Sunday, February 10, 2013

पूर्वोत्तर भारत: कितना अलग, कितना समान ?


            
            (An article published in Sablok January.2013 which I saw today)                                          
       हाल के दिनों में असम की घटनाओं और उनके कारण बाहर रहने वाले पूर्वोत्तर के लोगों के दुखद पलायन से एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि पूर्वोत्तर भारत क्या एक असमाधेय समस्या का नाम है । इस सवाल की छानबीन के लिए हमें पूर्वोत्तर भारत के इतिहास पर निगाह डालनी होगी । यह एक सचाई है कि अंग्रेजों से पहले पूर्वोत्तर, भारत का अंग नहीं रहा था । मुगलों ने एक बार कोशिश की थी लेकिन वे ब्रह्मपुत्र को पार नहीं कर सके थे । 1826 में पहली बार असम में अंग्रेज, बर्मा के हमलावरों से रक्षा के बहाने आए थे । उन्होंने असम में चाय की खेती शुरू की और पहली बार नकदी फसल की संस्कृति इस क्षेत्र में दिखाई पड़ी । असम में उनकी मौजूदगी को लेकर पहाड़ी इलाकों में रहने वाले सुगबुगाने लगे और तनाव बढ़ने के साथ ही अंग्रेजों ने नए नए इलाकों में घुसपैठ शुरू की । इस प्रक्रिया में उन्हें इतना समय लगा और इतना प्रतिरोध झेलना पड़ा कि शेष भारत से पूर्वोत्तर को अलग रखने के व्यवस्थित उपाय किए गए ।    
       इन्हीं उपायों के तहत इनर लाइन परमिट की व्यवस्था शुरू की गई ताकि शेष भारत के साथ इस क्षेत्र का संपर्क संबंध नाममात्र का रहे असल में अंग्रेजों को इस बात का डर था कि अगर स्वाधीनता की लहर का असर इस इलाके पर पड़ा तो वह मारक होगा क्योंकि इस क्षेत्र पर कब्जा करने में उन्हें शेष भारत के मुकाबले बहुत अधिक समय लगा था । इसी क्रम में इस बात पर भी ध्यान देना चहिए कि स्वतंत्र भारत में जो आधुनिक इतिहास पढ़ाया जाता है उसमें आज़ादी के आंदोलन का इतिहास प्रमुख होता है लेकिन उसमें पूर्वोत्तर कहीं मौजूद नहीं होता मानो शेष भारत तो आज़ादी के लिए लड़ रहा था लेकिन पूर्वोत्तर गुलामी का मजा ले रहा था । जबकि बात ऐसी है नहीं अकेले नागालैंड को काबू में करने में अंग्रेजों के छक्के छूट गए थे । इसी तरह बाकी इलाके भी कभी पूरी तरह शांत नहीं किए जा सके थे । 1857 में सिर्फ़ असम में दो लोगों (मनीराम दीवान और पियोली बरुआ फूकन) को अंग्रेजों ने फांसी दी बल्कि चटगाँव छावनी में विद्रोह हुआ जिसके बाद विद्रोही आज के त्रिपुरा, मणिपुर और कछार तक मोर्चा लेते हुए गुजरे थे इसी समय के आस पास खासी लोगों ने अपनी भाषा के लिए रोमन लिपि के व्यवहार पर आपत्ति उठाई थी 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान चाय बागान के श्रमिकों ने काम छोड़कर अपने अपने घर की राह ली थी जिन्हें काबू करने के लिए बड़े पैमाने पर हिंसा और दमन का सहारा लिया गया था 1942 के समय भी जगह जगह स्थानीय स्तर पर विद्रोह हुए असल में आज़ादी की लड़ाई के इर्द गिर्द आधुनिक भारत का जो इतिहास बनाया जाता है उसकी दुखती रग बँटवारा है इस दुर्घटना को अनदेखा करके ही स्वतंत्रता की खुशी के लिए पाठ्यक्रमों में जगह बनाई जाती है
