Thursday, April 2, 2015

एजेंडे का बदलाव

                      

नयी सदी में मार्क्सवाद के स्वरूप के सिलसिले में कुछ बहुत ही मजेदार बातें डेविड सोकोल नेदेयरफ़ोर कांट वाज रांग : द एडवेंट आफ़ द टर्न टु कल्चर इन मार्क्सिस्ट थाटशीर्षक अपने विस्तृत शोधपत्र में कही हैं । उनका कहना है कि मार्क्स और एंगेल्स की रुचि क्रांतिकारी राजनीति, इतिहास के विश्लेषण और आर्थिक सिद्धांतों में प्रमुख रूप से दिखाई पड़ती है तो बीसवीं सदी के उनके अनुयायियों की रुचि का क्षेत्र बदल गया था । उनके लेखन में दर्शन, लोकप्रिय संस्कृति और सबसे अधिक कला और साहित्य के अध्ययन पर जोर दिखाई देता है । पेरी एंडरसन की किताबकंसिडरेशन्स आन वेस्टर्न मार्क्सिज्मके हवाले से सोकोल बताते हैं कि पश्चिमी मार्क्सवाद के अधिकांश दिग्गजों का लेखन कला, साहित्य और सौंदर्यशास्त्र के सवालों पर केंद्रित रहा है । एंडरसन ने तो पश्चिमी मार्क्सवादी चिंतकों तक ही अपने आपको सीमित रखा लेकिन सोकोल ने सोवियत संघ की मार्क्सवादी धारा से जुड़े चिंतकों में भी इस बात की मौजूदगी रेखांकित की है । इस प्रवृत्ति के अवशेष टेरी ईगलटन और फ़्रेडेरिक जेमेसन जैसे चिंतकों में अब भी बने हुए हैं । असल में दूसरे इंटरनेशनल से जुड़े सिद्धांतकारों ने अर्थशास्त्र और राजनीति पर ही विचार किया इसलिए एंडरसन ने इस प्रवृत्ति को उसके विरोध के रूप में देखा है । यह विश्वास किया गया कि दूसरे इंटरनेशनल केभोंड़ेमार्क्सवाद में संस्कृति दोयम दर्जे की चीज मानी जाती थी । संस्कृति के विचारकों नेकार्य-कारणके इकहरे रिश्तों को सृजनात्मक तरीके से चौड़ा किया और सामाजिक बदलाव में आर्थिक के अलावे वैचारिक और सांस्कृतिक तत्वों की भूमिका को भी उजागर किया । प्लेखानोव के सैद्धांतिक काम को बर्नस्टीन के विरोध के रूप में ही समझा जा सकता है । प्लेखानोव ने समाज के आर्थिक आधार और रचनाकार की वर्गीय विचारधारा को कला का निर्धारक तत्व माना । कलात्मक गुणवत्ता के आकलन में सौंदर्यात्मक की जगह विचारात्मक पहलुओं पर अधिक ध्यान देने की उन्होंने वकालत की । सामाजिक बदलाव में कला और संस्कृति की भूमिका पर भी उन्होंने जोर दिया । रूसी मार्क्सवादियों में संस्कृति के सवालों पर जोर को पहचानने के बाद एंडरसन ने पश्चिमी मार्क्सवाद में इसकी जगह को पश्चिमी देशों में मजदूर वर्ग की पराजय और पूंजीवादी लोकतांत्रिक शासन की मजबूती से जोड़ा है । शायद सोकोल नई सदी में आर्थिक और राजनीतिक लेखन के पुनरुत्थान की संभावना देखते हैं ।

Wednesday, April 1, 2015

जेम्स पेत्रास की नजर से दुनिया का वर्तमान

      जेम्स पेत्रास ने एक लेख लिखा है ‘पाजिटिव थाट्स आन डार्क टाइम्स’ । इसमें उन्होंने इस दौर में जो आशा के सकारात्मक चिन्ह दिखाई दे रहे हैं उनके बारे में बताने की कोशिश की है । उनका कहना है कि सचमुच पिछले पंद्रह सालों से यूरोप, अमेरिका और इजरायल युद्ध का खूनी खेल खेल रहे हैं, पूरी दुनिया में विषमता बढ़ी है, आर्थिक संकट का अंत दिखाई नहीं पड़ रहा है तथा एशिया, उत्तरी अफ़्रीका, यूरोप और कनाडा में दक्षिणपंथी तानाशाहियों का उभार हुआ है । फिर भी कुछ सकारात्मक बदलाव भी आए हैं जो प्रतिक्रियावाद के वर्तमान उभार को बुनियादी तौर पर उलट देने में सक्षम हैं । माना कि एशिया बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है लेकिन चीन में मजदूर वर्ग के संघर्षों की धमक अनजानी नहीं है जिनके चलते उनके वेतन और मजदूरी में औसतन 10% सालाना बढ़ोत्तरी हुई । दस सालों में इसका असर वेतन के दोगुना होने में प्रकट हुआ । इसके लिए मजदूरों ने हड़ताल, प्रदर्शन और जुझारू तरीके अपनाए । वेतन की बढ़ोत्तरी के चलते अनेक विदेशी कंपनियों ने अपना काम तटीय क्षेत्रों से हटाकर देहाती इलाकों में स्थानांतरित किया जिससे देहातों में सर्वहारा की तादाद बढ़ी और वर्ग संघर्ष के क्षेत्र का विस्तार हुआ । अनेक कंपनियों ने सस्ती मजदूरी के चक्कर में कंबोडिया, वियतनाम और बांग्लादेश की राह पकड़ी । नतीजा कि इन देशों में भी जुझारू मजदूर वर्ग संघर्ष फैल गया । ऐसी भी खबरें हैं कि चीन में मजदूरी में इजाफ़े और अमेरिका में कमी के चलते अनेक अमेरिकी कंपनियों ने उत्पादन का काम अमेरिका में ही कराने का फैसला किया है । चीन से बाहर की ओर पूंजी निवेश में बढ़ोत्तरी आई है । यह पूंजी जहां भी जा रही है वहां मजदूर वर्ग के संघर्षों में भी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है । इस तरह चीन के भीतर की मजदूरों की लड़ाई से विश्वव्यापी बदलाव आ रहे हैं । एशिया में ही अफ़गानिस्तान की लड़ाई का अंत सूझ नहीं रहा है । इसका असर अमेरिका के भीतर तो पड़ ही रहा है दुनिया भर में अमेरिकी साम्राज्य निर्माण पर इसका नकारात्मक प्रभाव जनता के लिए शुभ संकेत है । अफ़गान युद्ध के विरोध ने ऐसा वातावरण बना दिया है कि किसी दूसरे युद्ध अभियान के लिए अमेरिकी प्रशासन हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है । लिबिया में ओबामा शहरों की बमबारी ही कर सके, देश पर कब्जा करने के लिए सेना नहीं भेज सके । सीरिया में प्रत्यक्ष दखल नहीं किया जा सका । इजरायल लाबी की ओर से ईरान पर हमला करने के जबर्दस्त दबाव के बावजूद ऐसा नहीं हो सका, आर्थिक प्रतिबंधों तक ही रुक जाना पड़ा ।   
इन धक्कों के कारण अमेरिका एशिया और लैटिन अमेरिका के पुराने प्रभाव क्षेत्रों में आर्थिक,राजनीतिक और कूटनीतिक असर खोता जा रहा है । दोनों इलाकों के बाजार में अमेरिकी हिस्सेदारी घटी है । अमेरिका को छोड़कर क्षेत्रीय संगठनों और मंचों का गठन लैटिन अमेरिका में हो रहा है । मध्य-पूर्व में फंसे होने के कारण अमेरिका अन्य जगहों पर कुछ कर नहीं पा रहा है । मध्य-पूर्व में अमेरिका के सहयोगी जनता में आधार खोते जा रहे हैं । इजरायल की सहायता बोझ होती जा रही है । अमेरिका के भीतर यहूदी नौजवानों में पुरानी सत्ता संरचनाओं के प्रति आकर्षण खत्म होता जा रहा है । खाड़ी के पुराने दोस्त देश भी जन आंदोलनों के मुहाने पर हैं । वहां मौजूद अमेरिकी अड्डे किसी भी आगामी जन विक्षोभ के शिकार हो सकते हैं । इसके अलावा ये शासक जुबानी तौर पर तो अमेरिका को समर्थन दे रहे हैं लेकिन गुपचुप सुन्नी कट्टरपंथियों का साथ भी दे रहे हैं ।
यूरोप में भी परिस्थिति डांवाडोल ही है । नाटो के हथियार तो रूस की सीमा तक तैनात हो गए हैं लेकिन अर्थतंत्र लंबे दिनों से मंदी और ठहराव से गुजर रहा है । संकट के खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे । सभी देश आर्थिक रूप से लगभग कोमा में हैं । विषमता बढ़ती जा रही है और वेतन तथा सामाजिक सुरक्षा का ढांचा बिखरता जा रहा है । वर्गीय गोलबंदी तेज हो रही है । वर्ग संघर्ष के पुनर्जीवन के वस्तुगत हालात पूरी तरह से तैयार हैं । यूरोपियन यूनियन ने यूक्रेन तक अपना प्रभाव क्षेत्र विस्तारित करके जहमत मोल ली है । पूर्वी यूक्रेन में मजदूरों ने पश्चिम की कठपुतली सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है । रूस पर प्रतिबंध लगाने की अमेरिकी कोशिश को जर्मनी, फ़्रांस और इटली आदि देशों के पूंजीपतियों से ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है । खुद अमेरिका में भी व्यावसायिक संगठन इसके विरोध में विज्ञापन छपा रहे हैं । अमेरिका में पूंजीपति वर्ग और साम्राजवादी राज्य मशीनरी के बीच खाई नजर आने लगी है । प्रतिबंधों के विरुद्ध रूस और चीन ने आपसी राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक सहयोग बढ़ा दिया है । चीन में देशी अर्थतंत्र उसकी मजबूती की जड़ में तो है ही, रूस ने भी आत्मनिर्भरता के रास्ते खोजने आरंभ कर दिए हैं । संक्षेप में प्रतिबंधों का असर उलटा पड़ रहा है । दूसरी ओर यूरोप में नीचे से प्रतिरोध की ताकतें खड़ी होने लगी हैं । ग्रीस में सीरिजा का उदय इसका प्रमाण है । इसके बाद स्पेन की बारी है । नव उदारवादी नीतियों के विरुद्ध विरोध को दक्षिणपंथी ताकतें शुरू में तो भुनाने में कामयाब होती नजर आईं लेकिन अब वाम ने पहलकदमी ले ली है ।
लैटिन अमेरिका में वाम की प्रगति में रुकावट आई है । फिर भी अमेरिका के समर्थक चिली और पेरू अपने आर्थिक मामलों में अमेरिका से अधिक चीन पर निर्भर हैं । होंडुरास और पराग्वे में अमेरिका तख्ता पलट करा सका लेकिन बिलिविया, वेनेजुएला और इक्वाडोर अब भी उसकी पकड़ से बाहर ही हैं । कोलंबिया में अमेरिका के सात अड्डे हैं लेकिन उसने वेनेजुएला के साथ व्यापारिक समझौता किया है । लैटिन अमेरिकी देशों की निर्भरता अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी पर बहुत अधिक है जिसके चलते उनके लिए मुश्किलें होती हैं । क्यूबा के सवाल पर भी ओबामा को अपना रुख बदलना पड़ा है ।
दक्षिण अफ़्रीका में खदान मजदूरों की ऐतिहासिक हड़ताल ने दुनिया भर के मजदूर आंदोलन में योगदान किया है । खुद अमेरिका में 80% लोगों ने ओबामा के युद्ध प्रयासों के विरोध में राय व्यक्त की है । इसमें वाम तत्व को सीएटल में समाजवादी प्रत्याशी क्षमा सावंत की जीत में देखा जा सकता है । शिकागो में अध्यापकों का संघर्ष स्थानीय अफ़्रीकी और लैटिन अमेरिकी समुदाय के समर्थन से जारी है । वैकल्पिक मीडिया के कार्यकर्ता भी मोर्चा संभाले हुए हैं और मीडिया पर कारपोरेट के कब्जे का जवाब दे रहे हैं । अमेरिकी व्यवसायियों के मंचों से रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के विरोध में आवाज उठ रही है ।

पेत्रास का कहना है कि सही बात है कि लड़ाई में टक्कर बराबर की ताकतों के बीच नहीं है लेकिन लड़ने से ही जिंदगी की सार्थकता का पता चलेगा और लोग दुश्मन को न केवल पहचानने लगे हैं, बल्कि उसकी हार भी शुरू हो गई है ।

