि व्यवसाय में लगे हुए हो सकते हैं लेकिन वे अपनी अलग जातिगत पहचान भी बनाए रखेंगे जो कबीलाई युग का अवशेष है ।
कबीले में उत्पादन के साधनों पर सामुदायिक स्वामित्व था । यह साझा स्वामित्व उसी हद तक भंग होता था जिस हद तक नया श्रम विभाजन इसे एकदम अनिवार्य बना देता था । साझा भूमि का अस्तित्व निजी मालिकाने वाली जमीन और चरागाहों के साथ बना रहा था । उत्पादन के जो साधन साझा नहीं थे उन पर परिवार का स्वामित्व था । आधुनिक समाज के पति-पत्नी-बच्चे वाले परिवार के मुकाबले सामंती परिवार काफी बड़ा होता था । इस बड़े परिवार का उत्पादन के साधनों पर सामुदायिक स्वामित्व हो सकता था या कुलपति, पिता या पुत्र, का इस पर निजी स्वामित्व भी हो सकता था । इस तरह संपत्ति के सामंती स्वामित्व के विभिन्न रूप पैदा हुए । पुरानी कबीलाई व्यवस्था के अवशेष संपत्ति के सामंती स्वामित्व के साथ साथ सामुदायिक स्वामित्व की मौजूदगी की व्याख्या कर देते हैं ।
सामंती उत्पादन पद्धति ने पुराने कबीलों को तोड़ा, घुला-मिला दिया और नए सामाजिक ढांचे में पुन: एकताबद्ध किया । यह नया सामाजिक ढांचा राष्ट्रीयता था । पूंजीवादी दौर में राष्ट्रों का निर्माण इन्हीं राष्ट्रीयताओं से हुआ, न कि कबीलों या किसी अन्य नामहीन ढांचे से ।
जैसा बहुत से लोग मानते हैं उस तरह जाति व्यवस्था केवल भारतीय समाज में नहीं थी । किसी न किसी रूप में यह प्रत्येक सामंती समाज में पाई जाती है । प्राचीन यूनान की तुलना में प्राचीन मिस्र में सामंती उत्पादन पद्धति अधिक विकसित थी और नतीजतन वहां सामाजिक समूहों ने जाति के रूप में अधिक साफ तौर पर ठोस आकार ग्रहण किया था । जब प्लेटो ने सोचा कि समाज को सबसे अच्छे तरीके से किस तरह संगठित किया जाए तो आदर्श के रूप में उसे मिस्र नजर आया । मार्क्स ने लिखाप्लेटो के रिपब्लिक में राज्य के निर्माणकर्ता सिद्धांत के रूप में जितना श्रम विभाजन पर विचार किया गया है वह महज मिस्र की जाति व्यवस्था का एथेनीय आदर्शीकरण है । एक उद्यमशील देश के आदर्श के बतौर मिस्र ने प्लेटो के बहुतेरे समकालीनों को प्रभावित किया था जिनमें आइसोक्रेटीज भी थे और उसका यह महत्व रोमन साम्राज्य के ग्रीकों तक के लिए बना हुआ था’ (पूंजी, खंड 1) । आइसोक्रेटीज का मानना था कि मिस्र के देवता बुसिरिस ने लोगों को जातियों में बांटा है और ‘आदेश दिया है कि कोई भी व्यवसाय एक ही व्यक्ति हमेशा करे क्योंकि वह जानता है कि जो भी अपना पेशा बदलता है वह किसी में भी कुशल नहीं रह पाता; लेकिन जो एक ही काम से चिपके रहते हैं वे उसे सर्वोच्च पूर्णता प्रदान करते हैं’; और आइसोक्रेटीज को लगा कि इस श्रम विभाजन के कारण ‘कला और हस्तशिल्प के मामले में वे अपने प्रतियोगियों से आगे निकल जाते हैं वैसे ही जैसे कोई विद्वान किसी अनाड़ी को पीछे छोड़ देता है’ (पूंजी में ही उद्धृत) । आइसोक्रेटीज ने अच्छी तरह समझा था कि जब कोई कारीगर जीवन भर एक ही पेशे से चिपका रहता है तो कैसे हस्तशिल्प में पूर्णता आती है ।                 