       भारत के विभाजन को लेकर जो भी बात होती है वह पंजाब और बहुत हुआ तो बंगाल के विभाजन की त्रासदी तक पहुँचती है पूर्वोत्तर का विभाजन भी भारत के बँटवारे से जुड़ा हुआ है इसने बंगाल को बाँटने की लार्ड कर्जन की पुरानी योजना को अमली जामा तो पहुँचाया ही, त्रिपुरा को ऐसी स्थिति में डाल दिया कि आज भी अनेक लोगों के सोने के कमरे तो भारत में हैं लेकिन रसोई बांग्लादेश में यही हाल करीमगंज नामक सिलचर के ज़िले का है जहाँ बांग्लादेश से आकर अनेक कामगार दिन भर भारत में रिक्शा चलाकर रात में अपने देश लौट जाते हैं मेघालय के अनेक लोगों की खेती की जमीन बांग्लादेश में है और वहाँ से आने जाने में वे सीमा सुरक्षा बल और बांग्लादेश राइफ़ल्स के अपराधी बन जाते हैं शेष भारत में शायद ही लोग जानते होंगे कि भारत और बांग्लादेश की सीमा कानो मैंस लैंडनिर्जन नहीं बल्कि बाकायदे आबाद इलाका है
     आज़ादी के बाद गद्दीनशीन शासकों ने भी पूर्वोत्तर के प्रति वही नजरिया जारी रखा जो अंग्रेजों का था अगर अंग्रेजों ने इस क्षेत्र के एकीकरण के लिए फ़ौज के साथ धर्म और भाषा का इस्तेमाल किया तो आज़ाद भारत की सरकार ने भी वही राह अपनाई । अंग्रेजों के नक्शे कदम पर चलते हुए नेहरू जी ने नागालैंड में 1958 में फ़ौज तो भेजी ही अंग्रेजों के ही जमाने का बना एक कानून भी थोड़ा और कड़ा करके इस क्षेत्र में लागू किया । ए एफ़ एस पी ए नामक यह कानून बेहद अलोकतांत्रिक और दमनकारी है । इसके तहत शांति भंग होने की आशंका मात्र पर फ़ौजी लोग किसी को भी गोली मार सकते हैं । अंग्रेजी शासन काल में यह अधिकार महज कमीशंड अफ़सरों को प्राप्त था लेकिन आज़ादी के बाद इसमें व्यापकता लाई गई और अब कोई भी सैनिक बेखटके इसका इस्तेमाल कर सकता है । अगर इसके तहत फ़ौजी कोई ज्यादती करते हैं तो उन पर मुकदमा चलाने के लिए गृह मंत्रालय की पूर्वानुमति की जरूरत होती है । फ़ौज को कत्ल करने की इतनी खुल्लम खुल्ला छूट इस कानून के तहत हासिल है कि पूर्वोत्तर के लोगों को इस कानून की मौजूदगी में आज़ाद देश के नागरिक होने का अहसास ही नहीं होता । वैसे तो आजकल सरकार अपनी ही जनता के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए है लेकिन पूर्वोत्तर के प्रसंग में ऐसा 1958 से ही जारी है । इस कानून के साथ शासन का इतना निहित स्वार्थ जुड़ गया है कि केंद्र सरकार द्वारा ही इस कानून की समीक्षा के लिए नियुक्त जीवन रेड्डी आयोग की इसे रद्द करने की अनुशंसा के बावजूद इसे बनाए रखा गया है । इसी कानून को रद्द कराने के लिए इरोम शर्मिला चानू पिछले अनेक बरसों से भूख हड़ताल कर रही हैं और जीवन रेड्डी आयोग की रपट धूल फाँक रही है । पूर्वोत्तर के लोगों में अलगाव का अहसास इसके कारण भी बढ़ता है । इस किस्म के अर्ध-सैनिक शासन के निर्बाध संचालन के लिए ही पूर्वोत्तर के प्रदेशों में राज्यपाल अक्सर सेना से अवकाश प्राप्त अफ़सरों को नियुक्त किया जाता है ।
      पूर्वोत्तर को अलगाव का अहसास इसलिए भी होता है क्योंकि उसे आतंकवाद के गढ़ के बतौर पेश किया जाता है और इससे निपटने के नाम पर सेना की बेहिसाब तैनाती कर दी गई है । जबकि ईमानदारी से पूछें तो आतंकवाद को कोई भी हटाना नहीं चाहता । राज्य सरकार को सुविधा है कि किसी भी विरोध को इस नाम पर बदनाम करके दबा सकती है । भ्रष्टाचार की अति भी इसी की आड़ में चलती रहती है । यहाँ तक कि केंद्र सरकार कभी कभी इन संगठनों का इस्तेमाल भी करती है । सभी जानते हैं कि असम आंदोलन से निपटने के लिए बोडो आंदोलन को खड़ा किया गया था । पिछले दिनों की घटनाओं के बाद यह तथ्य प्रकाश में आया कि बोडो उग्रवादियों के पास सबसे अधिक अवैध हथियार हैं । जब बोडो आंदोलन के साथ केंद्र सरकार का समझौता हुआ था तो तय हुआ था कि बोडोलैंड स्वायत्त कौंसिल के दस्तावेज नागरी लिपि में होंगे । एकीकरण का वही औपनिवेशिक नजरिया । पूर्वोत्तर में सेना और आतंकवाद एक दूसरे के विरोधी नहीं, एक दूसरे के पूरक हैं ।