Tuesday, March 31, 2015

पृष्ठभूमि की तरह


नये दौर में मार्क्सवाद के अध्ययन के सिलसिले में जो नयी बातें हुई हैं उनमें एंडी और राब लुकास ने अप्रैल 2005 में एक पहल की है जिसमें ‘मार्क्स: मिथ्स एंड लीजेंड्स’ नाम से लेखमाला शुरू हुई है । उनका कहना है कि मार्क्स के लेखन को पिछले डेढ़ सौ सालों में जितने मिथकों का शिकार होना पड़ा है उतना किसी भी अन्य विचारक के साथ नहीं हुआ है इसलिए उनके आलोचनात्मक अध्ययन के लिए इनकी सफाई जरूरी है । वैसे तो इसमें ज्यादा मुश्किल नहीं है क्योंकि उनका समस्त लेखन उपलब्ध है लेकिन इसकी इच्छा बहुतेरे लोगों को नहीं होती । असल में इन मिथकों के निर्माण का कारण उनकी अपार सफलता है । उनका नाम बीसवीं सदी को न केवल बदलने बल्कि परिभाषित करने वाले युगांतरकारी आंदोलन का पर्याय बन गया । कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को उनके प्रति निष्ठा सिद्ध करनी पड़ती जबकि उनके विरोधी सभी तरह की नफरत भरी चीजों के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराते । उनके लेखन की व्याख्या अनिवार्य रूप से राजनीतिक होती, निस्संग अध्ययन संभव नहीं रह गया । कहने का मतलब यह नहीं कि आंदोलनों ने उनकी तथाकथित शुद्धता को दूषित कर दिया, न ही किसी ‘सही’ मार्क्स को उनकी विरासत का दावा करने वाले बीसवीं सदी के संघर्षों के बरक्स खड़ा कर दिया जाय । विकृतियों की सफाई के नाम पर किसी एकाश्मी मार्क्स को इतिहास की धूल धक्कड़ से बचाकर ‘मार्क्सवाद’ से पूरी तरह से अलगाना ठीक नहीं होगा । फिर भी उनके लेखन और इतिहास पर ध्यान देने से ढेर सारी चीजों पर भ्रम दूर हो सकते हैं । मार्क्स के बारे में जिन मिथकों का निर्माण हुआ है वे दो तरह के हैं । एक तो वे जिनका प्रचार समाजवाद के विरोधियों ने दुर्भावनापूर्वक किया । दूसरे वे जिनका निर्माण उनके अनुयायियों ने किया । इनका निर्माण अनेक ऐतिहासिक कारकों के चलते हुआ और इसकी जिम्मेदारी तय करना जटिल काम है । कुछ मिथ इन दोनों में साझा भी हैं । इससे जुड़ा हुआ खंड उन मिथकों का है जो मार्क्स को ‘राजकीय समाजवाद’ का निर्माता ठहराते हैं । विरोधियों द्वारा प्रचारित मिथकों का बड़ा हिस्सा उनके चरित्र हनन के मकसद से जुड़ा हुआ है इसलिए इनका दूसरा खंड मार्क्स के ‘चरित्र’ से जुड़े मिथकों का है । इसके तहत उन्हें महत्वोन्मादी, मरखाहा, यहूदी-विरोधी और नस्लवादी, घमंडी, स्त्रीलोभी, उबाऊ लेखक और दूसरों के लिखे की नकल मारनेवाला साबित किया गया । उनके बारे में बने मिथकों के खंडन के लिए ध्यान से तथ्यों को देखना होगा । असल में मार्क्स के विचारों का निर्माण जिन संदर्भों में हुआ उनसे पूरी तरह भिन्न संदर्भों में उनका अभिग्रहण हुआ । मिथक निर्माण की एक बड़ी वजह शायद यह भी है । असल में मार्क्स के सोचने का तरीका उनके समय के भी प्रचलित बौद्धिक तरीकों से काफी अलग था । उनके मूल पाठकों में से अधिकतर लोग उस आलोचनात्मक चिंतन धारा से अपरिचित थे जिसमें युवा हेगेलपंथियों का बौद्धिक विकास हुआ था । इसलिए जो कुछ उन्होंने लिखा उसे तत्क्षण ही उन्नीसवीं सदी में प्रचलित समाजवाद के संदर्भ में समझा गया और उसके हेगेलपंथी पहलुओं की उपेक्षा हुई । इसके कारण मार्क्स को उन्नीसवीं सदी के समाजवाद और प्रत्यक्षवाद से जोड़कर देखने की गलतफहमियों का जन्म हुआ । इसी से आर्थिक निर्धारणवादी व्याख्याओं का भी जन्म हुआ । इन मिथकों को चिन्हित करने के बाद इस परियोजना के संचालकों ने उम्मीद जताई है कि भविष्य में अन्य विषयों पर भी साफ-सफाई होगी ।
इस परियोजना के तहत जिन मिथों की सफाई में जिन लोगों के लेख संकलित हैं वे हैं- 1) राजकीय समाजवाद के साथ मार्क्स को जोड़ने के मिथ, जिसके सिलसिले में परेश चट्टोपाध्याय और हाल ड्रेपर के लेख हैं । 2) मार्क्स के चरित्र के बारे में मिथ, जिनके सिलसिले में फ़्रांसिस ह्वीन, टेरेल कारवेर, हाल ड्रेपर और हम्फ्री मैकक्वीन के लेख हैं । 3) उन्नीसवीं सदी के समाजवाद और प्रत्यक्षवाद के साथ मार्क्स को जोड़नेवाले मिथों के सिलसिले में जान हैलोवे और सीरिल स्मिथ के लेख हैं । 4) द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मिथों के सिलसिले में ज़ेड ए जोर्डन और मैक्समिलियन रूबेल के लेख हैं । 5) मार्क्सवाद के अन्य मिथों के सिलसिले में हैरी क्लीवर, पीटर स्टिलमैन, सीरिल स्मिथ और क्रिस्टोफर जे आर्थर के लेख हैं । 6) सबसे अंत में हालिया मिथों के सिलसिले में क्रिस्टोफर जे आर्थर, जोसेफ मैककार्नी और लारेंस विल्डे के लेख प्रस्तुत किए गए हैं । हालांकि कुछ लेख निश्चित ही भ्रम दूर करते हैं लेकिन इन लेखों पर सोवियत परंपरा के मुकाबले पश्चिमी दुनिया के विद्वानों के बीच प्रचलित बहसों की छाया है ।  

परियोजना के तहत उपलब्ध लेखों में से एक मैक्समिलियन रूबेल द्वारा ‘द लीजेंड आफ़ मार्क्स, आर “एंगेल्स द फ़ाउंडर”’ शीर्षक से लिखित है । इन्होंने मार्क्स की एक जीवनी भी ‘मार्क्स विदाउट मिथ्स’ नाम से लिखी है । उक्त लेख में रूबेल ने मार्क्स के विचारों के प्रसंग में एंगेल्स की भूमिका की जांच-पड़ताल की है । उन्होंने मार्क्स के अधूरे काम को संपादित करने में एंगेल्स की क्षमता पर सवाल उठाया है । असल में उनका एतराज ‘मार्क्सवाद’ की प्रस्तुति पर है । साथ में उन्होंने इस मान्यता को भी परखने की कोशिश की है जिसके मुताबिक मार्क्स के मुकाबले एंगेल्स द्वंद्ववादी पद्धति में कम कुशल थे । लेखक मार्क्सवाद की कोटि को ही बनावटी मानते हैं । उनके अनुसार कार्ल कोर्श ने ‘टेन थीसिस आन मार्क्सिज्म टुडे’ में इसी भ्रम में बार बार ‘मार्क्स-एंगेल्स की शिक्षा’, ‘मार्क्स के सिद्धांत’,’मार्क्सवादी सिद्धांत’, ‘मार्क्सवाद’ आदि का व्यवहार किया है । पांचवीं थीसिस में तो उन्होंने संस्थापकों में एंगेल्स का नाम भी नहीं लिया । लेखक का प्रस्ताव है कि ‘मार्क्सवाद’ पद को छोड़ देना ही उचित होगा । आश्चर्यजनक नहीं कि इन्होंने हीमार्क्सोलोजीपदबंध का आविष्कार किया जिसेमार्क्सवादकी जगह इस्तेमाल किया जाता है । इसी तरह के नजरिए से आजकल मार्क्स के लेखन-चिंतन पर सोच-विचार हो भी रहा है ।