अरस्तू के समय सामंती व्यवस्था और सुदृढ़ हुई । वर्गीय भिन्नता और तीखी हुई । नतीजे के बतौर अरस्तू किसानों और कारीगरों को कोई राजनीतिक अधिकार देने को तैयार नहीं थे । नागरिकता के अधिकार भूमिधर वर्ग के लिए सुरक्षित थे । उन्होंने कहा ‘सचाई यह है कि जो लोग राज्य के अस्तित्व के लिए अनिवार्य नहीं हैं उन सभी लोगों को हम नागरिक नहीं मान सकते’ (द पालिटिक्स आफ़ अरिस्टोटल, मैकमिलन 1923) । न केवल शूद्र बल्कि पूर्ण राजनीति के लिए वैश्य भी मताधिकार विहीन होंगेनागरिकों को यांत्रिकी या व्यवसाय से जुड़ा हुआ जीवन नहीं बिताना चाहिए क्योंकि ऐसा जीवन अधम है और सद्गुण के लिए घातक है । और भी, जिन लोगों को हमारा नागरिक होना है उन्हें खेतिहर भी नहीं होना चाहिए क्योंकि खेतिहर जीवन में अवकाश असंभव है तथा सद्गुण की संस्कृति और राजनीतिक गतिविधि के लिए अवकाश भी उतना ही जरूरी है ।’ (वही) केवल अवकाशभोगी वर्ग ही शासन करने योग्य हैं औरभू संपत्ति इन्हीं वर्गों के हाथ में होनी चाहिए क्योंकि समृद्धि हमारे नागरिकों की अनिवार्य योग्यता है और केवल इन्हें ही नागरिकता प्राप्त होगी ।’ (वही) सेना और विचारक वर्ग अवकाशभोगी वर्ग हैं । अरस्तू की इच्छा थी कि आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सत्ता मात्र एक वर्ग के हाथों में संकेन्द्रित हो और वह वर्ग हो भूस्वामी वर्ग । युवावस्था में इन्हें सैनिक के बतौर सेवा देनी चाहिए और जो इन जिम्मेदारियों की उम्र पार कर चुके हैं उन्हें अपनी पूजा देवताओं को अर्पित करनी चाहिए और उन्हीं की सेवा में अपना देय पाना चाहिएक्योंकि ये ही लोग हैं जिन्हें पुजारी का कार्यभार समुचित रूप से दिया जा सकता है’ (वही) । कोई किसान या कोई कारीगर पुजारी बन सकता है ? भारत में तो एक शूद्र भी ब्राह्मण हो सकता है ! ‘किसी खेतिहर या यांत्रिक को पुजारी नहीं नियुक्त किया जा सकता, क्योंकि उचित यही होगा कि केवल नागरिक ही अपना सम्मान देवताओं को अर्पित करें ।’ (वही) केवल कुलीनों को ही पुजारी और सैनिक होना चाहिए क्योंकि कुलीनता वंशानुगत गुण है’ (वही) । यह सही है कि केवल कुलीन ही राज्य नहीं चला सकते लेकिन उन्हें शेष लोगों को उसी तरह नियंत्रित करना चाहिए जिस तरह आत्मा शरीर को नियंत्रित करती है । यह सही है कि आम तौर पर खेतिहर, कारीगर और किराए के मजदूर राज्य के लिए अपरिहार्य होते हैं लेकिन ठीक ठीक तो राज्य के अंग सैनिक और विचारक वर्ग ही हैं ।’ (वही)
इस प्रकार अरस्तू की किताब पालिटिक्स में ग्रीक समाज में वर्णों के बनने का पूर्ण चित्रण है ।
इंग्लैंड में जाति व्यवस्था मौजूद थी- या- है ?