नागरिक जीवन में सेना की उपस्थिति इतनी अधिक है कि बिना वाजिब पहचान पत्र के आपका निडर होकर घूमना फिरना तकरीबन असंभव है । बाहर के प्रदेशों में बहुतेरे लोग इस तथ्य से वाकिफ़ नहीं हैं कि लक्षद्वीप और काश्मीर के बाद आबादी में मुसलमानों का सबसे अधिक प्रतिशत असम में ही है । ये लोग कोई घुसपैठिए नहीं हैं बल्कि विभाजन से बहुत पहले से इस प्रांत के निवासी हैं । कुछ तो भाजपा के बांगलादेशी विरोधी प्रचार और कुछ सरकार के रवैये के कारण लगातार इन्हें बाहरी होने का अहसास कराया जाता है ।
कहने की जरूरत नहीं कि देश की मुख्यधारा का निर्माण जिन वैचारिक औजारों के सहारे होता है उनमें बहुसंख्यकवाद की मजबूत मौजूदगी है । सांस्कृतिक भिन्नता को बर्दाश्त करना राष्ट्रीय एकता के जोश में मुश्किल हो जाता है । यही जोश अनेक बार स्थानीय लोगों के साथ फ़ौजियों के बरताव में दिखाई पड़ता है । इसी चक्कर में कई बार अलग प्रदेश के लिए होने वाले आंदोलनों को भी अलगाववादी मान लिया जाता है । इस जोश के कारण भी बहुधा पूर्वोत्तर की समस्या के उचित समाधान का माहौल बनाने में बाधा आती है ।
     पूर्वोत्तर के लोग देश के विकास में अपना वाजिब हिस्सा चाहते हैं । उनकी माँग का औचित्य रणनीतिक कारणों से किसी भी कीमत पर पूर्वोत्तर को देश के साथ चिपकाए रहने की जिद से भी साबित है । सरकार की योजना अंधाधुंध पैसा झोंककर पूर्वोत्तर में एक ऐसा तबका तैयार करने की लगती है जिसके भरोसे उसे अपने दमनकारी शासन का स्थानीय आधार निर्मित होने की आशा है । सभी जानते हैं कि आतंकवाद की फ़ंडिंग का बड़ा स्रोत ये पैसा ही है जो ठेकेदारों और नेताओं के साथ उन्हें भी प्राप्त होता है । असल में पूर्वोत्तर के लोग जिस तरह से किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक में अपनी हिस्सेदारी कराते हैं, चाहे वह खेल हो या गायन की प्रतियोगिता, उसी से साबित है कि वे सरकारी और गैर सरकारी हिंसा से तंग आ चुके हैं और अपने लिए इस देश में सम्मानजनक जगह चाहते हैं । शर्त बस यह है कि उनकी आवाज सुनने लायक कान हमारे और हमारी सरकार के पास हों । इसके लिए संघीय शासन की कल्पनाशक्ति की जरूरत है और संसाधनों की लूट पर आधारित विकास के माडल की बजाए लोगों पर भरोसे की ।                   

Monday, February 4, 2013

आगामी किताब की भूमिका


                                                                                                                                                                                                                                                                                  