Wednesday, February 11, 2015

नए दौर के नए सवाल और नए संघर्ष

पूंजीवादी दुनिया की हलचलों में कुछ नई चीजें दिखाई सुनाई पड़ रही हैं । जिसे हम नव-उदारवादी समय कहते हैं उसके आने के बाद के हालात को लेकर बहस मुबाहिसे जारी हैं । फिलहाल 2014 में प्रकाशित फ़्रांसिसी अर्थशास्त्री थामस पिकेटी की किताब कैपिटल इन द ट्वेंटी फ़र्स्ट सेंचुरीकी चर्चा सबसे अधिक हो रही है । मजेदार बात है कि पिकेटी मार्क्सवादी नहीं हैं । किताब के एक समीक्षक जेम्स के गालब्रेथ के मुताबिक वे नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्र की मान्यताओं से प्रभावित हैं । सिर्फ़ 43 साल के पिकेटी पेरिस स्कूल आफ़ इकोनामिक्स में प्रोफ़ेसर हैं । वे जब 18 साल के थे तो बर्लिन की दीवार गिरी । तात्पर्य कि   मार्क्सवाद से जुड़ी हुई पुरानी बहसों का उन पर वैचारिक असर नहीं है । अपने अनेक साक्षात्कारों में उन्होंने इस बात को स्वीकार भी किया है । हालांकिसमयांतरके हालिया अंक में इस किताब की समीक्षा में रामशरण जोशी ने पिकेटी के माता-पिता के ट्राट्स्कीपंथी जड़ों को खोज निकाला है लेकिन अन्य किसी समीक्षक ने इसके संकेत नहीं दिए हैं ।
मार्क्स का वे विरोध नहीं करते बल्कि सिर्फ़ यह कहते हैं कि उन्हें पर्याप्त आँकड़े सुलभ नहीं थे । पिकेटी का आँकड़ों से लगाव इस बात से जाहिर होता है कि असमानता के इस अध्ययन में बीस से अधिक देशों के पिछले दो सौ सालों से ज्यादा समय के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया है । कुछ हद तक इसके चलते भी यह किताब इसी विषय पर लिखी अन्य पूर्ववर्ती किताबों से अलग है ।  अपनी किताब को पिकेटी अर्थशास्त्र और इतिहास के संयुक्त अनुशासन के भीतर रखना पसंद करते हैं । इस मामले में भी इसकी नवीनता जाहिर है । मुख्य रूप से वे विकसित देशों को अपने अध्ययन का विषय बनाते हैं । चूँकि विकसित देशों में 99% बनाम 1% का संघर्ष अकुपाई आंदोलनों और कटौती विरोधी आंदोलनों के रूप में सामने आया इसीलिए इस किताब को लोकप्रियता भी उन्हीं देशों में हासिल हुई है । अमेरिकी समाज में हाल के दिनों में विषमता में आई वृद्धि के प्रति विक्षोभ का एक कारण यह है कि बीसवीं सदी के ज्यादातर समय वहां विषमता यूरोप के मुकाबले कम रही है जबकि इस सदी में वह यूरोप से अधिक हो गई है ।
नाम के चलते मार्क्स की किताब के साथ पिकेटी की किताब की समानता दिखाई पड़ती है लेकिन दोनों में जमीन आसमान का अंतर है । इसकी समीक्षा करते हुए हार्वे ने बताया है कि मार्क्स के लिए पूँजी मूलत: शोषण के जरिए पूँजीपति को प्राप्त होने वाला अतिरिक्त मूल्य है जबकि पिकेटी पूँजी को संपदा के रूप में देखते हैं । विकसित देशों में संपदा के मामले में बढ़ती विषमता का उनका अध्ययन एक खास सूत्र पर टिका हुआ है । वे कहते हैं कि पूँजी पर मुनाफे की दर अर्थतंत्र में वृद्धि की दर से अधिक बनी हुई है इसलिए इस विषमता के कम होने के कोई आसार नहीं हैं । वे यह भी कहते हैं कि इसके चलते किरायाभोगी (रेंटियर) पूँजी की बाढ़ आई हुई है जो मुख्य रूप से सट्टा बाजार में लगी हुई है और उसी के मुनाफ़े पर टिकी हुई है ।
पिकेटी का कहना है कि इसके चलते लोकतांत्रिक व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया है । इसके समाधान के बतौर वे प्रगतिशील आय-कर, विरासत कर आदि से अलग वैश्विक संपदा कर भी लादने का प्रस्ताव कर रहे हैं । फ़्रांस के रहनेवाले पिकेटी के लिए संपदा कर कोई नई बात नहीं है क्योंकि राजनीतिक क्रांतियों के इस देश में विषमता को बढ़ने से रोकने के लिए इसका प्रावधान लंबे दिनों से है ।      
विख्यात दार्शनिक अर्थशास्त्री का मुकाम हासिल कर चुके प्रभात पटनायक आम तौर पर पिकेटी के सरोकारों में मार्क्सवादी विद्वानों की प्रतिध्वनि सुनते हैं लेकिन वे पिकेटी से अपनी असहमति भी जाहिर करते हैं । वे कहते हैं कि आखिर अर्थतंत्र में वृद्धि की दर का निर्धारण कैसे होगा । पिकेटी के जवाब के मुताबिक इसका निर्धारण श्रमशक्ति की वृद्धि दर और प्रौद्योगिक प्रगति के चलते श्रम की उत्पादकता की वृद्धि दर को जोड़कर होगा । इस पर श्री पटनायक की आपत्ति यह है कि पूँजी केवल देशी श्रम की उत्पादकता पर निर्भर नहीं रही है । पूँजी ने श्रम की जरूरत को पूरा करने के लिए दुनिया भर में लोगों को दासों, बंधुआ मजदूरों या प्रवासी कामगारों के बतौर इस देश से उस देश दुनिया भर में नचाया है ।
हिंदू अखबार में इसकी समीक्षा लिखते हुए के सुब्रमण्यम ने लिखा है कि इस किताब का प्रभाव गहरा और दूरगामी होगा । उनका कहना है कि विषमता मुख्य धारा के आर्थिक चिंतन के लिए हमेशा ही असुविधाजनक बात रही है । पूरी कोशिश यह साबित करने की होती है कि जितना काम किया गया उसका सही हिसाब करके मजदूरी दे दी जाती है इसलिए विषमता का कारण उत्पादन या वितरण की गड़बड़ी नहीं, जातीय, सांस्कृतिक या कौशल संबंधी गुण होते हैं । पिकेटी विषमता को एक समाजैतिहासिक परिघटना मानते हैं जिसकी जड़ें संपदा प्रवाह और आय के वितरण में हैं । इसका अध्ययन वे रिकार्डो, माल्थस या मार्क्स की तरह करना चाहते हैं । उनके अनुसार इसकी उपेक्षा का कारण कुज्नेट के आशाजनक निष्कर्ष रहे हैं ।
अरिंदम सेन ने लिबरेशन में लिखी अपनी समीक्षा में बताया है कि साइमन कुज्नेट नामक एक अर्थशास्त्री ने बीसवीं सदी के मध्य में आर्थिक वृद्धि और विषमता के बीच संबंध बताने के लिए घंटी की शक्ल का वक्र प्रस्तावित किया जिसके अनुसार उद्योगीकरण और नगरीकरण के चलते शुरू में आर्थिक विषमता बढ़ती है क्योंकि बिल्डर धनी होते जाते हैं लेकिन देहात से आने वाले कामगारों की मजदूरी काफी कम होती है । थोड़े दिनों बाद जब देहात से मजदूरों की आपूर्ति कम होने लगती है और इस आबादी को अन्य जगहों पर भी काम मिलने लगता है तो उनकी मजदूरी बढ़ानी पड़ती है । यहां तक कि कम आमदनी वाली आबादी सरकारी नीतियों को अपने पक्ष में करवाने में सफल होती है । इससे विषमता घटने लगती है । इसी को कुज्नेट वक्र कहते हैं जिसमें विषमता शुरू में तो बढ़ती है लेकिन समय बीतने के साथ कम होने लगती है । इस धारणा के अनुसार आर्थिक वृद्धि ही सब कुछ है । जान एफ़ केनेडी इसे रूपक की भाषा में व्यक्त करने के लिए समुद्री ज्वार का उदाहरण देते हैं जो सभी नावों को ऊपर उठा देता है । पिकेटी की किताब ने कुज्नेट में बुर्जुआ अर्थशास्त्र की आस्था को हिलाकर रख दिया है ।
हिंदू में ही निकोलस डी क्रिस्ताफ़ लिखितऐन इडियट्स गाइड टु इन-इक्वलिटीशीर्षक लेख में बताया है कि पिकेटी की किताब अमेजन के आंकड़ों के अनुसार हाल में सबसे अधिक बिकने वाली किताब रही है । इसके शुरुआती 26 पृष्ठों ने सबसे अधिक ध्यान खींचा है । स्वाभाविक रूप से ये पृष्ठ विषय प्रवेश के हैं । लेखक ने यह लेख समीक्षा के रूप में नहीं, बल्कि टिप्पणी के रूप में लिखा है । उनका कहना है कि अमेरिकी लोग असमानता को समझना चाहते हैं क्योंकि यह उनका प्रतिदिन का अनुभव हो चुका है । सबसे धनी 1% लोगों के पास सबसे गरीब 90% लोगों से अधिक संपत्ति जमा हो गई है । दुनिया के सबसे धनी 85 लोगों के पास सारी संपत्ति का आधा हिस्सा है । 2010 में अमेरिका में होने वाली कुल आमदनी का 93% सबसे अमीर 1% लोगों के हिस्से आया । यह विषमता आर्थिक वृद्धि के लिए बाधा बन गई है । सही बात है कि असमानता कम होने से आर्थिक वृद्धि तेज होती है । इसका उदाहरण दूसरे विश्व युद्ध के बाद के दशक हैं । अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक शोध पत्र में भी माना गया है कि समतापरक समाजों में तीव्र आर्थिक वृद्धि देखी गई है । विषमता के चलते सामाजिक अस्थिरता पैदा होती है । समाज में दरारें पैदा होती हैं और नीचे पड़े लोग अपने आपको अधिकारविहीन समझने लगते हैं । बाजार पर से भरोसा उठने लगता है और लगता है कि लोगों की संपत्ति उठाकर धनियों को सौंप दी जा रही है । संपत्ति का स्रोत जोड़ तोड़ नजर आने लगता है । मसलन धनी लोगों को फायदा पहुंचाने वाले टैक्स के कानून बनाए जाते हैं । दवा कंपनियों के मालिकान ने दवाओं के कम दाम वाले चिकित्सा कार्यक्रम को अमेरिकी कांग्रेस में रुकवाने के लिए राजनेताओं की गोलबंदी की और 50 बिलियन डालर का सालाना मुनाफा कमाया ।
पिकेटी की किताब के ही प्रसंग में नोबेल पुरस्कार से समानित अर्थशास्त्री जोसेफ स्तिगलित्ज की किताबद प्राइस आफ़ इन-इक्वलिटीकी भी चर्चा हो रही है जो डब्ल्यू डब्ल्यू नार्टन एंड कंपनी द्वारा 2012 में न्यूयार्क और लंदन से एक साथ प्रकाशित हुई है । इस किताब का उप-शीर्षक हैहाउ टुडेज सोसाइटी एनडैंजर्स आवर फ़्यूचर। भूमिका में वे वर्तमान समय यानी 2011 को बहुत कुछ 1848 या 1968 जैसा ही ऐतिहासिक मानते हैं । उनके अनुसार ऐसे समय वे हैं जब लोग उठ खड़े होते हैं और प्रचलन को गलत मानते हुए बदलाव की मांग करते हैं । अरब वसंत के साथ बदलाव की यह भावना एक के बाद दूसरे देश में प्रकट हुई । जल्दी ही यह आग यूरोप और अमेरिका तक फैल गई । इनके हालात में अंतर थे लेकिन समानता भी थी । दोनों ही जगहों पर आंदोलन के पीछे आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के असफल और अन्यायपूर्ण होने की समझदारी काम कर रही थी । दुनिया भर की सरकारें बेरोजगारी जैसी समस्याओं के समाधान के बारे में चिंतित नहीं दिख रही थीं । ऐसे में अन्याय का अहसास विश्वासघात के अहसास में बदल गया । लोकतंत्र भी धोखा महसूस होने लगा । इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों को लगता है कि अगर सरकारें लोगों के प्रति अपने आपको जवाबदेह समझें तो चुनावी लोकतंत्र कारगर हो सकता है । रोजगार और घरों की समस्या से आगे जल्दी ही आंदोलन में अमेरिकी समाज की तमाम विषमताओं पर चर्चा होने लगी ।                       
लगे हाथों जनवरी 2014 में आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशितद आक्सफ़ोर्ड हैंडबुक आफ़ द हिस्ट्री आफ़ कम्युनिज्मकी भी चर्चा कर लेते हैं । 672 पृष्ठों की यह किताब एस ए स्मिथ के संपादन में प्रकाशित हुई है और बीसवीं सदी के कम्युनिस्ट आंदोलन का बेहतरीन विश्लेषण मानी जा रही है । किताब केइंट्रोडक्शनमें स्मिथ ने बताया है कि यह किताब पिछले कुछेक दिनों में रूस और अन्य पूर्वी यूरोप के देशों तथा चीन में सामने आए नए दस्तावेजों के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के विभिन्न विद्वानों के 35 लेखों का संग्रह है । शुरू के चार लेख उन संस्थापकों पर केंद्रित हैं जिनके विचारों और गतिविधियों ने विभिन्न देशों में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना में केंद्रीय भूमिका निभाई । इसमें मार्क्स-एंगेल्स के विचारों के हिसाब से साम्यवाद के विवेचन पर लिखा परेश चट्टोपाध्याय का लेख महत्वपूर्ण है । किताब का दूसरा हिस्सा उन पांच युगांतरकारी दौरों का विश्लेषण करता है जो कम्युनिस्ट आंदोलन के जीवन में निर्णायक रहे । शंकर राय द्वारा लिखी समीक्षा में 1919, 1936, 1956, 1968 और 1989 को इन मौकों के रूप में चिन्हित किया गया है । उनका कहना है कि इन मौकों की पहचान ही कम्युनिस्ट आंदोलन की रूस केंद्रित छवि को खंडित करती है और उसकी विविधता तथा व्यापकता को उजागर करती है । इनमें 1968 पर माड एन ब्राके द्वारा लिखा गया अध्याय उस समय केसांस्कृतिक क्रांतिके प्रयासों का विश्लेषण करता है । किताब के तीसरे हिस्से में दुनिया के प्रमुख इलाकों में कम्युनिस्ट पार्टियों और उनके शासन की छानबीन की गई है । बाकी किताब में कम्युनिस्ट शासन के मातहत जीवन के अलग अलग पहलुओं को जांचा परखा गया है । इसकी मुख्य विशेषता यह है कि अधिक ध्यान उन देशों पर दिया गया है जहां शासन में कम्युनिस्ट रहे, आंदोलनकारी कम्युनिस्ट पार्टियों की कारगुजारी पर कम ध्यान दिया गया है । संपादक ने लेखकों से किसी एक देश पर लिखने की बजाए एकाधिक देशों के तुलनात्मक विश्लेषण पर जोर देने को कहा था और यह भी कहा था कि विश्लेषण में सत्ता के समक्ष क्रांति से पहले के सामाजिक ढांचों के नफे नुकसान का भी जायजा लें । साथ ही अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के साथ इन देशों के रिश्तों का भी ध्यान रखने को कहा गया था । इसका अपवाद केवल चीन की क्रांति पर लिखा लेख है क्योंकि संपादक का मानना है कि मार्क्सवादी आंदोलन या समाजवादी निर्माण में चीन की भूमिका की अनदेखी की गई है जबकि समय बीतने के साथ महसूस हो रहा है कि बीसवीं सदी की क्रांतियों में सबसे महत्वपूर्ण क्रांति यही थी । सोवियत रूस पर भी विचार करते हुए पारंपरिक क्षेत्रों की बजाय स्तालिनोत्तर खासकर ब्रेजनेव युग पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया गया है ।             
2014 में ही प्रोफ़ाइल बुक्स से डेविड हार्वे कीसेवेंटीन कंट्राडिक्शंस ऐंड द एंड आफ़ कैपिटलिज्मशीर्षक किताब छपी है और पिकेटी की किताब की तरह ही चर्चा में है । पिकेटी से हार्वे का अंतर यह है कि जहां पिकेटी अपने आपको मार्क्स से अनभिज्ञ बताते हैं वहीं हार्वे घोषित रूप से मार्क्स की किताबकैपिटलके शिक्षक हैं । अपनी किताब में सबसे पहले वेअंतर्विरोधकी धारणा को स्पष्ट करते हैं । वे बताते हैं कि अगर कुछ अंतर्विरोधों ने पूंजीवाद को लचीला और समय के साथ रूप बदलने लायक बनाया है तो उन्हीं में इस व्यवस्था के नाश के बीज भी निहित हैं । कुछ अंतर्विरोधों का तो कमोबेश प्रबंधन किया जा सकता है, लेकिन कुछ खतरनाक होते हैं । इसके बाद जिन सत्रह अंतर्विरोधों की वे चर्चा करते हैं उनमें सात को वे बुनियादी मानते हैं । बुनियादी इस मायने में कि उनके बगैर पूंजी का काम नहीं चल सकता । ये हैं- 1) उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच, 2) श्रम के सामाजिक मूल्य और मुद्रा द्वारा उसके प्रतिनिधित्व के बीच 3) निजी पूंजी और पूंजीवादी राज्य के बीच 4) निजी अधिग्रहण और साझा संपत्ति के बीच 5) पूंजी और श्रम के बीच 6) पूंजी का स्वरूप : कोई प्रक्रिया या कोई वस्तु, के बीच 7) उत्पादन और श्रम के साकारीकरण की अंतर्विरोधी एकता । इसके बाद वे सात गतिशील अंतर्विरोधों की चर्चा करते हैं । गतिशील इस मायने में कि ये दशकों में बदल जाते हैं । ये हैं- 1) तकनीक, काम और मानव प्रयोज्यता 2) श्रम विभाजन 3) एकाधिकार और प्रतियोगिता : केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण 4) असमान भौगोलिक विकास और स्थान का उत्पादन 5) आय और संपत्ति की विषमताएं 6) सामाजिक पुनरुत्पादन 7) आजादी और प्रभुत्व । इनके बदलाव पर नजर रखना आंदोलन के लिए जरूरी होता है । आंदोलन में पूंजीवाद के किसी पुराने रूप की वापसी की मांग की जगह उसके आगे बढ़ने के साथ पैदा हुए नए मुद्दों और शक्तियों को संबोधित करना उचित होगा । किताब का तीसरा हिस्सा तीन खतरनाक अंतर्विरोधों की चर्चा करता है । 1) अंतहीन चक्रीय वृद्धि 2) प्रकृति के साथ पूंजी का रिश्ता 3) मानव स्वभाव का विद्रोह: सार्वभौमिक अलगाव ।
इन अंतर्विरोधों की पहचान के बाद हार्वे भविष्य की राजनीति के लिए कुछ सूत्र गिनाते हैं । वे हैं- 1) लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए मुट्ठी भर लोगों के हाथ में विनिमय मूल्यों को केंद्रित करके भुगतान की क्षमता के आधार पर वस्तुओं का आवंटन करने वाली मुनाफ़ा आधारित बाजार व्यवस्था के जरिए प्रावधान के विपरीत सबके लिए पर्याप्त उपयोग मूल्यों का प्रावधान (मकान, शिक्षा, अन्न सुरक्षा आदि) 2) विनिमय की ऐसी व्यवस्था का निर्माण जिसमें वस्तुओं और सेवाओं का परिचालन तो हो लेकिन कुछेक निजी हाथों में सामाजिक सत्ता के रूप में धन का संचय न हो । 3) निजी संपत्ति और राजसत्ता के बीच विरोध को साझा संपत्ति के शासन के जरिए खत्म करना, मानव ज्ञान और जमीन को साझा संपत्ति घोषित करना और इसके सृजन, प्रबंध तथा रक्षा की जिम्मेदारी जन सभाओं और संस्थाओं के हाथ में देना । 4) व्यक्तियों द्वारा सामाजिक सत्ता के अधिग्रहण को आर्थिक और सामाजिक बंधनों से नियंत्रित करना और इसे दुनिया भर में पागलपन के रूप में चिन्हित करना । 5) साझा सामाजिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य सहकार संगठनों के साथ मिलकर सहकारी उत्पादकों द्वारा उत्पादन के फैसलों के जरिए श्रम और पूंजी के बीच वर्ग विरोध का समापन । 6) दैनिक जीवन की गति धीमी करना, वाहन फ़ुर्सती और सुस्त ताकि मनचाहे काम करने के लिए ज्यादा समय मिले । 7) आपस में संबद्ध आबादी को आपसी सामाजिक जरूरतों के बारे में एक दूसरे से बातचीत और मूल्यांकन का अवसर ताकि उसके आधार पर वे उत्पादन के फैसले लें । 8) तमाम तरह के सामाजिक श्रम के बोझ को कम करने, अनावश्यक तकनीकी श्रम विभाजन को खत्म करने, मनचाही व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के लिए समय निकालने, मनुष्य के कारनामों के पारिस्थितिकीय प्रभाव कम करने वाली नई तकनीकों और संगठनों का सृजन । 9) स्वचालन, रोबोटीकरण और कृत्रिम बुद्धि के इस्तेमाल से तकनीकी श्रम विभाजन को कम करना, अनिवार्य तकनीकी श्रम विभाजन को सामाजिक श्रम विभाजन से अलग करना, प्रशासनिक, नेतृत्वकारी और पुलिसिया जिम्मेदारी को जन समुदाय की अदला-बदली से निभाना ताकि विशेषज्ञों के शासन से मुक्ति मिले । 10) उत्पादन के साधनों के इस्तेमाल का अधिकार ऐसी जन संस्थाओं को सौंपना जो व्यक्तियों और सामाजिक समूहों के बीच विकेंद्रित प्रतियोगी क्षमताओं को विकसित करें ताकि तकनीकी, सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवन शैली के मामलों में भिन्नतापरक नवाचार उभरें । 11) विभिन्न इलाकों के संगठनों, कम्यूनों और समूहों के बीच सर्वाधिक संभव विविधता जीने और रहने के तरीकों तथा प्रकृति के साथ संबंधों और सांस्कृतिक आदतों तथा विश्वासों के मामले में होगी । तब भी विभिन्न जगहों के लोगों की मुक्त और अबाध भौगोलिक आवाजाही की गारंटी करनी होगी । हालात का जायजा लेने, योजना बनाने और लागू करने तथा विभिन्न स्तरों की साझा समस्याओं से निपटने के लिए विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि नियमित रूप से एकत्र होंगे । 12) ‘सबसे उसकी क्षमता के अनुसार और सबको उसकी जरूरत के अनुसारके सिद्धांत में निहित विषमता के अतिरिक्त सभी किस्म की असमनताओं का उन्मूलन हो । 13) घरेलू काम और सामाजिक रूप से अनिवार्य श्रम के अंतर को धीरे धीरे इस तरह मिटा दिया जाए कि सामाजिक श्रम घरेलू काम में समाहित हो जाए तथा घरेलू और सामुदायिक काम ही अलगाव-विहीन और मुद्रा-विहीन सामाजिक श्रम का प्रमुख रूप हो जाए । 14) शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान भोजन, बुनियादी सामानात और परिवहन सबको सुलभ हो ताकि अभाव से मुक्ति तथा काम और आवागमन की आजादी की भौतिक शर्तें पूरी हों । 15) अर्थतंत्र की वृद्धि शून्य हो, ऐसा माहौल हो जिसमें निरंतर वृद्धि के पागलपन की जगह मनुष्य की निजी और सामूहिक क्षमताओं और शक्तियों के अधिकतम संभव विकास की चिंता हो । 16) मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्राकृतिक ताकतों का अधिग्रहण और उत्पादन तो हो लेकिन पारिस्थितिकी की सुरक्षा का ध्यान रखा जाए, जहां से कच्चा माल आये वहां पोषक तत्वों, ऊर्जा और उन वस्तुओं की भरपाई की गारंटी हो, प्राकृतिक सौंदर्य की मोहकता को बनाए रखा जाए क्योंकि हम भी उसी के अंग हैं । 17) मनुष्य का अपने आपसे अलगाव समाप्त होगा तो उसके श्रम और सृजन के बीच भेद खत्म होगा, उसका अलगाव दूसरों से खत्म होगा तो उसमें सामूहिकता आयेगी और यह अहसास मुक्त मन से स्थापित घनिष्ठ सामाजिक संबंधों तथा जीने और रचने के भिन्न भिन्न तरीकों से सहानुभूतिपरक अनुभव से पैदा होगा । ऐसी दुनिया का निर्माण होगा जिसमें हरेक व्यक्ति को समान रूप से सम्मान का हकदार समझा जाएगा हालांकि बेहतर जिंदगी की अलग अलग मान्यताओं पर टकराहटें होंगी । इस सामाजिक दुनिया का विकास मानव क्षमता और शक्ति के क्षेत्र में लगातार और स्थायी तौर पर होने वाली क्रांतियों के जरिए होगा और नवीनता की खोज निरंतर चलती रहेगी ।
कहना न होगा कि इन कामों पर नये समय का प्रभाव है जब पूंजीवादी संकट एक हद तक स्थिर होता हुआ दिखाई दे रहा है । अगर इसके विरोध हो भी रहे हैं तो उनका क्रांतिकारी तेवर थोड़ा कमजोर पड़ा है । बदले हुए माहौल को चार्ल्स केनी नेमार्क्स इज बैकशीर्षक लेख में व्याख्यायित किया है । उनका कहना है कि दुनिया भर के अकुपाई आंदोलनों के ठंडा होने के साथ बहरा कर देने वाला सन्नाटा पसरा हुआ है । विकसित देशों के मजदूर गरीब मुल्कों के मजदूरों के साथ खड़ा नहीं हो रहा है । वैश्विक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत को कमजोर कर दिया है । उनका कहना है कि मजदूर तो नहीं लेकिन मध्य वर्ग की सक्रियता में बढ़ोत्तरी आई है ।
असल में मार्क्स द्वारा दुनिया भर के मजदूरों में एकता देखने की ठोस वजह यह थी कि उस समय दुनिया भर के मजदूरों के भौतिक हालात सचमुच समान थे । आमदनी में विषमता देश की सीमाओं के भीतर थी, देशों के बीच आमदनी का आज जितना भारी अंतर नहीं था । इस स्थिति में बदलाव औद्योगिक क्रांति के आगे बढ़ने के साथ आना शुरू हुआ । कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के बाद इंग्लैंड में मजदूरी में इजाफा आया और फिर यूरोप और उत्तरी अमेरिका में भी यही होना शुरू हुआ । पश्चिमी देशों में समृद्धि स्थिर होने के साथ ही देशों की आर्थिक स्थिति में असमानता बढ़नी शुरू हो गई । मिलानोविक के अनुसार हालत यह हो गई है कि भारत से सबसे धनी 5 फ़ीसद लोगों की औसत आमदनी उतनी ही है जितनी अमेरिका के सबसे गरीब 5 फ़ीसद लोगों की औसत आमदनी है । इसी कारण धनी विकसित देशों के मजदूर और गरीब पिछड़े देशों के मजदूरों की लड़ाई के क्षेत्र समान नहीं रह गये हैं ।
लेखक का कहना है कि लेकिन लड़ाई का एक नया मोर्चा खुल गया है । पिछले दस सालों में विकासशील देश विकसित देशों के मुकाबले ज्यादा तेजी से आगे बढ़े हैं और दोनों के मध्य वर्ग के बीच की खाई कम होती जा रही है । अरविंद सुब्रमण्यम का अनुमान है कि 2030 तक चीन आज के यूरोपीय संघ की जगह होगा । इसी तरह इंडोनेशिया तब आज के दक्षिण कोरिया से मुकाबला कर रहा होगा । इसका मतलब कि अगली पीढ़ी के समय तक दुनिया में मध्य वर्ग काफी मजबूत हो चुका होगा । इस नये मध्य वर्ग का जीवन नये समय की सुविधाओं से लैस होगा । यही मध्य वर्ग नये समय का ठीक ठाक वेतन पाने वाला पेशारत कर्मचारी है और इसकी वैश्विक एकजुटता बनती हुई दिखाई पड़ रही है । तकनीक और व्यापार के चलते दुनिया भर में लोग आपस में करीब आयेंगे और तब दुनिया के अनुमानित साढ़े तीन अरब मजदूर देखेंगे कि उनके हाल लगभग एक समान हैं । वे सरकारों पर दबाव डालेंगे कि मिलकर वे सारी संपदा के मुट्ठी भर लोगों यानी पूंजीवादी कुलीनों के हाथ में संकेंद्रित होने से रोकें और उसका व्यापक वितरण सुनिश्चित करें । वे टैक्स चोरी को जमा रखने वाले बैंकों को बंद करने की आवाज उठायेंगे । यह सर्वहारा क्रांति तो न होगी लेकिन वैसे भी मध्य वर्ग क्रांति के लिए विख्यात नहीं रहा है । उम्मीद है कि आगामी दशक में गरीब तो पूंजी से उतना नहीं जूझेंगे लेकिन मध्य वर्ग जरूर अपना हिस्सा मांगेगा ।
रोस डाउटहैट नेमार्क्स राइजेज अगेनशीर्षक लेख में कहा है कि टिमोथी शेंक नेनेशनअखबार में मार्क्स के इस पुनरावतार के दो कारण बताए हैं । एक तो युवा बुद्धिजीवी वित्तीय संकट के अनुभव से प्रेरित होकर मार्क्स की पूंजीवाद की आलोचना को नई निगाह से देखना चाहते हैं । वे कहते हैं कि अकुपाई आंदोलन के उतार के बावजूद ऐसे नये जर्नल प्रकाशित हुए जिनमें लोगों ने साहस के साथ नए प्रयोग पर बहस की । इस अनुभव से नई किताबों और अध्ययनों का प्रकाशन शुरू हो गया है जो लोगों का ध्यान खींच रहे हैं । ऐसी दो किताबों की प्रशंसात्मक समीक्षा भी शेंक ने लिखी है ।
उनके अनुसार दूसरा कारण पिकेटी की किताब जैसी चीजों में दिखाई पड़ रहा है जिसमें आधुनिक आर्थिक प्रवृत्तियों का सामान्य विश्लेषण पेश किया गया है । पिकेटी मार्क्स से दूरी बरत रहे हैं लेकिन जाने या अनजाने उनकी एक मान्यता को बल प्रदान कर रहे हैं और वह कि तथाकथित मुक्त बाजार पूंजी के मालिकान को अकूत फायदा पहुंचाता है । बीसवीं सदी में थोड़ा संपन्न मजदूर वर्ग के उभार ने इस मान्यता को धूमिल कर दिया था । वर्तमान यह है कि विषमता तो बढ़ ही रही है, वृद्धि की रफ़्तार भी धीमी पड़ी है । ऐसे में उन्नीसवीं सदी जैसा भविष्य नजर आ रहा है जब धनिकों को विरासत में भारी संपत्ति मिलती थी और मध्य वर्ग कमजोर होता जा रहा था ।
गोरान थेर्बोर्न ने न्यू लेफ़्ट रिव्यू के जनवरी-फ़रवरी 2014 अंक में लेख लिखा ‘न्यू मासेज ?’ इसमें वे बताते हैं कि पूंजीवाद के आलोचकों का सामाजिक आधार अब तक मजदूरों के सवाल रहे हैं । 1970 दशक तक औद्योगिक मजदूर पूंजीवाद विरोधी विमर्श में केंद्र में रहे । उसी के साथ स्वाधीनता आंदोलनों की शक्ल में एक नया सामाजिक आधार भी साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति प्रयासों का अंग बना । पिछले तीस सालों में उत्तरी देशों का अनुद्योगीकरण हुआ है और इसके चलते मजदूरों की ताकत घटी है । इसी दौर में दक्षिण के देशों में उद्योगीकरण बढ़ा लेकिन मजदूर वर्ग या उपनिवेशवाद विरोधी उभार जैसा कुछ तो नहीं हो रहा, पूंजीवाद विरोधी कोई नया सामाजिक आधार तो नहीं दिखाई पड़ रहा है फिर भी जन आंदोलनों की शक्ल में वर्तमान पूंजीवादी विकास विरोधी कुछ नई तकतें उभर रही हैं ।
इसमें पहली ताकत वे हाशिये के समुदायों को गिनते हैं । ये प्राक-पूंजीवादी जन समूह हैं, बड़ी पूंजी के प्रवेश से परेशान हो रही देसी आबादियां हैं । इनका प्रभाव भारत और लैटिन अमेरिका में अधिक है लेकिन तमाम दक्षिणी देशों में मौजूद हैं । संख्या के लिहाज से कम होने के बावजूद बोलिविया और भारत में स्थानीय स्तर पर विद्रोहियों के कारण इनका प्रतिरोध चर्चा का विषय बना हुआ है । इन्हीं के साथ लाखों भूमिहीन किसानों, अस्थायी मजदूरों और झुग्गियों में रहने वाले खोखा विक्रेताओं को भी जोड़ लीजिए । बेदखली के विरुद्ध और बिजली, पानी के लिए इनकी गोलबंदी तेजी से होती है । अरब मुल्कों के आंदोलनों और कटौती विरोधी यूरोपीय देशों के प्रदर्शनों में इनकी भागीदारी महत्वपूर्ण रही है । किसी कारगर समाजार्थिक विकल्प से उनके जुड़ाव के लिए जरूरी है कि यह विकल्प उनकी तात्कालिक समस्याओं को संबोधित करे । इनको संगठित करने के लिए शहरी आबादी के संपर्क लायक ढांचों की जरूरत है । पूंजीवाद विरोधी एक अन्य नया तबका मध्य वर्ग के रूप में उभरा है । इनमें छात्र प्रतिरोध की लगभग सभी मुहिमों के महत्वपूर्ण घटक के रूप में दिखाई पड़े हैं । अर्थतंत्र में सेवा क्षेत्र की बढ़ती के साथ इस मध्य वर्ग की तादाद बढ़ रही है और आर्थिक संकट उन्हें लगातार अलगाव में डाल रहा है । 