वहां इसकी मौजूदगी न केवल मध्य युग के दौरान थी बल्कि पुनर्जागरण (रिनेसां) के दौरान भी खूब फल-फूल रही थी और औद्योगिक क्रांति की दीर्घ कालावधि में भी जिंदा रहने की कोशिश में खूब धूल उड़ा रही थी ।
बासवेल ने एक बार जानसन से एक लेखक की शिकायत की जो कुलीनों के प्रति पर्याप्त सम्मान नहीं प्रदर्शित करता था । उस मौके पर जानसन ने कहा: “मान लीजिए कोई जूता गांठनेवाला उससे उसी समानता का दावा करे जिसका दावा वह कुलीनों से करता है: वह किस तरह घूरेगा ।क्यों महोदय, घूर क्यों रहे हैं? (जूता गांठनेवाला कहता है), समाज की मैं बहुत सेवा करता हूं । सही बात है कि मुझे इसके लिए पैसे मिलते हैं; लेकिन आपको भी तो महोदय मिलते ही हैं: और माफ कीजिए यह कहने के लिए कि मुझसे ज्यादा ही मिलते हैं, जबकि आप ऐसा कुछ नहीं करते जो बहुत जरूरी हो । क्योंकि मनुष्य का काम आपकी किताबों के बिना भी अच्छी तरह चल जाएगा, लेकिन मेरे जूतों के बगैर नहीं चलेगा ।इसलिए महोदय अगर पद की विशिष्टता के लिए निश्चित अपरिवर्तनीय नियम नहीं होंगे तो वरीयता के लिए लगातार संघर्ष होगा । इन पदों से ईर्ष्या नहीं पैदा होती क्योंकि ये संयोगवश प्राप्त होते हैं ।” (द लाइफ़ आफ़ सैमुएल जानसन)
यहां जानसन महज वर्गीय भेदभाव का बचाव नहीं कर रहे हैं; वे पद संबंधी भेदभाव का बचाव कर रहे हैं जो किसी के पेशे के चुनाव पर निर्भर नहीं है बल्कि संयोगवश प्राप्त होता है यानी किसी खास जाति में आपके जन्म पर निर्भर है । लोग चुपचाप जन्म के इस संयोग को स्वीकार कर लेते हैं और इसीलिए जानसन की राय में कोई ईर्ष्या नहीं पैदा होती ।
इंग्लैंड में किसी भी अन्य वर्ग से अधिक सम्मान भूमिधर वर्ग का था । पादरी इस वर्ग के वेतनभोगी नौकर की तरह थे । व्यापार और वाणिज्य के विकास से नए प्रतियोगी सामने आए जिन्होंने प्रतिष्ठा पर कुलीनों के एकाधिकार पर सवाल उठाया । बासवेल ने कहा ‘लेकिन शायद निचले तबकों के लोगों का अति तीव्र विकास होने से जन्म और भद्रता के आधार पर स्थापित विभेद का मूल्य घट जाता है । यह विभेद अधीनता की विराट परियोजना के लिए हमेशा लाभप्रद पाया गया है ।’ (वही) अधीनता की इस विराट परियोजना के उदाहरण अंग्रेजी साहित्य में भरे पड़े हैं ।
इंग्लैंड में भूमि पर सामुदायिक स्वामित्व था ?
भूमि का सामुदायिक स्वामित्व भारतीय सामंती समाज का विशेष लक्षण माना जाता है । असल में कुछ लोग तो यह भी मानते प्रतीत होते हैं कि भारत में सामंती समाज नहीं था; इस देश के लोग अंग्रेजों के आने से पहले आदिम साम्यवाद के विभिन्न चरणों में रह रहे थे, अंग्रेजों के आने से भारतीय इतिहास में पहली सामाजिक क्रांति पूरी हुई ।
भूमि का सामुदायिक स्वामित्व न केवल मध्य युग में था बल्कि अंग्रेजी जाति व्यवस्था की तरह ही पुनर्जागरण (रिनेसां) के दौरान भी बना रहा और सिर्फ़ औद्योगिक क्रांति के समय काफी हिंसा के बाद खत्म हुआ । ‘पूंजी’ के पहले खंड में मार्क्स ने ‘सामुदायिक जमीन की व्यवस्थित लूट’ की बात की है । यह लूट होती कैसे अगर भूमि पर सामुदायिक स्वामित्व न होता ? मार्क्स ने कहा कि सामुदायिक संपत्ति पुरानी ट्यूटानिक संस्था थी ‘जो सामंतवाद के परदे में जीवित रही’ । (वही) दूसरे शब्दों में यह कबीलाई समय का अवशेष था जो सामंती व्यवस्था के दौरान भी मौजूद था । 