Friday, March 21, 2025

कामरेड चंदू और आज का समय

 

                 

                                          

कामरेड चंदू के समय जिन राजनीतिक प्रवृत्तियों की शुरुआत हुई थी आज वे अपनी परिणति को प्राप्त हो चुकी हैं । जब पिछली सदी की आखिरी दहाई में सोवियत संघ के विखंडन के साथ उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण वाला नवउदारवाद, भाजपाई उग्र हिंदू सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय की प्रवृत्तियों का आगमन हमारे देश में एक साथ हुआ तो स्वाभाविक रूप से विद्यार्थी राजनीति में भी बहसें तेज हुईं । जेएनयू का परिसर वैसे भी वामपंथ की तीखी आपसी बहसों के लिए मशहूर रहा है । उसके पारम्परिक राजनीतिक माहौल में उपर्युक्त बदलावों की वजह से आइसा और अभाविप का आगमन भी एक ही साथ हुआ । जो पारम्परिक संगठन थे उनको भी इन प्रवृत्तियों के हिसाब से ढलना पड़ा । उदाहरण के लिए फ़्री थिंकर्स नाम का एक संगठन था जो धीरे धीरे आरक्षण विरोध और हिंदू सांप्रदायिकता का पोषक बनता गया । जिनका जिक्र अभी हुआ उन दोनों नये संगठनों का उभार और प्रवेश परिसर से बाहर की सामाजिक हलचल का नतीजा था । उसके बाद से तीस से अधिक साल गुजर चुके हैं । इन सालों में इन तीनों ही प्रक्रियाओं का स्वरूप बदला और इनके आपसी रिश्ते भी एक दूसरे को गहरे प्रभावित करते रहे । इन्हीं सामाजिक राजनीतिक बदलावों का असर विद्यार्थी राजनीति में सक्रिय दोनों संगठनों पर भी पड़ा ।  

हिंदू सांप्रदायिकता का पोषण करने वालों ने शुरू में वैश्वीकरण के विरोध में स्वदेशी का राग अलापा लेकिन जल्दी ही अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के साथ उसके रिश्ते साफ होते गये । उनका सोच और काम किसी आम सांप्रदायिक संगठन का नहीं था बल्कि उसमें फ़ासीवादी प्रवृत्ति की गहरी मौजूदगी थी । इस बात को कहने में पारम्परिक वाम के प्रमुख संगठन एस एफ़ आई को हिचक होती थी और इसके कारण वे साहस के साथ पहल करने में बाधा महसूस करते थे । जब उनके ही साथ सहानुभूति रखने वाले संगठन सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) ने अयोध्या में ‘हम सब अयुध्या’ नाम से प्रदर्शनी लगायी तो उसके एक चित्र पर मचे कोहराम की वजह से संसद ने सर्वसम्मति से उसकी निंदा की । उस संसद में प्रधानमंत्री के पद पर विश्वनाथ प्रताप सिंह थे और सरकार को भाजपा के साथ ही वाम का भी समर्थन हासिल था । जाहिर है उग्र हिंदू सांप्रदायिकता के विरोध में खड़ी ताकतों को इस तरह के विचलनों से निराशा होती थी । आइसा ने इसके बरक्स सांप्रदायिक फ़ासीवाद के मुकाबले के लिए साहस के साथ पहल की इसलिए एस एफ़ आइ का भी एक हिस्सा टूटकर आइसा के साथ आ मिला । इस राजनीतिक प्रवृत्ति की पहचान और उसके विरोध के सवाल पर वामपंथ की इन दोनों धाराओं के बीच मतभेद अब भी जारी है । अभी माकपा ने वर्तमान शासन को फ़ासीवादी कहने से परहेज बरता हुआ है ।         

