2026
में वर्सो से ए जे ए वुड्स की किताब ‘द कल्चरल
मार्क्सिज्म कनस्पिरेसी: ह्वाइ द राइट ब्लेम्स द फ़्रैंकफ़र्त स्कूल फ़ार द डिक्लाइन
आफ़ द वेस्ट’
का
प्रकाशन हुआ ।
2021 के
अंत में आक्सफ़ोर्ड शब्दकोष में सांस्कृतिक मार्क्सवाद को जोड़ा गया । इस शब्द का
अतीत विवादित रहा था ।
1930 दशक
के हिटलरी प्रचार में इसके मूल खोजे जा सकते हैं । फ़ासीवादियों की एक अंग्रेजी पत्रिका
में 1938
में
इसका पहली बार इस्तेमाल हुआ था । इस बदनाम इतिहास के वावजूद इसकी लोकप्रियता बढ़ी
है । परिसरों और सड़कों पर इसके दमन की अपील के पोस्टर लगाये गये । रिपब्लिकन पार्टी
के कुछ प्रमुख नेताओं ने अमेरिका के पराभव के लिए इस विचार को जिम्मेदार ठहराते हुए
किताबें लिखी हैं । इसी तरह लैटिन अमेरिका के दक्षिणपंथी शासकों ने अपनी सरकार को
इस वामपंथी बीमारी से दूर रखने का इरादा जाहिर किया । ब्रिटेन में भी कनजर्वेटिव पार्टी
के सांसद इस विचार पर युवकों का दिमाग खराब करने का आरोप लगाते हैं । ट्रम्प समर्थक
एलन मस्क ने भी इस सिलसिले में विकिपीडिया के एक लेख में इसे झूठ मूठ का हौवा बताये
जाने पर चिंता जाहिर की । धीरे धीरे यह शब्द दक्षिणपंथ की शब्दावली में जगह बनाता जा
रहा है । हमारे देश से तुलना करें तो इस तरह का शब्द अर्बन नक्सल या टुकड़े टुकड़े गैंग
है । इस शब्द के जरिए दक्षिणपंथ बताना चाहता है कि पश्चिमी समाजों की संस्कृति विगत
साठ सालों में क्यों बदली ।
उनका
कहना है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल नामक जर्मन विचारकों के एक समूह ने पश्चिमी सभ्यता के
अवसान को तेज गति प्रदान करने के लिए सांस्कृतिक बहुलता, नारीवाद और
पर्यावरण की विचारधाराओं का आविष्कार किया । असल में हिटलरी आतंक से भागकर अमेरिका
आये अडोर्नो और मार्क्यूज जैसे चिंतकों ने वहां के साठ दशक के विद्रोही आंदोलनों
में अपने विचार सफलता के साथ फैलाये । बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उनके समर्थक
विभिन्न संस्थानों में दाखिल हुए और उन्होंने शिक्षा, मीडिया, सरकार और चर्च में
सांस्कृतिक मार्क्सवाद को प्रोत्साहित किया । हाल में दक्षिणपंथी विचारक अश्वेत
आंदोलन,
समलिंगी
और भिन्न यौनिकता वाले समूहों की मजबूत दावेदारी तथा जलवायु संकट पर चर्चा के पीछे
इसको ही दोषी ठहराते हैं । अमेरिका के अतिरिक्त भी बहुत सारे देशों में इस खतरे से
समाज को बचाने के लिए रूढ़िवादी ताकतें सांस्कृतिक युद्ध ठाने हुए हैं ।
इसके
बाद लेखक ने इन दोनों शब्दों के अर्थ जानने का प्रयास किया है । रूढ़िवादी आलोचकों
को लगता है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल ने 1930 दशक में कम्युनिस्ट विध्वंस की नयी रणनीति
बनायी । मजदूरों की कोई अगुआ कम्युनिस्ट पार्टी बनाने या कारखानों पर सीधे कब्जा
करने की जगह उन्होंने पश्चिमी पूंजीवाद के उन्मूलन के लिए बुर्जुआ समाज के
सांस्कृतिक औजारों में घुसपैठ की योजना बनायी । इन केंद्रों पर काबिज हो जाने के
बाद सांस्कृतिक मार्क्सवादियों ने विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों की मांगों को स्वर
