Saturday, March 5, 2016

वर्ग विहीन समाज

            
वर्ग विहीन समाज का स्वप्न केवल मार्क्सवादियों का नहीं, बल्कि विषमता का विरोध करने वाले सभी तरह के लोगों का स्वप्न रहा है । ज्ञातव्य है कि मार्क्स-एंगेल्स के पहले से ही साम्यवादी गुट थे जो समाज से वर्ग आधारित विषमता को समाप्त करने के लिए लड़ रहे थे । इन कम्युनिस्टों में इतिहास में ऐसे समाज की कल्पना लोकप्रिय थी जिसमें अभी वर्ग विभाजन नहीं हुआ था । आम तौर पर इसे ही ‘आदिम साम्यवाद’ कहा जाता है । ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ में पहला ही वाक्य है- अब तक का समूचा इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है । इसमें बाद में एक संशोधन करके इतिहास को ज्ञात इतिहास लिखा गया जिससे स्पष्ट है कि जबसे मनुष्य को अपने इतिहास का ज्ञान है तबसे समाज में वर्ग विभाजन मौजूद है । उसके पहले की अवस्था ही वर्ग विहीन समाज की कल्पना का आधार बना ।     
मार्क्स ने वर्ग विहीन समाज या साम्यवादी भविष्य को असंभव कल्पना की जगह पूंजीवादी समाज से ही उत्पन्न साबित किया । इसके लिए उन्होंने इसके निर्माण की प्रक्रिया को दो हिस्सों में बांटा है । पहला चरण पूंजीवादी समाज के साम्यवादी समाज में क्रांतिकारी रूपांतरण की अवधि है । इस अवधि में साम्यवादी समाज अभी अपनी ही बुनियाद पर नहीं खड़ा होता बल्कि जिस पूंजीवादी समाज के गर्भ से पैदा होता है हरेक मामले में उसके जन्म चिन्ह लिए हुए होता है । इसकी कोई निश्चित अवधि का संकेत मार्क्स ने नहीं किया है लेकिन इसकी समाप्ति के बाद क्रमश: दूसरा चरण शुरू हो जाता है । पूंजीवाद के खात्मे के बाद स्थापित नए राज्य का प्रमुख दायित्व मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच भेदभावपरक अंतर की तरह ही खेती और उद्योग तथा शहर और देहात के बीच अंतर को खत्म करना भी होना चाहिए । सभी बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा, कारखाने से बाल श्रम का खात्मा और शिक्षा के साथ उत्पादक श्रम को जोड़ना बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है । कारखानों में क्रांति के फलस्वरूप काम के हालात में सुधार होगा । काम को सबसे पहले सहनीय, फिर रुचिकर और अंतत: मानवीय बनाना इन सुधारों का लक्ष्य होगा । काम के घंटे कम करना यानी अवकाश को मूल्यवान समझना होगा । उत्पादन के क्षेत्र में किसी वस्तु का कितना उत्पादन होगा इसका फ़ैसला योजना बनाने वाले सामाजिक जरूरत, उपलब्ध श्रम काल और उत्पादन के साधनों के मद्दे नजर करेंगे । इस दौर में लोगों को वही प्राप्त होगा जो वे समाज को देंगे । इसकी गणना श्रम-काल में होगी । इस दौर में धन की बजाए मार्क्स के शब्दों मेंसर्टिफ़िकेटऔरवाउचरोंका इस्तेमाल होगा । उनके अनुसार ये वाउचर धन नहीं हैं क्योंकि उनका परिचालन नहीं होगा । इस तरह मजूरी के नकद भुगतान की ताकत और चलन के खात्मे से मुद्रा प्रणाली को समाप्त किया जाएगा ।
साम्यवाद के प्रथम चरण की समाप्ति के साथ ही साम्यवाद का दूसरा चरण क्रमश: प्रकट होगा । पूंजीवाद द्वारा छोड़ी गई तथा प्रथम चरण में कई गुना बढ़ाई गई समृद्धि के चलते यह समय सामग्री वस्तुओं की प्रचुरता का समय होगा । बंजर जमीन में खेती शुरू हो गई होगी । कारखानों में काम करना सुखद हो गया होगा । शिक्षा के पुनर्गठन के चलते सबको कारखाने और कक्षा में प्रशिक्षण दिया जा रहा होगा । यह सब साम्यवाद की बुनियाद बनेगा । इसमें 1) श्रम विभाजन खत्म हो गया होगा इसलिए जो जिस भी काम को जरूरी समझेगा उसे करने में सक्षम होगा । 2) काम, उपभोग, और अवकाश के वक्त दूसरों के साथ और दूसरों के लिए काम व्यक्ति के जीवन का ज्यादातर हिस्सा होगा । 3) जमीन से लेकर समुद्र और भोजन तक सब कुछ सामाजिक स्वामित्व के मातहत होगा । 4) समूची दुनिया मनुष्य के मकसद के लिए सचेत तौर पर उत्पादित वस्तुओं से बनी होगी । प्राकृतिक शक्तियों के ज्ञान और उन पर नियंत्रण के जरिए मनुष्य अपने भाग्य का निर्धारण खुद ही करेगा । 5) लोगों की गतिविधियों को संगठित करने के लिए बाहरी ताकत की जरूरत नहीं होगी । 6) राष्ट्र, नस्ल, धर्म, रिहायश, पेशा, वर्ग और परिवार पर आधारित सभी मानव विभाजन खत्म हो जाएंगे । इसी तरह मनुष्य का समाजीकरण और समाज का मानवीकरण होगा ।


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