Wednesday, January 28, 2015

पिता-पुत्र


जो 'है' था
वह अब 'था' है
कितनी आसानी से
इसे पुत्र के बचपन की नींद
देखते हुए समझा
और अब पिता की मौत
में पुष्ट पाया
द्वन्द्ववाद नहीं था यह
चीजों के होने का तरीका है
जो अपने न-होने में  भी
होती हैं  छुपी हुई
फिर औचक प्रकट
होकर जिंदगी
बन जाती हैं
घर के दरवाजे पर वे अब नहीं होंगे
नहीं लेंगे जिम्मेदारी किसी की
बच्चे अब चिढ़ाएंगे किसे
कौन उन्हें डाँटेगा
भाई निश्तिन्त होकर घूमेंगे
चाचा बगैर लज्जित हुए पीटेंगे
 चाची को
किसी को कोई काम नहीं रह जाएगा
मुझे भी खबर नहीं लेनी होगी उनकी






Saturday, January 17, 2015

कारपोरेट-कम्यूनल फासीवाद के विकास की प्रक्रिया

         

अभी हाल में ही पूरी दुनिया के 400 बुद्धिजीवियों ने बयान जारी किया है और फ़ासीवाद के सौ साल बाद के हालात पर अपनी बात कही है । उनका कहना है कि फ़ासीवाद ने सत्ता पर कब्जा करने के बाद तानाशाही कायम की, नेता की सेवा में शक्तियों को केंद्रित किया, हिंसा से विपक्ष को खामोश किया, प्रेस को दबाया, स्त्रियों के अधिकारों में कटौती की और मजदूरों के संघर्ष का दमन किया । उन्होंने विज्ञान, शिक्षा और संस्कृति की सभी संस्थाओं पर नियंत्रण कर किया और साम्राज्य विस्तार तथा नस्लभेद को बढ़ावा दिया । उसके विरोध के क्रम में समाज के बदलाव की बात उठी और फ़ासीवाद के बाद की बनी दुनिया पर इस नयी सोच का असर रहा । फ़ासीवाद खत्म नहीं हुआ था बस थोड़े समय के लिए उसकी ताकत कमजोर पड़ी थी । पिछले बीस सालों में ऐसे तमाम दक्षिणपंथी आंदोलन नजर आये हैं जिनमें फ़ासीवादी प्रवृत्ति मौजूद है । लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं, नस्लवादी राष्ट्रवाद उभार पर है, एकाधिकार बढ़ा है और धार्मिक, यौनिक तथा लैंगिक अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं । विषमता और बहिष्करण से विक्षोभ को अपना हथियार बनाकर ये आंदोलन जनता के बीच जगह बना रहे हैं । अपनी लोकप्रियता की दुहाई देकर ये तानाशाह कानून, अदालत, प्रेस, शिक्षा, संस्कृति और विज्ञान की संस्थाओं को मिट्टी में मिला रहे हैं । जनता को सूचना और जानकारी के अधिकार पर भी खतरा है । झूठ का उत्पादन हो रहा है और लगातार भीतरी दुश्मन खोजे जा रहे हैं । सुरक्षा के बहाने सत्ता को मजबूत किया जा रहा है । पूंजी की चाटुकारिता का बोलबाला है । इस माहौल का जोरदार प्रतिरोध खड़ा करने की अपील इन बुद्धिजीवियों ने सबसे की है । इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि प्रत्येक नये अवतार में यह अपना रूप बदल लेता है । इसके बावजूद कुछ चीजें बनी भी रहती हैं । किसी अवतारी नेता के प्रति भक्ति ऐसी ही चीज है । इस समय मीडिया का इस्तेमाल ऐसे नेता की छवि बनाने के लिए किया जा रहा है ।                           

