Saturday, December 27, 2025

लोकतंत्र से फ़ासीवाद की ओर

 

                               

                                                                      

2024 में कैननगेट से एस तेमेलकुरान की किताब ‘हाउ टु लूज ए कंट्री: द 7 स्टेप्स फ़्राम डेमोक्रेसी टु फ़ासिज्म’ के नये संस्करण का प्रकाशन हुआ । इसे सबसे पहले 1919 में 4थ एस्टेट से छापा गया था । लेखिका ने पाठकों के नाम पत्र के रूप में इस संस्करण की नयी प्रस्तावना लिखी है । शीर्षक में लोकतंत्र और फ़ासीवाद होने से किताब बहुत अच्छी होने की उम्मीद नहीं रह जाती । लेखिका ने बताया है कि इस किताब में जिस रास्ते का उन्होंने वर्णन किया है उस पर चलकर पाठक का देश भी गुम हो जा सकता है । ऐसा होने से बचाने की जिम्मेदारी पाठक की ही है । उनका कहना है कि इतिहास के शुरू से ही मनुष्य तीन तरह की अक्षमता से ग्रस्त रहा है । जब कभी राजनीतिक आपदा से देश को बचाना होता है तो हम सभी देर से जागते हैं । यह आदत बेहद मारक साबित हुई है । खतरे की आहट सुनने का समय आने पर हम बहरे हो जाते हैं । दिमाग की किसी गड़बड़ी के कारण बुरी खबर को हम अनसुना कर देते हैं और खबरची का गला दबाकर दिमागी सुकून हासिल करते हैं । समस्या पैदा होने पर हमें यकीन रहता है कि कोई न कोई कुछ करेगा । बाद में लगता है कि वह कोई तो हमें होना था । इसलिए हमें दस्तावेजी इतिहास पसंग आता है । इन सब बातों के जानने के बावजूद हममें से ही कुछ लोग भविष्य की बात करना बंद नहीं करते । इसकी भी तीन वजहें हैं । खतरे का संकेत मिलने पर चुप रहना मुश्किल होता है क्योंकि अन्यथा हम पागल हो सकते हैं । सच को उजागर होना चाहिए । हम मानकर चलते हैं कि शब्दों की ताकत से मूर्खता का इलाज सम्भव है । हालांकि अक्सर इसका नतीजा खूनखराबे में निकलता है । इसके पीछे कहीं न कहीं यकीन रहता है कि एक न एक दिन मनुष्य अपनी गलतियों से सीखेगा तथा अपने राजनीतिक और नैतिक पतन का विरोध करने में देर नहीं करेगा ।  

2016 में ही लेखिका को तुर्की छोड़कर यूरोप जाना पड़ा था । तब उन्होंने लोगों को बताया कि जो कुछ दुनिया में होना शुरू हुआ है वह सब तुर्की में हो चुका है । तब ट्रम्प को मजाक की चीज समझा जाता था और ब्रेक्सिट को भी हल्के में लिया जा रहा था । उस समय विश्व राजनीति में जो पागलपन चालू हुआ था वह ऐसा विश्वव्यापी प्रयोग लगता था जिसके करने वाले किसी अन्य ग्रह के प्राणी लगते थे जो मानो सर्वाधिक हास्यास्पद राजनेताओं को झेलने की मनुष्य की क्षमता की परीक्षा कर रहे हों । उस समय लेखिका ने सात ऐसे वैश्विक रास्ते महसूस किये जिनसे होकर बहुतेरे देश फ़ासीवाद की गिरफ़्त में आ रहे हैं और यह मजाक की बात नहीं लगी । इन रास्तों का एक आंतरिक तर्क था और इस परिघटना की कार्यपद्धति को पहचाना जा सकता था । उन्हें लगा कि अगर ज्यादातर लोग इसके तरीके को जान लें और तदनुसार कार्यवाही करें तो इस खतरे को रोका जा सकता है ।

समस्या यह थी कि तब इस खतरे को बहुत कम ही लोग लेखिका की तरह फ़ासीवाद कहने को तैयार थे । जब भी वे इस शब्द का खुला प्रयोग करती थीं तो बौद्धिक समुदाय उनसे इतना जल्दी न करने का आग्रह करता था । उनका कहना है कि कोई भी स्थापित व्यवस्था इसी तरह अपनी रक्षा का उपाय करती है । 2019 में किताब के छपने के समय बौद्धिक समूह को खतरा महसूस तो होने लगा था फिर भी व्यवस्था में सुधार का आधारहीन आत्मविश्वास बरकरार था । यह वैचारिक भ्रम अब भी कायम है कि पश्चिमी लोकतंत्र बहुत हद तक परिपक्व हैं । उदार लोकतंत्र की बचकानी बीमारियों से उनकी सेहत में बहुत अंतर नहीं पड़ेगा । ऐसा होना केवल तुर्की या भारत जैसे परिधि के देशों में सम्भव है । उसके बाद जो हुआ उसे बताने की जरूरत नहीं । जिसे दक्षिणपंथी पापुलिज्म कहा जा रहा था वह नासूर की शक्ल ले चुका है । ट्रम्प अब प्रमुख राजनेता है और यूरोप अंधकार के मुहाने पर खड़ा है । बीमारी अर्जेन्टिना में भी पहुंच गयी है । इन सबके ऊपर गाज़ा का जनसंहार पूरी दुनिया के सामने जारी है ।

किताब के पहली बार छपने के बाद से लेखिका को अनेक भाषाओं में सोशल मीडिया में एक ही तरह की बातें देखने में आती रही हैं । सभी कहते हैं कि उनके देश में भी यही सब हो रहा है इसलिए किताब देखें । दुर्भाग्य से ऐसा कहने वालों का बहुमत नहीं बन सका है । लोकतंत्र को बचाने के लिए जितना कम प्रयास हो रहा है वह समस्या की गम्भीरता को देखते हुए बेहद नाकाफी है । उन्होंने देखा कि विगत पांच सालों में मुख्य धारा के बुद्धिजीवियों और मध्यमार्गी राजनेताओं में लोकतंत्र को बचाने के लिए बहुत ऊंचे स्तर की बहसें आयोजित हुईं लेकिन ये लेखिका को अधिकतर अपनी झेंप मिटाने की कोशिश ही महसूस हुईं । वे भी इनमें से बहुत सारी बहसों में शरीक थीं इसलिए उनको मालूम है कि उनमें व्यवस्था की उस समस्या को स्वीकार ही नहीं किया जाता जिसने इस राक्षस को पैदा किया है । अगर मान भी लिया तो वे खुद को इतना ज्ञानी और गम्भीर समझते हैं कि जनता के राजनीतिक फैसलों में उनकी राय न लिये जाने की शिकायत रहती है । आज की दुनिया में तमाम वैज्ञानिक भी कोरोना के दौरान जनता को टीका लगवाने और मास्क पहनने के लिए नहीं समझा सके थे जबकि तमाम झक्की लोग भांति भांति के दैवी षड़यंत्र की कहानियों पर लाखों अंधभक्तों का विश्वास अर्जित कर सके थे । जो लोग राजनीतिक केंद्र को बचाना चाहते थे या लोगों को उनके सहजबोध की ओर लौटाना चाहते थे उनकी हालत चंद मुट्ठी भर समर्थकों को उपदेश देने वालों जैसी रह गयी । दूसरी ओर जनमत संग्रह से पता चल रहा था कि दक्षिणपंथी पापुलिज्म का कुछ देर मजा लेने के बाद लोग खुशी खुशी फ़ासीवाद के गड्ढे में गिर रहे हैं । उसके बाद से सर्वत्र जनता लोकतंत्र से मुख मोड़ रही है । दुखद रूप से उनके सामने कोई चारा भी तो नहीं है ।    