देना शुरू किया और इस तरह गोरी बहुसंख्या की सभ्यतागत विरासत को तहस नहस कर डाला ।
आरोप है कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के इन विद्रोहियों को यकीन था कि पश्चिमी संस्कृति के
विनाश से मार्क्सवादी समता का सपना साकार होगा । इस दक्षिणपंथी धारणा के मुताबिक
संस्कृति तो देसी आबादी के मूल्यों को ही प्रतिबिम्बित करती है । इन्हीं मूल्यों
के धागे से किसी भी देश के नागरिक तमाम शत्रुता और मतभिन्नता के बावजूद आपस में
जुड़े बताये जाते हैं । संस्कृति के बारे में इस धारणा से लेकिन 1960 दशक के बाद के
सामाजिक बदलावों की सटीक व्याख्या नहीं मिल पाती । कारण कि अल्पसंख्यकों की अधीनता
को इसमें स्वाभाविक मान लिया जाता है । ऐसी स्थिति में रूढ़िवादी लोग मानते हैं कि
पश्चिम के विनाश के लिए किसी बाहरी शक्ति ने सांस्कृतिक उत्पादन के घटकों पर कब्जा
कर लिया है । अपनी रक्षा के लिए सांस्कृतिक मार्क्सवाद के ये विरोधी सार्वजनिक
जीवन से सांस्कृतिक चेतना के रेशे रेशे को समाप्त करने के लिए कानून बनवाते हैं, जीवनशैली में
बदलाव की वकालत करते हैं या फिर हिंसा का सहारा लेते हैं । वे फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के
समर्थकों पर ऐसी जादुई शक्ति आरोपित करते हैं जो सभी किस्म के अंतर्विरोधों और
विपरीत दिशा में सक्रिय ताकतों पर काबू पा लेती है ।
इसमें
तो कोई दो राय नहीं कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल का महत्व ऐतिहासिक रहा है । 1923 में इसकी
स्थापना मार्क्सवादी बौद्धिकता को सांस्थानिक आधार देने के लिए हुई थी । इस
संस्थान के चिंतकों ने हेगेलीय दर्शन,
मार्क्सवादी
राजनीतिक अर्थशास्त्र और फ़्रायड के मनोविश्लेषण को जोड़कर सामाजिक आलोचना का रास्ता
निकाला जिसे आलोचना सिद्धांत कहा गया । उनके लेखन से आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता की
प्रकृति,
फ़ासीवादी
प्रचार की गतिकी तथा कला और संस्कृति के वस्तूकरण के बारे में अंतर्दृष्टि मिलती
है ।
इस
समूह के अनेक सदस्य तीस के दशक में हिटलरी शासन के चलते भागे और उन्हें अमेरिका
में शरण मिली तथा शोध व अध्यापन का रोजगार भी मिला । 1960 के दशक में मार्क्यूज ने
विद्यार्थी आंदोलन का उत्साह के साथ समर्थन किया और उन्हें नव वाम का गुरू भी कहा
गया । फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के कुछ विद्यार्थी अध्यापन में भी बहुत सफल रहे । कुछ तो
वामपंथ के महत्वपूर्ण कार्यकर्ता हुए । आज भी उनके लेखन की लोकप्रियता बरकरार है ।
उनकी किताबों के नये संस्करण छपते और पढ़े जाते हैं । यह किताब इस समूची प्रक्रिया
के बहुत सीमित अंश का विश्लेषण करती है । इसमें केवल उनके तर्कों का ही जिक्र है
जो मानते हैं कि पश्चिम के सभ्यतागत पराभव की जिम्मेदारी फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के
सांस्कृतिक मार्क्सवाद पर है । इसमें कुछ सांस्कृतिक गुत्थियों को सुलझाने का
प्रयास है । पहली कि सांस्कृतिक पराभव को जर्मन मार्क्सवादियों के इस समूह से
जोड़ने की कहानी क्यों बनायी गयी । दूसरे कि प्रतिक्रियावादी ताकतों को आज भी इस