पूरी दुनिया में विद्वान इस तथ्य के विश्लेषण में व्यस्त हैं कि इक्कीसवीं सदी के आरंभ में ऐसे कौन से बदलाव आए कि पूंजीवाद के संकट में होने के बावजूद मुट्ठी भर धन्नासेठों की संपत्ति में अकूत इजाफ़ा कैसे हो रहा है? अनेक विचारकों ने तो पूंजीवाद के वर्तमान स्वरूप की विशेषता को चिन्हित करने के लिए उसे ‘नव-उदारवाद’ की संज्ञा दी है । इसकी खूबी अर्थतंत्र का वित्तीकरण बताया जा रहा है जिसमें तृतीयक क्षेत्र (सेवाक्षेत्रही सबसे अधिक विस्तृत हो जाता है । साथ ही इसे भी देखने की बात हो रही है कि लगभग सभी देशों में राजनीति में दक्षिणपंथी ताकतों की मजबूती का इससे कोई संबंध है क्या? आम तानाशाही से अलगाकर इसे देखने और समझने की कोशिश हो रही है । धीरे धीरे विचारकों में फ़ासीवाद की गंभीर चर्चा भी शुरू हो गई है । 1929 से 1930 तक की महामंदी के बाद हिटलर के उदय की परिघटना से वर्तमान हालात को समझने की कोशिश की जा रही है । हिटलर की परिघटना पश्चिम के एक औद्योगिक समाज की थी इसलिए उसमें नाटकीय तेजी रही । भारत के अर्ध-सामंती समाज होने के कारण इसकी उठान धीमी किंतु मजबूत रही है । भारत में इस दौर में कोई भी पूंजीपति उद्योग लगाकर नहीं, बल्कि सरकार के पास मौजूद संसाधनों की लूट से संपत्ति अर्जित कर रहा है ।   

कोमिंटर्न के बुल्गारियाई नेता जियोर्जी दिमित्रोव ने फ़ासीवाद को वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी हिस्से की सबसे अधिक दमनकारी और सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी शासन पद्धति कहा है । उन्होंने यह भी कहा कि भूमंडलीय परिघटना होने के बावजूद अलग अलग देशों में फ़ासीवाद के भिन्न भिन्न रूप प्रकट होते हैं । इससे लड़ने के लिए इस भिन्नता को समझना जरूरी है । इसीलिए हमें अपने देश में पूंजीवाद के विकास के इतिहास को ध्यान में रखना होगा । टाटा-बिरला के बाद सहारा से होते हुए अंबानी-अडानी तक की यात्रा में पूंजीपतियों के साथ राजसत्ता और राजनेताओं के रिश्ते भी बदलते रहे हैं । स्वाधीनता आंदोलन के समय एक बार जब संपत्ति के अधिकार को बुनियादी अधिकारों में शामिल कराने के लिए खुद किसी पूंजीपति ने आवाज उठाई तो बिरला ने उसे परामर्श दिया कि जिनके पास संपत्ति है यदि वे ही इस मांग को उठाएंगे तो इसका समर्थन कोई नहीं करेगा । यह मांग उन्हें करनी चाहिए जिनके पास संपत्ति नहीं है । औद्योगिक दौर के पूंजीपति राजनेताओं से खुद को अलग रखकर दबाव समूह की तरह काम करते थे । आज स्थिति एकदम उलटी है । भारत की संसद में विजय माल्याजिंदल और अंबानी जैसे पूंजीपति हैं और अपने उद्यमों से जुड़ी हुई संसदीय समितियों के सदस्यों के रूप में कानूनों को प्रभावित करते हैं । पिछली सरकार में भी विभिन्न मंत्री वकील थे जो विभिन्न कारपोरेट घरानों की वकालत करते रहे थे और मंत्री बनने के बाद भी उन घरानों को लाभ दिया करते थे । वर्तमान सरकार में भी वकील मंत्रीगण वे ही हैं जो अतीत में इन घरानों की वकालत किया करते थे । कारपोरेट घरानों के साथ घालमेल का यह आलम है कि शिक्षक और प्रशासक के रूप में इनकी नियुक्ति के प्रस्ताव बेशर्मी के साथ किए जा रहे हैं । इसी क्रम में जबसे निजी पूंजी को प्रतिष्ठा देने का उदारीकरण का अभियान शुरू हुआ तबसे ही देश में दक्षिणपंथी उत्थान- आपस में जुड़ी हुई घटनाएं हैं । पूंजीवाद के वर्तमान नव उदारवादी स्वरूप के सामने आने के साथ ही पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी राजनीति का उभार दिखाई दे रहा है । जिन देशों में यह उदारीकरण शुरू किया गया वहां जन विक्षोभ को दबाने के लिए तानाशाही आई । भारत में यही काम पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकार ठीक से नहीं कर पा रही थी और बदनाम भी हो गई थी, इसलिए पूंजी ने तथाकथित लोकप्रिय और कठोर शासक पर दांव लगाया । इसीलिए वर्तमान निजाम शुद्ध सांप्रदायिक नहींबल्कि इसके प्रत्यक्ष कारपोरेट हित भी हैं ।    

2 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी । वे पहले कांग्रेस में रहे थे लेकिन हिंदू हितों पर अलग से जोर देने के लिए उन्होंने इस नए संगठन की स्थापना की । 1920 में चले असहयोग आंदोलन के बारे में उनका मूल्यांकन था कि ‘महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के फलस्वरूप देश का उत्साह ठंडा पड़ता जा रहा था और सामाजिक जीवन में उस आंदोलन के द्वारा पैदा की गईं बुराइयां खतरनाक रूप से सिर उठा रही थीं---असहयोग का दूध पीकर पले हुए यवननाग अपनी जहरीली फुफकारों से समूचे राष्ट्र में दंगे भड़का रहे थे ।’ असहयोग आंदोलन की अचानक वापसी से पैदा हताशा में सांप्रदायिकता ने पैर पसारे । साइमन कमीशन के विरुद्ध उपजे विक्षोभ से पैदा आंदोलनों से यह संगठन दूर रहा । सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) से भी संघी दूर रहे । 26 जनवरी 1930 को स्वाधीनता दिवस के रूप में तो मनाया लेकिन भगवा झंडे की पूजा करते हुए । आजादी की लड़ाई से उनकी दूरी राष्ट्रवाद की उनकी धारणा से जुड़ी हुई है । वे इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवादकहते हैं और भूभागीय राष्ट्रवादसे इसे अलग बताते हैं । 1940 में हेडगेवार की मृत्यु के बाद ज्यादातर सैद्धांतिक काम दूसरे सर संघचालक माधवराव सदाशिव गोलवलकर ने किया । उन्होंने लिखा ‘भूभागीय राष्ट्रवाद और साझा दुश्मन के सिद्धांत नेजो राष्ट्र की हमारी धारणा की बुनियाद का निर्माण करते हैंहमें हमारे सच्चे हिंदू राष्ट्रवाद की सकारात्मक व प्रेरक अंतर्वस्तु से वंचित कर दिया है तथा उसने आजादी की अनेक लड़ाइयों को वस्तुतब्रिटिश विरोधी लड़ाइयां बना दिया है । ब्रिटिश विरोध को देशभक्ति और राष्ट्रवाद के समतुल्य बना दिया गया है । इस प्रतिक्रियावादी विचार ने स्वतंत्रता आंदोलन के समूचे दौर में उसके नेताओं और आम जनता पर बड़ा हानिकारक प्रभाव डाला है ।’ राष्ट्रवाद की यही धारणा हिंदुत्ववादियों को साम्राज्यवाद विरोध के आधार पर विकसित भारतीय राष्ट्रवाद के विपरीत यहूदी राष्ट्रवाद के समर्थन की ओर ले जाती है । उसके इजरायल समर्थन का तात्कालिक राजनीतिक संदर्भ तो है हीवैचारिक संदर्भ भी है । यहूदी राष्ट्रवाद के साथ ही गोलवलकर ने नाजी राष्ट्रवाद से भी प्रेरणा ली और उसे गौरव के रूप में व्याख्यायित करते हुए लिखा ‘आज जर्मनी का राष्ट्रीय गौरव चर्चा का मुख्य विषय बन गया है । राष्ट्र और उसकी संस्कृति की शुद्धता की रक्षा करने के लिए जर्मनों ने अपने देश को सेमेटिक नस्लवादियोंयहूदियोंसे मुक्त करके समूची दुनिया को हिला दिया है ।----जर्मनी ने यह भी दिखला दिया है कि एक-दूसरे से मूलतपृथक नस्लों और संस्कृतियों को एक एकल समग्र में समेटना कितना असंभव है ।’ उन्होंने इससे सीखने की भी सलाह दी । गोलवलकर के मुताबिक अल्पसंख्यकों के लिए इस देश में रहने की अनुमति तो है लेकिन तब जब वे ‘इस देश में कुछ न मांगते हुएकिसी सुविधा का हकदार न होते हुएकिसी भी प्रकार की प्राथमिकता पाए बिनायहां तक कि नागरिकता के अधिकारों के बिना ही हिंदू राष्ट्र के अधीन रहें ।’ धर्मांतरण आदि का मूल तर्क इस सपने को पूरा करने की इच्छा है । संगठन का उनका सिद्धांत ‘एक चालक अनुवर्तिता’ है जो संयुक्त हिंदू परिवार के सांगठनिक आदर्श पर गढ़ा हुआ है । हजारों संगठनों का संजाल संघ के वैचारिक नेतृत्व में सामान्य काम काज जारी रखते हैं और विशेष अवसरों पर विशेष दिशा में इन सभी संगठनों की कार्यवाहियों को निर्देशित कर दिया जाता है । उनकी लोकतंत्र विरोधी विचारधारा का सबूत यह है कि वे ‘अधिकार की जगह कर्तव्य’ को प्रस्थान विंदु बनाते हैं । इसे उनके छात्र संगठन के स्वरूप में देखा जाता है जिसमें अध्यक्ष हमेशा कोई अध्यापक होता है । स्वच्छ भारत अभियान में भी उन्होंने स्वच्छ वातावरण के नागरिक अधिकार के सवाल की जगह स्वच्छता को नागरिकों के कर्तव्य में बदल दिया है । विचार के अतिरिक्त पूरे कामकाज में अलोकतांत्रिकता का सबसे बड़ा सबूत गुरु पूर्णिमा के दिन देश भर की शाखाओं में लिफ़ाफ़े में गुप्तदान की प्रक्रिया है जिसके तहत प्राप्त दान का कोई ब्यौरा देश के सामने कभी पेश नहीं किया गया । संघ के प्रचारक के लिए अविवाहित रहने का बंधन उसके स्त्री-विरोधी एजेंडे का प्रमाण है ।          

फ़ासीवाद का इतिहास हमें बताता है कि उसका जन्म संसदीय लोकतंत्र से ही होता है । असल में संसदीय लोकतंत्र पूंजीवाद के विकास के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा रहा है । शासन की सामाजिक सहमति के लिए सार्विक बालिग मताधिकार जन आंदोलन से तो हासिल हुआ लेकिन कदम कदम पर पूंजीवाद ने इसके प्रसार का प्रतिरोध किया । एक ओर तो पूंजी को प्राप्त आत्मविश्वास के चलते वह मताधिकार को सीमित करने का प्रयास करती हैदूसरी ओर फ़ासीवाद आम जनता में अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के विरुद्ध उपजे विक्षोभ को देशप्रेम और फ़ंडामेंटलिज्म के सहारे अपने लाभ के लिए भुनाता है । लोकप्रिय प्रचार माध्यमों के सहारे परोसा गया आध्यात्मिक नशा एक हद तक मनुष्य को व्यापक सामाजिक अलगाव की क्षतिपूर्ति प्रदान करता है । ध्यान देने की बात यह है कि संसदीय लोकतंत्र के दायरे में काम करते हुए भी फ़ासीवादी ताकतों को इसके बारे में रत्ती भर भी भ्रम नहीं होता है । वे अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए इसका उपयोग मात्र करते हैं । इसीलिए हमेशा उनके काम काज में संसदीय कार्यवाहियों से ज्यादा महत्वपूर्ण गैर-संसदीय कार्यवाहियां होती हैं । सत्ता के औपचारिक तंत्र से इसको भरपूर सांस्थानिक मदद दी जाती है ।       

भारतीय फ़ासीवाद के कुछेक पहलुओं को समझने के लिए पिछ्ले लोक सभा चुनाव के नतीजों को भी देखना होगा । इसे ही बहुत सारे लोग अब तक हासिल सामाजिक प्रगति के विरुद्ध प्रतिक्रिया के बतौर व्याख्यायित कर रहे हैं । चुनाव से बनी हुई लोकसभा में स्त्रीअल्पसंख्यक जन प्रतिनिधियों की संख्या में गिरावट आई है और विभिन्न तबकों के प्रतिनिधित्व का पैटर्न बदल गया है । भारत के विभिन्न इलाकों में मौजूद अंतर्विरोधों में भाजपा ने पुराने समीकरणों में फेरबदल किया है और ऐसे प्रभावशाली तबकों की भावनाओं को उभारा है जो अपने आपको शासक समुदाय में शामिल नहीं अनुभव करते थे । इससे संघीयता के ताने बाने को घातक क्षति पहुंची है । स्त्री उभार के विरुद्ध राजनीतिक गोलबंदी को हवा देना उसने दिवराला सती कांड के बाद से ही शुरू कर दिया था । चुनावों से ठीक पहले आसाराम बापू प्रकरण में भी इन ताकतों ने पितृसत्तात्मक राजनीतिक ध्रुवीकरण किया । खाप पंचायतों के रूप में उन्हें एक संगठित स्त्री विरोधी मंच मिल गया है जिसके समर्थन में जिम्मेदार मंत्री आदि माहौल बना रहे हैं । गृह मंत्रालय की ओर से दहेज उत्पीड़न कानून में संशोधन का प्रस्ताव इसी प्रतिक्रिया को मजबूती प्रदान करने के मकसद से लाया गया है । जातिगत उत्पीड़न का समर्थन रणवीर सेना और सवर्ण-सामंती ताकतों के साथ उसके हेलमेल में देखा जा सकता है ।

