विजेन्द्र
अनिल के मरणोपरांत प्रकाशित कहानी संग्रह‘फर्ज़’पर एकाधिक कारणों से ध्यान देना होगा । इसे उनके
पुत्र सुनील श्रीवास्तव ने संपादित किया है और प्रकाशन 2026 में अभिधा प्रकाशन से हुआ
है । इस कहानी संग्रह से न केवल विजेन्द्र अनिल बल्कि उस समय भोजपुर और बिहार में फूटी
विद्रोही रचनात्मकता की साफ झलक मिलती है । वह समय न केवल किसान आंदोलन और संघर्ष के
नये अध्याय के लिए मशहूर हुआ बल्कि उसकी ऊर्जा ने युवा साहित्यकारों की नयी जमात को
जन्म दिया । इनमें विजेन्द्र अनिल भी शामिल थे । इन साहित्यकारों ने संघर्ष के चित्रण
की जो नूतन प्रविधि विकसित की उसमें भाषा के नवाचार का विशेष महत्व था । भोजपुरी में क्रांतिकारी गीत लेखन ने उसे नयी
पहचान दी थी । भोजपुरी में इस नये तरह के लेखन से अलग हिंदी
लेखन को भी इस भाषिक नवीनता ने जमीनी आधार दिया और कहानियों के पात्र इस भाषा में
पूरी तरह जीवंत हो उठे । जो भोजपुरी बोलने वालों के दुख और दर्द की अभिव्यक्ति का
माध्यम थी वह सहसा हक और दावेदारी की लड़ाई के वर्णन का माध्यम बन गयी । ये अधिकार
संविधान प्रदत्त मूल अधिकार होने के साथ मानवाधिकार भी होते थे । कहानियों की जान
इन अधिकारों को हासिल करने के लिए होने वाली जुझारू लड़ाई है । यह लड़ाई ही कहानियों
के पात्रों को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है । कहानियों में बीच बीच में भोजपुरी के ये
गीत भी आते रहते हैं । जिन गीतों की उपस्थिति है वे लोकगीत की तरह के ही संघर्ष
गीत हैं । इनसे इस संघर्ष का सांस्कृतिक और रचनात्मक आयाम बनता है ।
इस
संग्रह में कुल दस कहानियां रखी गयी हैं जिनमें संग्रह की शीर्षक कहानी अंतिम है । इस कहानी में आत्मकथात्मकता की हल्की गंध है । ये
सभी किसी न किसी पत्रिका में प्रकाशित हैं । कहानियों के साथ उन पत्रिकाओं का नाम
और प्रकाशन का वर्ष महीना भी दे दिया गया है । इससे उस समय की महत्वपूर्ण लघु
पत्रिकाओं की सूचना मिल जाती है । बिहार, उत्तर प्रदेश तथा हिंदी भाषी क्षेत्र से
छपने वाली इन पत्रिकाओं का महत्व उन स्वरों को सामने लाने में निहित है जिन्हें
पुरस्कार और प्रसिद्धि के बाहर और उनका प्रतिरोधी माना जाता था । इस समय के पुरस्कार
बहुल वातावरण के लिए, जब प्रतिरोधी पहल का भी एक हिस्सा बिना किसी संकोच या दुविधा
के वित्त पोषित नजर आता है, उस समय की कल्पना भी मुश्किल है जब समझदार पाठक मिलना ही
सबसे बड़ा पुरस्कार हुआ करता था और सभाओं की जगह छोटे छोटे समूहों में रचनापाठ और
उस पर खुली बातचीत ही आलोचना का सबसे प्रामाणिक रूप माना जाता था । इस लेखन और उस
पर बातचीत में वैचारिक सघनता हुआ करती थी और तीखी बहसों के बावजूद कटुता नहीं पैदा
होती थी । ये कहानियां उसी समय की उपज हैं जब छपने से पहले किसी भी रचना को इस
कठिन अग्निपरीक्षा से गुजरना होता था ।
कहानियों के पात्र जिस वातावरण में अवस्थित हैं वहां उनकी
सामाजिक हैसियत और आर्थिक स्थिति आपस में मिल जाते हैं । ग्रामीण इलाके के सामाजिक
ढांचे में जमीन का सवाल सबसे प्रमुख है । जमीन
की जरूरत खेती के लिए तो है ही, रहने के लिए भी जमीन चाहिए होती है और जब रहेंगे
तो खाने के लिए अन्न उगाने हेतु जमीन ही सुलभ संसाधन होती है । जमीन के संसाधन
होने से उसके साथ कामगार और मालिकाना जुड़ा होता है । अपवाद के बतौर ही कुछेक पात्र
जमीन के मालिक हैं, अधिकतर उस पर काम करने वाले कामगार तबके से संबद्ध हैं । हमारे
सामाजिक ढांचे से जिसका परिचय हो वह जानता है कि इसी मालिकाने के हिसाब से सामाजिक
व्यवस्था भी निर्मित है । कामगार पात्रों के सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी खूबी स्त्रियों
की बराबरी है । असल में मालिकों के मुकाबले कामगार तबके की स्त्रियों के लिए जीने
का मतलब खेत में काम करना है । वे आर्थिक रूप से पुरुष पर निर्भर नहीं होतीं इसलिए
उनमें बराबरी की मानसिकता होती है ।
स्त्रियों की तरह ही खेतिहर जीवन के
साथ इन कहानियो में मुस्लिम पात्रों की बहुतायत अचरज में डालने वाली है । इन सबका