सांप्रदायिक फ़ासीवाद से लड़ने के मामले में एस एफ़ आई ने माकपा की सीमा ही अपना रखी थी । वह सीमा सरकार के भरोसे उसका मुकाबला करने की थी । सरकार की सीमा के प्रसंग में हमने ऊपर संकेत किया कि उसे भाजपा के भी समर्थन की जरूरत होती थी । इस दबाव में बहुधा माकपा और उसी तरह एस एफ़ आई भी धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में मजबूत लड़ाई लड़ने वालों की उम्मीद से धोखा कर जाते थे । इसके मुकाबले माले ने संघर्ष की ताकतों को साथ लेने पर बल दिया । खासकर जब भाजपा ने अयोध्या को झांकी कहकर काशी और मथुरा का भी अपना मकसद जाहिर किया तो बनारस में विनोद मिश्र द्वारा इस सवाल पर जनप्रदर्शन और उनकी गिरफ़्तारी के बाद आइसा द्वारा प्रदर्शन और उसमें कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी ने आइसा की छवि को धर्मनिरपेक्षता के लिए समझौताविहीन संघर्ष करने वाले संगठन के रूप में स्थापित कर दिया । केंद्र सरकार के अलावे बिहार की सरकार भी माकपा की उम्मीद का मजबूत सहारा थी । खासकर आडवाणी की रथयात्रा के रोके जाने के बाद लालू सरकार पर उदारवादी बौद्धिक लट्टू थे । इस सरकार के साथ लेकिन एक और तथ्य यह था कि रणवीर सेना द्वारा बिहार में दलित संहार की घटनाएं भी सबसे अधिक इसी सरकार के काल में घटित हो रही थीं । रणवीर सेना ने सवर्ण सामंती दबदबे को कायम रखने के अपने मकसद के पक्ष में भाजपाई उभार को भी इस्तेमाल किया । इस तरह आइसा के लिए हिंदू सांप्रदायिकता से लड़ने का काम समग्र सामंतवाद विरोध की लड़ाई का अंग हो गया था । रणवीर सेना समाज की पुरानी व्यवस्था को कायम रखने के लिए ही दलित संहार का अभियान चलाये हुए थी । इस तरह जातिवाद के विरोध से भी सांप्रदायिकता का विरोध मिल गया । इस विशेषता ने आइसा के सांप्रदायिकता विरोध को तत्कालीन सामाजिक उथल पुथल में दमित समुदायों की राजनीतिक दावेदारी की आकांक्षा के साथ जोड़ दिया । इसका ही स्वाभाविक प्रतिफलन अंबेडकर के संवैधानिक मूल्यों को धर्मनिरपेक्षता के समर्थन में खड़ा करने के बतौर सामने आया । जातिप्रथा का उनका विरोध हिंदू राष्ट्र को घोर विपत्ति मानने से जुड़ गया ।   

इस सवाल पर आइसा की वैचारिकता का एक और पहलू भी प्रासंगिक बना हुआ है । उसने उदार हिंदू की ओर से लड़ने के मुकाबले धर्मनिरपेक्षता का पक्ष लिया । नागभूषण पटनायक ने इसे एक रैली में राज्य की नीति को ‘सर्व धर्म वर्जयेत’ कहकर परिभाषित किया था । हिंदू सांप्रदायिकता और मुस्लिम सांप्रदायिकता को एक ही सुर में समान समझकर खारिज करने की मांग अक्सर वामपंथियों से की जाती थी । आइसा ने हमेशा यह कहा कि भारतीय समाज में सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार स्वाभाविक रूप से बहुसंख्यक धर्म की पक्षधरता में बदल जाता है । सांप्रदायिक फ़ासीवाद का खतरा भी बहुसंख्यक सांप्रदायिकता से पैदा होता है । इसलिए सांप्रदायिकता से लड़ाई देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य के निर्माण से अभिन्न तौर पर जुड़ी है ।