5 हिंदू राष्ट्र और हिंदू हितों की स्थापना के प्रधान लक्ष्य को पूरा करने के लिए आम तौर पर जनसंघ या भाजपा का समर्थन आर एस एस ने किया लेकिन अगर कांग्रेस ने इस गोलबंदी का लाभ उठाना चाहा तो संघ ने उसका भी साथ दिया । गांधी की हत्या के बाद बियाबान में पड़ी हुई इस संस्था को चीन युद्ध के समय महत्व मिला और उसके बाद 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेने के लिए इसे झांकी के साथ आमंत्रित किया गया । फिर इंदिरा गांधी ने आपात काल के बाद की अपनी पराजय का बदला लेने के लिए उत्तर भारत में जब हिंदू मतों के ध्रुवीकरण की योजना बनाई तो संघ ने उनका साथ दिया और देश के विभिन्न भागों में उनके लिए मतदान भी कराया । इसके पहले भी बांगलादेश युद्ध के बाद इंदिरा गांधी को अटल बिहारी वाजपेयी ने दुर्गा कहा था क्योंकि उस लड़ाई में पाकिस्तान की पराजय के चलते युद्धोन्माद का माहौल बनाने और उसके सहारे मुस्लिम विरोधी वातावरण बनाने में सुविधा हुई थी ।    

वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के साथ संघ को औपचारिक मान्यता देने-दिलाने के काम में तेजी आई है । सरकार के मंत्रियों के साथ साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतिअनेक संस्थानों के मुखिया सर संघ चालक मोहन भागवत से मिल रहे हैं । विजयादशमी के दिन के स्थापना समारोह में दिया गया उनका रस्मी भाषण दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ । संसद की कार्यवाही से दंगों के सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उल्लेख संपादित करके निकाल दिए गए । सरकार के अधिकतर मंत्री इस संगठन से जुड़े रहे हैं ।

इससे लड़ने की दृष्टि से एक तथ्य को दिमाग में रखना होगा कि धर्म और सांप्रदायिकता दो चीजें हैं । धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल सांप्रदायिकता है । इसीलिए सांप्रदायिकता का इतिहास आधुनिक राजनीति और उसकी जरूरतों से जुड़ा हुआ है । इसके लिए आवश्यक गोलबंदी हेतु धर्म की मूलवादी व्याख्या की जाती है । एक बात और है कि आधुनिक भारत में बहुसंख्या पर आधारित राजनीतिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली ने संसद में अल्पसंख्यक समुदाय का सार्थक प्रतिनिधित्व वैसे भी होने नहीं दिया था । ‘फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट’ और एक जगह से एक ही प्रतिनिधि आधारित प्रणाली की खामियों के चलते देश में सही अर्थों में संसदीय लोकतंत्र भी नहीं रहा है । हाल में उसकी जगह आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात इसीलिए की जा रही है ।   

फ़ंडामेंटलिज्म एक सपने पर आधारित होता है और संबंधित धर्म में आए हुए बदलावों को हटाकर तथाकथित शुद्धता को स्थापित करना चाहता है । यह शुद्धता भी कल्पित होती है । उदाहरण के लिए गीता प्रेस से प्रकाशित महाभागवत पुराण में से महारास (रासलीला) को संपादित कर उसे शुद्ध किया गया है । इसी तरह वर्णाश्रम कभी आचरित जीवन पद्धति नहीं रही है लेकिन मूलतत्ववादी इसे ही हिंदू समाज व्यवस्था साबित करना चाहेंगे । इसीलिए वे सबसे पहले संबंधित धर्म के लोकाचार या जिसे लोकप्रिय धर्म कहते हैंउसके विरुद्ध अभियान चलाते हैं । भारतीय संस्कृति को वे जिस तरह परिभाषित करते हैं उसके मूल में पितृसत्तात्मकसामंती सवर्ण वर्चस्व वाली ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था तथा इनको पोषित करने वाले पारंपरिक पारिवारिक मूल्य हैं । हमारे सामंती सामाजिक ढांचे की बुनियाद ये पारिवारिक मूल्य ही हैं । यह ढांचा पितृसत्ता को बल प्रदान करता है और संतान को जन्म देने वाले यौन आचरण के अतिरिक्त सभी वैकल्पिक यौन आचरणों का हिंसक विरोध करता है ।    

पूंजी और पोंगापंथ का घातक मिश्रण वर्तमान फ़ासीवाद की विशेषता है । मशहूर अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक के अनुसार भाजपा की यह जीत पिछले डेड़ सौ वर्षों में हासिल सामाजिक प्रगति के विरुद्ध प्रतिक्रिया है । सामाजिक अग्रगति के साथ ही साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष की भावना को भी उलट देने का संकल्प वर्तमान शासन का लक्ष्य है । अमेरिकी दबदबे वाली अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के साथ यह भी उसी तरह का रिश्ता रखना चाहता है जैसा रिश्ता मुस्लिम धार्मिकता का दोहन करके स्थापित अरब मुल्कों के सत्ताधारी शासक समुदाय का है । इस विचित्र स्थिति का विश्लेषण करने वालों ने जोर देकर समझाया है कि मुस्लिम समाज में लोकतांत्रिक धारा के विरोध में जो फ़ंडामेंटलिस्ट आंदोलन उभरे उन्होंने पश्चिम विरोध का उन्माद समाज की लोकतांत्रिकता का दमन करने के लिए पैदा किया लेकिन सत्ता मिलते ही पश्चिमी मुल्कों की सरपरस्ती हासिल करने की कोशिश करने लगे ।

10 पिछ्ले लोकसभा चुनावों में 31 फ़ीसद वोट लेकर भी हमारी चुनाव प्रणाली की विशेषता के कारण भारी संसदीय बहुमत हासिल करके बनी सरकार अब सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके अपना आधार मजबूत और विस्तारित करने में लगी हुई है । इसमें वह हिंदी का उपयोग कर रही है लेकिन इसके प्रति उसका अनुराग एक हद तक हिंदी पट्टी में अपने आधार को मजबूत और गहरा करना ही है अन्यथा हिंदी उनके मुताबिक पतन का ही प्रतीक है, शुद्ध तो संस्कृत है । उसमें भी सत्य उतना ही बताया जा रहा है जो उनकी पोंगापंथी व्याख्या के लिए सुविधाजनक हो । संस्कृत की सारी परंपरा को एकायामी ब्राह्मण धारा के रूप में स्थापित किए बिना वह उनके काम की नहीं होगी । इसके लिए उसे ज्ञान और दर्शन की भाषा नहींधर्माचार की भाषा सिद्ध करना आवश्यक है । महाभारत और पुराणों की मनमानी व्याख्या के सहारे अंधविश्वास को बढ़ावा देना मकसद है, न कि दर्शन या आयुर्वेद, योग आदि की प्रतिष्ठा । योग को धार्मिकता से जोड़ दिया गया है अन्यथा भारतीय दर्शन की परंपरा में वह अनीश्वरवादी धारा में आता है ।

11 दुर्भाग्य से भारत के आधिकारिक राष्ट्रवाद और देशभक्ति को जिस तरह देखा समझा गया उसमें देशभक्ति को साम्राज्यवाद विरोध की जगह पाकिस्तान विरोध के जरिए परिभाषित करने की परंपरा थी । हमारे देश में देशभक्त होने का मतलब देश की भौगोलिक एकता और अखंडता को पवित्र मानना, मजबूत केंद्र, जिसका अभिन्न अंग भारतीय सेना है, की पैरोकारी, राष्ट्रगान और ध्वज जैसे प्रतीकों को अतिरिक्त मान्यता, संसद और सर्वोच्च न्यायालय पर सवाल न उठाना आदि रहे है । इसके चलते पड़ोसी मुल्कों के अलावे देश के सीमाई इलाकों की फौजी देखरेख भी देश की एकता का निशान बना दिया गया । इसके परिणाम अति-केन्द्रीयता और भौगोलिक रूप से लोकतांत्रिक शासन के मामले में भेदभाव के बतौर जम्मू-काश्मीर और उत्तर-पूर्व में देखे जा सकते हैं । कुल धर्मनिरपेक्षता के बावजूद सत्ता में हिंदू बहुसंख्यक मूल्यों की ओर झुकाव और उसके प्रति अतिरिक्त सहनशीलता और उसे स्वाभाविक मान लेने की प्रवृत्ति थी । वैज्ञानिक संस्थानों तक में अंधविश्वास का खुला प्रचलन था । रामनवमी के अवसर पर मोदी के व्रत के प्रचार से पहले भी कांग्रेसी प्रधानमंत्री अपनी हिंदू पहचान का मुजाहिरा करते रहे हैं । भारत में धर्मनिरपेक्षता के बतौर आचरित ‘सर्व धर्म समभाव’ आसानी से बहुसंख्यक धर्म की ओर झुक जाता रहा है ।    

12 नव उदारवादी आर्थिकी और संचार की नई तकनीकों के आगमन के साथ अधिकांश मुल्कों में मीडिया की भूमिका में बदलाव देखा गया । टेलीविजन के विनाशकारी प्रभावों का अध्ययन अमेरिका में किया गया है । देखा गया कि खासकर इराक युद्ध के दौरान मीडिया का उपयोग सर्वानुमति बनाने में किया गया और उसके लिए एक नया शब्द नत्थी पत्रकारिताचल पड़ा । इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ बड़ी पूंजी का जुड़ाव हो गया और मीडिया खुद शासक समुदाय का अंग हो गया । मीडिया घरानों के साथ पूंजी के जुड़ाव का यह नया स्तर पिछली सरकार में ही प्रकट होना शुरू हो गया था, इस नए शासन में तो रिपोर्टिंग की जगह भाजपा के मुख्यालय से ही प्राप्त खबरों और वीडियो का इस्तेमाल हो रहा है और रिलायंस के हाथ में ज्यादातर खबरिया चैनल आ गए हैं । सहारा के प्रयोग से बहुत आगे बढ़कर मीडिया पर अबाध नियंत्रण का राज स्थापित हो गया है । खबर और प्रचार के बीच अंतर समाप्त हो गया है । दृश्य साधनों के उपयोग और उनके जरिए निर्मित छवियों के प्रसारण ने फ़ोटो शापिंग की कला का रूप ले लिया है जिसमें लोग कैमरे की निगाह से सचाई देखने के आदी हो जाते हैं । 

13 शिक्षा और संस्कृति, खासकर इतिहास और समाज के वर्णन को हिंदुत्ववादी ढांचे में ढालना संघ का पसंदीदा काम है । शिक्षा में बत्रा की किताबों और अन्य अवैज्ञानिक दावों के जरिए अंधविश्वास को बढ़ावासंस्कृत की स्थापना और शैक्षिक संस्थानों की स्वायत्तता पर हमला इसके कुछ हथियार के बतौर दिखाई पड़े हैं । जातिगत भेदभाव और धार्मिक पाखंड का औचित्य बताने की कोशिश इन पुस्तकों की प्रेरणा होती है । शैक्षिक संस्थानों के मुखिया महाभारत और रामायण की घटनाओं की तारीख का पता लगाने के लिए शोध को प्रोत्साहित कर रहे हैं तो पुराण कथाओं को वैज्ञानिक सत्य की तरह पेश किया जा रहा है ।  

14 हालिया विवादधर्मांतरणगोकुशीलव जेहादआतंकवाद आदि मुद्दों का मकसद ही अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के विरुद्ध घृणा का व्यस्थित माहौल बनाना है । खासकर आतंकवाद का सवाल अमेरिका के साथ वैचारिक सहयोग के लिए भी मददगार है । जिस दिन चुनाव के नतीजे आए उसी दिन पुणे में साफ़्टवेयर इंजीनियर मोहसिन सादिक की हत्या प्रतीक के रूप में आगामी दिनों का आभास दे रही थी । अतीत को हथियाने की कोशिश में शिक्षक दिवस का इस्तेमाल स्कूलों में पारंपरिक शक्ति संबंधों के महिमा मंडन के लिए किया गया । गांधी जयंती को स्वच्छता तक सीमित तो किया ही गयास्वच्छता अभियान के तहत दिल्ली के त्रिलोकपुरी में वाल्मीकि समुदाय की स्वच्छता के लिए माता की चौकी स्थापित की गई । पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली में दलित और मुस्लिम समुदाय की आपसी दुश्मनी को आगामी चुनावी लाभ के लिए हवा दी जा रही है । एक ओर हिंदुत्व के पक्ष में प्रचंड धार्मिक उन्माद और दूसरी ओर कारपोरेट पूंजी के लिए सारी सरकारी मशीनरी की मददवर्तमान निजाम की प्रमुख विशेषताएं हैं । श्रम कानूनों और भूमि अधिग्रहण नियमों में संशोधन तथा विभिन्न परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया को उदार बनाना सरकार द्वारा निजी पूंजी को फ़ायदा पहुंचाने के प्रयास हैं । विदेशी पूंजी के हित में एफ़ डी आई की मंजूरीबीमा के जरिए स्वास्थ्य और निजी शिक्षा संस्थाओं के रास्ते शिक्षा में उनके प्रवेश की आहट सुनाई पड़ रही है । ‘मेक इन इंडिया’ का नारा विदेशी पूंजी के पक्ष में निर्यातोन्मुखी उद्योगीकरण का उपाय है । अनेक देशों में विकास के प्रदर्शन के नाम पर इस उपाय का सहारा लिया गया है, लेकिन कहीं भी इससे देशी अर्थतंत्र को मजबूती नहीं मिली है । अलबत्ता इस उपाय से अर्थतंत्र के एक हिस्से में नकली तेजी पैदा करके शेष अर्थव्यस्था को खतरे में डालने का इतिहास सबका जाना हुआ है । निजी पूंजी की सुविधा के लिए लेबर इंस्पेक्टरों की जांच की जगह संस्थानों की ओर से श्रम कानूनों के पालन के स्व-प्रमाणन की बात हो रही है । मारुति की कार अल्टो की चालक सीट का कवर बनाने का कारखाना ही तिहाड़ में लगाया गया है । न्यूनतम मजदूरी और बाल श्रम कानून में भी संशोधन का प्रस्ताव है ।