लेखिका को लगता है कि लोकतंत्र की वर्तमान हालत दिखावे से अधिक नहीं रह गयी है । मानवता के सबसे गम्भीर वादे, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को भद्दे मजाक में बदल दिया गया था । जीवन की हकीकत आर्थिक प्रणाली में व्यक्त होती है और उसने इन तीनों को निगल लिया था । सच्ची समानता की बात करना गुनाह था, स्वतंत्रता मांगने लायक भी बची नहीं रह गयी थी । बंधुत्व से सबके मनोरंजन में बाधा पड़ने की आशंका थी । मतदान अलबत्ता कर सकते थे । कुछ कहना हो तो उसके लिए गैर सरकारी संगठनों का रास्ता खुला था । लोकतंत्र तो वैसे भी हकीकत नहीं बन सका था, अब नवउदारवादी अर्थव्यवस्था से जुड़कर वह अपने आदर्शों से और भी दूर हो गया । उसकी इस हालत को हम सबके सामने मानवता की असली अवस्था के रूप में परोसा जा रहा था । इस व्यवस्था में दसियों साल बिता लेने के बाद जनता को उस व्यवस्था में भरोसा ही नहीं रह गया था जो उनकी असुरक्षा को दूर करने का हक भी नहीं दे रही थी । लोग जब इस मजाक से ऊब गये तो उनका गुस्सा जायज था । समस्या यह है कि दक्षिणपंथी झूठे प्रचार के असर में लोग असली दुश्मन की जगह लोकतंत्र, स्त्री, आजादी और प्रवासियों के विरुद्ध खड़े हो गये हैं । नफ़रत में वे अपनी असुरक्षा का इलाज खोज रहे हैं । नफ़रत ने उस खाली जगह को भरा है जो राजनीति की दुनिया से गायब हो चुके लोकतांत्रिक आदर्शों के कारण खाली हुई है । नवउदारवाद के प्रभुत्व की वजह से दुनिया भर के लोग सच सुन ही नहीं सके थे । लोकतंत्र ने नहीं, उसके अभाव ने उन्हें धोखा दिया है । समानता, न्याय और सम्मान के अभाव ने व्यवस्था के दुश्मन को जन्म दिया है । इस दुश्चक्र से जूझने के लिए लेखिका तीन कामों की सलाह देती हैं । सच को उजागर किया जाए, जनता में भरोसा रखा जाए और विफल होने पर बेहतर समझ दिखाई जाए ।

वे अब भी अपने लिखे के असर के बारे मे सोचती हैं । इसीलिए यह किताब उन्होंने अपनी एक किताब की निरंतरता में लिखी । वह किताब हृदयहीन दुनिया में एकजुटता के बारे में थी । मार्क्स ने कहा था कि धर्म हृदयहीन दुनिया का हृदय है । लेखिका ने राहनीति के केंद्र में हृदय को स्थापित करने को सोचा । ऐसा हृदय जो वर्तमान व्यवस्था में मनुष्यों को सभ्यता और सम्मान लायक समझे । हम सब आत्मकेंद्रित स्वार्थी पुतले मात्र नहीं हैं जो गलाकाट प्रतियोगिता के कारण ही सक्रिय रहते हों । अगर हमारी राजनीतिक स्थिति के बारे में गहराई से सोचा जाए तो पता लगेगा कि मनुष्य की नैतिकता के बारे में ऊपर बताई गयी मान्यता का भी इससे घनिष्ठ रिश्ता है । समस्या चूंकि गहरी है इसलिए इधर उधर कुछ छोटा मोटा सुधार कर लेने से ही लोकतंत्र स्वस्थ नहीं हो जाएगा । इसके लिए आमूल बदलाव की राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है । इसके लिए होने वाले संघर्ष में लेखिका ने पाठकों का भी साथ चाहा है । इस पागलपन में मनुष्यता में यकीन कायम रखना कठिन है लेकिन उनके अनुसार यह करना ही पड़ेगा । अन्यथा कोई रास्ता नहीं है ।

Tuesday, December 23, 2025

लोकतांत्रिक पूंजीवाद का संकट

 

                               

                                                     

2023 में पेंग्विन प्रेस से मार्टिन वोल्फ़ की किताब ‘द क्राइसिस आफ़ डेमोक्रेटिक कैपिटलिज्म’ का प्रकाशन हुआ । लेखक का कहना है कि जैसे जैसे दुनिया उनके सामने उजागर होती गयी, वैसे वैसे उनके विचार बदलते गये । जड़ विचार रहना अच्छी बात नहीं होती । इसके बावजूद उनके मूल्य नहीं बदले । माता-पिता हिटलर के कारण निर्वासित शरणार्थी थे । उनके कारण ही लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा अचल रही । साथ ही नागरिकता, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, तार्किकता और सत्य की प्राथमिकता में भी उनका यकीन कायम रहा । चौथे खम्भे की भूमिका इन मूल्यों की सेवा करना है । इन मूल्यों के साथ ही वे इस सदी की तीसरी दहाई में पहुंचे हैं । पचासी साल की उम्र में उन्हें एक चक्र पूरा हुआ महसूस हो रहा है जिसमें उनके माता पिता भी शामिल हैं । लेखक के पिता के जन्म के साथ इसकी शुरुआत हुई । तब तक उद्योगीकरण, शहरीकरण, वर्ग संघर्ष, राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, नस्लभेद और महाशक्तियों के आपसी टकराव को काफी समय गुजर चुका था । चार साल बाद प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया । यूरोप की स्थिरता समाप्त हो गयी । माता का जन्म विश्वयुद्ध के खात्मे के दो महीने पहले हुआ था । तब रूसी क्रांति को संपन्न हुए नौ महीने ही बीते थे । बादशाहों को गद्दी छोड़नी पड़ी और यूरोपीय साम्राज्य ढह गये । नयी दुनिया की बेहतरी का भरोसा भी बहुत दिन कायम न रह सका । मुद्रा स्फीति और कुछ सुधार के उपरांत महामंदी आयी, स्वर्णमान खत्म हो गया, जर्मनी में हिटलर का उदय हुआ, स्पेनी गृहयुद्ध और फिर दूसरा विश्वयुद्ध । पिता ने जर्मनी छोड़ दिया । माता भी नाना-नानी के साथ भाग निकलीं । दोनों की मुलाकात 1942 में लंदन में हुई । एक साल बाद शादी हुई और तीन साल बाद जाकर लेखक का जन्म हुआ । उनका पालन पोषण ब्रिटेन में ही हुआ । पूरा परिवार लाखों परिवारों की तरह आफत के दौर का उत्पाद बना । बहुत मुश्किल से ये सभी लोग उस आफत से बाहर निकलने या बचने में कामयाब रहे । शेष रिश्तेदार इतने भाग्यशाली नहीं रहे ।

इस पूरे माहौल ने लेखक में निराशा को जन्म दिया । इसके कारण उनको जीवन के मुश्किल दौर में भी खुशी खोजने की धुन सवार हुई । दूसरे कि उनको आशावाद से बहुत धोखे मिले । सबसे ताजा धोखा वित्त के प्रबंधकों की बुद्धिमत्ता और निर्वाचकों की समझदारी के मामले में मिला । उनके माता पिता भी निराशावादी रहे थे । पिता को वियेना में नाटक लिखने से जो मानदेय मिला उसके सहारे वे अमेरिका की राह में लंदन चले आये । दादा मछली मारने के व्यवसाय में थे और जर्मन आक्रमण के समय समुद्र के रास्ते परिवार समेत निकल आये । चाहते तो थे कि रिश्तेदार भी आयें लेकिन रिश्तेदारों को सुधार की आशा थी । इस तरह दादा की निराशा ने उन्हें बचा लिया । इस पारिवारिक इतिहास के कारण उन्हें सभ्यता की भंगुरता का आभास रहा है । कोई भी जानकार यहूदी इस सच से इनकार नहीं कर सकता । मनुष्य बेवकूफी, क्रूरता और विध्वंस की राह पर फिसल जाते रहे हैं । वे कबीलाई ढंग से अपने और बाहरी के बीच भेद बरतने की आदत के शिकार हो जाते हैं । इसके बाद वे जिसे बाहरी मानते हैं उनका बिना किसी संकोच के संहार भी कर देते हैं । इसी वजह से लेखक ने शांति, स्थिरता और आजादी को कभी स्थायी नहीं समझा और जो लोग इस धोखे में रहते हैं उनकी समझ पर तरस खाते रहे । लंदन का जीवन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा । माता पिता का निधन 1993 और 1997 में हो गया । उनके बचपन और जवानी के दिनों के मुकाबले बाद की दुनिया बेहतर रही । लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण दुनिया में उनके भरोसे की विजय हुई । यूरोप पर से तानाशाही का खतरा टल गया लगता था । लोकतंत्र विजयी हुआ था । मध्य और पूर्वी यूरोप के समाजवादी शासन लौह दीवार से बाहर निकल रहे थे । यूरोप का फिर से एकीकरण हो रहा था । रूस के भी लोकतंत्र और व्यक्ति की आजादी की राह में आने की उम्मीद नजर आ रही थी । फ़्रांसिसी क्रांति से लेकर बीसवीं सदी तक के वैचारिक, राजनीतिक और आर्थिक विभाजन समाप्त होते नजर आ रहे थे ।