कहानी में यकीन क्यों है और सांस्कृतिक मार्क्सवाद को षड़यंत्र की तरह देखने का चलन
किस तरह आगे बढ़ा ।
अन्य
विद्वानों ने भी इन सवालों का जवाब देने की कोशिश की है । उनका कहना है कि
सांस्कृतिक मार्क्सवाद का यह हौवा पुराने यहूदी मार्क्सवाद या बोल्शेविक
सांस्कृतिक हमले के हौवे का ही नया रूप है । एक जमाने में यह भी माना जाता था कि
कम्युनिस्ट विचारधारा यहूदियों का षड़यंत्र है । इसके विश्वासी लोगों का कहना था कि
रूस और अन्य देशों की कम्युनिस्ट क्रांतियों का असली मकसद ईसाइयत को पश्चिम से
उखाड़ फेंकना है । द्वितीय विश्वयुद्ध के आसपास सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले का
प्रचार हिटलर का तंत्र करता था । कहा जाता था कि यहूदी लोग पश्चिमी संस्कृति को
नष्ट करने की गुपचुप कोशिश कर रहे हैं और कम्युनिस्ट आंदोलन को इसी उद्देश्य से
खड़ा किया गया है । इस धारणा के स्रोत हिटलर की किताब में नस्ल और संस्कृति के बारे
में व्यक्त विचार थे । एक हिटलरी सिद्धांतकार ने तो नस्ली सौंदर्यशास्त्र की धारणा
भी बनायी थी । वे आधुनिकतावाद को पतनशील कला कहते थे और मानते थे कि यहूदी
कम्युनिस्ट चालबाजी के तहत इसे फैलाया जा रहा है ।
यह
तो सही है कि इन पुराने विचारों और सांस्कृतिक मार्क्सवाद के हल्ले के बीच बहुत
सारी समानता है । 1938
में
ही ब्रिटेन के फ़ासिस्टों ने सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले को सांस्कृतिक मार्क्सवाद
कहा था । उनके द्वारा दिये गये इस नाम को लोग भूल गये थे । वह तो इसे फिर से 1990 दशक के पूर्वार्ध
में यह नाम दिया गया । वर्तमान दक्षिणपंथी कार्यकर्ता और लेखक इस बात पर जोर देते
हैं कि फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के अनेक सदस्य यहूदी थे । इस तरह वे कहना चाहते हैं कि
सांस्कृतिक पतन की दिशा में सोचना उनके लिए आनुवंशिक तौर पर सहज था । इंटरनेट पर
फ़ासीवादी कोश में भी सांस्कृतिक मार्क्सवाद और सांस्कृतिक बोल्शेविक हमले को
समानार्थी बताया गया है ।
इन
सबके बावजूद लेखक को लगता है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद की इस नयी धारणा और पुरानी
समानार्थक धारणाओं में अंतर है । इनको समान समझने के पीछे मान्यता है कि इनकी
अंतर्वस्तु इनकी अभिव्यक्तियों की भिन्नता के बावजूद एक समान ही बनी हुई है । इस
मान्यता में विचारों की खासियत की उपेक्षा नजर आती है और मान लिया जाता है कि
समस्त दक्षिणपंथी राजनीति बुनियादी तौर पर एक समान ही होती है । लेखक मानते हैं कि
सांस्कृतिक मार्क्सवाद की शब्दावली और फ़्रैंकफ़र्त स्कूल को षड़यंत्र की तरह देखने
का एक और भी इतिहास है । इसके बाद यह शब्दावली और धारणा हिटलरी शब्दकोष में घुसी और
बोल्शेविक सांस्कृतिक हमले का समानार्थी बनी । इस जटिल कहानी पर ध्यान देने की
जरूरत लेखक को महसूस होती है । इसके बिना सांस्कृतिक मार्क्सवाद को षड़यंत्र के रूप
में पेश करने का इतिहास अच्छी तरह समझना मुश्किल है ।
इस
इतिहास में गोता लगाने से पहले वे अपनी शब्दावली पर गौर करना जरूरी समझते हैं ।
इसके तहत वे षड़यंत्र सिद्धांत की धारणा की चीरफाड़ करते हैं । इसके लिए वे फ़ूको से