प्रस्तुत लेख (किताब?) में मेरी भंगुर स्मृति में सोवियत संघ के विघटन से लेकर वर्तमान समय तक जिस तरह मार्क्सवाद के उत्थान पतन का ब्यौरा दर्ज है उसे निरूपित करने की कोशिश की जाएगी । इसमें मुख्य रूप से नए विचारकों के विचार ही शमिल किए गए हैं और आम तौर पर पुस्तकों का ही सहारा लिया गया है । उनके अतिरिक्त आवश्यक सैकड़ों लेखों का सहारा आकार बढ़ जाने के भय से नहीं लिया गया है । स्मृति की गड़बड़ी और अंग्रेजी की गलत सही जानकारी इसकी सीमाएँ हैं लेकिन कोई और यह काम शुरू नहीं कर रहा इसलिए हाथ लगाया । चर्चा बहुतों से इसी उम्मीद से की कि वे इस काम को भली तरह से अंजाम दे सकते हैं लेकिन होनी को कौन टाल सकता है ।
इस किताब की पृष्ठभूमि के बतौर आपको यह भी जानना होगा कि हमारी पीढ़ी को मार्क्सवाद में किस तरह रुचि पैदा हुई और कैसे आगे बढ़ी । पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के ‘70 दशक के अंत और ’80 दशक के शुरू में होश सँभालने वाले नौजवानों का साबका हिंदी क्षेत्र के कम्युनिस्टों की पहली खेप से नहीं हुआ लेकिन उनके तकरीबन अप्रासंगिक होने के साथ ही दूर बंगाल में जन्मी वामपंथ की तीसरी धारा की आहट से कान गरम हो रहे थे । इस वातावरण ने हमें पारंपरिक वाम से दूर रखा और सिर्फ़ आंदोलन नहीं बल्कि उसके साथ ही मार्क्सवाद की सैद्धांतिक जानकारी के लिए उत्सुक बनाया । वैसे यह कोई बैठे ठाले की पढ़ाई लिखाई नहीं थी बल्कि व्यावहारिक काम उसके साथ जुड़ा हुआ था लेकिन वह भी अलग तरह का था । घर छोड़कर भूमिहीन किसान जनता, जिन्हें आज दलित कहा जाता है उनके जीवन के साथ एक नए किस्म की पारस्परिकता बनानी थी । क्रांति की बातें उनके लिए हवाई न थीं बल्कि प्रत्यक्ष यथार्थ का अंग थीं क्योंकि सामाजिक उत्पीड़न उनके सामने सामाजिक परिवर्तन का एजेंडा सीधे प्रस्तुत कर रहा था । जब राजनीतिक सत्ता दखल का सवाल उनके सामने खड़ा होता तो उसका अनुवाद वे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए लड़ाई में कर लेते । फिर भी किसान समुदाय में राजनीतिक होड़ बहुत कम होने से सवाल दिमाग में दर्ज नहीं रहते थे । पारंपरिक वाम के साथ राजनीतिक होड़ का आभास शहरी इलाकों में मजदूरों के संगठनों में काम करते वक्त होता था । वहाँ आपको ट्रेड यूनियन की दुनिया में नेतागिरी के नाम पर दलाली करते हुए कार्यकर्ताओं को देखकर संशोधनवाद समझ में आ जाता था । मजदूरों के बीच काम करते हुए भी उन्हें सैद्धांतिक शिक्षा देनी होती थी और इसमेंकम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’, ‘क्या करेंऔरअंतर्विरोध के बारे मेंबहुत काम आए ।
तब पूर्वी उत्तर प्रदेश के छात्रों के बीच तीसरी धारा के एन जी ओ मार्का कुछ संगठन लोकप्रिय थे जो छात्रों के आदर्शवाद का अर्थ राजनीति से ही दूरी बरतना समझते थे । उनके साथ वैचारिक लड़ाई करके ही कोई राजनीतिक संगठन बनाया जा सकता था । इस तीखी लड़ाई में चारू मजुमदार की विरासत को खारिज करने और विकसित करने के बीच विवाद हुआ करता था । लेकिन असली जद्दो-जहद तो जे एन यू में देखने में आया । यहाँ पारंपरिक वाम की धारा मजबूती से जड़ जमाए हुए थी । उनके विरोध में तीसरी धारा के छिटपुट प्रयास अराजक चिंतन से ग्रस्त थे । इन दोनों से लड़ने के क्रम में हम सबने मार्क्सवाद की खूब पढ़ाई की और उसके सृजनात्मक व्यवहार को भी समझा । उत्तर-आधुनिकता आ चुकी थी और नव सामाजिक आंदोलनों के समर्थकों के साथ मुहब्बत के साथ ही लड़ाई भी करनी होती थी ।