बाद की घटनाओं ने साबित किया कि ये उम्मीदें बेबुनियाद थीं । उदार वित्तीय व्यवस्था अस्थिर साबित हुई । एशियाई वित्तीय संकट के दौरान लेखक को इसका भान हुआ । हालिया वित्तीय संकट और महामंदी के बाद तो यह पूरी तरह सिद्ध हो गया । विश्व अर्थतंत्र अस्थिरता को जन्म देने वाले असंतुलन का स्रोत हो गया । वित्तीय अस्थिरता का कारण था कि विभिन्न देशों के बीच पूंजी प्रवाह को काबू में रखने वाली अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी निभाने में अक्षम हो गयी । यह वित्तीय अस्थिरता पश्चिमी अर्थतंत्र की एकमात्र विफलता नहीं थी । इसके साथ विषमता में बढ़ोत्तरी भी लगी हुई थी । निजी जीवन में असुरक्षा बोध घर कर गया था और आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार सुस्त पड़ गयी थी । व्यापारिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, राजनीतिक और प्रशासनिक शासक कुलीनों की इस विफलता ने जनता की निगाह में उन्हें अविश्वसनीय बना दिया ।

राजनीति की दुनिया में भी इसी तरह के बड़े बदलाव आये । 2001 में 11 सितम्बर को अमेरिका में हुए हमलों ने सबको सकते में डाल दिया । इसके बाद अफ़गानिस्तान और इराक में युद्ध हुए । दूसरी ओर वैश्वीकरण की आर्थिक सफलता के साथ ही चीन और कुछ हद तक भारत का उभार हुआ । इसके कारण राजनीतिक और आर्थिक शक्ति संतुलन में बदलाव आया । अब उसकी धुरी अमेरिका और पश्चिम से खिसककर पूरब की ओर जाने लगी । विश्व राजनीति में इसके साथ ही एक अन्य बदलाव भी आ रहा था । इक्कीसवीं सदी के आगे बढ़ने के साथ उदार लोकतंत्र की जगह अनुदार लोकतंत्र या गालबजाऊ तानाशाही का विस्तार होने लगा । ये तानाशाह पुराने तानाशाहों से अलग थे । इनमें लोकलुभावनवाद था । इनका उभार न केवल नये लोकतांत्रिक देशों में हुआ बल्कि संसार के बड़े और पुराने लोकतांत्रिक देश भी इसकी चपेट में आ गये । इन्होंने अपने देशों की अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता को भारी नुकसान पहुंचाया और पश्चिम की श्रेष्ठता को मटियामेट कर दिया । राजनीति के प्रति उनके गालबजाऊ रुख ने कानून के शासन को धूलधूसरित कर दिया, सत्य के प्रति निष्ठा को कमजोर किया और सारे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों की ऐसी तैसी कर दी । इन्हीं बातों को उदार लोकतंत्र का लक्षण माना जाता था । पूर्ण मनमानी ही शायद इनका लक्ष्य था ।

लेखक को आज की चुनौतियों की तुलना बीसवीं सदी के पूर्वार्ध की चुनौतियों से करना उचित लगता है । उस समय भी विश्व का शक्ति संतुलन इंग्लैंड और फ़्रांस से खिसककर जर्मनी और अमेरिका की ओर जा रहा था जैसे आज वह अमेरिका से चीन की ओर खिसक रहा है । उस समय भी विश्वयुद्ध, स्पेनी एनफ़्लुएंजा, भारी मुद्रास्फीति और महामंदी की शक्ल में बड़े संकट आये थे । इस समय उसी तरह कोरोना और यूक्रेन युद्ध जैसे संकट आये । उस समय जर्मनी, इटली और स्पेन में लोकतंत्र का खात्मा और तानाशाही का उभार हुआ था । इस समय भी विकासशील देशों और पहले के समाजवादी देशों में यह प्रवृत्ति नजर आ रही है । इस बार लोकतंत्र का खात्मा उन भी देशों में हो रहा है (अमेरिका में ट्रम्प और इंग्लैंड में ब्रेक्सिट) जो बीसवीं सदी में लोकतंत्र का झंडा उठाये हुए थे । इस समय तो परमाणु युद्ध और जलवायु संकट की ऐसी हालत है जिसके बारे में 1980 दशक से पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी । लेखक को अपनी पीढ़ी के बारे में लगता है कि उन्हें बीसवीं सदी के इन हालात का अंदाजा नहीं होगा लेकिन उनके माता पिता को अतीत की प्रतिध्वनि अवश्य सुनायी पड़ी होगी । रूसी साम्राज्य की फिर से स्थापना की चाह में उन्हें हिटलर द्वारा सभी जर्मन भाषी यूरोपीयों को एक ही शासन के मातहत लाने की इच्छा की अनुगूंज महसूस हुई होगी । इसी नये समय को समझने के क्रम में इस किताब का लेखन हुआ है ।

Sunday, December 7, 2025

युवा विक्षोभ की अभिव्यक्ति: देवेन्द्र का कथा संसार

 

               

                                             

साहित्य का इतिहास देखने में प्रवृत्ति केंद्रित दृष्टि की प्रधानता के कारण देवेन्द्र का कथाकार बहुधा अलक्षित रह जाता है । बेहतरीन कहानियों की संख्या प्रचुर होने के बावजूद मानदंड के मामले में उनको अक्सर अनदेखा कर दिया गया है । इसके कारणों की शिनाख्त करने के साथ ही हम उनको शरीक कर सकने वाली हिन्दी की कथा परम्परा को भी समझने का प्रयास करेंगे । साथ ही इसमें उनकी विशेषता और उनके योगदान को भी देखने की कोशिश की जाएगी ।   

देवेन्द्र की भाषा में काव्यात्मकता है लेकिन यह काव्यात्मकता उदय प्रकाश की तरह यथार्थ को धुंधला करने के काम नहीं आती । उनकी काव्यात्मकता में जीवन की विषम परिस्थितियों से उपजा तीखापन है । अक्सर यह तीखापन मारक व्यंग्य का रूप ले लेता है । उदय प्रकाश तो घोषित तौर पर कवि के साथ कथाकार हैं लेकिन देवेन्द्र के बारे में यह अल्पज्ञात है कि वे कहानियों की दुनिया में आने से पहले छंदोबद्ध कविताओं के लेखक रहे थे । इस तरह उनका कथाकार सिंहासनच्युत कवि कहा जा सकता है । उनकी एक मशहूर कहानी का शीर्षक ही है ‘शहर कोतवाल की कविता’ । इस शीर्षक में व्यक्त विडम्बना को पहचानना बहुत मुश्किल नहीं है । एकदम ही विपरीत समझे जाने वाले दो क्षेत्रों को इस शीर्षक में एक साथ अनायास नहीं रखा गया है । कोई कवि ही कोतवाली के साथ कविता का वैषम्य पकड़ सकता है । इस कहानी में कविता न केवल शीर्षक में है बल्कि सारी अफ़सरी हनक के बावजूद कोतवाल की आत्महत्या का कारण बनती है । बहुत सारी जगहों पर भीषण और अत्यंत गहन भावनात्मक अभिव्यक्तियों के लिए कविता की पंक्तियों का सीधे प्रयोग किया गया है । कविता इन कहानियों के पात्रों के जीवन में बेहद खतरनाक भूमिका निभाती है । इसी तरह एक और कहानी का शीर्षक है ‘महाकाव्य का आखिरी नायक’ । जो लोग महाकाव्य की गरिमा और त्रासद उदात्तता से परिचित नहीं उन्हें इस कहानी और शीर्षक के बीच का रिश्ता समझ ही नहीं आयेगा । समकालीन कहानी में शायद ही किसी कथाकार की कहानियों में इस हद तक कविता मौजूद हो । आधुनिक मुक्त छंद की कविता की क्षमता में ऐसा विश्वास कुछ हद तक आश्चर्यजनक है क्योंकि इस दौर की कविता को जीवन से कटा हुआ बताने वालों की भी जमात कमजोर नहीं है । कहानियों में कविता के प्रवेश का आकर्षण उनके यहां इतना प्रबल है कि ‘धर्मराज’ शीर्षक कहानी में उनका मुख्य पात्र धर्मराज भीड़ में घिरा ‘मैथिलीशरण गुप्त की कविता होता है, लेकिन अकेले होते ही अज्ञेय का गद्य बन जाता है’ । इसके बाद अज्ञेय के गद्य की व्याख्या भी ‘मतलब के दर्शन से भरा, रहस्यमय और अबूझ’ । दोनों के बारे में कहानीकार की राय से असहमत हुआ जा सकता है लेकिन इस फैसले से एक दौर के विद्रोही भाव का पता जरूर चलता है । उस विद्रोह में सभी विद्रोहों की तरह थोड़ा अतिवाद भी था ।