विश्लेषण के औजार लेते हैं । उनका कहना है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद का अर्थ
प्रयोग के राजनीतिक संदर्भ के अनुसार बदलता रहा है । इसलिए किसी एक सांस्कृतिक
मार्क्सवाद की जगह अनेक सांस्कृतिक मार्क्सवादों की बात करनी होगी । लेखक का कहना
है कि उसके बदलते अर्थों को संदर्भ देते हुए इसका इतिहास बनाने की कोशिश इस किताब
में की जाएगी । उसे षड़यंत्र सिद्धांत के बतौर प्रस्तुत करना सबसे नया मामला है ।
अलग अलग राजनीतिक संदर्भों में इसके अर्थ, भूमिका और उपयोग बदलते रहे हैं । इस
नजरिए को अपनाने से यह समझने में मदद मिलेगी कि दक्षिणपंथी लेखक और कार्यकर्ता नये
श्रोताओं के मुताबिक और नयी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए इसके अर्थ को
अनुकूलित करते रहे हैं ।
सही
संदर्भ प्रदान करने की इस पद्धति में लेखक ने समय का विशेष ध्यान रखा है ।
विश्लेषण की इस पद्धति की प्रेरणा उन्हें ग्राम्शी से मिली है । ग्राम्शी ने किसी
खास ऐतिहासिक दौर में राजनीति,
संस्कृति
और अर्थतंत्र के जटिल रिश्तों को पहचानने लायक मार्क्सवादी विश्लेषण का तरीका विकसित
किया । पूंजीवादी उत्पादन पद्धति जैसी मार्क्स की अनेक धारणाओं को भी इसी तरह का
अमूर्तन समझा जा सकता है जो पूंजीवादी समाज के बुनियादी लक्षणों को उजागर करते हैं
। इस विश्लेषण के तहत पूंजीवादी विकास के खास दौर में किसी भी समाज के हालात की
परीक्षा की जाती है । यह ऐसा क्षण होता है जब विभिन्न तरह की ताकतें या घटक आपस
में मिलकर उस भूमि का निर्माण करते हैं जिस पर वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष संचालित
किया जाता है । इस विश्लेषण में ग्राम्शी आंगिक और सामयिक के बीच भेद करते हैं ।
आंगिक
किसी भी सामाजिक गठन के अपेक्षाकृत स्थायी लक्षण होते हैं । आंगिक तथ्य वे संबंध
होते हैं जो किसी भी समाज के दैनन्दिन जीवन में समा गये होते हैं । इसके उदाहरण
श्रम संबंध,
आर्थिक
ढांचा,
सरकारी
संस्थान,
सांस्कृतिक
व्यवहार और कानूनी प्रक्रिया हैं । राजनीतिक उथल पुथल या बाजार के उतार चढ़ाव से इन
तत्वों पर बहुत असर नहीं पड़ता । सामान्य तरीके से कहें तो आंगिक का अर्थ यथास्थिति
भी निकलता है । जब इस यथास्थिति को संकट का सामना करना पड़ता है तो संघर्ष का
सामयिक इलाका खुल जाता है । आंगिक संकट पूंजीवादी विकास के अंतर्निहित
शत्रुतापूर्ण संबंधों की उग्रतर अभिव्यक्ति होते हैं । इसमें सामान्यता बाधित हो
जाती है,
पहले
से चले आ रहे तौर तरीकों को चुनौती का सामना करना पड़ता है और पारम्परिक सहजबोध
गड़बड़ा जाता है । इस आंगिक संकट से निपटने और यथास्थिति के संरक्षण के लिए
प्रभुत्वशील ताकतें संघर्ष के सामयिक क्षेत्र में उतरती हैं । सामाजिक समस्याओं को
काबू करने के लिए वे नयी नीतियों का प्रस्ताव कर सकते हैं, विक्षोभ से निपटने
के लिए पुलिस की शक्तियों को बढ़ा सकते हैं या बजट के घाटे को कम करने के लिए
सार्वजनिक क्षेत्र में कटौती की घोषणा कर सकते हैं । संतुलन हासिल करने के लिए वे
अन्य समूहों से समझौता कर सकते या मोर्चा बना सकते हैं । ऐसी स्थिति में वैकल्पिक