15 वीं और 16 वीं सदी में इस सामुदायिक संपत्ति पर कब्जा करने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर हिंसा की वारदात भी हुई थी । मार्क्स ने कहा ’18 वीं सदी में हासिल अग्रगति इस बात में व्यक्त हुई कि कानून ही लोगों की जमीन की चोरी का उपकरण बन गया, हालांकि बड़े फ़ार्मरों ने अपने कुछ स्वतंत्र तरीकों का भी इस्तेमाल किया । लूट का संसदीय रूप ऐक्ट फ़ार एनक्लोजर्स आफ़ कामन्स (सामान्य जनता के लिए बाड़े का कानून) था । यह कानून दूसरे शब्दों में ऐसा अध्यादेश था जिसके जरिए जमींदारों ने जनता की जमीन को निजी संपत्ति के रूप में अपने को आवंटित कर लिया । ये जनता से संपत्तिहरण के अध्यादेश थे ।’ (वही)
मार्क्स ने बताया है कि 19 वीं सदी के पहले तीन दशकों में जमींदारों ने साझा जमीन से 3,511,770 एकड़ ‘चुरा’ लिया । (वही)
भूमि का सामुदायिक स्वामित्व इंग्लैंड और भारत दोनों में सामंती समय और उसके बाद भी बना रहा ।
भारत में जमीन पर सामुदायिक स्वामित्व के साथ जमीन पर निजी मालिकाना भी था । काणे ने धर्मशास्त्र के इतिहास में हिंदू कानून की किताबों से जमीन बेचने की अनुमति के अनेक उदाहरण दिए हैं । आर एन सालातोर ने लाइफ़ इन गुप्ता एज नामक किताब में अनेक शिलालेखों का उल्लेख किया है जिनमें गुप्त काल में बिक्रय पत्र का संकेत मिलता है । के पी जायसवाल ने हिंदू कानून की किताबों और शिलालेखों दोनों का उल्लेख करते हुए कहाप्राचीन साहित्य से व्यक्तियों द्वारा निजी तौर पर जमीन की बिक्री और दान के असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं । कानून की किताबों में भूमि की बिक्री और आदेश पर मालिकाने की प्राप्ति का प्रावधान है । शिलालेख पूरी तरह सिद्ध करते हैं कि भूमि का निजी स्वामित्व मौजूद था ।
6 जून 1863 को एंगेल्स ने मार्क्स को लिखा: ‘भू संपत्ति का अभाव असल में समूचे पूरब की कुंजी है ।’ (संकलित पत्र-व्यवहार) मार्क्स और एंगेल्स का यह तथा ऐसे ही अन्य वक्तव्य अक्सर इस सिद्धांत के समर्थन में उद्धृत किए जाते हैं कि भारत में जमीन पर निजी मालिकाना नहीं था ।
एंगेल्स के ऊपर उद्धृत पत्र के एक हफ़्ते बाद मार्क्स ने उन्हें जवाब दिया: ‘जहां तक संपत्ति का सवाल है भारत के बारे में अंग्रेज लेखकों में इस पर बहुत विवाद है । कृष्णा के दक्षिण में भ्रंश पहाड़ी देहात में लगता है कि भू संपत्ति मौजूद थी ।’ (वही) भारत में जमीन पर निजी मालिकाने का संदेह जाहिर करने वाले मार्क्स और एंगेल्स के इस तथा इसी तरह के अन्य वक्तव्यों की आम तौर पर उपेक्षा कर दी जाती है ।
भारतीय और उसी तरह इंग्लैंड के सामंती समाज में सामुदायिक संपत्ति के साथ निजी संपत्ति भी सामंती समय में मौजूद थी ।
सामंती भारत के अनेक भागों में विभिन्न राष्ट्रीयताओं के इलाके साफ पहचाने का सकते हैं । बुंदेलखंड, अवध, ब्रज आदि सामंती दौर के राष्ट्रीयताओं के इलाके हैं जो अब वृहत्तर हिंदी क्षेत्र के हिस्से हैं । इसी तरह कार्नवाल, वेल्स, स्काटलैंड आदि सामंती दौर के राष्ट्रीयताओं के इलाके हैं जो अब ब्रिटिश जनता के देशी भूभाग के हिस्से हैं । इनमें से कुछ हिस्सों में अलगाव के लिए आंदोलन जारी हैं ।