फिर आया सोवियत संघ के पतन से उपजी निराशा के दौर में विश्वास को बनाए रखने की जिद भरी कोशिश । इस कोशिश के बीच में ही दूर देशों में संघर्ष फूट पड़े, सवालों के पूर्व-निश्चित हल गायब हो चुके थे और इसीलिए अपने पैरों पर खड़ा होकर सारे प्रश्नों को दोबारा समझने और सुलझाने की प्रक्रिया शुरू हुई । इसी प्रक्रिया का नतीजा यह किताब है । इसमें कुल दस-बारह साल का ऐसा समय दर्ज़ है जो पस्ती से झटके के साथ उबरने का गवाह रहा है । इसमें निश्चिंत भाव से हम प्रतिबद्धों का मजाक उड़ाने वाले एकाएक मुँह के बल गिरे और भूतों की शादी की प्रेतलीला में गाफ़िल उद्धत खाऊ बुजुर्ग हमसे हजार शिकायत करते रहे लेकिन जमाना हमारे हाथ आ चुका था । ये हमारी जवानी के दोबारा वापस आने के दिन बने जिसमें फिर से ज्ञान-क्रिया की एकता थी और थे विक्षुब्ध चमकते चेहरे ।   

Wednesday, January 9, 2013

नूह की नौका पर सवार


       इस समूचे घटनाक्रम की शुरुआत तकरीबन एक माह पहले हुई थी जब मैं केंद्रीय हिंदी संस्थान के निमंत्रण पर अगस्त ’07 के आरंभ में दीमापुर गया था । जाते हुए तो बहुत पता नहीं चला लेकिन आते हुए लाडरिमबाई से लेकर कलाइन तक रास्ते भर तकरीबन बीस जगह पहाड़ गर्भवती स्त्रियों के पेट की तरह जगह जगह से फूले मिले और सड़क के किनारे पत्थरों के छोटे छोटे टीले । पूरे रास्ते एक ओर बांग्लादेश की सरहद । तकरीबन दो घंटे तक बस मानो एक विशाल जलाशय की परिक्रमा करती रही । एक फ़ौज़ी ने खिड़की से बाहर के दृश्य को देखकर कहा कि यह तो लोकतक जैसा है । पहले सिर्फ़ सोनापुर का भय रहता था । इस बार हालत यह थी कि एक लैंडस्लाइड पार हुए नहीं कि पंद्रह मिनट बाद दूसरी लैंडस्लाइड । पेशाब और साँस रोके रोके यह रास्ता पार हुआ ।
       कुछ ही दिनों बाद सहकर्मी कृष्णमोहन झा को शिलांग जाना था । रास्ता खुला है कि नहीं ? रोज पता लगाते रहे । जाने के दिन खुला होने से निकल गए । शिलांग में ही पिता की मृत्यु का समाचार मिला । पत्नी और बच्ची सिलचर । पत्नी ने सुबह की बस पकड़ी । रात साढ़े दस बजे दो सौ किलोमीटर दूर शिलांग पहुँच सकीं । वहाँ से वे लोग 14 अगस्त की रात डेढ़ बजे गुवाहाटी उतर सके । 14 अगस्त की रात का अर्थ पूर्वोत्तर के बाशिंदे ही समझ सकते हैं ।
       रास्ता खुला है कि बंद है का अर्थ एक व्यापक संदर्भ में समझ में आएगा । बारिश के दिनों में इसका कारण भूस्खलन होता है । भूस्खलन का कारण मेघालय के प्रति भारत सरकार का नजरिया है । अत्यंत अस्थिर पर्वत मालाओं का यह प्रदेश औपनिवेशिक काल से ही प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का शिकार है । चीड़ की लकड़ी, कोयला उत्खनन, और हाल के दिनों में सीमेंट के लिए डोलोमाइट चट्टानों के उत्खनन से निरंतर पहाड़ नंगे हो रहे हैं । सिलचर की सीमा से लगे हुए ही तीन सीमेंट कारखाने खुल गए हैं । जरा सी बारिश हुई और भूस्खलन से रास्ता बंद । अन्य दिनों में बंद यानी हड़तालों के कारण आवागमन ठप हो जाता है । एक जमाने में रजनीतिक विक्षोभ प्रदर्शन की दुनिया में यह शब्द इतना लोकप्रिय था किभारत बंदसे कई लोग राजनीति में आते थे । अब इसका अस्तित्व महज पूर्वोत्तर में है । भारत सरकार यहाँ के लोगों को ठेंगे पर रखती है बदले में लोग भी यही रवैया अपनाते हैं । सुप्रीम कोर्ट का आदेश हुआ करे अगर कोई मुद्दा है तो बंद होगा । न्यायमूर्तियों की आँखों के सामने सेना जो चाहे करती है तो लोग भी उनकी बंदिशों की परवाह क्यों करें ? बंद भी मामूली नहीं । जिस दिन बंद हो उस दिन आप सड़क पर क्रिकेट खेल सकते हैं ।