जीवन खेती और जमीन के साथ जुड़े संघर्ष से बना है । जमीन का मालिकाना हमारे देश का
महत्वपूर्ण तत्व है । सभी जानते हैं कि आजादी के आंदोलन में जब किसान आये तो उनके
साथ ही जमींदारी का सवाल भी आया । रामविलास शर्मा का मानना है कि सबसे बड़ा जमींदार
अंग्रेज था । इसका सबूत नील और अफीम जैसी नकदी फसलों की खेती के लिए अपनायी गयी
व्यवस्था थी । इसके अतिरिक्त अपने शासन और शोषण की व्यवस्था को चलाते रहने के लिए
अंग्रेजी राज ने देशी जमींदारों को विकसित किया और उन्हें संरक्षण भी दिया । यही
कारण है कि आजादी के आंदोलन के साथ जमींदारी उन्मूलन का सवाल भी जुड़ गया था । कागज
में आजादी के बाद जमींदारी खत्म भी हुई लेकिन जमीन पर मालिकाना कायम रहा । खेती के
लिए जमीन के मालिक के साथ कामगार की भी जरूरत होती है । इस कामगार समुदाय की
आकांक्षा के साथ संसाधनों के बंटवारे की व्यवस्था का टकराव होने से भूमि संघर्ष का
जन्म होता है । यही संघर्ष सारी कहानियों का मर्म है । यह संघर्ष कामगारों को
स्वतंत्र व्यक्तित्व प्रदान करता है ।
उनका यह व्यक्तित्व दबकर सहने की जगह
अपने हक के लिए बोलने में व्यक्त होता है । जब भी अभिव्यक्ति की आजादी की बात होती
है तो उसका अर्थ अखबार की स्वतंत्रता तक सीमित समझा जाता है । हम सभी जानते हैं कि
सामाजिक ढांचे में बोलने का अधिकार भी व्यक्ति की हैसियत से तय होता है । यह
अधिकार कामगारों को सबसे कम मिलता है । लेखक ने संविधान प्रदत्त इस मूल अधिकार को
जमीन पर उतारने का साहस करने वालों की कथा कही है । यह भी याद रखना होगा कि हमारी
वर्तमान सरकार अधिकार के मुकाबले कर्तव्य की बात पर अनायास जोर नहीं देती । यह
कर्तव्य भी उसके लिए संस्थान द्वारा निभाया जाने वाला नहीं होता, बल्कि जिम्मेदारी
नागरिक को दे दी जाती है कि वह कर्तव्य पालन करे । इसीलिए प्रधानमंत्री कार्यालय
से जुड़े कर्तव्य पथ की जगह सेवा तीर्थ बना दिया गया है । नागरिकों का कर्तव्य है
कि वे सरकार की सेवा करें ।
उनके व्यक्तित्व का यह बदलाव बोलने
की हिम्मत नक ही सीमित नहीं रहता, संगठन बनाने तक पहुंचता है । हम सभी जानते हैं
कि शासक समूह अपने अधीनस्थ को काबू में रखने के लिए उनके बीच विभाजन को जन्म देता
है । इसलिए हक के लिए लड़ने वाले संगठन पर जोर देते हैं ताकि उत्पीड़ितों के बीच समझ
पर आधारित एकता बन सके । यह एकता अपने आपको संगठन में व्यक्त करती है । जमीन के
मालिक भी अपनी प्रभुता की रक्षा के लिए संगठन का निर्माण करते हैं । वास्तव में
बनी ‘भूमि सेना’ का फर्ज़ कहानी में कथात्मक प्रतिरूप ‘किसान रक्षा वाहिनी’ है । इस
नाम में ही विडम्बना है क्योंकि इसमें किसान की जगह खेतों के मालिकान हैं । इसके
विरोध में किसान सभा है जो गंगा के पेट से निकली जमीन पर बसने के हक के लिए संगठित
हो रहे हैं । बसने का उनका यह अधिकार मानवाधिकार की श्रेणी में आता है । यह मूलभूत
अधिकार भी हासिल करने के लिए उन्हें लड़ाई करनी पड़ती है ।
व्यक्तित्व का यही बदलाव ‘रात बिरात’ कहानी में मुस्लिम दुकानदार के मन में दूसरे धर्म के एक यात्री के प्रति भी करुणा को जन्म देता है । मनुष्य एकता का यह भावात्मक विस्तार अद्भुत है और इसका कथात्मक प्रतिनिधित्व भी ध्यातव्य है । जाने पहचाने के प्रति सहानुभूति सहज मानवीय गुण है लेकिन अनजान मुसाफिर को पत्नी के साथ रात हो जाने पर घर में शरण देना अन्याय के विरुद्ध संघर्ष से उपजी चेतना का बहुत पक्का सबूत है ।
इस कहानी संग्रह की एक और विशेषता खेती के साथ जुड़े शब्दों का बेधड़क इस्तेमाल है । इसके आधार पर ऐसे शब्दों का पूरा कोश तैयार किया जा सकता है जिनका प्रयोग आज भी गांव देहात में होता है । इन शब्दों के मूल मुगल शासन द्वारा तैयार प्रशासनिक व्यवस्था का पता देते हैं जिसने हमारे देश को दुनिया के पैमाने पर सबसे अमीर देशों में एक बनाने में मदद की थी । उसकी औपनिवेशिक लूट की व्यवस्था ने व्यापक किसान विक्षोभ को जन्म दिया था । इसी विक्षोभ की निरंतरता इन कहानियों में भी दर्ज हुई है ।
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