16 विकास की कुल बातचीत का मकसद हालात में वास्तविक सुधार की जगह मनोवैज्ञानिक तुष्टि प्रदान करना है । सबसे ऊंची मूर्ति, मंगल ग्रह अभियान, बुलेट ट्रेन आदि का ढोल इसी कारण पीटा जा रहा है । प्राचीन ज्ञान गुरु का दावा पहले से ही रहा है । इस तरह की रणनीति लगभग सभी गरीब मुल्कों के शासक अपनाते रहे हैं । जनसमुदाय की वास्तविक स्थिति में रोजमर्रा के अपमान से पैदा उनके सहज बोध में मौजूद प्रतिरोध की चेतना के सहारे इसका मुकाबला करना ठीक होगा । भाजपा जानती है कि गरीबी में रह रहे मनुष्य को झूठी शान के इस भावनात्मक धोखे की जरूरत होती है ।  

17 देश विभाजन, बाबरी मस्जिद विध्वंस और वर्तमान सरकार का गठन देश में हिंदू ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यक, खासकर मुस्लिम विरोध, का परिणाम रहे हैं । देश के बंटवारे ने हिंदू-मुस्लिम विभाजन का स्थायी स्रोत बना दिया था, बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाने का सपना उसी किस्म के ठोस ढांचे की स्थापना है जो भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को उनकी सामाजिक हैसियत हमेशा बताती रहे । इसलिए किसी भाजपाई द्वारा उसके निर्माण संबंधी वक्तव्य या संकल्प को प्रलाप मानना उचित न होगा । वर्तमान सरकार बहुसंख्यकवाद के आधार पर लोकतंत्र को पुनर्व्याख्यायित करने की कोशिशों को समर्थन और बढ़ावा देती दिखाई दे रही है । जबकि लोकतंत्र की बुनियाद बहुसंख्यकों नहींअल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करना ही माना जाता है । सत्ता के संसाधन के दुरुपयोग और गुंडा वाहिनी के गैर कानूनी कदमों के समन्वित तालमेल से फ़िलहाल उन्माद को हवा दी जा रही है । भविष्य में इसी कार्यनीति के सहारे बड़े से बड़े हत्याकांडों को भी खामोशी से अंजाम दिये जाने के संकेत हैं ।       

18 धर्मांतरण से जुड़ी हुई सबसे बड़ी समस्या जाति-व्यवस्था के रूप में सामने आई है । इसके साथ ही अंबेडकर की हिंदू समाज व्यवस्था के बारे में बुनियादी मान्यताएंकि दलित जातियां हिंदू समाज का अंग नहीं हैं और कि हिंदू समाज जाति-आधारित ऊंच-नीच के बिना नहीं रह सकताबहुत कुछ सही साबित हो रही हैं । हिंदू समाज में इसी वजह से धर्मांतरण की कोई धारणा नहीं रही थी । अंग्रेजों के आने के बाद जब भारतीय लोग समुद्र पारकर विदेश जाने लगे तो समुद्र के नमकीन पानी में हिंदू धर्म के गल जाने की बात कही जाने लगी । विदेश से लौटने के बाद उनकी शुद्धि के लिए जो कर्मकांड किए जाते थे उनमें गाय का गोबर खिलाना या गोमूत्र पिलाना या कुछ जगहों पर गोमूत्र छिड़कना आदि होते थे । देहाती इलाकों में जाति से बहिष्कृत परिवार को वापस जाति में लाने के लिए सामूहिक भोज का प्रचलन है । संघ ने तथाकथित ‘घर वापसी’ के बारे में कहा कि इसके जरिए हमने वापस आए लोगों को ‘स्वाभिमान और सलामती’ प्रदान की है । इसमें निहित धमकी की भाषा को पहचानना मुश्किल नहीं है ।

19 मुस्लिम विरोध के साथ ही कम्युनिस्ट विरोध भी इन ताकतों की रणनीति का जरूरी अंग है क्योंकि सामाजिक चेतना से मजदूरों-किसानों के सवालों को गायब किए बिना कारपोरेट हितों की बेशर्म तरफ़दारी मुश्किल होगी और उसके लिए चीन विरोध के हथियार को आजमाया जाता रहा है । समूचे बौद्धिक विमर्श से जनता की उत्पादक ताकतों के सवाल हट गए हैं और सोचे समझे तरीके से ऐसे प्रतीक निर्मित किए जा रहे हैं जो जीवन में आर्थिक सफलता को गरिमा प्रदान कर रहे हैं । हाल में फ़िल्मी कलाकारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों आदि का महिमामंडन लोगों के दिमाग में गंभीर सामाजिक राजनीतिक कर्म के अवमूल्यन की कोशिश का अंग हैं । नव-उदारवादी आर्थिकी के तहत सेलेब्रेटी सितारों की जीवन शैली को गौरवान्वित किया गया और उसके बाद राजनीति में उन्हें लाकर विधायी कामों की जिम्मेदारी भी उन्हीं को सौंप दी गई है । यह भी वाम-विरोधी वैचारिक मुहिम का ही अंग है । फ़िलहाल कम्युनिस्ट विरोध की बात सीधे सीधे न कहकर माओवादियों के खात्मे के नाम पर वामपंथ विरोधी वैचारिक माहौल के जरिए की जा रही है । इससे विकास के कारपोरेट-समर्थक विमर्श में मदद मिल रही है और पूर्व सरकार द्वारा निर्मित वातावरण का लाभ भी । आश्चर्यजनक नहीं कि जिन चीजों का वैचारिक विरोध करने का आवाहन दक्षिणपंथियों की ओर से किया जा रहा है उसमें मैकालेवादमिशनरी और मुस्लिम आतंकवाद के साथ मार्क्सवाद और भौतिकवाद भी हैं । संपदा के सृजन में मेहनत की जगह कौशल और व्यापार की भूमिका को अधिक महत्वपूर्ण साबित करने के प्रयास भी न केवल सतही भाषणों और सरकारी घोषणाओं मेंबल्कि अकादमिक दुनिया में भी होने लगे हैं ।       

20 सारतपूंजी के पक्ष में उसके शोषण के शिकार लोगों को खड़ा कर देने की यह विशिष्ट राजनीति है जिसका प्रयोग आम तौर पर संसदीय लोकतंत्र के परदे में अपना स्वार्थ साधने वाली पूंजी संकट में करती है । संकट में पड़ने पर पूंजीवाद कभी सामंती ताकतों से समर्थन लेने से परहेज नहीं करता रहा है । इंग्लैंड में महारानी और जापान में सम्राट के ताज की मौजूदगी तथा अमेरिका में इसाई कठमुल्ला ताकतों का राजनीतिक प्रभाव इसी तथ्य की गवाही देते हैं । भारत में भी जाति आधारित हिंदू धर्म पूंजीवाद के लिए सस्ते श्रम को जुटाने का साधन रहा है और आज श्रमिकों को बांटने और भ्रमित करने का अस्त्र बन गया है ।

 

Tuesday, January 6, 2015

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तर्क पद्धति

              
                                                                                                                                                                                     