या विपक्षी राजनीति करने वालों को जनता के सामने संकट का अपना समाधान प्रस्तुत
करना चाहिए । इन प्रयासों की सफलता का मूल्यांकन सबको कायल करने की और सामाजिक
शक्तियों के मौजूदा संतुलन को बदलने की उनकी क्षमता के आधार पर किया जा सकता है ।
नया शक्ति संतुलन स्थापित करने या वर्चस्व की नयी व्यवस्था कायम करने के ये सामयिक
प्रयास उथल पुथल की जगह सामाजिक स्थिरता कायम करने की ओर लक्षित होते हैं ।
लेखक
का सवाल है कि सांस्कृतिक मार्क्सवादों के अध्ययन में विश्लेषण की इस पद्धति का
इस्तेमाल किस तरह किया जाए । वे सबसे पहले याद दिलाते हैं कि यह धारणा किसी के
दिमाग में यूं ही नहीं पैदा हो जाती । इसका जन्म सामयिक संघर्ष की गरमी में होता
है । खास राजनीतिक ताकतों के वैचारिक मकसद को पूरा करने के लिए इनका निर्माण किया
जाता है । आम लोगों को संकट के कारण से अवगत कराना होता है और बेहतर समाज के किसी
खास नमूने के पक्ष में उनका समर्थन हासिल करना होता है । सामयिक विश्लेषण से वह
भूमि स्पष्ट होती है जहां ये ताकतें पैदा और गोलबंद होती हैं । इस विश्लेषण से नजर
आ सकता है कि कोई खास ताकत क्यों अलग किस्म की राजनीति करती है और क्यों कुछ ही
समस्याओं को उठाने का फैसला करती है । किताब में ऐसा कोई अंतिम विश्लेषण मुहैया
कराने का दावा लेखक ने नहीं किया है । इस दिशा में सोचने और लिखने के लिए तो
एकाधिक लोगों के सामूहिक प्रयास की जरूरत होगी । कोई भी एक लेखक उन तमाम ताकतों, दबावों, प्रवृत्तियों, तनावों, शत्रुताओं और
अंतर्विरोधों को पकड़ नहीं सकता जिनसे मिलकर कोई भी खास समय बनता है । सामयिक
विश्लेषण की दीर्घकालीन परम्परा पर आश्रित रहने के बावजूद लेखक को अपना विश्लेषण
आंशिक और तदर्थ ही लगता है । इसके जरिए उन्होंने देखा है कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद
के विचारों का उत्पादन और प्रसार कैसे सम्भव हुआ । इसके लिए उन्होंने काल और भूगोल
की सीमा पहले ही तय कर ली है । उन्हें उम्मीद है कि अन्य लोग इसे विस्तार और गहराई
प्रदान करेंगे । इसी क्रम में लेखक द्वारा प्रस्तुत तर्कों और व्याख्याओं को भी
आगे ले जाया जाएगा । वैसे भी इस सांस्कृतिक मार्क्सवाद की कहानी का अभी अंत नहीं
हुआ है ।
उन्होंने
पहले ही कहा कि बोल्शेविक सांस्कृतिक हमले और सांस्कृतिक मार्क्सवाद में समानता तो
है लेकिन कहानी की शुरुआत 1920 या 1930 दशक से नहीं होती । विश्लेषण हेतु वे 1960
दशक से इसकी शुरुआत मानते हैं । इसकी समझ के लिए साठ के दशक के तमाम तरह के
बदलावों और संयोजनों को देखना वे जरूरी समझते हैं । उस दशक को वे मई 1968 तक ही
सीमित नहीं मानते । वे मानते हैं कि यह दशक 1955 से 1974 तक फैला हुआ है और इसका
विस्तार वैश्विक था । इस लम्बे दशक ने क्रांति, विक्षोभ और प्रतिसंस्कृति की
सम्भावना को जन्म दिया । इसी दशक में सामाजिक और नस्ली ऊंचनीच की व्यवस्था की
रक्षा,
विध्वंसक
ऊर्जा को नियंत्रित करने तथा दमन और शोषण की पद्धतियों को बरकरार रखने के लिए
राजनीतिक ताकत का भी बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ । साठ का दशक ऐसा वैश्विक खरल था