सामंती उत्पादन पद्धति का जन्म और विकास पुराने कबीलाई सामाजिक ढांचे में होता है । इसका जन्म और विकास ऐसे काल्पनिक सामाजिक ढांचे में नहीं होता जो दासों और दास मालिकों में विभाजित हो । परिवार, निजी संपत्ति और राजसत्ता का उदय में एंगेल्स ने बताया है कि कैसे विभिन्न कबीलाई समुदायों का सामंतवाद में संक्रमण होता है । सही बात है कि एथेन्स और रोम में बहुत सारे दास थे । लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि एथेन्स या रोम के समाज दासों और दास मालिकों में विभाजित थे या ये समाज प्राक-सामंती समाज थे । असल में तो मनुष्यों की वस्तुओं की तरह खरीद फरोख्त हो सके इसके लिए उनकी खरीद और बिक्री के साधन- मुद्रा - को भरपूर विकसित होना चाहिए और उत्पादन पद्धति को इतना विकसित होना चाहिए कि उनकी श्रम शक्ति का उपयोग हो सके, ऐसा बाजार होना चाहिए जहां उनकी मेहनत की उपज आदि को बेचा जा सके । एंगेल्स ने एथेन्स में दासता के विकास के प्रसंग में ठीक इसी तरह की आर्थिक गतिविधि का वर्णन किया है ।
दासों की बड़ी संख्या की व्याख्या इस तथ्य से होती है कि उनमें से ढेर सारे दास एक साथ विशाल कमरों वाले कारखानों में ओवरसीयरों के मातहत काम करते थे । वाणिज्य और उद्योग के विकास के साथ संपत्ति का संचय और संकेंद्रण कुछेक हाथों में हुआ; स्वतंत्र नागरिकों की बड़ी आबादी गरीब थी और उन्हें या तो हस्तशिल्प के काम में दासों के साथ होड़ करनी पड़ती जिसे अधम और नीचतापूर्ण माना जाता था और उसमें सफलता बहुत कम निश्चित थी या फिर पूर्ण दरिद्रता का सामना करना पड़ता । तत्कालीन परिस्थितियों में दरिद्रता का ही मुख देखना पड़ता था और चूंकि वे बहुसंख्यक थे इसलिए अपने साथ समूचे एथेन्स के राज्य को नीचे गिरा देते थे ।’ (संकलित रचनाएं, भाग दो)
इससे हमारे सामने ऐसे प्राक-सामंती कबीले की तस्वीर नहीं उभरती जो सामुदायिक रूप से दासों पर शासन करता हो; यह ऐसे समाज की तस्वीर है जहां सामंतवाद न केवल परिपक्व है बल्कि उत्पादन और वितरण की विपरीत प्रक्रियाओं के साथ मौजूद है । बड़ा बाजार है, इसके प्रबंधन के लिए कारखाने हैं, दासों का सस्ता श्रम है, एथेन्स के स्वतंत्र नागरिकों का बड़े पैमाने पर दरिद्रीकरण हो रहा है । इस समाज में मुख्य अंतर्विरोध धनी और गरीब एथेन्सवासियों के बीच है; दरिद्र जनता की बहुसंख्या अपने साथ समूचे एथेन्स के राज्य को नीचे गिरा रही है ।
रोम में भी हालात अलग नहीं थे । 8 मार्च 1855 को मार्क्स ने एंगेल्स को लिखाकुछ दिन पहले मैंने रोम के (प्राचीन) इतिहास को आगस्तस के युग तक फिर पढ़ा । उसका आंतरिक इतिहास आम तौर पर छोटी बनाम बड़ी भू-संपत्ति के बीच संघर्ष में समाधित होता है, हां दासता की स्थिति के चलते किंचित बदलाव आते हैं ।’ यहां भी मुख्य अंतर्विरोध संपत्ति के छोटे और बड़े मालिकों के बीच है ।
आश्चर्य की बात नहीं कि यूरोपीय देशों द्वारा बड़े पैमाने पर दासों की खरीद बिक्री पुनर्जागरण (रिनेसां) और उसके बाद यानी व्यापारिक पूंजीवाद के दौर में हुई ।
सामंती भू-स्वामियों के बिना भी सामंतवाद संभव है । सामंती उत्पादन पद्धति नगर और देहात में छोटे पैमाने का उत्पादन है । जाति और वर्ण इस समाज के खास लक्षण हैं । संपत्ति का सामंती स्वामित्व अलग अलग रूपों में हो सकता है । निजी स्वामित्व के साथ साथ संपत्ति का सामुदायिक स्वामित्व भी रह सकता है । उत्पादन के साधन, बुर्जुआ अर्थों में, सामंत की संपत्ति नहीं होते । मार्क्स ने बताया है कि जमीन पर किसानों का भी ‘उतना ही सामंती अधिकार था जितना मालिक का’, इन्हीं किसानों को इन जमीनों से मालिकों ने भगाया । (पूंजी, खंड 1) नियम पूर्वक छोटे पैमाने पर उत्पादन वाले समाज में उत्पादन के साधनों पर उत्पादक का आंशिक या संपूर्ण स्वामित्व होता है; यही बात उसे आधुनिक सर्वहारा से अलगाती है । सामंती उत्पादन पद्धति दासों और दास मालिकों के समाज में परिपक्व नहीं होती है, बल्कि वह कबीलाई समाज में पैदा और परिपक्व होती है । जब कबीले विभाजित होकर फिर से एकजुट होते हैं तो नई राष्ट्रीयताओं का निर्माण होता है । इनमें नए श्रम विभाजन का प्रचलन होता है और लोगों की एकता कबीले की तरह रक्त-संबंध आधारित नातेदारी से नहीं बनती । सामंतवाद के बुनियादी लक्षण यूरोप और भारत में समान ही हैं ।       
                            


