Wednesday, July 1, 2026

आवारा पशु, किसान और सरकार

 

                 

                                             

हमारे देश में खेती के साथ जानवरों का बहुत गहरा रिश्ता है । खेती का काम करने के दौरान किसान के सादा और मेहनत से भरे जीवन में ये जानवर हमेशा मौजूद रहते हैं । खेत से अन्न उपजाने के लिए उसको बीज बोने लायक बनाने के लिए हल खींचने से लेकर फसल के लिए जैविक खाद मुहैया कराने तक इन जानवरों की उपयोगिता भी अनेक किस्म की होती है । इसलिए किसान का इन जानवरों के साथ घरेलू रिश्ता भी बन जाता है । भारतीय साहित्य का बड़ा हिस्सा उनकी इस आपसदारी की गवाही देता है ।

इसमें बुनियादी व्यवधान अंग्रेजी राज के दौरान आया गोरे सैनिकों के लिए फौजी छावनियों में बूचड़खाने खोले गये । कहने की जरूरत नहीं कि बूचड़ अंग्रेजी के बुचर से आया है । गोरे सैनिकों को ठंडे वातावरण में मांस की जरूरत पड़ती रही थी । भारत में भी आहार की उनकी यह आदत बनी रही इसलिए खेती के लिए जरूरी पशुओं का मांस उन्हें दिया जाने लगा । इसका नतीजा यह हुआ कि किसानों को खेती हेतु पशुओं और उनके दूध से मिलने वाले पोषण की कमी महसूस होने लगी । इसी पृष्ठभूमि में हम उस समय आजादी के आंदोलन में गोहत्या के सवाल को महत्वपूर्ण सवाल के बतौर उठता देखते हैं । अंग्रेजी राज भी इसके प्रति संवेदनशील था । उनके लिए इसका एक पहलू सकारात्मक था क्योंकि इस सवाल पर धार्मिक विभाजन तो पैदा किया ही जा सकता था इसलिए उन्होंने इस सवाल को जिंदा रखा । इसके कारण इस मुद्दे में उपनिवेश विरोध का तत्व भी आ जाता है । लेकिन हमारे देश में दुधारू पशुओं का मांस खाने की परम्परा केवल इस्लाम में कुर्बानी के साथ नहीं जुड़ी है । बहुत बड़े क्षेत्र में यह पोषण के लिए आवश्यक प्रोटीन का सस्ता और सुलभ स्रोत भी है । देश की हिंदू आबादी के भी साधनहीन हिस्से में इसके आहार की परम्परा रही है । इसके अतिरिक्त चमड़े का समूचा व्यवसाय पशुओं की खाल पर टिका हुआ है । चमड़े का उपयोग जूता, बेल्ट, पर्स, तमाम अन्य वस्तुओं और संगीत के ढेर सारे वाद्ययंत्रों के बनाने में होता है । इसके अतिरिक्त उनके रक्त का इस्तेमाल विटामिन की गोलियों के निर्माण में भी होता है और पशु चिकित्सक होने के नाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं । 

पशुओं के इस दोहरे किस्म के उपयोग के कारण सरकार की ओर से हमेशा ऐसी नीति की जरूरत रही जिसमें उसके यथोचित संरक्षण के साथ ही उसके औद्योगिक उपयोग की भी सम्भावना बनी रहे । आजादी के बाद के विषाक्त सांप्रदायिक वातावरण में जिन ताकतों ने गांधी की हत्या की उन्होंने ही गोरक्षा के सवाल को राजनीतिक गोलबंदी का साधन बनाया और इसके लिए संसद के सामने हिंसक प्रदर्शन भी किया गया । बहरहाल इस सिलसिले में गांधी का नाम हमने अनावश्यक नहीं लिया । उन्होंने 1910 में ही इसके सांप्रदायिक तत्व को समझ लिया था और सीधे कहा कि आदमी के जान की कीमत उनके लिए गाय से अधिक है ।

उनकी हत्या के बाद न केवल इस मसले पर सांप्रदायिक अभियान को धक्का लगा बल्कि गाय के सवाल पर उनकी राय ही सर्वसम्मति की तरह बनी रही । खेती और चमड़े के व्यावसायिक कारोबार के बीच संतुलन वाली नीति अपनाने के कारण किसान पर बीमार पशु को पालने का बोझ भी नहीं रहता था । इस शांतिपूर्ण माहौल में व्यवधान तब आया जब गांधी के हत्यारों को सरकार पर काबिज होने का मौका मिला । उसके बाद से इस मामले को हिंसक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का अस्त्र बना लिया गया । लेकिन इसमें भी पाखंड और झूठ पर्याप्त फैलाया जा रहा है । एक ओर गाय बचाने का उन्मादी शोर मचाना है तो दूसरी ओर उसके निर्यात का लाभ भी उठाना है । एक से ध्रुवीकरण का राजनीतिक लाभ मिलता है तो दूसरे से देशी और विदेशी कारपोरेट जगत के साथ रिश्ते मजबूत होते हैं ।

कहने की जरूरत नहीं कि इससे हमारे देश के उत्पादक किसान समुदाय का नुकसान होता है । उसे खड़ी फसल वाले खेत की रक्षा के लिए आवारा घूमते पशुओं की समस्या का सामना करना पड़ता है तो दूसरी ओर बीमार पड़े पशुओं का बोझ भी बेवजह उठाना पड़ता है । आवारा घूमती नीलगायों की समस्या का पहले से सामना कर रहे किसान समुदाय पर यह अतिरिक्त बोझ सरकार ने डाल दिया है, उसका संप्रदायीकरण कर रही है और उन पशुओं के निर्यात का लाभ भी उठा रही है ।                                  

No comments:

Post a Comment