युवा, कविता और विक्षोभ के जिक्र से स्पष्ट है कि देवेन्द्र की कहानियों की प्रमुख कथावस्तु उच्च शिक्षा संस्थान हैं । इनमें भी हिंदी साहित्य के अध्ययन अध्यापन की दुनिया अर्थात हिंदी विभाग हैं । इन शिक्षा संस्थानों से जिस तरह देश के स्वाधीनता आंदोलन का रिश्ता है उसी तरह हिंदी की प्रतिष्ठा के साथ इन विभागों की खास तरह की केंद्रीयता जुड़ ही जाती है । ‘देवांगना’ और ‘रंगमंच पर थोड़ा रुककर’ जैसी कहानियों में इसके अपवाद हैं । ‘देवांगना’ शीर्षक कहानी में हमारे समाज के सबसे अधिक किनारे कर दिये गये पात्रों की अत्यंत दारुण कथा है तो ‘रंगमंच पर थोड़ा रुककर’ कहानी अपराधियों के जीवन में पाठक का प्रवेश कराती है । कहानियों की ऐसी विषयवस्तु ने ही शायद उनमें उच्च शिक्षा संस्थानों को आने से रोक दिया होगा । ये शिक्षा संस्थान हिंदी भाषी समाज के भीतर अवस्थित हैं । इनके पतन की कहानी ‘नालन्दा पर गिद्ध’ में बेहद मारक तीक्ष्णता के साथ आयी है । इसके अतिरिक्त भी ‘अनुपस्थित’ शीर्षक कहानी में शिक्षा के उस सांस्थानिक पतन की झांकी देखने को मिलती है जिसका विराट स्वरूप अब उजागर हुआ है । उनका एक पात्र कुलकर्णी है जो डीन की कुर्सी पर काबिज है और उनके ही एक विद्यार्थी की नियुक्ति के लिए सिफारिश करने वाले से कहते हैं कि ‘शिक्षक संघ होता था । कर्मचारी संघ था । और तो और तुम्हारा छात्र संघ था । कुलपति लोग दबकर रहते थे ।--अब कुछ नहीं । हर पद का रेट तय है ।--दलाल लोग कुलपति होने लगे हैं’ । देवेन्द्र जिस समय की बात कर रहे हैं उस समय के मुकाबले उच्च शिक्षा के संस्थानों में केवल भ्रष्टाचार बल्कि पदाधिकारियों की मनमानी और बढ़ी है कहानी में आये इस वक्तव्य की खास बात यह है कि छात्र संघ, कर्मचारी संघ और शिक्षक संघ की ऐसी भी भूमिका हुआ करती थी इसकी ओर पाठक का ध्यान जाता है अन्यथा समय तो इन संघों के भ्रष्ट होने की कथा सुनाने का है आश्चर्य कि यह बात डीन के पद पर काबिज व्यक्ति के मुख से कहलवाई गयी है

कहानीकार के इस रुख के साथ ही उनका वह रुख भी कायम है जिसमें छात्र संघ के प्रति सामान्य तौर पर बनी धारणा की अभिव्यक्ति होती है नालन्दा पर गिद्धकहानी में वामपन्थी प्रत्याशी मार्क्सवादी लेनिनवादी विचारधारा का है और सशक्त उम्मीदवार बनकर उभर रहा था उसकी विचारधारा से भी मजबूत पहचान उसकी जाति निकलती है । इसे वाणी देते हुए कहानी के पात्र आचार्य चूड़ामणि का कथन हैविचारधाराएं तो परिवर्तनशील होती हैं । उम्र और परिस्थिति से निर्धारित । मूल सत्य तो जाति हैऔर इसी समझ के आधार पर आर एस एस एस की राजपूत और भूमिहार लाबी ने वामपन्थी प्रत्याशी का समर्थन किया और वह विजयी रहा । विडम्बना यह किउसी पैनल का दूसरा हरिजन प्रत्याशी मात्र पचासी वोट पाकर वीरान और बेजान पसरी सड़क पर अकेले क्रान्तिवाद-जिन्दाबाद चिल्लाताजा रहा था । इस माहौल ने ज्ञान और विद्या के प्रति ऐसी हिकारत को जन्म दिया है कि लेखक अध्यापकों की लिखी किताबों तक के बारे में बताते हुए उनकी गुणवत्ता के मुकाबले रणनीति को ही देखता हैशान्तिकाल के बीस वर्षों में इस विभाग से सिर्फ तीन पुस्तकों का प्रकाशन हुआ था । इण्टरव्यू घोषित होने के बाद से पैंतालीसवीं पुस्तक की सूचना थी। इन्हें भी लेखक अध्यापकों के विद्यार्थियों ने ही तैयार किया था । हाल यह है कि पुस्तकालय की किताबों से सीधे सहायता लेकर भारतीय काव्यशास्त्र, समकालीन साहित्य की भूमिका, रीतिकाल का कलात्मक योगदान, आदि-आदि ग्रन्थ तैयार किये जा रहे थे । शिक्षा संस्थानों के समग्र पतन की यह तस्वीर आज भी दुर्भाग्यवश सच से बहुत दूर नहीं है । हो सकता है ये शीर्षक बहुतेरे आकांक्षी अभ्यर्थियों के लिए सहायक साबित हों!                                

जिस हिंदीभाषी समाज में ये संस्थान हैं स समाज के साथ गांव अभिन्न रूप से संबद्ध हैं । उपनिवेशवाद के विरोध के क्रम में गांवों के प्रति आम तौर पर थोड़ा रूमानी नजरिया हिंदी की विशेषता रही है । इस मामले में देवेन्द्र शेष लोगों से बहुत अलग रुख अपनाते हैं ।