Sunday, December 13, 2015

लेनिन का रूस और पश्चिम

                
2011 में मैकमिलन से राबर्ट सर्विस की किताबस्पाइज ऐंड कमिसार्स: बोल्शेविक रशिया ऐंड द वेस्टका प्रकाशन हुआ । किताब में रूस की नवंबर क्रांति के साथ पश्चिमी दुनिया के बरताव का विश्लेषण किया गया है । साथ ही रूसी क्रांतिकारियों की पश्चिमी दुनिया के साथ अंत:क्रिया का भी विवेचन किया गया है । ज्ञातव्य है कि राबर्ट सर्विस इतिहासकार हैं और रूसी नेताओं- लेनिन, स्तालिन और त्रात्सकी- की जीवनियों के लेखक हैं । लेनिन की जीवनी में ही उन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिया था कि लेनिन पश्चिम की ओर आकर्षित थे । उनका कहना है कि रूसी क्रांति के बाद के कुछ सालों में पश्चिम के साथ नए रूस की उल्लेखनीय गतिशील अंत:क्रिया चली । ये साल रूस में गृहयुद्ध के साल थे । पश्चिम की कोशिश रूस को समझने और काबू में रखने की थी । बोल्शेविक सत्ता की कोशिश अर्थतंत्र को चलायमान रखने के लिए व्यापार समझौतों को बरकरार रखते हुए क्रांति का पश्चिम में प्रसार करने की थी । इस स्थिति में रूस के साथ बाहरी दुनिया के रिश्ते केवल लेनिन या त्रात्सकी नहीं तय कर रहे थे, बल्कि ढेर सारे कूटनीतिज्ञों, खबरनवीसों, बुद्धिजीवियों, व्यापारियों और यात्रियों की भूमिका भी इस मामले में कम महत्वपूर्ण नहीं थी ।
क्रांति के नेताओं को लगता था कि अगर क्रांति एक ही देश तक महदूद रही तो उसे बचाना मुश्किल होगा । उन्हें उम्मीद थी कि रूस की ही राह पर अन्य यूरोपीय देश भी चलेंगे । जब क्रांति हुई तो विश्वयुद्ध चल ही रहा था इसलिए 1918 से पहले दुनिया के ताकतवर देशों को रूस पर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं थी । युद्ध खत्म होने के बाद उनकी चिंता यह थी कि कम्यूनिज्म के संक्रमण को कैसे रूस के बाहर फैलने से रोका जाए । जर्मनी, हंगरी और इटली में छिटपुट क्रांतिकारी घटनाएं घटीं लेकिन खास कुछ हुआ नहीं । पश्चिमी ताकतों ने रूस की कम्यूनिस्ट विरोधी फौजों को सहायता देना शुरू किया लेकिन 1919 के अंत तक हालात काबू में आ गए तो उन्हें भी हाथ पीछे खींचना पड़ा । पहली अंतर्राष्ट्रीय जोर आजमाइश में रूस सफल रहा था ।
रूस ने क्रांति के प्रसार के लिए इंटरनेशनल का गठन किया ताकि विश्व पूंजीवाद के खात्मे के लिए अन्य देशों में कम्यूनिस्ट पार्टियों की स्थापना हो । 1920 में पोलैंड में लाल सेना भेजी गई । लेखक को इस किताब की प्ररणा तब मिली जब ब्रिटेन के जासूस पाल ड्यूक्स के निजी कागजात उन्हें देखने का अवसर मिला । उसके संस्मरण आरम्भिक सोवियत शासन के हालात का अद्भुत आंखों देखा विवरण थे । ड्यूक्स ने लाल सेना की जासूसी करते हुए बाहरी आदमी की निगाह से जो कुछ देखा उसे दर्ज किया था । इसके बाद उन्होंने रूसी क्रांति की रिपोर्ट लिखने वाले जान रीड से लेकर एक हद तक आलोचक रहे बर्ट्रांड रसेल तक शेष लोगों के संस्मरण देखे । फिर उनकी निगाह कूटनीतिज्ञों की खबरों और आत्मकथाओं पर पड़ी । पहले उन्हें लगा था कि ये लोग अक्षम और मंद बुद्धि होते हैं लेकिन इन संवादों की गुणवत्ता से वे भौंचक्का रह गए । इसके बाद उन्होंने व्यवसायियों की छानबीन की जो 1920-21 में रूस के साथ व्यापार शुरू करने के इच्छुक थे । रूस के इतिहास लेखन के लिए रूसी संग्रहालय से प्राप्त सामग्री के आधार पर बनी धारणा की पुष्टि के लिए ये स्रोत उन्हें जरूरी लगते हैं ।