       बहरहाल अगस्त अंत में कृष्णमोहन को आना था तो कलकत्ते से सपरिवार हवाई मार्ग से आए । पूर्वोत्तर में यह एक अच्छी बात है । सड़क बंद हो, रेल बंद हो हवाई मार्ग चालू रहता है । इसी कारण फ़ोन के जरिए आपस में संपर्क भी बना रहता है ।
       सुना था यहाँ ऐसी बारिश होती है कि दसियों दिन सूरज नहीं दिखाई पड़ता । जनवरी 2005 में आया था तो अक्टूबर 2004 की बाढ़ के किस्से थे । लगातार दो सालों तक बारिश अच्छी नहीं हुई सो सुनी सुनाई बातों पर यकीन नहीं होता था । इसलिए इस बार गर्मी की छुट्टी में घर नहीं गया । यकीन नहीं होगा पर 20 मई से जो बारिश शुरू हुई तो 20 जून तक जैसे बादल को लगातार पसीना आता रहा । इसी बीच यहाँ की बाढ़ का हल्का सा स्वाद मिला । मेरे एक प्रेमी छात्र मुझे प्रेमवश अपने घर पैलापुल ले गए । पूरा परिवार सेवा में हाजिर । रात में जब सोया तो रात भर बारिश की आवाज सुनाई देती रही । सुबह घर के सामने से जाँघ भर पानी में लुंगी पहनकर पैंट झोले में लिए बाहर निकले । सड़क पर आकर पैंट पहनी और बस पकड़ी । यह तो ट्रेलर था असली पिक्चर तो सितंबर में देखी ।
       संकट आ रहा था धीरे धीरे । अगर आपने साँप को शिकार करते देखा हो तो इस धीरे धीरे का मतलब समझ सकते हैं । कहीं कहीं वह झपट्टा मारकर आता है पर सिलचर में आहिस्ता आहिस्ता । पानी आ रहा है । कहाँ तक आया रोज देखिए । अभी पहला मकान घिरा । शाम को तीसरे मकान तक आया । दूसरी सुबह अपने घर की चहारदीवारी के बाहर । रात बारह बजे कमरे के सामने एक इंच । अब घर में बैठे देखते रहिए । साँप मेढक को घेर लेता है । पूँछ के इस घेरे से बाहर अगर मेढक उछला तो बिजली की गति से घूमकर साँप उसका मुँह पकड़ लेता है । इस घातक चुंबन से मेढक का दम घुट जाता है और फेफड़े फूल जाते हैं । फिर अनायास, बगैर किसी अतिरिक्त कोशिश के साँप का मुँह फैलता जाता है और एक गरम आवरण से मेढक ढँकता जाता है । इसी तरह सिलचर की आबादी घिरी रही और संकट के मुँह में धीरे धीरे प्रविष्ट हो गई ।
       पहली सूचना अखबारों से मिली । यह नहीं कि संकट की खबरें अखबार में पढ़ने को मिल रही थीं । वैसे भी अगर आपको बांग्ला के अतिरिक्त अन्य भाषा के अखबार पढ़ने हों तो सुबह के अखबार शाम को बस से आते हैं । दो दो, तीन तीन दिनों के अखबार एक साथ मिलने शुरू हुए । उनके मिलने न मिलने से रास्ते के खुलने बंद होने का पता चलता है । इस पर झुँझलाहट हो तो हो लेकिन यह भी एक तरह की खबर ही होती है । दो दिन के अखबार मिलने का मतलब रास्ता कल बंद था आज खुला है । तीन दिन का मतलब परसों से बंद होने के बाद आज खुला है । रास्ते का खुलना (और उसी तरह बंद होना) मामूली न समझा जाए । दक्षिणी असम के तीन जिलों और मिज़ोरम तथा त्रिपुरा तक सब कुछ इसी सड़क से जाता है । इसलिए एक दिन की बंदी भी हाहाकार मचा देती है । खैर इसी तरह पहले हफ़्ते सड़क खुलती बंद होती रही । इस दौरान एक बस निकल गई तो गारंटी नहीं कि दूसरी भी निकल जाए । दीमापुर से एक विद्यार्थी आ रहे