युवा और उच्च शिक्षा संस्थानों के केंद्र में आने से प्रेम भी केंद्रीयता प्राप्त कर लेता है । हिंदी भाषी समाज में प्रेमी जोड़ों की हालत किसी से छिपी नहीं है । उनके साथ बरती जाने वाली समूची क्रूरता बहुत गहराई के साथ इन कहानियों में व्यक्त हुई है । इस विषयवस्तु की प्रमुखता के लिए यही तथ्य जानना पर्याप्त है कि उनकी दो कहानियों ‘एक खाली दिन’ और ‘सपने के भीतर’ के नायक और नायिका सत्तो और शांतनु ही हैं । समान स्त्री पुरुष चरित्रों को लेकर दो कहानियों की रचना भी उनकी प्रिय विषयवस्तु का सबूत देती है । प्रेम के साथ ही देवेंद्र अपनी कहानियों में देह संबंध के सवाल पर भी बहुधा विचार करते हैं । इस मामले में वे प्रेम की थोड़ी रूमानी धारणा के शिकार भी लगते हैं । ‘क्षमा करो हे वत्स!’ में उनका स्वयं कथन है ‘स्त्री और पुरुष के बीच आकर्षण और फिर प्रेम एक स्वाभाविक गुण है । शारीरिक सम्बन्धों का उच्चतम रूप प्राप्त करने के बाद यह प्रेम समाजोन्मुख होने लगता है । हमारी विवाह संस्थाओं में इस स्वाभाविक प्रक्रिया का ही विरोध है । वहां शारीरिक सम्बन्ध पहली रात बन जाते हैं । बाद के दिनों में तरह-तरह के समझौते करते हुए हम प्रेम पैदा करने की कोशिश करते हैं । वे सुखी और सफल लोग हैं जो प्रेम पैदा कर लेते हैं’ । लेखक ने यह स्वयं कथन अपने वैवाहिक प्रेम की असफलता के बारे में किया है । जो व्यापक यथार्थ है उसकी कुरूपता को उजागर करते हुए वे लिखते हैं ‘गांव में लोग पत्नियों को बैल की तरह पीटते हैं और रात के अंधेरे में चुपके से दस मिनट के लिए उनके पास जाते हैं और कुत्ते की तरह सम्भोग करके फिर दरवाजे की अपनी चारपाई पर आकर सो जाते हैं’ । इस सामाजिक यथार्थ ने नैतिक पाखंड को जन्म दिया है ‘घूस, भ्रष्टाचार, मक्कारी, दूसरे की जमीन हड़प कर जाना आदि आदि हमारे समाज का स्वीकृत यथार्थ है । ये सब हमारे चरित्र को प्रभावित नहीं करते । सिर्फ कमर के नीचे का गोपनीय हिस्सा अस्पृश्य रहकर हमारे चरित्र को तेजस्वी बनाता है’ । निष्कर्ष कि ‘एक मांस पिण्ड निर्धारित करता है हमारे चरित्र को’ । लेखक ने अपनी प्रतिक्रिया को इस तरह व्यक्त किया है ‘नैतिकता के इन भारतीय और अमानवीय मानदण्डों पर मैंने समूचे बलगम को खंखारकर थूक दिया’ ।       

उनका विक्षोभ अक्सर व्यंग्य के सहारे अभिव्यक्त होता है । यह लगभग उनका स्थायी भाव है । इसकी सफलता से वे इतना अभीभूत हैं कि परिवर्तन के प्रयासों को भी इसका शिकार बना लेते हैं । हिंदी की आधुनिक कहानी के इतिहास में क्रांतिकारियों का मजाक उड़ाने वाली कहानियों की लम्बी परम्परा है । देवेन्द्र की कहानी ‘क्रान्ति की तलाश’ भी इसी धारा का अंग बनकर रह गयी है । इस तरह की कहानियों को आचार्य शुक्ल की शब्दावली में सांप्रदायिक साहित्य कहा जा सकता है । अगर पाठक को ठोस संदर्भ न मालूम हो तो रेणु की ‘आत्मसाक्षी’ या काशीनाथ सिंह की ‘लाल किले का बाज’ को सराहना मुश्किल है । इस कहानी का जिक्र इसलिए जरूरी है कि उनकी अन्य कहानियों के भी विद्रोही पात्रों की आदर्श भाषा प्रकाश की उद्धत भाषा का अनुगमन करती है ।

गांव के प्रति रूमानी नजरिये का प्रतिकार उनकी कहानी ‘क्षमा करो हे वत्स!’ में सबसे अधिक मिलता है । कहानी न केवल सच्ची घटना का आभास देती है बल्कि सच है भी । कथावाचक के पुत्र का अपहरण हुआ और उसके अवशेष किसी खेत में मिले । उनके इस दुख में शामिल होने की जगह लोग भुना रहे थे । लेखक की टिप्पणी है ‘गांवों के सामाजिक ढांचे के भीतर निरंकुशता और स्वार्थपरता रोम-रोम में रची-बसी होती है’ । कहने की जरूरत नहीं कि भारत के गांव की यह आलोचना जातिप्रथा के दंश को भोगने वालों के अनुभव  से पूरी तरह अलग है ।                                   

Saturday, December 6, 2025

जनेवि में हिंदी

 

             

                         

जो लोग जनेवि के भाभाके से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते हैं उनका अनुभव शोध करने आये लोगों से अलग होता है । मेरा प्रवेश शोधार्थी के बतौर 1989 में हुआ । तब प्रवेश हेतु लिखित परीक्षा जनेवि ही लिया करता था । लिखित परीक्षा काहिविवि में दिया था । साक्षात्कार हेतु उपस्थित होने का निमंत्रण मिलने पर पहली बार दिल्ली आया । इससे लगभग छह माह पहले दर्शनशास्त्र के शोधार्थी गोरख पांडे ने आत्मघात कर लिया था । बड़े भाई अवधेश प्रधान उनके घनिष्ठ थे इसलिए मेरे दिल्ली आने से थोड़ा आशंकित थे । गोरख जी से मेरा भी दो तीन दिनों का साथ बनारस में रहा था । उनके निधन के बाद जीवन का पहला लेख लिखा था ।

मुझसे पहले रामतीर्थ पटेल का प्रवेश हो चुका था । उन्हीं के पास पेरियार में सीधे आया । उनके शोध निर्देशक मैनेजर पांडे थे और मुझे भी पूर्व परिचय के कारण उनसे ही मिलना था । देखा शोधार्थी अपने निर्देशक से सीधे मिलने में संकोच करते हैं । हमारे लिए यह विचित्र था । बाद में देखा पूरे जनेवि में केवल हिंदी के ही विद्यार्थी अपने अध्यापकों के पांव छूते हैं । पूछ्ने पर अब भी ऐसा करने वाले सम्मान का तर्क देते हैं । सवाल उठता है अन्य विषयों के जो विद्यार्थी ऐसा नहीं करते वे असम्मान तो नहीं करते फिर हिंदी के लिए यह विशेष चलन क्यों । पिता माता के तो शिष्टाचार में छूने की आदत रही लेकिन अध्यापकों के साथ आम तौर पर दोस्ती जैसा ही रिश्ता रहा था । असल में हिंदी इलाके का यह सामंती चलन जनेवि के हिंदी में भी चला आया था । इसके अलावे एक चलन और देखा जिसे काहिविवि में बंद होते हुए देखा था । मौखिकी परीक्षा में शोधार्थी मिठाई का बंदोबस्त करते थे । इसे त्रिभुवन सिंह ने बंद करा दिया था लेकिन यह दुर्गुण जनेवि के हिंदी में बचा रह गया था । एक और बात बहुत अखरी कि हिंदी के विद्यार्थी जनेवि के सामाजिक जीवन की मुख्य घटना अर्थात छात्र संघ चुनावों में मतदान तो करते हैं लेकिन उम्मीदवार नहीं होते । हमारे अध्यापक भी अध्यापक संघ में किसी पद पर नहीं होते थे । एक बार मैनेजर पांडे ने उपाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा लेकिन चिनाय से हार गये । सहपाठी देवेन्द्र चौबे बाद में अध्यापक संघ के पदाधिकारी निर्वाचित हुए तो खुशी हुई ।   

जनेवि की बात हो तो उसके छात्र संघ का जिक्र अवश्य होगा । इसके चुनाव अब भी उत्सव की तरह होते हैं । दस से अधिक दिनों तक अलग अलग छात्रावासों के भोजनालय में सभाएं होती थीं जिनमें प्रत्याशियों के साथ उनके समर्थन में राजनीतिक नेताओं या बौद्धिकों के व्याख्यान होते थे । सभा में प्रश्नोत्तर होते जिसकी चर्चा देर रात तक गंगा ढाबे पर होती रहती थी । चुनाव से अलग भी किसी भी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर इस तरह के व्याख्यान नियमित रूप से रात के खाने के उपरांत होते । इन उत्तेजक व्याख्यानों में हम सब देश के तमाम नेताओं और बौद्धिकों को सुनते । कभी कभी विभिन्न विषयों के अध्यापक भी ये व्याख्यान देते । इनमें भी हिंदी के नामवर सिंह को ही सुना । छात्र संघ चुनाव के दौरान की सभाओं में सबसे आकर्षक घटना उम्मीदवारों और खासकर अध्यक्ष पद के प्रत्याशियों की बहस थी । इस बहस को सुनने अध्यापक तो आते ही थे, दिल्ली के अन्य बुद्धिजीवी भी अक्सर आते थे । आज भी यह परम्परा कमोबेश कायम है ।