पहले लेखक को लगता था कि क्रांतिकारी और उनके विरोधी एक दूसरे के बारे में कुछ खास नहीं जानते थे लेकिन इन स्रोतों को खंगालने पर उनकी यह धारणा खंडित हो गई । नई सरकार के सत्ता में आने के बाद कूटनीति के पांरम्परिक रास्ते तो बंद हो गए लेकिन दोनों खेमों के जासूसों ने अपना काम बखूबी किया था । उनके द्वारा सही समय पर मुहैया सटीक जानकारी की बदौलत दोनों को योजनाएं और रणनीतियां बनाने में आसानी हुई । क्रांति के तुरंत बाद रूसी सेना की हालत बहुत अच्छी नहीं थी । अगर 1918 में जर्मनी ने हमला कर दिया होता तो रूस की हार तय थी । ब्रेस्त-लितोव्स्क की संधि को इसी परिप्रेक्ष्य में देखना ठीक होगा जिसके चलते इस हमले को टाला जा सका ।
जब बोल्शेविकों ने सत्ता पर कब्जा किया तो उन्हें शासन के जारी रहने का यकीन नहीं था लेकिन इससे उनकी उम्मीद कायम रखने की क्षमता कम नहीं हुई । अगर रूसी लोग क्रांति कर सकते हैं तो अन्य देशों के लिए यह और आसान होगा ! इसीलिए बोल्शेविकों ने अपनी नीतियों को बनाने में वैश्विक संदर्भ को ओझल नहीं होने दिया । बह्रहाल विश्व क्रांति का इरादा होने के बावजूद बोल्शेविक नेता सचाई से नावाकिफ़ नहीं थे । उन्हें पता था कि पश्चिमी ताकतें अगर मिलकर हमला कर दें तो रूस को हराने में उन्हें मुश्किल नहीं होगी इसलिए वे इन ताकतों से बातचीत भी करते रहे । अक्टूबर क्रांति के साल भर के भीतर पश्चिमी देशों के राजदूतों ने देश छोड़ दिया जब ब्रिटेन, फ़्रांस और अमेरिका के अधिकारियों पर कम्यूनिस्ट सत्ता ने मुकदमे चलाए । अर्थतंत्र युद्ध और क्रांति के चलते तबाह हो चुका था इसलिए सरकार के चलते रहने के लिए विदेश व्यापार जारी रहना जरूरी था । रूस के राजदूतों ने विकसित औद्योगिक देशों के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक संपर्क जारी रखने की भरपूर कोशिश की । नतीजतन मार्च 1921 में इंग्लैंड के साथ सोवियत संघ का व्यापार समझौता हुआ ।
अक्टूबर क्रांति के बाद पश्चिमी दूतावासों ने लेनिन की सरकार को मान्यता न देते हुए अनधिकृत मध्यस्थों के सहारे संपर्क जारी रखा । दूसरी ओर लंदन और वाशिंगटन की सरकारों ने भी रूसी सरकार के साथ संवाद के लिए इसी तरह के गोपनीय संपर्क सूत्र खोज लिए थे । लेकिन जब उन्होंने देखा कि सोवियत रूस कूटनीति और क्रांति का दोहरा खेल खेल रहा है तो उन्होंने लेनिन और त्रात्सकी की सरकार को उलट देने की योजना पर काम करना शुरू किया । लगभग सौ सालों से इन कोशिशों पर परदा पड़ा रहा था । पश्चिमी राजदूत विध्वंसक गतिविधियों में गहराई से शरीक थे लेकिन इनका पर्दाफ़ाश होने से सोवियत संघ के साथ उन देशों की परवर्ती राजनीतिक और सैनिक होड़ के तरीकों के सिलसिले में उनकी बदनामी होती । वे यह आरोप लगाते रहने की सुविधा चाहते थे कि सारी गलतियों का दोषी सोवियत संघ था । पश्चिमी राजदूतों के रूस छोड़ने के बाद भी क्रांति विरोधी ताकतों को धन दिया जाता रहा और संवेदनशील सूचनाएं जुटाई जाती रहीं । सोवियत सत्ता को पलटा तो नहीं जा सका लेकिन पश्चिमी सरकारों के लिए उपयोगी तथ्य उन्हें मिलते रहे ।