थे । पूरी रात बस रास्ते में रुकी रही । सुबह नौ बजे रास्ता खुला । मुख्य रास्ते पर पानी था । बस ने दूसरा रास्ता पकड़ा । चारों ओर जल का प्रवाह । स्थानीय लोग बताते रहे कि बीच में सड़क दो फ़ुट नीचे कहाँ है । सारे दरवाजे खिड़कियों को खोलकर रखा गया था ताकि संकट आने पर कूदा जा सके । वे नौ सितंबर को सिलचर पहुँचे । उस दिन तक जिन्हें बाहर जाना था चले गए जिन्हें अंदर आना था चले आए । जो जहाँ गया वहीं रह गया । चिट्ठियों का आना जाना पहले ही बंद हो चुका था ।
       दूसरा संकेत बिल्लियों ने दिया । स्वभाव से ही ये रहस्यप्रेमी होती हैं । कोने अँतरे उनके रहने की जगहों में पानी आने वाला था । रोती हुई वे इधर उधर घूमती रहीं । नौ सितंबर को विश्वविद्यालय में तीन दिनों के अवकाश की घोषणा हुई । पता चला विश्वविद्यालय पहुँचने के लिए नाव चल रही है । इस बीच मिज़ोरम से एक शोधार्थी ने तीन बार बाहर निकलने की कोशिश की । पता चला कि बराक में यह पानी मणिपुर में भीषण बारिश के कारण नीचे आया है । इंफाल में तीन फ़ीट, चार फ़ीट पानी शहर की सड़कों पर है । फिर खबर आई कि बराक को छोड़िए करीमगंज में कुशियारा ने तबाही मचा दी है । बराक को जल प्रदान करने वाली मधुरा में पानी बढ़ रहा है । कभी एक चाय बगान से बहती हुई इस पतली सी नदी को पैदल पार किया था । फिर एक बार स्टीमर से बराक को मधुरा के पूर्व-संगम (इसे मधुरा घाट कहते हैं) पर पार किया था । गुवहाटी शहर में आधा चक्का डूबा हुआ रिक्शा चलने का चित्र भी अखबार में देखा । सिलचर शहर में बराक का नहीं बल्कि घाघरा का पानी घुसा है । ये छिनाल (सौजन्य-वीरेन डंगवाल) नदियाँ थोड़ा जल का आदर पाते ही इतरा उठी थीं । विश्वविद्यालय फिर तीन दिनों के लिए बंद हो गया । गायें पानी में गिरकर मर रही थीं । मछलियों के लिए बिछाए जालों में साँप फँस रहे थे ।
       सिलचर में घरों में खाना बनाने के लिए बांग्लादेश से भागकर आई महिलाएँ काफी सस्ते में मिल जाती हैं । इनमें अधिकांश विधवाएँ हैं क्योंकि पुरुषों को यहाँ का वातावरण अर्थात पानी रुचता नहीं । शहर में सबसे अधिक जूतों और दवाओं तथा शराब की दूकानें हैं । कभी यह शहर दुर्घटना का शिकार होकर पृथ्वी के नीचे चला गया और सु दो सौ साल बाद खुदाई में बाहर आया तो यह देखकर लोगों को अचरज होगा कि इतने सारे मेडिकल रिसर्च सेंटर यहाँ क्यों थे । दरिद्रों की बहुसंख्या वाले इस शहर में प्रत्येक नर्सिंग होम रिसर्च सेंटर भी है । इन सबके मालिक राजनेता हैं । कारण यह कि शोध केंद्र के नाम पर जमीन बिजली आदि सस्ते मिल जाते हैं । बहरहाल घरों में काम करने वाली इन महिलाओं को यहाँ मासी बोलते हैं । मेरी मासी के घर में पानी घुसा तो वह अपनी लड़की के साथ दुछत्ती पर चली गई । तीन चार दिन बाद वहाँ से बाँस की नाव बनाकर खिड़की के रास्ते लेटकर घर से निकली और राहत शिविर में चली आई ।