नवउदारवादी आर्थिकी के सवाल पर सर्वानुमति पर भी आइसा ने सवाल उठाये और माना कि मानवीय चेहरे वाले पूंजीवाद के निर्माण की बात हवाई सपना है । आर्थिक सुधारों को लागू करने के क्रम में उठने वाले जनता के विक्षोभों के दमन हेतु इसने दुनिया भर में तानाशाही की स्थापना को प्रेरित किया है । कोई कारण नहीं कि भारत में इसका चरित्र अपवाद के बतौर मानवीय बना रहे । जमीन पर इस आर्थिकी के हमले का सबसे बड़ा शिकार छतीसगढ़ के ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी थे । उसके बाद तो किसी भ्रम की गुंजाइश ही नहीं थी । अब तो सबके सामने हमारे देश के फ़ासीवाद का कारपोरेट चेहरा नंगा हो चुका है । आइसा की इस समग्र समझ ने उसे व्यापक लोकतांत्रिक गोलबंदियों के साथ सहकार विकसित करने का मौका दिया । यह इसकी एक और विशेषता थी जिसका सबसे चरम रूप कामरेड चंद्रशेखर द्वारा सीवान जाकर कृषि संघर्ष के साथ एकजुट होने का फैसला था । आइसा ने विद्यार्थी आंदोलन को कभी परिसर के भीतर सीमित रखने के बारे में सोचा भी नहीं । न केवल वह खुद बाहरी सामाजिक हलचल का प्रतिबिम्ब था बल्कि विद्यार्थी आंदोलन को हमेशा उसने व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन के अभिन्न अंग के बतौर देखा । इसी कारण दलितों के संहार, मजदूर आंदोलन के दमन से लेकर इराक पर अमेरिकी हमले की मुखालफ़त तक के साथ खुद को जोड़े रखा । स्त्री आंदोलन और पर्यावरण के प्रश्न से भी उसने रचनात्मक संवाद विकसित किया ।                  

वर्तमान शासन की वैचारिकता का वाहक संगठन अभाविप लगभग सभी परिसरों में प्रशासन का पक्ष लेता है । उसका बुनियादी ध्येय अधिकार की जगह कर्तव्य पर जोर देना है । उसके अध्यक्ष आम तौर पर अध्यापक होते हैं । सभी शिक्षा परिसरों में प्रशासन के सहारे वह अपना एजेंडा लागू करवा रहा है । विद्यार्थी राजनीति की यह विचित्र परिघटना है जब कोई विद्यार्थी संगठन प्रशासन के पक्ष की वकालत करे । उसके साथ भाजपा की अकूत धनशक्ति, समाज के चरम प्रतिक्रियावादी तत्व और राजसत्ता का खुला संरक्षण है । इस नयी स्थिति ने शिक्षा के मोर्चे पर संघर्ष को बहुआयामी वैचारिकता प्रदान की है । अब उसके साथ शिक्षा के सामाजिक दायित्व को फिर से जगाने का दायित्व भी जुड़ गया है । विद्यार्थी आंदोलन को अब कुछ सुविधाओं को हासिल करने तक सीमित नहीं रखा जा सकता । शिक्षा में निहित आलोचनात्मकता ही उसे सामाजिक लोकतंत्र का सहायक बनाती है । इस कठिन समय में शिक्षा को उसकी इस बुनियादी भूमिका में ले आने के कर्तव्य से पीछा छुड़ाकर कोई भी सार्थक विद्यार्थी आंदोलन खड़ा नहीं किया जा सकता । चंद्रशेखर और आइसा की विरासत का विकास इसी दिशा में वांछित है । इसी रास्ते पर चलकर शिक्षण संस्थान राष्ट्र निर्माण में अपेक्षित योगदान कर सकते हैं । उनका एकमात्र कर्तव्य युवा बौद्धिक को यथास्थिति में बदलाव हेतु मदद करने लायक बनाना है, अन्यथा वे अपनी भूमिका से चूक जाएंगे । विद्यार्थी आंदोलन शिक्षा केंद्रों को उनकी इस भूमिका में उतरने की प्रेरणा देकर ही अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा सकेगा ।                   

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