शुक्ल जी की तर्क पद्धति को कोई नाम देना जरुरी नहीं है लेकिन ध्यान तो वह अवश्य खींचती है । यह पद्धति उनके भाव या मनोविकार संबंधी निबंधों में व्यक्त हुई है । कहीं अलग से उन्होंने इसे स्पष्ट नहीं किया है लेकिन चिंतामणि- भाग 1’ के निबंधों में वह आद्यंत समाई हुई है । आचार्य शुक्ल की यह तर्क पद्धति केवल उनके निबंधों तक सीमित नहीं है बल्कि उनकी आलोचना और विशेष रूप से ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में प्रकट होती है । इतिहास में हजारेक साहित्यकारों का जिक्र होने के बावजूद किन्हीं दो लोगों की साहित्यिक विशेषता के उल्लेख में दोहराव नहीं मिलेगा । ऐसा विश्लेषण अर्थात अलग अलग करके देखने और समझने की अगाध क्षमता से ही संभव है । निबंधों में इस पद्धति की पहचान सबसे अधिक आसानी से होती है । 
सबसे पहले हमारा सामना द्वैत में द्वंद्व को रेखांकित करने वाली दृष्टि से होता है जिसमें परस्पर विरोधी तत्वों की मौजूदगी एक ही साथ दिखाई देती है । मसलन पहले ही निबंधभाव या मनोविकारमें पहला वाक्य है- ‘अनुभूति के द्वंद्व ही से प्राणी के जीवन का आरंभ होता है ।यह जोड़ा सुख और दुख की सामान्य अनुभूतियों का है । एक ही प्राणी में ऊपर से आपस में विरोधी प्रतीत होने वाली अनुभूतियों की उपस्थिति के अलावे उनकी बढ़ती हुई जटिलता की व्याख्या के लिए वे उस समय यूरोपीय चिंतन में प्रभावी एक अन्य दार्शनिक पद्धति की मदद लेते हैं । उसे हम विकासवाद के नाम से जानते हैं और उसका असर भी मौजूद है जब वे जीवन के आगे बढ़ने के साथ इनकी जटिलता को भी बढ़ता हुआ दिखाते हैं । ध्यान देने की बात है कि विकासवाद प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धति थी, खासकर वनस्पति विज्ञान की जिसमें किसी वनस्पति में उसके ही आंतरिक गुणों का विकास दिखाई देता था । लेकिन आचार्य शुक्ल के लिए विकास का मतलब इन्हीं अनुभूतियों का आंतरिक विकास नहीं बल्कि मनुष्य के सामाजिक जीवन का विकास है जिसके साथ ये अनुभूतियाँ क्रमशः जटिल होती जाती हैं । सामाजिक जीवन के इस विकास को वे दुनिया के बारे में व्यक्ति की बढ़ती हुई जानकारी से परिभाषित करते हैं- ‘नाना विषयों के बोध का विधान होने पर ही उनसे संबंध रखने वाली इच्छा की अनेकरूपता के अनुसार अनुभूति के भिन्न भिन्न योग संघटित होते हैं जो भाव या मनोविकार कहलाते हैं । सामान्य मनोभावों से शुरू होकर जटिल मनोभावों की ओर यह विकास अपनी यात्रा में व्यक्ति की उम्र में बढ़ोत्तरी के साथ ही समाजीकरण की बढ़ोत्तरी के चलते उसके ज्ञान के विस्तार को मान्यता देता है । मनोभावों के विकास की यह समझदारी ज्ञान के विकास के साथ ही मनुष्य की संवेदनशीलता के भी विस्तार के समूचे आयाम समेटे हुए है । संभवत: इसी समझ के विनिवेशन से साहित्य की ऐसी धारणा की स्थापना होती है जिसके अनुसार साहित्य मानव मन के भावजगत से जुड़ा होता है और धार्मिक कृतियों के मुकाबले सार्वभौमिक पहुंच रखता है । जिस मनुष्य के भावजगत को वह संबोधित होता है वह मनुष्य ऐहिक प्राणी है और उसकी भावनाओं का निर्माण इसी दुनिया-समाज में होता है । इसी के चलते साहित्यिक रचना को भी अपना विषय इसी दुनिया-समाज से उठाना पड़ता है तभी वह पाठक के मन में वांछित भावों को उद्बुद्ध कर पाता है ।     
चूँकि ये भाव यौगिक यानी आपस में मिले हुए होते हैं इसलिए पहला काम उन्हें अलगाकर पहचानना है । इसके लिए शुक्ल जी जिस पद्धति का सहारा लेते हैं उसे अरस्तू द्वारा प्रस्तुत परिभाषा की परिभाषा से सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है । विल ड्यूराँ ने अपनी किताबद स्टोरी आफ़ फिलासफीके दूसरे अध्याय में बताया है कि अरस्तू के अनुसार किसी भी बेहतरीन परिभाषा के दो अंग होते हैं- सबसे पहले जिस चीज की परिभाषा करनी है उसे उससे मिलते जुलते लक्षणों की चीजों के प्रवर्ग में रखना होता है, फिर यह बताना होता है कि उस प्रवर्ग की बाकी चीजों से उसकी भिन्नता क्या है । इस पद्धति को हम शुक्ल जी द्वारा भावों को एकदम स्पष्ट करने की चेष्टा में सफलता से लागू करते हुए देखेंगे । पहले हमने जिन दो प्रवर्गों का जिक्र किया अर्थात सुखात्मक और दुखात्मक अनुभूतियों के प्रवर्ग, उनमें शुक्ल जी समस्त भावों को विभाजित करते हैं, उसके बाद उनकी विशेषता बताते हैं । विशेषता बताने के लिए जरूरी है कि किसी भाव को शेष भावों से अलगाया जाए । उदाहरण के लिए दुखात्मक अनुभूतियों के प्रवर्ग में से वे क्रोध और भय को इस तरह पहचनवाते हैं- ‘हानि या दुःख के कारण में हानि या दुःख पहुँचाने की चेतन वृत्ति का पता पाने पर हमारा काम उस मूल अनुभूति से नहीं चल सकता जिसे दुःख कहते हैं बल्कि उसके योग से संघटित क्रोध नामक जटिल भाव की आवश्यकता होती है । जब हमारी इंद्रियाँ दूर से आती हुई क्लेशकारिणी बातों का पता देने लगती हैं, जब हमारा अंतःकरण हमें भावी आपदा का निश्चय कराने लगता है; तब हमारा काम दुःख मात्र से नहीं चल सकता बल्कि भागने या बचने की प्रेरणा करनेवाले भय से चल सकता है ।इससे क्रोध और भय के बीच समानता और अंतर का पता चलता है । समानता यह कि दोनों दुःख से पैदा होती हैं; क्रोध दुःख के चेतन (ज्ञात) कारण के प्रति पैदा होता है जबकि भय दुःख के अचेतन (अज्ञात) कारण से होता है ।
भावों की मौजूदगी मात्र का कोई अर्थ नहीं । भावों के फलस्वरूप इच्छा का जन्म होता है जिससे विभिन्न शारीरिक प्रयत्न प्रकट होते हैं । लेकिन इन प्रयत्नों से भी महत्वपूर्ण है भाषा जिससे इसकी अभिव्यक्ति में व्यापकता आती है । शुक्ल जी कहते हैं- ‘बात यह है कि भावों द्वारा प्रेरित प्रयत्न या व्यापार परिमित होते हैं । पर वाणी के प्रसार की कोई सीमा नहीं । उक्तियों में जितनी नवीनता और अनेकरूपता आ सकती है या भावों का जितना अधिक वेग व्यंजित हो सकता है उतना अनुभाव कहलानेवाले व्यापारों द्वारा नहीं ।इस तरह इस पूरे विवेचन में भाषा भी एक महत्वपूर्ण संकेतक के बतौर विचारणीय हो जाती है । साथ ही ‘अनुभाव’ जैसी शब्दावली का प्रयोग हमें इस तथ्य के प्रति जागरूक रखता है कि बात मनोविज्ञान की नहीं, काव्यशास्त्र की हो रही है । यह अलग बात है कि वांछित मनोभाव को जगाना साहित्यिक रचना का उद्देश्य होता है इसलिए मनोभावों का काव्यशास्त्रीय विवेचन भी सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पर्यवेक्षण पर आधारित है । 
भावों का यह समस्त विवेचन बिना किसी कारण नहीं किया गया वरन इसके पीछे निश्चित उद्देश्य हैं । ये उद्देश्य उनके इस वाक्य से स्पष्ट होते हैं- ‘समस्त मानव जीवन के प्रवर्तक भाव या मनोविकार ही होते हैं । मनुष्य की प्रवृत्तियों की तह में अनेक प्रकार के भाव ही प्रेरक के रूप में पाए जाते हैं ।इसी विंदु पर आचार्य शुक्ल भावों के सामाजिक प्रकार्य की दृष्टि से उनका विवेचन करते हैं । भावजगत के परिष्कार का मक़सदनरसत्ताका प्रसार है क्योंकिरागात्मिका वृत्ति के प्रसार के बिना विश्व के साथ जीवन का प्रकृत सामंजस्य घटित नहीं हो सकता ।यहां स्वाभाविक रूप सेनरका अर्थ मनुष्य समझना होगा । हम सभी जानते हैं कि उस समय भाषा में लिंग संवेदनशीलता उतनी नहीं थी । लेकिन मनुष्य के प्रति भी बहुत ही व्यापक दृष्टि अपनाई गई है । उसका प्रसार मानव समाज तक तो है ही, प्राणी जगत भी उसी के भीतर समाहित हो जाता है । इससे भी आगे बढ़कर शुक्ल जी के चिंतन में समूची प्रकृति के अभिन्न अंग के रूप में मनुष्य दिखाई पड़ता है । यह बात तब और पुष्ट हो जाती है जब हम पाते हैं कि शुक्ल जी कविता का उद्देश्य ‘शेष प्रकृति’ के साथ मनुष्य के ‘रागात्मक संबंधों की रक्षा और निर्वाह’ घोषित करते हैं । स्वाभाविक रूप से शेष प्रकृति में किसी एक व्यक्ति के अलावा समस्त मानव समाज, मानवेतर प्राणी जगत और समूची प्रकृति आ जाते हैं । इन सबके बीच आपसी निर्भरता को बचाए रखना ही मानव समाज की स्थिति के लिए भी उन्हें आवश्यक लगता था । इस मामले में आचार्य शुक्ल का चिंतन अपने समय से बहुत आगे तक रोशनी फेंकता है ।   
दूसरे ही निबंधउत्साहमें वे एक वाक्य में कहते हैं- ‘दुःख के वर्ग में जो स्थान भय का है, वही स्थान आनंद वर्ग में उत्साह का है ।कैसे? दोनों में ही प्रयत्न की प्रधानता होती है लेकिन एक दूसरे के विपरीत । भय में भागने का प्रयत्न दिखाई पड़ता है तो उत्साह में कर्म में प्रवृत्त होने का । फिर उत्साह से मिलते जुलते भावों से उसका संबंध बताते हैं- ‘धृति और साहस दोनों का उत्साह के बीच संचरण होता है ।लेकिन साहस भी सभी तरह का नहीं ‘--केवल कष्ट या पीड़ा सहन करने के साहस में ही उत्साह का स्वरूप स्फुरित नहीं होता । उसके साथ आनंद पूर्ण प्रयत्न या उत्कंठा का योग चाहिए ।सामाजिक उपादेयता के नजरिए से इसका मूल्यांकन करते हुए कहते हैं- ‘उत्साह की गिनती अच्छे गुणों में होती है ।साथ ही भावों की अच्छाई बुराई का पैमाना भी तय करते हैं- ‘किसी भाव के अच्छे या बुरे होने का निश्चय अधिकतर उसकी प्रवृत्ति के शुभ या अशुभ परिणाम के विचार से होता है ।इसी निबंध में वे भावों की निरंतरता भी समझाते हैं और इसके लिए आम जीवन से उदाहरण चुनते हैं ।
अगले निबंधश्रद्धा-भक्तिमें यह तर्क प्रक्रिया और भी परिपक्व रूप में प्रकट हुई है । उसका रूप वर्णन सबसे पहले इस तरह किया गया है कि उसे पहचानने में कोई कठिनाई न हो- ‘किसी मनुष्य में जन-साधारण से विशेष गुण व शक्ति का विकास देख उसके संबंध में जो एक स्थायी आनंद-पद्धति हृदय में स्थापित हो जाती है उसे श्रद्धा कहते हैं ।ये गुण सामाजिक रूप से शुभ परिणामी होने चाहिए तभीजिन कर्मों के प्रति श्रद्धा होती है उनका होना संसार को वांछित है ।इसके सबसे निकट का भाव प्रेम है इसलिए उससे श्रद्धा को साफ तौर पर अलगाने की कोशिश अनेक उदाहरणों के सहारे की गई है । उदाहरणों के बाद एकाधिक सूत्रात्मक वाक्य भी आए हैं ।श्रद्धा का व्यापार-स्थल विस्तृत है, प्रेम का एकांत । प्रेम में घनत्व अधिक है और श्रद्धा में विस्तार ।---यदि प्रेम स्वप्न है तो श्रद्धा जागरण है । प्रेम में केवल दो पक्ष होते हैं, श्रद्धा में तीन । प्रेम में कोई मध्यस्थ नहीं, पर श्रद्धा में मध्यस्थ अपेक्षित है ।मध्यस्थ कोई व्यक्ति नहीं होता, श्रद्धास्पद के कर्म होते हैं । बात पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाई थी इसलिए फिर से जोड़ा- ‘प्रेम का कारण बहुत कुछ अनिर्दिष्ट और अज्ञात होता है; पर श्रद्धा का कारण निर्दिष्ट और ज्ञात होता है ।---श्रद्धा में दृष्टि पहले कर्मों पर से होती हुई श्रद्धेय तक पहुँचती है और प्रीति में प्रिय पर से होती हुई उसके कर्मों आदि पर आ जाती है । एक (श्रद्धा-लेखक) में व्यक्ति को कर्मों द्वारा मनोहरता प्राप्त होती है, दूसरी (प्रेम-लेखक) में कर्मों को व्यक्ति द्वारा । एक में कर्म प्रधान है, दूसरी में व्यक्ति । आधुनिक पूंजीवादी समय के स्वार्थी व्यक्तिवाद का प्रतिवाद शुक्ल जी की चेतना में समाया हुआ है और उनके इस पहलू का मूल्यांकन होना अभी बाकी है । साहित्य का धर्म ही वे मनुष्य की व्यक्ति-सत्ता को कुछ देर के लिए लोक-सत्ता में विलयित कर देना मानते हैं ।  
आचार्य शुक्ल की विश्लेषण क्षमता का प्रमाणघृणाशीर्षक निबंध में प्रस्तावित यह विभाजन है – ‘मनोविकार दो प्रकार के होते हैं- प्रेष्य और अप्रेष्य । प्रेष्य वे हैं जो एक के हृदय में पहले के प्रति उत्पन्न होकर दूसरे के हृदय में भी पहले के प्रति उत्पन्न हो सकते हैं, जैसे क्रोध, घृणा, प्रेम इत्यादि ।---अप्रेष्य मनोविकार जिसके प्रति उत्पन्न होते हैं उसके हृदय में यदि करेंगे तो सदा दूसरे भावों की सृष्टि करेंगे । उसके अन्तर्गत भय, दया, ईर्ष्या आदि हैं ।इस निबंध में की शुरुआत में ही उनकी तर्क पद्धति की विशेषताओं के दर्शन होने लगते हैं । शुक्ल जी के समस्त लेखन की एक बड़ी विशेषता सूत्रवत वाक्य निर्माण है । इसका संबंध उनकी तर्क पद्धति से है । उनका पूरा ध्यान किसी भी वर्ण्य विषय से पाठक को अच्छी तरह परिचित करा देना है ताकि वह उसे पहचानने में भूल न करे । लोग उदासीनता को भी घृणा का नाम देते हैं लेकिन दोनों में महत्वपूर्ण अंतर है । यह अंतर हमारी सक्रियता से जुड़ा हुआ है । लिखते हैं- ‘जिस बात से हमें घृणा है, हम चाहते क्या आकुल रहते हैं कि वह बात न हो, पर जिस बात से हम उदासीन हैं उसके विषय में हमें परवाह नहीं रहती; वह चाहे हो, चाहे न हो ।’ कहने की जरूरत नहीं कि शुक्ल जी की चिंता ऐसी चीजों को न होने देने की है जो ‘अरुचिकर’ होती हैं । इन चीजों के संबंध में उनका कहना है कि ‘घृणा और श्रद्धा के मानसिक विषय’ प्राय: सर्वस्वीकृत होते हैं । 
घृणा को स्पष्ट करने के क्रम में वे इसके सामाजिक मूल को बताना चाहते हैं । इसी क्रम में मनुष्य के सामाजिक अनुभव में विस्तार आने से इस मनोभाव के पैदा होने की प्रक्रिया को सूत्रवत व्यक्त करते हैं- ‘सृष्टि-विस्तार से अभ्यस्त होने पर प्राणियों को कुछ विषय रुचिकर और कुछ अरुचिकर प्रतीत होने लगते हैं ।यहांरुचिकर-अरुचिकरके द्वैत पर अनायास नजर जाती है लेकिन घृणा का संबंधअरुचिकरके साथ है इसलिए दूसरा ही वाक्य इसे स्पष्ट करता है- ‘इन अरुचिकर विषयों के उपस्थित होने पर अपने ज्ञान-पथ से उन्हें दूर रखने की प्रेरणा करनेवाला जो दु:ख होता है उसे घृणा कहते हैं ।अरुचिकर की उपस्थिति से घृणा के अलावा क्रोध भी हो सकता है इसलिए उससे इसका अंतर करना उन्हें जरूरी लगा । अंतर स्थापित करते हुए फिर से सामाजिक जीवन से उन्होंने जो उदाहरण दिया है वही आचार्य शुक्ल की सामाजिक संवेदनशीलता को समझने के लिए पर्याप्त है । इन दोनों मनोभावों के बीच अंतर है किहम अत्याचारी पर क्रोध और व्यभिचारी से घृणा करते हैं ।कुछ देर बाद ही यह अंतर सक्रियता से व्याख्यायित होने लगता है जब वे कहते हैं- ‘घृणा का भाव शांत है उसमें क्रियोत्पादिनी शक्ति नहीं है । घृणा निवृत्ति का मार्ग दिखलाती है और क्रोध प्रवृत्ति का ।क्रोध का ही एक रूप वैर भी होता है, उससे घृणा का अंतर भी ध्यान देने लायक है- ‘वैर का आधार व्यक्तिगत होता है, घृणा का सार्वजनिक ।आश्चर्य की बात नहीं कि सामाजिक दृष्टि से घृणा को जरूरी समझने के मामले में आचार्य शुक्ल अकेले नहीं हैं । उन्हीं के समकालीन लेखक प्रेमचंद ने भीसाहित्य में घृणा की उपयोगिताशीर्षक निबंध लिखा था । उस समय घृणा की जरूरत को रेखांकित करने की इन साहित्यिक कोशिशों के पीछे कहीं न कहीं सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की चाहत थी ।   
उपर्युक्त विवेचन से शुक्ल जी के लेखन की एक और विशेषता स्पष्ट होती है । उनकी साहित्य संबंधी आलोचना और विवेचन के मूल में गहरा नैतिक-सामाजिक दायित्व बोध मौजूद है । यह नैतिकता स्थूल विधि-निषेध पर आधारित न होकर सामाजिक कल्याण की भावना से आप्लावित है । उनके निबंधों के विश्लेषण से पता चलता है कि साहित्यालोचन के लिए केवल साहित्यिक रुचि ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि साहित्यिक रुचि भी सामाजिक कल्याण के नैतिक दायित्व-बोध से उपजती है । इसके अभाव में आलोचना काव्य-कला की पहचान की रीतिवादी रुचि में पतित हो जाने के लिए मजबूर है और साहित्येतिहास भी कवि कीर्तन मात्र रह जाएगा ।

आचार्य शुक्ल के साहित्यालोचन के मूल में पूंजीवाद से उत्पन्न व्यक्तिबद्धता और स्वार्थ के बोलबाले तथा समाज के स्वस्थ संचालन के लिए आवश्यक सहज मानवीय गुणों की जगह लोभ की प्रतिष्ठा के प्रति उनकी नैतिक आलोचना है । ठोस रूप से कहें तो ब्रिटिश उपनिवेशवाद में इस पूंजीवादी लोभ को संस्थाबद्ध रूप प्राप्त हुआ था इसलिए इसकी आलोचना भी उनके काव्यालोचन की अंतर्धारा है । सभ्यता को वे मनोभावों पर ‘आवरण’ डालने वाली चीज समझते थे और कविता को मनोभावों के सहज प्रकटन का माध्यम मानते थे । इस मामले में उन्होंने अपने समय में उठ रही स्वाधीनता की आकांक्षा का साथ दिया । तभी वे अपने समय की काव्य प्रवृत्ति (छायावाद) की पृष्ठभूमि का निरूपण करते हुए यह चिन्हित कर सके कि उस समय हमारे देश का स्वाधीनता आंदोलन, स्वतंत्रता के एक विश्वव्यापी उभार के अंग के रूप में दिखाई पड़ा । आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना की इन्हीं विशेषताओं के कारण हिंदी की प्रगतिशील आलोचना ने आम तौर पर उसे विरासत के रूप में ग्रहण किया और आगे बढ़ाया ।