इन चुनावों में हमारे सहपाठी जयप्रकाश लीलवान प्रत्याशी के बतौर खड़े हुए थे लेकिन उससे भी हिंदी के विद्यार्थियों का अलगाव नहीं टूटा । उर्दू से अलबत्ता कुछ छात्र सक्रिय रहते । शकील तो अध्यक्ष भी रहे । बाद में आशुतोष, प्रणय और संजय कुमार भी चुनाव लड़े लेकिन विजय केवल प्रणय को मिली । हिंदी इलाके के विद्यार्थियों ने छात्र राजनीति में अपनी जगह बनायी तो इसका वाहक आइसा और अभाविप बने जो आज भी छात्र राजनीति में विरोधी ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते हैं । छात्रावासों के माहौल और निजी रुचि के कारण राजनीति से चंद्रशेखर, इतिहास से प्रथमा और तिथि, रूसी से शुभ्रा आदि से मित्रता बनी ।      

प्रवेश के कुछ ही दिन बाद ये चुनाव होते हैं । 1989 के चुनाव थे । उसी दौरान की सभाओं से पता चला कि अब तक के हिंदी से जगदीश्वर चतुर्वेदी एकमात्र छात्र संघ अध्यक्ष रहे थे । उनका भाषण सुनने गया । बाद में भी उनसे एकाधिक प्रसंगों में मुलाकात हुई । हम हिंदी के विद्यार्थी जनेवि के जीवन के इस सर्वाधिक जीवंत मौके से कटे अपने भीतर ही सिमटे रहते । ऐसे में हमारे वरिष्ठ शम्भुनाथ सिंह ने जो अब कुलपति हैं अपने कावेरी छात्रावास में हिंदी के विद्यार्थियों की बातचीत का सिलसिला शुरू किया तो उसमें जाने लगा । उससे प्रदीप तिवारी, सियाराम शर्मा, रमेश कुमार, मृत्युंजय सिंह, महेश आलोक, संजय कुमार, संजय जोशी आदि से घनिष्ठता हुई । मुनिरका में पुराने परिचित प्रमोद सिंह, अनिल सिंह और राधेश्याम मंगोलपुरी रहते थे । उनके पास भी आना जाना शुरू हुआ । मुनिरका जनेवि का विस्तार ही है । विवाहोपरांत सपरिवार छात्रावास मिलने से पहले मुझे भी रहना पड़ा था ।  

अध्ययन शुरू हुआ तो देखा कि अध्यापक तो बहुत कम हैं लेकिन उनका जलवा बहुत है । देश भर से लोग उनसे मिलने आया करते और दिल्ली के भी साहित्य जगत में उनकी उपस्थिति बहुत ही चमकदार होती थी । बोरी भर अध्यापकों के विभाग से आया था और मुट्ठी भर अध्यापकों की सक्रियता देख रहा था । इनके कारण ही दिल्ली और देश के तमाम विद्वानों को देखने सुनने का मौका मिलता । ब व कारंत और एजाज़ अहमद के व्याख्यान याद हैं । बाद में एजाज़ साहब ने पहल की ओर से मार्क्सवाद की प्रासंगिकता पर त्रिवेणी में भी व्याख्यान दिया । उसे छपाकर ज्ञानरंजन ने मुफ़्त वितरित किया था । बाद में सुना कि उन्होंने इतिहास में कुछ पढ़ाया भी था । केदार जी को जब साहित्य अकादमी मिला तो हम सबने उनकी कविताओं का पाठ उनकी मौजूदगी में किया । मैनेजर जी ने व्याख्यान दिया और केदार जी ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया । इन अध्यापकों और जनेवि के समूचे माहौल के कारण हिंदी के विद्यार्थियों को समाज विज्ञान के विद्यार्थियों के सामने भी आत्मविश्वास से बोलने का साहस मिला था । दिल्ली शहर का कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम हमारे इन अध्यापकों की अनुपस्थिति में सम्भव नहीं था । उनके कारण हम विद्यार्थी भी चौड़े होकर घूमते थे । इनकी राय पर तीखी बहसें होती थीं । देश के बाहर से भी विद्यार्थी आते थे । फिलहाल सरकार के कोप की शिकार फ़्रांचेस्का ओर्सिनी नामवर जी की कक्षाओं में बैठतीं ।  

कक्षाओं के बाहर की दुनिया भी बहुत उत्तेजक होती । किताबों और पत्रिकाओं के लिए परिसर में ही दुकान थी । जनेवि से प्रतिदिन साहित्य अकादमी के लिए बस जाती थी । इतिहास के विद्यार्थी तीन मूर्ति जाया करते थे । छात्रावासों में सभी विषयों के विद्यार्थी रहते और भोजनालय में एक साथ खाते थे । खाते समय विभिन्न छात्र संगठनों की ओर से जारी परचों को पढ़ते और उन पर बहस करते । इन सबने लगभग प्रत्येक छात्र को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सामयिक मसलों का विशेषज्ञ बना दिया था । इस माहौल ने किसी विद्यार्थी को अपने ही विषय तक सीमित नहीं रहने दिया ।       

जनेवि के इसी माहौल ने ऐसा कर दिया कि देश के किसी भी कोने में प्रशासन, पत्रकारिता और अध्यापकों की दुनिया में कोई न कोई मिल जाता है । उसे बरबाद करने की कोशिशों का पता सबको है इसलिए यह नजदीकी सभी बरकरार रखे हुए हैं । हाल में पेरिस से आये फोन से सत्यम झा को मेरी याद का पता चला तो गर्व हो आया ।   

                                

Tuesday, December 2, 2025

भारत के संविधान का निर्माण

 


2025 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से रोहित डे और ओर्नित सानी की किताब ‘असेम्बलिंग इंडिया’ज कनस्टीच्यूशन: ए न्यू डेमोक्रेटिक हिस्ट्री’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों का कहना है कि इस किताब में संवैधानिक राजनीति की समृद्ध दुनिया की यात्रा है । साथ ही देश के संविधान को आकार देने वाली कल्पना की भी जांच परख की गयी है । इस अनकही कहानी को कहने में छह साल लगे और यह समय लेखकों को प्रेरक प्रतीत हुआ । दोनों ही अपनी अपनी किताबों के लिए भारत के संविधान निर्माण की अभिलेखीय सामग्री छान रहे थे और इसी क्रम में यह किताब उनकी संयुक्त लेखन योजना में शामिल होती चली गयी । इसका लेखन कोरोना के दौरान हुआ । किताब में आये नाम उसी रूप में रखे गये हैं जिस रूप में वे दस्तावेज में मिले । सामाजिक समूहों के उन नामों का इस्तेमाल हुआ है जो नाम ये समूह अपने आपको देते हैं । संविधान सभा की बहसों में वक्ता के साथ बहस की तारीख का उल्लेख हुआ है । किताब की शुरुआत मई 1947 में बंगाल में पद्मा नदी के बीच बसे लोगों द्वारा संविधान सभा को लिखे एक पत्र से हुई है जिसमें परिस्थिति के अस्थिर होने की चिंताकुल सूचना दी गयी है । इस इलाके में मशालची समुदाय के लोग रहते थे और नदी की तेज धारा द्वीपों की मिट्टी को लगातार ही इधर से उधर करती रहती थी लेकिन जब चिट्ठी लिखी जा रही थी तो नदी की धारा के मुकाबले विभाजन के हालात ने अस्थिरता को जन्म दिया था । वे लोग बनने वाली प्रतिनिधि सभाओं में अपना अलग प्रतिनिधित्व चाहते थे ताकि उनकी सांस्कृतिक विशेषता पूरी तरह सुरक्षित रह सके । विभाजन की घोषणा के बस दो हफ़्ते पहले यह पत्र लिखा गया था । उस समय मशालची समुदाय सचमुच अस्थिर था । नदी की धारा में बदलाव के साथ उनके निवास के जिले भी बदल जाया करते थे । उन्हें भय था कि सीमा उनके सिर पर से गुजरेगी । वे लोग इस्लाम में विश्वास करते थे लेकिन मुस्लिम लोग उन्हें अपना अंग नहीं मानते थे । इसके चलते वे राजनीतिक और आर्थिक रूप से अपंग महसूस करते थे । आजादी के मौके पर उन्हें लगा कि इस समय उनकी स्थिति सही और निश्चित हो सकती है । नये राष्ट्र के निर्माण के इस अवसर पर उन्हें अपनी पहचान को उभारने की आशा पैदा हुई । इस तरह के बहुतेरे अन्य समूह भी थे जो संविधान निर्माण को इस नये काम के लिए सही मौका समझ रहे थे । उन्हें अपने भविष्य के सुनिश्चित होने की उम्मीद संविधान से पैदा हुई ।