जिसमें नस्ल,
लिंग, वर्ग, यौनिकता और पीढ़ी
के मसले पर राजनीतिक और सामाजिक विरोध के साथ ही तकनीक के नये रूप, सूचना और संचार
क्रांति तथा व्यावसायिक बाजार का फैलाव भी मिल गया था । जेमेसन तो साठ के दशक का
मूल उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों तक ले जाते हैं । उनके अनुसार दक्षिणी गोलार्ध की
इन घटनाओं ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की विश्व व्यवस्था में उलट फेर को जन्म
दिया । अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के क्रांतिकारी दुनिया भर के साम्राज्यवाद विरोधी
क्रांतिकारी आंदोलनों की सफलता से प्रेरणा ले रहे थे । फ़ैनन, माओ और चे की
किताबें उनको दिशा दिखा रही थीं । अमेरिका के नव वामपंथी युवक वियतनाम, कम्बोडिया और लाओस
में अपनी ही सरकार के सैन्य हस्तक्षेप का विरोध कर रहे थे । साठ दशक के विद्रोह की
इसी वैश्विकता ने हाशिए पर डाल दिये गये और अल्पसंख्यक बना दिये गये समूहों में इस
उम्मीद को जन्म दिया कि वे इस विश्वव्यापी क्रांति की अबाध प्रगति के अग्रिम
मोर्चे पर खड़े हो सकते हैं । उन्हें पश्चिमी सभ्यता की अजेय श्रेष्ठता का पराभव
सन्निकट लगने लगा था ।
इसी
साठ के दशक में नस्ल,
लिंग
और यौनिकता की नयी सामाजिक और राजनीतिक कोटियों को भी लोकप्रियता मिली । वर्ग
संघर्ष आधारित पुराने रूपों का जुझारूपन मंद पड़ने लगा था । अमेरिका में शीतयुद्ध
के समय बनी कम्युनिस्ट विरोधी सर्वसम्मति ने ट्रेड यूनियन आंदोलन की वैधता को
चुनौती दी । सोवियत खेमे के कुछेक देशों में रूसी दबदबे का विरोध प्रकट हुआ ।
राजनीति के नये तरीके सामने आये । नारीवाद की दूसरी लहर ने निजी के राजनीतिक होने
का नारा दिया । उसने निजी अनुभवों तथा दमन के व्यापक ढांचों में सम्पर्क देखने पर
जोर दिया । अश्वेत सत्ता और स्त्री तथा समलैंगिक मुक्ति के आंदोलनों ने पहचान की
राजनीति की शुरुआत की । इस राजनीति ने मौजूदा व्यवस्था की आलोचना के साथ आगामी
मुक्ति के सपने को जोड़ा । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवादी समाजों में व्याप्त
सामाजिक बहिष्करण,
अधीनता
और अवरोधों से निर्मित यथास्थिति को इन्होंने उजागर कर दिया । अमेरिकी शिक्षा में
स्त्री अध्ययन,
अश्वेत
अध्ययन और मूलवासी अध्ययन हेतु इन आंदोलनों ने लड़ाई लड़ी । ज्ञान के नये रूपों के
विकास हेतु नस्ली,
यौनिक
और लैंगिक पहचानों को आधार बनाया जाने लगा । माना गया कि इससे सत्ता और दमन के
विविध आयामों को देखने में भी मदद मिलेगी । साठ के दशक के बाद से अनेक देशों में
स्त्रियों,
नस्ली
अल्पसंख्यकों और विभिन्न यौनिक समूहों ने बहुत सारे नागरिक अधिकार अर्जित किये और
सामाजिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभायी । समता और समावेशन के ये रूप आंशिक और
अंतर्विरोधी थे फिर भी इनसे सामाजिक जीवन में उदारता आयी और ऊंचनीच की पुरानी
व्यवस्था में थोड़ी ढिलाई आयी ।
उस
समय संस्कृति की धारणा भी बदली । बीसवीं सदी के मध्य में बहुत सारे विकसित देश
औद्योगिक उत्पादन की जगह सेवा और सूचना आधारित समाजों में बदले । इसे उत्तर