ब्रेस्त-लितोव्सक की संधि के बाद ब्रिटेन, फ़्रांस, जापान और अमेरिका ने सेनाएं भेजीं लेकिन वे पुराने साम्राज्य की सीमाओं के बाहर ही रहीं । जर्मनी के साथ लड़ाई में फंसे होने के चलते वे कुछ खास कर नहीं पा रहे थे । युद्ध खत्म होने के बाद आर्थिक और राजनीतिक कारणों से उन्होंने दुबारा ऐसी कोशिश नहीं की । विंस्टन चर्चिल को भी घुसपैठ का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था । इसके बाद भी कोशिशें बंद नहीं हुईं । फ़्रांसिसी लोग दक्षिणी यूक्रेन में रुचि लेते रहे । अमेरिकी उद्यमी साइबेरिया में धंधा करना चाहते थे । ब्रिटेन के खुफ़िया अफ़सरों ने कम्यूनिस्ट सत्ता के पतन के बाद रूस के लिए व्यावसायिक योजनाएं बना रखी थीं । अमेरिकी सरकार ने खाद्य आपूर्ति का इस्तेमाल कम्यूनिस्टो के विरुद्ध करना चाहा था । 1919 में योजना बनाई गई कि लेनिन को राजनीतिक शर्तों पर अन्न दिया जाए और कम्यूनिस्ट विरोधियों के कब्जे वाले क्षेत्रों में मुफ़्त आपूर्ति की जाए ।
गृह युद्ध की समाप्ति के बाद लेनिन और त्रात्सकी ने रूस के सात व्यापार का लोभ अनेक देशों को दिया लेकिन इसके लिए वैचारिक प्रभाव के विस्तार की योजनाओं पर विराम नहीं लगाया । 1921 में जर्मनी में सत्ता पलटने की कोशिश कोमिंटर्न के निर्देश पर हुई इसके बावजूद कि फ़्रांसिसी और ब्रिटिश सेनाओं द्वारा जर्मनी में पश्चिमी प्रभाव कायम रखने के लिए हस्तक्षेप का खतरा था । कोमिंटर्न की कोशिशों के बावजूद जर्मनी में क्रांति नहीं हुई । रूसी नेताओं ने जर्मनी में कम्यूनिस्ट विरोधी समूहों की ताकत को कम करके आंका था । इसी तरह 1920 में उन्हें पोलैंड में राष्ट्रवादी भावनाओं को समझने में भूल हुई थी । राजनेताओं को जितनी भी बेहतर सूचना हासिल हो वे उसका अपनी योजना के अनुसार ही इस्तेमाल कर सकते हैं । लेनिन और त्रात्सकी को लगता था कि यूरोप कम्यूनिस्ट क्रांति के मुहाने पर खड़ा है । जो लोग इन्हें सूचनाएं देते थे वे भी इन्हीं मान्यताओं से संचालित थे । दूसरी ओर पश्चिमी नेताओं का भी यही हाल था । अंतर बस यह था कि वे रूस के लिए जितने जासूस लगा सकते थे उतने जासूस रूस कभी पश्चिमी देशों में नहीं लगा सकता था । सूचनाओं की मात्रा अधिक होने से ही कर्तव्य तय नहीं हो जाता । पश्चिमी नेताओं के सामने घरेलू बवालों के अलावा मध्य यूरोप की उलझनें भी थीं । लायड जार्ज ने ब्रिटेन के युद्धोत्तर आर्थिक भलाई के लिए फ़्रांस और अमेरिका को किनारे करते हुए सोवियत संघ से 1921 में व्यापार समझौता कर लिया । इससे सोवियत संघ को सांस लेने का मौका मिल गया और लेनिन की नई आर्थिक नीति ने अर्थतंत्र को स्थिरता दी ।

लेखक के मुताबिक इस किताब में सोवियत संघ और पश्चिम के रिश्तों को अंतर्राष्ट्रीय नजरिए से देखा गया है । दोनों पक्षों के नायक अपनी अपनी कब्रों में चले गए हैं । लेनिन का शव हटाने के लिए रूस की जनता तैयार नहीं है । उनके नेतृत्व में हुई क्रांति ने सोवियत संघ को जन्म दिया था जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में नाज़ी जर्मनी को तो हराया ही, चालीस साला शीत युद्ध भी झेला । अक्टूबर क्रांति ने जिन सवालों को जन्म दिया था वे आज भी प्रासंगिक हैं । रूस और पश्चिम का विरोध भी समाप्त नहीं हुआ है इसलिए इन दोनों का आपस में उलझा हुआ इतिहास आज भी जानना उपयोगी होगा ।