उसके निर्माण की कहानी को दिल्ली और लंदन तक ही आम तौर पर सीमित रखा जाता है । इस प्रचलित कहानी के अनुसार  9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा की बैठक के साथ इस प्रक्रिया की शुरुआत हुई । सभा में 205 सदस्य थे जिनमें दस स्त्रियां थीं । वातावरण में उत्साह और अनिश्चय था । इसके मुताबिक मुट्ठी भर समझदार लोगों ने देश को दूरदृष्टि और उदारता के साथ यह बहुमूल्य उपहार प्रदान किया । निर्वाचित सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव से नहीं आये थे । वे 1935 के इंडिया ऐक्ट के आधार पर धार्मिक, सामुदायिक और पेशेवर चुनिंदा निर्वाचकों द्वारा 1946 में चुने गये विधान मंडलों के प्रतिनिधि थे । सभा ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान अंगीकृत किया और 26 जनवरी 1950 को इसे लागू माना गया । माना जाता है कि इसी दौरान (1946 से 1949 के बीच ) वह सब कुछ घटित हुआ जिसके कारण संविधान को उसका मौजूदा रूप मिला । इसे समझने के लिए इस दौरान हुई घनघोर बहसों के दस्तावेज खंगाले जाते हैं । इस तरह समूचा भारतीय संविधान चुनिंदा लोगों की आपसी रजामंदी की उपज बनकर रह जाता है । कुछ विचार गिनाये जाते हैं जिन्होंने इसका बुनियादी ढांचा तैयार किया । इस समझदारी में संविधान औपनिवेशिक अतीत से बिलगाव की जगह उसकी निरंतरता में नजर आता है । संविधान निर्माण की इस कहानी के मुकाबले इस किताब में वैकल्पिक कहानी सुनायी गयी है । इसके मुताबिक संविधान का निर्माण सभा के बंद कमरे के भीतर नहीं उसके बाहर बनाया गया । इसमें देश के विस्तृत भूगोल और उसके भी परे की तरह तरह की सामाजिक ताकतों ने भाग लिया । समूचे महाद्वीप में संविधान निर्माण की बहुमुखी और समानांतर प्रक्रियाओं की मौजूदगी को इस किताब में देखा और समझा गया है । यह प्रक्रिया हिमालय की लाहौल स्पीति से लेकर दक्षिण भारत के सुदूर इलाकों समेत बंगाल के चटगांव और सौराष्ट्र तथा स्टाकहोम और कैलिफ़ोर्निया के प्रवासी भारतीयों में चल रही थी । इन जगहों के रहने वाले ये सभी लोग अपने अपने सामाजिक जीवन और अनुभवों के आधार पर भविष्य के अपने संविधान को प्रभावित कर रहे थे । यह अद्भुत प्रक्रिया सभा की बहसों के साथ साथ नीचे से चल रही थी । अंदर की घनघोर बहसों के दस्तावेज तो इसके सामने कुछ भी नहीं हैं । सभा के बाहर जनता में जो हलचल थी उसके दस्तावेज अंदर की बहसों के दस गुना हैं ।

भविष्य के संविधान निर्माण को देश के लोगों ने अपनी बहसों के जरिए युद्ध के मैदान में बदल दिया था । इसी प्रक्रिया ने इतने लचीले संविधान को जन्म दिया । औपचारिक कानूनी प्रक्रिया के इतर संविधान बनने की यह जीवंत प्रक्रिया संविधान के परवर्ती ग्रहण, वैधता और दीर्घजीवन के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई । इसके निर्माण में भागीदारी की वजह से आम लोग इस पर अपना अधिकार समझ सके । उनके इस बोध ने भारत में लोकतंत्र के वास्तविक जीवन को आकार दिया । देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सामने जो भी जटिल और कठिन चुनौती आयी उस पर पार पाने में संविधान पर जनता के इस अधिकार भाव ने बहुत बड़ी मदद की । औपनिवेशिक शासन की समाप्ति और संविधान लिखे जाने के बीच की अवधि में लोग और भूभाग में भारी अनिश्चितता रही । विभाजन के फैसले के छह महीने पहले ही सभा ने अपना कामकाज शुरू किया था । इसमें कांग्रेस का दबदबा था । दूसरा बड़ा दल मुस्लिम लीग का था लेकिन उन्होंने कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया । 550 देसी रियासतें अंग्रेजी राज का हिस्सा नहीं थीं और औपनिवेशिक शासन के खात्मे के साथ संप्रभु हो जाने वाली थीं । उनका भविष्य भी तय नहीं था । उनके कब्जे में लगभग आधा देश था । सभा में उनके 93 प्रतिनिधि थे जिनके चुने जाने में जनता की कोई भूमिका नहीं थी । आदिवासी इलाकों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं हुआ था और उनका भविष्य भी तय नहीं था । अंग्रेजी राज की सार्वजनिक संस्थाओं, प्रांतीय विधानमंडलों, न्यायपालिका और नौकरशाही का भी भविष्य कोई बहुत निश्चित नहीं था । उनमें काम करने वाले भारतीय थे और उन्हें नये संवैधानिक व्यवस्था के मातहत लाया जाना था । दरिद्रता, अशिक्षा और सामाजिक भेदभाव की मौजूदगी इस अनिश्चयता को और भी भयावह बना रही थी ।

देश की सीमा भी निर्धारित नहीं थी और जिन पर यह संविधान लागू होना था उनकी नागरिकता भी तरल बनी हुई थी । सबसे बड़ी बात कि औपनिवेशिक शासन की सुविधा के लिए बनी संस्थाओं को आजाद देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिहाज से कैसे ढाला जाय । लोगों को मालूम था कि इन सवालों पर संविधान जो भी तय करेगा उसका सीधा असर उनके जीवन पर पड़ेगा इसलिए उन्होंने इस प्रक्रिया में जिम्मेदार उत्साह के साथ भाग लिया । संविधान की भाषा में ही उन्होंने अपने संघर्षों और आकांक्षाओं को व्यक्त करना शुरू किया । उनकी मांगें जातिगत, वर्गगत, लैंगिक, धार्मिक और भाषाई सरोकारों से उपजी थीं । उनकी राजनीति संविधान निर्माण की प्रक्रिया से जुड़ गयी और वे संविधान के लेखन में अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल हुए और इस तरह संविधान को अनौपचारिक जीवन मिला । उनके लिए यह पूरी प्रक्रिया औपनिवेशिक संविधान सुधार से पूरी तरह अलग थी । यह संविधान उनका अपना होना था । उनकी बहुतेरी बातें सुनी नहीं गयीं लेकिन संविधान निर्माण के साथ उनकी इस संलग्नता ने तय कर दिया कि भारत का संविधान किताब तक ही कभी सीमित नहीं रहेगा । संविधान निर्माण की इस प्रक्रिया ने ऐसी राजनीति और संवैधानिक भाषा को जन्म दिया जो भारत की बहुलतावादी राजनीति में समायी हुई है । आज भी कानून की चारदीवारी के बाहर चलने वाली संवैधानिक राजनीति उसी भाषा से संचालित होती है ।    

लेखकों ने सफाई देते हुए कहा कि उनका मतलब यह नहीं कि संविधान बनने की प्रक्रिया ने सार्वजनिक रुचि जगा दी, न ही यह कि नये संविधान की उम्मीद ने सभा की चारदीवारी के बाहर संविधान से संलग्नता पैदा कर दी । इसकी जगह वे नया परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करना चाहते हैं जिसमें घटनाक्रम इस तरह नजर आये कि 1946 से शासकीय संस्थाओं और व्यापक विविधतापूर्ण जनता की संविधान के साथ सक्रिय संलग्नता ने संविधान निर्माण की प्रक्रिया को अब तक प्रभावित किया है । जो संविधान लिखा गया उसे प्रभावित करने में सफलता को पैमाना बनाने से लोकप्रिय संवैधानिक राजनीति को, खासकर उसमें होने वाले संशोधन और व्याख्या की प्रक्रिया को समझना मुश्किल होगा । 1950 में अगर लोग संविधान के लेखन को प्रभावित नहीं भी कर सके तो आगामी दशकों में उसके संशोधन और व्याख्या पर तो इसका असर जरूर रहा ।  