औद्योगिक अर्थतंत्र कहा गया और माना गया कि इसमें संस्कृति की पहुंच दैनन्दिन तक
प्रसारित हो गयी है । फ़िल्म,
टेलीविजन, संगीत, फ़ैशन, विज्ञापन, अखबार और पत्रिका
ने सबके अस्तित्व को प्रभावित करना शुरू किया और उनकी ताकत में बेतरह इजाफ़ा हुआ है
। किशोर और युवक इस नयी और उत्तेजक युवा संस्कृति के उपभोक्ता बने । इस नयी
संस्कृति ने बोलने,
पहनने
और व्यवहार की पारम्परिक आदतों को भी बदल दिया । मानविकी और समाज विज्ञान के
विद्वान भी इस सांस्कृतिक मोड़ पर विचार करने लगे । पूंजीवादी समाजों में
सांस्कृतिक उत्पादन और उपभोग पर केंद्रित संस्कृति अध्ययन में ग्राम्शी के
सिद्धांतों का उपयोग शुरू हुआ । पहले जहां समझा जाता था कि मास संस्कृति लोगों को
निष्क्रिय उपभोक्ताओं में बदल रही है उसकी जगह नये सिद्धांतकारों ने लोकप्रिय
संस्कृति को राजनीतिक संघर्ष के औजार के रूप में देखना शुरू किया । इन बौद्धिकों
ने मास्को से नजदीकी समाप्त करके सांस्कृतिक राजनीति का व्यापक और लोकप्रिय रूप
विकसित करने के लिए अन्य आंदोलनों के साथ संवाद शुरू किया । साठ दशक के बाद से सांस्कृतिक
सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में अधिकाधिक आते गये ।
साठ
के दशक को उदार सहमति और युवा विद्रोह तक सीमित करना सही नहीं होगा । दक्षिणपंथी
तख्तापलट और नव औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों से लेकर पुलिस दमन और राजकीय निगरानी तक
साठ का दशक सत्ता और विशेषाधिकार के संरक्षण हेतु असाधारण ताकत के इस्तेमाल का भी
दशक था । उसी समय तमाम दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक आंदोलन उभरे जिनका
मकसद पश्चिमी सभ्यता की मौजूदा ऊंचनीच की रक्षा करना था । इन ताकतों को ऐसे
बौद्धिकों की जरूरत थी जो तथाकथित सांस्कृतिक पतन के कारण बता सकें, समर्थकों को
सुसंगत राजनीतिक पहचान हेतु गोलबंद कर सकें और रूढ़िवादी पुनरुत्थान के सपने परोस
सकें । साठ के दशक में जो भी सामाजिक बदलाव शुरू हुए उनका प्रतिरोध करने और उन्हें
पलट देने की कोशिश से सांस्कृतिक मार्क्सवाद के हौवे का गहरा नाता है । लेखक समझना
चाहते हैं कि दक्षिणपंथ के ये बौद्धिक राजनीतिक आंदोलनों के साथ किस तरह का रिश्ता
रखते हैं । उनकी भूमिका की छानबीन के सिलसिले में लेखक को बुद्धिजीवियों के बारे
में ग्राम्शी की धारणा उपयोगी प्रतीत होती है ।
ग्राम्शी
के लेखन में बुद्धिजीवियों की धारणा का खास महत्व है । वे इस धारणा को विख्यात
बुद्धिजीवियों के परे ले जाना चाहते थे । वे इसकी अमूर्त धारणा की जगह देखना चाहते
थे कि खास किस्म के बौद्धिकों का निर्माण ऐतिहासिक तौर से कैसे हुआ है और उनकी
राजनीतिक भूमिका क्या होती है । ग्राम्शी का यह रुख विश्लेषणात्मक है जो समझता है
कि बुद्धिजीवियों के विभिन्न समूहों की वास्तविक राजनीतिक चेतना और गतिविधियों को
आकार देने वाले हालात और प्रक्रियाएं कौन सी रही हैं । उन्होंने शुरू करने के लिए
तात्कालिक, प्रत्यक्ष और जीवंत को चुना, व्यापक ऐतिहासिक परिघटना को समझने के लिए
सामाजिक आचरण और भौतिक परिस्थिति की छानबीन की । बुद्धिजीवियों की बात करते हुए