       बाढ़ आते ही यहाँ के गरीब लोग बगैर किसी अनुमति के बंद हो चुके स्कूलों में चले आते हैं । स्कूल में एक कमरे में पाँच परिवार । किसी की बकरी, किसी की मुर्गी, किसी के हंस, किसी की बिल्ली साथ में । कालोनियों के लोग ट्रकों और बसों की ट्यूबें खरीद लाए ताकि उन पर बैठकर सड़क तक आ सकें । गैस के सिलिंडर ब्लैक में हजार रुपए में मिलने लगे । बाढ़ में बहुत समताकारी शक्ति होती है । पैसे आपके पास हैं लेकिन खाएँगे क्या । बाज़ार से सब्जियाँ गायब, चावल गायब । राहत सामग्री कुछ जनता को मिलती अधिकांश ब्लैक मार्केट चली जाती । सिगरेट, माचिस, मोमबत्ती सबकी लूट हो गई । नेता लोग, मंत्री, राज्यपाल हवाई जहाज़ से आते उड़कर देखते जायजा लेते और चले जाते । एक हेलीकाप्टर हैलाकांदी में राहत सामग्री लेकर उतरा तो उसके डैनों से 44 घर टूटकर उखड़ गए । दो लोग बाँस की नाव से अपने घर जा रहे थे बिजली का तार छू जाने से वहीं उनकी समाधि बन गई । मासी जहाँ आई थी वहाँ एक दिन देखा राहत सामग्री का वितरण कर रहे छुटभैये एन जी ओ मालिकान चीजें कम बाँट रहे थे वीडियोग्राफ़ी अधिक करवा रहे थे ।
       विश्वविद्यालय में 30 परिवार टापू की तरह गिरफ़्तार थे । पानी की राशनिंग शुरू हो गई और सभी शाहजहाँ की तरह जीने का अभ्यास करने लगे । इसमें भी टेलीफ़ोन और मोबाइल का बिल जमा करने की व्यवस्था चाक चौबंद रही । आखिर सरकार ने आपसी संपर्क का यह जो साधन उपलब्ध करवाया है उसकी कीमत क्यों न वसूले । ‘इंडियन आइडल’ और ‘डांस प्रतियोगिता’ टी वी में आती रहीं और उनके लिए एस एम एस वोट भी पड़ते रहे । रिंगटोन डाउनलोड कराए जाते रहे और ‘वर्ल्ड 20-20’ में भारत की टीम खेलती रही । मुनाफ़े का कारोबार कैसे बंद हो सकता था !
       विद्वानों ने इस विषय पर काफी विचार किया है कि अनुपस्थिति भी मौजूद होती है, अभाव की भी सत्ता होती है और जो दिखाई नहीं देता वह भी सक्रिय होता है । सोचता रहा कि सेना कहाँ है । अखबारों में पढ़ा कहीं सी आई एस एफ़ का ट्रक फँस गया था, आगे जाने के लिए नाव की जरूरत थी । नाव एक ही मालिक कहीं गया था । घर में सिर्फ़ पत्नी थी । जवान घुस पड़े । जबर्दस्ती की । तभी रोजा खुला और लोग मस्जिद से नमाज पढ़कर निकले । बात फैल गई । भीड़ पर काबू पाने के लिए रणबाँकुरों ने गोलियाँ चलाईं जिससे एक आदमी मारा गया । कुछ मित्रों ने सोचा कि सरकार के पास आपदा प्रबंधन का कोई विभाग अवश्य होगा । चलो वहाँ देखते हैं । पता चला उस विभाग की विशेषज्ञता भूकंप के प्रबंधन में है, बाढ़ उनके कार्यक्षेत्र से बाहर है । स्थानीय विधायक स्थानीय सांसद की पत्नी हैं । उनकी पुत्री पिता के साथ हवाई सर्वेक्षण के लिए आई और दयार्द्र भाव से एन जी ओ मार्का सेवा में जुट पड़ी । विधायक महोदया ने कहा कि पानी अगर घट नहीं रहा तो मैं क्या करूँ, । जब उनसे मँहगाई की शिकायत की गई तो उन्होंने ज्ञान दिया कि बाज़ार में वस्तुएँ नहीं हैं तो उनकी कीमत बढ़ेगी ही ।   
       घर के भीतर धरती के आदि बाशिंदे (तिलचट्टे और मकड़े) घूमते रहे । घर के बाहर गलियों में बाँस की नाव पर लोगों का आवागमन जारी रहा । हम तिथियों पर विश्वास करके बारिश के बंद होने की प्रतीक्षा करते रहे । विश्वविद्यालय फिर तीन दिनों के लिए बंद हुआ । तीन दिन की सीमा इसलिए कि जो नदियाँ बाढ़ लाती हैं वे ही परेशान करने के बाद बड़ी तेजी से नम्र भी हो जाती हैं । अमावस्या आई और चली गई बारिश बंद नहीं हुई । आज उनकी पूजा हो रही है जो संसार के समस्त स्थापत्य के शिल्पी थे । संभव है जगत की मान्यता से तुष्ट होकर वे बारिश रोक लें । सुबह धूप तो निकली है । बहरहाल मैं कमरे में पानी घुसने की प्रतीक्षा करते हुए न भेजने के लिए यह पत्र लिख रहा हूँ ।