संविधान निर्माण की इस तरह की कहानी सुनाने के क्रम में लेखकों ने उसके विकास के कालक्रम में उलटफेर किया और संविधान तथा कानून के स्रोतों को बहुलता प्रदान की । इसका निर्माण चुनिंदा दूरदर्शी लोगों की जगह जनता के बीच जारी संवाद से होता हुआ नजर आता है । इस क्रम में लेखकों ने अब तक उपेक्षित कुछ नयी ताकतों पर ध्यान दिया है लेकिन इससे ही इसका निर्माण लोकतांत्रिक नहीं हो जाता । उन्होंने बस यह कहा है कि भारतीय जनता संवैधानिक भाषा में पारंगत हुई और उसने अपनी बात सुनाने की कोशिश की । उन्होंने अपने अधिकारों पर बल दिया और इससे लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया में थोड़ी तेजी आयी ।

लेखकों का कहना है कि हाल के दिनों में संवैधानिकता को लोकतांत्रिक राजनीति के रास्ते की रुकावट कहा जा रहा है । इस मत के अनुसार बदलाव को कानूनी घेरे या बहुत हुआ तो संशोधन तक ही सीमित रखा जा रहा है । हमारे देश में संविधान बनने के साथ इतनी गहरी राजनीतिक संलग्नता रही है कि लोकतांत्रिक राजनीति के साथ संविधान अभिन्न हो गया है । संविधान का पहला मसौदा तैयार होने से पहले अप्रैल 1947 में ही सार्वभौमिक मताधिकार मंजूर कर लिया गया । अगले ही साल से मतदाता सूची के निर्माण का काम भी शुरू हो गया । इस तरह सरकार बनाने में सबके बराबर अधिकार की बात संवैधानिक राजनीति के साथ नाभिनालबद्ध हो गयी । नये लोकतांत्रिक यथार्थ को अंग्रेजी राज के समय बनी प्रातिनिधिक संस्थाओं के साथ जोड़ लिया गया । उस समय तक संविधान बनाने का ऐसा अनुभव किसी देश के पास नहीं था । भारत में संविधान से लोकतंत्र नहीं आया । संविधान की उम्मीद के साथ देश की राजनीति का लोकतंत्रीकरण हुआ 

संविधान के सिलसिले में अधिकांश लेखन संविधान सभा की बहसों और संविधान के पाठ पर केंद्रित रहता है । उनमें मान लिया जाता है कि संवैधानिक राजनीति का विस्तार भारत के लोगों की कल्पना, रुचि और क्षमता के बाहर की बात थी और वे इस प्रक्रिया से पूरी तरह उदासीन थे । लोकतंत्र के बारे में कहा जाता है कि भारत के लोगों को अहसास नहीं था कि उन्हें क्या मिला है । कुछ लोग यह भी कहते हैं कि संविधान निर्माण से आम जनता दूर थी और संविधान बनाने वालों के लिए जनता के लोग अमूर्त थे । फिलहाल तो यह भी कहा जा रहा है कि संविधान देश की जनता के ठोस अनुभवों से रहित था और उसमें विदेशी गंध बहुत अधिक थी । उसकी भाषा भी आम जनता के लिए अबूझ है । इन मान्यताओं से संविधान बनने की प्रक्रिया में रुचि तो नहीं ही पैदा होती, यह धारणा भी बनती है कि संविधान तो भारत की निरक्षर और अलोकतांत्रिक जनता को लोकतंत्र की शिक्षा देने का माध्यम था । इसके उलट इस किताब के लेखकों को लगता है कि बहुतेरे भारतीय संविधान के जरिये प्राप्त होने वाली लोकतांत्रिकता के बारे में सजग थे । व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद के आधार पर उन्होंने अपनी मांग उठाने के लिए संगठित होना शुरू कर दिया और इसी प्रक्रिया में संविधान का अनुवाद अपने लिए सुबोध भाषा में किया । उन्होंने संविधान सभा को चुनौती दी और नये विचार प्रस्तुत किये । इस क्रम में उन्होंने सभा के सदस्यों को शिक्षित किया और संविधान पर अपना दावा ठोंका । इस तरह उन्होंने संविधान का अनुपनिवेशन किया ।  

संविधान बनाने की प्रक्रिया के स्थापित वर्णन में सभा की बहसों के अतिरिक्त बहसों के महत्वपूर्ण हिस्सों पर ध्यान नहीं दिया जाता । संविधान का लेखन तीन साल में हुआ जबकि सभा केवल एक साल तक बहस हेतु बैठी । इसके बाद की अवधि में लाखों लोगों ने जिस तरह जीवंत बहसें कीं उनका जिक्र संविधान निर्माण के प्रसंग में नहीं होता । संविधान निर्माण की प्रक्रिया की जितनी सूक्ष्म निगरानी देश की जनता ने की उसे भी इसे बनाने की प्रक्रिया के बाहर समझा जाता है । इस निगरानी ने अप्रत्याशित नतीजों को जन्म दिया । सभा के सचिवालय को जितने ज्ञापन मिले उन्हें सुरक्षित रखना भी मुश्किल हो गया । जिन दो सालों में सभा की बैठकें नहीं हुईं उस दौरान सभा के सदस्य देश और दुनिया के तमाम लोगों के साथ संवादरत रहे । इन तीनों साल जनता एकत्र होकर मांगें करती रही और संविधान की कमियां भी जताती रही । संविधान बनने की प्रक्रिया के साथ जनता का यह जुड़ाव और उनकी सक्रियता इस बात की इजाजत नहीं देती कि भारत के संविधान संबंधी बहसों को किसी भी स्तर पर समाप्त मान लिया जाय ।

किताब में संविधान के सिलसिले में देसी रियासतों, कबीलाई इलाकों के साथ अंग्रेजी संस्थानों के भीतर चलने वाली बहसों को भी जगह दी गयी है । अब तक इनकी उपेक्षा हुई है । ऐसा करने से आधा भूभाग और तिहाई आबादी नजरों से ओझल रही है । लेखकों के मुताबिक देसी रियासतों और कबीलाई इलाकों की घटनाओं की भूमिका संविधान बनने म बहुत महत्वपूर्ण रही हैं । इसी तरह प्रांतीय विधानमंडलों, नगरपालिकाओं, न्यायपालिका और नौकरशाही के भीतर चलने वाली बहसों भी देखी गयी हैं । इनके आधार पर भी बहुतेरे संवैधानिक कदम उठाये गये और उनकी विरासत अब तक बनी हुई है ।

इसके लेखकों में से ओर्नित सानी ने सार्वभौमिक मताधिकार के आधार पर 1947 से 1950 के बीच बनी पहली मतदाता सूची का अध्ययन किया है । उनका कहना है कि भारत जैसे भेदभावपूर्ण समाज में सरकार गठन हेतु प्रक्रिया की समता को संस्थाबद्ध करना संविधान के लेखन से पहले ही संपन्न हुआ और इसने देश के लोकतंत्र को जनता के लिए सार्थक और विश्वसनीय कहानी बना दिया । मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए संघर्ष ने संविधान के बनने से पहले ही उसे ठोस शक्ल दे दी । इसी तरह रोहित डे ने संविधान के अध्ययन के क्रम में पाया कि वेश्या या कसाई जैसे समाज के अत्यंत हाशिए के समुदायों ने भी नयी सरकार के नियमों से अपनी रक्षा के लिए संविधान का सहारा लिया था । इस तरह संविधान ने देश के लोगों के दैनन्दिन को बहुत गहाराई से बदला और इस बदलाव की अगुआई अल्पसंख्यक समूहों ने की । दोनों लेखकों के पहले के इन अध्ययनों को इस किताब ने आगे बढ़ाया है ।