बहुधा उन्होंने ठोस भौतिक यथार्थ के महत्व पर जोर दिया । उनका कहना था कि बौद्धिक
समूह का निर्माण अमूर्त लोकतंत्र की भूमि पर नहीं होता बल्कि एकदम ठोस पारम्परिक
ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के अनुसार इसका निर्माण होता है । ग्राम्शी की इसी समझ के
अनुरूप लेखक ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद का हौवा खड़ा करने वालों की शिनाख्त की है ।
ये सभी लोग उस वैचारिक संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल हैं जो सामाजिक वर्गों,
राजनीतिक ताकतों और अधिरचना के संस्थानों के खास किस्म के संबंध से पैदा होता है ।
सांस्कृतिक मार्क्सवाद के बारे में प्रत्येक कथन को इसी संदर्भ में देखना होगा ।
इस
किताब में लेखक ने किसी धारणा की उत्पत्ति से लेकर उसमें आये बदलावों का एकरेखीय
इतिहास उकेरने की जगह पर सांस्कृतिक मार्क्सवाद की बहुलता को देखने का प्रयास किया
है । इस यात्रा में उन्होंने इधर उधर का भी रास्ता लिया है और निरंतरता को भंग भी
किया है । इसमें उस इतिहास को सुलझाया गया है जिसका एक सिरा महत्वोन्मादी नेता से
उलझा है तो दूसरे सिरे पर रूढ़िवादी चिंतको का कोई समूह है तो कभी इसके निशान किसी
ईसाई दक्षिणपंथी दस्तावेजी फ़िल्म में मिल गये । सांस्कृतिक मार्क्सवाद की यह कहानी
दुनिया भर की प्रतिक्रियावादी राजनीतिक शक्तियों द्वारा बार बार सुनायी गयी ताकि
समता, लोकतंत्र और न्याय के विरोध को सही ठहराने के नये नये तरीके तलाशे जा सकें ।
अगर व्यक्तियों की बीमार मानसिकता में ही इसके स्रोत देखेंगे तो कभी हम इसे समझ
नहीं सकते । इसे समझने के लिए हमें संस्थानों को देखना होगा । इसके विश्लेषण हेतु
सामयिकता का रुख अपनाना होगा और इसे ढांचागत तर्क समझने होंगे । ग्राम्शी ने कहा
था कि किसी व्यक्ति के दिमाग में विचार और मत अपने आप नहीं पैदा होते । उसे मौजूदा
यथार्थ का राजनीतिक स्वरूप देने वाले कुछ केंद्र होते हैं । इस किताब में भी व्यक्तियों
के दिमाग की जगह इन्हीं केंद्रों की छानबीन की गयी है ।
किताब
में सांस्कृतिक मार्क्सवाद के दावे से इनकार नहीं किया गया है । कुछ बातें तो सही
हैं भी । मार्क्यूज ने कहा था ही कि साठ के दशक के बाद नव वाम की रणनीति संस्थाओं
के जरिए दीर्घकाल तक बने रहने की होनी चाहिए । दिक्कत यह है कि इन तथ्यों का उपयोग
फ़्रैंकफ़र्त स्कूल के प्रभाव को बताने या मौजूदा सामाजिक यथार्थ को स्पष्ट करने के
लिए नहीं किया गया है । इनका तो उपयोग राजनीतिक गोलबंदी के लिए किया जा रहा है
जिसका मकसद कुछेक वंचित समूहों की बेदखली है । लड़ाई फ़्रैंकफ़र्त स्कूल की विरासत को
लेकर है ही नहीं । संघर्ष तो रहने लायक दुनिया के स्वरूप के निर्धारण को लेकर हो
रहा है । इधर के दिनों में दक्षिणपंथ ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद पर हल्ला बोल दिया
है । इस युद्ध में शामिल प्रतिक्रियावादियों की ताकत और कमजोरी की हमारी समझ पर ही
इस हमले के प्रतिरोध और बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष की उम्मीद टिकी हुई है ।
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